Archive for: February 2013

अब वे वासर बीत गये : कांतिकुमार जैन

कांतिकुमार जैन

कांतिकुमार जैन

साठ के बाद जीवन आम आदमी ही नहीं, रचनाकारों के लि‍ये भी चिंता का वि‍षय है। लेकि‍न क्‍या इस जीवन में कोई आनंद नहीं रह जाता या रचनात्‍मकता नहीं रह जाती। क्‍या आदर्श स्‍थि‍ति‍ होनी चाहि‍ए। चर्चित संस्‍मरणकार कांति‍कुमार जैन का आलेख-

साठ  पार का जीवन हिन्‍दी साहित्य के प्रारम्‍भ से ही कवियों की चिंता और चिन्‍तन का एक प्रमुख विषय रहा है। उद्दाम वासना के सिद्ध वाक् कवि विद्यापति को साठ पार के जीवन को स्वीकार करने में बड़ी कठिनाई हुई थी- ‘माधव, हम परिनाम’। इस निराशा का कारण था कि अब उन्हें ‘सुत मित रमनि समाज’ सब ‘तापत सैकत वारिबिन्दु सम’ लगने लगे थे। जैसे तप्त बालुका राशि पर पानी की बूंद गिरे और छन्न हो जाये,  वैसे ही बुढ़ापे में न सुत काम आते हैं, न मित्र। रमणियाँ बाबा कहने लगती हैं- मैं क्या करूँ राम, मुझे बुढ्ढा मिल गया जैसा मनोभाव। कबीर जैसा कवि को भी साठ के पार पहुँचकर यह अनुभूति हुई थी कि इस संसार में रहने का अब कोई अर्थ नहीं है। यह बिराना देश है और इस काँटे की बाड़ी में रहने का जो भी उद्यम करेगा, उसे उलछ प्रलछ कर ही रहना होगा। पर साठ के पार जीवन को लेकर सबसे मार्मिक बातें सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने कही हैं। ‘पद्मावत’ के उपसंहार कांड में उसने बड़ी वेदना से लिखा- अब बूढ़ी आयु हो गई है। दृष्टि  मंद हो गई है और नेत्रों में पानी ढलने लगा है। दाँतों के गिरने से गाल पिचक गये हैं, अब मेरे बोल किसी को नहीं सुहाते। विचारने की शक्ति चली गई, गर्व चला जाता है, शीश धुनी हुई रुई के समान हो गया है। कानों से ऊँचा सुनाई पडऩे लगा है। केशों में रहने वाले भौरों की श्यामता चली गई है। शरीर जीते जी मरे के समान हो गया है। जब तक यौवन है तभी तक जीवन है। फिर पराये वश हो जाना- यही मृत्यु है। साठ पार के जीवन को जायसी स्वीकार नहीं कर पाते-

विधि जो सीस डुलावे, सीसे धुनै तेहि रीस
बूढ़े-आढ़े होहु तुम, केहि यहि कीन्ह असीस।

‘बूढ़े आढ़े’ अर्थात् वृद्ध और प्रतिष्ठित वरिष्ठ नागरिकों को शासन की ओर से सुविधाएँ तो अब दी जाने लगी हैं, उन्हें सम्मानीय भी माना जाने लगा है पर ‘निराला’ तो बुढ़ापे में नितांत अकेलेपन का अनुभव करते थे-

मैं अकेला
देखता हूँ आ रही मेरे दिवस की सांध्य बेला।

मैथिलीशरण गुप्त जी ने बड़े दु:ख से लिखा :

अब वे वासर बीत गये
मन तो भरा भरा है लेकिन तन के सब रस रीत गये
चमक छोड़ चौमासे बीते, कंवल छोड़कर शीत गये
लेकर मधु की ऊष्मा सारी, मेरे मन के पीत गये
अब तो केवल गूँज बची है जीवन के सब गीत गये
इस राम जाने जीवन में, हम हारे या जीत गये

चलाचली की बेला के यही दु:ख हैं। अब आप न मुंगौड़े खा सकते हैं, न इमरिती। दही बड़े खाने से कफ भड़क उठता है और खाँसते-खाँसते पसलियाँ दु:खने लगती हैं। बुखार चढ़ा रहता है सो अलग। मृत्यु भय के कारण रात भर नींद नहीं आती। गालिब के मन पर मौत छाई रहती थी। उसके शेरों में मौत का जिक्र बारबार आता है। शायद जीवन भर के अभाव, तंगदस्ती। दु:ख ही शायद गालिब के जीवन की कथा रही हो-

कैदे हयात बंद गम असल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी गम से निजात पायें क्यों?

बुंदेली कवि ईसुरी को मृत्यु से भय नहीं लगता था उन्होंने कहा-

आ गये मरबे के दिन मोरे
चल जात जे जी रे
अब तो देह अगन वा रई ना, हात पाँव सब सीरे
डारन लगे रात हैं नइया, पात होत जब पीरे

पर ये सारे कवि इस बात से दु:खी है कि ‘आछे दिन पाछे गये, हरि सो किया न हेत। अब पछताये होत का जब चिडिय़ा चुग गई खेत।’ जीवन की व्यर्थता का बोध। दूसरा दु:ख इस बात का है कि अब पुलिस का प्रियतमा नहीं आती।

‘अज्ञेय’ ने अपने एक हाइकू में लम्‍बे जीवन की अनुभूतियों का सार-संक्षेप प्रस्तुत करते हुए लिखा है-

झरना
झरता पत्ता हरी डाल पर
अटक गया।

विद्वानों ने इसका जो भी अर्थ किया हो, मेरी दृष्टि  में साठ पार के जीवन का अर्थ है झरना अवश्यभावी है। ‘धरा को प्रमान यहै तुलसी जो फरासो झरा, जो जरा सो बुताना’। हरसिंगार झरते हैं झर-झर- जो जीवित है वह झरेगा ही पर झरते हुए व्यक्ति को नाना मोह घेरे रहते हैं : बैंक बैलेंस कितना है, मेरे बाद मेरी चल अचल संपत्ति का क्या होगा, मेरी पुस्तकों की रायल्टी किसे मिलेगी, वह मिलेगी भी या नहीं? फिर मेरी जो तमाम अप्रकाशित रचनाएं पड़ी हुई हैं वे क्या यों ही नष्ट हो जायेंगी। साहित्यकार की सबसे बड़ी पीड़ा होती है उसकी कृतियों का अप्रकाशित रह जाना। मेरे मित्र प्रमोद वर्मा का ‘समग्र’ उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ है। मुक्तिबोध जी का पहिला संग्रह तब छपा जब वे दिवंगत हो चुके थे। अशोक वाजपेयी ने अपने स्तंभ ‘कभी कभार’ में अपने बाल सखा रमेश दत्त दुबे की रचनाओं के महत्व का आकलन करते हुए लिखा था कि‍ किसी अच्छे प्रकाशक को रमेश दत्त दुबे की कृतियाँ प्राप्त कर उन्हें प्रकाशित करने में रुचि लेना चाहिए ताकि आंचलिक आधुनिकता का विरल रूप सामने आ सके। हिन्‍दी में एक नहीं, अनेक ऐसे साहित्यकार हैं जिनकी रचनाएं उनके जीवन काल में प्रकाशित नहीं हो पातीं। हमें ऐसा कोई तंत्र विकसित करना चाहिए कि लेखक की महत्वपूर्ण रचनाएं पाठकों के सामने उसके जीवन काल में ही सामने आ सकें और लेखक को अपने लिखे हुए को प्रकाशित देखने और उससे सार्थकता की अनुभूति हो सके।

हिन्‍दी कवियों ने साठ पार के जीवन के आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और शारीरिक पक्षों का उल्लेख तो किया है पर आर्थिक पक्ष की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। कारण- प्रारम्‍भ से ही हमारे कवियों ने दैन्य को/विपन्नता को महिमा मंडित किया है और माँग के खाने और मसीत में सोने को बुरा नहीं माना है। कुछ ऐसे भी हैं जो सत्ता में भागीदारी करते रहे हैं। मीर, चंदबरदाई की तरह, खुसरो की तरह, केशवदास की तरह या अब्दुर रहीम खान की तरह, ये सब जीवन की सुविधाओं का सुख भोगते रहे हैं। साहित्य का इतिहास हमें बताता है कि सत्ता के सुख के लिये हमारे कवियों का दरबार से जुडऩा आम रहा है। सत्ता की सत्ता, साहित्य का माने जाने का सुख अलग। केशव और तुलसी केवल मध्यकाल के सत्य नहीं हैं, हमारे आधुनिक काल के भी सत्य हैं। अज्ञेय और मुक्तिबोध, अशोक वाजपेयी और राजकमल चौधरी जैसे युग्म हमारी परम्‍परा का अनिवार्य हिस्सा हैं। हिन्‍दी में निराला जैसा होल टाइम साहित्यकार बिरला ही होगा। आधुनिक काल के अधिकांश हिन्‍दी साहित्यकारों के लिये साहित्य पार्टटाइम धंधा है। साठ पार के जीवन की कोई योजना उनके पास नहीं होती है। इधर नौकरीपेशा साहित्यकारों को पेंशन, भविष्य निधि आदि के कारण वृद्धावस्था के लिये सुरक्षा प्राप्त है। अन्यथा आज से बीस-पच्चीस वर्ष पहिले आपको मुक्तिबोध, परसाई या शरद जोशी जैसा साठोत्तरी जीवन जीना पड़ता। अब तो अकादमियों की पीठों की अध्यक्षता, प्रकाशन गृह का परामर्श जैसे दायित्व साहित्यकारों को चिंतामुक्त रखते हैं पर अधिकांश तो इतने सौभाग्यशाली नहीं होते। हिन्‍दी का साहित्यकार जब दुर्घटनाग्रस्त होता है या अस्वस्थ तो सरकार से वित्तिीय सहायता माँगने का रिवाज है। उन साहित्यकारों के प्रकाशक, उन साहित्यकारों के संरक्षक संघ या मंच कभी-कभी ही उनकी सुध लेते देखे जाते हैं। अब सरकार साहित्यकार की वित्तीय सहायता करेगी तो वह साहित्यकार के विचारों का रंग भी देखेगी और आपातकाल में उसका स्टैंड भी। हिन्‍दी के हमारे साहित्यकार इसी में गदगद हो जाते हैं कि शीला जी, त्रिलोचन जी के निवास पर पहुँचकर उनकी खोजखबर ले आती हैं या मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री किसी दुर्घटनाग्रस्त कवि की कोई कविता पाठ्यक्रम में सम्मिलित किये जाने की घोषणा कर देते हैं। साहित्यकारों को उचित रायल्टी मिले, पुरस्कारों में पक्षपात न हो, पीठों पर नियुक्तियों में भाई भतीजावाद या रंगदारी न चले, इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। विज्ञान और तकनीक की प्रगति के कारण साठ पार के जीवन की समस्याओं का समाधान अब उतना कठिन नहीं रहा बशर्ते वित्त का अभाव न हो। यह तभी सम्‍भव है जब साहित्यकार के लिए समाज में सम्मान ही नहीं, उसकी चिंता भी हो उसके वार्धक्य की निश्चिंतता के लिये हमारे समाज और हमारे सत्ताशीर्षों में चिंता का अभी कोई सुनिश्चित संकेत नहीं है।

यहाँ अपने प्राध्यापकीय जीवन के एक अनुभव का उल्लेख करना मुझे वाँछनीय लगता है। सूरदास का पद ‘मधुवन तुम कत रहत हरे’ की व्याख्या करते हुए मैं कवि के अंधत्व के विभिन्न पक्षों की चर्चा करता। कहता कि सूर जन्मान्ध नहीं हो सकते, यदि होते तो उन्हें हरे रंग का ज्ञान नहीं होता। जिसने जीवन में कभी रंगों का वैविध्य देखा ही नहीं, उसे क्या पता कि मधुवन हरा है या पीला। उसे तो यह भी संज्ञान नहीं हो सकता कि नीले और काले में क्या भेद होता है। बिहारी यदि जन्मान्ध होते तो वे ‘सोहत ओढ़े पीतपट स्याम सलोने गात’ जैसी पंक्ति नहीं लिख सकते थे। ‘नीलांबर परिधान हरित पट पर सुंदर है’ जैसा कुछ लिखने के लिये मैथिलीशरण गुप्त की आँखें सजग होनी ही चाहिए। जन्मान्ध के लिये इन्द्रधनुष की कल्पना करना सम्‍भव नहीं है। मैं अपने छात्रों से यह भी पूछता कि उन्हें,  भगवान न करे, यदि कभी अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों में से किसी एक को अक्षुण्ण रखने का चुनाव करना हो तो वे किसे सुरक्षित रखना चाहेंगे? घ्राणेन्द्रिय की रक्षा किसी की भी प्राथमिकता नहीं थी। घ्राण न भी तो उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। घ्राण विलासिता की इन्द्रिय है, जीवन के लिए घ्राण का उपयोग बहुत ही सीमित है। साहित्य में घ्राणेन्द्रिय के संवेदन का उल्लेख सबसे कम है। स्वाद जिह्वा का एक मात्र कार्य नहीं है। मनुष्य ने विकास क्रम में जिह्वा को स्वाद लेने की तुलना में ध्वनियों का उच्चारण करने जैसा अधिक सामाजिक और उपयोगी कार्य सौंप दिया है। जिह्वा के अभाव में हम गूंगे हो जायेंगे और हमारी सामाजिकता का बहुलांश समाप्त हो जायेगा। उस समय तक साहित्य में वाचिक परम्‍परा का महत्व स्थापित नहीं हुआ था। अन्यथा मैं कहता कि जिह्वा के बिना न रजनीश संभव हैं, न नामवर। विद्यार्थी सहमत होते कि विवशता में वे अपनी घ्राणेन्द्रिय का और फिर स्वादेन्द्रिय को परित्याग करने का प्रस्तुत हो जायेंगे। स्पर्श का क्या किया जाये? स्पर्श के लिये हमें दूसरे के निकट आना पड़ता है। रिमोट में हम स्पर्श से संवेदित नहीं हो सकते। श्रृंगार का अधिकांश संबंध स्पर्श से ही है। यदि व्यक्ति के पास स्पर्शेंद्रिय न होती तो रीति काल की कविता भी नहीं होती। रीतिकाल काव्य ही क्यों, नई कविता भी स्पर्श संवेदन के अभाव में असंभव होती। साहित्यकार का काम घ्राण, स्वाद और स्पर्श के बिना चल जायेगा पर श्रवण और दृष्टि  के बिना? इन दोनों में से किसी एक का चुनाव करने के लिये साहित्यकार को बहुत सोचना पड़ेगा। विद्यार्थियों को भी इनमें से किसी एक के पक्ष में मत देने में कठिनाई होती। साठ के पार पहुँचे साहित्यकार को कालदेवता श्रवण और दृष्टि  की पुर्जियों में से किसी एक को उठाने का अवसर दे तो साहित्यकार मन ही मन मनायेगा कि हे भगवान आँखों को बचा लो। पर दूसरे ही क्षण वह कानों को बचाने की गुहार लगाने लगेगा। बधिरता मुझे असामाजिक बना देगी, कवि सम्मेलनों, मुशायरों, संगीत गोष्ठियों से मुझे वंचित होना पड़ेगा। मैं चलचित्र या टी.वी. देखूँगा तो न मैं वार्तालाप समझूँगा, न संगीत का आनंद उठा पाऊँगा। मेरा दूरभाष पर बात करना भी असम्‍भव हो जायेगा। बगल में बैठा हुआ मित्र चिल्ला रहा है और आप कान में श्रवण यंत्र लगाये उसका मुँह ताक रहे हैं। लोकगीत, लोकवाद्य सभी निरर्थक। न के.एल. सहगल, न रफी, न लता, न आशा कोई आपको आनंदित कर पाने में समर्थ नहीं होगा। पक्षियों की टीट्विट भी निरर्थक। सो कान तो रहने ही चाहिए। तो क्या आप आँखों की तुलना में कानों का पक्ष लेंगे? मैं आँखें बंद कर लेता- सब कुछ पुंछ जात, कक्षा अस्तित्व हीन हो जाती। फिर आँखें खोल, कान बंद करता, कक्षा है, छात्रों के चेहरे हैं, छात्राओं की रंगबिरंगी साडिय़ाँ हैं, श्याम पट है। है, विश्‍व है। नहीं, मैं अपनी आँखें नहीं दूँगा। आँखों के बिना विश्‍व की अधिकांश श्री, सुषमा निरर्थक हो जायेगी। छात्र मेरे निष्कर्षों से सहमत होते, उनकी आँखें बड़ी हो जातीं जैसे वे अपनी दृष्टि बचाने के लिए कटिबद्ध हो कोई भी मूल्य चुकाने को तैयार हैं। पर मुझे लगा कि इतने गम्‍भीर निर्णय के लिये विद्वानों की पंचायत बुलानी चाहिए। मैंने एक संगोष्ठी का आयोजन किया। मनोविज्ञानवेत्ता, कवि, चित्रकार, संगीताचार्य, चिकित्सक, स्त्री, पुरुष आमंत्रित थे। सबका निष्कर्ष था कि साठ के पार की वय में सब कुछ चला जाये, आँखें भर न जायें। ‘कागा सब तन खाइयो, चुन चुन खाइयो माँस, दुई नैना मत खाइयो, पीऊ मिलन की आस’ का मर्म समझ में आया। यह भी समझ में आया कि देवदास यदि अंधा हो गया होता तो वह पारो को देख नहीं पाता, इससे बड़ा संताप और क्या होता। इस संगोष्ठी में एक इतिहासवेत्ता भी उपस्थित थे। बोले कि महाभारत का मूल कारण धृतराष्ट्र का अंधत्व था। यदि राजा अंधा न होता, गूंगा या बहरा होता तो भारत का इतिहास कुछ और ही होता। करेले पर नीम चढ़ा यह कि,  गाँधारी ने भी स्वेच्छा से अंधत्व का वरण किया, कम से कम दोनों में से एक के पास तो दृष्टि  होनी ही चाहिए थी। राजा यदि अंधा हो तो देश चौपट हो ही जायेगा। गूंगा, बहरा व्यक्ति नहीं। एक अंधे राजा ने पूरे देश को, उसके पूरे इतिहास को विकृत कर दिया। मैंने बहुत पहिले जैनेन्द्र कुमार की एक कहानी पढ़ी थी- ‘जान्हवी’। जान्हवी एक वियोगिनी का नाम है जो अपने प्रियतम से मिलने की आशा अंत तक नहीं छोड़ती। जब देखा तब वह गुनगुनाया करती है:

कागा, सब तन खाइयो, चुन चुन खइयो माँस
दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।

साठ के पार पहुँचकर मैं जान्हवी की तरह इस दोहे को ज्यों का त्यों दुहराऊँगा तो नहीं, उसमें थोड़ा सा परिवर्तन करके यह जरूर कहूँगा-

कागा, सब तन खाइयो, चुन चुन खइयो माँस
दो नैना मत खाइयो, पुस्तक पढऩ की आस

पढऩा मुझसे अभी भी अच्छा लगता है- क्लासिकी साहित्य भी और नया लिखा जाने वाला भी। मैंने कुछ दिनों पहिले ही अपने बेसंभाल होते जो रहे पुस्तकालय की छंटनी की है। जो पुस्तकें मैं पढ़ चुका हूँ और जिन्हें दुबारा पढऩे की न तो रुचि है, न ही समय, उन्हें अलग करो। उन्हें भी अलग करो जिन्हें पढऩे का समय अब नहीं निकाला जा सकेगा। समय की सीमा है, आँखों की ज्योति की भी। पर पढऩा तो है ही। समय काटने के लिये भी और समाज तथा मानव स्वभाव को समझने के लिये भी। समय के साथ रहने के लिये भी। इतनी सारी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं, उन्हें भी देखना जरूरी है। सबको भले न पढ़ पाऊँ, उन्हें उलटना-पुलटना तो चाहिए ही। फिर हिन्‍दी में इतनी सारी पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं और आपको पास आ भी रही हैं। सभी तो कूड़ा नहीं हैं। उनमें काफी कुछ नया, विचारोत्तेजक, मौलिक होता है कि आउट ऑफ डेट न होने के लिये उन्हें पढऩा चाहिए। अपने समय, समाज और प्रगति को जानने-समझने के लिये उनसे दूर रहना किसी भी प्रकार उचित नहीं। इसके लिये समय भी चाहिए और आँखें भी। समय का नियोजन आप कर सकते हैं, आँखों की ज्योति का भी। डॉक्‍टर भले ही कहें कि‍ ज्‍यादा पढ़ना आपके लि‍ये उचि‍त नहीं है, पर कितना पढऩा उचित है यह तो आपको तय करना होगा। हर तीस-पैंतीस दिन बाद ढेर पत्रिकाएं आपके पास आती हैं, डाकिया आपको जानने लगा है। इन पत्रिकाओं को मैं तीन कोटियों में बाँटता हूँ। पहिली वे जिनका नाम देखा और रद्दी के ढेर में पटक दिया। इन्हें पढऩे क्या, उलटने-पुलटने का समय भी अब मेरे पास नहीं है। अध्यात्म की, धर्म की, पत्रिकाएं मुझे व्यर्थ लगती हैं। कोई नई बात नहीं, कोई नहीं बहस नहीं। दूसरी कोटि उन पत्रिकाओं की है जिन्हें उलट कर एक सरसरी निगाह डालने से यह पता चल जाता है कि हिन्‍दी में इन दिनों क्या लिखा जा रहा है, नई पीढ़ी क्या सोचती है, उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं, वे हम बूढ़े लोगों से कितनी भिन्न है। यदि कोई रचना प्रथम दृष्टया अच्छी लगी तो प्रथम बैठक में ही उसे पढ़ भी लिया। हिन्‍दी में इन दिनों कोई विश्वसनीय पाक्षिक मुझे नहीं दिखता। सब अपने-अपने मित्रों, गुट के, क्षेत्र के, संघ के, मंच के लेखकों का जैकारा करने में व्यस्त हैं। समीक्षकों की बात का भरोसा कर लेखकों को पढ़ो तो लगता है कि आप जिसे गाय का बछड़ा समझ रहे थे वह कुत्ते का पिल्ला निकला। कुछ लोगों को तो नामावली गिनाना ही अपने समीक्षक होने के कर्तव्य की इतिश्री लगती है। इसलिए हिन्‍दी में इन दिनों स्वर्ग देखने के लिये स्वयं ही मरना पड़ता है। अधिकांश समीक्षक पेड़ तो गिना देते हैं पर वन की श्री सुषमा देखनी हो तो धंसो उनमें डर नहीं है। चिड्डों की तरह यहाँ-वहाँ फुदकने वाले समीक्षकों ने हिन्‍दी समीक्षा को बेहद अविश्वसनीय और अप्रमाणिक बना दिया है। इस तरह का साहित्य छापने वाले पत्रिकाओं को मैं भी अलग डाल देता हूँ। जो आठ-दस पत्रिकाएं बचती हैं,  वहीं पढ़ी जाती हैं। कभी किसी पुस्तक की चर्चा हुई तो उसे भी पढऩा होता है समीक्षार्थ न आये, भेंट स्वरूप न आये, मानार्थ न आये तो खरीद कर यदि समीक्षार्थ कोई पुस्तक मेरे पास आई है और लगा है कि उस पर लिखना चाहिए तो उसे पढ़ता हूँ तब लिखता हूँ। यदि लिखने का मन नहीं हुआ तो पुस्तक सधन्यवाद वापिस। कुछ लेखक इसका बुरा भी मानते हैं और संबंध खराब कर लेते हैं। अब साठ के पार पहुँचकर मैं आपकी दिलजोई करूँ या अपनी शक्ति, समय और आँखों की ज्योति देखूँ। साठ के पार पहुँचकर नये साहित्यिक मित्र भी बनते हैं और कुछ पुराने परिचितों से संबंध बिगड़ जाते हैं। साठ के पार पहुँचे समीक्षक को अपने दायित्व का निर्वाह विवेक पूर्वक ही करना चाहिए, अचूक अवसरवादिता आपको धीरे-धीरे अविश्वसनीय और गैर भरोसेमंद बना देती है।

सो 60 क्या 78 पार के बाद भी साहित्य मेरी प्राथमिकताओं में है- अपनी समस्त शारीरिक, मानसिक और भौमिक सीमाओं के बावजूद। गालिब ने कहा था कि ‘छुटती नहीं है काफिर मुँह से लगी हुई’ पढऩे की आदत मुझसे भी नहीं छूट पा रही है। मुझे अपने स्वास्थ्य सामर्थ्‍य और समय सीमा के प्रबंधन के बिना साहित्य से सानिध्य बनाये रखने की बात सोचना विवेकहीनता लगती है। ‘साठ के पार जीवन और साहित्य के बीच जो नियंत्रण रेखा खींच दी गई है, उसका उल्लंघन कई प्रकार की समस्याओं को जन्म दे सकता है और यह उम्र समस्याओं से बचने की है, उन्हें भड़काने की नहीं।

वास्तविकता यह है साठ पार का जीवन रोमानी वास्तविकता नहीं है यह ठोस आलावकारी और काफी हद तक कटु वास्तविकता है। जरा जर्जर शरीर, आधियों व्याधियों से शक्तिहीन जीवन, वित्तीय संकट, पारिवारिक विषमताएं, समसामयिक साहित्यकारों की ईर्ष्‍या- साठोत्तरी साहित्यकार इनमें से किसी को संभालने की जुगत नहीं कर पाता। वह डॉक्टरों के चक्कर लगाये कि साहित्य रचना करे, अपने मोतियाबिन्‍द का ऑपरेशन कराये कि साहित्य के पढऩे का साहस संचित करे, बहू-बेटियों और उनके परिवारों के लोभ-लालच से स्वयं को सुरक्षित रखने के उपाय खोजे कि अपना लिखना-पढऩा जारी रखे। हर साहित्यकार चतुर सुजान हो और अपने वृद्धावस्था का यह आकस्मिक दुर्घटना का पूर्व प्रबंधन कर ही सके, यह कम ही देखा जाता है। कभी-कभी साहित्यकार के साठ पार के जीवन की विषमताओं के लिये स्वयं वही उत्तरदायी होता है। जो साहित्यकार जीवन भर नियमित रूप से पाव भर छालिये से अपनी आँतों को नष्ट  करेगा, जिसका दिन रसरंजन से भी प्रारम्‍भ होगा और उसी से समाप्त, जो भूख को शांत करने के लिए कड़क चाय पीने को बाध्य होगा, उसका साठोत्तर जीवन कैसा होगा- इसके अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं। साहित्यकार सम्‍वेदनशील प्राणी होता है इसमें संदेह नहीं पर वह शरीरधारी होता है- शरीर विज्ञान के सभी नियम उस पर लागू होते हैं- यह भी उतना ही सच है जितना उसका रचियता होना। हमारे देश में साहित्यकार को लेकर जो मिथ प्रचलित हैं, उनसे भी मुक्त होने की आवश्यकता है। साहित्यकार सदैव असंतुलित, असंयमित स्वैराचारी जीवन ही जिये, यह आवश्यक नहीं है।

रचनात्मकता का संबंध हार्मोंस से है। जब शरीर के हार्मोंस क्षीण होने लगें तब रचनात्मकता में कमी आने लगती है। कल्पना अब कुलाँचे नहीं भरती, शब्दों में गूँज नहीं बचती। एक अभ्यास, पुनरावृत्ति, निष्प्राण दुहराव। इसीलिये कुछ विचारक मानते हैं कि साठ पार के व्यक्ति की रचनात्मकता को तिलांजलि दे देनी चाहिए। कई साहित्यकार ऐसा करते भी हैं। महादेवी जी ने वार्धक्य में गीत लिखने छोड़ दिये थे, वे ऋचाओं का अनुवाद करने लगी थीं। हमारे अपने दौर में राजेन्द्र यादव ने वयोवृद्धि में कहानी या उपन्यास छोड़कर विमर्श के खेत में बीज बोने शुरू किये, वास्तव में विधा बदल देने से कला की थकान मिटती है पर यह विधान्तरण स्वस्फूर्त होना चाहिए। रचनाकार को जब लगे कि वह न कोई नया प्रयोग कर पा रहा है, न ही उसमें नई संवेदना के अंकुर फूट रहे हैं तो उसे कलम कूची छोड़कर श्रोताओं या दर्शक दीर्घा में आकर बैठने लगना चाहिए, पर कुछ तालिबान किस्म के विचारक फतवा करने के उत्साह में लता मंगेशकर या मकबूल फिदा हुसैन के गायन या चित्रण पर ही पाबंदी लगा देना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि विश्व के महान साहित्य में साठ पार के साहित्यकारों का योग कुछ कम नहीं है। यही बात रचना के अन्य क्षेत्रों की भी है। इसके विपरीत प्रसिद्ध कथाकार दूधनाथ सिंह साठोत्तर कलाकारों के प्रति ज्यादा संवेदनशील एवं उदार हैं। वे मानते हैं कि जब हमारा माध्यम हमसे सध गया है, हम अनुभव पक्व हो गये हैं, भावी पढिय़ों के लिये हमारे पास देने के लिए मूल्यवान सम्‍पदा है तब उठ जाना कला के लिये बड़ी दुर्घटना है- अपूरणीय क्षति। वे कहते हैं कि मूत्यु को ऐसे कलाकारों से ग्रेस में कुछ वर्षों का जीवन-दान देना ही चाहिए। निश्चिंत होकर, एकाग्रभाव से अपना सर्वोत्तम दिये बिना हम तुम्हें लेने नहीं आयेंगे। मुझे दूधनाथ सिंह की बात मूल्यवान और सार्थक लगती है। कल्पना कीजिए,  रवीन्द्रनाथ ठाकुर दस वर्ष और जीते, गालिब को मृत्यु ने पंद्रह वर्षों का अवकाश और दिया होता या तुलसी को ‘विनय पत्रिका’ लिखने के बाद कुछ समय और मिला होता। कुछ लोग साठ पार होने पर सठिया जाते हैं किंतु कुछ लोगों पर उम्र का प्रभाव नहीं पड़ता। क्या साठ, क्या सत्तर जो लोग साठ के होने के पहिले ही सठिया जाते हैं, उनका आप क्या करेंगे? साहित्यकार के लिये उम्र का बंधन नहीं होता है। हाँ, कोई बंधन होता है रचनात्मकता का। कविता यौवन की विधा है। प्रौढ़ावस्था में उपन्यास या कहानी लिखनी चाहिए और वार्धक्य में आत्मकथा सिंहावलोकन। विश्व साहित्य में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जहाँ यौवन में कवियों ने अपना सर्वोत्तम प्रदान किया है। पर ऐसे उदाहरण विरल ही हैं जहाँ 25-30 वर्ष का साहित्यकार ‘गोदान’ लिखे या ‘मैला आंचल’। संस्मरण या आत्मकथा जैसी विधाएं एक तटस्थता, एक वैराग्यभाव की अपेक्षा रखती हैं, वैसे बेईमानी की हिसाब किताब की, आत्मश्लाधा की कोई उम्र नहीं होती। रचनात्मकता, नवनवोन्मेषशीलता किसी उम्र का मुँह नहीं देखती। साहित्यकार को तब तक वृद्ध नहीं माना जाना चाहिए जब तक उसकी रचनाओं में नवीनता का, ताजगी का ताप शेष है।

हिन्‍दी में पुरस्कारों के लिये जो मारामारी है वह प्रतिष्ठा और मान्यता के लिये तो है ही, वित्तीय सुरक्षा कवच प्राप्त करने के लिये भी है। लखटिया पुरस्कार मिल गया तो हारी बीमारी में काम आयेगा, बेटियों की शादी आसानी से हो जायेगी, बेटे-बहू को लगेगा कि गैया अभी भी दूध दे सकती है। पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार फेड आउट नहीं होता। पुरस्कार किस संस्था का है, उसके निर्णायक कौन हैं, उनकी विचारधारा क्या है, महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है कागज का वह टुकड़ा जिसे चैक या ड्राफ्ट कहते हैं। हमारी मनीषा हर काम को वित्तीय साधनों के दोहन में परिवर्तित करने में इतनी कुशल है कि बिना भ्रष्टाचार के हम किसी भी चीज की कल्पना ही नहीं कर पाते। झूठा मेडिकल सर्टिफिकेट लेना हो, रेलवे में आरक्षण करवाना हो, पी.एच.डी. प्राप्त करनी हो, संगोष्ठी करनी हो, मकान खरीदना हो- सब में जितना लेनदेन मेज के ऊपर होता है, उससे कम मेज के नीचे नहीं। साहित्यकार इससे मुक्त होगा, यह सोचना खामख्याली है। जो साहित्यकार यह सब मैनेज नहीं कर सकता वह ‘निराला’ जैसा, मुक्तिबोध जैसा जीवन जीने के लिए बाध्य है। मैं हिन्‍दी के अनेक साहित्यकारों को जानता हूँ जो मंच से गुलशन नंदा को गालियाँ देते हैं पर मन ही मन मनाते हैं हाय;  हम गुलशन नंदा क्यों न हुए? लेखक जिंदगी भर लिखने, छपने और बिकने के बाद भी अपना बुढ़ापा अपने घर में निश्चित होकर नहीं काट सकता। साठ पार के साहित्यकार को हमारा समाज और हमारी सरकारें निश्चिंत होकर लिखने की सुविधा नहीं देती। मध्यप्रदेश शासन ने विभिन्न विश्वविद्यालयों में मुक्तिबोध पीठ, निराला पीठ, प्रेमचंद पीठ जैसी बहुत सम्मानीय और उपयोगी शुरुआत की थी पर उनका जो हश्र हुआ, वह किसी से छिपा नहीं है। राजनीति हमारे साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन पर इस कदर हावी है कि हम किसी भी पद-पुरस्कार-मंच को निष्कलुष रहने ही नहीं देते। आप कितना भी अच्छा कुआँ खरीदिये, उसमें भाँग डालने के सौ-सौ जतन हमें आते हैं। सारा दोष सरकारों का, समाज का ही हो, ऐसा नहीं है। हमारे साहित्यकार भी साठ पार की अपनी दुर्व्‍यवस्‍था के लिये कम जिम्मेदार नहीं हैं। साहित्य रचना को लेकर हमारे मन में कुछ ऐसी रोमानी कल्पनाएं बनी हुई हैं कि साहित्यकार संतुलित जीवन जी ही नहीं पाता। प्रतिभा प्राय: असंतुलित होती है पर वृद्धावस्था का ब्लू प्रिंट तैयार करने का रिवाज हमारे यहाँ नहीं है। साहित्यकार की संपन्नता, उसकी निश्चिंतता सम्माननीय होनी चाहिए। उसे उपेक्षणीय एकाकी, रुग्ण बनाने से बचाने के जितने उपाय हम कर सकें, हमें करने चाहिए। लता मंगेशकर, खुशवंत सिंह यदि साठ पार के बाद भी सक्रिय और ऊर्जा संपन्न हैं तो इसीलिए कि वे स्वस्थ भी हैं और आर्थिक रूप से सुरक्षित भी। हिन्‍दी के विष्णु प्रभाकर भी हमें याद आते हैं। एक प्रकार से विगत को अभ्यागत करने की विधा है। यह विधा मुझसे सध गई, संस्मरण मेरे लिये सुविधा की विधा है। दूसरों के लिये है या नहीं, मैं नहीं कह सकता। कुछ लोगों का आरोप है कि अपने संस्मरणों में क्रुयेल हो गया हूँ। मैं इससे इंकार नहीं करूँगा। शल्य चिकित्सक यदि दया, माया, ममता दिखाने लगे तो वह शल्यक्रिया नहीं कर सकता। हमारे समाज में कथनी और करनी में इतना अंतराल है कि दोनों को अलग-अलग करने के लिये निर्ममता आवश्यक है। फिर मेरे कुछ समीक्षकों ने मुझ पर अपने संस्मरणों में ‘छौंक’ लगाने का आरोप भी लगाया है। जिन संस्मृतों को जो श्रद्धेय, पूज्य प्रात: स्मरणीय मानते हैं उन पर अंगुली उठाया जाना वे सहन नहीं कर पाते। फिर रचनात्मकता थोड़े बहुत छौंक की अपेक्षा करती ही है। छौंक यानी लंतरानी मैंने किसी बदनीयती से समाविष्ट की हो, ऐसा नहीं है। किसी व्यक्ति की जो छवि लोक में प्रचलित है, वह भी मेरी दृष्टि में रही है इसलिए रसाल अथवा रजनीश, सुमन अथवा अंचल जैसे व्यक्तियों के सत्य प्रसंग भी उनके श्रद्धालुओं को छौंक जैसे लगते हैं। मैं छौंक से बच सकता था फलत: विवादों से भी पर विवादों से बचने के लिये हर किसी की प्रशंसा करना, उसके केवल उज्ज्वल पक्षों की ही निशानदेही करना मुझे गलत लगता है। निर्ब्‍याज सत्य, संपूर्ण निष्पक्षता संभव नहीं है। प्रारंभ में मैंने भी कामना की कि कोई पुरस्कार, कोई सम्मान मुझे मिले पर हिन्‍दी में पुरस्कारों की, सम्मानों की जो हालत है वह प्राय: सम्मानित हो, पुरस्कृत को उठापटक, जोड़तोड़ के घेरे में खींच लेती है। मैंने अब सम्मान या पुरस्‍कार की कामना से मुक्ति पा ली है। इन दिनों टी.वी. चैनलों पर एक विज्ञापन आ रहा है- रूपा फ्रंटलाइन पहिनी है तो सामने आ जाओ। यानी महत्व फ्रंटलाइन अंडरवियर का है, उसके पहिनने वाले का नहीं। इन दिनों सभी समीक्षक, पुरस्कार समितियों के सभी सम्मानित सदस्य, चयन समितियों के सभी विशेषज्ञ प्रत्याशी की योग्यता या क्षमता का मूल्याँकन नहीं करते, नहीं करना चाहते, वे विचारधारा, संगठनबद्धता या संघ की सदस्यता के आधार पर निर्णय करते हैं। राजनीति में यह होता है, साहित्य में भी यही होने लगा है। जिस दौर में कृति की तुलना में कृतिकार का अंतर्वस्त्र महत्वपूर्ण हो, उस दौर में साहित्य की गुणवत्ता नहीं, साहित्यकार की जोड़-तोड़ की क्षमता ज्यादा प्रभावशाली हो हाती है।

रोमांचक बचपन: प्रेमपाल शर्मा

badho ka bachpan

‘बड़ों का बचपन’ पुस्‍तक एकलव्‍य, भोपाल का एक बेहद रोचक प्रकाशन है। इसमें संजीव ठाकुर ने दुनिया भर के 29 मशहूर हस्तियों के बचपन की यादें, शरारतें, शिक्षा, दीक्षा आदि दी हैं । देसी-विदेशी और राजनीतिज्ञों से लेकर लेखक, फिल्‍मी हस्तियाँ सभी शामिल हैं । महत्‍वपूर्ण लेखकों में गोर्की, शरतचन्‍द्र चटर्जी, फकीर मोहन सेनापति, अमृता प्रीतम, तसलीमा नसरीन, पांडेय बेचैन शर्मा उग्र आदि हैं । बहुत रोमांचक है लेखकों के बचपन को जानना । कितनी गरीबी और संघर्षों में बीता गोर्की का बचपन । बचपन में पिता जल्‍दी गुजर गये तो कभी नानी के घर तो कभी दूसरे पिता के । खाने-पीने तक का ठिकाना नहीं, पढ़ने की बात तो दूर । लेकिन पढ़ने का शौक न जाने कैसे लग गया। इतना कि मॉं के बटुए से पैसे चुराकर परियों की कहानी खरीद लाया । चोरी पकड़े जाने पर खूब पिटाई हुई । गोर्की लिखते हैं कि मुझे पिटने का डर नहीं था, दु:ख हुआ किताब के छिन जाने का । कौन सा काम नहीं किया गोर्की ने बचपन में । रविवार की सुबह बोरी लेकर शहर में निकल जाता और फटे कपड़े, लोहे की कील, पुरानी हड्डियाँ, रद्दी कागज जमा करके कबाड़ी की दुकान में बेच आता । थोड़ा और बड़ा हुआ तो बेकरी में काम करने लगा। इसी बचपन से पैदा हुआ दुनिया का महान कथाकार गोर्की ‘माँ’, ‘मेरा बचपन’ आदि रचनाओं का लेखक।

बंगाल के लेखक शरतचन्‍द्र का बचपन भी ऐसे ही अभावों में बीता लेकिन उतना ही शरारतपूर्ण । हुक्‍के की चिलम में पत्‍थर भर देते तो कभी स्‍कूल की छुट्टी जल्‍दी करने के लिए घड़ी की सूई आगे बढ़ा दी। भूत-प्रेतों को सरेआम चुनौती देने के लिए उन्‍हीं के अड्डे में खेलते । यही व्‍यक्ति आगे चलकर ‘चरित्रहीन’, ‘श्रीकांत’ जैसे महान उपन्‍यासों का लेखक बना । प्रसिद्ध फ्राँसीसी विचारक रूसो ने तो कौन सी शरारत, चोरी और गुंडई नहीं की । न स्‍कूल में टिकता, न किसी काम में । फ्राँस की क्राँति के पीछे रूसो की स्‍वत्रंता की अवधारणा प्रमुख थी । चार्ली चैपलिन की माँ अदाकारा थीं जब उनको गले की बीमारी हुई तो चैपलि‍न को स्‍टेज पर आना पड़ा । आर्थिक परिस्थितियाँ इतनी दयनीय थीं कि चैपलि‍न शाम को नाटकों में काम करते और दिन में अखबार बेचते । खिलौने बनाए, बढ़ई की दुकान पर काम किया । अमृता प्रीतम, तसलीमा नसरीन सभी की ऐसी ही कहानि‍याँ । अंग्रेजी के कहर से प्रसिद्ध बंगला लेखिका तसलीमा भी नहीं बचीं । जहाँ गणित और सभी विषयों में खूब नम्‍बर आए अंग्रेजी में सिर्फ तैंतीस । मुश्किल से पास हुईं । डॉक्‍टर पिता ने रात-दिन अंग्रेजी रटाई तो अगली बार नंबर और कम हो गये । आज तसलीमा के नाम पर बंगाली की तीस मशहूर किताबें हैं और अंग्रेजी भी फर्राटे से बोलती हैं ।

राजनेताओं में गाँधी, अम्‍बेडकर, माओ, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्‍त्री, अब्‍दुल कलाम आदि हैं । गाँधी की ईमानदारी को कौन नहीं जानता ? बचपन में चोरी की तो तुरन्‍त गलती भी मान ली पत्र लिखकर । पत्र पढ़कर पिता की आँखों से आँसू बहने लगे । यानी गलती किस से नहीं होती । बड़ी बात है कि उसे स्‍वीकार करना । भूतपूर्व राष्‍ट्रपति अब्‍दुल कलाम का बचपन तमिलनाडु के रामेश्‍वरम में बीता । बचपन में उन्‍होंने भी अखबार बेचे । कौन भूल सकता है अम्‍बेडकर के बचपन को । अछूत माने गये, दुत्‍कारे गये । आज समानता के लिये देश के मसीहा ।

बहुत प्रेरणादायक प्रसंगों से भरी पड़ी है पूरी किताब । बच्‍चे ऐसे किताबें पढ़कर ही पुस्‍तकों की तरफ आते हैं । संजीव ठाकुर का कहना सही है कि मनुष्‍य के जीवन का सबसे सुनहला अध्‍याय बचपन ही होता है । सम्‍भावनाओं का अनंत आकाश लिये ।

एकलव्‍य प्रकाशन को इस सीरिज में और भी पुस्‍तकें अलग-अलग निकालनी चाहिए । जैसे लेखकों का बचपन, वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों, फिल्‍मी नायक-नायिका आदि । हर बच्‍चे के लिये जरूरी किताब ।

पुस्‍तक : बड़ों का बचपन
लेखक :
संजीव ठाकुर
प्रकाशक :
एकलव्‍य प्रकाशन, ई-10, बी.डी.ए. कॉलोनी, शंकर नगर, शि‍वाजी नगर, भोपाल- 462016
मूल्‍य  :
90 रुपये
पृष्‍ठ  :
175
चित्रांकन :
प्रदीप चिंचालकर

बीनू भटनागर की दो कवि‍तायें

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

04 सितम्बर 1947 को बुलन्दशहर, उत्‍तर प्रदेश में जन्‍मीं कवयि‍त्री बीनू भटनागर की दो कवि‍तायें-

मैं सपनों में नहीं जीती

मैं सपनों में नहीं जीती
सपने मुझमें जीते हैं।
मेरी कविता भी,
कल्पना में नहीं जीती,
यह वो नदी है जो,
यथार्थ मे ही बहती है।
कल्पना का आँचल,
यथार्थ ने पकड़ा हो,
तभी कविता मेरी,
आकार लेती है।
निराशा और आशा से,
बनती है कहानी भी,
कहानी में भले ही,
संघर्ष और दुख हों,
हौसले नहीं टूटेंगे,
घरौंदे नहीं छूटेंगे,
उम्मीद से बंधे होंगे,
किरदार सब मेरे।
जब मैं लेख लिखूँगी,
जीवन को दिशा दूँगी,
मिथ्या और अंधविश्वास से,
निरंतर लड़ूंगी मैं,
सामाजिक, धार्मिक कुरीतियों का,
विरोध करती रहूँगी मैं।
अनोखे व्यंग भी लिखूंगी मै,
कभी ख़ुद पर,
कभी माहौल पर,
हँसूगीं हँसाऊँगी मैं,
कभी दोस्तों का भी,
मज़ाक बनाऊँगी मैं।
क्योंकि,
मैं सपनों में नहीं जीती,
सपने साकार करने की,
अनुभूति में जीती हूँ।

मैने कहाँ मांगा था

मैंने कहाँ मांगा था सारा आसमा,
दो-चार तारे बहुत थे मेरे लिये,
दो-चार तारे भी नहीं मिले तो क्या…
चाँद की चाँदनी तो मेरे साथ है।

मैने नहीं माँगा था कभी इन्द्रधनुष,
जीवन में कुछ रंग होते बहुत था,
दो रंग  भी नहीं मिले तो क्या..
श्वेंत-श्याम ही बहुत हैं मेरे लिये।

मैंने नहीं चाहा था महल हो कोई,
एक घर मेरा भी होता आशियाँ,
पर वो भी नहीं मिला तो क्या…
ये जर्जर झोंपडी तो मेरे पास है।

मैने कहाँ मांगे थे कभी नौरतन,
चाँदी की पायल ही मुझे थी पसन्द,
वो भी नहीं मिल सकी कभी तो क्या,
पीतल की वो अंगूठी तो मेरे पास है।

मैंने नहीं चाहा था फूलों का हार हो,
दो फूल चमेली के बहुत थे मेरे लिये,
चम्पा चमेली भी नहीं मिले तो क्या,
काँटे गुलाब के तो मेरे पास हैं।

हर श्रमिक की है ऐसी ही दास्ताँ,
आधा अधूरा खाना, फिर चैन से सोना,
गुदगुदे बिस्तर नहीं भी हैं तो क्या…
एक पुरानी चटाई तो उसके पास है।

बेखौफ आजादी अभियान में हिरावल की नाट्य प्रस्तुति

bekhauf azadee

नई दिल्ली: महिलाओं पर बढ़ती हिंसा के खिलाफ देश भर में चल रहे ‘बेखौफ आजादी’ अभियान के तहत जन संस्कृति मंच की गीत नाट्य इकाई ‘हिरावल’ अपनी नाट्य प्रस्तुति करने दिल्ली पहुँची। 19 फरवरी से ही हिरावल की ओर से विभिन्न कॉलेजों में नवीनतम नाटक ‘बेखौफ आजादी’ की प्रस्तुति जारी है। युवा रंगकर्मी संतोष झा लिखित और निर्देशित इस नाटक की बिहार की राजधानी पटना में 10 फरवरी और 11 फरवरी को मंचन हो चुका है।

21 फरवरी को यौन हिंसा के खिलाफ वर्मा कमेटी की सिफारिशों को लागू करने के लिये ‘बेखौफ आजादी’ अभियान की ओर से संसद के समक्ष एक प्रदर्शन होना है, जिसे सफल बनाने के लिए हिरावल भी अपनी भूमिका निभा रही है। 19 फरवरी को उसकी ओर से सत्यवती कॉलेज, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, सेंट स्टीफेंस और जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में तथा 20 फरवरी को हंसराज कॉलेज, रामजस कॉलेज, सोशल वर्क डिपार्टमेंट, दिल्ली विश्‍वविद्यालय आदि में ‘बेखौफ आजादी’ नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति की गई।

क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की कविताएं और गीत महिलाओं की आजादी, बराबरी, सुरक्षा और उनके लिए न्याय के लिए चल रहे इस आंदोलन में आंदोलनकारियों की जुबान और उनके प्लेकार्ड्स पर लगातार रहे हैं। हिरावल के इस नाटक की शुरुआत भी उनकी कविता ‘बंद खिड़कियों से टकराकर’ से होती है। प्रथम दृश्य में दो बुर्जुगों की बातचीत के जरिए आजादी संबंधी पितृसत्तात्मक धारणाएं सामने आती हैं, जिनसे लड़कियां स्त्री आजादी की अपनी धारणा को लेकर बहस करती हैं। वे दो टूक कहती हैं कि वे मर्द और औरत के फर्क को नहीं मानेंगी।

दूसरे दृश्य में आशाराम बापू जैसे धर्मगुरुओं की मानसिकता पर तीखा व्यंग्य किया गया है। तीसरे दृश्य में यौन उत्पीड़न की शिकार लड़कियों के साथ पुलिस प्रशासन के बर्ताव और लड़की के प्रतिरोध को पेश किया गया है। तीसरे दृश्य में नाटक ने यूपीए-एनडीए की महिला विरोधी प्रवृत्तियों पर सवाल उठाया गया है, कि किस तरह वे किसी का तर्क न सुनते हुए लगातार फाँसी की मांग कर रहे, जबकि केंद्र हो या राज्य, हर जगह सरकारें उन्हीं की है और दोषियों को दंडित भी उन्हें ही करना है। नाटक में वर्मा कमेटी की रिपोर्टों को लागू करने के तर्कों को मजबूती से रखा गया।

30 मिनट अवधि के इस नाटक ने यौन हिंसा के खिलाफ न्याय, आजादी और बराबरी के लिये चल रहे आंदोलन की मांगों, बहसों और सवालों को बहुत ताकतवर तरीके से पेश किया। हिरावल की दिव्या गौतम, समता राय, संतोष झा, सुमन कुमार के साथ इसमें जेएनयू और दिल्ली विश्‍वविद्यालय की श्‍वेता, अंजलि, आकृति, ज्योति, मार्तंड प्रगल्भ, विशाल, शौर्यजीत, विशाल आदि ने भूमिकाएं निभाई हैं।

(सुधीर सुमन, जसम राष्ट्रीय सहसचिव की ओर से जारी)

चंद्रकांत देवताले सहि‍त 24 साहि‍त्‍यकार साहि‍त्‍य अकादमी पुरस्‍कार से सम्‍मानि‍त

chandrakant deotale

नई दिल्ली : देश की 24 भाषाओं में विशेष साहित्यिक योगदान के लिए प्रख्यात साहित्यकारों को 18 फरवरी 2013 को वर्ष 2013 के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हिन्‍दी साहित्य में यह पुरस्कार प्रसिद्ध कवि चंद्रकांत देवताले को कविता-संग्रह ‘पत्थर फेंक रहा हूँ’ के लिये प्रदान किया गया। पुरस्कार विजेताओं में 12 कवि, छह कथाकार और चार उपन्यासकार शामिल थे। साथ ही मैथिली में साहित्य अकादमी पुरस्कार आत्मकथा और गुजराती में समालोचना के लिए दिया गया।

साहित्योत्सव-2013 के आगाज के मौके पर कमानी सभागार में आयोजित पुरस्कार समारोह में पुरस्कारों का वितरण साहित्य कला अकादमी के नवनिर्वाचित अध्यक्ष विश्‍वनाथ प्रसाद ति‍वारी और अंग्रेजी भाषा के प्रसिद्ध लेखक शिव के कुमार ने किया। मैथिली में लेखिका शेफालिका वर्मा को उनकी आत्मकथा ‘किस्त-किस्त जीवन’ के लिये सम्मानित किया गया तो गुजराती में समालोचना ‘साक्षीभास्य’ के लिए चंद्रकांत अमृतलाल टोपीवाला को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। पंजाब के दर्शन बुट्टर को उनकी कविता ‘महा कंबनी’ के लिए सम्मानित किया गया। मराठी कहानी परम्‍परा में स्वागत योग्य परिवर्तन का परिचायक कहानी-संग्रह ‘फिनिक्सच्या राखेतून उठला मोर’ के लिये जयंत पवार को पुरस्कृत किया गया। इनके अलावा उदय थुलुड़(नेपाली),  जयंत पवार(मराठी),  गौरहरि दास (ओड़िया),  गंगाधर हांसदा(संताली), स्व. इंदिरा वासवानी (सिंधी) और पी. सुब्बाराव (तेलुगु) को उनके कहानी संग्रह के लि‍ए पुरस्‍कार प्रदान कि‍या गया।

जीत थाइल (अंग्रेजी), बालकृष्ण भौरा (डोगरी),  गुणेश्‍वर मुसाहारी (बोडो),  एच.एस. शिवप्रकाश (कन्नड़),  मखनलाल कंवल (कश्मीरी),  काशिनाथ शांबा लोल्येकर (कोंकणी),  के सच्चिदानंदन (मलयालम),  आईदान सिंह भाटी (राजस्थानी)  और रामजी ठाकुर (संस्कृत) को उनके कवि‍ता संग्रह के लि‍ये सम्‍मानि‍त कि‍या गया।

सुब्रत मुखोपाध्याय (बांग्ला),  चंदना गोस्वामी (असमिया) , जोद्ध चन्द्र सनसम (मणिुपरी), डी सेल्वराज (तमिल) को उनके उपन्‍यास और  कृष्ण कुमार तूर (उर्दू) को गजल संग्रह के लि‍ये सम्‍मानि‍त कि‍या गया।

वि‍श्‍वनाथ प्रसाद ति‍वारी बने साहि‍त्‍य अकादमी अध्‍यक्ष

प्रसिद्ध कवि, आलोचक और लेखक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को साहित्य अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया है। इस पद के लिये  उनका चयन सर्वसम्मति से हुआ है। वह अकादमी के 12वें अध्यक्ष होंगे। ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी हिन्‍दी लेखक को यह सम्मान मिला हो।

अकादमी के पूर्व अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय के निधन के बाद विश्‍वनाथ  तिवारी कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाल रहे थे। इनकी नियुक्ति  पाँच वर्ष के लिये है। उपाध्यक्ष पद के लिये ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ भाषा के लेखक चंद्रशेखर कंबार को निर्विरोध चुना गया।

प्रतिरोध का सिनेमा का मेला 22 फरवरी से गोरखपुर में

Cinema of Resistance

नई दि‍ल्‍ली : प्रतिरोध का सिनेमा का तीन दि‍वसीय फिल्म फेस्टिवल  22 फरवरी 2013 से रामकृष्‍ण मणि‍ त्रि‍पाठी सभागार, गोकुल अति‍थि‍ भवन, सि‍वि‍ल लाइन्‍स, गोरखपुर में शुरू होगा।

यह फेस्टिवल स्त्री संघर्ष और स्त्री मुक्ति को समर्पित है। इस सिलसिले में  प्रसिद्ध फ्राँसीसी फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेस्सों की फीचर फिल्म ‘मूशेत’ जो कि एक किशोरी के व्याकुल मन की कहानी है, दिखाई जायेगी। फिल्म फेस्टिवल के आखिरी दिन दिल्ली में हुए दिसंबर 16 आन्दोलन को नजदीक से अपने कैमरे में कैद कर रहे छायाकार विजय कुमार की डायरी और इमरान द्वारा संकलित विडियो कोलाज ‘रोड टू फ्रीडम’ भी इस बार के आयोजन का प्रमुख हिस्सा होंगे।

अपने शुरुआत से ही प्रतिरोध का सिनेमा अभियान देश में चल रहे विभिन्न आन्दोलनों को मंच देता रहा है। इसी क्रम में इस बार संजय काक की नयी डाक्यूमेंटरी ‘माटी के लाल’  का पहला प्रदर्शन और  नगरी, झारखंड में चल रहे नगरी आन्दोलन पर बीजू टोप्पो द्वारा निर्देशित फिल्म ‘प्रतिरोध’को दिखाया जायेगा।

फिल्म फेस्टिवल में ललिथा गोपालन और फिल्मकार तरुण भारतीय के व्याख्यान प्रदर्शनों का आयोजन कि‍या जायेगा। ललिथा भारतीय  फिल्मों में आर्काइवल फुटेज के इस्तेमाल पर अपनी प्रस्तुति ‘लॉस्ट एंड फाउंड  फुटेज’ नाम से देंगी और तरुण  डाक्युमेंटरी फॉर्म के प्रयोग और दुरुपयोग के बारे में विस्तार से अपने व्याख्यान ‘सच्चाई का सच’में करेंगे।
बच्चों के लिए ख़ास तौर पर तैयार किये गए सत्र में नितिन दास निर्देशित ‘जादुई पंख’ श्रृंखला  की लघु फिल्मों के अलावा राजन खोसा द्वारा निर्देशित  इस वर्ष की चर्चित बाल फिल्म ‘गट्टू’ को दिखाया जायेगा।

आठवें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जाने वाली और महत्वपूर्ण  फिल्में हैं- तपन सिन्हा निर्देशित ‘एक डाक्टर की मौत’, गुरविंदर सिंह की पंजाबी फीचर फिल्म ‘अन्हे घोरे दा  दान’, आमिर बशीर  द्वारा निर्देशित कश्मीरी फीचर फिल्म ‘हारुद’ और स्टूडेंट फिल्म ‘भारतमाता की जय’
फिल्म फेस्टिवल का एक और आकर्षण लखनऊ के तरक्कीपसंद शायर तश्ना जी पर बनी नयी डाक्यूमेंटरी  फिल्म  ‘अतश’ का रहेगा। गोरखपुर के डाक्टर अजीज़ अहमद शायर अली सरदार जाफरी की जन्मशती के मौके पर उन्हें याद करते हुए जाफरी साहब की रचनाओं की  सांगीतिक प्रस्तुति देंगे।
इस फेस्टिवल के मौके पर जसम के फिल्म समूह द ग्रुप की तरफ से कम कीमत वाली पुस्तकों की योजना के तहत आस्कर अवार्ड्स की राजनीति पर रामजी तिवारी की किताब ‘आस्कर अवार्ड्स- यह कठपुतली कौन नचावे’का लोकार्पण भी होगा।

हर बार की तरह इस बार भी यह आयोजन पूरी तरह से निशुल्‍क है और इसमें शिरकत करने के लिए किसी भी प्रकार के औपचारिक निमंत्रण पत्र या डोनर कार्ड की जरूरत नहीं है।

खामोशी से खतरा : अनुराग

book fair

एक धारणा बना दी गई है कि किताबें नहीं बिकतीं। लोग खरीदकर पढ़ना नहीं चाहते। खासकर हिंदी के प्रकाशक तो इस बात का सबसे अधिक रोना रोते हैं। हालांकि इसमें उन्‍हें कम से कम दो लाभ हैं। पहला- सरकारी खरीद के लिए नैतिक लाइसेंस के रूप में इस बात का प्रयोग करते हैं। दूसरा- लेखकों को रॉयल्‍टी देने से छुट्टी मिल जाती है। जन संस्‍कृति मंच ने रामशंकर यादव ‘विद्रोही’ के कविता संग्रह ‘नई खेती’ का प्रकाशन किया। इस संग्रह की छह सौ प्रतियां तीन माह में बिक गईं। दूसरी ओर एक नामी प्रकाशक ने वरिष्‍ठ कथाकार शेखर जोशी की दो किताबों की एक साल की रॉयल्‍टी 35 रुपये भेजी। कहीं न कहीं खपला तो जरूर है।

तीन-चार साल पहले की बात है। हमारी कॉलोनी में किसी ने नेशनल बुक ट्रस्‍ट को फोन कर दिया। उन्‍होंने तय दिन को किताबों की गाड़ी भेज दी। मुझे भी भ्रम था कि लोग किताबें नहीं खरीदेंगे। लेकिन कई लोगों ने अपने और बच्‍चों के लिए किताबें खरीदीं।

जन संस्‍कृति मंच की किताबों और फिल्‍मों का वितरण देख रहे   बैजनाथ ने बताया कि जसम के वर्ष में ‘प्रतिरोध के सिनेमा’ के दस आयोजन होते हैं और करीब दस अन्‍य साहि‍त्यिक-सांस्‍कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते है। इनके अलावा समय-समय पर पुस्‍तक प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। हमारे पास अभी अपने और अन्‍य प्रकाशकों के मिलाकर करीब तीस टॉइल्‍स हैं।‍ फिर भी ‘‘हम हर आयोजन में किताबों और फिल्‍मों की डीवीडी की कुल मिलाकर 10 से 15 हजार तक की बिक्री कर लेते हैं। अगर किताबें अच्‍छी और सस्‍ती हों तो लोग छूट भी नहीं मांगते।’’

नई दिल्‍ली में स्थित हिंदी भवन के सामने लक्ष्‍मण राव चाय बेचने के साथ अपनी लिखी किताबें भी बेचते हैं। पहले वह दिल्‍ली और आसपास के स्‍कूलों-कॉलेजों में साइकिल से जाकर किताबें बेचते थे। अब बंद कर दिया है। उन्‍होंने बताया कि हर महीने ग्‍यारह-बारह हजार की किताबें उनके यहां से बिक जाती हैं। उन्‍हें कहीं जाना नहीं पड़ता है।

श्रीराम सेंटर में वाणी प्रकाशन की किताबों की दुकान में कई बार किताब या पत्रिका खरीदने गया। मुझे याद नहीं आता कि कभी वह दुकान खाली मिली हो। दो-चार लोग किताब खरीदते और पसंद करते मिल जाते थे। अर्बन डिपार्टमेंट ने किताब और पत्रिकाएं बेचना कमर्शियल एक्टिविटी मानकर इसे बंद करवा दिया। लेकिन अधिकांश बडे़ लेखकों और प्रकाशकों के दिल्‍ली में होने के बावजूद उस समय कोई तीव्र विरोध हुआ हो या कोई प्रदर्शन हुआ हो, मुझे याद नहीं पड़ता। कहीं और दुकान खोलने के लिए भी दबाव नहीं बनाया गया। सब ने चुपचाप इसे स्‍वीकार कर लिया। पुस्‍तकों को असली खतारा इस चुप्‍पी से ही है।

दरियागंज में स्थित हिंदी बुक सेंटर को छोड़कर पूरी दिल्‍ली में मेरी जानकारी में इस समय कोई ऐसी दुकान नहीं है, जहां सभी महत्‍वपूर्ण किताबें मिल सकें। इस दुकान के बारे में अधिकांश लोगों को पता नहीं है और यह काफी अलग भी पड़ती है। देश की राजधानी में हिंदी के अधिकांश महत्‍वपूर्ण प्रकाशक हैं। सभी मिलकर कोई एक ऐसी दुकान नहीं खोल पा रहे हैं, जहां सभी की किताबें रखी जा सकें। प्रकाशकों का इसमें रुचि नहीं लेने का एक महत्‍वपूर्ण कारण सरकारी थोक खरीद का होना है। यह एक ऐसा जरिया है, जिसमें हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा आता है। यह कोई रहस्‍य नहीं रह गया है कि मोटा कमीशन देकर प्रकाशक सरकारी आर्डर प्राप्‍त करते हैं। एक बार में एक प्रकाशक की किताबों की निश्चित संख्‍या ही खरीदी जाती है। इसलिए एक ही प्रकाशक ने मुख्‍य प्रकाशन के अलावा अन्‍य नामों से प्रकाशन खोल लिए है। प्रिंट लाइन वाला पेज बदला और मिल गया एक और आर्डर। जब ऐसे शार्टकट से अच्‍छी खासी कमाई हो रही हो तो लोगों पर निर्भर क्‍यों रहा जाए। लेखक को कभी पता ही नहीं चलेगा कि उसकी किस किताब को कितना आर्डर मिला। ऐसे में उसकी किताबों की बिक्री का हिसाब रखने का और न ही रॉयल्‍टी देने आदि का कोई झंझट। सरकार को खरीदी गई किताबों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए। सरकारी खरीद के कारण ही प्रकाशक पुस्‍तकों की अनाप-शनाप कीमतें रखते हैं। आर्डर देने वाला खुश और आर्डर पाने वाला भी। हालांकि अब प्रकाशक कम कीमतों में पेपरबैक संस्‍करण उपलब्‍ध कराने लगे हैं। कई नए प्रकाशक भी आए हैं जो अच्‍छी और सस्‍ती किताबें प्रकाशित कर रहे हैं। उनका यह प्रयास लो‍कप्रिय भी रहा है। उन्‍हें लेखकों और पाठकों का पूरा सहयोग मिल रहा है। इससे पाठक की पहुंच पुस्‍तक तक बन रही है। इस संबंध में कीमतें कुछ और कम करने और पेपरबैक्‍स पुस्‍तकों की संख्‍या बढ़ाने की जरूरत है। सरकारी खरीद का मकसद साहित्‍य के प्रचार-प्रचार में सहयोग करना ही रहा होगा, लेकिन जब यह व्‍यवस्‍था पुस्‍तक विरोधी साबित हो रही हो तो इस बंद कर दिया जाए। इसके बदले कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए कि जो सरकारी मदद मिल रही है, वह प्रकाशक को मिलने की बजाय सीधे पाठक को मिले। सरकार ही विभिन्‍न शहरों में सरकारी स्‍कूल, कॉलेज या संपत्ति में एक दुकान खोले जिसमें प्रकाशक नाममात्र की मासिक राशि खर्च कर अपनी किताबें रख सकें। इससे होने वाली आमदनी से इसका खर्चा चलाया जाए। यहां सवाल उठता है कि क्‍या ऐसी दुकानें चलेंगी। मैं 1989 से 1992 तक उत्‍तरकाशी, उत्तराखंड में रहा। वहां मकान की सीढ़ी के नीचे जो जगह बचती है, उसमें किसी सज्‍जन ने साहित्यिक किताबों की दुकान खोल रखी थी। मैंने ‘भगत सिंह की जेल डायरी’ आदि कुछ किताबें वहां से खरीदी थीं। और लोग भी खरदीते होंगे, तभी तो दुकान चल रही थी। उत्‍तरकाशी देश की सीमा पर स्थित बहुत ही छोटा शहर है। जब वहां किताबें बिक सकती हैं तो बडे़ शहरों और कस्‍बों में क्‍यों नहीं बिक सकतीं। इसके अलावा देश भर में कई लोग पत्रिकाएं और किताबें मंगाकर उन्‍हें पुस्‍तक प्रेमियों को बेचते हैं। हालांकि इसमें उन्‍हें कोई आर्थिक लाभ नहीं होता और न ही उनका यह मकसद है, लेकिन लोगों तक किताबें पहुंच जाती हैं।

अगर आप कभी साप्‍ताहिक बाजार गए हैं तो वहां पटरी पर किताब बेचते एक-दो लोग जरूर मिले होंगे और ठेली में किताब बेचने वाला भी। यह सही है कि उनके पास धार्मिक किताबें और पत्रिकाएं, फिल्‍मी पत्रिकाएं, कुछ चालू किस्‍म की पत्रिकाएं और उपन्‍यास व साप्‍ताहिक पत्र-पत्रिकाएं अधिक होती हैं, लेकिन इन सबके बावजूद उनके पास प्रेमचंद के उपन्‍यास ‘गोदान’ व ‘गबन’ और कोई कहानी संग्रह, शरतचंद्र का ‘देवदास’ और सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि क्रांतिकारियों की जीवनियां भी मिल जाएंगी। इन किताबों को सजावट के लिए दुकानदार नहीं रखते। निश्चिततौर से इन किताबों की बिक्री होती है। दूसरी बात यह है कि अगर चालू किस्‍म की किताबें- पत्रिकाएं खरीदीं और पढ़ी जा रही हैं तो इसका मतलब भी यह है कि लोगों की पढ़ने में रुचि है। बस हम उनकी रुचि को विकसित कर उन्‍हें अच्‍छी किताबों की ओर नहीं मोड़ पा रहे हैं। इसके लिए सामूहिक रूप से प्रयास किए जाएं। प्रकाशक तो किताबों को लेकर लोगों के बीच में जाएं ही, साथ ही लेखकों को लोगों के बीच आना होगा। चारदीवारी के बीच बडे़ से बडा़ साहित्यिक आयोजन करने की बजाए लोगों के बीच छोटे-छोटे आयोजन करना ज्‍यादा उपयोगी है। अभी तक जो आयोजन हो रहे हैं उनमें लेखक वक्‍ता, लेखक श्रोता, लेखक आयोजक, लेखक व्‍यवस्‍थापक। यानी सब कुछ लेखकों के बीच ही हो रहा है, आम आदमी की उसमें कोई भागेदारी नहीं है। मुझे लगता है कि लेखकों को इसकी चिंता भी नहीं है। नहीं तो वह व्‍यवस्‍थापकों से कहते कि एयरकंडीशनर हॉल में आयोजन करने के बजाए किसी कॉलोनी के पार्क में आयोजन करें। कुछ लोग भी जुटेंगे। हो सकता है कि लोगों को शुरू-शुरू में अजूबा लगे, लेकिन बार-बार इस तरह का आयोजन देखकर उनके मन में स्‍वाभाविक रूप से जिज्ञासा उत्‍पन्‍न होगी कि ये लोग क्‍या करते हैं और क्‍यों करते हैं। यह जिज्ञासा उन्‍हें किताबों के नजदीक ले जाने में सहायक होगी।

कई बार स्‍कूलों में बुक स्‍टॉल लगाए जाते हैं। उनमें साधारण और महंगी किताब होने के बावजूद खरीदी जाती हैं। फिर हिंदी प्रका‍शकों के साथ ही ऐसी क्‍या दिक्‍कत है कि उनकी किताबें पाठक नहीं खरीदता।

देश की राजधानी की ही बात करें तो यहां दिल्‍ली सरकार की ओर से जगह-जगह शराब की दुकानें खोली गईं। इसके लिए लोगों के विरोध को नजरअंदाज किया गया। इसकी मुख्‍य वजह राजस्‍व की प्राप्ति है। लेकिन क्‍या एक लोक कल्‍याणकारी सरकार का दायित्‍व केवल मुनाफा कमाना है। लोगों को सुरुचि संपन्‍न बनाना और उनके बौद्धिक स्‍तर को बढ़ाने की प्रति उसका कोई दायित्‍व नहीं है। क्‍यों नहीं दिल्‍ली सरकार पूरी राजधानी में एक भी किताब की दुकान नहीं खोल सकती।

दिल्‍ली कला-संस्‍कृति की भी राजधानी है। केंद्रीय साहित्‍य अकादमी, हिंदी अकादेमी, विभिन्‍न भाषाओं की अकादमी, संगीत-नाटक अकादमी और कई कला-संस्‍कृति से जुडे़ सेंटरों और संस्‍थानों के बावजूद दिल्‍ली में एक भी ऐसी जगह का न होना, जहां लोग अपनी पसंद की किताब देख और खरीद सकें शर्मनाक है। यह हॉल देश की राजधानी के हैं तो अन्‍य जगहों का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। इसमें न तो दोष किताबों का है और नहीं पाठकों का। दोष है तो हमारा, जो कोई व्‍यवस्‍था नहीं कर पा रहे हैं। केंद्रीय साहित्‍य अकादमी और एनएसडी के पास काफी जगह है। क्‍यों नहीं इनके गेट पर एक बड़ी-सी दुकान बनाई जा सकती, जहां लोगों को आसानी से सभी प्रकाशकों की किताब उपलब्‍ध हो सकें।

पाठकों को किताबों से दूर करने में डाक विभाग की भी महत्‍वपूर्ण भूमिका है। जितने की किताब नहीं होती है, उससे ज्‍यादा डाक में खर्च हो जाते हैं। ऐसे में कोई कैसे डाक से किताब मंगाने का साहस कर सकता है। डाक से किताब भेजने में सरकार रियायत दे तो कुछ लाभ होगा।

अगर लोग किताब नहीं खरीदना चाहते हैं तो वे पुस्‍तक मेले में क्‍यों आते हैं। और लोग खरीदते ही नहीं हैं तो मेले में किताब कैसे बिक जाती हैं। कौन खरीदता है उन्‍हें। किताबों की खरीदारी करने वाले दिल्‍ली के ही नहीं, आसपास के राज्‍यों के लोग भी आते हैं। कुल किताबों में जितना कमीशन मिलता है, उससे ज्‍यादा तो आने-जाने में खर्च हो जाता है। इसके बावजूद लोग आते हैं तो इसकी मुख्‍य वजह है, एक ही छत के नीचे सभी प्रकाशकों का मौजूद होना। ऐसे में लोगों को अपनी मनपसंद की किताबें खरीदने में सुविधा होती है। विश्‍व पुस्‍तक मेले-2013 के दौरान पहले दिन तीन लगातार बारिश पड़ने और बहुत ज्‍यादा खराब मौसम होने के बावजूद लोग आए तो अभी भी कहा जाए कि किताबों की खरीदी में किसी की रुचि नहीं है। अगर किसी भी तरीके से देश भर में जगह-जगह किताबें उपलब्‍ध कराई जाएं तो जरूरी बिकेंगी। कम से कम एक बार कोशिश तो करनी ही चाहिए।

(यह लेख संपादित रूप में जनसत्ता में 10 फरवरी 2013 को प्रकाशित हुआ है)

धन्नासेठ प्रकाशक और हिन्दी कवि की विपन्नता का आख्यान: अनवर सुहैल

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बाबा नागार्जुन की चर्चित कविता ‘सौदा’ पर युवा कवि अनवर सुहैल की टिप्‍पणी-

बाबा नागार्जुन के सृजन के केन्द्र में था आम-आदमी, खेतिहर किसान, मजदूर, हस्तशिल्पी, विकल्पहीन मतदाता, स्त्रियाँ, हरिजन और हिन्दी का लेखक। बाबा ने बड़ी आसान भाषा में अपनी बात कही ताकि बात का सीधा अर्थ ही लिया जाये। जिस तरह बाबा नागार्जुन अपनी वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान और बोली-बानी में भदेस और सहज थे, उसी तरह उनका समूचा लेखन प्रथम दृष्टया तो सरल-सहज-सम्प्रेषणीय नज़र आता है किन्तु उनकी अलंकारहीन भाषा का जादू देर तक पाठक-श्रोता के मन-मस्तिष्‍कमें उमड़ता-घुमड़ता रहता है। नागार्जुन की यही विशेषता उन्हें क्लासिक कवियों की श्रेणी में खड़ा करती है।

मैं सोचता हूँ कि आधुनिक हिन्दी का काव्य कितना अपूर्ण होता यदि निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय, केदार और नागार्जुन जैसे लेखकों का सृजन-सहयोग हिन्दी-कविता को न मिला होता। आज का कवि जाने क्यों अपनी परम्परा से दूरी बनाना चाहता है। नागार्जुन की कविता इतनी मारक है कि सीधे टारगेट पर प्रहार करती है और बिना किसी दम्भ के मुस्‍कराकर अपनी जीत का ऐलान करती है। शब्द की मारक क्षमता का आँकलन बाबा की विशेषता थी। बाबा जानते थे कि सब कुछ खत्म हो जायेगा लेकिन कविता में फँसे हुए शब्द हमेशा लोगों के दिलों में जिन्दा रहेंगे और ताल ठोंक कर कहेंगे-

‘बाल न बाँका कर सकी, शासन की बंदूक’
शब्द की शक्ति यही है।
बक़ौल ग़ालिब- ‘जो आँख से टपका तो फिर लहू क्या है?’

नागार्जुन के शब्द बड़े पावरफुल हैं। उनमें ग़ज़ब की धार है, पैनापन है और ज़रूरत पड़ने पर खंज़र की तरह दुश्मन के सीने में उतरने की कला है।

अपने परिवेश की मामूली से मामूली डिटेल बाबा की नज़रों से चूकी नहीं है। बाबा सभी जगह देखते हैं और तरकश से तीर निकाल-निकाल कर प्रत्यंचा पर कसते हैं। इसी तारतम्य में लेखक और प्रकाशक के बीच समीकरण की भी उन्होनें दिलचस्प पड़ताल की है।

हिन्दी के लेखक की दरिद्र आर्थिक-स्थिति और प्रकाशकों की सम्पन्नता को विषय बनाकर बाबा नागार्जुन की एक कविता है ‘सौदा’। ‘सौदा’ यानी ‘डील’। लेखक और प्रकाशक के अंतर्संबंधों की पड़ताल करती कविता ‘सौदा’ में बाबा ने बड़ी सहजता से लेखकों की निरीह-दरिद्रता और प्रकाशकों के काइयाँपन को बयान किया है। इस कविता में यूँ कहें कि धूर्त प्रकाशकों को बड़े प्यार से चाँदी का जूता मारा है। प्रकाशक जो कि मूलतः विक्रेता होता है किन्तु कच्चे माल के रूप में उसे पाण्डुलिपियाँ तो खरीदनी ही पड़ती हैं। इस हिसाब से ‘सौदा’ में प्रकाशक एक ऐसे खरीददार के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसे प्रत्यक्षतः रचनाओं की ज़रूरत है लेकिन वह विक्रेता पर अहसान भी जताना चाहता है कि न चाहते हुए, घाटे की सम्भावना होते हुए भी वह कवि का तैयार माल खरीदने को मजबूर है। ऐसा इसलिए है कि दुर्भाग्यवश प्रकाशक इस धंधे में फँसा हुआ है। अच्छे करम होते तो वह कोई और काम न कर लेता। काहे रद्दी छापने के काम में फँसा होता। प्रकाशक का दृष्टिकोण पता नहीं दूसरी भाषाओं में कैसा है, किन्तु हिन्दी में तो जो नागार्जुन का अनुभव है, वैसा ही खट्टा-कसैला अनुभव कमोबेश तमाम लेखकों को होता है। लेखकों को प्रकाशक की चौखट में माथा रगड़ना ही पड़ता है। सिद्ध करना पड़ता है कि ‘हाँ जनाब, आपने अभी तक जो छापा, वाकई कूड़ा था, लेकिन आप मेरी कृति को तो छापिए, देखिएगा हाथों-हाथ बिक जायेंगी प्रतियाँ और धड़ाधड़ संस्करण पे संस्करण निकालने होंगे। ये किताब छपेगी तो जैसे प्रकाशन जगत में क्रान्ति आ जायेगी। आप एक बार हमारे प्रस्ताव पर विचार तो करें।’

जवाब में प्रकाशक यही कहता रहेगा-
‘लेकिन जनाब यह मत भूलिए कि डालमिया नहीं हूँ मैं
अदना-सा बिजनेसमैन हूँ
खुशनसीब होता तो और कुछ करता
छाप-छाप कर कूड़ा भूखों न मरता।’

ये हैं मिस्टर ओसवाल, हिन्दी की प्रगतिशील पुस्तकों के पब्लिशर मिस्टर ओसवाल। जिनकी नामी दुकान है ‘किताब कुंज’। मिस्टर ओसवाल का चरित्र-चित्रण जिस तरह नागार्जुन ने किया है उससे हिन्दी के अधिकांश लेखक परिचित हैं। देखिए मिस्टर ओसवाल नामक प्रकाशक जो कैप्सटन सिगरेट का पैकेट रखता है, जिसकी कलाई पर है ‘स्वर्णिम चेन दामी रिस्टवाच की’,

जिसने
‘अभी अभी ली है ‘हिन्दुस्तान फोर्टीन’
सो उसमें यदा-कदा साथ बिठाते हैं
पान खिलाते हैं, गोल्ड फ़्लेक पिलाते हैं
मंजुघोष प्यारे और क्या चाहिए बेटा तुमको???’
है न प्रकाशकीय पात्र की अद्भुत सम्पन्नता। इसी के बरअक्स आप ज़रा लेखक की विपन्नता का दृश्य देखें-
‘बेटा जकड़ा है बान टीबी की गिरफ़्त में
पचास ठो रुपइया और दीजियेगा
बत्तीस ग्राम स्टप्टोमाईसिन कम नहीं होता है
जैसा मेरा वैसा आपका
लड़का ही तो ठहरा
एं हें हें हें कृपा कीजियेगा
अबकी बचा लीजियेगा…एं हें हें हें
पचास ठो रुपइया लौंडे के नाम पर!’

लेखक प्रकाशक के आगे अपनी व्यथा को किस तरह गिड़गिड़ाकर व्यक्त कर रहा है-
‘जियेगा तो गुन गायेगा लौंडा हिं हिं हिं हिं….हुँ हुँ हुँ हुँ
रोग के रेत में लसका पड़ा है जीवन का जहाज़।’

प्रगतिशील प्रकाशक मिस्टर ओसवाल के सामने लेखक नतमस्तक है। वह नहीं चाहता कि प्रकाशक उसकी पाण्डुलिपि वापस करे।

‘जितना कह गया, उतना ही दूँगा
चार सौ से ज़्यादा धेला भी नहीं
हो गर मंजूर तो देता हूँ चैक
वरना मैनस्कृप्ट वापस लीजिए
जाइए, गरीब पर रहम भी कीजिए।’

बस प्रकाशक का ये जवाब लेखक की कमर तोड़ देता है। अच्छे-अच्छे लेखक की हवा निकल जाती है जब प्रकाशक सिरे से पाण्डुलिपि को नकार दे। किसी भी लेखक के लिये सबसे मुश्किल क्षण वह होता है, जब किसी कारण से उसका लिखा ‘अस्वीकृत’ हो जाये या ‘वापस लौट आये’।

इस कविता में तीसरा पात्र ‘पाण्डुलिपि’ है। पाण्डुलिपि यानी लेखक का उत्पाद। इस उत्पाद के सहारे प्रकाशक युगों-युगों तक कमाता है लेकिन लेखक के रूप में पाण्डुलिपि को लेकर नागार्जुन के मन की व्यथा-कथा का एक बिम्ब-

‘बिदक न जाएं कहीं मिस्टर ओसवाल?
पाण्डुलिपि लेकर मैं क्या करूँगा?
दवाई का दाम कैसे मैं भरूँगा?
चार पैसे कम….चार पैसे ज्यादा….
सौदा पटा लो बेटा मंजुघोष!
ले लो चैक, बैंक की राह लो
उतराए खूब अब दुनिया की थाह लो
एग्रीमेंट पर किया साइन, कापीराइट बेच दी।’

मसीजीवी लेखक के लिये कालजयी सृजन बेहद सरल है लेकिन उस कालजयी सृजन के एवज़ धनार्जन बेहद कठिन है। क्या मिलता है लिखने के बदले? कितना कम मिलता है और वह भी अनिश्चित रहता है मिलना-जुलना। पता नहीं लेखन किसी को पसंद भी आयेगा या नहीं? संशय बना रहता है।

लेखक अक्सर कहते हैं कि सृजन एक तरह से प्रसव पीड़ा वहन करने वाला श्रमसाध्य काम है। इस प्रसव पीड़ा से लेखक हमेशा जूझता है। कितना मुश्किल काम है किसी कृति को सृजित करना। चाहे वह एक कविता हो, कहानी हो, उपन्यास हो या अन्य कोई विधा। क्लासिक तेवर के कवि बाबा नागार्जुन तक जब प्रकाशक के समक्ष अपनी रचना और व्यथा के साथ खड़े होते हैं तो सृजन के दर्द को भूल कर प्रकाशक के साथ बाबा नागार्जुन ने कितनी बारीकी से सृजन की शिद्दत को व्यंग्य से बाँधा है-

‘दस रोज़ सोचा, बीस रोज़ लिखा
महीने की मेहनत तीन सौ लाई!
क्या बुरा सौदा है?
जीते रहें हमारे श्रीमान् करुणानिधि ओसवाल
साहित्यकारों के दीनदयाल
नामी दुकान ‘किताब कुंज’ के कुंजीलाल
इनसे भाग कर जाऊँगा कहाँ मैं
गुन ही गाऊँगा, रहूँगा जहाँ मैं
वक्‍त पर आते हैं काम
कवर पर छपने देते हैं नाम।’

‘सौदा’ कविता का यही मर्म है। प्रकाशक ऐन-केन प्रकारेण, लेखक की पाण्डुलिपि पर क़ब्ज़ा कर लेता है और फिर छापने में मुद्दत लगा देता है। गरजुहा लेखक यानी मसिजीवी लेखक तो लिखने के लिये अभिशप्त होता ही है, दिन-रात आँखें फोड़कर, कमर तोड़कर वह लिखेगा ही।

यही नागार्जुन की शैली है। बाबा अपनी बात इस साफ़गाई से कहते हैं कि सामने वाला चारों खाने चित हो जाये और नाराज़ भी न हो। वाकई, इतिहास गवाह है कि हिन्दी का लेखक ग़रीब से ग़रीब होता गया है और प्रकाशक हिन्दुस्तान के कई शहरों के अलावा विदेशों में भी अपनी शाखाएं खोल रहे हैं। जब भी उनके पास ज़रूरी लेखन लेकर जाओ तो पहला वाक्य यही रहेगा-

‘मार्केट डल है जेनरल बुक्स का
चारों ओर स्लंपिंग हैं…’

और प्रकाशक की गर्जना का एक चित्र देखिए-

‘फुफ् फुफ् फुफकार उठे
प्रगतिशील पुस्तकों के पब्लिशर मिस्टर ओसवाल
नामी दुकान ‘किताब कुंज’ के कुंजीलाल
यहाँ तो ससुर मुश्किल है ऐसी कि….
और आप खाए जा रहे हैं माथा महाशय मंजुघोष!’

ऐसी बात, इतनी सादगी से और इतनी ताक़त से बाबा नागार्जुन ही कह सकते हैं…सिर्फ और सिर्फ नागार्जुन…..

एशियाई ढब के किस्सागो

swayam prakash

चित्तौड़गढ़। यथार्थ को संजोते हुए जीवन की वास्तविकता का चित्रण कर समाज की गतिशीलता को बनाये रखने का मर्म ही कहानी हैं। सूक्ष्म पर्यवेक्षण क्षमता शक्ति एक कथाकार की विशेषता है और स्वयं प्रकाश इसके पर्याय बनकर उभरे हैं। उनकी कहानियों में कथा और कहन की शैली खासतौर पर दिखती हैं। यही कारण है कि पाठक को कहानियों अपने आस-पास के परिवेश से मेल खाती हुई अनुभव होती हैं। विलग अन्दाज की भाषा शैली के कारण स्वयं प्रकाश पाठकों के होकर रह जाते हैं। चित्तौड़गढ़ में आयोजित ‘समकालीन हिन्दी कथा साहित्य एवं स्वयं प्रकाश’ विषयक राष्ट्रीय सेमीनार में मुख्यतः यह बात उभरकर आयी।

सेमीनार का बीज वक्तव्य देते हुए सुखाडिया विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर माधव हाडा ने कहा कि यथार्थ के प्रचलित ढाँचे ने पारम्परिक कहन को बहुत नुकसान पहुँचाया है लेकिन अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के बावजूद स्वयं प्रकाश ऐसे कथाकार हैं जो यथार्थ के नये-नये पक्षों का उद्घाटन करते हुए कहन को क्षतिग्रस्त नहीं होने देते। उन्होंने कहा कि कहानी और कथा का भेद जिस तरह से उनकी कहानियों को पढ़ते हुए समझा जा सकता है, वैसा किसी भी समकालीन कथाकार के यहाँ दुर्लभ है। प्रोफेसर हाडा ने कहा कि आज के दौर में लेखक को स्वयं लेखक होने की चिन्ता खाये जा रही है, वहीं मनुष्य एवं मनुष्य की चिन्ता स्वयं प्रकाश की कहानियों में परिलक्षित होती है।

हिन्दू कॉलेज, दिल्ली से आये युवा आलोचक पल्लव ने आयोजन के महत्त्व को प्रकाशित करते हुए कहा कि प्रशंसाओं के घटाटोप में उस आलोचना की बडी़ जरूरत है जो हमारे समय की सही रचनाशीलता को स्थापित करे। इस सत्र में कथाकार स्वयं प्रकाश ने अपनी चर्चित कहानी ‘श्कानदांवश्’ का पाठ किया जो रोचक कहन  में भी अपने समय की जटिल और उलझी हुई सच्चाइयों को समझने का अवसर देती है। पाठक जिसे किस्सा समझकर रचना का आनंद लेता है वह कोरा किस्सा न होकर उससे कहीं आगे का दस्तावेज हो जाती है। सत्र के समापन पर सम्भावना के अध्यक्ष डॉ. के.सी. शर्मा ने आगे भी इस तरह के आयोजन जारी रखने का विश्‍वास जताया। शुरुआत में श्रमिक नेता घनश्याम सिंह राणावत, जी.एन.एस. चौहान, जेपी दशोरा, अजयसिंह, योगेश शर्मा ने अतिथियों का अभिनन्दन किया।

दूसरे सत्र के मुख्य वक्ता युवा कवि अशोक कुमार पांडेय ने समकालीन कथा साहित्य की विभिन्न प्रवृतियों के कई उदाहरण श्रोताओं के सामने रखे। उन्होंने समय के साथ बदलती परिस्थितियों और संक्रमण के दौर में भी स्वयं प्रकाश के अपने लेखन को लेकर प्रतिबद्ध बने रहने पर खुशी जाहिर की। उन्होंने समकाल की व्याख्या करते हुए कहा कि यह सही है कि किसी भी काल के विभिन्न संस्तर होते हैं। एक ही समय में हम आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक सभी स्तरों पर इन संस्तरों को महसूस कर सकते हैं। लेकिन जहाँ उत्तर-आधुनिक विमर्श इन्हें अलग-अलग करके देखते हैं, वहीँ एक वामपंथी लेखक इन सबके बीच उपस्थित अंतर्संबंध की पड़ताल करता है और इसीलिए उसे अपनी रचनाओं की ब्रांडिंग नहीं करनी पडती। उसके लेखन में स्त्री, दलित, साम्प्रदायिकता, आर्थिक शोषण सभी सहज स्वाभाविक रूप से आते हैं। स्वयं प्रकाश की कहानियाँ  इसकी गवाह हैं। उनकी दूसरी खूबी यह है कि वह पूरी तरह एशियाई ढब के किस्सागो हैं, जिनके यहाँ स्थानीयता को भूमंडलीय में तब्दील होते देखा जा सकता है। इस रूप में वह विमर्शों के हवाई दौर में विचार की सख्त जमीन पर खडे़ महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। सत्र की अध्यक्षता करते हुए कवि और चिंतक डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय ने कहा कि कोई भी व्यक्ति दूसरों की पीड़ा और व्यथा को समझकर ही साहित्यकार बन सकता है और सही अर्थों में समाज को कुछ दे सकता हैं। उन्होंने स्वयं प्रकाश के साथ भीनमाल और चित्तौड़ में व्यतीत दिनों पर एक संस्मरण का वाचन किया। जबलपुर विश्वविद्यालय की मोनालिसा और राजकीय महाविद्यालय मण्डफिया के प्राध्यापक डॉ. अखिलेश चाष्टा ने पत्रवाचन कर स्वयं प्रकाश की कहानियों का समकालीन परिदृश्य में विश्‍लेषण किया। विमर्श के दौरान पार्टीशन, चौथा हादसा, नीलकान्त का सफर जैसी कहानियों की खूब चर्चा रही। इस सत्र का संचालन माणिक ने किया।

तीसरे सत्र के मुख्य वक्ता डॉक्‍टर कामेश्‍वर प्रसाद सिंह ने समाकालीन परिदृश्य में स्वयं प्रकाश की उपस्थिति का महत्त्व दर्शाते हुए कहा कि ‘पार्टीशन’ जैसी कहानी केवल साम्प्रदायिकता जैसी समस्या पर ही बात नहीं करती, अपितु संश्‍लिष्‍ट यथार्थ को सही-सही खोलकर कर पाठक तक पहुँचा देती है। उन्होंने ‘क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा है?’ का उल्लेख करते हुए कहा कि मध्यवर्ग का काइँयापन इस कहानी में जिस तरह निकलकर आता है वह इसे एक खास ढंग से देखने से रोकता है। इस सत्र में इग्नू दिल्ली की शोध छात्रा रेखा सिंह ने पत्र वाचन किया। अध्यक्षता कर रहे राजस्थान विद्यापीठ के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ मलय पानेरी ने कहा कि स्वयं प्रकाश की कहानियाँ नींद से जगाने के साथ आँखें खोल देने का काम भी करती हैं। उन्होंने स्वयं प्रकाश की एक अल्पचर्चित कहानी ‘ढलान पर’ का उल्लेख करते हुए बताया कि अधेड़ होते मनुष्य का जैसा प्रभावी चित्र इस कहानी में आया है वह दुर्लभ है। सत्र का संचालन करते हुए डॉ. रेणु व्यास ने कहा कि स्वयं प्रकाश की कहानी के पात्रों में हमेशा पाठक भी शामिल होता है यही उनकी कहानी की ताकत होती है।

समापन सत्र में डॉ. सत्यनारायण व्यास ने कहा कि जब तक मनुष्य और मनुष्यता है जब तक साहित्य की आवश्यकताओं की प्रासंगिकता रहेगी। उन्होंने कहा कि मानवता सबसे बड़ी विचारधारा है और हमें यह समझना होगा कि वामपंथी हुए बिना भी प्रगतिशील हुआ जा सकता है। सामाजिक यथार्थ के साथ मानवीय पक्ष स्वयं प्रकाश की कहानियों की विशेषता है एवं उनका सम्पूर्ण साहित्य, सृजन इंसानियत के मूल्यों को बार-बार केन्द्र में लाता है। सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात समालोचक प्रो. नवलकिशोर ने स्वयं प्रकाश की कहानियों के रचना कौशल के बारीक सूत्रों को पकडते हुए उनकी के छोटी कहानी ‘हत्या’ का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मामूली दिखाई दे रहे दृश्य में कुछ विशिष्ट खोज लाना और उसे विशिष्ट अंदाज में प्रस्तुत करना स्वयं प्रकाश जैसे लेखक के लिये ही संभव है। चित्रकार और कवि रवि कुमार ने कहा कि किसी भी कहानी में विचार की अनुपस्थिति असम्‍भव है और साहित्य व्यक्ति के अनुभव के दायरे को बढ़ाता हैं। इस सत्र का संचालन कर रहे राजकीय महाविद्यालय डूंगरपुर के प्राध्यापक हिमांशु पण्डया ने कहा कि गलत का प्रतिरोध प्रबलता से करना ही स्वयं प्रकाश की कहानियों को अन्य लेखकों से अलग खड़ा करती है। रावतभाटा के रंगकर्मी रविकुमार द्वारा निर्मित स्वयंप्रकाश की कहानियों के खास हिस्सों पर केन्द्रित करके पोस्टर प्रदर्शनी इस सेमीनार का एक और मुख्य आकर्षण रही। यहीं बनास जन, समयांतर, लोक संघर्ष सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई। सेमीनार में प्रतिभागियों द्वारा अपने अनुभव सुनाने के क्रम में विकास अग्रवाल ने स्वयं प्रकाश के साथ बिताये अपने समय को संक्षेप में याद किया। आयोजन में गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. गजेन्द्र मीणा ने प्रतिभागियों के प्रतिनिधि के रूप में सेमीनार पर वक्तव्य दिया। इस सत्र में विकास अग्रवाल ने भी अपनी संक्षिप्‍त टिप्पणी की। आखिर में आभार आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास ने दिया।

आयोजन स्थल पर चित्रकार रविकुमार द्वारा कथा-कविता पोस्टर प्रदर्शनी, ज्योतिपर्व प्रकाशन द्वारा स्वयं प्रकाश की पुस्तकों की प्रदर्शनी एवं लघु पत्रिकाओं की प्रदर्शनी को प्रतिभागियों ने सराहा।

प्रस्‍तुति : डॉक्‍टर कनक जैन, संयोजक, राष्ट्रीय सेमीनार

युवा कथाकार मनीषा कुलश्रेष्‍ठ को लमही सम्मान

 

मनीषा कुलश्रेष्ठ

मनीषा कुलश्रेष्ठ

नई दिल्ली : हिन्दी की चर्चित युवा कथाकार मनीषा कुलश्रेष्‍ठ को प्रतिष्ठित ‘लमही सम्मान’ प्रदान करने की घोषणा की गई है। वर्ष 2012 का लमही सम्मान घोषित करते हुए निर्णायक मंडल ने कहा है कि मनीषा कुलश्रेष्ठ सघन सम्‍वेदना, व्यापक सरोकार,  सतर्क बौद्धिकता और रचनात्मक समृद्धि की दृष्टि से एक अद्भुत कथाकार हैं। जिन युवा कथाकारों ने हिन्दी साहित्य को नये आयाम दिए है उनमें मनीषा अग्रणी हैं।

महान कथाकार प्रेमचंद की स्मृति में दिया जाने वाला ‘लमही सम्मान’ मनीषा में एक विराट कथा परम्‍परा विकसित होते देख रहा है। इस चौथे ‘लमही सम्मान’ के निर्णायक मंडल में प्रख्यात पत्रकार आलोक मेहता, सुपरिचित फिल्मकार डॉ. चन्द्रप्रकाश द्विवेदी,  आलोचक सुशील सिद्धार्थ,  सम्‍पादक विजय राय और युवा प्रकाशक महेश भारद्वाज शामिल थे। अब तक यह सम्मान ममता कालिया, साजिद रशीद और शिवमूर्ति को प्रदान किया जा चुका है।

26 अगस्त 1967 को जोधपुर (राजस्थान) में जन्मी मनीषा कुलश्रेष्ठ बहुमुखी प्रतिभा की धनी रचनाकार हैं। उनकी अब तक प्रकाशित पुस्तकें हैं- कठपुतलियाँ, कुछ भी तो रुमानी नहीं,  केयर ऑफ स्वात घाटी,  गंधर्व गाथा (कहानी संग्रह),  शिगाफ़, शालभंजिका (उपन्यास)। वह एक श्रेष्ठ अनुवादक हैं। इंटरनेट की पहली वेब पत्रिका ‘हिन्दी नेस्ट’ का एक दशक से सम्‍पादन कर रही हैं। उन्हें अब तक मिले सम्मानों में प्रमुख हैं- चंद्रदेव शर्मा सम्मान, रांगेय राघव सम्मान, कृष्ण बलदेव वैद फैलोशिप।

मनीषा कुलश्रेष्ठ ने स्त्री विमर्श को अपनी कहानियों में नयी सार्थकता प्रदान करते हुए मानवीय नियति और विस्थापित वंचित सामाजिकता की पड़ताल की है। कश्मीर समस्या पर केंद्रित उपन्यास ‘शिगाफ़’ उनके वैश्विक सरोकारों को व्यक्त करता है। इधर वह नये उपन्यास ‘पंचकन्या’ को लिखने में व्यस्त हैं।

यह सम्मान महान कथाशिल्पी मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर 30 जुलाई 2013 को नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य समारोह में प्रदान किया जायेगा। उन्हें सम्मान स्वरूप 15000 नकद, शील्ड, श्रीफल और शॉल प्रदान किया जायेगा।