Archive for: January 2013

राका शिवहरे की कविताएं

राका शिवहरे

राका शिवहरे

राका शिवहरे पेशे से डॉक्टर हैं, किन्तु साहित्य में भी उनकी गहरी रुचि है और कविता लिखने में भी। वह बोल-चाल की भाषा में लिखते हैं। न कोई पेंच न कोई बनावटी। सीधे शब्दों में अपने अनुभव/भाव व्यक्त करते हैं। उनकी कुछ कविताएं-

जीवन का अनुप्रास

मन के मन-को मान मैं माना
तू तो तन-की ताल तलैया
जोंकुं जीवन जीके जाना
चंचला चातुरी चाल चलैया.
सोता सपना सपन सलोना
कनक कोटि के कीट कटैया
लाली लालच लेत ललाना
लत-लानत ले लात लतैया
रास राग रति रोग रंगाना
रूप रुचि रस राच-रचैया
उर उड़त उड़ान उन्चाना
झूमें झिन्घुर झाड़ झडैया
सीध सहे सब सात सताना
बिदक बड़ी बौराए बरैया
ख़ुशी खातिर खग खोजे खजाना
खोया खुदा,खुद खेल खिलैया
(10/11/2012)

लालबत्ती-हरीबत्ती

चौक पे लाल बत्ती ने
यकायक थाम ली रफ्तार
अनायास हाथों ने
ऐ-सी के मरोड़े कान
ली एक फुरसती दीर्घ साँस
एफ.एम. की तान में मदमस्त
मशगूल अपने छोटी
सी दुनिया में था मैं व्यस्त
तभी लगा कोई झाँक रहा है
मेरी व्यवस्था को आँक रहा है
बगल कि टैम्पो पर
फेफड़ों से भरपूर जिन्दगी
लगभग चिपकी दस जोड़ी आँखें
हवा-सड़क पर अवैध कब्जे
मानिंद निकले पैर-हाथ कमान
बमुश्किल सन्सियाते
कुचले बैग पेटी और उनके समान
पसीने और गर्मी से रोता
लड्डूगोपाल–चढ़ गया माँ की मचान
अब चुप था देख
मेरे राज्य पे आराम फरमाते शेर कि शान .
औ शायद कोफ़्त करता हो
खिलोने कि किस्मत से
बस कनखियों से भाँप लिए
मैंने उस नवयुवती के अरमान
जो दे रही थी मजबूर पति
को मूक शब्दों में- स्वप्नज्ञान
पल भर में…
पहुँच गया था बीस साल पीछे
कमबखत हरीबत्ती की चाबुक
ने फिर घोड़ा बना दिया।
(27/10/2012)

विसर्जन

मुंबई से टीवी पर
लाइव
गणपति विसर्जन
मुलुड, पनवेल, घाटकोपर
सैलाब-जुलूस-हुजूम
असंख्य अगणित
गाजे-बाजे भगत-गणेश

कातर कौतुक बूढी आँखें
टूटे काँच में बुदबुदाती लालटेन
पथराये चश्मे से
बेसुध ढूँढ़ती
उस बाढ़ में अपनी इक बूँद
बैठते दिल से
कुछ अपना शेष
विशेष
शायद दिख पड़े
मुनुआ और उसका गणेश
बहू और उसका लल्ला
बस दे दूँगी यहीं से बलैया
छाती में कपास लपेटे
पोते का अहसास समेटे
धोती की छोर पर
यादों की पुटकी
छिन्गनी में काजल तैयार
ढूंढ़ती
गणेशों में अपना गणेश
अपना लाल
लाल का लल्ला
लगाने को नज़र का टीका

और यहाँ
मोतिहारी में-
ना भीड़ ना बाजा ना भगदड़
रोज़ होता मौन विसर्जन
बिन पानी
बूढी आँखों में डूबता है
रोज़ गणेश
तभी बूढ़े रेडियो की आवाज़
-अरी बाहिर आ जाओ
मुनुआ की माँ लाइट-गोल हो गईल….
माँ सोचती
सच- लाइट तो कब
बप्पा मोरया….
(04/10/2012)

विजयाशमी

अचरज न करना
गर कल
रावण ठोक दे
मानहानि का दावा
वो दुखी है और नाराज़ भी
चूँकि
नेताजी आज़ कि शाम..
बनने वाले है राम

बीरभदर

सोसाइटी के मैनगेट पे
खुद से मोटी
बन्दूक लटकाए
छणिक मुस्तैदी ओढ़े
जो रहती बस सोसाइटी-अध्यक्ष
की  गाड़ी पार होते तक
आंशिक नशेड़ी- बीरभद्र
निशक्त-मजबूर-अधेड़
पर अकड़ी मूँछों वाला
मानो ये ही रहा हो बस मानक
एलीजीबिलिटी क्राईटेरिया
हो रहा अब रोज़
दैनिक चुहुल का शिकार
का हो बीरभदर-भैया ?
खाना लाये हो का?
ससुर रोज़ चुटकी लेत हैं
जब से लड़का-औ-महरारू
निकाल दिहिन है
घर कि रोटी को मोहताज
थूकत-पिच्च से खैनी
बिचारत अब दद्दा.
काहे का बीर?
काहे का भद्र?
(25/10/2012)

बच्चों का क्या दोष

शहर की छाती पे
उग गए हैं सर्वदा
कंक्रीट के पहाड़ या
सहूलियत के दड़बे
चिड़ियाघर या
निजता की एकल खिड़की
ना आँगन ना बाड़ी
ना तुलसी का चौरा
पोसते अपने नवकुँवर ..
किराये के औजारों से
दादी-दादा किस्सों में
जो कदाचित त्योहारों में
पधारते हैं हिस्सों में.
एकाकी- नैनो-न्यूक्लीयर फॅमिली
न्यूक्लीयर सभ्यता
हम दो हमारे एक-या-दो
किसी और को घुसने मत दो
रिलेशन प्रूफ ‘फ्लैट’
सोचता तो होगा
अब आगे बच्चों का क्या दोष?

जनसंघर्षों की आवाज बन चुकी हैं गोरख की कविताएं

गोरख पांडेय

गोरख पांडेय

स्मृति दिवस पर क्रान्‍तिकारी कवि की रचनाओं पर लेखकों-संस्कृतिकर्मियों ने की चर्चा- 

जन संस्कृति मंच के पहले राष्ट्रीय महासचिव क्रान्‍तिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में उनके स्मृति दिवस 29 जनवरी 2013 को चारु भवन सभागार (शकरपुर, दिल्ली) में कार्यक्रम आयोजित किया गया। जसम की गीत नाट्य इकाई ‘संगवारी’ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में गोरख की समग्र रचनाओं का सम्‍पादन कर रहे युवा आलोचक गोपाल प्रधान ने कहा कि गोरख हिन्‍दी के ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं में अन्याय और गैरबराबरी के खिलाफ दर्शन और विचार पानी की तरह समाया हुआ है। उनके जेहन  में दिन-रात दार्शनिक प्रश्‍न और समय की चिंताएं चलती रहती थीं। कविता युग की नब्ज धरो/आदमखोरों की निगाह में खंजर सी उतरो- ऐसी कविता बहुत कम कवियों ने लिखी हैं। शासकवर्ग के प्रति ऐसी प्रचंड नफरत और शोषित-उत्पीडि़त वर्ग के प्रति ऐसी सम्‍वेदनशीलता बहुत कम कवियों में मिलती है। वह कहते थे कि जनता को रोटी के साथ ही आला दर्जे की संस्कृति भी चाहिए, क्योंकि संस्कृति का निर्माण भी जनता ने ही किया है। और उसके द्वारा निर्मित हर चीज की तरह उसे संस्कृति से भी वंचित किया गया है। पोपुलर कल्चर के नाम पर परोसी जाने वाली घटिया चीजों के विपरीत उन्होंने जनता की संस्कृति की बेहतरीन उपलब्धियों को लोकप्रिय तरीके से जनता तक पहुँचाया। अभी भी उनके कवि के असली महत्व को ठीक से पहचाना नहीं जा सकता है। संस्कृतिकर्मियों की जिम्मेवारियों के सन्‍दर्भ में भी गोरख से अभी बहुत कुछ सीखना होगा।

पत्रकार और कवि चंद्रभूषण ने कहा कि गोरख उन गिने-चुने लोगों में से हैं, जिन्हें एक मिथक के समान दर्जा मिल गया है। अपने दौर के हिन्‍दी साहित्य के वह चरम बिन्‍दु हैं। व्यक्ति और आंदोलन- दोनों को सम्‍बोधित करने की दृष्टि से उनकी कविताएं अद्भुत हैं। वह अलगावों में पड़े हुए लोगों को जोड़ते हैं। अपने पहले संग्रह ‘जागते रहो सोने वालों’ में उन्होंने लोकगीत का खंड ज्योति जी को समर्पित किया है और आधुनिक कविताओं का खंड बुआ को, इसके पीछे भी वही नजरिया काम करता प्रतीत होता है। गोरख ने गहरी तन्हाई की कविता भी लिखी। चंद्रभूषण ने कहा कि गोरख बार-बार नये रूप में हमारे सामने आयेंगे और उनकी कविताओं की नई-नई व्याख्याएं होंगी।

फिल्मकार संजय जोशी ने कहा कि गोरख की कविताएं लोगों को उद्वेलित करती हैं। जल्द ही गोरख की आवाज में उनकी कविताओं की दुर्लभ रिकार्डिंग जारी की जाएगी।

गोरख की अस्वस्थता के दौरान उनके साथ रहने वाले और राजनीतिक कार्यों के सिलसिले में उनके सम्‍पर्क में रहने वाले भाकपा-माले के दिल्ली राज्य कमेटी सदस्य अमरनाथ तिवारी ने कहा कि वह तो जीवन में शामिल हैं। गोरख ने जिस बारीक तरीके से गरीबों और मजदूरों के जीवन को अपनी कविताओं में रखा है, लगता है जैसे वह जी रहे हैं उन चीजों को। वह मजदूर बस्तियों में जाकर भी अपनी कविताएं सुनाते थे। वह अपनी रचनाओं में सिर्फ सवाल ही नहीं उठाते थे, बल्कि हल भी सुझाते थे। गोरख जैसे कवि की आज भी जरूरत है, जनता ऐसे कवियों को पसंद करती है, जो उसकी बातों को कहे। उन्होंने बताया कि यह गोरख के विचारों का ही उन पर प्रभाव था कि उन्होंने अपनी विधवा बहन का विवाह करवाया, जिसके लिए समाज उस वक्त तैयार नहीं होता था।

वरिष्ठ माले नेता सुबोध सिन्हा ने याद किया कि किस तरह बोकारो में अपने एक सप्ताह के प्रवास के दौरान गोरख ने अपनी एक कविता को मजदूरों को लगातार तीन दिन सुनाया और उनकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों के अनुसार उसे संशोधित करते हुए अंतिम रूप दिया।

कवि श्याम सुशील ने गोरख की रचना ‘आशा का गीत’ से प्रेरित अपनी कविता और उनकी चर्चित कविता ‘बुआ के लिये’ का पाठ किया।

संस्कृतिकर्मी गिरजा पाठक ने कहा कि आठ-नौ साल की उम्र से उन्होंने गाना शुरू किया, तो गोरख के गीतों से उन्होंने शुरुआत की। नैनीताल में जनकवि गिर्दा भी गोरख के गीतों को गाते थे। कविता-पोस्टरों में भी गोरख की काव्य-पंक्तियाँ केंद्र में रहती थीं। गिरजा ने कहा कि बाद में राजनीतिक कार्य के सिलसले में वह जिन राज्यों में भी गए, वहाँ गोरख के गीतों को आंदोलनकारियों की जुबान पर पाया। जसम के राष्ट्रीय पार्षद कपिल शर्मा ने कहा कि उन्होंने संस्कृतिकर्म की शुरुआत गोरख के गीतों से की। कोई गीत इतने सारे अर्थ समेटे हुए हो सकता है, यह गोरख के गीतों से ही मालूम हुआ। संस्कृतिकर्मी मित्ररंजन ने कहा कि आज जो जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ाइयाँ चल रही हैं, उसके लिए भी गोरख की कविताएं बेहद प्रासंगिक हैं। उन्होंने उनकी कविता ‘स्वर्ग से विदाई’ का पाठ किया। कपिल शर्मा और असलम ने गोरख के गीतों और गजलों को गाकर सुनाया तथा नितिन ने उनकी कविता ‘बंद खिड़कियों से टकराकर’ का पाठ किया। संचालन करते हुए समकालीन जनमत के सम्‍पादक सुधीर सुमन ने कहा कि दिल्ली में हमने गोरख को खोया था, उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि यहाँ जनसांस्कृतिक आंदोलन को ताकतवर तरीके से आगे बढ़ाया जाए। सत्ता और कारपोरेट पूँजी आज जिस तरह साहित्य-संस्कृति को भी निगल लेने का प्रयास कर रही है और उसे अपना वैचारिक सहयोगी बना रही है, उसके बरअक्स जनता के सांस्कृतिक आंदोलन को विकसित करना वक्त की जरूरत है।

आयोजन में युवा आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी, प्रकाश चौधरी, पत्रकार शिवदास, प्रेम सिंह गहलावत, कलाकार विजय, प्रकाशक आलोक शर्मा, नसीम शाह, डिम्पल, ऋतुपर्णा विस्वास, रिजवान आलम, शहनवाज आलम, सोना बाबू, सैयद मजाहिर, श्योदान प्रजापत, मुस्तकिम, प्रकाश आदि मौजूद थे।

1945 में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में जन्मे गोरख पांडेय ने अपनी कविताओं और गीतों के जरिए हिन्‍दी साहित्य में विशेष पहचान बनाई। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्‍दी के वह इकलौते कवि हैं, जिनकी रचनाएं सच्चे अर्थों में लोकगीत की तरह पूरे उत्तर भारत में प्रचलित हुईं और जल्द ही अन्य भाषा-भाषी प्रांतों में भी जनांदोलनों में उनके गीत सुनाई देने लगे। यह सिलसिला आज भी जारी है। दिल्ली गैंगरेप कांड के खिलाफ भड़के आंदोलन के दौरान इंडिया गेट और जंतर मंतर से लेकर पटना, इलाहाबाद, गोरखपुर सरीखे कई शहरों में होने वाले प्रदर्शनों में भी गोरख के गीत सुनाई पड़े।

29 जनवरी को बिहार के समस्तीपुर और मधुबनी तथा गोरख पांडेय के गृहजिला देवरिया (उत्तर प्रदेश) में भी उनकी स्मृति में आयोजन हुए। अभी दरभंगा, आरा, पटना, पूर्णिया आदि शहरों में भी आयोजन होने हैं।

प्रस्‍तुति :सुधीर सुमन

पितृऋण : प्रभु जोशी

प्रभु जोशी

12 दिसंबर, 1950  देवास (मध्य प्रदेश) के राँवा गाँव में जन्‍में वरिष्‍ठ लेखक और चित्रकार प्रभु जोशी की कहानी ‘पितृऋण’ पहली बार ‘सारिका’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद यह कहानी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई और खासी चर्चित है-  

मैंने देखा, पिताजी अच्छी तरह बर्थ के कोने में खिड़की की चौखट से बिल्कुल सटकर पर्याप्त निश्चिंतता के साथ बैठ गये थे। मोटी और मटमैली-सी वह पोटली, जिसमें उनके कुछ कपड़े-लत्ते बंधे थे, उन्होंने अपने पैरों के पास, ठीक पास रख ली थी। इतनी व्यवस्थित ढंग से जैसे कि उसमें कोई बहुत मूल्यवान सामान बंधा है और सतर्कहीनता की स्थिति में किसी के भी हाथ साफ करने का भय हो, जबकि उनकी शारीरिक हालत और पोटली की शक्ल देखकर, यह बहुत साफ लगता था कि घटिया-से-घटिया स्तर का चोर, चोरी तो छोडि़ये उसे छूने के लिये अपना मन भी नहीं बना पायेगा।

डब्बे में औसतन अधिक लोग थे, जबकि जिस डब्बे में हम इस वक्त सफर कर रहे थे वह डब्बा रिजर्वेशन वाला था। अमूमन लोग रिजर्वेशन वाले डब्बे में इस उम्मीद में ही चढ़ जाते हैं कि वहाँ कम-से-कम बैठने वाली जगह तो निकल ही आती है और सफर करने वाले लोग भी अपने मध्यवर्गीय भीरुता के चलते संकोच को तोड़कर चढ़ने वाले से लगे हाथ  भिड़ते भी नहीं। कम-से-कम रात नौ बजे तक तो ऐसी सवारियों की उपस्थिति पर आपत्ति नहीं ही उठाते। बहरहाल, लोग जिन्हें जगह नहीं मिल पायी थी, इधर-उधर खड़े हो गये थे। कुछेक तो दरवाजे के पास हैंडिल पकड़कर लगभग झूलते हुए से भी थे। बावजूद इसके, कोई भी व्यक्ति उस बर्थ पर बैठने की हिम्मत नहीं कर पाया था, जिस पर पिताजी पालथी मारकर बैठे हुए थे।

मैंने कनखियों से मार्क किया, डब्बे में मौजूद भीड़ की आँखों में पिताजी के प्रति घृणा और दया का मिलाजुला टुच्चा-सा बिफरता भाव था। निस्संदेह इसका कारण पिताजी की शारीरिक विकृति ही थी। खून बिगड़कर रोग को इस हद तक बढ़ा चुका था कि अब उनका चेहरा बहुत ही खौफनाक ढंग से विकृत हो गया था। लगभग जुगुप्सा पैदा करने वाला और वीभत्स।

इस समय पिताजी काफी असहजता अनुभव कर रहे थे। हालाँकि उनके चेहरे की सतह से इसे नहीं जाना जा सकता था, क्योंकि इतने सूक्ष्म भावों को व्यक्त कर सकने में उनकी त्वचा रोग के द्वारा घेर लिये जाने से पहले की तरह उतनी समर्थ नहीं रह गई थी। सिर्फ आँखों के जरिये ही उनकी मनःस्थिति को जाना जा सकता था। चूँकि उनकी आँखें अभी भी उतनी ही बोलती-बात करती हुई ही थीं। बहरहाल, मैंने आँखों की तरफ देखकर उनकी असहजता को पूरी तरह भाँप लिया था। असहजता का कमोबेश एक कारण शायद यह भी था कि कदाचित डब्बे के भीतर की भीड़ के अंदर भर आये तनाव का जिम्मेदार वह खुद को ही मान रहे थे। शायद इसीलिए उन्होंने विवश होकर खिड़की की चौखट से बाहर गुजरते अरुचिकर दृश्यों में खुद को तन्मय दिखाने का बहाना खोज लिया था, और काफी देर से वह एकटक बाहर ही देखे जा रहे थे। या बहुत मुमकिन था कि ऐसा न भी हो क्योंकि रोग पिछले छः-सात साल से था और इतने लम्बे वक्फे में अजनबीपन व घृणा से भरी नजरों को झेलने के वह अभ्यस्त हो गये हों। लेकिन, शायद ऐसा नहीं ही था। चूँकि रोग को बढ़ता देखकर पिताजी के लिए गाँव के बाहर कुएं पर खांकरों की डगालें काट कर एक छपरीनुमा टापरी बना दी गई थी और माँ के अलावा शायद ही कोई दूसरा उनसे वहाँ मिलने जाता हो। फिर वह भी टापरी से तब ही बाहर निकला करते थे, जब उन्हें यह खबर हो जाती थी कि बाहर उनको देख लेने वाला गाँव का कोई नहीं है। बाहर निकल कर, केवल वह कुछ ही को देखा करते थे। मसलन, सूपड़ी वाले आम को, टेकरिया नीम को और पाल्या बरगद को। और टापरी के बाहर खड़े रहने वाले इन दर्शकों से उन्हें कभी किसी तरह की असहजता का अहसास नहीं होता था। अलबत्ता, वह उनसे बात भी किया करते थे। पता नहीं  शायद वह उनके स्वगत का ही हिस्सा थीं या सचमुच हाड़माँस के लोगों की जुगुप्सा के विरुद्ध वनस्पति जगत से स्वयम को उपेक्षित महसूस करते एक अनाथ आदमी का सम्‍वाद।

बहरहाल, पढ़ाई के उन दिनों के बाद से यह पहला मौका था, जब पिताजी मेरे पास लगातार एक हफ्ते से थे। वर्ना, पिछले छः-सात वर्षों से उनकी जिन्दगी, जिनमें समाज के बहुत नजदीक रिश्ते भी थे, कुएं के पास बाँध दिये गये केवल उसी टापरेनुमा मकान भर में ही सिमटकर रह गई थी। और पिछले महीने माँ की अचानक हुई मौत के बाद, जब गाँव में उन्हें अवेरने वाला कोई नहीं रह गया तो मजबूरन उन्हें मुझे अपने पास शहर ले आना पड़ा था। हालाँकि, उन्होंने यहाँ मेरे पास आने में काफी आनाकानी की थी, और मुझे भी यह तार्किक लगने लगा था कि चूँकि उनकी स्मृतियों का एक विराट-संसार यहीं है तो उनके लिये यहाँ रहने में ही कदाचित ज्यादा सुविधाजनक स्थिति होगी, क्योंकि यों भी जीवन के उत्तरार्द्ध में धर दबोचने वाली बीमारी ने उन्हें अब केवल स्मृतियों के लिये ही छोड़ दिया था। मगर, बाद में लगा कि बिरादरी के रिश्तेदार इसे मेरे खिलाफ अपने कुप्रचार का एक सहज सम्‍भव आधार बना लेंगे।

बहरहाल बाद इसके कुटुम्बियों की भर्त्‍सना से बचने के लिये मैं उन्हें अपने साथ शहर ले आया था।

यह निश्‍चय ही भावुकता नहीं थी। बस कहा जाना चाहिये कि एक किस्म की लोकनिन्दा के भय के दबाव में लाने को तो मैं उन्हें यहाँ अपने पास ले आया था,  मगर लाने के थोड़े ही दिन बाद बहुत तीक्ष्णता के साथ यह महसूस होने लगा था कि जैसे मैंने खुद हाथ से पकड़कर अपने दिमाग के भीतर एक ऐसे भयानक कीड़े को डाल दिया है, जो दिन-रात मेरी चेतना को धीरे-धीरे कुतर-कुतर कर खाता जा रहा है। क्योंकि,  जहाँ मैं रह रहा था उस आवासीय इलाके के अभिजात्य परिवेश में पिताजी की उपस्थिति मेरे व रेखा के लिये परोक्ष-अपरोक्ष रूप से शर्मनाक ही बनती जा रही थी।

और इसी बीच ऑफिस के एक काम के सिलसिले में मेरे उच्चाधिकारी ने मुझे वाराणसी चले जाने को कहा तो मैं बावजूद अपनी अस्वस्थता के बिना किसी ‘ना-नू‘ के इतने लम्बे टूर के लिये तत्काल तैयार हो गया था। यही सोचकर कि चलो इसी बहाने ही सही दिन-रात अपने दिमाग पर बने रहने वाले इस आतंक से कुछ दिनों के लिए किंचित मुक्ति तो मिलगी। घर पहुँचकर जब मैंने रेखा से अपनी इस आकस्मिक वाराणसी-या़त्रा का जिक्र किया तो पता नहीं पिताजी को इस बात का सुराग कैसे हाथ लग गया। और,  वह बगैर किसी पूर्व-पीठिका के पुरजोरढंग से प्रस्ताव रख गये थे कि जब मैं वाराणसी जा रहा हूँ, तो क्या उन्हें भी अपने साथ लिये चलूँगा? उनके द्वारा प्रस्ताव इतना अप्रत्याशित रूप से ऐसी करुण-याचना की तरह रखा गया था कि मैं लगे हाथ कोई भी टिप्पणी करने में खुद को असमर्थ पा रहा था। मगर, पिताजी मेरी असहजता और द्विविधा से नितान्त दूर और ऊपर रहते हुए अतिशय गँवई भावुकता में भरकर कहने लगे थे, लगभग स्वगत की तरह कि उन्हें यह बात बहुत पहले से मालूम थी… ‘छित्तरमल दादा’ ने बताया था कि मैं ही उनको तीरथ करवाऊँगा। जनम के समय कुण्डली बनाते हुए ही उन्होंने उनको फटाक्दनी से बता दिया था कि संतान पितृभक्त निकलेगी और तीर्थ-पुण्य भी वही करवायेगी। बाद इसके वह बच्चों की-सी सहजता से अपने छित्तरमल दादा तथा ‘ज्योतिष विद्या’ की तारीफ करते रहे थे कि कैसे वह भविष्य के गर्भ में छुपी बात को भी शत-प्रतिशत बता देती है। यह देवविद्या है। और ब्राह्मण पुत्र होने के नाते मुझे भी उसका थोड़ा-बहुत ज्ञान तो होना चाहिए था। बाद इसके वह हँसने लगे थे। हँसी के झीने नेपथ्य में मुझे उनका सहसा वही चेहरा दिखाई देने लगा था, जो बीमारी के पहले था, जिसमें वह मेरे पिता थे। मैं भीतर से कमजोर हो आया था, नतीजतन, जब यात्रा के लिए निकलने का समय हुआ तो हम शाम के अंधेरे में तांगे में बैठकर कॉलोनी से सीधे स्टेशन आ गये थे। आसपास के लोगों की निगाहों से बचकर।

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अचानक डिब्बे की भीड़ में कुछ सुरसुराहट हुई। कुछ लोग झगड़ने के स्वर में परस्पर बोले जा रहे थे। मैंने ऊपर की बर्थ पर से लेटे-लेटे ही गरदन उचकाकर नीचे डब्बे में देखा। एक अधेड़ और एक नई उम्र का लड़का, लड़की के ठीक सामने आयरन का एंगिल थामे खड़े था। शायद अधेड़ को अपनी जवान लड़की को लड़के द्वारा लम्पटों की तरह बेलिहाज होकर निर्विघ्न घूरना पसंद नहीं था। इसीलिए, वह उसे राय दे रहा था कि वह उनके सामने खड़ा न रहे, दूसरी जगह बैठ जाए। उस अधेड़ ने बर्थ के उस खाली कोने की ओर इशारा किया था, जिस पर पिताजी बैठे थे। इस अप्रिय सलाह पर लड़का भड़क उठा, ‘मेरे खड़े रहने से आपके पैरों को तो तकलीफ नहीं हो रही है न….? तो फिर, आप अपनी सलाह अपने पास रखिए।’

इस उत्तर का सामना न कर पाने की झुँझलाहट में वह अधेड़ उठा और उस बर्थ के पास पहुँच गया, जहाँ पिताजी बैठे हुए थे। पहुँचकर बेसाख्ता हड़काने वाली कड़क आवाज में बोला, ‘अबे ऐ बुड्ढे़ ! चल उठ यहाँ से … वहाँ सण्डास के पास क्यों नहीं बैठ जाता…! जब तेरी हालत ऐसी है तो!’

ठीक इसी पल मेरे भीतर दहशत की गर्म लकीर खून में उतरते केल्शियम के इंजेक्शन की तरह उतर गई। चूँकि, उसकी झिड़क के साथ ही पिताजी ने अपनी रोमहीन खुश्क पलकें उठाकर पनीली आँखों से बहुत कातर होकर मेरी तरफ देखा था। और लगने लगा कि अगले ही पल मुझे वह सहायतार्थ पुकारने वाले हैं। मैं उनकी पुकार से डरने लगा। क्योंकि उनकी उस पुकार में निश्‍चय ही मेरे व उनके बीच के रिश्ते का सच अपने प्रमाणीकरण के साथ सामने आ जाने वाला था। पर खुशकिस्मती से ऐसा नहीं हो पाया। क्योंकि तभी वही लड़का जो अधेड़ की जवान होती हुई खूबसूरत-सी लड़की को ताकने की सुविधा हथियाये हुए था, उस अधेड़ का लताड़ता हुआ बोला, ‘शर्म नहीं आती आपको…? ऐसे अपंग और बूढ़े आदमी को इस ढंग से ट्रीट करते हुए…? कुछ तो मानवीयता रखिए…..! शर्म करिए श्रीमान….।’  लड़के के लिये अधेड़ पर आक्रामक होने के लिये अनपेक्षित नैतिक रास्ता निकल आया था, जबकि वस्तुतः उसकी आँखों में पिताजी की स्थिति पर नैसर्गिक रूप से कोई विशेष मानवीय सहानुभूति नहीं थी, पर  नाराज होने के लिए इस मुद्दे को उसने आसानी से अपना पुख्ता आधार बना लिया था। जबकि, पुत्र होने के कारण अधेड़ के व्यवहार पर अविलम्ब आपत्ति प्रकट करना मेरे हिस्से आता था। इसके विपरीत निहत्थे आदमी के पास बचे हुए अस्त्र की तरह मेरे पास थी केवल अपनी फीकी बुझी हुई और लज्जा को छुपाने वाली हँसी। जो हँसी कम खिसियाहट अधिक थी। उस खिसियाहट को कोई नहीं देख पाया था।

लड़के के तथाकथित दृढ़ नैतिक-प्रतिकार से वह अधेड़, डब्बे में सफर कर रहे लोगों के बीच अमानवीय, क्रूर तथा हास्यास्पद एक साथ हो गया था। वह कसमसाया हुआ, अपनी लड़की के साथ, पूर्व स्थान पर जम गया, जहाँ से वह उठकर आया था। और अब लड़के को लड़की को घूरते रहने की सुविधा पुनः और ठीक उसी स्तर की प्राप्त हो गई थी। फलतः उसकी मुद्रा में भर आया तनाव झड़ गया था और पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा निश्चिंतता के साथ लड़की को घूरने का रुचिकर कर्तव्य निभाने की स्थिति में आ गया था।

मैंने भी महसूस किया कि मेरे खून में कुछ देर पहले पैदा हुई खलल अब खत्म हो गई है। स्थिति के नाटकीय हो उठने का भय काफी कुछ छँट गया था।

तिरछी निगाह से मैंने पिताजी की स्थिति का मुआयना किया- वह अब पहले से कहीं ज्यादा घुड़ी-मुड़ी होकर खिड़की की चौखट से और अधिक सटकर बैठ गये थे। साथ ही नीचे पाँवों के पास रखी पोटली को उठाकर उन्होंने अपनी गोद में रख लिया था। हालाँकि, ताजा घटे प्रसंग से उनकी आँखों में जाने तो कैसा-कैसा कातर भाव भर आया था। उनकी इस दुरवस्था से मेरे भीतर के दुखों में एक हिलोर-सी उठ गई। लगा, मेरे दुखों के मानचित्र पर एक नई सुर्ख रेखा खिंच गई है जिसने उन्हें बाँट दिया है। मैंने अपने चेहरे पर हाथ फेरा। जैसे चेहरे से गर्द झाड़ रहा होऊँ। वहाँ गर्द थी ही नहीं। शायद पश्चात्ताप था, जिसे हाथ फेरकर पोंछने की मैंने, एक असफल कोशिश की थी। पश्चाताप कि उस धूर्त लड़के ने अधेड़ को डाँटकर वह काम कर दिया था, जो कि एक बेटा होने के नाते मुझे करना चाहिए था।

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पता नहीं क्या कारण था। हमें काफी देर रुके रहना पड़ा। करीब दो-एक घण्टे। शायद बिलासपुर एक्सप्रेस का ही पचड़ा था। उज्जैन में जो डब्बे देवास से लगे थे, काट दिये गये थे। भोपाल के लिये दूसरे डिब्बों का शण्टिंग शुरू हो गया था। डब्बे की कुच्चम-कुच सघनता पहिले की तुलना में कम हो गई थी। मेरी बर्थ के नीचे बैठे गाँवदी लोग उतर गये थे और डब्बे में भर आये खालीपन ने मेरे भीतर के इतनी देर से रिस रहे तनाव को भी बाहर उलीच दिया था।

K. Ravindra Singh.pitrarin

दो-एक क्षण गुजरने के बाद ही बर्थ पर लेटे-लेटे मैंने सहसा पिताजी की टसक सुनी। थोड़ा-सा चौंक गया। गरदन उठाकर देखा, उन्होंने खुश्क चमड़ी वाली अपनी साठ बरस बूढ़ी़ टाँग लम्बी की थी। मुझे मालूम है, यह उनकी आदत है। थी नहीं, हो गई है। उस समय से जब मैं फर्स्‍ट ईयर में था। दशहरा-दीवाली के समय छुट्टियों में, मैं हमेशा की तरह गाँव गया था। छुट्टियाँ खत्म होने के बाद देवास आने के लिये बोहरे की मोटर गाँव से दो मील दूर काँकड़ पर से पकड़नी पड़ती थी। पिताजी यहाँ तक मुझे छोड़ने आये थे। माँ ने हमेशा की तरह मेरे साथ दाल-चावल, सिंकी हुई मूंगफलियाँ तथा होले-उम्बी की छोटी-छोटी पोटलियाँ मिलाकर एक बड़ा-सा पोटला बना दिया था, जो काफी भारी हो गया था। पिताजी ने चलते समय अपने सिर पर रख लिया था। मैंने कहा भी था, ‘अब आप से इतना वजन नहीं चलता मुझे दे दीजिए मैं उठा लूँगा।’ तो वह पिताओं वाले अन्दाज में बेतरह भिनक पड़े थे, ‘वाह! इत्ती सी उमर में तू इत्ता वजन उठायेगा तो फिर मैं काय वास्ते हूँ, ऐं…..?’

कुछ दूर चलने के बाद काँकडि़या आम के पास उन्हें अचानक लगा कि मोटर ‘चानिया-थल‘ के पास से ‘हारण’ बजाये दे रही है और यदि तेज-तेज नहीं चले तो निश्‍चय ही वह छूट जाएगी। वह इतनी बड़ी गठरी उठाये हुए दौड़ने से लगे थे। दौड़ते-दौड़ते अचानक उनका पैर किसी बरसाती ‘बेदरे‘ में आ गया और वे लथड़ाकर गिर गये थे। फिर भी उठकर लँगड़ाते-लँगड़ाते दुड़की मारी और आखिरकार उन्होंने मोटर को हाथ से नहीं जाने दिया था। हम ज्यों ही पहुँचे कि मोटर आ गई थी। उन्होंने झटपट गठरी अंदर फेंककर मुझे चढ़ा दिया था। मेरे चढ़ते ही मोटर चल दी थी। उनकी साँस बुरी तरह फूल आई थी। इस हद तक कि वह चाहकर भी पिताओं वाली कोई परम्परागत हिदायत नहीं दे पाये थे। मैं भी नहीं देख पाया था कि उनका क्या हुआ, क्योंकि मोटर के चलते ही पिछले पहियों ने कच्चे रास्ते की धूल की एक दीवार उठा दी थी, जिसके पीछे उनकी साँस, उनके शब्द और उनकी आकृति भी कहीं गुम हो गई थी।

‘ चिट्टी लाखजे रे नाना…हो…!’ बस इतने से ही शब्द थे, जो मोटर की गुरार्हट को बमुश्किल धकेलत हुए मेरे कानों तक कैसे तो भी पहुँच गये थे। बाकी को मोटर की एकदम से ऊँची हो गई गुर्राहट ने लील लिया था।

हफ्ते भर बाद उन्होंने किसी से लिखवाकर चिट्ठी पहुँचायी थी, जिससे ही पता चला था कि उस दिन उनके पाँव में मोच आ गई थी और वह काँकड़ पर काफी देर तक अकेले ही मूर्छित पड़े रहे थे और अब पाँव पर पलाणी के पत्ते बाँध रहे हैं। दरअसल देवास पहुँचने के बाद मैं चिठ्ठी ही लिखना भूल गया था।

तभी से अब तक उन्हें यही होता है। एक ही बैठक से लगातार बैठे रहने से टाँग सो जाती है। उसे वह दो-चार बार लम्बी-ओछी करके उसका उपचार करते हैं। उन्होंने दो-चार बार यही कसरत की और फिर आराम से पीठ टिकाकर उसी तरह बैठ गये।

और अब डब्बा पूरी तरह खाली हो गया था। भोपाल स्टेशन था। जहाँ रात के डेढ़ बजे तक गाड़ी खड़ी रहने वाली थी। पूरा प्लेटफार्म ऊँघ रहा था। गाड़ी के भीतर की बत्तियाँ भी जैसे यात्रियों के लिये नहीं, अपना कर्तव्य निभाने के लिये जल रही थीं। मैंने अपने उनींदेपन में उठँग होकर पिताजी की तरफ देखा, शायद उन्हें नींद नहीं आ रही थी। डब्बे के खालीपन, रात की खामोशी और अंधेरे ने उनके अंदर मुझसे बतियाने का अपूर्व साहस भर दिया था। और वे मेरी रुचि या जिज्ञासा की टोह लिये बगैर अपने अतीत का बखान तथा आने वाले आगे के सफर की कल्पनाजन्य सम्‍भावनाओं पर हुलक से भर कर बात करने लगे थे। मसलन, हम बनारस कै बजे पहुँचेंगे ? वहाँ मैं अपने आफिस का पता कैसे करूँगा ? उन्हें कहाँ ठहराऊँगा ? कौन-कौन से मंदिर और घाटों पर ले जाऊँगा ? वहाँ का हवा पानी कैसा होगा ?

अंधेरे में उनकी आवाज से निकलते हर शब्द पर पहले मैं उनके मौजूदा विकृत चेहरे को हटाता और फिर उसकी जगह उनका पुराना चेहरा लगाता और अंत में उनकी आवाज को उसी पुराने चेहरे से निकालकर सुनता। उनकी शक्ल लगभग हर लम्हे में ही बदलनी पड़ती और बदलते हुए वह अलग-अलग समय और उम्र की हो जाती। कभी घास काटकर लाने वाली, कभी हाट से लौटने वाली, कभी माँ के साथ हँसने और बात करने वाली तो कभी मेरी पढ़ाई के लिए कर्ज माँगने वाले की- निश्चित ही पिताजी बहुरूपिया नहीं थे, पर बहुत सारे प्रतिरूप उनमें समाहित लगते थे। वह माँ की बात करते तो आवाज काँपने लगती जैसे वह बात नहीं, माँ की मृतदेह से कफन हटा रहे हों। देह से भी नहीं, मौत से आवरण उठा रहे हों। फिर बताने लगते कि चिंता की जरूरत नहीं है। मैं उन्हें केवल मीरघाट ले जाकर छोड़ दूँ। वहाँ तो उनको अपने कुनबे के गंगई गौर मिल ही जायेंगे। वे बहुत भले लोग हैं। वह आगे बताने लगे थे कि वे मुझे भी जानते होंगे। उनके पोथे में मेरा नाम भी जरूर दर्ज होगा… मेरे छुटपन का नाम बब्बू। ‘…वोई नाम। तेरी माँ ने ही तो लिखवा दिया था, जिसमें यह था कि उन्होंने उन्हें दाल-बाफले और खीर खिलाई थी। बाफलों को घी में कितना तर-बतर कर दिया था। फिर ये तेरी माँ को रमायन का छोटा-सा गुटका दे गये थे, जिसे वह बाँच-बाँच कर सुनाती थी…. वह अक्षर बाँच लेती थी ना। वा पढिया-लिखिया घर की थी..ना…म्हारा मुजब थोड़ेइै थी…नेठूई ज…कालो अक्षर भैंस बराबर…।’’

मैं चुपचाप कम्बल से बदन को ढाँपे ऊपर बर्थ पर लेटा रहा।

कुछ पल और बड़बड़ाने के बाद पिताजी अचानक रुक गये। शायद उन्होंने मेरी उपेक्षा को मार्क कर लिया था और उन्हें लगने लगा हो कि उनकी बातें मेरे लिये नीरस और व्यर्थ हैं। शायद ऐसा नहीं भी हो। कहीं माँ का ही कोई सन्‍दर्भ उन्हें याद हो आया हो। और नतीजतन दुःखी होकर वह उसे बोलने-बताने से छुपा गये हों। और कहने की जरूरत नहीं कि सौ फीसदी यही था। चूँकि, दो घड़ी की चुप्पी के पश्चात वह फिर से बतियाने लगे थे। आवाज में आये बदलाव से साफ तौर पर जाहिर हो रहा था कि वहाँ उनके गले में रूँधापन है। वहाँ दुःख ताजा और एकदम हरा है। घर पर भी कुछेक दफा माँ का रिफरेंस आते ही मैंने उन्हें बहुत दुखित और कातर होते देखा था। ठीक इसी तरह ही।

अंततः मैंने ऊबकर कहा कि ज्यादा बेहतर यही होगा कि हम बात करने के बजाय थोड़ा सो लें। मैं अंधेरे में उनके चेहरे को चाहे न देख पाया होऊँ, मगर यह तय है कि मेरी इस टिप्पणी से उनकी मुद्रा में अपमानबोध एकत्र होकर ऊपर तक उफन आया होगा। या हो सकता है, उन्हें अपने प्रलाप की अनर्गलता पर स्वयं ही पश्चाताप हो आया हो। बहरहाल, वातावरण के तनाव को कम करने के लिये उन्होंने अपनी तरफ से एक अनुमान गढ़ा और बोले, ‘‘ हाँ रे तू भी थाकी गयो होगा रे।…म्हारो कई…? हूँ तो यूँज बड़बड़ातो रहूँ रे…. बूढ़ा लोग होण के नींद नी आय तो जबाण ही चलती रे। तू तो सोई जा रे…हूँ जागी रियो हूँ।’’

फिर कुछ देर पश्चात ही मुझे झपकी लग गई।

धड़ धड़ धड़ाम…। तेज भागती रेल शायद किसी नदी के लोहे के लम्बे पुल से गुजर रही थी। इतनी ऊँची और तीखी आहट से मेरी नींद खुल गई। बाहर हवा काफी ठण्डी थी। मैंने पिताजी की ओर नजर डाली। वह गंदी-सी गठरी की तरह घुटने पेट से सटाये उघाड़े पड़े थे। शायद, खिड़की बंद नहीं कर पाये होंगे और मेरी नींद में कहीं खलल न पड़ जाये इस आशंका के कारण उन्होंने मुझे भी उठाने से खुद को रोक लिया होगा। वैसे रोग ने उनके हाथों की उँगलियों के पोरों को काफी हद तक भोंथरा-सा बना दिया था। इतना कि वह बारीक काम करने में अक्षम व लगभग अनुपयोगी सिद्ध हो गयी थीं। कभी-कभी तो वे मात्र ठूँठ की तरह लगा करती थीं।

एक बारगी हवा की ठण्डी खुनक का ख्याल कर के मेरे मन में आया भी कि जो एक और कम्बल मेरे पर एक्स्ट्रा है, मैं उसे उनके शरीर पर डाल दूँ, मगर, दूसरे ही क्षण उनके विकृत अंगों की स्मृति ने इस विचार को एक सिरे से साफ ही कर दिया। फिर कम्‍बल भी इतना कीमती था लाल इमली वाला कि पिताजी के क्षत-विक्षत अंगों पर डालने का अर्थ उसे बर्बाद करना था। मैंने खुद को जब्त कर लिया। यह सोचकर कि शायद उनको ठण्ड न लग रही हो, बल्कि बीमारी ने उनके सोने की मुद्रा में ही यह परिवर्तन कर दिया हो। वैसे भी मैंने कहीं किसी पत्रिका में पढ़ा भी था कि इस बीमारी में रोगी को गर्मी का बहुत ज्यादा अनुभव होता है। ठीक ऐसी गर्मी जैसे पारे को चाट लेने के बाद होती है। और मरीज ज्यादा ओढ़ने-पहनने से घबराने लगता है।

मैं उस एक्स्ट्रा कम्बल को ठीक से चारों तरफ से ओढ़कर फिर सो गया।

रातभर गाड़ी चलती रही। और बेलिहाज हवा भी खिड़की से अंदर आती रही। मगर, भोपाल के बाद, जब डब्बा पूरा भर गया तो भीड़ के कारण डब्बे में मनुष्य के शरीर से उठने वाली गर्मी से ठण्ड कम हो गई थी। मैंने भीड़ का अनुमान लगाने के लिये गरदन उठाकर पूरे डिब्बे में देखा। लगभग सभी यात्री तीर्थ की तैयारियों वाले लोग लग रहे थे और उनकी शक्लें टिपिकल मालवी किस्म की थीं। भोली और मासूम। तभी अचानक मुझे उस यात्री दल में एक आदमी दिखाई दिया, जो ऊँचा पूरा तो था ही साथ उसने सफेद मालवी साफा बाँध रखा था। अपने दोनों हाथों को खोब बनाकर उसने अपने चेहरे को कुछ ऐसे ढाँप लिया था, जैसे वह आँखों से झरती नींद को सम्‍भाल रहा हो। उसे देखकर मुझे पिताजी का बरसों पहले का वह चेहरा याद हो आया, जब उन्हें इस रोग ने घेरा नहीं था। बर्थ के कोने में लेटे हुए पिताजी तथा उसके सामने बैठे हुए इस आदमी को देखकर लगा, जैसे पिताजी अपनी विकृत काया को कैंचुल की तरह बर्थ के उस कोने में छोड़कर यहाँ आ बैठे हैं। शापग्रस्त काया से मुक्त होकर एकदम तरोताजा। बिल्कुल पहले की तरह। मन में ऐसी हूक उठी कि यदि अविलम्ब अपने को रोक नहीं पाया तो मैं पिताजी को पुकार बैठूँगा।

उस दिन भी पिताजी रोटीघर की दीवार से पीठ टिकाकर ऐसे ही बैठे थे। खाद की गाड़ी ढोकर लौटे थे तथा खाने की थाली की प्रतीक्षा कर रहे थे कि देवास से परीक्षा की फीस के पैसों के लिये मैं पहुँचा गया था। जहाँ तक मुझे याद है, उस दिन घर में शायद अन्तिम रोटियाँ थीं। (यह बाद में पता चला था) और पिताजी भी चतुर माँ की सांकेतिक भाषा को समझ गये थे कि यदि वह खायेंगे तो मुझे रोटी नहीं खिलायी जा सकेगी। मैंने थाली के सामने बैठते हुए माँ से कहा था कि पिताजी को भी खाना परोस दे तो पिताजी बीच में ही बोले थे कि उन्हें बिल्कुल भूख नहीं है… सुबह की बासी रोटियों की ‘सिरावणी‘ ही आज इतनी डट के हो गई थी कि अभी तक डकारें आ रही हैं और फिर आजकल गर्मी भी तो इतनी पड़ती है कि दो रोटियाँ खाओ तो दस लोटे पानी पीना पड़ता है… और उन्होंने पेट को भरा दिखाने के लिये एक ऐसी डकार ली थी, जो साफ-साफ मालूम पड़ रही थी कि वह खाली पेट से जबरन ली गई डकार है। फिर माँ ने उन्हें छाछ और गुड़ दे दिया था, जिसे गटागट पीकर, वह काका के यहाँ मां के गहने ‘गिरवी’ रखने के लिए उठकर चल दिये थे।

‘उतरिये! आप लोग अभी उतरिये इस डब्बे में से’ इस आवाज से पूरे डब्बे में खलबली मच गई। शायद वे गँवई लोग भूल से रिजर्वेशन वाले इस डब्बे में चढ़ आये थे, जबकि तीर्थ यात्रियों की बोगी दूसरी थी। टी.टी. ही था। सबसे टिकट माँग रहा था। और यकायक पिताजी के सामने आकर ठिठक गया था। उसने पिताजी को पहले ऊपर से नीचे तक देखा फिर मुद्रा में रेलवे अधिकारी का सरकारी क्रोध भरकर बोला, ‘ऐ बुड्ढे़ ! तुम यहाँ कैसे जमे हो ?’

पिताजी उसकी टिप्पणी और प्रश्‍न से बेखबर बने खिड़की के बाहर देख रहे थे। उनकी निर्लिप्त मुद्रा के कारण टी.टी. को लगा जैसे वह जानबूझकर न सुन पाने का अभिनय कर रहे हैं। इससे उसके सरकारी अहम् को शायद तीखी ठेस अनुभव हुई। नतीजतन काफी ऊँची आवाज में वह लगभग चीखकर बोला,  ‘अबे ओ बुड्ढे ? सुनाई नहीं देता क्या?’

मैंने देखा, पिताजी ने डरकर अत्यन्त कातर दृष्टि से टी.टी. की तरफ तका। फिर एक मूक और करुण याचना से प्लावित आँखों से मेरी तरफ देखने लगे।

संकट की एक कठिन घड़ी इतनी रात में अप्रत्याशित ढंग से आ खड़ी हुई थी। मैं तत्काल सम्‍भला और टी.टी. को मैंने अपनी अफसरों वाली इंगलिश में बताया कि उसके पास बाकायदा रिजर्वेशन वाला टिकट है। मैंने ही दिलवाया है। और वह कोई भिखारी नहीं है। पास में पैसे न होने के कारण उज्जैन के प्लेटफार्म पर गिड़गिड़ा रहा था। अतः मुझे दया आ गयी। फिर मैंने पिताजी की तरफ मुखातिब होकर कहा, ‘बाबा, इन्हें अपना टिकट दिखाइये।’ यह वाक्य बोलते समय मेरी आवाज अजीबोगरीब ढंग से जाने कैसी-कैसी तो भी हो आई। चेहरा नाटकीय। टी.टी. आगे बढ़ गया। यह सब होने के बाद मैंने खुश होकर सोचा ‘बाबा’ संबोधन इतना गोलमाल था कि उससे डब्बे के अन्य यात्रियों को तनिक भी इस बात का सन्देह नहीं हो पाया कि मुझे जैसे अभिजातवर्गीय व्यक्ति और एक रुग्ण बूढ़े के बीच किसी भी प्रकार का कोई निकट का रक्त-सम्बन्धी रिश्ता है। अलबत्ता मुझे हल्की-सी खुशी ही हुई कि पिताजी को सम्‍बोधित करने के लिये बचपन में अपनाया गया यह संबोधन उम्र और समय के इस मुकाम पर आकर कितना सुरक्षात्मक सिद्ध हुआ है।

टी.टी. टिकिट की पड़ताल किये बगैर अगले डब्बे की तरफ बढ़ गया।

मैंने रूमाल निकालकर गरदन के आसपास आया हुआ पसीना पोंछा और फिर से बर्थ पर चढ़कर लेट गया। लेटते हुए मैंने सोचा कि यदि पिताजी को अपना एक्स्ट्रा कीमती कम्बल ओढ़ने को दे दिया होता तो इस तरह के कठिन अभिनय की नौबत से बचा जा सकता था। क्योंकि, तब धीरे से वह टिकट देखता और आगे बढ़ लेता। आपके कपड़ों का स्तर सामने वाले के व्यवहार के भद्र-अभद्र स्तर भी तय कर देता है। इसके बाद लखनऊ तक कोई संकटकालीन स्थिति उपस्थित नहीं हुई। यात्रा बिल्कुल निर्विघ्न रही। बीच में पिताजी का सिकुड़ा हुआ चेहरा देखकर मैंने चाहा भी कि पिताजी से चाय-नाश्ते का पूछ लूँ । लेकिन डब्बे में मौजूद साफ शफ्फाक सवारियों की प्रतिक्रिया का सामना करने की हिम्मत नहीं हो रही थी- सो खुद को रोक लिया। फिर पिताजी ने खुद भी कोई ऐसी माँग नहीं की जो मुझे किसी तरह की विकट स्थिति में डाल दे।

मुझे पहली बार लगा पिताजी अनपढ़ होने के बावजूद मूर्ख नहीं हैं।

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सुबह तक हम बनारस जा लगे। स्टेशन पर उतरते हुए पहली बार लगा कि यहाँ मालवा की तुलना में ठण्ड ज्यादा है और कम-से-कम एक स्वेटर रख लिया गया होता तो ठीक रहता। क्योंकि हवा की ठण्डी हिसार शरीर पर चोट कर रही थी।

बनारस में स्टेशन से ही इतनी बड़ी फजर में ही गंगा किनारे चल धरने के लिये रिक्शा कर लिया और घाट की तरफ कूच कर दिया। रिक्शा करते समय थोड़ी-सी असहजता का सामना जरूर करना पड़ा। मगर, हम जल्दी ही मीरघाट पहुँच गये क्योंकि पिताजी गंगा के पवित्र घाट पर सूर्योदय के पहिले ही नहाने के लिये उत्सुक थे। वह बार-बार ब्राह्म-मुहूर्त में स्नान कर लेने पर पुण्य-प्राप्ति की महिमा का बखान करते आ रहे थे। उनकी उत्सुकता तथा बेसब्री के पीछे तपते और झुलसे वर्षों की एक लम्बी और डोलती हुई प्रतीक्षा थी। इसीलिए मैंने सोचा, इन्हें नहलाकर कहीं किसी सराय या धर्मशाला में टिका दूँगा और फिर अपना आफिस का काम निबटा आऊँगा।

रिक्शेवाले को किराये का पैसा चुका कर मैंने रिक्शा वहीं घाट के बाहर छोड़ दिया। फिर हम धीरे-धीरे घाट की तरफ बढ़ आये।

सूरज क्षितिज से बस थोड़ा-सा ही निकल पाया था और नदी के दूसरे किनारे से उगता हुआ ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने उगने की पूरी तैयारी किये बगैर ही निकल आया है। उसकी रोशनी में वैसी तेजी नहीं लग रही थी, जैसी देवास में टेकरी के पास उगते हुए लगती है। शायद, ऐसा नदी के ऊपर फैले कोहरे के कारण ही लग रहा था।

घाट पर कुछ पहलवाननुमा पण्डे लोग भी हमारे पीछे लगे लेकिन, साथ में पिताजी को देखकर पीछे लगने की निरर्थकता को ताड़कर वे अपने हील-हुज्जत के हथकण्डों के साथ लौट गये। सुबह-सुबह धन्धे के वक्त को वे भी यों ही जाया नहीं करना चाहते थे। मुझे अनायास ही गाँव की मालवी बोली वाली एक कहावत याद हो आयी जिसमें कहा गया था कि बामण की सुबह और बेस्या की साँझ बिगड़ी कि सबकुछ बिगड़ा।

अब पिताजी और मैं घाट के पास थे। घाट की सीढि़यों पर बहुत सम्‍भव था, पिताजी की शारीरिक दशा देखकर कोई टोक भी सकता था। इसीलिये हम चलते हुए घाट के आखिरी कोने पर आ गये थे, जहाँ लोगों की हलचल ज्यादा नहीं थी। बस दो-चार लोग यहाँ-वहाँ टहल रहे थे, जैसे वे भी गंगाघाट पर स्नान नहीं, सिर्फ किसी की तलाश में आये हों।

अपनी गंदली-सी गठरी खोलकर पिताजी अपना लाल गमछा निकालने लगे। तभी असावधानीवश उसमें से कुछ नीचे बिखर पड़ा, जिसमें से दो-एक छोटी-छोटी पुट्ठल, कुछ चिल्लर और मैले-कुचैले कागज थे। मैंने देखा, जिस उल्टे हुए कागज को उन्होंने ठीक किया था, वह कागज नहीं माँ की एक छोटी-सी तस्वीर थी, जो मैंने सेकेण्ड ईयर में अपने दोस्त के एक क्लिक-थर्ड कैमरे से निकाली थी। तस्वीर को उठाते हुए मैंने देख लिया तो पिताजी काफी असहज हो गये। कदाचित तस्वीर को छुपाने की पुख्ता कोशिश के बावजूद हाथ लगी असफलता ने उन्हें भीतर तक अफसोस से भर दिया था।

मैंने चेहरा इतना भावहीन कर लिया जैसे कुछ देखा ही नहीं हो। मगर इतनी निर्धूप सुबह में माँ की तस्वीर से एक हल्की-सी चमक मेरे भीतर भर गई थी।

नहाने के लिये वह घाट की सीढि़यों पर उतरने लगे तो क्षण भर के लिये वहाँ उनके पैर ठिठक गये। जैसे,  मुझसे कुछ कहने की तैयारी कर रहे हों। तैयारी, क्या, सचमुच ही वह कुछ कहना ही चाह रहे थे। मगर, दबा गये। चेहरा मेरी तरफ किये बगैर कुछ पल उसी मुद्रा में स्थिर रहकर बोले, ‘सुण, पोटला को ध्यान राखजे हो..बेटा।’ उनकी इस हिदायत में उनकी बरसों पहले वाली ही पाटदार आवाज थी। एक पिता की आदेश देती दानेदार आवाज, जिसकी अनसुनी करने में ही पुत्र अपने आहत अहम की तुष्टि खोजते हैं। मुझे उनकी ऐसी ही प्राचीन और पिताओं की परम्परागत हिदायत को ठसकदार आवाज में सुनकर खीझ और हँसी साथ-साथ आयी। भला वाराणसी में ऐसा कौन चोर होगा जो उनके ऐसे पोटले को हाथ लगाना भी पसंद करेगा।

वह धीरे-धीरे चलते हुए ठण्डे जल में डूबी दो एक सीढि़याँ उतर कर रुक गये। लगा, पानी की ठण्डक से अधिक वह इस समय उसकी पवित्रता को अनुभव कर रहे हैं। फिर, बहुत गाढ़ी और रूंधी हुई आवाज में बोले, ‘‘ ऊ नी पोटली में थोड़ीक-घणी चिल्लर है रे…. थारी माँ ने इकट्ठी करी राखी थी… के हूँ तमारा सांथे तीरथ गई तो भगवान का मंदर-मंदर वास्ते खुला पइसा की दिक्कत नी होयगा…।’’

बोलते-बोलते वह जल में डूबी हुई और अधिक नीचे की सीढि़यों पर उतर गये। अब वह जल से ज्यादा कहीं स्मृति की गहराई में खड़े थे।

फिर बहुत धीमे से मेरी तरफ अपना चेहरा किया और बोले, ‘बेटा रे! पोटली में थारी माँ का ‘फूल’ भी रखिया हुआ है रे….! एका वास्ते, हूँ कही रहियो थो….पोटली को ध्यान राखजे। काल अमावस को दिन है… पिण्डदान करी ने खमाई दाँगा…गंगा माता की धार में…।’’ उनके इस सम्‍वाद को सुनते हुए मैंने मार्क किया कि उनकी आवाज आखिरी शब्दों तक पहुँचते-पहुँचते अत्यन्त जर्जर और विदीर्ण हो आई है। इस सूचना ने कि पोटली में माँ की अस्थियाँ हैं, मुझे थोड़ा-सा विचलित कर दिया। विचलित होकर मैंने पिताजी के चेहरे की तरफ और गौर करते हुए पुनः देखा- वहाँ, उनके चेहरे पर से उम्र तथा स्मृतियों से लदे न जाने कितने पल और न जाने कितने वर्ष सरसराते हुए गुजरते जा रहे थे। मुझे तक उन वर्षों और पलों के गुजरने की आवाज नहीं पहुँच रही थी। और यदि आवाज पहुँच भी रही थी तो वह उन वर्षों और पलों के गुजरने की नहीं, सिर्फ गंगा के धीमे-धीमे शताब्दियों से बहते जल की थी, जो पता नहीं कहाँ जा रहा था।

पूरे सफर में कदाचित पहली बार उनके मुँह से मेरे लिए ‘बेटा‘ संबोधन निकल आया था, जिसकी भीतर तक सालती अनुगूँज ने मुझे कमजोर कर दिया था। पर, मैं कमजोरी पर जल्दी ही नियंत्रण पाने में सफल हो गया। मुझे लगा कि मैं मौके पर सम्‍भल ही जाता हूँ।

पिताजी कुछ पल पानी की हिलती सतह को चुपचाप अपलक घूरते रहे। शायद, वहाँ उनकी धुंधलाती आँख तथा बहते जल की सतह के बीच माँ की स्मृतियाँ थीं, जो उन्हें हॉण्ट कर रही थीं।

‘‘थारी माँ की भोत इच्छा थी कि वा म्हारा सांथे तीरथ करती रै…। ओ के तो गंगा-गीत भी तो कित्ता आता था।’’ उन्होंने कहा और अंतिम शब्द बोलते हुए उनके गले की आवाज अवरूद्ध हो गई। चेहरे से ऐसा लग रहा था, जैसे उनके कान उस ओर खुल गए हैं, जहाँ माँ की आवाज में गंगा के गीत गूँज रहे हैं। उन गीतों की बहुत क्षीण-सी अनुगूँज मुझे तक भी चली आ रही थी।

मैंने देखा उनकी आँखें इतनी शोकाकुल हो उठी हैं कि लगने लगा कि अगले ही क्षण आँसू बाहर बह आयेंगे। इसी बीच शायद उन्होंने भाँप लिया कि मैं उनके चेहरे पर आते-जाते भावों को पढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ। अतः उन्होंने ‘जय गंगे’ कहकर पानी में डुबकी लगा ली। वह पानी की काँपती सतह के नीचे चले गये थे। जैसे- कभी-कभी हमारे साथ गाँव की छोटी तलैया में पानी के भीतर चकमा देने के लिये छुप जाते थे। पर, इस समय यह खुद को नहीं, अपने आँसुओं को छुपाने की उनकी तकनीक थी, लेकिन इससे क्या? मैं जान चुका था कि उनके सिर के ऊपर से बहती गंगा जी की धारा, अंदर ही अंदर उनकी रोगग्रस्त गिचगिची आँखों के खारे पानी को कहीं दूर बहा ले गई होगी।

इसी बीच कुछ सुसंस्कृत लोग मुझे घूरने लगे थे। मैं वहाँ से हटकर दो-चार कदम दूर आ गया। छोटे-छोटे उन मंदिरों की तरफ, जहाँ भिक्षुओं की एक भीड़ बैठी हुई थी। पास आकर मैंने देखा कि उनमें अधिकांशतः कुष्ठरोगी ही हैं। मुझे देखते हुए उन्होंने अपने हाथ मेरे आगे फैला दिये। कुछेक ने एल्युमिनियम के अपने कटोरे भी। एक के एल्युमिनियम के कटोरे में तो ताजा पूडि़याँ और चावल थे, शायद सुबह-सुबह किसी तीर्थ यात्री ने दे दिये होंगे।

वैसे, मैंने किसी पत्रिका के लेख में यह पढ़ा भी था कि यहाँ वाराणसी में पितृमोक्ष के लिये आने वाले लोग भिक्षु-भोज कराते हैं, जिसमें धर्मभीरुता के चलते बाकायदा यह ध्यान रखा जाता है कि भोजन खाने योग्य भी हो। उनमें मालपुए तक भी होते हैं।

पिताजी ने अपनी क्षत-विक्षत अंगुलियों को जोड़कर जो अंजुरी बनाई थी, उसमें से अर्घ्‍य का जल रुक नहीं पा रहा था। फिर भी उन्होंने जो भी और जितना भी उनको याद था, बुदबुदाते हुए पाँच-छः बार जल अर्घ्‍य दिया और पानी से बाहर आ गये। बाहर निकलते समय वह लगभग गिरते-गिरते बचे। पानी से निकल उन्होंने कपड़े बदले फिर मेरी ओर बढ़ आये।

हम घाट से लगे हाथ सराय के लिए निकल आये। सराय आकर तय किया कि पहले आफिस के काम निबटाना जरूरी है। बाद वहाँ से लौटने के पिताजी को कुछ खास-खास धार्मिक महत्व के स्थानों और मंदिरों पर घुमा लाऊँगा। इतना भी उनके लिये उम्मीद से कहीं ज्यादा होगा। मुझे उनसे यह जानकर तअज्जुब भी होने लगा कि उन्हें कई उन मंन्दिरों के नाम याद थे जिनका मुझे तो पता तक नहीं था।

आफिस के काम के लिये निकलते समय मुझे याद आया भी कि उनके पास न जाने कब से बचाये जाते रहे सौ-सौ के काफी-कुछ मुड़े-तुड़े नोट हैं और चिल्लर की एक छोटी पोटली भी। मैंने पिताजी के सामने आशंका प्रकट की कि कहीं कोई सराय में उनसे यह सब छीन-छान न ले। अपरिचित जगह। अपरिचित लोग। ये मेरी आशंका को भाँपकर तुरन्त बोले, ‘‘ हाँ, सच्ची बात है। म्हारा कने तो तू जोखिम रहने ही मत दे रे..। हूँ खुद देणे की सोचरियो था, पर मन में आयो, कंई मालम म्हारी चोंटी-चाटी, छुई-छाई रकम के तू हाथ लगायगा भी या के नी।’’

बाद इसके, उन्होंने पोटली खोलकर मुझे मुड़े-तुड़े नोटों की छोटी-सी गड्डी सौंप दी और बाल-सुलभ उत्साह से वह सारी चिल्लर भी, जो माँ की मट्टी की गुल्लक की थी। चिल्लर में माँ की स्मृति का भी भार भर गया था। हाथ में लेते हुए मैं थोड़ा-सा असहज हो आया। मगर चिल्लर सौंपते हुए उनके चेहरे पर एक तसल्ली-सी उभर आयी थी, जैसे वह एक भावनात्मक बोझ से मुक्त हो रहे हैं। चिल्लर सौंपने में उनके हाथ में एक उतावली लग रही थी। विरासत सौंपने के लिये उतारू आदमी की-सी।

मैं बैग में उस सारी अमानत को डालकर ऑफिस के काम को निबटाने की जल्दी में बाहर आने लगा तो बोले, ‘‘बेटा, आफिस को काम तू निरात से निबटई के आ जे। नौकरी को मामलो है। एके पेलां देख जे। म्हारा कंई…? हूँ तो काल मंदर-मंदर देव-दर्शन कर लूँगा। रोजी-रोटी को काम पेलां हो।’’

मैं तेज-तेज चलता हुआ, रिक्शा ढूँढ़ने के लिये सराय के परिसर से बाहर आ गया।

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आफिस में माहितियाँ लेते-देते वक्त पिताजी का बेचैन बनाता हुआ ख्याल आया और देवास में रेखा और बच्चों की भी याद हो आयी। रेखा की परेशानियाँ भी याद आयीं और खुद की भी, जो पिताजी के हमारे साथ रहने के कारण निश्‍चय पहिले से कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थीं। ऑफिस से निबटते ही पहले मैंने सीधे सराय पिताजी के पास पहुँचने की सोची। तभी मुझे भीड़ याद आ गई जो मीरघाट पर मेरे सामने हाथ फैला रही थी। वह भीड़ जिनमें से कुछेक के कटोरों में पूडि़याँ और चावल थे।

मुझे लगा, ऐसे लोग वाराणसी में रहते हुए दुःखी नहीं कहे जा सकते हैं। वे अपनी ही किस्म के लोगों के साथ रहते हुए दुःख की तिक्तता से काफी हद तक ऊपर उठ आये हैं और मुक्ति का अनुभव करते हैं। इसी से अचानक एक विचार कौंधा कि यदि मैं पिताजी को इन्हीं रुग्ण और समानधर्मा लोगों के बीच छोड़ दूँ तो मैं बहुत-सी परेशानियों से आसानी से मुक्ति पा सकता हूँ। और वह भी दुःखी नहीं रहेंगे, क्योंकि उनकी ही तरह के सैकड़ों लोग यहाँ हैं और सैकड़ों मंदिर भी। फिर भगवान तो यहाँ कण-कण में हैं।

मौत के ख्याल की डरावनी दीवार की तरह था यह विचार, जिसे मैं सिर्फ एक झटके में ठीक इसी समय ही फलाँग सकता था, अन्यथा फिर शायद नहीं। और मैंने हिम्मत बटोरी और उसे एक ही साँस में फलाँग गया था।

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अब, इस समय मैं सराय पहुँचने के बजाय रेलवे स्टेशन पर टिकिटघर के सामने था। देवास की टिकिट कटाने के लिये। तभी सनसनाता हुआ संदेह सामने आकर खड़ा हो गया। यदि कहीं वह घर वापस लौट आये तो?  हाँ तो फिर क्या होगा ? मगर यह सोचकर मुझे एक आश्वस्ति अनुभव हुई कि उनके पास अब एक नया पैसा भी नहीं है। उन्होंने खुद आगे रह कर ही तो मुझे सब के सब ही तो सौंप दिये थे।

चित्र : के. रवीन्‍द्र

ओ! फिर से जीना : महाश्‍वेता देवी

महाश्‍वेता देवी

महाश्‍वेता देवी

24 जनवरी को जयपुर साहित्योत्सव-2013 के शुभारम्भ पर प्रसिद्ध लेखिका महाश्‍वेता देवी का दिया उद्घाटन संभाषण-

शब्द। मैं नहीं जानती कि कहाँ से। एक लेखिका जो वेदना में है? शायद, इस अवस्था में पुनः जीने की इच्छा एक शरारतभरी इच्छा है। अपने नब्बेवें वर्ष से बस थोड़ी ही दूर पहुँचकर मुझे मानना पड़ेगा कि यह इच्छा एक सन्तुष्टि देती है, एक गाना है न  ‘आश्चर्य के जाल से तितलियाँ पकड़ना’। इसके अतिरिक्त उस ‘नुकसान’ पर नजर दौड़ाइए जो मैं आशा से अधिक जीकर पहुँचा चुकी हूँ।

अट्ठासी या सत्तासी साल की अवस्था में मैं प्रायः छायाओं में लौटते हुए आगे बढ़ती हूँ। कभी-कभी मुझ में इतना साहस भी होता है कि फिर से प्रकाश में चली जाऊँ। जब मैं युवती थी, एक माँ थी, तब मैं प्रायः अपनी वृद्धावस्था में चली जाती थी। अपने बेटे को यह बहाना करते हुए बहलाती थी कि मुझे कुछ सुनाई या दिखाई नहीं दे रहा है। अपने हाथों से वैसे टटोलती थी, जैसा अन्धों के खेल में होता है या याददाश्त का मजाक उड़ाती थी। महत्त्वपूर्ण बातें भूल जाना, वे बातें जो एक ही क्षण पहले घटी थीं। ये खेल मजेदार थे। लेकिन अब ये मजेदार नहीं हैं। मेरा जीवन आगे बढ़ चुका है और अपने को दुहरा रहा है। मैं स्वयं को दुहरा रही हूँ। जो हो चुका है, उसे आपके लिए फिर से याद कर रही हूँ। जो है, जो हो सकता था, हुआ होगा।

अब स्मृति की बारी है कि वह मेरी खिल्ली उड़ाए।

मेरी मुलाकात कई लेखकों, मेरी कहानियों के चरित्रों, उन लोगों के प्रेतों से होती है जिन्हें मैंने ‘जिया’ है, प्यार किया है और खोया है। कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं एक ऐसा पुराना घर हूँ जो अपने वासियों की बातचीत का सहभागी है। लेकिन हमेशा यह कोई वरदान जैसा नहीं होता है! लेकिन ‘यदि कोई व्यक्ति अपनी शक्ति के अन्त पर पहुँच जाए तब क्या होगा’? शक्ति का अन्त कोई पूर्णविराम नहीं है। न ही यह वह अन्तिम पड़ाव है जहाँ आप की यात्रा समाप्त होती है। यह केवल धीमा पड़ना है, जीवनशक्ति का ह्रास। वह सोच जिस से मैंने प्रारम्भ किया था वह है ‘आप अकेले हैं ’।

उस परिवेश से जहाँ से मैं आयी हूँ, मेरा ऐसा बन जाना अप्रत्याशित था। मैं घर में सब से बड़ी थी। मैं नहीं जानती कि आप के भी वही अनुभव हैं कि नहीं, लेकिन उस समय प्रत्येक स्त्री का पहला यौन अनुभव परिवार से ही आता था। और युवावस्था से ही मुझ में प्रबल शारीरिक आकर्षण था, मैं इसे जानती थी, इसे अनुभव करती थी और ऐसा ही मुझे कहा गया था। उस समय हम सभी टैगोर से काफी प्रभावित थे। शांतिनिकेतन में थी, प्रेम में पड़ी, जो कुछ भी किया बड़े उत्साह से किया। तेरह से अठारह वर्ष की अवस्था तक मैं अपने एक दूर के भाई से बहुत प्रेम करती थी। उसके परिवार में आत्मघात की प्रवृत्ति थी, और उसने भी आत्महत्या कर ली। सभी मुझे दोष देने लगे, कहने लगे कि वह मुझे प्यार करता था और मुझे न पा सका इसीलिये उसने आत्मघात कर लिया। यह सही नहीं था। उस समय तक मैं कम्युनिस्ट पार्टी के निकट आ चुकी थी, और सोचती थी कि ऐसी छोटी अवस्था में यह कितना घटिया काम था। मुझे लगता था कि उसने ऐसा क्यों किया। मैं टूट गयी थी। पूरा परिवार मुझे दोष देता था। जब मैं सोलह साल की हुई, तभी से मेरे माता-पिता विशेषकर मेरे सम्बन्धी मुझे कोसते थे कि इस लड़की का क्या किया जाए। यह इतना ज्यादा बाहर घूमती है, अपने शारीरिक आकर्षण को नहीं समझती है। तब इसे बुरा समझा जाता था।

मध्यवर्गीय नैतिकता से मुझे घृणा है। यह कितना बड़ा पाखंड है। सब कुछ दबा रहता है।

लेखन मेरा वास्तविक संसार हो गया, वह संसार जिस में मैं जीती थी और संघर्ष करती थी। समग्रतः।

मेरी लेखन प्रक्रिया पूरी तरह बिखरी हुई है। लिखने से पहले मैं बहुत सोचती हूँ, विचार करती हूँ, जब तक कि मेरे मस्तिष्‍क में एक स्पष्ट प्रारूप न बन जाए। जो कुछ मेरे लिए जरूरी है वह पहले करती हूँ। लोगों से बात करती हूँ, पता लगाती हूँ। तब मैं इसे फैलाना आरम्भ करती हूँ। इसके बाद मुझे कोई कठिनाई नहीं होती है, कहानी मेरी पकड़ में आ चुकी होती है। जब मैं लिखती हूँ, मेरा सारा पढ़ा हुआ, स्मृति, प्रत्यक्ष अनुभव, संगृहीत जानकारियाँ सभी इसमें आ जाते हैं।

जहाँ भी मैं जाती हूँ, मैं चीजों को लिख लेती हूँ। मन जगा रहता है पर मैं भूल भी जाती हूँ। मैं वस्तुतः जीवन से बहुत खुश हूँ। मैं किसी के प्रति देनदार नहीं हूँ, मैं समाज के नियमों का पालन नहीं करती, मैं जो चाहती हूँ करती हूँ, जहाँ चाहती हूँ जाती हूँ, जो चाहती हूँ लिखती हूँ।

वह हवा जिस में मैं साँस लेती है, शब्दों से भरी हुई है। जैसे कि पर्णनर। पलाश के पत्तों से बना हुआ। इस का सम्बन्ध एक विचित्र प्रथा से है। मान लीजिए कि एक आदमी गाड़ी की दुर्घटना में मर गया है। उसका शरीर घर नहीं लाया जा सका है। तब उसके सम्बन्धी पुआल या किसी दूसरी चीज से आदमी बनाते हैं। मैं जिस जगह की बात कर रही हूँ, वह पलाश से भरी हुई है। इसलिए वे इसके पत्तों का उपयोग करते हैं एक आदमी बनाने के लिए।

पाप पुरुष। लोक विश्वास की उपज। शाश्वत जीवन के लिए नियुक्त। वह दूसरे लोगों के पापों पर नजर रखता है। वह कभी प्रकट होता है, कभी नहीं। उसने स्वयं पाप नहीं किया है। वह अन्य सभी के अतिचारों का लेखा-जोखा रखता है। उनके पापों का। अनवरत। और इसीलिए वह धरती पर आता है। छोटी-से-छोटी बातों को लिपिबद्ध करते हुए। एक बकरा। दण्डित। दहकते सूरज के नीचे अपने खूँटे से बँधा हुआ। पानी या छाया तक पहुँचने में असमर्थ। तब पाप पुरुष बोलता है, ‘यह एक पाप है। तुम ने जो किया है वह गलत है। तुइ जा कोरली ता पाप।’

वस्तुतः यह एक मनुष्य नहीं है। केवल एक विचार की अभिव्यक्ति है।

यह एक दण्ड हो सकता है। उसने कोई भीषण अपराध किया होगा। शे होयतो कोनो पाप कोरेछिलो। कोई अक्षम्य पाप। और अब वह कल्पान्त तक पाप पुरुष बनने के लिए अभिशप्त है। वस्तुतः केवल एक ही पाप पुरुष नहीं है, कई हैं। उसी तरह जैसे कि इस कथा को मानने वाले प्रदेश भी कई हैं।

इससे भी सुन्दर कई शब्द हैं। बंगाली शब्द। चोरट अर्थात् तख्ता। और फिर डाक संक्रान्ति। इसका सम्बन्ध चैत्र संक्रान्ति से है। डाक माने डेके डेके जाय। जो आत्माएँ अत्यन्त जागरूक और चैतन्य हैं, वे ही इस पुकार को सुन सकती हैं। पुराने साल की पुकार, जो जा रहा है, प्रश्‍न करते हुए। पुराना साल आज समाप्त हो रहा है। और नया साल कल प्रारम्भ हो रहा है। क्या है जो तुम ने नहीं किया है ? क्या है, जो अभी तुम्हें करना है ? उसे अभी पूरा कर दो।

गर्भदान। यह बड़ा रोचक है। एक स्त्री गर्भवती है। कोई उसे वचन देता है कि यदि बेटी का जन्म होता है, उसे यह-वह मिलेगा। यदि बेटा होता है तो कुछ और मिलेगा। गर्भ थाकते देन कोरछे। दान हो चुका है जब कि बच्चा अभी गर्भ में ही है। इस कथा का कहना है कि अजात शिशु इस वचन को सुन सकता है, इसे याद कर सकता है, और इसे अपनी स्मृति में सहेज सकता है। बाद में वह शिशु उस व्यक्ति से उस वचन के बारे में उस गर्भदान के बारे में पूछ सकता है जो अभी हुआ नहीं है।

हमारा भारत बड़ा विचित्र है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के परधी समुदाय को लें। एक विमुक्त समुदाय। चूँकि वे आदिवासी समुदाय हैं, बच्चियों की बड़ी माँग है। किसी गर्भवती स्त्री का पति आसानी से अजन्मे बच्चे की नीलामी करा सकता है या बेच सकता है। पेट की भाजी, पेटे जा आछे। जो अभी गर्भ में ही है। नीलाम कोरे दीछे। गर्भ के फल को नीलाम कर देता है।

नरक के कई नाम हैं। नरकेर अनेक गुलो नाम आछे। एक नाम जो मुझे विशेष पसन्द है, वह है ओशि पत्र वन। नरक के कई प्रकार हैं। ओशि का अर्थ तलवार है। और पत्र अर्थात एक पौधा जिस के तलवार सरीखे पत्ते हों। ऐसे पौधों से भरा हुआ जंगल। और आप की आत्मा को इस जंगल से गुजरना होता है। तलवार सरीखे पत्ते उस में बिंध जाते हैं। आखिर आप नरक में अपने पापों के कारण ही तो हैं। इसलिए आप की आत्मा को इस कष्ट को सहना ही है।

जब भी मुझे कोई रोचक शब्द मिलता है, मैं उसे लिख लेती हूँ। ये सारी कापियाँ, कोटो कथा। इतने सारे शब्द, इतनी सारी ध्वनियाँ। जब भी उन से मिलती हूँ, मैं उन्हें बटोर लेती हूँ।

अन्त में मैं उस विचार के बारे में बताऊँगी जिस पर मैं आराम से समय मिलने पर लिखूँगी। मैं अरसे से इस पर सोचती रही हूँ। वैश्‍वीकरण को रोकने का एक ही मार्ग है। किसी जगह पर जमीन का एक टुकड़ा है। उसे घास से पूरी तरह ढँक जाने दें। और उस पर केवल एक पेड़ लगाइए, भले ही वह जंगली पेड़ हो। अपने बच्चे की तिपहिया साइकिल वहाँ छोड़ दीजिए। किसी गरीब बच्चे को वहाँ आकर उस से खेलने दीजिए, किसी चिड़िया को उस पेड़ पर रहने दीजिए। छोटी बातें, छोटे सपने। आखिर आप के भी तो अपने छोटे-छोटे सपने हैं।

कहीं पर मैं ने ‘दमितों की संस्कृति’ पर लिखने का दावा किया है। यह दावा कितना बड़ा या छोटा, सच्चा या झूठा है ? जितना अधिक मैं सोचती और लिखती हूँ, किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उतना ही कठिन होता जाता है। मैं झिझकती हूँ, हिचकिचाती हूँ। मैं इस विश्‍वास पर अडिग हूँ कि समय के पार जीनेवाली हमारे जैसी किसी प्राचीन संस्कृतिके लिये एक ही स्वीकार्य मौलिक विश्‍वास हो सकता है वह है सहृदयता। सम्मान के साथ मनुष्य की तरह जीने के सभी के अधिकार को स्वीकार करना।

लोगों के पास देखनेवाली आँखें नहीं हैं। अपने पूरे जीवन में मैंने छोटे लोगों और उनके छोटे सपनों को ही देखा है। मुझे लगता है कि वे अपने सारे सपनों को तालों में बन्द कर देना चाहते थे, लेकिन किसी तरह कुछ सपने बच गये। कुछ सपने मुक्त हो गये। जैसे गाड़ी को देखती दुर्गा (पाथेर पांचाली उपन्यास में), एक बूढ़ी औरत, जो नींद के लिए तरसती है, एक बूढ़ा आदमी जो किसी तरह अपनी पेंशन पा सका। जंगल से बेदखल किये गये लोग, वे कहाँ जाएँगे। साधारण आदमी और उनके छोटे-छोटे सपने। जैसे कि नक्सली। उन का अपराध यही था कि उन्होंने सपने देखने का साहस किया। उन्हें सपने देखने की भी अनुमति क्यों नहीं है?

जैसा कि मैं सालों से बार-बार कहती आ रही हूँ, सपने देखने का अधिकार पहला मौलिक अधिकार होना चाहिए। हाँ, सपने देखने का अधिकार।

यही मेरी लड़ाई है, मेरा स्वप्न है। मेरे जीवन और मेरे साहित्य में।

पंखुरी सिन्हा की कवितायें

Pankhuri Sinha

मुजफ्फरपुर, बिहार में 18 जून 1975 को जन्‍मीं युवा कवयित्री पंखुरी सिन्‍हा की कवितायें और कहानियाँ विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्‍हें राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान, गिरिजा कुमार माथुर पुरस्कार, शैलेश मटियानी सम्मान आदि से सम्‍मानित किया जा चुका है। उनकी तीन कवितायें-

धुंध, कुहासों जैसी बातें

पश्मिने के शाल पर कढा़ई की नहीं
पश्मिने के असल होने के अन्वेषण की बातें
बातें अनुसन्धान की
उस गर्माहट में होने की बातें
खालिस कश्मीरी उच्चारण में
पश्मिने की बातें
कश्मीरी आवाज़ में ढेरों ढेर पश्मिने की बातें
जैसे पश्मिने की खेती
जैसे भेड़ पालना
इन सब गरम गुनगुने ख्यालों से दूर
यांत्रिक कुहासों की बातें
जैसे कदम-कदम पर रुकना
लोकल ट्रेन का
जैसे अलग-अलग लोकल ट्रेनों में सफ़र
अलग-अलग शहरों में
बस निरंतरता सफ़र की
और पहुँचना कहीं नहीं
उलझे रहना
ढेरों दफ्तरी फाइलों में
ढेरों दफ्तरी फाइलें
निपटाने को
रिपोर्ट, चिट्ठियाँ
और बातें घर,पत्नी, बच्चों कीं
मसरूफियत की
और आना चाय-कॉफ़ी पर
सारे दोस्तों का
पकौड़ों का कुरमुरापन
तलते बेसन की खुशबू
तलछट कड़ाही की
बचा तेल
पत्नी की सुघड़ता
महीने के खर्च का हिसाब
धनिये, पुदीने, गुड़ और टमाटर की चटनी
यहाँ तक कि इमली की भी
चटखारेदार बातें
और बीच में
दफ्तरी फ़ोन का आहिस्ता बजना
और सवाल ढेरों ख़ुफ़िया
पेशानी पे बल
माथे की लकीरें
वो तमाम बातें जिनसे बनी होती हैं
लोगों की ज़िंदगियाँ
ज़िन्दगी की तमाम खूबसूरतियाँ
और बातें ईमान कीं
ढेरों ढेर ईमान कीं
तराज़ू में तोलने की
लोगों के ईमान को
रूह की, ज़मीर की
पुरुषत्व की, वर्चस्व की
उन तमाम एहसासों की
जो दफ्तर से घर
और घर से दफ्तर
आते-जाते हासिल होते हैं।

संधि

जो लोग संधि नहीं करते
उनकी एक फितरत होती है
संधि यानी कुबूलना शर्तें
एक बेहद दबंग कार्यप्रणाली की
उन्हें कत्ल किया जा रहा है दिनदहाड़े
कईयों को सिर्फ उनके अधिकार न देकर।

रीते-रीते मौसम में

उम्मीदों के गुज़र जाने के मौसम में
यहाँ-वहाँ दुबारा छला गया उसे
हर किस्म की कोशिश में
जहाँ मुक़म्मल होने थे
सारे सपने
जहाँ दुबारा नाकारा गया उन्हें
वहाँ मुड़कर देखते हुए
दुबारा सब कुछ को
बड़ी-बड़ी दुकानों को
जिनके इर्द-गिर्द बुने गये हजारों जाले
सपनों के, युद्ध के
हिंसा के
वहाँ मुड़कर देखना सब कुछ को
भयानक शीत लहरी के बाद की धूप में
जिन्होंने किया हो, सूरज के यूँ निकलने का इंतजार
वो कर सकते हैं सवाल
लेकिन, गूंजता है खालीपन
सवाल का
एक भयानक नरसंहार के बाद।

बाल साहित्य सम्मान शीघ्र बहाल होंगे

Hindi Sansthan

लखनऊ : आज देश में चारों ओर जो चरित्र का संकट दिखाई पड़ रहा है, इसका समाधान बाल साहित्य में निहित है। अगर हम बच्चों को बाल साहित्य उपलब्ध करायें तो उससे उनके व्यक्तित्व का समुचित विकास तो होगा ही, हमारा समाज भी एक स्वस्थ समाज के रूप में निर्मित हो सकेगा। पर दुर्भाग्यवश हमारे देश में ऐसा नहीं होता है। हमारे यहाँ बाल साहित्य को दोयम दर्जे का माना जाता है। हम विदेशों की तुलना में एक चौथाई भाग भी इसपर ध्यान नहीं देते हैं, जिसका दुष्परिणाम हमें चारों ओर दिखाई पड़ रहा है। यह बात उत्‍तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह ने बाल साहित्यकारों के प्रतिनिधिमण्डल के समक्ष कही। वह 1997 में बंद हुए 10 बाल साहित्य सम्मानों को चालू कराने हेतु ज्ञापन देने आए बाल साहित्यकारों के दल को सम्बोधित कर रहे थे।

उन्होंने रचनाकारों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि हमें इस बात की प्रसन्नता है कि आप लोगों ने इस महत्वपूर्ण विषय पर हमारा ध्यान आकृष्ट कराया। उन्होंने आश्‍वासन दिया कि हम मुख्यमंत्री से मिलकर इस बारे में बात करेंगे। और जब तक सरकार द्वारा इस सम्बन्‍ध में कोई निर्णय नहीं होता, हम अपने सीमित बजट में भी कुछ बिन्दुओं पर अमल करने की कोशिश करेंगे।

तस्लीम के महासचिव डॉ. जाकिर अली रजनीश के अह्वान पर एक दर्जन बाल साल साहित्यकारों के प्रतिनिधिमण्डल ने संस्थान के निदेशक एवं कार्यकारी अध्यक्ष से मिलकर बाल साहित्य के उन्नयन हेतु अपने सुझाव प्रस्तुत किये।  इनमें बंद हुए बाल साहित्य सम्मानों को पुनर्जीवित करना, बाल साहित्य सम्बन्‍धी गोष्ठियों एवं कार्यशालाओं का आयोजन कराना तथा बाल साहित्य की पुस्तकों का प्रकाशन शामिल है। प्रतिनिधिमण्डल में विनोद चंद्र पाण्डेय, सूर्य कुमार पाण्डेय, जाकिर अली रजनीश, हेमंत कुमार, विद्याबिन्दु सिंह, बन्धु कुशावर्ती, अरुणेन्द्र चन्द्र त्रिपाठी, धनसिंह मेहता अन्जान, रवीन्द्र प्रभात, सर्वेश अस्थाना के नाम प्रमुख हैं।

इस अवसर पर संस्थान के निदेशक सुधाकर अदीब ने भी बाल साहित्यकारों का स्वागत किया और उनकी मांगों पर समुचित ध्यान देने का आश्‍वासन दिया। साहित्यकारों ने जिन बाल साहित्य सम्मानों को पुनर्जीवित करने की मांग की, उनका विवरण निम्नवत है-

1.  सोहनलाल द्विवेदी बाल कविता सम्मान
2.  अमृतलाल नागर बाल कथा सम्मान
3.  रामकुमार वर्मा बाल नाटक सम्मान
4.  जगपति चतुर्वेदी बाल विज्ञान लेखक सम्मान
5.  शिक्षार्थी बाल चित्रकला सम्मान
6.  कृष्ण विनायक फड़के बाल साहित्य समीक्षा सम्मान
7.  लल्ली प्रसाद पाण्डेय बाल पत्रकारिता सम्मान
8.  निरंकारदेव सेवक बाल साहित्य इतिहास लेखन सम्मान
9.  सुभद्रा कुमारी चौहान महिला बाल साहित्य सम्मान
10. उमाकांत मालवीय युवा बाल साहित्य सम्मान

कवि-कथाकार महाप्रकाश को जसम की श्रद्धांजलि

नई दिल्ली: मैथिली की प्रगतिशील धारा के चर्चित कवि और कथाकार महाप्रकाश 19 जनवरी, 2013 को हमारे बीच नहीं रहे। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उनका फेफड़े और किडनी में संक्रमण का इलाज चल रहा था, वहीं उन्होंने आखिरी सांसें ली।

सहरसा (बिहार) के बनगाँव में 14 जुलाई 1949 को महाप्रकाश का जन्म हुआ था। 1968-69 से उन्होंने लेखन की शुरुआत की थी। 1972 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘कविता संभवा’ की काफी चर्चा हुई थी। यात्री और राजकमल चौधरी के बाद वह मैथिली की प्रगतिशील धारा के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि थे। हाल में ही अंतिका प्रकाशन से उनका दूसरा कविता संग्रह ‘समय के संग’ प्रकाशित हुआ था। चांद, अंतिम प्रहर में, इश्तिहार, बोध, हिंसा, जूता हमर माथ प सवार अइछ, पंद्रह अगस्त, शांतिक स्वरूप आदि उनकी महत्वपूर्ण कविताएं हैं। उन्‍होंने कहानियाँ भी खूब लिखीं, लेकिन उनका कोई गम्‍भीर मूल्याँकन नहीं हुआ है। ध्वंस, दीवाल, खाली हौसला, अदृश्य त्रिभुज, बिस्कुट, पाखंड पर्व आदि उनकी चर्चित कहानियाँ हैं। ‘पाखंड पर्व’ में उन्होंने कुलीन मैथिली समाज की जनविरोधी प्रवृत्तियों की आलोचना की है। उनकी कविताओं और कहानियों का अनुवाद हिन्‍दी और बांग्ला में भी हुआ। उन्‍होंने अनुवाद का काम भी किया। मैथिली उपन्यासकार ललित के उपन्यास ‘पृथ्वीपुत्र’ का उनके द्वारा किया गया अनुवाद ‘विपक्ष’ पत्रिका के विशेषांक में प्रकाशित हुआ था। उनकी रचनाओं में मिथिला का व्यापक जीवन नजर आता है। पूँजीवाद के खिलाफ अपनी रचनाओं में वह निरंतर मुखर रहे।

युवा पीढ़ी के रचनाकार महाप्रकाश के जबर्दस्त प्रशंसक रहे। उन्होंने कई नये रचनाकारों को गढ़ने में अहम भूमिका निभाई। वह बहुत अच्छे वक्ता थे। गप्पें करना, संगीत सुनना और आत्मकथा पढ़ना उन्हें खासतौर से पसंद था। वह बेहद स्वाभिमानी और सम्‍वेदनशील थे। इस स्वाभिमान ने ही उन्हें जनसामान्य सा जीवन चुनने में मदद की और सम्‍वेदनशीलता ने प्रगतिशील विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध बनाया। युवा कवि राजेश कमल के अनुसार वह अक्सर दुनिया जहान में घट रही घटनाओं को लेकर फोन करते थे और बताते कि क्या गलत है और क्या सही है। फोन पर वह अपनी कविता या कहानी के बारे में बात लगभग नहीं करते थे।
महाप्रकाश के शव को 19 जनवरी को शाम में लोधी रोड, नई दिल्ली के विद्युत शवदाहगृह में अग्नि के हवाले किया गया। इस मौके पर उनके बेटों और करीबी परिजनों के साथ कहानीकार गौरीनाथ, आलोचक श्रीधरम, कवि रमण, युवा कवि खालिद, भाकपा-माले केंद्रीय कमेटी सदस्य प्रभात कुमार, सुधीर सुमन आदि मौजूद थे।

बिहार की राजधानी पटना में 20 जनवरी को जन संस्कृति मंच के राज्य कार्यालय में महाप्रकाश की स्मृति में शोकसभा हुई, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर, कथाकार अशोक कुमार, शायर संजय कुमार कुंदन, कवि राजेश कमल, प्रतिभा, संतोष सहर, रंजीव, रंगकर्मी संतोष झा और समता राय ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

मातृभाषा, साहित्य और प्रगतिशील विचारधारा तथा नई रचनाशीलता के प्रति अपने गहरे समर्पण के लिए वह हमेशा याद आएंगे। जन संस्कृति मंच की ओर से उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)

मंटो के नाटक को नहीं दिखाया जाना विडम्‍बनापूर्ण : जसम

Saadat Hasan Manto

नई दिल्‍ली : मंटो को समर्पित भारत रंग महोत्सव में मंटो के ही नाटक को न दिखाया जाना विडम्‍बनापूर्ण है। नियंत्रण रेखा पर जो भी विवाद और तनाव है उसका राजनयिक हल तलाश किया जाना चाहिए, उसका इस्तेमाल देश के अंदर अंधराष्ट्रवादी-साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने और लोकतान्त्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने के लिये नहीं किया जाना चाहिए। मंटो भारत-पाकिस्तान विभाजन की मूर्खता और अतार्किकता को दिखाने वाले तथा साम्प्रदायिक उन्माद का विरोध करने वाले लेखक हैं और दोनों देशों की साझी संस्कृति के प्रतिनिधि हैं। मंटो ने आज से कई गुना अधिक तनाव और साम्प्रदायिक कत्लेआम के दौर में भी अपना विवेक नहीं खोया था। हम उस विवेक के साथ हैं। सांस्कृतिक एकता और प्रगतिशील-सेकुलर मूल्यों के जरिए ही भारत-पकिस्तान की जनता का भविष्य बेहतर हो सकता है। इस बेहतरी की जो सांस्कृतिक लड़ाई है उसमें मंटो की रचनाएँ आज भी मददगार हैं। दोनों देशों की सरकारें जिस तरह के साम्प्रदायिक-युद्धोन्माद की राजनीति का खेल खेलती रहती हैं, हम संस्कृतिकर्मी और कलाकार इसके विरोधी हैं। हम इसे बरदाश्‍त नहीं करेंगे कि इसकी आड़ में मंटो के नाटक के मंचन को रोक दिया जाए। आज के वक्त में मंटो की रचनाओं को याद किया जाना और जरूरी है।

भारत रंग महोत्सव में 19 जनवरी, 2013 को अजोका थियेटर के नाटक न दिखाए जाने के निर्णय के बाद पत्रकारों-बुद्धिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों ने इस नाटक का मंचन अपनी पहल पर करवाकर जो पहल की है, उसका हम जन संस्कृति मंच की ओर से स्वागत करते हैं।

(जन संस्कृति मंच की ओर से सुधीर सुमन द्वारा जारी)

शैक्षिक सरोकारों को समर्पित ‘शैक्षिक दखल’ : रमेश जोशी

shekshik dakhal

शैक्षिक सरोकारों को लेकर प्रकाशित की जा रही है पत्रिका ‘शैक्षिक दखल’ की लेखक रमेश जोशी की समीक्षा-

शिक्षा मानवीय संसाधनों को विकसित करती है। इस दृष्टिकोण को मद्देनजर रखते हुए यदि शिक्षा की व्यवस्था की जाय तो स्वाभाविक है उत्तम मानवीय संसाधनों का विकास होगा और अपेक्षानुरूप हम अपने समाज को ढालने में समर्थ हो सकेंगे। यदि संसाधनों को लेकर या फिर वित्तीय संकट का रोना रोकर कामचलाऊ व्यवस्था पर निर्भर रहा जाय तो परिणाम बहुत अच्छे नहीं हो सकते हैं। जैसे-जैसे तकनीकी का विकास हो रहा है शिक्षा का दायरा भी विस्तृत होता जा रहा है। वर्तमान में शिक्षा देना बहुत आसान नहीं रह गया है, केवल कक्षा-कक्ष में जाकर पाठ्यक्रम से सम्बन्धित बातें बता देना और परीक्षा पास करवाना ही शिक्षा का लक्ष्य नहीं है, बल्कि छात्रों के अन्दर विद्यमान दक्षताओं को पहचान कर उनमें अपेक्षित परिवर्तन करते हुए उनमें जीवन कौशलों को विकसित करना भी है। शिक्षा को कैसा होना चाहिए और छात्रों को किस प्रकार आवश्यकताओं के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण तथा जीवनोपयोगी शिक्षा दी जाय इसको शिक्षक से बेहतर कौन जान सकता है। छात्रों में बहुमुखी प्रतिभा को विकसित करने के लिये शिक्षक को अनेक प्रयोग करने पड़ते हैं। छात्रों की कल्पना शक्ति का विकास करने के लिये शिक्षक को स्वयं भी रचनाशील होना चाहिए। आज भी संसाधनों को दरकिनार करते हुए कई शिक्षक छात्रों के भविष्य को संवारने में लगे हैं और सामाजिक चेतना के माध्यम से अन्य लोगों में भी चेतना का संचार करने में लगे हैं।

रचनात्मकता शिक्षक का प्रमुख गुण है। वह इसके अभाव में वह वर्तमान में विद्यालयों में उचित वातावरण का सृजन नहीं कर सकता है। बच्चों की रचनात्मक प्रवृति को विकसित करने के लिये तथा शिक्षकों में चेतना का संचार करने के लिए शैक्षिक सरोकारों को समर्पित ‘शैक्षिक दखल’ का अंक रचनाधर्मी शिक्षकों के अथक प्रयास से निकल चुका है। इसे लोग पढें विशेषरूप शिक्षकों से निवेदन है कि अवश्य ही इस पत्रिका को पढ़ें तथा अपेक्षित सुधार हेतु अपनी राय दें ताकि इसे और अधिक उपयोगी बनाया जा सके। केवल सम्‍पादक मंडल या इससे जुड़े लोगों के प्रयास से बहुत अधिक सफलता नहीं मिल सकती है। अतः पाठकों की अधिकाधिक संख्या तथा उनकी प्रतिक्रिया सफलता के लिये आवश्यक है।  ‘शैक्षिक दखल’ का यह अंक अपने आपमें काफी सामाग्री समेटे हुए है। पत्रिका का बाह्य आवरण बहुत सुन्दर तथा आकर्षक है। अश्‍वघोष की ‘आजकल’ तथा हरीश चन्द्र पाण्डेय की ‘वहाँ कोई बच्ची नहीं थी’ कविता पत्रिका का निश्चित रूप से वजन बढ़ाती हैं। सम्‍पादकीय में महेश पुनेठा ने ‘ पाठ्य पुस्तकों के बोझ तले सिसकती रचनात्मता’ में विद्यालयों के बोझिल तथा सीमित वातावरण का जिक्र किया है जिससे कि बच्चों की रचनात्मकता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। पाठ्य पुस्तकों का बोझ बच्चों को शिक्षा की मौलिक विचारधारा से भटका रहा है तथा उन्हें बोझिल बना रहा है। पुनेठा जी ने लिखा है,‘बच्चा तनाव में है और किसी बोझ से दबा है तो वह नया सोच ही नहीं सकता और जब सोच ही नहीं सकता है तब रचने की बात तो दूर की कौड़ी है।’ वह आगे कहते हैं, ‘बच्चों का मन बहुत करता है कि खुले में विचरण करें, कल्पनाओं की उड़ान भरें, कुछ नया करे पर अध्यापकों-अभिभावकों द्वारा उसे किसी प्रकार से फिर पाठ्यपुस्तक रूपी किले से बाँध दिया जाता है।’ पाठ्य पुस्तकों की निर्भरता पर वह कहते हैं, ‘ एक आम तर्क होता है कि जब पाठ्यपुस्तक ही नहीं हैं तो पढ़ाई कैसे शुरू होगी? यह प्रवृति बच्चे की रचनात्मता को कुंद करती है।’ यहाँ तक कि हमारे शिक्षकों में भी इस बात के लिये नाराजगी होती है कि वे पुस्तकों के अभाव में क्या करें।

हमारे परिवेश से भिन्न होने के कारण अंग्रेजी माध्यम से होने वाले नुकसान के बारे में उनका कहना है कि,‘ अंग्रेजी माध्यम के चलते बच्चे की चिंतन मनन की प्रक्रिया बाधित हुई है। एक ऐसी भाषा जो मातृभाषा से इतर है, बच्चे कि लिये उसमें चिंतन और कल्पना करना स्वाभाविक नहीं है।’

राजीव जोशी के समन्वयन में ‘स्वाधीन हुए बिना रचनात्मकता सम्‍भव नहीं’ विषय पर कई छात्रों, शिक्षकों, लेखकों, पत्रकारों ने प्रतिक्रिया व्यक्त की है तथा लेखन व सृजन के लिए स्वतंत्रता के महत्व को स्वीकारा है। साथ ही स्वतंत्रता के असली मायनों को भी परिलक्षित किया है। स्वतंत्रता के सम्बन्ध में युवा उपन्यासकार राजीव रंजन कहते हैं, ‘स्वतंत्र होकर मिट्टी में जैसे दबाव नहीं डाला जा सकता उसे गढ़ने की स्वतंत्रता तो है पर इस प्रक्रिया में वह निश्चित दबाव, आकार, चाक की गति आदि की अवहेलना नहीं कर सकता।’ बातचीत में प्रोफेसर ए.के. जलालुद्दीन ने कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान की हैं जो कि शिक्षक के लिये बहुत जरूरी हैं और इनका ध्यान यदि कक्षा-कक्ष में दिया जाय तो हम सफल शिक्षक की जिम्मेदारी का निर्वाहनआसानी से कर सकते हैं। शिक्षक को शिक्षण के इतर दी गयी जिम्मेदारियों पर भी कई लोगों ने ध्यान आकृष्ट किया है और इस पर सोचना वास्तव में बहुत जरूरी हो गया है।

बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर अभिभावक या शिक्षक उसे कितना बड़ा दण्ड देते हैं इसका वर्णन ‘किस्सा गुलफाम उर्फ टोलम का’ में किया गया है। हमें समस्या की तह में जाने की आवश्यकता है और उसके उपरान्त ही हम कोई निर्णय लें ताकि किसी का भविष्य खराब न हो सके। कविता की सार्थकता पर मोहन श्रोत्रिय ने प्रकाश डाला है। वह कहते हैं, ‘कविता सृजन का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक कर्म है तो उसे सामाजिक सरोकार भी होंगे ही। इन सरोकारों की खुली अभिव्यक्ति भी पाठकों से कवि, कविता की निकटता और जुड़ाव को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।’ शिक्षक के व्यवहार की महत्ता को परिलक्षित करता खजान सिंह का आलेख बताता है कि विद्यालय में शिक्षक के लिए छात्रों के साथ मधुर व्यवहार कितना उपयोगी होता है। यदि आज भी छात्र विद्यालय के वातावरण को अनाकर्षक मानते हैं तथा पढ़ने से दूर भागते हैं तो निश्चित रूप से शिक्षक को अपने व्यवहार को पुनः सुधारने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त भी कई महत्वपूर्ण आलेख इस पत्रिका में दिये गये हैं जो कि पठनीय हैं।

‘आते हुए लोग’ के सम्बन्ध में मेरा सुझाव है कि इसमें और अधिक लोगों के विचारों को स्थान दिया जाय। शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों के अनुभवों को इसमें शामिल किया जाय साथ ही व्यक्तिगत आक्षेपों से बचा जाय। व्यवस्थागत खामियों को उजागर करना ठीक है परन्तु व्यक्तिगत रूप से अल्प अनुभव को आधार मानकर कोई सार्वजनिक सिद्धान्त स्वतः निकाल लेना तर्क संगत नहीं होता है। मेरा सम्पादक मंडल से अनुरोध है कि इस प्रकार की खामियों से बचा जाय।
कुल मिलाकर पत्रिका में उपलब्ध सामाग्री पठनीय है। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए कई महत्वपूर्ण सामाग्री इसमें समाहित है। ‘समाचार पत्रों में शिक्षा जगत की मौजूदगी’ डॉ. दिनेश जोशी का संकलन भी बहुत कुछ कहता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आप शिक्षक हों चाहे अभिभावक शिक्षा जगत में नित बदलती तस्वीर के लिये तथा अपने नौनिहालों के भविष्य के लिए इस पत्रिका को अवश्य पढ़ें।

पत्रिका का नाम : शैक्षिक दखल
सम्‍पादक : महेश चंद्र पुनेठा और दिनेश कर्नाटक
सम्‍पर्क : महेश चंद्र पुनेठा, जोशी भवन, नि‍कट लीड बैंक, पि‍थौरागढ़-262501, मोबाइल नम्‍बर- 09411707470
सहयोग राशि‍: 20 रुपये(प्रति‍ अंक), 100 रुपये(चार अंकों के लि‍ये), 1000 रुपये(आजीवन)

अब शब्‍दों का विश्‍व बैंक बनाने की तैयारी : अनुराग

अरविंद कुमार

अरविंद कुमार

84वें वर्ष में प्रवेश कर रहे (जन्‍म 17 जनवरी 1930) कोशकार अरविंद कुमार पर लेख-

आधुनिक काल में हिन्‍दी के पहले शब्‍दकोश ‘समांतर कोश’(1996), ‘द हिंदी-इंग्लिश इंग्लिश-हिंदी थिसारस ऐंड डिक्शनरी’(2007) जैसे महाग्रंथ और ‘अरविंद लैक्सिकन’(2011) के रूप में इंटरनैट पर विश्‍व को हिन्‍दी-अंग्रेजी के शब्‍दों का सबसे बड़ा ऑनलाइन ख़ज़ाना देने वाले अरविंद कुमार अब ‘शब्दों का विश्‍व बैंक’ बनाने की तैयारी में जुटे हैं।

उनके डाटाबेस में हिन्‍दी-इंग्लिश के लगभग 10 लाख शब्द हैं। यहाँ शब्द से मतलब है एक पूरी अभिव्यक्ति, उसमें शब्द चाहे कितने ही हों। जैसे : उत्थान पतन, आरोह अवरोह, ज्वार भाटा,, rise and fall, ascent descent, going up and down, tide and ebb, up and down; नभोत्तरित होना, उड़ान भरना, टेकऔफ़ करना, go up in the sky, rise in the sky; क्षेत्र के ऊपर से उड़ना, किसी के ऊपर से उड़ना, overfly, fly across, pass over – एक एक शब्द गिनें तो शब्द संख्या दस लाख से कहीं ऊपर हो जाएगी, अनुमानतः साढ़े बारह लाख।

शब्‍दों को लेकर उनका जुनून अभी भी कम नहीं हुआ है। कुछ दिन पहले किसी ने उनसे पूछा कि आपके डाटा में ‘तासीर’ शब्द है या नहीं। उन्‍होंने चेक किया। शब्द था ‘प्रभाव’ के अंतर्गत। यह उसका अर्थ होता भी है- जैसे दर्द की ‘तासीर’। वह चाहते तो इससे संतोष कर सकते थे, लेकिन उनका मन नहीं माना। हिन्‍दी में तासीर शब्द को उपयोग आम ज़िंदगी में है तो उसका संदर्भ ‘आहार’ या ‘औषध’ की आंतरिक प्रकृति या स्वास्थ्य पर उसके ‘प्रभाव’ के संदर्भ में होता है। उन्‍हें लगा कि इसके लिए एक अलग मुखशब्द बनाना ठीक रहेगा। उन्‍होंने सटीक इंग्लिश शब्द की तलाश शुरू कर दी। लेकिन इसमें उन्‍हें किसी कोश से कोई सहायता नहीं मिली। प्रोफ़ेसर मैकग्रेगर के ‘आक्सफ़र्ड हिंदी-इंग्लिश कोश’ में मिला– effect; action, manner of operation (as of a medicine)। लेकिन ‘तासीर’ के मुखशब्द के तौर इनमें से कोई भी शब्द रखना उन्हें ठीक नहीं लगा। इधर-उधर चर्चा भी की, लेकिन बात नहीं बन रही थी। अंततः वह शब्‍द गढ़ने में लग गये। कई दिन बाद ‘तासीर’ मुखशब्द के साथ अन्य शब्द जोड़ पाए–

तासीर, असर, क्रिया, परिणाम, प्रभाव, प्रवृत्ति, वृत्ति, उदाहरण :‘उड़द की तासीर ठंडी होती है अत: इसका सेवन करते समय शुद्ध घी में हींग का बघार लगा लेना चाहिए।’

effective trait, the manner in which a food item or medicine affects its consumer, effect, impact, manner of operation (as of a food item or medicine), nature, reactive nature, trait.

यह केवल एक उदाहरण है। उनके मन में हर रोज़ कुछ न कुछ नए विचार आते रहते हैं। जो भी नए शब्द सुनते और पढ़ते हैं, हर रोज़ उसे डाटा में ढूँढ़ते हैं और फिर उनके नए संदर्भ डालते हैं। कई बार रात में कुछ ख़याल में आता है। एक रात उनके मन मेँ gubernatorial शब्द उमड़ता घुमड़ता रहा। यह governor का विशेषण ।

गवर्नर के कई संदर्भ हैँ- administrator, प्रशासक; controller, नियंत्रक; electricity regulator, विद्युत रैगुलेटर; ruler, शासक; speed controller, गति नियंत्रक।

भारत में गवर्नर का प्रमुख राजनीतिक प्रशासनिक अर्थ है- representativeand observer of the central government in a state किसी राज्य मेँ केंद्र सरकार का प्रतिनिधि और प्रेक्षक। अमेरिका मेँ गवर्नर chief executive of a state है। वहां राष्ट्रपति की ही तरह इस पद के लिए भी चुनाव होता है। हमारे यहां यह प्रतिनिधि मात्र है, शासन का संचालक नहीं (यह काम हमारे यहां राज्य के मुख्यमंत्री का होता है)। हमारे यहां इसके कई पर्याय हैं जैसे- राज्यपाल, नवाब, निज़ाम, प्रांतपाल, सूबेदार, उप राज्यपाल, गवर्नर जनरल, चीफ़ कमिश्‍नर, मुख्य आयुक्त, लैफ़्टिनैंट गवर्नर, सदरे रियासत (जम्मू और कश्मीर) हैं।

अतः gubernatorial के लिए उन्‍हें एक स्वतंत्र मुखशब्द बनाने की आवश्‍यकता महसूस हुई। जब तक यह ससंदर्भ अपने आप में एक स्वतंत्र प्रविष्टि के तौर पर सही जगह नहीं रखा जाता, तब तक इसके विशेषण gubernatorial को उपयुक्त जगह नहीं रखा जा सकता। वह नहीं चाहते थे कि gubernatorial को ‘गति नियंत्रकीय’ से कनफ़्यूज़ करने का मौक़ा दिया जा जाए। उसके लिये सही जगह वहीं हो सकती है जहाँ उसका सही अर्थ स्पष्ट हो- राज्यपालीय,राज्यपाल विषयक।

आजकल वह डाटा के सम्‍बर्धन के अतिरिक्त परिष्कार और साथ-साथ शब्दों के अनेक रूपों को सम्मिलित करने का काम भी कर रहे हैं। जैसे- जाना के ये रूप जोड़ना- गई, गए, गया, गयी, गये, जा, जाइए, जाइएगा, जाए, जाएगी,जाएँगी, जाएंगी, जाएँगे, जाएंगे, जाओ, जाओगी, जाओगे, जाने, और go के लिए goes, going, went। (डाटा में ये सभी रूप अकारादि क्रम से रखे गए हैं।) क्‍योंकि हिन्‍दी में वर्तनी की कई पद्धतियाँ प्रचलित हैं, अतः ‘गई’ और ‘गए’ के साथ-साथ ‘गयी’ और ‘गये’ जैसे विकल्प भी जोड़ रहे हैं। ये पद्धतियाँ क्योंकि प्रचलित हैं तो इन्हें अशुद्ध भी नहीं कहा जा सकता। इस बारे में उनका कहना है कि ये भिन्न पद्धतियाँ हिन्‍दी के किसी भी सर्वमान्य वर्तनी जाँचक के बनने बहुत बड़ी बाधा हैं।

यह तो हुई क्रिया पदों के रूपोँ की बात। अब संज्ञाओं को लें तो गौरैया के लिए गौरैयाएँ, गौरैयाओँ, गौरैयाओं; प्रांत/प्रदेश के लिए प्रदेशोँ, प्रदेशों, प्रांतोँ, प्रांतों। (वर्तनी की अनेकरूपता यहाँ भी देखने को मिलती है- अनुनासिक और अनुस्वार के भिन्न प्रचलनोँ के कारण।)

सुबह पांच बजे से

उनका दिन सुबह पाँच बजे शुरू हो जाता है। लगभग सन् 1978 से। और तभी कुल्ला-मंजन कर के शुरू हो जाता है अपने डाटाबेस पर काम। काम सुबह पाँच बजे से शुरू हो कर शाम के लगभग साढ़े छह बजे तक चलता है। लेकिन लगातार नहीं। बीच-बीच मेँ छोटे-छोटे ब्रेक लेते रहते हैं। कभी शेव करने और नहाने के लिए, कभी नाश्ते के लिए, कभी यूँ ही ऊब मिटाने के लिए दस-पंद्रह मिनट, कभी दोपहर खाने के लिए। लगभग चार-पाँच बजे छोटा सा काफ़ी ब्रेक। और साढ़े छह बजे पूर्ण विराम। अब रात के साढ़े नौ बजे तक एकमात्र मनोरंजनपूर्ण कार्यक्रम ही देखते हैं। बीच मेँ आठ से साढ़े आठ बजे तक समाचार।

सर्दी के चार महीने वह बेटे सुमीत के पास आरोवील आ जाते हैं। आजकल वह सपत्‍नीक वहीं हैं। वहाँ उन्‍हें अख़बार सुविधा से नहीं मिल पाते। इसलिए सुबह काम के बीच कभी इंटरनैट पर इंग्लिश और हिन्‍दी समाचारोँ पर सरसरी नज़र डालना, कभी ई-मेल देखना और हर दिन लगभग पंद्रह-बीस मिनट फ़ेसबुक पर छोटी-मोटी टीका, मित्रों की मेल पर पसंद का निशान, किसी-किसी पर छोटी सी टिप्पणी भी उनकी दिनचर्या में शामिल है। निकट के नगर पुडुचेरी में कभी कभार ही कोई हिन्‍दी फ़िल्म आती है। अतः आरोवील में वह समय बच जाता है। कभी-कभी ऊब मिटाने के लिए टीवी पर पुरानी फ़िल्म देख कर काम चला लेते हैं।

चंद्रनगर (गाज़ियाबाद) में रहने के दौरान दिल्ली-गाज़ियाबाद क्षेत्र में बने सिनेमाघरों में अकसर सुबह 12 से पहले की फ़िल्में देखते हैं।

हम सब साथ-साथ

अरविंद कुमार पत्नी कुसुम कुमार, बेटी मीता और बेटे सुमीत के साथ।

अरविंद कुमार पत्नी कुसुम कुमार, बेटी मीता और बेटे सुमीत के साथ।

कोशकारिता के अपने जुनून के लिए अरविंद कुमार ने 1978 में ‘माधुरी’ की जमी-जमाई नौकरी छोड़ी। तब से वह केवल इसी काम में लगे हैं। किसी से कोई आर्थिक सहायता नहीं ली और कोई रचनात्‍मक सहयोग भी नहीं लिया। जो काम करोड़ों के बजट और लम्‍बे-चौड़े स्‍टॉफ के बाद भी कोई संस्‍था नहीं कर पा रही है, उसे अरविंद कुमार ने कर दिखाया।

अरविंद कुमार इतना बड़ा काम कर पाए इसकी एक वजह उन्‍हें परिवार का पूरा सहयोग मिलना ही है। वह बताते हैं कि अम्मा-पिताजी ने कभी उनके किसी फ़ैसले का विरोध नहीं किया। ‘सरिता’, ‘कैरेवान’ छोड़ी तो उन्होंने उनके निर्णय का स्वागत ही किया। ‘माधुरी’ के लिए मुंबई गए, तो वे ख़ुश थे। छोड़ कर आए तो भी ख़ुश। जो भी उन्‍होंने किया, उनकी अम्‍मा-पिताजी के लिए स्वीकार्य था।

उनके निजी परिवार एकक ने तो इससे भी आगे बढ़ कर, उनका काम में हाथ बँटाया। जब 1973 में ‘माधुरी’ की अच्छी ख़ासी नौकरी छोड़ने की बात की, तो पत्नी कुसुम ने बड़े उत्साह से उनका समर्थन किया, बल्कि बाद में पूरा सहयोग किया। आरम्‍भ में उनकी भूमिका अरविंद कुमार के बनाए कार्डों का इंडैक्स बनाने की थी। बाद में वह अरविंद कुमार की ही तरह हिन्‍दी कोश में ‘अ’ से ‘ह’ तक जाते-जाते वस्तुओं, वनस्पतियों और देवी-देवताओं के नामों को सही कार्ड बना कर दर्ज़ करने लगीं। अरविंद कुमार का कहना है कि ‘शब्देश्‍वरी’ (पौराणिक नामों का थिसारस) का ढाँचा मेरा है और अधिकांश शब्द तो कुसुम के ही हैँ– नाम हम दोनों का है।’

1976 में नासिक में गोदावरी नदी में सपरिवार स्नान कर के उन्‍होंने ‘समांतर कोश’ का शुभारंभ रिकार्ड करने के लिए एक कार्ड बनाया। उस पर पहले उन्‍होंने, फिर पत्‍नी कुसुम, बेटे सुमीत (सोलह साल) और बेटी मीता (दस साल) ने दस्तख़त किए। एक तरह से यह उन सब की सहभागिता का दस्तावेज बन गया। शायद यही कारण है कि जब भी सुमीत और मीता सहयोग करने लायक़ उम्र में पहुँचे तो अपनी-अपनी तरह से उनके काम के साथ जुड़ते गए।

अरविंद कुमार 1978 में ‘माधुरी’ की नौकरी छोड़कर सपरिवार दिल्ली मेँ मॉडल टाउऩ वाले घर में आ टिके। सुमीत का दाख़िला मुंबई के एक प्रतिष्ठित डॉक्टरी के कालिज में हो चुका था। वह पढ़ाई के दिनों वहीं रहते। मीता नवीं में सरकारी स्कूल में दाख़िल हो गईं। धीरे-धीरे सुमीत ने डॉक्टरी पढ़ाई में सर्जरी में दो गोल्ड मैडल जीते, और कुछ महीनों बाद वह दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में रैज़िडैंट सर्जन बन गए। वहाँ कंप्यूटर लगाए जा रहे थे। यहीं से ‘समांतर कोश’ के काम की तकनीक बदलने की शुरूआत हो गई। कंप्‍यूटर देखकर सुमीत की समझ में यह बात आ गई कि हम जो कार्डों पर काम कर रहे हैं, उस तरह तो वह काम कभी पूरा ही नहीं हो पाएगा। उन्‍होंने अपने पिताजी यानी अरविंद कुमार को इसके लिए सहमत करने की मुहिम ही चला दी।

अंततः अरविंद कुमार सहमत हुए। लेकिन कंप्यूटर के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। उधार लेने की हिम्मत भी नहीं थी, और संभावना भी नहीं थी। आख़िर कुछ बचत करने के लिए सुमीत ने साल-डेढ़ साल ईरान में काम ले लिया। यथावश्यक राशि जमा होते ही वापस आ गए।

1993 में कंप्यूटर ख़रीदा गया। अब उसके लिए साफ़्टवेयर चाहिए था जिसे प्रोग्राम कहते हैं। ‘समांतर कोश’ के लिए एक ख़ास तरह के प्रोग्राम की ज़रूरत होती है। यह प्रोग्राम डाटाबेस बनाता है– यानी विशेष प्रकार की सूची, तालिका। अकेला डाटाबेस बनना काफ़ी नहीं होता। उसे वाँछित रिपोर्ट में तब्दील करना होता है। इस काम के संदर्भ में- थिसारस बनाना। इन दोनों ही कामों के लिए अलग-अलग प्रोग्राम चाहिए होते हैं। ये दोनों ही क़ीमती होते हैं। और अरविंद कुमार के बूते से बाहर थे। अतः सुमीत ने ही हिम्मत की। उन्‍होंने किताबें पढ़-पढ़ कर जाना कि डाटाबेस बनाने के लिए उस समय फ़ाक्सप्रो नाम का प्रोग्राम सब से अच्छा है। इधर-उधर सम्‍पर्क बना कर उसका प्रबंध कर लिया। अब फ़ाक्सप्रो से क्या काम लेना है– यह अरविंद कुमार और सुमीत को तय करना था। फिर उस काम के लिए एक उपप्रोग्राम या कंप्यूटरी भाषा मेँ ऐप्लिकेशन लिखनी थी जो फ़ाक्सप्रो पर काम कर सके। अब फिर किताबें पढ़ कर ख़ुद ही सीख कर पहले एक प्रारंभिक ऐप्लीकेशन बनी। जैसे-जैसे ‘समांतर कोश’ की ज़रूरतें बढ़ती गईं, सुमीत उस में नए-नए मौड्यूल जोड़ता गए। अब तक अरविंद कुमार के पास 60,000 कार्डों पर ढाई लाख सुव्यवस्थित शब्द जुड़ चुके थे। उसको कंप्यूटरिकृत करने के लिए डाटा प्रविष्टि कर्मचारी रखा। वह बड़ा मेहनती निकला, और लगभग बेचूक टाइप करने वाला। लगभग नौ-दस महीनों मेँ उसने वह काम पूरा किया। अब और शब्द जोड़ने थे। 1951 से ही अरविंद कुमार हिन्‍दी में टाइपिंग करते आ रहे थे। ‘सरिता’, ‘कैरेवान’ में अपनी सभी रचनाएं उन्‍होंने टाइपराइटरों पर लिखी थीं। इसका फायदा यह हुआ कि उन्‍हें कंप्यूटर डाटा में नए शब्द जोड़ने में बहुत ज़्यादा समय नहीं लगा। इस बीच सुमीत बंगलौर में डॉक्टरी करने चला गए थे।

समांतर कोश का विमोचन करते राष्ट्रंपति शंकर दयाल शर्मा।

समांतर कोश का विमोचन करते राष्ट्रंपति शंकर दयाल शर्मा।

अतः अरविंद कुमार दंपति भी सुमीत के पास बंगलौर चले गए। वहाँ जाना इसलिए भी ज़रूरी था कि अब भी उन्‍हें नई आवश्यकताओं के लिए प्रोग्राम को परिष्कृत करवाना होता था और इसमें सुमीत सहायक थे। 1990 मेँ मीता की शादी हो चुकी थी। अतः वे सुमीत के पास जाने के लिए स्वतंत्र थे। 1994 में बंगलौर जा पहुँचे। वहां सितंबर 1996 को ‘समांतर कोश’ का काम पूरा हुआ। (इस बीच यह भी तय हो चुका था कि नेशनल बुक ट्रस्ट से किताब छपेगी।) पूरे ‘समांतर कोश’ के प्रिंट आउट निकालकर तीनों नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक अरविंद कुमार (उनका नाम भी अरविंद कुमार था) को सौंपने दिल्ली आए। अक्‍टूबर में प्रिंटआउट दिए। प्रिंटआउट मिलते ही अरविंद कुमार (निदेशक, नेशनल बुक ट्रस्‍ट) ने मुद्रण विभाग को आदेश दिया कि कोई बड़ा प्रेस तीनों शिफ़्टोँ के लिए बुक कर लें। पाँच हज़ार कापियों के लिए काग़ज़ इकट्ठा ख़रीद लें ताकि सभी 1,800 से पेजों में एक सा काग़ज़ रहे और काग़ज़ न होने के बहाने छपाई न रोकनी पड़े। किताब दिसंबर तक आनी ही चाहिए– राष्ट्रपति जी को समर्पित करने की तारीख़ 13 दिसंबर वह पहले ही समय ले चुके थे– किसी और को बताए बग़ैर!

और इस तरह से ‘समांतर कोश’ के रूप में एक अनमोल खजाना हिन्‍दी को मिल गया। पर बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। यह तो केवल पूर्वकथा सिद्ध हुई। सुमीत को सिंगापुर मेँ कंप्यूटर की नौकरी मिल गई। बंगलौर से अरविंद कुमार दंपति चंद्रनगर (गाज़ियाबाद) वापस आ गए।

मीता का कहना था कि  अपने डाटा में इंग्लिश शब्दों का समावेश करें। यह बेहद ज़रूरी है। वह इंग्लिश मीडियम से पढ़ रही अपनी बेटी तन्वी को हिन्‍दी सिखातीं तो इंग्लिश के हिन्‍दी शब्द और पर्याय नहीं मिल पाते थे। अरविंद कुमार तत्काल मीता से सहमत हो गए। काम को आगे बढ़ाने का ज़िम्मा भी मीता ने लिया– ‘समांतर कोश’ की एक प्रति पर हाशियों पर सभी मुखशब्दों के इंग्लिश अर्थ लिख दिए। यही ‘द पेंगुइन इंग्लिशहिंदी/हिंदीइंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी’ की शुरूआत बनी।

अब तक सुमीत सिंगापुर की एक साफ़्टवेयर कंपनी मेँ सीनियर वाइस प्रेज़िडैंट बन चुके थे, और मलेशिया की राजधानी क्वालालंपुर के एक अस्पताल के संचालन का कंप्यूटरन करवा रहे थे। अरविंद दंपति उसके पास गए तो वहीं उसने डाटा में इंग्लिश अभिव्यक्तियाँ शामिल करने की ऐप्लिकेशन की पहली प्रविधि लिखी।

कर्म आजीवन आनंद है

अरविंद कुमार के जीवन के तीन मंत्र हैं—

मेहनत मेहनत मेहनत या कहें तो कर्म कर्म कर्म। गीता का यह श्‍लोक हर जगह उद्धृत किया जाता है—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

यहाँ कृष्ण केवल सकाम और निष्काम कर्म के संदर्भ में बात कर रहे हैं। अरविंद कुमार इसे इहलौकिक अर्थ के साथ कुछ और भी जोड़ कर देखते हैं। वह कहते हैं कि ‘कर्म करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। हमारा कर्म सफल होगा या नहीं, हमें इस की तो परवाह करनी ही नहीं चाहिए, हम काम पूरा कर पाएँगे या नहीँ– इसकी भी चिंता नहीं करनी चाहिए।’ वह अपने कई उदाहरण देते हैं, ‘दिल्ली आ कर काम शुरू करते ही हमारे घर मॉडल टाउन में भयानक बाढ़ आ गई। सात फ़ुट तक पानी भर आया। अगर हमारे कार्ड ऊपर मियानी में न होते, तो सारी मेहनत धरी धराई रह जाती। इसी प्रकार मुझे 1988 में बेहद भारी दिल का दौरा पड़ा। अगर मैं अस्पताल मेँ ही न होता तो बच नहीं पाता। गुमनाम मर जाता। ऐसी कई घटनाएं जीवन में घटती रहती हैं। यूँ मर भी जाता तो जहाँ तक मेरा सवाल है मैं कर्म करने का पूरा आनंद तो लगतार भोग रहा था। तो मैं कहता हूँ— कर्म आजीवन आनंद है।’

सपना शब्दों के विश्‍व बैंक का

उनका कोश अरविंद लैक्सिकन (http://arvindlexicon.com) इंटरनैट पर है। उनका कहना है कि पर यहीं रुका तो नहीँ जा सकता।

आजकल वह एक तरफ़ तो डाटा के संवर्धन और परिष्कार में लगे हैं तो साथ ही साथ अकारादि क्रम से आयोजित ‘हिंदी-इंग्लिश-हिंदी कोश’ के लिए प्रविष्टियों का चयन कर रहे हैं। ऐसे थिसारसों में इंडैक्स की ज़रूरत नहीं होती। अतः वे अपनी सहजता के कारण लोकप्रिय होते जा रहे हैं। (राजकमल से प्रकाशित उनका ‘अरविंद सहज समांतर कोश’ की लोकप्रियता इसका सबूत है।) अब वह ऐसा द्विभाषी कोश-थिसारस बनाना चाहता हैं, जो कालिज तक के छात्रों की सभी ज़रूरतें पूरी कर सके। उनका विश्‍वास है कि यह काम मार्च, 2013 तक पूरा हो जाएगा।

अरविंद कुमार के कई सपने हैं। उनमें एक महान सपना है ‘शब्दोँ का विश्‍व बैंक’ यानी वर्ल्ड बैंक आफ़ वर्ड्स। उनका कहना है कि ‘यह अभी परिकल्पना और आधारभूत काम करने की स्थिति में है। एक बात ज़ाहिर है यह काम मेरे जीवन मेँ पूरा होना सम्‍भव नहीं है। मेरा काम है इस का आधार तैयार खड़ा करना। काम शुरू होने के बाद कई पीढ़ियाँ ले सकता है और इसके लिए अंतररष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होगी। समय सीमा तो बन ही नहीं सकती। समांतर कोश के लिए दो साल की सीमा तय की थी। लग गए बीस साल! अभी तो विश्‍व शब्दबैंक की परिकल्पना का आधार जानना बेहतर है। मेरे पास हिन्‍दी और इंग्लिश अभिव्यक्तियों का विश्‍व में सब से बड़ा डाटा है। अब हिन्‍दी के माध्यम से हम भारत की सभी भाषाएं जोड़ सकते हैं। इंग्लिश डाटा के सहारे बाहर की भाषाएं मिलाई जा सकती हैं। भारत में सब से पहले मैं दक्षिण की सर्वप्रमुख भाषा तमिल से आरम्‍भ करना चाहूँगा–  इसके लिए तमिल सहयोगियों की तलाश निजी स्तर पर चल रही है। विदेशी भाषाओं में प्राथमिकता संयुक्त राष्ट्रमंडल की किसी भी आधिकारिक भाषाओं को दी जाएगी। फ्राँसीसी पहले आनी चाहिए।
‘इस परिकल्पना का आधार है यूनिकोड का अवतरण। इसके आने के बाद ही यह सोच पाना सम्‍भव हो सकता था। ऐसे किसी बैंक का महाडाटा बनने का सब से बड़ा लाभ यह होगा कि हम जब चाहें संसार की किन्हीं दो या अधिक भाषाओँ के थिसारस-कोश बना सकेंगे–  जैसे तमिल-हिन्‍दी-फ़्राँसीसी, या भारत की बात लें तो ज़रूरत हो तो गुजराती-बांग्ला-हिन्‍दी, या फिर मलयालम-हिन्‍दी…।’
उनका कहना है कि इस परिकल्पना का तकनीकी आधार है– हमारी विकसित शब्द-तकनीक। इस के ज़रिए हम अपने डाटा में अनगिनत भाषाएं और अनगिनत शब्दकोटियाँ समो सकते हैं। यह  प्रविधि बनाई है डॉक्‍टर सुमीत कुमार ने। और यह लगातार विकसित होती रह सकती है। अभी अरविंद कुमार डाटा को अपडेट करते हैं। उनका कहना कि यह एक निरंतर प्रक्रिया है। अगले साल तक इसके लिए कोई प्रणाली विकसित हो पाएगी।

अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि. की स्‍थापना

अरविंद कुमार ने अक्‍टूबर 2010 में कम्‍पनी अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि. की स्‍थापना की। कंपनी का उद्देश्य है भारतीय भाषाओं को संसार भर में ले जाना। अरविंद कुमार इसके संस्थापक और शब्‍द संकलन प्रमुख हैं। अन्य सदस्य हैं कुसुम कुमार, सुमीत और मीता लाल। मीता लाल कम्‍पनी की सीईओ हैं। सुमीत इसके तकनीकी पक्ष के अध्यक्ष हैं।
यह कम्‍पनी अ‍रविंद कुमार के सभी कोशों और अन्य रचनाओं की सर्वाधिकारी है। इसने पेंगुइन से उनकी पुस्तक ‘द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐँड डिक्शनरी’ के सभी अधिकार ले लिए हैं। इस पुस्तक की बिक्री यही कम्‍पनी कर रही है।
अरविंद कुमार की कई पुस्तकें राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित हुई हैं। उन सब पर उनका सर्वाधिकार है, प्रकाशकों के पास केवल एक बार तीन साल के लिए मुद्रण अधिकार है। उनमें एक ‘सहज समांतर कोश’  के बारे में उनका एग्रीमैंट कुछ इस प्रकार का है– यदि वे लोग हर तीन साल मेँ एक नियत संख्या में किताब बेच पाए तो अगले तीन सालों के लिए उन्हें उसके पुनर्मुद्रण का अधिकार मिल जाएगा। अतः यह कोश उनके पास चलता रहेगा।
नेशनल बुक ट्रस्ट से ‘समांतर कोश’ वापस लेने की उनकी कोई इच्छा नहीं है। अब तक एनबीटी उसके छह मुद्रण कर चुका है।
21 जून 2011 की शाम को अरविंद कुमार को दिल्ली की हिन्‍दी अकादेमी ने शलाका सम्मान दिया, उसी दिन थाईलैंड से उन के पुत्र डॉ. सुमीत कुमार ने अरविंद लैक्सिकन को www.arvindlexicon.com  पर ऑनलाइन कर दिया।

अरविंद कुमार अकारादि क्रम से संयोजित इंग्लिश-हिन्‍दी और हिन्‍दी-इंग्लिश थिसारसों पर भी काम कर रहे हैं। ये पुस्तकें उनकी कम्‍पनी 2013-14 में प्रकाशित कर पाएगी। इन कोशों की एक ख़ूबी है इंग्लिश में भारतीय शब्द बड़े पैमाने पर संकलन। उनका कहना है कि हमारे छात्र कब तक ऐसे इंग्लिश कोशों पर निर्भर करते रहेंगे जिन में हमारी संस्कृति ही न हो।