Archive for: December 2012

नये साल पर कमल जोशी की कविताएं

kamal joshi
नए साल में सामाजिक, राजनीतिक व सांस्‍कृतिक चेतना का विकास हो। इस कामना के साथ प्रसिद्ध फोटोग्राफर और लेखक कमल जोशी की कविताए- 

1.

खेतों को नाज मिले
बैलों को सानी
जंगल को पेड़ मिलें
नदिया को पानी

बिटिया को प्‍यार मिले
बेटे को काज
तवे को रोटी मिले
चूल्‍हे को आग

बटिया को राही मिले
प्‍यासे को कुव्‍वां
बच्‍चों को खेल मिले
चिमनी को धव्‍वां

जुगनू को रा‍त मिले
चिडि़या को आसमान
‘होरी’ को मान मिले
संघर्ष को दास्‍तान

सागर भी नीला रहे
पर्वत हो धानी
ऐसा हो नया साल
सपनों के मानी।

2.

दिल कहे आऊँ मैं
सबको ले जाऊँ मैं
खुशियों की नाव में
छोटे से गाँव में
पेड़ों की छाँव में।

3.

माना की सर्द हो गया है मौसम
धरती ढक गई है बरफ से
फिर भी
खुद को सम्‍भालो
कुछ इरादे समेटो
ठण्‍ड से काँपती उंगुलियों से
मिट्टी में दबा दो कुछ सपने।

बुराँस लायेगा वसंत
और आग लगा देगा जंगल में
मिट्टी के गरम होते ही
तुम्‍हारे इरादों की कोंपले
जमीन को फोड़ निकलेंगी बाहर
बाँहे फैला कर करने लगेंगी
आसमान से बातें

उठो! आओ, कि बो दो कुछ इरादे
मैं लाऊँगा बुराँस
कभी, कहीं से
जंगल में लगाने को आग।

4.

इस साल
बात करना किसी पेड़ से!

पूछना उससे
जब तुम्‍हारा सर
छू रहा होता है आसमान
तुम तब भी क्‍यों
पकडे़ रहते हो मिट्टी?

जब तुम्‍हारे पत्‍ते
हरे होकर
सूरज से करने लगते हैं बातें
क्‍यों तब भी नहीं छोड़ते
वो शाखों को ?

तुम
अपनी छाया में आने वाले से
नहीं पूछते
उसकी जाति ना पाति
न उसका धर्म!

पत्‍थर मार कर
फल तोड़ते बच्‍चों से
कभी नहीं पूछा तुमने
कि
क्‍या दोगे इसके बदले?

पूछना उससे,
पेड़! तुम ऐसे क्‍यों हो
कैसे करते हो तुम ऐसा
हम क्‍यों नहीं कर पाते ऐसे!
मालूम करना तो जरा उससे।

चिडिया से बतियाती औरत

जब दो कलाकारों का सृजन एक साथ सामने आता है तो कुछ अलग ही प्रभाव होता है। ऐसा ही शानदार प्रभाव डाला है कवि महेश चंद्र पुनेठा की कविताओं पर वरिष्‍ठ चित्रकार कुँवर रविन्‍द्र के बनाए पोस्‍टरों ने-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

साँसों ने विराम ले लिया, लेकिन उसका संघर्ष अविराम है : प्रणय कृष्‍ण

नई दिल्‍ली : 16 दिसंबर को वह छह दरिंदों से अकेले ही 31 किलोमीटर तक दिल्ली की सडकों पर घूमती ‘यादव ट्रैवेल’ की व्हाइट-लाइन बस में लड़ती और जूझती रही। उसके दोस्त को वे पहले ही बुरी तरह घायल कर चुके थे। अगले 13 दिनों तक उसने अस्पताल में अपना बहादुराना संघर्ष जारी रखा। इन सारे दिनों में उसके इस बहादुराना संघर्ष ने भारत के लाखों-करोड़ों लड़कियों-लड़कों और आम लोगों को पहली बार औरतों के खिलाफ अन्याय और हिंसा के सभी रूपों के विरुद्ध इतने बड़े पैमाने पर सडकों पर उतार दिया। हुक्मरानों को जितना भय उसकी लड़ाकू ज़िंदगी से था, उससे भी ज़्यादा उसकी संभावित मौत से था। उन्होंने उसे गुपचुप इलाज के नाम पर वतन-बदर कर दिया। आज सुबह 2.15 पर सिंगापुर के अस्पताल में उसकी साँसों ने विराम ले लिया, लेकिन उसका संघर्ष अविराम है।

21 वीं सदी के 12वें साल के आखिरी महीने में इंडिया गेट को तहरीर स्क्वायर में तब्दील करने को आतुर भारत की हज़ारों युवतियों-युवकों ने बैरिकेडों पर भीषण ठण्ड में लाठियों और पानी की बौछारों से लड़ते हुए एक नई लड़ाकू अस्मिता पाई, बिना यह जाने कि जिस बहादुर लड़की के बलात्कार के खिलाफ संघर्ष से वे प्रेरित हैं, उसका नाम क्या है, गाँव क्या है, जाति क्या है, धर्म क्या है। इस प्रक्रिया में वे खुद अपनी जाति, क्षेत्र, भाषा, धर्म के ऊपर उठ कर भारत में औरत की आज़ादी और इन्साफ के लिए एक अपराधिक सत्ता-व्यवस्था से टकरा गए। वे इतना ही जानते थे कि वह 21वीं सदी के भारत की 23 साल की ऐसी युवती थी जिसने एक दुर्निवार सवाल के हल के लिए आर-पार की लड़ाई छेड़ रखी है।

गर्भ में भ्रूण के रूप में क़त्ल की जाती, जातीय और साम्प्रदायिक हिंसा में बलात्कार कर मौत के घाट उतारी जाती, घरों में पीटी जाती, रिश्तेदारी में ही यौन-उत्पीड़न का शिकार होती, धर्म और जाति के ठेकेदारों के फरमानों से मौत की सज़ा पाती, दहेज के लिए जलाई जाती, अपहरण कर बाज़ार में बिकने को लाई जाती असंख्य, अनाम भारतीय औरतों के लिए न्याय के संघर्ष का प्रतीक बन गई ‘एक जुझारू युवती’। पुलिस, क़ानून में आमूलचूल बदलाव और सता तथा समाज के स्‍त्री के प्रति नज़रिए में भारी परिवर्तन की अपरिहार्यता को वह अपनी लड़ाकू ज़िंदगी और मौत के ज़रिए बड़े-बड़े अक्षरों में लिख गई।

कश्मीर के शोपियां में हो, चाहे छत्तीसगढ़ की सोनी सोरी अथवा मणिपुर की मनोरमा, पुलिस और सुरक्षाबलों द्वारा आए दिन होने वाले यौन-बर्बरताएं, घरों-खेतों-खलिहानों-दफ्तरों-बसों-सडकों-स्कूलों-कॉलेजों में हर दिन अपमान सहने को विवश की जाती भारत की स्‍त्री-शक्ति के सामंती और पूँजीवादी जघन्यताओं के खिलाफ संघर्ष ने नये रूप अख्तियार किए हैं, नया आवेग है यह अन्याय के खिलाफ।

शरीर के खत्म हो जाने के बाद भी वह इसी नई चेतना, नए संघर्ष और अथक संघर्ष की ‘प्रेरणा’  बनकर हम सबके दिलों में, युवा भारत की लोकतांत्रिक चेतना में सदा जीती रहेगी।

आजादी, बराबरी और इंसाफ तथा उसके लिए प्रतिरोध महान जीवन मूल्य है : जन संस्कृति मंच

सुधीर सुमन

नई दिल्ली: हम उस बहादुर लड़की के प्रतिरोध का गहरा सम्मान करते हैं,  जिसने 16 दिसंबर की रात अपनी आजादी और आत्मसम्मान के लिये अपनी जान को दाँव पर लगा दिया और बलात्कारियों द्वारा नृशंस तरीके से शरीर के अंदरूनी अंगों के क्षत-विक्षत कर देने के बावजूद न केवल जीवन के लिये लम्‍बा संघर्ष किया, बल्कि  न्याय की अदम्य इच्छा के साथ शहीद हुई। आजादी, बराबरी और इंसाफ तथा उसके लिए प्रतिरोध महान जीवन मूल्य है, जिसकी हमारे दौर में बेहद जरूरत है। जन संस्कृति मंच लड़की के परिजनों और करोड़ों शोकसंतप्त लोगों की प्रति अपनी संवेदनात्मक एकजुटता जाहिर करता है।

यह गहरे राष्ट्रीय और सामाजिक-सांस्कृतिक शोक की घड़ी है। हम सबके दिल गम और क्षोभ से भरे हुए हैं। हमारे लिये इस लड़की का प्रतिरोध इस देश में स्त्रियों को साथ हो रहे तमाम जुल्मो-सितम के प्रतिरोध की केंद्रीय अभिव्यक्ति रहा है। जो राजनीति, समाज और संस्कृति स्त्रियों की आजादी और बराबरी के सवालों को अभी भी तरह-तरह के बहानों से उपेक्षित कर रही है या उनके प्रति असंवेदनशील है या उनका उपहास उड़ा रही है, उनको यह संकेत स्पष्ट तौर पर समझ लेना चाहिए कि जब स्वतंत्रता, सम्मान और समानता के अपने अधिकार के लिये जान तक कुर्बान करने की घटनाएं सामने आने लगें,  तो वे किसी भी तरह वक्त को बदलने से रोक नहीं सकते।

इस देश में स्त्री उत्पीड़न और यौन हिंसा की घटनाएं जहाँ भी हो रही हैं, उसके खिलाफ बौद्धिक समाज, संवेदनशील साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों और आम नागरिकों को वहाँ खड़ा होना होगा और जाति-सम्‍प्रदाय की आड़ में नृशंस स्त्री विरोधी मानसिकता और कार्रवाइयों को संरक्षण देने की प्रवृत्ति की  मुखर मुखालफत करनी होगी, समाज, प्रशासन तंत्र और राजनीति में मौजूद स्त्री विरोधी सामंती प्रवृत्ति और उसकी छवि को मौजमस्ती की वस्तु में तब्दील करने वाली उपभोक्तावादी अर्थनीति और संस्कृति का भी सचेत प्रतिवाद विकसित करना होगा, यही इस शहीद लड़की के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अनियंत्रित पूँजी की संस्कृति जिस तरह हिंस्र आनंद की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही और जिस तरह वह पहले से मौजूद विषमताओं को और गहरा बना रही है,  उससे मुकाबला करते हुए हमें एक बेहतर समाज और देश के निर्माण की ओर बढ़ना होगा।

आज इस देश की बहुत बड़ी आबादी आहत है और वह अपने शोक की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करना चाहती है, वह इस दुख के प्रति अपनी एकजुटता जाहिर करना चाहती है, लेकिन उसके दुख के इजहार पर भी पाबंदी लगाई जा रही है। इस देश की राजधानी को जिस तरह पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है, जिस तरह मेट्रो स्‍टेशन बंद किए गए हैं, जिस तरह बैरिकेटिंग करके जनता को संसद से दूर रखने की कोशिश की गई है, वह दिखाता है कि इस देश का शासकवर्ग जनता के शौक से भी किस तरह खौफजदा है। अगर जनता के दुख-दर्द से इस देश की सरकारों और प्रशासन की इसी तरह की दूरी बनी रहेगी और पुलिस-फौज के बल पर इस तरह लोकतंत्र चलाने की कोशिश होगी, तो वह दिन दूर नहीं जब जनता की वेदना की नदी ऐसी हुकूमतों और ऐसे तंत्र को उखाड़ देने की दिशा में आगे बढ़ चलेगी।

सुधीर सुमन, जसम राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी

अच्‍छी रचना मानव के पक्ष में खड़ी होती है : विश्‍वनाथ त्रिपाठी

नई दिल्‍ली : किताबघर प्रकाशन के संस्‍थापक पंडित जगतराम आर्य के जन्मदिवस 16 दिसंबर को ‘आर्य स्मृति साहित्य समारोह: 2012’ का आयोजन किया गया। इस बार की सम्मान-शृंखला-19 में उपन्यास की पांडुलिपि आमंत्रित की गई थीं। पुरस्कार की घोषित राशि इकतीस हजार रुपये थी और लेखक की निर्धारित आयु सीमा 40 वर्ष थी। संयोगवश, पांडुलिपियों की संख्‍या सीमित रही तथा सम्मान योग्य पांडुलिपि की भी अनुपस्थिति रही। संयोजक तथा परामर्शदाता के अनुसार यह निर्णय लिया गया कि स्तरीय पांडुलिपि के अभाव में यह सम्मान प्रदान न किया जाए। साथ ही, इस बार ‘आलेख पुरस्कार’ की एक अतिरिक्त घोषणा भी की गई थी। किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किए जा रहे बहुखंडीय बृहद् किशोर उपन्यास ‘गुल्लू और एक सतरंगी’ (लेखक : श्रीनिवास वत्स) के खंड-1 पर समीक्षात्मक आलेख लिखने वाले दो प्रतिभागियों को घोषित राशि 5100/- रुपये के लिए सम्मानित किया जाना था। आलेखकार अजितकुमार तथा डॉ. विजयकुमार महांति को यह सम्मान देने की घोषणा हुई थी। व्यक्तिगत तथा अपरिहार्य कारणों से दोनों विजेता समारोह में उपस्थित न हो सके।

साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सभागार में हिन्‍दी के विख्यात सर्जक-आलोचक डॉ. विश्‍वनाथ त्रिपाठी की अध्यक्षता में समारोह आरंभ हुआ। संगोष्ठी का संचालक युवा आलोचक पल्लव ने किया।

‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के संयोजक और किताबघर प्रकाशन के प्रमुख सत्यव्रत ने संयोजकीय वक्तव्य में समारोह के वक्ताओं तथा साहित्यिक समाज से अनुरोध किया कि इस तथ्य की जाँच की जानी चाहिए कि क्या इधर हिन्‍दी में उपन्यास लेखन की स्थिति में कुछ ठहराव या बदलावों के संकेत उभर रहे हैं।

आलोचक पल्लव ने संगोष्ठी के केंद्रीय विषय ‘उपन्यास का प्रदेश’ पर चर्चा करते हुए कहा कि आज हिन्‍दी उपन्यास की विधागत अंतर्प्रक्रियाएं कई विधाओं में आ-जा रही हैं और इससे उपन्यास की पारम्‍परिक लेखन प्रविधि में कुछ नया जुड़ता प्रतीत हो रहा है। काशीनाथ सिंह ने ‘काशी का अस्सी’ में जिस शिल्पविधि को अपनाया है, वह विचारणीय है कि उस कृति को उपन्यास के खाँचे-ढाँचे में देखा जाए या नहीं। यह भी कि ‘शेखर: एक जीवनी’ या ‘मैला आंचल’ के जैसा शास्त्रीय रूप इधर के उपन्यास-लेखन में देखने को नहीं मिल रहा है। इसी प्रसंग में उन्होंने चित्रा मुद्गल के प्रकाशित उपन्यासों का संदर्भ देते हुए बताया कि उनके प्रत्येक उपन्यास की जमीन नई और लिखने की तकनीक भी भिन्न है। इस प्रकार के लेखकीय योगदान से विधा की विकासमान धारा हमारे सामने आती है और उपन्यास की सोद्देश्यता का क्षेत्र व्यापक होता है।

प्रसिद्ध कथाकार चित्रा मुद्गल ने कहा कि हाँ, विधाओं की एक-दूसरे के मध्य आवाजाही हुई है। मगर कौन-सी कृति किस विधा में स्थित है, यह प्रायः आलोचक तय कर रहे हैं। उपन्यास अपने समय और देशकाल का गहरा आख्यान होता है। मगर कुछ कृतियों को ‘उपन्यास’ सिद्ध कर देने की हड़बड़ी इधर आलोचकों में बढ़ी है। यह उचित है कि पितामह की धोती की तरह का परिवेश हम छोड़ रहे हैं, मगर पौधे को जड़ों से उखाड़ना उचित नहीं है। कुछ दशकों पूर्व लम्‍बी कहानी लेखन की परम्‍परा अस्तित्व में थी। देखते-देखते उन्हें लघु उपन्यास, फिर उपन्यासिका और अंत में ‘उपन्यास’ ही कहा जाने लगा। ‘उपन्यास का प्रदेश’ तो विधाओं के लोक में होता ही है मगर प्रदेशों का अपना उपन्यास भी होता है। संजीव का उपन्यास ‘किसनगढ़ के अहेरी’ अपनी आँचलिकता के लिए जाना जाता है। व्यापक समस्याओं से जुड़ने वाले स्थानिक या आँचलिक उपन्यासों का भी अभाव नहीं है हिन्‍दी में। कृष्णा सोबती,  रांगेय राघव में अपने-अपने सरोकारों का चित्रण हैं। रचना के स्तर लेखकीय प्रयोग होते रहे हैं, होने भी चाहिए। कहानी में निजता की पहचान प्रमुख होती है तो उपन्यास में वही सार्वजनिकता की ताकत और ऊर्जा पैदा करती है। हिन्‍दी के बड़े उपन्यासकार रांगेय राघव, यशपाल, अमृतलाल नागर…एक प्रतिमान गढ़ते हैं जिनके समक्ष खड़े होने में मुझे बीस वर्षों तक झिझक रही। अच्छे समाज की कल्पना को साकार रूप देना बडी़ रचना की मांग करता है। एक सीमा तक जाकर तो रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य भी उपन्यास की प्रतीति देते हैं। मगर संस्कृत के बाद, उपन्यास गद्य की विधा बनी। निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल जैसा गद्य लिखना एक चुनौती भरा कार्य है। समाज के स्वरूप का दबाव भी अपनी जगह काम करता है। लेखक का सर्जक रूप परकायाप्रवेश की स्थिति और तेजस्विता पैदा करता है। ‘रेहन पर रग्घू’, ‘अपना मोर्चा’ निश्चित ही उपन्यास हैं, मगर ‘काशी का अस्सी’? मैं समझती हूँ कि परम्‍परा का पुनर्निर्माण भले हो जाने दें, मगर उसके शाश्वत रूप में सेंध लगाना उचित नहीं होगा। प्रकाशकों का भी दबाव हो सकता है कि उपन्यास चूँकि आसानी से बिक सकते हैं, इसलिए कई अन्य विधाओं के ग्रंथों को भी उसी तर्ज पर ‘उपन्यास’ कहने दिया जाता है।

संचालक पल्लव ने कहा कि हर सर्जक का अपना एक मानसिक प्रदेश भी हुआ करता है। संजीव हमारे समय के ऐसे रचनाकार हैं जिनका ध्यान इस देश के हाशिए पर स्थित लोगों के जीवन की कथा को उकेरने पर गया है। उनके उपन्यास ‘सूत्रधार’ आदि से पता लगता है कि वह अपना परिश्रम,  प्रतिभा, साधना और समर्पण के साथ लेखन किया करते हैं।

कथाकार संजीव ने हिन्‍दी के अनेक ऐसे उपन्यासों का स्मरण दिलाया जो कि साहित्य के तथाकथित समकालीन और सुपरिचित क्षेत्रों से एकदम विलग हैं। कामतानाथ के ‘कालकथा’ से लेकर भगवानदास मोरवाल के ‘काला पहाड़’ और ‘रेत’, चंद्रकांता के ‘कथा सतीसर’, नासिरा शर्मा के ‘कुइंयाजान’ तथा मैत्रेयी पुष्पा के ‘इदन्नमम’, ‘अलमा कबूतरी’ और चित्रा मुद्गल के ‘आंवा’ उपन्यास का उल्लेख किया। उन्होंने ऐसे उपन्यासों का संक्षेप में उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे ये कृतियाँ उस रचनात्मक धारा से भिन्न है, जिसे कि प्रचलित लेखन धारा के रूप में देखा जाता है। ऐसे उपन्यासों में विषय और परिवेश ही नायक कहे जा सकते हैं। दोहराव वाले विषयों की एकरसता और वर्चस्व को तोड़ते ये उपन्यास, भले ही अचर्चित रह जाते हैं मगर इनके रचने का महत्त्व तो कम नहीं होता। ममता कालिया के उपन्यास ‘दौड़’ को भी अन्य कई उपन्यासों के साथ संजीव ने उल्लेखनीय बताया।

अपनी रचना-प्रक्रिया के विषय में संजीव का कहना था कि मैं स्वयं उपन्यास का कीड़ा रहा हूँ मगर फिर भी हिन्‍दी, भारतीय या विश्‍व की अन्य भाषाओं के विराट उपन्यास साहित्य को जानने का दावा नहीं कर सकता। मगर यह सच है कि विश्‍व साहित्य की केंद्रीय विधा उपन्यास ही है। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ तथा ‘लज्जा’ जैसे चर्चित उपन्यासों को उन्होंने दस्तावेजीकरण का नमूना बताया। अपात्र कृतियों को उत्कृष्ट रचना घोषित करने की आलोचकीय हड़बड़ी को संजीव ने ‘साहित्यिक अपराध’ बताते हुए आलोचना के समकालीन परिदृश्य पर निराशा व्यक्त की। ड्राइंगरूम में बैठकर, जमीनी स्तर के अनुभव नहीं अर्जित किए जा सकते। इतिहास तथ्य है जबकि उपन्यास लेखन कला, इस अंतर को हमारे लेखकों और आलोचकों को समझना होगा। कच्ची रचना सृजन नहीं हो सकती। दस्तावेज और तथ्यों की धूल हटाकर ही हम किसी अध्ययनपरक उपन्यास की रचना कर सकते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के इस कदम को साहसिक बताया कि कमजोर कृति को पुरस्कृत करने के स्थान पर उन्होंने सम्मान को शून्य कर देने की प्रक्रिया अपनाई।

संजीव ने युवा उपन्यासकारों के सामने उपस्थित नई चुनौतियों के आधिक्य को भी रचना-बंजरता की उत्पन्न स्थिति से जोड़कर देखा। कैरियर और वेतन की धमक-चमक में, समाज में ठहरकर विचार करने की बुद्धिजीवीय सक्रियता में ह्रास हुआ है, कमी आई है। जन आंदोलनों का विलोप होना,  तंत्र की एक अन्य शातिराना हरकत है। इसलिए इस सबमें उलझा युवक रचनात्मक योगदान नहीं कर पा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि समय की गति-दुर्गति को देखते हुए यह वांछनीय है कि हम छोटे कलेवर के उपन्यास लिखें। विषय और कथ्य की पहुँच आम जन तक हो और आतंकित करने वाली भाषा के प्रयोग से बचें। लेखक यह भी देखें कि इस बीच पाठक की रुचियाँ बदली हैं। समाज में फैली विसंगतियों पर लेखकों को ही ध्यान देना होगा। उनके लिए फरिश्ते आसमान से नहीं उतरेंगे।

‘इदन्नमम’ और ‘अलमा कबूतरी’  जैसी कृतियों की लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के अनुसार हिन्‍दी में प्रचलित ‘युवा लेखन’ के जुमले को अब नकार देने का समय है। उन्होंने स्वयं अपना लेखन चालीस वर्ष की आयु के बाद तब शुरू किया था, जब उन्हें अपने रचनाकार के पास पर्याप्त परिपक्वता के अर्जित होने का आत्मविश्‍वास हो चला था। उन्होंने कहा कि नब्बे के दशक में भी ‘न लिखने का कारण’ शीर्षक चिंताएं उपस्थित रही हैं। उन्होंने अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यासों का हवाला देते हुए कहा कि हमें चिंता यह होनी चाहिए कि लिखना है और उत्कृष्ट लिखना है। चिंता यह होनी चाहिए कि जो लिखा जाए वह गहराई से, डूबकर लिखा जाए। आज का लेखक जल्दी में है, हड़बड़ी में है। हमें शोध के लिए अपने विषय के क्षेत्रों में जाना होगा। रेणु के ‘मैला आंचल’ उपन्यास को अपनी रचनात्मक प्रेरणा बताते हुए मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि कैसे एक अंचल विशेष की कहानी होते हुए भी वह उपन्यास, राष्ट्रीय चरित्र और स्वभाव की कृति बन जाता है। ‘इदन्नमम’ और ‘चाक’ जैसे उपन्यासों में मैंने उन नारी पात्रों को खोजा है जो अपनी कथा को संप्रेषित कर पाती हैं, जुबान दे पाती हैं। लोकगीतों में वर्णित स्त्रिायों की व्यथा को मैंने अपनी रचनाओं में स्थान देने का उपक्रम किया है।

मैत्रेयी पुष्पा के अनुसार बदलावों के आगमन से हमें भयभीत नहीं होना चाहिए। मैं गाँव में जाती हूँ तो पाती हूँ कि वहाँ किशोरी-युवतियाँ फेसबुक पर हैं, कंप्यूटर पर काम कर रही हैं। बहुएं मोबाइल पर बातें कर रही हैं, अर्थात् अभिव्यक्ति और संप्रेषण के नए दरवाजे इस नई तकनीक के माध्यम से खुल रहे हैं। उनका मानना था कि हमें प्रश्नांकित होने में भय या संकोच नहीं लगना चाहिए। आम प्रश्नों के उत्तर देते हैं, तो नई दृष्टि का अनुसंधान भी होता है। अभी-अभी किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘तबदील निगाहें’ में मैंने अपने वरिष्ठों से खूब प्रश्‍न किए हैं जिनमें प्रेमचंद, जैनेंद्र और भगवतीचरण वर्मा जैसे दिग्गज रचनाकार शामिल हैं। उपन्यास आपके जीवन को नई राह देते हैं, नई तलाश भी देते हैं। अनुभूत सत्य को जानने के लिए मैं काफी फील्डवर्क करती हूँ। अपने पात्रों के मध्य जाकर रहा करती हूँ और उनकी जिजीविषा और विवशता को उपन्यास का ताना-बाना बनाती हूँ। इसीलिए अनुभव, विशिष्ट रचना के रूप में बोला करते हैं। ऐसे में पाठक-समाज को अपनी छवि दिखती है तो वह कृति विशेष को पढत़ा है। मेहनत, प्रतिभा और धैर्य किसी भी कृति की गुणवत्ता को बढा़ने का काम करते हैं।

हिन्‍दी के वरिष्ठ आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि अपने वाङम्य के ज्ञान के बिना अच्छा साहित्य नहीं लिखा जा सकता और आज मंच पर जो तीनों उपन्यासकार उपस्थित हैं, इनके बिना समकालीन हिन्‍दी उपन्यास का इतिहास नहीं लिखा जा सकता। शाश्वत रूप से स्थापित कृतियों के बारे में उन्होंने कहा कि काल के सदियों लम्‍बे कालखंड के समय के झरते रेशों ने उन्हें महानता सौंपी है, इसलिए एक पुनर्पाठ से उनके महत्त्व को निरस्त कर पाना दुष्कर कार्य है। उन्होंने कहा कि आलोचक के रूप में उन्हें कई बार बहुत असुरक्षा महसूस होती है क्योंकि मूल्याँकित रचना के प्रतिमान और उनके स्रोतों से प्रायः अवगत रहना मुश्किल प्रक्रिया है। इस तरह आलोचक भी वंचित हैं,  दुखित हैं। साहित्य लेखक पाठक को समाज के समकाल से सूचित करता है और पाठक की सुरुचियों में वृद्धि और विकास लाता है। कला और संगीत आदि ललित सर्जनाएं भी यही काम करती हैं। मगर आज के बाजारवाद और साम्राज्यवादी नजरिए ने हमारा स्वाद बदल दिया है।

उन्‍होंने कहा कि ‘स्व’ की जगह ‘पर’ का बोलबाला है। इस तंत्र का पुर्जा बनने पर यह पाठ पढ़ना अनिवार्य है कि जो है,  वह नहीं है बल्कि वह है जो नहीं है। ‘हिंदू’, ‘जनसत्ता’ आदि समाचार-पत्र पढ़कर पता लगता है कि समाज में क्या विसंगतियाँ व्याप्त हैं। लेखक वहाँ से कच्ची सामग्री उठा सकता है। समय की दुर्दम चुनौतियों को स्वीकार करने पर ही लेखक अपना सांस्कृतिक योगदान दे पाता है। समाज की तथाकथित विकास प्रक्रिया को दिशाहीन बताते हुए उन्होंने कहा कि अच्‍छी रचना मानव के पक्ष में खड़ी होती है। मानव निरपेक्ष विकास को उद्घाटित, प्रकाशित कर यह बताना होगा कि हम दिशाहीनता की स्थिति के मारे हैं। अच्छे उपन्यास वही हुए हैं जिनके कथ्य में बिखराव है, वैसा ही बिखराव जैसा कि जीवन में सचमुच पाया जाता है। और लेखक को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पाठक उसकी अंतिम शरणस्थली है। ऐसे में जबकि हम त्याग करने का सुख ही भूल गए हैं, इसमें व्यापक पाठक वर्ग के हृदय में अपनी बात उतारनी है, जीवन का ग्राफ ही साहित्यिक उपन्यास का शिल्प हो सकता है।

पतनशीलता के दौर में अभिधा से काम नहीं चलेगा : असगर वजाहत

असग़र वजाहत को सम्मान प्रदान करते पंकज बिष्ट

राजसमन्द। आज साहित्य और राजनीति के संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत आ गई है। जहाँ साहित्य संस्कृति का सबसे बड़ा प्रतिनिधि है, वहीं राजनीति संस्कृति का नुकसान किये बगैर आगे नहीं बढ़ती। पतनशीलता के ऐसे दौर में अभिधा से काम चल ही नहीं सकता। इसीलिये जब शब्द कम पड़ने लगते हैं तब शब्दों को मारना पड़ता है ताकि नये शब्द जन्म ले सकें। यह विचार अणुव्रत विश्‍व भारती राजसमन्द में पुरस्कृत साहित्यकार असग़र वजाहत ने आचार्य निरंजननाथ स्मृति सेवा संस्थान तथा साहित्यिक पत्रिका ‘संबोधन’ द्वारा 9 दिसम्‍बर 2012 को आयोजित अखिल भारतीय सम्मान समारोह में व्यक्त किये।

कार्यक्रम का शुभारम्भ माल्यार्पण, गोपाल कृष्ण खंडेलवाल की सरस्वती वन्दना, शेख अब्दुल हमीद की गजल तथा मधुसूदन पांड्या के स्वागत भाषण से हुआ। सम्मान समिति के संयोजक क़मर मेवाड़ी ने आचार्य निरंजननाथ सम्मान की प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सम्मान का उद्देश्य आचार्य साहब के साहित्यिक अवदान को स्मरण करते हुए हिन्दी साहित्य की रचनात्मक ऊर्जा को रेखाँकित करना है।

मुख्य अतिथि विख्यात साहित्यकार एवं ‘समयांतर’ पत्रिका के सम्पादक पंकज बिष्ट ने कहा कि भारतीय समाज की उन आधारभूत विसंगतियों को असग़र वजाहत का लेखन सहजता से अभिव्यक्त करता है, जिन्हें हम जातिवाद, असमानता और दमन के रूप में जानते हैं। उनकी रचनाएं अपनी विषयवस्तु में ही नहीं बल्कि प्रस्तुतिकरण में भी भिन्न हैं। मुस्लिम समाज के बहाने उनकी रचनाएं साम्प्रदायिक और प्रतिक्रियावादी होते भारत पर गम्भीर टिप्पणी है। हिन्दी कहानी को नया मुहावरा देने वाले असग़र वजाहत के नाटक और फिल्म के क्षेत्र में दिये गये मौलिक योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

समारोह में असग़र वजाहत को उनके कहानी संग्रह ‘मैं हिन्दू हूँ’ , युवा आलोचक पल्लव को उनकी पुस्तक ‘ कहानी का लोकतंत्र’ तथा आलोचक डॉ. सूरज पालीवाल को उनके समग्र साहित्यिक अवदान के लिए मधुसूदन पांड्या ने शाल एवं श्रीफल, मुख्य अतिथि पंकज बिष्ट ने प्रशस्ति पत्र, राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष वेद व्यास ने प्रतीक चिह्न तथा सम्मान समिति के अध्यक्ष कर्नल देशबंधु आचार्य ने सम्मान राशि भेंट कर सम्मानित किया।

युवा आलोचक पल्लव ने अपने आलोचना कर्म को सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ते हुए कहा कि उनका लेखन लघु पत्रिकाओं का ही लेखन है। डॉ. सूरज पालीवाल ने अपनी रचना प्रक्रिया बताते हुए कहा कि अपने लोगों के बीच सम्मानित होना सबसे बड़ा सम्मान है। अध्यक्षता कर रहे वेद व्यास ने कहा कि आचार्य निरंजननाथ सम्मान ‘संबोधन’ जैसी लघु पत्रिका के माध्यम से दिया जाने वाला देश का सबसे बड़ा एवं प्रतिष्ठित पुरस्कार है। इस पुरस्कार के लिए कर्नल देशबंधु आचार्य की हिन्दे साहित्य के प्रति समर्पण की भावना अभिव्यक्त होती है।

समारोह में सदाशिव श्रोत्रिय, डॉ कनक जैन, हरिदास दीक्षित, त्रिलोकी मोहन पुरोहित, यमुना शंकर दशोरा, माधव नागदा, जीतमल कच्छारा, अफजल खाँ अफजल, बालकृष्ण गर्ग ‘बालक’, राधेश्याम सरावगी, नारुलाल बोहरा आदि की महत्वपूर्ण भागीदारी रही।

कार्यक्रम का संचालन नरेन्द्र निर्मल ने किया और कर्नल देशबंधु आचार्य ने भावी योजना पर प्रकाश डालते हुए सभी का आभार प्रकट किया।

प्रस्‍तुति : नरेन्द्र निर्मल

प्रति संसार की रचना : महेश चंद्र पुनेठा

युवा कवियित्री रेखा चमोली को हाल ही में ‘सूत्र सम्‍मान’ से सम्‍मानित किया गया है। कवि महेश चंद्र पुनेठा द्वारा लिखी गई उनके कविता संग्रह ‘पेड़ बनी स्‍त्री’ की भूमिका-

स्त्री मन की उधेड़बुन, बेचैनी, झुँझलाहट, खीज, आशा-आकांशा को जितनी गहराई और प्रमाणिकता से एक स्त्री की रचनाओं में जाना और महसूस किया जा सकता है शायद और कहीं नहीं। रचना में एक स्त्री अपने मन को पूरी तरह से उडे़ल कर रख देती है। स्त्री के विद्रोही मन की ऊँचाई और प्रेमी मन की गहराई का असली भान उसकी रचना में ही होता है। उसके लिये वास्तविक संसार में वह जो सम्‍भव नहीं उसे अपने कविता-संसार में सम्‍भव कर दिखाती है। एक ऐसे प्रति संसार की रचना करती है जो उसे पसंद है। रेखा की प्रस्तुत संग्रह की कविताएं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। ये कविताएं जितना एक स्त्री जीवन के बाह्य पक्ष के बारे में बताती हैं उससे ज्यादा उसके मन के बारे में। एक स्त्री अपने आसपास को किस तरह देखती है और आसपास की तमाम चीजें और घटनाएं उसके मन पर कैसा प्रभाव डालती हैं, यह इन कविताओं में दृष्टिगोचर होता है। इनके यहाँ प्रेम और विद्रोह दोनों है। वह अंधविश्‍वासों और रूढि़यों से मुठभेड़ करती हैं। चीजों को उसी रूप में नहीं स्वीकारती हैं जैसी पहले से चली आ रही हैं, बल्कि आलोचनात्मक विवेक का इस्तेमाल करते हुए जो उन्हें तर्क संगत लगता है उसे स्वीकार करती हैं। स्त्री के सम्मान और स्वाभिमान के साथ होने वाला कोई भी खिलवाड़ उन्हें बर्दाश्त नहीं है।

रेखा में अपनी बात को बेवाक रूप से कहने का साहस भी है और दृढ़ता भी। उनमें सामंती मूल्यों के प्रति गहरा आक्रोश है। वह उन्हें तोड़ना चाहती हैं। पुरूष प्रधान समाज में स्त्री के साथ होने वाले हर छल-छद्म से वह परिचित हैं। उसको अपनी कविताओं में निर्ममता से उघाड़ती हैं। ‘स्त्री पूजा’ के प्रपंच को वह अच्छी तरह जानती और समझती हैं इसलिए उसकी कोई परवाह नहीं करती हैं। उनकी स्पष्ट मान्यता है कि स्त्री पूजा उसको सम्मान देने के लिए नहीं, बल्कि सम्मान की खुशफहमी पैदा कर उसका मनमाफिक उपयोग करने की चालाक कोशिश है। महिमामंडित कर चुप कराने का षड्यंत्र है ताकि उसके भीतर किसी तरह का विद्रोह पैदा न होने पाए। उसको यह खुशफहमी रहे कि कोई बात नहीं, भले कितने ही दुःख-दर्द सहन करने पड़ें पर उसका सम्मान तो कायम है। लाज, प्रेम, दया,  क्षमा, त्याग, विनयशीलता, आज्ञाकारिता, समर्पण को स्त्री के गहने क्यों बताए गये हैं, इसको भी वह अच्छी तरह समझती हैं। वह मानती हैं कि जब स्त्री समाज के बनाए सामंती नियम-कानूनों और मूल्यों के बोझ से बाहर निकलेगी तभी सही अर्थों में उसकी मुक्ति सम्‍भव है।

रेखा की कविताओं में जगह-जगह स्त्री-मुक्ति की आकांक्षा पंख फड़फड़ाती हुई दिखाई देती है। उनकी स्त्री लकीरों से बाहर निकलकर अपना मनचाहा संसार रचना चाहती है, भले ही व्यवस्था को लकीर से बाहर जाना पसंद नहीं है। उनके यहाँ ‘उड़ान’ बीज शब्द के रूप में आता है जो मुक्ति का प्रतीक है। यह अच्छी बात है कि उनकी स्त्री के भीतर तमाम परेशानियों और जाल-जंजालों के बावजूद भी मुक्ति की आकांक्षा मरती नहीं है। वह उड़ना चाहती है। अपने पंखों को हमेशा तोलती रहती है। परिस्थितियों के सामने झुकती नहीं है बल्कि उससे टकराना चाहती है। उठ खड़ी होती है। निर्भीक होकर अपनी सहमति-असहमति व्यक्त करती है यह जानते हुए भी कि औरत की हर लड़ाई में उसकी देह को ही उसका दुश्मन बना दिया जाता है। फिर भी उनकी इच्छा है कि बेटियाँ खूब नाचें-गाएं, खेलें-कूदें जिससे गूँज उठें दसों-दिशाएं।

प्रकृति के विभिन्न उपादान इन कविताओं में बार-बार आते हैं। प्रकृति का आलंबन लेकर अपने दुःख-दर्द, हर्ष-उल्लास और आशा-आकांशा को व्यक्त करने का औरत का बहुत पुराना तरीका इन कविताओं में भी परिलक्षित होता है। सूरज, पेड़, बादल, बारिश, नदी, पहाड़, धूप, फूल-पत्ती आदि इन कविताओं में बहुत आते हैं। यह कवियित्री की प्रकृति से निकटता को बताती है। यहाँ इन सबका मानवीकरण कर दिया है। कवियित्री इनसे बतियाती है। अपने दुःख-दर्द उनको सुनाती है। स्त्री के दुःख इतने अधिक हैं कि फिर भी खत्म नहीं होते।

रेखा की कविताओं में प्रेम की गहरी एवं विलक्षण अनुभूति के दर्शन होते हैं। एक ऐसी परिस्थिति में जबकि घर-बाहर के काम के बोझ से दबी औरत के पास ‘प्यार-व्यार’ की बातों के लिए समय तक नहीं है उसमें रेखा का प्रेम कविताएं लिखना प्रीतकर लगता है। तमाम व्यस्तता और समस्याओं के बाद भी प्रेम के प्रति सम्मान का भाव है। उनकी कविताओं में आया प्रेम फिल्मी प्रेम नहीं, बल्कि जीवन का सबसे उद्दात भाव है जो मजबूती से थामे रखता है। जिसकी नमी, तरलता, हरापन बचाए रखती है आदमी होने के अहसास को। उनके लिए प्रेम मनुष्य होने का पर्याय है। वह मानती हैं कि प्रेम करना किसी लड़की के लिये  हथेली में गुलाब उगाने जैसा है जिसकी मीठी चुभन को तो छुपाया जा सकता है पर खुशबू को नहीं। प्रेम के सामने सामंती और पूँजीवादी मूल्यों के चलते आने वाले खतरों से भी रेखा वाकिफ हैं। ऑनर किलिंग जैसी घटनाओं पर वह व्यंग्य करती हैं कि ये सब घटनाएं उस देश में होती हैं जिसमें ‘राधा-कृष्ण’ की पूजा की जाती है। वह स्त्रियों को सलाह देती हैं- तुम जरूर करना प्रेम/पर ऐसा नहीं कि/जिससे प्रेम करना उसी में/ढूँढने लगना/आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप। अर्थात अपनी अस्मिता को बचाए रखना। वह इसके खिलाफ दिखती हैं कि प्रेम में अपने अस्तित्व को ही मिटा दिया जाय जैसे नदी सागर में मिलकर मिटा डालती है क्योंकि जब स्त्री बचे रहेगी तभी दुनिया का अस्तित्व भी बचा रहेगा। यह स्त्री अस्मिता के प्रति उनकी अतिरिक्त सजगता ही कही जाएगी।

इन कविताओं में ग्वाले, घसियारिनें, स्कूली बच्चे, खेतों में खरपतावार हटा-हटाकर थक गई बहू-बेटियाँ, दूर शहर गए आदमी के इंतजार में बैठी पहाड़ी स्त्री, सड़क किनारे खेलते नंग धड़ंग बच्चे, भीख मांगती मांएं भी दिखाई देते हैं। अपने आसपास की केवल प्रकृति पर ही नहीं बल्कि उसके बीच रह रहे श्रम करते लोगों पर भी रेखा का ध्यान बराबर जाता है। यह उनके अपने लोक और श्रम से संपृक्ति का प्रमाण है।

रेखा की कविताओं की खासियत है कि वह किसी बात को उलझाती नहीं हैं। भाषा के खेल के द्वारा कोई चमत्मकार पैदा करने की कोशिश नहीं करती हैं। बोलचाल के उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करती हैं जो उनके पास सहजता से उपलब्ध हैं। बिम्‍बों में अपनी बात कहती हैं पर उनके लिये भी कहीं दूर नहीं जाती हैं बस अपने आसपास से ही उठाती हैं। अपनी कोमल भावनाओं और रोजमर्रा के अनुभवों को अपनी कल्पनाशीलता से एक नया और मोहक रूप प्रदान कर देती हैं। उनकी बालसुलभ कल्पनाएं बहुत भाती हैं। प्रेम कविताओं में तो मानो उनकी कल्पनाशीलता को नये पंख लग जाते हैं।

रेखा की कविताएं पहाड़ी झरने की तरह हैं जो एक ओर देखने वाले को भीतर-बाहर से भिगोती हैं तो दूसरी ओर कठोर से कठोर चट्टानी भूमि को भी तोड़ केनन में बदल डालती हैं। फिर केनन पानी से लबालब भरकर हर पल तरंगायित होता रहता है। उसके छींटे आसपास फैलकर सभी को नम कर देते हैं। इन कविताओं को पढ़ने के बाद पाठक वह नहीं रह जाता है जो उससे पहले होता है। लगातार एक झरना उसके भीतर प्रवाहित होते रहता है। रेखा अपनी अद्भुत कल्पनाओं से उसे गुदगुदाते हुए एक नए लोक में ले जाती हैं जहाँ पहुँचते-पहुँचते उनके तीखे प्रश्‍न फिर उसे वास्तविक लोक में लौटा ला उससे जिरह करने लगते हैं। पाठक सोचने-विचारने को मजबूर हो जाता है और उन प्रश्‍नों के उत्तर तलाशने लगता है। तब उसे लगता है कि उसकी नजर जहाँ सब कुछ ठीक-ठाक देख रही थी वह वैसी नहीं है। चीजें बहुत गड़बड़ हैं। उनको सही करने की जरूरत है। इस तरह ये कविताएं हमें सचेत करती हैं। इन कविताओं को धैर्य से पढ़ने की आवश्यकता है।

किताब : पेड बनी स्‍त्री (कविता संग्रह)
कवियित्री : रेखा चमोली
मूल्‍य : 100 रुपये
प्रकाशक: बिनसर पब्लिकेशन कंपनी, 8 प्रथम तल 4, डिस्पेंसरी रोड देहरादून-248001

‘पेड़ बनी स्‍त्री’ से रेखा चमोली की कुछ कविताएं

कविता खुद में झाँकने को मजबूर करती है : रेखा चमोली

रेखा चमोली

मैं जिस जगह रहती हूँ वह एक छोटा सा सीमांत पहाड़ी जिला (उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड) है जो चीन की सीमा से लगा है। गंगा यहीं से निकलती है। एक तीर्थस्थल के रूप में इसका बहुत अधिक महत्व है। यहाँ का जनजीवन बहुत कठिन है। सर्दियों में जहां अत्यधिक ठंड पड़ने से पूरा क्षेत्र प्रभावित रहता है, वहीं बरसात में चार महीने की घनघोर बारिश से सारे रास्ते, सड़कें टूट जाने से यातायात अस्त-व्यस्त हो जाता है। इसी साल जुलाई में बादल फटने से आई बाढ़ में पूरा शहर लगभग दो माह तक बुरी तरह प्रभावित रहा। बहुत अधिक जनहानि हुई और आगे भी जाने कितने वर्ष इसको ठीक होने में लगेंगे। पहाड़ों से पलायन निरन्तर जारी है। घर-गाँव में बचे हैं तो सिर्फ बूढ़े,  महिलायें और बच्चे। वे ही पुरुष गाँव में हैं जो रोजगार की तलाश में बाहर नहीं जा पाये। खेती-किसानी मौसम की मेहरबानी पर ही टिकी हुई है।

नदियों पर बाँध बनाने की होड़ ने पहाड़ को जगह-जगह से छलनी कर दिया है। पिछले कुछ वर्षों से लगता है कभी न खत्म होने वाले निर्माण कार्यों के बीच ये अस्त-व्यस्त जनजीवन कभी पटरी पर आ भी पायेगा या नहीं।

महिलायें पहाड़ की रीढ़ हैं। घर, खेत, जंगल, जानवर सब इनके भरोसे हैं। अलसुबह से शुरू हुई इनकी दिनचर्या देर रात तक बेहद व्यस्त रहती है। बच्चे भी माँओ की यथासम्‍भव मदद करते रहते हैं। जंगल लगातार कम होने से पशुओं का चारा और लकड़ी लेने के लिए बहुत दूर जाना पड़ता है।

साहित्यिक दृष्टि से यह एक अनजाना-अनपहचाना स्थान है। इस छोटे से स्थान में आज भी पत्र-पत्रिकाओं की मात्र दो दुकाने हैं जहाँ साहित्यिक पत्रिकाएं मुश्किल से ही मिल पाती हैं। ऐसे में, अगर मैं वर्षों तक जिला पुस्तकालय की मोटी-मोटी किताबें बिना किसी दिशा या प्रयोजन के मात्र स्वांतः सुखाय पढ़ती रही तो कोई आश्चर्य नहीं। पर इन किताबों ने मुझे बहुत कुछ दिया। शायद इन्हीं किताबों का असर रहा होगा जिसने मुझे विद्रोही और सम्‍वेदनशील बनाया।

स्वाध्याय का यह संस्कार मुझे अपनी माँ से मिला जो आज भी अमिट हैं। समय के साथ उसकी छाप गहरी होती गई। मेरी माँ बहुत मेहनती व साहसी महिला हैं। वह नौकरी करतीं, घर परिवार सम्‍भालतीं और जब तमाम तरह की जिम्मेदारियों से निपट कर सोने जातीं तो कोई न कोई किताब उनके पास होती। वह बहुत सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त हैं। शायद इसीलिए मैं भी ऐसी बन पाई।

स्वाध्याय के साथ ही साहित्यक पत्र-पत्रिकाओं ने मेरे सोचने,  लिखने को काफी प्रभावित किया है। ‘कृति ओर’, ‘कथन’, ‘वागर्थ’, ‘सूत्र’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘उत्तरा’, ‘सर्वनाम’, ‘लोकगंगा’ जैसी पत्र-पत्रिकाएं पढ़कर लगा मेरे जैसे सोचने वाले बहुत से लोग इस दुनिया में हैं, जो चुपचाप अपना काम कर रहे हैं।

‘अपने-अपने राम’, ‘कोई तो’, ‘माँ’, ‘असली इंसान’, ‘तरूणाई का तराना’, ‘पहला अध्यापक’, ‘स्त्री उपेक्षिता’, ‘अन्या से अनन्या’, जैसी अनगिनत किताबों ने दुनिया को समझने के आयाम दिये। इन किताबों को पढ़ने के बाद मेरा खुद पर विश्वास बढ़ा, चीजों को जैसे हैं वैसे देखने के बजाय उनको नये अवलोकनों, तर्कों, संदर्भों के साथ जोड़कर देखना सीखा। नार्गाजुन, केदारनाथ अग्रवाल, विजेन्द्र, महाश्वेता देवी, चन्द्रकांत देवताले जैसे जमीन से जुड़े रचनाकारों ने मुझे हमेशा प्रेरित किया।

हमारे समाज में महिलायें आज भी एक अलग प्रजाति मानी जाती हैं। शिक्षा-संस्कृति और समाज में तमाम परिवर्तनों के बावजूद उनकी स्थिति में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया। वे घर की चार दीवारी से बाहर तो अवश्य आ गई हैं, पर सामाजिक-वर्जनाओं की दीवार से अभी तक बाहर नहीं निकल पाई हैं । आज भी उनके पास अपने जीवन के बारे में जरूरी निर्णय लेने की आजादी नहीं है। वे महिलायें जो पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं, परम्पराओं पर सवाल खड़े करती हैं, आलोचनाओं के निशाने पर आ जाती हैं। उनके अस्तित्व और स्वाभिमान पर चोट कर उनको दीन-हीन बनाने का प्रयास आज भी जारी है। घर-परिवार और समाज में अपने लिये उन्होंने जो थोड़ी सी टिकाऊ जमीन बनाई है वो उनके अदम्य जीवन शक्ति का परिणाम है। साहित्य ने हमेशा उनकी इस जीवन शक्ति को बढ़ाने और उसके बारे में समझ बनाने का काम किया है। मेरे जीवन में भी साहित्य की यही भूमिका रही।

जहाँ तक अपनी कविता की बात है- मेरी कविता उनकी कविता है जो सदा से हाशिये पर धकेले गये हैं। जिनके साथ हुए अमानवीय व्यवहार को ईश्वर की मर्जी, कर्मों का फल या ऐसा ही होता आया है मानकर सहज स्वीकार किया जाता है। भले ही वे कभी इन कविताओं को न पढ़ पायें, उनको पता भी न चले कि वे मेरी कविताओं के विषय हैं, फिर किसी कविता का विषय हो जाने से उन्हें क्या मिल जायेगा। बावजूद इसके मेरा विश्वास है कि इन टूटी-फूटी कविताओं की आवाजें अपना कुछ न कुछ असर तो दिखायेंगी। ये मानकर ही लिखती आई हूँ कवितायें। मेरा मानना है कि जीवन के अनुभवों और यथार्थ से उपजी जीवन जैसी कवितायें ही सच्ची कवितायें हैं। मेरी कविताओं में दुख, निराशा, अपमान,  हिंसा और असमानता की बाते हैं क्योंकि इन सब चीजों का अस्तित्व दुनिया में है। तब और ज्यादा है जब महिलायें या वंचित वर्ग परम्पराओं और व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े करके हल निकालने का प्रयास करते हैं। अच्छा सुंदर तो सबकुछ यथास्थिति स्वीकार करने में ही है। परिवर्तन की आहटों में, निर्माण की प्रक्रिया में उथलपुथल तो होगी ही। पीड़ा बिना कब नवनिर्माण होता है। मेरे लिए कविता ऑक्सीजन की तरह है। तो आत्मसम्मान और आत्मसंतोष के साथ अपने अस्तित्व की पहचान, अपनी आत्मा के प्रति जवाबदेही भी है। अगर मेरी कविता समानता, प्रेम, बराबरी, शांति और सम्मान से भरी दुनिया के निर्माण में रत्तीभर भी सहयोग कर पाती है तो मैं मानूँगी मेरा कविता कर्म सार्थक है। मात्र यश प्राप्ति के लिए कवि बनना मुझे मंजूर नहीं है।

कविता मेरी ताकत है। मुझे खुद में झाँकने को मजबूर करती है। मुझे खुद में सुधार लाने को उकसाती है। मुझे और अधिक मानवीय तथा संवेदनशील बनाती है। पर साथ ही मैं यह भी कहना चाहूँगी कि कवि भी आखिर एक मनुष्य है। इसी दुनिया में रहने वाला। दुनियादारी निभाता। अपने बाल-बच्चों के अस्तित्व की रक्षा करता। स्वाभाविक है कई बार परिस्थितियों के आगे बेबस भी हो जाता है। ऐसा मेरे साथ भी होता है पर मैं उससे टूटने के बजाय दुबारा डटकर खड़ी होने का पूरा प्रयास करती हूँ। दुबारा खड़े होने की यह ताकत मुझे कविता से ही मिलती है।

(युवा कवियित्री रेखा चमोली द्वारा ‘सूत्र सम्‍मान’ के दौरान दिया गया वक्‍तव्‍य)

मानसिकता भी बदलो : आशिमा

आशिमा

महिलाओं को लेकर समाज की दोहरी मानसिकता पर युवा लेखिका आशिमा का आलेख-

पूरा एक हफ्ता हो गया। गैंगरेप पीडिता की हालत में कोई खास सुधार नहीं है, लेकिन उसके जज्बे और हौसले का सलाम जो उसको जीवन दे रहा है। जन आक्रोश के दबाव में एसआइटी और फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन को लेकर सरकार गम्‍भीर हुई है। साथ ही बलात्कार जैसे अपराधों को अंजाम देने वालों की सजा को कड़े से कड़ा बनाने पर भी विचार किया जा रहा है।

आरोपी पुलिस गिरफ्त में हैं। मामला कानून की चौखट तक आ पहुँचा है। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि न्यायिक प्रक्रिया में देरी नहीं होगी। जनता और मीडिया का दबाव बना तो यह हुआ वरना ऐसे अनेक वारदातों में तो मामला दर्ज तक नहीं होता।

आक्रोशित लोग सामूहिक बलात्कार के अभियुक्तों के लिए फाँसी की सजा की माँग कर रहे हैं। पर इस तरह की दूसरे मामलों का क्या होगा? उन पर कोई बात नहीं हो रही है। आज लोगों को गैगरेप के छह रेपिस्ट ही नजर आ रहे हैं। पिछले सभी रेप केस लोग भूल गए लगते हैं। तो क्या कुछ दिनों में इस केस को भी लोग भूल जाएंगे?

सभी इस बात से वाकि़फ़ हैं कि महिलाओं से संबंधित अपराधों में बढ़ोतरी हुई है। प्रतिदिन अखबार या न्यूज चैनल इस तरह की खबरों से भरे पड़े रहते हैं। तब चेतना कहाँ गायब थी, जब यही लोग ऐसी खबरों को अनदेखा कर पन्ने पलट लिया करते थे? दिल्‍ली गैंगरेप मामले में लोगों को एक और घिनौना चेहरा सामने आया है। जब पीडि़ता और उसके मित्र को घायल अवस्‍था में रात को दिल्ली की ठिठुरती सर्दी में निर्वस्त्र महिपालपुर की सड़क पर फेंका गया, तब किसी ने उनकी मदद नहीं की। यहाँ तक की कपडे़ तक नहीं दिए।

बालीबुड की एक सुपरहिट फिल्‍म में बलात्कार शब्‍द को मजाक के रूप में पेश किया गया था। इस पर लोगों ने खूब ठहाके भी लगाए थे। उसी सीन में नारी के शरीर के अंग को लेकर कॉमेडी की गई थी। डर लगता है कि हम आज अचानक ऊँची आवाजों के साथ सड़कों पर आकर और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर मामले की गम्‍भीरता पर अपडेट या शेयर करके कहीं अपने ही आप को धोखा तो नहीं दे रहे?

हर दिन विज्ञापनों से लेकर सड़क चलती लड़कियों पर कसे जाने वाले कमेंट्स तक पर महिलाओं को केवल एक वस्‍तु के रूप में देखे जाने की प्रवृत्ति सामने आ रही है। इस पर कोई ध्‍यान नहीं दे रहा है। जो आइटम सांग जितना महिलाओं को कामाडिटी की तरह पेश करे, वही सबसे ज्यादा हिट भी हो रहा है। कोई पोर्न स्टार भारत आती है तो सबसे ज्यादा सर्च किये जाने वाली सिलेब्रिटी बन जाती है। किस बीमार मानसिकता में जी रहे हैं हम।

रेप जैसे मामलों पर लगाम कसने के लिए लड़कियों को नहीं, लड़कों को पाठ पढ़ाये जाने की जरूरत है। कानून के खौफ से ज्यादा पुरुष मानसिकता और उसे जन्म देने वाली स्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए। आखिर चंद पुरुष महिला के प्रति वहशी कैसे हो जाते हैं?  महिला को पढ़े-लिखे और ज्यादा काबिल होने के बावजूद पुरुष के सामने कम ही क्‍यों आँका और परखा जाता है?  किसी भी क्षेत्र में अपनी जगह बनाने के लिए लड़के से कहीं ज्यादा लड़कियों को जद्दोजहद क्‍यों करनी पड़ती है?  उनके रास्‍ते में रुकावटें डाली जाती हैं और कदम-कदम पर उन्‍हें पुरुष मानसिकता का सामना करना पड़ता है।

लड़का यदि देर शाम घर आने की बात करे तो अभिभावक को कोई बहुत बड़ा प्रश्‍न उसका इंतजार नहीं करेगा। यदि यही बात लड़की करे तो दस तरह के सवालों का उसे सामना करना होगा। कई तरह की बंदिशें उस पर लगा दी जाएंगी। अभिभावक भले ही इसे उसकी सुरक्षा के लिए जरूरी बताते हैं  और इसे सही मान भी लिया जाये तो यह स्थिति चिंताजनक है। जरूरत महिलाओं को पूर्ण सुरक्षा देने और उन्‍हें स्‍वस्‍थ और स्‍वतंत्र माहौल उपलब्‍ध कराने की है। जरूरत इस बात की भी है कि अभिभावक अपने बेटों को अहसास कराएं कि ‘बेटा लड़कियाँ भी आप लड़कों की ही तरह बराबर की इनसान हैं। उन्हें बराबरी का समझें और बराबरी का दर्जा दें।’

न्याय के साथ आजादी भी चाहिए : एपवा

नई दिल्ली : एपवा, आइसा-इनौस, एक्टू और जन संस्कृति मंच ने 23 दिसंबर 2012 को बलात्कार और दमन के खिलाफ राष्ट्रीय शर्म दिवस मनाया। प्रदर्शनकारियों को इंडिया गेट न पहुँचने देने की तमाम कोशिशों के बावजूद निजामुद्दीन गोलंबर से जुलूस निकालकर वे बैरिकेट को तोड़ते हुए इंडिया गेट पहुँचे और वहाँ सभा की। यह प्रदर्शन बिल्कुल शांतिपूर्ण था और महिलाओं की आजादी और सुरक्षा की माँग कर रहा था। विवाह, परिवार, जाति, सम्‍प्रदाय की आड़ में किये जाने वाले बलात्कार और सुरक्षा बलों द्वारा किये जा रहे बलात्कार और इज्जत के नाम पर की जाने वाली हत्याओं के खिलाफ संसद का विशेष सत्र बुलाकर एक प्रभावी कानून बनाने की भी माँग की गर्इ। बलात्कार के मामलों में सजा की दर कम होने पर भी सवाल उठाया गया तथा सभी दोषियों की सजा सुनिश्चित करने की माँग की गर्इ। आदिवासी सोनी सोढ़ी के गुप्तांग में पत्थर भरने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ भी कार्रवार्इ की माँग की गर्इ। देश में सामंती-जातिवादी और साम्‍प्रदायिक शक्तियों द्वारा किये जाने वाले बलात्कार के दोषियों को भी सजा की गारंटी हो, इस पर जोर दिया गया।

प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर इंडिया गेट पर आज के प्रदर्शन को बर्बरता से कुचलने का आरोप लगाया है और कहा है कि सरकार ने एक तरह से अघोषित इमरजेंसी लागू कर दी है। लोग इंडिया गेट न पहुँच पाएं, इसके लिए उसने  हरसम्‍भव कोशिश की। इसके बावजूद जो लोग वहाँ पहुँचकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, उनके खिलाफ पुलिस लगातार उकसावे की कार्रवार्इ करती रही। बिना किसी उग्र प्रदर्शन के उसने आँसू गैस छोड़ने की शुरुआत की। पुलिस ने जिस तरह उपद्रवियों का बहाना बनाकर महिलाओं और निहत्थे लोगों तक पर लाठियाँ बरसार्इ हैं, पानी की बौछार की है, लगातार आँसू गैस के गोले छोड़े हैं, वह सरकार के तानाशाहीपूर्ण और अलोकतांत्रिक रवैये का उदाहरण है। पुलिस ने साजिशपूर्ण तरीके से शांतिपूर्ण आंदोलन के दमन का बहाना बनाया है, जिसकी जाँच होनी चाहिए। आज जिस तरह प्रदर्शनकारियों और आम जनता पर बर्बर हमला किया गया, जिस तरह पुलिस ने लड़कियों के साथ बदसलूकी की, पत्रकारों तक को नहीं बख्सा, वह बेहद शर्मनाक है। इससे स्त्री अधिकार से जुड़े सवालों और आम स्त्री के प्रति पुलिस और यूपीए सरकार की सम्‍वेदनहीनता का ही पता चलता है।

पुलिस का यह कहना कि हम गैंगरेप के आरोपियों के खिलाफ कार्रवार्इ कर रहे हैं, तो फिर आंदोलन क्यों किया जा रहा है, इस बात की ओर इशारा करता है  कि सरकार और प्रशासन चाहता है कि मामला इसी घटना तक ही सीमित रहे। लेकिन लोगों का गुस्सा इसलिए भी उमड़ रहा है कि अभी भी लगातार बलात्कार, छेड़छाड़ और उत्पीड़न की घटनाएं जारी हैं। समाचार पत्र ऐसी खबरों से भरे पड़े हैं। एपवा, आइसा, इनौस, एक्टू और जसम का प्रदर्शन सम्‍पूर्ण स्त्री विरोधी तंत्र  को बदलने की माँग को लेकर था, जिसमें सक्षम कानून बनाने से लेकर बलात्कार और हिंसा के मामले में न्यायपालिका, पुलिस, चिकित्सा आदि तमाम क्षेत्रों में आमूल चूल बदलाव की माँग शामिल थी। यौन हिंसा की तमाम प्रवृत्तियों को औचित्य प्रदान करने वाली प्रवृत्तियों और संस्कृति के अंत की माँग भी प्रदर्शनकारी कर रहे थे।

प्रदर्शन के दौरान सभाओं को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि इस गैंगरेप और बलात्कार, यौन हिंसा, उत्पीड़न के तमाम मामलों में तो न्याय चाहिए ही, कहीं भी किसी वक्त आने-जाने, अपने पसंद के कपड़े पहनने, जीवन के तमाम क्षेत्रों में बराबरी के अवसर और जीवन साथी को चुनने की आजादी भी होनी चाहिए। एपवा की ओर से कविता कृष्णन और आइसा की ओर सुचेता डे ने सभा को संबोधित किया। जसम की ओर से कवि मदन कश्यप, पत्रकार आनंद प्रधान, आशुतोष, सुधीर सुमन, मार्तंड, रवि प्रकाश, कपिल शर्मा, उदय शंकर, खालिद भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए। आइसा के ओम प्रसाद, अनमोल, फरहान, इनौस के असलम, एक्टू के संतोष राय, वीके एस गौतम, मथुरा पासवान समेत कर्इ नेताओं ने प्रदर्शन का नेतृत्व किया।