Archive for: November 2012

दुश्मन मेमना : ओमा शर्मा

कथाकार ओमा शर्मा को उनकी कहानी ‘दुश्‍मन मेमना’ के लिये इस वर्ष का ‘रमाकान्‍त स्‍मृति’ सम्‍मान दिया जा रहा है। 1 दिसम्‍बर 2012 को गाँधी शान्ति प्रतिष्‍ठान, दीनदयाल उपाध्‍याय मार्ग, नई दिल्‍ली में शाम 5:15 बजे से आयोजित समारोह में उन्‍हें यह सम्‍मान दिया जायेगा। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता कथाकार प्रभु जोशी करेंगे और मुख्‍य अतिथि होंगे कथाकार कान्तिमोहन। इस अवसर पर ओमा शर्मा की पुरस्‍कृत कहानी ‘दुश्‍मन मेमना’- 

वह पूरे इत्मीनान से सोयी पड़ी है। बगल में दबोचे सॉफ्ट तकिए पर सिर बेढंगा पड़ा है। आसमान की तरफ किए अधखुले मुँह से आगे वाले दाँतों की कतार झलक रही हैं। होंठ कुछ पपडा़ से गए हैं, साँस का कोई पता ठिकाना नहीं है। शरीर किसी  खरगोश के बच्चे की तरह मासूमियत से निर्जीव पड़ा है। मुड़ी-तुडी़  चादर का दो तिहाई हिस्सा बिस्तर से नीचे लटका पड़ा है। सुबह के साढ़े ग्यारह बज रहे हैं। हर छुट्टी के दिन की तरह वह यूँ सोयी पड़ी है जैसे उठना ही न हो। एक-दो बार मैंने दुलार से उसे ठेला भी है … समीरा, बेटा समीरा, चलो उठो … ब्रेक फास्ट इज़ रेडी …। मगर उसके कानों पर जूँ नहीं रेंगी है। उसके मुड़े हुए घुटनों के दूसरी तरफ खुली त्रिकोणीय खाड़ी में किसी ठग की तरह अलसाए पड़े कास्पर (पग) ने जरूर आँखें खोली हैं मगर कुछ बेशर्मी उस पर भी चढ़ आयी है। बिगाड़ा भी उसी का है।

वैसे वह सोती हुई ही अच्छी लगती है। उठ कर कुछ न कुछ ऐसा-वैसा जरूर करेगी जिससे अपना जी जलेगा। नाश्ते में पराँठे बने हों तो हबक देने की मुद्रा में यूँ ‘ऑक’ करेगी … कि नाश्ते में पराँठे कौन खाता है। दलिया; नो। पोहा; मुझे अच्छा नहीं लगता। सैण्डविच; रोज़ वही। उपमा; कुछ और नहीं है। मैगी; ओके।
‘‘मगर बेटा रोज वही नूडल्स।’’
‘‘तो ?’’
‘‘पेट खराब होता है।’’
‘‘मेरा होगा ना।’’
‘‘परेशानी तो हमें भी होगी।’’
‘‘आपको  क्यों  होगी ?’’
‘‘कल आपको मायग्रेन हुआ था ना।’’
‘‘तो ?’’
‘‘डॉक्टर ने मैदा, चॉकलेट, कॉफी के लिए मना किया है ना।’’
‘‘मैंने कॉफी कहाँ पी है?’’
‘‘नूडल्स तो मांग रही हो।’’
‘‘मम्मा!’’ वह चीखी।
‘‘इसमें मम्मा क्या करेगी?’’
‘‘पापा, व्हाइ आर यू सो इर्रिटेटिंग।’’

मैं इर्रिटेटिंग हूँ, यह बात अब मुझे परेशान नहीं करती है। नादान बच्चा है, उसकी बात का क्या। अकेला बच्चा है तो थोड़ा पैम्पर्ड है इसलिए और भी उसकी बातों का क्या।

वैसे उसकी बातें भी क्या खूब होती रही हैं। अभी तक।
हर चीज के बारे में जानना, हर बात के बारे में सवाल।
‘‘पापा हमारी स्किन के नीचे क्या होता है ?’’
‘‘खून।’’
‘‘उसके नीचे ?’’
‘‘हड्डी।’’
‘‘हड्डी माने ?’’
‘‘बोन।’’
‘‘और बोन के नीचे ?’’
‘‘कुछ नहीं।’’
‘‘स्किन को हटा देंगे तो क्या हो जायेगा ?’’
‘‘खून बहने लगेगा।’’
‘‘खून खत्म हो जाएगा तो क्या होगा ?’’
‘‘आपको बोन दिख जाएगी।’’
‘‘ उसको तो मैं खा जाऊँगी।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘कास्पर भी तो खाता है।’’
‘‘वो तो डॉग है।’’
‘‘पापा, वो डॉग नहीं है।’’
‘‘अच्छा, तो क्या है?’’
‘‘कास्पर।’’
‘‘कास्पर तो नाम है, जानवर तो …’’
‘‘ओ गॉड पापा, यू आर सो … ’’

उसकी यही  नॉनसेंस जिज्ञासाएं हर रात को सुलाए जाने से पूर्व अनिवार्य रूप से सुनाई जाने वाली कहानियों का पीछा करतीं। मुझे बस चरित्र पकड़ा दिये जाते – फॉक्स और मंकी; लैपर्ड, लायन और गोट; पैरट, कैट, एलिफैंट और भालू। भालू को छोड़कर सारे जानवरों को अंग्रेजी में ही पुकारे जाने की अपेक्षा और आदत। कहानी को कुछ मानदंडों पर खरा उतरना पड़ता। मसलन, उसके चरित्र कल्पना के स्तर पर कुछ भी उछल-कूद करें मगर वायवीय नहीं होने चाहिए, कथा जितना मर्जी मोड़-घुमाव खाए मगर एकसूत्रता होनी चाहिए, कहानी का गंतव्य चाहे न हो मगर मंतव्य होना चाहिए, वह रोचक होनी चाहिए और आख़िरी बात यह कि वह लम्बी तो होनी ही चाहिए।

आख़िरी शर्त पर तो मुझे हमेशा गच्चा खाने को मिलता जिसे जीत के उल्लास में उँघते हुए करवट बदल कर वह मुझे चलता कर देती।मगर अब!
अब तो कितनी बदल गयी है। कितनी तो घुन्ना हो गयी है।
कोई बात कहो तो या तो सुनेगी नहीं या सुनेगी भी तो अनसुने ढंग से।
‘‘आज स्कूल में क्या हुआ बेटा?’’मैं जबरन कुछ बर्फ पिघलाने की कोशिश में लगा हूँ।
‘‘कुछ नहीं।’’  उसका रूखा दो टूक जवाब।
‘‘कुछ तो हुआ होगा बच्चे !’’
‘‘अरे !, क्या होता ?’’
‘‘मिस बर्नीस की क्लास हुई थी ?’’
‘‘हाँ।’’
‘‘और मिस बालापुरिया की ?’’
‘‘हाँ, हुई थी।’’
‘‘क्या पढ़ाया उन्होंने ?’’
‘‘क्या पढ़ातीं ? वही अपना पोर्शन।’’
‘‘निकिता आयी थी।’’
‘‘आयी थी।’’
‘‘और अनामिका।’’
‘‘पापा, व्हाट डू यू वांट?’’ वह तंग आकर बोली।
‘‘जस्ट व्हाट्स हैपनिंग विद यू इन जनरल।’’
‘‘नथिंग, ओके।’’
‘‘आपके ग्रेड्स बहुत खराब हो रहे हैं बेटा।’’
‘‘दैट्स व्हाट यू वांट टू टॉक ?’’
‘‘नो दैट इज ऑलसो समथिंग आई वांट टू टॉक।’’
‘‘कितनी बार पापा ! कितनी बार !!’’
‘‘वो बात नहीं है, बात है कि तुम्हें हो क्या रहा है।’’
‘‘नथिंग।’’
‘‘तो फिर।’’
‘‘आई डोन्ट नो।’’
‘‘आई नो।’’

और वह तमककर दूसरे कमरे में चली गयी- मम्मी से मेरी शिकायत करने। मम्मी समीरा से आजिज़ आ चुकी है मगर ऐसे मौकों पर उसकी तरफदारी कर जाती है, मुख्यतः घर में शान्ति बनाए रखने की नीयत से वर्ना रिपोर्ट कार्ड या ओपन-डे के अलावा भी ऐसे नियमित मौके आते हैं जब उसे खून का घूँट पीकर रहना पड़ता है।

‘‘ट्यूटर के बावजूद पिछली बार मैथ्स में चालीस में से बारह लायी थी।
इस बार आठ हैं।’’
‘‘चलो, आगे मैथ्स नहीं करेगी।’’
‘‘ये आगे या अभी की बात नहीं है। जो क्लास में किया जा रहा है, किताब में है उसे पढ़ने-समझने की बात है।’’
‘‘ज्योग्राफी का भी वही हाल है।’’
‘‘क्या आठवीं की पढ़ाई इतनी मु्श्किल हो गयी है ?’’
‘‘आगे क्या करेगी ?’’
‘‘सबके बच्चे कुछ न कुछ कर लेते हैं, ये भी कर लेगी।’’
‘‘कैसे? सब इतना आसान है ?’’
‘‘इतना मत सोचा करो!’’
‘‘लड़की का पिता होकर मैं नहीं सोचूँगा तो कौन सोचेगा ? आगे कितना मुश्किल समय आने वाला है। अपने पैरों पर खड़े होने के लिए इसे कुछ तो करना पड़ेगा। हम हैं मगर हमेशा थोड़े रहेंगे। पता नहीं वे कौन माँ-बाप होते हैं जिनके बच्चे बोर्ड में टॉप करते हैं। आईआईटी-मेडिसन करते हैं। अखबारों में जिनके सचित्र गुणगान होते हैं।   यहाँ तो पास होने के लाले पड़ते हैं।’’
‘‘पास तो खैर हो जाती है।’’
‘‘हो जाती है, होम ट्यूशन्स के सहारे।’’
‘‘हमारे घरवालों को सरकारी स्कूल की फीस भारी लगती थी, यहाँ पब्लिक स्कूल में पढ़ते हुए होम ट्यू्शन्स के बिना गुजारा नहीं।’’
‘‘तुम उसके मामले को अपनी तरह से क्यों देखते हो ? व्हाई शुड योर अपब्रिंगिंग कास्ट शैडो ऑन हर लाइफ ?’’
मुझे निःशंक झिड़क दिया जाता है।

मैं स्वयं उस तरफ जाना नहीं चाहता मगर जिस तरह चीजें बिगड़ रही हैं, रहा भी नहीं जाता। ठीक है कि उसे सुख-सुविधाएं नसीब हैं मगर बिगड़े तो नहीं। उस दिन कैमिस्ट्री की मिस रोडरिक्स ने बुलवा लिया। एक जमाना था जब यह उनकी फेवरेट हुआ करती थी। उस दिन तो काट खाने को आ रही थी।

‘‘होम वर्क तो दूर, जर्नल तक पूरा नहीं करती है। क्लास में समीकरण-संतुलन खत्म हो गया है और यह आयरन का सिंबल ‘आई’ बना देती है। फिर आयोडिन कहाँ जाएगी?’’

मुझे समझाते हुए ही मीरा समझदार और संयमी लगती है। जब खुद भुगतती है तो या तो उस पर हाथ उठा देती है या कुछ देर चीख-पुकार मचाकर मेरी नाकामी और तटस्थता को फसाद की जड़ करार देते हुए  मुँह फुला लेती है। मैं तो रविवार के दिन बमुश्किल उसका कुछ देख पाता हूँ, रोजमर्रा में तो उसका काम मीरा ही सम्‍भालती है।

मगर मीरा भी कहाँ तक सम्‍भाले!

स्कूल तैयार होते समय  रोज जू्ते और  ज़ुर्राबों की खोज मचती है क्योंकि गये रोज स्कूल से  लौटकर बिना फीते खोले जू्तों को जो उतारा तो एक कहीं फेंका, दूसरा पता नहीं कहाँ। पानी की बोतल हर हफ्ते के हिसाब से छूटती है। डब्बावाला लगा रखा है कि बच्चे को ताजा़ खाना मिल जाये मगर उसकी भी कोई कदर नहीं। किताबों को तो कबाड़े की तरह रखती है। अपन सेकेन्ड-हैंड किताबों को भी अगले साल वालों को बढ़ा देते थे, ये नवम्बर-दिसम्बर तक नयी किताबों के चिथड़े उड़ा देती है जबकि उनके कवर बाजार से चढ़वाए जाते हैं। ये  कौन सा ग्लोबलाइजेशन है कि हर निजी और मामूली चीज को आउटसोर्स कर दो- पहले बदलाव मगर बाद में एक मजबूरी के तहत !

वह सब भी ठीक है मगर बच्चा पढ़ तो ले! ये मैडम तो स्कूल से  लौटकर घर में घुसी नहीं कि सीधे फेसबुक पर  ऐसे टूटती है जैसे देर से पेशाब का दबाव लगा हो और घंटों उसी पर लगी रहेगी। तब न खाने-पीने की सुध रहती है  और न सर्दी-गर्मी लगती है। लोगों के बच्चे होते हैं जो स्कूल से आते ही सब काम छोड़कर होमवर्क में जुट जाते हैं, टीवी तक नहीं देखते और एक हमारी है …। जब खराब नम्बरों से ही डर नहीं तो होमवर्क की क्या बिसात! मैं तो बस सुनता रहता हूँ कि इसके एक हजार से ज्यादा फेसबुक फ्रैंड्स हैं। एक दिन बिना लॉग आउट किए कंप्यूटर बन्द कर दिया होगा। मीरा ने जब उसे चालू किया तो पुराना एकाउंट रीस्टोर हो गया। क्या-क्या तो अजीबोगरीब फोटो डाल रखे हैं। टैक्नोलॉजी ने तीतर के हाथ बटेर पकड़ा दी है। पता नहीं कितने और कहाँ-कहाँ के तो लड़के दोस्त बना रखे हैं। इस उम्र के लड़के भेड़िए होते हैं इसलिए लड़कियों को ही सम्‍भल कर चलना होगा। मगर यह तो रत्ती भर नहीं सुनती है। मैं उसके पास जाकर बैठूँ भी तो खट से कंप्यूटर को मिनीमाइज कर देगी या एस्केप बटन दबा देगी। न बेस्ट का मतलब पता है, न फ्रैंड का मगर बेस्ट फ्रेंड दर्जन भर हैं। मैं कुछ समझाने-चेताने लग जाऊँ तो अपनी जरा सी ‘हो गया’ से मुझे झाड़ देगी। मुझे बहला-फुसलाकर एक ब्लैकबैरी हथिया लिया क्योंकि सभी फ्रैंड्स के पास वही है। मैंने सोचा इसके मन की मुराद पूरी हो जाएगी। अकेला बच्चा है, क्यों किसी चीज़ की कमी महसूस करे? आए दिन मोबाइलों के आकर्षक विज्ञापनों की कटिंग अपनी माँ को दिखाती थी। अक्सर मेरे मोबाइल को लेकर ही उलट-पुलट करती रहती थी, कुछ नहीं तो उस पर ‘ब्रिक्स’ या मेरे अजाने क्या-क्या गेम्स खेलती रहती।मगर आज तक हाथ मल रहा हूँ।उसके मोबाइल पर हर दम तो अब पासवर्ड का ताला जड़ा होता है। इसी से पता चलता है कि जरूर कुछ भद्दी हरकतों में शामिल होगी। सब कुछ पाक-साफ होता तो पासवर्ड की या उसके लिए इतना पजैसिव होनी की जरूरत क्यों पड़ती?

उस दिन मैं ड्राइंगरूम में अकेला बैठा आइपीएल का मैच देख रहा था कि मीरा मेरे पास आयी और चुप रहने का इशारा करके हौले से बैडरूम में ले गयी। समीरा सो चुकी थी। आज गलती से उसका मोबाइल डाइनिंग टेबल पर छूट गया था। सोते वक्त भी अमूमन वह उसे अपने तकिए के नीचे रखती है। साइलेन्ट मोड में। मुझे या मीरा को अधिकार नहीं है कि मोबाइल जैसी उसकी पर्सनल चीजों के बारे में ताक-झाँक या नुक्ताचीं करें। आखिर इससे हमको क्या वास्ता कि वह कब किससे क्या बात करती है? बीबीएम यानी ब्लैकबैरी मैसेन्जर सर्विस चालू करवा लिया है। जितने मर्जी मैसेज, फोटो या वीडियो भेजो। उस दिन के आए-गए सारे संदेश पढ़ने में आ गए। यकीन नहीं हुआ कि अपना बच्चा ऐसी भाषा लिखता है। एक लफ्ज़ की स्पैलिंग ठीक नहीं थी। वासप, लोल, बीटीडब्लू, ओएमजी, टीटीवाइएल और जेके की भरमार थी। मीरा ने बताया कि ये सब क्रमश: व्हाट्स अप, लाफ आउट लाउड, बाइ द वे, ओ माई गॉड, टॉक टू यू लेटर और जस्ट किडिंग के लघु रूप हैं। खैर यह सब तो चलो इस जैनरेशन की व्याकरण है मगर इसके अलावा जो लिखत-पढ़त थी उसे देखकर किसी को घटिया हिन्दी फिल्म के संवाद याद आ जाएं। पहले फरजा़न नाम का कोई लड़का रहा होगा जिसके साथ इसका नाम जुड़ा था। थोड़े दिन पहले उसे चलता कर दिया है। आजकल दो और पकड़ लिए हैं; साहिल और साराँश। फेसबुक की अपनी प्रोफाइल पिक्चर के बारे में उनसे जबरन टिप्पणियाँ मांगती हुई। आधी बातों के सूत्र तो चित्र-संकेतों (स्माइलीज़) में धंसे होते हैं तो वैसे ही कुछ पल्ले नहीं पड़ता। विषय के तौर पर हिन्दी–आवर मदर टंग, यू नो — बहुत बोरियत भरी फालतू और मुश्किल लगती हो लेकिन संदेशों की अदला-बदली के बीचों-बीच उसकी चुनिंदा देसी गालियों का प्रयोग सारे करते हैं। जैसे यह कोई फैशन या जमानेसाज़ होने की बात हो।

एक बार की बात है जब नवी-मुम्बई के रास्ते शायद मानर्खुद में किसी जगह सुअरों को ढूँढ़-ढूँढ़कर कुछ खाते देखा था। बस शुरू हो गयी।

‘‘पापा, पिग्स क्या खाते हैं ?’’
‘‘पॉटी।’’ मैंने एक नजर फिराकर स्टियरिंग पकड़े ही कहा।
‘‘छी! क्यों?’’ एसी गाड़ी में बैठे हुए ही उसने उल्टी करने की मुद्रा बनायी।
‘‘वो उनका खाना होती है … उसमें उनको बदबू नहीं आती है?’’
‘‘उस पॉटी को खाकर जो पॉटी करते हैं उसे भी खा जाते हैं?’’

इस पुत्री-पिता संवाद की एकमात्र गवाह श्रीमती मीरा जोशी ने ऐन इस बिन्दु पर अपनी सख्त़ आपत्ति दर्ज़ करते हुए ‘स्टॉप इट’ कहा तो कुछ पलों के लिए उसका सवाल एक नाजा़यज सन्नाटे में टंगा रहा।

‘‘नहीं।’’मैंने हौले से ‘ऑब्जैक्शन ओवररूल्ड’ की मुद्रा में जवाब दिया। ‘‘सूचनाधिकार के युग में मैडम आप सवालों से बच नहीं सकते। क्यों पापा ?’’

‘‘अरे, अपनी पॉटी कोई नहीं खाता। गूगल पर सर्च करके देखना- एनिमल्स हू ईट देअर ओन शिट- शायद होते भी हों …।’’ मैंने बात बिगड़ने से पहले बात को रफा-दफा किया।

कोई यकीन करेगा कि दो साल पहले तक ऐसी मासूम शरारती लड़की के भीतर अचानक क्या कचरा घुस गया है कि कुछ समझ में नहीं आ रहा है। कुछ बताती भी तो नहीं है… जैसे हम इस लायक ही न हों। माँ-बाप अभी न रोकें तो पूरा बिगड़ने में कितनी देर लगती है? पता नहीं और बिगड़ने को क्या रह गया है। मोबाइल के म्यूजिक में फ्लोरिडा, ब्रूनो मार्स, एमेनिम, रिहाना, एनरिके, जस्टिन बीवर, एकॉन और पता नहीं किन-किन फिरंगी रैंक-चन्दों को भर रखा है। जब देखो तब ईयर-प्लग चढ़ाए रहती है। बेबी, टुनाइट आयम लविंग यू, लिप्स लाइक शुगर, डीजे गॉट अस फालिंग इन लव अगेन, इफ यू आर सेक्सी एण्ड यू नो क्लैप योर हैंड्स को सुनने का मतलब क्या है। ज़रा कुछ बोलो तो कहती है इससे एकाग्रता बढ़ती है। एक दिन मैंने घेर-घार के पूछ लिया तो कहती है इनका कोई मतलब नहीं है। ये तो म्यूजिक है। कोई भला आदमी बताए तो मुझे कि इसमें काहे का म्यूजिक है? सारे गानों में वही एक-सा हो-हल्ला। कोई अल्फ़ाज नहीं जो दिल पर ठहरे। कोई सुर नहीं, सब शोर ही शोर।

और देखो, फिर भी किस धड़ल्ले से कह देती है कि जब मुझे कुछ अता-पता ही नहीं है तो फिर मैं ऐसी इर्रिटेटिंग बातें क्यों करता हूँ ?

सुबह की सैर पर रोज मिलने वाले एक परिचित बता रहे थे कि गये शुक्रवार की दोपहर को यह ‘ब्लू हैवन’ के लाउंज में किसी हमउम्र लड़के के साथ एक कोने में चाइनीज़ खा रही थी। मैंने घर पर पूछा तो मीरा ने बताया कि स्कूल से आने के बाद यह ‘क्रॉसवर्ड’ बुक स्टोर पर कुछ सहेलियों से मिलने की कहकर गयी थी। उसने वहाँ ड्रॉप भी किया था अब कहाँ ‘क्रॉसवर्ड’ और कहाँ ‘ब्लू हैवन’? जब घर से जाती है तो कतई नहीं चाहती कि हममें से कोई उसे फोन करे। करो तो अक्सर उठाएगी नहीं। बाद में मोबाइल के साइलेन्ट मोड या टैक्सी की खड़-खड़ का बहाना कर देगी।

अपनी तरफ से प्यार-पुचकार के खूब आजमाइश कर चुका हूँ मगर नतीजा ? वही ढाक के तीन पात। उस रोज़ बेचैनी के कारण नींद खुल गयी। बिना रोशनी किए समीरा के कमरे की तरफ गया तो देखता हूँ मैडम बीबीएम करने पर लगी हैं। रात के ढाई बजे! आग लग गई मेरे। रहा नहीं गया। बस हाथ उठने से रह गया। समझ में आ गया कि हम लोग के लाड़-प्यार का ही नतीजा है यह सब। पता नहीं रात में कब तक यह सब करती है तभी तो रोज़ सुबह उठने में आना-कानी करती है। बस, मैंने मोबाइल ले लिया। मगर इसकी हिमाकत तो देखो! कहती है मैं उसका मोबाइल नहीं देख सकता! क्यों ? टैल मी! व्हाट इज देअर इन दैट व्हिच आई- हर फादर- कैन नॉट सी ? मीरा बीच में आ गई सो उसे अपना कोड-लॉक डालने दिया। किस दबंगी से तो मुँह लग लेती है जबकि सेब काटने की अकल नहीं है। उस दिन काटा तो कलाई में चाकू घुसेड़ दिया।

मुझे एक डर यह भी लगता कि जिन लड़कों के साथ यह बीबीएम पर रहती है, उनसे कहीं स्कूल के बहाने मिलती-जुलती तो नहीं है ? इस उम्र का आकर्षण दिमाग खराब किए रहता है। मैंने कई दफा, स्कूल यूनिफॉर्म में, इसकी उम्र की लड़कियों को मरीन ड्राइव की पट्टी और आइनॉक्स के मॉर्निंग शोज़ से छूटते देखा है। कुछ समाजशास्त्री किस्म के लोग तो इन्हें ‘टीनेज कपल’ तक कहते हैं। इनके माँ-बाप यकीन करेंगे कि उनके पिद्दी से होनहार क्या गुल खिला रहे हैं ?सीक्रेट वीडियो कैमरे से रिकॉर्डिंग करके आए दिन एमएमएस सरक्युलेट होते रहते हैं। एक्सप्रैस में ही पिछले दिनों रिपोर्ट थी कि नवयुग पब्लिक स्कूल की वह लड़की जिसने नौवीं क्लास में लुढ़क जाने के बाद खुदकुशी कर ली थी, पोस्टमार्टम के बाद पता चला कि गर्भ से थी। वह भी तो अपने माँ-बाप का इकलौती बच्ची थी। उसके माँ-बाप ने भी हमारी तरह पैदाइश-परवरिश के चक्कर में डॉक्टरों की दौड़-धूप की होगी, बढिया  से स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए खूब ऊपर-नीचे हुए होंगे, स्कूल के ओपन डेज़ पर सब काम छोड़कर टाइगर मदर्स के बीच बारी आने पर क्लास टीचर के सामने किसी प्रविक्षार्थी की तरह डरे-सहमे पेश होते रहे होंगे, बुखार न उतरने या अज्ञात कारणों से पेचिस हो जाने पर दवाइयों के अलावा नजर उतारकर तसल्ली की साँस भरी होगी, मध्य रात्रि में उसके कमरे में हौले से रोशनी करके मच्छरों को चैक किया होगा…।

या फिर, इस दबड़ेनुमा फ्लैट में वे कभी सोच सकते थे कि वे कोई कुत्ता ( कास्पर को कुत्ता कहने में उन्हें समीरा के नाम का झटका लगा) भी पालना मंजूर होगा? जब कास्पर नहीं था, यानी तीन बरस पहले, तब हर गन्दे-शन्दे पिल्ले को खेलने के लिए उठा लाती। एक बादामी रंग की बिल्ली का छौना था जिसे उसकी माँ ने छोड़ दिया था या छूट गया था। उसे हमारे घर में शरण मिली। मगर तीन रोज़ में ही जब उसने सोफे के ऊपर, टेबल के नीचे और फ्रिज के पिछवाड़े को तरोताजा होने का ज़रिया बनाया तो मैंने भी हाथ खड़े कर दिए। दो दिन तक तो वह छौना दिखता रहा — कभी कार पार्किंग के पास तो कभी जैनसैट के पास । मगर तीसरे दिन वह नदारद था। किसी अभियान की तरह मुझे साथ लेकर उसकी ढुँढ़वायी मची।

‘‘छोड़ बेटा, लगता है उसे किसी जानवर ने मार खाया है।’’कोशिश नाकाम रहने पर मैंने उसे समझाया।
‘‘पापा, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वह एक रात में वह पूरी बिल्ली बन गया हो? मैंने उसी कलर की बिल्ली बाजू वाली बिल्डिंग में देखी है।’’
उसे किसी भी सूरत छौने का न होना या किसी जानवर द्वारा मार डालने का गल्प मंजूर नहीं था।
‘‘वो तो इतना छोटा था, उसे कोई क्यों मारेगा भला!’’
‘‘हाँ, यह तो हो सकता है। कई बार ऐसा हो जाता है। इस बार भी ऐसा ही हुआ है। अब घर चलें।’’ मुझे भरसक उसके साथ होना पड़ा।
इसी कोमल दीवानगी को देखकर ही तो कास्पर को लाना पड़ा। नामकरण के लिए भी कुछ मशक्कत नहीं करनी पड़ी क्योंकि महीने भर के जीव को पहली बार गोदी में दुलारते हुए उसके मुँह से निकला था – ‘पापा, काश इसके ‘पर’ होते, ये उड़ सकता! और नाम हो गया कास्पर !’
गूगल के परोसे सारे फिरंग नाम धरे रह गए।

मगर क्या हुआ ?

सिर्फ पागलों की तरह खेलने-पुचकारने के लिए है कास्पर। एक भी दिन उसे रिलीव कराने नहीं ले जाती है। अखबार में अक्सर पढ़ता हूँ कि पैट्स बहुत  बढ़िया स्ट्रैस बस्टर होते हैं। ख़ाक होते हैं। मेरा तो स्ट्रैस बढ़ता ही जा रहा है।

**                                        **

शाम को घर लौटा तो मीरा का मुँह कुछ ज्यादा ही उतरा हुआ था। थोड़े बहुत मूड स्विंग्स तो उसे होते ही रहते हैं तो पहले तो मैं चुप लगा गया। एक चुप्पी लाख सुख की तर्ज़ पर। औरतें किस बात पर कैसे रिएक्ट कर जाएं कोई बता सकता है? मगर कुछ देर बाद उसने खुद ही आढ़े-टेढ़़े रास्ते पकड़ने शुरू कर दिए।

‘‘आज इसके स्कूल गयी थी।’’ उसने यूँ कहा जैसे उस हवा के साथ अदावत हो जो मैं ढीठता से ले रहा था।

हवा में सन्नाटा था मगर यह सन्नाटा उस निस्तब्धता से हटकर था जो पति-पत्नी के खालिस अहमों की नीच टकराहट से किसी फाँस की तरह रह-रहकर चुभता है। समीरा का अजीबो गरीब ढंग से फिसलता रवैया अब हम दोनों का, शुक्र है, साझा उद्यम-सा बन गया है।

अपने दफ्तर के काम की थकान की ओट में रहकर मैंने उसकी बात पर कुछ नहीं कहा तो उसने जोड़ा, ‘‘गई नहीं, इसकी टीचर ने बुलाया था।’’

उसके कहे के आगे पीछे एक बोझिल निर्वात तना खड़ा था।
‘‘क्या हुआ ? कोई खास बात ?”
किसी डराती आशंका से मुठभेड़ की तैयारी में मेरा लरजता आत्मविश्‍वास जाग्रत सा होने लगा।
‘‘इट्स गैटिंग डेन्जरस।’’ उसकी भंगिमा पूर्ववत पथरीली थी।
‘‘व्हाट ? व्हाट हैपन्ड! क्या हुआ ?’’
‘‘इसने स्कूल में खुद को मारने की कोशिश की…’’
‘‘अच्छा, कैसे?’’बढ़ती बदहवासी तले मेरा तेवर तटस्थ होने लगा।
‘‘पैन की नोंक चुभाकर …’’

मेरे चेहरे से जब जिज्ञासा सूखकर बदरंग हो गयी तो उसने अलापना शुरू कर दिया… इतनी तो अच्छी टीचर है वह इसकी… कैमिस्ट्री की मिस उमा पॉल बर्नीस। यूपीबी। कुछ दिन पहले तक वह इसकी फेवरेट थी। अब इसकी दुश्मन हो गयी है। और होगी क्यों नहीं? दो-चार बिगड़ैल लड़कियों के साथ पीछे की सीटों पर बैठकर ये गन्दी-गन्दी पर्चियाँ पास करते थे। आज टीचर ने पकड़ लिया। सबसे ज्यादा इसकी लिखावट में मिलीं ! मैंने खुद अपनी आँखों से देखी हैं। टीचर का नाम ‘अगली पगली बिच’ कर रखा था। बतौज सजा़ इसे क्लास के बाहर पाँच मिनट खड़ा कर दिया। दो और लड़कियाँ थीं । कौन बर्दाश्त करता ? इसमें इसे बड़ी हेठी लगी। बस, अन्दर आने के बाद अपनी हथेली पंक्चर कर ली। डेस्क पर खून की धार गिरी तो हल्ला मचा। मिस बर्नीस घबरा गईं और मुझे फोन करके बुलवाया। मैंने टीचर से माफी माँगी और रियायत माँगकर इसे घर ले आयी। घबरायी हुई थी या क्या मगर इसका शरीर तप रहा था सो मैंने एक क्रोशिन देकर सुला दिया। तब से ही सोई पड़ी है। तुम मत कुछ कहना।

अवसन्न सा होकर मैं मीरा को देखता हूँ। उसके होंठ खुश्क हुए जा रहे थे। पिछले दिनों लगातार तनावग्रस्त रहने से उसके भीतर का सब कुछ निचुड़ सा गया है। कब से वह खुलकर नहीं हँसी होगी। कभी ये तो कभी वो, कोई न कोई पचड़ा लगा रहता है। इस हालत में वह बोतल से जल्दी-जल्दी पानी के घूँट ऐसे निगलती है कि लगता है, बोतल डरावनी हिचकियाँ ले रही है। एक बोझिल अवसाद किसी घुलनशील द्रव्य की तरह उसकी शिराओं में उतर गया लगता है। हम दोनों के बीच इन दिनों एक मृतप्राय निष्क्रियता घर किए बैठी रहती है।

मुझे पता है कि इस समय उसका मनोबल बढ़ाते हुए मैंने उसे सहला सा दिया तो वह ढहने लग पड़ेगी। इसलिए ऊपरी तौर पर ही उकसाता हूँ।

‘‘इन टीचर्स को तो बात का बतंगड़ करने में मज़ा आता है। माँ-बाप की परेड निकालने में चुस्की लगती है। इसकी उम्र के सारे बच्चे शरारती होते हैं और जो नहीं होते हैं तो उन्हें डॉक्टर को दिखाना चाहिए। रैदर दैन बीइंग ए स्पोर्ट दे आर देअर ऑनली टू किल द फ्लैम-बॉएंस ऑफ चिल्ड्रन। और ये सब उस स्कूल का हाल है व्हिच इज़ सपोज्ड टू बी अमंग द बेस्ट इन मुम्बई। पिटी। बाइ द वे, आज डिनर में क्या है ?’’

गृहस्थी का मेरा यह पंद्रह साल का अनुभव है कि खाने-पीने के स्तर पर उतरते ही बहुत सारे छुटपुट मसले अपने आप हवा हो जाते हैं।

मगर मेरे इस प्रोप-अप से वह किंचित और जड़वत हो जाती है और पास में रखी समीरा की नोटबुक का आखिरी पन्ना खोलकर मेरी तरफ बढ़ा देती है।

‘‘व्हाट !’’
‘‘सुसाइड नोट !!’’
एक सदमा किसी संगीन सा मुझमें खूब गया है।

आधा भरा हुआ पेज। उपनाम सहित ऊपर एक तरफ लिखा हुआ पूरा नाम। दूसरे कोने में साल सहित लिखी जन्मतिथि। उसके समांतर ठीक नीचे डेट ऑफ डैथ, जिसके सामने हाइफन लगाकर सिर्फ वर्ष लिखा है – वही जो चल रहा है। बस, ‘फैसले’ के दिन की तारीख भरी जानी है। दो-तीन जगह शब्दों की मामूली काटपीट वर्ना सब कुछ एक उम्दा कम्पोजीशन की तरह सोच समझकर लिखा गया पर्चाः

मैं जीना चाहती थी। मैंने कोशिश भी करी मगर मैं हार गई। क्या फायदा ऐसे जीकर जिसमें आप अपनी मर्जी से जी नहीं सकते। मेरे पापा को तो कभी मुझसे जादा मतलब रहा नहीं। मम्मी भी वैसी हो गई है। सेल्फ ऑबसैस्ड। दोनों को मेरी किसी खुसी से मतलब नहीं। मोबाइल तक छीन लिया। मैं दोस्तों के यहाँ स्लीपओवर के लिए नहीं जा सकती हूँ। उन सबको कितनी फ्रीडम है। मुझे तो बस पढ़ाईपढ़ाई करनी होती है। पढ़ाई से मुझे चिढ़ है। मगर किसी को उसकी परवा नहीं। मैं जानती हूँ कि ये सब जान लेने की पूरी वजह नहीं है मगर मेरे पास जीने की भी तो वजह नहीं है। अनामिका, यू आर माई BFF। आई विल मिस कास्पर।

पढ़ते पढ़ते मेरे भीतर हाहाकार मचता एक दृश्य उभर रहा है … पहले उसके कमरे के दरवाजे पर समीरा-समीरा नाम की घनघोर तड़ातड़ थापें, फिर पूरी वहशत के साथ दरवाजे को धक्के से तोड़ना, बिस्तर के पास औंधी पड़ी कुर्सी, कमरे के बीचों बीच सीलिंग  फैन से स्थिर लटका उसका कोमल बेजान शरीर, बेकाबू होकर सिर पटकती दहाड़ मारती मीरा, मिलने वालों का जमघट, … पुलिस… पोस्टमार्टम…

‘‘ड्राफ्टिंग तो अच्छी है … कितनी कम गलती हैं।’’

एक चुहुल के साथ जैसे मैं उस भयानक दुःस्वप्न से उबरने की चेष्टा करता हूँ। सहारे के लिए मीरा की तरफ फीकी मुस्कान छोड़ता हूँ मगर सब बेअसर।

उसकी आँखों में एक गहरा निष्ठुर अजनबीपन तिर आया है। जीवन के हासिल को जैसे कोई बेधमके चट कर गया हो। किसी पहाड़ी ढलान से उतरती गाड़ी के जैसे ब्रेक फेल हो गए हों और सामने एक डरावने, चिंघाड़ते अंधेरे के सिवा कुछ बचा ही न हो …क्या कोई जीवन इतनी बेवजह, कोई चेतावनी या मौका दिये बगैर इतनी आसानी से नष्ट किया जा सकता है? और क्यों …?

‘‘सारी टीचर्स और क्लास को इसने डिक्लेयर कर रखा है इसके बारे में … ’’
वह अपनी मुदर्नी के भीतर से किसी कड़वे गिले की उल्टी करने को हो आई है।
मेरी बोलती बन्द है।

‘‘जिस रोज़ तुमने इसका मोबाइल लिया था उस रात भी इसने किचिन में कलाई काटने की कोशिश की थी जिसे सेब काटते वक्त लगे कट का नाम दे दिया …’’

उसका अवसाद किसी आवेग मिश्रित उबाल की शक्ल लेने को है।

‘‘आई डोंट बिलीव दिस … ऐसा कैसे हो सकता है …’’

पहली दफा मैं मामले की संगीनियत महसूस कर रहा हूँ … सामने कोंचते मनहूस घिनौने तथ्यों के कारण भी और अपने यकीन के बेसहारा और तिलमिलाकर अपदस्थ होने के कारण भी।

‘‘हाथ कंगन को आरसी क्या’’ अधूरा मुहावरा कहकर वह मुझे सोती पड़ी समीरा के पास ले जाती है और हथेली को हौले से खोलकर वह बिन्दु दिखाती है जो एक बुजदिल कोशिश का सरासर प्रमाण है।

यानी उस नामालूम रोज़- और आज नीमरोज़- यह हुआ नहीं मगर बा-खूब हो सकता था कि आप अपने जीवन की चकरघिन्नी में शामिल होने के लिए आदतन अल्साए उठते और ‘ब्लैड टू डैथ’ जैसे डॉक्टरी निष्कर्ष तले जिन्दगी भर के लिए हाथ मलते रह जाते।

गॉश!

‘‘मैं पता करके एक काउंसलर से आज मिल भी आई। उसके मुताबिक मामला सीरियस है। हम कोई और चाँस नहीं ले सकते हैं …’’

यानी जो चीज पहले टल गयी, आज टल गई, वह हो सकता है कल न टल पाए!

मैं एक आवेग से भर उठता हूं।

‘‘कोई मुझे बताए तो सही कि हम क्या जुल्म करते हैं इस पर ! स्कूल के दिनों को छोड़ मैडम अपनी मर्जी से दोपहर तक उठती हैं। रात को सोने से पहले ब्रश करना आज तक गवारा नहीं हुआ है। नतीजा, हर महीने दाँतों में कोई न कोई कैविटी लगानी-बदलवानी पड़ती है। उठते ही नैट और फेसबुक। मोबाइल तक में फेसबुक एलर्ट्स हैं। पहले बास्केटबॉल या साइकिलिंग तो कर लेती थी लेकिन अब वह भी नहीं। गेम्स के नाम पर नैट या फिर रोडीज़। हर किताब और खाना बोरिंग लगता है। टॉयलेट जाने का कोई नियम-क्रम आज तक नहीं बना। मैं तो कहता हूँ वह सब भी ठीक है। कर लो। मगर यह क्या कि स्कूल के जर्नल तक को पूरा करने की फुर्सत नहीं है आपको। फिसड्डी होते चलने जाने का अफसोस तो दूर, अहसास तक नहीं है। एक हमारा टाइम था जब हमारे बाप को ये तक पता नहीं होता था कि पढ़ कौन सी क्लास में रहे हैं … सबजैक्ट्स क्या ले रखे हैं …’’

‘‘सत्या, प्लीज। डोंट गैट इनटू दैट। तुम अपने टाइम से औरों को जज (मतलब हाँकने से है) नहीं कर सकते…’’

वह अपनी पस्त मानसिकता में रहते हुए भी एक परिचित गर्म नश्तर मेरे पनपते गुस्से पर रख देती है। वैसे सही बात तो यह है कि समीरा को लेकर जितनी दौड़-भाग, मेहनत-मशक्कत वह करती है, मैं नहीं। परिवार बड़ा था इसलिए बँटवारे में जो हिस्सा मिला उससे अपनी स्वतंत्र जिन्दगी नहीं चल सकती थी इसलिए अपना काम शुरू किया। काम एकदम नया। अनिलिस्टिड कंपनियों के शेयर बेचने का … वे जो दसियों बरस से धन्धा तो कर रही हैं मगर जिनकी बेलैंस शीट को देखकर बैंकों और आम निवेशकों के मुँह में पानी नहीं आता है … जो अपने ईवेंट मैनेजेर अफोर्ड नहीं कर सकती हैं … कोई उड़ीसा में बॉक्साइट का उत्खनन करती है तो कोई उत्तरांचल में छोटे स्तर पर पन बिजली बना रही है। ज्यादातर कैश स्टार्व्ड इकाइयाँ। बड़ा काम नहीं है मगर आज बाँद्रा में सिर ढँकने को अपनी छत है। रात का खाना रोज़ घर पर होता है। किसके लिए किया यह सब? स्टेट बैंक की चाकरी में या तो मैनेजरी में फँसा रहता या आए रोज ‘रूरल’ कर रहा होता। मीरा क्या जानती नहीं है यह सब। बैंकों के डेबिट-क्रेडिट में चौदह साल खटाए हैं उसने। तीन साल पहले वी.आर.एस. लिया … कि समीरा पर पूरा ध्यान देगी। दिया भी खूब। कभी अलाँ-फलाँ कम्पाउंड की वेलेंसी निकालने का तरीका समझ-समझा रही है तो कभी फैक्टराइजेशन में जान झोंके पड़ी हैं;  कभी ऑस्ट्रेलिया में होने वाली बारिश और मिट्टी के वर्गीकरण की सफाई कर रही है तो कभी सवाना की जलवायु को फींच रही होती है।

‘‘अपने टाइम से जज नहीं करूँ तो क्या इसके टाइम से जज करूँ ? गाँव देहात तक के बच्चे एक से एक इंजीनियरिंग-मैनेजमेंट में जा रहे हैं, बिना किसी खानदानी सहारे के नौजवान लड़की-लड़के एक-एक विचार को तकनीकी में पिरोकर नए-नए उद्यम खड़ा कर दे रहे हैं … बिना मेहनत के हो रहा है यह सब … बिल गेट्स और आइंसटीन की नजीरों से सांत्वना लेनी है तो बस यही कि उन्होंने भी अपने स्कूलों में कोई किला फतह नहीं किया … हद है …’’

‘‘सत्या लिसिन।’’ जरा रुक वह फिर बोली, ‘‘अभी यह सब कहने-सोचने का वक्त नहीं है। अभी तो हमें बस यह देखना है कि कैसे यह रास्ते पर आ जाए … आए रोज़ तरह-तरह की खबरें पढ़कर आजकल मेरा तो कलेजा बैठने लगा है।’’

मुझे अपनी गलती का अहसास होता है।

कितने कम लफ्जों के सहारे दर्द और परवाह अपने गंतव्य पर जा लगते हैं!

कल-परसों ही तो खबर थी… भारत में खुदकुशी करने वाले बच्चों-विद्यार्थियों की तादाद पिछले पाँच बरसों में दो गुनी हो गयी है। अकेली मुम्बई में हर वर्ष सौ से ज्यादा स्कूली बच्चे अपनी जान ले लेते हैं। किसी विषय या क्लास में नहीं हुए पास तो जीवन समाप्त! डेढ़ करोड़ की आबादी के महानगर में सौ की संख्या मायने न रखती हो मगर सोचो, सौ से ज्यादा परिवारों पर हर वर्ष क्या बीतती होगी? भोली,खिलखिलाती मासूम तस्वीरों के नीचे अखबार के श्रद्धांजलि वाले पन्ने पर, कैसी टीस भरती, हाथ मलती ऋचाएं सिरायी जाती है! कैसे अनवर्त्य(इर्रिवरसिबल) ढंग से कुछ जिन्दगियाँ हमेशा के लिए बदल जाती हैं! आसमान तोड़ आर्तनादों को भी सांख्यकी कितनी अन्यमनस्कता से अनसुना रख छोड़ती है!

क्या हम भी उन्हीं में शामिल होने की कगार पर हैं?

मैं समीरा के पास जाकर हौले से लेट जाता हूँ। कुछ बरस पहले उसे लुभाने का मेरे पास एक रामबाण था- उसकी कमर खुजला कर।
‘‘पापा खुजली नहीं हो रही थी … आप करने लगे तो होने लगी। क्यों ?’’  किसी सुकून से लबरेज़ होकर वह कह उठती।
‘‘ये पापा का जादू है।’’
किसी अपने को सुख देना भी कितना सुख देता है।
‘‘बताओ ना पापा, क्यों ?’’
‘‘अरे तुम ‘टेल मी व्हाई’ में देख लेना …. इट्स पापाज़़ मैजिक …’’
ऐसी कौतुक जीतें मुझे वास्तविक आह्लाद से भर जातीं।
मगर इन दिनों उसके ऊपर मनुहार का हाथ भी मैं तभी रख पाता हूँ जब वह बेसुध सो रही हो वर्ना नीमहोशी में भी वह ‘‘पापा डोंट इर्रिटेट मी’’ की चीख से मुझे दफा़ कर देती है।
आज भी कर दिया।
मगर उसकी दुत्कार को जज्ब़ करने के मेरे नजरिए में फर्क़ था।
थोड़ी देर बाद वह उठती है और बिना कुछ बोले बाहर सोफे पर जाकर लेट जाती है।
मैं मीरा से उसकी पसन्द के सारे वाहियात खाने- नूडल्स-बर्गर वगैरा बनाने की ताकी़द करता हूँ।
मीरा ने पहले ही पास्ता बना रखा है।

**                                        **

हम दोनों मनोचिकित्सक डॉक्टर अशोक बैंकर के केबिन के बाहर इन्तजार में बैठे हैं। समीरा केबिन के अन्दर है। हम तीनों को साथ अन्दर देखकर शायद वे भाँप गए थे कि मामला क्या है।क्या सचमुच?

‘‘समीरा … आह, योर नेम इज सो लवली … लाइक यू … किसने रखा ?“ मुस्कान छिड़कते हुए वे चहके।

‘‘मम्मा ने।’’ समीरा सकुचाते हुए फुसफुसाती है।

‘‘सिर्फ मम्मा ने … पापा ने नहीं?’’ जोश के साथ वह हाजिर जवाबी दिखाते हैं। अस्पताल में घुसने और एपॉइंटमेंट के बावजूद इन्तजार करने से आ चिपकी ऊबासी को उन्होंने मिलते ही झाड़-पोंछ़ दिया … जैसे किसी छतनार वृक्ष के नीचे से गुजरते हुए भी ठंडक महसूस होती है। निमिष भर को मुझे इसकी पैदाइश के बाद का वह वक्त याद आता है जब हमने उन साझे मार्मिक पलों में अपने नामों, ‘सत्य’ और ‘मीरा’, की सहज संधि से इसका नाम ‘समीरा’ सृजित कर लिया था।

‘‘दूसरे का अब क्या  नाम रखेंगे ?’’
मैंने मीरा की तरफ कौतुक प्रस्ताव रखा।
‘‘ना बाबा, ना। एक बच्चा बहुत है।’’
शायद सिजेरियन के टाँके अभी हरे थे।

लेकिन समीरा के तीन बरस का होते-होते हमने तय कर लिया था कि दूसरा बच्चा नहीं करेंगे। जो है उसी को अपना सब कुछ देंगे।

उस फैसले पर कभी पुनर्विचार नहीं किया।

हाँ, कभी इन दिनों ये जरूर लगता है कि एक बच्चा ही दूसरे बच्चे की कम्‍पनी होता है। एक भली चंगी बच्ची अचानक घुन्ना हो जाए, पढ़ाई-लिखाई पर तवज्जो़ देने की बजाय इन तथाकथित सोशल नैटवर्किंग साइट्स की गिरफ्त में पड़ जाए और माँ-बाप कुछ कहें तो सीधे खुदकुशी का रास्ता पकड़े तो इससे ज्यादा कम्युनिकेशन गैप और क्या होगा?

खैर, अब जो भी है, जैसा भी है, सम्‍भालना है।

एक अच्छे और नामी डॉक्टर की साख में खुशमिज़ाजी कम बड़ी भूमिका नहीं अदा करती होगी।
‘‘ओके। तो समीरा, मुझे वे तीन कारण बताओ ताकि मैं तुम्हारे मम्मी-पापा को शूट कर सकूँ?’’ नाटकीय गम्भीरता से वह उससे पूछते हैं। साथ में तीन उंगलियों से संकेतार्थ पिस्तौल सी चलाते हैं।
समीरा समेत हम सबके चेहरे खिल उठते हैं।
‘‘तीन कारण, एक, दो और तीन। बताओ बताओ।’’ पहले समीरा कुछ हँसकर रह गयी थी, जवाब नहीं दिया था इसलिए वह उससे बजिद उगलवाने सा लगे।
‘‘मेरा मोबाइल ले लिया।’’
साहस और संजीदगी से वह पहला कारण बताती है।
‘‘ये एक हो गया। जोशीजी यह आपको नहीं करना चाहिए था। मोबाइल तो इन दिनों जरूरी खिलौना है।’’
शायद पेशेगत रणनीति के अन्तर्गत उन्होंने निशाना साधते हुए जोड़ा।
‘‘लिया नहीं डॉक साब, बस रात को अलग रखने को कहा है।’’ मैं बड़े ताव से अपनी बात कहता हूँ- जैसे कोई फै़मिली कोर्ट लगी हो।
‘‘मगर क्यों?’’ वह जोर देकर कहते हैं, मानो समीरा के पेरोकार हों।
समीरा के चेहरे पर एक मीठी जीत उभर आई है।
‘‘क्योंकि यह देर रात तक बीबीएम पर रहती है।’’
‘‘ब्लैकबैरी है इसके पास?’’ वह थोड़ा चौंककर पूछते हैं। उसके विज्ञापन ‘इट्स नॉट ए फोन, इट्स व्हाट यू आर’ का असर दिख रहा है।
‘‘क्या करते? इसकी जिद थी … कि सारे फ्रैंड्स के पास है।’’
मेरी मजबूरी की अनसुना करते हुए वह फिर समीरा की तरफ हो लिए।
‘‘ये तो बड़ी अच्छी बात है। मैं भी बीबीएम पर हूँ। इट्स ए ग्रेट फैसिलिटी। मैं तुम्हें अपना पिन दे दूँगा समीरा। विल यू बीबीएम मी ?’’
मित्र होते जा रहे डॉक्टर की बात का वह हामी में गर्दन हिलाकर जवाब देती है।
‘‘सो, दैट्स वन, समीरा … टैल मी टू अदर रीजन्स टू शूट दैम…’’
इस पर समीरा की पुतलियाँ संकोच में हमारी तरफ घूमकर लौट जाती हैं।
डॉक्टर बैंकर ने बाका़यदा लक्ष्य किया।
‘‘मैं और समीरा जरा अकेले बतियाएँगे … इफ यू डोंट माइंड …’’ उन्होंने इरादतन हमें बाहर जाने का इशारा किया।
‘‘जरूर जरूर।’’ कहकर मीरा और मैं बाहर आ गए।

बाहर डॉक्टर बैंकर से मिलने वाले मरीजों की अच्छी खासी कतार है। साइकैट्रिक वार्ड रूप-रस-गंध हर लिहाज से दूसरों से कितना अलग होता है। हमारे बाद नौ-दस लोग और होंगे। शाम के सात बज रहे हैं। चमकती आँखोंवाली जो अधेड़ औरत हमसे पहले अन्दर गयी थी- वही जो साथ आए पुरुष के साथ तगड़ी बहस करने में लगी थी- पूरे पौने घण्‍टे के बाद बाहर निकली। इस हिसाब से तो डॉक्टर को घर जाने में ग्यारह बजेंगे। इस इलाके में जल्दी नहीं चलेगी। एक चालीस छूती गृहस्थिन है, थोड़ी थुलथल, स्लीब-लैस में, खासी ग्लॉसी लिपिस्टिक पोते। चेहरे की हवाइयाँ सी उड़ी हुई एक आधुनिक सी युवती है – गोरी, पतली, थ्री-फोर्थ चिपकाए, कई जगह से कान छिदाए। एक अपेक्षाकृत निम्न मध्यवर्गीय जोड़ा है। इन्हें भी यहाँ आना पड़ गया? कतार में बच्चा सिर्फ एक और है, अपने पिता के साथ। होगा कोई चक्कर। पहले साइकैट्रिस्ट के पास जाने का मतलब था पागलपन का इलाज़ कराना। अब तो चीजें बदल रही हैं हालाँकि एक बेनाम पोशीदगी अभी भी खूब भटकती-फिरती है। उस दिन कोई बता रहा था कि मेडिसन में इन दिनों साइकैट्री और न्यूरोलॉजी टॉप पर चल रही हैं। अमरीका में तो सबसे ज्यादा माँग इन्हीं लोगों की है।

‘‘तुमसे तो यह पहले काफी बातें कर लेती थी, अब नहीं करती है?’’ मैं थोड़ा ऊँघते हुए मीरा की तरफ एक बात सी रखता हूँ।
वह ‘हूँ’ सा कुछ कहती है।
मतलब, किसी गैर-जरूरी से सवाल का क्या जवाब देना !
हो सकता है उस माहौल को देखकर उसके भीतर कोई उधेड़बुन शुरू हो गई हो।
‘‘टीचर्स को हमें पहले बताना चाहिए था। मुझे लगता है पेज-थ्री वाले परिवारों के बच्चों की संगत का असर है। अपने बिगड़ैल माँ-बाप की तरह वे भी बड़े ऐबखोर होते हैं…गंदगी को इतनी नज़दीकी से रोज़ जो देखते हैं…दोस्तों के बीच उनके बच्चे मॉं-बाप को ‘दैट वोमेन-दैट मैन’ जैसा कहकर बात करते जरा़ नहीं हिचकते हैं…’’
वह फिर चुप रहती है।
‘‘अरे, ऐसा क्या हो गया अभी?’’

मक्खी मारता सा मैं अपनी नजर सामने टंगे टीवी पर लगाता हूँ जिस पर सत्तर के दशक की कोई हिन्दी फिल्म चल रही है … लाकेट, कार रेस, बेलबॉटम और मल्टी हीरो-हीरोइनें। एक अन्तराल के बाद स्मृति के रास्ते साधारण चीजें भी कैसा चुम्बकीय आकर्षण फेंकने लगती हैं। क्या इसी को साधारणता का रोमांस कहेंगे … एक ऐसी साधारणता जिसमें ऐसी दुर्निवार जटिलताएं नदारद कि… अपने ज़रा से बच्चे से आप खुलकर बात तक न कर पाएं … उसे लेकर आप सोचते रहते हैं, रणनीति बनाते हैं, परेशान होते रहते हैं मगर कर कुछ नहीं पा रहे होते हैं। उसकी हर नाकाबिले-बरदाश्त चीज़ को सहनीय मान लेते हैं…किसी अपने के साथ एक लाचार दूरी के निर्वात में फँसना कैसा दमघोंटू होता है!

कुछ देर बाद मुस्कराते हुए समीरा बाहर निकली और हमें अन्दर जाने का इशारा किया। दरवाजा भेड़कर सम्‍भलते हुए हम डॉक्टर  के सामने बैठे और धड़कती उतावली में वस्तुस्थिति जाननी चाही।
‘‘इट्स प्रैटी बैड !’’उन्होंने खासे रूखेपन के साथ कोई तमाचा सा जड़ दिया।
‘‘पता नहीं डॉकसाब। दो साल पहले तक तो सब ठीक-ठाक था उसके बाद इसके रवैए में बहुत बदलाव आ गया…’’
‘‘अरे मैं कुछ पूछ रहा हूँ और आप कुछ और बता रहे हैं।’’ उन्होंने टोका।
लगा, जैसे ईशान अवस्थी (तारे जमीन पर) के पिता के बतौर में निकम सर से मुखातिब हो गया हूँ।
‘‘ऐसा तो कुछ नहीं हुआ कि इसे वह सब करना पड़े जो यह करने की धमकी देती है।’’ मीरा ने शाइस्तगी से बात जोड़ी।
‘‘देखिए मिसेज जोशी, यह तो सोचने -सोचने की बात है। जो बच्चे वैसा करते हैं, उनके माँ-बाप भी अपनी निगाह में वैसा कुछ नहीं करते-कहते कि बच्चे को वह कदम उठाना पड़े जो वह उठा लेता है …’’
उनकी बात से हामी भरते हुए हम चुप बने रहे।
‘‘कल के अलावा पहले भी यह तीन बार  कोशिश कर चुकी है।’’
‘‘तीन !’’

हम दोनों विस्मय से काँप उठते हैं। एक सम्‍भावित त्रासदी से ज्यादा उसके जीवन से बेदखल और फिजू़ल होते अपने जीवन की त्रासदी से। दिन-रात उसकी खुशी के लिए खा़क होते हम जैसे कुछ नहीं…एक अनजान डॉक्टर ज्यादा भरोसेमंद हो गया। चलो, ये भी ठीक!

‘‘हाँ, तीन बार। लेकिन आप लोग उससे इस बाबत कोई बात नहीं करेंगे- अगर उसका भला चाहते हैं तो।’’ उनके लहजे में संगीन हिदायत है। ‘तो’ को उन्होंने जोर देकर स्पष्ट किया।

‘‘नहीं करेंगे… लेकिन डॉकसाब हम क्या करें ? पूरी छूट दे रखी है। शायद थोड़ी कम देते तो यह नौबत न आती। इंग्लिश म्यूजि़क, रोडीज़ और फेसबुक की यह ऐसी एडिक्ट हो गयी है कि पढ़ना-लिखना तो छोडिए़ खाना-पीना तक नैगलैक्ट करती है। एक बात नहीं सुनती।’’

‘‘नथिंग अनयुज्अल इन दैट।’’ वह किसी परमज्ञानी की तरह मेरा मंतव्य समझकर मुझे रोकते हैं और कहते हैं, ‘‘टैक्नोलॉजी ने हमारे समाज में इन दिनों बड़ा तहस-नहस मचाया हुआ है। आप और हम इस संक्रामक बीमारी से बचे हुए हैं तो अपनी नाकाबलियत के कारण। ये लोग जिन्हें हम यंग अडल्ट्स कहते हैं, बहुत सक्षम हैं … ये टैक्नोलॉजी की हर सम्भावनओं को छूना चाहते हैं … बिना ये जाने-समझे कि उससे क्या होगा। आपकी बच्ची अलग नहीं है। मेरे पास आने वाले दस टीनेज़ पेशेन्ट्स में से आठ इसी से मिले-जुले होते हैं … ’’

‘‘क्या करें डॉकसाब ? मिडिल क्लास लोग हैं हम … लड़की का अपने पैरों पर खड़े होना कितना जरूरी है …’’ एक तबील अनकही के बीच हाँफता सा मैं जैसे अपनी चिंताओं का अर्क उन्हें सौंपने लगता हूँ।

‘‘नॉट टू वरी जोशी जी। ये बिल्कुल ठीक हो जाएगी। शी विल बी ऑलराइट शार्टली।’’ हमें उबारते हुए वह अपने लैटर हैड पर फ्लूडैक (फ्लैक्सोटिन) का प्रैशक्रिप्शन लिखते हैं जिसे दोपहर खाने के बाद लेना है। थायोराइड सहित दो-चार टैस्ट कराने होंगे और एक काउंसलर, कोई तनाज़ पार्डीवाला, का मोबाइल नम्बर लिखते हैं। हमारे भीतर उगते शंकालु भावों को भाँपते हुए वह कहते हैं, ‘‘… द सिरप इज जस्ट ए मूड एलिवेटर … आजकल इस उम्र के बच्चों में विटामिन डी थ्री की कमी बहुत हो रही है … टीवी-कंप्यूटर पर लगे रहने से…आई जस्ट वांट टू रूल आउट दैट … पार्डीवाला बहुत अच्छी साइकोथेरेपिस्ट हैं।’’ उन्होंने बताया कि वह समीरा के फेसबुक फ्रैंड बनने वाले हैं … टू पीप इनटू हर रीयल माइंडसैट … बीबीएम है ही … ।

हमारा दिल अचानक आश्‍वस्त  होने लगा है, मियाँ की जूती मियाँ के सिर वाले अन्दाज में। तभी  उन्होंने बाहर बैठी समीरा को अन्दर बुलाया और बात का सन्दर्भ  और लहजा बदल कर घोषणा सी करते बोले, ‘‘एक्चुअली, समीरा बहुत टेलेंटिड लड़की है, और बेहद स्वीट भी।’’  उन्होंने अपनी बात यूँ रखी मानो अभी तक की जा रही हमारी गुफ्तगू का वह लब्बोलुआब हो। मैं उनकी जादुई  हौसला अफ़जाई का असर देख रहा हूँ।

‘‘शी इज ए जैम डॉक्साब बट…’’ बैंकर की राय के समर्थन में परंतुक खोंपते ही मीरा का गला भर्रा उठा और फौरन से पेश्तर वह फफक भी पड़ी। मैं हक्का-बक्का था मगर समीरा ने लपककर उसे पकड़ लिया और कातर मासूमियत से धीमे से बोली, ‘‘मम्मा, क्या हुआ?’’

गनीमत रही कि मीरा ने खुद को बिखरने नहीं दिया।

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ये जो दुनिया है, वही जिसे हम रोज़ गाली देते हैं, दरअसल उतनी खराब है नहीं जितनी हम कभी सोचने लगते हैं। पता लगा कि पार्डीवाला और डॉक्टर बैंकर दोनों समीरा की फेसबुक पर हैं। आपस में बीबीएम करते रहते हैं। यानी वही सब जिसने एक बीमारी की तरह समीरा को घेर रखा था, उसके ओनों-कोनों में झाँकने की पगडंडियाँ बने हुए हैं। किसी आम अविवाहित पारसी की तरह पार्डीवाला थोड़ी खब्ती लगती हैं लेकिन अपने काम में हैं बड़ी पेशेवर। पहले मीरा से एक के बाद एक ई-मेल लिखवाए, कुछ बिन्दुओं पर स्पष्टीकरण लिए। पूरी जन्मपत्री चाहिए थी उसे समीरा की … कब कहाँ कैसे पैदा हुई, नॉर्मल या सिजेरियन, गर्भकाल कैसा था, समीरा की पसन्द-नापसन्द, एनी हिस्ट्री ऑफ डिप्रेशन इन फैमिली, परिवार में किसके साथ अटैच्ड है, दादा-दादी, नाना-नानी, बुआ-मौसी के साथ कितनी घुली-मिली है, एनी नोन एपिसोड ऑफ एब्यूज, दोस्त कौन हैं, उनके परिवार और माँ-पिता की मुख्तसर जानकारी, हमारा किन लोगों के साथ उठना-बैठना रहता है, पिता के बिजनैस की स्थिति और उसमें आते उतार-चढ़ाव …। यानी उसे एक से एक जरूरी-गैर-जरूरी तफसील चाहिए थी। कभी तो लगा कि तफसीलों के अम्‍बार में कुछ इस्तेमाल भी होगा या यह सब उलझाने और टाइम-पास करने के लिए है। कहीं पढ़ा था मैंने कि समस्या के बारे में बोल-बतियाकर उससे आधी निजात तो आप वैसे ही पा लेते हैं।

यहाँ पता नहीं क्या चल रहा है ?
खैर, कर भी क्या सकते हैं!

पार्डीवाला खूब बहुरूपनी हैं। समीरा के साथ छह-सात सेशन कर चुकी हैं। क्या होता है उन दोनों के बीच वह न समीरा हमें बताती है और न पार्डीवाला। समीरा उसके पास से लौटकर बड़ी खुश दिखती है। बीबीएम से ही एपॉइन्टमैंट होता है और समीरा को वहाँ छुड़वा दिया जाता है। होमवर्क के तौर पर समीरा को ई-मेल भेजने होते हैं जिनकी विषय-वस्तु से हमें कोई सरोकार नहीं रखना होता है। यहाँ तक तो ठीक है मगर अब यही बात मीरा और पार्डीवाला के बीच चल रहे संचारण पर भी लागू होने लगी है। डॉ. बैंकर और पार्डीवाला समीरा से जुड़ी बातों को लेकर तब्सरा करते रहते हैं। आख़िर हम सबका मकसद तो वही है। समीरा की हालत में कथित तौर पर सुधार हो रहा है हालाँकि आदत से मजबूर मैं रात को उठकर समीरा के कमरे में झाँक लेता हूँ कि ठीक-ठाक सो तो रही है या कुछ … । वैसे इसके मायने क्या समझे जाएं कि मैं उसके साथ ज्यादा क्या, बिल्कुल भी टोका-टाकी न करूँ!

‘‘बिगड़ने दूँ।’’ तक का भी जवाब सपाट ‘‘हाँ’’ है।
मामला नाजुक है। सब्र से काम लेना पड़ेगा।

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उतरती दोपहरी को कुछ अप्रवासी निवेशकों के साथ एक कम्‍पनी की विस्तार योजनाओं पर मशवरा कर रहा था कि डॉक्टर बैंकर के फोन को देखकर चौंक पड़ा।

दो महीने के वकफे में मेरा फोन शायद उन्होंने पहली बार बजाया था।
‘‘सत्यपाल जी, आप शाम को छह बजे आ सकते हैं मेरे पास?’’ इधर-उधर की कोई बात किए बगैर उन्होंने पूछा।
‘‘जरूर डॉकसाब जरूर … मगर आज छह बजे तो समीरा की डाँस क्लास है।’’
‘‘आई नो दैट। मगर सिर्फ आपको आना है। मीराजी की भी जरूरत नहीं है। ओके ।’’

डॉक्टरों की यह पेशेवर इन्सानियत वाली अदा मुझे अच्छी लगती है। उनके सुलूक में आपको कभी रूखेपन की बू  आ सकती है मगर अमलन वह आपकी समस्या को संबोधित रहते हैं। यह नहीं कि किसी राहगीर की तरह ऊपर-ऊपर से हमदर्दी के आँसू बहा लो मगर करो कुछ नहीं और चलते बनो। कॉलिज में जब पढ़ता था तो इस थीम के आसपास किसी यूरोपियन लेखक की किताब भी पढ़ी थी। अब तो कम्‍पनियों के ट्रायल बैलेंस और फायनैंशियल्स ही पढ़ता हूँ। मुझे तो डॉक्टर बैंकर का काम बड़ा पसन्द है। समीरा भी उनके साथ ऐसी हिल-मिल गई है कि एक दिन अपनी मम्मी से पूछ रही थी कि साइकैट्रिस्ट बनने के लिए क्या करना पड़ता है। जब उसने बताया तो उसने कहा कि इससे अच्छा तो फिर कांउसलर बनना है – काम वही और मेहनत कम। जो भी है, कम से कम कुछ तो अब वह सोचने लगी है … कि क्या करना है … या यह कि कुछ करना भी चाहिए …वर्ना अभी तो हमें उसके बारे में सोचना तक गुनाह था। हमारी किसी भी सीख-तज़वीज़ पर जब देखो तब ‘चिल’ कहकर पल्लू झाड़ लेती है।

यही सब सोचते हुए जब डॉक्टर बैंकर के यहाँ पहुँचा तो सुखद आश्‍चर्य यही लगा कि ज्यादा भीड़ नहीं थी। उनकी रिसेप्शनिस्ट ने ‘अब’ और ‘अभी’ के बम्बइया गठजोड़ से बने ‘अबी’ का तड़का मारते हुए बताया कि डॉकसाब मुझे याद कर रहे थे।

उनके सामने पेश होते ही उनके मुस्कुराते चेहरे को देख मेरे भीतर किसी गुप्त ऊर्जा का संचरण हो गया।
‘‘कैसे हैं जोशी जी ?’’
प्लास्टिक की पतली सी फाइल में पाँच-सात कागजों को रखते हुए उन्होंने पूछा।
‘‘अच्छा हूँ डॉकसाब।’’
‘‘समीरा कैसी है ?’’
‘‘कहीं बेहतर … वैसे आप ज्यादा जानते होंगे।’’ मैं डरते-सकुचाते मामले को उन्हीं की तरफ बढा़ देता हूँ।
‘‘आई थिंक शी इज़ रेस्पोंडिंग वैल … बट व्हाट ए सेंसिटिव चाइल्ड शी इज़ …’’
‘‘ मैं थोड़ा चकराया।’’
“दो साल पहले आपका बिजनेस कैसा चल रहा था मिस्टर जोशी?’’ वह सशंकित भाव से लफ्जों को चबा-चबाकर बोलने लगे।
‘‘ठीक ही था … ग्लोबल मैल्टडाउन का दौर था सो थोड़ी मंदी तो सबकी तरह हमने भी झेली मगर टचवुड, ज्यादा कुछ नहीं हुआ … ’’
‘‘हाँ, ज्यादा कुछ तो नहीं हुआ मगर जो हुआ वह क्या कम था …’’
उनकी बातों के मानी कहाँ से कहाँ छलाँग मार गए। मैं जानता था वह मुझे कहाँ जीरो-इन कर रहे हैं।
उनके तौर-तरीके में एक गरिमापूर्ण मिलावट जरूर थी मगर इरादे में एक बेहिचक साफगोई भी थी।
मुझे कुछ कहते ही नहीं बन पड़ रहा था।
और वह आगे जरा भी कुरेदने की नीयत नहीं रखते थे।
उस लज्जास्पद खामोशी के बीच मुझे गहरी लम्बी साँस आयी तो मैंने उनसे एक घूँट पानी की दरकार की।
पानी निगला।
‘‘बट व्हाई, जोशीजी? यू हैव सच ए ब्यूटीफुल फैमिली … ’’
यह इंजेक्शन देने से पहले स्प्रिट लगाने से कुछ आगे की बात थी।
‘‘मीरा ने कुछ कहा आपसे ?’’
मेरा अविश्‍वास किसी टुच्चे गुनाह की तरह बगलें झाँकने लगा।
‘‘बिल्कुल नहीं … नॉट ए श्रेड।’’ उन्होंने मुँह बिचकाकर कहा और फिर बोले,  “… और हाँ … आइंदा यह मत समझिए कि वह छोटी बच्ची है … मोबाइलों की कान-उमेठी करने में वह हम-आपसे कहीं आगे वाली जैनरेशन की है …आपके उस चैप्टर ने उसे गहरे झिंझोडा़ है…’’
मैं उन्हें देखते हुए सुन रहा था या सुनते हुए देख रहा था, नहीं मालूम।
वह अन्तराल दे देकर बोल रहे थे।
मैं मंत्रविद्ध सा  था…कि कोई दाग़ कहाँ जाकर इंतकाम ले बैठता है…।
‘‘हैट्स ऑफ टू दैट एंजल … बहुत सम्‍भाला है उसने अपने  आपको …’’ वह चबाते-सोचते पता नहीं क्या-क्या कहे जा रहे थे।
जैसा उन्होंने तभी बताया कि शाम सात बजे उन्हें टीन-एज़ डिप्रेशन पर होने वाले एक सेमिनार में जाना था—कुछ नए नतीजों को सम्‍बन्धित लोगों से साझा करने।
मुझे पस्त और बोझिल देख  वह मेरे पास आए और किसी मसीहा की तरह कन्धे पर हाथ रखकर बोले, ‘‘यू हैव कम आउट ऑफ इट … दिस इज़ द बैस्ट पार्ट ऑफ इट। बट शी हैज नॉट !’’
उनके जाने के बाद मैंने गौर किया कि मेरे आस-पास कितना अंधेरा मंडरा चुका था।
उस पल मैंने एक मुलायम छौने का यकायक बिल्ली हो जाना महसूस किया ।
लुटा-निचुडा़-सा मैं गाड़ी में आ बैठा हूँ।स्टार्ट  करने की ऊर्जा नहीं बची है।बस सोचे जा रहा हूँ कि … बिल्ली को छौने की मुलायमियत कैसे लौटाई जा सकेगी ?

साम्राज्‍यवाद-विरोध, आलोचना और रामविलास शर्मा

नई दिल्‍ली : ‘रामविलास शर्मा एक विलुप्त प्रजाति के शख्स थे।राहुल सांस्कृत्यायन, वासुदेव शरण अग्रवाल और डीडी  कौशम्बी जैसे विश्‍वकोशीय ज्ञान रखने वाले भारतीय विद्वानों की प्रजाति के। लेकिन रामविलास जी का स्वधर्म आलोचना ही था। इतिहास और भाषा विज्ञान जैसे विषयों में रमने के कारण आलोचना की अनेक मूल्यवान संभावनाएं साकार न हो सकीं। ‘मित्र सम्‍वाद और गद्य की विलुप्त कला’ शीर्षक निबंध  में मैंने ऐसी ही एक सम्‍भावना की और संकेत किया था।’’ ये  बातें नामवर सिंह ने दिल्ली विश्‍वविद्यालय के हिन्‍दी विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कही।

23, 24 और 25 नवम्बर को दिल्ली विश्‍वविद्यालय के  हिन्‍दी विभाग ने हिन्‍दी के ख्यातिलब्ध आलोचक रामविलास शर्मा की जन्मशती वर्ष में उनके कार्यों की विस्तृत विवेचना के लिये तीन दिनों का एक राष्ट्रीय सेमिनार ‘जन्मशती सम्‍वाद’ के नाम से आयोजित किया। इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से हिन्‍दी और अन्य अनुशासनों के विद्वानों ने भाग लिया।

उद्घाटन सत्र की शुरुआत विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर गोपेश्‍वर सिंह के स्वागत भाषण से हुई। सत्र के संचालक आशुतोष कुमार ने बताया कि यह सेमिनार ज्ञानशास्त्रीय स्वतंत्रता के लिये किये गये रामविलासजी के  संघर्ष पर  केन्द्रित है। मुख्य अतिथि समकुलपति  विवेक सुनेजा  ने अपने वक्‍तव्‍य में विश्‍वविद्यालय के मानविकी विभागों की उपयोगिता की बात कही और जीवन में प्रेम के विलुप्त होते जाने की ओर इशारा किया जिसे लौटाने का काम साहित्य ही कर सकता है।

बीज भाषण देते हुए डॉ. निर्मला जैन ने कहा कि रामविलास जी की साधना के तीन मुख्य उद्देश्य थे– ज्ञान पर पश्‍च‍िम के एकाधिकार का खंडन, समाजवादी चेतना का प्रसार और प्रगति के लिए परम्परा के साथ  जीवंत सम्‍वाद। लेकिन मृत्यु के बाद मूलतत्ववादी के रूप में उनकी नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश की गयी।

सेमिनार के पहले सत्र का विषय था– ‘उपनिवेशवाद, नवजागरण और रामविलास शर्मा’। इसमें इतिहासकार हरबंश मुखिया, समाजशास्त्री अभय कुमार दुबे, आलोचक  नंदकिशोर आचार्य ने विचार रखे। सत्र की अध्यक्षता डॉ. मैनेजर पांडे ने की।  हरबंश मुखिया ने मार्क्सवाद के विभिन्न धाराओं का उल्लेख करते हुए उसके दक्षिणी अमेरिका में विकसित हो रहे नवीन स्वरूप की चर्चा भी की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उत्पादन की वृद्धि पर मार्क्सवाद की एक धारा का जोर है वह उचित नहीं है। उसका जोर अच्छे जीवन पर होना चाहिए जो दक्षिणी अमेरिकी देशों में दिया जा रहा है। रामविलास शर्मा के हवाले से उन्होंने बताया कि इतिहास लेखन की उनकी पद्धति स्तालिनवादी परम्परा की है, जो सुनिश्चित निष्कर्षों पर बल देती है।

अभय कुमार दुबे ने वक्तव्य की शुरूआत इसी बिंदू से की और तथ्यों का उल्लेख करते हुए इस मान्यता का खंडन किया। उन्होंने यह बताया कि रामविलास शर्मा के निष्कर्षों में कई परवर्ती इतिहासकारों के निष्कर्ष के बीज छिपे हैं। उनके समग्र लेखन की धुरी लोकजागरण है। उन्होंने अर्ली माडर्न के सूत्र दिये। उन्‍होंने कहा कि रामविलास शर्मा ने भारतीय मनीषा का गहन अध्ययन करके मार्क्सवाद का एक भारतीय संस्करण तैयार किया जिसमें उन्होंने मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन से अधिक सीखा बजाय कि उसके भाष्यकारों से।

नंदकिशोर आचार्य ने रामविलास  शर्मा के नवजागरण की अवधारणा की व्याख्या की और बताया कि विचारों और सांस्कृतिक सरंचानाओं को केवल आर्थिक परिवर्तनों के जरिए नहीं समझा जा सकता।

अपने अध्यक्षीय भाषण मे मैनेजर पांडेय ने चुटकी लेने वाले अंदाज में वक्ताओं के विचारों पर टिप्पणी प्रस्तुत की और उनकी मान्यताओं का खंडन भी किया। रामविलास शर्मा ने क्या नहीं किया, इसकी बजाय उन्होंने क्या किया इस पर बल देने की बात कही। उनकी आलोचना दृष्टि पर प्रेमचंद के प्रभाव को रेखांकित किया और कहा कि रामविलास शर्मा पर बात करते हुए वैचारिक और आलोचनात्मक किताबों के अलावा उनकी रचनात्मक किताबों को भी केन्द्र में रखना चाहिये। नवजागरण को उन्होंने एक विवादित अवधारण बताते हुए कहा कि कोई भी समाज तब जागेगा जब वह सोया हुआ हो और एक समय में एक समाज के सभी लोग सुप्त या सभी लोग जागृत नहीं हो सकते। इस सत्र का संचालन विभाग के प्राध्यापक राजेन्द्र गौतम ने किया और सत्र के अंत में डा. हरिमोहन शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन  किया।

दूसरा दिन : हिंदी आलोचना और रामविलास शर्मा’

सेमिनार के दूसरे दिन के पहले सत्र के विषय ‘हिन्‍दी आलोचना और रामविलास शर्मा’ पर वक्तव्य की शुरुआत की बजरंग बिहारी तिवारी ने। रामविलास शर्मा के व्यापक लेखन और ‘भारतीय संस्कृति और हिन्‍दी प्रदेश’ किताब के हवाले से यह बताया कि रामविलास शर्मा के लेखन में दलित समर्थन की आवाज है। वह जहाँ सामंतवाद कहते हैं, वहाँ उनका आशय वर्णव्यवस्था होती है। साम्राज्यवाद से असली नुकसान देश की निम्न वर्गीय जनता का ही हुआ और इसे शर्मा जी स्पष्टतौर पर देख रहे थे। ब्राह्मणवादी व्यवस्था में देश की आम जनता को काट दिया गया और उससे विदेशी शासकों को लाभ हुआ। इस तरह उन्‍होंने यह सिद्ध किया कि उनके चिंतन के केन्‍द्र में दलित भी थे।

कँवल भारती की अनुपस्थिति में  उनका पर्चा आशुतोष कुमार ने पढ़ा। उन्होंने कबीर के बिन्‍दु से रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि का मूल्याँकन किया और बताया कि  अपनी आलोचना में रामविलास शर्मा कबीर को बाहर करके और तुलसी को केन्द्र में रखके प्रच्छन्न हिन्दुत्ववाद की लाइन पकड़ रहे थे और ब्राह्मणवाद को ही पुख्ता कर रहे थे। कुछ साक्षात्कारों के हवाले से उन्होंने बताया कि रामविलास जी जाति प्रथा मिटाने का आधार वर्ग निर्माण को मानते हैं लेकिन समान वर्गों के बीच में जो विभेद हैं उसका आधार जाति है।

रोहिणी अग्रवाल ने स्त्री दृष्टि से रामविलास शर्मा की आलोचना का मूल्याँकन किया और बताया कि समाजवादी लक्ष्य की प्राप्ति में जो लेखक काम आ सकते थे उन्होंने उन्हें प्राथमिकता दी। इस तरह प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, वृंदावनलाल वर्मा उनकी प्राथमिकता में और अज्ञेय, जैनेंद्र बाहर रह गये। जैनेंद्र के उपन्यास ‘सुनीता’ की रामविलास जी की आलोचना के आधार पर  उन्होंने रामविलास शर्मा की आलोचना में एक आदर्श हिन्दू नारी के रूप में स्त्री की उपस्थिति को रेखाँकित किया।

शंभुनाथ ने कहा कि हर आलोचक का वैचारिक हिमांक होता है। देखने की चीज हिम नहीं प्रवाह है। रामविलास शर्मा की आलोचना में कथ्य, विचार और हृदय मिलकर बोलते हैं। आज जैसे-जैसे ज्ञान का समुद्र बढ़ रहा है वैसे-वैसे भावकूपता भी बढ़ रही है।  रचना की तरह आलोचना में भी खंडन होता है और साथ ही  पुनर्निर्माण भी। रामविलास शर्मा ने यूरोप केन्द्रित सोच, रुढि़वादिता और यांत्रिक भौतिकवाद का खंडन करते हुए ज्ञात इतिहास से अज्ञात  इतिहास की ओर छलांग लगाई  है। वह शुक्ल जी और द्विवेदी जी की तरह लोक की बात करते हैं। उनका जोर इस बात पर है कि आज भी भारत में नवजागरण की परियोजना अधूरी  है, जिसे पूरा करना है।

नित्यानंद तिवारी ने कहा कि  ‘ज्ञानशास्त्रीय स्वतंत्रता के लिए अंतरानुशासनिक सम्‍वाद’ रामविलास जी की कुल साधना को प्रकट करने वाला मुहावरा है। इसे उन्होंने  सेमीनार के निमंत्रणपत्र से उद्धृत किया।  उन्होंने कहा कि साहित्य और   समाज का सम्बन्ध  जितने  परिभाषित रूप में रामविलास शर्मा में है उतना न शुक्ल में है न द्विवेदी जी में। उनकी आलोचना में रहस्यवादी गुंजलक की सम्‍भावना नहीं है। उनकी आलोचना यथार्थ को नये ढंग से देखने का तरीका बताती है। रामविलास शर्मा ने पीढियों के विवेक को जाग्रत किया है। अध्यक्षीय भाषण में विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने सवाल पैदा होने को और वक्ताओं के बीच असहमति भरे सम्‍वाद को सेमिनार की उपलब्धि माना। हिन्दी का पाठक शर्मा जी को आत्मीयता और कृतज्ञता के साथ पढ़ता है। उन्होंने साम्राज्यवाद को सौंदर्यवाद का पर्याय बताया। वह विवाद के लिये संतुलन की परवाह नहीं करते। उनको पढ़ते हुए उनके नेपथ्य को भी याद रखने की जरूरत है जिसके बीच उन्होंने अपना लेखन किया। करुणा की अनुभूति और त्रासदी का  बोध  उनकी आलोचना की खास उपलब्धियां हैं।

सत्र का संचालन अल्पना मिश्र और धन्यवाद ज्ञापन मुकेश गर्ग ने किया। भोजनावकाश के बाद के सत्र की अध्यक्षता भगवान सिंह ने की और वक्तव्य दिलीप सिंह, रवींद्र गर्गेश और कृष्णदत्त शर्मा ने दिया। वक्‍ताओं ने रामविलास शर्मा के भाषा और समाज के विश्‍लेषण और उसके महत्त्व को रेखाँकित किया। कृष्णदत्त शर्मा ने उनके गद्य की साफ़गोई की ओर इशारा किया। दिलीप सिंह ने समय से आगे की उनकी उपलब्धि की ओर रेखाँकित किया और कहा कि जिस समय रामविलास शर्मा ने भाषा और समाज के सम्‍बन्‍धों को विश्‍लेषित किया, उस समय पश्‍च‍िम में भी किसी चिंतक ने इस ओर ध्यान नहीं दिया था। रवीन्द्र गर्गेश ने रामविलास शर्मा को उद्धृत करते हुए विभिन्न भाषाओं के सम्‍बन्‍धों के विश्‍लेषण की पद्धति की ओर ध्यान दिलाया। सत्र का संचालन कुमुद शर्मा ने और धन्यवाद दिया पूरनचंद टंडन ने।

तीसरा दिन- ‘ज्ञान मीमांसा’

तीसरे दिन दोनों सत्रों का विषय था ‘ज्ञान मीमांसा और रामविलास शर्मा’। पहले सत्र की शुरुआत वरिष्ठ आलोचक खगेन्द्र ठाकुर के वक्तव्य से हुई। उन्होंने ज्ञान मीमांसा की शाब्दिक व्याख्या से शुरुआत करते हुए इस बात पर जोर दिया कि शासक वर्ग की कोशिश होती है कि जनता वैसी बातों को भूल जाए जो असुविधाजनक है। वह अपने हित में काम आने वाली ज्ञान का निर्माण करता है। ज्ञान की इस पद्धति को चुनौती देनी चाहिये। राजेन्द्र कुमार ने कहा कि रामविलास शर्मा का अन्य अनुशासनों में जाना साहित्य के स्वधर्म का ही विस्तार है। साहित्य के लिये कोई अनुशासन परधर्म नहीं है। उन्होंने कहा कि रामविलास शर्मा वर्तमान की समस्या को इतिहास और परम्‍परा के आलोक में देखते हैं। उनका सारा लेखन एक सांस्कृतिक अभियान है। जिसके कई आयाम हैं, कई धाराएं हैं लेकिन पुकार एक है जो भारतेन्दु से शुरू होकर महावीर प्रसाद द्विवेदी, निराला से होते हुए शर्मा जी तक आती है। यह पुकार भारत के स्वत्व की पुकार है। रामविलास शर्मा सच्चे अर्थों में जनता के आलोचक हैं और उनके निष्कर्ष उत्तर नहीं हैं, प्रश्‍न हैं।

रवि श्रीवास्तव ने कहा कि रामविलास शर्मा के सन्‍दर्भ में ज्ञान मीमांसा का सवाल इतिहास और परम्‍परा की आलोचना का सवाल है। संग्रह और ज्ञान का विवेक शुक्ल जी के बाद सबसे अधिक रामविलास जी में ही मिलता है। रामविलास शर्मा पर बातचीत करते हुए हमें उनके रचना कर्म में छिपे उन संकेतों को भी पहचानना चाहिये जो संकीर्णता के राष्ट्रवादी अभियान को लाभ पहुँचाते हैं।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए मुरली मनोहर सिंह ने कहा कि रामविलास शर्मा के समस्त लेखन कर्म की धुरी भारत में जनवादी क्रांति के लिये तैयारी करना, सांगठनिक कार्य करना और वैचारिक संघर्ष करना है। चीजों को टुकड़ों में देखने की प्रवृति छोड़ देनी चाहिए और साथ ही जनता और बुद्धिजीवियों के बीच जो दूरी बढ़ रही है, उसे भी कम करना चाहिए। रामविलास शर्मा की आलोचना में ज्ञान के अन्य अनुशासनों की आवाजाही को भी देखना चाहिए। और वर्तमान के सवालों से आलोचना को जोड़ना चाहिए। रामविलास शर्मा की ज्ञान मीमांसा, परम्‍परा की सकारात्मकता की निरंतरता और उसके पहलुओं को आत्मसात करने की लिये उनका विश्‍लेषण करती है। इसके तीन सूत्र हैं गतिमानता, सापेक्षता और अंतर्विरोध। सत्र का संचालन डा. प्रेम सिंह ने किया।

दूसरे सत्र में कृष्णदत्त पालीवाल ने कहा कि  अंतवाद के इस जमाने में कहा गया कि समस्त ज्ञान रदी की टोकड़ी में फेंक देने लायक है। बस एक ही ज्ञान बचा हुआ है पूँजीवाद। रामविलास शर्मा ने स्थापित मार्क्सवादी विचार से आगे बढ़ते हुए प्रतिपादित किया  कि हमारी बुनियादी समस्या किसान की समस्या है।

प्रणय कृष्ण ने पालीवाल की अवधारणाओं का प्रतिवाद किया। उन्‍होंने कहा कि मार्क्सवाद गतिमान और विकासशील  है, उसका कोई भी संस्‍करण अंतिम नहीं है।  मार्क्सवादियों की कोशिश संकीर्ण  विशेषज्ञताओं की जगह  बहुआयामी संवेदनशीलता को स्थापित करने की ओर रही है।   मार्क्स के मुताबिक़ समाजवाद  मनुष्य के  वास्तविक इतिहास की शुरुआत है , उसके पहले का सब कुछ  प्राक- इतिहास है। डॉ. संजीव ने कहा कि रामविलास शर्मा का मार्क्सवाद हिन्‍दी का विजेता और प्रतिष्ठित मार्क्सवाद है जिसके प्रभाव में हिन्‍दी के विमर्श जगत से सभी विरोधी विचारों को बाहर कर दिया गया है जिसमें रांगेय राघव और मुक्तिबोध भी शामिल हैं। रामविलास शर्मा परम्‍परा पर गौरव करना सीखाने वाला और उसकी फ़ांको को ढंक देने वाला विराट आख्यान रचते हैं। उनका प्रशस्ति गायन मूलतः हिन्‍दी प्रदेश और हिन्‍दी के लिए गौरव सामग्री देने का प्रयास है जिसमें देशभक्ति समस्त अंतर्विरोधों को ढंक लेती है और यह ठीक नहीं है। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए असद ज़ैदी ने कहा कि रामविलास शर्मा ने कोई अंतिम बात नहीं कही। वह मार्क्सवादी आंदोलन की उपज थे लेकिन ऐसी बातें भी कह गये जिससे दक्षिणोन्मुखी धारा भी उन्हें ऋषि परम्‍परा में रखती है। रामविलास की विराटतर होती प्रतिमा को एक नज़र में देख लेना मुश्किल है। कट्टरताओं, संकीर्णताओं से युक्त होने के साथ उनका विषयगत वैविध्य एक चुनौती और भय पैदा करता है। रामविलास शर्मा पर बात करते हुए हमें यह भी याद रखना चाहिए कि साम्राज्यवाद का विरोध करते हुए वह उन्हीं उपकरणों को इस्तेमाल करने लगते हैं जो साम्राज्य की उपज है। और इसीलिये पीछे के समाज में उदाहरण देखे जाने लगते हैं। यह प्रवृति ठीक नहीं है। सत्र का संचालन मंजु मुकुल ने किया और धन्यवाद दिया श्योराज सिंह बेचैन ने।

इसके बाद के सत्र में रामविलास शर्मा के पुत्र विजयमोहन शर्मा ने उन पर एक फ़िल्म दिखाई। समापन सत्र में राजेंद्र यादव की अध्यक्षता में राजेंद्र कुमार और रामेश्‍वर राय ने तीन दिनों के बहसों और विमर्शों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। संगोष्ठी रपट आशुतोष कुमार ने प्रस्तुत की।

प्रस्‍तुति: अमितेश, हिन्‍दी विभाग, दिल्ली विश्‍वविद्यालय

स्वाति तिवारी को हिन्दी सेवी सम्मान

उदयपुर : हिन्दी की विख्यात कथाकार स्वाति तिवारी को साहित्यिक पत्रिका ‘संबोधन’ की ओर से 25 नवंबर 2012 को आयोजित समारोह में 8वाँ हिन्दी सेवी सम्मान प्रदान किया गया।

राजस्थान साहित्य अकादमी के सभागार में आयोजित समारोह में मधुसूदन पंडया ने शाल एवं श्रीफल, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष वेद व्यास ने प्रशस्ति पत्र एवं ‘संबोधन’ के सम्पादक क़मर मेवाड़ी ने 11000/- रुपये का चेक प्रदान कर अभिनन्दन किया।

समारोह में सुखाडिया विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. माधव हाड़ा,  जगदीश तिवारी,  एम.डी. कनेरिया, नारायण सिंह राव, माधव नागदा,  डॉक्‍टर कुंदन माली (कपडगंज ), राधेश्याम सरावगी, ईश्‍वर शर्मा आदि कई साहित्यकारों की भागीदारी रही। कार्यक्रम का संचालन अफ़जल खाँ अफ़जल ने किया और अंत में अकादमी सचिव डॉक्‍टर प्रमोद भट्ट ने आभार ज्ञापित किया।

मोती : अमिय बिन्दु गुप्ता

22 जुलाई 1979 को उत्‍तर प्रदेश के जौनपुर जिले के नेवाद गाँव में जन्‍मे अमिय बिन्दु गुप्ता की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशति हो चुकी हैं। उनकी कहानी-

अपना बैग लेकर मैं घर से निकला तो मोती मेरे साथ चलने लगा, उसे रोकने की कोशिश की पर वह पीछे-पीछे चलता रहा। मैं गली से होकर सड़क पर पहुँचा और सामान रखकर रिक्शे का इंतजार करने लगा। मोती बार-बार मेरा सामान और मेरा पैर सूँघ रहा था, रिक्शे पर चढ़ने लगा तो मोती कूँ-कूँ करते हुए मेरे पैरों से लिपट गया। उसे हटाते हुए मेरा गला भर आया। एक सप्ताह तक उसके साथ रहकर मैं वापस दिल्ली जा रहा था। मैं उसे लौटाना चाह रहा था पर वह अपना अगला पैर रिक्शे पर टिकाकर खड़ा हो गया, जैसे रिक्शे को रोक लेना चाहता हो। मैंने रिक्शे वाले से रेलवे स्टेशन चलने के लिए बोला और रिक्शा आगे बढ़ गया। मैं मोती को भगाता रहा लेकिन वह गली में न मुड़कर रिक्शे के पीछे दौड़ पड़ा। वह ऐसे चल रहा था जैसे मन में कुछ निश्‍चय करके निकला हो, मैंने भी बोलना बन्द कर दिया और हम दोनों स्टेशन तक आ गये।

रिक्शे से उतरकर एक बार फिर मोती को प्यार किया और सोचा कि वह लौट जाए पर आज वह मुझे छोड़ने को तैयार ही नहीं था। मोती मेरे साथ प्लेटफार्म पर भी चला आया। मोती को लेकर मुझे चिन्ता हो रही थी कि वह लौटेगा कैसे? पर इन सबसे बेखबर वह मेरे साथ वहीं प्लेटफार्म पर खेल रहा था। मुझे याद आया कि वह स्टेशन तक पिताजी के साथ कई बार टहलने आ चुका है, इसलिये उसके प्रति मेरी चिन्ता कुछ कम हो गई। समय आराम से कट रहा था, इसलिए मैं उसके साथ खेलने लगा। ट्रेन का समय हो गया, स्टेशन पर हलचल होने लगी तो मोती मेरे पास आकर चुपचाप खड़ा हो गया और ट्रेन को देखता रहा। उसकी आँखों में बेबसी थी, जैसे कि वह ट्रेन का कुछ कर नहीं सकता। ट्रेन रुकी तो मैं भागकर, थोड़ी दौड़ लगाकर अपनी बोगी में चढ़ गया। सामान रखकर बाहर देखा तो मोती भी मेरे साथ दौड़ आया था और दरवाजे के सामने खड़ा था। मैं वहीं खड़ा हो गया। थोड़ी ही देर में ट्रेन खुल गई और स्टेशन से सरकने लगी। मोती ट्रेन के साथ भागने लगा, बाय-बाय कहकर उसे लौटाने की कोशिश की पर वह ट्रेन के साथ अपनी स्पीड भी बढ़ाता गया। थोड़ी ही देर में ट्रेन ने उसे पछाड़ दिया और आगे निकल गई। मोती मेरी आँखों से ओझल हो गया तो थोड़ी देर तक मैं उसे ढूढ़ने की अनायास कोशिश की और फिर आकर अपनी सीट पर बैठ गया।

मैं खिड़की वाली सीट पर बैठा था। बाहर जाने-पहचाने खेत, बिल्डिंगें, रास्ते सब पीछे छूटते जा रहे थे। दूर खेतों के पार, पेड़ की झुरमुटों के बीच सूरज क्षितिज के नजदीक था और छिपने की कोशिश कर रहा था। यादों में उतनी तीव्रता अब नहीं रह गई थी पर दिल एक कोने से पसीज रहा था, थोड़ा गीलापन लग रहा था हालाँकि वह आँखों की कोरों तक नहीं आ पाया था। महसूस हो रहा था कि सब जाना पहचाना पीछे छूटता जा रहा है। जैसे-जैसे ट्रेन की स्पीड बढ़ती गयी मन में विचारों का प्रवाह अबाध होने लगा। घर से लौटते हुए हर बार मेरी अवस्था ऐसी ही रहती है। घर में एक सप्ताह ऐसे बीतता है, जैसे कुछ कर ही नहीं पाया, किसी से मिल भी नहीं पाया, अभी शहर को आँख भर देख भी नहीं पाया और जाने का समय हो गया।

शहर की गंध अभी भी ट्रेन की खिड़की से होकर नथुनों में भर रही थी और अपनापन का वातावरण चारों तरफ से घेरे हुए था। मैं निश्चिन्‍त बैठकर विचारों के उड़न खटोले पर सवार था। मन में मोती की दौड़ बाकी थी, पता नहीं वह क्या कहना चाह रहा था? मैं इतनी बार घर आकर लौट चुका हूँ फिर इस बार ही वह स्टेशन तक क्यों आया? हाँ! यह बात जरूर है कि पिछली बार की अपेक्षा मैं इस बार घर पूरे एक साल बाद गया था। मोती मुझसे बहुत अधिक प्यार करता है क्योंकि मैं उसे गली से उठाकर घर में लाया था। सात साल पहले की बात है जबकि हमारे घर के सामने वाले प्लॅट पर मकान नहीं बना था, खाली मैदान था, वहीं मुहल्ले के सारे बच्चे खेला करते थे। एक दिन हम लोग क्रिकेट खेल रहे थे, उसी समय एक छोटा पिल्ला मोटर साइकिल के नीचे आते-आते बचा था। मरने से तो वह बच गया, परन्तु उसके पैरों और पेट में चोट आ गई थी। चोट ज्यादा थी, इसलिए मैं उसे घर उठा लाया था।

ट्रेन तेजी से भागी जा रही थी और मन में विचार भी उतनी ही तेजी से आते जा रहे थे। एक छोटी सी नदी हमारे शहर की सीमा पर पड़ती है, ट्रेन उसके ऊपर से गुजरी तो मेरा विचार भंग हुआ। इस नदी को पार करने के बाद मुझे हवा की गंध बदली हुई महसूस होती है, मैंने अपने को सिकोड़ लिया जैसे कि अनजाने देश में आ गया होऊँ। गला अवरुद्ध होने लगा, आँसू आँख की कोरों को भिगा गये थे। ऐसे समय में इच्छा होती कि कोई परिचित मिल जाये और उससे अपने शहर की यादों की बात कर लें या फिर उसके कन्धे पर सिर रखकर रो लें परन्तु इस नदी के बाद मन एकदम से उखड़ जाता है और ऐसा हर बार होता है। मैं अभी भी बाहर शून्य में देख रहा था पर आँख कुछ देखने को तैयार ही नहीं थी। बाहर क्या-क्या पीछे छूटता जा रहा है अब उसको उससे मतलब ही नहीं था। टीटीई साहब आकर गये थे, विचार प्रवाह में दखल पड़ा तो फिर मोती की फिक्र शुरू हो गई, मुझे लगा कि घर पर बात करके देखना चाहिए।

घर बात की, पिताजी से पता चला कि मोती अब तक घर नहीं पहुँचा है। मैंने उनसे बता दिया कि वह मेरे साथ स्टेशन तक आ गया था। मैं बात और आगे नहीं बढ़ा सका क्योंकि अभी थोड़ी देर पहले घर से निकला था। पिताजी और माँ को अकेले छोड़कर। मोती की बात भी एक बहाना थी, वह तो मैं उनकी आवाज सुनना चाहता था कि कहीं वे अब तक रो तो नहीं रहे हैं। फोन रखकर मैंने खिड़की पर सिर टिका दिया और बाहर देखने लगा। अँधेरा घिर रहा था, शाम की शांति मन में गहराती जा रही थी। तन्हाई के साथ आशंकाएँ मन में घिरती जा रही थीं। यादों का जो घोड़ा दौड़ पड़ा था वह अब रोकने से भी नहीं रुक रहा था।

मुझे वह रात याद आने लगी जब मोती पहली बार हमारे घर आया था। उस रात मुझे बहुत डाँट सुननी पड़ी थी। उस समय हम लोगों की परीक्षाएँ चल रही थीं। पिताजी को लगा था कि इसके चलते हम लोग पढ़ाई से भटक सकते हैं। उस समय मोती को देखभाल की जरुरत भी थी, दूसरे चोट लगे होने के कारण पिताजी का मन कराह भी रहा था कि उसे कुछ हो गया तो नाहक ही पाप लगेगा। पता नहीं दर्द से या अपनों से बिछड़ने के कारण उस रात वह कूँ-कूँ करता रहा। पिताजी और माँ उसके पास ही सोये हुए थे इसलिए रातभर उन्हें नींद नहीं आई। सुबह मुझे फिर डाँट सुननी पड़ी। गुस्से में आकर पिताजी उसे उठा ले गये और गली के बाहर सड़क पर छोड़ आए, जहाँ उसके और साथी पिल्ले भी थे। परन्तु वह एक घण्टे के अन्दर ही वापस आ गया। लोगों को थोड़ा आश्‍चर्य हुआ परन्तु मुझे पूरा विश्‍वास था कि वह वापस आयेगा ही।

उसी दिन शाम को जब अँधेरा हो गया तो पिता जी उसे लेकर फिर बाहर निकल गये और दूर बाजार में ले जाकर छोड़ आए, जहाँ उसके साथी भी नहीं थे। जब मुझे पता चला तो मैं बहुत दुखी हुआ लेकिन पिछली रात पिताजी की नींद खराब हुई थी, वे बहुत अधिक नाराज थे, इसलिए मैं भी चुपचाप रो-धोकर चुप रह गया। दूसरे दिन सुबह पिताजी के जोर-जोर से बोलने की आवाज से मेरी नींद खुली। मैं डरते हुए बाहर निकला तो वह कूँ-कूँ करता हुआ आकर मेरे पैरों को चाटने लगा। इस बार चौंकने की बारी मेरी थी। उसकी आँखें गीली थी, शायद आँसू ही रहा हो, कृतज्ञता के आँसू! मैंने उसी समय उसका नामकरण मोती कर दिया और मोहल्ले के लोग भी उसे मोती नाम से बुलाने लगे थे। पिताजी की नाराजगी भी कुछ कम हो गई थी, उन्होंने बताया कि रात के दो बजे से ही गेट पर खड़ा होकर चिल्ला रहा था। हमारे घर का गेट बहुत बड़ा है तथा नीचे काफी जगह होती है जिससे बड़े कुत्ते भी अन्दर आ सकते हैं। परन्तु वह रात भर ठण्ड में बाहर ही खड़ा होकर चिल्लाता रहा, अन्दर नहीं आया था। जब पिताजी ने सुबह गेट खोला तभी वह अन्दर आया जैसे कि अन्दर आने की आज्ञा और सहमति चाह रहा हो। उस दिन के बाद पिताजी ने उसे बाहर छोड़ने की कभी कोशिश नहीं की और वह हमारे घर का सदस्य बन गया। पिताजी को भी उस दिन महसूस हो गया था कि इतनी कृतज्ञता तो मनुष्यों में भी नहीं मिलती कि दुत्कारे जाने के बाद भी एहसान उतारने के लिए आज्ञा मांगे।

रात हो चुकी थी ट्रेन के बाहर अब अँधेरे का साम्राज्य स्थापित हो चुका था। ट्रेन की खिड़की खुली हुई थी, थोड़ी देर में दूर आकाश में सुबह जैसा हल्का प्रकाश दिखाई देने लगा जैसे कि पौ फटने के समय पूरब दिशा में प्रकाश दिखाई देता है। लखनऊ आने वाला था और वे शहर की लाइटें थीं जो आसमान को रोशन किये हुए थीं। कुछ यात्री उतरने की तैयारी करने लगे थे। लखनऊ इस रास्ते में एक बड़ा स्टेशन है। उत्तर प्रदेश की राजधानी है और रेलवे का बहुत बड़ा जंक्शन भी। हमारी ट्रेन यहाँ आधे घण्टे के लिए रुकती है और रात के लगभग नौ बजे पहुँचती है अतः इस ट्रेन-समाज का यह नियम सा बन गया है कि लखनऊ आने वाला हो या आ गया हो तो भोजन की तैयारी शुरू हो जाती है। लखनऊ में उतरकर प्लेटफार्म पर टहला जाता है और फिर जब ट्रेन यहाँ से खुलती है तो लोग बिस्तर लगाना शुरू कर देते हैं। मैं अभी खाने के लिए तैयार नहीं था और सोच रखा था कि ट्रेन जब लखनऊ से खुलेगी तब खाऊँगा।

ट्रेन लखनऊ पहुँची तो मैंने फिर घर फोन किया। पिताजी ने फोन उठाया और बताया कि अब तक मोती घर नहीं लौटा। थोड़े चिन्तित लग रहे थे। माँ और पिताजी ने अभी तक खाना भी नहीं खाया था और खाना अभी बना भी नहीं था। मैंने थोड़ा समझाने की कोशिश की कि चलिये आ जाएगा, पर पिताजी की आवाज से लग रहा था कि वह घबराए हुए हैं। वह मोती के बारे में पड़ताल करने लगे और पूछे कि वह कहाँ तक गया था। मैंने बताया कि प्लेटफार्म के आखिरी छोर तक बढ़ आया था और पुलिया तक दौड़ते हुए देखा था। उसके बाद ट्रेन थोड़ा सा मुड़ जाती है इसलिए वह मुझे दिखा नहीं। इस बात को सुनकर पिताजी की चिन्ता थोड़ी बढ़ गई। वह बताने लगे कि मोती पुलिया को कभी पार नहीं करता था। पुलिया के पार वाले कुत्ते उसे देखते ही दौड़ा लेते हैं, इसलिए वह पुलिया तक भी नहीं जाता बल्कि उसके पहले ही उन्हें भी लौटा लाता था। रात हो चुकी थी, अब किया ही क्या जा सकता था। थोड़ी बातचीत हुई और उसी चिन्ता में मैंने फोन रख दिया। मेरा मन भी आशंकित होने लगा था।

मैंने सुन रखा था कि हर जानवर अपने मूत्र से, अवशिष्ट से या शरीर की गन्ध से एक रेखा खींचता है, अपनी दुनिया की सीमा बनाता है, जिसके बाहर वह नहीं निकल पाता। निकलता है तो उसका अस्तित्व मिट जाता है। मोती का जीवन मेरे घर से शुरू होकर गली के आखिरी छोर तक बीतता था। वह सड़क पर कभी अकेले नहीं जाता था। जब कभी मैं घर से बाहर जाता तो लौटने पर वह मुझे वहीं गली के छोर पर मिल जाता था। मेरी स्मृतियाँ फिर हावी होने लगीं। मोती आज सुबह से ही परेशान था। पता नहीं उसे कैसे पता चल गया था कि आज मुझे जाना है। बार-बार वह मेरे पास आकर पैरों से लिपट जाता था। यहाँ तक कि मैं बाथरूम या टायलेट जाता तो वह दरवाजे के बाहर बैठकर इंतजार करता रहता। शाम को घर से निकलते हुए वह भी मेरे साथ आ गया था। मैंने बहुत कोशिश की थी कि वह लौट जाये पर माना नहीं। अब मुझे अपने ऊपर खीझ आ रही थी कि मुझे उसे जबरदस्ती घर में बाँध देना चाहिये था। पर अब क्या हो सकता था। मुझे लगने लगा कि वह मुझे रोकना चाहता था पर रोक नहीं सका और खुद मेरे साथ अपनी दुनिया की सीमा को पार करने की कोशिश की। पता नहीं अब वह बचा भी है कि नहीं और बचा है तो घर भी लौट पायेगा या नहीं।

इन्हीं सब विचारों के बीच मैंने आधे मन से कुछ खाया और फिर खिड़की बन्द कर सोने की कोशिश करने लगा। नीचे वाली सीट थी इसलिये सिर उठाकर खिड़की पर ही रख लिया था और बाहर अन्धेरे में देखने की कोशिश करता रहा। मोती की बात मन से हटती ही नहीं थी। डेढ़-दो घण्टे बाद ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी तो मैंने घर फोन करने की कोशिश की। मैंने सोचा था कि एक-दो घण्टी में फोन उठा तो बात करूँगा, नहीं तो काट दूँगा। पर फोन बजते ही पिताजी ने उठा लिया। अभी तक सोये नहीं थे। मोती घर नहीं लौटा था। उनकी टाल-मटोल वाली बात से लगा कि वे लोग तब तक खाना नहीं खाए थे। सड़क पर आकर घण्टों खड़े थे पर कहीं से कोई खबर नहीं मिली थी। उनकी गीली होती आवाज से पता चल रहा था कि वे कितनी कोशिश करके बात कर पा रहे हैं। लोगों के घर से जाने के बाद अभी तक उन्हें मोती का सहारा हुआ करता था और वे लोग उसे खिलाने, टहलाने और उससे बातें करके अपना समय काटते थे पर आज मेरे साथ मोती भी घर से निकल आया तो जैसे उनकी दुनिया वीरान हो चुकी थी। मैं भी कुछ कह नहीं सका, चुपचाप फोन रख दिया। सोने की झूठमूठ कोशिश करने लगा पर आँखों में मोती की तस्वीरें घूम रहीं थी।

एक हफ्ते पहले जब मैं घर आया था तो मोती गली के बाहर मुझे इंतजार करता हुआ मिला था। ट्रेन के टाइम पर पिताजी ने उसे बताकर भेज दिया था तो वह गली के बाहर आकर खड़ा था। मुख्य सड़क से हटकर अपनी गली में मुड़ा ही था कि मुझे वह दिखलाई पड़ा। उछलकर मेरे मुँह तक चढ़ आया और फिर पैर सूँघकर, पैण्ट को मुँह से पकड़कर थोड़ा खींचते हुए आगे बढ़ने लगा। मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा तो वह दौड़कर घर की ओर जाने लगा। मोती आगे-आगे चल रहा था और मैं उसके पीछे-पीछे। घर का गेट खुला हुआ था और पिताजी वहीं खड़े थे। मैं पाँव छूकर अन्दर घुसा तो मोती माँ को खींचते हुए ला रहा था। पिछले दो साल से पिताजी और माँ का बस यही साथी रह गया था। उस समय मन को तसल्ली हुई थी कि मोती को वे झिड़क नहीं रहे थे, जबकि आये दिन फोन पर मोती की शिकायतें सुन सुनकर मैं कभी-कभी खीझ जाता था। यह सोचकर परेशान हो जाता था कि मेरे कारण पिताजी और माँ को परेशानी उठानी पड़ रही है।

मेरे आश्‍चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने देखा कि रसोई में भी मोती माँ के साथ है। मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हो रहा था क्योंकि जब तक हम लोग घर में थे तब तक तो उसे रसोई के दरवाजे तक भी आने नहीं दिया जाता था। हफ्ते भर घर में रहकर संतोष के साथ ही मेरे मन में एक हल्की सी ईर्ष्‍या की रेखा भी जग आई थी कि मोती तो हमसे अधिक माँ और पिताजी के नजदीक हो गया था और यह भी कि पिताजी और माँ को मोती से अधिक लगाव हो गया था। माँ और पिताजी की हालत सोचकर मन और परेशान हो गया और मैं यादों के क्रम को तोड़कर सोने की पुनः कोशिश करने लगा परन्तु आज की रात तो सब व्यर्थ था।

अभी तक जो केवल एक कुत्ता था, अब घर के सदस्य सा महत्वपूर्ण हो चुका था और ऐसे विचार उठने लगे थे कि उसके बिना जीवन कैसा हो जायेगा। खासकर माँ और पिताजी का क्या होगा? जो इतने दिनों से उसके साथ जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं। मोती भी उनके साथ खूब शरारतें करता था। पिताजी के लिये वह समय व्यतीत करने का साधन बन गया था। दो साल पहले पिताजी नौकरी से रिटायर हो चुके थे इसलिए उनके लिये मोती के साथ समय बिताना आसान हो गया था। इस बार पूरे एक हफ्ते की छुट्टी में मैं कहीं गया नहीं, अपने साथ पढ़ने वाले पुराने दोस्तों में से भी कोई इस समय घर नहीं आया था, कोई तीज त्यौहार का मौसम भी नहीं था इसलिये किसी से विशेष मिलना-जुलना नहीं हुआ। मेरे घर में रहने से मोती खूब खुश था। बातचीत में माँ और पिताजी घूम फिरकर मोती और उसकी शरारतों पर आ जाते थे। उसकी शरारतें मुझे ऐसे सुनाते जैसे वह मेरा बेटा हो। शिकायतें सुनकर भी मुझे अच्छा लगता था। क्योंकि मैंने महसूस किया कि उनकी शिकायतों में शिकायत से अधिक उसे सुनाने का भाव रहता था।

मैं करवट बदलता रहा और सोने की कोशिश करता रहा पर सब व्यर्थ था। कभी माँ, कभी पिताजी तो कभी खुद मोती मेरी चिन्ता का विषय बन जाते। मैं इन्हीं पाटों के बीच पिसता रहा। इनके जीवन में मुझे परस्पर निर्भरता दिखने लगी थी। मुझे लगता कि मोती और अन्य मूक जानवरों को देखभाल की अतिरिक्त जरूरत होती है क्योंकि वे किसी से कुछ कह नहीं सकते। इसी तरह यह भी लगता कि बूढ़े होते माँ-बाप को भी किसी बच्चे की जरूरत होती है जिसके साथ वे खेल सकें और फिर अपने मन की बात कह सकें। बस कह सकना ही अधिक महत्वपूर्ण होता है इस उम्र में। उस पर अमल हो या न हो, उसका कोई प्रभाव पड़े या न पड़े इसका बहुत मतलब नहीं रह जाता। परन्तु जीवन की दौड़ में आदमी जानवरों की तरह अपनी सीमाएँ नहीं बना पाता। वह हर गन्ध, हर सीमा को पीछे छोड़ आगे निकल जाता है। अपने अस्तित्व को बचाए भी रखता है, चाहे जिस तरह का भी अस्तित्व हो।

मेरे दिमाग में अब तक सीखी हुई बातें चलने लगीं कि जानवर दिमाग का ज्यादा प्रयोग नहीं करते। वे हृदय के बल पर पूरे अस्तित्व के साथ जीवन जीते हैं। इसलिये जब अपनी सीमाएँ तोड़ते हैं तो उनका अस्तित्व नहीं बच पाता। लेकिन देखता हूँ कि इन्सानों के साथ रहकर जानवर भी अपनी सीमाएँ तोड़ने की हिमाकत करने लगे हैं। उनमें इन्सानों सी समझ बढ़ती जा रही है, हो सकता है यह उनके जीवन के लिये अपरिहार्य जरूरत ही बनती जा रही हो। यही सब सोचते हुए यादों का सिलसिला वहाँ तक पहुँच गया जबकि मैं पहली बार दिल्ली के लिये निकला था। उस समय मोती बहुत दुखी हुआ था, उसने दो दिनों तक खाना नहीं खाया था। उसे यह बात पता नहीं कैसे समझ आ गई थी कि मैं बाहर जा रहा हूँ। शायद एहसास दिमाग से समझने वाली चीज नहीं है, इसलिये जीवन के लिये दिमाग अपरिहार्य नहीं है, केवल एहसासों के बल पर भी जीवन जीया जा सकता है।

रात इसी तरह के झंझावातों में बीत गया और पता नहीं किस पहर में आंखों में नींद उतर आई। यात्रियों के शोरगुल से आँख खुली तो दिल्ली आने वाला था। अभी बाहर घुप अन्धेरा था। जाड़े के दिनों में पाँच बजे तो रात ही होती है। कमरे पर जाने के लिये ऑटो में बैठा तब तक भी उजाला नहीं हुआ था। फिर भी मैं खुद को रोक नहीं सका और घर फोन कर दिया। फोन पर पिताजी की आवाज सुनकर मैं घबरा गया। कभी भी इतना अधीर होकर उनको बात करते नहीं सुना था। वह उस समय टहलने निकल चुके थे। टहलना तो बहाना था, दरअसल वह मोती को ढूढ़ने निकले थे। स्टेशन की ओर जा रहे थे। मैंने बात को हल्का करने के लिए बोल दिया कि अरे क्या हुआ? आप लोगों को परेशान करता था, चलिये छुटकारा मिल गया। आप लोग भी खाली हो जायेंगे, आपका समय बचेगा। पिताजी ने मेरी बात का कोई विरोध नहीं किया। उनके रूँधे गले से बस इतनी आवाज सुनाई पड़ी- ‘‘जिन्दगी इतनी खाली भी अच्छी नहीं लगती कि कोई परेशान करने वाला ही न हो।’’ मैंने बातचीत को अपनी ओर मोड़ने की कोशिश की। अब सुबह हो चुकी थी इसलिये मैं उन्हें अकेला ऐसे ही छोड़ देने के लिये तैयार नहीं था। मैंने कहा कि मुझे भी रोज शिकायतें सुननी पड़ती थीं, इतना सुनते ही पिताजी एकदम से बिफर पड़े। बोलने लगे- ‘‘परेशान करता था, इसी बहाने तो तुम लोगों से दो-चार बातें कर लेता था, नहीं रहेगा तो क्या बात करूँगा? फोन उठाते ही बोलूँगा अच्छा हूँ, जिन्दा हूँ बस! इसके अलावा हमारी जिन्दगी में क्या घटित होता है, जो तुम लोगों को बताऊँ? उसके होने से घटनाएँ तो हैं, बाते तो हैं… (थोड़ा रुककर आवाज को सम्‍भालते हुए) और बातें हैं तो जिन्दगी है।’’

इतनी बातें सुनकर तो मेरा दिमाग सुन्न हो गया। मैंने इस तरह से कभी सोचा ही नहीं था। मुझे इसकी उम्मीद ही नहीं थी कि पिताजी की तरफ से ऐसी प्रतिक्रिया आ सकती है। मुझे कभी यह एहसास नहीं हुआ था कि माँ और पिताजी इतने अकेले हो गये हैं कि उनके जीवन में घटनाएँ भी नहीं बची हैं। पर सच यही था कि घटित होने के लिए उनके अपने जीवन में क्या था ही? जो था उनके बेटों, बेटियों या उनके भी बच्चों के जीवन में था पर वे उनके साथ नहीं थे। मैं सोच ही नहीं पा रहा था कि आखिर क्या जवाब दूँ, क्या समझाऊँ? फोन पर बड़ी लम्बी चुप्पी दोनों ओर से रही और अंत में पिताजी ने बात पूरी की कि ‘‘आज से पहले इसने (मोती ने) कभी पुलिया पार करने की कोशिश नहीं की थी, कल यह यहाँ तक बढ़ आया।’’ यही कहकर उन्होंने फोन काट दिया।

कमरे पर पहुँचने के थोड़ी देर बाद ही पिताजी का फोन आ गया। मुझे उठाते हुए डर लग रहा था, पर उनके पहले ही शब्द ने वह डर दूर कर दिया। उनकी निश्चिन्त आवाज में पहले जैसी खनक थी। उन्होंने बताया कि मोती उसी पुलिया के नीचे सूखे घासों के बीच दुबका हुआ बैठा था और उनके आते ही कूँ-कूँ करते हुए पैरों से लिपट गया। पिताजी की आवाज में गजब का विश्‍वास और गर्व झलक रहा था। जैसे कि मोती उनके विश्‍वास पर खरा उतरा हो, जैसे कि उनके बुढ़ापे की दुनिया वीरान होने से बच गयी हो। पिताजी ने बाद में बताया कि पहले भी टहलते समय वह कभी पुलिया तक नहीं जाता था। वह पुलिया से बहुत डरता था तथा उन्हें भी वहाँ तक नहीं जाने देता था। मोती ने मेरे साथ मिलकर अपनी बनाई हुई सीमा रेखा को तोड़ने की कोशिश की थी परन्तु वह उससे पार नहीं जा सका और मेरा पीछा करना छोड़कर वहीं बैठ गया। उसे एहसास हो गया होगा कि उस सीमा से बाहर जाना उसके बस की बात नहीं है, आदमी ही अपनी सीमाएँ तोड़ सकता है क्योंकि आदमी की भूख अनन्त है, उसकी यात्रा अनन्त है…।

चित्र : प्रगति त्‍यागी, कक्षा: 11

चिड़िया और दाना : गोपाल प्रधान

लोककथाओं का एक रोमांचक संसार है। एक लोककथा कई भाषाओं/बोलियों में प्रचलित है और उनका अलग ही आनंद है। एक ऐसी ही लोककथा को भोजपुरी में लिखा है गोपाल प्रधान ने-
एक चिड़िया को दाल का एक दाना मिला । उसने सोचा कि इसमें से आधा वह अभी खा लेगी और बाकी आधा चोंच में दबाकर दूर देस उड़कर जा सकेगी । यही सोचकर उसने दाने को चक्की में दो हिस्सा करने के लिए डाला । चक्की चलाते ही एक हिस्सा तो टूटकर बाहर आ गिरा लेकिन शेष आधा चक्की के खूँटे में फँसा रह गया । अब तो कोई खूँटे को चीरे तो दाना निकले और वह अपना सफर शुरू करे । पहले चिड़िया बढ़ई के पास गई । बोली-
बढ़ई बढ़ई खूँटा चीर खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

बढ़ई ने समय न होने का बहाना बनाकर इनकार कर दिया । तब चिड़िया राजा के पास गई । बोली-
राजा राजा बढ़ई डाँट बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

राजा ने कहा- जाओ, तुम्हारे लिये मैं बढ़ई को नहीं डाँटूँगा । चिड़िया रानी के पास गई । बोली-
रानी रानी राजा छोड़ राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

रानी ने भी उसकी माँग की ओर ध्यान नहीं दिया और डाँटकर भगा दिया । चिड़िया साँप के पास गई । बोली-
सरप सरप रानी डँस रानी न राजा छोड़े
राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

साँप को भी यह काम करने लायक नहीं लगा । फिर चिड़िया लाठी के पास गई । बोली-
लाठी लाठी सरप ठेठाव सरप न रानी डँसे
रानी न राजा छोड़े
राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

लाठी ने भी उसकी मदद करने से इनकार कर दिया । चिड़िया भाड़ के पास गई । बोली-
भाड़ भाड़ लाठी जार लाठी न सरप ठेठावे
सरप न रानी डँसे
रानी न राजा छोड़े
राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

भाड़ को भी उसकी माँग नाजायज लगी । चिड़िया हाथी के पास गई । बोली-
हाथी हाथी भाड़ बुताव भाड़ न लाठी जारे
लाठी न सरप ठेठावे
सरप न रानी डँसे
रानी न राजा छोड़े
राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

हाथी भी इस काम के लिए तैयार न हुआ । चिड़िया भँवर के पास गई । बोली-
भँवर भँवर हाथी छान हाथी न भाड़ बुतावे
भाड़ न लाठी जारे
लाठी न सरप ठेठावे
सरप न रानी डँसे
रानी न राजा छोड़े
राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

भँवर भी उसकी मदद करने से इनकार कर बैठा । हारकर चिड़िया पुराने दोस्त मूस के पास गई । बोली-
मूस मूस भँवर काट भँवर न हाथी छाने
हाथी न भाड़ बुतावे
भाड़ न लाठी जारे
लाठी न सरप ठेठावे
सरप न रानी डँसे
रानी न राजा छोड़े
राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

आखिरकार चूहा उसकी मदद को राजी हो गया और चला भँवर को काटने । भँवर ने जब सुना तो बोला-
हमको काटो ओटो मत कोई
हम हाथी छानब लोई
हाथी ने सुना तो बोला-
हमको छानो ओनो मत कोई
हम भाड़ बुताइब लोई

भाड़ ने सुना तो बोला-
हमको बुताओ उताओ मत कोई
हम लाठी जारब लोई
लाठी ने सुना तो बोली-
हमको जारो ओरो मत कोई
हम सरप ठेठाइब लोई

साँप ने सुना तो बोला-
हमको ठेठाओ ओठाओ मत कोई
हम रानी डँसब लोई

रानी ने सुना तो बोली-
हमको डँसो ओसो मत कोई
हम राजा छोड़ब लोई

राजा ने सुना तो बोला-
हमको छोड़ो ओड़ो मत कोई
हम बढ़ई डाँटब लोई

बढ़ई ने सुना तो बोला-
हमको डाँटो ओटो मत कोई
हम खूँटा चीरब लोई

और बढ़ई ने खूँटा चीर दिया । चिड़िया ने दाना चोंच में दबाया और उड़ चली परदेस ।

चित्र : रिया शर्मा, कक्षा-तीन

इंदौर में दूसरा फिल्‍मोत्‍सव 24 नवम्‍बर से

इंदौर : ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ श्रृंखला के अंतर्गत इंदौर में दूसरे फिल्‍मोत्‍सव का आयोजन 24 और 25 नवम्‍बर को प्रीतमलाल दुआ सभागार, रीगल चौराहा, इन्‍दौर में किया जा रहा है। इसकी मेजबानी ‘सूत्रधार’ कर रहा है।

24 नवम्‍बर को शाम 5.00 बजे से 6.00 बजे तक कार्यक्रम के लिये रजिस्‍ट्रेशन होगा। फिल्‍मोत्‍सव का शुभारम्‍भ 6.00 बजे होगा। मुख्‍य अतिथि होंगे वृत्‍तचित्र ‘ख़याल दर्पण’ के निदेशक युसूफ़ सईद। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के संजोयक संजय जोशी वीडियो क्‍लीपिंग्‍स के जरिये ‘सौ सालों के सफर में भारतीय डाक्‍यूमेंट्री फिल्‍म्‍स’ के महत्‍व को रेखांकित करेंगे। इस दौरान वृत्‍तचित्र ‘ख़याल दर्पण’ दिखाया जायेगा और इसके निदेशक युसूफ़ सईद से बातचीत होगी।

25 नवम्‍बर को कार्यक्रम की शुरुआत सुबह 10.30 बजे बच्‍चों की फिल्‍मों के विशेष सत्र से होगी। इसमें निदेशक राजेश चक्रवर्ती की ‘हिप-हिप हुर्रे’ और निदेशक अरुण खोपकर की ‘हाथी का अंडा’ दिखाई जायेगी।

लघु फिल्‍मों का विशेष सत्र 1.00 बजे शुरू होगा। निदेशक नीना पाले की की ‘दिस लैंड इज माइन’, निदेशक बर्ट हान्सत्रा की ‘ग्‍लास’ और ‘जू’, निदेशक लुईस फॉक्‍स की ‘द स्‍टोरी ऑफ स्‍टफ’, निदेशक सुमित पुरोहित की ‘आई वोक-अप वन मॉर्निंग एंड फाउंड मायसेल्‍फ फ्रेमस’, निदेशक राबर्ट एनरिको की ‘एन आकरन्‍स एट आऊल ग्रीक ब्रिज’ और निदेशक नकुल साहनी की ‘इज्‍जत नगरी की असभय बेटियां’ दिखाई जायेंगी। इस दौरान ‘इज्‍जत नगरी की असभय बेटियां’ पर चर्चा भी की जायेगी।

भारतीय सिनेमा के गौरवपूर्ण 100 वर्ष पर विशेष सत्र शाम 5.00 बजे शुरू होगा। इसमें निदेशक फैज़ा अहमद की ‘सुपरमैन ऑफ मालेगांव’, निदेशक एम.के. रैना और अनंत रैना की ‘जोहरा सहगल’ तथा निदेशक एम.एस. सथ्‍यू की ‘गर्म हवा’ दिखायी जायेगी। इस अवसर पर अभिनेता बलराज साहनी पर केंद्रित पोस्‍टर का विमोचन भी किया जायेगा।

‘दस्तक’ का लोकार्पण 24 नवम्बर को

नई दिल्‍ली : यशोदा सिंह की पुस्‍तक ‘दस्तक’ का लोकार्पण 24 नवम्बर 2012 को शाम 6 बजे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर(आई.आई.सी.) एनेक्सी,  लेक्चर रूम-1, ग्राउंड फ्लोर, मेक्सम्यूलर मार्ग, नयी दिल्ली में किया जायेगा।

कार्यक्रम का संचालन मानवाधिकार कार्यकर्त्ता जोज़फ़ मथाई करेंगे। यशोदा सिंह ‘दस्तक’ के अंश पढ़ेंगी और इस किताब पर कवियित्री-लेखिका अनामिका, आलोचक और कहानीकार संजीव कुमार व मीडिया विश्‍लेषक विनीत कुमार चर्चा करेंगे।

‘साम्राज्यवाद-विरोध, आलोचना और रामविलास शर्मा’ पर सेमिनार 23 से

नई दिल्‍ली : आलोचक रामविलास शर्मा की जन्‍मशती के अवसर पर 23, 24 और 25 नवम्बर को कांफ्रेंस सेंटर(वनस्‍पति विभाग के सामने), उत्‍तर परिसर, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में ‘साम्राज्यवाद-विरोध, आलोचना और रामविलास शर्मा’ विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है।

सेमिनार 23 नवम्‍बर को दोपहर दोपहर 2 बजे शुरू होगा। इस सत्र की अध्यक्षता नामवर सिंह करेंगे। बीज वक्‍तव्‍य निर्मला जैन का होगा और अशोक वाजपेयी विशिष्‍ट अतिथि होंगे। मुख्‍य अतिथि होंगे दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के समकुलपति विवेक सुनेजा।

शाम चार बजे पहला सत्र शुरू होगा। इसका विषय है- ‘उपनिवेशवाद , नवजागरण और रामविलास शर्मा’।  इसकी अध्‍यक्षता हरवंश मुखिया करेंगे। मैनेजर पांडेय, नन्‍दकिशोर आचार्य और अभय कुमार दुबे इस विषय पर विचार रखेंगे।

24 नवम्‍बर को सुबह दस बजे पहला सत्र ‘हिन्‍दी आलोचना और रामविलास शर्मा’ होगा। इसकी अध्‍यक्षता विश्‍वनाथ त्रिपाठी  करेंगे। नित्यानंद तिवारी , शम्‍भुनाथ, कँवल भारती और रोहिणी अग्रवाल इस विषय पर अपने विचार रखेंगे।

दोपहर दो बजे दूसरे सत्र का विषय ‘भाषा , समाज और रामविलास शर्मा’ होगा। इसकी अध्‍यक्षता भगवान सिंह करेंगे। दिलीप सिंह , कृष्‍णदत्‍त शर्मा और रवीन्‍द्र गर्गेश वक्‍तव्‍य देंगे। ,

25 नवम्‍बर को सुबह दस बजे पहले सत्र का विषय होगा ‘ज्ञान-मीमांसा और रामविलास शर्मा’। इसकी अध्‍यक्षता मुरली मनोहर प्रसाद सिंह  करेंगे। राजेन्द्र कुमार , असद जैदी और रवि श्रीवास्तव इस विषय पर विचार रखेंगे।

दोपहर दो बजे दूसरे सत्र का विषय भी होगा ‘ज्ञान-मीमांसा और रामविलास शर्मा’। इसकी अध्‍यक्षता खगेन्द्र ठाकुर करेंगे। विजय बहादुर सिंह , कृष्णदत्त पालीवाल , प्रणय कृष्‍ण का वक्‍तव्‍य होगा।

शाम चार बजे समापन सत्र होगा। इसकी अध्‍यक्षत राजेन्‍द्र यादव करेंगे। इस अवसर विजय मोहन शर्मा की विशिष्‍ट उपस्थिति होगी। संवाद समाहार राजेन्‍द्र कुमार और रामेश्‍वर राय करेंगे। संगोष्‍ठी रपट आशुतोष कुमार पेश करेंगे औ धन्‍यवाद ज्ञापन गोपेश्‍वर सिंह देंगे।

संज्ञा सिंह की कवितायें

संज्ञा सिंह

20 जुलाई 1976 मसोढ़ा जौनपुर, उत्तर प्रदेश में जन्मी संज्ञा सिंह हमारे समय की एक महत्वपूर्ण व सशक्त कवियित्री हैं । वह शलभ श्रीराम सिंह की भतीजी हैं। संज्ञा अपने पिता के पास न रहते हुए शलभ जी साथ उनके अंतिम समय तक रहीं और वहीं उन्होंने कविता के संस्कार पाए। शलभ जी की मृत्यु के उपरांत लगभग दशक भर साहित्य जगत से दूर रह कर अब पुनः सक्रिय हुई हैं। उनकी कविताये विभिन्न साहित्यिक पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनका एक कविता संग्रह ‘अपने आलावा’ प्रकाशित को चुका है। उनकी कुछ कवितायें-

मेरी  सुबह

सुबह होगी
नीम के कुछ फूल होंगे
जमीन पर
पत्तियाँ दो चार-चार
इधर-उधर
बिस्तर पर पड़ी होंगी

सुबह होगी
एक फूल गुलाब का
खिला-अध खिला
तुम्हारे पास होगा
तुम्हारे हाथों
एक फूल वाली सुबह
मेरे हाथों में उतर आयेगी
सुबह होगी मेरी इस तरह 

नयी सृष्टि का ताल

राग की तरह धारण करना चाहती हूँ तुमको मैं
ग्रहण करना चाहती हूँ पराग  की तरह
खिले हुए फूल से उठा कर

सूरज की शक्ल में देखना चाहती हूँ अपना अनुराग
कुँवारेपन का सुहाग एक अनन्त नीले विस्तार में
तब्दील कर देना चाहती हूँ मैं
हो जाना चाहती हूँ एक कभी न बुझने वाली आग
तुम्हारे लिये

इतनी छोटी उम्र में मेरा यूँ दिखना
तुम्हारी निगाहों का कमल है
ब्रम्हा की नयी सृष्टि का ताल है शायद यह
रंग-रंग होता हुआ सुगंधमय शाश्‍वत…..

नीम के दो पेड़

द्वार का खालीपन भरते
नीम के दो पेड़
खूब सूरत होते जा रहे हैं
अपनी-अपनी छाया के साथ

बराबर चल रही है
एक-दूसरे  से बड़ा हो जाने की कोशिश
बरकरार है एक अघोषित प्रतियोगिता दिन-रात

अपनी सुन्दरता और हरियाली में समान
समान अपनी लम्बाई  और फैलाव में
मुश्किल हो  गयी है इनकी छटाई
कटाई मुश्किल हो गयी है इनकी हर किसी के लिए

जमीन को ढकने  और आसमान बनने की कोशिश में
मिलते जा रहे हैं दोनों एक दूसरे से
बाँहों में डालते हुए बाँहें
घर की छत से ऊपर
ऊपर अगल-बगल के तमाम पेड़ों से
कुएँ की तरफ बढ़ रहे हैं दोनों
अपनी झूमती टहनियों को देखने के लिये
पानी में

कल तक पतझड़ से निपटते हुए
खड़े थे दोनों बनकर ठूँठ
पत्तियों से पाटते हुए
अपने नीचे की जमीन पूरी की पूरी

आज बसंत की शुरुआत पर
वहरती  हुई अपनी नन्हीं पत्तियों के साथ
संसार का स्वागत कर रहे  हैं
भरते हुए निरंतर द्वार का खालीपन

श्रीनिवास श्रीकान्त के कविता संग्रह का विमोचन

शिमला : हिमाचल प्रदेश के जानेमाने वरिष्ठ कवि व आलोचक श्रीनिवास श्रीकान्त के 75वें जन्मदिन की पूर्व संन्ध्या पर 11 नवम्‍बर 2012 को शिमला के गेयटी सभागार में उनका लेखकों द्वारा सार्वजनिक अभिनंदन किया गया। गोष्ठी का आयोजन हिमालय साहित्य, संस्कृति और पर्यावरण मंच के तत्वावधान में किया गया जिसमें प्रदेश के लगभग 60 साहित्यकारों ने भाग लिया। इस अवसर पर श्रीनिवास श्रीकान्त के सद्य प्रकाशित कविता संग्रह ‘चट्टान पर लड़की’ का विमोचन हुआ जिसका विमोचन बाल कलाकार सिमरन ने किया। यह पहला अवसर था जब किसी संस्था की ओर से परम्परा को तोड़ते हुए किसी बालिका के कर कमलों द्वारा वरिष्ठ साहित्यकार की पुस्तक का लोकार्पण किया गया।

अध्यक्षीय सम्बोधन में वरिष्ठ लेखक रामदयाल नीरज ने कहा कि श्रीनिवास श्रीकान्त ने अपने पहले संग्रह ‘नियति, इतिहास और जरायु’ के माध्यम से पाठकों का ध्यान आकृष्‍ट किया था। उन्होंने कहा कि वह 1975 में श्रीनिवास जी के सम्पर्क में आए और उनकी विलक्षण सृजनात्मक प्रतिभा से रूबरू हुए। नीरज ने कहा कि श्रीनिवास ‘गिरिराज’ और ‘हिमप्रस्थ’ के सम्पादन से लम्बे समय तक जुड़े रहे और उन्होंने नई प्रतिभाओं को मंच प्रदान किया। उन्‍होंने कहा कि साहित्य के प्रति उनका रूझान व अनुराग श्रीनिवास श्रीकान्त के कारण हुआ।

आलोचक डॉक्‍टर हेमराज कौशिक ने श्रीनिवास श्रीकान्त के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वह बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं क्योंकि कवि के रूप में प्रतिष्ठित होने के साथ-साथ एक कुशल सम्‍पादक तथा आलोचना के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी विशिष्‍ट पहचान बनाई। तुलसी रमण ने उनकी पुस्तक ‘चट्टान पर लड़की’ पर विवेचनात्मक टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए कहा कि जिस भूमण्डलीकरण का सघन दौर अब आया है श्रीनिवास के कवि को करीब चार दशक पहले इसकी भनक थी। उन्होंने आगे कहा कि श्रीनिवास एक जन्मजात कवि हैं।वह

कविता का तानाबाना नहीं बुनते उसकी कविता सहज प्रवाह से आती है। असल में श्रीनिवास श्रीकान्त का रचनाकार कला विधाओं का कोलाज है। आत्मा रंजन, अवतार एनगिन, मधुकर भारती ने भी उनकी रचनाओं की चर्चा की। संगोष्ठी के आयोजक एस. आर. हरनोट ने कहा कि श्रीनिवास श्रीकांत एक अंतराल के चिंतन के बाद पुनः अपनी सक्रिय रचनात्मकता की ओर लौटे हैं और यह हम सभी को आश्‍चर्यचकित भी करता है कि पिछले तीन सालों में उनके तीन कविता संग्रह- ‘बात करती है हवा’, ‘घर एक यात्रा है’, ‘हर तरफ समंदर है’ के अतिरिक्त ‘कथा में पहाड़’ जैसा सम्‍पादित वृहद् कथा-ग्रन्थ और एक आलोचना पुस्तक ‘गल्प के रंग’ प्रकाशित हुए हैं।

कार्यक्रम का शुभारम्भ करते हुए ‘इरावती’ के सम्‍पादक राजेन्द्र राजन ने श्रीनिवास श्रीकान्त के हिन्दी साहित्य में अवदान को एक बड़ी उपलब्धि बताया और कहा वह हिमाचल के पहले ऐसे लेखक हैं जिन्होंने कविता के अलावा अन्य सभी विधाओं में समान रूप से दक्षता हासिल की। राजेन्द्र राजन ने मंच संचालन भी किया। इस अवसर पर श्रीनिवास श्रीकान्त ने तरून्नम में अपनी गजलें व गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। गोष्ठी में केशव, बद्रीसिंह भाटिया, अरविन्द रंचन, ओम भारद्वाज, तेज राम शर्मा, आरसी शर्मा, अरुण भारती, रजनीश, इन्द्रपाल, कुलराजीव पंत, नीता अग्रवाल, दिनेश अग्रवाल, अश्विनी गर्ग और निर्मला शर्मा आदि लेखक उपस्थित थे।