Archive for: October 2012

रामविलास शर्मा जन्मशतवार्षिकी संगोष्‍ठी 2-3 को

नई दि‍ल्‍ली : साहित्य अकादमी की ओर से रामविलास शर्मा जन्मशतवार्षिकी का आयोजन 2-3 नवम्बर 2012 को साहित्य अकादमी सभागार, प्रथम तल रवीन्‍द्र भवन,  नई दिल्ली में कि‍या जायेगा।

कार्यक्रम की शुरुआत शुक्रवार, 2 नवम्बर को पूर्वाह्न 10.30 बजे उद्घाटन सत्र से होगी। ब्रजेन्‍द्र त्रिपाठी, उपसचिव, साहित्य अकादेमी स्‍वागत वक्‍तव्‍य देंगे। आरंभिक वक्तव्य माधव कौशिक, संयोजक, हिन्दी परामर्श मंडल, साहित्य अकादेमी का होगा। उद्घाटन व्याख्यान शिवकुमार मिश्र और बीज भाषण अजय तिवारी देंगे। अध्यक्षीय व्याख्यान विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी, उपाध्यक्ष, साहित्य अकादेमी का होगा।

प्रथम सत्र अपराह्न 2.00 बजे शुरू होगा। इसका वि‍षय है- ‘हिन्दी आलोचना और रामविलास शर्मा’। इस सत्र की अध्यक्षता विश्‍वनाथ त्रिपाठी करेंगे। राजेन्‍द्र कुमार, अरुण कमल, राजेश जोशी और रवि श्रीवास्तव आलेख पढे़ंगे।

द्वितीय सत्र अपराह्न 4.30 बजे शुरू होगा। इसका वि‍षय है- ‘भारतीयता की अवधारणा और हिन्दी जाति’। इसकी अध्यक्षता रमेश कुंतल मेघ करेंगे। रवि भूषण, कृष्‍णदत्‍त पालीवाल, अवधेश प्रधान और अजय आलेख पढ़ेंगे।

शनिवार, 3 नवम्बर को तृतीय सत्र पूर्वाह्न 10.30 बजे शुरू होगा। इसका वि‍षय है- ‘हिन्दी नवजागरण का स्वरूप’। इसकी अध्यक्षता नित्यानंद तिवारी करेंगे। शंभुनाथ, श्रीभगवान सिंह, कर्मेन्दु शिशिर और सत्यदेव त्रिपाठी आलेख पढे़ंगे।

चतुर्थ सत्र अपराह्न 2.00 बजे शुरू होगा। इसका वि‍षय है- ‘भारतीय समाज और भाषा का प्रश्‍न’। इसकी अध्यक्षता भगवान सिंह करेंगे। दिलीप सिंह, राजेन्‍द्र प्रसाद पांडेय, गरिमा श्रीवास्तव और श्रीप्रकाश शुक्ल आलेख पढ़ेंगे।

कार्यक्रम में अंत में शाम 5.00 बजे रामविलास शर्मा पर उदय प्रकाश द्वारा निर्देशित तथा हिन्दी अकादमी द्वारा निर्मित वृत्‍तचित्र ‘कालजयी मनीषा’ का प्रदर्शन कि‍या जायेगा।

‘पुनर्वाचना’ का लोकार्पण 3 नवम्‍बर को

नई दि‍ल्‍ली : आलोचक पंकज पराशर की सद्यः प्रकाशित पुस्‍तक ‘पुनर्वाचना’ का लोकार्पण कमिटी रूम, भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में 3 नवम्‍बर, 2012 को सुबह 11 बजे कि‍या जायेगा। कार्यक्रम के अध्यक्षता प्रोफेसर नामवर सिंह करेंगे।

मुख्य अतिथि प्रोफेसर रामबक्ष, अध्यक्ष, भारतीय भाषा केंद्र, जे.एन.यू., दिल्ली होंगे। विशिष्ट अतिथि होंगे वीरेन्द्र कुमार बरनवाल। डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, पंकज बि‍ष्ट, गोपाल प्रधान, वैभव सिंह एवं आनंद पाण्डेय कार्यक्रम में वि‍चार वक्‍त करेंगे। पुस्तक पर आलेख पाठ करेंगे युवा आलोचक पल्लव। संचालन डॉ. शंभुनाथ तिवारी, एसोशिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ करेंगे।

रेखा चमोली की कवि‍तायें

8 नवम्‍बर, 1979 को कर्णप्रयाग, उत्‍तराखंड में जन्‍मी रेखा चमोली को हाल ही में ‘सूत्र सम्मान-2012’ दि‍ये जाने की घोषणा हुई है। उनकी कुछ कवि‍तायें-

अस्‍तित्‍व

दुनिया भर की स्‍त्रि‍यों
तुम जरूर करना प्रेम
पर ऐसा नहीं कि
जिससे प्रेम करना उसी में
ढूंढ़ने लगना
आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप

तुम अपनी जमीन पर रोपना
मनचाहे पौधे
अपने आकाश में भर लेना
क्षमता भर उड़ान
मन के सारे ओने-कोने
भर लेना ताजी हवा से
भीगना जी भर के
अहसासों की बारिश में
आवश्यकता भर ऊर्जा को
समेट लेना अपनी बाहों में

अपने मनुष्य होने की संभावनाओं को
बनाए रखना
बचाए रखना खुद को
दुनिया के सौन्दर्य व शक्‍ति‍ में
वृद्धि‍ के लिये
दुनिया के अस्‍ति‍त्‍व को
बचाए रखने के लिये।

उडा़न

एक स्त्री कभी नहीं बनाती बारूद बंदूक
कभी नहीं रंगना चाहती
अपनी हथेलियाँ खून से
एक स्त्री जो उपजती है जातिविहीन
अपनी हथेली पर दहकता सूरज लिये
रोशनी से जगमगा देती है कण-कण
जिसकी हर लडा़ई में
सबसे बडी़ दुश्मन बना दी जाती है
उसकी अपनी ही देह

एक स्त्री जो करना जानती है तो प्रेम
देना जानती है तो अपनापन
बोना जानती है तो जीवन
भरना जानती है तो सूनापन
बिछ-बिछ जाने में महसूस करती है बड़प्पन
और बदले में चाहती है थोडी़ सी उडा़न

एक स्त्री सहती है
बहती है
लड़ती है
बस उड़ नहीं पाती
फिर भी नहीं छोड़ती पंख फड़फडा़ना
अपनी सारी शक्‍ति‍ पंखों पर केन्‍द्रि‍त कर
एक स्त्री तैयार हो रही है उडा़न के लिये।

नदी उदास है

आजकल वह
एक उदास नदी बनी हुई है
वैसे ही जैसे कभी
ककड़ी बनी
अपने पिता के खेत में लगी थी
जिसे देखकर हर राह चलते के मुँह में
पानी आ जाता था

अपनी ही उमंग में
नाचती कूदती फिरती यहाँ वहाँ
अचानक वह बांध बन गयी

कभी पेड़ बनकर
उन बादलों का इन्तजार करती रह गयी
जो पिछली बार बरसने से पहले
फिर-फिर आने का वादा कर गये थे

ऐसे समय में जबकि
सबकुछ मिल जाता है डिब्बाबन्द
एक नदी का उदास होना
बहुत बड़ी बात नहीं समझी जाती ।

छुट्टी

सुबह से देख रहा हूँ उसे
बिना किसी हड़बडी़ के
जुट गयी है रोजमर्रा के कामों में
मैं तो तभी समझ गया था
जब सुबह चाय देते समय
जल्दी-जल्दी कंधा हिलाने की जगह
उसने
बडे़ प्यार से कंबल हटाया था
बच्चों को भी सुनने को मिला
एक प्यारा गीत
नाश्ता भी था
सबकी पसंद का
नौ बजते-बजते नहीं सुनार्इ दी
उसकी स्कूटी की आवाज

देख रहा हूँ
उसने ढूंढ़ निकाले हैं
घर भर के गन्दे कपडे़ धोने को
बिस्तरे सुखाने डाले हैं छत पर
दालों, मसालों को धूप दिखाने बाहर रखा है

जानता हूँ
आज शाम
घर लौटने पर
घर दिखेगा ज्यादा साफ, सजा-सँवरा
बिस्तर नर्म-गर्म धुली चादर के साथ
बच्चे नहाए हुए
परदे बदले हुए
चाय के साथ मिलेगा कुछ खास खाने को
बस नहीं बदली होगी तो
उसके मुस्कराते चेहरे पर
छिपी थकान
जिसने उसे अपना स्थाई साथी बना लिया है

जानता हूँ
सोने से पहले
बेहद धीमी आवाज में कहेगी वह
अपनी पीठ पर
मूव लगाने को
आज वह छुट्टी पर जो थी।

मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी

तुम चाहते हो
मैं बनूँ
गंगा की तरह पवित्र
तुम जब चाहे तब
डाल जाओ उसमें
कूडा़-करकट मल अवशिष्ट
धो डालो
अपने
कथित-अकथित पाप
जहाँ चाहे बना बांध
रोक लो
मेरे प्रवाह को
पर मैं
कभी गंगा नहीं बनूँगी
मैं बहती रहूँगी
किसी अनाम नदी की तरह
नहीं करने दूँगी तुम्हें
अपने जीवन में
अनावश्यक हस्तक्षेप
तुम्हारे कथित-अकथित पापों की
नहीं बनूँगी भागीदार
नहीं बनाने दूँगी तुम्हें बांध
अपनी धाराप्रवाह हँसी पर
मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी
चाहे कोई मुझे कभी न पूजे।

नींद चोर

बहुत थक जाने के बाद
गहरी नींद में सोया है
एक आदमी
अपनी सारी कुंठाएं
शंकाएं
अपनी कमजोरियों पर
कोई बात न सुनने की जिद के साथ
अपने को संतुष्ट कर लेने की तमाम कोशिशों के बाद
थक कर चूर
सो गया है एक आदमी
अपने बिल्कुल बगल में सोर्इ
औरत की नींद को चुराता हुआ।

प्रेम

चट्टानों पर उग आती है घास
किसी टहनी का
पेड़ से कटकर
दूर मिट्टी में फिर से
फलना फूलना
प्रेम ही तो है
प्रेम में पलटती हैं ऋतुएं।

धनिया के फूल

मेरे सामने की क्यारी में
खिल रहे हैं
धनिया के फूल
सफेद, हल्का नीला,मिला जुला सा रंग
नाजुक पंखुडि़यां, कोमल खुशबूदार पत्‍ति‍याँ
चाहो तो पत्‍ति‍यों को डाल सकते हो
दाल, सब्जी में
या बना सकते हो लजीज चटनी
ये छोटे-छोटे धनिया के फूल
नहीं करते कुछ खास आकर्षित
गुलाब या गेंदे की तरह
नहीं चढ़ते किसी देवी-देवता के
चरणों में
किसी नवयुवती ने नहीं किया
कभी इनका श्रृंगार
पर ये नन्हे-नन्हें फूल
जब बदल जाएंगे
छोट-छोटी हरी दानियों में
तो खुद ही बता देंगे
अपना महत्व
कि इनके बिना संभव नहीं है
जायकेदार, स्वादिष्ट भोजन।

प्रबन्धन

पुराने किस्से कहानियों में सुना था
ठगों के गाँव के बारे में
ठगी बहुत बुरा काम होता था
धीरे-धीरे अन्य चीजों की तरह
ठगी का भी विकास हुआ
अब ये काम लुकछिप कर नहीं बल्‍कि‍
खुलेआम प्रचार प्रसार करके
सिखाया जाने लगा
ठगों के गाँव अब किस्से कहानियों में नहीं
शानों शौकत से
भव्य भवनों में आ बसे हैं
जहाँ से निकलते हैं
लबालब आत्मविश्‍वास से भरे
छोटे-बडे ठग
जो जितने ज्यादा लोगों को ठग लेता है
उतना ही बडा प्रबन्धक कहलाता है।

पढे़-लिखे समझदार लोग

सीधे सीधे न नहीं कहते
न ही उंगली दिखाकर दरवाजे की ओर इशारा करते हैं
वे तो बस चुप्पी साध लेते हैं
आपके आते ही व्यस्त होने का दिखावा करने लग जाते हैं
आपके लायक कोई काम नहीं होता उनके पास
चुप्पी समझदारी है हमेशा
आप पर कोई आरोप नहीं लगा सकता ऐसा वैसा कहने का
ज्यादा पूछने पर आप कह सकते हैं
मैंने क्या कहा?
ये चुप्पी की संस्कृति जानलेवा है।

कान्‍ति‍ कुमार जैन पर केन्‍द्रि‍त ‘राग भोपाली’ अंक का लोकार्पण

सागर : प्रगति‍शील लेखक संघ सागर इकाई की पत्रि‍का ‘राग भोपाली’ के प्रोफेसर कान्‍ति‍ कुमार जैन पर केन्‍द्रि‍त अंक का लोकार्पण 9 सि‍तम्‍बर, 2012 को उनके 80वें जन्‍मदि‍न के अवसर पर कटरा नमक मण्‍डी में आयोजि‍त गोष्‍ठी में कि‍या गया। इस अंक में प्रोफसर जैन के व्‍यक्‍ति‍त्‍व और कृति‍त्‍व पर प्रकाश डाला गया है। पत्रि‍का के सहयोगी सम्‍पादक गोवि‍न्‍द सिंह असि‍वाल, प्रोफेसर कान्‍ति‍ कुमार जैन, उनकी पत्‍नी साधना जैन और महेन्‍द्र पुसकेले ने इस पत्रि‍का का लोकार्पण कि‍या।

इस अवसर पर गोवि‍न्‍द सिंह असि‍वाल ने कहा कि‍ जो लेखक प्रगति‍शील वि‍चारों को अपने लेखन में प्रति‍पादन कर रहे हैं, वे भी हमारे उतने ही हैं, जि‍तने प्रगति‍शील लेखक संघ के सदस्‍य। कान्‍ति‍कुमार जैन हमारे संघ के सदस्‍य तो नहीं हैं, लेकि‍न मार्क्‍सवाद के प्रति‍ उनकी प्रति‍बद्धता असंदि‍ग्‍ध है। उन्‍होंने मार्क्‍सवाद का व्‍यापक अध्‍ययन कि‍या है और वह मुक्‍ति‍बोध व परसाई के अभि‍न्‍न मि‍त्र रहे हैं। हि‍न्‍दी वि‍भाग के अध्‍यक्ष होते हुए उन्‍होंने अपने पाठ्यक्रम में मुक्‍ति‍बोध और परसाई को तो स्‍थान दि‍या ही, नजीर अकबराबादी जैसे कवि‍ को भी पाठ्यक्रम में शामि‍ल कि‍या। यहाँ यह भी उल्‍लेखनीय है कि‍ कथाकार और सम्‍पादक भीमसेन त्‍यागी ने जब ‘भारतीय लेखक’ के परसाई पर केन्‍द्रि‍त अंक नि‍कालने की योजना बनाई तो कान्‍ति‍ कुमार जैन उसमें अति‍थि‍ सम्‍पादक थे। उन्‍होंने परसाई के बाल साहि‍त्‍य और कवि‍ताओं की खोज करके ‘भारतीय लेखक’ के परसाई अंक को ‘परसाई की खोज’ बना दि‍या।

महेन्‍द्र पुसकेले ने कहा कि‍ डॉक्‍टर नामवर सिंह ने अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्वि‍वेदी पर केन्‍द्रि‍त ग्रंथ ‘दूसरी परम्‍परा की खोज’ लि‍खकर अपने गुरु का ऋण चुकाया, उसी प्रकार असि‍वाल ने ‘राग भोपाली’ का यह अंक कान्‍ति‍ कुमार जैन पर केन्‍द्रि‍त कर उनका ऋण अदा करने का प्रयत्‍न कि‍या है। इस अवसर पर साधना जैन ने फैज अहमद फैज की नज्‍मों का सस्‍वर पाठ कि‍या। उनकी बेटी गोपा ओर मोना ने भी अपने पि‍ता के लेखन और व्‍यक्‍ति‍त्‍व पर प्रकाश डाला। सात्‍वि‍क जैन ने अपने नाना के सम्‍बन्‍ध में कई रोचक संस्‍मरण सुनाये। गोष्‍ठी की अध्‍यक्षता प्रगति‍शील लेखक संघ सागर इकाई के अध्‍यक्ष टीकाराम त्रि‍पाठी ने की।

इस अवसर पर डॉक्‍टर मनीष चन्‍द्र झा, वृन्‍दावन राय सरल, राम आसरे पाण्‍डेय, मनोज श्रीवास्‍तव, दीपा भट्ट, उषा पुसकेले, दि‍नेश साहू आदि‍ उपस्‍थि‍त थे।

केवल खबर नहीं है डेंगू : देवेंद्र मेवाड़ी

उपचार के दौरान देवेंद्र मेवाड़ी

डेंगू पर इतनी गंभीर बहस शायद इससे पहले कभी नहीं हुई। न इस जानलेवा रोग का खतरा इतनी शि‍द्दत से कभी महसूस किया गया था। हालाँकि हर साल सैकड़ों लोगों का जीवन इस रोग के कारण दाँव पर लगता रहा है, लेकिन अब तक महज एक खबर था डेंगू। इसके डंक का असली पता तो तब लगता है जब अपने-आप पर बीतती है। मुझ पर 2009 में बीत चुकी है यह। इसलिए कह सकता हूँ, महज खबर नहीं है डेंगू-

अभी देर शाम गुड़गाँव के आर्टमेस अस्पताल से डिस्चार्ज होकर चार दिन बाद घर लौटा हूँ। आते ही, सबसे पहले ‘आर्टमेस’ का अर्थ खोजा। पता लगा, यह यूनानी पौराणिक कथाओं में चंद्रमा की देवी का नाम है। बेहद कमजोरी महसूस कर रहा हूँ, पर तीन-चार दिन पहले जैसा शरीर तोड़ बुखार और बेचैनी थी, अब नहीं है। डॉक्टरों ने डेंगू (वे इसे डेंगी कहते हैं) के शिकंजे से मेरी जान बचा ली है। मेरे लिये भी अब तक तो डेंगू केवल अखबार में छपी खबर था, लेकिन अब अच्छी तरह जानता हूँ कि यह केवल खबर नहीं है। किसी को हो जाये तो जान पर बन आती है। डेंगू फैलाने वाले मच्छरों का डंक जानलेवा भी हो सकता है। न जाने मुझे किस नामकूल मच्छर ने कब और कहाँ डंक मार दिया था।

17 अक्टूबर को दीपावली थी। दिन में लगा बुखार चढ़ रहा है। बहुत प्यास लगी और शरीर में अजीब-सी टूटन के साथ जोड़ों और पेशियों में पीड़ा होने लगी। समझ में नहीं आ रहा था कि हो क्या गया है। 18,19 और 20 अक्टूबर को भी 103 डिग्री फारेनहाइट तक तेज बुखार में तपता रहा। दर्द ऐसा कि पूरा शरीर जैसे किसी ने कपड़े धोने की मुंगरी से पीट दिया हो। नजदीक के डॉक्टर को दिखाया। उन्होंने फीस ली, बुखार की दवा दे दी। लेकिन,  न बुखार घटा, न दर्द कम हुआ। दिल्ली में डेंगू के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसलिये मैं डर रहा था। डॉक्टर से खून की जाँच के लिये कहता रहा, लेकिन वह समझाते रहे पहले दवा तो खाइए, फिर देखेंगे। जब देखा कि बुखार और शरीर का दर्द किसी तरह कम नहीं हो रहा है तब जाकर खून की जाँच के लिये लिखा। 23 तारीख को सुबह जाँच के लिये खून का नमूना दिया। शाम को रिपोर्ट लेने श्रीमती जी गईं। लौट कर बताया, ‘‘रिपोर्ट दिखाई तो डॉक्टर घबराए हुए से लगे। पूछने लगे कि मसूडों से खून तो नहीं आ रहा है? शरीर पर लाल पित्त तो नहीं दिखाई दे रहे हैं। फिर बोले- अगर रात को तबियत ज्यादा खराब हो जाए तो उन्हें अस्पताल ले जाइए।’’ श्रीमती जी हैरान। घबराकर कह आईं, ‘‘आपसे हफ्ते भर से कह रहे थे, खून की जाँच करा दीजिए। अब आप रात में अस्पताल ले जाने की बात कर रहे हैं। कहाँ ले जाऊँगी?’’

खैर, वापस आकर उन्होंने कहा, ‘‘सुनो, अभी अस्पताल चल पड़ते हैं।’’ मैंने पूछा, ‘‘क्यों?’’ तो डॉक्टर की बात बताई। रिपोर्ट देखी तो मैं भी सकते में आ गया। मेरे खून में प्लेटलेट संख्या 1.50-4.0 लाख से घट कर केवल 22,000 रह गई थी। यह खतरनाक स्थिति थी।

हमने बेटी और दामाद को फोन किया। वे भागे आए। श्रीमती जी, बेटी मानसी और दामाद राहुल के साथ अस्पताल जाने की तैयारी की। लेकिन, कहाँ और किस अस्पताल में जाएँ? राहुल ने इसी बीच गुड़गाँव में बहू सोनिया से बात की तो उसने बिना समय बर्बाद किए, फौरन सैक्टर-51 के आर्टमेस अस्पताल की ओर आने की राय दी। आर्टमेस? मैं चौंका था। चलो, अर्थ बाद में खोज लूँगा।….

हम ऑर्टमेस की ओर भागे। रास्ते में सोनिया मिल गई। वह ऑर्टमेस में ले गई। डॉक्टर रमन अभि से फोन पर पहले ही बात कर चुकी थी। वह सैर छोड़ कर ट्रैक सूट में ही अस्पताल आ गये। मुझे इमर्जेंसी में भेज कर खून का नमूना लिया और फिर ‘इन पेशेंट’ के रूप में अस्पताल में भर्ती करके दूसरी मंजिल पर वार्ड नंबर 2502 में भेज दिया। नर्सों ने हाथ में फटाफट नली जोड़ कर स्टैंड में टंगी बोतल से ग्लूकोज का घोल ड्रिप कराना शुरू कर दिया। वे कभी खून का नमूना ले जातीं और कभी रक्तदाब व शरीर का तापमान मापतीं।

इस बीच कई परीक्षण किए गये- खून का परीक्षण, मूत्र का परीक्षण, मलेरिया परीक्षण (थिक एंड थिन स्मियर टेस्ट), यकृत क्रियाशीलता, वृक्कीय (रीनल) क्रियाशीलता, टाइफी डॉट, डेंगी एनएस1, एंटिजन कैप्चर टेस्ट, क्रॉस मैंचिंग, आटोमेटेड प्लेटलेट काउंट, ए बी ओ टाइपिंग, आर एच टाइपिंग आदि।

राहुल ने प्लेटलेट चढ़ाने के लिये रात में रक्तदान किया। सौभाग्य से उसका और मेरा रक्त ग्रुप एकसमान यानी ‘ए प्लस’ निकला।

कम्प्यूटर से मिले परीक्षणों के परिणाम से पता चलाः रक्त ग्रुप ‘ए’ टाइप, आर एच पॉजिटिव, प्लेटलेट संख्या 20000, मलेरिया एंटिजन निगेटिव (प्लाज्मोडियम वाइवैक्स तथा प्लाज्मोडियम फैल्सिपेरम दोनों के लिये)। डेंगू एनएस1 एंटिजन कैप्चर टेस्ट भी निगेटिव निकला, लेकिन इस हिदायत के साथ कि एनएस1 एंटिजन असंरचनात्मक प्रोटीन है जिसे डेंगू की गंभीर अवस्था का सूचक माना जाता है। लेकिन, निगेटिव टेस्ट का मतलब यह नहीं है कि हाल ही में संक्रमण नहीं हुआ। डेंगू एनएस1 एजी स्ट्रिप टेस्ट का गुणात्मक परीक्षण है और नमूने में एनएस1 एंटिजन की मात्रा नहीं दर्शाता है। नमूनों के साथ तुलना करने पर डेंगू एनएस1 एजी स्ट्रिप की अतिसंवेदनशीलता से पुष्टि हुई कि आर टी-पी सी आर तथा वायरल कल्चर 92.3 प्रतिशत व 100 प्रतिशत थी। टाइफी डॉट परीक्षण भी निगेटिव था।

टैक्नोलॉजिस्ट ने राय दी कि ‘निगेटिव’ परिणाम से हाल ही में हुए या वर्तमान संक्रमण की संभावना खत्म नहीं हो जाती क्योंकि ‘पॉजिटिविटी’ पर बुखार शुरू होने से लेकर अब तक के समय और मरीज की प्रतिरक्षात्मक क्षमता का असर पड़ता है। इसलिए, यदि अब भी एस. टाइफी संक्रमण का संदेह हो तो 5-7 दिन बाद दूसरा नमूना लेकर उसके पुनः परीक्षण की संस्तुति की जाती है।

सुबह-सुबह मेरे भतीजे यशवंत ने ‘आर्टमेस’ में आकर रक्तदान किया जिससे प्लेटलेट निकाल कर बाद में मेरे शरीर में चढ़ाई गईं। उसका रक्त ग्रुप भी मेरी तरह ‘ए प्लस’ था।

इतना कुछ करने के बाद भी अगले दिन यानी 24 तारीख को मेरे खून में प्लेटलेट घट कर 18,000 हो गईं। डॉक्टर को शक था कि कहीं तो कुछ है। वह मेरे शरीर पर लाल पित्त खोजते रहे। पूछते रहे कि मसूड़ों से खून तो नहीं निकला। इसके साथ ही उन्होंने किसी प्रयोगशाला से पुनः मेरे खून के नमूने की जाँच कराई। प्लेटलेट चढ़ाने के बाद 25 तारीख को सुबह मेरे खून में प्लेटलेट संख्या बढ़ कर 38,000 हो गई। लेकिन, शाम को लगभग 6 बजे वह फिर घट कर 30,000 हो गई।

प्रयोगशाला से रिपोर्ट आने पर अब तक छिपे डेंगू के वायरस का पता लग गया। सीरम के एस एस डी ई जी और एस एस डी ई एम परीक्षणों का परिणाम यह रहा-

डेंगू वायरस आईजीएम …….मौजूद है
डेंगू वायरस आई जी जी……..मौजूद है

यानी, प्राइमरी और सेकेंडरी दोनों प्रकार के डेंगू का संक्रमण है। रिपोर्ट में दी गई टिप्पणी के अनुसारः ‘डेंगू बुखार का वायरस लेविविरडी परिवार का वायरस है। इसके 4 सीरोटाइप हैं। इसका संक्रमण होने पर हल्का बुखार और शरीर में पीड़ा हो सकती है। लेकिन, गंभीर रूप से संक्रमण होने पर हेमोरेजिक यानी रक्तस्रावी बुखार आ सकता है। यह वायरस एडीज ग्रुप के मच्छरों से फैलता है। इस परीक्षण से प्राइमरी और सेकेंडरी संक्रमण का पता लग जाता है। आईजी एम एंटिबॉडी का पता बुखार आने के 3-5 दिन के भीतर लग जाता है। ये 30 से 90 दिन तक मौजूद रहती हैं। कभी-कभी तो आईजीएम पॉजिटिविटी का आठ माह बाद भी पता लगता है। सेकेंडरी संक्रमण में आईजी जी का स्तर बहुत बढ़ जाता है जिसके साथ-साथ आईजी एम का स्तर भी बढ़ा हुआ हो सकता है।

25 तारीख को सुबह मेरा बड़ा भतीजा मदन मोहन भी बंगलुरु के दौरे से लौट आया। आते ही उसने प्लेटलेट निकालने के लिए रक्तदान किया जिसे इमरजेंसी के लिए रख लिया गया।

26 तारीख की सुबह खून की जाँच से पता चला कि प्लेटलेट बढ़ कर 50,000 हो गई हैं। डॉ. रमन अभि ने मुस्कुरा कर कहा, ‘‘अगर प्लेटलेट इसी तरह बढ़ती गईं तो कल डिस्चार्ज कर देंगे। आप फिर घर पर आराम कर सकते हैं।’’

वही हुआ। अगले दिन यानी 27 अक्टूबर की सुबह प्लेटलेट 1,25,000 हो गईं। डॉक्टर ने मेरी जाँच करके इस हिदायत के साथ अस्पताल से छुट्टी देने का निर्देश दे दिया कि घर पर पूरी तरह आराम करें, रोज कम से कम 5 लीटर पानी व अन्य पेय पिएं और औषधियाँ लें।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने की औपचारिकताएं पूरी करके बाहर निकला तो शाम ढल रही थी। बाहर खुली हवा में गहरी साँस ली। सामने ‘ऑर्टेमेस’ अस्पताल की भव्य इमारत खड़ी थी। कृतज्ञता के साथ उसकी ओर देखा। उसकी ऊपरी मंजिलों के गहरे रंग के कुछ काँच ढलते सूरज की किरणों से सहसा चमक उठे। नीड़ की ओर लौटते दो-एक पंछी चहचहाए। हवा का एक पुरसुकून ठंडा झौंका मुझे छू कर आगे बढ़ गया। लगा- ‘आह! कितनी सुंदर है हमारी यह दुनिया, जिसमें मैं बच कर वापस लौट आया हूँ!’

3 नवंबर 2009

प्लेटलेट की पहेली

कल शाम 6 बजे डॉ. रमन अभि से मिला। प्लेटलेट संख्या की जाँच के लिये खून का नमूना दिया। आज रिपोर्ट मिल गई है। प्लेटलेट संख्या अब 3,09,000 हो गई है। डॉक्टर की शुभकामनाएं और पुनः प्रतिदिन कम से कम पाँच लीटर पानी पीने की हिदायत लेकर लौट आया हूँ। बेहद कमज़ोर अनुभव कर रहा हूँ, लेकिन डॉक्टर ने कहा है कि‍ कमजोरी धीरे-धीरे ही दूर होगी।

पुनश्‍च, 3 नवंबर 2009

डेंगू के कारण अठारह दिन से बीमार हूँ। इस बीच जिस चीज की सबसे अधिक चर्चा सुनी वह है- प्लेटलेट। आखिर यह क्या बला है? लेकिन, इसे बला भी कैसे कह सकता हूँ? इसने तो मेरे प्राण बचाने में मदद की। मेरे खून में इनकी कमी हो गई तो पहले राहुल और अगले दिन यशवंत के ताजा दान किए गये खून में से प्लेटलेट निकाल कर मेरे शरीर में चढ़ाई गईं। ग्लूकोज की बोतल उतार कर नर्स ने उसकी जगह प्लेटलेट का सैचेट लगा दिया था। प्लास्टिक के पारदर्शी सैचेट में भरी वह लाल-नारंगी चीज मैंने देखी थी। घट कर 18,000 तक हो गई मेरी प्लेटलेट संख्या को बढ़ाने के लिये मेरे शरीर में इनका ट्रांसफ्यूजन किया गया। तभी से जानने की बड़ी इच्छा है कि आखिर ये हैं क्या?

किताबें और इंटरनेट टटोला तो पता लगा, ये रक्त में पाई जाने वाली सूक्ष्म कणिकाएं हैं। अक्सर हम दो तरह की रक्त कोशिकाओं के ही नाम सुनते हैं- लाल रक्त कोशिकाएं और श्‍वेत रक्त कोशिकाएं। लाल रक्त कोशिकाओं में लाल रंग का हीमोग्लोबिन होता है। ये कोशिकाएं शरीर के हर हिस्से में ऑक्सीजन पहुँचाती हैं। श्‍वेत रक्त कोशिकाएं दुश्मनों से शरीर की रक्षा करती हैं। ये संख्या में तो लाल रक्त कोशिकाओं से कम होती हैं लेकिन इनका आकार उनसे बड़ा होता है। ये रक्त में पहुँचने वाले जीवाणुओं आदि को हड़प कर जाती हैं। इनके अलावा खून में इन से भी छोटी कणिकाएं होती हैं जो प्लेटलेट कहलाती हैं। इनका काम है खून का थक्का जमाना। कहीं कोई काँटा या सुई चुभ जाए या चाकू से कट जाए तो ये फौरन वहाँ खून का थक्का जमा कर उसे बहने से रोक देती हैं। हमारे शरीर में इनकी संख्या आमतौर पर एक माइक्रो लीटर खून में 1,50,000 से 4,00,000 तक होती है।

डॉक्टर ने मेरी पर्ची में रोग का नाम लिखा थाः ‘थ्रोम्बोसाइटोपेनिया’ यानी प्लेटलेटों की संख्या असामान्य रूप से कम। और,  पूछा था, ‘‘क्या हाथ-पैरों में छोटी-छोटी पित्तियां उभरीं? आंखें और चेहरा लाल हुआ? मसूढ़ों से खून तो नहीं निकला?’’ अब पढ़ कर समझ में आ रहा है कि शरीर में प्लेटलेट संख्या कम हो जाने पर ये लक्षण दिखाई देते हैं। पैरों की पिंडलियों से नीचे के भाग में चमड़ी पर तमाम लाल-लाल बिंदियाँ निकल आती हैं। चोट लगने पर चमड़ी लाल पड़ जाती है। मसूढ़ों से खून निकलने लगता है। मल-मूत्र में भी खून आ सकता है। कहीं पर कट-फट जाने से खून मुश्किल से रुकता है। प्लेटलेट 20,000 से कम हो जाने पर आँतों या दिमाग में बिना चोट के भी खून निकल सकता है। यह हालत जानलेवा हो सकती है।

और, मेरी प्लेटलेट संख्या 24 तारीख को 18,000 हो गई थी! प्लेटलेट संख्या 50,000 से कम होने पर लोग डॉक्टर की राय लेकर अस्पताल चले जाते हैं। यह संख्या 20,000 से कम होने पर तो हर हालत अस्पताल में होना चाहिए ताकि डॉक्टर शरीर में प्लेटलेट चढ़ा सकें। पढ़ने पर यह भी पता लगा कि हेपॉरिन जैसी कुछ दवाइयों से भी प्लेटलेट कम हो जाती हैं। कई बार तिल्ली भी प्लेटलेटों को हड़पने लगती हैं। तब तिल्ली को ही आपरेट करके शरीर से बाहर निकाल देते हैं।

डेंगू का प्रकोप होने पर तो प्लेटलेट कम होती ही हैं। कुछ और कारणों का भी पता चला। ये अस्थि मज्जा में बनती हैं। इसलिए अस्थि मज्जा के किसी विकार के कारण भी इनकी संख्या में कमी हो सकती है। ल्यूकेमिया और एचआइवी का संक्रमण होने और शराब अधिक पीने पर भी इनकी संख्या घट सकती है।

फिलहाल तो मुझे संतुलित आहार से अपनी प्लेटलेट संख्या को सामान्य स्तर तक बढ़ाना है। और हाँ, मच्छरों से भी बच कर रहना है।

(लेखक की आपबीती ‘मेरी विज्ञान डायरी’ के पन्नों से)

युवा कवियि‍त्री रेखा चमोली को 2012 का ‘सूत्र सम्मान’

नई दि‍ल्‍ली : साहित्यिक पत्रिका ‘समकालीन सूत्र’ द्वारा दिया जाने वाला ठा. पूरन सिंह स्मृति ‘सूत्र सम्मान’ इस वर्ष उत्तराखंड के जोशियाड़ा, उत्तरकाशी में रहने वाली युवा कवियि‍त्री रेखा चमोली को प्रदान किया जायेगा। ज्ञात हो की बस्तर के लोक कवि स्व. ठा .पूरन सिंह की स्मृति में दिया जाने वाला ‘सूत्र सम्मान’ प्रतिवर्ष देश के किसी ऐसे युवा कवि /कवियत्री को प्रदान किया जाता है जो अपने जनपद और जन से जुड़कर निरंतर अपनी सृजनात्मकता और काव्य वैशिष्ट्य, काव्य सहजता से देश की युवा कविता को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में 8 नवम्बर 1979 को जन्म लेने वाली युवा कवियि‍त्री रेखा चमोली की कवितायें अपनी मिट्टी से उपजती हैं और स्त्री संसार के विविध जीवन को एक नया आकार देती हैं। रेखा की कविताओं में जनपदीयता की निश्‍चल अनुगुँजें हैं जो उनकी कविताओ को और महत्वपूर्ण बनाती हैं। बी.एस.सी.,एम.ए, प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा रेखा ने उत्तरकाशी में ग्रहण की है। इधर अपने पहले कविता संग्रह ‘पेड़ बनी स्त्री’  से समग्र रूप से पहचानी गयी रेखा चमोली की कवितायें ‘कृतिओर’, ‘कथन’, ‘वागर्थ’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘सर्वनाम’, ‘समकालीन सूत्र’, ‘बया’, ‘लोकगंगा’ और ‘उत्तरा’ जैसी चर्चित पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर रेखांकित की गयी हैं । अध्यापन कार्य से जुडी़  रेखा चमोली कविता लेखन के साथ-साथ उत्तराखंड में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार व पाठ्य पुस्तक निर्माण और शैक्षिक राज्य स्तरीय कार्यशालाओं में लगातार सक्रिय हैं।

उल्लेखनीय है कि‍ 1997 से शुरू किये गये ‘सूत्र सम्मान’ से अब तक देश के चर्चित युवा कवि अशोक शाह, प्रताप राव कदम, नासिर अहमद सिकंदर, रजत कृष्ण, संजीव बक्शी, एकांत श्रीवास्तव, अग्नि शेखर, महेश पुनेठा, विमलेश त्रिपाठी आदि‍ को सम्मानित किया जा चूका है।

युवा कवियि‍त्री रेखा चमोली को दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में छत्तीसगढ़ में आयोजित एक विशिष्‍ट साहित्यिक आयोजन में  ‘सूत्र सम्मान-12’ प्रदान किया जायेगा।

भूमंडलीकरण से साहित्य और पत्रकारिता के बीच दूरी बढ़ी है: मंगलेश डबराल

कमलिनी दत्त

नई दि‍ल्‍ली : गाँधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में 20 अक्टूबर को कवि, चित्रकार और दूरदर्शन के मशहूर प्रोड्यूसर कुबेर दत्त की याद में जन संस्कृति मंच की ओर से आयोजन किया गया। पिछले साल 2 अक्टूबर को कुबेर दत्त का आकस्मिक निधन हो गया था। काल काल आपात, कविता की रंगशाला, केरल प्रवास, धरती ने कहा फिर…, अंतिम शीर्षक उनके प्रकाशित कविता संग्रह हैं। जीवन के आखिरी दस वर्षों में उन्होंने अनेक पेंटिंग भी बनाईं, जिनमें से कई पत्रिकाओं और किताबों के कवर पर भी छपीं। कुबेर दत्त ने दूरदर्शन के माध्यम से आम अवाम को न केवल अपने देश के श्रेष्ठ जनपक्षीय साहित्य और कलात्मक सृजन से अवगत कराया, बल्कि दुनिया के महान साहित्यकारों और कलाकारों से भी परिचित कराया।

आयोजन की शुरुआत कुबेर दत्त की जीवनसाथी कमलिनी दत्त द्वारा उनके जीवन और रचनाकर्म पर केंद्रित वीडियो की प्रस्तुति से हुई। कुबेर दत्त और कमलिनी दत्त की जोड़ी साहित्य, कला और प्रसारण की दुनिया की मशहूर जोड़ी रही है। कुबेर दत्त ने तो कमलिनी के बारे में कई जगह लिखा है, पर कमलिनी ने पहली बार इस आयोजन में उनके बारे में अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि कुबेर के बारे में बोलना मेरे लिए सबसे ज्यादा मुश्किल है, उतना ही जितना एक तूफान को मुट्ठी में बंद करना। कुबेर मेरे लिए क्या थे, मैं क्या बताऊँ, जीवनसाथी, अंतरंग सखा, आपत स्तंभ, एक सच्चा कामरेड! कुबेर मितभाषी थे- रूपवान थे- लेकिन जिस गुण ने मुझे प्रभावित किया वह था उनका जीवन और सृष्टि के प्रति समरसता का बोध। जीवन और जीव में फर्क न करना, इनसान चाहे परिचित हो, अपरिचित हो, चपरासी हो, पानवाला, चायवाला, कार्यालय के साथी, कलाकार, साहित्यकर्मी, सबसे एक जैसा मधुर व्यवहार। अपने उच्चाधिकारी के प्रति सम्मान रखते हुए भी सीधा स्पष्ट दो टूक व्यवहार उन्हें कभी-कभी अप्रिय भी बनाता था। कार्यक्षेत्र में सामंतवाद किस कदर व्याप्त है आप सब जानते हैं। मैं अपने शुरू के कार्यकाल में अत्यंत भीरु थी। कुबेर ने धीरे-धीरे मुझे निडर बनाया। मेरी नववर्ष की डायरी में लिखा- संघर्ष ही जीवन है, विवशताओं से घबराना कायरता है। यह मेरे जीवन का सूत्र वाक्य बन गया। कुबेर की विचारधारा के प्रति निष्ठा उनके सभी कार्यकलापों का दिशानिर्देश करती थी। वह इस हद तक निडर थे जिस हद तक किसी सरकारी कर्मचारी के लिये होना संभव नहीं था। आपातकाल के दौरान सरकारी नीतियों के विरुद्ध अपने कार्यक्रमों में लिखते थे और स्वयं बोलते भी थे। वरवर राव, गदर जैसे क्रांतिकारियों के साथ बातचीत प्रसारित करने से भी कुबेर डरे नहीं। वह इस संबंध में स्पष्ट विचार रखते थे कि कार्यक्रम दर्शकों के लि‍ये बनता है, सरकार या अधिकारियों के लिये नहीं।

कमलिनी दत्त द्वारा प्रस्तुत वीडियो में अपने गाँव से कुबेर दत्त का लगाव, उनका बिल्ली प्रेम, उनके जीवन के कई दुर्लभ फोटोग्राफ्स और प्रेमचंद, महादेवी, किशोरीदास वाजपेयी पर बनाए गये कार्यक्रमों के अंश दर्शकों को देखने को मिले। कुबेर दत्त चित्र बनाते और कविताएं पढ़ते हुए भी नजर आए।

मंगलेश डबराल और मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

जन संस्कृति मंच ने कुबेर दत्त के निधन के बाद आयोजित शोकसभा में उनकी स्मृति में हर साल साहित्य, संस्कृति और मीडिया से संबंधित विषय पर व्याख्यान आयोजित करने का निर्णय लिया था। इसी सिलसिले में ‘साहित्य और जनमाध्यम’ विषय पर प्रथम कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि आज मीडिया का भूमंडलीकरण हो गया है, इसने अमेरिकीकरण को अच्छा मान लिया है। आज जैसा बड़ा मध्यवर्ग भारत में पहले कभी नहीं था। पश्‍चि‍म को संबोधित इस मध्यवर्ग का अपने समाज से कोई संबंध नहीं रह गया है। आज सूचनाओं की बमबारी ज्यादा हो रही है, संवाद कम हो रहा है। दैनिक अखबार भी उत्पाद में बदल गये हैं और टीवी की नकल कर रहे हैं। टीवी का मूल स्वभाव मनोरंजन हो गया है। राजनीति भी यहाँ मनोरंजन बन जाती है। मीडिया ने उपभोक्तावाद के आगे समर्पण कर दिया है। अब गरीबी हटाओ की जगह अमीरी बढ़ाओ उसका नया नारा हो गया है।

मंगलेश डबराल ने कहा कि अभी भी भारतीय साहित्य का लेखक ज्यादातर निम्नमध्यवर्ग से आता है,  उसकी टीवी चैनल में मौजूदगी नहीं है, अखबार में अब साहित्य हाशिए पर है। भावपूर्ण भाषा और विचारों की जगह विज्ञापनों की भाषा का जोर है। जिस तरह ‘दिनमान’ जैसी पत्रिकाओं ने अच्छी फिल्म, कला और साहित्य के संस्कार दिए, आज वैसा नहीं है। भूमंडलीकरण से साहित्य और पत्रकारिता के बीच दूरी बढ़ी है। आज मास मीडिया क्षणिक शोहरत का एक उद्योग बन चुका है। ऐसे में सिर्फ साहित्य को  समर्पित कोई चैनल हो, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। कुबेर दत्त द्वारा दूरदर्शन में साहित्य को लेकर किए गये काम को उन्होंने बेमिसाल बताया।

आयोजन के तीसरे खंड में ‘कुबेर की दुनिया’ पर बोलते हुए प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हिन्‍दी के वरिष्ठ आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि हमें कुबेर दत्त और कमलिनी दत्त दोनों की कला साधना पर विचार करना चाहिए। उनके जीवन के संकटों और संघर्षों पर भी ध्यान देना चाहिए। संस्कृति की दुनिया में ऐसा कोई दूसरा दंपत्ति दिखाई नहीं देता। कुबेर केवल चमचमाते हुए स्टार राइटरों के ही आत्मीय नहीं थे, बल्कि त्रिलोकपुरी और सादतपुर के साहित्यकारों से भी उनके गहरे आत्मीय संपर्क थे। कुबेर ने अपने काम के जरिए यह दिखाया कि एक प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी के लिये काम करने का स्पेस हर जगह है।

जनवादी लेखक संघ के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि कुबेर दत्त दूरदर्शन में केवल वेतनभोगी कर्मचारी की तरह काम नहीं कर रहे थे। दूरदर्शन को उन्होंने जनवादी विचार और साहित्य-संस्कृति का माध्यम बनाया। केदारनाथ अग्रवाल की कविता पंक्तियों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मैंने उसको जब-जब देखा, गोली जैसा चलता देखा। उन्होंने खासतौर पर दो प्रसंगों को याद किया, कि किस तरह जब उन्होंने एक सभा में यह कहा कि लेखक जनता की आजादी के लिए लड़ता है, लेखक अगर किसानों की स्वतंत्रता के लिये  नहीं लड़ता तो वह लेखक नहीं, तो भाषण के बाद कुबेर ने उन्हें गले से लगा लिया। इसी तरह जनाधिकार पर लिखी गईं कविताओं के एक कार्यक्रम में इमरजेंसी और इंदिरा गांधी के खिलाफ जो भी उन्होंने बोला, कुबेर ने उन्हें ज्यों का त्यों प्रसारित किया। उन्होंने कहा कि कुबेर कई कला विधाओं के संगम भी थे।

अपने पिता को अत्यंत मर्मस्पर्शी ढंग से याद करते हुए युवा नृत्यांगना पुरवा धनश्री ने कहा कि उन्होंने सिखाया कि हर इनसान चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, प्रांत, भाषा, संस्कृति से हो, यूनिक है और इंसानियत, प्यार, श्रद्धा सबसे बड़ा धर्म है। बाकी अन्य पिताओं की तरह वे ‘नार्मल’ पिता नहीं थे। उन्होंने अपनी कला के जरिए ही अपनी बेटी से ज्यादा संपर्क किया। यही उनका तरीका था। मैं उनका हाथ पकड़ना चाहती थी, उनके कंधे पर सर रखना चाहती थी, पर इसका स्पेस मुझे कम मिला। अक्सर मैंने उन्हें रातों में रोते हुए देखा। वह कहते थे कि मैं बुरा आदमी नहीं हूँ, मुझे समझो। शायद उनके घाव मेरे घावों से ज्यादा गहरे थे। हर शाम वह घर आकर चंद लम्हें हमारे संग बाँटते और फिर अपने कविखाने में चले जाते। फिर थोड़ी देर बाद अपनी कृति सुनाते या कोई चित्र दिखाते। उन शब्दों में मैं अपने पिता को ढूंढती और थक जाती ढूंढते-ढूंढते। पर आज मैं उन्हें महसूस करती हूँ खुद में।

‘अलाव’ पत्रिका के संपादक-कवि रामकुमार कृषक ने कहा कि कुबेर दत्त का काम बहुआयामी है। वह प्रगतिशील जनवादी मूल्यों के समर्थक थे। कबीर से लेकर भगतसिंह तक भारतीयता की जो परम्‍परा बनती है, वह खुद को उससे जोड़ते थे। उपेक्षित और अभावग्रस्त लोगों की तकलीफों को लेकर वह बेहद संवेदित रहते थे। वह एक बड़े और जरूरी इनसान थे।

कवि मदन कश्यप ने कहा कि कुबेर की दुनिया एक बड़ी दुनिया थी, वह एक साथ सृजन, विचार और प्रसारण की दुनिया थी। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वह प्रतिरोध की दुनिया थी। सिर्फ अपनी ही नहीं, बल्कि सामूहिक सृजनात्मकता और विचार के लिये उन्होंने कैरियर को हमेशा दाँव पर रखा। उनकी चिंताएं बड़ी थीं। एक वक्त में जब जनप्रतिरोध के विरुद्ध लोग एकताबद्ध हो रहे थे, तब कुबेर दत्त उन थोड़े लोगों में थे, जिन्होंने शासकवर्ग की अनुकूल धारा में बहने से इनकार किया, सरकारी माध्यम में रहते हुए भी प्रतिरोध की परम्‍परा के साथ खड़े रहे। मदन कश्यप ने जोर देकर कहा कि बहुत सारे ऐसे कवि लेखक हैं, जो कुबेर जी के कारण ही दूरदर्शन पर आ पाए, उनके वहाँ से जाने के बाद वे  कभी नहीं बुलाए गये और भविष्य में भी उन्हें बुलाए जाने की कोई गारंटी नहीं है।

चित्रकार हरिपाल त्यागी ने उनसे अपने लम्‍बे जुड़ाव का जिक्र करते हुए कहा कि किसी को याद करना दरअसल उसे दुबारा खोजना होता है। जिस उम्र में लोग चित्रकला बंद कर देते हैं, उस उम्र में कुबेर ने चित्रकला शुरू की। उन्होंने कहा कि कुबेर शहराती कभी नहीं बन पाए, गाँव को वह कभी नहीं भूले, शायद यह भी एक कारण था जो उन्हें सादतपुर के साहित्यकारों से जोड़ता था। हरिपाल त्यागी ने यह भी बताया कि उन्हें राजनीतिक गतिविधियों के सिलसिले  में कुबेर के गाँव जाने का भी अवसर मिला था।

कवि चंद्रभूषण ने नौजवानों से सहजता के साथ घुल जाने वाले उनके स्वभाव को याद करते हुए कहा कि उनका व्यक्तित्व तरल पारे की तरह था। उनको पकड़ना आसान नहीं है। वह नौजवानों की तरह निश्छल और निष्कवच थे। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है, जैसे कोई बहुत ही गहरी बात है, जिसे वह कहना चाहते हैं। उन्हीं की कविता के हवाले से कहा जाए तो भारत का जो जनसमुद्र है, उसकी साँस हैं उनकी कविताएं, जो उसकी तकलीफ को झेलते हुए लिखी गई हैं।

कवि श्याम सुशील ने कहा कि कुबेर दत्त मीडियाकर्मी और लेखक की भूमिकाओं को अलग-अलग नहीं मानते थे। दोनों ही भूमिकाओं में उन्हें सृजन का आनंद मिलता था। उन्होंने हजारों चित्र बनाए और कविताएं लिखीं, जो कुछ सामने रहा, उसी पर चित्र बना डाला या कविताएं लिख दी। एक कागज के टुकड़े पर लिखी गई एक छोटी सी कविता को उन्होंने सुनाया-

पत्थर पत्थर मेरा
दिल है
पानी पानी तेरा दिल
पानी-पत्थर
जैसे मिलते
ऐसे ही तू मुझसे मिल।

श्याम सुशील ने कहा कि इस तरह की तमन्ना रखने वाले निश्छल हृदय कुबेर की कविताओं को पढ़ना, उनकी पेंटिंग और अन्य रचनाओं के बारे में सोचना या चर्चा करना उन्हें अपने आसपास महसूस करने जैसा है। इसलिए वह आज भी हमारे साथ हैं और अपनी रचनाओं के माध्यम से हमेशा रहेंगे। श्याम सुशील ने रमेश आजाद द्वारा कुबेर दत्त पर लिखित कविता- ‘कुबेर दत्त की रंगशाला से’ का पाठ भी किया।

कुबेर दत्त के छोटे भाई सोमदत्त शर्मा ने उन पर केंद्रित अपनी कविता के जरिए उन्हें बड़े भावविह्वल अंदाज में याद किया।

सुधीर सुमन

आयोजन के संचालक सुधीर सुमन ने कहा कि कुबेर स्मृति व्याख्यान का सिलसिला हर वर्ष जारी रहेगा। कुबेर दत्त हमारे लिए इस बात की मिसाल हैं कि जनपक्षधर होने की लड़ाई हर स्तर से लड़ी जानी चाहिए। वह अंधेरे के भीतर जिस रोशनी की आहट सुनने की बात करते थे, उन आहटों को सुनना, उन्हें अपनी रचनाओं में दर्ज करना और बेहिचक दमनकारी शासक संस्कृति व राजनीति के खिलाफ खड़ा होना आज भी बेहद जरूरी है। आज हत्याएं बहुत अनदेखे और अदृश्य तरीके से भी हो रही हैं, पर जैसा कि कुबेर ने अपने जीवन के आखिरी दिनों में एक कविता में लिखा था- ….मेरे दिमाग में सुरक्षित विचारों ने मुझे मरने नहीं दिया था/ हत्यारा मेरे विचारों को नहीं मार पाया था, तो उन विचारों को मजबूत बनाने का संघर्ष और उसके प्रति यकीन बनाए रखना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनकी अप्रकाशित कविताओं और उनके रचनाकर्म के मूल्याँकन और उनसे संबंधित संस्मरणों पर आधारित पुस्तकों के प्रकाशन की भी योजना है, जिनके लिये लेख और टिप्पणियाँ kamalinidutt@yahoo.com  पर भेजी जा सकती हैं।

सभागार में कुबेर दत्त की कविता और पेंटिंग से बनाए गए पोस्टर भी लगाए गए थे। ग्राफिक डिजाइनर रामनिवास द्वारा डिजाइन किए गये ये पोस्टर कुबेर दत्त की खूबसूरत लिखावट, कविता में मौजूद वैचारिक फिक्र और प्रभावपूर्ण चित्रकारी की बानगी थे।

प्रोफेसर चमनलाल, रेखा अवस्थी, बलदेव वंशी, अशोक भौमिक, अचला शर्मा, प्रणय कृष्ण, आशुतोष, रंजीत वर्मा, शैलेंद्र चौहान, भगवानदास मोरवाल, सतीश सागर, भूपेन, रोहित जोशी, रमेश आजाद, कुमार मुकुल, स्वतंत्र मिश्र, प्रभात कुमार, मीरा, अवधेश, क्वीनी ठाकुर, पुरुषोत्तम नारायण सिंह, ब्रजमोहन शर्मा, गोपाल गुप्ता, रामनरेश राम, अशोक प्रियदर्शी, मार्तण्ड, कमला श्रीनिवासन, वासुदेवन अयंगार, रोहित कौशिक, सुरुचि, रविप्रकाश, सौरभ, दिनेश और नीरज आदि कई साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, मीडियाकर्मी, राजनीतिक कार्यकर्ता और छात्र इस आयोजन में मौजूद थे।

प्रस्‍तुति‍ : श्याम सुशील

कोई भी भाषा सीखने के लिए खुलापन जरूरी: प्रो. संजय

तिरुवारूर : तमिलनाडु केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय में 15 अक्टूबर, 2012 को हिन्दी माह-2012 का समापन समारोह संपन्न हुआ। विश्‍वविद्यालय ने 1 से 29 सितंबर, 2012 तक हिन्दी माह समारोह मनाया और पूरा सितंबर माह हिन्दी की विभिन्न प्रतियोगिताओं तथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया। इस समारोह के लिए शहर में विभिन्न जगहों पर द्विभाषी बैनर लगाये गये थे और सभी केन्द्रीय विश्‍वविद्यालयों, संगठनों और उपक्रमों को संबंधित कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र प्रेषित कर दिये गये थे। समापन समारोह के अवसर पर मुख्य अतिथि प्रसिद्ध समाज भाषा वैज्ञानिक एवं दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, चेन्नै के कुलसचिव, प्रोफसर दिलीप सिंह थे। कार्यक्रम के शुभारंभ के समय मुख्य अतिथि के साथ मंच पर विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बी. पी. संजय, वित्त अधिकारी, पी. वी. रवि उपस्थित थे।

कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. के. वी. रघुपति, सहायक आचार्य (अंग्रेज़ी) के स्वागत भाषण; कुलपति, आचार्य बी. पी. संजय ; वित्त अधिकारी, पी. वि. रवि ; मुख्य अतिथि आचार्य दिलीप सिंह, कुलसचिव, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, चेन्नै ; आचार्य टी. सेंगदिर, गणित विभाग ; आचार्य पी. रवींद्रन, भौतिक विज्ञान विभाग ; आचार्य पी. रजनी, अंग्रेज़ी विभाग; गीता वर्मा द्वारा दीप प्रज्ज्वलन और एकीकृत विज्ञान निष्णात के कार्तिक एँड ग्रुप के स्वागत गान तथा श्याम, अभिषेक एँड हिमा हरिहरन ग्रुप के प्रार्थना से हुई। इसके बाद ए. आर. वेंकटकृष्णन, उप कुलसचिव (अकादमिक) ने बीज भाषण दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी. पी. संजय ने की।

विश्‍वविद्यालय के कुलपति, प्रोफेसर बी. पी. संजय ने अध्यक्षीय भाषण में कहा, “कोई भी भाषा सीखने और बोलने के लिए खुलेपन की आवश्यकता होती है। पहले स्तर पर वाक्य विन्यास, व्याकरण की गलतियाँ हो सकती हैं, जो स्वाभाविक भी हैं, लेकिन धीरे-धीरे उस भाषा को बोला और समझा जा सकता है। संतोष है कि हमारे कर्मचारी एवं विद्यार्थी इस दिशा में प्रयासरत हैं।” विश्‍वविद्यालय की भाषा नीति स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, “विश्‍वविद्यालय सभी भारतीय भाषाओं के लिए ज़गह बनाना चाहता है। तुलनात्मक अध्ययन एवं प्रयोजनमूलक पाठ्यक्रमों के ज़रिए भाषा एवं साहित्य शिक्षण सुगम बनाया जा सकता है। विश्‍वविद्यालय अगले सत्र में इस तरह के पाठ्यक्रम प्रारंभ करने की पूरी कोशिश करेगा।”

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर दिलीप सिंह ने समापन भाषण ‘राष्ट्रभाषा, राजभाषा और संपर्क भाषा’ पर बोलते हुए कहा कि “14 सितंबर वास्तव में राजभाषाओं से संबंधित है। केवल हिन्दी ही राजभाषा नहीं है, बल्कि प्रत्येक राज्य ने जिस किसी भाषा को राजभाषा के रूप में चुना है, वे सभी उन प्रांतों की राजभाषाएँ हैं। हिन्दी केवल केन्द्रीय संगठनों, उपक्रमों की राजभाषा है।” उन्होंने ‘संपर्क भाषा’ के संबंध में कहा कि प्रत्येक राज्य से जुड़े प्रदेशों की परस्पर सीमाओं पर बोली जानेवाली सभी भाषाएँ उन तमाम प्रांतों के लिए संपर्क भाषाएँ हैं। हिन्दी व्यापक अर्थों में संपर्क की भाषा हो सकती है।” उन्होंने उपरोक्त विषय पर विस्तार से बात की और राष्ट्रभाषा, राजभाषा और संपर्क भाषा के नवीन अर्थों को प्रस्तुत किया।

विश्‍वविद्यालय प्रशासन ने विशेष पहल करते हुए तिरुवारूर में स्थित एक पाठशाला ‘जीनियस नर्सरी एँड प्राइमरी स्कूल’ द्वारा हिन्दी दिवस मनाने और हिन्दी की विभिन्न गतिविधियाँ करने पर पाठशाला प्रबंधन को प्रशंसा पत्र देकर उनके इस काम की प्रशंसा की और भविष्य में इस तरह की गतिविधियों से भावात्मक एकता और हिन्दी के प्रचार-प्रसार में योगदान की आशा जतायी। विश्‍वविद्यालय के कुलसचिव वी. के. श्रीधर ने एक प्रशंसा पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए कहा कि “इस तरह के प्रशंसा पत्रों से पाठशालाओं का मनोबल बढ़ेगा। आज एक पाठशाला ने रिपोर्ट भेजी है, कल एकाधिक पाठशालाएँ हिन्दी के प्रचार-प्रसार की रिपोर्ट करेंगी और विद्यार्थी भी हिन्दी सीखने के लिए अग्रसर होंगे। भावात्मक एकता बनाने में इस तरह के प्रशंसा पत्रों से यदि किसी भी तरह की सहायता होती हो, तो अवश्य ही ऐसी पहल की जानी चाहिए। विश्‍वविद्यालय समाजहित में किए गए कार्यों की प्रशंसा के लिए सदैव तैयार है।” उन्होंने आगे कहा, “पाठशालाओं में नवीन पीढ़ी शिक्षारत है। उन्हें हिन्दी के वैश्‍विक स्वरूप से अवगत कराने के उपक्रम, उन्हें हिन्दी के प्रति जागरूक बनाने में उपयोगी हो सकते हैं। भाषा संबंधी सभी पूर्वाग्रह त्यागकर भाषाओं के ज़रिए भावात्मक एकता लाने की आवश्यकता है। विश्‍विद्यालय भावात्मक एकता विकसित करने का समर्थक है और हर तरह से सहायता के लिए तैयार है।”

कार्यक्रम में विशेष आकर्षण सोनिया एवं लोकरम्या द्वारा दी गई शास्त्रीय नृत्य-प्रस्तुति थी। अंत में एम. पी. बालामुरुगन, उप कुलसचिव (स्थापना) ने अभिनंदन एवं बी. त्यागराजन, सहायक कुलसचिव (अकादमिक) ने आभार प्रकट किया। कार्यक्रम का संचालन एकीकृत विज्ञान निष्णात की सिव पवित्रा एवं ऋषभ महिंद्रा ने किया। हिन्दी माह समारोह का आयोजन विश्‍वविद्यालय के हिन्दी अधिकारी आनंद पाटील ने किया।

कार्यक्रम में हिन्दी की विभिन्न प्रतियोगताओं के विजेताओं के लिए क्रमशः प्रथम रुपये 1500/-, द्वितीय रुपये 1000/-, तृतीय रुपये 750/-, प्रोत्साहनपरक रुपये 500/- के पुरस्कार प्रदान किए गए। इस तरह के कुल 20 पुरस्कारों एवं प्रमाणपत्रों से विश्‍वविद्यालय प्रबंधन ने विजेताओं को सम्मानित किया। ये प्रतियोगिताएँ तीन समूह यथा- संकाय एवं अधिकारी, कर्मचारी और विद्यार्थी समूह में संपन्न हुईं। पारदर्शिता बनाए रखने हेतु प्रतियोगिताओं के सभी पेपर बीजेआर गवर्नमेंट कॉलेज (उस्मानिया विश्‍वविद्यालय), हैदराबाद के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. घनश्याम को मूल्यांकन के लिए भेज दिए गए थे। उन्हीं के द्वारा प्रेषित रिपोर्ट के अनुसार पुरस्कार वितरित किए गए।

प्रस्‍तुति‍ : आनंद पाटील, हिन्दी अधिकारी

रामलीला में बंदर : कमल जोशी

बचपन को याद कर रहे हैं फोटो जर्निलिस्‍ट और लेखक कमल जोशी-

बचपन के दिनों में हमारी सबसे बडी़ कोशिश होती थी रामलीला में बंदर बनने की । तब हमारा शरीर या रसूख इतना नहीं होता था कि हम हनुमान बनने की सोचें। हाँ, सपना जरूर था। रामलीला में बंदर बनने के लिये भी कितने पापड़ बेलने पड़ते थे, यह हमको ही पता है।

रामलीला में बंदर बनने की आकांक्षा की सबसे पहले अड़चन घर से ही होती थी। रामलीला रात नौ बजे से शुरू होती थी। बंदर या राक्षस बनने के इच्छुक बच्चों को साढे़ आठ बजे तक रामलीला मुख्य स्टेज के पीछे मेकअप रूम में पहुँचना पड़ता था। उसके बाद एन्ट्री बन्द हो जाती थी। हमारे घर वाले हमें साढे़ आठ बजे तक खाना देते ही नहीं थे जिससे हम समय पर रामलीला स्टेज में पहुँच कर बंदर बनने का मेकअप कर सकें। घर में पिताजी को खाना मिलता था। रसोई से गर्म-गर्म रोटी ले जाने की जिम्मेदारी मेरी या अनिल की होती। पिताजी साढे़ आठ के बाद खाना खाते। उसके बाद ही हमें खाना मिलता। तब खाना खाने के बाद ही जा सकते थे। हम तो बंदर बनने के लिये रात के खाने की बलि‍ तक देने को तैयार थे। पर माँ थीं कि हमें बिना खाना खिलाये जाने नहीं देतीं।

साढे़ आठ बजे रामलीला पहुँचने की गर्ज में मैंने तथा अनिल ने तय किया कि हम कहेंगे कि हमारी खाना खाने की इच्छा नहीं है। पेट भरा है जिससे माँ हमें खाना खाने के झंझट से मुक्त कर दें। पर हुआ उल्टा ही। दोनों भाइयों के एक साथ खाना नहीं खाने की इच्छा तथा पेट भरे होने की शिकायत पर माँ को लगा कि हमारी तबियत खराब हो रही है। तुरंत हमारे पेट पर गयान्धूँ (गाय के दूध का घी) मलकर रजाई ओढ़ा कर सुला दिया। हमने कि‍तना कहा कि तबियत ठीक है पर माँ कहाँ मामने वाली। हमने खाना खाकर भी दिखा दिया पर माँ ने रामलीला नहीं जाने दिया। रातभर मेरी फ्लॉप तरकीब पर अनिल मुझसे लड़ता रहा।

इन विषम परिस्थितियों के बावजूद हम मेकअप रूम में दाखिल हो जोने में सफल हो जाते थे। यहाँ भी लोचा था। सब बंदर बनना चाहते थे क्योंकि रामलीला मास्टर की साफ-साफ ताकीद होती थी कि मंच पर बंदर ही राक्षसों का संहार करेंगे यानी वानर-राक्षस युद्ध होने पर राक्षस ही पिटेंगे। राक्षस पात्र वानरों को नहीं मारेंगे। यद्यपि कई बार ऐसा भी हुआ कि ज्यादा पिट जाने पर राक्षस को गुस्सा आ गया और उसने मंच की मर्यादा के विपरित दर्शकों के सामने ही वानर को पीट डाला और वानर रोने लगा। दर्शकों का हँसी के साथ-साथ सीटियाँ बजाना आम बात थी। ऐेसे में मंच की व्यवस्था सम्भालने वाले मुस्टंडे आकर वानर-राक्षस द्वन्द को तुरन्त मंच के अंदर खींच लेते। मंच मर्यादा तोड़ने के फलस्वरूप तबियत से उनकी पिटाई होती और दोनों को भविष्य में वानर या राक्षस बनने से अलग कर दिया जाता।

हमारे नसीब में अधिकांशतः राक्षस बनना था और पिटना भी बदा था। परन्‍तु वानर भी हम बनें इसलिये सब जल्दी पहुँचने के साथ-साथ लाल स्वेटर की व्यवस्था में लग जाते। क्योंकि घुटना तो रामलीला की ड्रेस में मिल जाता जो अमूमन हनुमान के पुराने कच्छे होते। हर साल भक्‍त नये कच्छे चढा़ते और हनुमान हर साल नये कच्छे में रोल करता। कभी-कभी तो एक वर्ष की रामलीला में वह दो बार नये कच्छे बदल देता। पुराने घुटने वानर सेना की ड्रेस बन जाते।

हाँ तो हमारे पास लाल स्वेटर के नाम पर स्कूल की ड्रेस की लाल स्वेटर ही होता। वानर बनने के लिये हमें घर से स्कूल स्वेटर ले जाने की मनाही थी क्योंकि वानर-राक्षस युद्ध में कई बार हम स्वेटर को फड़वा चुके थे। फिर भी हम घरवालों से आँख चुराकर स्वेटर स्मगल कर लेते थे तथा वानर बनने को हाजिर हो जाते। वानर बनने के सब सुख थे, पर एक परेशानी थी। वानरों को मुखौटे पहनने पड़ते थे। जिससे वे बंदर जैसे दिखें। मुखौटे पहनने के बाद दर्शक दीर्घा से हमारे दोस्तों को पता ही नहीं चलता था कि आज वानर कौन बना है? अपनी उपलब्धि को दिखाने के लिये यह बहुत जरूरी होता था कि हम हनुमान की टीम में बीच-बीच मे मुखौटे उठाकर अपने दोस्तों-परिचितों को अपनी शक्ल दिखाते रहें कि‍ कन्फर्म हो सके कि इस रात में मैं ही बंदर बना हूँ। हमारी इस हरकत को यदि हनुमान देख लेता तो वह एक चपत जड़ देता। हम झट से मुखौटा नीचे कर देते थे। हनुमान-वानरों की इस हालत पर दर्शक हँसते। हम उदास होते कि पता नहीं कितने देख पाये हमारी शक्ल।

राक्षस बनने की नियति तो सार्वजनिक रूप से पिटने की थी। पर वानर बनकर भी सुरक्षित नहीं रहा जा सकता था। होता ये था कि हम अति उत्साह में अपने से बडे़ लड़कों को बंदर के रूप में ज्यादा ही पिट दिया करते थे क्योंकि वे राक्षस बनते थे। शायद वो उनकी ज्यादती जो हम रोज सहते थे, उसका परिणाम होती थी। राक्षस मंच मर्यादा की वजह से उस वक्त संयमि‍त और चुप रहते पर बाद में हमारी बहुत ठुकाई होती। फिर हम घर की राह पकड़ते। अगले दिन पीठ में दर्द रहता चाहे हम बंदर बने हों या राक्षस। भरत मिलाप के दिन बंदर बनना सबसे बडी़ उपलब्धि थी। झाँकी में हनुमान की सेना बनकर हिस्सा लेने के लिये बहुत से तिकड़म लगानी पड़ती। झाँकी के लिये बहुत बेगारी करनी पड़ती तब कहीं रामलीला मास्टर का दि‍ल पि‍घलता। और हम बंदर बनते। उस दिन हनुमान के साथ बैठने का सुख तो मिलता ही साथ ही सारे शहर में घूमने का और मुखौटा उठा-उठाकर लोगों को पहचानने का मौका भी मिलता।

पता नहीं रामलीला की एक घटना का जिक्र करना उचित है कि नहीं। रामलीला में सीता स्वयंवर का दृश्य था। एक व्‍यक्ति‍ को एक देश के राजा का रोल दिया गया तो आदत के अनुसार वह शराब की घुट्टी लगाकर आया। राजाओं में से किसी ने उसका किसी बात पर मूड ऑफ कर दिया। राजा बेचारा गुस्से में क्या करता। उसने शिव धनुष तोड़ने की एक्टिंग नहीं की बल्कि तोड़ ही डाला। मंच पर सीता-दशरथ हतप्रभ। राम-लक्ष्मण हक्के-बक्के पर सीता को उसके साथ कैसे भेजा जा सकता था। पर्दा गिराया गया। पीछे उस राजा की पिटाई की गयी। दूसरी पार्टी ने शिवधनुष रिपेयर किया तब लीला शुरू हुई।

हमारा बचपन अभाव में तो नहीं गुजरा परन्तु हमें उतनी सुविधायें तथा रिसोर्स नही मिलते थे जो हमारे साथ के सम्पन्न घरों के दोस्तों को मिलते थे। सन् साठ में हम बचपन के अन्तिम मोड पर थे तो अहम जाग रहा था। हम क्यों किसी से कम हों, यह भाव था।

हमारे सम्पन्‍न दोस्त कोटद्वार के सबसे महंगे ओके टेलर तथा दून टेलर्स से कपडे़ सिलवाते थे। इन टेलरों ने कॉलर के पीछे अपना लेबल लगाना शुरू किया। इसी बिल्ले से पता चलता था किसकी कमीज महंगे टेलर ने सिली है। सम्पन्‍न घर के लड़के लेबल दिखा-दिखा तडी दिखाते।

हमारे कपडे़ मकान के बाहर पटरी पर बैठने वाले दर्जी सिला करते थे। उन बेचारों की हैसियत इतनी नहीं कि लेबल बनवाते। इसी बीच हमें नई ड्रेस सिलवानी थी। उस पर बिल्ला नहीं लगा तो बेइज्जती हो सकती थी। सवाल तडी़ का था। घर वाले तो दून टेलर से कमीज सिलवाने से रहे। ऐसे में हम कहाँ से बिल्ले लगवाते। अपने दर्जी को हमने बिल्ले के लिए परेशान करना शुरू किया। उसने चिढ़कर कहा कि‍ कहीं से बिल्ला मांग कर ले आओ। मैं सिल दूँगा। दर्जी लेबल सिलने को तैयार था। अब सवाल यह लेबल कहाँ से आये। इसी उधेड़ बुन में था। तभी युक्ति आई कि हमारे पिताजी जो अन्डरशर्ट पहनते थे, उसके पीछे गर्दन के पास लेबल लगा रहता था। हौजरी की कम्पनी का। उस समय महिलायें भी सैंडो बनियान पहनती थीं ब्लाउज के ऊपर। हमें इससे मतलब नहीं था कि बिल्ले में क्या लिखा है। वैसे भी तो अंग्रेजी में होता था। हमने चुपचाप माँ-पिताजी की बनियानों से बिल्ले काटकर टेलर को कमीज में सिलने को दे दिये। घर में बनियान पीछे से कटी देखकर कोहराम मचा कि किसने काटे क्यों काटे ? मैं चुप। खैर, हमने कमीज पर बिल्ले लगवाये।

अगली बार हम भी लेबल वाली कमीज पहनकर स्कूल गये। हर बात पर कॉलर पीछे बिल्ले दिखाते रहे। अब हमारी भी तडी़ थी कि बाहर के टेलर से कमीज सिलवाई। पर एक बार जब पिताजी दर्जी के पास पैसे देने पहुँचे तो उसने बातों ही बातों में कहा, ‘‘अब बच्चे कपडे़ की सिलाई कम फैशन ज्यादा देखते हैं। आपके बच्चे भी बिगड़ गये है। दोनों बिल्ले के चक्कर में किसी की बनियान से बिल्ले लाये और सि‍लवाये।’’

पिताजी की समझ में आ गया कि उनकी बनियान किसने काटी। घर आये। कमीज मंगवाई पूछा, ‘‘ये लेबल कहाँ से आये ?’’ मैं चुप रहा। पिटाई हुई, ‘‘उधेडो ये बिल्ले, पढा़ई में जीरो हैं और फैशन करने में सबसे आगे।’’ मुझे पिटाई का दर्द कम हुआ पर बिल्ले उखाडे़ जाने का डर ज्यादा सताने लगा। मैं जोर-जोर से रोने लगा। माँ ने बिल्ले उखाड़ने से मना कर दिया।

ऐसे ही क्रियटिविटी का एक और किस्सा। हम बचपन में अपने घर के बगलवाली नहर में नहाते थे। तैरना वहीं सीखा हमने। छोटे रहे होंगे तो नंगे नहाते थे। नंगे नहाते-नहाते तैरना भी सीख गये। जब छठीं-सातवीं में पढ़ने लगे तब हॉफ पैंट पहनकर नहाने लगे। लड़कियों की नजर में नोटिस होना जरूरी है इसलिये उनके आते ही डुबकी लगाना और तैरने की कलाबाजी के करतब दिखाना शुरू हो जाता । मैं ही नहीं सभी ऐसा करते।

इन्हीं दिनों हमारा साथी जो सबसे बडे़ व्यापारी का लड़का था, एक वी शेप वाली चड्डी ले आया। अन्य लड़के हमारी तरह पुरानी हॉफ पैंट में या धारी घुटनों में नहाते थे। सभी लड़के उसके कच्छे पर मरते थे। तैरना उसे कम आता था पर उसके वी शेप के कच्छे के चक्कर में उसका ज्यादा बडा़ रौब हो गया। वह अपने गुट के साथ तैरता और हमारी जगह कम कर देता। अब हमारे लिये यह सम्मान का प्रश्‍न हो गया। कैसे उसके वी शेप की चड्डी से टक्कर ली जाये।

उन्हीं दिनों मेरे चचेरे भाई आये थे। उनके पास वैसी ही वी शेप चड्डी थी। वह दो दिन के लिये आये थे। मैंने उनका कच्छा चुरा लिया। जब वह जाने लगे तो कच्छे की ढूंढ़ हुई, वो कहाँ से मिलता। अब वो मेरा था। पर उसे मैं पहन नहीं सकता था। वो मेरे साइज से बहुत बडा़ था।

अब अपनी क्रि‍यटि‍वि‍टी का इस्‍तेमाल की जरूरत थी। उसे अपने साइज का काटकर बना लि‍या। अगले दि‍न में इसे पहनकर नहर में चला गया। सबने पूछा, ‘‘कहाँ से ले आया यह ?’’

‘‘भाईजी फौज से लाये हैं।’’ मैंने कहा।

‘‘अब फौज में बच्‍चे के कच्‍छे मि‍लते हैं ?’’ प्रति‍द्वन्‍दी लड़के ने पूछा।

मैंने अकड़कर कहा, ‘‘तू क्‍या जाने फौज के बारे में। तू तो मूंग तोल मूंग। मेरी फिर धाक जम गई।

वे कत्‍ल के पाँच दि‍न थे। उतने भारी दि‍न उससे पहले कभी नहीं गुजरे थे। इतनी ग्‍लानि‍ मुझे कभी नहीं हुई थी। कि‍स्‍सा यूँ हुआ कि‍ मैं स्‍काउटिंग के शि‍वि‍र में गया था। दस दि‍वसीय शि‍वि‍र स्‍काउटिंग गति‍वि‍धि‍यों को हि‍स्‍सा था। मैं क्रि‍याकलापों का नेता था। कम वजन होने के कारण मुझे पि‍रामि‍ड बनाते हुए सबसे ऊपर लड़कों के कन्‍धों पर खड़ा होना था। गढ़ देवा का प्रमुख रोल होता है इस कि‍स्‍से में। शि‍वि‍र में पि‍ताजी भी आये थे। जैसे कि‍ अन्‍य अभि‍भावक भी आते थे। वे साथ में चने-लैचीदाणे(चने-इलायची दाने) भी लेकर आये। गढ़ देवा लैंसडाउन होना था। उन्‍होंने कहा, ‘‘ठीक है मैं तेरे लि‍ये गर्म पैंट सि‍लवा देता हूँ।’’ पैंट का नाम सुनते ही खुशी में नींद उड़ गई। अब तक हॉफपैंट ही पहनते थे। पहली बार पैंट सि‍लवाई जा रही थी। पैंट टेलर के पास थी। मैं इंतजार करते-करते सो गया। सुबह उठकर माँ से पूछा तो उन्‍होंने कहा, ‘‘मैं पि‍ताजी से पूछ कर बताऊँगी। कहाँ रखी है।’’ वह पि‍ताजी से पूछकर पैंट ले आईं। अगले दि‍न लैंसडाउन पहुँचे। हम कोटद्वार की स्‍पोर्ट्स लड़कि‍यों की भी देखभाल करते। शाम को मैंने नई पैंट नि‍काली, पहनी। तभी एक लड़के ने कहा कि‍ नई पैंट नहीं है। इसके पीछे तो टल्‍ला लगा है। कमरे में गया। उदास नजरों से टल्‍ले को देखा। मैं रोने लगा। दरअसल बडे़ भाई साहब की पैंट उधेड़कर मेरे लि‍ये बनवाई गई थी। पर उसी पैंट को पहनकर जाना पड़ा। लड़के मजाक बनाते थे। कहाँ तो मैं जोर-जोर से नारे लगाता था, पर उस साल गढ़ देवा की अवधि‍ में डर-डर कर रहा। धीरे-धीरे टल्‍ले वाली पैंट पहनने की आदत बन गई।

रामलीला में बंदर बनने का कि‍सी ने सरल रास्‍ता बताया कि‍ अगर तुम अपनी पलकों के ऊपर के बाल और भौं के बाल नोंच कर दो पत्‍थरों के बीच रख दोगे तब तुम्‍हारी मनोकामना पूरी होगी। मैं और अनि‍ल इस काम में लग गये। रोज आँखों के बाल नोंचते और जब लोगों के सामने जाते तो बि‍ना बालों और पलकों की भौंहे देखकर वे आश्‍चर्य भी करते और हँसते भी। हमारे लि‍ये हँसी-मजाक को मौका नहीं था पर अपना ही चेहरा आइने में देखकर पहचाना नहीं जाता। यह सि‍लसि‍ला कैसे खत्‍म हुआ, याद नहीं पर बचपन याद है।

(अतुल शर्मा द्वारा सम्‍पादि‍त शीघ्र प्रकाश्‍य पुस्‍तक से)  

आचार्य निरंजननाथ सम्मान असग़र वजाहत को

असग़र वजाहत

राजसमन्द: आचार्य निरंजननाथ स्मृति सेवा संस्थान के सहयोग से साहित्यिक पत्रिका ‘संबोधन’ के माध्यम से प्रति वर्ष दिया जाने वाला ‘आचार्य निरंजननाथ सम्मान’ हिन्दी के विख्यात साहित्यकार डॉक्‍टर असग़र वजाहत को प्रदान किया जायेगा।

सम्मान समिति के संयोजक और ‘संबोधन’ के सम्पादक क़मर मेवाड़ी ने बताया कि 14वाँ आचार्य निरंजननाथ सम्मान डॉक्‍टर असग़र वजाहत, दिल्ली  को उनकी कथा कृति ‘मैं हिन्दू हूँ’ पर इक्यावन हजार (51,000/-) रुपये, हिन्दी के युवा आलोचक पल्लव, चित्तौड़गढ़ को दूसरा प्रथम प्रकाशित कृति सम्मान उनके आलोचना निबंध संग्रह ‘कहानी का लोकतंत्र’ पर ग्यारह हजार (11,000/-) रुपये तथा प्रोफेसर सूरज पालीवाल, जोधपुर को उनके समग्र साहित्यिक अवदान पर विशिष्ट साहित्यकार सम्मान ग्यारह हजार (11,000/-) रुपये के साथ शाल, श्रीफल, प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिन्ह प्रदान किया जायेगा।

क़मर मेवाड़ी के अनुसार कर्नल देशबंधु आचार्य की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में इन पुरस्कारों की घोषणा की गयी। इस वर्ष निर्णायक थे- प्रख्यात कथाकार एवं समयांतर के सम्पादक पंकज बिष्ट, प्रसिद्ध  समीक्षक मधुरेश तथा युवा कथाकार हिमांशु पंडया।

सम्मान समारोह 9 दिसंबर, 2012 को राजसमन्द जिले के कांकरोली नगर में आयोजित होगा।