Archive for: September 2012

पाखंड और लूट की सत्ता के खिलाफ एक वैचारिक संघर्ष है ‘महाभोज’

पटना के कालिदास रंगालय में हिरावल द्वारा ‘महाभोज’ के दो दिवसीय मंचन की युवा लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की रि‍पोर्ट-

पटना : बिहार की चर्चित नाट्य संस्था ‘हिरावल’ ने 24-25 सितंबर को पटना के कालिदास रंगालय में मन्नू भंडारी के बहुचर्चित नाटक ‘महाभोज’ का मंचन किया। तीन दशक से लगातार देश भर में मंचित किया जाने वाला यह नाटक आज के बिहार के राजनीतिक सन्‍दर्भ में बेहद प्रासंगिक लगा। जबकि इस नाटक के लिखे जाने से लेकर अब तक सत्ता के झंडों के कई रंग बदले हैं, लेकिन सत्ता के पाखंड, सामंती शक्तियों पर उसकी निर्भरता और उसके द्वारा नौकरशाही और मीडिया का अपने निहित स्वार्थ में इस्तेमाल की हकीकत के लिहाज से नाटक का मुख्यमंत्री दा साहब आज भी बेहद जाना-पहचाना चरित्र लगता है। एक ओर वह वोट के लिए खेत मजदूरों और दलितों के विकास के लिये योजनाओं की घोषणाएं करता है,  तो दूसरी ओर वह उनका दमन-उत्पीड़न करने वाली सामंती शक्तियों का हितैषी बना रहता है। पक्ष-विपक्ष की शासकवर्गीय पार्टियों का गरीब-मेहनतकश वर्ग के साथ सिर्फ चुनावी फायदे और नुकसान का रिश्ता दिखता है, कोई उनकी जिंदगी को बुनियादी तौर पर बदलना नहीं चाहता, दोनों सामंती शक्तियों के प्रतिनिधि जोरावर सिंह को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं।

मन्नू भंडारी लिखित इस नाटक की पहली प्रस्तुति आज से तीस साल पहले एनएसडी के रंगमंडल की ओर से दिल्ली में की गई थी। हिरावल ने आज से दस साल पहले भी इस नाटक का मंचन किया था। वैचारिक तौर पर यह अत्यंत गम्‍भीर, यथार्थपरक और बहसतलब नाटक है। बिहार की राजनीति के लिये तो मानो आज भी एक प्रभावशाली आईना है। महाभोज में बिसू नामक एक खेत मजदूर की हत्या का प्रसंग है, जो खेत मजदूरों को उनके अधिकारों के लिये जागरूक कर रहा था और आगजनी के जरिय जला कर मार दिये गये गरीबों-दलितों के हत्यारों को सजा दिलाने के लिये संघर्ष कर रहा था। उसकी हत्या के बाद नाटक में मुख्यमंत्री दा साहब और विपक्षी पार्टी के सुकुल जी उपचुनाव में दलितों को अपने-अपने पक्ष में संगठित करने की हरसम्‍भव कोशिश करते हैं। इस कोशिश में सत्ता मीडिया और नौकरशाही का खुलकर इस्तेमाल करती है। हत्या के जिस सच को लेकर बीसू के दोस्त बिंदा और रिसर्चर महेश संघर्ष करते हैं, दा साहब के इशारे पर उस सच को ही पलट दिया जाता है और बिंदा को ही हत्यारा साबित कर दिया जाता है। अपने हक अधिकार के लिए आंदोलन करने वालों को ही गुनाहगार साबित करके जेल में डाल देने की कई घटनाओं से नाटक के इस प्रसंग का प्रत्यक्ष संबंध जुड़ जाता है।

थानेदार, अखबार का सम्‍पादक, डीआइजी और पक्ष-विपक्ष के नेता- सबके गरीब विरोधी चरित्र को नाटक ने बड़ी कुशलता से पर्दाफाश किया। मौजूदा तंत्र समाज के आखिरी आदमी के प्रति कितना निर्मम है, इसे इस नाट्य प्रस्तुति ने बडे़ कारगर तरीके से पेश किया। अपने साथी बीसू के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए संघर्ष कर रहा बिंदा कहता है- ‘‘कुछ नहीं करेगी यहाँ की पुलिस। कोई कुछ नहीं करेगा। …अखबार वालों के पास गये, छापना तो दूर, बात तक नहीं की। आगजनी का कइसा ब्योरा छापा था….अब जाने कउन साँप सूँघ गया है! सब के सब बिक गये हैं।’’ गाँव में कास्ट और क्लास विषय पर रिसर्च करने पहुँचे महेश शर्मा से बहस करते हुए वह दो टूक पूछता है- ‘जरा बताओ, कउन मिटाएगा अमीर-गरीब का ई भेद? तुम तो डेढ़ महीने से हियाँ साइकिल पे घूम-घूमके अउर किताबें पढ़-पढ़के गांव जानि रहे हो।…. थीसस लिखोगे गाँव पे। …अइसे जाना जाता है गाँव? अरे गाँव जानना है तो जुड़ो हियाँ के लोगों के साथ…. सामिल होओ उनके दुख-दरद में! लिखो कि सरकारी रेट पे मजूरी माँगने-भर से जिंदा आदमियों को भून के राख बना दिया। अउर जब इस जुलुम के खिलाफ किसी ने आवाज उठाये की कोसिस की तो मार दिया उसे……।’’

इस नाटक ने बुद्धिजीवियों और नागरिकों को जनसंघर्षों से जुड़ने का संदेश भी दिया। महेश शर्मा एसपी सक्सेना से कहता है- ‘‘लेकिन हमें परमिशन नहीं है सर कि हम गाँव की समस्याओं और लोगों के साथ इनवॉल्व हों। फेलोशिप की पहली शर्त होती है यह। यह सारी की सारी एजुकेशन अज्ञान में रखना चाहती है हमको…नहीं चाहती कि हम अपने आसपास की असलियत को जानें, उससे जुड़ें। फार्म में भरकर देना होता है हमको कि हम सिर्फ देखेंगे… तटस्थ होकर। जो कुछ गलत है, उस पर रिएक्ट नहीं करेंगे… खून नहीं खौलने देंगे अपना। …क्या मतलब है ऐसी एजुकेशन का।’’ नाटक के अंत में जब बीसू के दोस्त बिंदा को पुलिस यातना दे रही है और तंत्र से जुड़े सारे लोग मौजमस्ती में व्यस्त हैं, तब वह सवाल करता है कि क्या इन हालात में बिना इन्वॉल्व हुए रह सकता है कोई? और इसी बिंदु पर बुनियादी संघर्षों के साथ जुड़ाव की जरूरत के संदेश के साथ नाटक का अंत होता है।

बिंदा की पत्नी रुक्मा की भूमिका में दिव्या गौतम ने पुलिसिया आतंक से परेशान आम मेहनतकश स्त्री का बेहद जीवंत अभिनय किया। थानेदार, दा साहब, जमुना बहन, जोरावर, लखन, बिंदा, सुकुल बाबू, एसपी, डीआईजी, सम्‍पादक दत्ता व सहायक सम्‍पादक की भूमिकाओं में क्रमशः राम कुमार, अभिषेक शर्मा, समता राय, नीतीश, कुंदन, अभिनव, प्रमोद यादव, अंकुर राय, राजेश कमल, सुधीर सुमन और संतोष झा ने अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया। महेश, हीरा, नरोत्तम, जगेसर, काशी, पांडे जी, बीसू, लठैत और मोहन सिंह की भूमिका मृत्युंजय, राजन, हिमांशु, राहुल रौशन, विक्रांत चौहान, मुरारी, अमित मेहता, चैतन्य कुमार और रौशन ने निभाई। ग्रामीण समेत अन्य भूमिकाओं में अविनाश कुमार, रतन, सूर्यप्रकाश, रतन और रुनझुन थे। नाटक का निर्देशन संतोष झा ने किया। सहनिर्देशक सुमन कुमार थे। प्रकाश परिकल्पना विज्येंद्र टाँक तथा मंच परिकल्पना अभिषेक शर्मा की थी। उद्घोषक डीपी सोनी थे। नेपथ्य की अन्य भूमिकाओं और जिम्मेवारियों में विनय राज और युसूफ अली थे। इस अवसर पर शहर के कई महत्वपूर्ण रंगकर्मी, साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी और बुद्धिजीवी मौजूद थे।

किसी सरकारी मदद के बिना और एनजीओ या कारपोरेट्स की फंडिंग के बगैर भी सिर्फ जनसहयोग के बल पर भी तीस-तीस पात्रों वाले मंचीय नाटक का प्रदर्शन सम्‍भव है, पटना में जसम की गीत-नाट्य इकाई हिरावल ने ‘महाभोज’ के दो दिवसीय मंचन के जरिय इसका उदाहरण पेश किया। जहाँ पुरस्कारों और प्रलोभनों के जरिय संस्कृतिकर्मियों, कलाकारों और साहित्यकार-बुद्धिजीवियों को खरीद लेने और वैचारिक तौर पर लूट की सत्ता में उन्हें साझीदार बना देने का सिलसिला जारी है, वहीं हिरावल ने अपनी वैचारिक स्वतंत्रता और स्वाभिमान को बनाए रखने और संस्कृतिकर्मियों की सामूहिकता को ताकतवर बनाने की कोशिश की है। रंगकर्म की दुनिया में इस वैचारिक संघर्ष ने एक प्रतिबद्ध दर्शक वर्ग का भी निर्माण किया है, ‘महाभोज’ के मंचन के दोनों दिन दर्शकों की अच्छी खासी मौजूदगी ने जिसका जबर्दस्त तरीके से अहसास कराया। कमाल यह कि इतने गम्‍भीर और पात्रबहुल इस नाटक को हिरावल के कलाकारों ने महज 27 दिनों में तैयार किया!

‘कवि के साथ’ का आयोजन तीस सितम्बर को

नई दि‍ल्ली : इंडि‍या हैबि‍टैट सेंटर द्वारा शुरू की गई काव्य-पाठ की कार्यक्रम श्रृंखला ‘कवि के साथ’ के छठे आयोजन में इस बार वरिष्ठ कवि मदन कश्यप के साथ मुकुल सरल और कुमार अनुपम का काव्य पाठ होगा। कार्यक्रम 30 सि‍तम्बर को शाम सात बजे गुलमुहर हाल, इंडिया हैबिटेट सेंटर, दिल्ली में शुरू होगा। कवि और कविता से कविताप्रेमी हिन्‍दी समाज का सीधा संपर्क-संवाद बढ़े, यही इस आयोजन का उद्देश्य है। इसमें हर बार हिन्‍दी कविता की दो पीढ़ियाँ एक साथ काव्यपाठ करती हैं। पाठ के बाद श्रोता उपस्थित कवियों से सीधी बातचीत करते हैं।

तीनों कवि‍यों की एक-एक कवि‍ता-

मदन कश्यप

छिपना

मुखौटों से झाइयाँ नहीं छिपतीं
पूरा का पूरा चेहरा छिप जाता है
सबको पता चल जाता है
कि सब कुछ छिपा दिया गया है

भला ऐसे छिपने-छिपाने का क्या मतलब

छिपो तो इस तरह कि किसी को पता नहीं
चले कि तुम छिपे हुए हो
जैसे कोई छिपा होता है हवस में
तो कोई अवसरवाद में

कुछ चालाक लोग तो
विचारधारा तक में छिप जाते हैं

कोई सूचनाओं में छिप जाता है
तो कोई विश्लेषण में
कोई अज्ञान में तो कोई इच्छाओं में

और कवि तो अक्सर अपनी कायरता में
छिपा होता है ।

मुकुल सरल

अल जैदी का जूता

नई भाषा
नये शब्द
नये मुहावरे
सब पुराने पड़े
आज का सबसे नया छंद है
अल जैदी का जूता
जिस पर मेरा मन हिलोरें ले रहा है
इस छंद में कविता रचो
तो कोई बात बने

अंधेरे में बिजली-सी कौंध-सा
ज़ुल्म के खिलाफ़
हर उस जालिम के मुँह पर पड़ा है
मुंतज्रर अल जैदी का जूता
जो खुद को समझता है जार्ज बुश
अमेरिकी सम्राज्यवाद से भी बड़ा है
अल जैदी का जूता
इसकी गूँज वहाँ तक है
जहाँ तक नहीं जाती कोई सदा
कोई आँसू…कोई आह!….
दिल की आग-सा
फैल गया है चारों तरफ़

बुश तुम्हारे बम वर्षकों
क्रूज मिसाइलों
टैंकों-मशीनगनों
तुम्हारी पूरी फ़ौज
और गलीज चालों से भी
ज्यादा मारक और घातक है
ये अल जैदी का जूता

कोई मुझसे कहे कि लिखूँ
जालिम का इतिहास
तुम्हारा कार्यकाल
तो बस तुम्हारी तस्वीर के साथ
चस्पां कर दूँगा
अल जैदी का जूता
तुम्हारी उपलब्धियों के लिये
सिर्फ़ एक ही पंक्ति होगी काफ़ी
कि इराक में
तुम्हारे मुँह पर खींचकर मारा गया जूता
…..
जिसे तुम चालाकी से बचा गये
लेकिन जो तुमसे चिपक गया है इस तरह
कि तुम्हें काटता रहेगा उम्र भर
और तुम्हारे जैसों को भी…..

और हाँ
सावधान!
मैंने भी पहन लिया है
अल जैदी का जूता
सिर्फ पाँव में नहीं
हाथों में भी…

कुमार अनुपम

(काव्य -कोलाज़ का एक अंश )

‘हिन्दी साहित्य में प्रशस्ति लेखक का महत्त्व’ या ‘हिन्दी साहित्य में फ्लैप लेखक का योगदान’ जैसे विषय पर जब शोध होगा तो श्रीमान बुद्धिजीवीजी का नाम प्रमुखता से सन्दर्भित होगा ऐसा बुद्धिजीवीजी ने सोचा यह उनका पराक्रम ही है कि जिसके लिए तरसते हैं तमाम साहित्यकार फाहित्यकार वह पुरस्कार बुद्धिजीवी जी ने दो-दो तीन-तीन बार झपटा इस सबके बावजूद बुद्धिजीवीजी में एक बचकानी ईषर्या घर कर गयी जिसका मौलिक पाठ अमरीका जिस तरह आतंकवाद के ख़िलाफ़ करता है कुछ उसी तरह हल्के अन्दाज़ में रह रह कर करते हैं कि उन पर मास्टरी की हैवी सेलरी का दाब न दिखे ऐसे विगलित क्षणों में बुद्धिजीवीजी रचना में आँख मूँद समीक्षा लिखने में जुट जाते हैं अफ़सर-दोस्त और दारू महत्त्वपूर्ण रचना की कसौटी हैं उन्हें याद रहता है बाक़ी भीड़ है जिसे लोहिया भी लोक आदि कहते थे बुद्धिजीवीजी जीवन के लिए बुद्धि को इनपुट मानते हैं और विज्ञापन को आउटपुट जिसका कमीशन उनकी साहित्यिक उपलब्धि है इस सन्तोष के साथ सिर झुकाकर चरने में मशगूल हो जाते हैं…

जनवादी सरकार के समाजवादी फैसले : अनुराग

मनमोहन सरकार से पहले इस तरह की समाजवादी और वैज्ञानिक सोच वाली सरकार स्‍वंतत्र भारत के इतिहास में कभी नहीं आई। भविष्‍य के बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कह सकता। वैसे हमारे राजनेताओं में जिस तरह की सोच विकसित हो गई है, उससे तो उम्‍मीद है कि आने वाली सरकारें मनमोहना से भी बढ़कर समाजवादी और वैज्ञानिक सोच की होंगी। वह भारत कितना खूबसूरत होगा, जिसमें एक भी गरीब नहीं बचेगा। बस अमीर ही अमीर होंगे।

करीब चालीस साल पहले श्रीमती इंदिरा गांधी ने नारा दिया था- गरीबी हटाओ। उसके बाद जनता पार्टी, कांग्रेस, जनता दल, समाजवादी जनता पार्टी, भारतीय जनता पार्टी आदि कई पार्टियों की सरकारें आईं और गईं, लेकिन कोई भी गरीबी नहीं हटा सका। इसलिए मनमोहन सरकार ने दिल पर पत्‍थर रखकर गरीबों को ही हटाने का निर्णय ले लिया। एक समझदार शल्‍य चिकित्‍सक बीमारी को जड़ से ही खत्‍म करता है। भले ही इसके लिए रोगी को बीमारी से भी गहरा जख्‍म क्‍यों न देना पडे़। निसंदेह इससे रोगी को तात्‍कालिक तकलीफ होती होगी, लेकिन यह उसी के हित में होता है। देश में सभी समस्‍याओं की जड़ गरीब हैं। इन्‍हें रोटी चाहिए, मकान चाहिए, शि‍क्षा चाहि‍ए, दवा चाहिए और भी न जाने क्‍या-क्‍या। इनकी जरूरतें कभी पूरी ही नहीं होतीं। देश अंतरिक्ष में पहुंच गया, इससे इन्‍हें खुशी नहीं मिलेगी। देश में आलीशान मॉल खुल रहे हैं, बडे़-बडे़ हाईवे बन रहे हैं, लेकिन ये बात केवल रोटी की करेंगे। इतना भी नहीं समझते कि रोटी नहीं मिल रही है तो बोटी खा लो और देश के वि‍कास के बढ़ते ग्राफ को देखकर खुश रहो। कुल मिलाकर गरीब देश के विकास और तरक्‍की में धब्‍बा हैं। सरकार कुछ कठोर निर्णय लेकर देश की बीमारियों की जड़ को ही समाप्‍त कर देना चाहती है तो इसमें किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए।

महान वैज्ञानिक डार्विन का सिद्धांत है कि पृथ्‍वी पर अस्तित्‍व बचाने के लिए निरंतर संघर्ष चलता रहता है। इसमें दुर्बल नष्‍ट हो जाते हैं और सक्षम बच जाते हैं। इतिहास गवाह है कई जीवों की प्रजातियां संघर्ष न कर पाने के कारण नष्‍ट हो गईं। गरीब नामक प्रजाति भी संघर्ष न कर पाने या खुद को परिस्थिति के अनुकूल नहीं ढाल पाने के कारण नष्‍ट हो जाती है तो इसमें किसी का क्‍या कसूर।

समय-समय पर पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ने से खाद्य पदार्थों के दाम भी बढ़े हैं। गरीब खाद्य पदार्थ खरीद नहीं पा रहे हैं और जले में नमक यह कि वे जितने चाहे सबसिडी वाले गैस सिलेंडर खरीद सकते हैं। इसलिए सरकार ने ऐसे सिलेंडर की संख्‍या भी सीमित कर दी है। जब खाना खरीदने की ही औकात नहीं है तो सबसिडी पर सिलेंडर देने का क्‍या फायदा। और जो खरीद सकते हैं, उन्‍हें स‍बसिडी की जरूरत नहीं है।

मनुष्‍य में अधिकांश बीमारियों की जड़ मोटापा यानी अधिक खाना है। महंगाई बढ़ने से लोगों का अनाप-शनाप खाना कम हो जाएगा। वे जैसे-तैसे करके जीने लायक ही खा पाएंगे। इससे वे मोटापा का शिकार नहीं होंगे। और उनका स्‍वास्‍थ्‍य भी ठीक रहेगा। इसके बावजूद यदि कोई नासमझ मोटापा बढ़ा ले तो उसे दुरूस्‍त करने के लिए डीजल, पेट्रोल के दाम फिर बढ़ाए जाएंगे। इससे वह अधिक से अधिक पैदल चलेगा और स्‍वस्‍थ रहेगा। फिर भला उससे धनी कौन होगा। कहा भी गया है- हेल्‍थ इज वेल्‍थ।

आज के दौर में लोकतंत्र की चुनौती ही आलोचना की चुनौती है : राजेंद्र कुमार

इलाहाबाद : वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर मैनेजर पांडेय के जीवन के 71 वर्ष पूरे होने के अवसर पर 23 सितम्बर को ‘जन संस्कृति मंच’ की ओर से इलाहाबाद में ‘आलोचना की चुनौतियाँ’ विषय पर प्रोफेसर राजेंद्र कुमार की अध्यक्षता में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। राजेंद्र कुमार ने कहा कि आज के समय में जो चुनौतियाँ लोकतंत्र के समक्ष हैं, वही आलोचना की भी चुनौतियाँ हैं। उन्होंने बताया कि साहित्य में आलोचना विधा का आगमन गद्य के उद्भव के साथ होता है। पश्‍चि‍म में यह पूँजीवादी लोकतंत्र के साथ जन्म लेती है। आज भारत में यह लोकतंत्र भी चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसका संकट और इसकी चुनौती आज की आलोचना की भी चुनौती है। उन्होंने कहा कि आज की आलोचना को एक समझ और तमीज विकसित करनी चाहिए जो यह पहचान सके कि साहित्य में विचारधारा को गैर-जरूरी बताने वाले खुद किस विचारधारा को स्वीकार्य बनाना चाहते हैं। उत्तर आधुनिकता, जो ‘सब-कुछ’ को ‘पाठ’ बनाती है, वह अपने आप में खुद एक विचार का आरोपण है। प्रतिरोध की चेतना की पहचान ही आलोचना को महत्वपूर्ण बनाती है। आलोचना का काम रचनाकार को छोटा या बड़ा सिद्ध करना नहीं है।

इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता लाल बहादुर वर्मा ने कहा कि आज आलोचना की चुनौती यह है कि साहित्य को साहित्य, और समाज को समाज बनाए रखने में मदद करे क्योंकि आज पूँजीवाद इसी को खत्म कर देना चाहता है। उन्होंने कहा कि आलोचना के लिए जन-सरोकार होना जरूरी है। आलोचना एक उपकरण भी है, जिसे चलाना मालूम होना चाहिए। आज आलोचना को साहित्य के लिए मशाल होना चाहिए। वह साहित्य और जन के बीच पुल है।

आलोचक और कथाकार दूधनाथ सिंह ने कहा कि विचारधारा और साहित्य-रचना का जो तनाव है वह आलोचना में होना चाहिए, उसे नज़र-अंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। सामाजिक शक्तियों के जो संघर्ष हैं, साहित्य उन्हें प्रतिबिम्बित करे।

रविभूषण (राँची) ने कहा कि आलोचना जीवन और समय-समाज सापेक्ष होनी चाहिए। आज के संकट के समय में आलोचना को राजनीतिक प्रश्‍नों से भी जूझना होगा।

आलोचक गोपाल प्रधान (दिल्ली) ने आलोचना के वर्तमान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आज क्षणिक किस्म के परिवर्तनों का उत्सवीकरण हो रहा है और आलोचना के भीतर से इतिहासबोध को विलिपित किया जा रहा है। जब कि हिन्‍दी आलोचना अपने प्रारम्भ से ही सिर्फ साहित्य-आलोचना नहीं रही बल्कि उसने व्यापक सामाजिक सरोकार रखते हुए समाज और देश की आलोचना की। इतिहासबोध उसमें एक जरूरी तत्व रहा है। उन्होंने कहा कि देश का शासक-वर्ग इतना देशद्रोही शायद ही कभी रहा हो, जितना कि आज का शासक-वर्ग है। उसके भीतर के भय का आलम यह है कि वह कार्टून भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। उन्होंने अत्याधुनिक तकनीकी के साथ अत्यंत पिछड़ी हुई सामाजिक चेतना के मेलजोल के खिलाफ आलोचनात्मक संघर्ष चलाने की आवश्यकता बताई।

पंकज चतुर्वेदी (कानपुर) का कहना था कि आलोचना अगर रचना में मुग्ध हो जाएगी तो वह रचना को ठीक से देख नहीं पाएगी। आलोचक को रचना की संशक्ति के साथ उससे दूरी भी बनाए रखनी होगी तभी वह रचना के महत्व को रेखांकित कर पाएगी। तमाम आलोचक दूरी बनाते हैं लेकिन संशक्ति गायब है। आलोचना को रचना से, उसके रचना कर्म से संबोधित होना होगा। आज के आलोचक पारिभाषिक शब्दावलियों के गुलाम हैं। पूरी आलोचना इन्हीं बीस-पच्‍चीस शब्दों से काम चलाती है। पारिभाषिक शब्दों की यह गुलामी रचना और आलोचना के बीच एक परदे का काम करती है। आलोचना को नये शब्द ईजाद करने होंगे। उन्होंने रचना और आलोचना में विचारधारा की आबद्धता को गैर ज़रूरी  बताते हुए कहा कि जनता के प्रति सम्बद्धता जरूरी है लेकिन विचारधारा से आबद्धता जरूरी नहीं।

प्रोफेसर चंद्रा सदायत (दिल्ली) ने कहा कि आज के दौर के अस्मितावादी विमर्श आलोचना का ही हिस्सा हैं। इसे और व्यापक बनाने के लिए अन्य भाषाओं के (अस्मितावादी विमर्शों के) अनुवाद को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए या फिर आलोचना को कम से कम उनका संदर्भ तो लेना ही चाहिए।

प्रज्ञा पाठक (मेरठ) ने कहा कि स्त्री के जीवन और साहित्य को अलग कर के देखने से उसके साहित्य का सही मूल्याँकन नहीं हो पाएगा। तमाम लेखिकाएँ भी इसमें भ्रमित होती हैं। आलोचना में अभी भी स्त्री-रचना पर बात करने में पुरुषवादी सोच का दबाव काम करता है। स्त्रियाँ भी स्त्री-विमर्श या रचना पर बात करते समय इसी प्रभाव को ग्रहण कर लेती हैं। स्वतंत्र और व्यक्तित्ववान स्त्री आज भी आलोचना के लिए चुनौती है।

अपने जन्मदिन के मौके पर, संगोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रो‌फेसर मैनेजर पांडेय ने कहा कि विचारधारा के बिना आलोचना और साहित्य दिशाहीन होता है। आलोचना में पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग ईमानदारी से होना चाहिए क्योंकि पारिभाषिक शब्द विचार की लम्बी प्रक्रिया से उपजते हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य की सामाजिकता की खोज और सार्थकता की पहचान करना ही आलोचना की सबसे बड़ी चुनौती है। इस अवसर पर राहुल सिंह (बिहार), रामाज्ञा राय (बनारस) आदि वक्ताओं ने भी विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं संस्कृतिकर्मी उपस्थित रहे। संगोष्ठी का संचालन जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने किया। इससे पहले कॉ. जिया उल हक ने प्रो. मैनेजर पांडेय को उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।

इस मौके पर प्रो. मैनेजर पांडेय के आलोचना कर्म पर केंद्रित दो पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ। इनमें से पहली पुस्तक ‘मैनेजर पांडेय का आलोचनात्मक संघर्ष’ युवा आलोचक तथा जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण द्वारा लिखित तथा जसम के सांस्कृतिक संकुल द्वारा प्रकाशित है। दूसरी पुस्तक ‘आलोचना की चुनौतियाँ’ का सम्पादन दीपक त्यागी और राजेश्वर चतुर्वेदी ने किया है जिसमें पाण्डेय जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अनेक लेख संकलित हैं ।

जरूरी चीजों का चुनाव टीआरपी से नहीं किया जा सकता : थानवी

गोष्ठी में वि‍चार व्यक्त करते वरि‍ष्ठ पत्रकार ओम थानवी।

नई दिल्ली: मीडिया पर अब पूँजी का दबदबा साफ़ दिखाई दे रहा है। जब मीडिया व्यापार की वस्तु होगा तो वहाँ भाषा पर व्यापार का असर कैसे रोका जा सकता है। सुपरिचित लेखक और ‘जनसत्ता’ के सम्पादक ओम थानवी ने यह बात हिन्दू कॉलेज में हिन्दी साहित्य सभा द्वारा वार्षिक दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यानमाला श्रृंखला में ‘मीडिया : साहित्य और संस्कृति’ विषय पर 25 सितम्बर 2012 को आयोजित गोष्ठी में कही। उन्होंने कहा कि‍ हमें यह ध्यान देना होगा कि जूते के कारोबार और अखबार में फर्क है क्योंकि सिर्फ सूचना देना ही मीडिया का काम नहीं, बल्कि पाठकों की समझ बढ़ाना भी मीडिया की जिम्मेदारी है।
थानवी ने कहा कि अपराध की जानकारी से ज्यादा प्रस्तुतीकरण पर जोर ही मीडिया के उद्देश्य को स्पष्ट कर देता है। उन्होंने सम्पादक संस्था के ह्रास पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि टीवी पर आ रहे समाचार चैनलों का सम्पादक कौन है यह हम नहीं जानते। मीडिया और भाषा के सम्बन्ध पर विस्तार से चर्चा करते हुए थानवी का कहना था कि अच्छी भाषा के बाद ही संस्कृति-कला और साहित्य की बात आती है। साथ ही उन्होंने साहित्य और अखबार की भाषा का भेद बताते हुए कहा कि साहित्य का गृहीता अलग है और अखबार का अलग, अत: भाषा यहाँ हमेशा जिम्मेदारी का बर्ताव मांगती है।
उन्होंने बोलचाल की भाषा का मीडिया लेखन में जोरदार पक्ष लेते हुए कहा कि हिन्दी भाषा की जगह अंग्रेजी का बढ़ता प्रयोग गलत है। उन्होंने कहा कि जिस देश में केवल एक प्रतिशत लोग अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हों वहाँ यह भ्रम है कि अंग्रेजी भारत की सम्पर्क भाषा है। व्याख्यान के बाद विद्यार्थियों के सवालों के उत्तर देते हुए थानवी ने टीआरपी को भी भ्रामक एवं रुचि‍ को विकृत करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि ‘शोले’ के मुकाबले ‘पाथेर पांचाली’ दर्शक कम हो सकते हैं लेकिन जरूरी चीजों का चुनाव टीआरपी से नहीं किया जा सकता।
इससे पहले साहित्य सभा के परामर्शदाता डॉ. पल्लव ने सभा के छात्र पदाधिकारियों एवं वार्षिक गतिविधियों का परिचय दिया। सभा के अध्यक्ष एमए के छात्र भीमसेन, शैलेश शुक्ल और असीम अग्रवाल ने दीप प्रज्ज्वलन कर आयोजन का शुभारम्भ किया। ओम थानवी का परिचय छात्रा चंचल गौर ने दिया। विभाग की प्रभारी डॉ. रचना सिंह ने दीपक सिन्हा के व्यक्तित्त्व को रेखांकित किया। संयोजन श्वेतांशु शेखर और प्रियव्रत मिश्रा ने किया। अंत में सभा के महासचिव शैलेश शुक्ल ने आभार ज्ञापित किया। आयोजन में बड़ी संख्या में युवा विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित थे।

प्रस्तुति‍ : नितिन मिश्रा, मीडिया प्रभारी, हिन्दी साहित्य सभा, हिन्दू कॉलेज

कुँवर रवीन्‍द्र की कवि‍तायें

कुँवर रवीन्द्र

वरि‍ष्‍ठ चि‍त्रकार कुँवर रवीन्‍द्र बहुत अच्‍छे कवि‍ भी हैं। उनकी कुछ कवि‍तायें-

एक

आज- कल मैं
एक ही बिम्ब में
सब कुछ देखता हूँ
एक ही बिम्ब में
ऊँट और पहाड़
समुद्र और तालाब को
मगर आदमी मेरे बिम्ब से बाहर छिटक जाता है
पता नहीं क्यों
आदमी बिम्ब में समां नहीं पाता
न तो आदमी में आदमी का बनता है बिम्ब
और न ही
न आदमी से आदमी का बिम्ब
आदमी में
पानी है , ऊँट है, पहाड़ है
फिर भी आदमी का बिम्ब नहीं बनता
हो सकता है
शायद इसीलिये छिटक जाता है वह
क्योंकि‍ सब कुछ है आदमी में
बस आदमी में आदमी नहीं है

दो

आओ रचें
एक नया दृष्य
एक नया आयाम
एक नई सृष्टि

एक बिम्ब तुम्हारा
और हो एक बिम्ब मेरा

हाँ
इन बिम्बों में

रंग भी भरना होगा
रंग
न रक्त का , न कर्म का
न वैचारिक सोच का

रंग विहीन दृष्य
रंग विहीन आयाम
रंग विहीन सृष्टि
हो सिर्फ मनुसत्व का रंग

मेरा बिम्ब , तुम्हारा बिम्ब
दिखे सिर्फ एक बिम्ब
सार्वभौम
हमारा बिम्ब

तीन

मैं
आदमी कब था
मुझे याद नहीं
हाँ आज
मैं एक कैलेण्डर हो गया हूँ
बताता हूँ सिर्फ
दिन तारीख और महीने
कभी-कभी क्या घटा
क्या घटेगा यह भी
बता नहीं पाता तो सिर्फ
अपनी नियति

चार

हम जब कह चुकते हैं
तब हम चुक जाते हैं
चुक जाते हैं अपने आप से

चुक जाने के बाद
फिर से भर पाना
कठिन को जाता है
और तब
हम आदमी नहीं रह जाते
को जाते हैं मजदूर
नहीं रह जाता
अपना कोई अस्तित्व
अपनी सोच
हो जाते हैं आश्रित
रह जाता है सिर्फ सुनना
और हो जाते हैं
केवल कहानी का एक हिस्सा
क्योंकि‍
तब हम कह चुके होते हैं

पाँच

मेरी छाती पर फ़ैल गया है
मरुस्थल
कानों में गर्म सीसे सा उतर गया है
शहरों का शोर
काश कोई आता
रख देता सीने पर
जंगल का एक टुकड़ा
कानों में नदियों के कलकल का फाहा
राजनीतिक शराब का नशा
बढ़ रहा है दिनोंदिन
काश कोई आता
डुबो देता इस पोत को

छह

तुमने पूछा है मुझसे
रोटी का स्वाद ?

नहीं
तुमनें किया है
मेरी निजता पर
मेरी अस्मिता पर प्रहार

क्या तुम जानते हो
भूख की परिभाषा ….

कुँवर रवीन्द्र की पेंटिंग

सात

इस शहर में
एक घर
जहाँ मैं ठहर गया हूँ
रहस्य में लिपटा सा
फिर भी पहचाना सा
और घर में
एक छज्जा
मैं छज्जे पर
सामने एक घर, दो घर
ढेर सारे घर
घर
घर पर घर
पतझड़ में बिखरे पत्तों की तरह
कहीं-कहीं संभावनाओं का छलना जैसे
न कहीं सरहद न कहीं रास्ता
घर पर घर
कंक्रीट का जंगल
खड़े हैं पेड़ सौन्दर्य के
रूढ़ियों के
नैतिक-अनैतिक
धर्मान्धों की झाड़ियाँ
साकार-निराकार
रंग भेद जात- पात
पीढी़ दर पीढी़
घर पर घर
घर में छज्जा
छज्जे पर मैं
एक घर
इस शहर में

कलाकार का कवि या कवि का कलाकार : नित्यानंद गायेन

वरि‍ष्‍ठ चि‍त्रकार और कवि‍ कुँवर रवीन्‍द्र की कला यात्रा पर एकाग्र विजय कुमार देव द्वारा सम्‍पादि‍त पुस्‍तक ‘रवीन्द्र और रेखांकन’ के सन्‍दर्भ में युवा कवि‍ नि‍त्‍यानंद गायेन की टि‍प्‍पणी-

“किसी भी कलाकार से उसकी अवधारणा, शैली और कला–प्रक्रिया की बारीकियाँ सतही तौर पर नहीं जानी जा सकती है, उसके चेतन–अवचेतन में भीतर तक पैंठने की कोशिश करनी होती है उस तल तक जहाँ से वह उदित होता है। उन तरंगों को महसूस करना होता है जिनके संचरण से वह कलाकर्म में प्रवृत्त होता है- विजय कुमार देव, सम्पादक ‘अक्षरा’ द्वारा व्यक्त ये बातें बहुत सटीक हैं।

हमारे समय के वरिष्ठ एवं चर्चित कला सम्‍पादक, कवि–लेखक कुँवर रवीन्द्र जी पर ये सभी बातें लागू होती हैं | कुँवर जी पर सम्पादित पुस्तक ‘रवीन्द्र और रेखाँकन’ में विजय जी ने लिखा है–“वैयक्तिक रूप से रवीन्द्र को समझना बड़ी टेड़ी खीर है। अपने निजी जीवन में वह जितने अक्खड़, अस्त–व्यस्त और लापरवाह है, कला कर्म में उतने ही महीन, पारदर्शी और सम्‍वेदनशील हैं।” रवीन्द्र जी के बारे में बहुत सही लिखी हैं ये बातें।

आज हम सभी देख पा रहे हैं कि के. रवीन्द्र जी अपनी कला के साथ निरंतर प्रयोग करने वाले कलाकार हैं। एक ऐसा कलाकार जो आत्मगान और यशगान के इस स्वार्थवादी समय में भी निजप्रचार से खुद को मीलों दूर रखे हुए हैं, और यही इस कलाकार की महानता की निशानी है। एक ऐसा कलाकार जिसकी कला को आज देश के लगभग सभी चर्चित पत्र–पत्रिकाएँ छापने को आतुर हैं और पहले भी छापते रहे हैं, वह गर्व और घमंड से खुद को बचाकर रखने में सफल है | यही गुण है जो रवीन्द्र को औरों से अलग और महान बनाते हैं।

कुँवर जी अपनी सफलता का श्रेय अपने गुरु प्रताप सिंह, जो एक समय जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई में मानसेवी व्याख्याता रहे हैं और अपने मित्रों को देते हैं | वह कहते हैं– “मेरे मित्रों में खासियत तो रही कि मुझे मैं बनाने में या मेरी अपनी पहचान बनाने में कोई कोर–कसर नहीं छोड़ी।” (पृष्ठ 15, आत्मकथ्य)

रवीन्द्र जी क्या कहना चाहते हैं रेखाओं और रंगों के माध्यम से यह कुछ हद तक हम उनकी कुछ कवितायेँ पढ़ कर शायद जान सकते हैं। उनकी एक कविता का यह अंश देखिये–“ आजकल मैं/एक ही बिम्ब में/सब कुछ देखता हूँ/एक ही बिम्ब में ऊँट और पहाड़ को/समुद्र और तालाब को/मगर आदमी/मेरे बिम्बों से बाहर छिटक जाता है/पता नहीं क्यों/आदमी बिम्ब में समा नही पाता है ?”

इन पंक्तियों से इस महान कलाकार के भीतर मनुष्य के प्रति जो बेचैनी है उसे देख सकते हैं। वहीं एक और कविता में वह लिखते हैं –

“इस शहर में
एक घर, जहाँ
मैं ठहर गया हूँ
रहस्य में लिपटा सा
फिर भी पहचाना सा
और घर में एक छज्जा,
छज्जे पर मैं
सामने एक घर, दो घर, ढेर सारे घर
घर, घर
घर पर घर
पतझड़ में बिखरे पत्तों की तरह”

इस कविता में ‘शहर’ का चित्र उकेर रहे हैं, वहीं एक दूसरी कविता में वह प्रतीकों का चित्र प्रस्तुत करते हैं–

“कितने खूबसूरत लगते हैं हम
एक कलेंडर की तरह
जड़े हुए दीवार से
या फिर कुत्ते की तरह
अपनी दुम खुजलाने के प्रयास में
गोल–गोल
बस एक ही दायरे में घूमते हुए”।

इन रचनाओं से गुजरने के बाद यह तय करना कठिन हो जाता कि रवीन्द्र जी उच्च दर्जे के चित्रकार हैं या कवि ?

इस सन्दर्भ में विनय उपाध्याय ने सही लिखा है– दरअसल अपनी रचना में रवीन्द्र भारतीय जीवन मूल्यों की पुरजोर वकालत करते हैं। वे षड्यंत्रों पर, आक्रमणों पर अभिव्यक्ति भर प्रहार करते हैं। उन प्रवित्तियों पर उनकी रेखाओं का वलय साक्षात होता है जिनके वर्चस्व में ईमानदारी हाशिये पर चला गया है। अपने जीते–जी बदल गई दुनिया के सच को रवीन्द्र के चित्र और कविता बखूबी बयान करते हैं। (रवीन्द्र और रेखांकन, पृष्ठ-48)

पुस्तक : रवीन्द्र और रेखांकन
सम्‍पादक : विजय कुमार देव
प्रकाशक : पड़ाव प्रकाशन
46 एल.आई.जी. नेहरू नगर, भोपाल-462003
मूल्य : 25 रुपये

बेतवा, विश्‍वनाथ त्रिपाठी और तीन कवि

विश्वनाथ त्रिपाठी

नरेश सक्सेना

मानवीय करुणा के प्रसंग अनन्त हैं।
करुणा मनुष्यों के प्रति, पशु-पक्षियों के प्रति और पेड-पौधों के प्रति
किन्तु पत्थरों प्रति?
पत्थरों की ऊब और अकेलेपन की अनुभूति और उनके दुख और
विस्थापन की कचोट की यह मर्मान्तक कथा तो अनोखी और अभूतपूर्व है।
ऐसा कोई प्रसंग हिन्दू धर्मग्रन्थों में आया हो, याद नहीं पड़ता
बइबिल और कुरान में कहीं हो तो हो।
हिंसा और घृणा से भरे इस समय में क्या किसी का पत्थरों के विस्थापन से विचलित होना सम्‍भव है?
हाँ, है ऐसा एक व्यक्‍ति‍। जिसका नाम है विश्‍वनाथ त्रिपाठी,
यह हमारे समय और कविता की एक ऐतिहासिक घटना है।
ऐसी कविता जिसका कथ्य रूप का मोहताज नहीं है। इस कथ्य के साक्षी अनेक हैं।

मैं इस बारें में कुछ नहीं कहूँगा। कहेंगी ये कवितायें जिन्हें हिन्दी के तीन महत्वपूर्ण कवियों ने अपने मौलिक ढंग से लिखा है। ये तीन कवि हैं विनोद कुमार शुक्ल, भगवत रावत और पूर्णचन्द्र रथ। तीनों कवितायें यहाँ प्रस्तुत है जो मनुष्य की सम्‍वेदना उसकी सहृदयता और सदाशयता के असीम विस्तार का सन्देंश आने वाली पीढियों को देती रहेंगी।

विश्‍वनाथ त्रिपाठी एक आलोचक के रूप में विख्यात हैं। सच्चाई यह है कि यह कवि पहले हैं और उससे भी पहले एक मनुष्य। शुरुआत उन्ही की एक कविता से करते हैं-

जल्लाद

फाँसी पर चढ़ा रहे थे
और नकाब पहने थे,
सद्दाम ने नकाब पहनना स्वीकार नहीं किया
फाँसी चढ़ते वक्त

नकाब न पहनने के कारण
फाँसी का फन्दा पडा़ चेहरा
देखा लोगों ने

वे याद रखेंगे
जल्लादों को, नकाबों को
और फाँसी का फन्दा पडें
सद्दाम के चहेरे को।

पिंजडे़ के पक्षी को

विनोद कुमार शुक्ल

पिंजडे़ के पक्षी को
स्वतंत्र करने के लिये
जंगल नहीं जाना होता
घर के आँगन में पिंजडा़ खोल
उडा़ दिया जाता है तो
छत की मुँडेर या पास के पेड़ की ओर
पक्षी चला जाता होगा।
पता नहीं कहाँ किस पेड से
पकडा़ गया हो।
पर गगन वही है
सब जगह उड़ने का।
एक बार जब विश्‍वनाथ बेतवा गये
तो नदी के बहते जल से
एक गोल पत्थर उठा लाये
जो उनके घर के आँगन के
खुले गगन में बरसों पकडा़ हुआ पडा़ रहा।
वे दुबारा बेतवा गये
तब पत्थर साथ ले गये
पारदर्शी जल के नीचे
याद कर, वहीं उसी जगह
दूसरे पत्थरों के बीच
पकडे़ पत्थर को छोड़ स्वतंत्र किया
स्वयं उन्मुक्‍त हुए
देखकर मैं
जिसे बताया मैंने, वह भी।

नौ

भगवत रावत

हिन्दी के एक अकेले फक्कड़ आलोचक
सचमुच के विद्वान
आपादमस्तक डूबे हुए साहित्य के सागर में
बतरस में माहिर
सहृदय इतने कि बडे़-बडे़ कवि
और कलाकार उन्हें देखते ही रह जायें

पान के शौकीन
चटोर मिष्ठान के
गोरे-चिट्टे मँझोले कद के
सत्तर पार कर चुके इतने खूबसूरत इंसान
कि अच्छों-अच्छों के कद उनसे छोटे पड़ जायें

यानी पंडित विश्‍वनाथ त्रिपाठी को जानते हैं आप
आधी से ज्यादा उम्र से रहते आ रहे हैं उसी दिल्ली में
जिसमें रहते हैं आप
वे भी आप ही की तरह आये थे रोटी-रोजी के चक्कर में
और बस गये वहीं
पर उनका आज तक कुछ नहीं बिगाड़ पायी दिल्ली

जब भी उनसे मिलेंगे आप
लगेगा आपको कि पंडित जी अभी-अभी उतरे हैं
बलिया-गोरखपुर की किसी ट्रेन से
और दिल्ली की चौडी़ सड़क पार नहीं कर पा रहे हैं

समय-समय की बात
कुछ ऐसा संयोग घटित हुआ भोजपुरी और बुन्देली में
कि एक दिन पंडित जी और मैंने ओरछा में
साथ-साथ किया स्नान वेत्रवती में जिसे बुन्देली में
कहते हैं बेतवा

बेतवा की बीच धारा के कुछ रंग-बिरंगे घिसे हुए
श्यामल-धूसर-चिकने गोल-गोल पत्थर
भा गये विश्‍वनाथ जी को
और वे उन्हें अपने साथ ले गये दिल्ली

और देखिये कि ठीक एक बरस बाद
उन्हीं गर्मियों के दिनों में
बेतवा की उसी धार में, उन्हीं पत्थरों को
वापस स्थापित करते देखा मैंने विश्‍वनाथ जी को
तो मैं उन्हें देखता रह गया भौंचक्का
और विश्‍वनाथ जी मानो मन ही मन क्षमा माँगते रहे
बेतवा से।

पत्थर से

पूर्णचन्द्र रथ

बेंत सी बलखाती
पुरानी नगरी के पास से गुजरती
इस नदीं में पत्थर ही पत्थर
ऐतिहासिक अडिग चट्टान
या छोटे-छोटे शालिग्राम

कुछ ले गये विश्‍वनाथ जी
पारसाल दिल्ली
अपना कैक्टस गमला घर सजाने

खुश नहीं थे
सीमेंट कोलतार के जनअरण्य में
भयभीत बच्चे ग्रामीण दिखे सर्वदा
अमूर्तन के शिल्प में असंगत विन्यास
धरा पर वर्णों का संकट
अकारण कुंठित अस्‍ति‍त्व में सहता भला
ले आया इनकी माटी से मिलाने
भूल या कहो अपराध हल्का करने

दिव्य चेहरे पर आर्य अवगाहन
विश्‍वनाथ जी ने गमछे में बँधे
पत्थर सारे डाल दिये नदी में

तंरगायित रही बेतवा
निष्कलुष वे डूबे
जल आकाश में उन्मुक्‍त
रवि रशिमयों के आलोक से अपराजेय
दिपदिपाने लगा।

(‘कथादेश’, अगस्‍त 2012 से साभार)

दफ़्तर के बाहर बनाम बाज़ार में बहार : डॉ. घनश्याम शर्मा

वरि‍ष्‍ठ आलोचक डॉ. घनश्याम शर्मा द्वारा युवा लेखक और आलोचक आनंद पाटील की पुस्‍तक ‘हिन्दी : विविध आयाम’ की समीक्षा-

आनंद पाटील की पहली पुस्तक ‘संस्कृति बनाम अपसंस्कृतीकरण’ सन् 2010 में प्रकाशित हुई। इसकी भूमिका में आनंद जब यह लिख रहे थे, ‘यह बाज़ारवाद भक्तिकालीन ‘मायावाद’ से कुछ ज़्यादा भिन्न है। हाँ, वहाँ नारी को माया माना गया जो कि अनुचित था और है। लेकिन तत्कालीन ‘मायावाद’ में ‘सम्पत्ति असबाब’ भी तो उल्लिखित है। आज यही सम्पत्ति और असबाब ‘उपभोक्तावादी मायावाद’ की पैरवी करते हैं। यह मसला मात्र ‘मानवीयता’ का नहीं, बल्कि भाषा, सभ्यता, संस्कृति और समाज के तमाम अंगों और उपांगों का है– जो आज मरणांतक स्थिति से गुज़र रहे हैं।’ शायद तभी से ‘हिन्दी : विविध आयाम’ (2012) की भूमिका ‘पूर्वोक्ति– बदलाहट की बयार और भाषाई अस्मिता’ की कुछ-कुछ रूपरेखा बनना प्रारम्भ हो गयी होगी।

चूँकि आनंद पाटील पहले नागालैण्ड विश्‍वविद्यालय (लुमामी) और फिर तमिलनाडु केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय (तिरुवारूर) में हिन्दी अधिकारी के पद पर नियुक्त होने से पूर्व कुछ महाविद्यालयों में भाषा-साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के अतिरिक्त ‘ई-टीवी’ में आलेखक एवं कार्यक्रम सहायक, ‘डेली हिन्दी मिलाप’ और ‘स्वतंत्र वार्ता’ दैनिक समाचार पत्रों में अनुवादक-सह-उप-संपादक, ‘मीडिया मर्चेन्ट्स’ में सहयोगी जनसंपर्क अधिकारी, ग़ैर-सरकारी संगठन ‘कॉज़ एन इफैक्ट’ के वृत्तचित्रों के लिये अनुवाद समन्वयक और ‘गूगल इंडिया’ (बंगलुरु) के लिए हिन्दी भाषाविद् समीक्षक के रूप में कार्य किया था। इसलिये निश्‍चि‍त ही समय-समय पर हिन्दी भाषा के अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़े कई सवाल एवं संदेह उनके मन-मस्तिष्क में उठते रहे होंगे। भाषा एवं राष्ट्र के प्रति जागरूक प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि ‘भाषा अस्तित्व है।’ किन्तु अक़्सर तथाकथित साहित्य एवं भाषा चिंतक यह भूल जाते हैं कि अपना अस्तित्व अपनी ही भाषा से और अपनी ही भाषा में स्थापित एवं मूल्यांकित होता है। इसी दृष्टि से मुक्तिबोध ने भाषा को एक जीवन परम्‍परा और सामाजिक निधि (‘एक साहित्यिक की डायरी’, पृ. 25-26) कहा है।

भूमण्डलीकरण, उपभोक्तावाद, बाज़ारीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी के विश्‍वव्यापी वेब (विषैला, विध्वंसक वातावरण) में लगभग समुचा देश ऐसा उलझा कि पाश्‍चात्य जीवन-शैली में जीने वालों को ही ‘सभ्य नागरिक’ माना जाने लगा। ऐसे में भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्‍परा, दर्शन एवं भाषा इत्यादि को इन्हीं तथाकथित सभ्य नागरिकों द्वारा या तो ‘आउटडेटेड’ कहकर नज़रंदाज़ कर दिया जाता है या फिर ‘इनसे’ जुड़े और प्रतिबद्ध लोगों को ‘गँवार’ (गाँव में रहने वाले, जो तथाकथित सभ्य समाज की दृष्टि में पिछड़े) मानकर हीन दृष्टि से देखा जाता है। ऐसे में अपने और भाषा के अतीत को देखने, वर्तमान को समझने और भविष्य को लिखने के लिए हिन्दी (‘हिन्दी हैं हम, वतन है – हिन्दोस्ताँ’ के अर्थ में) की स्मृतियों, वास्तविकताओं और आकांक्षाओं को पूरी शिद्दत के साथ खंगालने की सख़्त आवश्यकता है।

‘हिन्दी : विविध आयाम’ की बारह पृष्ठों की भूमिका ‘पूर्वोक्ति– बदलाहट की बयार और भाषाई अस्मिता’ में हिन्दी की स्थिति एवं गति (दशा एवं दिशा) को रेखांकित करती हुई आनंद पाटील की हिन्दी भाषा को लेकर उनकी गहरी आशा, चिंता और आकांक्षा पूरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त हुई है। हिन्दी भाषा की ‘पूछ और पहुँच’ जो अंग्रेज़ी पूँछ से ढकी और लपटी हुई ही नहीं अपितु जकड़ी हुई भी है, का विस्तार जानने और समझने के लिए कई वरिष्ठ विद्वानों की चिंता और चिंतन के साथ-साथ कुछेक नवोदित प्रतिभाओं के विचार भी पुस्तक में संकलित एवं प्रस्तुत किये गये हैं, जो हिन्दी भाषा के अस्तित्व से जुड़े सवालों, संदेहों और संभावनाओं से गुज़रते हुये उसके अस्तित्व पर लगातार जमती हुई धूल को रोकने, झड़काने और पुनः सँवारने की अनिवार्यता को रेखांकित करते हैं।

संकलित पुस्तक में भूमिका के बाद मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता ‘अंधेरे में’ की कुछ काव्य-पंक्तियाँ उद्धृत की गयी हैं। काव्यांश की अंतिम पंक्ति ‘मर गया देश अरे, जीवित रह गये तुम’ पर ग़ौर फरमाएँ तो यह कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा कि निश्‍चि‍त ही भाषा के दृष्टिकोण से यह देश लगभग मर ही गया है। गणेशशंकर विद्यार्थी ने कहा था– “मुझे देश की आज़ादी और भाषा की आज़ादी में किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं निस्संकोच भाषा की आज़ादी चुनूँगा, क्योंकि मैं फायदे में रहूँगा। देश की आज़ादी के बावजूद भाषा की गुलामी रह सकती है, लेकिन अगर भाषा आज़ाद हुई तो देश ग़ुलाम नहीं रह सकता।” अंग्रेज़ चले गये लेकिन अंग्रेज़ी नहीं। विचारों की ग़ुलामी सबसे बड़ी ग़ुलामी होती है। आज हमने तथाकथित ‘सभ्य’ होने के अति उत्साह में ‘स्व’ की चेतना गँवाकर ‘ऑनलाइन’ ग़ुलामी सहर्ष स्वीकार कर ली है।

समीक्ष्य पुस्तक में कुल 45 आलेख हैं। इनके अतिरिक्त कवि शम्भु बादल और घनश्याम की कुछ कविताएँ भी शायद हिन्दी भाषा के एक आयाम के रूप में संकलित की गयी हैं।

आरम्भ सकारात्मक हो तो ‘अंत भला’ होने की अधिक संभावना रहती है। इसी कारण आनंद की संपादन कुशलता ने सुरेश पंडित के लेख ‘समय में असरदार हस्तक्षेप करता हिन्दी लेखन’ को सबसे पहले रखा है। इस लेख की अंतिम पंक्तियों को इसके सार और हिन्दी भाषा के सकारात्मक आयाम के रूप में देख सकते हैं। सुरेश पंडित ने लिखा है– ‘हिन्दी लेखन समाज के सच को लगातार सामने लाने के लिए व्यग्र है, बल्कि कुछ क्षेत्रों में तो इतना ज़ोरदार काम हुआ है कि उनकी प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जा सकता।’

प्रोफेसर सुवास कुमार ने अपने लेख ‘उच्च अध्ययन (पाठ्यक्रम) में हिन्दी साहित्य’ में ‘उच्चतर पाठ्यक्रमों के स्वरूप में बदलाव के लिये बहस की अच्छी गुंजाइश है’ कहते हैं। रोज़गार की दृष्टि से हिन्दी साहित्य का पाठ्यक्रम जीवन की वास्तविकताओं से कटा हुआ मानने वालों को वे यह कहना चाहते हैं– ‘चाहे मनुष्य का जीवन कितना ही परिवर्तित क्यों न होता जाये, साहित्य और कला मनुष्य के जीवन से कट नहीं सकते– सदा ही उनकी ज़रूरत बनी रहेगी क्योंकि इनका संबंध मनुष्यता के सारतत्व से है।’ प्रो. सुवास कुमार जैसे विचार कई वरिष्ठ हिन्दी प्राध्यापकों और आचार्यों के भी हैं, जिन सबका लगभग यह मानना है कि डॉक्टरी और इंजीनियरी जैसे कई विशुद्ध उपयोगितावादी विषय भी सबको रोज़गार की गारंटी नहीं दे सकते। प्रोफेसर सुवास कुमार के लेख में उनकी चिंता एवं चिंतन साहित्य एवं कला के अध्ययन की आवश्यकता पर अधिक है न कि भाषा पर। और किसी भी भाषा के प्रति जुड़ाव-लगाव की भावना न हो तो उस भाषा के साहित्य से प्रेम नहीं हो सकता। और बिना प्रेम (जूनून की हद तक) का कर्म पीड़ाजनक ही होता है। यही कारण है कि प्राचीन विद्वान और चिंतकों ने ‘उपयोगी ही सुंदर’ (प्लेटो) माना और कहा है। और अति भावुकता में हम सब अक़्सर यह भूल जाते हैं कि ‘भूखे भजन न होई गोपाला।’ और यह भी एक सच्चाई है कि मुझ जैसे ‘कई भाषा और साहित्य प्रेमियों की संतानें’ भाषा और साहित्य को छोड़ किसी अन्य ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में पढ़ती हैं और बहुतेरे कार्यरत भी हैं। इसके अतिरिक्त एक और सच्चाई यह भी है कि भाषा-साहित्य की सेवा-सृजन, भाषा-साहित्य के वेतनभोगी व्यक्तियों से ज़्यादा औरों ने की और कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य और कटु सत्य यह है कि आज ‘रोज़गार’ का उपाधियों से उतना संबंध नहीं रहा, जितना आवेदक की ‘अन्य अर्हताओं’ से है। यह बात प्रो. सुवास कुमार ही नहीं अपितु हम सब जानते हैं और विशेषकर वे सब ज़्यादा अच्छी तरह जानते हैं, जो विश्वविद्यालयों से जुड़े हुए हैं या जुड़ना चाहते हैं। ख़ैर, यहाँ मुझे अनायास ही अपनी निरक्षर किंतु शिक्षित माँ की एक बात याद हो आयी, जो कहा करती थी कि ‘बूढ़ा आदमी अक़्सर धार्मिक हो जाता है।’

प्रो. राजेन्द्र कुमार ने अपने लेख ‘हिन्दी : विविध रूप, विविध समस्याएँ’ में ‘हिन्दी दिवस’ पर व्यंग्य करते हुए लिखा है– “अपना देश शायद दुनिया का अकेला देश है, जहाँ भाषा के नाम पर भी ‘दिवस’ मनाए जाते हैं… सच तो यह है कि हिन्दी के नाम पर होने वाले वार्षिक कर्मकांड हिन्दी के प्रति सम्मान-भाव जगाने के काम कम आते हैं, हिन्दी को मज़ाक का विषय बनाने के ज़्यादा।… हिन्दी तो हमारे यहाँ किसी गाँव की उस स्त्री की तरह है, जिसे ‘भौजी’ कहकर उससे मज़ाक करने का अधिकार कोई भी सहजतया पा जाता है।” आगे वह अंग्रेज़ी और हिन्दी के द्वंद्व की सच्चाई बतलाते हुए लिखते हैं– “अंग्रेज़ी का आत्यंतिक विरोध कई बार हिन्दी-प्रेम कम, अंग्रेज़ी में अपनी गति की सीमाओं को छिपाने का उपक्रम ज़्यादा होता है… पर आज तो संकट यह है कि हमारे बहुत-से हिन्दी प्रेमियों को कायदे से न अंग्रेज़ी आती है, न हिन्दी। तर्क कुछ यह ध्वनित होता है कि अंग्रेज़ी क्या सीखना, वह तो पराई भाषा है, हिन्दी भी क्या सीखना वह तो है ही अपनी भाषा।” हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार और प्रयोगधर्मी बनने-बनाने के संदर्भ में वे लेख के अंत में लिखते हैं– “हिन्दी को केवल साहित्य प्रधान भाषा ही नहीं बने रहने देना है, बल्कि विभिन्न ज्ञानात्मक अनुशासनों का माध्यम बनकर वह सामने आये, इस दिशा में हमें सार्थक प्रयास करने हैं।”

जी. पी. मिश्र का लेख ‘औपनिवेशिक शिकंज़े में सिसकती हिन्दी’ कुछ तेज़, तिक्‍त और तिखे तेवर लिये हुये अभिव्यक्त हुआ है। यह निश्‍चि‍त ही उनकी अपनी और मौलिक संवेदनात्मक तड़प भी है। इस लेख में उन्‍होंने प्रेमचंद (‘सोजे वतन’), रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह जैसे भाषा प्रेमि‍यों और देशभक्तों का ज़िक्र किया है। वह लिखते हैं– “जब किसी दुश्मन से बैर निभाना हो, तो कुछ और करने की बजाय उसकी अगली पीढ़ी के बच्चों को अपसंस्कृति और अविवेक के गड्डे में झौंक दें। दुश्मन अपने अंदरूनी अंतर्विरोधों से खुद पिट जायेगा।” यहाँ आगे उन्होंने लार्ड मैकाले को भी उद्धृत किया है, जिससे हम सब परिचित हैं। मिश्र जी के भावात्मक अंगारे की अभिव्यक्ति बकौल डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल के माध्यम से इस प्रकार अभिव्यक्त हुई है– “यदि हमें बचना है, अपनी भाषा व मनुष्यता को विनाश से बचाना है, तो व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन के लिये जटिल संग्राम में उतरना होगा। केवल बहसों से काम नहीं चलेगा। देश को एक क्रांति की ज़रूरत है, जो हिंसक भी हो सकती है।” एक अन्य स्थान पर वह हिन्दी साहित्य जगत के परिवेश में व्याप्त गुटबाजी और विषाक्त वातावरण के विषय में सटीक लिखते हैं– “विभिन्न संस्थानों के शीर्ष पर बैठे मठाधीशों ने हिन्दी के साहित्यिक मैदान को एक अखाड़ा बना दिया है… वैचारिक मठों और गढ़ों से रूपवाद, संरचनावाद, अभिव्यक्तिवाद और अब ‘लेखक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ जैसे ऊपर से अत्यंत आकर्षक लगने वाले नारे की लगातार वक़ालत की जा रही है। इसका उद्देश्य लेखक को सामाजिक, राजनीतिक, विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से दूर करना है।” निश्‍चि‍त ही यह लेख ‘वह तोड़ता पत्थर’ है।

डॉ. आत्माराम ने अपने लेख ‘हिन्दी का बाज़ार और बाज़ार की हिन्दी’ में व्यावसायिक दृष्टि से संपन्न होती हुई हिन्दी की चर्चा की है। वह लिखते हैं– “भारत में विज्ञापन का बाज़ार हिन्दीमय हो रहा है, हिन्दी के विज्ञापनों से सजे होर्डिंग अब चेन्नै एवं कोच्ची जैसे सुदूर दक्षिण के शहरों में भी नज़र आ रहे हैं। इंटरनेट पर भी हिन्दी का विस्तार हो रहा है।” किंतु साथ ही साथ उनकी यह चिंता भी व्यक्त हुई है– “हिन्दी का बाज़ार भी बहुत बड़ा है, परंतु बाज़ार की हिन्दी का स्वरूप दिन-ब-दिन अंग्रेज़ीमय होता जा रहा है।” बाज़ार के विशेषज्ञ ही नहीं अपितु आम आदमी भी ‘बाज़ार के समीकरण’ और ‘समीकरणों का बाज़ार’ बहुत हद तक जानता है। बाज़ार के बाज़ीगरों ने वस्तुओं और सेवाओं को ही नहीं अपितु कला, साहित्य और भाषा के माध्यम से सभ्यता, संस्कृति, परम्‍परा, दर्शन और आस्था तक को बेचने-ख़रीदने के क्रम में इन सबको वस्तु में तब्दील करके रख दिया है।

समूची मानव सभ्यता प्राचीन काल से अब तक यह कहती आयी है– कभी काव्योक्‍ति के रूप में– ‘न मानुषात श्रेष्ठतम् हि किञ्चित’ (वेद व्यास), ‘सबार उपरे मानुषेर सत्तो तबार उपरे नाई’ (चण्डीदास) और कभी दार्शनिक सत्य का प्रतिपादन करने के लिए– ‘मनुष्य सारी वस्तुओं का माप है’ (प्रोटेगोरस)। किंतु आज यह सर्वसिद्ध हो चुका है कि बाज़ार से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं, बाज़ार से ऊपर कोई नहीं और बाज़ार सारी वस्तुओं का माप है।

इसी तथ्य और सत्य को डॉ. राजीव कुमार रावत ने अपने लेख ‘वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक युग में हिन्दी की प्रासंगिकता’ में बहुत स्पष्ट लिखा है– “हिन्दी को वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक युग में कम्प्यूटर, विज्ञान, चिकित्सा आदि क्षेत्रों की ओर से कोई चुनौती नहीं है। विश्‍व बाज़ार की मजबूरी है हिन्दी। अमरिका, रूस, चीन आदि बड़े-बड़े देशों के बाज़ार भारत में आने को उत्सुक हैं और हिन्दी के महत्व को समझकर अपना रहे हैं।”

राजभाषा और उसके क्रियान्वयन के संदर्भ में हिन्दी सरकारी कार्यालयों में ‘धर्म की भाषा’ के रूप में संविधान की धाराओं के तहत धार्मिक कर्म करती नज़र आ रही है। यहाँ राष्ट्रभाषा और राजभाषा हिन्दी की स्थिति एवं गति पर विष्णु नागर का यह कटाक्ष दृष्टव्य है– “मैं हिन्दी जगत के तमाम धुरंधरों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ कि आज़ादी के पिछले साठ सालों में हिन्दी ने वाकई उल्लेखनीय प्रगति की है। इतनी ज़्याद प्रगति की है कि वह राष्ट्रभाषा से राजभाषा बनकर रह गई है और अब हिंग्रेज़ी के नये अवतार में जनता के सामने पेश है। इसलिए उसे अब देश से निकालकर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिष्ठित करने की तैयारी हो रही है।” (आउटलुक, स्वाधीनता विशेषांक, 20 अगस्त, 2007)

गौरीनाथ ने अपने लेख ‘जन-समाज बचे तभी तो भाषा बचेगी’ में गाँधीजी की ही तरह मातृभाषाओं के महत्व की वक़ालत करते हुए लिखा है- “राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिए जो हमारी चिंताएँ हैं, वैसी चिंताएँ मातृभाषा के लिये क्यों नहीं है? जब मातृभाषा ही नहीं बचेगी, तो हम राष्ट्रभाषा का सम्मान करने के लायक रहेंगे क्या?… मेरे ख़याल से हिन्दी के प्रति हमारी जो यह दृष्टि है, यह सही नहीं है! हम जब तक मातृभाषा और उस भाषा-भाषी जन और समाज के हित में नहीं सोचेंगे, तब तक हम सही अर्थ में हिन्दी के हित में भी नहीं सोच सकते।” उनकी यह चिंता जायज़ है, क्योंकि हिन्दी के नाम पर प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों रुपये लुटाए जा रहे हैं और उसी की चिंता में दिन-रात दुबले हुए जा रहे हैं।

समीक्ष्य पुस्तक के विषय में वरिष्ठ कवि, आलोचक, चिंतक विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी के विचार पिछले फ्लैप (ज़िल्द) पर प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने लिखा है– “सृष्टि में हर मनुष्य किसी न किसी भाषा में जन्म लेता है। उसी मातृभाषा में वह एक परम्‍परा और संस्कृति भी प्राप्त करता है, क्योंकि कोई भी परम्‍परा और संस्कृति भाषा में ही सुरक्षित होती है।… भाषा मनुष्य की सबसे मूल्यवान सम्‍पदा है। भारत जैसे बहुभाषी, बहुसंस्कृतियों वाले देश की सभी मातृभाषाएँ मूल्यवान है।… यह विडम्‍बना ही है कि अंग्रेज़ी सारी मातृभाषाओं की छाती पर चढ़ी हुई है।” उन्होंने समीक्ष्य पुस्तक को प्रमाणित करते हुए लिखा है- “एक तटस्थ और संवेदनशील दृष्टि से हिन्दी भाषा की अपरिहार्य स्वीकृति के लिये यह पुस्तक पठनीय और विचारणीय है।”

ब़हरहाल, समीक्ष्य पुस्तक में भूमिका, अनुक्रम, कविताएँ और लेखक सम्‍पर्क छोड़ कुल 341 पृष्ठों में देश के कुछ राज्यों में हिन्दी भाषा और साहित्य के विभिन्न रूप-स्वरूप और आयामों से संबंधित कुल 45 लेख संकलित हैं, जो ‘आधा खाली’ अथवा ‘आधा भरा गिलास’ वाले दृष्टिकोण से अभिव्यक्‍त हुये हैं। किंतु एक दृष्टि ऐसी भी तो हो सकती है, जो गिलास (विषय– हिन्दी : विविध आयाम) की ऊँचाई, चौड़ाई और गहराई को देख और दिखा सके, तो दूसरी ऐसी कि ‘आधा खाली’ (आयाम विशेष लेख) की अच्छाइयाँ (विशेषताएँ/महत्व) और ‘आधा भरा’ (लेख) की कमियाँ (सीमाएँ/समस्याएँ) समझ-समझा सके। ‘आधा खाली’ और ‘आधा भरा’ एक समग्र वाद-विवाद की माँग रखता है, जिसका निश्‍चि‍त पहला, सर्वसम्मत और निष्पक्ष निष्कर्ष यह निकलता ही है कि ‘गिलास’ (विषय) महत्वपूर्ण है। ग़ौरतलब है कि गिलास पारदर्शी अथवा अपारदर्शी भी हो सकता है। शेष सम्‍वाद के लिये आनंद पाटील की यह पुस्तक शोध के नये द्वार ही नहीं खोलती अपितु ऐसे किसी भी शोध के लिये मील का पत्थर सिद्ध हो सकती है। शेष शमशेर के शब्दों में– ‘बात बोलेगी, भेद खोलेगी, बात ही’!

समीक्ष्य पुस्तक
‘हिन्दी : विविध आयाम’ (2012)
सं. आनंद पाटील
तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 600 रुपये

बल्ली भाई : एक कवि एक योद्धा : गोपाल प्रधान

जनकवि‍ बल्ली सिंह चीमा

जनकवि‍ बल्‍ली सिंह चीमा पर युवा लेखक गोपाल प्रधान का आलेख-

अस्सी का दशक हिन्‍दी में नए किस्म के कवियों की फ़ौज की आमद के लिये जाना जाएगा जिनकी कविताएँ छपने से पहले ही लोगों की जुबान पर चढ़ गईं । बल्ली सिंह चीमा इसी फ़ौज के उम्दा सिपाही हैं । बल्ली भाई के साथ ही इनमें थे अदम गोंडवी, रामकुमार कृषक, गोरख पांडे और अनेकानेक ऐसे कवि जिनकी कविता के लिये रामविलास जी ने जो बात नागार्जुन के लिये कही वही बात हम कह सकते हैं कि इनकी कविताओं में लोकप्रियता और कला का मुश्किल संतुलन सहज ही सधा हुआ है । देखा तो बल्ली भाई को बहुत बाद में लेकिन एक पतली सी किताब ‘खामोशी के खिलाफ़’ के जरिये पहला परिचय बेहद पहले करीब 1980 में ही हो गया था ।

इन कवियों में क्या है जो साझा है, इसकी तलाश करते हुए हमें राजनीतिक संदर्भ देखने होंगे क्योंकि तकरीबन ये सभी कवि राजनीतिक हैं और किसी न किसी तरह से वामपंथ की क्रांतिकारी धारा से जुड़े हुए हैं । आपातकाल के बाद जो नया राजनीतिक वातावरण बना उसकी एक सच्‍चाई अगर जनता पार्टी की सरकार का बनना है तो दूसरी और ज्यादा प्रासंगिक सचाई प्रतिरोध की ऐसी ताकतों के खामोश संघर्षों की छिपी हुई खबरों का सामने आना है जो सतह पर नहीं तैर रही थीं । ये ताकतें देश भर में फैले हुए नक्सलवादी कार्यकर्ता थे जिन्हें पुलिस ने फ़र्जी मुठभेड़ों और गैर कानूनी नजरबंदी में यंत्रणा देकर मार डाला था । आपातकाल के बाद बने वातावरण में इस आंदोलन की उपस्थिति एक जीवंत प्रसंग की तरह रही और उसी दौर में इस तीसरी धारा का हस्तक्षेप भारत के राजनीतिक पटल पर क्रमश: बढ़ता गया । भाकपा (माले) से जुड़े हुए जन संगठनों का उदय हुआ और बिहार के क्रांतिकारी किसान आंदोलन में इसे ठोस अभिव्यक्ति मिली । यही वातावरण इन कवियों के उभार और उनकी कविता की लोकप्रियता को समझने की कुंजी है ।

वह दौर ऐसा था कि सहज ही कुछ प्रतीक नई अर्थवत्ता के साथ उभर आये । उदाहरण के लिये भगतसिंह शुरू से ही क्रांति के प्रतीक रहे थे लेकिन उस समय एक ही साथ गोंडा, बनारस, इलाहाबाद और उत्तर प्रदेश के छोटे-छोटे कस्बों तक में उनका शहादत दिवस मनाया जाने लगा । उस दौर में कांग्रेसी सत्ता के विरुद्ध लड़ रही ताकतों ने भगतसिंह के प्रतीक में एक नया अर्थ भरा और उनके बहाने आज़ादी की लड़ाई की इकहरी तस्वीर को चुनौती दी । यह तस्वीर शासकों की सुविधा के लिये निर्मित की गई थी । भगतसिंह गांधी की समझौतावादी नीति, जिसका मुखौटा अहिंसा थी, के विरुद्ध क्रांतिकारी धारा के रहनुमा के बतौर पेश किए गये । उसी दौर में गुरुशरण सिंह का नाटक ‘इंकलाब जिंदाबाद’ लोकप्रिय हुआ जिसका मुख्य प्रतिपाद्य आज़ादी की लड़ाई का यही द्वंद्व था। बल्ली सिंह चीमा की मशहूर गज़ल के एक शेर ‘बो रहे हैं अब बंदूकें लोग मेरे गाँव के’ में बंदूकें बोने वाले गाँव के लोगों की तस्वीर के पीछे उनके अपने समय में सशस्त्र संघर्ष करने वाले किसान तो हैं ही, भगतसिंह की बचपन की वह कथा भी है जिसमें पिता से वे बताते हैं कि खेत में बंदूक बो रहा हूँ । इसी समझ को स्वर देते हुए वह एक शेर में कहते हैं:

‘हम नहीं गांधी के बंदर ये बता देंगे तुम्हें,

हर युवा को भगतसिंह, शेखर बनाना है हमें।’

किसान आंदोलनों की आँच के कारण स्वाभाविक था कि इन कवियों की कविताओं में ग्रामीण माहौल और मजदूर-किसान उपस्थित हों । लेकिन इनके गाँव मैथिलीशरण गुप्त के ‘अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों न इसे सबका जी चाहे’ के आदर्शीकरण से पूरी तरह अलग और सामंती बंधनों के नीचे कराहते और उसे बदलने की कोशिश करते हुए चित्रित हैं। ये गाँव उनके तईं एक वैपरीत्य रचने में सहायक हैं सुख के द्वीपों के बरक्स दुख के सागर:

‘सवेरा उनके घर फैला हुआ है,

अँधेरा मेरे घर ठहरा हुआ है।’

गाँव के किसान इन बंधनों को चुपचाप बर्दाश्त करने की बजाय उसके विरुद्ध विद्रोह करते हुए दिखाये गये हैं । एक गज़ल के शेर तो प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ का मानो पुनर्पाठ करते हैं:

‘अब भी होरी लुट रहा है अब भी धनिया है उदास,

अब भी गोबर बेबसी से छट्पटाएँ गाँव में।’

गाँव के लोगों के सामंती उत्पीड़न में गुलामी के समय से कोई खास फ़र्क नहीं आया है। इसे भी चिन्हित करने के लिए वह इसी उपन्यास का सहारा लेते हैं:

‘अब भी पंडित रात में सिलिया चमारन को छलें,

दिन में ऊँची जातियों के गीत गाएं गाँव में।’

यह चित्रण स्वाभाविक रूप से सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए संघर्षरत दलित जातियों के लिये हालात बदलने की प्रेरणा बन जाता है ।

इन सभी कवियों ने गज़ल को नए ढाँचे में ढालकर अपनी बात कही है। हिन्‍दी कविता की परम्‍परा से परिचित लोग जानते हैं कि गज़ल का प्रतिरोध के लिये उपयोग कोई नई बात नहीं है । दुष्यंत कुमार ने बहुत पहले इस विधा का सृजनात्मक उपयोग मारक व्यंग्य के साथ राजनीतिक संदेश देने के लिये किया था । एक जगह वह दुष्यंत के मुहावरे का उपयोग करते हुए भी उनसे आगे जाने का संकेत करते हैं:

‘इस जमीं से दूर कितना आसमाँ है,

फेंककर पत्थर मुझे ये देखना है।’

बल्ली सिंह चीमा ने इस परम्‍परा को आगे बढ़ाते हुए सहज खड़ी बोली में ऐसी सफलता के साथ गेय गज़लें लिखीं कि वे लोगों की जुबान पर न सिर्फ़ चढ़ गईं, बल्कि अनेकशः उनका नारों की तरह इस्तेमाल भी किया गया । कविता की लोकप्रियता का प्रमाण अगर स्मृति में उसका बैठ जाना है तो बल्ली भाई की गज़लें इसका प्रतिमान हैं ।

उन्होंने अपने अन्य सहधर्मियों के साथ जो गज़लें और गीत लिखे उनके जरिय आपातकाल के बाद का समूचा राजनीतिक इतिहास अपनी गतिमयता के साथ समझा जा सकता है । मसलन उनके इस शेर को पढ़ते ही गोरख के गीत ‘बोलो ये पंजा किसका है’ की याद आ जाती है:

‘तुम तो कहते थे हैं उनके कर कमल,

देख लो वो हाथ खंजर हो गया।’

व्यंग्य की एक मिसाल उनकी ये पंक्तियाँ हैं जिनमें वह दमन की सरकारी भाषा का मज़ाक उड़ाते हैं:

‘रोटी माँग रहे लोगों से किसको खतरा होता है,

यार सुना है लाठी चारज हलका हलका होता है।’

लेकिन अन्य कवियों के मुकाबले बल्ली सिंह चीमा की कविताओं में व्यंग्य से अधिक आक्रोश दर्ज़ हुआ है । जैसी सहज दृढ़ता बल्ली भाई के भीतर मिलने पर नजर आती है वैसी ही सहज दृढ़ता उनकी कविताओं के भीतर समा गई है । आसानी से लेकिन मजबूती से उनकी कविता बड़ी बात कह जाती है:

‘तेलंगाना जी उठेगा देश के हर गाँव में,

अब गुरिल्ले ही बनेंगे लोग मेरे गाँव के।’