Archive for: August 2012

‘ये सच है मुफलिसी में आदमी सौ बार मरता है’

नई दि‍ल्ली : जगदीश रावतानी की संस्था ‘आनंदम’ ने अपने पाँचवे वर्ष में कदम रखते हुए 22 अगस्त 2012 को मासिक काव्य गोष्टी का आयोजन दरियागंज के एक सभागार में किया। इसमें जाने-माने कवियों/शायरों ने शिरकत की। इस मौके पर जगदीश रावतानी ने सभी से अनुरोध किया के वे आसाम के निवासियों को यह सन्देश दें की हम सब  इस संकट की घडी उनके साथ हैं । गोष्ठीक में सैफ सहरी, भूपेन्द्र कुमार, जगदीश रावतानी, नीता अरोरा, मजाज़ अमरोही, शुकदेव शोत्रिये,  मंजुला दास, विरेंदर कमर, शोभना मित्तल, दर्द देहलवी, राणा प्रताप गन्नौरी, आदेश त्यागी, इरफ़ान तालिब, अजय अक्स, नागेश आदि‍ ने शिरकत की। सदारत ज़र्फ़ देहलवी ने और संचालन किया जगदीश रावतानी ने कि‍या।
ईद और स्वतंत्र दिवस को समर्पित इस शाम में कवियों ने अपने जज़्बात और मोहब्त को बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़ में प्रस्तुत किया। चन्द ग़ज़लों /कविताओं की कुछ पंक्तियाँ-
जगदीश रावतानी:
इश्क कर बन्दों से तेरा फायदा हो जाएगा
नफरतों का बीज जग से लापता हो जाएगा
क्यों हवा देता है अफवाहों की चिंगारी को यू
आग भड़केगी तो फिर सब कुछ फना हो जाएगा
अजय अक्स :
कभी ईमान मरता है कभी किरदार मरता है
ये सच है मुफलिसी में आदमी सौ बार मरता है
नागेश :
खफा वो हमसे इस कदर हो गए
मरासिम ही जेरो ज़बर हो गए
मजाज़ अमरोही :
क्या किसी रेशमी आँचल का लिया है बोसा
खुशबूए बाँटती फिर रही है हवा ईद के दिन
राणा प्रताप गन्नौरी:
दिल में यादे हँसी रहें उनकी, उनकी सूरत रहे निगाँहों में
हम को लाजिम है अहतराम उनका, मिट गए जो वतन की निगाँहों में
भूपेन्द्र  कुमार:
गले मिलन का पर्व है, ईदुल फितर कमाल
भेद भाव से मुक्ति की, दूजी नहीं मिसाल
इरफ़ान:
तुम्हारी जुल्फ से खेले अच्छा नहीं लगता
कोई इन्हें छेड़े मेरे सिवा अच्छा नहीं लगता
आदेश त्यागी:
मेरे हिस्से में एक ऊँची उड़ान आने दो
मुझ तलक आज मेरा आसमान आने दो
आज हो जाने दो मुझे बाबस्ता ए आज़ादी मुझे
मेरी मुट्ठी में सारा जहाँ आने दो
दर्द देहलवी:
मंजिल का कुछ पता नहीं, रस्ते में हैं सभी
में ही अकेला कोई  हूँ, खतरे में हैं सभी
इखलास किस में कितना है, इस की खबर नहीं
यह तो दिखाई देता है, सजदे में हैं सभी
ज़र्फ़ देहलवी :
हर तरफ सद्भावना का संचार होना चाहिए
आदमी को आदमी से प्यार होना चाहिए
सैफ सहरी:
आदाब जिंदगी का उन्हें भी सिखाईये
बच्चों को अपने दोस्तों उर्दू पढ़ाईए
नीता अरोरा :
प्रेम तुम्हारा पावन पायल, मादक सी झंकार
मानव मन के रंग महल में, स्वप्नों का अभिसार
शुकदेव शोत्रिये :
नीम की गंध में याद आती रही
छाँह में खेलते जीत की हार की
शोभना शुभी :
लक्ष्मी बाई अमर है हम सब जानते हैं
क्या देखा है आपने आज़ाद भारत में
किसी लक्ष्मी बाई को
अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ते
रिपोर्ट : तरुण रावतानी

हंगल भारत-पाकिस्तान की साझी प्रगतिशील सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि थे: प्रणय कृष्ण

एके हंगल

रंगकर्मी-फिल्म अभिनेता एके हंगल के निधन पर जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि-

नई दिल्ली : मशहूर वामपंथी रंगकर्मी, स्वाधीनता सेनानी और फिल्मों के लोकप्रिय चरित्र अभिनेता एके हंगल का 95 वर्ष की उम्र में 26 अगस्त, 2012 को लम्‍बी बीमारी से बंबई में निधन हो गया। इंडियन पीपुल्स थियेटर(इप्टा) और प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन से संबद्ध एके हंगल ने वामपंथ और मार्क्‍सवाद के प्रति अपनी आस्था को आजीवन बरकरार रखा। 1917 में जन्में हंगल के बचपन का ज्यादातर समय पेशावर में गुजरा। उनके परिवार में कई लोग अंग्रेजी राज में अफसर थे और वे चाहते थे कि एके हंगल भी अफसर ही बनें, लेकिन उन्होंने अपना जीवन स्वाधीनता संघर्ष में लगाने का फैसला कर लिया था, उन्हें अंग्रेजों की गुलामी कबूल नहीं थी। आजादी की लड़ाई में वह जेल भी गये। बलराज साहनी, कैफी आजमी सरीखे अपने साथियों के साथ वह सांस्कृतिक परिवर्तन के संघर्ष में शामिल हुए। कराची में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव रहे। सांप्रदायिकता विरोधी आंदोलनों और मजदूर आंदोलनों के साथ एक प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी के बतौर उनका जुड़ाव रहा। वह भारत-पाकिस्तान की जनता की साझी प्रगतिशील सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि थे।

एके हंगल एक ऐसे संस्कृतिकर्मी थे, जिन्होंने नाटकों में काम करने के साथ-साथ आजीविका के लिए टेलरिंग का काम भी किया और इस पेशे में उन्होंने बहुतों को प्रशिक्षित भी किया। उन्होंने 18 साल की उम्र में नाटक करना शुरू कर दिया था, लेकिन फिल्मों में चालीस साल की उम्र में आये- तीसरी कसम में निभाई गई एक छोटी सी भूमिका के जरिए। उसके बाद उन्होंने लगभग 200 फिल्मों में काम किया और भारतीय जनता के लिये वह ऐसे आत्मीय बुजुर्ग बन गये, जिनके द्वारा निभाए गये फिल्मी चरित्रों को लोग अपने जीवन का हिस्सा समझने लगे। उन्होंने अभिनय को यथार्थ की समझदारी से जोड़ा और छोटे से छोटे दृश्यों को भी यादगार बना दिया। हिन्‍दी फिल्मों में जब भी गरीब, लाचार उपेक्षित व्यक्तियों या समुदायों और बुजुर्ग लोगों की जिन्‍दगी के मार्मिक दृश्यों या प्रसंगों की चर्चा होगी, तब-तब एके हंगल का बेमिसाल अभिनय याद आयेगा। ‘बावर्ची’, ‘नमकहराम’, ‘शोले’, ‘शौकीन’, ‘अभिमान’, ‘गुड्डी’ आदि उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्में हैं। हिन्‍दी सिनेमा में अपराधियों और काले धन के हस्तक्षेप तथा आम जन जीवन की सच्चाइयों के गायब होने और एक भीषण आत्मकेंद्रित मध्यवर्ग की अभिरुचि के अनुरूप फिल्में बनाये जाने को लेकर वे काफी चिंतित रहते थे।

भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। लेकिन बहुप्रशंसित और सम्मानित इस अभिनेता के जीवन के आखिरी दौर में जबकि अपने ऑटोबायोग्राफी के लिये जरूरत के तहत वह अपने पुश्तैनी घर देखने गये थे और पाकिस्तानी डे फंक्शन के आमंत्रण को स्वीकार करके वहाँ चले गये तो साम्‍प्रदायिक-फाँसीवादी राजनीति के लिये कुख्यात शिवसेना के प्रमुख ने 1993 में देशद्रोह का आरोप लगाकर उनकी फिल्मों पर बैन लगा दिया था। उनकी फिल्मों को थियेटर्स से हटा दिया गया था। फिल्मों के पोस्टर फाड़े गये थे और एके हंगल के पुतले जलाए गये थे, फोन से धमकियाँ भी दी गई थीं। दो साल तक उनका बहिष्कार किया गया। उस वक्त उन्होंने कहा था कि वह स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं, उन्हें किसी से कैरेक्टर सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं है।

बेशक जनता का सम्मान और सर्टिफिकेट किसी भी संस्कृतिकर्मी के लिये बड़ा सम्मान और सर्टिफिकेट होता है और यह एके हंगल को मिला। वह भारत-पाकिस्तान दोनों देशों में प्रगतिशील-जनवादी मूल्यों और मनुष्य के अधिकार के लिए लड़ने वाले सारे संस्कृतिकर्मियों और आंदोलनकारियों के जीवित पुरखे थे। देश में बढ़ती पूँजीवादी अपसंस्कृति, श्रमविरोधी राजनीतिक संस्कृति, सामप्रदायिक-अंधराष्ट्रवादी विचारों के विरोध में गरीबों-बेबसों और मेहनतकशों की जिन्‍दगी की पीड़ा और आकांक्षा को अभिव्यक्ति देना तथा उनकी एकता को मजबूत करना ही एके हंगल के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जन संस्कृति मंच उनके निधन पर गहरी शोक संवेदना जाहिर करते हुए उनके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प लेता है।

(प्रणय कृष्ण,  राष्ट्रीय महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी वि‍ज्ञप्‍ति‍)

कथाकार संजीव- कुछ नोट्स : प्रेमपाल शर्मा

कथाकार संजीव

6 जुलाई, 2012 को कथाकार संजीव 65 वर्ष के हो गये । प्रेमचंद की विरासत थामे इस उपन्‍यासकार का हाल ही में प्रकाशित उपन्‍यास ‘रह गयी दिशायें इसी पार’ उनकी कथा यात्रा का महत्‍वपूर्ण पड़ाव है । इससे पहले उनके प्रकाशित उपन्‍यास हैं:- ‘किशनगढ़ के अहेरी’, ‘सर्कस’, ‘सावधान ! नीचे आग है’, ‘धार’, ‘पाँव तले की दूब’, ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ और ‘सूत्रधार’ ।

‘तीस साल का सफ़रनामा’, ‘आप यहाँ हैं’, ‘भूमिका और अन्‍य कहानियाँ’, ‘दुनिया की सबसे हसीन औरत’, ‘प्रेत मुक्ति और अन्‍य कहानियाँ’, ‘ब्‍लैकहोल’, ‘खोज’, ‘दस कहानियाँ’, ‘गति का पहला सिद्धांत’, ‘गुफा का आदमी’ और ‘आरोहण’ उनके कहानी संग्रह हैं ।

वरि‍ष्‍ठ लेखक प्रेमपाल शर्मा की डायरी के अंश संजीव के रचना कर्म को समझने के लि‍ये महत्‍वपूर्ण हैं-

डायरी : 1991

सारिका के जनवरी 1980 के पुरस्‍कार अंक में ‘अपराध’ कहानी छपी थी- प्रथम पुरस्‍कृत । तब से आज तक सैंकड़ों कहानियाँ पढ़ीं होंगी किन्‍तु बहुत कम ऐसी हैं जिन्‍हें लौट-लौट कर पढ़ने को मन करता है । रामचन्‍द्र शुक्‍ल के शब्‍दों में- प्रेम में हम एकाधिकार चाहते हैं जबकि श्रद्धा में हम चाहते हैं कि दूसरे लोग भी उसे प्‍यार करें । शायद एकमात्र कहानी जिसकी मैंने बीसियों प्रतियाँ कराके उनको दी हैं जो हिन्‍दी कहानी की दरिद्रता को रोते हैं या जिनकी नजरों में आने से यह कहानी रह गयी । नक्‍सलवाद को मैंने पहली बार उसी कहानी के माध्‍यम से अनुभव किया था । इससे पहले पता नहीं मैंने नक्‍सलवाद नाम सुना भी था या नहीं । किन्‍तु उसके बाद इस विचारधारा को न मैं निगल पाया, न अस्‍वीकार कर पाया और यह सब असर है ‘अपराध’ कहानी के पात्र बुलबुल और सचिन का । लोहे की भट्टी में तपे हुए दहकते अंगारे से पात्र ।

यूनिवर्सिटी में किसी को रिसर्च करते देखता हूँ तो याद आता है- ‘अपराध’ कहानी पर किया जाने वाला शोध । लाइब्रेरी ढूँढ़ते, खोजते, हर शोधार्थी की हर थीसिस मुझे ऐसा प्रयास लगती है कि जिसका कोई उपयोग नहीं इस सामाजिक व्‍यवस्‍था में । मात्र डिग्री के लिये- किसी पिता के मंसूबों को साधने, तो कभी किसी रिश्‍तेदार की नाक को लम्‍बा करने के लिये । जब भी किसी बड़ी नदी को मैंने रेलगाड़ी में पार किया है, मेरी आँखों में ‘अपराध’ पर लिखी थीसिस छपाक से पानी में गिरती है और सारी नदी में कागज छितराने लगते हैं । और बुलबुल भी । बुलबुल डॉक्‍टर थी । सचिन कहता है- दीदी तुमी बुझवैना । ये सामंतोवादी शिक्षा व्‍योवस्‍था । तो अगले ही पल प्‍यार की ठंडी फुहार छोड़ती बुलबुल । ऐसो ! हमार राजकुमार ।

कहानी में सचिन को दारोगा के मुँह पर थूकने का प्रसंग कितना सार्थक है । दारोगा जी । तुम नहीं समझोगे । अपने बेटे को भेज देना- उसे समझा दूंगा । कितनी गहरी पकड़ है- वक्‍त के साथ हम सभी सुभाष, नेहरू बनते हुए अंत में गांधी में तब्‍दील हो जाते हैं । सचमुच गर्म खून की भाषा गर्म खून ही समझ सकता है ।

साहित्यिक आलोचना की परिधियों से परे यह कहानी कुछ बड़े सीधे-सीधे प्रश्‍न खड़ा करती है । क्‍या हिंसा को और बड़ी हिंसा और नफरत को नफरत से दबाया जा सकता है ? जो व्‍यवस्‍था स्‍वयं अपराध को पैदा करती हो, उसके कारणों को जानने और लीपापोती के लिए अनुसंधान या आयोग, कमेटियाँ बनाने का कोई अर्थ है ? आखिर कौन सी मजबूरी है जिसके चलते डॉक्‍टरी पढ़ रही संघमित्रा, जो मुर्दे की चीरफाड़ से भी बेहोश हो जाती थी, परिस्थितियों के वश में स्‍वयं शातिर अपराधी बन जाती है ? सिद्धार्थ और सचिन जो एक छत के नीचे मार्क्‍स, लेनिन और ‘सामन्‍तोवादी शिक्षाव्‍योवस्‍था’ को समझने की कोशिश कर रहे हैं; उनमें से एक अपराध की दुनिया से गुजरता हुआ जेल के सीखंचों के पीछे पहुँच जाता है और दूसरा उन्‍हीं प्रवृत्तियों पर तथाकथित शोध करके फलता-फूलता है । क्‍योंकि सिद्धार्थ, सेशन जज-पिता, एस.पी.-बड़े भैय्या, जिलाधीश- छोटे भैय्या और गृह सचिव जीजाजी की बदौलत ऐन वक्‍त पर सचिन से ठीक विपरीत साँचे में फिट कर दिया जाता है । सुविधा भोगी ये सब वही चेहरे हैं जिनके लिए ‘न्‍याय तथ्‍य सापेक्ष है, सत्‍य सापेक्ष नहीं । तथ्‍य का प्रमाण स्‍वयं में सामर्थ्‍य सापेक्ष है । अत: निर्णय लचीला होता है । पुलिस एफ.आई.आर. प्रस्‍तुत करती है । चार्जशीट पेश करती है । गवाह होते हैं अपराध के सबूत । वकील होते हैं, कानून की किताबें होती है । इन सबमें से पर्त-दर-पर्त जो निष्‍कर्ष छन-छन कर आता है, हम वहीं निर्णय तो दे सकते हैं । और फिर तुम जिसकी सिफारिश करने आये हो उसका तो मुकाबला ही सत्‍ता से है जो हमेशा न्‍यायपालिका पर हावी रहती है ।’ सेसन जज पिता का सचिन के पिता को यह कहना है तो बेटे सिद्धार्थ के लिए यह कि ‘सी.बी.आई. वाले कब के तुम्‍हारे विरुद्ध कदम उठा चुके होते । बचते आये हो तो अपने जीजाजी के चलते । लेकिन यही रवैया रहा तो आई फाइनली वार्न यू….यानि कि बड़े-बड़े सिद्धान्‍तों की दुहाई देता हुआ न्‍याय ऐसा तरल पदार्थ जिसे जिस पात्र में ढाल दें वैसा ही ढल जायें । और सिद्धार्थ आ गया सुधार के रास्‍ते, उस साँचे की बदौलत जो उसे मिला और सचिन बना खूँखार नक्‍सलवादी उसी व्‍यवस्‍था के दूसरे साँचे में ढलकर ।

सेशन जज पिता और एस.पी. भाई के सामने टी.वी. के सेनिटोरियम से सचिन के पिता हाँफते-हाँफते दौड़े आये । किन्‍तु न सचिन के पिता की याचना का कोई असर पड़ा, न सचिन का अपनी सफाई में एक शब्‍द न कहने का । उल्‍टे नक्‍सलवाद को खत्‍म करने के लिए नक्‍सलवादी गाँव को जलाने के पुरस्‍कार स्‍वरूप उनका प्रोमोशन हो गया ।

लेकिन उसी सचिन की सिफारिश यदि राजनेता, एम.एल.ए., एम.पी. या व्‍यवस्‍था का बड़ा अफसर एस.पी., जज, सेक्रेटरी करता या इनके किसी आदमी का आदमी निकल आता तो भी क्‍या दंड वही रहता ? यह सच केवल बिहार या बंगाल का सच नहीं है, आज पूरे देश का सच बन चुका है । कन्‍याकुमारी से लेकर कश्‍मीर और आसाम से सोमनाथ तक गाया जाने वाला राग इस दोगली व्‍यवस्‍था का क्रूर चेहरा है ।

1967 में बंगाल के नक्‍सलवाड़ी गाँव से शुरू हुए इस आंदोलन ने देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं और इसके पक्ष-विपक्ष में चली आ रही मीलों लम्‍बी बहस का अभी भी कोई सिरा नहीं नजर आ रहा । अनेकानेक गुटों में फलता-फूलता यह आन्‍दोलन स्‍वाधीन भारत के इतिहास में आज भी उतना प्रासंगिक बना हुआ है जितना सत्‍तर के दशक में । लेकिन जो निष्‍कर्ष, निर्णय लाखों करोड़ों पन्‍नों में नहीं मिलेंगे वे इस छोटी सी कहानी में बहुत संतुलित ढंग से रखे गये हैं- एक सहज पारदर्शी भाषा में । इतनी गुरु गम्‍भीर विचारधारा का इतना पठनीय प्रस्‍तुतीकरण । नक्‍सलवाद पर यूँ तो और भी कहानियाँ, उपन्‍यास आये हैं पर इतनी खूबसूरती के साथ समस्‍या को शायद ही किसी ने उठाया हो । संजीव यहीं बाजी मार ले गये हैं । शुरू से अंत तक अदृश्‍य, बारीक धागों में बुनी सचिन और संघमित्रा की प्रेम कहानी- बिल्‍कुल ‘उसने कहा था’ की तर्ज पर । किन्‍तु सौ वर्ष बाद के सामाजिक यथार्थ के अनुकूल व अनुरूप । मौजूदा भारत की मुकम्मिल तस्‍वीर जिसमें अपने समय का सब कुछ बोलता है- प्‍यार, नाते-रिश्‍ते, व्‍यवस्‍था, जेल, विचारधारा । हिन्‍दी साहित्‍य जिन कहानियों के बूते विश्‍व साहित्‍य को टक्‍कर दे सकता है ‘अपराध’ उनमें से एक है ।

कहानी की एक अद्वितीय विशेषता उसका शिल्‍प पक्ष भी है । एकदम लचीला-फंतासी का ऐसा प्रयोग जिसमें घटनाओं को मनमर्जी पाठकों के सामने रखा जा सकता है । उसका प्रवाह कहानी खत्‍म होने से पहले भी पाठक को नहीं छोड़ता और न खत्‍म होने के बाद ।

हिन्‍दी की सर्वश्रेष्‍ठ कहानियों में से एक । यहीं कुछ कारण हैं जिससे मैं बार-बार इसकी प्रतियाँ कराता हूँ और दोस्‍तों को देता हूँ- देखो हिन्‍दी कहानी क्‍या चीज  है ? मेरे मित्रों ने कहा कि यह कहानी बहुत भावुक है । मैं चुप रहता हूँ । यदि समाज का इतना वास्‍तविक यथार्थ घिनौना रूप भी आपको भावुक नहीं बना सकता है तो साहित्‍य आखिर क्‍या बला है ? मैंने यह कहानी 1980 में पढ़ी थी और आज 1991 में भी मुझे भावुक बनाती है तो मैं ऐसी भावुकता की कद्र करता हूँ ।

साहित्‍य का अधिकांश क्‍या भावुकता के बिना सम्‍भव हो पाता ?

डायरी : 3 मार्च 2011

यह देश का दुर्भाग्‍य है कि 60 सालों के बाद भी सत्‍ता उन लोगों के पास सरकती चली गई जिसमें समाजवादी संविधान के बावजूद एक आदमी पाँच हजार करोड़ का मकान मुम्‍बई में बनवा रहा है । दो-चार किलोमीटर की यात्रा भी हेलीकॉप्‍टर से करते हैं और गरीब मुल्‍क का इतना पैसा उनके गुप्‍त नामों से विदेशी बैंकों में जमा है, जिसे अगर बाँट दिया जाए तो पूरे देश में खुशहाली लौट आए । इसी दुर्भाग्‍य की परछाई साहित्‍य को घेरे है । वैसे भी साहित्‍य, समाज या राष्‍ट्र का दर्पण ही तो होता है । नतीजा यह हुआ कि वह कहानी और उपन्‍यास जो दिल्‍ली या महानगरों में पहुँचे साहित्‍यकार पश्‍चि‍म, लैटिनी लेखकों के वक्‍तव्‍य, अंग्रेजी अदा के तड़के और स्‍त्री स्‍वतंत्रता के नाम पर मनोवैज्ञानिक फ्राइड की आड़ में जरा साहित्यिक अंदाज में सैक्‍स के चित्रण में रहे, उन्‍हें मीडिया या परजीवी आलोचक बुद्धिजीवियों के बैंड बाजे ने सारे देश के लिए आदर्श माना । जब आदर्श ऐसा हो तो संजीव जैसा ग्राम, कस्‍बाई, मजदूर संवेदना का कथाकार कहाँ टिकता ? बंगाल की कुलटी जैसी छोटी-सी जगह में दिन-रात अपनी नौकरी करते हुए जो लिखता रहा उसे दिल्‍ली में बैठे आलोचकों ने शायद ही कभी जिक्र करने लायक समझा हो ।

सैंकड़ों कहानियॉं संजीव ने लिखी हैं और हर कहानी एक नयी जमीन तोड़ती है । ‘तीस साल का सफरनामा’ से बात शुरू की जाए तो यह कहानी आजादी के बाद चकबंदी के नाम पर जो कुछ हुआ उसकी व्‍यथा कथा है । 1977 में यह कहानी लिखी गई थी तो ‘सुरजा’ आजादी की तरह तीस साल का था लेकिन ‘तीस की उम्र में ही उसके निचुड़े चेहरे, उस पर उगी बेतरतीब दाड़ी एक ऐसा चलता-फिरता दस्‍तावेज है जिस पर तीस साल की आजादी का इतिहास भूगोल सब कुछ पढ़ा जा सकता है ।’ श्रीलाल शुक्‍ल के ‘राग दरबारी’ में भी ऐसे ही गाँव के स्‍कूल प्रधान, पंचायत के सैंकड़ों चित्र उभरते हैं लेकिन संजीव की कहानियाँ कभी-कभी उस पर भी भारी पड़ती हैं । नयी पीढ़ी तो गाँव की भी, चकबंदी में हुए अन्‍याय को नहीं समझ सकती शहर की तो बात छोड़ो । उन्‍हें जिन्‍हें यह नहीं पता कि दूध मदर डेयरी से आता है या गाय-भैंस भी देती हैं । गाँव के जमींदार पैसे वाले जिनके यहाँ चकबंदी की लूट का चित्र देखिए । ‘जी ! …….. लूट शब्‍द पर आपको आपत्ति है ? चकों को देखकर आप ही कोई उचित शब्‍द सुझाइये । यह रहा सरजू पांडे का चक । जमीन आठ आने मालियत की थी । कानूनगो साहब को प्रसन्‍न कराकर चौदह आने मालियत की बनी और फिर नहर के बगल दो आने मालियत की ऊसर में आकर सात गुनी बन गयी । समय पर खरबूजे और दशहरी आम न पहुँचा पाने के कारण सन्‍तोखी कोइरी और मैकू कुरमी के द्वार पर के खेत और बाग का स्‍वामित्‍व खटाई में पड़ गया । गणेसी बढ़ई थोड़ा टेंटिया गया था । दो ही कुर्सियाँ तो माँगी थीं साहब ने ! फल यह हुआ कि उसकी सिंचित गोंअड़ एक बीघे जमीन सोलह से दस आने मालियत की हो गयी । गणेसी गिड़गिड़ाया तो कानूनगो ने कानून की बारीकी समझायी – बाग की छाया पड़ रही थी उस खेत पर (पृष्‍ठ 110)।

हजारों गरीब छोटे किसान इस चकबंदी ने बरबाद कर दिए तो वहीं भ्रष्‍ट, नौकरशाही, रिश्‍वत के बल पर नये अमीर सामंत पैदा हुए । धीरे-धीरे इन्‍होंने लोकतंत्र के नाम पर सत्‍ता पर भी कब्‍जा किया । और सत्‍ता पर कब्‍जा होने के बाद अगला अध्‍याय शुरू होता है यानि कि रामहरख पांडे, लोटन यादव और रमाशंकर सिंह जैसे समृद्ध किसान सामंती कागजों पर भूमिहीन बन गये और हरखू, लोटू और शंकर हरिजन के नाम से बंजर जमीन इन्‍हें मिल गई । ऐसे चरित्र, चित्र, भाषा शायद ही इधर के किसी लेखक के पास हों ।

पिछले दिनों 60 साल की आजादी के बाद माओवाद, नक्‍सलवाद की आवाजें फिर उठ रही हैं । सुरजा की जमीन तो गई ही गई उसे एक चोरी के आरोप में जेल भी भिजवा दिया गया और सत्‍ता का चमत्‍कार देखिए जिस नंबरदार ने उसे जेल भिजवाया था उसी ने उसको बाहर निकलवाकर वाहवाही लूटी । इन स्थितियों में कौन पागल नहीं हो जाएगा और वही सुरजा के साथ हुआ । ऐसे प्रसंगों पर अखबारों में ऐसी खबरें आने पर बुद्धिजीवियों के बीच बहस चल पड़ी । ‘ब्‍लैक पैंथर ! मार्क्‍स का वर्ग-संघर्ष !…. नहीं-नहीं, लोहिया का वर्ण-संघर्ष ! किसी ने हेगेल के ‘फेनो-मेनोलॉजी ऑफ़ माइंड’ से प्रभावित बता डाला तो किसी ने फेनन की ‘द रैचेड ऑफ़ द अर्थ’ में ही इसका स्रोत ढूँढ निकाला । बड़े तर्क-वितर्क के बाद यह मान लिया गया कि सुरजा नक्‍सलपंथी है ।’

यदि इस कहानी को ‘तीस साल का सफरनामा’ के बजाय साठ साल का सफरनामा कह कर फिर से छापा जाए तब भी चमकते भारत की चकबंदी में पाठक पाएंगे कि सुरजा की तकदीर में कोई अंतर नहीं आया । उसे सत्‍ता अभी भी नक्‍सलवादी या माओवादी बता रही हैं । लेखक की कल्‍पना की उड़ान देखिए जो वह कहानी की अंतिम लाइन में कहता है ‘और जनाब कुसुमपुर की नियति को फुला दीजिये तो यह पूरे देश की नियति हो जाएगी ।’ मात्र तीस साल की उम्र में संजीव ने ऐसी ढेरों कहानियॉं हिन्‍दी साहित्‍य को दी । उनको बड़े बुद्धिजीवियों के बड़े समारोहों में वह कुर्सी भले ही न मिली हो लेकिन हिन्‍दी पट्टी के गाँव के अधिकतर नौजवान उनकी एक-एक कहानी को छाती से चिपकाए फिरते हैं ।

एक और कहानी है उनकी ‘भूखे रीछ’ । तीस साल का सफरनामा यदि चकबंदी, गाँव के किसान की विकट स्थितियों का बयान है तो ‘भूखे रीछ’ मिलों, फैक्‍ट्रि‍यों में काम करने वाले मजदूरों की । राम लाल एक आयरन की फैक्‍ट्री में काम करता है । सायरन की आवाज उठते ही चटपट फैक्‍ट्री की तरफ दौड़ लगाता है । दिन के भुकभुके की तरह कहानी की शुरूआत होती है । राम लाल दातौन फाड़कर ‘ओ-ओ’ करते हुए जीभ साफ करके बंगले की फालतू नल पर दो-एक कुल्‍ली करने के बाद हर-हर गंगे करता हुआ नल के नीचे नहाने बैठ जाता है । फिर देह का पानी पोंछे बिना ही बसाती बनियान पर कालिख-पुती कमीज डालकर बेडौल पतलून-जूते से लैस होकर आवाज लगाता है, रज्‍जो sss ! रज्‍जो sss ! अरी ओ तुरकानी, आज फिर लेट करायेगी क्‍या !’ (पृष्‍ठ 56) सूदखोर सिर्फ गाँव के सिमाने के अंदर ही नहीं मिलों के अंदर भी बैठे हैं । बलदेव राय जैसे सैंकड़ों बिना कोई काम किये तनख्‍वाह भी पाते हैं और औने-पोने सूद का पैसा भी बटोरते हैं । राम लाल सोचता है कि सूदखोर लोगों को गेट के अन्‍दर ढुका लिया जाता है । सारे नियम कायदे हम छोटे लोगों के लिये ही हैं । ये ‘वाचन वार्ड’ लोग कॉय को हैं……. खाली इसलिए कि सरकार के हाथ में जाने से पहले कारखाने का सारा माल बाहर बेच दें !’ …..वह कुछ और बोलने वाला है मगर यह सोचकर सिटपिटा जाता है कि कहीं साले झूठी चोरी के इल्‍जाम में फँसा दें तो….. ? (पृष्‍ठ 63)

दिल्‍ली में बैठे आलोचक कहानी में गाँव तलाशते हैं ? कहाँ मिलेगा उन्‍हें   गाँव ? कौन गाँव, देहात, कस्‍बा फैक्‍ट्री में रहता है आज या काम करता है ? लेखन में पूरी की पूरी पीढ़ी, आलोचक समेत शहर में आ चुकी है । चंद कथाकार जिनकी कहानियों में गाँव जिंदा हैं उनमें हैं काशीनाथ सिंह, संजीव… । ‘चाकरी’, ‘मरोड़’, ‘भूखे रीछ’ कहानियों में कहानी उतनी नहीं चलती जितनी कथाकार के अन्‍दर । ‘भूखे रीछ’ में मजदूर बस्‍ती का पूरा जीवन है । नल की लाइन में खड़ा रामलाल, ओवरटैम की इच्‍छा में किसी साथी की मौत, बीमारी मांगता, सूदखोर राय से बचकर निकलने की कोशिश में गेट पर अचानक राय आवाज से पकड़ा जाता । बसाती, बनियान, कमीज पतलून में फैक्‍ट्री में छह बजे से पहले घुसने की कोशिश करना । संजीव ने यह जीवन जिया है इसीलिये यह सब लिख पाये ।

सन् अस्‍सी के आसपास मिल मालिकों के शोषण की तरकीबों और उनके खिलाफ उठने वाली सभी आवाजों को इस कहानी में सुना जा सकता है । किसी भी मुद्दे पर हड़ताल हो, हड़ताल शुरू तो होती है लेकिन पैसे के बूते मालिक उसे तोड़ने में भी कोई देर नहीं लगाते । पिछले तीस साल पहले के समय पर नजर डालिये, तो इस कहानी में प्रतिरोध की कुछ प्रतिध्‍वनियाँ बहुत साफ हैं । साठ साल के बाद तो यूनियन जैसे चीजें ही नहीं बचीं ।

सन् अस्‍सी में ‘अपराध’ कहानी ने संजीव को उस दौर का नायक कथाकार बना दिया था । वह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है । दुर्भाग्‍य बस यही है कि हिन्‍दी कहानी का वह नायक आज हिन्‍दी और हिन्‍दी की दुनिया की राजनीति के चलते वैसे ही किसी अंधेरे, एकांत की तरफ बढ़ रहा है जहाँ ‘तीस साल के सफरनारमा’ का सुरजा या ‘भूखे रीछ’ का राम लाल या ‘अपराध’ कहानी का सचिन पहुँचा था । यदि देश की सत्‍ता उनके हाथों में पहुंचती जो वाकई इस देश का पेट भर रहे हैं, तो संजीव, प्रेमचंद के बाद सबसे प्रमाणिक कथाकार होते ।

कविता और जीवन के रिश्ते का गान : सुधीर सुमन

बिहार की चर्चित सांस्कृतिक संस्था ‘हिरावल’ द्वारा बनाई गई  ऑडियो सीडी ‘जाग मछंदर’ पर लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन का समीक्षात्‍मक आलेख-

आज हिन्‍दी में इसका बहुत रोना रोया जाता है कि कविताओं के पाठक या श्रोता कम हो गये हैं। कवि-सम्मेलनों और मुशायरों के आयोजन कम हो गये हैं, जो मंच हैं भी, उन पर चुटकुलेबाजों या अराजनीतिक व प्रतिक्रियावादी किस्म के लोगों का कब्जा है। सुनने की क्रिया भी सृजनात्मकता से परे नहीं होती, पर बाजार ने व्यक्ति को एक ऐसे मशीन में तब्दील करने की कोशिश की है, जो सिर्फ अपनी तात्कालिक भावोत्तेजना या क्षणिक सुकून के लिए कलाओं का उपभोग करना चाहता है। इसी प्रक्रिया में गम्‍भीर वैचारिक कविताओं के बारे में कुछ इस तरह की राय बनाने की कोशिश की जाती है, मानो लोगों तक उनका न पहुँच पाना उनकी कोई  बुनियादी कमजोरी हो। हालाँकि कई बार ऐसा भी लगता है कि कुछ कवियों ने कविता के न गाये जाने को ही श्रेष्ठ कविता का पैमाना बना दिया है। उन्हें शायद अपनी श्रेष्ठ कविता के आम हो जाने की कोई जरूरत भी महसूस नहीं होती। लेकिन जो कविताएं जनता के लिए लिखी बताई जाती हैं, उन्हें जनता तक पहुँचाने की जद्दोजहद से कोई जेनुइन कवि कैसे अलग रह सकता है? दरअसल मामला सिर्फ मुक्तछंद की कविता को लोगों तक पहुँचाने का ही नहीं है, बल्कि जो अच्छे गीत हैं और जो जनभाषाओं में रचे गए हैं, उन्हें भी जनता तक ले जाने की कोशिशें  कम हैं। नतीजतन बॉलीवुड के फिल्मी गीतों और जनभाषाओं में उनके ही भद्दे, अश्‍लील, स्त्रीविरोधी संस्करण सुनने को लोग विवश होते हैं।

भोजपुरी भाषी होने के कारण भोजपुरी की जो दशा बाजार ने की है, उसे देखकर मुझे बेहद कोफ्त होती रहती है। भोजपुरी गीत-संगीत बाजार में तो जैसे इसकी होड़ लगी हुई है कि कौन कितना अश्‍लील, विकृत-कामुक रचना लिख सकता है। ऐसे में कथाकार सुभाषचंद्र कुशवाहा द्वारा ‘लोकरंग’ आयोजन में जाना बहुत सुकून प्रदान करता रहा है। हालाँकि वहाँ अभी संरक्षण पर ही ज्यादा जोर है, जनभाषाओं में नई रचनाशीलता के उदाहरण कम सामने आए हैं। लेकिन जिस तरह हर साल होने वाले इस आयोजन में अवधी-भोजपुरी के महान लोकगीतकारों की रचनाओं से लोगों का परिचय कराया गया है, वह भी अगर नये रचनाकारों को प्रेरणा दे, तो यह कम उपलब्धि नहीं होगी। जोगिया जनूबीपट्टी-कुशीनगर में आयोजित होने वाले इस आयोजन में तीन साल पहले जब मैं गोरखपुर से चला, तो बस में एक कैसेट बज रहा था- चांद मारे किरनिया के बान करेजवा में तानि तानि के। बचपन में इस गीत को सुना था और अब भी उसका जादू बदस्तूर था। दिल्ली आने पर अपनी परम्‍परा में गहरी रुचि रखने वाले साथी धर्मेंद्र सुशांत ने बताया कि यह छपरा के मशहूर गीतकार अशांत जी का गीत है और कि उनके कई गीत बेहद मशहूर रहे थे। उस कैसेट में कई ऐसे भी गीत थे, जिनमें बदलता हुआ जमाना अभिव्यक्त हो रहा था। मसलन, खेल के पिरितिया के खेल/दिमाग हमार फेल कइलू चिरई। लेकिन सिर्फ पुरुष के नजरिये से रचे गए गीत ही नहीं थे, बल्कि उसी कैसेट में एक गीत था, जिसमें नशेड़ी पति की जमकर खबर ली गई थी। बाद में मैं पता करता रहा, पर उसे बनाने वाली कम्‍पनी का नाम मालूम नहीं हो सका। असल में लय या संगीत के साथ पेश करने से कविता की हेठी नहीं होती, बल्कि उसकी ताकत बढ़ती है। एक बार गाने का मूड आया तो मैंने कुमार मुकुल की कई कविताओं को गाया, उनमें भोजपुरी का एक गीत भी था। उस गीत और कविताओं के गायन को मित्रों ने काफी सराहा।

‘मधुशाला’ जैसी रचनाओं को तो कई लोगों ने गाया है। गायक मन्ना डे के खाते में ऐसे कई लोकप्रिय गीत हैं। ऐसी रचनाओं को गैरफिल्मी कहा जाता था। लेकिन हिन्‍दी की कविताओं के गायन के कैसेट कम ही मिलते हैं। आज से 13-14 साल पहले मुझे मेरे एक मित्र ने एक ऑडियो कैसेट दिया था, जिसमें अजय राय की आवाज में निराला और प्रसाद समेत कई हिन्‍दी के बड़े कवियों की रचनाओं को गाया गया था। हालाँकि उसमें में भी गीत ही थे।

अभी मुझे बिहार की चर्चित सांस्कृतिक संस्था ‘हिरावल’ द्वारा बनाई गई एक ऑडियो सीडी सुनने का मौका मिला। गोरख पांडेय, विजेंद्र अनिल, रमाकांत द्विवेदी रमता, महेश्‍वर, रामकुमार कृषक, अदम गोंडवी सरीखे सारे महत्वपूर्ण जनगीतकारों की रचनाओं के गायन के लिये हिरावल जानी जाती रही है। हाल के  वर्षों में हिरावल के कलाकारों ने कई ऐसी रचनाओं को संगीतबद्ध करके पेश किया है, जिसने इस धारणा को गलत साबित किया है कि आम लोगों को वैचारिक कविताएं पसंद नहीं आतीं या उसे वे सुनना नहीं चाहते। इन कविताओं का संगीत किसी पापुलर धुन की पैरोडी नहीं है, जिसके अनगिन उदाहरण भक्तिगीतों का नशीला संगीत बाजार रोजाना जबरन हमारे कानों में ठूँसता है। संगीत यहाँ  रचनाओं में व्यक्त परिवर्तनकामी भावों और वैचारिक आशयों का बेहतरीन सहचर लगता है। हिरावल की ओर से ऐसी आठ रचनाओं की एक ऑडियो सीडी बनाई गई हैं, जिनमें से कई विभिन्न आयोजनों में गाई जा चुकी हैं और बेहद मकबूल हैं।

फैज, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, जयशंकर प्रसाद, नागार्जुन, निराला, वीरेन डंगवाल और दिनेश कुमार शुक्ल की रचनाओं पर आधारित ऑडियो सीडी ‘जाग मछंदर’ का परिचय देते हुए कहा गया है कि यह उन सबके लिए है जिन्होंने इंसानी जिंदगी को बेमतलब और बेसबब बना देने वाली स्थितियों और ताकतों से दो-दो हाथ करने का हौसला बचाए रखा है। रचनाओं का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है और हर रचना को उसके कथ्य के अनुरूप संगीतबद्ध करने और उसी के अनुरूप गाने की कोशिश की गई है। फैज, नागार्जुन, शमशेर जिनकी अभी जन्मशताब्दी गुजरी है, उन्हें एक तरह से इसके जरिए एक संगीतमय श्रद्धांजलि भी दी गई है।

फैज की नज्म ‘इंतेसाब’ को और लोगों ने भी गाया है, पर ‘आज के नाम और आज के गम के नाम’ को सुनते हुए पुरानी धुन की याद नहीं आती, खासकर नज्म के दूसरे हिस्से में हमारे दौर के गमों का बयान बड़े मार्मिक अंदाज में हुआ है। इस ऑडियो कैसेट के लोकार्पण के मौके पर बिल्कुल पहली बार हिरावल के कलाकारों की आवाज में इसे सुनते हुए एक नौजवान कवि की प्रतिक्रिया थी, कि गमों की दास्तान को सुनते-सुनते उसकी आँखे नम हो आईं। मुक्तिबोध को आमतौर पर जटिल भाव-संवेदन का कवि माना जाता है। बिहार में एक राजनीतिक कार्यकर्ता कभी इसी बात पर बहस कर बैठे थे कि दिनकर और मुक्तिबोध में दिनकर की कविताएं जनता को ज्यादा समझ में आती हैं। जाहिर है मुक्तिबोध की कविताओं में मौजूद लय और उसकी ताकत से वे अनभिज्ञ थे। हिरावल के कलाकारों ने मुक्तिबोध की बहुचर्चित कविता ‘अंधेरे में’ का एक अंश चुनकर गाया और आज इस अंश को सुनाए जाने की श्रोताओं की ओर से बहुत मांग होती है। ये पंक्तियां ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन/ओ मेरे सिद्धांतवादी मन/अब तक क्या किया/जीवन क्या जीया…’ आज के दौर में कायम नाउम्मीदी, निष्क्रियता और यथास्थिति से बड़े कारगर तरीके से टकराती हैं। इस कविता में जो उतार-चढ़ाव है और जो छटपटाहट है, इसे संगीत में बखूबी बांधा गया है। जब यह पंक्ति वेग के साथ कानों से गुजरती है कि बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये, तो जाने कितने स्तर पर आत्मालोचन के भाव पैदा होते हैं। शमशेर के सौंदर्यबोध के इजहार में ये कलाकार पूरी तरह कामयाब रहे हैं। उनकी कविता ‘ य’ शाम है’ में दमन झेलने वाले गरीब मजूरों और उनके प्रति संवेदित कवि दोनों के हृदय का हाहाकार सामूहिक गायन और संगीत के जरिए बखूबी अभिव्यक्त हुआ है।

जयशंकर प्रसाद के गीत ‘तुमुल कोलाहल कलह में मैं हृदय की बात रे मन’ को आशा भोसले ने भी गाया है, संगीत और उनका गायन बेहद परिष्कृत है, पर हिरावल के इस ऑडियो सीडी में हृदय की उस बात को कहने पर ज्यादा जोर है, उसकी जो विकलता है, वह सुनने वाले के मर्मस्थल में तीक्ष्णता से उतरती है। बाबा नागार्जुन के एक छोटे से गीत का चुनाव लाजवाब है और कहा जाए तो इस कैसेट की उपलब्धि है। भादों की अंधेरी रात है और उसमें चमकते जुगनू हैं, जो जान भर रहे हैं जंगल में, लगता है उजाले और अंधेरे के बीच कोई जंग है। कवि की समझदारी है कि यही जीतेंगे शक्ति प्रदर्शन के दंगल में। कवि का आग्रह है- इन्हें तुम बेचारे मत कहना, अजी यही तो ज्योतिकीट हैं। दरअसल जुगनू जनसामान्य के प्रतीक हैं और उनके होने की महत्ता और उनकी ताकत में भरोसे की यह अद्भुत रचना है, जिसका संगीत काफी मेलोडियस है, जो सहज ही जुबान पर चढ़ जाने की क्षमता रखता है।

निराला के गीत ‘गहन है यह अंध कारा’ में सचमुच अंधेरे और घुटन का अहसास होता है। धीमी पिच की आवाज और उसमें बाँसुरी का इस्तेमाल, ऐसा लगता है मानो कोई गहरी बेचैनी हो, मुक्त होने की कोई गहरी तड़प हो। स्वार्थ के जिन अवगुंठनों से निराला जैसे संवेदनशील कवि का मन अपने दौर में परेशान  रहा, उसके बाद के दौर में वह पूरी तरह से सभ्यता का फलसफा ही बन गया, अपनी कविता ‘हमारा समाज’ में वीरेन डंगवाल उसी फलसफे से बहस करते हैं, पहले समझाने के अंदाज में कि यह कौन नहीं चाहेगा कि उसे मिले प्यार, फिर कई सामान्य चाहतों का जिक्र आता है और अचानक कविता चाह से सवाल की ओर बढ़ती है और गीत का तेवर बदल जाता है- हमने ये कैसा समाज रच डाला है, जिसमें वही चमकता है जो शर्तिया काला है। और अंत में यह सवाल भी कि बोलो तो कुछ करना भी है या काला शरबत पीते-पीते मरना है। इस कविता को हिरावल द्वारा ही पहली बार संगीतबद्ध किया गया था और इसे काफी लोकप्रियता भी हासिल हुई। इसी तरह जिस गीत पर ऑडियो कैसेट का नाम रखा गया है, दिनेश कुमार शुक्ल के उस गीत में हारमोनियम का बड़ा प्रभावी इस्तेमाल किया गया है। एक फाइटिंग स्प्रीट और जहाँ सब कुछ बिक रहा है, उससे टकराने की ललकार इस गीत को सुनते हुए लगातार महसूस होती है। अपने वक्त की वस्तुगत समझ है और उस वक्त को बदल देने  की अपील है- सो रहा संसार/पूँजी का विकट जाल/किंतु सर्जना के एक छोटे से नगर में/फिर नए संघर्ष का उन्वान लेकर जाग मेरे मन मछंदर। जहाँ मन और तन, देश और दृष्टि, हर्ष-विषाद, कल्पनाएं-भावनाएं, नाद-निनाद सब कुछ बिक रहा है, जहाँ अपने बिक रहे हैं और सपने बिक रहे हैं, वहाँ पहुँचकर गायन और संगीत पल भर को मानो थमने सा लगता है, पर फिर तेजी से गोरख के नवगीतों को याद करते हुए जोश के साथ पलटता है संगीत भी और गायक की आवाज भी और दोनों कवि के मकसद को और भी अर्थवान बना देते हैं।

ये संगीतबद्ध रचनाएं अपने सुनने वालों से थोड़ा वक्त चाहती हैं, इन्हें चलताऊ अंदाज में नहीं सुनना चाहिए। ये देर तक हमारे जेहन में ठहरने वाली रचनाएं हैं। कविता को लोगों तक उसके अपने मिजाज के अनुरूप ले जाने की यह कोशिश तो है ही, साथ ही साथ यह उर्दू-हिन्‍दी की साझा प्रगतिशील परम्‍परा से परिचित कराने का भी प्रयास है। यह एक समन्वय भी है प्रगतिशील साहित्य के विरासत के साकारात्मक स्वरों का। हम तो यही कामना करेंगे कि हिरावल की ओर से यह सिलसिला जारी रहे। रचनाओं को संतोष झा और विस्मय चिंतन ने संगीतबद्ध किया है। आवाज समता राय, डीपी सोनी, अंकुर राय, सुमन कुमार और संतोष झा की है। इसे बनाने में कपिल शर्मा और इमरान का विशेष सहयोग रहा है। इसकी कीमत 125 रुपये है। इसे हिरावल, मदनधारी भवन, दूसरी मंजिल, एस.पी. वर्मा रोड, पटना, बिहार-800001 के पते पर संपर्क करके हासिल किया जा सकता है। हिरावल का ईमेल- hirawal@gmail.com है। हिरावल के गायक- रंगकर्मी  संतोष झा ने बताया कि हमने किसी बड़े आर्थिक  मुनाफे के लिए यह ऑडियो कैसेट बनाया नहीं है। इसका खर्च निकल आये,  इतना काफी है। अगर इस तरह के आॅडियो कैसेट की मांग ज्यादा बढ़ेगी तो भविष्य में कीमत इससे कम भी हो सकती है। असल चीज यह है कि कविताएं और उनमें मौजूद विचार लोगों तक पहुँचे और उनके जीवन का हिस्सा बनें, उनके जीवन की जरूरत बनें। कविताएं आम लोगों के जीवन में घुलमिल जायें और उनमें अभिव्यक्त सपने साकार हों।

हि‍न्‍दी को राजभाषा के रूप में लादना सबको खलता है

तिरुवारूर : हिन्दी को सम्‍पर्क भाषा, आम अवाम की ज़रूरतों की भाषा के रूप में स्वीकार किया जा रहा है लेकिन राजभाषा के रूप में आज भी विरोध हो रहा है, कारण कि ‘राजभाषा’ कहते ही ‘राज चलाने की भाषा’ के रूप में उसे ग्रहण किया जाता है। वहीं केन्द्र में भी हिन्दी अनुवाद के बूते पर चलती है, जिसमें उसकी क्लिष्टता के कारण वह आम अवाम की समझ में नहीं आती है। वास्तविकता यह है कि वह अपनी प्रयोजमूलकता से कोसों मिल दूर होती है। मंत्रियों से लेकर सरकारी अधिकारियों तक अंग्रेज़ी में काम करते हैं और मंचों से, टीवी चैनलों पर बोलते हुए भी अंग्रेज़ी का प्रयोग करते हैं। ऐसे में हिन्दी को राजभाषा के रूप में लादना यथोचित नहीं जान पड़ता। इस बात तमिलनाडु केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय, तिरुवारूर में 26-28 जुलाई, 2012 को ‘दक्षिण भारत में हिन्दी’ विषय पर आयोजि‍त त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में उभरकर आयी। प्रकाश जैन, डॉ. घनश्याम, डॉ. चिट्टी अन्नपूर्णा ने इस बात पर सिलसिलेवार प्रकाश डाला। हिन्दी अनुवाद के ज़रिए, संचार माध्यमों के ज़रिए, साहित्य और तुलनात्मक अध्ययन के ज़रिए, व्यवसाय के ज़रिए बाज़ार में छा गयी है और एक विश्‍व पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कर चुकी है। ऐसे में उसके वैश्‍वि‍क रूप से कोई इन्कार नहीं करता, लेकिन राजभाषा के रूप में लादना सबको खलता है।

संगोष्‍ठी के अंतर्गत ‘राजभाषा कार्यान्वयन में सूचना प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग’ विषय पर राजभाषा कार्यशाला, ‘हिन्दी क्लब’ का उद्घाटन एवं संगोष्ठी संयोजक एवं निदेशक आनंद पाटील द्वारा संपादित (तमिलनाडु केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय की पहली पुस्तक) ‘हिन्दी : विविध आयाम’ का लोकार्पण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस विश्‍वविद्यालय में राष्ट्रीय स्तर की यह प्रथम संगोष्ठी थी और रेखांकित करने की बात है कि यह हिन्दी की संगोष्ठी थी।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केरल के प्रसिद्ध कवि, लेखक, आलोचक एवं महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के प्रति कुलपति प्रो. ए. अरविंदाक्षन तथा अध्यक्ष विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी. पी. संजय थे।

कार्यक्रम की शुरुआत 26 जुलाई को ‘हिन्दी क्लब’ के उद्घाटन समारोह में दीप प्रज्ज्वलन से हुई। इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. घनश्याम शर्मा, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, बाबू जगजीवन राम महाविद्यालय (उस्मानिया विश्‍वविद्यालय) हैदराबाद थे। बीज व्याख्यान गुरुकुल विद्यापीठ, इब्राहिमपट्टणम् के डॉ. प्रेमचन्द्र ने दि‍या। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी. पी. संजय ने की।

डॉ. घनश्याम ने कहा कि “विश्‍वविद्यालय प्रणाली में ‘हिन्दी क्लब’ पूर्णतः नवीन संकल्पना है। इस क्लब की स्थापना के पीछे जो उद्देश्य है, वह बहुत ही उम्दा है। इस क्लब के ज़रिए हिन्दी को लोकप्रिय बनाने का काम किया जाएगा। विद्यार्थी, अधिकारी, संकाय सभी एक प्लेटफार्म पर एकत्रित होंगे और हिन्दी के कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे तथा हिन्दी सीखने, समझने, समझाने का काम करेंगे। यह इज़ी लर्निंग मेथड़ वाला मार्ग है।” डॉ. प्रेमचन्द्र ने शैक्षिक क्षेत्र में क्लब जैसी संकल्पना की आवश्यकता पर प्रकाश डाला तथा संयोजक की दूरदर्शिता को सराहा। वहीं इस बात की ओर भी इंगित किया गया कि इसे हिन्दी के ‘संघ’ के रूप में ग्रहण न किया जाए।

प्रो. बी. पी. संजय ने हिन्दी क्लब को एक बेहतर ज़रिया मानते हुए, इसकी स्थापना को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि “हिन्दी क्लब के ज़रिए विद्यार्थियों में सक्रियता बढ़ायी जा सकती है। हिन्दी को लेकर उनके मन में जो भय है, उसे निकाल बाहर किया जा सकता है। एक बेहतर साधन के रूप में इस क्लब को देखने की आवश्यकता है।”

इस अवसर पर कम्प्यूटर एनिमेटेड विज्ञान कथा आधारित फ़िल्म ‘वॉल-ई’ (अकादमिक पुरस्कार विजेता फ़िल्म) का प्रदर्शन कि‍या गया। इसके बाद लघु चर्चा और डॉ. अनिल पतंग द्वारा लिखित नाटक ‘दिल ही तो है’ (निर्देशन : आनंद पाटील) का मंचन कि‍या गया।

27 जुलाई को ‘दक्षिण भारत में हिन्दी’ राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में प्रो. ए. अरविंदाक्षन ने कहा कि “विश्‍वविद्यालय में हिन्दी विभाग नहीं है, केवल हिन्दी अनुभाग है और उसमें भी केवल एक ही अधिकारी है, जो राजभाषा से संबंधित कामकाज देखता है। बावजूद इसके हिन्दी का इतना भव्य आयोजन किया गया है और बहुत ही व्यापक विषय पर चर्चा करने के लिए अनेकानेक विद्वानों को आमंत्रित किया गया है। प्रायः हममें यही बात प्रचलित है कि तमिल लोग हिन्दी बोलना नहीं जानते अथवा बोलना पसंद नहीं करते। जबकि सत्य तो यह है कि काफ़ी तमिल भाषी कर्मचारी, विद्यार्थी हिन्दी बोल रहे हैं।” इसके लिए उन्होंने आनंद पाटील की पहल को सराहा। उन्होंने अपने उद्घाटन भाषण में दक्षिण में हिन्दी की स्थिति एवं गति, दशा एवं दिशा पर विस्तार से बात की।

प्रो. बी. पी. संजय ने संगोष्ठी को ‘इंटलेक्च्युअल ओपननेस’ कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि सामाजिक विकास के लिए एक-दो पीढ़ियों को बलिदान करना होगा। उन्होंने आगे कहा कि हम सभी भाषाओं का प्रसार करने में विश्‍वास रखते हैं और उनका आदर करते हैं। उन्होंने आमंत्रित विद्वानों से उम्मीद की कि इस विशद विषय के अलग-अलग पहलुओं पर सार्थक चर्चा करेंगे और विश्‍वविद्यालय को सुझाव देंगे कि आगे किस तरह के कदम उठाये जाने चाहिए।

प्रो. अरविंदाक्षन, प्रो. बी. पी. संजय तथा वी. के. श्रीधर ने तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित आनंद पाटील की पुस्तक ‘हिन्दी : विविध आयाम’ का लोकार्पण किया।

इस त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में अन्य अतिथि वक्ताओं के रूप में प्रो. कृष्ण कुमार सिंह, साहित्य विभाग, महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा; प्रो. ए. भवानी, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, मनोम्ननियन सुंदरनार विश्‍वविद्यालय, तिरुनेलवेली; डॉ. सी. अन्नपूर्णा, अध्यक्ष, अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ, महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा; डॉ. एम. श्यामराव, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्‍वविद्यालय, हैदराबाद; डॉ. चिट्टी अन्नपूर्णा, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, मद्रास विश्‍वविद्यालय, चेन्नै; प्रकाश जैन, महाप्रबंधक, डेली हिन्दी मिलाप, हैदराबाद; डॉ. जयशंकर बाबू, हिन्दी विभाग, पांडिचेरी विश्‍वविद्यालय, पांडिचेरी; डॉ. आत्माराम, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्‍वविद्यालय, हैदराबाद; डॉ. चंदू खंदारे, हिन्दी विभाग, गाँधीग्राम ग्रामीण विश्‍वविद्यालय, गांधीग्राम; एम. संजीवी कानी, सहायक प्रबंधक (राजभाषा), भारतीय रिज़र्व बैंक, बैंगलुरु; विनायक काले, शोधार्थी, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्‍वविद्यालय, हैदराबाद; अनीता पाटील, शोधार्थी, हिन्दी विभाग, उस्मानिया विश्‍वविद्यालय, हैदराबाद ने ‘दक्षिण भारत में हिन्दी’ के विविध पहलुओं पर अपने शोध पत्र/व्याख्यान प्रस्तुत किये।

‘राजभाषा कार्यान्वयन में सूचना प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग’ विषय पर आयोजित राजभाषा कार्यशाला में प्रतिभागियों के रूप में राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बांदरसिंदरी के हिन्दी अधिकारी प्रतीश कुमार दास तथा हि‍न्‍दुस्‍तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड, चेन्नई के हिन्दी अधिकारी बशीर उपस्थित थे।

कुलपति प्रो. बी.पी. संजय ने मुख्य अतिथि प्रो. ए. अरविंदाक्षन को उनकी हिन्दी सेवा के लिए मान पत्र एवं स्मृति चिह्न देकर तथा अन्य अतिथियों को प्रमाणपत्र एवं स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।

तीन दिन के इस कार्यक्रम का सत्र संचालन विश्‍वविद्यालय के विभिन्न विभागों में अध्ययनरत एकीकृत स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के विद्यार्थी यथा–यालिनी, विजय बाबू, राम कृपाल कुमार, अभिषेक कुमार, सिव पवित्रा, स्वाति ने किया।

ए. आर. वेंकटकृष्णन, उप कुलसचिव (अकादमिक); एम. पी. बालामुरुगन, उप कुलसचिव (स्थापना एवं प्रशासन); डॉ. वी. मधुरिमा, भौतिकी विभाग; डॉ. वी. पी. रमेश, गणित विभाग; डॉ. के. वी. रघुपति, अंग्रेज़ी विभाग ने संगोष्ठी के अलग-अलग सत्रों में आभार प्रकट किया।

 

हर शिक्षक, छात्र और माँ-बाप के लिये जरूरी किताब : प्रेमपाल शर्मा

वि‍ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने में अरवि‍न्‍द गुप्‍ता का महत्‍वपूर्ण योगदान है। उनकी पुस्‍तक ‘रोशन सि‍तारे- प्रेरक भारतीय वैज्ञानि‍क’ वि‍ज्ञान को लोकप्रि‍य बनाने का ऐसा ही प्रयास है। इस पुस्‍तक पर वरि‍ष्‍ठ लेखक प्रेमपाल शर्मा की समीक्षा-

विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने विशेषकर बच्‍चों को खेल-खेल में विज्ञान की दुनिया में लाने के लिये अरविन्‍द गुप्‍ता का काम अद्वितीय है । अरविन्‍द गुप्‍ता जैसे समर्पित विज्ञान लेखकों ने विज्ञान को कठिन, बोझिल मानने की रूढि़ को तोड़ा है । बचपन की स्‍मृतियों, स्‍कूल  के दिनों को हम याद करें तो विज्ञान, गणित के नाम से ही शिक्षक, माँ-बाप या समाज एक भय पैदा करता था । परीक्षा के मापदंडों पर कम नम्‍बर पाने वाला यदि साइंस की तरफ अपनी रुचि के लिये जाना भी चाहता था तो उसकी मजाक उड़ाई जाती थी । यह तस्‍वीर आज भी नहीं बदली । यही कारण है कि नम्‍बरों की होड़ और मेहनत के बावजूद हमारी कई पीढियाँ दूसरे देशों के मुकाबले कोई मौलिक योगदान विज्ञान के क्षेत्र में नहीं कर पायीं ।

भय सचमुच मौलिकता को डस लेता है । अरविन्‍द गुप्‍ता की नयी किताब ‘रोशन सितारे- प्रेरक भारतीय वैज्ञानिक’ इसीलिये ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है कि इसमें ऐसे चालीस भारतीय वैज्ञानिकों के जीवन, शिक्षा और काम को बहुत सहज, कम शब्‍दों में एक रोचक कहानी के अंदाज में प्रस्‍तुत किया है । सचमुच बड़ा लेखक वही होता है जो बड़ी बात को इतने सरल शब्‍दों में कह देता है । प्रेमचंद, शरतचंद से लेकर जयंत नर्लीकर, अरविन्‍द गुप्‍ता, सुबोध मोहन्‍ती उसी कड़ी का नाम हैं ।

पुस्‍तक की निर्माण प्रक्रिया भी गौरतलब, अनुकरणीय है । भारतीय राष्‍ट्रीय विज्ञान अकादमी के अध्‍यक्ष एम. विजयन बच्‍चों के लिये विज्ञान पर लोकप्रिय पुस्‍तक चाहते थे । विज्ञान-प्रसार के लिये अरविन्‍द गुप्‍ता को इन्दिरा गाँधी पुरस्‍कार देते वक्‍त उन्‍होंने अरविन्‍द का व्‍याख्‍यान सुना । इनके काम से बहुत प्रभावित हुए । अरविन्‍द को अनुरोध किया और प्रख्‍यात वैज्ञानिक जयंत नर्लीकर, माधव गाडगिल, टी. पदमनाभन की एक सलाहकार समिति भी बनायी जो इस पुस्‍तक निर्माण में मदद करे । बस हो गया एक ऐतिहासिक काम । मूल अंग्रेजी में नाम ‘ब्राइट स्‍पार्क्‍स  इन्‍सपायरिंग इंडियन सांइटिस्‍टस, फ्राम द पास्‍ट’ हिन्‍दी में चमकते सितारे । जैव भौतिकी अध्‍येता कैरॉल हेडॉक के बेजोड़ चित्रों और प्रस्‍तुति के साथ । पुस्‍तक में जगदीश चंद्र वसु, सी.वी. रामन, बीरबल साहनी, मेघनाथ साहा, सलीम अली, साराभाई, लारी बेकर, अनिल अग्रवाल समेत चालीस वैज्ञानिक शामिल हैं । खास  बात है इसमें तीन महिला इरावती कर्वे, अन्‍ना मणि और कमला सोहोनी का होना है । सिर्फ तीन महिलायें क्‍यों ? वकौल पुस्‍तक की भूमिका- ‘कमला सोहोनी बम्‍बई विश्‍वविद्यालय में प्रथम आई थीं । इसके बावजूद नोबल पुरस्‍कार विजेता सी.वी. रामन ने उन्‍हें दाखिला देने से इन्‍कार किया : ‘मैं अपनी संस्‍था में किसी भी लड़की को नहीं लूँगा ।’ जब कमला ने रामन के दफ्तर में धरना दिया तब रामन थोड़ा नरम पड़े । आखिर में उन्‍होंने कमला को दाखिला तो दिया परन्‍तु एक ‘विशेष’ छात्रा के रूप में । बाद में कमला ने एक शोधकर्ता के रूप में अपनी साख जमाई और केम्ब्रिज से पी.एच.डी. हासिल की । शुरुआत में महिला वैज्ञानिकों को विज्ञान के पुरुष-प्रधान क्षेत्र में अपने पैर जमाने के लिये बहुत मेहनत-मशक्‍कत करनी पड़ी । उनके संघर्षों और कुर्बानियों से भावी पीढि़यों के लिए रास्‍ता प्रशस्‍त हुआ । आज स्थिति पहले से निश्‍चि‍त ही बेहतर है । एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान भारत में चार में से एक वैज्ञानिक महिला  है । यह सचमुच हर्ष का विषय है । हाल ही में 100 भारतीय महिला वैज्ञानिकों के जीवन और अनुभवों को समेटती हुई एक महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक ‘लीलावतीज डॉटर्स’ भारतीय राष्‍ट्रीय विज्ञान अकादमी ने प्रकाशित की है ।

अगली बार जब कोई ऐसी पुस्‍तक लिखेगा तो अरविन्‍द गुप्‍ता भी उसमें निश्‍चि‍त रूप से शामिल किये जाएंगे । उन्‍होंने भी विज्ञान और इसके प्रचार-प्रसार के लिये कम काम नहीं किया । अरविन्‍द गुप्‍ता ने 1975 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्‍थान (आई.आई.टी.), कानपुर से बी.टेक की डिग्री हासिल की । चन्‍द साल नौकरी करने के बाद वह  विज्ञान के प्रचार-प्रसार में लग गये । वर्तमान में वह पुणे में स्थित आयुका मुक्‍तांगन बाल विज्ञान केन्‍द्र में काम करते हैं । अरविन्‍द गुप्‍ता भारत में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने और खिलौने बनाने के लिये मशहूर हैं । उन्‍होंने भारत और विदेशों में ‘कबाड़ से जुगाड़’ विधि से वैज्ञानिक मॉडल बनाने की हजारों कार्यशालायें आयोजित की हैं । वह  लेखन और अनुवाद भी करते हैं । उनकी लोकप्रिय वेबसाइट arvindguptatoys.com  पर खिलौनों और पुस्‍तकों का एक विशाल भण्‍डार है । अपने काम के लिए उन्‍हें कई पुरस्‍कार मिल चुके हैं, जिनमें बच्‍चों में विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिये भारत सरकार का सर्वप्रथम राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार  (1988) और आई.आई.टी., कानपुर का डिस्टिंगुइश्‍ड एलुम्‍नस अवॉर्ड (2000) शामिल हैं ।

हर शिक्षक, छात्र और माँ-बाप के लिये बहुत जरूरी किताब । शीघ्र ही दूसरी भारतीय भाषाओं में उपलब्‍ध होगी ।

पुस्‍तक : रोशन सितारे- प्रेरक भारतीय वैज्ञानि‍क
लेखक   : अरविन्‍द गुप्‍ता
प्रकाशक : एकलव्‍य, ई-10, शंकर नगर
बीडीए कॉलोनी, शिवाजी नगर,
भोपाल, मध्‍य प्रदेश- 462016
मूल्‍य : 110 पेज: 249

आलोचक विजेंद्र नारायण सिंह को जलेस की श्रद्धांजलि

नई दिल्‍ली : जनवादी लेखक संघ ने हिन्‍दी के जाने-माने आलोचक प्रोफेसर विजेंद्र नारायण सिंह के आकस्मिक निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया।13 अगस्‍त की रात 11.35 बजे पटना में दिल का दौरा पड़ जाने से उनकी मृत्यु हो गयी। वह 76 वर्ष के थे। जलेस के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और चंचल चौहान की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्‍त‍ि में उन्‍हें श्रद्धांजलि अर्पित की गयी।

विजेंद्र नारायण सिंह का जन्म 6 जनवरी 1936 को हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा बिहार में ही हुई थी, पटना यूनिवर्सिटी से हिन्‍दी में एम.ए. और  पी एच डी की थी। वह भागलपुर विश्‍वविद्यालय के अनेक कॉलेजों में अध्यापन करने के बाद हैदराबाद के केंद्रीय विश्‍वविद्यालय में विभागाध्यक्ष रह कर सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने अनेक आलोचना कृतियों का सृजन किया जिनमें ‘दिनकर : एक पुनर्मूल्याँकन’, ‘उर्वशी : उपलब्धि और सीमा’, साहित्य अकादमी के लिए दिनकर पर मोनोलोग, ‘काव्यालोचन की समस्याएं’, ‘अशुद्ध काव्य की संस्कृति’, ‘भारतीय समीक्षा में वक्रोक्ति सिद्धांत’, ‘वक्रोक्ति सिद्धांत और छायावाद’ आदि प्रमुख हैं। वक्रोक्ति सिद्धांत की उनकी मौलिक व्याख्या उनके व्यापक अध्ययन और चिंतन का एक अभूतपूर्व प्रमाण है। हिन्‍दी साहित्य उनके इस योगदान को कभी नहीं भुला सकता। उनके जाने से सचमुच एक अपूरणीय क्षति हुई है।

उन्होंने 2005 में जनवादी लेखक संघ की सदस्यता ली, फिर वह 2007 में जलेस के केंद्रीय उपाध्यक्ष चुने गये। इस समय वह बिहार राज्य के अध्यक्ष थे। उन्होंने पूरे बिहार राज्य में जलेस को नयी गति व सक्रियता प्रदान करने में नेतृत्वकारी भूमिका अदा की।

बीनू भटनागर की कवि‍तायें

14 सि‍तम्‍बर 1947 को बुलन्दशहर ( उत्‍तर प्रदेश) में जन्‍मी बीनू भटनागर के लेख, व्‍यंग्‍य, कवि‍तायें आदि‍ रचनाएं वि‍भि‍न्‍न पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। उनकी तीन कवि‍तायें-

पचास के उस पार

माना कि यौवन के वो क्षण,
खो गये कुछ उलझनों में,
मैं वही हूँ तुम वही हो,
फिर न क्यों,
जी लें वही उन्माद के क्षण।

तुम मेरे हो शांत सागर,
लक्ष्य मेरा,
मैं नदी बहती हुई तुमसे मिली हूँ,
बाँहें फैला दो ज़रा मैं तो वही हूँ।
महसूस मुझको करा दो मैं नहीं हूँ।

तुम हो इक चट्टान हो संबल मेरा,
फिर नहीं क्यों बढ़के थामा हाथ मेरा।
भूल जाओ बालों मे चाँदी के जो तार हैं
भूल जाओ कि हम पचास के उस पार हैं।
फिर से जी लो कुछ पल,
जो हथेली से फिसलकर,
रेत के ढेर में,
ओंस की बूँदों से खो गये हैं।
आज भी मेरे वो पल,
तुम पर उधार हैं।

ना वो मेरा ना वो तु्म्हारा

दूर गगन पर एक सितारा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा,
फिर भी लगता कितना प्यारा।

नीड़ पेड़ का रैन बसेरा,
पक्षी का आकाश है सारा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

नदिया का बहता जलधारा,
प्यास बुझाता हरता पीड़ा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

फूलों का मुस्काता चेहरा,
उनपर मंडरता एक भँवरा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

सुर लय पर संगीत की धारा,
तन मन सबे प्रभु पर वारा,
वो तेरा भी है, और है मेरा।

ये मेरा है वह है तेरा,
कितना अर्थहीन ये नारा,
ना वो मेरा ना वो तु्म्हारा।

नदिया

हिम से जन्मी,
पर्वत ने पाली,
इक नदिया।
घाटी घाटी करती वो,
अठखेलियाँ।
अपने साथ लिये चलती वो,
बचपन की सहलियाँ।
फूल खिलाती,
कल कल करती,
खेले आँख मिचौलियाँ।
बचपन छूटा यौवन आया,
जीवन बना पहेलियाँ,
मैदानों मे आकर,
बढ़ गईं ज़िम्मेदारियाँ,
फ़सल सींचती हुई प्रदूषित,
रह गईं बस कहानियाँ।
सबका सुख दुख बाँटते
बीत गईं जवानियाँ।
जीवन संध्या मे अब,
पँहुच गईं तरुणाइयाँ।
मंद मंद होने लगीं,
मोहक अंगड़ाइयाँ।
सागर से जा मिली,
बढ़ गईं गहराइयाँ,
मानव जीवन की भी तो
ये ही हैं कहानियाँ।

हिन्दी दलित साहित्य को समग्रता में लाने का सराहनीय प्रयाय: तुलसीराम

नई दिल्ली : ‘‘मोहनदास नैमिशराय की पुस्तक ‘हिंदी दलित साहित्य’ दलित साहित्य को समग्रता में सामने लाने का सराहनीय प्रयास है। यह एक आधार पुस्तक है जो आने वाले समय में शोधार्थियों को एक नई दृष्टि देगी।’’ यह बात वरिष्ठ दलित लेखक और चिंतक प्रोफेसर तुलसीराम ने  12 जुलाई 2012 को साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के लोकार्पण समारोह के अध्यक्षीय वक्तव्य में कही। उन्होंने कहा कि इतिहास पहली प्रस्तुति में पूरा नहीं आता, लेकिन ऐसे प्रयास ही आगे के लिये बेहतर रास्ते बनाते हैं।

गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति की निदेशिका मणिमाला ने कहा कि नैमिशराय ने इस किताब में राजनीतिक परिवर्तनों के आधार पर दलित साहित्य के विभिन्न चरणों का सुव्यवस्थित इतिहास प्रस्तुत किया है। उन्होंने सभी विधाओं के लिए अलग से अध्यायों का निर्माण किया है जो अभी तक एक ही जगह एक किताब के रूप में उपलब्ध नहीं थे।

जयप्रकाश कर्दम ने कहा कि समान्यतः कोई भी इतिहास लेखन अतीत पर बहुत ज्यादा निर्भर होता है, लेकिन नैमिशराय इस पुस्तक में इस तिलिस्म को तोड़ते हैं और वर्तमान को बहुत गहराई से प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने पुस्तक में कई तथ्यात्मक त्रुटियों की तरफ लेखक का ध्यान खींचते हुए कहा कि कोई भी इतिहास अंतिम नहीं होता और उसमें सुधार की गुंजाइश लगातार बनी रहती है।

पुस्तक के लेखक मोहनदास नैमिशराय ने लेखकीय संबोधन में कहा कि मैं पुस्तक में सुधार के सभी सुझावों का स्वागत करता हूँ और आगे के संस्करणों में इन्हें अवश्य सुधार दिया जाएगा।

साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित 357 पृष्ठों की यह पुस्तक 14 खंडों में है और साहित्य की सभी लोकप्रिय विधाओं के लिये अलग खंडों के अतिरिक्त पुस्तक में दलित साहित्य के सौंदर्य शास्त्र, दलित साहित्य के दायरे, दलित साहित्य के भविष्य और अभी तक प्रकाशित पुस्तकों की सूची भी दी गई है। पुस्तक का मूल्य 200 रुपये है।

कार्यक्रम का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने किया। कार्यक्रम में विमलेशकांति वर्मा, प्रभाकर श्रोत्रिय, प्रयाग शुक्ल, अजय नावरिया, सूरजपाल चौहान सहित कई महत्त्वपूर्ण लेखक, पत्रकार व साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

प्रस्तुति – अजय कुमार शर्मा

सुनीता की कवि‍तायें

12 जुलाई 1982 को चंदौली जिले के छोटे से कस्‍बे चकियाँ में जन्मीं डॉक्‍टर सुनीता ने ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी पत्रकारिता : स्वरूप एवं प्रतिमान’ विषय पर बी.एच.यू. से पी-एच.डी. की  है। इनके  लेख–कवितायेँ कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी कुछ कवि‍तायें-

अस्थायी

अख़बारों के चंद पन्नों में सिमटी जिंदगियों में
ताजेपन सा कुछ भी नहीं
रात के पड़े खाने सुबह की तरह
रोते-बिलखते मासूम चेहरे पल के मेहमाँ
गाते-गुनगुनाते मुखड़े होंठो की चुभन
एक क्षण के पश्‍चात ढल जाते हैं रात्रि सरीखे
चंद चर्चाओं के बाज़ार क्षणिक गरम, तवे से
छपाक-छपाक की भड़ास क्षण में गायब
रेत पर गिरे बूंदों के अस्तित्व के मानिंद
बरखा-बहार और मधुवन की मधुर ध्वनि
धड़कनों में शोर मचाते खलबली अभी-अभी
करवट के साथ पन्ने पलटते दृश्य और दृष्टि बदले सभी
परिवर्तित परिवेश की पुकार सुनाई देती कभी-कभी
सुमधुर योजनाओं की ललकार दिखाई देती चहुओर
न रुकने वाली वक्त की सुइयाँ टीम-टीम कर लुप्त होतीं
एक चेहरा उभरता है प्रेयसी के जुल्फों में कैद
चितवन की चंचलता चहक उठती
नयेपन का अंदाज़ पलक झपकने के साथ
बुलबुले से अस्तित्ववि‍हीन हो जाता
खबरों की दुनिया में निरंतर गहमागहमी बनी रहती
निरुउत्तर प्रजा पल्लवित पुण्य बनी हुई
लेकिन भू धरा थमने के जगह डोलती रहती
थिरकती साँसों के लय पर वायु नृत्य करते
नटते, रिझते और रिझाते रम्भाने लगते
पात्र में रखे पानी सा मटमैला और फीका बन जाते
दिखने में धवल और स्वच्छ लगते
भागते, दौड़ते कल्पना के सागर में छलांग लगाते
छलकते आँसू रंगीन चित्रों के गुजरते ही सूख जाते
चिथड़े-चिथड़े सुख की तलाश में निकल पड़ते एक और लम्‍बी यात्रा पर
नंगे, खुले और खुरदरे पैरों के निशान जह-तह बिखरे पड़े
उनकी आवाज़ाही का कोई स्थायी प्रमाण नहीं
नर-शरीर की तरह अस्थायी, क्षणभंगुर और जुगनू की तरह
यहाँ सब कुछ सिमटा हुआ है बिखरे तौर पर
ढेर में तब्दील होते मलबा सा नहीं
बल्कि सपनों के कलेजे पर बिछे फूलों के कतारों की तरह
एक-एक कतरन से तैयार वस्त्र सा सुसज्जित, आकर्षक किन्तु अस्थायी

इस जिंदगी के बदले

इस जिंदगी के बदले
दो जून की रोटी नहीं मिली
सौदों के अम्बार मिले जिनकी वजह से नर्क के द्वार खुले
हँसते-खिलते गुलशन में
पतझड़ सदियों से बने हुए हैं

पगडंडियों से झुरमुट की तरह रौंद दिये गये
एक-एक करके चुने गए उम्मीद के दाने
भेड़-बकरियों में बाँट दिये गये
गर्दन जबह करके जबरदस्ती जुराबे बाँधी गई
कपड़े तार-तार कर दिये गये…!

इस जिंदगी के बदले
खपचालियाँ घोंप-घोंप कर मुरब्बे बना दिये गये
चीनी की जगह नमक रगड़ा गया
स्वाद लेकर चखने के स्थान पर
कसैले पान की तरह थूक दिये गये

खाने के लिये जूठन परोसे गये जैसे ज़ायकेदार छप्पन भोग
छटपटाहट होती रही लेकिन कोलाहल न बन सके
हवन कुण्ड में डाले गये घी की भाँति
धीरे-धीरे जलते हुए बदबू फैलाने लगे
गीली लकड़ी की तरह सुलग-सुलग कर

इस जिंदगी के बदले
मुझे बना दिया गया
आस्मा से गिरती हुई ओसें की बूंदें
पशुओं के आगे पड़े चारे के तिनके की भाँति
बिछा दिये गये अरमान के सारे उपागम

ठहरे हुए पानी के चारों-ओर
फैली हुई बजबजाती काई
जिसके चौमुहाने पर जैसे भिनभिनाती मख्खियाँ
मछली की सी तड़फाड़ाहट
उथल-पुथल करती नसें

इस जिंदगी के बदले
हमें दिये गये
बदलते विस्तर की तरह रोज़ एक नई सेज
उठाये-बिछाए जाते रहे
एक दिन से कई रातों तक
फैले बदबू से गहन घृणा के पात्र बनने तक

बेमज़ा भोजन की तरह
पटक दी जाती थाली सी
वदन माज दिए जाते
पेस्ट से घिसते दाँतों से
मशीन में काट दिये जाते चारे की तरह

इस जिंदगी के बदले
धब्बे लगी दीवार में तब्दील कर दिये जाते
एक नामुराद मुलाजिम की तरह
धकिया दिये जाते
घुटन के मकान में कैद किये जाते

परिंदे के पर काटकर उसे उड़ने पर मजबूर से किये जाते
हथेलियों पर अंगारे रख दिये जाते
बर्फ के टुकड़े मुख में घुसेड़ कर
आँखों में फूलों के सेज सजाये जाते
सिसकी अन्तःपुर में सुरक्षित रह जाती

इस जिंदगी के बदले
खुरपी पकड़ाकर बिराने में ठेल दिये जाते
उड़ती रेतों को पकड़ने की फरमाईश की जाती
घुमड़ते बादलों के झुर्रियों को गिनवाए जाते
एक बैल की तरह बलुहट में जोत दिये जाते

ताबूत में कैद लाश से जुगाली कराई जाती
पर्वत शिखरों पर जमें बर्फ के रेम्बों दिखाये जाते
अनसुनी कहानियों के किस्से दोहराते हुए
गरम तवे पर रोटी सेंकती उसे ठंडा लोहे में परिवर्तित कर दिये जाते
फिर घन पर घन बरसाए जाते
उसके सपाट होने तक

इस जिंदगी के बदले
नेत्रों पर चिलमन चढ़ा दिये गये
झूठे वादों के साथ दगा ही मिले
कुत्तों की तरह बोटी-बोटी नोचकर खाए
भूखे पेट पर रोलर चलाकर
जश्न मनाने की मन्नत मानी गई

धमकियों के दम पर धमनियाँ जब्त कर लिये गये
तपते रेत पर छोड़ दिये गये
महल की नींव रखने के लिये
इमारत के चारों पाए कूल्हों पर टिका दिये
भावी रिश्तों के नाम पर सब कुछ होता रहा

इस जिंदगी के बदले
खच्चर सरीखे लादी ढोते रहे
लगन कभी भी कम न हुई
चाहत के दिये जलते रहे
एक-एक दिन गुजरते गये उम्मीद बंधी रही

सुबह की किरण फूटते ही
हिम्मत की ताकत दुगुने दम से लग जाती
लेकिन बेड़ियों में कैद जिंदगी
अपने अंत की ओर बढ़ रही थी
उसे रोकना मुमकिन न था
हथौड़े की मार से जिस्‍म बेजान हो गये

इस जिंदगी के बदले
यातना के सागर में डुबो दिये गये
खारे पानी से गल गये
हड्डियों का ढ़ाँचा बरकारार रहा
युगों-युगों तक सिला की तरह

लहराते ख़्वाब खो गये
यादों के पट पलकों में खुल रहे हैं
चीनी-जल की तरह घुल गये
जीवन से इस कदर मोह बढ़ता रहा लेकिन उड़ान भरने की मनाही थी
वह आज भी बरौनियों में मसखारे से चिपके हैं

सूरज कुछ कहता

सूरज कुछ कहता है
सदा चुप-चुप रहता है
बंधनमुक्त विचरता है
स्नेहमग्न उलहना देता है।

धूप की तपिस तड़प रही है
अनजाने जख्म से जूझ रही है
कब मुक्त होंगें कर्तव्य से
पीड़ा की वेदना व्यथा सुना रही है।

नीरव में पड़े तन्हा खड़े हैं
दयार्द्र की उम्मीद से भरे हैं
मदांध मानव से गिला है
हम भी प्रेमातुर हेतु बने हैं।

यावज्जीवन के आमरण हैं
प्रतिक्षण के विवरण हैं
कष्टापन्न को सहते हैं
देशार्पण में लगे रहते हैं।

मार्गव्यय का लोभ नहीं है
सदाचार में तल्लीन हैं
व्यभिचार से रिश्ता नहीं है
भयमुक्त संचित नरोत्तम हैं।

नीलाम्बर के वासी हैं
पृथ्वीजन के पोषक हैं
शरणागत के दास हैं
कलाप्रवीण विद्यार्थी हैं।

धर्मविमुख नहीं करते हैं
पथभ्रष्ट के भी हमराही हैं
अँधेरे के दुश्मन हैं
उजाले के देवालय हैं।

पनचक्की से घुमरते हैं
देहलता से लिपटते हैं
नीलकमल से सुसज्जित हैं
पीताम्बर से चमकते हैं।

कनकलता से मिताई है
यहाँ न कोई महाजन है
नगरवास में रहता हूँ
शिलालेख सा अमिट हूँ।

सुनता न कोई आपबीती है
आनंदमग्न लोग स्नेहमग्न हैं
दर्द के रेखांकित से अंजान हैं
बीचोंबीच उभरे, जवाब खामोश हैं।

शोकाकुल करुणा से देखते हैं
मुँहमाँगा वरदान सहश्र पाते हैं
व्याकुल मन बेमतलब भटकते हैं
कर्मभूमि को मालगाड़ी सा ठेलते हैं।

गगन में हरफनमौला से फिरते हैं
पदच्युत का कोई भय नहीं है
देशनिकाला कभी नहीं हो सकता है
हम सृष्टि संचालन के पथगामी हैं।

कमलनयन में उम्मीद बन सजते हैं
पंचतत्व के उत्कृष्टतम स्वामी हैं
पर्णकुटी से महलों तक में रहते हैं
आशाओं के दीपक बन जलते हैं।

छटपटाहट

कहीं दूर से रौशनी आ रही थी
आसमान में बादलों के बीच तारें
मिट्टी के जर्रे-जर्रे में कसक थी
कमरे में बल्ब खमोशी के गीत गा रहे थे
वह दूर खड़ी कुकृत्य को देख रही थी
लब खामोश थे पलाश के पेड़ रो रहे थे
पत्तों की सरसराहट भय चित्र खींच रहे थे
बगल कमरे में लेटी माँ खाँस रही
पीड़ा, दर्द, कसक की आहटें हल्की-हल्की आ रही थीं
पेड़ों पर अपने घोसले में पंक्षी गहरी निद्रा में निमग्न थे
दरवाजे के कोने खड़ी शीतल छाया
अंदर के जलन से लपलपा रहे थे
अपनी गरज बाबली जबरदस्ती घसीटती रही
अफ़यूनी जुनूनी निर्णय से तन-वदन टूट रहा था
अफ़सोस, दिल गड्ढे में धँसता जा रहा था
स्त्री के समक्ष स्त्री का लूट लिया संसार
दम तोड़ दिए आह, सिसकी और लज्जता ने
नोटों की गड्डियाँ आँखों में लहरा रही थीं
नसों में दौड़ते खून पानी के शक्ल अख्तियार करते जा रहे थे
अय तेरी कुरबत, मनमाने सो कर ले
चक्कर काटती धरती घूम कर आ जायेगी दुबारा अपनी जगह
इस काया को छोड़ते ही एक नए छाया में अवतरित होते हुए
आस्मा में टिमटिमायेंगे
उड़ता गप्पा का उपहार देते हुए
कुछ गाँठे खोलते हुए चिंता की लकीरे घिर आईं
बादलों के आँचल न ढक सके
समाज के ताने में गूंथे व्यंगवाणों को।
(एक सच्ची घटना पर आधारित है।)