Archive for: July 2012

अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध जरूरी है: मैनेजर पांडेय

दिल्ली: ‘अपने समय में रामविलास शर्मा ने जिस तरह ब्रिटिश साम्राज्यवाद का सुसंगत विरोध किया, उसी तरह आज अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध बेहद जरूरी है।’ जन संस्कृति मंच द्वारा 22 जुलाई 2012 को साहित्य अकादमी सभागार में दो सत्रों में आयोजित प्रख्यात मार्क्‍सवादी आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा के जन्मशती आयोजन में बीज वक्तव्य देते हुए प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने यह कहा। उन्‍होंने कहा कि रामविलास शर्मा की आलोचनात्मक चेतना का विकास स्वाधीनता आंदोलन के साथ हुआ। 1857 का महासंग्राम, प्रेमचंद-निराला-रामचंद्र शुक्ल की आकांक्षाओं, प्रगतिशील आंदोलन और मार्क्‍सवादी विचारधारा- वे बुनियादी स्रोत हैं, जिनसे उनकी आलोचनात्मक दृष्टि निर्मित हुई थी। उनकी नवजागरण की धारणा बुनियादी तौर पर साम्राज्यवाद-विरोधी धारणा है। उन्होंने आजीवन इस साम्राज्यवादी प्रचार का विरोध किया कि अंग्रेज भारत का विकास करने आये थे या उनकी कोई प्रगतिशील भूमिका थी।

आयोजन की शुरुआत जबरीमल्ल पारख और सत्यकाम द्वारा इग्नू की ओर से रामविलास शर्मा के व्यक्तित्व, रचनाकर्म और विचारधारा पर बनाई गई फिल्म ‘अडिग यही विश्‍वास’ के प्रदर्शन से हुई। फिल्म रामविलास जी के सुपुत्र विजयमोहन शर्मा के सौजन्य से दिखाई गई।

इस अवसर पर रामविलास शर्मा के छोटे भाई रामशरण शर्मा जी ने हिरावल संस्था के कलाकारों द्वारा निर्मित प्रसाद, निराला, फैज, मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, वीरेन डंगवाल, दिनेश कुमार शुक्ल की कविताओं पर आधारित ऑडियो सीडी ‘जाग मेरे मन मछंदर’ का लोकार्पण किया।

‘साम्राज्यवाद-विरोधी आलोचक रामविलास शर्मा’ विषयक पहले सत्र में राँची, झारखंड से आये आलोचक प्रो. रविभूषण ने कहा कि जिन सवालों और समस्याओं को लेकर रामविलास जी ने वैचारिक संघर्ष किया, वे चाहते थे कि उन्हें याद करने के बजाय उन सवालों और समस्याओं पर विचार किया जाये। उन्होंने जो इतिहास लेखन और विवेचन किया, वह इतिहास निर्माण के लिये किया। भारत में सामंतवाद किस तरह साम्राज्यवाद का मुख्य आधार बना रहा है, इस पर उनकी पैनी निगाह थी। साम्राज्यवाद से संप्रदायवादी शक्तियों और सामंती अवशेषों के संबंध को उन्होंने बार-बार चिह्नित किया।

आलोचक मुरली मनोहर प्रसाद ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की क्रूरताओं और उसके खिलाफ भारतीय जनता के संघर्ष का विस्तार से जिक्र करते हुए कहा कि साम्राज्यवाद-विरोधी और सामंतवाद-विरोधी संघर्ष के लिहाज से रामविलास शर्मा के लेखन की प्रासंगिकता आज भी है। आक्रामक वित्तीय पूँजीवाद के खिलाफ देश के मजदूरों-किसानों में जो बेचैनी है, जिस व्यापक संघर्ष की सम्‍भावना है, उसमें रामविलास के विचार सहयोगी होंगे।

पहले सत्र की अध्यक्षता करते हुए इलाहाबाद से आए प्रो. राजेन्‍द्र कुमार ने कहा कि रामविलास जी का लेखन साम्राज्यवाद के खिलाफ एक प्रकार का सांस्कृतिक अभियान है। नवजागरण की मूल प्रतिज्ञा के रूप में साम्राज्यवाद-विरोध का जिक्र उन्होंने बार-बार किया। साम्राज्यवाद जिस देश में जाता है वहाँ भाषा, धर्म, जाति, संप्रदाय और क्षेत्र के आधार जनता को बांटता है, रामविलास जी हमेशा इस साम्राज्यवादी साजिश का विरोध करते रहे।

‘हिन्‍दी आलोचना में साम्राज्यवाद विरोध का समकालीन सन्‍दर्भ’ विषयक दूसरे सत्र में बनारस से आये प्रो. अवधेश प्रधान ने 1857 के संघर्ष को लेकर होने वाली वैचारिक बहसों का जिक्र करते हुए कहा कि उस वक्त साम्राज्यवाद ने भारत में जिस तबाही को अंजाम दिया, उससे सवर्ण और दलित दोनों समुदाय बर्बाद हुए। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में दलितों की भूमिका को सामने लाने की जरूरत पर बल दिया और कहा कि साम्राज्यवाद से दलितों की कभी भी मुक्ति सम्‍भव नहीं है। जिस तरह आधुनिकता के तर्क पर अंग्रेजी राज का समर्थन किया गया था, उसी तरह विकास के नाम पर आज अमेरिकी राज का समर्थन किया जा रहा है। आज स्वाधीनता संग्राम की महान उपलब्धियों को खारिज करने की कोशिश की जा रही है, जिसका जोरदार विरोध किया जाना चाहिए। रामविलास जी से इसकी हमें प्रेरणा मिलती है।

दूसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि रामविलास शर्मा की पूरी जिंदगी खुली किताब है। उनको पढ़कर ही नहीं, उन्हें देखकर भी लोग मार्क्‍सवादी हुए हैं। उनकी आलोचना या उनकी सीमाओं की चर्चा जरूर करनी चाहिए, पर इसके लिये उन्होंने जो लिखा है, उसे गंभीरता से पढ़कर ही ऐसा करना चाहिए। रामविलास शर्मा हिन्‍दी साहित्य के स्वर को साम्राज्यवाद-विरोधी बनाने वाले अग्रगण्य लेखक हैं। उन्होंने साम्राज्यवाद-विरोध को हिन्‍दी कविता का सौंदर्यबोध बना दिया।

वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल और युवा आलोचक अमिताभ राय, कवितेंद्र इंदु, शहबाज और बजरंग बिहारी तिवारी ने रामविलास शर्मा की आलोचनात्मक दृष्टि और सौंदर्यबोध को लेकर कुछ विचारोत्तेजक सवाल भी किये और खासकर दलित और स्त्री संबंधी उनकी धारणाओं को लेकर विमर्श किया।

संचालन युवा आलोचक गोपाल प्रधान ने किया। आयोजन में हरिसुमन बिष्ट, प्रेमपाल शर्मा, हरिपाल त्यागी, अशोक भौमिक, वीरेंद्र कुमार बरनवाल, आनंद प्रधान, प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, अली जावेद, अजेय कुमार, प्रेमशंकर, देवेंद्र चौबे, राधेश्याम मंगोलपुरी, अच्युतानंद मिश्र, सवि सावरकर, योगेंद्र आहूजा, कुमार मुकुल, एके अरुण, संतोष झा, समता राय, उदय शंकर, श्याम शर्मा, श्याम सुशील, संजय जोशी, भाषा सिंह जैसे साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों के अतिरिक्त दिल्ली विश्‍वविद्यालय, जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय और जामिया मिलिया विश्‍वविद्यालय के छात्र बड़ी संख्या में इस आयोजन में मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण ने सूचना दी कि जसम की ओर से आगरा, गोरखपुर, दरभंगा समेत देश के कई शहरों में रामविलास जी पर केंद्रित कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

सुधीर सुमन द्वारा जारी

आओ लंदन घूम आयें : चंद्रशेखर करगेती

पेशे से अधि‍वक्‍ता चंद्रशेखर करगेती का व्‍यंग्‍यात्‍मक आलेख-

9 नवम्बर 2000 को उत्तराखण्ड राज्य बना।अलग राज्य होने पर यहाँ के सभी विभाग व ऑफिसों की स्थापना नये सिरे से हुयी। भले ही आज उत्तराखण्ड उत्तरप्रदेश से अलग होकर एक पर्वतीय राज्य बन चुका है, लेकिन शुरू से लेकर आजतक अधिकांश योजनायें व कार्यप्रणाली उत्तरप्रदेश की तरह हैं । बुरा हाल तो सबसे ज्यादा राजनीतिज्ञों का है। आज अधिकतर वे लोग इस प्रदेश के भाग्यविधाता बने हुए हैं जो इस राज्य की मूलभाषा को ही नहीं जानते, जब राजनेताओं के हाल ये है तो अधिकारियों के तो माशाल्लाह। किसी को कर्नाटक से उठाकर कर लाया गया तो किसी को हैदराबाद से तो किसी को मुम्बई से। कुछ को तो अपना नया घर इतना रास आया कि अपने घर का रास्ता ही भूल गये । उत्तराखण्ड संभवत: देश का पहला ऐसा राज्य होगा जहाँ घर की मुर्गी दाल बराबर है, इस राज्य के मुखिया (राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों) ऐसे हैं जिन्हें यहाँ की बोली तक नहीं आती।

इन बारह सालों के दौरान हमारे प्रदेश में राज्य के बाहर से आयात किये गये उत्कृष्ट अधिकारियों ने मंत्रियों के साथ मिलकर कई स्कीमें ऐसी निकालीं जिन्हें पूरे देश में सराहा गया । इन नीतियों को लागू करने के लिये हमारे प्रदेश के मंत्री व अधिकारीगण बहुत बार विदेश यात्रा के लिये गये । इनमें कुछ यात्रा किसी सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये हुई हैं, तो बहुत सी यात्राएं विदेश में नयी चीजें समझने, सीखने व स्टडी करने के लिये की गईं । इन यात्राओं का उद्देश्य बाहरी दुनिया से कुछ सीख कर उस तकनीक का उपयोग प्रदेश की बेहतरी के लिये किया जाना था।

हर एक यात्रा में प्रदेश सरकार के लाखों रुपये खर्च होते हैं । हर एक यात्रा की जरूरत का पहले आंकलन किया जाता है कि इसकी आवश्यकता क्यों हैं ? इससे प्रदेश को तत्काल और दूरगामी, क्या लाभ होंगे ? इन यात्राओं में यह भी देखने की आवश्यकता होती है कि जो लोग प्रदेश सरकार की तरफ से जा रहे हैं, उनका ओबजर्वेशन कैसा है, तकनीकी ज्ञान कैसा है और आवश्यक बातों को समझने की और फिर यहाँ वापस आकर प्रदेश के लाभ के लिये उपयोग करने के लिये क्षमता कितनी है ?

प्रदेश हित के लिए शायद यात्रा से पहले उससे होने वाले फायदें की रिपोर्ट व उसकी जरूरत की रिपोर्ट व प्रतिनिधिमण्डल के सदस्यों की सक्षमता की रिपोर्ट बनायी गई होगी । वापसी के बाद उत्तराखण्ड  में कैसे नयी स्कीम लागू की जाये, इसकी रिपोर्ट भी दी गई होगी । शायद उन रिपोर्टों के अनुसार प्रदेश के बहुमुखी विकास के लिए कार्य भी किये होंगे और शायद बहुत विकास भी हो गया होगा !

बस यह दिखाई नही देता, अदृश्य है !

वैसे इस बारे में न तो कोई उच्च पदस्थ पूछता है और न ही कोई बताता है। हो  सकता है प्रदेश को अदृश्य लाभ कराने के लिए उन्हें भी विदेश यात्रा का मौका हाथ लगे ?

आजकल चर्चा है कि राज्य में ओलम्पिक स्तर के खिलाड़ी पैदा करने के लिये फिर राजनेताओं और अधिकारीयों का एक दल एक माह के लिये लंदन ओलम्पिक का टिकट कटवाने वाला है। अब इन अधिकारियों और मंत्रियों ने बचपन में भले ही गिल्ली-डंडा भी न खेला हो, पर इनसे पूछे कौन कि कौन से खेल में महारत हासिल है ? कितने ठो मेडल जीते हो भाई राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय खेलों में ? पर आज समझ में आ रहा है कि खिलाड़ी पैदा करने के लिये खुद का खिलाड़ी नहीं, राजनेता होना जरूरी है क्योंकि भारत भर में उससे बड़ा खिलाड़ी कौन ?

नेताजी की सहयोगी लक्ष्‍मी सहगल का नि‍धन

नई दि‍ल्‍ली : स्वतंत्रता सेनानी एवं आजाद हिंद फौज की रानी झांसी रेजीमेंट की कमांडर पद्मविभूषण कैप्टन डॉक्‍टर लक्ष्मी सहगल का 23 जुलाई, 2012 को निधन हो गया है। उनका कानपुर मेडिकल सेंटर में इलाज चल रहा था। वह 98 वर्ष की थीं। लक्ष्मी सहगल की इच्छा के अनुसार निधन के तत्काल बाद उनके नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी की गई। दिल का दौरा पडऩे पर पर उन्हें 19 जुलाई को भर्ती कराया गया था।

उनका जन्म 24 अक्टूबर, 1914 में मद्रास में हुआ था। उनका बचपन का नाम लक्ष्मी स्वामीनाथन था। उनके पिता एस. स्वामीनाथन मद्रास उच्‍च न्यायालय के जाने-माने वकील थे, लेकिन लक्ष्मी स्वामीनाथन ने गरीबों की सेवा के लिए डॉक्टरी का पेशा चुना और 1938 में मद्रास मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की।

वह 1940 में सिंगापुर गईं और खासकर भारतीय गरीब मजदूरों के इलाज के लिये वहाँ क्लिनिक खोला। नेताजी सुभाष चंद्र बोस जब दो जुलाई 1943 को सिंगापुर आये और आजाद हिंद फौज के महिला रेजीमेंट की स्थापना की बात की तो लक्ष्मी स्वामीनाथन ने खुद को आगे किया और लक्ष्मीबाई ब्रिगेड की कैप्टन बनीं। 1946 में उनका वि‍वाह कर्नल पीके सहगल के साथ हुआ।

कैप्टन लक्ष्‍मी सहगल ने 1971 में माकपा की सदस्यता ग्रहण की और राज्यसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने 2002 में राष्ट्रपति पद के लिये एपीजे अब्दुल कलाम के खिलाफ वामपंथी उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

वर्ष 1998 में उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया था। वह आजकल अपने डॉक्टरी पेशे में व्यस्त थीं और एक नर्सिंग होम चला रही थीं। वह जीवन भर गरीबों और मजदूरों के लिए संघर्ष करती रहीं।

रामवि‍लास शर्मा जन्‍मशती आयोजन 22 को

नई दि‍ल्‍ली : सुप्रसिद्ध आलोचक डॉक्‍टर रामविलास शर्मा(1912-2000) की जन्‍मशती के अवसर पर जन संस्‍कृति‍ मंच की ओर से 22 जुलाई, 2012 को साहित्य अकादमी सभागार, रवीन्द्र भवन, नई दि‍ल्‍ली में सुबह 10 बजे से वि‍शेष आयोजन कि‍या जा रहा है। कार्यक्रम में बीज वक्तव्य प्रोफेसर मैनेजर पाण्डेय का होगा।

पहला सत्र का वि‍षय है- साम्राज्यवाद-विरोधी आलोचक रामविलास शर्मा। इस सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार करेंगे। प्रोफेसर रविभूषण और प्रोफेसर मुरली मनोहर प्रसाद सिंह परि‍चर्चा में भाग लेंगे।

दूसरा सत्र दोपहर 1 बजे शुरू होगा। इसका वि‍षय है- हिन्दी आलोचना में साम्राज्यवाद विरोध का समकालीन सन्दर्भ। इस सत्र की अध्‍यक्षता वरि‍ष्‍ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी करेंगे। प्रोफेसर अवधेश प्रधान और प्रोफेसर नित्यानंद तिवारी परि‍चर्चा में भाग लेंगे।

दो ग़ज़लें : प्राण शर्मा

ब्रिटेन में बसे भारतीय मूल के हिन्‍दी लेखक प्राण शर्मा की दो गजलें-

1.

रहके अकेला इस दुनिया में करना सब कुछ हासिल प्यारे
मैं  ही जानू  कितना ज़्यादा  होता  है ये  मुश्किल प्यारे

प्यारे-प्यारे,  न्यारे-न्यारे  खेल-तमाशे सब के सब हैं
आ कि ज़रा तुझको दिखलाऊँ दिल वालों की महफ़िल प्यारे

मोह नहीं जीवन का तुझको, मान लिया है मैंने लेकिन
दरिया में हर डूबने वाला चिल्लाता है साहिल प्यारे

कुछ तो चलो तुझको अनजानी राहों की पहचान हुई है
कैसा रंज, निराशा कैसी पा न सका जो मंजिल प्यारे

सबकी बातें सुनने वाले अपने दिल की बात कभी सुन
तेरी खैर मनाने वाला तेरा अपना है दिल  प्यारे

कुछ तो कर महसूस खुशी को कुछ तो कर महसूस तसल्ली
कुछ तो आये मुँह पर रौनक कुछ तो हो दिल झिलमिल प्यारे

तेरे-मेरे रिश्ते-नाते ‘प्राण’  भला क्यों सारे टूटें
माना, तू मेरे नाकाबिल,  मैं तेरे नाकाबिल प्यारे

2.

दोस्ती  यूँ  भी तेरी  हम  तो निभायेंगे
मानोगे जब तक नहीं तुझको मनायेंगे

सुनते हैं,  बह जाती है सब मैल नफ़रत की
प्यार की गंगा में हम खुल कर नहायेंगे

कुछ भलाई जागी है हम में भी ए यारो
पंछियों को हम भी अब दाने खिलायेंगे

क्या हुआ जो बारिशों में ढह गयी यारो
राम  ने  चाहा  कुटी  फिर  से  बनायेंगे

हम फ़क़ीरों का ठिकाना हर जगह ही है
शहर से निकले तो जंगल ही बसायेंगे

आप  जीवन  में  हमारे  आके  तो देखें
आपको दिल में कभी सर पर बिठायेंगे

एक से रहते नहीं दिन ‘प्राण’  जीवन के
आज रोते हैं अगर कल मुस्करायेंगे

पहला आजमगढ़ फिल्म फेस्टिवल 14 से

नई दि‍ल्‍ली : प्रतिरोध के सिनेमा अभियान का यह 26वां और आजमगढ़ का पहला फिल्म फेस्टिवल 14 जुलाई को सुबह 11 बजे आजमगढ़ के नेहरू हाल में शुरू होगा। लेखिका और एक्टिविस्ट अरुंधति राय के वक्तव्य से इसकी शुरुआत होगी।

फिल्म फेस्टिवल में अपनी फिल्मों के साथ दिल्ली से संजय काक व अनुपमा श्रीनिवासन और भुवनेश्‍वर से सूर्यशंकर दाश हिस्सा लेंगे। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की पहली डाक्यूमेंटरी ‘खामोशी’, जो कि पूर्वांचल में महामारी की तरह कायम इन्सेफेलाइटिस बीमारी से सम्बंधित है, भी दिखाई जायेगी।

इस फेस्टिवल में छोटी-बड़ी 15 फिल्मों के अलावा अशोक भौमिक द्वारा प्रगतिशील भारतीय चित्रकारों के चित्रों की प्रदर्शनी ‘जन चेतना के चितेरे’ और अजय जेतली और अंकुर द्वारा तैयार विश्‍व सिनेमा की 11 कालजयी फिल्मों के पोस्टरों की प्रदर्शनी भी दिखाई जायेगी। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी भी डीवीडी और किताबों की बिक्री के लिये अपना स्टाल लगायेगी। फेस्टिवल के दूसरे दिन  सुबह 11 बजे से लेकर 1 बजे तक बच्चों के लिये एक छोटी और एक फ़ीचर फिल्म दिखाई जायेगी। इस मौके पर अशोक भौमिक  के उपन्यास ‘ शिप्रा एक नदी का नाम है’ का लोकार्पण भी होगा।  फेस्टिवल में शिरकत करने के लिए किसी भी तरह के औपचारिक आमन्त्रण की जरूरत नहीं है।

अधि‍क जानकारी के लि‍ये सम्‍पर्क करें- संजय जोशी,  संयोजक, प्रतिरोध का सिनेमा का राष्ट्रीय अभियान, जन संस्कृति मंच
मोबाइल नम्‍बर- 9811577426, ईमेल- thegroup.jsm@gmail.com

‘कवि के साथ’ का आयोजन 8 जुलाई को

नई दि‍ल्ली  : इंडिया हैबिटैट सेंटर द्वारा शुरू की गई काव्य-पाठ की कार्यक्रम-श्रृंखला ‘कवि के साथ’ का पाँचवा आयोजन 8 जुलाई 2012 को शाम 7 बजे से गुलमोहर हॉल, इंडि‍या हैबि‍टैट सेंटर लोधी रोड, नई दि‍ल्ली में कि‍या जायेगा। इस बार वरिष्ठ कवि असद जैदी के साथ  गिरिराज किराडू और  सुधांशु फिरदौस काव्यपाठ करेंगे।
कवि और कविता से कविताप्रेमी हिन्दी  समाज का सीधा सम्पर्क-सम्वाद बढ़े, यही इस आयोजन का उद्देश्य है। इसमें हर बार हिन्दी कविता की तीन  पीढ़ियाँ एक साथ काव्यपाठ करती हैं। पाठ के बाद श्रोता उपस्थित कवियों से सीधी बातचीत करते हैं।
इस बार के तीनों कवि‍यों की एक-एक कवि‍ता-

नामुराद औरत/असद जैदी

नामुराद औरत
रोटी जला देती है

बीस साल पहले किसी ने
इसकी लुटिया डुबो दी थी
प्यार में

नामुराद औरत के पास
उस वक़्त
दो जोड़ी कपड़े थे

नामुराद औरत भूल गई थी
दुपट्टा ओढ़ने का सलीक़ा
नामुराद औरत की
फटी थी घुटनों पर से शलवार

इतने बरस बीत गये
बेशरम उतनी ही है
बेशऊर उतनी ही है

अब तो देखो इसकी
एक आँख भी जा रही है

टूटी हुई बिखरी हुई पढ़ाते हुए/गिरिराज किराडू

एक प्रतिनियुक्ति विशेषज्ञ की हैसियत से
(मानो उनके कवियों का कवि हो जाने को चरितार्थ करते हुए)

लगभग तीस देहाती लड़कियों के सम्मुख
होते ही लगा शमशेर जितना अजनबी कोई और नहीं मेरे लिये
मैंने कहा कि उनकी कविता का देशकाल एक बच्चे का मन है
कि उनके मन का क्षेत्रफल पूरी सृष्टि के क्षेत्रफल जितना है
कि उनकी कविता का खयालखाना है जिसके बाहर खड़े
वे उसे ऐसे देख रहे हैं जैसे यह देखना भी एक खयाल हो
कि वे उम्मीद के अज़ाब को ऐसे लिखते हैं कि अज़ाब खुद उम्मीद हो जाता है
कि उनके यहाँ पाँच वस्तुओं की एक संज्ञा है और पाँच संज्ञाएं एक ही वस्तु के लिये हैं

अपने सारे कहे से शर्मिन्दा
इन उक्तियों की गर्द से बने पर्दे के पीछे
कहीं लड़खड़ाकर गायब होते हुए मैंने पूछा
अब  आपको कविता समझने में कोई परेशानी तो नहीं ?
उनका जवाब मुझे कहीं बहुत दूर से आता हुआ सुनाई दिया
जब मैं जैसे तैसे कक्षा से बाहर आ चुका था और शमशेर से और दूर हो चुका था।

वह जुलाई थी या अगस्त/सुधांशु फिरदौस

वह जुलाई थी या अगस्त

ठीक ठीक याद नहीं हैं
बस इतना याद है
बारिश हो रही थी
और सर पे धान के बिचरों का बोझा उठाये
घुटनों तक डूबी वह भीग रही थी

सर पे धान के हरे-हरे बिचरों का बोझा
पांक से लिथड़ी उसकी सुगरपंखी फ्रॉक
नाक में तार की मुडी हुई नथुनी
और मेह गिर रहा था हम दोनों के बीच

वह रोपनी का आखिरी दिन था
उसके बाद छोड़ आया सिंगाही
छोड़ आया अपनी बोली
छोड़ आया अपना पानी
छोड़ आया वहीं चौर के शीशम के पेड़ से टंगी अपनी कमीज़

कैलेंडर में साल बदले हैं स्कूल और कॉलेज बदले हैं
बदले हैं शहर फटे बनियानो की तरह
जीता रहा हूँ अपने ही देश में विस्थापितों की तरह
जिन्दगी में आई है लडकियाँ
जैसे आती हैं बरसाती नदियाँ
छप्पर तक बहा के ले गयी हैं
फिर भी बची रह गयी है माँ की दी हुई चूड़ियाँ

उलझा रहा हूँ किताबों के मकड़जाल में
रटता रहा हूँ गणित के दुर्लभ प्रमेओं को
सोचता रहा हूँ आदमी को गुलाम बनाने वाले अल्गोरिथमो के बारे में
टावर ऑफ़ हनोई के बारे में
यूलेरियन सर्किट के बारे में
हेमिल्टोनियन ग्राफ के बारे में
आज ऑफिस से जब घर लौटा हूँ
अकेले बंद कमरे का दरवाजा खोला हूँ
बिस्तर पे लेट के जैसे हीं आँखे बंद की हैं
तो ऐसा लग रहा है
सर पे धान के बिचरों का बोझा उठाये वह अब भी भीग रही है
और शीशम के पेड़ से टंगी वह कमीज़ अब भी वहीं हिल रही है