Archive for: June 2012

रामकृष्ण मणि का जसम की श्रद्धांजलि‍

इलाहाबाद : लखनऊ के सहारा अस्पताल में 25 जून को प्रोफेसर रामकृष्ण मणि त्रिपाठी का निधन हो गया। साम्प्रदायिकता और साम्राज्यवाद के खिलाफ जन-आन्दोलनों की एक सशक्त बौद्धिक आवाज़ हमारे बीच अचानक खामोश हो गयी। 23 मार्च को गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में प्रतिरोध के सिनेमा पर उनका उद्बोधन सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी अंतिम उपस्थिति के बतौर लोगों की स्मृति में दर्ज रह जायेगा।

2 नवम्बर, 1929 को जन्मे प्रोफेसर त्रिपाठी आजमगढ़ जनपद के मूल निवासी थे जहां शिबली कॉलेज से इंटरमीडियट तक की शिक्षा लेने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिये इलाहाबाद आये। इलाहाबाद में वह कम्यूनिस्ट पार्टी के भूतपूर्व महासचिव पी.सी. जोशी के सम्‍पर्क में आये और स्टूडेंट फेडरेशन की सदस्यता के रास्ते होते हुये भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य भी हो गये। राजनीति विज्ञान के मेधावी विद्यार्थी वह थे ही जिसके चलते उन्हें सन् 52-54 में इलाहाबाद विश्‍ववि‍द्यालय में अध्यापन का अवसर मिला, लेकिन उस समय सरकार की कम्यूनिस्ट-विरोधी मुहि‍म के चलते विश्‍ववि‍द्यालय में उनकी नौकरी स्थायी नहीं हो सकी। कुछ ही दिनों बाद वह सी.एम.पी. डिग्री कॉलेज में स्थायी प्रवक्ता नियुक्त हुये। 1958 में गोरखपुर विश्‍ववि‍द्यालय खुला जहाँ वह राजनीति-विज्ञान विभाग में असिस्टैंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुये और सेवानिवृत्ति तक वह वहीं रहे। गोरखपुर ही उनका स्थायी आवास और बौद्धिक कर्मभूमि बना। प्रोफेसर त्रिपाठी न केवल राजनीतिक विचारों के इतिहास के अत्यंत लोकप्रिय शिक्षक थे, बल्कि छात्रों और बौद्धिकों के बीच सार्वजनिक जीवन में सकारात्मक हस्तक्षेप के रोल-मॉडल भी थे। वह यह मानते थे कि लोकतंत्र की हिफाज़त के लिये लगातार जनता के बुनियादी सवालों पर जन-आन्दोलन होते रहने चाहिये। गोरखपुर और पूर्वी उत्तर-प्रदेश के ऐसे बहुतेरे आन्दोलनों में वह प्रत्यक्ष भागीदारी भी करते थे, चाहे वह बन-टांगिया मज़दूरों के विस्थापन का सवाल हो या पूरे अंचल में साम्प्रदायिकता के उफान का विरोध करने का मसला हो। लम्बे समय से पूरे अंचल में मानवाधिकार, लोकतंत्र, भ्रष्टाचार-विरोध, साम्प्रदायिकता और साम्राज्यवाद-विरोध की कोई भी बौद्धिक पहलकदमी उनके बगैर शायद ही संपन्न होती रही हो। वह ऐसे हर आयोजन में अनिवार्य उपस्थिति रहते थे। कम्युनिस्ट पार्टी की आतंरिक बहसों के कारण पार्टी सदस्यता छोड़ देने के बाद भी लगातार वामपक्षीय विचारों और जन-आन्दोलनों के साथ रहे। गाँधी के लोक-सम्‍पर्क और जन-जागरण के भी वह कायल थे। दर्शन,  राजनीति-शास्त्र और साहित्य के गम्‍भीर अध्येता होने के साथ-साथ वह तमाम समाज-विज्ञानों की नवीनतम शोधों के प्रति जागरूक विद्वान थे। जीवन के आखिरी दिनों तक नौजवानों से उनकी दोस्ती, बहस-मुबाहिसे कभी ख़त्म नहीं हुये। एक सच्चे बौद्धिक की तरह वह खुले दिल-दिमाग के साथ ही आन्दोलनों और गोष्ठियों में शिरकत करते थे और अपनी बातें बगैर लाग-लपेट के लोगों के समक्ष रखते थे।

वर्ष 2003 में जब योगी आदित्यनाथ की साम्प्रदायिक मुहि‍म के खिलाफ लोग बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे, उन्होंने पीपुल्स फोरम जैसी संस्था के संस्थापक अध्यक्ष बनकर योगी और उनकी साम्प्रदायिक कार्रवाइयों का सार्वजनिक विरोध किया। पिछले दिनों अन्ना आन्दोलन के समर्थन में भारी जुलूस में वह ‘वाकर’ के सहारे चलते हुए शामिल हुये। ये उनकी दुर्घर्ष प्रतिबद्धता का ही प्रमाण था। लेकिन वह समर्थन भी आँख मूँद कर नहीं करते थे। अन्ना आन्दोलन का समर्थन करते हुये भी उन्होंने उसके कई तौर-तरीकों और विचार-दृष्टि की आलोचना सार्वजनिक तौर पर की।

जन संस्कृति मंच की पहल पर प्रतिरोध के सिनेमा के फेस्टिवल की जो मुहीम गोरखपुर से चलकर अब कई राज्यों तक सार्थक सिनेमा की मुहि‍म के बतौर फ़ैल चुकी है, उसके संरक्षक, प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक प्रोफेसर त्रिपाठी शुरू से लेकर मृत्यु-पर्यंत बने रहे। बगैर किसी स्पांसरशिप के, जनता के सहयोग के भरोसे सिनेमा के ज़रिये प्रगतिशील मूल्यों के प्रचार के वह सूत्रधार रहे। साहित्य में प्रेमचंद और सिनेमा में चार्ली चैपलिन उनके आदर्श थे। पिछले एक दशक में उन्होंने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के कई कार्यक्रमों में शिरकत की।

आज जब वह नहीं हैं  तो उनकी कमी हमें बराबर खलेगी। इस विरले जनपक्षधर बुद्धि‍जीवी को जन संस्कृति मंच का सलाम। हम उनके परिजन, छात्र और ढेरों चाहने वालों के दुःख में शरीक हैं। वह हमें सदा याद रहेंगे।

(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)

उपेन्द्र कुमार की कवितायें मन और बुद्धि को छूती हैं : मैनेजर पांडेय

काव्य पाठ करते उपेन्द्र कुमार। साथ में मैनेजर पांडेय।

नई दि‍ल्‍ली : कवि उपेन्द्र कुमार की कविता की बनावट और उनके विषयों में विविधता है। अपनी सहजता और संवेदनशीलता से वह केवल मन को ही नहीं, बुद्धि को भी छूती हैं। प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पांडेय ने यह विचार 15 जून 2012 को इंडियन सोसायटी ऑफ ऑथर्स के मासिक कार्यक्रम ‘मैं कौन हूँ’ में उपेन्द्र कुमार की कविताओं पर टिप्पणी करते व्यक्‍त किये। वह इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुए इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उपेन्द्र कुमार की कविता में ग्रामीण जीवन की झलक और व्यंग्य की धार उसे और तीखा कर देती है। उनकी कविताओं पर नागार्जुन और भवानी प्रसाद मिश्र, दोनों के प्रभावों को महसूस किया जा सकता है।

इससे पहले कवि और व्यंग्यकार उपेन्द्र कुमार ने अपनी लेखन यात्रा पर चर्चा करते हुआ कहा की मैं अपने लेखन में भोजपुरी समाज को पुनर्जीवि‍त करना चाहता हूँ। इस समाज की दीनता, करुणा और पौरुष की समझ ने मेरी कवि दृष्टि को निरंतर विकसित और समृद्ध किया है। अपने प्रारंभि‍‍क कविता लेखन, कविताओं की वापसी और अपने पहले कविता संग्रह ‘बूढ़ी जड़ों का नवजात जंगल’ के लिये अज्ञेय, अमृता प्रीतम और भवानी प्रसाद मिश्र से दो शब्द लिखवाने के मर्मस्पर्शी संस्मरण सुनाते हुए उन्होंने अपनी कविताओं ‘सत्तू’, राजनीतिक व्यंग्य की कवितायें ‘खेल’, ‘संसद’, ‘पूछ मत लेना’, ‘बांकेलाल’ आदि सुनाईं। श्रोताओं के अनुरोध पर अंत में कुछ छोटी-छोटी कई प्रेम कवितायें भी प्रस्तुत कीं।

1947 में बिहार के बक्सर में जन्में उपेन्द्र कुमार का पहला कविता संग्रह 1980 में प्रकाशि‍त हुआ। तब से अब तक आपके सात कविता संग्रह और दो गज़ल संग्रह आ चुके हैं। हिन्‍दी अकादमी, दिल्ली के कृति और साहित्यकार सम्मान से सम्मानित उपेन्द्र कुमार कहानी और समीक्षा लेखन में भी सक्रिय हैं।

कार्यक्रम का संचालन सोसायटी ऑफ ऑथर्स के अध्यक्ष दिनेश मिश्र ने किया व अन्य व्यवस्थाओं का प्रबंध सचिव विवेक गौतम ने किया। कार्यक्रम में गंगाप्रसाद विमल, मदन कश्यप, वीरेन्द्र वरनवाल, भारत भारद्वाज, कमल कुमार आदि‍ उपस्थित थे।

प्रस्तुति: अजय कुमार शर्मा

बबन पाण्डेय की तीन कवि‍तायें

बबन पाण्डेय

सिविल इंजीनियरिंग  में स्नातक बबन पाण्डेय की पहली कविता ‘मन का दर्द’ 1980 में पटना से प्रकाशित पत्रिका ‘पहुँच’  में प्रकाशि‍त हुई। वि‍भि‍न्न पत्र-पत्रि‍काओं में उनकी कई कवि‍तायें प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। बिहार सरकार के जल-संसाधन विभाग में सहायक अभियंता बबन पाण्डेय की तीन कवि‍तायें-

ओ मेघ ! तू  बरस

ओ मेघ ! तू  बरस
घनघोर बरस
तू उनके लिये  बरस
जिनके कुएँ
सरकारी पन्नों पर बने हैं।

ओ मेघ ! तू बरस
घनघोर बरस
फाड़  दे
जनता के कान पर जमे
भाषणों और आश्वाूसनों की काई को।

ओ मेघ ! तू बरस
घनघोर बरस
इतना बरस
टूट जाये तटबंध नदियों के
खोल दे पोल
इंजीनि‍यरों और ठेकेदारों की मिलीभगत की।

विटामिन की गोलियाँ

आज नहीं रुक रही थी
फाइल पर उनकी कलम
नहीं खोज रही थी
उनकी आँखें
सेल्फ पर रखे
सरकारी नियमों की किताब
पैर में मानों
लग गये हों पहिये।

मैंने भी खाई है
विटामिन की गोलियाँ
मगर उसमे नहीं होती
नोटों की गड्डि‍यों जैसी ऊर्जा।

हँसने  के पीछे का राज

हँसी नहीं आ रही है
कई सालों से मुझे
भूल गया हूँ
कब हँसा था खिलखिलाकर पिछली बार।

हास्य-क्लब ज्वाइन किया
वहाँ तो लोग
हँसते कम हैं
दाँत निपोरते ज्यादा हैं।

सम्बन्धियों के यहाँ गया
सोचा हँस लेंगे सब मिलकर
मगर
हँसी नाम की चिड़ियाँ उड़ चुकी थी।

हँस कर स्वागत करते हैं
दुकानदार, जब सामान खरीदता हूँ
एजेंट, जब पालिसी लेता हूँ
गर्ल फ्रेंड, जब पार्टी लेती है
पत्नी, जब गहने खरीदना हो
मित्र, जब उधार लेना हो।

क्या हँसी
अब व्यवसाय बन चुकी है।

ग़ज़ल-गायकी के मीर

मेहंदी हसन ( 18 जुलाई 1927- 13 जून 2012)

बादशाह-ए-ग़ज़ल मेहंदी हसन को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि-

18 जुलाई 1927 को  राजस्थान  के  झुंझनू  जिले  के  लूणा  गाँव  में  मेहंदी  हसन  पैदा  हुए।  मेहंदी साहब  का  बचपन  तंगहाली  में  गुजरा  पर  संगीत  के  मामले  में  वह  शुरू  से  ही  धनी  रहे। उनके  परिवार  की पन्द्रह  पीढियाँ  संगीत  से  जुडी़  थीं।  संगीत  की  शुरुआती  तालीम  उन्होंने  अपने  पिता  उस्ताद  अजीमखान  और  चाचा  उस्ताद  इस्माइल  खान  से  ली।  दोनों  बढ़िया  ध्रुपदिये  थे। बँटवारे  की  टीस  उन्हें  हमेशा ही  सालती  रही। अपनी  जमीन  से  विस्थापित  मेहंदी  साहब  का  परिवार  पाकिस्तान  चला  गया। पाकिस्तान  जाने  के  बाद  जिन्‍दगी  चलाने   के  लिये  उन्हें  काफी  मेहनत  मशक्कत  करनी  पड़ी। पर जिन्‍दगी चलती रही।

1957 से 1999  तक  गज़ल  के  इस  महान  फनकार  ने  ग़ज़ल-गायकी  के  प्रतिमान  स्थापित  किये और हमारे  उप-महाद्वीप  में  विकसित  इस  महान  साहित्यिक  विधा  को  लोकप्रियता  के  चरम  तक पहुँचाया।  उन्होंने   सार्वजनिक  स्तर  पे   पिछले  12 वर्षों  से  गाना  छोड़  दिया  था।  उनका  आख़िरी  अलबम  2010 में  ‘सरहदें’  नाम  से  आया  था ।  यह  लता  मंगेशकर  के  साथ  उनका  युगल  अलबम  था।  84 बरस  की  उमर  में  13 जून 2012  को  उनका निधन हो गया।  इस  महान  कलाकार  को  जसम  की श्रद्धांजलि !

मरुभूमि में बहुधा बहुत  चटख रंग के फूल  खिलते हैं।  मेहंदी साहब की गायकी भी  ऐसी  ही  थी।  जब वह  बात  करते थे  तो  एक  शाइस्ता  राजस्थानी  आदमी  का  बोल –चाल  का  लहज़ा  दिखता  था।  पाकिस्तान में  बसने  के  छह  दशक  बाद  भी  पंजाबी  के  वर्चस्व  ने   उनके  व्यक्तित्व  के  किसी  भी  हिस्से  को  प्रभावित नहीं  किया  था।  न  तलफ्फुज  को,  न  लहजे  को  और  न  वेश-भूषा  को  ही। रहते  भी  वह  कराची  में  थे,  जहाँ आम-तौर  पर  मुहाजिर  रहते  आये  हैं।  ध्रुपदिये  पुरखों  के  साथ-साथ  मरुभूमि  के  विराट  विस्तार  में फैलता   ‘पधारो  म्हारे  देस’ में  मांड   का  दुर्निवार  स्वर  उन्हें  बार-बार  अपनी  जन्मभूमि  की  और  खींचता था।  क्लासकीय  के  साथ-साथ  लोक  की  राग-रागिनियाँ  भी  उनकी  गायकी  के  अहसास  में  शामिल  रहीं।

मेहंदी  हसन  ने  जिस  दौर  में  गाना  शुरू  किया,  वह 1950 का  दशक  उस्ताद  बरकत  अली,  बेगम अख्तर  और  मुख्तार  बेगम  जैसों  का  था।  गज़ल  गायकी  के  इन  धुरंधरों  के  सामने  अपनी  जगह  बना पाना  काफी  मुश्किल  था।  पर  मेहंदी  साहब  के  पास  कुछ  और  था, ध्रुपद  की  तालीम  और  ग़ज़लों  का बेशकीमती  खजाना।  यह  थोड़ा  मुश्किल  जोड़  था।  ध्रुपद  की  बंदिशों  से  एकदम  अलग  गज़लें  ख्याल  की बंदिशों  के  रूप  में  इस्तेमाल  होती  रही  हैं।  मेहंदी  साहब  ने  अपनी  ध्रुपद  विरासत  के  आधार  पर  गज़ल गायकी  की  नयी  आवाज़  विकसित  की।  बेगम  साहिबा  गज़ल  की  उस  परम्परा  से  आती  थीं,  जो  मुग़ल दरबार  और  दीगर  रियासती  दरबारों   से  निकली-बढ़ी  थी।  वह  गज़ल  की  ख्याल  गायकी  के  शीर्ष  का प्रतिनिधित्व  करती  थीं।  मेहंदी  साहब  कहा  करते  थे  कि  जिस  गज़ल  को  बेगम  साहिबा  ने  छू  लिया,  उसे गाने  का  कोई  मतलब  नहीं।   उनके  प्रिय  शायर  मीर  थे।  मीर  की  शायरी  जैसी  ही  क्लासिकीयता  उनके गायन  में  भी  आपको  मिलेगी।  मीर  की  ही  तरह  मेहंदी  हसन  ने  लोकप्रिय  और  शास्त्रीय  के  बीच  की दीवार  गिरा  दी।  वह  खासपसंद  भी  हैं  और  आमपसंद  भी।  फिल्मों  के  लिये  उनकी  गायी  गयी  ढेरों  गज़लें इसका  सबूत  हैं।

जब शायरी और गायकी की दो विधाएं मिलती हैं, तो एक अद्भुत कीमियागरी होती है। लिखी गयी ग़ज़लों को पढ़ना हमेशा ही उनके अर्थ को महदूद कर देता है। रिवायती ऐतबार से ग़ज़ल  ‘कही’ जाती है,  उसका सम्बन्ध   ‘वाचिक’ से रहा,  भले ही मुद्रण के साथ वो छपे अक्षरों में भी अपने जलवे बिखेरती रहीं। मेहंदी हसन ने मौसीकी के ज़रिये सुननेवालों को अहसास कराया कि उसके कहे जाने में क्या जादू रहा होगा और है। वह शर्तिया ग़ज़ल का काव्यशास्त्र जानते थे, उसकी तालीम उनकी भले ही औपचारिक न रही हो। अकेले वह ही थे जो गाते वक्त ये विवेक रख सकते थे कि अगर किसी ग़ज़ल के भाव संश्‍लि‍ष्‍ट हैं , तो उसका मुख्य भाव क्या है और कौन से भाव अंडरटोन में हैं। जब मीर की ग़ज़ल ‘आके सज्जादा-नशीं कैस हुआ मेरे बाद’ हम मेहंदी साहेब से सुनते हैं, तभी ये समझ में ज़्यादा आता है कि इश्क के विषाद से भी ज़्यादा इस ग़ज़ल में इश्क के मैदान में ‘मीर’ होने का भाव अव्वल है। ‘खुदी’ को बुलंद करना अहम है। मेहंदी साहब की अदायगी में ‘इश्क के मैदान में बादशाहत’ की मीर की दावेदारी सम्पूर्ण अभिव्यक्ति पाती है।

ग़ज़लों को सुनना श्रोता को गायन के सहारे अर्थ की और गहरी और विस्तृत दुनिया तक ले जाता है। सलीम कौसर की एक गज़ल ‘मैं ख्याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है/ सरे आइना मेरा अक्स है पसे आइना कोई और है’ को मेहंदी हसन ने भैरवी ठाठ में गाया है। जब मेहंदी साहब इसे अदा करते हैं तो बेहद सीधी-सादी दिखने वाली गज़ल इंसान के ऐतिहासिक संघर्षों का बयान बन जाती है। मानवीय संघर्षों के बावजूद हकीकतें ‘मेरा जुर्म तो कोई और था, ये मेरी सज़ा कोई और है’ की हैं। मेहंदी साहब ने इस गज़ल को अदा करने के लिये उदास भाव वाला भैरवी ठाठ चुना जो कि पूरी गज़ल की अदायगी में साफ़ है। पर एक बड़े गायक की तरह वे इस भैरवी ठाठ की उदासी को अकेला नहीं छोडते। मक्ते के शेर ‘जो मेरी रियाजाते नीम शब् को सलीम सुबहो न मिल सके’ में आयी सुबह को वे सुबह के राग में गाते हैं। शास्त्रीय संगीत के ठेठ बंधों-उपबंधों के लिहाज से यह भले ही ठीक न हो, पर सुनने वाला इस उदास गज़ल के भीतर एक सुबह का तसव्वुर कर लेता है। परवीन शाकिर की गज़ल ‘कू ब कू फ़ैल गयी बात शनासाई की’  (दरबारी) भी इसी तरह की एक गज़ल है जिसे मेहंदी साहब ने अद्भुत स्वर और अर्थ दिये। ‘रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ’  (कल्याण) जैसी गज़ल की अपनी अदायगी से उन्होंने उसके रूमानी और राजनीतिक दोनों अर्थों को बखूबी खोल दिया। किस ग़ज़ल की अदायगी में किस राग का आधार लेना है, इसे मेहंदी साहब ग़ज़ल के मानी के तर्क से चुनते थे। वह बता सकते थे कि ‘प्यार भरे दो शर्मीले नैन’ को राग काफी में या  ‘ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं’ को भीमपलासी में या, ‘कोंपलें फिर फूट आईं’ को मेघ में, ‘एक बस तू ही नहीं’ को मियाँ की मल्हार में या ‘शोला था जल बुझा हूँ’ को किरवानी में गाना उन्हें क्यों ठीक लगा। कभी-कभी इंटरव्यू में वे बताते भी थे।

उन्होंने हज़ारों सालों से प्रचलित राग-रागिनियों मालकौस, दरबारी, यमन, भैरवी,  मल्हार आदि का निचोड़ लेकर ग़ज़ल के शब्दों की ढेरों अर्थ-छवियों की अदायगी जिस तौर पर की,  वैसा पहले कभी न हो पाया था। ये हुनर उन्हें इस कदर सिद्ध था की कई दफा बगैर कम्पोजीशन पहले से बनाए वह सिर्फ राग सोच लेते थे और गाते हुए तर्ज़ आपसे आप बनती जाती थी।

उन्होंने माजी के महान शायरों मीर, ग़ालिब से लेकर अपने समकालीनों फैज़, फ़राज़, शहजाद और परवीन शाकिर तक को गाया, लेकिन मिजाज़ और तबीयत के लिहाज से उनका जैसा रिश्ता मीर से बना वैसा शायद ही किसी और से। लोगों का ख्याल है की ग़ालिब में वह वैसा नहीं रम पाये, लेकिन इसका क्या कीजिएगा की ग़ालिब की एक ग़ज़ल ‘अर्जे-नियाज़ इश्क के काबिल नहीं रहा, जिस दिल पे नाज़ था, वो दिल नहीं रहा’ बहुतों ने गायी, लेकिन उस ग़ज़ल के भाव के साथ न्याय सिर्फ मेहंदी कर पाये।

फैज़ साहब ने जब ग़ज़ल कहने की एक अलग राह निकाली तो मेहंदी साहेब की गायकी ने ही उसकी विशेषता को सबसे पहले पकड़ा। यह अकारण नहीं कि जिस ग़ज़ल से सबसे पहले मेहंदी साहेब को मकबूलियत हासिल हुयी वह ‘गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ बहार चले’ थी। फ़राज़ की अलग तेवर की रूमानी गज़लों की ख्याति के पीछे मेहंदी साहेब की अदायगी की भी करामात ज़रूर थी।

मेहंदी साहब का आख़िरी वक्त तंगहाली में गुजरा। उनका बेहतरीन इलाज नहीं हुआ। भारत-पाकिस्तान और बांग्लादेश, तीनों मुल्कों की सरकारों को इस पर शर्म आनी चाहिये। उनका भारत में इलाज के लिये आना जैसा मुद्दा बनाया गया, वह अफसोसनाक था। नेता-उद्योगपति और धनियों-मानियों के लिये यह सीमा कभी रोक नहीं बनी पर कलाकार के लिये वीजा-पासपोर्ट के अनंत झंझट थे। तीनों मुल्कों को अपनी आवाज़ के धागे से गूँथता यह फनकार आज हमारे बीच नहीं है पर उसकी आवाज अभी भी इन मुल्कों के आम-अवाम के दिलो-दिमाग में गूँज रही है।

मेहंदी साहेब को सुनने वालों की ज़िंदगी में वह शामिल थे। वे सुनने वाले तमाम लोग राग-रागिनियों की बारीकियाँ भले न जानते हों, लेकिन हर सुनने वाले के पास मेहंदी साहेब के सुरों के संस्मरण हैं। मेहंदी साहेब की गायकी उनके दुखों, उनकी खुशी, उनके संघर्षों में साथ निभाती है, सिर्फ मनोरंजन नहीं करती, ज़िंदगी की तमीज विकसित करने में सहयोग करती है। कोई भी कला इससे ज़्यादा और क्या कर सकती है?

पाकिस्तान के निजाम ने भले ही उन्हें कितने ही तमगों से नवाज़ा हो, उन्होंने व्यवस्था-विरोधी शायरों को गाना कभी बन्‍द नहीं किया। सामंती-फ़ौजी-धार्मिक- पूँजीवादी हुकूमतें जिन जज्बातों को प्रतिबंधित करना अपना फ़र्ज़ समझती हैं, मेहंदी उन्हीं जज्बातों के अनोखे अदाकार थे। उनकी सुरीली ज़िंदगी इस बात की गवाह है की नागरिकता (जो की किसी राष्ट्र की होती है) सभ्यता की स्थानापन्न नहीं होती।

(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच की और से जारी )

कथाकार अरुण प्रकाश को जसम की श्रद्धांजलि

नई दि‍ल्‍ली : हिन्‍दी के वरिष्ठ कथाकार अरुण प्रकाश का 18 जून, 2012  को दिल्ली के पटेल चेस्ट अस्पताल में लम्‍बी बीमारी के बाद निधन हो गया। बिहार के बेगूसराय में 22 फरवरी 1948 को जन्में अरुण प्रकाश अपने प्रगतिशील-जनवादी लेखन के लिये हमेशा प्रासंगिक बने रहेंगे। ‘भैया एक्सप्रेस’, ‘जल प्रांतर’, ‘मझधार किनारे’, ‘लाखों के बोल सहे’, ‘विषम राग’ और ‘स्वप्न घर’ जैसे कहानी संग्रहों के लेखक अरुण प्रकाश का उपन्यास ‘कोंपल  कथा’ और कविता संकलन ‘रात के बारे में’ भी चर्चित रहे। रोजगार के पलायन करने वाले बिहारी मजदूरों के जीवन संघर्ष पर केन्‍द्रि‍त उनकी कहानी ‘भैया एक्सप्रेस’ हो या उत्तर बिहार में बाढ़ की विभीषिका के बहाने पूरे समाज और व्यवस्था के अंतविर्रोधों और उसमें मौजूद द्वंद्वों को अभिव्यक्त करने वाली कहानी ‘जल प्रांतर’ हो, ये उनके प्रतिबद्ध लेखन की मिसाल हैं। उनकी रचनाओं में आम मेहनतकश लोगों के दुख-दर्द और समस्याओं को अभिव्यक्ति मिली।

सत्तर के तूफानी दशक में जिन नौजवान लेखकों ने साहित्य को सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन का माध्यम बनाया, अरुण प्रकाश उनमें से एक थे। बिहार में नवजनवादी सांस्कृतिक मोर्चा के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वह जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय परिषद में भी रहे।

अरुण प्रकाश कुछ वर्षों तक अध्यापन और पत्रकारिता से जुड़े रहने के बाद स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य करते रहे। उन्होंने अंग्रेजी से हिन्‍दी में विभिन्न विषयों की आठ पुस्तकों का अनुवाद किया। वह ‘चंद्रकांता’ सहित कई धारावाहिकों, वृत्तचित्रों एवं टेलीफिल्मों से भी जुड़े रहे।

हाल के एक दशक में उन्होंने स्वयं को कथा समीक्षा और आलोचना के लिए समर्पित कर दिया था।  अरुण प्रकाश को हिन्दी  अकादमी का साहित्यकार सम्मान, रेणु पुरस्कार, दिनकर सम्मान, सुभाष चंद्र बोस कथा सम्मान और कृष्ण प्रताप स्मृति कथा पुरस्कार से नवाजा जा चुका था।

हाल के दिनों में उन्होंने साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के कई अंकों का सम्‍पादन भी किया था। अरुण जी का असमय जाना हिन्दी साहित्य संसार की गहरी क्षति है। जन संस्कृति मंच की विनम्र श्रद्धांजलि!

(प्रणय कृष्ण, महासचिव जन संस्कृति मंच की ओर से जारी )

आइसक्रीम की कहानी : प्रकाश मनु

आइसक्रीम का नाम सुनते ही बच्‍चों ही नहीं, बड़ों के मुँह में भी पानी आ जाता है। आइसक्रीम की दि‍लचस्‍प कहानी बयां कर रहे हैं कथाकार प्रकाश मनु-

अगर आज बच्चों से उनकी सबसे प्रिय खाने की चीज के बारे में पूछा जाये, तो ज्यादातर बच्चों का जवाब होगा—आइसक्रीम! खाने-पीने की कोई शानदार पार्टी हो, या फिर कोई मेला या उत्सव, बच्चों की उत्सुक निगाहें सबसे पहले आइसक्रीम को ढूँढ़ती हैं। खाने-पीने को कुछ और मिले या न मिले, मगर आइसक्रीम जरूर चाहिए। और जी भरकर आइसक्रीम खाने के बाद भी उनकी तबीयत होती है—काश, थोड़ी-सी फलाँ आइसक्रीम या सॉफ्टी या चॉकबार और मिल जाती, तो मजा आ जाता! यों भी किसी को वैनिला और स्ट्राबरी पसंद है, तो किसी को कसारा, चॉकबार और केसर पिस्ता! और ऐसे बच्चे भी कम नहीं जो वैनिला या स्ट्राबरी खाते हुए मन-ही-मन खयालों में उड़ रहे होते हैं कि काश, इसके बाद कसारा या केसर पिस्ता और मिल जाती तो क्या कहने!

यों आइसक्रीम अब कोई दुर्लभ चीज नहीं रही। शायद ही कोई छोटा या बड़ा शहर या कसबा हो, जहाँ रोशनी में जगमगाता आइसक्रीम पार्लर या फिर लुभावने पोस्टरों से सजे, किस्म-किस्म की स्वादिष्ट आइसक्रीम बेचने वाले ठेले न हों! हालाँकि बच्चे अपनी इस पसंदीदा चीज को मजे से खाते हुए शायद ही कभी सोचते हों, कि यह आइसक्रीम जो आज इतनी असानी से मिल जाती है, कभी इतनी दुर्लभ थी कि बड़े-बड़े राजाओं के दरबारों या फिर धनी लोगों की पार्टियों में ही नजर आती थी। ज्यादातर लोग इस ‘ठंडी स्वादिष्ट मिठाई’ के लिये तरसते थे! और सच तो यह है कि आइसक्रीम की कहानी कोई सौ-दो सौ साल पहले की नहीं, बल्कि तकरीबन ढाई हजार साल पुरानी है और इतिहास में अनेक महान हस्तियों के साथ, अनेक प्रसंगों में उसका जिक्र मिलता है।

शुरू में बगैर दूध के आइसक्रीम बनाने का चलन था। यह आइसक्रीम कभी ठोस रूप में होती तो कभी आधी जमी हुई। इसमें फलों का रस, चीनी और पानी का इस्तेमाल होता था। सदियों पहले चीन, तुर्की, भारत और एशिया के कई देशों में आइसक्रीम का प्रचलन था। उसके बाद यूरोपीय देशों में भी आइसक्रीम का प्रचलन हुआ और निरन्‍तर बढ़ता गया।

आइसक्रीम की कहानी का एक छोर ढाई हजार बरस पहले, विश्‍वविजयी सिकंदर से जुड़ता है। सिकंदर ने जब मिस्र को जीता, तो उसने जीत का जश्‍न मनाने के लिये ढेर सारी आइसक्रीम तैयार करने का आदेश दिया। हालाँकि यह आज की आइसक्रीम से अलग थी। सिकंदर के आदेश पर पंद्रह बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गये। फिर उन्हें पहाड़ के ऊँचे शिखरों से लाई गई मुलायम, दूधिया बर्फ से भरने के लिये कहा गया, ताकि महान सिकंदर इस ठंडी मिठाई का भरपूर आनंद ले सके।

यों आइसक्रीम की कहानी आज से कोई ढाई हजार बरस पहले से शुरू होती है। कहा जा सकता है कि किसी न किसी रूप में तब आइसक्रीम या ऐसी ही कोई चीज एक स्वादिष्ट मिठाई के रूप में मौजूद थी। इसके बाद तो आइसक्रीम के होने के काफी पक्के प्रमाण मिलने लगते हैं। ईसा की पहली शताब्दी में रोम के शासक नीरो ने अपने सेवकों को आदेश दिया था कि पहाड़ों से बर्फ लाई जाये और उसे फलों के रस और शहद में मिलाकर यह ठंडी मिठाई तैयार की जाए!

इसके बाद सातवीं शताब्दी में चीन के राजा तांग ने बर्फ और दूध को मिलाकर आइसक्रीम बनाने का तरीका खोज निकाला। सारी दुनिया में स्वादिष्ट आइसक्रीम बनाने की कला को लेकर चीन का दूर-दूर तक नाम हो गया। तब चीन से आइसक्रीम यूरोप में पहुँची और तरह-तरह के रूपों में इटली और फ्रांस के राज दरबारों में पेश की जाने लगी।

कहा जाता है कि प्रसिद्ध विश्व-यात्री मार्को पोलो जब लंबे समय तक चीन में रहने के बाद इटली लौटा, तो अपने साथ-साथ आइसक्रीम तैयार करने की कला लेकर गया था। और इस तरह आइसक्रीम देखते ही देखते दुनिया के दूसरे देशों में जा पहुँची। कैथेरीन मेडिसी फ्रांस की रानी बनीं, तो उनके साथ आइसक्रीम बनाने की कला फ्रांस भी जा पहुँची। और फिर देखते ही देखते फ्रांस के राज दरबार और रईसों की पार्टियों में भी आइसक्रीम नई सज-धज के साथ सामने आने लगी।

आधुनिक काल में आइसक्रीम को लोकप्रियता दिलाने में अमेरिका का बड़ा हाथ है। अमेरिका में न सिर्फ आइसक्रीम बनाने की नई-नई विधियाँ खोजी गईं, बल्कि दावतों और पार्टियों में आइसक्रीम परोसने और मेलों में आइसक्रीम बेचने के नये-नये अंदाज सामने आने लगे। सन् 1750 में मैटीलैंड के गवर्नर ब्लैडन ने अपने मेहमानों को आइसक्रीम की दावत दी थी। अठारहवीं शताब्दी के आखिर में फिलिप लेजी नाम के लंदन के एक मिठाई बेचने वाले व्यापारी ने ‘न्यूयार्क’ अखबार में घोषणा की कि वह आइसक्रीम समेत किस्म-किस्म की मिठाइयाँ बेचने जा रहा है। उसकी इस घोषणा ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। अमेरिका में पहला आइसक्रीम पार्लर भी अठारहवीं शताब्दी में ही खुला और उसके बाद तो सचमुच आइसक्रीम की कहानी को पंख लग गये। सब ओर उसकी धूम मच गई। कहा जाता है कि अमेरिका की बड़ी हस्तियाँ, जिनमें जॉर्ज वाशिंगटन भी थे, आइसक्रीम के खासे शौकीन थे।

आइसक्रीम को यह नाम कैसे मिला? इसका श्रेय भी अमेरिका को ही जाता है। पहले इसे ‘आइस्ड क्रीम’ यानी ‘ठंडी की गई क्रीम’ कहा जाता था। पर बाद में धीरे-धीरे संक्षिप्त होकर इसका कहीं अधिक सुंदर और आकर्षक नाम ‘आइसक्रीम’ हो गया, जो अब पूरी दुनिया में फैल चुका है।

अब तक आइसक्रीम बनाने की नई से नई विधियाँ खोज ली गई थीं। जब पैडल से चलने वाला लकड़ी का फ्रीजर बना, तो इसके निर्माण में एकाएक तेजी आ गई। सन् 1832 में फिलेडेल्फिया के एक मिष्ठान्न निर्माता ऑगस्टस ने आइसक्रीम बनाने का एक नया तरीका खोजा। किन-किन चीजों को, किस अनुपात में मिलाने से स्वादिष्ट आइसक्रीम तैयार होती है, उसने यह खोज की। यह आइसक्रीम बहुत कुछ आज मिलने वाली आइसक्रीम जैसी थी।

नैन्सी जॉनसन नाम की इंग्लैंड की एक महिला ने सन् 1846 में हाथ से चलने वाले फ्रीजर की खोज की। इससे आइसक्रीम बनाने का सही, वैज्ञानिक तरीका खोज लिया गया, जो कमोबेश आज भी इस्तेमाल होता है। नैन्सी जॉनसन ने तो अपने आविष्कार को पेटेंट नहीं करवाया, पर आगे चलकर विलियम जी. चंच ने सन् 1848 में जॉनसन द्वारा निर्मित आइसक्रीम फ्रीजर को उसी के नाम के साथ पेटेंट करवाया।

इसके बाद आइसक्रीम के निर्माण में एक बड़ी छलाँग सन् 1851 में दिखाई दी। कारण यह था कि इसी वर्ष बाल्टीमोर के जेकब फसेल ने बड़ी मात्रा में आइसक्रीम तैयार करने का व्यापारिक संयंत्र कायम किया। जाहिर है, इसके साथ ही आइसक्रीम के निर्माण और प्रचार में आश्‍चर्यजनक तेजी आई। दूसरे व्यापारियों में भी इसी तरह के संयंत्र लगाकर आइसक्रीम बनाने की होड़ नजर आने लगी। इसे आइसक्रीम की विश्‍व-यात्रा का एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण पड़ाव कह सकते हैं।

अब सभी का ध्यान आइसक्रीम को खूबसरत ढंग से सर्व करने की ओर गया और उसे परोसने के लिये आकर्षक, डिजायनदार कप तैयार करने की कोशिशे हुईं। आखिर उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अल्फ्रेड एल. क्रेल ने खूबसूरत ढंग से आइसक्रीम ‘सर्व’ करने के लिए सुंदर डिजाइन वाले कप-प्लेट ईजाद किये, जिससे आइसक्रीम का पूरा आनंद लिया जाये। जाहिर है, अब तक आइसक्रीम का खूब प्रसार होने के साथ-साथ वह सभ्य समाज की पहचान भी बन चुकी थी।

इसके बाद फ्रिज या रेफ्रिजरेटरों की ईजाद और उनके घर-घर पहुँचने पर तो आइसक्रीम को जमाना एक साथ सस्ता और आसान भी हो गया। इस दिशा में एक बड़ी कामयाबी तब मिली, जब आइसक्रीम जमाने का ऐसा फ्रीजर बना लिया गया, जो बिना रुके, लगातार काम करता था और व्यावसायिक रूप से सस्ता भी था। फिर तो आइसक्रीम की सब ओर दुंदुभी बजने लगी।

इसके बाद आइसक्रीम के नये-नये लुभावने रूप खोजे गये। इनमें सबसे लोकप्रिय हुआ आइसक्रीम कोन, क्योंकि यह बेहद सुविधाजनक था और मेले तथा उत्सवों में चलते-फिरते उसका आनंद लिया जा सकता था। सन 1904 में लुइस विश्‍व मेले में सबसे पहले ऐसे कोन देखे गये, जिनमें आइसक्रीम भरकर उन्हें चलते-फिरते खाया जा सकता था। कई व्यापारी अच्छे से अच्छे, सुंदर और कलात्मक कोन बनाकर उनमें आइसक्रीम पेश करने लगे, ताकि उनकी बिक्री बढ़े। इनमें लेबनान का एक व्यापारी अबे ड्रमर भी था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि आइसक्रीम कोन बनाने की मशीन तैयार करने वाला पहला शख्स अबे ड्रमर ही था। यों आइसक्रीम कोन बनाने का इतिहास खासा लम्‍बा है और किसी एक को उसका श्रेय देना मुश्किल है। कई लोग इस दिशा में एक साथ सोच रहे थे, ताकि आइसक्रीम की लोकप्रियता से ज्यादा से ज्यादा लाभ हासिल किया जा सके। धातु के सुन्‍दर और आकर्षक कोन बनाने के साथ-साथ, कागज के कोन भी बनाए गये।

सन् 1904 में सेंट लुइस स्थान के चार्ल्‍स ई. मेचेंस के मन में ‘पेस्ट्री कोन’ बनाने का विचार आया और उसी ने पहला आइसक्रीम कोन बनाया। कहा जाता है कि इस साल सेंट लुइस विश्‍व मेले में कम से कम पचास जगहों पर ऐसे आइसक्रीम कोन मिल रहे थे। इससे पता चलता है कि एक ही समय में कई लोगों ने एक साथ आइसक्रीम का यह रूप खोजा था, जो आज भी खासा लोकप्रिय है। खासकर मेलों और उत्सवों का तो यह खास आकर्षण ही है और हलकी धूप वाले गुनगुने मौसम में, इसे टहलते हुए खाने का आनंद ही कुछ और है! बहरहाल, इतना तय है कि बीसवीं शताब्दी के प्रारम्‍भ में सेंट लुइस के विश्‍व मेले में कोन प्रसिद्ध हुए और एकाएक दुनिया भर में छा गये थे।

इसके बाद आइसक्रीम का युग आया। इसके आविष्कार की कहानी भी खासी रोचक है। इसे बनाने का विचार आयोवा के एक दुकानदार के मन में आया। यह सन् 1920 के आसपास की बात है। हुआ यह कि एक बच्चा उसके पास आइसक्रीम खरीदने आया। उसे यह तय करने में मुश्किल आ रही थी कि वह आइसक्रीम सेंडविच ले या फिर चॉकलेट बार? तब नेल्सन के मन में एक नया विचार आया। उसने एक आइसक्रीम बार खोज निकाली, जिसके ऊपर चाकलेट की हलकी सी परत थी। सन् 1934 में चाकलेट से मढ़ी हुई यह नये ढंग की, अनोखी आइसक्रीम बार खोज ली गई, जो आज भी ज्यादातर बच्चों की पहली पसंद है। और अब तो लोगों की जरूरतों के हिसाब से ऐसी आइसक्रीम भी खोज ली गई हैं, जिनमें चीनी नहीं है तथा जो कतई मोटापा नहीं बढ़ाती।

आइसक्रीम की लोकप्रियता बढऩे के साथ-साथ, तरह-तरह की आइसक्रीम खोजने की जो होड़ लग गई। सन् 1960 में रुबेन मैट्स ने एक अलग तरह की आइसक्रीम खोजकर उसे अनोखा नाम ‘हैगन डाज’ दिया। इसी समय लियो स्टीफेनस ने ‘डब बार’ खोजी। इससे भी मजेदार थी ‘गुड ह्यूअर आइसक्रीम बार’ की खोज। इसे बेचने का भी एक नायाब तरीका खोज निकाला गया। सफेद ट्रकों का एक खूबसूरत काफिला उन्हें बेचने के लिये निकला। इन ट्रकों पर मीठी ‘रुन-झुन, रुन-झुन’ करने वाली घंटियाँ लगी थीं और एक ही तरह की पोशाक वाले ड्राइवर बैठे थे, जो खरीदने वालों को अपने इस अनोखे रूप से चकित और आकर्षित करते थे। जाहिर है, इस आइसक्रीम का जैसा दिलचस्प नाम था, उसे बेचने का तरीका भी वैसा ही मनोरंजक था, जिसने सभी को लुभाया। कुछ इतिहासकार इसी को पहली आइसक्रीम बार मानते हैं।

बेशक आइसक्रीम आज अपनी लोकप्रियता के शिखर पर है और उसने प्रसिद्धि की दौड़ में दुनिया की सारी स्वादिष्ट मिठाइयों को पीछे छोड़ दिया है। बड़े हों या बच्चे, सभी आइसक्रीम के दीवाने हैं—शायद इसलिए कि यह ऐसी लाजवाब चीज है, जिसे कितना ही खाओ, मन नहीं भरता! इसलिए आइसक्रीम की कहानी जो पिछले ढाई हजार सालों से चली आती है, उम्मीद है, अभी हजारों सालों तक मनुष्य के साथ-साथ यात्रा करेगी। उसके नये-नये लुभावने रूप सामने आएँगे तथा उसका स्वाद और आनंद कभी कम न होगा!

(‘अनोखी कहानि‍याँ ज्ञान-वि‍ज्ञान की’ से साभार)
सभी चि‍त्र : कीर्ति मि‍त्‍तल, कक्षा 11

मैं अपनी कविता को माँ मानता हूँ : लीलाधर मंडलोई

लीलाधर मंडलोई

नई दिल्ली : ‘‘मेरी कविता के अनेक रूप मेरी माँ के ही विभिन्न रूप है। माँ से विलग होकर मैं मानो कोई कविता कह नहीं पाता, अतः मैं कविता को अपनी माँ ही मानता हूँ।’’ यह भावपूर्ण विचार लब्धप्रतिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई ने 13 जून 2012 को साहित्य अकादेमी द्वारा उन पर केंद्रित ‘कवि-संधि’ कार्यक्रम में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि मैं अपनी कविताओं की भाषा और फार्म में लगातार तोड़-फोड़ करता रहता हूँ। मेरे पहले कविता-संग्रह में जहाँ बुंदेली के चौकड़िया छंद का प्रभाव है तो अगले संग्रहों में उर्दू का प्रभाव। दूरदर्शन में कार्य के दौरान कविताओं को कैमरे की नज़र से भी लिखने की कोशिश की। मैं जहाँ-जहाँ गया वहाँ की भाषा, मुहावरे को कविता में उतारने की कोशिश करता रहा हूँ।

कार्यक्रम के दौरान उन्होंने दो दर्जन से ज्यादा कविताओं का पाठ किया। ‘गिरगिट’, ‘घरेलू मक्खी’, ‘त्यौहार का दिन’, ‘रिश्ता’, ‘बेटियों से क्षमा याचना’, ‘आदिवासियों का आधुनिक प्रार्थना गीत’, ‘दिल्ली के बारे में’ आदि कविताओं को श्रोताओं ने बेहद पसंद किया।

कार्यक्रम के आरम्‍भ में अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने उनका संक्षिप्त परिचय देते हुए कहा कि मंडलोई कविता में आदिवासियों मज़दूरों, प्रकृति के प्रति केवल सरोकर ही व्यक्त नहीं करते, उनको एक चुनौती के रूप में भी लेते हैं। वह बुद्धि-वैभव के अतिक्रांत संसार के बरबस अपनी कविता में मनुष्य के पास बुनियादी नातेदारी के साथ जाना चाहते हैं। कार्यक्रम के अंत में उनकी कविताओं पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि उनकी कविता में केवल माँ ही नहीं पूरा परिवार लिपट कर आता है जो बहुत बड़ी बात है।

कार्यक्रम में उनकी पीढ़ी के कवियों के अलावा अनेक युवा कवि भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। पंकज सिंह, मंगलेश डबराल, दिनेश कुमार शुक्ल, मदन कश्यप, प्रभाकर श्रोत्रिय, अनामिका, मिथिलेश श्रीवास्तव, विष्णु नागर, विमल कुमार, कुमार अनुपम आदि कुछ प्रमुख नाम हैं।

प्रस्तुति: अजय कुमार शर्मा

शौचालय का अर्थशास्त्र : दिनेश चन्द्र भट्ट ‘गिरीश’

मोंटेक सिंह आहलूवालि‍या के 35 लाख रुपये खर्च करके दो शौचालय बनाने के कारणों, इसकी आवश्‍यकता और इसके दूरगामी लाभ बता रहे हैं शि‍क्षक और लेखक दिनेश चन्द्र भट्ट ‘गिरीश’-

‘शौचालय’ दो शब्दों के योग से बना है- ‘शौच’ और ‘आलय’। शौच शब्द ‘शुचि’ से बना है जिसका अर्थ है- पवित्र। ऐसा ‘आलय‘ (भवन) जहाँ से व्यक्ति पवित्र होकर निकलता है। जिसका शौचालय जितना बडा़ वह उतना ही अधिक पवित्र- वर्तमान परिपेक्ष्य में यही अभिप्राय ज्यादा समीचीन है। ऐसे शौचालय का प्रयोग न कर पाने वालों को क्या कहा जाय- म्लेच्छ यही न।

शुचिता या पवित्रता के पायदान पर हमारे देश में आज अगर कोई विराजमान हैं तो वे हैं- योजना आयोग के उपाध्यक्ष माननीय मोंटेक सिंह आहलूवालिया । 35 लाख रुपये खर्च करके दो भव्य शौचालय निर्मित करवाने वाले की शुचिता पर कैसे सन्देह किया जा सकता है। समग्र राष्ट्र के हितार्थ आर्थिक नियोजन करने का कार्य कितना मष्तिष्क को थकाने वाला होगा, जिस कारण उन्हें कब्ज की शिकायत रहती होगी। उनके शुभचिन्तकों ने उन्हें भव्य शौचालय निर्मित कराने की सलाह दी होगी। यह ऐसा शौचालय होगा जो संगमरमर से निर्मित, उसकी दीवारें स्वर्णरचित और उसकी सामग्री रत्‍नखचित ही होगी। ऐसा अनुमान मैं लगा रहा हूँ। शुचिता हेतु जब वह बैठते होंगे, मंद-मंद संगीत की सुरलहरियाँ बज उठती होंगी। वहाँ त्रिविध बयारि (शीतल, मंद, सुगन्धि से परिपूर्ण वायु) बहती होगी ताकि वह शुचिता परिपूर्ण होकर उस आलय से बाहर आयें।

मल-मूत्र विसर्जन के लिये एक और शब्द प्रयुक्त होता है- लघुशंका और दीर्घशंका। जब कोई व्यक्ति फ्रेश होने के लिये जाता है तो वह कहता है- दीर्घशंका हेतु जा रहा हूँ। निश्‍चय ही वह निम्नमध्य या मध्यम आर्थिक स्थिति वाला ही व्यक्ति है जिसे शंका है (लघु या दीर्घ) कि शारीरिक श्रम न करने, अव्यवस्थित दिनचर्या, तनावग्रस्तता के कारण उसकी आँतो में पल रहे या सड़ रहे मलमूत्र का परित्याग वह यथोचित ढंग से कर पाता है या नही! उसकी शंका समाधान को प्राप्त ही होगी, निश्‍चयपूर्वक कहा नहीं जा सकता। अपच, अम्लीयता, गैस, बवासीर जैसी बीमारियाँ इसीलिये अस्तित्वमान हैं।

निम्न आर्थिक स्थिति वर्ग का तो कहना ही क्या ‘मलत्याग‘ शब्द की अश्‍लील मानते हुए वह कहता है- दिशा मैदान जाना। आज के सन्दर्भ में उसमें ऐसा करने के लिये न तो कोई दिशा बची है और न मैदान ही। हाँ रेल लाइन या सड़क के किनारे समूह बनाकर मजबूरी में शर्म का परित्याग किये हुए बैठने को मजबूर हैं। रेल के ए.सी. क्लास में सफर करने वाले भद्रपुरुष के लिये ऐसे दृश्य कितनी जुगुप्सा पैदा करते होंगे। देश की अधिसंख्य आबादी ऐसा करती है। इसे सहन भी तो करना ही पड़ता है कि एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक वोट बैंक के रूप में इनका जीवित रहना कितना जरूरी है। अन्यथा अभावग्रस्तता में ये जियें या मरें किसे परवाह है।

शौचालय के लिए यदाकदा ‘बाथरूम’ का प्रयोग किया जाता है। कहीं-कहीं विद्यालयों में बच्चे मलमूत्र त्याग के लिये ‘बाथरूम’ शब्द का प्रयोग करते हैं। जरूरतमंद व्यक्ति अगर किसी मंत्री या बड़े नेता के यहाँ पहुँच जाय तो वह नेताजी को घण्टों बाथरूम के आश्रय में पाता है। आज समझ में आ रहा है कि आलीशान शौचालय का उपयोग करने वाला बाथरूम की भव्यता से मोहित होकर ही घण्टों सुखभोग करता हुआ परितृप्त होकर वहाँ से निकलता होगा।

तो बात निकली थी मोंटेक सिंह का शौचालय भव्य और आकर्षक है। आर.टी.आई. के तहत हमारे देश की सभी उच्च-आर्थिक स्थिति वालों के शौचालयों की स्थिति का ब्यौरा मंगाया जाना चाहिए। साथ ही विदेशों की ऊँची हस्तियों के शौचालयों से सम्बन्धित अभिलेख माँगे जाने चाहिए। सबसे महंगे शौचालय वाले का नाम ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड’ में दर्ज होना चाहिए। हो सकता है मोंटेक सिंह का नाम इस रिकार्ड में दर्ज हो जाय। अमेरिका के राष्ट्रपति इस हेतु उन्हें गले लगा लें जैसा कि पिछले माह एक अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को गले लगा लिया था। इससे बड़ा सम्मान हमारे देश के लिये और क्या हो सकता है।

शौचालय दीर्घशंका और दिशा मैदान का सम्बन्ध जीवन स्तर से ही है। जो व्यक्ति 35 लाख रुपये के शौचालयों का इस्तेमाल कर रहा है वह निश्‍चय ही छप्पन भोग का आनन्द तो लेता ही होगा। वह करोड़ालय (करुणालय नहीं) में तो अवश्य निवास करता होगा। उसके मातहत पलने वाले लोगों का जीवन स्तर भी उन्नत होता होगा। पत्रकारों को चाहिए कि वे उन सभी का साक्षात्कार लें (मोंटेक सिंह और उनके मातहतों से) और पूछें आपको कैसा लगता है इतने भव्य शौचालयों का उपयोग करते हुए? क्या-क्या विशिष्टताएँ हैं इन शौचालयों में? कितना आनन्द आता है शुचिता की प्रक्रिया में? आदि-आदि। हमारी नई पीढ़ी को यह जानकारी अवश्य ही होनी चाहिए ताकि उनका लक्ष्य बने- मोंटेक सिंह जैसा बनना और भव्य शौचालयों का सदुपयोग कर एक काबिल भारतवासी बनना। माता-पिता अपने बच्चों को एक सीख दें कि बनो तो मोंटेक सिंह जैसा अन्यथा मानुष देह धारण करने का क्या औचित्य? ‘बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर नर मुनि सदग्रंथन गावा‘, हमारा बचपन क्यों ऐसा आदर्श ग्रहण कर पा रहा है बड़ा चिन्तनीय विषय है।

बच्चे का महंगा स्कूल, हमारा आवास, हमारी कार, गहने आदि स्टेटस सिम्बल हुआ करते हैं। स्टेटस मेन्‍टेन करने के लिए आज व्यक्ति क्या नहीं करता! गुणवत्ता से अधिक प्रचलन का ध्यान रखा जाता है। हमारे  लिये सौभाग्य का विषय है कि आज शौचालय स्टेटस सिम्बल बनने जा रहा है। सम्पन्नता की अभिव्यक्ति या व्यक्ति की पहचान इसलिये नही होगी कि वह किस कार में सवारी करता है। या उसके बच्चे कितने महंगे स्कूल में पढ़ते है। या वह कितना महंगा भोजन करता है। बस महत्वपूर्ण यह होगा कि उसका शौचालय कितना महंगा है। और उसके भीतर किन-किन सुख सुविधाओं की ध्यान में रखा जाता है। अब शौचालय से सम्बन्धित टायलेट सीट, उसमें लगने वाले मार्बल आादि का विज्ञापन अधिकाधिक देखने को मिलेगा। अगर कोई फिल्मी हस्ती तत्सम्बन्धी आइटम का विज्ञापन करे तो कहना ही क्या! क्रिकेट स्टार घड़ी बेच रहा है। फिल्म अभिनेत्री कुरकरे खाकर और खिलाकर अपने परिवार को सम्पन्न और खुशहाल बता रही है। इसी प्रकार का बहुत कुछ। लेकिन अब फिल्मतारिका और फिल्म स्टार टायलेट में बैठा यह बताने का प्रयास कर रहा होगा कि फलाँ कम्पनी की टायलेट सीट या शौचालय में प्रयुक्त होने वाला मार्बल या इसी तरह के अन्य आयटम आपको कैसे सुख प्रदान करते हैं। अगर आप बताए गए आयटम का प्रयोग करते हैं तो आपका जीवन धन्य हो जायेगा और यह भी कि आपका शौचालय आपके लिए गर्व और पड़ोसी की ईर्ष्या का कारण भी होगा। उस विज्ञापन का मूलमंत्र होगा- उसका शौचालय आपके शौचालय से आकर्षक कैसे! उपभोक्ता के लिये अंग्रेजी का शब्द है-कष्टमर। अगर उपभोक्ता को आर्थिक तंगी से जीवन यापन करते हुए विज्ञापित वस्तुओं का प्रयोग स्टेटस के दबाब में करना पड़े तो वह कष्टमर ही है यानी आर्थिक तंगी के कारण कष्ट से मरने वाला। शौचालय आज बाजार के मायावी संसार का प्रिय विषय बनने जा रहा है। यही प्रेरणा काम करने वाली है कि आप अपने जीवन में भवन बनाएँ या न बनाएँ एक अदद आलीशान शौचालय अवश्य बनवा लें। ‘एक बंगला बने  न्यारा’  नहीं, ‘एक शौचालय बने उजियारा’।

मुझे लगता है कि मोंटेक सिंह का सम्बन्ध मण्टो की एक कहानी के एक चरित्र टोबाटेक सिंह से है। कहें तो मोंटेक सिंह और टोबाटेक सिंह भाई-भाई। टोबाटेक सिंह ने अपनी आखिरी श्‍वास तक भारत विभाजन को स्वीकार नहीं किया। भारत और पाकिस्तान के पूरे क्षेत्र को वह हिन्दुस्तान ही मानता आया। दुर्भाग्य से पाकिस्तान में रहना पड़ा। हर समस्या की शिकायत वह पण्डित नेहरू से करने की बात कहा करता था। इसी प्रकार मोंटेक सिंह आर्थिक विभाजन को स्वीकार नही करना चाहते। सभी भारतवासियों को वह खाते-पीते और उभरती आर्थिक महाशक्ति वाले देश का नागरिक समझते हैं। अगर किसी व्यक्ति को भुखमरी, किसानों की आत्महत्या, भ्रष्टाचार, संशाधनों का असमान वितरण आदि समस्याएँ या विसंगतिया दिखाई देती है तो उसकी दृष्टि का दोष है। उसकी भावना का दोष है- ‘जाकी रही भावना जैसी’। हमें बलिहारी होना चाहिये उस शौचालय का जिसके उपयोग के उपरान्त ऐसी कोई भी अनुभूति नहीं होती जो देश के लिये चिन्तनीय हो। वहाँ ऐसा अनुभव अवश्य होता होगा कि भारत 2020 तक विश्‍व की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरने वाला है। ऐसा अनुभव प्रदान कराने वाला शौचालय अगर महिमामण्डित करने के योग्य नहीं तो और क्या है?

काले धन पर इस वर्ष और विगत वर्ष अत्यधिक चर्चाएं हुईं कि कालाधन विदेशों मे जमा है। कई लोगों ने बि‍स्तर के अंदर, दीवार की चिनाई में, छत के भीतर आदि कई जगहों पर धन संचित किया हुआ था। हमारे देश के मनीषी इसे कालाधन बता रहे थे। अगर मेरे पास इतना धन होता तो मैं इसे काला नहीं रहने देता, पीला बना लेता। शौचालय की दीवारों को स्वर्णनिर्मित बनाकर भव्य शौचालय की निर्मिति के बाद भी अगर देश की तीन चौथाई आबादी बेधडक यत्र-तत्र दिशा मैदान वाला कार्य भी करती या 28 रुपये रोजाना कमाकर अमीर भी बन जाती तो मुझ पर क्या असर होता। शायद कुछ भी नहीं क्योंकि मैं तो उस भव्य शौचालय का उपभोग करने वाला होता जहां से गरीबी, बेकारी, भुखमरी, कुपोषणा, बदहाल व्यवस्थाऐं आदि तो कुछ भी महसूस नही होता। बचपन मे याद की हुई एक कविता का स्मरण मुझे इस सन्‍दर्भ में हो रहा है-

यदि होता किन्नर नरेश मैं, राजमहल में रहता।
सोने का सिंहासन होता, सिर पर मुकुट चमकता।।
-आमीन

मेरी जिंदगी में बच्चे : सुधीर सुमन

छुटकू बच्चे की शक्ल से मिलती तस्वीर।

लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन को हाल ही में दो बच्चे मि‍ले। ये बच्‍चे जिस तरह से मिले, उसे याद करते हुए लिखा गया लेख-

बच्चे मेरी जिंदगी की ऊर्जा रहे हैं। हमेशा बच्चों के बीच घिरा रहा हूँ। कुछ पढ़ाकू छवि होने के कारण और ज्यादा बच्चों से लगाव होने के कारण अक्सर माता-पिता मुझसे ही उनका नाम रखने की गुजारिश करते थे। करीब 20-25 बच्चों का नामकरण मैंने किया ही होगा। आज भी कोई न कोई ऐसा आग्रह कर ही देता है। कितने शिशु मेरी बाहों में झुलते हुए, मेरे कंधे पर सैर करते हुए बड़े हुए। हमारे यहाँ एक गीत जो बच्चों को झुलाते हुए अक्सर गाया जाता था- तोरा मइया न डोलावे, तोरा बप्पा न डोलावे तोरा हमहीं डोलाईं, वह तो जैसे पूरी तरह से हकीकत रहा है।

किशोर उम्र में मैंने ‘बच्चों के बारह उपन्यास’ नामक एक किताब पढ़ा था, जिसमें एक उपन्यास की कथा पराग नाम के एक बच्चे के बारे में थी। कहानी तो काल्पनिक थी, पर कल्पना ऐसी थी, जिसने मुझ पर गहरा असर छोड़ा था। पराग की उम्र बढ़ती नहीं, वह अमर है। और यह अमरता ही उसके लिये गहरे दुख और अवसाद की वजह बन जाती है। उसके साथी बच्चे बड़े होते हैं, बूढे़ होते हैं, फिर मर जाते हैं। जो नये बच्चे आते हैं, वे उसके दोस्त बनते हैं। लेकिन एक वक्त ऐसा आता है, जब वह अपनी अमरता को अभिशाप समझने लगता है और जिस लड़की से वह गहरा स्नेह करता है, उसके मरने के बाद वह भीषण पीड़ा से भर उठता है और अमरता से मुक्ति चाहता है। शायद हू ब हू कथा इसी रूप में न हो, पर इसी रूप में मेरी स्मृति में बची हुई है। कभी-कभी लगता है कि वह पराग मेरे भीतर बैठा हुआ है। फिर भी मैं उसकी तरह मुक्ति नहीं चाहता। मैं बच्चों की आँखों से इस दुनिया को लाखों बार देखना चाहता हूँ। उनके साथ उनकी भाषा में बात करना चाहता हूँ।

मैं शुक्रगुजार हूँ उन मां-बापों का जिन्होंने मेरे वात्सल्य पर यकीन किया और उन बच्चों का जिन्होंने मुझे बेहद प्यार किया। आज तो बच्चे बड़ों की महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिये ऐसे रेस में झोंक दिये जा रहे हैं, कि उनका बचपन समय से पहले ही खत्म हो जाता है। ऐसे माहौल में हाल में दो बच्चे मुझे कुछ इस तरह मिले कि मैं भूल नहीं पाया। एक तो बिल्कुल नन्हा-सा शायद साल-डेढ़ साल का होगा, गोरा-चिट्टा, मुस्कुराता हुआ, आँखों में अजीब सी शरारत भरी थी जिसकी। मेट्रो की लाइन में खड़ा था तो पीछे से किसी ने मेरी शर्ट खींची। मैंने पीछे मुड़के देखा  तो पाया महाशय मेरी शर्ट पर अपनी उंगलियों की जबर्दस्त पकड़ बनाये हुए हैं। मैंने पकड़ बनाये रहने दी। मेट्रो के अंदर घुसने तक उन्होंने शर्ट नहीं छोड़ा। लेकिन उनकी माता जी को सीट मिल गई  तो उन्हें मेरी शर्ट छोड़नी पड़ी। फिर भी उनकी आँखें मेरा पीछा करती रहीं। जब मैं अपने स्टेशन पर उतरा तो देखा महाशय शीशे से मुझे देख रहे हैं। मैंने गर्मजोशी से बाय किया, मेट्रो चली गई, पर उन्होंने हमेशा के लिये स्मृति में जगह बना ली। ठीक वैसे ही बच्चे की शक्ल मेरी एक फेसबुक फ्रेंड के वॉल पर जाने पर दिखती है।

मनमोहक मुस्कान के साथ जाह्नवी।

दूसरी दिलचस्प मुलाकात सात साल की एक बच्ची से लखनऊ जाते वक्त गोमती एक्सप्रेस में हुई। मैं अपनी सीट पर बैठ चुका था। ट्रेन खुलने से पहले मेरी सीट की बगल में एक दंपत्ति अपनी दो बच्चियों के साथ आये। मेरी सीट खिड़की के पास थी। मेरे ठीक विपरीत साइड की खिड़की पर वे दोनों बच्चियां बैठ गईं। अचानक मेरे आगे की सीट पर एक और बच्ची का सिर उभरा, उसने मुझे देखा, मैंने उसे देखा। मैं मुस्कुराया, वह भी मुस्कुराई। मगर कहीं थोड़ी सी हिचक थी। पहले तो उसने मेरे बगल वाले दंपत्ति को दूसरे साइड की सीट पर भेजा, वहाँ से उनकी बच्चियों को अधिकारपूर्वक बुलाया और फिर लगे खेलने। एक खेल था- पिकाचू, जिसमें हारने वाले का गाल पकड़कर खींचा जाता है। हमारी चंचल, चपल सहयात्री ने अपना नाम जाह्नवी बताया, उसके साथ यह सूचना जोड़ते हुए कि यह नाम उनकी दादी माँ ने रखा था। मेरे पूछने पर उन्होंने जाह्नवी का अर्थ भी बताया, फिर से इस सूचना के साथ कि उनकी दादी माँ ने बताया है कि जाह्नवी का अर्थ गंगा होता है। खैर, जाह्नवी अद्भुत ऊर्जा से भरी थीं। थकान का नामोनिशान उनके चेहरे पर नहीं आ रहा था। उन्होंने जो नये दोस्त बनाए थे, वे थोड़ी देर रुकना चाहते थे, पर उनका खेल- पिकाचू थम ही नहीं रहा था। तेज गति से हथेलियों का टकराना, फिर कैंची और पत्थर की शक्ल में मुद्राएं और हारने वाले के गालों को खींचना। और साथ ही यह भी बताना कि अंकल गाल खींचने में कितना मजा आता है न! खेल से थोड़ा डायवर्ट हुईं तो अंत्याक्षरी शुरू कर दी और साबित कर दिया कि उनका अंग्रेजी के शब्दों का ज्ञान सबसे अधिक है, अपने बड़े गोल मटोल भाई से कहीं अधिक, जो खेल में उनका साथ देने को मजबूर थे। उनके पिता बस एकाध बार उन पर निगाह डाल ले रहे थे। उनकी माँ दूसरी साइड की चेयर पर अपने ही ख्यालों में खोई हुई थीं। बाकी गोमती के चेयर कार डिब्बे का मेरे ठीक सामने का चेयर तो मानो जाह्नवी का घोड़ा था, जिसकी लगाम हाथ में लिये वह उसे दौड़ाए लिये जा रही थीं।

गोमती एक्सप्रेस अपने नियत समय से देर होती जा रही थीं, लेकिन हमारी जाह्नवी तो समय को अपने हिसाब से नचा रही थीं। हमारी बातचीत शुरू हो चुकी थी। अचानक उन्होंने मेरी ओर पाँच-छह पॉपकार्न बढ़ाए, मैंने कहा- तुम खाओ। वह कहाँ मानने वाली थीं। उन्होंने मेरे हाथों में मौजूद किताब को बंद किया और उस पर पॉपकार्न रख दिये। अब मैं क्या करता, मैंने तो खा लिये। फिर कुछ देर बाद मैंने आलू भुजिया देना चाहा, पर उन्होंने मना कर दिया। लेकिन कुछ देर बाद ही उनकी बंधी हुई मुट्ठी हल्की सी ढीली हुई, गोकि उनका चेहरा कोई देखता तो उसे लगता कि उनका ध्यान कहीं और हैं, पर मैंने संकेत समझ लिया। मैंने सबकी आँख बचाकर आलू भूजिया उनकी नन्हीं हथेलियों में रख दी। उन्होंने कनखियों से अपने पिता की ओर देखा, उनका ध्यान कहीं और था। और वह इस तरह अपनी हथेलियों को अपने मुँह तक ले गईं, मानो बस यूँ ही हथेलियाँ उधर चली गई हों। और किसी को पता नहीं चल पाया। बल्कि भाई ने ताड़ने की कोशिश की, पर उन्होंने उसे डॉज दे दिया। कमाल यह था कि यह मुद्रा उन्होंने चार-पाँच बार दुहराई और किसी को पता नहीं चला कि हम दोनों अपने खाने की वस्तुएं शेयर कर रहे हैं।

मुझे अगले दिन साथी मदन मोहन के उपन्यास पर कार्यक्रम का संचालन करना था। मैं दुबारा उनके उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ को पढ़ लेना चाहता था। लेकिन जाह्नवी के थपेड़े न केवल कभी-कभी मेरे माथे पर लग रहे थे, बल्कि वे किताब के पन्नों को भी गड्डमड्ड कर दे रहे थे। अचानक किताब ही उनके कब्जे में चली गईं और उन्होंने उसके अंदर के आखिरी कवर पर अपने मां-पिता का मोबाइल नम्‍बर लिखा। यह भी लिखा कि माई नेम इज जाह्नवी। मुझे लगा कि यह नटखट कहीं अपने माँ-बाप के लिये मुश्किल न पैदा कर दे। मैंने तुरत उन्हें अपना परिचय दिया और बताया कि जब मैं लखनऊ फिल्म फेस्टिवल में आऊँगा तो आपको फोन करूँगा। बच्चों के लिये जब फिल्में दिखाई जायेंगी तो आपलोग जाह्नवी को लेकर आइयेगा। फिल्मों का नाम सुनते ही जाह्नवी अपने सवालों के साथ तैयार हो गईं। लेकिन ट्रेन लखनऊ में दाखिल हो चुकी थी। मुझे लग रहा था कि मेरी अगली ट्रेन छूट न जाये। मैं अपना सामान व्यवस्थित करने लगा। जाह्नवी इसे लेकर परेशान थीं कि अंकल कहाँ ठहरेंगे। मैंने चुटकी ली- आपके यहाँ ठहर जाऊँगा। वे बोलीं- नहींऽऽ। स्टेशन पर ट्रेन के लगते ही मुझे तेजी से भागना पड़ा। एक हड़बड़ी की विदाई ली, इस उम्मीद के साथ कि हम फिर मिलेंगे।

मौजूदा व्यवस्था का सामना करने के लिए कलेजा भी तो होना चाहिए! : पलाश विश्‍वास

मृणाल सेन

महान फिल्मकार मृणाल सेन की 90 वर्ष की उम्र के बावजूद सृजन प्रक्रिया जारी है। उन पर वरि‍ष्‍ठ लेखक-पत्रकार पलाश वि‍श्‍वास का आलेख-

हमारे लिये यह कोई खबर नहीं कि अपनी 90 वीं वषर्गांठ मना चुके प्रसिद्ध फिल्म निर्माता मृणाल सेन अभी भी काम में लगे हुए हैं और इस उम्र में भी उनमें एक नयी फिल्म बनाने का जज्बा कायम है। भारतीय सिनेमा में सामाजिक यथार्थ को विशुद्ध सिनेमा और मेलोड्रामा की दोनों अति से बाहर अभिव्यक्ति देने में जो पहल उन्होंने की, वह हमारे लिये ज्यादा महत्वपूर्ण है। विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता भावनाओं में बह जाना नहीं है, वस्तुवादी दृष्टिकोण का मामला है, कड़ी आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने सिनेमा और जीवन में इसे साबित किया है। लगातार चलते रहने को जिंदगी मानने वाले जाने-माने फिल्मकार मृणाल सेन किसी न किसी तरह से ताउम्र फिल्म जगत से जुड़े रहना चाहते हैं क्योंकि उनके अनुसार अंतिम कुछ नहीं होता, किसी पड़ाव पर कदमों का रुक जाना जिंदगी नहीं है। बेहतरीन फिल्में बना चुके इस वयोवृद्ध फिल्मकार ने मौजूदा दौर की फिल्मों के स्तर पर निराशा जताई। सेन ने कहा आजकल की फिल्में मुझे पसंद नहीं। मैंने कुछ चर्चित फिल्में देखीं लेकिन पसंद नहीं आईं। मैं उनके बारे में बात भी नहीं करना चाहता। हकीकत भी शायद यही है कि जो लोग फिल्में बना रहे हैं, वे इस लिहाज से कम ही सोच पाते हैं। वे अपना काम अच्छा जरूर कर रहे हैं, लेकिन विषयवस्तु के लिहाज से फिल्में बेहद कमजोर हैं। साहित्य हो या फिल्म, समकालीन यथार्थ की चुनौतियों का सामना करने का दुस्साहस तो मृणाल दा जैसे लोगों में ही होती है। मौजूदा व्यवस्था के मुकाबले उठ खड़ा होने के लिये कलेजा भी तो होना चाहिए। कला और माध्यम की दुहाई देकर या बाजार की बाध्यताओं के बहाने यथार्थ से कन्नी काटकर लोकप्रिय और कामयाब होने का रास्ता सबको भाता है।

हमलोग हतप्रभ थे कि सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के दौरान वह प्रतिरोध आंदोलन में शामिल क्यों नहीं हुए और अभिनेता सौमित्र चट्टोपाध्याय के साथ चरम दुर्दिन में भी उन्होंने वामपंथी शासन का साथ क्यों दिया। हमें लग रहा था कि मृणाल दा चूक गये हैं। पर  बंगाल में कारपोरेट साम्राज्यवाद का, वैश्‍वि‍क पूँजी का मुख्य केंद्र बनते हुए देखकर अब समझ में आता है कि परिबोर्तन से उन्हें एलर्जी क्यों थी! मृणाल सेन ने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था। मृगया और पदातिक के मृणाल सेन से आप और किसी चीज की उम्मीद नहीं कर सकते। मृणाल सेन नंदीग्राम में अत्याचार के खिलाफ कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट से आज निकले जुलूस में शामिल हुए। वही खादी का कुर्ता, अस्सी साल की काया और मजबूत कदम। लेकिन नंदीग्राम नरसंहार के विरोध को उन्होंने वामपंथ के बदले दक्षिण पंथ को अपनाने का सुविधाजनक हथियार बनाने से परहेज किया।

उन्हीं के समकालीन बांग्ला के महान फिल्मकार ऋत्‍वि‍क घटक ने सिनेमा में सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिये ‘मेघे ढाका तारा’ और ‘कोमल गांधार’ जैसी क्लासिक फिल्मों में मेलोड्रामा का खुलकर इस्तेमाल करने से परहेज नहीं किया। पर मृणाल दा अपनी फिल्मों में कटु सत्य को वह जैसा है, उसी तरह कहने के अभ्यस्त रहे हैं जो कहीं-कहीं वृत्तचित्र जैसा लगता है। ‘आकालेर संधाने’ हो या ‘महापृथ्वी’ या फिर बहुचर्चित ‘कोलकाता 71’, उनकी शैली फीचर फिल्मों की होते हुए भी कहीं न कहीं, वृत्तचित्र जैसी निर्ममता के साथ सच को एक्सपोज करती है, जैसे कि यथार्थ की दुनिया में वह स्टिंग आपरेशन करने निकले हों! यहाँ तक कि उनकी बहुचर्चित ‘भुवन सोम’ का कठोर वास्तव कथा की रोमानियत के आरपार सूरज की तरह दमकता हुआ नजर आता है। उनकी फिल्में उस दौर का प्रतिनिधित्व करती हैं, जब देश नक्सलवादी आंदोलनों और बहुत बड़े राजनीतिक उथल-पुथल से जूझ रहा था, अपने सबसे कलात्मक दौर में मृणाल सेन अस्तित्ववादी, यथार्थवादी, मर्क्‍सवादी, जर्मन प्रभाववादी, फ्रेंच और इतालवी नव यथार्थवादी दृष्टिकोणों को फिल्मों में फलता-फूलता दिखाते हैं। उनकी फिल्मों में कलकत्ता किसी शहर नहीं चरित्र और प्रेरणा की तरह दिखता है। नक्सलवाद का केन्‍द्र कलकत्ता, वहाँ के लोग, मूल्य-परम्‍परा, वर्ग-विभेद यहाँ तक की सडकें भी मृणाल की फिल्मों में नया जीवन पाती हैं। ‘एक दिन प्रतिदिन’ जैसी फिल्मों के जरिये मृणालदा ने कोलकाता का रोजनामचा ही पेश किया है, जहाँ सारे परिदृश्य वास्तविक हैं और सारे चरित्र वास्तविक। मृणाल दा ने कोलकाता के बीहड़ में ही अपना कोई चंबल खोज लिया था, जहाँ उनका अभियान आज भी जारी है।

मृणाल दा की प्रतिबद्ध सक्रियता का मायने इसलिये भी खास है कि समानांतर सिनेमा को प्रारम्‍भि‍क दौर में काफी दर्शक मिले, मगर बाद में धीरे-धीरे इस तरह की फिल्मों के दर्शक कम होते चले गये। अस्सी और नब्बे के दशक के आखिर में सार्थक सिनेमा का आंदोलन धीमा पड़ गया। प्रकाश झा और सई परांजपे जैसे फिल्मकार व्यावसायिक सिनेमा की तरफ मुड़ गये। श्याम बेनेगल बीच में लम्‍बे समय तक टेलीविजन के लिये धारावाहिक बनाते रहे। जाहिर है कि समानांतर सिनेमा की अंदरूनी कमियों के कारण भी यह आंदोलन सुस्त पड़ने लगा। फिल्म माध्यम हो या साहित्य, जनता से सीधे जुड़े बगैर अति बौद्धिकता उसके लिये आत्मघाती साबित होती है। जनसरोकारों के बगैर गैर लोकप्रिय कथानक के लिये सरकारी संरक्षण अनिवार्य हो जाता है। जब संरक्षण का वह स्रोत बंद हो जाता है, तो चैनल बदलने के सिवाय वजूद कायम रखना मुश्किल होता है। मुक्तिबोध की कहानी ‘सतह से उठता आदमी’ और दास्तोवस्की की क्लासिक रचना ‘अहमक’ बनाने वाले मणि कौल को ही लीजिए, जिनकी फिल्में देखने को नहीं मिलती। बतौर सहायक निर्देशक मणि के साथ काम करने वाले राजीव कुमार ने पिछले दिनों बताया कि उन्होंने खुद ‘अहमक’ नहीं देखी, जिसके वह सहायक निर्देशक थे। कुमार साहनी की कथा भी यही है। फिर भी दोनों समांतर फिल्मों के ऐसे दिग्गज हैं, जिन्होंने बचाव के लिये कोई वाणिज्यिक रास्ता, शार्ट कट अख्तियार नहीं किया। ऋत्विक घटक की कहानी तो किंवदंती ही बन गयी कि किस किस पड़ाव से होकर उनको गुजरना पड़ा और कैसे वह टूटते चले गये। मृणाल दा की ‘भुवन सोम’ से समांतर सिनेमा की कथा शुरू होती है, इसलिए उनकी कथा समांतर सिनेमा की नियति से अलग भी नहीं है। मृणाल सेन की ‘भुवन शोम’ और मणि कौल की ‘उसकी रोटी’ ने फिल्मों को एक नयी लीक दी। इस लीक को नाम दिया गया कला फिल्म या समांतर सिनेमा। इन फिल्मों ने फिल्म के सशक्त माध्यम के सही उपयोग का रास्ता खोल दिया। फिल्में सम-सामयिक समाज की जुबान बन गयीं। अब वे सिर्फ मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रह गयीं। वे सामाजिक संदेश भी देने लगीं। इन फिल्मों में फंतासी के बजाय वास्तविकता पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा। दर्शकों को लगने लगा कि फिल्म के रूप में वे अपने गिर्द घिरी समस्याओं, कुरीतियों और भ्रष्टाचार से साक्षात्कार कर रहे हैं। अब फिल्म उनके लिये महज मनोरंजन का जरिया भर नहीं, बल्कि उस समाज का आईना बन गयी जिसमें वे रहते हैं। इस आईने ने उन्हें श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’, ‘मंथन’, गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश’, ‘अर्धसत्य’ से समाज की कई ज्वलंत समस्याओं से रूबरू कराया। इस लिहाज से स्मिता पाटील अभिनीत ‘चक्र’ (निर्देशक-रवींद्र धर्मराज) भी मील का पत्थर साबित हुई। इस तरह के सिनेमा को समांतर सिनेमा का नाम दिया गया जहाँ वास्तविकता को ज्यादा महत्व दिया गया। जीवन के काफी करीब लगने वाली और समय से सही तादात्म्य स्थापित करने वाली इन फिल्मों का दौर लम्‍बे समय तक नहीं चल पाया। तड़क-भड़क, नाच-गाने और ढिशुंग-ढिशुंग से भरी फिल्मों के आगे ये असमय ही मृत्यु को प्राप्त हुईं। जीवंत सिनेमा कही जाने वाली इन फिल्मों की वित्तीय मदद के लिये राष्ट्रीय फिल्म वित्त निगम आगे आया, जो बाद में फिल्म विकास निगम बन गया। उम्मीद की जाती है कि हम समांतर सिनेमा बनायें, लेकिन समांतर सिनेमा को बढ़ावा नहीं मिलता। इनके लिये अच्छे पैसे नहीं मिलते और आम जनता से समर्थन भी नहीं मिलता।

फिल्मों के बारे में बेबाक राय देने में मृणाल दा ने कभी हिचकिचाहट नहीं दिखायी। मसलन बहुचर्चित आठ आस्कर अवार्ड जीत चुकी फिल्म ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ को खराब फिल्म कहा। मृणाल सेन का मानना है कि ऑस्कर सिनेमाई श्रेष्ठता का पैमाना नहीं है और महान फिल्मकारों को कभी इन पुरस्कारों से नवाजा नहीं गया। उन्होंने कहा, ऑस्कर के लिये फिल्मकार अपनी प्रविष्टियाँ भेजते हैं और महान फिल्मकारों ने कभी इसके लिये अपनी फिल्में नहीं भेजी होंगी। आठ ऑस्कर जीतने वाली भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा मैंने फिल्म देखी नहीं है, लेकिन यह जरूर बहुत खराब फिल्म होगी। झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लड़के के करोड़पति बनने की कहानी से पता नहीं वे क्या दिखाना चाहते हैं। इसकी थीम ही खराब है।

मृणाल दा की फिल्म ‘भुवन सोम’ 1969 में बनी थी, जिसे हमने 74-75 में जीआईसी के जमाने में देख लिया। तब तक हमने सत्यजीत राय या ऋत्विक घटक की कोई फिल्म नहीं देखी थी। पर ‘भुवन सोम’ के आगे पीछे ‘अंकुर’, ‘निशांत’,’ मंथन’, ‘दस्तक’, ‘आक्रोश’ जैसी फिल्में हम देख रहे थे। तब हमारे पास कोई टाइमलाइन नहीं थी। मैसूर श्रीनिवास सथ्यू भारतीय फिल्म उद्योग का एक प्रतिष्ठित नाम है। 1973 में बनी उनकी फिल्म ‘गर्म हवा’, न सिर्फ विभाजन पर देश की पहली फिल्म है, बल्कि विभाजन से पैदा मानवीय त्रासदी को संवेदनशील तरीके से सामने लाने वाली फिल्म भी है। सथ्यू हिन्दी और कन्नड़ दोनों भाषाओं में फिल्में बनाते रहे हैं, उनकी बाकी फिल्मों के बारे में नहीं भी बात करें तो भी सिर्फ ‘गर्म हवा’ ही उन्हें भारत के समांतर सिनेमा आंदोलन का सबसे बड़ा नायक साबित करती है। वामपंथी विचारधारा से प्रभावित सथ्यू ने इप्टा के साथ बहुत काम किया। ‘गर्म हवा’ को भी इप्टा के वैचारिक ट्रेंड वाली फिल्म कहा जा सकता है। जिसमें अल्पसंख्यकों के डर और चिंता को बहुत सलीके से उकेरा गया है। साथ ही उनके लौटते आत्मविश्‍वास और भरोसे को भी। चूंकि हम विभाजन पीडि़त परिवार से हैं तो इस फिल्म ने बरसों तक हमारे दिलोदिमाग पर राज किया और आज भी हम इसे विभाजन पर बनी किसी फिल्म से किसी मायने में कमजोर नहीं मानते। इन्हीं मैसूर श्रीनिवास सथ्यू साहब का कहना है कि मृणाल सेन की ‘खंडहर’ हर मायने में विश्‍वस्तरीय फिल्म है। इसमें सिनेमा का हर पहलू चाहे वो कहानी हो, अभिनय हो या फोटोग्राफी सभी कुछ बहुत ऊँचा है।

कौन सी फिल्म पहले बनी और कौन सी बाद में, इसकी सूचना नहीं थी और उम्र के हिसाब से तब हम इंटरमीडिएट के छात्र थे। पर ‘भुवन सोम’ में यथार्थ का जो मानवीय सरल चित्रण मृणाल दा ने पेश किया, वह सबसे अलहदा था। उत्पल दत्त को हमने तरह-तरह की भूमिकाओं में अभिनय करते हुए देखा है, पर भुवन सोम के रूप में उत्पल दत्त की किसी से तुलना ही नहीं की जा सकती।

मृणाल दा की जिन दो फिल्मों की उन दिनों हम छात्रों में सबसे ज्यादा चर्चा थी, वे हैं ‘कोलकाता 71’ और ‘इंटरव्यू’ , जिन्हें देखने के लिये हमें वर्षों इंतजार करना पड़ा। बहरहाल जो बाद में हमें मालूम पड़ा कि बंगाली फिल्मों की तरह ही सेन हिन्‍दी फिल्मों में भी समान रूप से सक्रिय दिखते हैं। इनकी पहली हिन्‍दी फिल्म 1969 की कम बजट वाली फिल्म ‘भुवन सोम’ थी। फिल्म एक अडिय़ल रईसजादे की पिछड़ी हुई ग्रामीण महिला द्वारा सुधार की हास्य-कथा है। साथ ही, यह फिल्म वर्ग-संघर्ष और सामाजिक बाधाओं की कहानी भी प्रस्तुत करती है। फिल्म की संकीर्णता से परे नये स्टाइल का दृश्य चयन और सम्‍पादन भारत में समांतर सिनेमा के उद्भव पर गहरा प्रभाव छोड़ता है। जब हमने ‘भुवन सोम’ देखी तब हमें मालूम ही नहीं था कि जिस श्याम बेनेगल की फिल्मों से हम लोग उन दिनों अभिभूत थे, उनकी वह समांतर फिल्मों की धारा की गंगोत्री ‘भुवन सोम’ में ही है।

हाल में 2010 में मृणाल सेन की फिल्म ‘खंडहर’ कान फिल्म महोत्सव में ‘क्लासिक’ श्रेणी में जब दिखाई गई तो वह उतनी ही ताजा फिल्म लगी जितनी 1984 में लगी थी। उसी साल वह रिलीज हुई थी और इस फिल्मोत्सव में प्रदर्शित भी हुई थी। पुणे के राष्ट्रीय फिल्म लेखागार में अपने नाम के अनुरूप ‘खंडहर’ धूल खा रही थी। बेहतरीन सिनेमा को सहेजने के उद्देश्य से बने इस लेखागार ने पुराने क्लासिक सिनेमा को सहेजने का नया कार्यक्रम शुरू किया है।‘खंडहर’ की रिलायंस मीडियावर्क्‍स ने नये सिरे से रिकॉर्डिंग की है। उस रात थिएटर में मौजूद सेन के प्रशंसकों के लिए ‘खंडहर’ ताजा फिल्म की तरह थी। 87 साल के सेन इस मौके पर मौजूद थे।

हिन्‍दी सिनेमा के समांतर आंदोलन के दिग्गजों श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, सथ्यू, मणि कौल, गुलजार और बांग्ला के फिल्मकार गौतम घोष, उत्पलेंदु,  बुद्धदेव दासगुप्त जैसे तमाम लोग माध्यम बतौर सिनेमा के प्रयोग और उसके व्याकरण के सचेत इस्तेमाल के लिये मृणाल सेन से कई-कई कदम आगे नजर आयेंगे, सत्यजीत रे की बात छोड़ दीजिये! इस मामले में वह कहीं न कहीं ऋत्विक घटक के नजदीक हैं, जिन्हें बाकी दुनिया की उतनी परवाह नहीं थी जितनी कि अपनी माटी और जड़ों की। ऋत्‍वि‍क की फिल्मों में कर्णप्रिय लोकधुनों का कोलाहल और माटी की सोंधी महक अगर खासियत है तो मृणाल दा की फिल्में यथार्थ की चिकित्सीय दक्षता वाली निर्मम चीरफाड़ के लिये विलक्षण हैं।

बंगाल की साहित्यिक और सामाजिक विरासत में मेलोड्रमा का प्राधान्य है । शायद बाकी भारत में भी कमोबेश ऐसा ही है। हम व्यक्ति पूजा, अति नायकीयता और पाखण्ड के बारमूडा त्रिभुज में जीते-मरते हैं। यथार्थ को वस्तुवादी ढंग से विश्‍लेषित करना बंगाली चरित्र में है ही नहीं, इसीलिए चौंतीस साल के वामपंथी शासन में जीने के बावजूद बंगाल के श्रेणी विन्यास, जनसंख्या संतुलन, वर्ग चरित्र और बहिष्‍कृत समाज की हैसियत में कोई फर्क नहीं आया। जैसे सालभर पहले तक वामपंथी आंदोलन का केन्‍द्र बना हुआ था बंगाल वैसे ही आज बंगाल धुर दक्षिणपंथी अमेरिकापरस्त उपभोक्तावादी निहायत स्वार्थी समाज है, जहाँ किसी को किसी की परवाह नहीं और व्यक्तिपूजा की ऐसी धूम कि बाजार में मां काली और बाबा भोलानाथ के हजारों अवतार प्रचलन में हैं और हर शख्स की आँखों में भक्तिभाव का आध्यात्म गदगद।

यह कोई नयी बात नहीं है। नेताजी, रामकृष्ण, विवेकानंद और टैगोर जैसे आइकनों में ही बंगाल अपना परिचय खोजता है। विपन्न जन समूह और सामाजिक यथार्थ से उसका कोई लेना-देना नहीं है। जिस बंकिम चट्टोपाध्याय को साहित्य सम्राट कहते अघाता नहीं बंगाली और बाकी भारत भी जिसके वंदे मातरम पर न्यौछावर है, उन्होंने समकालीन सामाजिक यथार्थ को कभी स्पर्श ही नहीं किया। ‘दुर्गेश नंदिनी’ हो या फिर ‘आनंदमठ’ या ‘राजसिंह’, सुदूर अतीत और तीव्र जातीय घृणा ही उनकी साहित्यिक सम्‍पदा रही है। ‘रजनी’, ‘विषवृक्ष’ और ‘कृष्णकांतेर विल’ में उन्होंने बाकायदा यथार्थ से पलायन करते हुए थोपे हुए यथार्थ से चमत्कार किये हैं। समूचे बांग्ला साहित्य में रवीन्द्रनाथ से पहले सामाजिक यथार्थ अनुपस्थित है। पर मजे की बात तो यह है कि ‘दो बीघा जमीन’ पर चर्चा ज्यादा होती है और ‘चंडालिका’ या ‘रूस की चिट्ठी’ पर चर्चा कम। ताराशंकर बंद्योपाध्याय का कथा साहित्य फिल्मकारों में काफी लोकप्रिय रहा है। स्वयं सत्यजीत राय ने उनकी कहानी पर ‘जलसाघर’ जैसी अद्भुत फिल्म बनायी। पर इसी फिल्म में साफ जाहिर है कि पतनशील सामंतवाद के पूर्वग्रह से वह कितने घिरे हुए थे। वह बहिष्कृत समुदायों की कथा फोटोग्राफर की दक्षता से कहते जरूर रहे और उन पर तमाम फिल्में भी बनती रहीं, पर इस पूरे वृतांत में वंचितों, उत्पीडि़तों और अस्पृश्यों के प्रति अनिवार्य घृणा भावना उसी तरह मुखर है, जैसे कि शरत साहित्य में।

माणिक बंद्योपाध्याय से लेकर महाश्‍वेता देवी तक सामाजिक यथार्थ के चितेरे बंगाल में कभी लोकप्रिय नहीं रहे। मृणाल दा भी सत्यजीत राय या ऋत्विक घटक के मुकाबले कम लोकप्रिय रहे हैं हमेशा। पर लोकप्रिय सिनेमा बनाना उनका मकसद कभी नहीं रहा। ऋत्विक दा, सआदत हसन मंटो या बांग्लादेश के अख्तरुज्जमान इलियस की तरह मृणाल दा न बागी हैं और न उनमें वह रचनात्मक जुनून दिखता है, पर सामाजिक यथार्थ के निर्मम चीरफाड़ में उन्हें आखिरकार इसी श्रेणी में रखना होगा जो कि सचमुच खुले बाजार के इस उपभोक्तावादी स्वार्थी भिखमंगे दुष्ट समय में एक विलुप्त प्रजाति है। इसीलिए मृणाल दा की सक्रियता का मतलब यह भी हुआ कि सबने बाजार के आगे आत्मसमर्पण किया नहीं है अभी तक। यह भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़ी खुशखबरी है।

मृणाल सेन भारतीय फिल्मों के प्रसिद्ध निर्माता व निर्देशक हैं। इनकी अधिकतर फिल्में बांग्ला भाषा में हैं। उनका जन्म फरीदपुर नामक शहर में (जो अब बंगलादेश में है) में 14 मई 1923 में हुआ था। हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने बाद उन्होंने शहर छोड़ दिया और कोलकाता में पढ़ने के लिये आ गये। वह भौतिक शास्त्र के विद्यार्थी थे और उन्होंने अपनी शिक्षा स्कोटिश चर्च कॉलेज एवं कलकत्ता यूनीवर्सिटी से पूरी की। अपने विद्यार्थी जीवन में ही वह कम्युनिस्ट पार्टी के सांस्कृतिक विभाग से जुड़ गये। यद्यपि वह कभी इस पार्टी के सदस्य नहीं रहे पर इप्टा से जुड़े होने के कारण वह अनेक समान विचारों वाले सांस्कृतिक रुचि के लोगों के परिचय में आ गये। संयोग से एक दिन फिल्म के सौंदर्यशास्त्र पर आधारित एक पुस्तक उनके हाथ लग गई। जिसके कारण उनकी रुचि फिल्मों की ओर बढ़ी। इसके बावजूद उनका रुझान बुद्धिजीवी रहा और मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव की नौकरी के कारण कलकत्ता से दूर होना पड़ा। यह बहुत ज्यादा समय तक नहीं चला। वह वापस आये और कलकत्ता फिल्म स्टूडियो में ध्वनि टेक्नीशियन के पद पर कार्य करने लगे जो आगे चलकर फिल्म जगत में उनके प्रवेश का कारण बना। फिल्मों में जीवन के यथार्थ को रचने से जुड़े और पढ़ने के शौकीन मृणाल सेन ने फिल्मों के बारे में गहराई से अध्ययन किया और सिनेमा पर कई पुस्तकें भी प्रकाशित कीं, जिनमें शामिल हैं- ‘न्यूज ऑन सिनेमा’ (1977) तथा ‘सिनेमा, आधुनिकता’ (1992)।

1955 में मृणाल सेन ने अपनी पहली फीचर फि‍ल्म ‘रातभोर’ बनाई। उनकी अगली फिल्म ‘नील आकाशेर नीचे’ ने उनको स्थानीय पहचान दी और उनकी तीसरी फिल्म ‘बाइशे श्रावण’ ने उनको अन्तर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि दिलाई। पाँच और फिल्में बनाने के बाद मृणाल सेन ने भारत सरकार की छोटी सी सहायता राशि से ‘भुवन शोम’ बनाई, जिसने उनको बड़े फिल्मकारों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया और उनको राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्रदान की। ‘भुवन शोम’ ने भारतीय फि‍ल्म जगत में क्रांति ला दी और कम बजट की यथार्थपरक फिल्मों का ‘नया सिनेमा’ या ‘समांतर सिनेमा’ नाम से एक नया युग शुरू हुआ।

इसके उपरान्त उन्होंने जो भी फिल्में बनायीं वह राजनीति से प्रेरित थीं जिसके कारण वह मार्क्‍सवादी कलाकार के रूप में जाने गये। वह समय पूरे भारत में राजनीतिक उतार-चढ़ाव का समय था। विशेषकर कलकत्ता और उसके आसपास के क्षेत्र इससे ज्यादा प्रभावित थे, जिसने नक्सलवादी विचारधारा को जन्म दिया। उस समय लगातार कई ऐसी फिल्में आयीं जिसमें उन्होंने मध्यमवर्गीय समाज में पनपते असंतोष को आवाज दी। यह निर्विवाद रूप से उनका सबसे रचनात्मक समय था।

1960 की उनकी फिल्म ‘बाइशे श्रावण’, जो कि 1943 में बंगाल में आये भयंकर अकाल पर आधारित थी और ‘आकाश कुसुम’ (1965) ने एक महान निर्देशक के रूप में मृणाल सेन की छवि को विस्तार दिया। मृणाल की अन्य सफल बंगाली फिल्में रहीं- ‘इंटरव्यू’ (1970), ‘कलकत्ता 71’(1972) और ‘पदातिक’ (1973), जिन्हें ‘कोलकाता ट्रायोलॉजी’ कहा जाता है।

मृणाल सेन की अगली हिंदी फिल्म ‘एक अधूरी कहानी’ (1971) वर्ग-संघर्ष (क्लास वार) के अन्यतम प्रारूप को चित्रित करती है जिसमें फैक्ट्री मजदूरों और उनके मध्य तथा उच्च वर्गीय मालिकों के बीच का संघर्ष फिल्माया गया है। 1976 की सेन की फिल्म ‘मृगया’ उनकी दूरदर्शिता और अपार निर्देशकीय गुणों को परिलक्षित करती है। भारत की स्वतंत्रता के पूर्व के धरातल को दर्शाती यह फिल्म संथाल समुदायों की दुनिया और उपनिवेशवादी शासन के बीच के संपर्क की अलग तरह की गाथा है।

1980 के दशक में मृणाल की फिल्में राजनीतिक परिदृश्यों से मुड़ कर मध्यवर्गीय जीवन की यथार्थवादी थीमों की ओर अग्रसर होती हैं। ‘एक दिन अचानक’ (1988) में भी तथापि तथाकथित स्टेटस का प्रश्‍न एक गहरे असंतोष के साथ प्रकट होता है।

मृणाल सेन को भारत सरकार द्वारा 1981 में कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। भारत सरकार ने उनको पद्म विभूषण पुरस्कार एवं 2005 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया। उनको 1998 में मानद संसद सदस्यता भी मिली। फ्रांस सरकार ने उनको ‘कमांडर ऑफ दि ऑर्ट ऐंड लेटर्स’ उपाधि से एवं रूस की सरकार ने ‘ऑर्डर ऑफ फ्रेंडशिप’ सम्मान प्रदान किये।

सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक के साथ ही दुनिया की नजरों में भारतीय सिनेमा की छवि बदलने वाले सेन ने कहा कि हर रोज मैं एक नई फिल्म बनाने के बारे में सोचता हूँ। देखते हैं कब मैं उस पर काम करता हूँ। अभिनेत्री नंदिता दास अभिनीत उनकी अंतिम फिल्म ‘आमार भुवन’ (यह, मेरी जमीन) वर्ष 2002 में प्रदर्शित हुई थी। उन्होंने कहा कि मैंने उसके बाद कोई फिल्म नहीं बनाई लेकिन मैंने यह कभी नहीं सोचा कि मैं सेवानिवृत हो गया हूँ।

उनकी फिल्मों में प्रत्यक्ष राजनीतिक टिप्पणियों के अलावा सामाजिक विश्‍लेषण और मनोवैज्ञानिक घटनाक्रमों की प्रधानता रही है। वाम झुकाव वाले निर्देशक भारत में वैकल्पिक सिनेमा आंदोलन के अग्रणी के रूप में जाने जाते हैं और अक्सर उनकी तुलना उनके समकालीन सत्यजीत रे के साथ की जाती है। खंडहर (1984) और भुवन सोम (1969) जैसी फिल्मों में बेहतरीन निर्देशन के लिये चार बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने के अलावा उन्हें फिल्म निर्माण में भारत के सबसे बड़े पुरस्कार दादा साहेब फाल्के से वर्ष 2005 में सम्मनित किया गया था। हाल ही में एक बड़े निजी बैंक ने उन्हें फिल्म बनाने के लिए धन देने का प्रस्ताव दिया था।

सेन ने कहा कि मेरे लिए धन की समस्या नहीं है। बैंक ने कहा है कि हम लोग पाँच करोड़ से अधिक की धनराशि देने के लिये तैयार हैं। मैंने उनसे कहा कि मैं पाँच करोड़ में छह फिल्म बना सकता हूँ। जब उनसे उनके जन्मदिन की पार्टी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वह जन्मदिन की पार्टी नहीं मनाएंगे। सेन ने कहा कि जन्म या मौत पर जश्‍न मनाना मेरा काम नहीं है। मेरे दोस्त, संबंधी या अन्य लोग जो मेरे लिये सोचते हैं, वे अगर चाहते हैं तो जश्‍न मना सकते हैं।

उन्होंने कहा कि एक बात जो मुझे इस बुढ़ापे में परेशान करती है वह है मेरी फिल्मों के प्रिंट का जर्जर होना। जिसमें कई आज भी दर्शनीय मानी जाती हैं। सेन ने कहा कि उनमें से अधिकांश की स्थिति बहुत खराब है। ऐसा खराब जलवायु और उचित रखरखाव के अभाव के कारण हो रहा है।

मृणाल सेन की कथा के साथ भारतीय सिनेमा के बदलते हुए परिदृश्य को भी जेहन में रखें तो मृणाल सेन के संकल्प का सही मतलब समझ में आयेगा। गौरतलब है कि सत्तर के दशक के आक्रोश के प्रतीक ‘एंग्री यंग मैन’ के रचयिता सलीम-जावेद की जोड़ी बिखर चुकी थी और सदी के महानायक अमिताभ का सितारा अब बुझ रहा था। ‘तेजाब’, ‘परिंदा’, ‘काला बाजार’ जैसी फिल्मों के साथ आधुनिक शहर की अंधेरी गुफाएं सिनेमा में आने लगीं। इन्हीं बरसों में जेन नेक्स्ट के स्टार अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ वगैरह उभरे। पॉपुलर फिल्मों के बरक्स समांतर सिनेमा ने इस दशक में अपनी मौजूदगी का अहसास और गहरा किया। ‘जाने भी दो यारों’ ने सत्ता की काली करतूत, ‘अर्धसत्य’ ने सड़ चुके सिस्टम के भीतर जीने की तकलीफ और ‘सलाम बॉम्बे’ ने शहर के हाशिए को जिस असरदार अंदाज में पर्दे पर दिखाया, वह हिन्‍दी समांतर सिनेमा किस ऊँचाई पर पहुंच चुका था, यह बताने के लिये काफी है। कहते हैं कि शुरुआती दिनों में स्क्रीनप्ले रायटर जोड़ी सलीम-जावेद खुद पेंट का डिब्बा हाथ में लेकर अपनी फिल्मों के पोस्टरों पर अपना नाम लिखा करते थे। यही वह जोड़ी थी, जिसने एक सत्तालोलुप और भ्रष्ट समाज के प्रति आम आदमी के विद्रोह को सिनेमाई पर्दे पर जिंदा किया। ‘ऐंग्री यंग मैन’ का जन्म समाज में दहकते नक्सलबाड़ी के अंगारों पर हुआ था और अमिताभ बच्चन के रूप में हिंदी सिनेमा ने सदी के महानायक को इसी जोड़ी के जरिए पाया। अमिताभ दिन में ‘शोले’ की शूटिंग किया करते और मुंबई की जागती रातों में ‘दीवार’ का क्लाइमेक्स फिल्माया जाता था। इसी दशक में समांतर सिनेमा शुरू हुआ, जिसने हिंदी सिनेमा के चालू नुस्खों से अलग जाकर अपना रास्ता बनाया। श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ के साथ शुरू हुआ यह सफर नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल, शबाना आजमी जैसे कलाकारों को हिन्‍दी सिनेमा में लेकर आया। 1975 में स्थापित हुई नैशनल फिल्म डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन ने इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हृषिकेश मुखर्जी, गुलजार, बासु चटर्जी की फिल्मों को साथ लेकर देखें तो पता चलेगा कि इस दशक तक आते-आते हिन्‍दी सिनेमा में काफी वेरायटी आ चुकी थी और कई मिजाज, सोच और अप्रोच की फिल्में एक साथ दर्शकों के बीच थीं। लेकिन समांतर सिनेमा के वे चर्चित नाम अब कहीं सुनायी नहीं देते, जबकि हमें मृणाल दा की सिंह गर्जना की गूँज अब भी सुनायी पड़ रही है।

विनोद भारद्वाज के लिखे ये उद्धरण मृणाल दा के अवदान और समांतर सिनेमा दोनों को समझने और जानकारी बढ़ाने में सहायक हैं। उन्होंने जो लिखा है, खासा महत्वपूर्ण है, जरा गौर फरमाये!

साठ के दशक में उभरे नये सिनेमा के कई नाम हैं-समांतर सिनेमा, सार्थक सिनेमा, आर्ट सिनेमा, नयी धारा, प्रयोगधर्मी सिनेमा, गैर-पेशेवर सिनेमा। समांतर सिनेमा (पैरलल सिनेमा) ही शायद सबसे सही नाम है। सन् 1960 में फिल्म वित्त निगम (फिल्म फाइनेंस कार्पोरेशन या एफएफसी) ने सिनेमा के लिये जगह बनानी शुरू की थी और साठ के दशक के अंतिम वर्षों में भारतीय भाषाओं में एक साथ कई ऐसी फिल्में बनीं जिन्होंने नयी धारा आंदोलन को ऐतिहासिक पहचान दी। फ्राँस में पचास के दशक में कुछ युवा फिल्म समीक्षकों ने नयी धारा को विश्‍व सिनेमा के इतिहास में अपने ढंग से रेखांकित किया और जब उन्होंने (गोदार, फ्रांसुआ त्रुफो आदि) अपनी फिल्में बनानी शुरू कीं तो उन फिल्मों को फ्राँसीसी भाषा में नूवेल वाग (न्यू वेव यानी नयी धारा या लहर) नाम दिया गया। एफएफसी ने शुरू में सुरक्षित रास्ता चुना था और वी. शांताराम की ‘स्त्री’ (1962) सरीखी फिल्मों से शुरुआत की थी। सत्यजित राय की ‘चारुलता’, ‘नायक’, ‘गोपी गायन बाघा बायन’ सरीखी फिल्में भी इसी स्रोत से बनीं। राय तब तक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पा चुके थे। शांताराम तो खैर मुख्यधारा के सिनेमा की पैदाइश थे। लेकिन फिल्म पत्रकार बीके करंजिया जब एफएफसी के अध्यक्ष बने, तो कम बजट की प्रयोगधर्मी फिल्मों को बढ़ावा मिलना शुरू हुआ।

उन्होंने जो लिखा है, बांग्ला फिल्मकार मृणाल सेन की ‘भुवन शोम’ (1969) से समांतर सिनेमा की शुरुआत मानी जा सकती है। इस फिल्म का बजट कम था, नायक उत्पल दत्त भले ही नायककार और अभिनेता के रूप में मशहूर थे, लेकिन नायिका सुहासिनी मुले बिलकुल नया चेहरा थीं। ‘भुवन शोम’ का नायक रेलवे में एक अक्खड़-अकड़ू अफसर था जो गुजरात के उजाड़ में चिडि़यों के शिकार के चक्कर में एक ग्रामीण लड़की के सामने अपनी हेकड़ी भूलने पर मजबूर हो जाता है। लड़की को इस तानाशाह अफसर का कोई डर नहीं है। अफसर को जीवन की नयी समझ मिलती है। खुद सत्यजित राय को समांतर सिनेमा का एक नाम कहा जा सकता है। मृणाल सेन, राय और ऋत्विक घटक लगभग एक ही दौर में अपनी फिल्मों से भारत के बेहतर सिनेमा के चर्चित प्रतिनिधि साबित हुए थे। राय को पश्‍चि‍म में अधिक ख्याति और चर्चा मिली, मृणाल सेन राजनीतिक दृष्टि से अधिक प्रतिबद्ध थे और ऋत्विक घटक बाद में भारतीय समांतर सिनेमा के अघोषित गुरु बना दिये गये। मणि कौल, कुमार शहानी आदि नयी धारा के फिल्मकार घटक के छात्रा थे और वे राय के सिनेमा को अपना ‘पूर्ववर्ती’ नहीं मानते थे। कुमार शहानी क्योंकि फ्रांस में रॉबर्ट ब्रेसां सरीखे चर्चित प्रयोगधर्मी फिल्मकार के साथ भी काम कर चुके थे, इसलिये उनकी पहली फिल्म ‘माया दर्पण’ को प्रयोगधर्मी सिनेमा के प्रारम्‍भि‍क इतिहास में मील का पत्थर बना दिया गया। मणि कौल की ‘उसकी रोटी’ एक दूसरा मील का पत्थर थी।

उन्होंने जो लिखा है, समांतर सिनेमा के दो सिरे थे- एक सिरे पर ‘भुवन शोम’, ‘सारा आकाश’ (बासु चटर्जी), ‘गर्म हवा’ (एमएस सथ्यू), ‘अंकुर’ (श्याम बेनेगल) आदि थीं जिनमें सिनेमा के मुख्य गुणों को पूरी तरह से छोड़ नहीं दिया गया था। दूसरे सिरे पर ‘उसकी रोटी’, ‘माया दर्पण’, ‘दुविधा’ (मणि कौल) आदि फिल्में थीं जो सिनेमा की प्रचलित परिभाषा से काफी दूर थीं। राय ने 1971 में ‘ऐन इंडियन न्यू वेव?’ नाम से एक लम्‍बे लेख में विश्‍व सिनेमा को ध्यान में रख कर भारतीय समांतर सिनेमा पर सवाल उठाये थे। सन् 1974 में उन्होंने ‘फोर ऐंड ए क्वार्टर’ नाम से अपने एक दूसरे लेख में ‘गर्म हवा’, ‘माया दर्पण’, ‘दुविधा’, ‘अंकुर’ पर लिखा था।

‘भुवन शोम’, ‘गर्म हवा’, ‘अंकुर’ ऐसी फिल्में नहीं थीं जिन्हें देखकर दर्शक ‘अपना सर पकड़ कर’ बाहर आये। ‘गाइड’ (जो निश्‍चय ही हिन्‍दी सिनेमा की एक उपलब्धि है) के निर्देशक विजय आनंद मुंबई के मैट्रो सिनेमा में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के दौरान एक फिल्म छोड़कर अपना सर पकड़े बाहर आये और कॉफी पी रहे थे। उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक से यह टिप्पणी की थी।

मृणाल सेन की प्रसि‍द्ध फि‍ल्‍में-
रातभोर, नील आकाशेर नीचे, बेशाये श्रावण, पुनश्च, अवशेष, प्रतिनिधि, अकाश कुसुम, मतीरा मनीषा, भुवन शोम, इच्छा पुराण, इंटरव्यू, एक अधूरी कहानी, कलकत्ता 1971, बड़ारिक, कोरस, मृगया, ओका उरी कथा, परसुराम, एक दिन प्रतिदिन, अकालेर संधनी, चलचित्र, खारिज, खंडहर, जेनसिस, एक दिन अचानक, सिटी लाइफ-कलकत्ता माई एल-डराडो,  महापृथ्वी, अन्तरीन, 100 ईयर्स ऑफ सिनेमा और आमार भुवन।

(समकालीन तीसरी दुनिया, जून 2012 से साभार)