Archive for: May 2012

जो रचता है वह मारा नहीं जाता है : महेश चंद्र पुनेठा

भगवत रावत

हि‍न्‍दी के सुप्रसि‍द्ध कवि‍ भगवत रावत (13 सितंबर 1939- 25 मई 2012) को श्रद्धांजलि‍स्‍वरूप चर्चित कवि‍ महेश चंद्र पुनेठा का आलेख

मैं भगवत रावत से बरास्ता उनकी कविताओं से ही परिचित हूँ। उनकी कविताओं को अक्सर पढ़ता रहा हूँ। वे मेरे पसंदीदा कवियों में से एक हैं। उनकी कविताओं में कथारस की प्रधानता मुझे बहुत प्रीतिकर लगती है। मेरे लिये भगवत रावत उन विरले कवियों में हैं जिनकी कविताएं मात्र सम्‍वेदना नहीं जगातीं बल्कि हमें सचेत भी करती हैं। करुणा और प्रेम में ही नहीं डुबाती हैं बल्कि बेचैन भी करती हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है, जैसे हम देश के उन आम-आदमियों से मिल रहे हैं जो इस पृथ्वी को कच्छप की तरह अपनी पीठ पर धारण किये हुए हैं पर उन्हें न इस बात का न भान है और न गुमान। उस आदमी को देख रहे हैं जो चारों और फैली हुई/स्थिर और कठोर चट्टानों की दुनिया के बीच..झाड़ियों में सूखे डंठल बटोरकर/आग जलाता है। उससे बातचीत कर रहे हैं जो अपनी पहचान के लिये जूझ रहा है। उस आदमी के सुख-दुःख बाँट रहे हैं जो जीवन भर दूसरों का माल-असबाब ढोता रहा फिर भी गरीबी का बोझ नहीं उतार पाया है।

भगवत रावत की कवितायें अपने चारों ओर के छल-छद्म, स्वार्थ, मक्कारी, झूठ, फरेब से कुंठित और निराश हो चले व्यक्ति को सकून तथा आत्मविश्‍वास प्रदान करती हैं। उनकी कवितायें भरोसा दिलाती हैं कि अभी दुनिया इतनी ‘गलीज नहीं हुई है कि हम इससे भागने की सोचें और एक सम्‍वेदनशील व्यक्ति के रहने योग्य न समझें, आशा एवं सुख के अनेक द्वीप अभी बचे हुए। पल-पल के हिसाब वाले इन दिनों में अभी भी सम्‍भव है- न कोई रिश्तेदारी, न कोई मतलब/न कोई कुछ लेना-देना, न चिट्ठी पत्री/न कोई खबर, कोई सेठ न साहूकार/एक साधारण सा आदमी/पाटता तीस-पैंतीस से ज्यादा वर्षों की दूरी/खोजता-खोजता, पूछता-पूछता घर-मोहल्ला/वह भी अकेला नहीं पत्नी  को साथ लिये/सिर्फ दोस्त की बेटी के ब्याह में शामिल होने चला आया। भगवत रावत ऐसे आत्मीयता भरे क्षणों को कविता की विषयवस्तु बनाकर उसे जीवनधर्मी बना देते हैं। कविता में सौंदर्य की प्रस्थापना के लिये उन्हें कहीं विशिष्ट की खोज में नहीं जाना पड़ता है। रास्ते में पड़े उबड़खाबड़-खुरदुरे पत्थर को उठाकर सुन्‍दर मूर्ति बना देने का अद्भुत हुनर उनके पास था। जीवन के छोटे-छोटे क्षणों को ही संश्‍लि‍ष्टता की बदौलत बड़ी कविता का रूप दे देते हैं। यह उनकी जीवन के प्रति गहरी रागात्मकता का प्रमाण है। इसी का बल है वह उन लोगों को देख पाते हैं जो- बैलों के साथ जुते/अपना बदन तोड़ते/हंसिए की तेज धार से/अपनी उम्र काटते’ हैं। उन्हें इस बात पर अपराध बोध भी होता है कि- हमेशा आगे बढ़ गया/पत्थरों से निकली हुई उनकी चिंगारियों को/कभी अपने जिस्म पर नहीं लिया/तांगा हाँकते हुए/उनके हाथों से/कभी घोड़े की रास/ अपने हाथों में नहीं ली। ऐसा वही कह सकता है जिसे इस वर्ग  से गहरी आत्मीयता हो और उनके श्रम की कीमत को पहचानता हो। जिसके सृजन का केन्‍द्र क्रियाशील जीवन हो। इसलिये बहुत कम भरोसे के लायक बची इस दुनिया में भी उनकी कविता एक ‘भरोसा’ प्रदान करती है। कुछ उसी तरह जैसे बर्तन वाली बाई को है। उसे भरोसा है कि एक दिन/उसकी लकड़ी मिल जाएगी/उसे भरोसा है कि एक दिन/अपराधी पकड़े जायेंगे। यही भरोसा है जो पीड़ित-शोषित-उपेक्षित जनों को संघर्ष के लिये प्रेरित करता है। जिसका बना रहना बहुत जरूरी है अन्यथा शोषक वर्ग द्वारा तो निरन्‍तर इसे तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है ताकि संघर्षशील जनता द्वारा वर्तमान व्यवस्था को ही अपनी नियति मान लिया जाये। उनकी कविता की सबसे बड़ी ताकत उस आदमी की तलाश है ‘जो थका-माँदा लगभग पराजित और अपमानित जीवन व्यतीत करता हुआ भी हारा नहीं’  है। जिसको दृढ़ विश्वास है कि ‘एक न एक दिन उसकी सच्चाई रंग लायेगी।’

भगवत रावत की कवितायें उन मित्रों की तरह हैं जो हमसे दूर रहते हुए भी जरूरत पर हमारे पास आ प्रकट होते हैं और हमें ताजगी से भर देते हैं। बचपन के किसी दोस्त की तरह हमारे अकेलेपन में आकर हमारे कंधे पर हाथ रख ‘चुपचाप अपना बीड़ी का बंडल बढ़ा’ देती हैं। अकेले में भी हमारे भीतर बजती रहती हैं। जब भी उनकी कवितायें पढ़ता हूँ अपने-आप को समृद्ध पाता हूँ। लगता है अपने लोगों से मिलकर लौटा हूँ जिन्होंने–‘जोड़-जाड़कर जुटी घरेलू दुनिया में पले-बढ़े तमाम आदमियों की तरह घरेलू दुनिया से ज्यादा बड़े सुख का सपना कभी नहीं देखा’।

उनकी कवितायें दुनिया की आपाधापी से बच-बचाकर आती हैं इसलिये कवि पाठकों से अपील करता है कि उनसे हड़बड़ी में नहीं मिला जाये- कम से कम अपना पसीना सुखा सकें/इतना समय/उन्हें दें/उन्हें बस इतना अपना/हो लेने दें/कि वे आपसे/बातचीत किये बिना/वापस न जायें। वास्तव में उनकी कविताओं को  धैर्य से पढ़ने की आवश्यकता है। ऊपर से सीधी-सरल लगने वाली उनकी कवितायें अपने भीतर बहुत कुछ समाए रहती हैं। उनका हमेशा सचेत प्रयास रहा है कि कविता को इतना सरल-सहज बनाया जाय कि वह सीधे पाठक के मन में उतर जाय। उनकी मान्यता रही कि हमारे नागरिक समाज में शायद ही ऐसा कोई हो जिसके मन में कविता के बारे में कुछ न कुछ धारणा न हो। उनका विश्‍वास था कि वह जो लिखेंगे उसे अवश्य ही कोई न कोई, न केवल समझेगा, उससे प्रतिकृत और प्रभावित भी होगा। वह कविताओं को बार-बार पढ़े जाने का आग्रह करते थे क्योंकि विभिन्न मनःस्थितियों में कवितायें विभिन्न अर्थ छवियाँ देती हैं। उनकी कविता में हमारे समय के निशान बहुत व्यापक एवं गहरे हैं। वह अपने समय की घटनाओं, दुर्घटनाओं, छल, प्रपंच,  पाखंड, प्रेम, करुणा, संहार, षड्यंत्र, राजनीति को अपने कथ्य का मुख्य आधार बनाते हैं। उन्हें पता है, मनुष्यता को बचाने के नाम पर कैसे मनुष्यता का कत्ल किया जा रहा है। वह जीवन भर मनुष्यता की खोज करते रहे भले ही वह इस खोज के पीछे भागते-दौड़ते थक से गये पर हारे नहीं।

उनके लिए-दुनिया का सबसे कठिन काम है जीना/और उससे भी कठिन शब्द के अर्थ की तरह/रच कर दिखा पाना/जो रचता है वह मारा नहीं जाता है। यह बात आज उन्हीं के सन्‍दर्भ में सही सिद्ध भी हो रही है भगवत रावत कभी मर नहीं सकते। सर्जन के प्रति उनकी इतनी गहरी आस्था जीवन के प्रति आस्था का ही पर्याय है। जीवन उनके लिये खाना-पीना-सोना और ऐश करना कभी नहीं रहा न ही अपनों की खुशी के लिए जीना। बल्कि रच कर दिखाना रहा। भला ऐसा कवि कभी मर सकता है क्या?  अपनी कविताओं से भगवत रावत हमेशा जिंदा रहेंगे। उनकी सादगी और विनम्रता हमेशा याद रहेगी।

विभाजन और मंटो ने मुझे प्रभावित किया : नरेन्द्र मोहन

नरेन्द्र मोहन

नई दिल्ली : साहित्य अकादेमी के कार्यक्रम ‘लेखक से भेंट’ के अंतर्गत  25 मई 2012 को वरिष्ठ कवि, नाटककार नरेन्द्र मोहन से मुलाक़ात कराई गई। ‘कहे कबीर सुनो भाई साधो’, ‘नो मैंस लैंड’ और ‘मिस्टर जिन्ना’ जैसे चर्चित नाटकों के लेखक तथा अपनी लम्‍बी कविता श्रृंखलाओं के लिये पहचाने जाने वाले नरेन्द्र मोहन ने कार्यक्रम के आरम्‍भ में अपना लिखित आत्मकथ्य और उसके बाद हाल ही में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘मंटो ज़िंदा है’ का अंतिम अंश पढ़ा। यह पुस्तक मंटो की जीवनी है और इसका अंतिम हिस्सा उनके जीवन के बिल्कुल अंतिम क्षणों पर प्रकाश डालता है। श्रोताओं के अनुरोध पर उन्होंने ‘पुतली नाच’ कविता श्रृंखला की पाँच कवितायें भी सुनाईं।

लाहौर में 1935 में जन्में नरेन्‍द्र मोहन ने अपने आत्मकथ्य में कहा कि उनके जीवन पर विभाजन और मंटो का बेहद गहरा प्रभाव पड़ा है। इसीलिये मेरे लेखन में अंधेरे और उदासी के प्रतीकों को बेहद आराम से ढूँढा जा सकता है। विभाजन की त्रासदी ने मेरी भाषा के मुहावरे को बेहद ठंडा बना दिया, लेकिन उससे विचारों की गर्मी रत्ती भर भी प्रभावित नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि यह मंटो का शताब्दी वर्ष है और वह भी महात्मा गाँधी की तरह अपनों की ही उपेक्षा के शिकार हुये थे। उन्होंने पाठकों को हमेशा अच्छी रचना पर भरोसा करने की सलाह दी न कि रचनाकार पर।

कार्यक्रम की शुरुआत में अकादेमी के सचिव अग्रहार कृष्णमूर्ति ने नरेन्द्र मोहन को फूलों का गुलदस्ता भेंट कर उनका स्वागत किया और उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने उनका संक्षिप्त परिचय दिया।

कार्यक्रम में त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी,  के.जी.वर्मा,  कुसुम अंसल,  कमल कुमार, देवेन्द्रराज अंकुर, प्रयाग शुक्ल, अरविंद गौड़, दयाप्रकाश सिन्हा, प्रेम जनमेजय, मदन कश्यप, रणजीत साहा, हरदयाल, कुलदीप सलिल आदि लेखकों, पत्रकारों और नाट्यकर्मियों ने हिस्सा लिया।

कार्यक्रम से पहले वरिष्ठ हिन्‍दी कवि भगवत रावत की मृत्यु पर दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई।

प्रस्तुति : अजय कुमार शर्मा

पूरनचंद्र जोशी की कवि‍तायें

पूरनचंद्र जोशी

9 मार्च, 1928 को ग्राम दिगोली, अल्‍मोड़ा (उत्‍तराखण्‍ड) में जन्‍में प्रसि‍द्ध अर्थशास्‍त्री और समाजशास्‍त्री पूरनचंद्र जोशी की ‘भारतीय ग्राम’, ‘परि‍वर्तन और वि‍कास के सांस्‍कृति‍क आयाम’, ‘आजादी की आधी सदी : स्‍वप्‍न और यथार्थ’, ‘अवधारणों का संकट’ आदि‍ एक दर्जन से अधि‍क पुस्‍तकें प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। हाल ही मैं उनकी दो कवि‍ताओं की पुस्‍तकें ‘इत्‍यादि‍ जन’ और ‘हि‍माद्रि‍ को देखा’ प्रकाशि‍त हुई हैं।  पूरनचंद्र जोशी की पाँच कवि‍तायें-

आँकड़े और आदमी

कैसा अजूबा है
केन्‍द्र में आँकडे़
हाशि‍ये पर आदमी
आँकड़ों के नीचे
दब गया आदमी

आँकड़ों में खो गया
सुदूर डुमका से
दस हजार फुट ऊँचे
पहाड़ पर पहुँचा
बद्रीनाथ पथ पर
तोड़ता पत्‍थर
मजूर बालक अनाम
माँ बाप से बि‍छुड़ा
अपनी जड़ों से उखड़ा
मजूद बालक अनाम
आँकड़ों में खो गई
बि‍हार के गाँवों की त्रासदी
आँकड़ों में खो गई
गाँव से उखड़ी
आज यहाँ कल वहाँ
ठेकेदार के बँधुवा
लक्ष्‍मी जैसे
मजूरों की त्रासदी

आँकड़ों में खो गई
पहाड़ के सरहदी गाँव की
बुढ़ि‍या माँ बचुली
शहर को चले गये
लड़के और बहुएं
गाँव में माँ रही अकेली
भारी बारि‍श में टूट गया घर
गाय और बछड़ों के साथ
हो गई खुद बेघर
इंदि‍रा आवास योजना का
अनुदान
अधि‍कारी हड़प गये
बुढ़ि‍या को उन्‍होंने
पागल दि‍या करार
यही बचुली की तरह
कि‍तनी पहाड़ी औरतों की त्रासदी
आँकड़ों में खो गयी
कि‍तनी पहाड़ी नारि‍यों की त्रासदी

कैसा अजूबा है
सरकारी रि‍पोर्ट में
नि‍र्जीव
आँकड़े ही आँकड़े हैं
जीते जागते मजूरों के
दुख दर्द संघर्ष नहीं
आँकड़ों में खो गई
कठोर जि‍न्‍दगी से जूझते
आदमी/औरतों की त्रासदी।

आँकड़ों का चमत्‍कार

सरकारी रि‍पोर्ट क्‍या है
आँकड़ों का पि‍टारा
सरकारी रि‍पोर्ट क्‍या है
मि‍थकों का पि‍टारा
आँकड़ों का चमत्‍कार
आँकड़ों के औसत में
घट गई गरीबी
आँकड़ों के औसत में
मि‍ट गई भुखमरी

आँकड़ों के औसत में
वि‍पन्‍न भी लगते कम वि‍पन्‍न
आँकड़ों के औसत में
सम्‍पन्‍न भी लगते कम सम्‍पन्‍न

आँकड़ों के औसत में
अमीर और गरीब की दरार
एकदम अदृश्‍य हुई
कैसा चमत्‍कार
आँकड़ों का चमत्‍कार।

आँखों देखी

देखता आया हूँ लगातार
इन आँखों से
एक हैं वे लोग
जो पैदा हुए हैं
केवल दुख भोगने
और आँसू बहाने के लि‍ये

एक हैं वे लोग
इनसान की शक्‍ल में हिंस्र पशु
जो करते हैं मजबूर अनेकों को
दुख भोगने और आँसू बहाने के लि‍ये

एक हैं वे लोग
जि‍नका जन्‍म ही हुआ है
दूसरों के दुखों को अपनाने
और उनके आँसू पोंछने के लि‍ये।

ये शि‍ल्‍पी हैं

ये शि‍ल्‍पी हैं
इति‍हास गवाह है
इन्‍होंने ही बनाया ताजमहल
इन्‍होंने ही बनाये दुर्भेद्य कि‍ले
और आलीशान महल
इन्‍होंने ही बनाया कोनारक
और असंख्‍य मन्‍दि‍र
गि‍रजाघर, मस्‍जि‍द और गुरुद्वारे
लेकि‍न इनको बनाने वाले शि‍ल्‍पी
समा गये इति‍हास के गर्भ में
बि‍ना नाम के बि‍ना सम्‍मान के
बि‍ना कि‍सी के उनकी स्‍मृति‍ में
आँसू बहाए

और सत्‍ताधारि‍यों से मि‍ला
कभी कभी अनोखा उपहार
कि‍सी की आँखें फोड़ दी गयीं
कि‍सी के हाथ काट दि‍ये गये
ताकि‍ वे ऐसी इमारतें
बना न सकें दुबारा
लेकि‍न जो जि‍न्‍दा भी रहे
सही सबूत
वे भी रहे गुमनाम
नाम मशहूर है लेकि‍न उनका
जि‍नके नाम पर ये इमारतें बनाई गयीं
इति‍हास ने भुला दि‍या है
इन शि‍ल्‍पि‍यों को
इति‍हास में अमर हैं
इनका हाथ कोटनेवाले
और इनकी आँखें की रोशनी छीननेवाले
उसे ही कहते हैं इति‍हास
जो लि‍खा जाता है समर्थों के हि‍त में
समर्थों के हक में

ये शि‍ल्‍पी हैं
इनका कोई इति‍हास नहीं
ये इति‍हास के पन्‍नों के बाहर हैं।

मैं आम आदमी हूँ

मैं आम आदमी हूँ
भारत का आम नागरि‍क
नि‍पट अनपढ़ और गँवार

मैं सबकी सुनता हूँ
लेकि‍न मेरी बात
सुनता नहीं कोई
दूसरों की आवाजें मुझ तक
पहुँचाने वाले
नये नये यंत्र हुए हैं
ईजाद
लेकि‍न मेरी बात ऊपर
पहुँचाने वाला
कोई यंत्र हुआ नहीं अभी
ईजाद
होता है सब कुछ
मेरे ही नाम पर
मेरे नाम पर सारी राजनीति‍
राज्‍य तंत्र शासन
चलता है सभी कुछ
लेकि‍न मुझसे कोई
पूछता ही नहीं कभी
कि‍ मैं सचमुच क्‍या सोचता हूँ
मैं क्‍या चाहता हूँ
और क्‍या है मेरा मत
और वि‍चार
ऊपर के लोग
मानकर चलते हैं
वि‍चार उनको करना है
हमारे बारे में
और हम हैं वि‍चार शक्‍ति‍वि‍हीन
नि‍पट अनपढ़ गँवार

कहने को मैं
जनता जनार्दन हूँ
सभी मेरी करते हैं
लोकतंत्र में पूजा
जैसे में ही हूँ लोकतंत्र का केन्‍द्र
लेकि‍न श्रम और शोषण की
व्‍यवस्‍था में ही
मैं हूँ केन्‍द्र में
वि‍तरण और उपयोग के समय
मैं हूँ केवल हाशि‍ये पर
मेरे भाग में है वही
जो बचा खुचा रहता है
समर्थों के उपभोग के बाद

मैं आम आदमी हूँ
भारत का आम नागरि‍क
मेरे ही नाम पर बना है
संवि‍धान
‘वी द पीपल ऑफ इंडि‍या
गि‍व टु अवर स्‍यल्‍मज दि‍स कन्‍स्‍टीट्यूशन’
वही संवि‍धान
जो मुझसे गुप्‍त रखा गया है।

(‘इत्‍यादि‍ जन’ से साभार)

‘जि‍जीवि‍षा और अन्‍य कहानि‍याँ’ कथा संग्रह का लोकार्पण

उदयपुर : राजस्‍थान साहि‍त्‍य अकादमी और राजस्‍थान साहि‍त्‍यकार परि‍षद, कांकरोली के संयुक्‍त तत्‍वावधान में 11 मई 2012 को साहि‍त्‍य अकादमी सभागार में आयोजि‍त समारोह में सुप्रसि‍द्ध कवि‍, कथाकार और साहि‍त्‍यि‍क पत्रि‍का ‘सम्‍बोधन’ के सम्‍पादक कमर मेवाड़ी के सद्य प्रकाशि‍त कथा संग्रह ‘जि‍जीवि‍षा और अन्‍य कहानि‍याँ’ का लोकार्पण राजस्‍थान साहि‍त्‍य अकादमी के अध्‍यक्ष वेद व्‍यास ने कि‍या। वेद व्‍यास ने कहा कि‍ कमर मेवाड़ी ने पि‍छले 55 वर्षों से नि‍रन्‍तर लेखन से साहि‍त्‍य के क्षेत्र में अप्रति‍म योगदान दि‍या है जि‍से वि‍स्‍मृत नहीं कि‍या जा सकता। उन्‍होंने वरि‍ष्‍ठ रचनाकारों के समग्र लेखन पर वि‍मर्श पर भी जोर दि‍या।

वरि‍ष्‍ठ कवि‍ एवं चिंतक प्रोफेसर नंद चतुर्वेदी ने कहा कि‍ रचनाकार के अवदान को भि‍न्‍न–भि‍न्‍न परि‍प्रेक्ष्‍य में देखना एवं उसके रचनाकर्म का मूल्‍याँकन करना चाहि‍ये। प्रति‍ष्‍ठि‍त कथाकार डॉक्‍टर राजेन्‍द्र मोहन भटनागर ने कमर मेवाड़ी के रचनाकर्म एवं सम्‍पादकीय योगदान को रेखांकि‍त कि‍या। वरि‍ष्‍ठ साहि‍त्‍यकार डॉक्‍टर भगवती लाल व्‍यास, डॉक्‍टर महेन्‍द्र भानावत, डॉक्‍टर मंजु चतुर्वेदी और माधव नागदा ने लोकार्पित पुस्‍तक की कहानि‍यों पर पत्रवाचन के माध्‍यम से वि‍वेचना प्रस्‍तुत की।

कथाकार कमर मेवाड़ी ने अपने कथा संग्रह में से ‘ऊँचे कद का आदमी’ कहानी का वाचन कि‍या। संयोजक नरेन्‍द्र ‘नि‍र्मल’ ने कमर मेवाड़ी के सम्‍पूर्ण साहि‍त्‍यि‍क अवदान एवं ‘सम्‍बोधन’ के माध्‍यम से कि‍ये जा रहे साहि‍त्‍यि‍क योगदान को रेखांकि‍त करते हुए उनके व्‍यक्‍ति‍त्‍व और कृति‍त्‍व पर प्रकाश डाला।

समारोह के आरम्‍भ में अति‍थि‍यों को माल्‍यार्पण एवं श्रीजी का प्रसाद भेंट कर स्‍वागत कि‍या गया। मुख्‍य अति‍थि‍ वेद व्‍यास, वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍ डॉक्‍टर राजेन्‍द्र मोहन भटनागर, समारोह अध्‍यक्ष नंद चतुर्वेदी, कृति‍कार कमर मेवाड़ी और पुस्‍तक के प्रकाशक शि‍ल्‍पायन के ललि‍त शर्मा का शाल ओढ़ाकर सम्‍मान कि‍या गया।

समारोह का आगाज प्रसि‍द्ध गजलकार शेख हमीद की गजल से हुआ। स्‍वागत उद्बोधन मधुसूदन पाण्‍ड्या ने दिया और आभार कर्नल देशबंधु आचार्य न व्‍यक्‍त कि‍या। धन्‍यवाद ज्ञापन अकादमी सचि‍व डॉक्‍टर प्रमोद भट्ट न कि‍या।

त्रिलोचन.. .उर्फ त्रिलोचनजी के भाई! : प्रकाश मनु

हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख हस्ताक्षर कवि‍ त्रि‍लोचन पर कथाकार प्रकश मनु का संस्‍मरण-

त्रिलोचनजी से मुलाकात हुए कई महीने हो चुके थे। दोस्त चित्रकार हरिपाल त्यागी के साथ मैं यमुना विहार वाले उनके निवास पर मिलने गया था और उस लम्‍बी और अनोखी मुलाकात का पूरा हाल मैंने विस्तार से ‘पहल’ में लिखा भी था। यह अजब संजोग है कि ‘त्रिलोचनजी के भाई’ से मेरी एक गजब की मुलाकात भी हरिपाल त्यागी के साथ ही हुई— उनके घर में। बल्कि कहना चाहिए कि हरिपाल त्यागी ने ही प्रसन्नता से चहकते हुए उनसे मेरी मुलाकात कराई थी, ‘‘इनसे मिलिये, आप हैं त्रिलोचनजी के भाई।’’

मैं कुछ कौतूहल, कुछ विस्मय, कुछ झिझक के साथ ‘उनसे’ मिला। सफाचट दाढ़ी वाले कुछ श्याम वर्ण के थे वे सज्जन, जिन्हें त्रिलोचनजी का भाई बताया जा रहा था। मन में कहीं एक हल्की खुदबुद भी थी, ‘अच्छा, त्रिलोचनजी के कोई भाई भी हैं, मैं तो जानता ही न था। धन्य हैं चित्रकार श्री हरिपाल त्यागी, जिनकी वजह से उनसे मिल पा रहा हूँ।’

मेरे लिये यह एक आनंददायक दिन था और मैं उस एक और प्रसन्न दिन की स्मृतियों में खोया जा रहा था, जब त्रिलोचनजी से मेरी मुलाकात हुई थी। मन ही मन दोनों की तुलना भी चल रही थी—त्रिलोचनजी के यहाँ सफेद दाढ़ी का लहलहाता जंगल था और त्रिलोचनजी के भाई पूरी तरह दाढ़ी मुँड़ाए हुए। जैसे अभी-अभी शेव करके आए हों। दोनों की शक्लें काफी कुछ मिलती हैं, लेकिन त्रिलोचनजी के भाई कुछ छोटी उम्र के लगते हैं। पाँच-सात साल तो जरूर छोटे होंगे त्रिलोचनजी से, या हो सकता है, दस-बारह साल छोटे हों।

दोनों के व्यक्तित्व की आधारभूत रेखाओं पर गौर करता हुआ, मैं मन ही मन हिसाब लगा रहा था।

त्रिलोचनजी से हुई पहली मुलाकात ने उनसे मिलकर बात करने की तेज इच्छा और अतृप्ति और बढ़ा दी थी। मैं त्रिलोचन जी से मिलने के लिए व्यग्र था। हरिपाल त्यागी यह जानते थे। लिहाजा उन्होंने अपने नये चित्र देखने के लिये सादतपुर निमंत्रित किया तो साथ ही जोड़ दिया, ‘‘इन दिनों अकसर त्रिलोचनजी भी घूमते-घामते आ जाते हैं, क्योंकि पास ही उनका निवास है। हो सकता है,  उनसे भी आप की मुलाकात हो जाये।’’ तो मैं त्रिलोचनजी से मिलने की एक अव्यक्त इच्छा लिये हुए ही सादतपुर आया था।

‘‘चलो त्रिलोचनजी न सही, उनके भाई से ही मुलाकात हो गई।’’ मैं मन ही मन मगन था।

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लेकिन त्रिलोचनजी के भाई से वह अद्भुत मुलाकात हुई किस ढब से—इसका जिक्र तो भूल ही गया। चलिए, अब बताता हूँ। वह रंगमंच, जिस पर त्रिलोचनजी के भाई ने प्रवेश किया था, कुछ यूँ था कि हरिपाल त्यागी के घर के आँगन में उनकी तमाम चित्रकृतियाँ कतार में लगी हुई थीं और उन पर त्यागीजी से मेरा गहन वार्तालाप चल रहा था। त्यागीजी ने एक-एक कर अपनी सारी नई चित्रकृतियों को बाहर ला-लाकर बाकायदा उनकी प्रदर्शनी-सी लगा दी थी और हम एक-एक चित्र पर घंटों माथापच्ची कर रहे थे। त्यागीजी एक-एक चित्र पर मेरी राय पूछते, फिर अपना ‘आइडिया’ बताते, फिर अपने-अपने रिफ्लेक्सेज पर जोर देते हुए हम एकबारगी बहस में उलझ जाते। इस तरह की पेचीदा स्थिति थी। याद पड़ता है, युवा कथाकार संजीव ठाकुर भी उस दिन साथ था और हम दोनों मिलकर त्यागीजी का एक लम्‍बा इंटरव्यू करने की फिराक में थे।

इस बीच ‘उन’ का आगमन हुआ था। वे, जो त्रिलोचनजी के भाई थे और बड़े अनौपचारिक ढंग से अचानक टहलते-टहलते रंगमंच में दाखिल हुए थे। कुछ देर वे चुपचाप त्यागीजी की वक्तृता सुनते रहे, फिर मेरी तरह वे भी ‘खेल’ में शामिल हो गये। यानी उन चित्रकृतियों पर अपनी राय बताने लगे और चित्रकार से उसके खास मंतव्य या आइडिया को लेकर बातचीत करने लगे। हरिपाल त्यागी, जैसी कि उनकी आदत है, हर चित्र पर हमें दिमाग लड़ाने और राय प्रकट करने की काफी खुली छूट दिये जा रहे थे। और हमारी बातों की कहीं ताईद करते, कहीं काटते भी जा रहे थे। उन्हें हक था, वे उस रंगमंच पर चित्रकला के ‘प्रथम पुरुष’ यानी सूत्रधार की हैसियत से विद्यमान जो थे।

मैंने देखा त्रिलोचनजी के भाई भी आहिस्ता-आहिस्ता, लेकिन बड़े उत्साह से अपनी टिप्पणियाँ दिये जा रहे हैं और कुछ इस ढंग से कि कला की उनकी गहरी समझ प्रकट होती थी।

‘‘अच्छा, चित्रकला में इनकी भी अच्छी रुचि है, ठीक त्रिलोचनजी की तरह।’’ मुझे सुखद आश्‍चर्य हुआ।

लेकिन अब एक दिक्कत आने लगी। उन चित्रकृतियों पर मेरी राय और त्रिलोचनजी के भाई की राय अकसर नहीं मिलती थी। मुझे चित्रों में तीखे कंट्रास्ट, कठोर आघात, परुषता और तीव्र गत्यात्मकता या शक्तिशाली रेखाएँ ज्यादा आकर्षित कर रही थीं, जबकि त्रिलोचनजी के भाई को शायद थिराई हुई रेखाएँ और प्रकृति के शांत चित्र ज्यादा भा रहे थे। बार-बार मैं बड़े हड़बडिय़ा उत्साह और कठोरता से उनकी बात काटकर अपनी बात आगे कर देता। वे चुपचाप सुन लेते या मुसकराकर रह जाते, लेकिन बात का जवाब नहीं देते थे।

मैं उनकी विनय को आसानी से अपनी जीत समझकर तना जा रहा था।

‘‘हम त्रिलोचनजी की इज्जत करते हैं तो क्या जरूरी है कि उनके भाई की भी हर बात माननी होगी?’’ मैंने अभिमान से भरकर सोचा और उनकी बातों को और अधिक तीखेपन से काटने लगा।

दो-तीन बार यह हुआ तो त्यागीजी चौंके। उन्होंने कोई ‘छिपा हुआ संकेत’ देना चाहा,  जिसे ग्रहण करने से मैंने पूरी बदतमीजी और उजड्डता से इनकार कर दिया और अपनी दबंगी और रोब बराबर कायम रखा। यहाँ तक कि त्रिलोचनजी के भाई ने मेरी ‘कलाभिरुचि’ की दो-एक बार दाद दी कि, ‘‘नहीं-नहीं, आप ही ठीक हैं।…मने मनुजी में कला की अच्छी समझ है।’’

मेरा गुब्बारा थोड़ा और फूल गया, लगभग फूटने की हद तक। इस बीच त्यागीजी ने सूचना दी कि कुछ युवाओं द्वारा पड़ोस की बस्ती में एक गम्‍भीर प्रयोगधर्मी नाटक किया जाने वाला है, जिसमें ‘दो शब्द’ त्रिलोचनजी के भाई कहेंगे और वही अध्यक्षता भी करेंगे। पता यह भी चला कि यों तो यह अध्यक्षता त्रिलोचनजी को करनी थी, पर वे आ नहीं सके, तो त्रिलोचनजी की जगह उनके भाई ही सही। मैंने मन ही मन झुँझलाहट महसूस की, ‘‘क्या त्रिलोचनजी के भाई उनके ‘डमी’ हैं जो उन्हें त्रिलोचनजी की जगह अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया जा रहा है? त्रिलोचनजी नहीं आ सके, तो क्या इन नाटक वालों को और कोई ढंग का आदमी नहीं मिला जो कला, संस्कृति, नाटक-वाटक की अच्छी समझ रखता हो!’’

खैर, इतने में मालूम पड़ा, भोजन तैयार है। समय पर नाटक देखने पहुँचना है तो जल्दी से भोजन कर लिया जाये। हम लोग भोजन के लिये बैठे, थालियाँ आईं तो भोजन के साथ-साथ चर्चा का विषय अब भी त्रिलोचनजी ही बने हुये थे। त्यागीजी सूचना देते हैं कि, ‘‘त्रिलोचनजी एक साथ बीस-पचीस तक रोटियाँ मजे में खा सकते हैं, और न खाएँ तो हफ्ता-हफ्ता भर बगैर अन्न के, सिर्फ पानी पी-पीकर काम चला लेंगे।’’ सुनकर मैं त्रिलोचनजी के भाई की ओर प्रतिक्रिया जानने की इच्छा से देखता हूँ। वे सरलता से मुसकराते हैं। इसका भाव यह है कि कुछ तो यह हकीकत है और कुछ लोग बढ़ा भी देते हैं जेबेदास्ताँ के लिये। ‘‘मने…त्यागीजी एकदम झूठ तो नहीं कह रहे।’’ त्रिलोचनजी के भाई हल्की-सी थाप लगा देते हैं, कुछ-कुछ शास्त्रीय अंदाज में।

सुनकर मैं हल्के-से चौंकाता हूँ, ‘‘मने…मने…मने…यह अंदाज तो एकदम त्रिलोचन वाला है। मने त्रिलोचनजी के भाई का साहित्य और कलाओं का ज्ञान ही नहीं, बात करने का अंदाज भी त्रिलोचनजी से एकदम मिलता है।’’

अब तो बात करने में मुझे मजा आने लगा। बात-बात पर मैं त्रिलोचनजी के भाई की प्रतिक्रियाएँ जान रहा हूँ और उन्हें चुपचाप मन में नोट करता जा रहा हूँ। साथ ही साथ एक दिलचस्प तुलना भी शुरू हो गई है—त्रिलोचनजी बनाम त्रिलोचनजी के भाई! ‘मने दोनों का बात करने का अंदाज किस कदर मिलता है—शक्ल भी। हाँ, त्रिलोचनजी के भाई काया में जरूर कुछ उन्नीस हैं। चेहरा भी कुछ ज्यादा कसा हुआ है, जरूर पाँच-सात साल छोटे होंगे।’

इस बीच बात चक्करदार रास्तों पर होते हुये न जाने कब, कैसे लोकसाधक और चिर लोकयात्री देवेंद्र सत्यार्थी पर आ गई और फिर वहाँ से उछलकर ‘देवेंद्र सत्यार्थी : तीन पीढिय़ों का सफर’ ग्रंथ पर, जिसका सम्‍पादन मैंने संजीव ठाकुर के साथ मिलकर किया था।

अब त्रिलोचनजी के भाई उस पर विस्तार से अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, ‘‘मने…मनुजी, एक बात तय है। सत्यार्थीजी पर पुराने लोगों ने जिस गम्‍भीरता और तल्लीनता से लिखा है, नये लोगों के लेखों में वह बात नहीं। आपने जिन पुराने लेखों को शामिल कर लिया, किताब की जान असल में वही हैं।’’

सुनकर मैं चौंका, क्या त्रिलोचनजी के भाई भी इस कदर ‘पढ़ाकू’ आदमी हैं जो इतनी आधिकारिक टिप्पणी दिये जा रहे हैं, सो भी पुस्तक के सम्‍पादक के सामने! मेरा सम्‍पादकीय अहं थोड़ा चौड़ा हुआ। सोचा, ‘त्रिलोचनजी ने ‘इंडिया टुडे’ में उसकी समीक्षा लिखी थी, तो त्रिलोचनजी के भाई ने उन्हीं से लेकर थोड़ी उलट-पुलट ली होगी और अब ऐसे बन रहे हैं कि जैसे सर्वज्ञानी हों।’

अबके मैंने सीधे-सीधे पूछ लिया, ‘‘क्या आपने पढ़ी है यह पुस्तक?’’

‘‘हाँ, और क्या!’’ त्रिलोचनजी के भाई सरलता से जवाब देते हैं, ‘‘पढक़र ही तो लिखी है समीक्षा इंडिया टुडे में। मैंने एक-एक शब्द पढ़ा है आपकी पुस्तक का।…मने मनुजी, बगैर पढ़े तो मैं कभी नहीं लिखता।’’

‘‘ऐं! लेकिन वह तो आपने नहीं, वह…वह तो त्रिलोचनजी ने…’’

जाने कैसे मुड़े-तुड़े शब्द मेरे होंठों से निकले और मैं कुछ और कह पाता, इससे पहले ही त्यागीजी का जगविख्यात ठहाका किसी बम के धमाके की तरह पैदा हुआ और कमरे के फर्श से उठकर छत तक फैल गया, जिसमें त्रिलोचनजी के भाई—सॉरी त्रिलोचनजी का थोड़ा मंद लेकिन प्रसन्न हास्य भी शामिल हो चुका था। और तो और, ‘बुद्धूपने’ से भरा मेरा निरा झेंपू ठहाका भी उसमें घुल-मिल चुका था।

3

गजब! क्या गजब नाटक हुआ मेरे साथ, अब इसका अंदाजा हो रहा है। इतने में बगल की रसोई से निकलकर शीलाजी बाहर आ गईं। त्यागीजी के बच्चे किसी चमत्कार भरे जादू से खिल-खिल करते हुए मेरे इर्द-गिर्द उपस्थित हो गये। और अब मेरे भोंदूपने पर सार्वजनिक रूप से तरस खाया जा रहा था और हँसी की ऐसी प्रसन्न धाराएँ-अंतर्धाराएँ बह रही थीं, जिनमें त्रिलोचन सबसे अधिक रस ले-लेकर आनंद लूटे जा रहे थे।

ऐसे क्षण जिनमें त्रिलोचनजी की दुर्गम शास्त्रीय व्याख्याओं और विद्वत्ता का बोझ एकबारगी बह गया है और अभी-अभी पतंग लूटकर आये शरारती बच्चे का अक्स उनके चेहरे पर कहीं ज्यादा साफ नजर आता है।

अलबत्ता, वह तिलिस्म जिसे हरिपाल त्यागी ने इतनी देर में मेरे और त्रिलोचनजी के बीच में किसी काँच की दीवार की तरह खड़ा कर दिया था, झन्न से टूटकर बिखर जाता है और अब त्रिलोचनजी बड़ी स्नेहिल निगाहों से मुझे देखते, बल्कि अपने स्नेह से नहलाने लगते हैं और ‘त्रिलोचनजी के भाई’ का जो चमत्कारी बिम्‍ब इतनी देर में बना था, वह देखते-देखते शून्य में बिला गया। अब समझ में आया, जिन्हें त्रिलोचनजी का भाई मैं समझ रहा था, वह कला, साहित्य और शास्त्र में इतनी गहरी रुचि और इतना ज्यादा दखल क्यों रखते थे और उनका बात करने का अंदाज त्रिलोचनजी से कदर मिलता क्यों था? और क्यों ‘दाढ़ीदार’ त्रिलोचनजी की जगह सफाचट चेहरेवाले ‘त्रिलोचनजी के भाई’ नाटक की अध्यक्षता करने जा रहे थे!

‘‘इस दाढ़ी ने सचमुच मुझे बहुत छकाया।’’ मैं भुनभुनाकर कहता हूँ। त्रिलोचनजी उस पर स्नेहपूर्ण थाप लगा देते हैं, ‘‘मने…ऐसा तो बहुतों के साथ हुआ है मनुजी, सिर्फ आपके साथ नहीं।’’

‘‘लेकिन दाढ़ी कटवाकर आप पाँच-सात साल छोटे जरूर लगने लग जाते हैं।’’ मैंने अपनी राय प्रकट की।

‘‘अजी, कहिए जवान, एकदम जवान! दाढ़ी कटते ही यह जादू।’’ हरिपाल त्यागी अब छेड़छाड़ पर उतर आये हैं और पूछते हैं, ‘‘सच-सच बताइए त्रिलोचनजी, अब आपने नाई से कहा दाढ़ी साफ करने के लिये तो वह डरा, झिझका या चौंका नहीं, आसानी से तैयार हो गया?’’ फिर वह मासूम चेहरा बनाकर पूछते हैं, ‘‘अच्छा त्रिलोचनजी, इस दाढ़ी काटने के पैसे आपने दिये नाई को, या बदले में नाई से ही…? आखिर ऐसे शुभ्र, स्वच्छ बाल! कोई धूप में तो ये सफेद हुये नहीं हैं।’’

कुछ देर में उन्होंने आखिरी छक्का लगाया, ‘‘रहने दीजिए त्रिलोचनजी, क्यों नाटक का उद्घाटन करने जा रहे हैं? वहाँ लोग कहेंगे, हमने तो त्रिलोचनजी को बुलाया था, यह उनकी जगह कौन सज्जन आ गये।…जब मनुजी ही नहीं पहचान पाये, तो वहाँ भला कौन पहचानेगा?’’

जवाब में त्रिलोचनजी की मंद हँसी का झरना झरता रहा और मैं झेंपा-झेंपा-सा उसमें नहाता रहा। मन ही मन मुझे गुस्सा आ रहा था, मैं इस कदर बेवकूफ बन कैसे गया?

साथ ही मुझे ताज्जुब भी हो रहा था कि किस तरह मुझे जान-बूझकर और कितनी सफाई से बुद्धू बनाया जा रहा था और इस ‘खेल’  में जो हरिपाल त्यागी का रचा हुआ था, त्रिलोचन किस तरह खुद-ब-खुद शामिल हो गये और दोनों मिल-जुलकर मुझे हक्का-बक्का और परेशान करने पर तुले थे।

बहरहाल, त्यागीजी के उस ‘जादुई’ खेल की बदौलत ही समझिए, उस पूरे दिन त्रिलोचनजी की भाई की छाया से मैं मुक्त नहीं हो पाया।

4

हालाँकि खाना खाकर जब हम नाटक देखने जा रहे थे, त्रिलोचनजी के भाई, सॉरी त्रिलोचनजी, से मेरी खूब घुटकर बातें हुईं। पूरे रास्ते भर मेरा हाथ थामे हुये वे मुझे राह पर के पेड़ों, फूलों और मौसमों की भरपूर रसात्मक जानकारी देते रहे। अशोक के पेड़ की चर्चा हुई तो सुंदरियों के पाद-प्रहार से उसके फूल उठने की कहानी भी कही गई, जिसका आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘अशोक के फूल’ में वर्णन किया है।

‘‘असली अशोक का पेड़ आजकल मिलता कहाँ है! उलटे लहरीली पत्तियों वाले एक निफूले पेड़ को अशोक कहकर इसका मजाक उड़ाया जाता है।’’ मैंने आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का सन्‍दर्भ देकर कहा। उत्तर में त्रिलोचनजी ने जो कहा, उसे सुनकर मैं चकित रह गया था, ‘‘हाँ, यह तो ठीक है कि अशोक के असली पेड़ ज्यादा नहीं मिलते, लेकिन वे बिलकुल नहीं है, ऐसा तो नहीं है। मने कुछ पेड़ तो मनुजी खुद मैंने देखे हैं।’’ और असली अशोक के पेड़ उन्होंने कहाँ-कहाँ देखे, त्रिलोचनजी इसका पूरे विस्तार और तल्लीनता से वर्णन करने लगते हैं।

‘‘लेकिन हजारीप्रसाद द्विवेदी तो लिखते हैं, असली अशोक का पेड़ तो अब गायब हो गया है। वह सभ्यता ही खत्म…!’’

मैं उनकी विद्वत्ता के ‘महासिंधु’ में शंका का एक क्षुद्र तिनका छोड़ देता हूँ।

‘‘हो सकता है, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इनको देखा ही न हो…या लिखते वक्त उन्हें ध्यान न रहा हो। लेकिन हैं वे असली अशोक ही, जिनका जिक्र मैंने किया है।’’ त्रिलोचनजी आचार्य द्विवेदी की विद्वत्ता से आतंकित हुए बगैर दृढ़ता से अपनी बात पर टिके हैं और अब विस्तार से अशोक के फूलों के बारे में बता रहे हैं कि  वे कैसे आकार-प्रकार और किन-किन रंगों के होते हैं।

और फिर सिर्फ अशोक ही नहीं, मुझे अच्छी तरह याद है, पूरे रास्ते भर वे फूलों, पेड़ों और वनस्पतियों के बारे में मेरा विपुल ज्ञानवर्धन करते रहे। मजे की बात यह है कि इस प्रसंग में ठेठ ग्रामीण कहावतों और लोककथाओं से लेकर कालिदास, भवभूति और वाल्मीकि तक इस सहज भाव से आ-जा रहे थे कि लगता था, ये सभी उनके खूब अच्छी तरह देखे हुये घर हैं और ग्रामीण कवियों और वाल्मीकि, कालिदास की सहजानुभूति में कोई खास फर्क नहीं है। वे एक ही परम्‍परा की अलग-अलग स्वत:स्फूर्त अभिव्यक्तियाँ हैं।

पूरे रास्ते वे प्रेम से मेरा हाथ पकड़े रहे थे और बार-बार कंधे पर धौल जमा देते थे।

आज याद करता हूँ तो त्रिलोचनजी की वह अकुंठ मस्ती और वह अहेतुक प्यार मुझे किसी आशीर्वचन का-सा लगता है। हालाँकि उसमें कोई दिखावटी बड़प्पन कतई न था।

त्रिलोचनजी से पहली मुलाकात में मैं ज्यादा खुल नहीं पाया था जिसका शुरू-शुरू में हल्का-सा मलाल मुझे था और जिसका जिक्र भी उन पर लिखे एक लेख में मैंने किया था। तब क्या जानता था कि अगली ही मुलाकात में वे मुझसे इस कदर घुल-मिल जाएँगे कि मैं उनके प्रेम में नहा उठूँगा।

5

बहरहाल, थोड़ी देर में हम नाटकस्थली पर पहुँचे, तो पता चला कि नाटक अभी-अभी शुरू हो चुका है। हम लोग थोड़ा विलम्‍ब से पहुँचते हैं, इसलिए बगैर ज्यादा व्यवधान पैदा किये एक तरफ बैठ गये और थोड़ी देर में नाटक ने हमें अपनी गिरफ्त में ले लिया।

नाटक काफी अच्छा था। वह एक प्रयोगधर्मी और दुस्साहसी नाटक था जिसमें दर्शकों और कलाकारों के बीच का फर्क पूरी तरह मिट जाता है। दर्शकों के बीच से एक-एक कर लोग उठकर जाते हैं और नाटक को अपने अपने हिसाब से ‘चलाने’ लग जाते हैं। शुरू में लोग भीड़ के इस हस्तक्षेप या भगदड़ से परेशान हुये, फिर समझ में आया, यह नाटक की एक शैली है। नाटक में आज के बद्धिजीवियों पर जमकर कटाक्ष किया गया था। उसमें जितने भी बुद्धिजीवी पात्र हैं, उनकी लगातार आपस में खींचातानी, टाँग खिंचाई, झगड़े-झंझट, असहमतियाँ अंतर्विरोध, आलोचना-प्रत्यालोचना कुछ इस कदर चलती रहती हैं कि पूरे माहौल में एक-दूसरे के प्रति अविश्‍वास और टूटन है। सभी एक-दूसरे का मजाक बना रहे हैं और जो कला या मीडिया जितना शक्तिशाली है, वह दूसरे को नीचा दिखाने में उतना ही क्रूर और निर्मम है। फिर एकाएक शोर मचता है, ‘अखबार…अखबार…अखबार!’ देखते ही देखते सब पात्र फ्रीज हो गये हैं और पूरे परिदृश्य में सिर्फ उड़ते-उछलते और हड़बड़ाते हुये अखबार और उनके ताजा समाचार हैं। पार्श्‍व से सूत्रधार की कुछ-कुछ क्रूरता से भरी आवाज आती है, ‘‘अब कविता, कहानी और साहित्य का अंत हो चुका है। आज का असली साहित्य तो अखबार ही है।’’

लीजिए, अब मध्यांतर। मैं हरिपाल त्यागी, रामकुमार कृषक और सादतपुर के बहुत-से मित्र त्रिलोचनजी को घेरकर बैठे हैं और छेड़छाड़ का मजा ले रहे हैं, ‘‘लीजिये त्रिलोचनजी, आपकी कविता तो गई। अब उसका कोई मतलब नहीं रह गया है। अखबार की रिपोर्ट है आज का असली साहित्य। आपकी कविता-वविता झूठ…!’’

‘कविता-वविता झूठ, अपन से कुश्ती लड़ लो।’ मुझे एक तुक्कड़ कवि की लाइन याद आ जाती है, जिसे बचपन का मेरा कवि-मित्र अनिल उदित बड़े नाटकीय अंदाज में सुनाया करता था। मैं शरारतन यह लाइन हवा में उछालता हूँ। एक सम्मिलित ठहाका।

जवाब में त्रिलोचनजी मंद-मंद मुसकराते हैं। एक अकुंठ, प्रसन्न हँसी के साथ छेड़-छाड़ का आनंद ले रहे हैं।

मध्यांतर खत्म। अब त्रिलोचनजी को आमंत्रित किया जा रहा है कि वे अध्यक्ष के रूप में नाटक पर ‘दो शब्द’ कहें। बाद का आधा नाटक उनके भाषण के बाद होगा।

त्रिलोचनजी सहजता से उठ खड़े हुए। सीधी, तनी हुई पीठ। चेहरे पर तपा हुआ, खुरदुरा आत्मविश्‍वास।

‘‘अब आपके बोलने के लिए क्या रहा? कविता-वविता झूठ…!’’ भीड़ में से एक चहकता हुआ स्वर उठा है। लगता है, नाटक का असर लोगों पर हावी है।

‘‘अब बोलिए, इसी का जवाब दीजिए। आज तो अखबार का ही बोलबाला है।’’ भीड़ में से एक दूसरा खिलंदड़ा स्वर। शायद हरिपाल त्यागी हैं।

त्रिलोचनजी उसी तरह हँसते हैं—एक शांत, निश्छल हँसी जिसमें गर्व नहीं, विद्वत्ता का बोझ नहीं, चोट करने की तेजी और घात-प्रतिघात नहीं, एक निष्कवच सादगी है।

‘दूर से देखने पर उनकी हँसी एक झेंपभरी हँसी लग सकती है।’ मुझे लगा।

‘‘अब आये चक्कर में…!’’ मेरे आसपास फुसफुस हो रही है।

‘‘ऐसा है, आप लोग नाटक का आनंद ले रहे हैं,  इसलिए मैं ज्यादा देर तो लूँगा नहीं। आपके धैर्य की परीक्षा नहीं लेना चाहता।’’ त्रिलोचनजी धीरे से शुरू करते हैं, ‘‘लेकिन यह जो अखबार वाला मुद्दा है, इसका जवाब देना तो भाई, जरूरी है।’’ वे हँसकर कहते हैं, ‘‘ऐसे बहुत-से पाठक हैं मेरी कविताओं के, जो कविताएँ पढ़कर पत्र लिखते हैं या अपनी राय बताते हैं। उनमें ऐसे बहुत-से लोग हैं, जिन्होंने मेरी एक-एक कविता को दस-दस, बीस-बीस बार पढ़ा है और मिलने पर कहते हैं कि ‘अभी तो जी नहीं भरा। अभी इसे और पढऩा चाहते हैं। इसलिए कि हम जितनी बार इन कविताओं को पढ़ते हैं, उतनी बार इनमें से नये-नये अर्थ झाँकते हैं।’ जबकि अखबार आज पढ़ा तो कल बासी हो जाता है। फिर कोई उसे उठाकर देखना भी नहीं चाहता। कल्पना कीजिए, आप एक कमरे में बंद हैं और आपके हाथ में कविताओं की एक किताब है। इसके अलावा कमरे में कोई और चीज पढऩे लायक नहीं है। तो महीने भर भी अगर आपको उस कमरे में अकेले बंद रखा जाये, तो तीस बार आप उस किताब को पढ़ सकते हैं, फिर भी ऊबेंगे नहीं। लेकिन अगर उसकी जगह एक अखबार है और वही अगर आपको तीस दिन पढऩा पड़े, तो मेरा खयाल है, आप जरूर पागल हो जाएँगे। (हँसी)…मने अखबार सिर्फ एक बार पढ़ा जा सकता है, मगर कविता जितनी बार पढ़ेंगे, नया अर्थ देगी। बल्कि मेरा तो कहना है, कविता हजार, दस हजार, लाख बार पढ़ी जाये, तो भी पुरानी नहीं होती। कालिदास, वाल्मीकि और तुलसी हमें आज भी आनंद देते हैं। इसलिए अखबार और कविता की कोई तुलना नहीं हो सकती। अखबार कभी भी कविता की जगह नहीं ले सकता, यानी पत्रकारिता हमेशा साहित्य के पीछे-पीछे चलेगी। जो लोग यह समझते हैं कि साहित्य को उससे कोई खतरा है या पत्रकारिता साहित्य को खा जाएगी, वे मूर्खों के स्वर्ग में रह रहे हैं!’’

कहकर त्रिलोचनजी बैठे तो सारा हाल तालियों की गडग़ड़ाहट से गूँज उठा। त्रिलोचनजी ने बगैर किसी उत्तेजना या अहंकार के, मंद-मंद मुसकराते हुए इतने आहिस्ता से अपनी बातें कहीं और साहित्य-विरोधी तर्कों को इस कदर धराशायी कर दिया कि मैं भौचक! त्रिलोचनजी के उस्तादाना फन ने मुझे मोह लिया। बातें इस ढंग से भी कही जा सकती हैं और ‘शत्रु’ को इस ढंग से भी ‘पटरा’ किया जा सकता है, मैं इससे पहले जानता ही न था।

और मजे की बात यह है कि त्रिलोचनजी ने जो कुछ भी कहा, कुछ इस अंदाज में कहा कि उससे नाटक की ‘लय’ खंडित नहीं होती, बल्कि वह नाटक का एक हिस्सा ही लगता है। वह विजेता के दर्प से नहीं, एक ‘कालचेता’ के गम्‍भीर अंतर्ज्ञान और अंतर्मंथन के साथ अपनी बात कह रहे थे।

इसका सबूत यह है कि ‘मध्यांतर’ के बाद जब नाटक फिर से शुरू हुआ और अखबार वाले बुद्धिजीवी यानी पत्रकार के तर्कों का जवाब जब लेखकनुमा पात्र को देना था, तो उसने अपने तयशुदा संवादों को छोडक़र हू-ब-बू त्रिलोचनजी के शब्द दोहरा दिये।

नाटक में एक और नाटक!

यह नाटक का जबरदस्त नाटकीय या ‘उत्कर्ष क्षण’ था, जब सारा हाल पहले से बढक़र तालियों की गडग़ड़ाहट से भर गया था।

6

नाटक खत्म होने पर लौटे तो सभी की जुबान पर त्रिलोचनजी की वक्तृता की तारीफ ही थी।

बहुत-से दर्शक सादतपुर के ही थे, इसलिये लौटे तो त्रिलोचनजी के इर्द-गिर्द, ‘बतकही’ करते लौटने वालों का पूरा एक जुलूस था। लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर हम सादतपुर पहुँचे, जहाँ त्रिलोचनजी ने हमसे विदा ली। उन्हें यमुना विहार जाना था, जहाँ अपने बेटे के साथ वे उन दिनों रह रहे थे।

मुझे उस क्षण की अनुभूति आज भी ठीक-ठीक याद है। मुझे लग रहा था, मैं त्रिलोचनजी के साथ-साथ ‘त्रिलोचनजी के भाई’ को भी प्रणाम कर रहा हूँ। बल्कि उसी क्षण मेरे भीतर यह बात कौंधी थी कि असल में त्रिलोचनजी में ‘दो’ व्यक्तित्व हैं। वे कहीं आपस में मिलते हैं तो कहीं टकराते भी हैं। जब वे ‘दाढ़ीदार’ होते हैं तो त्रिलोचन होते हैं और जब बगैर दाढ़ी के तो त्रिलोचनजी के भाई!

हरिपाल त्यागी ने तो अपनी सदाबहार तबीयत से एक हल्का-सा मजाक किया था, पर वह मजाक अजब ढंग से मेरे लिये हकीकत बन गया। उस दिन मैं घर लौटने पर देर रात तक सोचता रहा था, त्रिलोचनजी की दाढ़ी न रहने पर उनमें क्या कुछ बदल जाता है? और कोई चार साल बाद यह लेख लिखते समय भी मैं उसी सवाल पर अटका हूँ और जवाब अभी तक नहीं मिला।

मुझे याद है, विदा के समय चलते-चलते त्यागीजी ने फिर चुहल की थी, ‘‘आज तो मनुजी को खूब छकाया।’’ और इस बार त्रिलोचनजी के साथ-साथ उपस्थित समूह ने भी इस ‘विचित्र वृत्तांत’ का पूरा रस लिया।

अचानक हरिपाल त्यागी का कटाक्ष फिर त्रिलोचन की ओर मुड़ गया था, ‘‘आपको कब लगता है त्रिलोचनजी, कि अब दाढ़ी कटवा लेनी चाहिये।’’

‘‘यह तो नहीं पता, पर जिस दिन भी लगता है, नाई की दुकान पर जाकर बैठ जाता हूँ और,’’ त्रिलोचनजी नहले पर दहला जमाते हैं, ‘‘इसकी भी क्या परवाह की जाये। दाढ़ी तो आनी-जानी है।’’

और उनका शुभ्र ठहाका उनके साँवले चेहरे के साथ-साथ आसपास के पूरे परिवेश को एक उजास से भर देता है।

सत्यार्थीजी को उनके अनेक प्यार करने वाले मित्र-शुभचिंतक ‘दाढ़ीदार शिशु’ कहकर संबोधित करते हैं। त्रिलोचनजी में भी बचपना सत्यार्थीजी से कम तो नहीं, मैं मन ही मन हिसाब लगाता हूँ। इसीलिये नहले पर दहला लगाते हुए भी उनके मन में जवाबी चोट करने की इच्छा नहीं, एक निर्मल आनंद ही होता है। इसी ‘निर्मल आनंद’ के बूते त्रिलोचनजी कवि हैं, तो साथ ही साथ नाटककार भी। वे तमाम अनलिखे नाटकों के नाटककार लगते हैं। उनके निकटस्थ मित्र और परिचित जानते हैं कि बतकही के बीच में उनका ‘शरारती’ अंदाज उन्हें कभी भी किसी भी क्षण एक उस्तादाना फन वाले नाटककार में बदल सकता है।

लिहाजा उस दिन विदा लेते हुये त्रिलोचनजी के साथ-साथ उनके ‘नाटककार’ को भी मैंने प्रणाम किया था, जिसे मैं कभी न जान पाता, अगर ‘त्रिलोचनजी के भाई’ से त्यागीजी ने मेरी मुलाकात न करवाई होती।

7

उसके बाद सादतपुर में त्यागीजी के घर पर ही त्रिलोचनजी से तमाम मुलाकातों की तमाम-तमाम मनोरंजक और आश्‍चर्यजनक स्मृतियाँ आज तक मेरे मन में ताजा हैं।

उनसे दूसरी या तीसरी मुलाकात में ही मैंने जान लिया था कि त्रिलोचनजी पहली बार जरूर कुछ ज्यादा खुलते नहीं हैं, लेकिन फिर जल्दी ही वे आपसे कुछ ऐसा अपनापा साध लेते हैं और फिर इतने खुलेपन से बगैर किन्‍तु-परन्‍तु के इतना बेधडक़ होकर बोलते हैं कि आश्‍चर्य होता है। उनसे बातचीत का एक मजा यह भी है कि जल्दी ही बातों के सारे सूत्र वे अपने हाथ में ले लेते हैं और एक विषय की ‘उठान’ पर वे आ जाएँ, तो उसमें से खुद-ब-खुद अनेक विषय, प्रसंग और व्यक्तित्व निकलते चले जाते हैं और त्रिलोचन को आप एक साथ तमाम वेगवान हवाओं के घोड़े पर सवार देख सकते हैं। वे एक साथ कई दिशाओं में बह जाना चाहते हैं—समय को लगभग पूरी तरह संक्रमित करते हुये। इसीलिए त्रिलोचनजी के साथ बैठकर समय का कुछ पता नहीं चलता।

मुझे याद है, एक बार विष्णुचंद्र शर्मा के यहाँ उनसे मुलाकात हुई। कोई प्रसंग छिड़ जाने पर बनारस की यादों की लडिय़ों पर लडिय़ाँ उन दोनों कवि-मित्रों की बातें में ऐसे झलमलाकर प्रकट हो रही थीं और त्रिलोचनजी इतने सजीव ढंग से रस ले-लेकर वे विगत प्रसंग सुना जा रहे थे कि लगता था, वर्तमान से निकलकर मैं इतिहास के उन बेछोर फैले हुए बरामदों में चला आया हूँ, जहाँ मिठास में पगे दिन और पानी पर तैरती सुनहली संध्याएँ होती हैं और बातों के ओर-छोर कभी नहीं मिलते।

शायद इसीलिये त्रिलोचनजी को पढऩा या सुनना एक ऐसे महाकाव्य को पढऩा है, जिसके कुछ नये पन्ने हर बार चकित करते हुये आँखों के आगे से गुजर जाते हैं।

यों हमारी बातों में साहित्य-चर्चा के अलावा त्रिलोचनजी की घुमक्कड़ी के अनेक सुख-दुख भरे अनुभव, उनके अतीत के तमाम आत्मकथात्मक प्रसंगों की दास्तानें भी शामिल होती थीं, जिनमें एक ‘यवनिका पतन’ के बाद फिर एक नया युग सामने खड़ा नजर आता है और त्रिलोचनजी की यात्रा ‘अबाध’ लगती है तथा उनका व्यक्तित्व ‘अजेय’। काशी नगरी प्रचारिणी सभा, बनारस और धूमिल को लेकर त्रिलोचनजी के संस्मरण तथा अपने समकालीन लेखकों पर उनकी बेबाक टिप्पणियाँ तो होती ही थीं। इसके अलावा भाषा पर उनकी आधिकारिक शास्त्रीय चर्चा और ग्रामीण तथा देशज शब्दों के सही-सही अर्थ या भंगिमाओं या अर्थ-छटाओं के लिये उनका मोह जरूर उझक-उझककर सामने आता था। और इस सबके अलावा एक ‘तिलिस्म’ वहाँ हर बार कुछ और मोहक होकर आता था, जिसे तीन या चार शब्दों का एक प्यारा-सा नाम मैंने दे रखा है, ‘त्रिलोचनजी के भाई।’

इस ‘गड़बड़’ प्रसंग को मेरे लिये और ज्यादा प्रिय बना दिया था त्रिलोचनजी की स्निग्ध हँसी ने, जिससे हरिपाल त्यागी का गढ़ा हुआ यह तिलिस्म हर बार कुछ अधिक मोहक और रंगीन और मीठा हो जाता था। एक ऐसा प्रसंग, जिसके बाद मैं त्रिलोचनजी को अपने बहुत निकट महसूस करने लगा था और उनकी अंतरंगता का ‘सेक’ महसूस करने के साथ-साथ उनसे थोड़ी-बहुत छेड़छाड़ का अधिकार भी मैंने ले लिया था।

अलबत्ता, इस प्रसंग के चलने पर हर बार त्रिलोचनजी और हरिपाल त्यागी का जो सम्मिलित ठहाका मुझे सुनने को मिलता था और मुझे झेंपकर हर बार जिस तरह ठहाके में शामिल हो जाना पड़ता था, अब भी उसके ‘आनंद संगीत’, बल्कि ‘आनंद लीला’ से मैं मुक्त नहीं हो पाया। यही वह ‘रसात्मक भूमि’ है जहाँ त्रिलोचनजी की सरलता उन्हें तमाम दूसरे प्रगतिवादी कवियों से अलग खड़ा कर देती है और उनके वाद को ‘वाद’ कम, ‘प्रगति’ अधिक बना देती है। वही अब भी इस प्रसंग को लिखते समय मुझे गाढ़े-गाढ़े काव्य-रस में भिगोए दे रही है।

एक लम्‍बी और कष्टकर बीमारी का दुख झेलकर त्रिलोचन गये। पर मुझे सरीखे बहुत-से लेखक-पाठकों के दिलों में वे अब भी हैं और हमेशा रहेंगे।

धरती की सरलता से निर्मित काव्य-देह में उनकी उपस्थिति और धडक़न अब भी महसूस होती है। ठीक वैसे ही, जैसी तब महसूस होती थी जब त्रिलोचन थे। तो त्रिलोचन अब गए कहाँ? फिर भी एक शून्य है जो पाटने में नहीं आता और भीतर गहरी अकुलाहट-सी है।

एक-दूसरे को तिर्यक काटते संशयों और हताशा के इस बुरे दौर में त्रिलोचन के होने के मानी क्या थे और कैसे उनकी सरलता देखते-देखते अनायास हमारे पूरे व्यक्तित्व पर नक्श हो जाती थी, शायद अब मैं थोड़ा-थोड़ा जान पाया हूँ। बहुत खोकर ही शायद यह अहसास होता है कि हमने क्या खो दिया है। इक्कीसवीं सदी में मुझे लगता है, हमें प्रगति ही नहीं, प्रकृति और प्रेम को भी नये सिरे से सीखने की शुरुआत करनी होगी। तब त्रिलोचन और उनकी सीधी-सरल लगती गुरुतर कविता के मानी हमें और ज्यादा साफ समझ में आएँगे।

(‘यादों का कारवाँ’ से साभार)
चि‍त्र: श्‍याम सुशील

‘टेलीवि‍जन का कारोबार’ पर गोष्‍ठी 23 को

नई दि‍ल्‍ली : युवा शोध समवाय की ओर से शोध पाठ-2 के अन्‍तर्गत ‘टेलीवि‍जन का कारोबार : मुनाफा और भाषाई उपद्रव के बीच सरोकार का मि‍थक’ पर गोष्‍ठी का आयोजन 23 मई 2012 को दोपहर 2.00 बजे कमरा नम्‍बर-15, कला संकाय, दि‍ल्‍ली वि‍श्‍ववि‍द्यालय में कि‍या जा रहा है। इसके प्रस्‍तोता हि‍न्‍दी वि‍भाग, दि‍ल्‍ली वि‍श्‍ववि‍द्यालय के शोधार्थी वि‍नीत कुमार होंगे। वरि‍ष्‍ठ पत्रकार, एन.डी.टी.वी. प्रि‍यदर्शन चर्चा में भाग लेंगे। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता संपादक, सी.एस.डी.एस अभय कुमार दुबे करेंगे।

शोध पत्र का सार
सन्‍दर्भः मंडी में मीडिया, वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक
बीज शब्द- कार्पोरेट मीडिया, टेलीविजन, भाषाई प्रयोग, टेलीविजन सामग्री, मीडिया उद्योग के तर्क, सामाजिकता की शक्ल, मुनाफा बनाम सरोकार, सहज संप्रेषण, स्क्रीन भाषा, मार्केटिंग स्ट्रैटजी, फिक्‍की-केपीएमज रिपोर्ट, मीडिया की आचार संहिता, सेल्फ रेगुलेशन..

टेलीविजन शुरू से आखिर तक उद्योग है। यह अलग बात है कि इसे व्यवस्थित उद्योग की शक्ल दिये जाने की कोशिशों के बावजूद अभी भी इसे सामाजिक सरोकार के माध्यम के रूप में देखने-समझने और विश्‍लेषित करने की परम्‍परा बरकरार है। इतना ही नहीं समाचार चैनलों के लोकतंत्र का चौथा स्तम्‍भ के दावे के बीच अब तो मनोरंजन चैनल तक भी अपने को इसी रूप में प्रस्तावित करने में जुटे हैं। यह टेलीविजन को पूँजीवादी माध्यम की अवधारणा और सांस्कृतिक अध्ययन पद्धतियों के तहत विश्‍लेषित करने से अलग की स्थिति है।

साल 2000 में फिक्‍की फ्रेम्स की जो नींव पड़ी और उसके बाद सिनेमा के साथ-साथ टेलीविजन को भी एक व्यवस्थित उद्योग का दर्जा दिये जाने की जो कोशिशें हुई, उसके पीछे जो निवेश हुए,अगर उसके पीछे के तर्कों पर गौर करें तो हमारे लिये यह समझना कहीं ज्यादा आसान है कि टेलीविजन टायर, ट्यूब, सीमेंट, रीयल इस्टेट जैसे किसी दूसरे उद्योग की तरह ही एक उद्योग है जिसका संबंध सामाजिक सरोकार के सवाल को पण्य वस्तु/उत्पाद में तब्दील करना है।[1] यह उत्पाद या तो समाचार की शक्ल में या फिर मनोरंजन की शक्ल में हमारे सामने आते हैं। शायद यही कारण है कि साल 2001 में फिक्‍की-फ्रेम्स ने मीडिया शोध पर एक सत्र रखा, उसमें टीवी दर्शक को टीवी उपभोक्ता के तरीके से देखने और उसी आधार पर रणनीति बनाने की बात की।[2] मसलन दूरदर्शन के सन्‍दर्भ में कागजी तौर पर ही सही दर्शकों को बतौर नागरिक देखने और उनकी जरूरतों के आधार पर कार्यक्रम प्रसारित करने की जो बात की जाती रही, इस मंच के जरिए उसे सीधे-सीधे उपभोक्ता कहा जाने लगा। टीवी के साथ दर्शक के इस नए संबंध के साथ जो स्पष्टता बरती गई, उसमें कोई शक नहीं कि टीवी के बाजार की नब्ज को समझने और उस आधार पर अपना प्रसार करने में भरपूर मदद मिली। लेकिन टेलीविजन सामाजिक सरोकार के घोषित एजेंडे से निकलकर दूसरी चिंता में सक्रिय हो गई। मसलन इसी सत्र में इस बात पर चर्चा की गई कि ‘आज से दो साल पहले जिस टीवी पर 20 मिलियन सेकण्ड विज्ञापन आते थे, अब उस पर 50 मिलियन सेकण्ड विज्ञापन आने लगे हैं। ऐसे में मीडिया बायर्स ( मीडिया स्पेस की खरीद-बिक्री करनेवाले लोग) की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।’ लेकिन ऐसे में इस रणनीति के साथ काम करनेवाले टेलीविजन को जिसमें कि मनोरंजन चैनल से लेकर समाचार चैनल तक बराबर के हिस्सेदार हैं, ठीक उसी तरह विश्‍लेषित करने की पद्धति का विकास होता जिस संरचना और ढाँचे के तहत ये काम करते हैं। मेरी अपनी समझ है कि यह काम या तो हमसे छूट गया या फिर पूँजीवादी माध्यम का लेबल चस्पा कर देने के बाद इसके भीतर सामाजिकता के दावे और मुनाफे की पेचीदगियों को समझने की जरूरतें महसूस नहीं की गईं। यह एक तरह से विश्‍लेषण का उदासीन क्षेत्र बनकर रह गया। पूँजीवादी माध्यम मानने के बावजूद अगर इसके काम करने के तरीके पर बात हो पाती ( हिन्दी क्षेत्र में) तो शायद सामाजिकता के दावे और खोखलेपन को हम बेहतर ढंग से समझ रहे होते। खैर, हुआ यह है कि हमारी इसी चूक के बीच टेलीविजन ने मुनाफे और सरोकार के बीच एक ऐसी प्रविधि का विकास किया है जिसमें दोनों काम साथ-साथ चलते हैं। मुनाफे का काम तो चलता ही है, सरोकार का काम होता दिखाई देता है। ऐसा या तो झटके में पूँजीवादी माध्यम करार देकर चलता कर देने की वजह से हुआ है या फिर अभी भी सामाजिक सरोकार की उम्मीद और उसी के तहत विश्‍लेषित करने की आदत के कारण जिसे कि जेम्स कर्रन और जीन सीटन ने ब्रिटेन के संदर्भ में मीडिया और टेलीविजन की आवारागर्दी के रुप में रेखांकित किया है।[3]

टेलीविजन की इस आवारागर्दी के बीच सामाजिकता कहाँ और कितना पीछे रह गई, इस पर बहस करना फिर उस उम्मीद की तरफ लौटना है। लेकिन समय-समय पर इस टेलीविजन पर दुरुस्त होने को लेकर जो दबाव बनाये गये, उसका नतीजा यह हुआ कि सामाजिक जटिलताओं से अपने को काटते हुए भी टेलीविजन सरोकार के दावे जोर-शोर से करने लग गया। समाचार चैनलों ने तो यह दावा शुरू से ही किया और यहाँ तक कि पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग को सरकारी भोंपू और जनविरोधी तक बताया लेकिन करीब बारह साल बाद मनोरंजन चैनल तक ऐसे दावे करने में पीछे नहीं हैं। यह टेलीविजन के भीतर और उसके प्रभाव से पैदा होनेवाली सामाजिकता के बजाय उस दबाव और जरूरत को खारिज करने की रणनीति भर है जो बहुत ही चमकीले ढंग से हमारे सामने है। यह हमें सीरियलों,रियलिटी शो और यहाँ तक कि गेम शो में समान रूप से दिखाई देता है। टेलीविजन की नये किस्म की सामाजिकता पर बात करना जरूरी है।

दूसरी तरफ सामाजिकता के इस नये संस्करण में भाषाई मिजाज न सिर्फ बदला है बल्कि यह सवाल गंभीरता से उठने लगा है कि क्या वाकई टेलीविजन को भाषा की जरूरत है। वह भाषा जिसके जरिए हम अर्थ का संप्रेषण भर नहीं कर रहे होते हैं बल्कि यथार्थ को रेखांकित भी कर रहे होते हैं। आप इसे लिखित या मौखिक भाषा के संदर्भ में देख सकते हैं। मेरी अपनी समझ है कि टेलीविजन को भाषा के जरिए अगर यह काम करना होता तो उसकी भाषा दूसरे माध्यमों से कहीं ज्यादा संवेदनशील होती लेकिन प्रयोग में इस भाषा को या तो दरकिनार कर दिया गया है और उसकी जगह कई दूसरे किस्म की भाषा ( जिसकी चर्चा हम ग्राफिक्स और विजुअल्स के जरिए करेंगे) ईजाद कर ली गई है, जिसने अपने तर्क विकसित किए हैं या फिर भाषा का यह रूप विज्ञापन के आसपास बैठता है। अकादमिक,व्याकरणिक और यहाँ तक कि स्वयं टेलीविजन की भाषा शर्तों के लिहाज से भाषा का यह संयोजन अराजक और उपद्रवी है लेकिन मुनाफे की दुनिया की असली भाषा यही है। टेलीविजन की सामाजिकता इसके बीच से होकर गुजरती है..

[1] Daya kishan thussu( 2007), news as entertainment, the rise of global infotainment, sage publication.
[2] Entertainment and media research: viewing the viewer as consumer, फिक्की-फ्रेम्स 2001
[3] James curran and jean seaton( 2003), Power without Responsibility. Routledge, London.

100 की जोहरा- नयेपन की तलाश है उनकी खासीयत : योगराज टंडन

जोहरा सहगल

चर्चित लेखक और नाट्यकर्मी योगराज टंडन रेडियो और दूरदर्शन में नाट्य लेखन व प्रस्तुति संबंधी कार्यों से जुड़े रहे हैं। 1950 में पृथ्वी थियेटर में इन्होंने जोहरा सहगल के साथ काम किया था। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से ‘थियेटर के सरताज पृथ्वीराज’ नाम की इनकी महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसमें जोहरा सहगल से संबंधित प्रसंग भी हैं। यह संस्मरण सुधीर सुमन और श्याम सुशील के साथ बातचीत करते हुए उन्होंने सुनाया-

मैं जब 1950 में बंबई गया, तब मुझे शॉट स्टोरी लिखने का शौक था। हमारा परिवार 1947 में विभाजन के बाद भारत आया था। पिता चाहते थे कि एक्साइज इंस्पेक्टर की नौकरी से उनके रिटायर होने से पहले मैं कोई काम करने लगूँ। हालाँकि चाबड़ी बाजार में एक प्रेस भी था, पर पिता चाहते थे कि मिथिलेटेड स्पीरिट का लाइसेंस ले दें और मैं वहाँ बैठूँ। पृथ्वीराज कपूर से हमारे पारिवारिक रिश्ते थे। वे जब भी दिल्ली आया करते थे, तो हमारे घर ठहरा करते थे। वे कहते कि गुग्गू तुम पढ़ने-लिखने वाले हो, इस घर में कैसे पैदा हो गये। वे कहते कि इसे मेरे पास भेज दो। लेकिन बड़े भाई लेख टंडन पहले ही वहाँ जा चुके थे और तब उनकी स्थिति अच्छी नहीं थी। खैर, मैं जब बंबई पहुँचा तो वहाँ नेपथ्य में मुझे भूमिका मिली, मुझे अभिनेताओं के अभिनय और प्रॉपर्टी वगैरह पर नजर रखनी थी। वहीं पहली मुलाकात जोहरा सहगल से हुई। नाटक ‘गद्दार’ में वे बड़ी बी बनती थीं। हफ्ते दो हफ्ते बाद मैंने एक दिन उन्हें टोका कि ये डायलॉग आपने गलत बोला। आपका किरदार तो यह बोल ही नहीं सकता। बिना किसी बहस के वे मेरी बात से सहमत हो गईं।

पृथ्वी थियेटर में शामिल होने से पहले जोहरा सहगल और उनकी छोटी बहन अजरा मुमताज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर भारतीय नर्तक उदय शंकर के बैले ग्रुप में थीं और इस ग्रुप में काफी महत्वपूर्ण स्थान रखती थीं। खासकर जोहरा जी तो अल्मोड़ा में उदय शंकर जी की नृत्य एकेडमी की सक्रिय कार्यकर्ता थीं। वहाँ नृत्य की शिक्षा के लिये जो कायदे-कानून बनाये गये थे, वे उस सिलेबस की इंचार्ज थीं। वहीं उन्होंने अपने से आठ साल छोटे एक नवयुवक नर्तक और चित्रकार साथी कामेश्‍वर सहगल से शादी की। उन दिनों यह शादी अपने प्रकार की पहली शादी कही जा सकती थी। इसमें किसी को अपना धर्म बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ी। उनके परिवार के लोग चाहते थे कि वे धर्म परिवर्तन कर लें। लेकिन उन्होंने बिना धर्म परिवर्तन किये साथ रहना तय किया और इसकी बहुत चर्चा थी। इसे लोगों ने बड़ा सराहा और एक प्रगतिशील कदम बताया। इसके बाद जोहरा जी और कामेश्‍वर सहगल अल्मोड़ा छोड़कर लाहौर चले गये और वहाँ नृत्य की शिक्षा के लिये एकेडमी खोल ली। आरम्‍भ में तो अपनी आजादख्याली और प्रगतिशील दृष्टिकोण के कारण लाहौर के सामाजिक लोगों ने उनको हाथोंहाथ लिया। जगह-जगह उनके सम्मान में दावतें हुईं। उनको जनसभाओं और घरेलू किस्म की बैठकों में बुलाया गया, उनके विचार सुने गये। एक हिन्‍दू तो दूसरा मुसलमान, फिर भी एक साथ जीवन बसर कर रहे हैं, घर-घर में उनकी शादी के बड़े सुखद चर्चे होने लगे थे। उस वक्त माहौल ऐसा था भी कि होली हिन्‍दू-मुस्लिम साथ मिलके मनाते थे। दीवाली के दिन मुसलमान भी दीये जलाते थे। हमारे ननिहाल में तजिया निकलता था और उसके लिये जो घोड़ा पाला जाता था, वह हिन्‍दू नंबरदार पालते थे। वही मुसलमान थे जिन्होंने दंगे-फसाद के दौरान हिन्‍दुओं को बचाया और हिन्‍दुओं ने मुसलमानों को। खुद मेरे पिता को भी उनके मुस्लिम दोस्त ने अपने पास रखा। दोस्त की बीवी रोज काफिर कहके उन्हें गालियाँ देतीं। एक दिन दोस्त ने अपनी बीवी को गालियाँ बकते सुन लिया और उसने कहा कि तुमसे पहले मेरा दोस्त है और उसी वक्त तलाक, तलाक, तलाक कहके तलाक दे दिया। बाद में फिर मौलवी आये, उन्होंने कहा कि गुस्से में कहा है इसलिए यह तलाक मंजूर नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियाँ तो बदल चुकी थीं। मुस्लिम लीग और कट्टर किस्म के मौलानाओं का प्रभाव उभरने लगा तो लोगों की दृष्टि बदलने में देर नहीं लगी। तारीफ के बजाए अब नुक्ताचीनी होने लगी। शको-शुब्हात के घने बादल चारों ओर मंडराने लगे। बहानों-बहानों जोहरा सहगल और कामेश्‍वर सहगल का सोशल बाइकॉट भी होने लगा। इसके बाद ही दोनों सबकुछ समेटकर लाहौर से बंबई आ गये।

जोहरा जी को अपनी सूझबूझ और नृत्य में निपुणता के कारण फिल्मों में काम मिलने लगा, पर वह उस काम से भिन्न था, जिसे उन्होंने उदय शंकर के साथ किया या लाहौर में जिसे करने के लिए उत्साह के साथ लगी थीं। जोहरा जी की छोटी बहन अजरा अब तक पृथ्वी थियेटर में शामिल हो चुकी थीं। पृथ्वी थियेटर के अब तक दो नाटकों के शो हो चुके थे। जोहरा जी जब वहाँ पहुँची तो दूसरे नाटक की ही आगामी प्रस्तुतियों की तैयारियाँ जोर-शोर से चल रही थीं। नाटक की कास्ट तय थी। एक्टिंग जोहरा जी का पहला शौक था, वे पृथ्वी थियेटर में आना चाहती थीं। मगर पृथ्वीराज कपूर के मन में एक झिझक थी कि अजरा उनकी दोनों नाटकों की हीरोइन थीं, वे जो मासिक वेतन अजरा जी को दे रहे थे, उससे कम या ज्यादा वेतन वे जोहरा जी को दे नहीं सकते थे। आखिरकार जोहरा जी अभिनेत्री के बतौर नहीं, बल्कि नाटकों में नृत्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये पृथ्वी थियेटर में शामिल हुईं, लेकिन बहुत जल्द ही उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से अपना एक खास स्थान बना लिया। डाँस में तरतीब देने के साथ-साथ बाकायदा नृत्य सिखाने के लिये रोजाना कलाकारों को अभ्यास भी कराती थीं। हर अभिनेता-अभिनेत्री को निजी रूप से एक-एक शारीरिक हरकत का अभ्यास कराती थीं।

जब मैंने पृथ्वीराज जी का घर छोड़ा तो मुझे सर छुपाने के लिए कोई जगह चाहिये थी। जोहरा जी ने कहा कि मेरे सर्वेंट क्वाटर में रह लो। पैरी रोड पर वह बंग्ला था। मैंने कहा कि मैं कहाँ से उसका किराया दे पाऊँगा। छूटते ही वे बोलीं- जो बन सके वह दे देना। वहाँ रहना शुरू किया। रोज सुबह ही निकल जाता था। जोहरा जी अपने नौकर से हमेशा यह कहती थीं कि इसका ख्याल रखना। बल्कि अक्सर वे कहती रहती थीं कि- कभी तो मेरे साथ बैठकर खा। यह सम्‍भव नहीं हो पाता था। लेकिन उनकी एक क्रिश्चन सहेली कई बार मुझे भोजन करा देती थीं, उनका तर्क होता कि क्रिश्चन हूँ, अकेले कैसे खा सकती हूँ। मुझे लगता है कि यह सब जोहरा जी के इशारे पर होता था। वे हमारे लिए आइडियल हैं। व्यवहार उनका बहुत अच्छा रहा है। वे मेरा पूरा ख्याल रखती थीं। मुझे याद है कि जब मुझे महीने में 75 रुपये मिलते थे जिनमें 25 रुपये मैं घर भेज देता था। मेरे बड़े भाई की शादी होनी थी। मैं सोच रहा था कि जब मैं कुछ कंट्रिब्यूट नहीं कर सकता, तो क्यों जाऊँ? जोहरा जी को शादी के बारे में पता चला, तो पूछने लगीं कि कब जा रहा है? मैंने कहा- मैं तो नहीं जा रहा। उन्होंने कहा कि ये तो कोई बात नहीं। लेकिन उनका वश नहीं चला। फिर उन्होंने पापा जी- पृथ्वीराज जी से कहा कि ये अपने भाई की शादी में नहीं जा रहा है। खैर, पृथ्वीराज जी ने समझाया कि तुम कुछ नहीं दे सकते, यह तो ठीक है, पर तुम नहीं जाओगे तो जान-पहचान वाले क्या कहेंगे? लोग सोचेंगे कि तुम भाई की शादी में क्यों नहीं हो? बड़ी बदनामी होगी। ये जो तुम बोझ बनने से परेशान हो, उससे तो ज्यादा बुरा होगा न! खैर, मैं गया। अगर जोहरा जी ने पहल न की होती, तो मैं अपने भाई की शादी में न गया होता। इसे मैं कभी नहीं भुलता। अजरा जी की आपा तो वे थी हीं, वे सबके लिये आपा जैसी ही थीं। बड़ा ह्यूमन व्यक्तित्व है उनका।

‘दीवार’ में पहले जो भूमिका बलराज साहनी की पत्नी करती थीं, उनकी मृत्यु के बाद जोहरा वह रोल करने लगीं। पहले किसी द्वारा निभाई गई भूमिका के बाद उसी भूमिका को निभाना और अपना प्रभाव छोड़ना बहुत मुश्किल होता है, जो उन्होंने किया। एक थियेटर आर्टिस्ट के लिए बॉडी मूवमेंट्स और कैरेक्टर की समझदारी, कि कौन सा रोल निभाना है, उसकी भाषा कैसी होनी चाहिए, यह सब उनमें है। आप जान लीजिए कि मैं तो मामूली असिस्टेंट था, मैंने कोई बात कही, तो वे उसे सुनती थीं। यूँ सर पर सवार होकर कभी पेश नहीं आतीं थीं। जब वे ‘दीवार’ नाटक में विदेशी औरत का रोल करती थीं, तो बाल कैसे बनाने हैं, टोपी कौन सी लगानी है, हमेशा यह सोचती रहती थीं। कहीं न कहीं नयापन लाने की कोशिश वे हमेशा करती थीं। वह तलाश अब भी उनकी जारी है। उनकी क्रिएटिविटी थकती नहीं। इस उम्र में भी वे वोकल और बॉडी एक्सरसाइज करती हैं, जबकि वे अपने आप चल नहीं सकतीं। ह्विल चेयर पर चलती हैं। याददाश्त उनकी गजब की है। लगता ही नहीं कि बूढ़ी हैं। मुझे तो हमेशा उसी तरह से यंग लगती हैं। मुझे उनकी हर परफामेंस नई लगी। रोल तो एक ही होता था और हफ्ते में उसकी तीन-तीन प्रस्तुतियाँ होती थीं। मगर हर बार वे कुछ न कुछ चेंज कर देती थीं। कभी कास्ट्यूम तो कभी कुछ, और यह सब बड़ा कन्विसिंग लगता था। इतना ही नहीं कि खुद अपने में चेंज कर लेती थीं, बल्कि उस परिवर्तन के बारे में साथी कलाकार से बात भी करती थीं कि अगर ऐसा बदलाव किया जाये तो कैसा रहेगा, ताकि वह भी उसके अनुरूप अपनी भूमिका को निभाए।

बाद में उनके और उनके पति के बीच टकराव पैदा हुआ। कामेश्‍वर कुछ ज्यादा ही आत्मकेंन्‍द्रि‍त थे। उन्हें लगता था मानो वो समय से बहुत पहले आ गये हों और उनके प्रशंसक अभी उतनी सूझबूझ नहीं रखते कि उनकी रचना को समझ सकें। वे यह नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी आर्टिस्ट बने, यह भी तनाव की वजह थी। एक बड़ी वजह यह भी रही होगी कि जितना जोहरा लाइम लाइट में थीं, वे उतने नहीं थे। तंग आकर उन्होंने खुदकुशी कर ली। अब घर जोहरा जी को काटने के लिये दौड़ता था। कुछ दिन वे अजरा जी के साथ रहीं। पृथ्वी थियेटर तब ‘पृथ्वी हट’ बन गया था। कुछ दिन वहाँ रहने की कोशिश की, पर बंबई शहर में रह पाना मानसिक रूप से उनके लिये बहुत कष्टकर था। लेकिन वे जीना चाहती थीं अपने बच्चों के लिये। उन्होंने बंबई शहर और पृथ्वी थिएटर दोनों को छोड़ दिया। पृथ्वीराज कपूर चाहकर भी उन्हें रोक नहीं सके। पहले वे दिल्ली आईं और फिर लम्‍बे समय के लिये लंदन चली गईं। भारत वापस आने के बाद उन्होंने दिल्ली शहर को ही अपना घर बना लिया। पति की मृत्यु के बाद खुद ही बच्चों को पाला, नाटक किया, उन्हें पढ़ाया। जैसी वे थीं, वैसा ही बच्चों को बनाया। पति के साथ तनाव के दौरान भी कभी बच्चों को पति के खिलाफ भड़काया नहीं।

1983 में जब मैं दूरदर्शन में ड्रामा प्रोड्यूसर था तब उनसे मुलाकात हुई। मैंने कहा कि जोहरा जी मैं चाहता हूँ कि आप नाटक में काम करें। लेकिन आपकी जितनी फीस है वह दे नहीं पाऊँगा। दूरदर्शन में दूसरी मुश्किलें थीं। अधिकारियों का यह कहना था उनकी आवाज अप्रूव्ड नहीं है। मेरे यह बताने का भी उन पर असर नहीं पड़ रहा था कि वे फिल्मों में काम कर चुकी हैं, पृथ्वी थियेटर में काम कर चुकी हैं। उनकी पोजिशन ऐसी है कि आवाज के एप्रूवल की जरूरत नहीं है। खैर, बड़ी मुश्किल से फाइल पहुँची अपनी जगह पर। उस वक्त उनको प्रति नाटक 1000 रुपये देना तय हुआ। 1989 में अपनी रिटायरमेंट के बाद मैं उनके यहाँ आता-जाता रहा। वहीं उन पर केन्‍द्रि‍त एक किताब पढ़ने को मिली। मैंने उनकी जीवनी लिखनी शुरू की थी, पर मेरी कमजोरी कहिए कि 50-60 पन्नों के बाद आगे नहीं लिख पाया। मुझे लगा कि पुनरावृति हो रही है, पृथ्वीराज कपूर वाली किताब के ही प्रसंग बार-बार आ जा रहे थे। मुझे लगा कि उन्हीं प्रसंगों को लेकर दुबारा एक किताब लिखना ईमानदारी नहीं होगी। फिर भी क्या जीवन है उनका! अपनी फैमिली में सबसे ज्यादा आधुनिक और रिवोल्ट करने वाली महिला हैं वे। पहले एयर सर्विस तो थी इस तरह थी नहीं, पानी के जहाज से ही जाना पड़ता था। वे पानी के जहाज से ही देश-दुनिया में गईं। उन्होंने कार चलाना सीखा। नाम याद नहीं आ रहा, एक बार तो एक मुस्लिम मुल्क में वे यहाँ से कार से ही गईं। एडवेंचर उन्हें पसंद है। उनकी बेटी उन्हें प्यार से फैटी कहती है, पर वे वैसे मोटी नहीं रहीं कभी भी। वे अब भी रियाज करती हैं। डांस वाली बॉडी है उनकी। अभी भी फैज और हफीज जालंधरी उन्हें याद हैं। उनकी आवाज की गूँज अभी भी पहले जैसी ही है।

हाँ, अजरा जरूर उनसे ज्यादा खूबसूरत थीं, लेकिन वे नाटक में अपनी निरंतरता बरकरार नहीं रख सकीं। बेशक जोहरा जी देखने में अधिक सुंदर नहीं थीं, लेकिन उनमें आकर्षण भरपूर रहा है। उनके बातचीत करने में अद्भुत किस्म का अपनापन और आकर्षण है। जब वे नृत्य करती थीं, तो आकर्षण की सारी सीमाएं टूट जाती थीं। आयु का बंधन टूट जाता था।

आज के दौर में आर्ट थोड़ा पीछे रह गया है, शोमैनशिप और ग्लैमर आगे आ गया है। आज के दौर में किसी जोहरा सहगल को आना होगा, तो उसे उनसे भी ज्यादा ग्रेट होना होगा, क्योंकि जमीन हमवार नहीं है, उबड़-खाबड़ रास्ते हैं। लाइटिंग और कपड़े ही जरूरी हो गये हैं। कहानी, डायलॉग और कैरेक्टर पीछे रह गये हैं। पहले स्क्रिप्ट पर कितनी बहसें होती थीं, लेकिन आज किसके पास फुर्सत है! एक खला है, एक गैप है। ऐसे दौर में हम परफार्म करती जोहरा सहगल को बहुत मिस करते हैं। आज तो बस उन्हें बोलते हुए ही हम सुन पा रहे हैं।

(‘समकालीन जनमत’, मई 2012 से साभार)

हमें दिल टूटने का गम नहीं है, मगर ये हादसा कुछ कम नहीं है

 

नई दि‍ल्‍ली : जगदीश रावतानी की संस्था ‘आनंदम संगीत व साहित्य सभा’ की मासिक गोष्ठी नई दिल्ली स्थित हिमालय हाऊस के मैक्स न्यूयार्क सभागार में. 14 मई, 2012 को आयोजि‍त की गयी। इसमें दर्द देहलवी, साज़ देहलवी, सरफराज़ देहलवी, मजाज अमरोहवी, मासूम गाजियाबादी, जमील हापुडी,  नौशाद ‘समर’,  इरफ़ान ग़ालिब, डॉ. अशोक ‘मधुप’, रूपा सिंह, पूजा प्रजापति, भूपेंद्र कुमार शोभना ‘शुभी’, नागेश चन्द्र, वेदप्रकाश,  वीरेंद्र कमर आदि‍ कवियों और शायरों ने हिस्सा लिया। गोष्ठी की अध्यक्षता प्रसिद्ध शायर नाज़ सिकंदाराबादी ने की। मासूम गाजियाबादी का एक शेर-

हिफाज़त चरागों की और दामनों से
वो अंजाम शायद नहीं जानते हैं।

गज़ल का रंग जम जाए तो वाह वाह के स्वर गूँज उठते हैं, जैसे मजाज अमरोहवी का यह शेर-
जीने के आरज़ू ने तो मरने नहीं दिया
पर ज़िन्‍दगी से हाथ मिलाने के दिन गये।

साज़ देहलवी उर्दू के अपने उम्दा रंग में नज़र आये-
जगाओ ना अभी मुन्कर नाकीरो*
मैं  लौटा हूँ थका हारा सफर से।
(* मुन्कर नकीर दो फ़रिश्ते हैं जो मरने के बाद कब्र में आ कर मरहूम से नाम आदि पूछते हैं)।

दर्द देहलवी-
आ कर तू  इंतज़ार की शिद्दत तो देख ले
मेरी नज़र की गर्मी मिलेगी किवाड में।

आदेश त्यागी-
छूटी खुदी और मुझ को खुदा आ गया नज़र
ये शायरी से क्या मुझे इरफ़ान हो गया।

डॉ. अशोक मधुप ‘आनंदम’ की गोष्ठी में पहली बार आए थे और उन्होंने एक शानदार गज़ल पेश की-
आग दिल में लगी किस कदर देखिये
जल गया है मेरा घर का घर देखिये
हकपरास्तों का मैं राहबर था कभी
आज नेज़े पे है मेरा सर देखिये।

इरफ़ान ग़ालिब-
अज़ीज़ भाई खफा सा दिखाई देता है
मेरे ही खून का प्यासा दिखाई देता है
उरूज़े-तिश्नगी या है फरेबे-हुस्ने-नज़र
क्यों रेगज़ार भी दरिया दिखाई देता है।

वीरेंद्र ‘कमर’-
हमें दिल टूटने का गम नहीं है
मगर ये हादसा कुछ कम नहीं है
अता कुछ और कर ज़ख्मों की दौलत
अभी दामन हमारा नम नहीं है।

कवयित्री शोभना ‘शुभी’ ने सशक्त कविता पेश की-
जिन आखों की तारीफ़ में उन्होंने कसीदे पढ़ दिए/ न रहें खाली यह सोच कर आँसू भर दिए…

पूजा प्रजापति-
कितना अच्छा होता जो दिल ना बनाता खुदा/तो ना शिकवा होता ना शिकायत ना कोई होता खुदा…

रूपा सिंह-
धूप धधकती कौंधती खिलखिलाती/अंधेरों को चीरती रौशन करती/… मेरी उम्र भी एक धूप थी…

नागेश चन्द्र-
और नहीं कुछ भी मन में/ आ जाओ तुम जीवन में

भूपेन्द्र कुमार-
सच्चे मानव के हाथों में पड़ती देखी हथकड़ियाँ
क्यों भ्रष्टाचारी की गर्दन का फंदा ढीला ढाला है।

‘आनंदम’ संस्थापक अध्यक्ष जगदीश रावतानी ने अपने किसी मरहूम दोस्त को श्रद्धांजलि देते हुए एक मार्मिक कविता पढ़ी। गोष्ठी के अंत उन्‍होंने सभी उपस्थित कवियों-शायरों का धन्यवाद कि‍या। गोष्ठी का संचालन वीरेंद्र ‘कमर’ ने किया।

प्रस्‍तुति‍ : प्रेमचंद सहजवाला

एब्सर्ड नाटकों के जनक हैं भुवनेश्‍वर : नंद किशोर आचार्य

नंदकिशोर आचार्य

दिल्ली : भुवनेश्‍वर द्वारा लिखित नाटक ‘तांबे का कीड़ा’ (1946)  भारतीय ही नहीं, अंग्रेज़ी तथा अन्य विदेशी भाषाओं में भी लिखा गया पहला ‘एब्सर्ड’ (असंगत)  नाटक है। पश्‍चि‍म में भी इसकी शुरुआत द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद होती है। अतः भुवनेश्‍वर को ‘एब्सर्ड’  नाटकों का जनक कहा जाना चाहिये। यह विचार प्रसिद्ध कवि, आलोचक और नाट्यचिंतक नंदकिशोर आचार्य ने साहित्य अकादेमी द्वारा भुवनेश्‍वर जन्मशतवार्षिकी के अवसर पर 15 मई, 2012 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में उद्घाटन व्याख्यान देते हुए व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि बड़ा रचनाकार वही होता है जो लेखन के लिए नई दृष्टि विकसित करता है और यह दृष्टि पाने के लिये उसे एक नए ‘फार्म’ को चुनना होता है। भुवनेश्‍वर ने अपने नाटकों और कहानियों के लिये एक नए ‘फार्म’ का आविष्कार किया। उनके ‘फार्म’ पर गम्‍भीर अध्ययन की ज़रूरत है।

प्रभाकर श्रोत्रिय ने अपने बीज भाषण में कहा कि भुवनेश्‍वर का सम्‍पूर्ण साहित्य भावुकता को अस्वीकृत करता है। भुवनेश्‍वर रस की सत्ता को समाप्त कर ‘आत्मताप’ को प्रतिष्ठित करते हैं। हिन्‍दी जगत ने उनके ‘क़िस्सों’ पर ज़्यादा ध्यान दिया है जबकि उनके कृतित्व का जाँचा-परखा जाना अभी बाक़ी है। उनके नाटकों पर अपने अध्यक्षीय व्याख्यान में अकादेमी के उपाध्यक्ष विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि भुवनेश्‍वर अपने ज़माने से आगे के रचनाकार थे। 1930 से 1955 के बीच में उन जैसा प्रतिभाशाली लेखक कोई नहीं है। प्रेमचंद द्वारा उनको अपने लेखन में ‘कटुता’ कम करने के सन्‍दर्भ पर उन्होंने कहा कि इस ‘कटुता’ की उपज के पीछे के कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिये। इससे पहले हिन्‍दी परामर्श मंडल के संयोजक माधव कौशिक ने कहा कि समाज से अलग सोचने वाले लेखकों के साथ हमने हमेशा अमानवीय व्यवहार किया है जो ग़लत है। भुवनेश्‍वर की त्रासदी अन्य लेखकों की भी त्रासदी है।

भुवनेश्‍वर की कहानियों पर आधारित सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर गोपेश्‍वर सिंह ने की और मंजुला राना व सुषमा भटनागर ने अपने आलेख प्रस्तुत किये। सुषमा भटनागर ने उनकी कहानियों में निर्भीक सच्चाइयों का विश्‍लेषण किया। गोपेश्‍वर सिंह ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि उनकी कहानियों में नई कहानी की तीन बातें पहली बार सामने आती हैं। पहली बात- अकेलापन,  दूसरी बात- प्रेम की सघन किन्‍तु मौन अनुभूति और तीसरी, सबसे महत्त्वपूर्ण बात- कहानी की नई भाषा। इस तरह भुवनेश्‍वर नई कहानी की प्रस्तावना लिखने वाले हैं। उन्हें केवल ‘भेड़िए’ कहानी तक सीमित नहीं कर देना चाहिये।

दिन के अंतिम सत्र में भुवनेश्‍वर के नाट्य साहित्य पर देवेन्द्र राज अंकुर की अध्यक्षता में भानु भारती, ज्योतिष जोशी और राजकुमार शर्मा ने विचार व्यक्त किये। भुवनेश्‍वर को रंगमंच पर पहली बार प्रस्तुत करने वाले भानु भारती ने कहा कि भारतीय रंगमंच भुवनेश्‍वर के बिना अधूरा है। हिन्‍दी रंग जगत ने उनके नाटकों के साथ अन्याय किया है। उनके नाटक घटनाओं से मुक्त हैं लेकिन उसका शिल्प चौंकाने वाला है। शब्दों की इतनी मितव्ययता आज दुर्लभ है।

ज्योतिष जोशी ने कहा कि भुवनेश्‍वर के नाटकों का कोई विकल्प नहीं है। स्त्री-पुरुष संबंधों को अपने समय में वह जिस बेबाकी से उठाते हैं, वह दुर्लभ है। उनके नाटकों में कला का कोई प्रभा मंडल नहीं है बल्कि एक वैचारिक मौलिकता है।

देवेन्द्र राज अंकुर ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि भुवनेश्‍वर को एब्सर्ड नाटककार के फ्रेम में रख दिया गया है जिससे उनके नाटकों से दूरी बना ली गई है जो सर्वथा ग़लत है। उनके नाटकों के दृश्य खंडों में जो चाक्षुष प्रभाव है, वह आज के समय में अकल्पनीय है। उनके नाटकों में कथा की नई रंग भाषा है, उसे समझकर उन्हें ज्यादा से ज्यादा मंचित करने की ज़रूरत है।

कार्यक्रम का संचालन उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन उपसचिव के.एस. राव ने किया।

प्रस्तुति: अजय कुमार शर्मा

आलोचना का लोकधर्मी प्रतिमान

‘आकंठ’ के आलोचक जीवन सिंह पर केन्‍द्रि‍त अंक पर युवा कवि‍ रामजी तिवारी की टि‍प्‍पणी-

पिपरिया, मध्य प्रदेश से हरिशंकर अग्रवाल के सम्‍पादन में निकलने वाली पत्रिका ‘आकंठ’ का, हमारे समय के महत्वपूर्ण आलोचक ‘जीवन सिंह’ पर केंद्रित अंक पिछले दिनों आया है। साहित्य के तथाकथित केन्द्रों से दूर रहते हुए जीवन सिंह ने जिस तरह आलोचना की लोकधर्मी परम्परा को विकसित और समृद्ध किया है, यह अंक उसी खासपने को रेखांकित करता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस अंक को जहाँ एक तरफ ‘आकंठ’ जैसी दूरस्थ पत्रिका ने निकाला है, वहीँ इसको सम्पादित करने का काम जिन चार युवा रचनाकारों ने किया है, वे सभी भी ‘जीवन सिंह’ और ‘आकंठ’ की ही तरह साहित्य के तथाकथित केन्‍द्रों से दूर रहने वाले नाम हैं। ये नाम हैं बलभद्र, केशव तिवारी, महेश चंद्र पुनेठा और सुरेश सेन निशांत। इनके अतिथि सम्‍पादन में निकलने वाले इस अंक में जीवन सिंह की रचनाधर्मिता और उनके द्वारा विकसित किये गये आलोचना के लोकधर्मी प्रतिमानों को व्यवस्थित तरीके से रेखांकित किया गया है। नन्द चतुर्वेदी, विजेंद्र, नवल किशोर, अजय तिवारी, ज्ञानेंद्रपति, मदन कश्यप, एकांत श्रीवास्तव, रेवती रमण, भरत प्रसाद, अशोक कुमार पाण्डेय जैसे कई और लोगों को ‘आकंठ’ के इस अंक में पढ़ा जा सकता है। इसमें जीवन सिंह का एक व्याख्यान, कपिलेश भोज और रेवती रमण के साथ दो साक्षात्कार, डायरी के कुछ पन्ने और उनकी कुछ चुनिन्दा कवितायें भी दी गयी हैं, जिनसे उनकी रचनात्मकता के विविध पक्षों से हम अवगत होते हैं |

‘आकंठ’ के इस विशेष अंक की शुरुआत में उसके चारों युवा संपादकों ने अपनी बात रखी है। ये बातें इस पत्रिका के लिये एक तरह से रोड-मैप का कार्य करती हैं। बलभद्र अपने लेख में कहते हैं- “आलोचना की संस्कृति के विकास में ऐसे लोगों के योगदान और महत्व को रेखांकित किया जाना चाहिये, जो प्रगतिशील जनवादी मूल्यों के साथ–साथ देश के आम-अवाम के हक में संगठन के स्तर पर भी सक्रिय हैं।” महेश चंद्र पुनेठा का इशारा जीवन सिंह की आलोचना के एक दूसरे मौलिक पक्ष की ओर है- “वह साहित्य चिंता से अधिक जीवन चिंता को प्राथमिकता देने वाले आलोचक हैं। उनका लेखन जीवन की क्रियाशीलता, जीवन सौंदर्य, जीवन बोध, उसकी संश्लिष्टता, विविधता और भाषा की तलाश का पर्याय है । केशव तिवारी कहते हैं- वह अपने साहस और विवेक से कविता में लोकधर्मी प्रतिमानों की स्थापना करते हैं। ऐसे प्रतिमान जिनके केन्‍द्र में केवल और केवल मनुष्यता हो।” सुरेश सेन निशांत की स्थापना है- “जीवन सिंह के लिये कविता के सौंदर्य का प्रश्‍न लोक जीवन के सौंदर्य के प्रश्‍न से अलग नहीं है। बाद के लेखों में भी जीवन सिंह के व्यक्तिव और कृतित्व का यही पक्ष उभरकर सामने आया है। रेवती रमण उन्हें सर्वाधिक प्रामाणिक आलोचक मानते हैं, जबकि ज्ञानेंद्रपति की नज़रों में ‘हिन्‍दी आलोचना की प्रगतिशील धारा के अद्यतन अध्याय का, जो अभी लिखा जा रहा है, नाम है- जीवन सिंह।

कपिलेश भोज और रेवती रमण शर्मा के साथ जीवन सिंह की बातचीत भी कई मायनों में अनूठी है। इसमें कविता और उसकी आलोचना पर जीवन सिंह ने खुलकर बात की है। कपिलेश भोज से अपनी बातचीत में उन्होंने कहा है कि यह कविताओं का ही प्रताप है कि मैं आज भी साहित्य–रसिक बना हुआ हूँ, अन्यथा मैं भी हि‍न्‍दी के बहुत सारे अध्यापकों की तरह सेवानिवृत्ति के बाद अपना धंधा चला जा रहा होता। कविता हमको नैतिक जीवन जीने की ओर प्रेरित करती है। सामान्य जन के प्रति आत्मीयता का भाव पैदा करती है। भावों-विचारों की सफाई करती है और आत्मिक जीवन को साफ़ सुथरा बनाती है। मैं कविता से यह सब ग्रहण करता हूँ। वहीँ रेवती रमण शर्मा से उनकी बातचीत लोक-कलाओं के विविध आयामों के खोलते हुए चलती है।

जीवन सिंह ने आलोचना की तीन महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं- ‘कविता की लोकप्रकृति’, ‘कविता और कविकर्म’ तथा ‘शब्द और संस्कृति’। इस अंक में इन तीनों किताबों को ध्यान में रखते हुए, हमारे समय के युवा कवियों/आलोचकों ने उनके कृतित्व पर प्रकाश डाला है। अंक की एक खूबी यह भी है कि इसमें अपने लेखों और आलोचकीय वक्तव्यों के माध्यम से हस्तक्षेप करने वाले अधिकांश साहित्यकार जनपदीय क्षेत्रों से आते हैं। यह अनायास नहीं है कि इसमें कोई भी महानगरीय नाम दिखाई नहीं देता। और वह दिखाई भी क्यों दे ? जिस शख्स ने आलोचना की पूरी लड़ाई इन्ही कृत्रिम रचनाओं और कृत्रिम सत्ता केन्द्रों के खिलाफ लड़ी है, उसके लिये और दूसरी आशा भी क्या की जा सकती है। क्या वे लोग इसके बदले में जीवन सिंह को वह स्थान दे सकते हैं, जिसके वह हकदार है…? कहना न होगा कि ये कृत्रिम सत्ता केन्‍द्र उनकी उपेक्षा करके भविष्य के आलोचकों के लिये भी सबक छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं |

जीवन सिंह ने कबीर, सूर, तुलसी और मीरा से होते हुए निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल और मुक्तिबोध को जिस महत्वपूर्ण तरीके से अपनी आलोचना में केन्द्रीय स्थान दिया है,  साथ ही साथ हमारे दौर के महत्वपूर्ण कवियों- विजेंद्र, कुमारेन्द्र पारस नाथ सिंह, ज्ञानेंद्रपति, मदन कश्यप, आलोक धन्वा, अरुण कमल, राजेश जोशी, ऋतुराज, कुमार विकल और वेणुगोपाल- को भी उचित स्थान देते हुए अपनी लेखनी चलायी है, इस तथ्य को इस अंक में महत्वपूर्ण माना गया है | इस अंक की मुक्तकंठ से प्रशंसा की जानी चाहिये और यह उम्मीद भी कि आने वाले दिनों में ऐसे महत्वपूर्ण रचनाकारों का उचित मूल्याँकन होता रहेगा, जो तथाकथित केन्द्रों से दूर बैठकर हमारे समय और साहित्य में बेहद महत्वपूर्ण योगदान कर रहे है…।

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