Archive for: April 2012

समाज में व्याप्त संस्कारों को बदलना जरूरी : मैत्रेयी पुष्पा

नई दि‍ल्‍ली : ‘अंजना: एक विचार मंच’ की ओर से ‘सरोकारों के आईने में स्त्री’ वि‍षय पर एक सभा दिल्ली के हिन्‍दी भवन (व्यास कक्ष) में 21 अप्रैल, 2012 को आयोजित की गई। इसमें सुविख्यात साहित्यकार रमणिका गुप्ता ने अध्यक्षता की व जानी-मानी साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा मुख्य अतिथि थीं। कार्यक्रम में डॉ. कमल  कुमार व पत्रकार गीताश्री का विशेष सानिध्य रहा।

सभा में विषय प्रवर्तन करते हुए ‘अंजना: एक विचार मंच’ के अध्यक्ष प्रेमचंद सहजवाला ने कहा कि यह सुखद बात है कि पिछले दो दशकों में भारत की शहरी व शिक्षित नारी ने तेज़ी से प्रगति की है तथा राष्ट्रपति या मुख्यमंत्री आदि जैसे  अतिविशिष्ट पदों के अतिरिक्त समाज के हर क्षेत्र यथा न्यायपालिका, चिकित्सा, शिक्षा आदि में स्त्री की महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। स्त्री आज न अनुचरी है न ही केवल सहचरी मात्र, वरन वह अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व में उजागर होने के पथ पर अग्रसर है। परन्‍तु आज भी मध्यवर्गीय नारी गृहस्थी के पिंजरे में फँसे रहने को ही अपना मोक्ष मानती है।

सुप्रसिद्ध पत्रकार गीताश्री ने कहा कि वह अपने जीवन में जब ज़रूरत पड़ी विद्रोह करती आई हैं तथा वह यह मानती हैं कि स्त्री को यदि अपनी गुलामी का अहसास भर है तो वह मुक्त हो सकती है। यानी प्रश्‍न चेतना का है। डॉ. कमल कुमार ने समाज की सोच में समुचित बदलाव की बात कही तथा मैत्रेयी पुष्पा ने भी समाज में दृढ़ता से व्याप्त संस्कारों को बदलने पर ज़ोर दिया।

कार्यक्रम अध्यक्ष रमणिका गुप्ता ने कहा कि आज भी स्थि‍ति यह है कि‍ कहीं-कहीं एक पढ़ी-लिखी डॉक्टरेट महिला गलती होने पर अपने पति के पाँव पड़ कर माफी माँगती है। जब अंत में प्रश्‍नोत्तर के दौर में प्रेमचंद सहजवाला ने प्रश्‍न उठाया कि लड़कियों के भडकीले व कामोत्तेजक पहनावे के बारे में रमणिका जी का क्या कहना है तो उन्होंने दो टूक जवाब दिया कि यह सारा पुरुषवादी सोच का कुसूर है। ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जहाँ नारी बहुत कम कपड़े पहनती है, परन्‍तु वहाँ के पुरुष इसे स्वाभाविक मान कर चलते हैं।

इस कार्यक्रम में रमणिका गुप्ता को ‘अंजना: एक विचार मंच’ की ओर से उनके अगले दिन (22 अप्रैल) आने वाले जन्मदिवस पर उर्मिल सत्यभूषण के कर कमलों से एक उपहार भी भेंट किया गया। कार्यक्रम का संचालन कवि जगदीश रावतानी ने किया तथा अनिल मीत ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।

पागलपन: माधवी कुटटी

अंग्रेजी की प्रख्यारत लेखिका कमला दास ( 31 मार्च, 1934- 31 मई, 2009)  मलयालम में माधवी कुटटी के नाम से लिखती थीं। उन्हेंल आत्म कथा ‘माई स्टोरी’ से काफी शोहरत मिली। केरल के त्रिचूर जिले में जन्मीं कमला दास की अंग्रेजी में ‘द सिरेंस’, ‘समर इन कलकत्ता’, ‘दि डिसेंडेंट्स’, ‘दि ओल्डी हाउस एंड अदर पोएम्स ’, ‘अल्फाेबेट्स ऑफ लस्ट’’, ‘दि अन्ना‘मलाई पोएम्सल’ और ‘पद्मावती द हारलॉट एंड अदर स्टोरीज’  आदि बारह पुस्तजकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मलयालम में ‘पक्षीयिदू मानम’, ‘नरिचीरुकल पारक्कुम्बोल’, ‘पलायन’, ‘नेपायसम’, ‘चंदना मरंगलम’ और ‘थानुप्पू’  समेत पंद्रह पुस्ताकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्ष 1984 में कमला दास नोबेल पुरस्कामर के लिए नामांकित हुईं। इसके अलावा उन्हेंि एशियन पोएट्री पुरस्कारर(1998), केन्ट पुरस्काार (1999), एशियन वर्ल्डस पुरस्कारर (2000), साहित्यत अकादेमी (2003), वयलॉर पुरस्काोर (2001), केरल साहित्य9 अकादेमी पुरस्कालर (2005) आदि से सम्मादनित किया गया।
उनकी इस कहानी का अनुवाद युवा कवि‍ और अनुवादक संतोष अलेक्से ने कि‍या है-

कई लोगों से सुनने के बाद ही मैं यकीन कर सकी कि अरुणा पागल हो गयी है। दिल्ली से आने के दूसरे ही दिन मैं उसके घर गयी। अरुणा की सुन्‍दर नेपाली नौकरानी ने दरवाजा खोला। वह हँसी और उसके दाँतों में पान चबाने के कारण लगे दाग दिखाई दिये।

‘‘तुम्हारी मालकिन कहाँ है ?’’ मैंने पूछा।

‘‘मालकिन बीमार है।’’ उसने कहा, ‘‘पाँच महीने हो गये।’’ उसके बताये हुये कमरे में मैंने देखा कि अरुणा ने लाल साड़ी पहनी हुई थी और चारपाई पर बैठकर छत की ओर देख रही थी।

‘‘अरुणा तुझे क्या हुआ।’’ मैंने पूछा, ‘‘तू इतनी दुबली कैसे हो गयी है।’’

वह आकर मरे गले लग गयी। उसके बालों में पसीने की गंध थी। अरुणा मेरे गले में हाथ डालकर मुझे देखती रही।

‘‘तू  इतने दिनों से मुझे मिलने क्यों नही आई ?’’ उसने पूछा, ‘‘क्या तू मुझे नापसंद करने लगी?’’

‘‘बता, तुझे कौन नापसंद करने लगा ? ’’

‘‘वो… मेरे पति।’’

‘‘मुझे विश्‍वास नहीं होता। तुझे गलतफहमी हो गयी है। तुझसे नफरत करने का कोई कारण ही नहीं है।’’

अरुणा बिस्तर पर लेट गई। ‘‘वह सब तू विश्‍वास नहीं करेगी विमला।’’ उसने कहा, ‘‘आजकल मेरी बातों का कोई विश्‍वास नहीं करता। वे कहते हैं कि मैं पागल हूँ। मैं बच्चों को सताती हूँ। चाकू से मैं लोगों को डराती हूँ। तूने यह सुना होगा।’’

‘‘ये सब बातें कौन फैलाता है।’’ मैंने पूछा।

‘‘मेरे पति और… बाकी सब। अब बच्ची भी मेरे पास नहीं आती। मेरी सास उसको ले गयी। पिछले महीने जब मैंने रोकर, हल्ला मचाया तब वे बच्ची को लेकर आये। लेकिन बच्ची ने दरवाजे पर खड़े होकर कहा,  ‘माँ,  तू पागल है’।’’

‘‘यह सब कब शुरू हुआ ?’’ मैंने पूछा।

‘‘मुझे याद नहीं है।’’ अरुणा ने कहा,  ‘‘मुझे समय का कोई ज्ञान नहीं है। वे कहते हैं कि मैंने पति की हत्या करने की कोशिश की, चाकू लेकर उनका पीछा किया। विमला! तू ही बता, क्या मैं यह सब कर सकती हूँ?’’

मैंने केवल सिर हिलाया।

‘‘पड़ोसी मुझसे डरते हैं। उन्होंने मेरी नौकरानी से पूछा कि मेरा पति मुझे पागलाखाने क्यों नहीं ले जाते ?’’

‘‘किसने कहा?’’ मैंने पूछा।

‘‘वही फूलमती। तू उसे जानती नहीं है न। अब वह इस घर की रानी है। अब मेरे पति के साथ बिस्तर भी बाँटने लगी है।’’

‘‘नहीं, अरुणा,  यह सब गलत है। तुझे गलतफहमी हो गयी होगी।’’ मैंने कहा।

‘‘मेरी बातों पर कोई विश्‍वास नहीं करता।’’ वह बुदबुदायी।

‘‘तू यहाँ से चली क्यों नहीं जाती?” मैंने पूछा, ‘‘अगर बात सही है तो अपमानित होकर यहाँ क्यों रहती है ?  तू अपने पिताजी के पास जा सकती है न ?’’

‘‘यह नहीं हो सकता।’’ अरुणा ने कहा, ‘‘बीच-बीच में रात को बत्ती जलाकर देखती हूँ तो पति को सोया पाती हूँ। दोनों हाथों के नीचे सिर रखकर बच्चों के समान सोते हैं। विमला,  मेरे पति कितने सुन्‍दर लगते हैं सोते हुये। उन्हें देखकर सारे दु:ख भूल जाती हूँ। नहीं,  मैं उनको छोड़कर कभी नहीं जाऊँगी। विमला तू समझ रही है न !’’

साहित्य चिंता की अपेक्षा जीवन चिंता को प्राथमिकता देने वाले आलोचक : महेश चंद्र पुनेठा

आलोचक जीवन सिंह।

‘आकंठ’ के वरि‍ष्‍ठ आलोचक जीवन सिंह पर केन्‍द्रि‍त अंक(सितम्बर, 2011) का सम्‍पादन कवि महेश चंद्र पुनेठा ने कि‍या है। इस अंक का सम्‍पादकीय-

यदि हम पूरी हि‍न्‍दी आलोचना-परम्परा का अवगाहन करें तो हमें दो  मुख्य धाराएँ दिखाई देती हैं- पहली जो साहित्यशास्त्रीय सिद्धांतों के आधार पर साहित्य की विवेचना-विश्‍लेषण करती है और दूसरी वह जो जीवन के गहरे अनुभवों से प्राप्त चेतना के आलोक में साहित्य को देखती है तथा उसका केवल विवेचन-विश्‍लेषण ही नहीं करती, बल्कि उसे दिशा भी प्रदान करती है। पहली धारा साहित्य चिंता को प्राथमिकता देती है और दूसरी जीवन चिंता को। साहित्य चिंता से प्रेरित धारा रूप पक्ष को महत्व देती है और उसकी प्रेरणा पूरी तरह रचना में निहित रहती है, जबकि जीवन चिंता से अभिप्रेत धारा वस्तु और रूप दोनों को लेते हुए वस्तु पक्ष को अधिक महत्व देती है और जीवन-प्रश्नों की उपेक्षा नहीं करती है। उसके लिए साहित्य विशुद्ध कला नहीं है जहाँ वर्ण-चमत्कार और वर्णन-चमत्कार का बाहुल्य हो, बल्कि जहाँ जीवन की कठोर और कोमल धड़कनें दर्ज हों तथा मुक्ति की पदचापें सुनाई देती हों। डॉक्‍टर जीवन सिंह आलोचना की दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके यहाँ किसी तरह की व्यूह रचना और उठाने-गिराने का खेल नहीं दिखाई देता है। उन्हें जहाँ जीवन के बड़े प्रश्‍न और मनुष्यता दिखाई देती है वह उसे अपने विवेचन का विषय बनाते हैं। वह हमेशा साहित्य को अपने समय और समाज की संबद्धता में देखते हैं। उनके लिए जीवन-व्यवहार और जीवन-संदर्भों के सवाल कितने महत्वपूर्ण और अनिवार्य हैं, उनके पूरे लेखन में देखा जा सकता है। ये सवाल उनके लेखन में अंतःसूत्र के तरह निहित हैं। उनका लेखन जीवन प्रश्नों से कहीं भी किनारा नहीं करता। वह अपने आलोचना कर्म में हमेशा इस बात की तलाश करते हैं कि क्या रचनाकार अपनी रचनाओं में जीवन-तथ्यों के मूल तक उतर पाया है, उसने अपने समय की पेचीदगियों को पहचाना है, जन अर्थात सर्वहारा वर्ग के जीवन और मूल्यों की सही विवेचना की है तथा वह जीवन को पूरी गहराई और संश्‍लि‍ष्‍टता के साथ व्यक्त कर पाया है। किसी भी कृति का मूल्याँकन करते हुए वह देखते हैं कि प्रस्तुत रचना में-जीवन के किस रूप को प्रधानता दी गई है, किस वर्ग का जीवन उसमें प्रतिबिंबित हुआ है, क्या उसमें शोषक वर्गों के विरूद्ध श्रमिक जनता के हित मुखरित हुये हैं या नहीं, रचनाकार की अपने समय के जीवन से कितनी गहरी एवं व्यापक संपृक्ति है, उनका लेखन जीवन की क्रियाशीलता, जीवन-सौंदय, जीवन-बोध, जीवन की संश्लिष्टता, जीवन की विविधता तथा जीवन की भाषा की तलाश का पर्याय है।

डॉक्‍टर जीवन सिंह, कवि की निजी ईमानदारी और निजी अनुभूति के स्थान पर उसकी समय और समाज के प्रति ईमानदारी को अधिक महत्व देते हैं। उनकी मान्यता है,  इसके लिए जरूरी है कि वह अपनी निजी सीमाओं से बाहर निकलकर जीवन-संग्राम में शामिल रहे । पर यह विडम्‍बना है कि हिन्‍दी के कुछ आलोचक एवं विमर्शकार रचनाकार के लिये जीवन संग्राम में उतरना कोई अनिवार्य नहीं मानते। इसी का परिणाम आज हम देखते हैं कि अधिकांश रचनाकार अपने आप को केवल लिखने तक सीमित किये हुये हैं। समय और समाज के प्रति अपने दायित्व को वे केवल वैचारिक अभिव्यक्ति तक सीमित मानते हैं। यह गलत प्रतिमानों को मान्यता देने का परिणाम है। उस ईमानदारी का क्या मूल्य जो समाज को कहीं ले नहीं जाती है। अपनी निराशा, कुंठा, उदासी को ईमानदारी से व्यक्त करने मात्र का समाज की दृष्टि से कोई महत्व नहीं। कुछ आलोचकों ने अनुभूति की प्रमाणिकता और ईमानदारी के नाम पर कविता को कवि के निजी मामले तक सीमित कर दिया। फलस्वरूप अनेक बार अवैज्ञानिक स्थापनाओं को भी महत्व मिला। इसलिये जीवन सिंह बिल्कुल सही स्थापना देते हैं कि ‘ईमानदारी और प्रमाणिक अनुभूति’ के बजाय ‘अनुभूति की व्यापकता और समकालीन सामाजिक यथार्थ’ से कविता को परखा जाना चाहिये। जनता को हिकारत की नजर से देखने वाली ईमानदारी प्रकारांतर से जनता की ताकत को नकारना तथा परिवर्तनकारी ताकतों के प्रयासों को झूठा सिद्ध करना ही है।

जीवन-चिंता के आलोचक होने के कारण उनके सौंदर्य की कसौटी में हमेशा उन लोगों का जीवन है जो श्रम से जुड़े हैं, क्योंकि उनके लिये जो कुछ सौंदर्यपूर्ण है वह मनुष्य के श्रम की देन है। प्रकृति के सौंदर्य के समानान्तर इस पृथ्वी पर मनुष्य ने जो कुछ सौंदर्यपूर्ण सर्जन किया है उसमें मनुष्य के श्रम की मुख्य भूमिका है। जीवन और दुनिया से प्रेम करने वाला व्यक्ति ही सामान्य जन और उसके जीवन के प्रति इस तरह के भाव रख सकता है। उनकी मानवीय श्रम पर गहरी आस्था है। वह मानते हैं कि मानवीय श्रम के बिना कुछ सम्‍भव नहीं है। लेकिन यह हमारी संकीर्णता और स्वार्थबद्धता है कि श्रम को हमेशा दरकिनार करते हैं और आधुनिक ज्ञान प्रक्रिया को इतना बढ़कर मानते हैं कि श्रम की क्रूर उपेक्षा करने में कोई संकोच नहीं बरतते। उनका विश्‍वास है कि कभी फिर समय आएगा जब श्रम के दर्शन के अनुसार दुनिया बदलेगी और पूँजी और बाजार का वर्चस्व खत्म होगा। वह मेहनतकश को अपना सच्चा साथी कहते हैं और उसकी पक्षधरता स्वीकारते हैं। एक जनसम्‍बद्ध साहित्यकार ही ऐसा कह सकता है। यह उनकी ताकत भी है। उनका उद्देश्य अपनी आलोचना द्वारा कला और श्रम के बीच पैदा किये गये अलगाव को दूर कर सौंदर्यबोध को उसकी मानवीयता में स्थापित करना हैं जिसमें वह सफल भी रहे हैं। वह श्रम और पूँजी के संबंध की सच्चाई को खोलने का काम अपनी आलोचना में करते हैं।

वह मानते हैं कि जब एक रचनाकार के भाव का स्तर, इस जगत की सारी संकीर्णताओं, संकुचितताओं और स्वार्थबद्धताओं का अतिक्रमण कर, विशुद्ध रूप से मानवीय स्वरूप ग्रहण कर लेता है, तो समकालीन और सच्ची कविता को जन्म देता है। कवि का सामान्य जन के भावभूमि से एक रिश्ता कायम होना चाहिये। उसे सामान्य जन से संबंधित सम्‍पूर्ण परिस्थितियों के बीच से होकर गुजरना चाहिये। इस दौरान उसे केवल उसकी दुरावस्थाजन्य विषमता और वेदना को ही नहीं वरन् उसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति, वर्ग और व्यवस्था की पहचान भी जरूरी है। वह कुछ उदाहरणों के द्वारा भी अपनी इस बात को सिद्ध करने का प्रयास करते हैं- ‘बड़े रचनाकार हर युग में इस तरह की स्थितियों से गुजरे हैं। कबीर अपने जमाने में सामान्य जन और उसकी दुरावस्था के पक्ष से, उस समय के पंडे और मौलवी से बहस करने से नहीं चूकते। तुलसी भी अपने समय के सामान्य जन की पीड़ा की अनदेखी नहीं करते।’ वह बहुत सही कहते हैं कि ‘पद्मावत’ की नागमती जब अपना रानीपन भूलकर सामान्य स्त्रियों की भाँति विरह-दग्ध होती है, तभी उसका वास्तविक रूप सामने आता है। रानीपन की विशिष्टता और आभिजात्य में वह काव्य चरित्र नहीं बन पाती। मीरा भी मीरा तभी बनती है, जब वह राजमहलों की पटरानी न बनकर, सामान्य जनजीवन की भावनाओं से एकाकार कर उनमें घुलमिल जाती हैं। इस तरह वे साधारणता के सौंदर्यशास्त्र को महत्व देते हैं।

वह जीवन की सच्चाई से वे मुँह नहीं मोड़ते हैं। उनकी आलोचना में वास्तविक जीवन-सौंदर्य का अन्वेषण कर आवृत्त सत्य को उद्घाटित करने की सतत् प्रक्रिया चलती रहती है। वह लोकतांत्रिक जीवन मूल्यों और उसके सांस्कृतिक आचरण की प्रतिष्ठा अपनी आलोचना द्वारा करते हैं। यहीं पर वह पक्षधरता का सवाल भी उठाते हैं। उनका मानना है कि इसके बिना जीवन और समाज की जटिलता एवं वास्तविकता को नहीं समझा जा सकता है। उनकी दृष्टि में जीवन साहित्य के लिये नहीं बल्कि साहित्य जीवन के लिये है। वह नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार, मुक्तिबोध आदि को अज्ञेय से इसलिये बड़ा कवि मानते हैं कि उनके यहाँ साहित्य की अपेक्षा जीवन की चिन्‍ता अधिक दृष्टिगोचर होती है। उनका मानना है कि इनकी कविताओं में जीवन की धड़कन सुनाई देती है। यहाँ जीवन के चित्र विविधता एवं गहराई लिये हुये हैं। ये कवि केवल जीवन की विसंगतियों और विडम्‍बनाओं के चित्र ही नहीं उकेरते, बल्कि उनसे बाहर निकलने की राह भी बताते हैं। यदि वह अज्ञेय, रघुवीर सहाय, विजयदेव नारायण साही, श्रीकांत वर्मा, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह आदि कवियों तथा ‘कविता के नये प्रतिमान’ रचने वाले नामवर सिंह और नवलकिशोर नवल व अशोक वाजपेयी जैसे आलोचकों से सहमति नहीं रखते हैं तो उसका कारण उनकी जीवन चिंता ही है। वह इनकी रचनाओं का विश्‍लेषण कर बताते हैं कि इनके यहाँ जीवन समग्रता के साथ नहीं आता है। जीवन की सम्‍पूर्णता की इनकी रचनाओं में घोर उपेक्षा हुई है। इसका सीधा कारण है उनकी अपने समय के जीवन में पैठ न होना । इन कवि-आलोचकों द्वारा उस समृद्ध हिन्‍दी काव्य परम्परा की अनदेखी की गई है जो अपनी देशी तथा लोक जीवन से सम्‍बद्ध जीवन-यथार्थ तथा सौंदर्यानुभूति की उपज है। इनके द्वारा कविता को जीवन की विसंगति एवं विडम्‍बनाओं के चित्रण एवं आलोचना को उसके विवेचन तक सीमित कर दिया है।

‘कविता के नये प्रतिमान’ के सन्‍दर्भ में जीवन सिंह यदि यह कहते हैं तो क्या गलत कहते हैं कि दरअसल कवि मोहग्रस्त नहीं था, आलोचक मोहांध हो गया था। उसकी कसौटी में खोट आ गया था। उसने जो ‘प्रतिमान’ रचे और उसकी जो आधारभूमि तैयार की, वह अपनी भूमि के यथार्थ से कम, परायी भूमि के प्रभाव की गिरफ्त में ज्यादा थी। वह कविता की अंतर्वस्तु पर आधारित रूप विन्यास से ज्यादा रूप पर आधारित अंतर्वस्तु से मुग्ध हो गया था। उसने रूप पर आधारित प्रतिमानों को रूपवादी संरचना में कुछ इस तरह की कलाकारी से प्रस्तुत किया था कि पाठक अपनी-अपनी भावना के अनुरूप प्रभु की मूर्ति के दर्शन कर लें।’ यदि ऐसा नहीं होता तो प्रतिमानों के रचे जाते वक्त आलोचक की नजर में नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार सरीखे वे कवि अवश्य होते जिनके यहाँ न केवल जीवन की विसंगति-विडम्‍बना तथा व्यापक सामाजिक अनुभव ऐतिहासिक एवं द्वंद्वात्मक दृष्टि से व्यक्त हुये हैं बल्कि उन ऐतिहासिक कारणों की पड़ताल भी गहराई से हुई जो उन विसंगति-विडम्‍बनाओं के लिये जिम्मेदार हैं। यह दुःखद है कि कुछ कवि-आलोचक डॉक्‍टर जीवन सिंह की इस आलोचना को विध्वंसात्मक आलोचना या ‘निंदा ही निंदा’ की आलोचना मानते हैं। मैंने जहाँ तक जीवन सिंह जी के आलोचना कर्म को जाना-समझा है उसके आधार पर कह सकता हूँ कि उनकी आलोचना में ऐसे अनेक प्रकरण आते हैं जहाँ वह उक्त कवियों तथा आलोचकों की प्रशंसा  करते हैं तथा उनके साहित्यिक अवदान को स्वीकारते हैं। क्या किसी रचनाकार की सीमाओं की ओर ध्यान दिलाना उसका ध्वंस करना होता है ? क्या आलोचना का काम केवल प्रशंसा ही प्रशंसा करना मात्र है? आलोचना मीठी ही मीठी नहीं होती है। कृति की सीमाओं या कमजोरियों को बताना भी आलोचक का धर्म होता है। किसी रचनाकार की सीमाओं की ओर संकेत करने का मतलब उसे खारिज करना नहीं होता है। इससे तो रचनाकार और साहित्य दोनों का ही हित होता है और अंततः समाज का । रचना हो चाहे आलोचना उसमें यदि विसंगतियों को उभारा जाता है तो उसका उद्देश्य उन विसंगतियों को दूर करना होता है। यदि हम किसी विसंगति को नजरअंदाज करते हैं तो उसका आशय है उसे बने रहने देना है। एक अच्छी आलोचना का काम है रचना की विसंगतियों को रेखांकित करना ताकि आगे उन्हें दूर किया जा सके। इस तरह की आलोचना को विध्वंसात्मक आलोचना कहना कहीं न कहीं आलोचना को पथ विचलित कर उसको भ्रष्ट करना है।

जीवनानुभवों की व्यापकता व विस्तृत एवं विविध क्रियाधर्मीं जीवन का समर्थन जीवन सिंह जी की जीवन चिंता से ही उद्भूत है। उनका मानना है कि सौंदर्यबोध का गहरा रिश्ता लेखक का जीवनानुभवों तथा विश्‍वदृष्टि से रहता आया है। विश्‍व दृष्टि और जीवनानुभवों की व्यापकता के अभाव में लेखक का सौंदर्यबोध भी जागतिक संकीर्णताओं से नहीं उबर पाता। इसके लिए वह जीवन से निकट सम्‍पर्क जरूरी मानते हैं। अपनी पुस्तक ‘कविता और कवि कर्म’ में एक स्थान पर वह लिखते हैं- ‘कविता दरअसल कवि पहले अपने जीवन में रचता है। जो कवि अपने जीवन में कवि नहीं वह कविता में भी वैसे ही हानि-लाभ के जोड़-तोड़ बिठाता है जैसे अपने जीवन में।….जो कविता जीवन की सहजताओं के जितनी नजदीक होगी वह उतनी ही दीर्घायु और कालजयी होगी।’ मध्यवर्गीय कवियों में यह आज कम होता जा रहा है। इसी का परिणाम है उनकी कविता में सरसता एवं जीवंतता की कमी दिखाई देती हैं। ये कविताएं एकरस व एकरूप होती जाती हैं। डॉक्‍टर सिंह तुलसीख्‍ सूर, कबीर, जायसी, मीरा, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन, कुमारेंद्र, विजेंद्र, मानबहादुर सिंह, ज्ञानेंद्रपति, मदन कश्यप, एकांत श्रीवास्तव, केशव तिवारी आदि कवियों का उदाहरण देकर बताते हैं कि उनकी कविता की श्रेष्ठता का कारण कहीं न कहीं उनकी जीवन से निकटता ही है। इनकी कविताओं में वाग्वैधग्दता, क्रीड़ा-कौतुक और अर्थ-चमत्कार के लिये कोई स्थान नहीं है। ये कवि उन्हें इसलिये प्रभावित करते हैं क्योंकि इनकी कविताओं में जीवन का ताप और जीवन के संघर्ष हैं।

कविता में जीवन की तलाश करते हुए डॉक्‍टर जीवन सिंह कवि के जीवन तक पहुँच जाते हैं। कवि के जीवन को उसकी रचना से अलग नहीं रखते, क्योंकि उनका मानना है एक सार्थक और बड़े रचनाकार का संघर्ष मूल्य के स्तर पर उसके जीवन व्यवहार से प्रारम्‍भ होता है। कविता को यदि हमें बचाना है तो उसे पहले अपने जीवन में बचाने के लिये काम करना होगा। प्रलोभनों, लालचों के सामने आत्मसंघर्ष करना होगा। यदि हमारे जीवन में कविता नहीं है तो वह शब्दों में रचित कविता में कैसे बच सकेगा, हमारे जीवन का भीतरी स्वर ही बाहर की शब्द रचित कविता के स्वर को पकड़ता है । जहाँ यह स्वर नहीं है वहाँ कविता की कोई जरूरत नहीं । इस तरह वह जीवन और कविता की एैक्यता को देखते हैं। इस तरह वह उस आलोचना परम्‍परा के वाहक है जो किसी रचनाकार का मूल्याँकन करते हुये उसके जीवन को उसके कृतित्व से अलग नहीं रखती। उनका दृढ़विश्वास है कि कोई भी कलाकार उसी स्थिति में आत्म साक्षात्कार या आत्मसंभवा अभिव्यक्ति करने में सक्षम होता है जबकि उसने अपने जीवन में स्वयं उदात्त स्थिति को प्राप्त कर लिया हो। जिन रचनाकारों की आत्मसंस्कृति अपनी विकारग्रस्तता में संकुचित रहती है, वे अपनी रचनाओं में उत्कृष्ट स्थिति को नहीं पहुँच पाते।

डॉक्‍टर सिंह को अपनी परम्परा और लोक जीवन का गहरा एवं व्यापक ज्ञान है जिसके चलते ही वह किसी रचनाकार के अपनी परम्परा-क्लैसिक एवं लोक जीवन के अपरिचय को एकदम ताड़ लेते हैं। उनकी रचनाओं में उन्हें जीवन और कविता की फाँक तुरन्‍त दिखाई दे जाती है। यह उन्होंने सायास अर्जित किया है। उनकी जीवन की उबड़-खाबड़ घाटियों में गहरी पैठ एवं उसकी यथार्थ की जटिलताओं की खूब समझ है जिसके कारण वह उन कवियों को बहुत जल्दी पकड़ लेते हैं जो कविता में बनावटी जीवन का चित्रण करते हैं तथा विचारवक्रता और प्रतीकात्मकता से काम चलाना चाहते हैं।

वह एक कवि-आलोचक के लिये जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण आवश्यक मानते हैं- ‘आज की कविता में जो बड़ी कमजोरी है, वह कवि द्वारा कविता रचने के लिये किये जाने वाले निरीक्षण की कमी की वजह से है। आज के ज्यादातर कवि, कुछ प्रचलित काव्य सूत्रों, फार्मूलों और कला योजनाओं की काव्यरीति के बल पर कविता रचने में लगे हुये हैं। इससे कविता में सरसता के स्थान पर सूखे जैसा माहौल व्याप्त है। जो कविता जीवन के निरीक्षण से रची जाएगी, उसमें अपने आप सरसता का वेग आता जाएगा ।’ उनका यह कथन बिल्कुल तर्क संगत है कि किसी भी जीवन स्थिति या कला जगत में उस समय रीतिवाद की स्थिति पैदा हो जाती है जब वह जीवन-क्रियाओं के निरीक्षण से अपना नाता तोड़ लेता है। वह जीवन-अनुराग रखने वाले आलोचक हैं इसलिए जीवन-संबंधों, जीवन-रूपों तथा जीवन-क्रियाओं के इंद्रियबोधात्मक ज्ञान एवं भाव प्रसार से बिम्‍ब ग्रहण करने पर अधिक बल देते हैं। उसे कविता की सृजनात्मकता को जानने की कसौटी बनाते हैं- ‘यदि कवि अपने समय के जीवन और जीवन संबंधों, रूपों, एवं उसकी जटिलताओं को मात्र एक नये सोच के रूप में और वक्रताओं में व्यक्त करता है तथा कहीं-कहीं सतही एवं चलताऊ बिम्‍बात्मक सक्रियता भी दिखला देता है तो समझा जा सकता है कि वह कविता के चालू मुहावरे को उड़ाकर कवि बनने चला है, जीवन की समग्रता में गहरी पैठ के आधार पर नहीं।’

वह ऐसे आलोचक हैं जो जीवन को नजदीक से देखते हैं और पहचानते हैं। मुक्तिबोध के इस कथन पर कि ‘साहित्य विवेक मूलतः जीवन विवेक है’ पर उनकी गहरी आस्था है। उनका मानना है कि जिस रचनाकार का जीवन का अनुभव जितना व्यापक होता है उसका साहित्य उतना ही प्रमाणिक एवं जीवंत होता है। एक रचनाकार को अपने समय या समकाल को समझने के लिये न केवल भावना या सम्‍वेदना के स्तर पर एक व्यापक और बुनियादी क्रियाशील संसार की आंतरिकता का अनुभव करना पड़ता है वरन् उसके यथार्थ की जटिल तहों तक जाने के लिये उससे जुड़े सामाजिक, आर्थिक और दार्शनिक प्रश्नों की गुत्थी को भी सुलझाना पड़ता है। उनकी जीवन के प्रति रागात्मकता को इस कथन में भी देखा जा सकता है कि सच्ची सौंदर्य की सृष्टि लोक-जीवन के तादात्म्य से ही होती है। लोक जीवन की अनुभूति जितनी व्यापक एवं गहरी होगी कविता का सौंदर्य उतना ही अधिक निखरता है। वह इस बात को चिह्नित करते हैं कि तुलसी, कबीर, सूर, जायसी, मीरा आदि के काव्य में जो सौंदर्य की सृष्टि हुई है उसका कारण इन कवियो की लोकभूमि से सम्‍बद्धता है। जब-जब कविता ने इसे छोड़ा है तब-तब न केवल संकुचित हुई बल्कि कला के ऊँचे आसन से भी गिर गई। उनकी आलोचना इस तरह कविता में सौंदर्य की लोक सृष्टि करती है। आखिर ऐसा कौन करेगा! वही ना जो लोक से सम्‍बद्ध हो। जिसका मन लोक में रचा-बसा और रमा हो। जिसे लोक से सच्ची प्रीत हो। मानवीय मूल्यों और श्रम के प्रति जिसकी गहरी आस्था हो। ठालप जीवन जीने वाले किताबी आलोचक ऐसा नहीं कर सकते हैं। वह मानते हैं कि शास्त्र की उत्पत्ति लोक से हुई। लोक के विवेचन से जिन नियमों-उपनियमों का निर्माण हुआ उसे शास्त्र कहा गया। शास्त्र में रूढ़ि है तो लोक में खुलापन होता है। जीवन की तरह कला एवं साहित्य रूपों को भी शास्त्रीयता की जकड़बंदी से मुक्ति आवश्यक होती है। शास्त्र और लोक दोनों का उन्हें गहरा ज्ञान है पर हमेशा शास्त्र के ऊपर लोक को ही रखते हैं। उन्होंने लोकभूमि के सूत्र को काव्य और काव्य चिंतन की अपनी परम्परा के भीतर से पकड़ा है। पर वह लोक जीवन में व्याप्त रूढ़ियों और अंतर्विरोधों की अनदेखी नहीं करते। यह उनकी जीवन चिंता का ही प्रमाण है कि वह मानते हैं कि मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा अंतर्विरोध मनुष्य के रूप में अमनुष्य होते जाना है। मानवीय मूल्यों में ह्रास उन्हें कचोटता है। वह अपने लेखन में हमेशा उसे बचाने की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि मनुष्यता की सृष्टि और फैलाव जितना ज्ञानसत्ता से होता है उतना ही मनुष्य की भावसत्ता से । इन दोनों के बीच संतुलन और द्वंद्वात्मक रिश्ता होना जरूरी होता है। मनुष्य की भावसत्ता को स्थापित करने के लिए लोक के मूल को पकड़े रहना पड़ता है। उनके लिये लोक वह क्रियाशील सामूहिक जीवन है जो अपने श्रम प्रक्रिया में आज भी मानवीय भावसत्ता को बचाए हुये है । उसकी सहजता को बचाये है। जीवन सिंह लोक से बोध एवं भाव दोनों स्तरों पर जुडे़ हैं । उनके लिये लोक सजावट की चीज नहीं है। वह लोक जीवन और प्रकृति को रचना के लिये महत्वपूर्ण मानते हैं।

जीवन-चिंता के चलते जीवन सिंह ने कभी-भी अपने लेखन को पद-प्रतिष्ठा प्राप्ति की सीढ़ी नहीं बनाया। कभी इस बात की परवाह नहीं की कि उनके लेखन से कौन प्रसन्न और कौन नाराज होगा ? पूरी ईमानदारी के साथ आलोचना कर्म में संलग्न रहे हैं। साहित्य और समाज के प्रति उनकी गम्भीरता एवं प्रतिबद्धता कम नहीं हुई। उनके डायरी के पन्नों तथा पत्रों से भी हमें पता चलता है कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं, उनकी चिंताओं के मूल विषय कौन से हैं। उन्होंने हमेशा उन बातों को कहा जो उन्हें मनुष्यता के पक्ष में लगीं। उन्होंने साहित्य के अभिजात्य केन्‍द्रों की कभी परवाह नहीं की। इसी का परिणाम उन्हें उपेक्षा के रूप में झेलना पड़ा। पर उन्हें इस बात का भी कोई मलाल नहीं है क्योंकि ऐसा नहीं कि इसके बारे में उन्हें पहले से पता नहीं था। वह तो इसे अपने संघर्ष का एक हिस्सा मानते आये हैं। जहाँ पूरा लोक ही हाशिए में है वहाँ उसके रचनाकारों का हाशिए में होना कोई आश्‍चर्य की बात नहीं। इन खतरों को उन्होंने जानबूझ कर उठाया है। यदि ऐसा नहीं होता तो वह लोक की लड़ाई को इतने आगे तक भी नहीं ले जा पाते। इतनी बेवाकी एवं साफगोई से अपनी बात नहीं कह पाते।

जीवन चिंता को प्राथमिकता देने का मतलब यह नहीं है कि वह कला पक्ष की उपेक्षा करते हों । उनके लिए रचना का न वस्तु पक्ष उपेक्षणीय है न कलापक्ष, न ही जीवन मूल्य उपेक्षणीय हैं और न कला मूल्य। वह इन सब का संतुलन बनाकर ही आगे बढ़ते हैं। जीवन की गहरी एवं व्यापक समझ वाला व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है, क्योंकि जीवन की सम्‍पूर्णता इन सब से मिलकर ही है। वह कवि की कला में ही उसकी स्वायत्तता देखते हैं। उनकी स्थापना है कि एक अच्छी रचना रूप और वस्तु के द्वंद्व से ही पैदा होती है। कविता और आलोचना के क्षेत्र में आये वाक्छल जिसने साहित्य को आम आदमी के यथार्थ से अलग कर समाज में विभ्रम की स्थिति पैदा की, को उद्घाटित करने से वह कहीं और कभी नहीं चूकते हैं।

वह सामाजिक क्रियाओं की जटिलता में जीवन यथार्थ की पड़ताल करते हैं, इसलिए शब्द-शिल्प के जाल में नहीं फँसते बल्कि बुनियादी, उत्पादक, क्रियाशील एवं वास्तविक समाज, मानवीय और अमानवीय ताकतों के यथार्थ को उद्घाटित करते हैं। इस तरह समकालीन यथार्थ को समग्रता में उजागर करते हैं। यही कारण रहा है कि उनके आलोचना कर्म केन्‍द्र में हमेशा जीवनधर्मी यथार्थवादी कविता-परम्परा रही है। अधूरी एवं खंडित अभिप्राय वाली कविता को कटघरे में खड़ा करते रहे जिसके चलते हुये उन्हें जड़ीभूत सौंदर्याभिरूचि वाले कलावादी आलोचकों का कोपभाजन बनना पड़ा है।

यह उनकी जीवन के प्रति प्रतिबद्धता ही है कि कविता को परखने के औजार भी जीवन से ही लेते हैं । लोकधर्मी प्रतिमानों को लेकर उनकी मान्यता है कि वे श्रम की संस्कृति और सौंदर्यभावना से उत्प्रेरित हैं। लोक की साधारणता, सहजता, सक्रियता और उन्मुक्तता ही वह कसौटी हो सकती है जो किसी भी समय की कविता को परखने का काम कर सकती है क्योंकि साधारणता, सच्‍चाई, सक्रियता, सहजता आदि का नाम ही तो लोकजीवन है जहाँ किसी तरह का कोई आडम्‍बर व पाखंड नहीं।  पर वह इस बात से भी वाकिफ हैं कि संबंधों की निरंतर आती और बढ़ती जा रही जटिलता को इतने मात्र से परख-जाँच पाना सम्‍भव नहीं है। उसके लिए अर्थ, समाज, राजनीति आदि की अपर सम्‍बद्धता से मानव निर्मित मानव-मन और व्यवहार की भीतर तक जाँच जरूरी है।

एक आलोचक का जीवनानुभव एक रचनाकार के जीवनानुभवों से अधिक होने चाहिये तब ही वह रचना का सही-सही मूल्याँकन कर सकता है। जो आलोचक केवल रचना के द्वारा ही जीवन को जानता है स्वयं उस जीवन से अपरिचित है तो वह रचना के साथ न्याय नहीं कर सकता है। आलोचना को रचना से अधिक गहरे स्तर पर समाज से जुड़ा होना चाहिये। तभी वह समाज से रचना के जुड़ाव का सही मूल्याँकन कर सकती है। इधर के आलोचकों में इस बात की कमी दिखाई देती है। जीवन से जुड़ाव की कमी के चलते ही आज की आलोचना लोकधर्मी और जनपदीय चेतना के साहित्य की उपेक्षा करती है। आलोचना मध्यवर्गीय जीवन के आसपास ही घूमती रह गई है। लेकिन जीवन सिंह की आलोचना जनपदीय जीवन और प्रकृति के प्रति रागात्मकता पैदा करती है। इसका कारण यह है कि वह अपनी आलोचना के केन्‍द्र में उन कवियों और कविताओं को रखते आये हैं जो लोकधर्मी और जनपदीयता बोध से लैस हैं। उनकी कविता में मनुष्य, समाज, प्रकृति और जीवन के प्रति राग-विराग गहराई से व्यक्त हुआ है। उन्हें जनपदीयता जीवन में भी और साहित्य में भी अपनी ओर आकर्षित करती है क्योंकि भले वहाँ जीवन के बड़े प्रश्‍न चाहे न निकलकर आयें हों किंतु कुछ बुनियादी व आधारभूत प्रश्‍नों को यहाँ कई तरह और कई कोणों से लाया गया है। उनकी दृष्टि में जनपद की महक सनी और लोकरंग में रंगी कविता का महत्व इस तथ्य में है कि वह ‘व्यक्ति के मनोवेगों पर असर डालती है।’

उनका मानना है कि पूँजी द्वारा निर्मित नए माहौल में आदमी पत्थर जैसा जड़ और संवेदना शून्य बनने की स्थिति में आ गया है। आदमी इससे कैसे बचे ? इसका उत्तर महानगरीय सभ्यता और पूँजीवादी दर्शनों के पास नहीं है। वहाँ जीवन की जटिलताएं और मनोगत उलझनें तो बहुत हैं लेकिन इस प्रश्‍न का उत्तर नहीं है। उन्हें इसकी गुंजाइश जनपदीय जीवन में दिखाई देती है, क्योंकि जनपद की खासियत होती है जन की प्रकृति से सम्‍बद्धता । यह सम्‍बद्धता जहाँ उसे एक ओर जीवट का धनी और संघर्षशील बनाती है वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक एवं सम्‍वेदनशील बनाती है। प्रकृति उसे मानवीय स्वभाव के समीप बने रहने की ठोस स्थितियाँ प्रदान करती है। प्रकृति के अपूर्व सौंदर्य के बीच मानवीय सौंदर्य का भी बराबर अहसास बना रहता है। भरपूर क्रियाशील जीवन से जीवंत संबंध बना रहता है। प्रकृति की कठिन परिस्थितियाँ एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के महत्व का अहसास भी कराती हैं। सामूहिकता के महत्व को बताती हैं। जबकि पूँजी निर्मित महानगरीय सभ्यता सबसे पहले आदमी का प्रकृति से और उसके बाद मानवीय प्रकृति से अलगाव करती जाती है। डॉक्‍टर जीवन सिंह प्रकृति के इस महत्व को स्वीकार करते हैं और रचना में प्रकृति को अधिक से अधिक स्थान देने के पक्षधर हैं। उनके लिए जीवन का प्रसार केवल मनुष्य तक नहीं है उसके चारों ओर की प्रकृति भी इसमें शामिल रहती है जो जीवन को गतिशील बनाती है।

जीवन सिंह की आलोचना के महत्व को कम करने की नीयत से  अक्सर व्यंग्यात्मक रूप से कहा जाता है कि वह कवि विजेंद्र के आलोचक हैं । पहले तो उनके बारे में यह कहना उनका सीमित मूल्याँकन है क्योंकि जिसने उनकी आलोचना को समग्र रूप से पढ़ा है वह जानते हैं कि उन्होंने कबीर, सूर, तुलसी, मीरा, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार, कुमारेंद्र, मानबहादुर सिंह, ज्ञानेंद्रपति सहित उन तमाम वरिष्ठ-कनिष्ठ कवियों की कविता पर भी लिखा है जिनकी कविता जीवन व लोकधर्मी प्रतिमानों में खरी उतरती है। उन्होंने जितना कवि विजेंद्र की कविता पर लिखा है उससे कम मुक्तिबोध, नगार्जुन, त्रिलोचन, केदार पर नहीं लिखा है। इसलिये उनको एक कवि विशेष का आलोचक बताना कहीं न कहीं उनका गलत एवं अधूरा मूल्याँकन है। यह सौतिया डाह का परिचायक है। फिर भी यदि किसी को लगता है कि उन्होंने कवि विजेंद्र को कुछ अधिक महत्व दिया तो इसमें भी असंगत क्या है? विजेंद्र हमारे समय के एक समर्थ कवि हैं जिनकी कविताओं में जीवन की गहराई एवं व्यापकता के दर्शन होते हैं। कविता हो या गद्य उसमें लोक की पक्षधरता और लोक-जीवन की धड़कनें साफ-साफ सुनाई देती हैं। विचारबोध, इंद्रियबोध और भावबोध का एक सही संतुलन उनकी कविताओं में दिखाई देता है। अपनी आलोचना में जीवन सिंह कविवर विजेंद्र को जो महत्व देते हैं, वह व्यक्तिगत कारणों से नहीं बल्कि अपने जन, जनपद और उसकी प्रकृति के प्रति उनकी गहरी निष्ठा के चलते ही है। डॉक्‍टर रामविलास शर्मा ने कवि निराला पर सबसे अधिक लिखा है पर उन्हें ‘निराला का आलोचक’ क्यों नहीं कहा जाता है?

अंत में, यही कहा जा सकता है कि जो आलोचक अपने समय और समाज की जटिलताओं को जितनी गहराई एवं व्यापकता से समझाता है वह उतनी ही अच्छी तरह रचना की जटिलता को खोल पाता है तथा उसका उतना सही विश्‍लेषण कर पाता है। जीवन सिंह यह काम बखूबी कर पाते हैं क्योंकि उन्हें अपने समय, समाज एवं जीवन की गहरी एवं व्यापक समझ है। वह चीजों को केवल ऊपरी तौर पर नहीं देख़ते हैं बल्कि उसके भीतर तक पैठ उसे खंगालते हैं तथा ऐतिहासिक-भौतिकवाद और द्वंद्वात्मकता की कसौटी पर कसते हैं, एकांगी रूप में कोई निर्णय नहीं लेते है। उन्हें अपने इतिहास, परम्परा एवं संस्कृति की भी गहरी समझ है। इस सबको देखने की उनके पास लोक दृष्टि है। वह हमेशा लोक के पक्ष में खड़े होकर देखते हैं। वह लोक की क्रियाशीलता और सामूहिकता के मूल्य को कभी दृष्टि से ओझल नहीं होने देते। साथ ही व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता का भी सम्मान करते हैं। उनका लोक पक्ष में खड़ा होना प्रकारातंर से जीवन के पक्ष में खड़ा होना है। उनकी मान्यताओं-स्थापनाओं-निष्कर्षों से असहमति हो सकती है पर उनकी जीवन के प्रति निष्ठा और जन के प्रति प्रतिबद्धता असंदिग्ध है। इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि इस अंक के लिए सामग्री जुटाने के दौरान मैंने जिन भी साहित्यिकों से उन पर लिखने का अनुरोध किया] उस पर जो उत्साह और आत्मीयता का इजहार उनकी ओर से देखने को मिला वह अद्भुत था। वह केवल एक ईमानदार, प्रतिबद्ध व निष्ठावान व्यक्ति के प्रति ही सम्‍भव था।

युवा शोध समवाय का पहला शोध पत्र पाठ 27 को

नई दि‍ल्‍ली : युवा शोध समवाय की ओर से पहला शोध पत्र पाठ 27 अप्रैल, 2012 को कमरा नंबर 15, कला संकाय, दि‍ल्‍ली वि‍श्‍ववि‍द्यालय में दोपहर 2.00 बजे से आयोजि‍त कि‍या जा रहा है। वि‍षय है-  दि‍ल्‍ली की दीवार, समकालीन सिनेमाई उदाहरणों के माध्यम से आभासी  दायरों की तलाश। इसके प्रस्‍तोता हिंदी विभाग,दिल्ली विश्‍वविद्यालय के शोधार्थी मि‍हि‍र मंड्या है। इस वि‍षय पर सी.एस.डी.एस. के एसोसि‍एट फेलो रवि‍कांत चर्चा और अध्यक्षता  देशबंधु कॉलेज, दिल्ली विश्‍वविद्यालय के प्राध्‍यापक  डॉ. संजीव करेंगे।

लेखक को समझा जाना सबसे ज़रूरी है : रमेशचंद्र शाह

लेखक-चिन्तक रमेशचंद्र शाह।

नई दि‍ल्‍ली : लेखक के लिये सबसे बड़ा पुरस्कार उसके लिखे को पाठकों द्वारा समझे जाने में होता है। यह विचार प्रसिद्ध लेखक-चिन्‍तक रमेशचंद्र शाह ने साहित्य अकादेमी द्वारा 17 अप्रैल, 2012 को आयोजित कार्यक्रम ‘लेखक से भेंट’  में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि भारतीय लोग इतिहास का मिथकीय स्वरूप पसन्‍द करते हैं,  जिसके चलते हमारी ‘इनोसेंस’ तो बचती है लेकिन इतिहास कमज़ोर हो जाता है।

अल्मोड़ा में बिताये अपने बचपन के दिनों को उन्होंने ‘गोबर गणेश’ उपन्यास के पहले अध्याय ‘घर की घड़ी’ को पढ़ कर साझा किया। अपने पिता की दुकान और उसमें आई रद्दी में आये साहित्य को पढ़कर ही उनकी लिखने-समझने-जानने की इच्छा जागृत हुई। इसी क्रम में उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मकथा लिखना बहुत कठिन है, क्योंकि सत्य को अकेले चलने-फिरने में दिक्कत होती है। उसे कल्पना के ढीले-ढाले पहनावे के साथ ही ठीक से चलाया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि मेरी भाषा के पहले संस्कार बालमुंकुद गुप्त के निबंधों से प्राप्त हुये। हँसोड़ शैली में गहन इतिहास बोध के साथ लिखी यह शैली मुझे अब तक प्रिय है। अपनी रचनाओं पर बात करते हुए कहा कि ‘गोबर गणेश’ जो कि मेरा पहला उपन्यास है, मुझे सबसे प्रिय है। ‘क़िस्सा गु़लाम’ उपन्यास के बारे में उन्होंने कहा कि पहले यह मैंने अंग्रेज़ी में लिखा था और अज्ञेय के कहने पर कई साल बाद इसको दुबारा हिन्‍दी में लिखा। इस उपन्यास ने मुझे सबसे ज़्यादा संतोष दिया। उन्होंने आपातकाल में लिखी अपनी कविता ‘हरिश्‍चन्‍द्र आओ’ सहित कई अन्य कविताएँ सुनाईं। अपने उपन्यास ‘गोबर गणेश’ के आरम्‍भि‍क अंश और निबंध ‘वह और मैं’ का भी पाठ किया।

कार्यक्रम के अंत में पाठकों के सवालों का उत्तर देते हुए उन्होंने बताया कि ‘गोबर गणेश’ का अगला हिस्सा उन्होंने पाठकों के अनुरोध पर ‘विनायक’ के रूप में लिखा है।

इससे पहले अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने उनका विस्तृत जीवन परिचय देते हुए कहा कि अपनी संवादी शैली से पाठकों को प्रभावित करने वाले शाह जी ने अज्ञेय और प्रसाद की तरह हर विधा में श्रेष्ठ साहित्य की रचना की है। उन्होंने पश्‍चि‍म के दर्शन की बजाये भारतीय अनुभव की ज़मीन पर अपनी दार्शनिकता को तरज़ीह दी है।

1937 में अल्मोड़ा में जन्में शाह की इंटर तक की शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। आगे की शिक्षा इलाहाबाद और आगरा में पूरी करने के बाद वह 1961 में हमीदिया महाविद्यालय, भोपाल में अंग्रेज़ी के अध्यापक नियुक्त हुये और 1997 में वहीं से अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुये। बाद में निराला सृजन पीठ के निदेशक भी रहे। इनको ‘व्यास सम्मान’ तथा ‘पदमश्री’ अंलकरण से भी सम्मानित किया गया है।

इनके 11 उपन्यास, 9 काव्य-संग्रह, 7 कहानी-संग्रह, आलोचना की 10 किताबें, 10 निबंध-संग्रह सहित डायरी, अनुवाद, बाल साहित्य, यात्रावृत्त की पुस्तकें प्रकाशित हैं।

प्रस्तुति – अजय कुमार शर्मा

जनपक्षधर फिल्मों के निर्माण की संभावनाएं और जरूरत

गोरखपुर और बनारस में आयोजि‍त फिल्मोत्सव पर लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन और मनोज सिंह की रि‍पोर्ट-

जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण

गोरखपुर/बनारस : 23 से 26 मार्च तक गोरखपुर में आयोजित 7वें फिल्मोत्सव का समापन दर्शकों के साथ प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के सन्‍दर्भ में एक अंतरंग बातचीत से हुआ। उनकी यह अपेक्षा थी कि आयोजन छुट्टी के दिन हो,  ताकि वे अपने वक्त का पूरा इस्तेमाल कर सकें। स्थानीय स्तर पर फिल्म सोसाइटियों द्वारा नियमित स्क्रीनिंग और इस अभियान के सघन प्रचार का सुझाव तो उन्होंने दिया ही, उनका जोर इस पर था कि फिल्मोत्सव में जनांदोलनों से सम्‍बन्‍धि‍त तथा समस्या प्रधान आत्मकथात्मक फिल्मों को अधिक जगह दी जाये। बुनकरों की आर्थिक बदहाली को विषय बनाने वाली अरमां अंसारी की फिल्म ‘वीपिंग लूम्स’ तथा कुंडकुलम परमाणु सयंत्र के खिलाफ हो रहे जनांदोलन पर आधारित अमुधन आर पी की फिल्म ‘कुंडकुलम’ दर्शकों को सर्वाधिक पसंद आई। 23 मार्च को इस फिल्मोत्सव का उद्घाटन करते हुए जसम के महासचिव प्रणय कृष्‍ण ने भगत सिंह को याद करते हुए यही तो कहा कि जब चंद लोगों का विकास और अरबों का विनाश हो रहा है, तब भगतसिंह की परम्‍परा जनता के रोजमर्रा के संघर्षों में विकसित हो रही है। प्रतिरोध का सिनेमा भी उन्हीं संघर्षों के साथ खड़ा है। गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल के मुख्य अतिथि फिल्म अभिनेता रघुवीर यादव ने भी समाज के संघर्षों पर फिल्में बनाने की जरूरत पर जोर दिया। उत्तराखण्‍ड के मशहूर रंगकर्मी जहूर आलम ने कहा कि कारपोरेट प्रायोजकों और सरकारी मदद के बजाये जनता के चंदे पर निर्भरता के कारण ही ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान का वैचारिक तेवर बरकरार है।

फिल्मोत्सव आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो. रामकृष्ण मणि त्रिपाठी ने कहा कि डाक्यूमेंट्री फिल्मों में भी रोचकता और कल्पनाशीलता की ऊँचाई होती है। डाक्यूमेंट्री फिल्में जनता के जीवन की सच्चाइयों और उसके संघर्षों की अभिव्यक्ति का कितना सशक्त माध्यम हो सकती हैं, गोरखपुर में प्रदर्शित युवा फिल्मकारों की फिल्में इसकी बानगी थी। डॉ. गौरव छाबड़ा की फिल्म ‘इंकलैब’ से फिल्मों के प्रदर्शन की शुरुआत हुई जो भगतसिंह और गाँधी दोनों की वैचारिक भूमिकाओं को आज के सन्‍दर्भ से देखती है और बदलाव के स्वप्न व आकांक्षा की अभिव्यक्ति के लिये एक ताकतवर माध्यम की जरूरत को भी चिह्नित करती है। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की पहली डाक्यूमेंटरी फिल्म ‘खामोशी’ भी फिल्म माध्यम के सकारात्मक उपयोग का ही उदाहरण है। पूर्वांचल की खतरनाक बीमारी इनसेफ्लाइटिस, जिसके कारण पिछले तीस साल में करीब एक लाख बच्चों की अकाल मौत हो चुकी है, की त्रासदी पर यह डाक्यूमेंटरी फिल्म आधारित है। गोरखपुर डायरी श्रृंखला के तहत बनाई गई और संजय जोशी और मनोज कुमार सिंह निर्देशित इस डाक्यूमेंटरी फिल्म को पूरे पूर्वांचल में दिखाये जाने की योजना है, ताकि इस बीमारी के इलाज के प्रति उदासीन प्रशासन और सरकारों पर जनदबाव बन सके।

इस व्यवस्था में आम आदमी के लिये न्याय पाना कितना दुष्कर है, इस कटु सच्चाई को सुमित खन्ना निर्देशित फिल्म ‘ऑल इज फॉर योर ऑनर’ ने बड़े कारगर तरीके से दर्शाया। ऑनर किलिंग की त्रासदी से गुजरे परिवारों से मुलाकात के जरिये बनाई गई नकुल सिंह स्वाने की डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘इज्जत नगर की असभ्य बेटियाँ’ तथा आजमगढ़ के नौजवानों को आतंकवादी बताने की राजनीतिक साजिश के खिलाफ फिल्मकार शकेब अहमद की फिल्म ‘दास्तान-ए-खामोशी आजमगढ़’ ने अपने वक्त के दो बड़े ज्वलंत सवालों को बड़े संवेदनशील तरीके से उठाया। विदर्भ के किसानों की आत्महत्या के कारणों पर केंद्रित नंदन सक्सेना और कविता बहल की फिल्म ‘कॉटन फॉर माई श्राउड’, शैक्षणिक संस्थाओं में दलित छात्रों के साथ किये जाने वाले भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ उनके संघर्ष को अभिव्यक्त करती राजेश, निखिला, नागेश्‍वर, शोंरिछोन, श्‍वा कुमार निर्देशित तमिल डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘आई एम नागेश्वर राव स्टार’ तथा एक अच्छी खबर की तलाश के जरिये अपने दौर की व्यवस्था को प्रश्नचिह्नित करती अल्ताफ माजिद की असमिया फिल्म ‘भाल खबर’ दर्शकों को काफी विचारोत्तेजित करने वाली फिल्में थीं।

उड़ीसा के फिल्मकार सूर्या शंकर दाश की ‘सुलगती जमीन की कहानियाँ’ शीर्षक वाली छोटी फिल्में उड़ीसा में जल, जंगल, जमीन और पहाड़ पर हक-अधिकार के लिये आदिवासियों के संघर्ष और कारपोरेट कम्‍पनियों, सरकार, प्रशासन और मीडिया की साजिशों और दमन को बड़ी कुशलता से सामने लाने और जनांदोलनों में फिल्म माध्यम की प्रभावशाली भूमिका को रेखांकित करने में कामयाब रहीं। सूर्याशंकर दाश ने कहा कि वह स्पष्ट तौर पर जनता के आंदोलन के पक्षधर फिल्मकार हैं और यह पक्षधरता कतई गलत नहीं है। ये फिल्में जनता के संघर्ष पर हैं और उनके संघर्षों को ताकतवर बनाने के लिये हैं। रोहित जोशी और हेम मिश्रा की फिल्म ‘इंद्रधनुष उदास है’ ने भी उत्तराखण्‍ड के सन्‍दर्भ में आर्थिक उदारीकरण के विकास मॉडल पर सवाल खड़ा किया। फिल्म विधा के छात्र यशार्थ मंजुल की फिल्म ‘एक अवाम’ भी बेरोजगारी और असफलताओं के बीच एक नौजवान द्वारा जिन्‍दगी के अर्थ तलाशने की कशमकश को सामने लाने वाली फिल्म थी, जिसकी पृष्ठभूमि में हबीब जालिब का एक मशहूर नज्म लगातार चलती है, जो नायक के कशमकश को मुखर करती है। रुचिका नेगी और अमित महंती की डाक्यूमेंटरी फिल्म ‘मालेगाँव टाइम्स’ में पावर लूम और सिनेमा के नाजुक रिश्ते की झलक देखने को मिली। इनके अतिरिक्त पंकज जोहर की फिल्म ‘स्टिल स्टैंडिंग’, शबनम बिरमानी की ‘हद अनहद’, ईशा पॉल और सुशोवन सरकार की ‘डर्टी पिक्चर हॉल’, फातिमा एन की ‘माई मदर्स डाउटर’, तहा सिद्दीकी और जयाद की फिल्म ‘डिशेंट ओवरडोज’ का भी प्रदर्शन हुआ। गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल ने युवा फिल्म निर्देशकों की बेहतर संभावनाओं की ओर संकेत किया। विषय और शिल्प दोनों लिहाज से इन फिल्मों ने जनता के सिनेमा के भविष्य के प्रति उम्मीद बंधाई।

दर्शकों के साथ बैठे फि‍ल्म अभि‍नेता रघुवीर यादव।

लघु फिल्मों की श्रृंखला में लुइस फॉक्स की फिल्म ‘स्टोरी ऑफ स्टफ’ ने चीजों के निर्माण, उनकी कीमत और वितरण की प्रक्रिया के जरिये जनविरोधी उपभोक्तावादी अर्थनीति की समझ को बड़े सरल तरीके से समझाया। बर्ट हंस्तारा की ‘ग्लास’ और ‘जू’ तथा राबर्ट एनरिको की ‘ऐन आकुरेंस एट आउल क्रीक ब्रीज’ जैसी फिल्में दर्शकों की कलात्मक बोध को समृद्ध करने वाली फिल्में थीं। इंकलाबी शायरों की रचनाओं को पोपुलर अंदाज में गाने वाले पाकिस्तान के लाल बैंड की म्यूजिक वीडियो को दर्शकों ने काफी सराहा। भारतीय फिल्म के निर्माण में दादा साहब फाल्के की ऐतिहासिक भूमिका पर केंद्रित दस्तावेजी फिल्म ‘हरिशचंद्राची फैक्टरी’ तथा जो जॉन्सन निर्देशित आस्कर सम्मान प्राप्त फिल्म ‘अक्टूबर स्काई’ इस फिल्मोत्सव का आकर्षण थी, जो एक कठिन जिंदगी और विकल्पहीनता के बीच से निकलकर वैज्ञानिक बनने वाले एक ऐसे इंसान की जिंदगी पर आधारित है, जो बार-बार असफल होने के बावजूद जिंदगी में हार नहीं मानता। प्रसिद्ध नारीवादी चिंतक और इतिहासकार उमा चक्रवर्ती की पहली फिल्म ‘छुपा हुआ इतिहास’ इतिहास की उपेक्षा की शिकार एक स्त्री सुब्बुलक्ष्मी की जिंदगी पर केंद्रित थी और जिसके जरिये दर्शक स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास से तो अवगत हुए ही, उस स्त्री का जो ‘छुपा हुआ इतिहास’ था, उससे भी रूबरू हुए। संसाधनों के अभाव में पलते एक अनाथ बच्चे के खाने के डब्बे के इर्द-गिर्द घूमती निर्देशक अमोल गुप्ते की फिल्म ‘स्टैनले का डब्बा’ भी गोरखपुर में काफी सराही गई। दिल्ली से आए चित्रकार सावी सावरकर का पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन भी इस फिल्मोत्सव का एक आकर्षण था, जिसमें उन्होंने सोमनाथ होड़ और रामकिंकर बैज की परम्परा से खुद को जोड़ते हुए कहा कि हमारे पास हाशिए के लोगों को चित्रित करने की एक लम्बी परम्परा है, जिसे नये चित्रकारों को आगे बढ़ाना चाहिये। उन्होंने कला के क्षेत्र में सबार्ल्टन सौन्दर्य शास्त्र के अभाव पर चिन्ता जाहिर की। और वर्ण व्यवस्था, अस्पृश्यता, महिला, बौद्ध धर्म, गुजरात को लेकर बनाए गये अपने चित्रों की श्रृंखला प्रदर्शित करते हुये उसे व्याख्यायित किया। इस फिल्मोत्सव में प्रसिद्ध दलित लेखक शरण कुमार लिंबाले की आत्मकथा ‘अक्करमाशी’ पर आधारित लोकेश जैन की एकल नाट्य प्रस्तुति मानो इसी सौदर्यशास्त्र की एक बानगी थी।

31 मार्च और 1 अप्रैल को बनारस में आयोजित पहले फिल्मोत्सव में भी सिनेमा को जनपक्षधर बनाए जाने की जरूरत ही केंद्र में थी। अस्सी स्थित छोटा नागपुर वाटिका में आयोजित इस फिल्मोत्सव की शुरुआत मैक्सिको से आईं फरनान्दा राबिन्सन द्वारा वहाँ के वाद्ययंत्र होमपेक्स के वादन से हुई। उद्घाटन सत्र में फिल्मकार मेघनाथ ने कहा कि हमें यह मिथक तोड़ना है कि फिल्म सिर्फ मनोरंजन का माध्यम है। दुर्भाग्य से हमारे देश में सिनेमा की ताकत को ठीक से समझा नहीं गया। आज सिनेमा बनाने और दिखाने के तंत्र पर बड़ी पूँजी ने कब्जा कर लिया है। सत्ता और उसके दमनकारी चरित्र पर सवाल खड़े करने वाली फिल्मों और फिल्मकारों को इससे बेदखल कर दिया गया है। ऐसी स्थिति में हमें इस तरह के फेस्टिवल के माध्यम से जनता के पास जाना होगा। उन्होंने प्रतिरोध के सिनेमा का दायरा और व्यापक करने पर जोर दिया। मैक्सिको के फिल्मकार फ्रांसिस्को टबोएडा ने मैक्सिको के साथ-साथ लैटिन अमरीकी देशों में साम्राज्यवाद व वर्चस्ववादी संस्कृति के खिलाफ जनता विशेषकर आदिवासियों द्वारा किये जा रहे संघर्ष की चर्चा करते हुये कहा कि इन देशों के बहुत से फिल्मकार प्रतिरोध के सिनेमा के जरिये जनता की लड़ाई के साथ खड़े हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता चितरंजन सिंह ने कहा कि प्राकृतिक सम्पदा की लूट के खिलाफ लोगों की चेतना का विकास करने में प्रतिरोध का सिनेमा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बनारस फिल्म सोसाइटी के संस्थापक सदस्य प्रशांत शुक्ल ने कहा कि प्रतिरोध का सिनेमा इस वक्त की जरूरत है, इसलिए ही बनारस में भी इस सिलसिले की शुरुआत की गई है।

अजय भारद्वाज की ‘एक मिनट का मौन’ फेस्टिवल की उद्घाटन फिल्म थी। यह फिल्म जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कामरेड चन्द्रशेखर की सीवान में हत्या और इसके बाद नई दिल्ली से लेकर पटना तक विरोध प्रदर्शनों के ज्वार को दिखाती है। यह फिल्म राजनीति के अपराधीकरण और उसको संरक्षण देने वाले राजनेताओं को जहाँ बेनकाब करती है, वहीं इसके प्रतिकार की सही राजनीति की तलाश भी करती है। फिल्म के प्रदर्शन के पहले जनसंस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने एक संक्षिप्त वक्तव्य में कहा कि आज ही के दिन 15 वर्ष पहले कामरेड चन्द्रशेखर और श्याम नारायण यादव की सीवान में वहाँ के अपराधी राजनेता ने हत्या करा दी थी। डेढ दशक बाद सीबीआई अदालत ने अभियुक्तों को सजा सुनाई है लेकिन असली गुनहगार को बचा लिया गया है। आज से असली हत्यारों को सजा दिलाने के लिए दूसरे दौर की लड़ाई छिड़ रही है। उन्होंने कहा कि अजय भारद्वाज की यह फिल्म आंदोलन के गर्भ से निकली है।

विकास के नाम पर हिंसा, विस्थापन के सत्ता के खेल का पर्दाफाश करने वाली दो चर्चित डाक्यूमेंटरी फिल्में- विकास बंदूक की नाल से (मेघनाथ-बीजू टोप्पो) और महुआ मेमोयर्स (विनोद राजा) बनारस में दिखाई गईं। अपनी फिल्म के बारे में मेघनाथ ने कहा कि आज का विकास दरअसल सत्ता, कारपोरेट घरानों और मीडिया के गठजोड़ से बुना गया एक डिजाइन है। जल, जंगल, पहाड़ का विनाश, हिंसा, विस्थापन इसकी अनि‍वार्य परिणति है। यह फिल्म विकास के इस मॅाडल के खिलाफ आदिवासियों के प्रबल प्रतिरोध को सामने लाती है। महुआ मेमोयर्स भी इसी विषय को और विस्तार से दर्शकों के सामने लाती है। मैक्सिको के फिल्मकार फ्रांसिस्को टबोएडा की दो फिल्में- ‘द मैसेन्जर’ और ‘लेट्स गो टू द रिवोल्यूशन’ भी बनारस के दर्शकों को देखने को मिलीं। ‘द मैसेन्जर’ में फेलिस्यानो को एक खुफिया संदेश जपाटिस्टो तक पहुँचाना है लेकिन वह अपने बूढे पिता से मिलने चला जाता है। ‘लेट्स गो टू द रेवोल्यूशन’ में मैक्सिकन क्रान्‍ति‍ के दौर की एक कहानी है। विशेषकर ये दोनों फिल्में उस दौर की क्रान्ति की स्थितियों और क्रान्तिकारियों के जीवन के यथार्थ को बखूबी चित्रित करती हैं।

गोरखपुर फिल्म सोसाइटी द्वारा इनसेफ्लाइटिस की त्रासदी पर बनाई गई डाक्यूमेंटरी फिल्म ‘खामोशी’ और सूर्याशंकर दाश की ‘सुलगती जमीन की कहानियाँ’ को बनारस में भी दिखाया गया। बनारस में कई छोटी फिल्में और एनिमेशन फिल्में भी दिखाई गईं। नेबर (नार्मन मैक्लरेन), ग्लास (बर्ट हंस्तारा), हंगर (पीटर फोल्डस) और प्रिन्टेड रेनबो (गीतांजलि राव) अपनी कलात्मकता और अन्तर्वस्तु से दर्शकों के दिलोदिमाग पर अमिट छाप छोड़ गईं। ‘नेबर’ 1952 में बनी यु़द्ध विरोधी फिल्म है तो ‘हंगर’ में आधुनिक समाज में बढ़ते लालच पर टिप्पणी है। बेला नेगी की ‘दाएं या बाएं’ और मालेगाँव में फिल्म निर्माण के शौकीन समूह पर बनी रोचक डाक्यूमेंटरी ‘मालेगाँव का सुपरमैन’ तथा बच्चों के न्यायबोध को रोचक ढंग से पेश करने वाली संकल्प मेश्राम की फिल्म ‘छुटकन की महाभारत’ इस फिल्मोत्सव में दिखाई गईं। पाथेर पंचाली, अपूर संसार के साथ सुप्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे की फिल्म त्रयी में शामिल ‘अपराजितो’ तथा इरानी फिल्मकार जफर पनाही की फिल्म आफ साइड भी बनारस के दर्शकों ने काफी पसंद किया।

रूडमारी: नरेन्‍द्र देवबर्मा

4 फरवरी, 1964 को जन्‍में कॉकबोरोक (त्रि‍पुरी) के लेखक नरेन्‍द्र देवबर्मा के कई कवि‍ता संग्रह, कहानी संग्रह और बच्‍चों के नाटकों की पुस्‍तकें प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। उनकी इस कहानी का भाषांतरण स्‍मि‍ता देवबर्मा ने कि‍या है-

बचपन से ही मुझे दूसरों की शादी-ब्याह में जाने की आदत तो है नहीं। फिर भी समतिया भैया का अनुरोध टाल नहीं सका और मुझे उनकी बेटी के ब्याह मे जाना पडा़। इस ब्याह में जाकर जो मैंने देखा, उसे अभी तक भूल न सका। शादी-ब्याह का अनुष्ठान रीति-रिवाज के साथ बहुत धूमधाम और खुशी-खुशी सम्पन्न हुआ। भैया समतिया ने गरीब होने के बावजूद अनुष्ठान में किसी भी चीज की कमी नहीं छोडी़। खान-पान की व्यवस्था में देखभाल करने का दायित्व मुझे सौंपा। मैंने ठीक तरह से इस दायित्व को निभाया। भैया समतिया शादी-ब्याह के बीच-बीच में खाने-पीने की भी खोज खबर लेते रहते और मुझसे कहते है, ‘‘तुम्ही मेरे हाथ-पाँव और आँख-कान हो। जितना है तुम्हीं को सम्भालना है और देखना है कि किसी चीज की कमी न रहे।

उन की बातों को सुनकर मुझे और भी होशियारी से इस दायित्व को देखना पडा़।

उधर शीतकाल का सूर्य अपने घर जाने की तैयारियाँ कर रहा था। मैं भी अपनी थकावट को दूर करने के उद्देश्य से उस जगह को छोड़कर घर के सामने वाले बडे़ आँगन की ओर आया तो देखा आँगन के चारों ओर घेरा डाल कर लोग न जाने क्या देख रहे थे। तभी देखा एक औरत बच्चा गोद मे लिये भीड़ चीरती हुई बाहर निकल आई और बड़बडा़ई, ‘‘न कभी देखी, न सुनी ऐसी अनहोनी करतूतें (करामत)।’’ मैंने उससे पूछा, ‘‘क्या हुआ बहन? वहाँ क्या हो रहा है?’’ मेरी बातों का कोई उत्तर न देकर वह औरत अपने आपसे कहती है, ‘‘ये भी कोई बात हुई, शादी की अपनी मर्जी से और अब ससुराल जाना नहीं चाहती। फिर शादी की ही क्यों?’’

‘‘हुआ क्या?’’ ऐसा कह मैं भीड़ को चीर के आगे बढ़ गया। जाने पर देखा, नई दुल्हन रूडमारी सभी के बीचों-बीच खडी़ बातों का जवाब दे रही थी। वहाँ गाँव के मुखिया अंजूराय कोई सवाल (दुल्हन से) कर रहे थे, ‘‘बेटी, सचमुच तुम ससुराल नही जाओगी?’’

‘‘कहा ना ताऊ जी मैं न जाऊँगी।’’ रूडमारी ने जवाब दिया। ‘‘क्यों जाना नहीं चाहती?’’ अंजूराय ने सवाल किया।

‘‘मैं ऐसे ही नहीं जाऊँगी। जाने की इच्छा नहीं है। इसलिये नहीं जाऊँगी।’’ रूडमारी फटाफट जवाब देती है।

‘‘फिर तुमने शादी क्यों की?’’ दादा अंजूराय ने पूछा।

‘‘मैंने अपनी मर्जी से ही शादी की है।’’ रूडमारी ने उत्तर दिया। ‘‘अपनी मर्जी से ही शादी की है तो अब ससुराल क्यों जाना नहीं चाहती?’’

‘‘मेरा मन नहीं चाहता इसलिये नहीं जाऊँगी। यही मेरा आखि‍री फैसला है। इससे ज्यादा मैं कुछ कहना नहीं चाहती।’’ रूडमारी ने कठोर जवाब दिया। रूडमारी के इस जवाब को सुनकर अंजूराय के पास उसे कहने के लिये कुछ बात न रही।

मैंने कुछ कहना चाहा तो रूडमारी ने रोकते हुये कहा, ‘‘काका, आप बीच में न कहें तो ज्यादा अच्छा होगा।’’ उसके बाद मैंने भी कुछ कहने की जरूरत नहीं समझी। चुपचाप खडा़ रहा। रूडमारी की माँ इस तमाशे को देखकर जोर-जोर से रोने लगी और कहने लगी, ‘‘मेरी बेटी को किसकी बुरी नजर लग गई जो अनाप-सनाप बकती जा रही है।’’

रूडमारी के पिता समतिया कहने लगे, ‘‘कहाँ की बुरी नजर पड़ गयी। एक-दो डंडे पडे़ंगे तो अपने आप ठीक हो जायेगी।’’ तभी वहाँ उपस्थित सभी लोग कहने लगे, ‘‘ऐसे नहीं चलेगा। दूल्हे को बुलाओ। वो आकर जो कुछ करे करने दो। तब कई लोगों ने दूल्हे को बुलाया।

जल्‍दी जाकर नहीं बैठने से सीट न मिलेगी, ऐसा सोच कर दूसरी तरफ कुछ बाराती जीप गाडी़ में पहले से ही बैठे हुये थे। पहले से ही जीप के दोनों टेलर में दहेज में दी गई सभी वस्तुएं जैसे- पंलग, अलमारी, टीवी, फ्रिज, सोफा आदि बाँध कर रख दि‍या गया। गाडी़ में बैठे लोग इन्तजार करते-करते थककर गुस्सा जाहिर करने लगे। दूल्हे का नाम रमेन। वह पढा-लिखा है और सरकारी नौकरी करता है। सुनते ही फटाफट आया और साफ शब्दों में पूछने लगा, ‘‘रूडमारी, क्या तुम सचमुच ससुराल जाना नहीं चाहती।’’

‘‘सच नही तो क्या मैं मजाक कर रही हूँ।’’

रूडमारी का यह खुले विचार का जवाब सिर्फ रमेन को ही नहीं, वहाँ उपस्थित सभी लोगों को आश्‍चर्यचकि‍त कर देता है।

‘‘क्यों नहीं जाओगी तुम।’’ रमेन ऊँची आवाज में फिर पूछता है।

‘‘मेरा दिल नहीं चाहता।’’ रूडमारी ने जवाब दिया।

‘‘ये भी कोई बात हुई। तो फिर शादी क्यों की?’’

‘‘मेरे दिल ने चाहा इसलिये की।’’

‘‘ऐसी बात बनाने से नहीं चलेगा। तुमको कहना ही पडे़गा, क्यों जाना नहीं चाहती।’’

‘‘तुम मुझमे प्यार नहीं करते।’’ रूडमारी के इस जवाब से सभी को आश्‍चर्य हुआ। किसी के मुँह से आवाज नहीं निकली। केवल एक-दूसरे की ओर देखते रहे।

‘‘मैं तुमसे प्यार नहीं करता।’’ रमेन के मुँह से आवाज निकलती है, ‘‘मै तुमसे प्यार नहीं करता तो फिर आकर शादी ही क्यों करता।’’

‘‘मैं जानती हूँ, तुम मुझसे प्यार नहीं करते।’’ रूडमारी बोलती है।

‘‘तुम्हें कैसे पता? तुम्हें बताना पडे़गा।’’ रमेन ने ठोस शब्दों में कहा।

‘‘तो सुनो।’’ रूडमारी ने कहना आरम्भ किया, ‘‘पिछले वर्ष तुम्हारे साथ मेरा ब्याह करने की तारीख तय हो चुकी थी। क्या ये सच नहीं है?’’ रमेन ने सर हिलाकर ‘हाँ’ किया। ‘‘तब तुमने शादी नहीं की क्योंकि दहेज में जो कुछ तुमने माँगा वो सब मेरे पिता जी पूरा नहीं कर पाये। इस साल मेरे पिता जी ने अपनी दो बीघा जमीन बेचकर तुम्हारी माँगें पूरी कीं। आज इस वजह से तुमने मुझसे शादी की। तुमने तो मुझसे प्यार ही नहीं किया। प्यार है तो सिर्फ दहेज से। अगर मुझसे प्यार होता तो पिछले साल ही बिना दहेज के मुझसे शादी करते।’’

रूडमारी के इस कथन से सभी प्रभावित होकर एक-दूसरे के कान में फुसफुसाने लगे।

तब मैं भी चुप न रह सका। बीच में खडा़ होकर कहना पडा़, ‘‘सुनो रमेन, सुनो भाइयो और बहनों, दूसरों को देखकर दहेज लेने और देने की जो प्रथा हमने शुरू की है हमारे समाज में वह ठीक नहीं। घर में अगर एक बेटी हो तो भी माता-पिता की चिन्‍ता की सीमायें खत्म नहीं होती। घर, जमीन-जायदाद बेचकर दहेज देने का नियम शुरू किया। हमारे समाज में जो नियम चालू हुआ है वह एक बीमारी की तरह फैला हुआ है। इस बीमारी को हमें ही रोकना पडे़गा। नहीं तो हमारे समाज में अंधेरा फैल जायेगा।’’

मेरी इस बात पर सहमति देते हुए सभी ने समर्थन दिया। तब रमेन ने रूडमारी के करीब जाकर उसके दोनों हाथ पकड़ के अपने सीने पर रख कर कहा, ‘‘रूडमारी, तुम सच में रूडमारी हो। रूडमारी का अर्थ है ज्ञानी। आज तुमने मुझे सचमुच बहुत अच्छी शिक्षा दी। मुझे भी दहेज प्रथा पसन्द नहीं है। समाज मुझे नीचा दिखायेगा, ऐसा सोचकर मैंने भी दहेज मांगा था। आज मैं तुम्हारा हाथ पकड़कर कसम खाता हूँ जितना भी दहेज में खर्च हुआ है, उसे में वापस कर दूँगा। साथ ही साथ मैं आशा करता हूँ कि तुम जैसी लडकियाँ हमारे समाज मैं पेदा हों तो दहेज प्रथा हमारे समाज में और ज्यादा दिन रह नही पायेगी।’’

दलित साहित्य विमर्श नहीं, चेतना का साहित्य : तेज सिंह

गोरखपुर : प्रसि‍द्ध आलोचक रामविलास शर्मा की स्मृति में हिन्‍दी आलोचना को  केन्द्रित  कर गोरखपुर में  7 और  8 अप्रैल, 2012 को  आयोजित कार्यक्रम में जातीय भाषा, दलित,  स्त्री  एवं छंद  मुक्त कविता  के  मुद्दों  पर  विमर्श  हुआ। इसमें डा. तेज सिंह  एवं  बजरंग बिहारी तिवारी  (दिल्ली), शम्भू  गुप्त ( वर्धा ), नचिकेता (पटना), अमरनाथ ( कोलकाता ), प्रभा दीक्षित( कानपुर ), मूलचंद  सोनकर  (वाराणसी )  अतिथि  वक्ता  थे। दलित  साहित्य  को  लेकर  सहानुभूति  और  समानुभूति  का  मुद्दा उठा । एक विचार स्थापित हो गया है कि दलित साहित्य-दलितों द्वारा, दलित  के  लिए,  दलित  के  विषय  में  है।

शम्भू  गुप्त  ने कहा  कि  ऐसे  विचार  दलित  साहित्य  को  संकीर्णता  के  घेरे  में  ला  देते  हैं। यह  दलितवाद  पैदा  करता  है  जिसकी  परिणति  है दलित   ब्राह्मणवादइस  दुराग्रह  ने  दलित  साहित्य  का  नुकसान  किया  है। बजरंग  बिहारी  तिवारी  ने  दलित  काव्य  की  आलोचना का  व्यवहारिक  पक्ष  रखा। डा.  तेज  सिंह  ने  कहा  कि  दलित  साहित्य –दलित  विमर्श  नहीं,  बल्कि  दलित  चेतना  का  साहित्य  है।

बहस  में  यह  बात  सामने  आयी  कि  कास्ट, क्लास  और  जेंडर  को  एक साथ  देखने  से  ही  स्त्री  साहित्य  पर  समग्रता  से  बातचीत हो  सकेगी। हिंदी  में  स्त्री  विमर्श  अभी  केवल  पुरुष  सन्दर्भ  में  है। स्त्री  का  चित्रण  स्वतंत्र  व्यक्तित्व  में  होना  चाहिए। महसूस किया  जा  रहा है कि आलोचना में अलग-अलग  खाँचे बन  गये  हैं  और  एक  रणनीति  के  तहत  दलित  और  स्त्री  साहित्य  में विभाजन  कर  उन्हें  मुख्य  धारा में  आने  से  वंचित  किया  जा  रहा  है। हिन्‍दी  की  मुख्य  धारा  वर्चस्ववादी  प्रवृत्ति  की  है  जिसे  तोडा़ जाना  चाहिये। मुख्यधारा  में  दलित  और  स्त्री  को  साथ  ले  कर  चलना  होगा।

कविता  में  छंद  विधा  की  उपेक्षा  के  सवाल  पर  प्रोफेसर  रामदेव  शुक्ल  का  कहना  था  कि  विगत  दो  दशकों  में  बड़ी  संख्या  में  दोहे  और ग़ज़लों  की  रचनाएँ  यह  स्पष्ट  करती  हैं  कि  कविता  छंद  मुक्त  नहीं  हुई  है। कविता  में  यदि  भाषा  है , जीवन  की  लय  है  तो  वह  छंद का  बन्ध  तोड़  कर  आयेगी। नचिकेता  ने  कहा  कि  कविता  न  तो  केवल  छंद  है  और  न  केवल  गद्य, बल्कि  कविता  इन  दोनों  कि द्वंदात्मक  समष्टि  है। प्रोफेसर  चितरंजन  मिश्र  का  कहना  था  कि  अच्छी  कविता  को  न  तो  छंद  से  बाहर  किया  जा  सकता  है  और  न  ही भीतर।

देवेन्द्र  आर्य  ने  छंद  कविता  की  उपेक्षा  को  दलितवाद  से  जोड़ते  हुए  दलित  साहित्यकारों  जैसा  ही  संघर्ष  करने  की  जरूरत बताई। जगदीश  नारायण  ने  छंद  काव्य  को  भाषा  की  आँख  बताते  हुये  काव्य  के  स्वरूप  की  रक्षा  और  भीतरी  ढाँचे  की  मजबूती  के लिये  छंद  की  वापसी  की  ज़रूरत  बताई। अनिल  राय  ने  पूछा  कि  क्या  छंद  में  दुर्बोधता  और  सम्प्रेषण की  समस्या  नहीं  होती और  क्या  छंद  मुक्त  कविता  सुगम  एवं सम्प्रेषणीय  नहीं  होतीं ? वास्तव  में  सम्प्रेषण-संशलिष्ट  एवं  द्विपक्षीय  क्रिया-प्रतिक्रिया व्यापार  है।  अतः  छंद  के  सवाल  को केवल  सम्प्रेषणीयता  से  जोड़  कर  नहीं  देखना  चाहिये। प्रभा  दीक्षित ने कहा कि विधा से ही कविता श्रेष्ठ या कमतर नहीं होती- अंतर्वस्तु आवश्यक है।

प्रतिमानीकरण के सवाल पर कपिल देव ने कहा कि आलोचना ने अपना फलक और मूल्य का दायरा विकसित किया है। कविता अभी अपने स्वरुप निर्माण की प्रक्रिया से गुज़र रही है, जब यह स्थिर होगी तो प्रतिमानीकरण का समय आयेगा। प्रमोद कुमार ने कहा कि कविता देश और काल में सदैव परिवर्तनशील है, यह स्थिर हो ही नहीं सकती। अतः इसका स्वरूप निर्धारण नहीं हो सकता। बजरंग बिहारी तिवारी ने उत्पादक कवि की अवधारणा प्रस्तुत की एवं प्रमिला केपी और अनामिका को उल्लिखित करते हुए प्रतिमान प्रस्तुत किये। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डा. तेज सिंह ने कहा कि आलोचना के दो मुख्य काम हैं- रचना का मूल्याँकन और सिद्धांत निरूपण।  प्रतिमान तो समय और समाज की उपज हैं। यह सही है कि छंद से आज आलोचक विमुख हो रहे हैं।

कार्यक्रम का पहला दिन उत्सवधर्मी रहा। भोजपुरी कवि मोती बीए द्वार का उद्घाटन, उर्दू आलोचना के शिखर विद्वान शम्सुर्रहमान फारूकी एवं हिन्‍दी कथाकार, भाषा चिन्तक प्रोफेसर रामदेव शुक्ल का सम्मान,  काव्य संकलन ‘सर्जना के तीन रंग’- जिसमें रामाधार त्रिपाठी ‘जीवन’,  विद्याधर द्विवेदी ‘विज्ञ’ और देवेन्द्र कुमार ‘बंगाली’ की चुनी हुईं कवितायेँ शामिल हैं और सुधा विन्दु त्रिपाठी रचनावली का विमोचन किया गया। तीन महत्वपूर्ण व्याख्यान हुए- समकालीन काव्यालोचना में हिन्‍दी-उर्दू की परम्‍परा पर शम्सुर्रहमान फारूकी, जातीय भाषा और साहित्य पर रामदेव शुक्ल और हिन्‍दी का जातीय साहित्य एवं रामविलास शर्मा पर अमरनाथ ने वक्तव्य दिये। कार्यक्रम का संयोजन और संचालन देवेन्द्र आर्य और पंकज गौतम ने किया। व्यवस्था रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी ने की।

इस अवसर पर गोरखपुर से केसीलाल, रणविजय सिंह, बीआर विप्लवी, सुरेन्द्र दुबे, गणेश पाण्डेय, अरविन्द त्रिपाठी, नागेन्द्र, हर्षवर्धन शाही, रंजना जैसवाल, हर्ष सिन्हा, दीपक त्यागी आदि भी उपस्थित थे

‘सरोकारों के आइने में स्त्री’ वि‍षय पर गोष्‍ठी 21 को

नई दि‍ल्‍ली: ‘अंजना: एक  विचार मंच’ की ओर से 21 अप्रैल, 2012 को शाम 5.00 बजे से रात 9.00 बजे तक हिन्‍दी भवन (बेसमेंट), नई दि‍ल्‍ली में स्त्री-विमर्श पर एक महत्वपूर्ण सभा ‘सरोकारों के आइने में स्त्री’ का आयोजन कि‍या जा रहा है। इसकी अध्‍यक्षता रमणिका गुप्ता करेंगी और मुख्य अतिथि मैत्रेयी पुष्पा होंगी। विशेष सान्निध्य डॉ. कमल कुमार और गीताश्री को होगा।

आज की नारी की महत्वाकांक्षाएं क्या हैं? पुरुष से वह कैसा समीकरण रखना चाहती है? नए समीकरणों में परिवार, समाज व सम्‍बंधों का प्रारूप क्या है? स्वतंत्र नारी का समाज निर्माण में क्या योगदान है? इन तमाम सवालों पर वि‍चार-वि‍मर्श होगा। इसके अतिरिक्त स्त्री विमर्श से जुड़ी कुछ सशक्त कविताएँ का पाठ होगा। कार्यक्रम के  अंत में उपस्थित श्रोतागण के प्रश्नोत्तर भी होंगे।

प्रस्‍तुति‍ : प्रेमचंद सहजवाला, अध्यक्ष ‘अंजना: एक विचार मंच’

दो ग़ज़लें : प्राण शर्मा

ग़ज़लकार, कहानीकार और समीक्षक प्राण शर्मा का जन्म वजीराबाद (पाकिस्तान)  में 13 जून 1937 को हुआ। प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में हुई और पंजाब विश्‍वविद्यालय से एम. ए., बी.एड. किया। वह 1965 से यू.के. में प्रवास कर रहे हैं। उनकी दो पुस्‍तकें ‘ग़ज़ल कहता हूँ’ व ‘सुराही’ (मुक्तक-संग्रह) प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अलावा ‘अभिव्यक्ति’ में प्रकाशित ‘उर्दू ग़ज़ल बनाम हिन्‍दी ग़ज़ल’ और ‘साहित्य शिल्पी’ पर ‘ग़ज़ल: शिल्प और संरचना’ के 10 महत्‍वपूर्ण लेख हैं। उनकी दो गज़लें-

1.

कर नहीं सकते अगरचे प्यार की बातें
कुछ तो करना सीखो तुम उपकार की बातें

हाँ में हाँ प्यारे कभी सबकी मिलाया कर
दिल दुखाती हैं सदा इनकार की बातें

एक ये भी नुस्खा है तीमारदारी का
ठण्डे मन से सुनियेगा बीमार की बातें

करते हो हर बात मतलब की हमेशा तुम
जैसे व्यापारी करे व्यापार की बातें

औरों की सुनिए भले ही शौक़ से लेकिन
पहले सुनिए  अपने ही परिवार की बातें

काम की कुछ बातें हों आपस में ए यारो
सर दुखाने लगती हैं बेकार की बातें

‘प्राण’ अपनों से कोई हक़ क्या कोई मांगे
लगती हैं सब को  बुरी हक़दार की बातें

2.

जिसकी सुखी है हर समय संतान दोस्तो
वो शख्स है जहान  में धनवान दोस्तो

हक़दार हों भले ही कई उसके वास्ते
मिलता है कब हरेक को सम्मान दोस्तो

जीवन में भी तो होती है हलचल अजीब सी
जीवन  में भी तो आता है तूफ़ान दोस्तो

संसार  दानवीरों  से  वंचित  नहीं  हुआ
करते हैं अब भी लोग कई दान दोस्तो

रहते हैं साधुओं से, फ़क़ीरों से उम्र भर
मिल जाते हैं कुछ ऐसे भी धनवान दोस्तो

दुनिया का  कोई माज़रा उससे नहीं छिपा
जिस शख्स को है थोड़ी भी पहचान दोस्तो