Archive for: March 2012

एल थॉमस कुट्टी की कवि‍ताएं

एल थॉमस कुट्टी

युवा मलयालम कवि एल. थॉमस कुट्टी के दो कवि‍ता संग्रह प्रकाशि‍त हो चुके हैं। इसके अलावा थिएटर एवं नाटकों पर भी एक किताब प्रकाशित। थिएटर एवं फोल्कलोर के लिये मशहूर। कोजिकोड विश्‍ववि‍द्यालय के मलयालम विभाग में एसोसिएट प्रोफ्रेसर के रूप में कार्यरत। उनकी चार कवि‍ताएं। इनका अनुवाद बहुभाषी अनुवादक संतोष अलेक्‍स ने कि‍या है-

बुखार

मैं
मिट्टी का मैला बिस्‍तर
आह, दवाई
एवं मेरा कमरा
बुखार से पीडित है

तेरे पास से
कफ की दुर्गन्‍ध आ रही है
हमारे बैल रूपी श्रृंगार में
पहले से ही बुखार था

पके हुए कौमार्य व
समाधान ढूँढनेवाले प्‍यासों के लिये
सीपियाँ बहती महानदी के
बिम्‍बों के लिये व
इकट्ठे हो रहे पवित्रताओं में
पहले से ही बुखार था

बुखार होते हुये भी
सारे रंगीन नामपट्ट
कल मेहमान बने
हरे से मारून
व सफेद से पीला निकला
बचपन में मैं
रंगों के घोल से
पगला गया

दिशा खोए हुए पतंग सा
मैंने टूटी दीवार पर
उड़ने की कोशिश की
मेरे रास्‍ते को रोककर
परछाइयों ने मुझे
दिव्‍य अनुभूतिहीनता व
शराब के बुरे असर के बारे में
सुबह की रोशनी में
टहनी कटे पेडों के बारे में
बसेरा लेने जगह ढूँढते
कौए के बारे में उपदेश दिया

मैं नींबू का नाश
व बेल की भलाई को भूल गया
मैंने
अकाल व धरती का स्‍त्रोत्र गाया

बुखार ने
सब कहीं उदासी को उतारा
दुनिया एक अपरिचित चीज बन गई
मैं गर्म माथा एवं
काँपते शरीरवाला
एक साधारण बुखार हूँ

मरणोपरांत

राष्‍ट्र के लिये हम
डेढ किलो भारवाले
बच्‍चों को पैदा करेंगे

राष्‍ट्र के लिये हम
नन्‍हे होठों में
राष्‍ट्रभाषा में देशभक्ति ठूँस देंगे

राष्‍ट्र के लिये हम
नन्‍ही पीठ पर दामों की सूची लगाकर
किंडरगार्डेन भेज देंगे

राष्‍ट्र के लिये उन्‍हें
पश्‍चि‍म की दादा-दादी की कहानियाँ
एवं प्रायोजित फीचर फिल्‍म दिखायेंगे

राष्‍ट्र के लिये हम
उनकी छाती को फूलायेंगे
एवं कद को बढा़येंगे

राष्‍ट्र के लिये उन्‍हें
बेरैक में सुलायेंगे
मारे जाने वाले को खानेवाले बनायेंगे
मारने का पाप
मारी गई वस्‍तु को खाने से मुक्‍त हो जाएगा

इस प्रकार नये साल में
मरणोपरांत वीरचक्र को
गले लगाकर रो पडेंगे

बालों का पकना

बालों के पकने से
मुझे डर लगता है
सुबह की रोशनी से भी

मैं बालों व आँखों में
काले रंग का उपयोग
करता हूँ

समय ने जो रोशनी दी
उसमें छिपाई गई सच्‍चाइयाँ
कठिन हो रहे हैं
शब्‍द दृष्टि एवं जिन्‍दगी

शुरू से अंत तक
सब जगह अंधेरा होने दो
फिर बीच में यह पवित्रता क्‍यों
जिन्‍दगी की भट्ठी
साफ बालोंवाला मुकुट प्रदान करती है

जब था

लो, तेरे लिये बालू
बडे़ हो जाओ
पालो पोसो
फिर उपेक्षा करो
लो, तेरे लिये
थोडा़ सा दर्द
गले में आवाज छिपकने तक
आहिस्‍ता से पियो खाओ
फिर इल्‍जाम लगाओ
जो भी रंगीन है
वह मेरा नहीं है
क्षण तो रूकता भी नहीं
मैं दाँत हूँ
सिंह के मुँह से गिरा

हि‍न्‍दू कालेज में वार्षिक उत्‍सव अभि‍धा 30 से

नई दिल्ली : हिन्दू कालेज के हिन्दी विभाग द्वारा वार्षिक उत्सव ‘अभिधा 2012’ का आयोजन 30 मार्च, 2012 से कि‍या जा रहा है। हिन्दी साहित्य सभा द्वारा आयोजि‍त इस दो दिवसीय समारोह की शुरुआत शुक्रवार सुबह 10 बजे से होगी। सभा के परामर्शदाता डॉक्‍टर रामेश्‍वर राय ने बताया कि  ‘कृति का पुनर्पाठ’ शीर्षक से आयोजि‍त पहले सत्र में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्द कृति ‘यशोधरा’ पर दिल्ली विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर गोपेश्‍वर सिंह एवं सुविख्यात समालोचक प्रोफेसर निर्मला जैन विचार रखेंगे। दूसरे सत्र में दोपहर में निराला की अमर कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ पर युवा कवि-आलोचक एवं इग्नू में सह आचार्य जितेन्द्र श्रीवास्तव तथा वरिष्ठ कवि पंकज सिंह विचार रखेंगे।

समारोह के दूसरे दिन ‘लेखक से मुलाक़ात’ के अंतर्गत सुबह पहले सत्र में विख्यात कथाकार-नाटककार असगर वजाहत अपनी रचनाओं का पाठ करेंगे तथा युवा विद्यार्थियों से बातचीत भी करेंगे। इस दिन के दूसरे सत्र में दोपहर दो बजे विजयेन्द्र स्नातक स्मृति भाषण प्रतियोगिता में इस बार का विषय ‘निज पर शासन फिर अनुशासन’ रखा गया है। इस अंतरमहाविद्यालयीय  प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय व तृतीय आने वाले प्रतिभागियों को नकद राशि और प्रमाण पत्र दिये जायेंगे।

डॉ. राय ने बताया कि इस दो दिवसीय आयोजन में युवाओं के लिए पुस्तक एवं लघु पत्रिका प्रदर्शनी भी आयोजि‍त की जायेगी। इस आयोजन के लिए हिन्दी अकादमी ने सहयोग प्रदान किया है।

हिन्‍दी एक भाषा संसार : उदय नारायण सिंह

स्‍पेन के वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय में आयोजि‍त ‘यूरोपीय हि‍न्‍दी संगोष्‍ठी’ की संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक और विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीश चंद्र जैसवाल की रि‍पोर्ट-

स्‍पेन : यूरोप के विभिन्न देशों में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण की स्‍थि‍ति‍ पर वि‍चार-वि‍मर्श के लि‍ये वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय, स्‍पेन में 15, 16 और 17 मार्च, 2012 को ‘विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य’ वि‍षय पर संगोष्‍ठी का आयोजन कि‍या गया। इसमें भारत सहित 21 देशों के 33 विद्वान सम्मिलित हुये।

संगोष्ठी का उद्घाटन वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय के उपकुलपति, स्पेन में भारत के राजदूत, वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय की डिप्टी डीन, कासा दे ला इण्‍डि‍या के निदेशक तथा संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक ने दीप प्रज्ज्वलन से किया। इसके बाद भारत सरकार के विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा का संदेश पढ़ा गया। विश्‍वविद्यालय के उपकुलपति प्रोफेसर मार्कोस साक्रिस्तान ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि प्रागैतिहासिक काल से ही वय्यादोलिद शहर तथा विश्‍वविद्यालय पर एशिया का प्रभाव पड़ा है। इन देशों की संस्कृति के प्रभाव से इस विश्‍वविद्यालय में एशियाई अध्ययन की परम्परा का सूत्रपात हुआ। वर्ष 2000 में एशियन स्टडीज़ सेंटर की स्थापना हुई । इस सेंटर ने भारत सरकार के विदेश  मंत्रालय के सौजन्य से यह संगोष्ठी आयोजित की। भारतीय दूतावास माद्रिद और कासा दे ला इण्‍डि‍या के पूर्ण सहयोग से ही स्पेन में  पहली संगोष्ठी का सफल आयोजन हुआ।

मुख्‍य अति‍थि‍ स्पेन के भारतीय राजदूत सुनील लाल ने अपने भाषण में हिन्‍दी की संपन्न परम्‍परा का ज़िक्र करते हुए बताया कि अन्य भारतीय भाषाओँ के सम्‍पर्क में आने के कारण हिन्‍दी स्वयं लाभान्वित हुई है तथा उसने उन्हें भी लाभान्वित किया है। भारत की 22 स्वीकृत भाषाएँ उसकी बहुभाषिकता स्थिति को द्योदित करती हैं  तथा राजभाषा के माध्यम से भारत की अनेकता में एकता परिलक्षित होती है। विश्‍व का सबसे  बड़ा प्रजातंत्र भारतवर्ष 2050 तक सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था के रूप में उभरेगा और अन्तरराष्ट्रीय कार्य बल में महत्वपूर्ण भारतीय साझेदारी के कारण हिन्‍दी अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित होगी।

विश्‍व भारती, कोलकाता, भारत के प्रोवाइस चांसलर प्रोफेसर उदय नारायण सिंह ने ‘नया शतक नई दिशा- भारतीय भाषाओँ के शिक्षण की समस्याएं और संभावनाएं’ विषय पर बीज वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक भाषा की अपनी पहचान होती है और उसके पठन-पाठन की अपनी समस्याएं होती हैं। भारतीय बहुभाषिकता के वातावरण में हिन्‍दी पर अन्य भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। अंग्रेज़ी, स्थानीय भाषाएँ और  बोलियाँ हिन्‍दी की शब्दावली और अक्सर संरचना को भी प्रभावित करती हैं। हिन्‍दी के विदेशी अध्येताओं को इसका ज्ञान अवश्य देना चाहिये। उन्हें भारतीय व्यवहार की स्थिति से अवगत कराना आवश्यक है। हिन्‍दी एक ओर मानक हिन्‍दी है, जो साहित्य में प्रयोग होती है तो दूसरी ओर बोलचाल की मिश्र हिन्‍दी है, जिसका प्रयोग आम जनता करती है और उसे टेलिविज़न पर भी देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में यह समझना आवश्यक है कि हिन्‍दी एक भाषा संसार का नाम है, सीमित क्षेत्र का वाचिक संप्रेक्षण माध्यम मात्र नहीं। हिन्‍दी भाषा शिक्षण के क्षेत्र में सम्प्रति हमारे समक्ष  अनेक प्रकार की चुनौतियाँ हैं, जिसके लिये हमें कुछ अनोखे और असाधारण ढंग से सोचने-विचारने की आवश्यकता है।

प्रोफेसर श्रीश चंद्र जैसवाल

संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक, वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर श्रीश चंद्र जैसवाल ने संगोष्ठी के आयोजकों की ओर से भारत सरकार के विदेश मंत्री का उनकी शुभकामनाओं के लि‍ये आभार व्यक्त कि‍या। उन्‍होंने वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय के रैक्टर प्रोफेसर मार्कोस साक्रिस्तान, वाइस रैक्टर प्रोफेसर लुईस सांतोस, एशियन स्टडीज़ सेंटर के प्रोफेसर ऑस्कर रामोस्त, कासा दे ला इण्‍डि‍या के निदेशक डॉक्‍टर गियर्मो आदि‍ को सहयोग के लि‍ये धन्‍यवाद दि‍या। उन्होंने पूर्व भारतीय राजदूत सुजाता मेहता तथा  नये राजदूत सुनील लाल, काउंसलर बिराजा प्रसाद, सांस्कृतिक सचिव पोलोमी त्रिपाठी तथा काउंसलर पिल्लै को आभार व्यक्त कि‍या। अंत में प्रोफेसर जैसवाल ने संगोष्ठी में 21 देशों से आये हुए सभी गणमान्य प्रतिभागियों का हार्दिक धन्यवाद किया।

संगोष्ठी के प्रथम शैक्षिक सत्र ‘पश्‍चि‍मी तथा मध्य यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’ की अध्यक्षता टेक्सस विश्‍वविद्यालय, ऑस्टिन, अमेरिका के प्रोफसेर हर्मन वैन ऑलफ़ेन ने की। इस सत्र में छह आलेख पढ़े गये।

लिस्बन विश्‍वविद्यालय, पुर्तगाल के प्रोफेसर अफज़ाल अहमद ने पुर्तगाल में हिन्दी शिक्षण का इतिहास बताते हुये आग्रह किया कि विद्यार्थियों को हिन्दी के ज्ञान के साथ-साथ भारत की विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्टता का ज्ञान भी कराया जाना चाहिये।

विएना विश्‍वविद्यालय, ऑस्ट्रिया  की वरि‍ष्‍ठ लेक्‍चरर अलका ऐत्रय चुडाल ने विएना में हिन्दी शिक्षण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य सामने रखा तथा वर्तमान पाठ्यक्रम की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वहाँ के विद्यार्थी योग, शास्त्रीय संगीत और भारतीय नृत्य से आकर्षित होकर बारीकी से उन्हें समझने के लिए हिन्दी पढ़ते हैं।

रोम विश्‍वविद्यालय, इटली की  अलेस्सान्द्रा कोंसोलारो ने इटली में हिन्दी शिक्षण की जानकारी देते हुए इस तथ्य पर बल दिया कि विद्यार्थियों को हिन्दी के माध्यम से भारतीय संस्कृति में प्रवेश मिल जाता है। उन्होंने बताया कि इटली के व्यापारिक निगमों में हिन्दी का ज्ञान रखने वाले विद्यार्थियों को रोज़गार के अवसर भी मिल रहे हैं।

यॉर्क विश्‍वविद्यालय, इंग्‍लैंड के ऑनरेरी फ़ैलो महेंद्र किशोर वर्मा ने मानक हिन्दी या प्रामाणिक हिन्दी पर अपने आलेख में पाठ्य सामग्री चयन और पाठ्य सामग्री की रचना के विषय से सम्‍बन्‍धि‍त बिन्‍दुओं पर प्रकाश डाला। उनके अनुसार भारत में हिन्दी के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखते हुए मानक हिन्दी तथा प्रामाणिक हिन्दी के महत्व की व्याख्या की जानी चाहिये।

घेंट विश्‍वविद्यालय, बेल्जियम के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रमेश चन्द्र शर्मा ने आग्रह किया कि हमें यूरोप के विश्‍वविद्यालयों में हिन्दी का एक सामाजिक वातावरण तैयार करना चाहिये, जिसमें एक ओर हिन्दी का भाषा वैज्ञानिक आधार हो, दूसरी ओर उसका एक सामाजिक आधार हो। उन्होंने एक ऐसे पाठ्यक्रम की आवश्यकता व्यक्त की, जो शब्द और संस्कृति दोनों का ज्ञान दे सके।

कासा एशि‍या, माद्रिद, स्‍पेन की हि‍न्दी प्राध्‍यापि‍का शेफ़ाली वर्मा ने स्पेन में  हिन्‍दी के अध्येताओं के समक्ष आनेवाली व्यावहारिक कठिनाइयाँ रखीं और उनके समाधान के लिये आग्रह किया I
‘भाषा प्रौद्योगिकी और हिन्‍दी शिक्षण में उसका अनुप्रयोग’ विषय पर आधारित दूसरे शैक्षिक सत्र की अध्यक्षता केन्द्रीय हिन्‍दी शिक्षण मंडल, आगरा, भारत के उपाध्यक्ष  प्रोफेसर अशोक चक्रधर ने की। इस सत्र के प्रारम्‍भ में श्रीश जैसवाल ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अध्ययन-अध्यापन तथा उसे विश्‍व भाषा के रूप में स्थापित करने के लिये कम्प्यूटर के अनुप्रयोग पर बल दिया।

अशोक चक्रधर ने कहा कि हिन्दी के प्रगामी प्रयोग के लिये भारत सरकार और विभिन्न संस्थानों को ही उत्तरदायी न माना जाये, वरन व्यक्तिगत स्तर पर इसके लिये प्रयास किये जायें। अपनी रोचक और प्रभावी पावर पौइन्ट प्रस्तुति के माध्यम से उन्होंने कंप्यूटर पर उपलब्ध आधुनिकतम अनुप्रयोग दिखाये, जो हिन्दी शिक्षण के लिए नितांत उपयोगी हैं। हिन्दी के मानकीकरण के सम्‍बन्‍ध में सभी के प्रयासों का स्वागत करते हुये उन्होंने कहा कि हमें अशुद्धियों को छोड़कर प्रबुद्धि पर ध्यान  देना चाहिये।

तेलेविव विश्‍वविद्यालय, इजरायल में हि‍न्‍दी प्राध्‍यापक गेनादी श्‍लोम्‍पर ने हिन्दी पाठ्य सामग्री निर्माण में टेलिविज़न व रेडियो आदि के महत्व पर प्रकाश डाला। टी.वी. समाचार के आधार पर हिन्दी शिक्षण सामग्री तैयार करते हुये उन्होंने चुनाव, सामाजिक आंदोलन, अन्तरराष्ट्रीय सम्‍बन्‍ध, खेलकूद आदि विषयक समाचारों को तथा भाषा की रोचकता और सुग्राह्यता को महत्व दिया।

एमेरेटस, टेक्सस विश्वविद्यालय, ऑस्टिन, अमेरिका के प्रोफेसर हर्मन वैन ऑल्फेन ने अमेरिका में हिन्दी शिक्षण सम्‍बन्‍धी इतिहास का परिचय देते हुये कहा कि भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की संख्या में वृद्धि होने के कारण 1985 के बाद वहाँ हिन्दी शिक्षण का तेज़ी से प्रसार हुआ। उन्होंने पिछले पचास वर्षों में हिन्दी भाषा शिक्षण में प्रौद्योगिकी के प्रयोग का वर्णन करते हुये आधुनिक युग में उसकी उपयोगिता और नवीनतम विकासों के अनुप्रयोग पर बल दिया।

केम्ब्रिज विश्‍वविद्यालय, इंग्लैंड में हि‍न्‍दी प्राध्‍यापक ऐश्‍वर्य कुमार ने बताया कि यूरोपीय आर्थिक मंदी हिन्दी के पठन-पठान पर प्रभाव डाल रही है। हिन्दी के प्रति खुद हिन्दी भाषियों या भारतीयों की सोच मौजूदा स्थिति की जिम्मेदार है। इस मानसिकता को बदलना होगा।

लंदन, इंग्‍लैंड नि‍वासी चर्चित लेखि‍का कविता वाचक्नवी ने भाषा प्रकार्यों के अधुनातन सन्दर्भ और हिन्दी विषय पर अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने वैश्‍वीकरण के सकारात्मक पक्षों के ऊपर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि हिन्दी विश्‍व में दूसरी सबसे बड़ी भाषा है, किन्तु इंटरनेट आदि माध्यमों के प्रयोग में अन्य भाषाभाषियों से काफ़ी पीछे है। उन्होंने हिन्दी भाषा समाज के लिये उपलब्ध सॉफ्टवेयर की विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि तकनीकी दृष्टि से हिन्दी को कंप्यूटर की चुनौती व प्रयोक्ता– सापेक्ष होने की यात्रा में बहुत आगे जाना अभी शेष है।

तृतीय शैक्षिक सत्र ‘शेष यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’ पर केन्‍द्रि‍त था। इस सत्र की अध्‍यक्षता पश्‍चि‍म व पूर्व यूरोपीय विश्‍वविद्यालय, नैदरलैंड के प्रोफेसर मोहन कान्त गौतम ने की।
इस सत्र के पहले वक्तव्य में  स्लोवेनिया विश्‍वविद्यालय, स्‍लोवोनि‍या के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर अरुण प्रकाश मिश्र ने अपने विश्‍वविद्यालय में  हिन्दी अध्यापन की विस्तृत जानकारी देते हुये बताया कि वहाँ के विद्यार्थियों को व्याकरण आदि विषयों के  साथ-साथ भारतीय संस्कृति का भी ज्ञान दिया जाता है। शीघ्र ही वहाँ भारतीय अध्ययन प्रकोष्ठ को वैधानिक मान्यता मिलेगी और उसके साथ ही हिन्दी शिक्षण में तीव्र गति से प्रगति होगी।

ज़ाग्रेब विश्‍वविद्यालय, क्रोएशिया में हि‍न्‍दी प्राध्‍यापक बिल्जाना ज्रनिक ने अपने विश्‍वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण और हिन्‍दी विभाग की अन्य गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए अपने विद्यार्थियों की भाषा अधिगम सम्बन्धी समस्याएँ सामने रखीं तथा यह भी बताया कि वह कैसे उनका निदान करती हैं I

वारसा विश्‍वविद्यालय, पौलेण्ड के प्रोफेसर वादानूता स्तासिक ने विश्‍वविद्यालय में हिन्दी के नियमित अध्ययन-अध्यापन की चर्चा करते हुये बताया कि अब तक 90 विद्यार्थियों को हिन्दी एम.ए. की डिग्री मिल चुकी है। उन्होंने कहा कि हिन्दी हमारा भरण-पोषण करते हुए भूमंडलीकृत दुनिया में अपनी पहचान को भी स्थापित करने में सहायता देती है।

उप्साला विश्‍वविद्यालय, स्वीडन के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हैंज़ वर्नर वेसलर ने विश्‍वविद्यालय में हिन्दी व संस्कृत के इतिहास का उल्लेख करते हुये कहा कि वहाँ हिन्दी शिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका है। वहाँ के विद्यार्थियों में हिन्‍दी मीडिया में अधिक दिलचस्पी है ।

मॉस्को विश्‍वविद्यालय, रूस में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर इंदिरा गाज़िएवा ने रूसी सरकारी मानविकी विश्‍वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण का चित्र उपस्थित करते हुये अध्यापन में आने वाली कठिनाइयों का ज़िक्र किया।

मॉस्को स्टेट विश्‍वविद्यालय, रूस  में एसोसि़एट प्रोफ़ेसर ल्युदमि‍ला खोख्लोवा ने बताया कि साम्यवादी काल में विद्यार्थियों को हिन्दी के माध्यम से पार्टी साहित्य पढ़ाया जाता था, लेकिन रूस के पुनर्गठन के बाद हिन्दी शिक्षण पद्धति बदल गयी। विद्यार्थियों की भारतीय संस्कृति, धर्म में बहुत जिज्ञासा है और उनके अनुसार उनके विश्‍वविद्यालय में हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है।

बुखारेस्‍ट विश्‍वविद्यालय, रूमानि‍या की लेक्‍चरर सबीना पोपर्लान ने बताया के वहाँ भारतीय दर्शन और चिंतन के अध्ययन की एक परम्‍परा रही है। उनके विश्‍वविद्यालय में भारतीय संस्कृति पर कई किताबें लिखी गई हैं। ज़्यादातर शोध कार्य भाषा विज्ञान से सम्‍बन्‍धि‍त होता है।

एल्ते विश्‍वविद्यालय, बुडापेस्ट, हंगरी की विज़िटिंग प्रोफ़ेसर विजया सती ने कहा कि हंगरी में तीन वर्षों का इंडोलॉजी अध्ययन कराया जाता है I यहाँ का मूल उद्देश्य सम्‍वाद है, जिसके माध्यम से संस्कृति और हिन्दी की जानकारी भी दी जाती है, भारतीय संस्कृति से जुड़े उपादानों का परिचय भी दिया जाता है। हिन्दी को रोज़गारपरक बनाने की कोशिश की जाती है।

मोहन कान्त गौतम ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि हिन्दी के विकास की प्रक्रियाओं को हमें देखना है।  हम इस क्षेत्र में आगे बढ़ते हुये मीडिया का उपयोग कर सकते हैं। हिन्दी को रोज़गारपरक बनाने की कोशिश होनी चाहिये। इससे हमारे यूरोपीय विद्यार्थी हिन्दी का प्रयोग अपने रोज़गार के लिये कर सकते हैं। हिन्‍दी भाषा का व्यावहारिक रूप अपनाना अधिक उपयुक्त है।

संगोष्ठी का चतुर्थ शैक्षिक सत्र ‘हिन्दी शिक्षण तथा पाठ्यक्रम सम्‍बन्‍धी समस्याएं तथा समाधान’ महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा, भारत के वाइस चांसलर विभूति नारायण राय की अध्यक्षता में संपन्न हुआ I

सत्र के प्रारम्‍भ में वर्धा विश्‍वविद्यालय के नि‍देशक जगन्नाथन वी.आर. ने हिन्दी की दो प्रमुख समस्याओं– संदर्भानुसार उपयुक्त पाठ्यक्रमों व सन्दर्भ ग्रंथों की कमी और भाषा व भाषा शिक्षण दोनों ही क्षेत्रों में मानकीकरण के अभाव को सामने रखा। उन्होंने लचीले, समस्तरीय और गुणता वाले पाठ्यक्रम के निर्माण पर बल दिया, जिसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जा सके और जो घटत्व के सिद्धांत का पालन करे। इस प्रकार सभी शैक्षिक संस्थाएं मानकीकरण के मंच पर एकत्र होकर देश-विदेश के विद्वानों द्वारा निर्मित पाठ्य सामग्री का लाभ ले सकेंगी।

जवाहर लाल नेहरू वि‍श्‍ववि‍द्यालय, भारत के प्रोफेसर वैश्ना नारंग ने विदेशी भाषा के शिक्षण और  भाषा को दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाने के पक्षों के भेद उभारने का प्रयास किया। उन्होंने यूरोपीय सन्दर्भों में हिन्दी भाषा अध्ययन–अध्यापन प्रक्रिया के आधार पर हुये विदेशी भाषा अधिगम के अंतर्गत संज्ञान प्रक्रिया को स्पष्ट किया।

वारसा विश्‍वविद्यालय, पोलैंड के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर कैलाश नारायण तिवारी ने हिन्दी भाषा और साहित्य पढ़ाने के लिए विभिन्न विश्‍वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की विभिन्नता को समाप्त करते हुये एक उच्च स्तरीय मानक पाठ्यक्रम के निर्माण की बात कही, जिसमें उन्होंने भारतीय तथा विदेशी विद्वानों के पूर्ण सहयोग पर बल दिया ।

प्रोफेसर नवीन चन्द्र लोहानी

लूसान विश्‍वविद्यालय, स्विट्ज़रलैंड के नवीन चन्द्र लोहानी  ने ‘हिन्दी साहित्य शिक्षण के लिये आलोचना मानदंडों की मुश्किलों’ पर चर्चा करते हुए बताया कि हिन्दी साहित्य को समझने के मानदंड संस्कृत, काव्य शास्त्र, पाणिनि व्याकरण तथा विश्‍व के आलोचनाशास्त्रों से प्राप्त वैचारिकी द्वारा मिले हैं।
सोफ़िया विश्‍वविद्यालय, बल्‍गारि‍या के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर नारायण राजू वी.एस.एस. सिरीवुरी ने हिन्दी शिक्षण में भारतीय सांस्कृतिक एवं सामाजिक सन्दर्भ का महत्व स्थापित किया।

लिस्बन विश्‍वविद्यालय, पुर्तगाल में लेक्‍चरर शिवकुमार सिंह ने पुर्तगाल में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण व्यवस्था से सम्‍बधि‍त चुनौतियों को प्रस्तुत किया। उन्होंने हिन्दी सीखने की प्रेरणा और शिक्षण पद्धतियों का ज़िक्र करते हुये सांस्कृतिक सन्दर्भों के महत्व को दर्शाया तथा यूरोप की स्थानीय भाषाओं में हिन्दी शिक्षण संसाधन तैयार करने पर बल दिया।

हैम्बर्ग विश्‍वविद्यालय, जर्मनी की तात्याना ओरन्स्कया ने हिन्दी शिक्षण के सम्‍बन्‍ध में विश्‍व हिन्दी दिवस के महत्व के बारे में विचार रखते हुए उसकी सकारात्मक भूमिका को स्वीकार किया तथा बताया कि यूरोपीय विश्‍वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षण की समस्या के मूल में भारत की गृहभाषा- राजनीति ही नहीं, बल्कि अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक तथ्य भी हैं।

कासा एशिया, बार्सीलोना, स्पेन  में हिन्दी प्राध्यापक दीप्ति गुलानी ने स्पेन में हिन्दी भाषा अध्ययन की अपेक्षाओं और कठिनाइयों पर प्रकाश डाला। उन्होंने हिन्दी शिक्षण की व्यावहारिक समस्याओं का उल्लेख किया और बताया कि स्पेन में हिन्दी के प्रति दिलचस्पी बढ़ रही है।

इस सत्र के अंतिम वक्‍ता प्रोफेसर मोहन कान्त गौतम ने यूरोप में हिन्दी अध्ययन की विस्तृत  समस्याएं और उनके समाधान पर अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यूरोपियन संसद यूरोप में प्रचलित सभी भाषाओं को मान्यता प्रदान करेगी और हिन्दी भाषा तथा इसका विशाल साहित्य यूरोप की सभ्यता को और अधिक संपन्न करेगा।

संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर उदय नारायण सिंह ने की। इस सत्र में चारों शैक्षिक सत्रों की रिपोर्ट क्रमशः विजया सती, शिव कुमार सिंह. रमेश शर्मा तथा ऐश्‍वर्य कुमार ने प्रस्तुत की। इसके बाद संगोष्ठी में उठे सभी मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई और अंत में संगोष्ठी की ओर से की जाने वाली संस्तुतियों पर विचार-विमर्श हुआ। गम्‍भीर चिंतन और पारस्परिक विचार विनिमय के बाद सर्वसम्मति से विदेश मंत्रालय  के समक्ष निम्नलिखित संस्तुतियों को रखने का निर्णय हुआ–
1. आठवें विश्‍व हिन्दी सम्मेलन, न्यूयॉर्क  की प्रमुख संस्तुति–‘अन्तरराष्ट्रीय मानक हिन्दी पाठ्यक्रम’ की परियोजना को क्रियान्वित किया जाये और उसमें हिन्दी के सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों का समावेश किया जाये।
2. विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण में संलग्न भारतीय एवं भारतेतर प्राध्यापकों को भाषा शिक्षण प्रविधि, साहित्य शिक्षण प्रविधि, हिन्दी व्याकरण, हिन्दी का सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ आदि विषयों में प्रशिक्षित किया जाये।
3. यूरोप में इस प्रकार की शैक्षिक संगोष्ठियाँ विदेश मंत्रालय के सहयोग से हर दो वर्ष में  नियमित रूप से आयोजित की जाएँ। वर्ष 2014 की यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी वारसा  विश्‍वविद्यालय में आयोजित करने का प्रस्ताव है।
4. पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक 24 घंटे का हिन्दी भाषा चैनल प्रारम्भ किया जाये, जिसमें हिन्दी की सभी प्रयुक्तियाँ उपलब्ध हों तथा वेब पर हिन्दी की विशाल सामग्री को एक स्थान पर हिन्दी अध्येताओं को उपलब्ध कराया जाये।
5. अंग्रेज़ी से इतर विदेशी भाषाओं को दृष्टि में रखकर मल्टीमीडिया सहित हिन्दी शिक्षण सामग्री का निर्माण किया जाये।
6. विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण के लिए स्नातकोत्तर स्तर का पाठ्यक्रम विकसित किया जाये।
7. भारतीय संस्कृत संबंध परिषद द्वारा विभिन्न विदेशी विश्‍वविद्यालयों में हिन्दी पीठों की संख्या में वृद्धि की जाये।
8. हिन्दी साहित्य एवं हिन्दी शिक्षण की उपयोगी पुस्तकें तथा मल्टी मीडिया सामग्री उन सभी विश्‍वविद्यालयों को विदेश मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराई जायें, जहाँ हिन्दी अध्ययन अध्यापन  की सुविधाएँ हैं।
9. अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय के डायनमिक पोर्टल पर वर्चुअल क्लास रूम की व्यवस्था की जाये, जिसके माध्यम से विदेशों में अध्ययनरत हिन्दी विद्यार्थियों को  हिन्दी साहित्य तथा हिन्दी भाषा के विद्वानों के विभिन्न विषयों पर व्याख्यान उपलब्ध कराये जायें।
10. विश्‍व में विदेशी भाषा के रूप में हिन्‍दी शिक्षण से सम्‍बन्‍धि‍त इन सभी संस्तुतियों के क्रियान्वयन के लिए विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, अन्तरराष्ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा और विश्‍व हिन्‍दी सचिवालय, मॉरिशस उत्तरदायित्व लें  तथा प्रभावी परियोजनायें बनायें।

समापन समारोह की अध्यक्ष एशियन स्टडीज़ की प्रोफेसर ब्लांका ने संगोष्ठी के सफल आयोजन पर बधाई दी। मुख्य अतिथि के रूप में विश्‍व हिन्दी सचिवालय, मॉरिशस की महासचिव पूनम जुनेजा ने संगोष्ठी की सार्थकता को रेखांकित किया। उन्होंने आश्‍वासन दिया कि विश्‍व हिन्‍दी सचिवालय संगोष्ठी द्वारा की गई संस्तुतियों पर अपेक्षित कार्रवाई करेगा। विशिष्ट अतिथि महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के उपकुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि संगोष्ठी द्वारा पारित सभी संस्तुतियों को क्रियान्वित करने का उत्तरदायित्व उनका विश्‍वविद्यालय लेता है। संगोष्ठी का समापन कासा दे ला इण्‍डि‍या के निदेशक डॉक्‍टर गियार्मो रोड्रगेज़ के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।

संगोष्ठी के पहले दिन चिंतन और वि‍चार मंथन के बाद शाम को कासा दे ला इण्‍डि‍या के सभागार में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें स्पेन के जिप्सी समुदाय के पारम्‍परिक नृत्य फ़्लेमेंको  को उसके भारतीय स्रोत से जोड़ने का प्रयास किया गया। इसके साथ ही भरतनाट्यम, कत्थक, हंस वीणा, तबला और मृदंगम एवं फ़्लेमेंको नृत्य और गायन का अन्तरराष्ट्रीय कलाकारों ने अद्भुत समागम किया। स्पेन की प्रसिद्ध भरतनाट्यम विशेषज्ञ मोनिका देला फुएंते ने हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘इस पार प्रिये तुम हो मधु है’ पर किया गया मोहक नृत्य दर्शनीय था।

श्रम और संघर्ष है बिहार की ऐतिहासिक पहचान

पटना में ‘शताब्दी वर्ष में बिहार: संघर्ष की विरासत-बदलाव की चाहत’ विषय पर आयोजि‍त सेमिनार पर लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की रि‍पोर्ट-

बिहार के सौ साल होने पर 22 मार्च से सरकार की ओर से जो तीन दिनी जश्‍न चले, उसके जरिये बिहार में ऐसा माहौल बनाया गया, मानो यहाँ हर चीज बेहतर हो गई है और चारों ओर खुशनुमा माहौल है। कला, संस्कृति, समाज और बौद्धिक क्षेत्र के बहुत कम ही लोग थे, जो सरकार के इस खेल से परे थे। सवाल यह है कि करोड़ों रुपये के खर्च से किस बिहारी अस्मिता और स्वाभिमान को इस सरकार ने मजबूत बनाया? एक शेर को थोड़ा बदल के कहने को जी चाहता है- तुम शौक से मनाओ जश्‍ने सौ साल सरकार, इस रोशनी में लेकिन कितने घर भी जल रहे हैं। यह महीना पहले मार्च लूट के नाम से जाना जाता था, इस बार मालूम नहीं जश्‍न के नाम पर कितनी लूट हो रही होगी! बिहार में मीडियाकर्मी, साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी इतने सत्तापरस्त तो कभी नहीं हुये थे। तरह-तरह के सम्मानों की खैरात बँट रही थी, लोकार्पण हो रहे थे, सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहे थे और लोग उसमें डूबते जा रहे थे। लेकिन बिहार सत्ताधारियों की सनक में जब नीले रंग में रोशनी में डूबाया जा रहा था, तब भी कुछ लोग ऐसे थे जो इसके पीछे मौजूद अंधेरे की शिनाख्त कर रहे थे।

22 मार्च को जब गाँधी मैदान में सरकार और प्रशासन जश्‍न की तैयारी में लगे हुये थे, उस वक्त उसी गाँधी मैदान के एक कोने पर आईएमए हॉल में छात्र संगठन ‘आइसा’ और इंकलाबी नौजवान सभा द्वारा आयोजित सेमिनार- ‘शताब्दी वर्ष में बिहार: संघर्ष की विरासत-बदलाव की चाहत’ में बिहार के बुनियादी बदलाव को लेकर गम्‍भीर विचार-विमर्श हो रहा था। सुबह-सुबह एक वरिष्ठ पत्रकार मार्निंग वॉक करते हुये मिले थे, जिन्होंने बताया कि आजकल बिहार में किस तरह मीडिया वही सबकुछ दिखाने को बाध्य है जो सरकार चाहती है, बाकायदा फोन करके पत्रकारों को निर्देशित किया जाता है कि किस तरह की खबरें छापनी हैं। जब हम सेमिनार में पहुँचे तो देखा कि वह पत्रकार भी मौजूद थे। सेमिनार में जाते वक्त दो तरह का बिहार साफ-साफ सड़कों पर दिख रहा था। एक बिहार था जो ऊँची बिल्डिंगों, लेटेस्ट मॉडल की गाडि़यों और विज्ञापनों के होर्डिंगों में दिख रहा था। जेपी की मूर्ति भी सरकार के विज्ञापनों से ढँक सी गई थी। दूसरी ओर ठेलेवाले, रिक्शेवाले आज भी सड़क किनारे खाना पका रहे थे। ठीक रेडियो स्टेशन के बगल में कुछ लोग फुटपाथ पर रहने को विवश थे। एक रिक्शेवाले का अंदाजा था कि पटना में 10000 लोग इसी तरह फुटपाथ पर सोते हैं। इधर पटना में बदलाव यह हुआ है कि दारू की दूकानें जगह-जगह दिख रही थीं, लेकिन हमेशा की तरह गरीबों और कम आय वालों के लिये सड़क किनारे खाना बनाकर बेचने वाले भी मौजूद थे। आखिर इस ‘बनते बिहार’ में वे रोजी-रोटी के लिये जायेंगे कहाँ! सेमिनार के बाद हमने भी अपनी भूख लिट्टी की ऐसी ही दूकान पर मिटाई।

सेमिनार में विषय प्रवर्तन करते हुये ‘समकालीन जनमत’ के प्रधान सम्‍पादक रामजी राय ने कहा कि बिहार में 58 प्रतिशत आबादी युवाओं की है और उनके लिये पिछले किसी भी दौर से ज्यादा महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार प्रचारित कर रही है कि रोजगार रुक गया है। तो सवाल यह है कि ये जो रेलगाडि़याँ इस तरह से भरी-भरी जा रही हैं  तो क्या उसमें लोग देश घुमने जा रहे हैं? दूसरा सवाल है बिहार की शिक्षा का। नालंदा और विक्रमशीला जैसे विश्‍वविद्यालय जहाँ कभी थे, उसकी शिक्षा की गुणवत्ता की बात तो दूर, सामान्य शिक्षा के लिये भी छात्र बिहार से बाहर जा रहे हैं। बिहारियों को बिहारी होने की शर्म कभी नहीं रही। बिहार अपने बारे में उतनी ही बेबाकी से बात करता रहा है, जितना दूसरों के बारे में। देश की राजधानी भले दिल्ली हो, पर देश में बदलाव की राजधानी पटना रही है। उन्होंने कहा कि बिहार की पहचान नागार्जुन जैसे कवि हैं, जिनकी जन्मशती गुजर गई, पर सरकार को उनकी याद नहीं आई। रामजी राय ने कहा कि बिहार में भाषा-निर्माण की जितनी ताकत है, उतनी कहीं और नहीं हैं। अपनी समस्याओं के समाधान के लिये उठ खड़ा होना और जनविरोधी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की चेतना बिहार की मूल चेतना है। बिहार में क्षेत्रवाद की प्रवृत्ति नहीं है, बल्कि बिहार में हमेशा संघर्षों की बड़ी एकता की पहल होती रही है। आज सरकार बनते बिहार का प्रचार कर रही है, पर इस बनते बिहार में रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। भ्रष्टाचार, घुसखोरी, महिलाओं का उत्पीड़न और अपराध तेजी से बढ़ रहा है। यह सरकार बिहार का नवनिर्माण नहीं कर सकती।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी ने एक मर्मबेधी कविता की तरह अपने वक्तव्य की शुरुआत की। वह उन चंद लोगों में से हैं, जो पिछले वर्षों में लगातार बिहार सरकार की आर्थिक नीति और विकास के मॉडल के खिलाफ मुखर रहे हैं। बिहार शताब्दी जश्‍न पर सवाल उठाते हुये उन्होंने कहा कि पटना को नीली रोशनी में डूबोकर जश्‍न मनाने वालों की निगाह उन सुदूर गाँवों पर नहीं है, जहाँ आज भी दीया नहीं जलता, चूल्हा 24 घंटे में एक बार ही जलता है, वे उन अस्पतालों में नहीं जाते जहाँ की कुव्यवस्था के कारण मरीज दम तोड़ देते हैं, उन संसाधनविहीन स्कूलों के विकास की उन्हें फिक्र नहीं है, जहाँ आम लोगों के बच्चे पढ़ते हैं। इस राज्य की बहुत बड़ी आबादी के विकास और उनकी जिंदगी में प्रकाश लाने की जिम्मेवारी से यह सरकार कन्नी काट चुकी है। बिहार में बदलाव का जो सरकार का दावा है वह बिल्कुल गलत है। आज बिहार के करीब बारह जिले खाद्य असुरक्षा से ग्रस्त हैं। कृषि, पशुपालन में नकारात्मक ग्रोथ हो रही है। बिहार में सिर्फ पाँच से दस प्रतिशत लोगों का विकास हो रहा है। पलायन बिल्कुल नहीं रुका है। सरकार झूठे दावे कर रही है। बिहार के 100 साल होने का जब जश्‍न मनाया जा रहा है तो सोचा यह जाना चाहिये कि जो 90 प्रतिशत आबादी है, वह इस जश्‍न में कहाँ है। किसान आंदोलनों ने बिहार में बुनियादी परिवर्तन का आधार तैयार किया था। आज विकास के लिये भूमि सुधार अनिवार्य है। लेकिन इस सरकार ने भूमि सुधार आयोग को रद्दी की टोकरी में डाल दिया है। कॉमन स्कूल सिस्टम को भी सरकार ने लागू करने से इनकार कर दिया है। शिक्षा की गुणवत्ता नष्ट हो रही है, शिक्षकों की गुणवत्ता खराब है। प्रोफेसर चौधरी ने बेहद क्षोभ के साथ कहा कि पूरी शिक्षा व्यवस्था अनैतिक, भ्रष्ट और चारित्रिक रूप से पतित लोगों के कब्जे में है, जिनमें से कुछ ने तो विश्‍वविद्यालयों को ऐशगाह बना दिया है। उन्होंने कहा कि आज कैबिनेट में कोई बहस नहीं होती। वर्तमान सरकार का पूरा रवैया अलोकतांत्रिक है। कमीशनखोरी, भ्रष्टाचार और लूट बढ़ी है, पूरा सिस्टम यहाँ चौपट हो चुका है। उन्होंने कहा कि बिहार शोषण व सामाजिक अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की धरती रही है। गौतम बुद्ध भी एक क्रांतिकारी थे। राजनीति, शासन, अर्थ हर स्तर पर बिहार के पास एक जो गौरवशाली विरासत है, वह कुछ व्यक्तियों की नहीं, बल्कि जनता की सामूहिक चेतना की विरासत है।

शिक्षाविद् विनय कंठ ने कहा कि आज उपलब्धियों का जो शोर सरकार मचा रही है, वह कृत्रिम और नकली है। बिहार की सरकार के पास कोई मौलिक दृष्टि नहीं है, बल्कि वह निजीकरण-उदारीकरण की आर्थिक नीतियों की ही नकल कर रही है। इससे भ्रष्टाचार और विषमता ही बढ़ेगी। जो भी विकास हो रहा है, उससे बहुसंख्यक समाज को कोई फायदा नहीं हो रहा है। जनता के लिये एक नई अर्थनीति की जरूरत है, जिसके लिए एक बड़ा राजनीतिक आंदोलन खड़ा करना होगा।

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने कहा कि आज बिहार में पत्रकारिता के आदर्शों पर चोट हो रही है। जनता की बुनियादी सुविधाओं की स्थिति बिल्कुल बदतर है, पर चमकते बिहार का सरकार खूब प्रचार कर रही है। करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन छप रहे हैं, जिनमें चार लाइन का विज्ञापन और मुख्यमंत्री की बड़ी तस्वीर होती है। सम्‍पादक से लेकर पत्रकार तक पर बंदिश है। आज बिहार में पत्रकारिता की सही दिशा का गम्‍भीर सवाल खड़ा हो गया है। उन्होंने कहा कि यह सेमिनार इस मायने में महत्वपूर्ण है कि एक ओर गाँधी मैदान में जहाँ सरकार जश्‍न में करोड़ों रुपये फूँक रही है, वहां दूसरी ओर यहाँ बिहार के वास्तविक बदलाव के लिये विचार-विमर्श हो रहा है।

पत्रकार श्रीनिवास ने कहा कि जिस तरह फ्राँस की क्रांति के समय वहाँ के राजा ने सरकस का खेल शुरू किया था, आज बिहार शताब्दी पर होने वाले जश्‍न उसी तरह की कोशिश है। लेकिन नीली रोशनी के पीछे के अंधेरे को यह सरकार लाख कोशिशों के बावजूद छिपा नहीं पायेगी। उन्होंने कहा कि बिहार की पत्रकारिता का उदय जनसंघर्षों से हुआ है। इस समय जो गड़बडि़यां सरकार कर रही है, उसका साथ देना पत्रकारिता की विरासत के खिलाफ है। ‘पीपुल वॉयस’ के सम्‍पादक डॉ. मुकेश ने कहा कि बिहार की समस्या यह है कि यहाँ लगातार स्वप्नविहीन सरकारें आती रही हैं, जो सिर्फ नकारात्मक काम करती रही हैं। जो भी सकारात्मक बदलाव हुये हैं, वे जनता के संघर्षों और कुर्बानियों के जरिये हुये हैं। ‘बिहार टाइम्स’ के सम्‍पादक अजय कुमार ने कहा कि बिहार सरकार इंवेंट मैनेजमेंट की सरकार बनकर रह गई है। बिहार में 50 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गये, संसद में उस पर बहस भी हुई, पर वह खबर बिहार के किसी अखबार में नहीं है। ग्रोथ रेट में यह कैसी बढ़ोतरी है कि जिसके साथ गरीबी भी बढ़ रही है? विस्थापन भी 26 प्रतिशत बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि बौद्धिक सच को छुपाने का काम कर रहे हैं। बिहार में नागरिक समाज की चुप्पी पर उन्होंने चिंता जाहिर की।

भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि बिहार में सत्ता की बागडोर सामंती-सांप्रदायिक सोच के लोगों के हाथ में है जिनकी साम्राज्यवाद के साथ साठगांठ है। बिहार में भी सरकार साम्राज्यवादपरस्त नीतियों को ही लागू कर रही है, यहाँ कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ है। सरकार सिर्फ सत्ता-प्रबंधन, उपलब्धियों के फर्जी आंकड़ों और विज्ञापन तथा जनता के खजाने की लूट में लगी हुई है, जबकि राज्य में गरीबों की संख्या, बेरोजगारी और मजदूर-किसानों की बदहाली लगातार बढ़ती जा रही है। आज भी यहाँ रोजगार और मजदूरी का सवाल उठाने पर दमन हो रहा है, नाबालिग बच्चियों का बलात्कार और हत्या का विरोध करने वालों की हत्या हो रही है, बुद्धिजीवियों द्वारा सवाल पूछने पर उन्हें सत्ता द्वारा चुप कराया जा रहा है, मीडिया की स्वतंत्रता छीन ली गई है। भूमि सुधार से आतंकित होना ही इसका संकेत है कि अभी भी सत्ता, समाज, राजनीति और समाज की बनावट में सामंती सोच हावी है। न्यायपालिका के दोहरे मापदंड हैं, अमौसी जनसंहार में गरीबों को आजीवन कारावास और फाँसी दी जाती है और गरीबों के जनसंहार करने वाले और उनके राजनीतिक संरक्षक आज भी खुले घूम रहे हैं, आज भी उनके अपराध का धंधा चल रहा है, जबकि हमारे साथियों की आज भी हत्या की जा रही है। इसलिये बिहार में लोकतंत्र और जमीनी विकास का क्या होगा, यह सवाल इस वक्त ज्यादा महत्वपूर्ण है।

उन्‍होंने कहा कि अंग्रेजों से लेकर आज तक बिहार की सत्ता ने जनता की बदलाव और विकास की आकांक्षा का कुचलने का ही काम किया है। बिहार उनके लिये श्रम के शोषण-दोहन की प्रयोगशाला रहा है। इसी कारण शोषण के खिलाफ संघर्ष और बुनियादी तौर पर व्यवस्था को बदलने वाले क्रांतिकारी जनांदोलन भी बिहार में लगातार होते रहे हैं। श्रम और संघर्ष बिहार की मूल पहचान है। छोटी-छोटी चीजों के लिये भी बड़ी-बड़ी लड़ाइयां बिहार में छिड़ जाती रही हैं। यहाँ बदलाव का संघर्ष अपने अंतर्वस्तु में व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव की मांग करता है। वामपंथी आंदोलन में भी इसीलिये बिहार क्रांति की निरंतर कोशिशों के लिये जाना जाता रहा है। बिहार में आज आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक तौर पर आगे बढ़ने की परिस्थितियां हैं, पर इसके लिए वर्तमान यथास्थितिवादी सत्ता जिसने बदलाव का झूठा भ्रम खड़ा किया है, उसे बदलना बेहद जरूरी है और उसे बदलने का काम यहाँ के नौजवान, छात्र, मजदूर और किसान ही मिलकर कर सकते हैं। जनता की जो बदलाव की विरासत और संघर्ष की ताकत है, उसको आगे बढ़ाना आज बेहद जरूरी है।

सेमिनार में इनौस के राष्ट्रीय महासचिव कमलेश शर्मा, आइसा के राज्य सचिव अभ्युदय, इनौस के राज्य सचिव नवीन कुमार, अरुण नारायण, युवा कवि मनोज कुमार झा, सजल आनंद, राजेश कमल, कथाकार शेखर, प्रो. तरुण कुमार, एडवोकेट मनोहर लाल, रत्नेश, रंगकर्मी संतोष झा, सुरेश कुमार ‘हज्जू’, माले नेता कृष्णदेव यादव, संतोष सहर, एपवा नेत्री अनीता सिन्हा समेत सैकड़ों गणमाण्य नागरिक, छात्रा-युवा मौजूद थे।

एक बहुत प्यारे और संवेदनशील लेखक का जाना : प्रकाश मनु

वरि‍ष्‍ठ कथाकार द्रोणवीर कोहली का 24 जनवरी, 2012 को देहांत हो गया। कथाकार प्रकाश मनु का आलेख-

निराले अंदाज वाले लाजवाब कथाकार द्रोणवीर कोहली (1932-2012) का जाना हिन्‍दी साहित्य से जुड़े सभी लेखकों और पाठकों को उदास कर देने वाली खबर है। वह इतने प्यारे, खरे लेखक और खरे इनसान थे कि हमारे दौर के प्राय: हर पीढ़ी के लेखक के पास उनके एक से एक अछूते संस्मरण और यादें होंगी। सन् 1932 में रावलपिंडी के निकट एक गाँव में जन्‍में द्रोणवीर कोहली ने ‘टप्पर गाड़ी’, ‘चौखट’, ‘तकसीम’, ‘वाह कैंप’ और ‘नानी’ सरीखे उपन्यास और एक से बढ़कर एक कहानियाँ लिखीं। बड़े अद्भुत वैचारिक लेख भी। उनकी डायरी, संस्मरण, रिपोर्ताज और यहाँ तक कि अनुवाद में भी ऐसा अनोखा रस था कि जो कुछ भी वह लिखते, उनमें उनकी मुस्‍कराती हुई निर्मल आँखें और सचेत शख्सियत दूर से नजर आ जाती थी। वह उन बिरले लेखकों में से थे जिनके लेखों, कहानियों और उपन्यासों पर उनका नाम न हो, तो भी हमें पहचानने में जरा भी देर न लगती थी कि भाषा का यह प्यारा और निराला अंदाज तो द्रोणवीर कोहली का ही हो सकता है। ‘आजकल’ के सम्‍पादन में भी उन्होंने बेशक यही मिसाल कायम की। हिन्‍दी के कई पीढ़ियों के जाने-माने और ऊर्जावान लेखकों को जोड़कर उन्होंने ‘आजकल’ को फिर से समकालीन दौर की, एक धड़कती हुई जीवंत और सतेज पत्रिका बनाया। एक ऐसी पत्रिका जो अपनी परम्‍परागत गरिमा को बनाये रखकर भी, समकालीन दौर की नई सम्‍वेदना और हलचलों से जुड़ती है, और कुछ अलग अंदाज में कीर्ति-शिखर रचती हुई हिन्‍दी साहित्य की प्रतिनिधि पत्रिका साबित होती है।

यों द्रोणवीर कोहली का उपन्यासकार रूप मेरे खयाल से उनकी सृजन-यात्रा में सबसे ऊँचा शिखर और मयार बनाता है। वह सही मानी में हमारे दिलों में पैठ करने वाले बड़े उपन्यासकार थे। ऐसे उपन्यासकार, जो हर बार किसी नई जमीन पर उपन्यास लिखते हैं और जिस परिदृश्य को उठाते हैं उसके बारे में पूरी जानकारी हासिल करके तथा पूरी तरह डूबकर लिखते हैं। उनके बारे में जब भी सोचो, हमेशा एक खरे लेखक की तसवीर आँख के आगे बनती नजर आती है। शायद इसीलिए कोहली जी के उपन्यासकार की सबसे बड़ी खासियत बताने के लिये कहा जाये तो मुझे एक क्षण भी नहीं लगेगा। यह निस्संदेह उनकी विश्‍वसनीयता है, जिसके कारण उनके उपन्यास हमें अपने आसपास की दुनिया और खुद अपने भीतर के विचार-संसार या सोच में हस्तक्षेप करते लगते हैं। मुझे याद है, उनके उपन्यास ‘वाह कैंप’ की खासी चर्चा हुई थी। ‘वाह कैंप’ को विभाजन के दौर पर लिखा गया हिन्‍दी का एक महत्वपूर्ण दस्तावेजी उपन्यास बताते हुए मैंने लेख लिखा, तो उन्हें स्वाभाविक प्रसन्नता हुई थी। उन्होंने बताया कि उनके अपने विस्थापित जीवन के बहुत-से मार्मिक और बेधक प्रसंग इस उपन्यास में नत्थी हो गये हैं। यों एक तरह से ‘वाह कैंप’ उनका आत्मकथात्मक उपन्यास ही है। बेशक विभाजन के काले दिनों पर लिखा गया यह एक करुण और यादगार उपन्यास है, जिसकी तुलना ‘झूठा सच’ और ‘तमस’ जैसे सदी के बड़े और कालजयी उपन्यासों से की जा सकती है। यह ‘झूठा सच’ और ‘तमस’ जैसे बड़े उपन्यासों की परम्‍परा को आगे बढ़ाने वाली एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है और इसकी विशिष्टता इस बात में है कि यह उपन्यास एक किशोर की आँखों से देखे गये महाभारत की शक्ल में उस जमाने का कच्चा चिट्ठा हमारी आँख के आगे रख देता है। हालाँकि द्रोणवीर कोहली के उपन्यासकार का ‘विजन’ इतना बड़ा और साफ है कि जब वह इन कारुणिक प्रसंगों को लिख रहे होते हैं, तो इतिहास के लहू सने पृष्ठ तो सामने आते हैं, मगर वे नफरत नहीं, एक बड़ी त्रासदी की करुणा और कसक ही उभारते हैं।

‘वाह कैंप’ के बाद लिखा गया ‘नानी’ कोहली जी का एकदम अलग मिजाज का उपन्यास है। और दो भिन्न संस्कृतियों, बल्कि दो ध्रुवांतों को टकराव और झंझावत के बीच आ फँसे, जिस ‘काल फलक’ पर उन्होंने उस उपन्यास की रचना की है, जाहिर है, वह गहरी उत्सुकता तो मन में जगाता ही है। मोटे शब्दों में ‘नानी’ उपन्यास एक हिन्‍दुस्तानी नानी की कहानी है जो पराई दुनिया में जाकर उसकी भूल-भुलैया में ऐसा फँसती है कि अकसर चक्कर पर चक्कर खाती और छोटे-बड़े  सुख-दुखों की कारा में फँसकर कई बार तो बेतरह वेदना और पीड़ा से कराहती नजर आती है। हालाँकि अमरीका की बेशुमार पैसे और समृद्धि से लदी-फदी इस चमकदार दुनिया के तिलिस्म में वह गई खुद थी। कहा जा सकता है कि नानी यानी सरस्वती के इर्द-गिर्द मोह और ममता के जो कोमल तंतु हैं, वे ही जाने-अनजाने उसे वहाँ ले जाने के लिए बाध्य करते हैं। शुरू-शुरू में एक नई दुनिया में पाँव रखने का सुख और रोमांच भी है। फिर अमरीका के साथ भूमण्‍डलीकरण की जोर-शोर की आँधी और जिस तरह का महिमा वर्णन और गौरवान्विति जुड़ गई है, उससे अमरीका जाना शुरू-शुरू में उन्हें शायद कुछ-कुछ ‘सपनीला’ भी लगा हो। किसी सपने के पूरे होने जैसा अनुभव। भारत जैसे गरीब देश की आँख से अमरीका शायद ऐसा ही लगता है।

लेकिन नानी को अमरीका ले जाने वाली मुख्य बात यह नहीं थी। मुख्य बात यह थी कि बेटी चेतना और दामाद श्याम रतन वहाँ थे और एक छोटी-सी दोहती तुला वहाँ थी, जिसकी शरारतें किसी को भी मुग्ध करने के लिये काफी हैं। और इससे भी बढ़कर तो यह कि बेटी और दामाद जो दोनों ही अमरीका में डॉक्टर हैं—के दाम्‍पत्य जीवन में यह एक नये आने वाले मेहमान की तैयारी का समय है। अमरीका में पैसे और समृद्धि की अंधी दौड़ चाहे जितनी हो, लेकिन यह समय किसी की दंपति के लिये सबसे अधिक नाजुक है। ज्यादातर तो पति-पत्नी दोनों ही काम पर जाते हैं। इसलिए प्रसव के कुछ ही समय बाद अबोध शिशु को ‘नैनी’ या परिचारिका के भरोसे छोड़कर जाना होता है। ऐसे ही समय वहाँ बसे भारतीयों को अपने देश और जड़ों की याद आती है और भारतीय जीवन की सहजता और ममता भी।

तो ममता के वे कोमल और बारीक डोरे ही थे, जो नानी यानी सरस्वती को चुपके से बाँधकर हजारों मील दूर एक पराई जमीन की कारा में ले आये। वह आ तो गई, लेकिन जीवन भर साथ रहे अपने भारतीय संस्कारों और जीवन शैली का क्या करे? रातों-रात भला कैसे बदल जायें वे। और उस सब को कैसे स्वीकार कर ले, जो उसके सहज जीवन प्रवाह का हिस्सा कभी था ही नहीं। लिहाजा नानी अलग जमीन ही नहीं, बल्कि एक अलग तरह की संस्कृति और बेगानेपन की कारा में अनचाहे ही जा पड़ती है, जहाँ वह चाहे लाख छटपटाती, दुखी और अपमानित होती रहती हो, लेकिन एक निश्‍चि‍त अवधि से पहले छूट नहीं पाती। उसका हर दिन कारा में एक और दिन काटने की तरह है। तुला को सँभालने के साथ-साथ नवागत शिशु ऋषि को सँभालना, दोनों को नहलाना-धुलाना, सफाई, दिन में कई-कई बार डायपर बदलने का काम, फिर उन्हें दूध पिलाना, हारी-बीमारी की चिंता करना और ऊपर से तुला की अटपटी जिदें। इस सबमें कई बार सरस्वती निढाल हो जाती है। उसके बूढ़े शरीर में अब भला इतनी जान भी कहाँ! ऊपर से जब-तब दामाद की झिड़कियाँ और तीखे कटाक्ष सुनने को मिलते हैं—यहाँ तक कि बेटी भी पति की ही भाषा बोलने लगती है। और सरस्वती को यह समझ में नहीं आता कि वह यहाँ आई किसलिये थी! लेकिन मोह-ममता का बंधन ऐसा है कि चाहे कितनी ही परेशानियाँ हों, लेकिन जब तक ऋषि कुछ बड़ा न हो जाये, अपना फर्ज अधूरा छोडक़र और बेटी की परेशानियों से छूटकर भला वह कैसे भारत लौट जाये?

यह दीगर बात है कि रोज-रोज ये सारे फर्ज पूरे करते हुए भी वह एक-एक दिन गिनती है कि कब वह उस जेलखाने से छूटेगी, जहाँ वह अपनी सहजता ही खो बैठी है। उसका मन बुझ गया है और बेटी और दामाद की झिड़कियाँ खा-खाकर वह इस घर में नानी कम, नैनी या परिचारिका ही अधिक बनकर रह गई है। बार-बार छुटकारा पाने की चाह के बावजूद सरस्वती उपन्यास के अंत में ही उस कैदखाने से छूट पाती है। छूटते वक्‍त फिर से भारत लौटते हुये उसकी जो मन:स्थिति थी, उसका वर्णन तो मुश्किल, बहुत मुश्किल है। बस उसकी कुछ करुण उक्तियों और आहों से ही उसका अंदाजा लगाया जा सकता है, जिसमें वह बार-बार अपने पति दीनदयाल से कटती है कि ‘मैं अब वह नहीं रही, मैं अब कुछ नहीं रही। मेरे भीतर बहुत-कुछ टूट गया है।’ या कि उसका बार-बार सोचना कि ‘मैं अब पहले जैसी कभी न हो पाऊँगी।’ यह भारतीय संस्कृति की सहज गरिमा में बड़ी हुई एक भारतीय स्त्री का पराई धरती पर जाकर अपनी ही बेटी और दामाद के घर में बार-बार टोके जाने और फटकारें खा-खाकर श्रीहीन हो जाना है। इसीलिये पति दीनदयाल जब मजाक में पूछते हैं कि क्या वह दुबारा यहाँ आना पसंद करेगी, तो सरस्वती जैसे कानों को हाथ लगाकर अकुलाकर कहती है, ‘नहीं, कभी नहीं।’

देखा जाये तो ‘नानी’ एक कथाहीन उपन्यास है, जिसमें अगर कोई कहानी है, तो वह महज यह कि अपने फर्ज या कर्तव्य के पाश में फँसी हुई नानी कितना कुछ सहती है। मगर फिर भी कठोर होकर एक बार भी वह ममता के इन कच्चे धागों को तोड़ती नहीं। यह नानी यानी सरस्वती की हिन्‍दुस्तानियत या भारतीयता है। इतना सहना कि वह तप लगे, कोई हिन्‍दुस्तानी स्त्री ही कर सकती है, पश्‍चि‍मी जीवन शैली और संस्कारों वाली स्त्री नहीं। लेकिन इस फर्ज को पूरा करने के पीछे सरस्वती जैसी एक प्रबुद्ध, संस्कारशील और सम्मानित स्त्री ने कितना कुछ खोया—कोई साढ़े तीन सौ पन्नों में फैला ‘नानी’ उपन्यास कुल मिलाकर इसी का एक विस्तृत ब्योरा पेश करता लगता है। इसे पढ़कर अच्छी तरह समझ में आ जाता है कि उम्र, बुजुर्गियत या रिश्तों का जो सम्मान यहाँ अब भी बाकी है, वैसा पश्‍चि‍मी देशों में नहीं है। इसीलिये सरस्वती ने एक छोटी बच्ची की तरह अपनी ही बेटी और दामाद से कितनी ‘सीख’ ली और ‘पाठ ठीक से याद न होने की सजा’ के एवज में कितने तीखे कटाक्ष, व्यंग्यपूर्ण उलाहने और झिड़कियाँ खाईं, उन्हें ‘नानी’  उपन्यास पढ़कर ही जाना जा सकता है। यहाँ तक कि सरस्वती के पति दीनदयाल जो पत्नी के आग्रह और चिट्ठी डालने पर खुद भी आकर इस कारा में पड़ गये हैं, कभी-कभी पत्नी की यह हालत और लाचारी देखकर बुरी तरह द्रवित हो उठते हैं। वे उसकी मदद चाहे अधिक न कर पाते हों, लेकिन सरस्वती के दुखों को सुन-सुनकर और थोड़ा धीरज बँधाते हुये वह उसके मन के बोझ को थोड़ा हल्का जरूर कर देते हैं। कहना न होगा कि  ऋषि और तुला की छोटी-छोटी शरारतें और खिलंदड़ापन ही है जिसके कारण नाना-नानी खुद को एक मीठी कारा में पाते हैं। यह न होता, तो यह मीठी कारा, मीठी तो होती ही नहीं, बल्कि एक जलते हुए जंगल की तरह उन्हें बस दिन-रात तपाती और बेधती ही रहती।

द्रोणवीर कोहली का यह बड़ा औपन्यासिक कौशल ही कहा जायेगा कि उनका ‘नानी’ उपन्यास बिना कुछ कहे, बड़े अनायास ढंग से समझा जाता है कि एक धनी और आत्मतृप्त देश का नरक क्या हो सकता है! यह ठीक है कि वहाँ पैसा लगभग बरस रहा है। हर कोई व्यस्तता की अंधी दौड़ में है। लेकिन उतना ही यह भी ठीक है कि किसी को रुककर सोचने की फुरसत नहीं है और कहीं चैन नहीं है। लोग एक नपी-तुली जिन्‍दगी के नपे-तुले सुख के इस कदर आदी होते जा रहे हैं कि जीवन का भीतरी उल्लास और स्फूर्ति गायब हो गई है। अगर धन की कमी एक तरह से तबाह करती है तो धन की अंधाधुंध बारिश दूसरी तरह से। चेतना और श्याम रतन के एक नीरस और बेस्वाद दांपत्य जीवन को इसी सन्‍दर्भ में समझा जा सकता है। वे हर वक्त थके और चिड़चिड़े-से नजर आते हैं और उनके लिये खुशी कोई बाहरी चीज है, जिसे वे शॉपिंग आदि के जरिये पा लेना चाहते हैं। मगर काश, वे जान पाते कि खुशी कोई ऐसी चीज नहीं जो पैसे से खरीदी जा सके। उसके लिये मन का मुक्त बहना जरूरी होता है। जबकि चेतना और श्याम रतन का जीवन इतना बँधा हुआ है कि वहाँ उनकी आदत या नपे-तुले ढंग से अलग कहा गया कोई एक छोटा-सा वाक्य, कोई एक छोटी-सी टिप्पणी या कोई हल्का-सा मजाक भी उन्हें खामखा खीज और रोष से भर देता है। और बार-बार उनके मुँह पर यही शब्द आते हैं कि इस बात को कहने की क्या जरूरत थी और बार-बार सरस्वती से यही ताकीद करते हैं कि वह अजनबियों से न मिले, न बातें करे। क्योंकि अजनबियों से बात करना और बगैर जरूरत बात करना यहाँ असभ्यता है। यहाँ तक कि किसी मेहमान के आने पर उससे चाय या खाने-पीने के लिये पूछ लेना भी असभ्यता है। समझ में आना मुश्किल है कि यह कैसी सभ्यता है जिसमें जीवन के सभी साज, कार्य-व्यापार खारिज हैं। इस माहौल में अगर सरस्वती और दीनदयाल जी लगातार घुटन महसूस कर रहे हैं तो यह बेसबब नहीं। दामाद श्याम रतन की कटूक्तियाँ और बात, बिना बात हिन्‍दुस्तान को लेकर की गई अशालीन और कठोर टिप्पणियाँ इस नरक को लगातार खौलाती रहती हैं। इससे सरस्वती और दीनदयाल जी की कभी-कभी तो यह हालत होती है कि वे बच्चों की तरह डरे-सहमे से नजर आते हैं। फुसफुसाकर एक-दूसरे से अपने मन की बात कहते हैं। और कभी-कभी तो अकेले में अपने साथ किये गये अपमानजनक व्यवहार को याद करके रो लेते हैं। दीनदयाल और सरस्वती दोनों उच्च शिक्षित हैं और दीनदयाल तो हिन्‍दुस्तान में एक बड़े अधिकारी रहे हैं। सरस्वती भी एक अच्छे स्कूल की सम्मानित प्रिंसिपल रह चुकी हैं। फिर अमरीका की सभ्यता की यह कौन-सी सदाशयता है जो इनकी गरिमा को चूस जाती है। कोहली जी बड़े मार्मिक ढंग से ये सवाल नानी उपन्यास के जरिये उठाते हैं। हालाँकि इनके कोई बने-बनाये रेडीमेड जवाब न देकर वे पाठकों के दिलों में एक गहरी कसमकश छोड़ देते हैं।

और जाहिर है, ये अमरीका जाकर अवांछित स्थतियों के चक्रव्यूह में फँसे एक संवेदनशील शख्स के सवाल ही नहीं हैं, बल्कि ये एक ऐसे सचेत लेखक के भी सवाल हैं, जो चाहे-अनचाहे अपने मुल्क में ग्लोबलाइजेशन और नई विश्व संस्कृति के नाम पर घुसे चले आते अमरीका को भी पहचान रहा है। और यहाँ परंपरागत हिंदुस्तानी नानी की लाचारी भरी त्रासद कथा एक अलग ध्रुव पर भी मार करती जान पड़ती है।

यों देखा जाये तो कोहली जी का यह अंदाज उनके उपन्यासों ही नहीं, कहानियों, लेखों, रिपोर्ताज समेत साहित्य की हर विधा में नजर आता है। वह अपने जीवन के बड़ी शिद्दत से महसूस किये गये किसी छोटे-से प्रसंग से शुरू करते हैं और फिर चीजें फैलती हैं तो वे पूरे जमाने को अपनी जद में ले लेती हैं।

कोहली जी के कथाकार रूप की भी यही खासियत है। उन्होंने बहुत कम कहानियाँ लिखी हैं, पर वे इतनी मार्मिक कहानियाँ हैं कि एक बार पढ़ने के बाद उन्हें भुलाना मुश्किल है। प्रभाकर श्रोत्रिय ‘वागर्थ’ के सम्‍पादक थे तो उन्होंने मुझे कोहली जी की कहानियों पर एक विस्तृत टीप लिखने के लिए कहा था और उसके लिये अलग-अलग पत्रिकाओं में छपी कहानियों के प्रिंट कोहली जी ने कृपापूर्वक उपलब्ध करवा दिये थे। तब तक मैंने उऩकी कोई कहानी नहीं पढ़ी थी, पर एक साथ उनकी कोई दर्जन भर कहानियाँ पढ़ते हुए मैं जैसे अवाक सा रह गया। ये वे कहानियाँ थीं जिनमें कोहली जी के संघर्ष और गर्दिश के दिनों की बहुत तप्त उसांसों भरी छायाएँ थीं और साठ के दशक के साहित्यिक-सामाजिक उथलपुथल के बहुत सच्चे और प्रामाणिक बिम्‍ब उनमें मौजूद थे। उनका वह कथा-संचयन शायद अब छप गया है, पर मेरी आँखों के सामने तो वे पन्ने ही तैर रहे हैं जिनमें कहानियों की शक्ल में एक समूचा दौर अपनी करुणा, गुस्से और विद्रोही तेवर के साथ मौजूद है, और बीच-बीच में खुद कोहली जी की आत्मकथात्मक छवियाँ घुल-मिल सी गई हैं।

हालाँकि कोहली जी बड़ों के साथ-साथ बच्चों के भी उतने ही प्यारे और लाजवाब लेखक थे जिनकी लिखी बाल कहानियों और उपन्यासों में अनोखा रस था और बच्चे खूब ललककर उन्हें पढ़ते थे। इसी तरह वर्षों तक ‘बाल भारती’ के सम्‍पादक के रूप में उन्होंने बाल पाठकों के मन में ऐसी छाप छोड़ी कि उनके समय के ‘बाल भारती’ के अंक आज भी मानो हाथ उठाकर पढऩे के लिये बुलाते जान पड़ते हैं। उनके समय के बाल पाठक आज भले ही बड़े हो गये हों, पर आज भी वे बड़ी शिद्दत से कोहली जी के समय में छपी एक से एक सुंदर और अलमस्त किस्सागोई से भरपूर कहानियों को याद करते हैं जिनकी प्रस्तुति और रेखांकन भी बड़ा खूबसूरत होता था। पिछले दिनों ‘बाल भारती’ की चुनिंदा कहानियों के संचयन के लिये पुरानी फाइलें पलटते हुए मैंने महसूस किया कि पत्रिका के उस दौर के अंक, जब द्रोणवीर कोहली ने इसका संपादन किया था, एकदम अलग से पहचान में आते हैं। अपने सम्‍पादन-काल में उन्होंने न सिर्फ हिन्‍दी साहित्य के शीर्ष कथाकारों को बाल साहित्य से जोड़ा, बल्कि उनसे ऐसी रचनाएँ भी लिखवा लीं, जो खुद में एक इतिहास बन गईं। बच्चों और बाल साहित्य के प्रति कोहली जी के समर्पण की यह अनोखी मिसाल है।

फिर बच्चों के लिए लिखे गये कोहली जी के ‘टप्पर गाड़ी’ और ‘करामाती कद्दू’  उपन्यासों की तो खासी धूम मची रही है। इन उपन्यासों में कथा-प्रवाह और कौतुक ऐसा जबरदस्त था कि बच्चे मानो साँस रोककर इन्हें पढ़ जाना चाहते थे। और सिर्फ बच्चे ही नहीं, बड़े भी। कोहली जी ने निश्‍चि‍त रूप से इन उपन्यासों को खुद बच्चा बनकर लिखा होगा। इसलिये बच्चे तो इनका आनन्‍द लेते ही हैं, बड़े भी इन्हें पढ़ते हुए एक शरारती हँसी के साथ अपने बचपन के खिलंदड़े दिनों में पहुँच जाते हैं।

सचमुच कोहली जी के ये अद्भुत उपन्यास हैं जिन्हें छपे हुए बरसों हो गये, मगर आज भी उन्हें उसी शिद्दत से याद किया जाता है। कोहली जी अतिशय विनम्रतावश अपने बाल उपन्यास ‘करामाती कद्दू’ को मौलिक उपन्यास न मानकर विदेशी कृतियों से प्रभावित मानते थे। सम्‍भव है, ऐसी कोई हलकी छाया वहाँ रही हो, पर उनकी शैली का जादू और अंदाजेबयाँ ऐसा है कि ‘करामाती कद्दू’ एक मौलिक बाल उपन्यास का-सा रस-आनन्‍द देता है। इसी तरह ‘टप्पर गाड़ी’ तक्षशिला की पृष्ठभूमि पर लिखा गया विलक्षण बाल उपन्यास है, जिसमें इतिहास और मिथक की आँखमिचौनी-सी है। इसमें हड़प्पा काल में मिलने वाली बैलगाड़ी की कथा बड़े अद्भुत रूप में सामने आती है, जिसमें प्राचीन और नई किस्सागोई का मिला-जुला रस है। कोहली जी ने इसे बच्चों के लिए इतने चुस्त कलेवर में और नाटकीयता के साथ लिखा है कि यह एक अविस्मरणीय उपन्यास बन गया है। बड़े से बड़े साहित्यकार भी द्रोणवीर कोहली के ‘टप्पर गाड़ी’ का बड़े आदर से जिक्र करते मिल जाते हैं। ऐसा सम्मान शायद ही हिन्‍दी के किसी और बाल उपन्यास को नसीब हुआ हो।

कोहली जी का ‘डाक बाबू का पार्सल’ और ‘हार न माने वीर’ भी बडे सुंदर बाल उपन्यास हैं। ‘डाक बाबू का पार्सल’ में डाक बाबू की मानवीय सम्‍वेदना छल-छल कर रही है, तो ‘हार न माने वीर’ मन में साहस, वीरता और रोमांच पैदा करने वाला बाल उपन्यास है जिसकी मूल कथा यूनानी मिथक कथाओं के बीच से निकली है।

इसी तरह द्रोणवीर कोहली ने बच्चों के लिये एकदम अलग अंदाज में किस्सागोई से भरपूर कहानियाँ लिखीं। ‘बाल भारती’ के एकदम शुरू के अंकों में ही कोहली जी की कहानियाँ नजर आने लगती हैं। शुरू में उन्होंने लोककथाएँ अधिक लिखीं, पर बाद में चलकर वे आधुनिक परिवेश की उन कहानियों की ओर आये जिनमें बच्चा और बच्चे का मन अधिक खुलकर सामने आता है। पर लिखने का अंदाज उनका हमेशा वही रहा, जिसमें बात कहने की सूझ और किस्सागोई भरपूर होती थी। इसलिये कोहली जी की बाल कहानियाँ ऐसी विनोदपूर्ण बाँकी अभिव्यक्ति लिये हुए हैं कि एक बार पढक़र उन्हें कभी भूला नहीं जा सकता। फिर उनकी कई ऐसी कहानियाँ याद आती हैं, जिनमें पशु-पक्षियों और खासकर नन्हे परिंदों की चह-चह करती उपस्थिति मन में गहरे बस जाती है। ऐसी ही एक छोटी चिड़िया की बड़ी मजेदार कहानी उन्होंने बाल भारती के लिये लिखी थी, जिसमें कथा के बीच में एक पंजाबी लोकगीत की पंक्तियाँ भी गुँथी हुई थीं, ‘टाली मेरे बचड़े, लक टुनूँ-टुनूँ…!’ और उस छोटी-सी कहानी को पढ़ते हुए मानो पूरा पंजाब और पंजाब की लोक संस्कृति की सुवास मन में उतर जाती है। इसी तरह ‘नंदन’ में उनकी एक बड़ी ही सुंदर और भावपूर्ण कहानी छपी थी जिसमें एक चिड़िया के घोंसले और उसके नन्हे बच्चे का किस्सा है।

कोहली के व्यक्तित्व और साहित्य दोनों में एक बड़ी गहरी-गहरी-सी करुणा या मर्मस्पर्शी संवेदना है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘वाह कैंप’ का किशोर नायक इसीलिये हमें कभी नहीं भूलता, जो देश के बँटवारे के समय परिवारी जनों के साथ पाकिस्तान से आया तो उसकी पढ़ाई-लिखाई ही नहीं, हँसता-खेलता बचपन भी मानो वहीं छूट गया। और यहाँ आने के बाद आर्थिक परेशानियों से जूझते परिवार की मदद के लिये छोटी उम्र में ही उसे जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाना पड़ा और तरह-तरह के काम करने पड़े। कोहली जी के ‘वाह कैंप’ उपन्यास में यह वर्णन आँखों को गीला कर देता है, क्योंकि इसमें खुद उनके निजी जीवन के अक्स हैं। कोहली जी ने एक से एक सुंदर कृतियाँ साहित्य-जगत को दी हैं, पर उनमें बड़ों के लिए लिखा गया ‘वाह कैंप’ और बच्चों के लिए लिखा गया ‘टप्पर गाड़ी’ सचमुच बेजोड़ हैं।

और ‘बाल भारती’ के सम्‍पादन के दौरान उन्होंने बच्चों की पत्रिका के सम्‍पादन की जो मिसाल कायम की, उससे आज भी हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। कुछ अरसा पहले बाल साहित्य के एक सेमिनार में उन्होंने अपने लेखन के शुरुआती दिनों का एक मर्मस्पर्शी संस्मरण सुनाया था। उन्होंने बाल पत्रिका ‘मनमोहन’ के सम्‍पादक को एक कहानी छपने भेजी थी, साथ में एक निजी तकलीफों से भरा पत्र भी था। इस पर ‘मनमोहन’ के सम्‍पादक ने उन्हें हर अंक के लिये एक कहानी जरूर भेजने के आग्रह के साथ इतना भावपूर्ण पत्र लिखा कि द्रोणवीर कोहली की आँखें भीग गईं और उसी दिन से उनके लेखक बनने की कहानी भी मानो शुरू हो गई। बाद में जब खुद कोहली जी सम्‍पादक बने, तो उनके सामने आदर्श तरुणाई के दौर के उन्हीं विनम्र और सरल सम्‍पादक का था, जिन्होंने गर्दिश के दिनों में उन्हें हिम्मत, हौसला और प्यार दिया था।

कोहली जी सचमुच बच्चों के दोस्त लेखक और दोस्त संपादक थे जिन्होंने साबित कर दिया कि बच्चों के लिये लिखने की पहली शर्त है, बच्चे और बचपन से दोस्ती, और जब वह हो जाती है तो रास्ते खुद-ब-खुद निकलते जाते हैं। द्रोणवीर कोहली आज नहीं हैं, पर उनकी मीठी उत्फुल्ल हँसी और बेलाग बातें आज भी हमें राह दिखा रही हैं। लगता है, वह हमसे कहीं दूर नहीं गये, हमारे आसपास ही हैं। यों भी बच्चों और जिन्‍दगी को इतनी शिद्दत से प्यार करने वाला लेखक भला इस धरती से दूर जा ही कहाँ सकता है।

आंदोलनकारी महि‍लाओं का सम्‍मेलन 27 को

देहरादून : ‘महि‍ला समाख्‍या’ और ‘पहाड़’ नैनीताल के संयुक्‍त तत्‍वाधान में उत्‍तराखण्‍ड में वि‍भि‍न्‍न समाजि‍क-राजनीति‍क आंदोलनों से जुड़ीं तथा सर्वोदय आंदोलन से जुड़ीं नेतृत्‍वकारी महि‍लाओं का सम्‍मेलन 27 मार्च, 2012 को रायल इन पैलेस (साई पीजी होम), 125 इन्‍दि‍रानगर, देहरादून में कि‍या जा रहा है।

इसमें उत्‍तराखण्‍ड में आंदोलनों से जुड़ी नेतृत्‍वकारी महि‍लायें प्रेरणादायक संस्‍मरण सुनायेंगी। आयोजन में लक्ष्‍मी आश्रम कौसानी तथा ‘पहाड़़’ नैनीताल द्वारा प्रकाशि‍त गाँधी जी की शि‍ष्‍या प्रसि‍द्ध संग्रामी तथा समाजसेवी सरला बहन की आत्‍मकथा ‘व्‍यवहारि‍क वेदांत’ के डेवि‍ड भाई द्वारा कि‍ये गये अंग्रेजी अनुवाद A Life in Two Words का वि‍मोचन भी कि‍या जायेगा।

जो जनता के सवालों के लिए शहीद हुए उनके संघर्ष को आगे बढ़ाने का आह्वान

नासरीगंज, बि‍हार में आयोजि‍त कार्यक्रम की लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की रि‍पोर्ट-

जब बिहार की सरकार नीली रोशनी की आड़ में लूट, भ्रष्टाचार, सामाजिक अन्याय और उत्पीड़न की सच्चाइयों को ढंक देने की कोशिश कर रही थी, वे सच्चाइयाँ रोहतास के नासरीगंज में बेपर्द हो रही थीं। एक ओर जहाँ करोड़ों रुपये खर्च कर बिहार में जश्‍न मनाया जा रहा था और उस जश्‍न के बीच ही मुख्यमंत्री के एक करीबी के घर से इनकमटैक्स वालों को करोड़ों रुपये मिल रहे थे, तब रोहतास और भोजपुर जिले के संघर्षशील मजदूर-किसान अपने साथी की हत्या का जवाब मांगने के लिए एकत्र हो रहे थे। पूरे देश में जब भगतसिंह का शहादत दिवस मनाया जा रहा था तब बिहार के नासरीगंज में हजारों मजदूर-किसान भगतसिह की ही राह पर चलते हुए शहीद होने वाले कामरेड भइया राम यादव की संकल्प सभा में बिहार में अपराध, भ्रष्टाचार व लूट का राज मिटाने का संकल्प ले रहे थे।

हम सबसे पहले भइया राम के ससुराल गए। गाँव की संकरी गलियों से गुजरते हुए भारी हुजूम के बीच से हम वहाँ पहुँचे जहाँ उनके परिजनों के साथ उनके कामरेड मौजूद थे। फिर हम (धूस) नासरीगंज के उस वाचनालय के विशाल प्रांगण में पहुँचे जिसे माले विधायक अरुण सिंह के कार्यकाल में बनाया गया था। वहीं शहीद-ए-आजम की वह प्रतिमा थी, जिसके निर्माण कार्य को देखकर लौटते वक्त सामंती अपराधियों ने कामरेड भइया राम की हत्या की थी। माले पोलित ब्यूरो के सदस्य का. रामजी राय ने उस प्रतिमा का अनावरण किया और हजारों कंठों से नारे गूंज उठे- शहीद-ए-आजम भगतसिंह को लाल सलाम, का. भइया राम को लाल सलाम, भइया राम अमर रहें। वाचनालय के ठीक बगल के मैदान में संकल्प सभा आयोजित थी, जिसमें जनसैलाब उमड़ा हुआ था। यह वह बिहार था, जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार के गरीबों, मजदूरों, किसानों और बेरोजगार नौजवानों की जिन्‍दगी में ऐसा कोई बदलाव नहीं आया है कि उनके चेहरे पर उल्लास और खुशी नजर आये। उनके लिए जश्‍न मनाने का माहौल नहीं है। बड़ी संख्या उन ग्रामीण मेहनतकश महिलाओं की थी जिनको अब तक की तमाम सरकारों ने सिर्फ छलने का काम किया है। हजारों चेहरे अपने प्रिय नेता की हत्या के दुख, क्षोभ और गुस्से से भरे हुए थे।

शहीद गीत- लाखों शहीदों के खून से रंगा निशान हम हाथ में उठाए हुए हैं, से संकल्प सभा की शुरुआत हुई, जिसे निर्मल नयन, संतोष झा और कृष्ण कुमार निर्मोही ने गाया। माले के पूर्व विधायक अरुण सिंह ने सभा का संचालन करते हुए कहा कि भइया राम यादव की हत्या एक राजनीतिक साजिश के तहत की गई है। इसके लिए राजनेता-पुलिस-अपराधी गठजोड़ जिम्मेदार है, जिसके संरक्षक नीतीश कुमार हैं। इस गठजोड़ द्वारा बच्चियों और महिलाओं की इज्जत-आबरू लूटे जाने और हत्या किये जाने के खिलाफ भइया राम ने प्रतिवाद किया था, उन्होंने गरीबों के वोट देने के अधिकार के लिये संघर्ष किया था, इसी कारण उनकी हत्या की गई है। यह हत्या इसका साक्ष्य है कि नीतीश के शासन में सामंती-अपराधी शक्तियों का मनोबल किस कदर बढ़ा हुआ है। भाकपा-माले रोहतास जिला कमेटी के सदस्य जवाहरलाल यादव ने पूरे यकीन से कहा कि जनता इस गठजोड़ को सबक जरूर सिखाएगी। का. कैसर निहाल ने कहा कि बड़े अरमान से भइया राम ने भगतसिंह की प्रतिमा का निर्माण करवाया था। अंग्रेजों ने भी तो यही सोचा था कि भगतसिंह को मारकर वे अमन-चैन से रह लेंगे, लेकिन भगतसिंह ने कहा था कि जिंदा भगतसिंह से ज्यादा खतरनाक उनके लिए मरा भगतसिंह होगा। ठीक उसी तरह हत्यारों और उन्हें संरक्षण देने वालों के लिए जीवित भैया राम से ज्यादा खतरनाक मृत भैयाराम होंगे, यह तय है। उन्हें हर मोर्च पर करारा जवाब मिलेगा।

भाकपा-माले के राज्य सचिव नंदकिशोर प्रसाद ने कहा कि भैया राम की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि गरीबों के आंदोलन की हत्या है। हत्यारों की इसकी कीमत चुकानी होगी और इनको संरक्षण देने वाली नीतीश सरकार को भी। का. राम जी राय ने कहा कि यह गरीबों के राजनीतिक नेतृत्व की सम्‍भावनाओं की हत्या करने की वैसी ही कोशिश है, जैसी कोशिश 15 साल पहले चंद्रशेखर की सीवान में हत्या करके की गई थी या सत्रह साल पहले रोहतास में ही का. मणि सिंह की हत्या करके की गई थी। शहीद-ए-आजम भगतसिंह के संघर्ष की विरासत को आगे बढ़ाने वालों की हत्या करके कोई जुल्म की सत्ता कायम नहीं रह सकती। नीतीश सरकार के दिन लदने लगे हैं, लूट से पर्दा हटने लगा है। उनके पाखण्‍ड और अन्याय के राज का खात्मे के लिए का. भइया राम के तमाम साथी संकल्पित हैं। अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा के राष्ट्रीय महासचिव का. राजाराम सिंह ने कहा कि नीतीश कुमार ने सुनील पांडेय जैसे घोषित अपराधी को विधानसभा भेजा, जिसके कारनामे जगजाहिर हैं। सामंती-साम्‍प्रदायिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाले और लूट, कमीशनखोरी और अपराध के लिये जिम्मेवार ऐसे सरगना जो बिहार बना रहे हैं, उसके खिलाफ ही भइया राम लड़ रहे थे। गाँव-गाँव में महिलाओं के साथ बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं और दारू भट्टियों को खोलने का वह विरोध कर रहे थे, इस कारण नीतीश के संरक्षण में पलने वाले सामंती-अपराधी ताकतों ने उनकी हत्या की है। उन्‍होंने कहा कि जो लोग बिहार में सामाजिक-आर्थिक बदलावों के नायक रहे हैं, उनको बिहार दिवस के जश्‍न में कोई याद नहीं कर रहा है। वहाँ मास्टर जगदीश, रामेश्वर अहीर, विनोद मिश्र जैसों की ऐतिहासिक भूमिका की चर्चा तक नहीं है। माले के वरिष्ठ नेता कृष्णदेव यादव ने कहा कि भैया राम की हत्या ने नीतीश के सुशासन और न्याय के साथ विकास के पाखण्‍ड का पर्दाफाश कर दिया है।

भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि का. भैया राम की हत्या एक बड़ी राजनीतिक साजिश है। नीतीश कुमार ने सरकार बनते ही अपने राजनीतिक रवैये का संकेत उस अमीरदास आयोग को भंग करके दे दिया था, जो गरीब-मेहनतकशों के जनसंहार के दोषियों को संरक्षण देने वाले राजनेताओं के पर्दाफाश के लिये बनी थी। उसके बाद हत्यारे अपराधी सुनील पांडेय को गरीबों के नेता रामनरेश राम के क्षेत्र से उम्मीदवार बनाकर उन्होंने गरीब विरोधी सामंतपरस्त राजनीति को आगे बढ़ाया। आज बिहार में जगह-जगह इसी तरह के अपराधी सरगने सर उठाए हुये हैं और पुलिस उन्हें सुरक्षा दे रही है। यह वही बिहार है जहां एक ओर करोड़ों रुपये खर्च करके जश्‍न मनाया जाया रहा है तो दूसरी ओर योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार यहाँ गरीबों की संख्या 50 लाख बढ़ गई है। का. भैया राम यादव बिहार के इन गरीबों के अन्‍दर ताकत भर रहे थे, इसी कारण गरीब विरोधी बिहार सरकार के संरक्षण में पलने वाले अपराधियों ने उनकी हत्या की है। मगर हत्याओं और जुल्म से कोई गरीबों के संघर्ष को रोक नहीं सकता, शाहाबाद का इतिहास इसका गवाह है। उन्‍होंने कहा कि का. भइया राम के संदेश को गाँव-गाँव तक ले जाया जायेगा । उन्होंने 30 मार्च को उनकी हत्या की राजनीतिक साजिश की सीबीआई जाँच की मांग को लेकर बिहार विधानसभा को घेरने का आह्वान किया।

वहाँ से लौटते वक्त मैं भैया राम की पत्नी का. उषा यादव के धैर्य को सलाम कर रहा था। पूरी दृढ़ता के साथ दिया गया उनका दो टूक वक्तव्य मेरे जेहन में लगातार गूँज रहा था- ‘भैया राम के सपने अधूरे हैं, जिन्हें पूरा करना है। वह कोई चोर-डकैत नहीं थे, बल्कि जनता के सवालों के लिए शहीद हुये हैं।’ यह स्वाभिमान और संघर्ष का तेवर ही बिहार की असली पहचान है। यह स्वाभिमान और संघर्ष का तेवर वहाँ मौजूद हजारों महिलाओं, पुरुषों और नौजवानों में दिख रहा था।

भगत सिंह को लेकर कुछ गैरवाजिब चिंताएं : सुधीर विद्यार्थी

क्रान्‍ति‍कारी लेखक सुधीर वि‍द्यार्थी का आलेख-

1. भगत सिंह को अकादमिक चिंतन या बौद्धिक विमर्श की वस्तु न बनाया जाये। यह याद रखा जाना चाहिए कि प्रगतिशील और बुद्धिजीवियों के मध्य चर्चा का बिन्‍दु बनने से बहुत पहले भगतसिंह लोक के बीच नायकत्व हासिल कर चुके थे। उन पर सर्वाधिक लोकगीत रचे और गाये गये। मुझे खूब याद पड़ता है कि अपनी किशोरावस्था में गाँवों में मेलों और हाटों में पान की दुकानों पर आइने के दोनों तरफ और ट्रकों के दरवाजों पर भगतसिंह की हैट वाली तथा चन्द्रशेखर आजाद की मूँछ पर हाथ रखे फोटुएं हुआ करती थीं। शुरुआत में जनसंघ के लोगों ने भी उन्हें इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए बम फेंकने वाले एक बहादुर नौजवान, जो हँसते हुए फाँसी का फंदा चूमता है, के रूप में जिन्‍दा बनाये रखा। प्रगतिशीलों के विमर्श में तो वे बहुत देर से आये। जानना यह होगा कि भगतसिंह या आजाद की जगह लोक के मध्य है। वहीं से दूसरा भगतसिंह पैदा होगा, अकादमीशियनों के बीच से नहीं।

2. इस समय को पहचानिए कि जहाँ बिग बी के साथ भोजन करने की नीलामी दस लाख रुपये तक पहुँच रही हो, जिस समाज में मुन्नी बदनाम होती है तो फिल्म हिट हो जाती है यानी बदनाम होने में अब फायदा है सो इसे हम बदनाम युग की संज्ञा दे सकते हैं, कॉमनवेल्थ खेलों में जहाँ पग-पग पर हमें गुलाम होने का अहसास कराया जाता हो और हम गुलाम रहकर खुशी का अनुभव भी कर रहे हों; इसी कॉमनवेल्थ का तो कवि शंकर शैलेंद्र ने अपने मशहूर गीत ‘भगतसिंह से’ में विरोध किया था जिसमें कहा गया था- मत समझो पूजे जाओगे क्योंकि लड़े थे दुश्मन से/ रुत ऐसी है आँख लड़ी है अब दिल्ली की लंदन से। कामनवेल्थ कुटुंब देश का खींच रहा है मंतर से/प्रेम विभोर हुए नेतागण रस बरसा है अंबर से) तो ऐसे निकृष्ट संस्कृति विरोधी और इतिहास विरोधी समय में हमें बहुत सतर्क रहने की जरूरत है कि भगतसिंह को याद करने अर्थ केवल एक समारोह अथवा प्रदर्शनप्रियता में तब्दील होकर न रह जाये। मैं मानता हूँ कि भगतसिंह को सेमिनारों और जेएनयू मार्का विश्‍वविद्यालयी चर्चाओं से बाहर निकाल कर उन्हें जनता के मध्य ले जाने की पहल करने का उपयुक्त समय भी यही है।

3. मेरा निवेदन है कि भगतसिंह को कृपया देवत्व न सौंपें और न उन्हें क्रान्‍ति‍ का आदिपुरुष बनायें। भगतसिंह कोई व्यक्ति नहीं थे, अपितु उनके व्यक्तित्व में संपूर्ण भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक विकास बोल रहा है। सत्तर साल लम्‍बे क्रान्‍ति‍कारी आंदोलन ने भगतसिंह को पैदा किया। भगत सिंह उस आंदोलन को बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करने वाले एक व्यक्ति ही थे। वे स्वयं विकास की प्रक्रिया में थे। कल्पना करिए कि यदि भगतसिंह की जेल में लिखीं चार पुस्तकें गायब न हो गई होतीं तब उनके चिंतन और बौद्धिक क्षमताओं का कितना बड़ा आयाम हमारे सम्मुख प्रकट हुआ होता। दूसरे यह कि आगे चलकर भारतीय क्रान्‍ति‍ के मार्ग पर उन्हें और भी बौद्धिक ऊँचाई हासिल करनी थी। पर इस सबको लेकर उनके मन में कोई गर्वोक्ति नहीं थी,बल्कि एक विनीत भाव से उन्होंने स्वयं सुखदेव को संबोधित करते हुए कहा था कि क्या तुम यह समझते हो कि क्रान्‍ति‍ का यह उद्यम मैंने और तुमने किया है। यह तो होना ही था। हम और तुम सिर्फ समय और परिस्थितियों की उपज हैं। हम न होते तो इसे कोई दूसरा करता। और कितना आत्मतोष था उस व्यक्ति के भीतर जिसने बलिदान से पूर्व यह भी कहा कि आज मैं जेल की चहारदीवारी के भीतर बैठकर खेतों, खलिहानों और सड़कों से इंकलाब जिंदाबाद का नारा सुनता हूँ तो लगता है कि मुझे अपनी जिन्‍दगी की कीमत मिल गई। ….और फिर साढ़े तेईस साल की इस छोटी सी जिन्‍दगी का इससे बड़ा मोल हो भी क्या सकता था।

4. आवश्यक तौर पर देखा यह भी जाना चाहिए कि भगतसिंह के साथ पूरी क्रान्‍ति‍कारी पार्टी थी। हम पार्टी और संपूर्ण आंदोलन को क्यों विस्मृत कर जाते हैं। हम यह क्यों नहीं याद रखते कि भगत सिंह के साथ चन्द्रशेखर आजाद का सर्वाधिक क्षमतावान और शौर्यमय नेतृत्व था। क्या भारतीय क्रान्‍ति‍कारी आंदोलन का मस्तिष्क कहे जाने वाले कामरेड भगवतीचरण वोहरा पार्टी के कम महत्वपूर्ण व्यक्ति थे जिन्होंने बम का दर्शन जैसा तर्कपूर्ण और बौद्धिक प्रत्युत्तर देने वाला पर्चा ही नहीं लिखा, बल्कि नौजवान भारत सभा और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन के घोषणापत्र आदि उन्होंने लिपिबद्ध किये। हमने विजय कुमार सिन्हा, जिन्हें दल में अंतरराष्ट्रीय संपर्कों और प्रचार-प्रसार की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी, को भी हमने भुलाने योग्य मान लिया। यह सच है कि हम विजय दा से भगतसिंह की एक फुललेन्थ की जीवनी की अपेक्षा कर रहे थे जो उनेक जीवित रहते पूरी नहीं हो पाई। पर मेरा यहाँ जोर देकर कहना यह है कि हमने बटुकेश्‍वर दत्त से लेकर सुशीला दीदी, धन्वंतरि, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य मास्टर रुद्रनारायण सिंह आदि सबको भुलाने देने में पूरी तरह निर्लज्जता का परिचय दिया। हमने इनमें से किसी की शताब्दी नहीं मनाई। यह सब स्वतंत्र भारत में जीवित रहे पर हमने इनमें से किसी क्रान्‍ति‍कारी की खैर खबर नहीं ली। क्या पूरी पार्टी और उसके सदस्यों के योगदान और अभियानों को विस्मृत करके अपनी समारोहप्रियताओं के चलते भगतसिंह को हम उस तरह का तो नहीं बना दे रहे हैं- उतना ऊँचा और विशाल, जिसकी तस्वीर को फिर अपने हाथों से छूना मुश्किल हो जाये हमारे लिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपनी आत्ममुग्धताओं में ही डूबे यह सब देख समझ ही न पा रहे हों। इससे भविष्य के क्रान्‍ति‍कारी संग्राम को बड़ा नुकसान होगा क्योंकि इतिहास के परिप्रेक्ष्य में संघर्ष की पूरी और सही तस्वीर को देख पाने में हम सर्वथा असमर्थ होंगे।

5. भगतसिंह के स्मरण के साथ एक खतरा यह भी है कि पिछले कुछेक वर्षों से हम देख रहे हैं कि उन्हें पगड़ी पहनाने का षड्यन्त्र बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है। पर पंजाब के उस क्रान्‍ति‍कारी नौजवान का सिर इतना बड़ा हो गया कि अब उस पर कोई पगड़ी नहीं पहनाई जा सकती है। हम वैसा भ्रम भले ही थोड़ी देर को अपने भीतर पाल लें। यद्यपि शताब्दी वर्ष पर तो यह खुलेआम बहुत बेशर्मी के साथ संपन्न हुआ। देखा जाये तो हुआ पहले भी था जब मैं पंजाब के मुख्यमंत्री श्री दरबारा सिंह के आमंत्राण पर 1982 में चण्डीगढ़ में उनसे मिलने आया तो देखा कि उनके कार्यालय में भगतसिंह का जो चित्र लगा है उसमें उन्हें पगड़ी पहनाई गई है। अब विडंबना देखिए कि कोई आज उस पगड़ी को केसरिया रंग रहा है तो कोई लाल। इसमें आरएसएस से लेकर हमारे प्रगतिशील मित्र तक किसी तरह पीछे नहीं हैं। एक सर्वथा धर्मनिरपेक्ष क्रान्‍ति‍कारी शहीद को धर्म के खाँचे में फिट किये जाने की कोशिशों से सवधान रहना चाहिए। यहाँ अपनी बात कहने का हमारा अर्थ यह भी है कि सब भगतसिंह को अपने अपने रंग में रंगने का प्रयास कर रहे हैं। कोई कहता हे कि वे जिन्‍दा होते तो नक्सलवादी होते। उनके परिवार के ही एक सदस्य पिछले दिनों उन्हें आस्तिक साबित करने की असफल कोशिशें करते रहे। यह कह कर कि भगतसिंह की जेल नोटबुक में किसी के दो शेर लिखे हुए हैं जिनमें परवरदिगार जैसे शब्द आए हैं जो उनकी आस्तिकता को प्रमाणित करते हैं। सर्वाधिक तर्कहीन ऐसे वक्तव्यों की हमें निंदा ही नहीं, अपितु इसका विरोध करना चाहिए। यादविन्दर जी को भगतसिंह का लिखा ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ जैसा आलेख आँखें खोल कर पढ़ लेना चाहिए। मैं यहाँ निसंकोच यह भी बताना चाहता हूँ कि दूसरे राजनीतिक दल भी बहुत निर्लज्ज तरीके से इस शहीद के हाथों में अपनी पार्टी का झण्‍डा पकड़ाने का काम करते रहे जो कामयाब नहीं हुआ। धार्मिक कट्टरता और पुनरुत्थानवाद के इस युग में भगत सिंह की वास्तविक धर्मनिरपेक्षता की बड़ी पैरोकारी की हम सबसे अधिक जरूरत महसूस करते हैं। लेकिन ऐसे में जब गाँधी और जिन्ना को भी डंके की चोट पर धर्मनिरपेक्ष बताया जा रहा हो, और भाजपा के अलंबरदार स्वयं को खालिस और दूसरों को छद्म धर्मनिरपेक्ष बताते हों तब वास्तविक धर्मनिरपेक्षता जो नास्तिकता के बिना सम्‍भव नहीं है, उसका झण्‍डा कौन उठाए? यह साफ तौर पर मान लिया जाना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सर्वधर्मसमभाव कतई नहीं है जैसा कि हम बार-बार, अनेक बार प्रचारित करते और कहते हैं। यह हमारा सर्वथा बेईमानी भरा चिंतन है जिसका पर्दाफाश किया जाना चाहिए। विचार यह भी किया जाना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता आखिर कितनी तरह की? रघुपति राघव राजाराम जपने वाले गाँधी भी धर्म निरपेक्ष थे, मजहब के नाम पर मुस्लिम होमलैंड ले लेने वाले जिन्ना भी धर्मनिरपेक्ष थे और भगतसिंह भी। तब इनमें से कौन सही धर्मनिरपेक्ष है, और धर्मनिरपेक्षता आखिर है क्या बला?

6. इधर भगतसिंह को संसद का पक्षधर साबित करने के भी प्रयत्न हुए और हो रहे हैं। संसद में भगतसिंह का चित्र या मूर्ति लगवाने का क्या अर्थ है। जिस संसदीय चरित्र और उसकी कार्यवाहियों के विरोध में उन्होंने, दल के निर्णय के अनुसार पर्चा और बम फेंका, क्या आज उस संसद और उसके प्रतिनिधियों की चाल-ढाल और आचरण बदल कर लोकोन्मुखी और जनपक्षधर हो गया है। यदि नहीं तो क्यों भगतसिंह पर काम करने वाले उन पर पुस्तकें जारी करवाने के लिए किसी सांसद अथवा मंत्री की चिरौरी करते हुए दिखाई पड़ते हैं। क्या हम वर्तमान संसदीय व्यवस्था के पैरोकार या पक्षधर होकर भगतसिंह को याद कर सकते हैं। आखिर क्यों भगतसिंह की शहादत के 52 वर्षों बाद उनकी बहन अमर कौर को भारत की वर्तमान संसद के चरित्र और उसकी कार्यप्रणाली पर उँगली उठाते हुए वहाँ घुसकर पर्चे फेंकने पड़े, जिसमें उठाए सवालों पर हमें गौर करना चाहिए। पर इस मुक्त देश में पसरा ठंडापन देखिए कि किसी ने भी 8 अप्रैल 1983 को अमर कौर की आवाज में आवाज मिलाकर एक बार भी इंकलाब जिंदाबाद बुलंद नहीं किया, जबकि यह दर्ज रहेगा कि इसी गुलाम देश ने तब भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त के स्वर में अपना स्वर बखूबी मिला दिया। जानने योग्य यह भी है कि पिछले दिनों संसद में भगतसिंह की जो प्रतिमा लगी उसमें वे पगड़ी पहने हुए हैं और वहाँ उनके साथ बम फेंकने वाले उनके अभिन्न बटुकेश्‍वर दत्त नदारद हैं।

7. जरूरी है कि भगतसिंह को याद करने और उनकी पूजा या पूजा के नाटक में हम फर्क करें। आज सारे जनवादी और प्रगतिशील राजनीतिक व सांस्कृतिक सामाजिक संगठन भगतसिंह को याद कर रहे हैं। दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी भी। यह चीजों को घालमेल करने की घिनौनी कोशिशें हैं ताकि असली भगतसिंह अपनी पहचान के साथ ही अपना क्रान्‍ति‍कारित्व भी खो बैठें। आखिर क्या कारण है कि भगतसिंह आज तक किसी राजनीतिक पार्टी के नायक नहीं बन पाए। यह सवाल बड़ा है कि आजाद की शहादत के बाद हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ को पुनर्जीवित करने के कितने और कैसे प्रयास हुए और वे कामयाब नहीं हुए तो क्यों? और क्यों आजादी के बाद कोई राजनीतिक दल हिसप्रस का झण्‍डा पकड़ने का साहस नहीं कर सका?

8. विचार यह करिए कि अब भावी इंकलाब का आधार क्या होगा। आजाद के नेतृत्व में भगतसिंह और दूसरे सारे युवा क्रान्‍ति‍कारी अधिकांशतः मध्यवर्ग से आए थे। आज पूँजीवादी व्यवस्था और बाजार के अनापशनाप विस्तार ने मध्यवर्ग को नागरिक से उपभोक्ता में तब्दील कर दिया है। नई पीढ़ी पूरी तरह कैरियर में डूबी है। उसके सपनों में अब देश और समाज नहीं है। वहाँ नितांत लिजलिजे व्यक्तिगत सपनों की कंटीली झाडि़याँ उग आई हैं। समाज टूट रहा है तो सामाजिक चिंताएं कहाँ जन्मेंगी। निम्न वर्ग जिन्‍दगी जीने की कशमकश में डूबा रह कर दो जून की रोटी मुहैया नहीं कर पा रहा है तो दूसरी ओर उच्च वर्ग क्रान्‍ति‍ क्यों चाहेगा? क्या अपने विरुद्ध? ऐसा तो सम्‍भव ही नहीं है। तब फिर क्रान्‍ति‍ का पौधा कहाँ पनपेगा और उसे कौन खाद-पानी देगा। यह बड़ा सवाल हमारे सामने मुँह बाये खड़ा हुआ है और हम हवा में मंचों पर क्रान्‍ति‍ की तलवारें भाँज रहे हैं। हम जो थोड़ा बहुत क्रान्‍ति‍ के नाम पर कुछ करने की गलतफहमियाँ पाल रहे हैं, क्या वह हमारा वास्तविक क्रान्‍ति‍कारी उद्यम है। कौन जानता है हमें। जिनके लिए क्रान्‍ति‍ करने का दावा हम करते रहे हैं, वे भी हमसे सर्वथा अपरिचित हैं। आप जेएनयू के किसी एअरकंडीशंड कमरे में तीसरी मंजिल पर बैठकर तेरह लोग क्रान्‍ति‍ की लफ्फाजी करेंगे तो देश की जनता आपको क्यों पहचानेगी। याद रखिए कि जेएनयू देश नहीं है। पूछिए इस मुल्क के लोगों से छोटे शहरों, कस्बों, देहातों में जाकर अथवा सड़क पर चलते किसी आम आदमी को थोड़ा रोककर इन बौद्धिक विमर्श करने वाले लोगों के बारे में पूछिए तो वह मुँह बिचकाएँगे। वे तो इनमें से किसी को भी जानते बूझते नहीं। तो आप कर लीजिए क्रान्‍ति‍। इस देश की साधारण जनता आपसे परिचित नहीं है। न आप उसके साथ खड़े हैं, न ही वह आपके साथ। ऐसे में क्या आप जनता के बिना क्रान्‍ति‍ करेंगे? लगता है कि इस देश में अब थोड़े से हवा हवाई लोग ही क्रान्‍ति‍ की कार्यवाही को संपन्न करने का ऐतिहासिक दायित्व पूरा कर लेंगे। जनता अब उनके लिए गैरजरूरी चीज बन गई है।

9. आज भाषा का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा है। यह आजादी के सवाल से गहरे तक जुड़ा हुआ है। अपनी भाषा के बिना आप आजादी की कल्पना नहीं कर सकते। पर आज सब ओर गुलामी की भाषा सिर माथे और उसकी बुलंद जयजयकार। भाषा का मामला सिर्फ भाषा का नहीं होता, वह संस्कृति का भी होता है। भगतसिंह ने यों ही भाषा और लिपि की समस्या से रूबरू होते हुए अपनी भाषाओं की वकालत नहीं की थी। क्या हम अंग्रेजी के बिना एक कदम भी आगे नहीं चल सकते? भाषा आज सबसे अहम मुद्दा है। हम उस ओर से आँखें न मूंदें और न ही उसे दरकिनार करें। भाषा के बिना राष्ट्र अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता।

10. अब तीन अन्य गौर करने वाली बातों पर हम अपना पक्ष और चिंताएं प्रकट करेंगे। वह यह कि आज भी ईमानदारी से भगतसिंह को याद करने वालों को वर्तमान सत्ता और व्यवस्था उसी तरह तंग और प्रताडि़त करती है, जिस तरह साम्राज्यवादी हुकूमत किया करती थी। शंकर शैलेंद्र का ‘भगतसिंह से’ गीत गाने पर संस्कृतिकर्मियों पर यह कह कर प्रहार किया जाता है कि यह गीत 1948 में सरकार ने यह कह कर जब्त किया था कि यह लोकप्रिय चुनी हुई सरकार के विरुद्ध जनता के मन में घृणा पैदा करता है। मैं स्वयं जानना चाहता हूँ कि क्‍या शंकर शैलेंद्र के इस गीत पर से 1948 के बाद से अभी तक सरकारी पाबंदी हटी है अथवा नहीं। यदि ऐसा हुआ है तो कब? दूसरा यह कि कई वर्ष पहले पाकिस्तान की फौज हुसैनीवाला से भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के स्मारकों को तोड़कर ले गई। हमने क्यों नहीं अब तक उन स्मारकों की वापसी की मांग पाकिस्तान सरकार से की। क्या वह हमारा राष्ट्रीय स्मारक नहीं था। और तीसरा विन्दु यह है कि कुछ वर्ष पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक महोत्सव हुआ था, मेला लगा था। यह तब की बात है जब भगतसिंह पर एक साथ कई-कई फिल्में आई थीं यानी हमारे बॉलीवुड को भी क्रान्‍ति‍ करने का शौक चर्राया था। बाजार और बॉलीवुड में यदि भगतसिंह को बेचा जा सकता है तो इसमें हर्ज क्या है। बाजार हर चीज से मुनाफा कमाना चाहता है। पर मैं यहाँ फिल्मों में भगतसिंह को बेचने की बात नहीं कर रहा, न ही इस बात पर चिन्‍ता प्रकट कर रहा हूँ कि उन्होंने तुडुक तुडुक और बल्ले बल्ले करके भगतसिंह जैसे क्रान्‍ति‍कारी नायक को पर्दे पर नाचना दिखा दिया। मैं यहाँ बात कुछ दूसरी कहना चाहता हूँ। लखनऊ के उस मेले में एक रेस्त्रां बनाया गया था जिसका दरवाजा लाहौर जेल की तरह निर्मित किया गया। उसमें बैरों को वह ड्रेस पहनाई गई थी जिसे जेल के भीतर भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ने पहना था। पानी जो वहाँ परोसा जा रहा था उसे काला पानी का नाम दिया गया था और घिनौनापन देखिए कि खाने के नाम पर स्वराज्य चिकन और काकोरी कबाब। यह हद से गुजर जाना है। लखनऊ एक प्रदेश की राजधानी है–सांस्कृतिक संगठनों और राजनीतिक दलों का केंद्रीय स्थान। पर सब कुछ कई दिनों तक उस जगह ठीक ठाक चलता रहा। कोई हलचल नहीं। कोई विरोध नहीं। क्या हम वास्तव में मर चुके हैं, क्या हमारे भीतर कोई राष्ट्रीय चेतना शेष नहीं है। क्या हमें अपने राष्ट्रीय नायकों और शहीदों का अपमान कतई विचलित नहीं करता। क्या इतिहास के सवाल हमारे लिए इतने बेमानी हो गए हैं कि वे हमारे भीतर कोई उद्वेलन पैदा नहीं करते। कुछ लोग थोड़े वर्षों से तीसरा स्वाधीनता आंदोलन नाम से एक संगठन चला रहे हैं। शहीदेआजम भगतसिंह के दस्तावेजों को सामने लाने लाने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम करने वाले प्रो. जगमोहन सिंह जी भी उससे जुड़े हैं। पर इस संगठन के चिंतन के प्राथमिक बिन्‍दु पर गौर करिए कि आंदोलन चलाने से पहले ही उसने घोषित कर दिया कि इंडिया गेट को ध्वस्त कर वहाँ शहीदों की बड़ी मीनार बनाना है। क्या यही इस देश का तीसरा स्वतंत्राता युद्ध होगा। कल तक हम अपने बीच बचे रहे जिन्‍दा शहीदों को कोई सम्मान और आदर नहीं दे पाए, उनकी ओर आँख उठाकर भी हमने देखा नहीं, उन्हें ठंडी और गुमनाम मौत मर जाने दिया पर आज उनके ईंट पत्थर के बुत खड़े करने में हमारी गहरी दिलचस्पी है। भगतसिंह को याद करने वाले संगठन कितनी गलतफहमियों में जी रहे हैं यह देखने के लिये आँखों को ज्यादा फैलाने की आवश्यकता नहीं है। क्या यह भी गौर करने लायक सच्चाई और त्रासदी नहीं है कि वामपंथी और साम्यवादी आंदोलन ही नहीं भगतसिंह के अनुयायी कहे जाने वाले लोगों और संस्थाओं ने भी सैद्धांतिक मीनमेख और थोड़े विमर्शों में स्वयं को अधिक उलझा लिया है। उनके बीच निर्लज्ज किस्म की संकीणताएं भी विद्यमान हैं। भगतसिंह का नाम स्वयं को प्रतिष्ठित करने के लिए लिया जाना कतई ठीक नहीं।

(समकालीन तीसरी दुनि‍या/मार्च 2012 से साभार)

सातवाँ गोरखपुर फि‍ल्‍म फेस्‍टि‍वल 23 से 26 तक

नई दि‍ल्‍ली : ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान का 22वां और गोरखपुर का सातवाँ फिल्म फेस्टिवल 23 से 26 मार्च, 2012 तक आयोजि‍त कि‍या जायेगा। फेस्टिवल का उद्घाटन 23  मार्च को शाम 4.30 बजे निपाल क्लब के सर्वोदय हाल में होगा। इस सत्र में फेस्टिवल के खास मेहमान मशहूर अभिनेता रघुवीर यादव मुख्य वक्तव्य देंगे। निपाल क्लब सिविल लाइंस में गोरखपुर के आरटीओ आफिस के सामने है।

वि‍स्‍तृत जानकारी के लि‍ये सम्‍पर्क करें : संजय जोशी, संयोजक, प्रतिरोध का सिनेमा का राष्ट्रीय अभियान, जन संस्कृति मंच, मोबाइल नम्‍बर- 91-9811577426

आंदोलन की जमीन पर ‘जनपथ’ के नागार्जुन विशेषांक का लोकार्पण

‘जनपथ’ के बाबा नागार्जुन वि‍शेषांक का लोकार्पण कथाकार मधुकर सिंह के अपने गाँव धरहरा में कि‍या। लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की रि‍पोर्ट-

इस बार आरा पहुँचा तो अखबारों में शाहाबाद क्षेत्र के चारों जिलों और कई प्रखंडों में कामरेड भइया राम यादव की हत्या के खिलाफ भाकपा-माले द्वारा बन्‍द की खबरें थीं। वह भाकपा-माले के रोहतास जिले के सचिव थे। लम्‍बे समय तक उन्होंने इंकलाबी नौजवान सभा के मोर्चे पर काम किया था। जब उनकी हत्या हुई उस वक्त वह नासरीगंज में शहीद-ए-आजम भगतसिंह की प्रतिमा की स्थापना की तैयारियों में जुटे हुए थे, जिसका अनावरण अगले 23 मार्च को होना था। हाल के दिनों में उस इलाके में दो नाबालिग बच्चियों के साथ बलात्कार और हत्या की घटनाओं के खिलाफ उनके नेतृत्व में माले ने जोरदार आन्‍दोलन किया था। इससे दोषी सामंती-अपराधी ताकतें बौखलाई हुई थीं। पुलिस के साथ मिलकर उन्होंने भइया राम को पहले गिरफ्तार करवाया, लेकिन वह थोड़े दिनों बाद ही जेल से बाहर आ गये। शहीद-ए-आजम भगतसिंह की प्रतिमा भव्य तरीके से स्थापित हो और उसका अनावरण प्रभावशाली ढंग से हो, इसमें उनकी गहरी दिलचस्पी थी। इस कारण पिछले दिनों लगातार प्रतिमा स्थल पर उनका आना-जाना था। अपराध-उत्पीड़न की ताकतों ने इसी बीच उन पर अचानक हमला किया और उनकी हत्या कर दी। मगर समाज के जनवादीकरण की कोशिशों को दबाने की नीयत से की गई इस हत्या से प्रतिरोध की आवाजें थम नहीं गई हैं,  जगह-जगह सड़कों पर उतरे आक्रोश से भरे माले कार्यकर्ता और समर्थक इसके गवाह थे।

अगले महीने बिहार में माले का राज्य सम्मेलन होने वाला है। उसके लिये प्रतिनिधियों का चुनाव होना था। पार्टी कार्यालय में इसकी गहमागहमी थी। बाकायदा वोटर लिस्ट, बैलेट बॉक्स, चुनाव पर्यवेक्षक और गणना करने वाले लोग तैयार थे। साथ ही 21-22 मार्च को होने वाले भोजपुर जिला सम्मेलन की तैयारियों में भी कामरेड जुटे हुये थे। पिछले चुनावों में पराजय के क्षण अब बहुत पीछे छूटते लगते हैं। सिर्फ चुनाव के लिए पार्टी है भी नहीं। इसके सामने तो चौतरफा संघर्षों और आंदोलनों का मोर्चा खुला हुआ है। जिला सम्मेलन के लिये तैयार कामकाज की रिपोर्ट देखने को मिलती है। देखता हूं कि इस बीच पार्टी ने नरेगा, बीपीएल, इंदिरा आवास, भूमिहीनों के लिए जमीन, खेत-मजदूरों-बंटाईदारों और किसानों के लिए मजदूरी, सिंचाई, खाद, बीज, धान क्रय केंद्र, फसल बीमा योजना आदि सवालों पर लगातार आंदोलन किया है। पंचायत प्रतिनिधियों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों और सरकारों के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई है। सरकारी विकास का मॉडल जो पूँजीपतियों, माफियाओं, दलालों और सामंती ताकतों के हित में संचालित है, उसके समानांतर आम गरीब-मेहतनकश जनता के विकास के मॉडल की एक कठिन लड़ाई साथी लड़ रहे हैं। बीच का कोई रास्ता नहीं है। यहाँ अन्याय और उत्पीड़न की ताकतों, प्रशासन और सरकार से हर कदम पर टकराव स्वाभाविक है। जिस देश में पूरी राजनीति ही जन के बजाए धन के नजरिए से संचालित होने लगी हो, जहाँ राजनीति और समाजसेवा व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति का माध्यम बन गई हो और शासकवर्ग के प्रलोभनों का जाल चारों ओर फैला हो, वहाँ उससे बचकर जनता के संघर्षों की राजनीति को विकसित करने और उसे मजबूत बनाने की जद्दोजहद आसान नहीं है। भोजपुर क्रांतिकारी जनराजनीति और जनांदोलन के लिहाज से आज भी एक प्रयोगभूमि बना हुआ है।

जनराजनीति और जनांदोलन की इसी धारा से निकली नाट्य संस्था ‘युवानीति’ ने पिछले माह से जनोत्सव अभियान की शुरुआत की है, जिसमें रंगकर्मी, गायक, कवि-साहित्यकार शहर के वार्डों में जाकर सांस्कृतिक आयोजन कर रहे हैं। इस बार यहीं से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘जनपथ’ के नागार्जुन विशेषांक पर साथियों ने कथाकार मधुकर सिंह के गाँव धरहरा में एक कार्यक्रम रखा था। लकवे के बाद मधुकर सिंह के लिए कहीं दूसरी जगह जा पाना थोड़ा कठिन है। इस कारण भी उन्हीं के गाँव में हमें पहुँचना था। मैं माले कार्यालय में ही साहित्यकार मित्रों का इंतजार करता रहा। जब कवि जितेंद्र कुमार, कथाकार अनंत कुमार सिंह, भोला कवि, आशुतोष पांडेय आदि आये तो हम एक साथ मधुकर जी के गाँव पहुंचे, जो करीब तीन किमी दूर आरा शहर के पूर्वोत्तर छोर पर है। मधुकर सिंह के वार्ड से लगातार जनता के आंदोलन और वामपंथी राजनीति से जुड़े उम्मीदवार ही पार्षद बनते रहे हैं। गाँव के लोगों ने बड़ा सा शामियाना लगा रखा था। कुर्सी और टेबुल के साथ माइक और लाउडस्पीकर का प्रबंध भी उन्होंने खुद ही किया था। जसम के बिहार राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन, राज्य पार्षद रंगकर्मी अरुण प्रसाद, युवानीति के संयोजक राजू रंजन आदि हमसे पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे। कवि सुमन कुमार सिंह और सुनील चौधरी हमारे बाद वहाँ पहुंचे। युवानीति के कलाकारों- राजू रंजन, सूर्य प्रकाश, रतन देवा और अमित मेहता ने शंकर शैलेंद्र के गीत ‘झूठे सपनों के छल से निकल चलती सड़कों पर आ’ और रमाकांत द्विवेदी रमता के गीत ‘अइसन गांव बना दे जहंवा जालिम जमींदार ना रहे’ के गायन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। इसी बीच एक रिक्शे से मधुकर सिंह आयोजन स्थल पर पहुँचे। संचालन की जिम्मेवारी अरुण प्रसाद ने सुमन कुमार सिंह को सौंप दी। हम सबको देखकर मधुकर जी काफी प्रफुल्लित थे। पहले उन्होंने ‘जनपथ’ के नागार्जुन विशेषांक का लोकार्पण किया। उसके बाद हम सबको सहयात्री लेखक, गीतकार, कलाकार बताते हुए उन्होंने अपने गाँव में स्वागत किया। उन्होंने जनता को राजनीतिक तौर पर जागरूक बनाने वाली संस्था के बतौर ‘युवानीति’ की भूमिका को बड़ी शिद्दत से याद किया और कहा कि इस संस्था ने लोगों की साहित्य, समाज और राजनीति के प्रति रुचि बढ़ाने और लोगों को सचेत बनाने का काम किया है। यह लोकार्पण भी इसी का उदाहरण है।

कार्यक्रम में कथाकार मधुकर सिंह और रामनिहाल गुंजन।

कवि जितेंद्र कुमार ने कहा कि बाबा नागार्जुन ने अपनी कविताओं और उपन्यासों में किसानों के संघर्ष का चित्रण किया। उनकी ‘भोजपुर’ कविता और ‘बलचनवा’ उपन्यास इसी का उदाहरण हैं। हम साहित्यकार संघर्षशील जनता के यथार्थ को अभिव्यक्त करना चाहते हैं, साहित्य और कला से ग्रामीणों और मेहनतकशों को काट देने की जो सत्ता की साजिश है, हम उसके खिलाफ हैं और पत्रिकायें हमारे लिये संघर्ष के सांस्कृतिक हथियार की तरह हैं। सत्ता से जुड़े लोग 10-20 साल में ही कैसे अरबों रुपये लूट रहे हैं और देश की 77 प्रतिशत जनता बीस रुपये से कम दैनिक आमदनी पर जीवन गुजारने को क्यों मजबूर है, हम अपने साहित्य में इन सवालों को उठाना चाहते हैं। आम किसान-मजदूर स्त्री-पुरुष का फसल के उत्पादन और बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ जीवन की बेहतरी के तमाम पहलू हमारे लिए रचना का विषय हैं। बाबा नागार्जुन पर केंद्रित ‘जनपथ’ के इस विशेषांक में यह दृष्टि स्पष्ट रूप से दिखती है।

‘जनपथ’ संपादक कथाकार अनंत कुमार सिंह ने कहा कि नागार्जुन किसान-मजदूरों और आम जन के कवि थे। किसान आंदोलन के कथाकार मधुकर सिंह के ग्रामवासियों के बीच नागार्जुन के बारे में चर्चा करना बेहद महत्वपूर्ण है। विशेषांक के संपादकीय के हवाले से उन्होंने कहा कि सचमुच बाबा नागार्जुन महज क्रांति की आकांक्षा नहीं, बल्कि क्रांति के कर्म के कवि हैं।

वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन ने कहा कि बाबा नागार्जुन ने अपने देश के मेहतनकश वर्ग की जिन्‍दगी को बदलने के लिये आजीवन रचनात्मक संघर्ष किया। उनके इस संघर्ष को ‘जनपथ’ का विशेषांक बखूबी रेखांकित करता है। बाबा की खासियत यह है कि उन्होंने जनता की भाषा को पकड़कर अपनी बात कही और जनता की सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना को उन्नत बनाने का कार्य किया। उन्होंने बताया कि गरीब अगर भूखा है, तो भजन से उसकी भूख मिटने वाली नहीं है, बल्कि उसे संघर्ष करना होगा। उन्होंने न केवल अपने आसपास की सच्चाइयों पर लिखा, बल्कि ‘भोजपुर’ जैसी कई कविताओं के जरिये पूरे देश में जनजागरण का संदेश दिया।

बतौर अतिथि संपादक मुझे भी बोलना था। मुझे तो यही विशेष लग रहा था कि नागार्जुन और मधुकर सिंह दोनों जनांदोलन और खासकर किसान आंदोलन और सामाजिक-आर्थिक बदलाव के संघर्षों के रचनाकार रहे हैं। जेपी आंदोलन के दौरान भी दोनों साथ-साथ थे। दोनों साहित्य की परिवर्तनकारी ताकत में यकीन करनेवाले रचनाकार रहे हैं। इस नाते यह बड़ा ही ऐतिहासिक मौका है कि अपनी शारीरिक अक्षमता के बावजूद एक कथाकार अपने अग्रज क्रांतिधर्मी रचनाकार पर केंद्रित विशेषांक का लोकार्पण करने के लिए उत्साह के साथ मौजूद है। यह रामनिहाल गुंजन का आग्रह था कि इस विशेषांक का लोकार्पण मधुकर सिंह के हाथों से ही होना चाहिये। उन्हीं का सुझाव था कि यह आयोजन मधुकर जी के गांव में ही होना चाहिए। नागार्जुन जिस तरह प्रगतिशील-जनवादी-वाम-लोकतांत्रिक धारा के सर्वमान्य और सर्वप्रिय रचनाकार रहे हैं, उन्हें याद करने की सार्थकता भी यही है कि परिवर्तनकामी साहित्यकारों की बड़ी एकता बने। साहित्यकारों का जनसरोकार और राजनीतिक भूमिका बढ़े। बाकी संपादन का श्रेय भले एक व्यक्ति को मिले, पर उसमें सामूहिक उर्जा लगी होती है। लेखक बंधुओ, मित्रों, कामरेडों और कुछ करीबी रिश्तदारों का भरपूर सहयोग न होता तो शायद इस रूप में नागार्जुन विशेषांक को निकाल पाना सम्‍भव न होता। यही सब मैं बोला। मधुकर जी काफी आह्लादित और उत्साहित दिख रहे थे, इससे भी बहुत सुकून मिल रहा था। बाकी तो बड़बोले नीतिश कुमार विधानसभा में उनकी मदद की घोषणा करके कब की चुप्पी साध चुके हैं। वैसे भी भोजपुर के क्रांतिकारी किसान आंदोलन की सुर्ख छवियों से जिस कथाकार की रचनाएं रची गई हैं, किसी मजदूर-किसान विरोधी सरकार का अगुआ उसकी सेहत की चिंता क्यों करेगा? जितना भी महादलित, अतिपिछड़ा और विकास आदि का पाखंड और विज्ञापनबाजी बिहार सरकार कर रही हो, मधुकर सिंह का पूरा रचना-संसार ही ऐसी प्रवृत्तियों का विरोधी रहा है। आम जनता के ‘दुश्मन’ राजनेताओं की जो शिनाख्त उन्होंने की थी, वह जाति-पांति के बहाने की जाने वाली शासकवर्गीय चालबाजियों पर आज भी भारी है।

इस आयोजन में भोला कवि ने अपनी कविता ‘मैं आदमी हूँ’ के जरिये मनुष्य की परिवर्तनकारी ताकत के प्रति आस्था जाहिर की। उन्होंने कहा कि जनशक्ति से बड़ी कोई शक्ति नहीं है, पर जन कहीं फंसा हुआ है, जिसकी मुक्ति की लड़ाई लड़नी है। समापन युवानीति ने मधुकर सिंह के गीत ‘सुनो सुनाता हूँ भोजपुर की कहानी’ को गाकर किया, जिसमें भोजपुर के क्रांतिकारी आंदोलन की गौरवगाथा दर्ज है। धन्यवाद ज्ञापन वार्ड पार्षद सुरेंद्र साह ने किया। युवानीति ने फिर अगले रविवार को उसी स्थल पर नाटक के मंचन की घोषणा की।

मधुकर सिंह के गाँव से लौटते हुये सोच रहा था कि एक ओर जहाँ बिहार के सांस्कृतिक-बौद्धिक वातावरण में बिहार के सौ साल होने पर उत्सवों की भांग घोल दी गई है, राजा ने तमाम स्कूलों को बिहार उत्सव मनाने का निर्देश दे दिया है, ऐसा लग रहा है, मानो बिहार की बदहाली की बुनियादी वजहों पर पर्दा डालने के लिये एक भारी तमाशा हो रहा है, जिसमें बहुत सारे साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी भी उछल-कूद मचाए हुये हैं, इस माहौल में हमारे द्वारा एक गाँव में नागार्जुन पर बातचीत क्या नक्कारखाने में तूती की आवाज है या सत्ता का चारण न बनने और जनसंघर्षों के साथ होने की इस जिद की कोई सार्थकता है? बिहार दिवस के जश्‍न में कोई सवाल नहीं उठा रहा है कि जब आज से सौ साल पहले बंगाल विभाजन हुआ  तो उससे बिहार-उड़ीसा अलग हुए थे। फिर बिहार और उड़ीसा 1936 में अलग हुये। तो फिर अचानक विज्ञापनबाज मुख्यमंत्री को बिहार का सौ साला जश्‍न मनाना क्यों जरूरी लगने लगा? चलिए एक पल को मान ही लीजिए कि बिहार सौ साल का ही हो गया  तो क्या अंधाधुंध जश्‍न से बिहार की बुनियादी समस्याओं का समाधान हो जाएगा? बिहार के मुख्यमंत्री जिस खोखले स्वाभिमान के नशे में बिहार की जनता को डूबा रहे हैं और जिस तरह अखबारों में इसे बहुत बड़ा इवेंट बना देने की होड़ लगी हुई है, वह बेहद हास्यास्पद है। जहाँ बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक उत्पीड़न, कृषकों की बदहाली, कमीशनखोरी, रोजगार के लिए पलायन, भ्रष्टाचार, बलात्कार, महिलाओं का उत्पीड़न और हत्याओं पर कोई लगाम नहीं लगा है, जहाँ दारु की दुकानों की इफरात हो गई है और प्राथमिक शिक्षा पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है, जहाँ गाँव भीषण सांस्कृतिक शून्यता और बर्बरता की ओर धकेल दिये गये हैं, वहां सिर्फ अपनी कुर्सी के लिए बिहार दिवस आयोजनों को एक राजनेता फीलगुड का अहसास भरने की एक मनोवैज्ञानिक साजिश न कहा जाये, तो क्या कहा जाये! ऐसी स्थिति में हम हैं कि बाबा नागार्जुन की परम्‍परा के साथ खुद को जोड़ने में लगे हैं, क्या आज के बिहार में इसका कोई अर्थ है?