Archive for: February 2012

शरद ति‍वारी की कवि‍ताएं

जनवादी चित्रकार चित्तप्रसाद का चि‍त्र।

युवा कवि‍ शरद ति‍वारी की तीन कवि‍ताएं-

प्रथम पात्र

वह आया
जैसे एक उपन्यास लिखने
एक नितांत अपरिचित परिवेश में
अनभिज्ञ है वह इस नए परिवेश से
अनजाने हैं आज वे
जो कल होंगे पात्र इस उपन्यास के
अनुभवहीन है वह
क्या नाम दे किसी पात्र को
कौन-सा उसका प्रथम प्रिय पात्र हो
क्या हो भाषा जिसमें कथा लिपिबद्ध हो
बिल्कुल अनजान वह देखता है इधर-उधर
चल-अचल आकारों से युक्त्
निरे भौतिक परिवेश को
जिज्ञासा का अपार जलधि
तरंगित होता है भरपूर वेग से
प्लावित करता हुआ उस हर एक को
जो निकलता है
किसी इन्द्रिय विशेष के प्रदेश से
तभी लक्षित होता है एक भौतिक आकार
गति है जिसमें
किस कारण, पता नहीं
अति सामीप्य  हो गया है जिससे अनायास ही
किस कारण, पता नहीं
शायद दे रहा है कुछ वह
तन को, मन को आहार
स्वार्थ ही है कारण सामीप्य का
पर बुरा नहीं सदा
है नियम यह प्रकृति का
…और समय बढ़ चला
परिवेश से सामीप्य भी बढ़ता चला
और उस आकार से भी
दूरी का अब सिलसिला कम हो चला
हर इन्द्रिय प्रदेश में
वही आकार बढ़ चला
उत्सुकता का उदधि उसे
आप्लावित करता चला
…और समय बढ़ चला
अन्य भौतिक आकार भी
हर प्रदेश में बसने लगे
और भीगने लगे
पर वह आकार ही
शायद प्रथम पात्र हो
क्योंकि अब सामीप्य नहीं
वह तो मन में बसने लगा
…और समय बढ़ चला
अपरिचित परिवेश अब
परिचित सा लगने लगा
वही भावी प्रथम पात्र
सजीव सा लगने लगा
उसकी ही भाषा में
उसे माँ जैसा कुछ नाम दे
अन्य पात्र खोजने
वह और आगे बढ़ चला
…और समय बढ़ चला

अंतर का दर्पण

तेरे अंतर का मैं दर्पण
कर रहा तुझे तेरा अर्पण
तेरे अनेक आशय अमूर्त
मुझसे मिलकर हो रहे मूर्त
मुझमें प्रतिपल आनन निहार
कर रहीं भावनाएं श्रृंगार
मेरे तन पर ही बार-बार
तेरा मानस करता विहार
मुझमें विकार पाते आकार
तेरा मुझमें साक्षात्कार
यद्यपि निश्‍चि‍त है तेरा अन्त
पर मुझमें है तू चिर अनंत
मुझमें अतीत का है दर्शन
तेरा मुझमें नित नया सृजन
आएँगे फिर अनेक जीवन
पाने को मेरा ही संबल
स्वीकार करूँगा उनको मैं
यह मेरा है संकल्प अटल
अगणित मन, तन में निहित किए
मैं बढ़ता रहा, रहा अविकल
पर कितना और कहूँ मैं अब
उस पंचवृत्ति में  विश्व सकल
वह सब कुछ दिखला रहा तुझे
जो कहता तेरा अंतस्तल
तू वृत्तिवान, चेतन, चंचल
मैं तो हूँ बस काग़ज़ समतल

स्‍वर्ण सुमन

(वि‍लि‍यम वर्ड्सवर्थ की कवि‍ता ‘डैफोडि‍ल्स ’ पर आधारि‍त)
वह उतराता बादल
जो पर्वत उपत्यकाओं से जाता
मैं भी निकला उसके जैसा
बस एकाकी वि‍चरण करता
द्रुम-दल समीप सर अंचल में
तब त्वरि‍त दृष्टि ‍ में देखे वे
स्वर्णिम सुमनों के वि‍पुल व्यू‍ह
स्वच्छंद पवन में नर्तनरत
यों दीप्तमान मानो अवि‍रत
अगणि‍त तारों के हों समूह
एक अंतहीन पथ पर वि‍कसि‍त
तट पर वे पंक्ति बद्ध स्थित
हो पडे़ अनायास वीक्षि‍त
अति‍शय आनंदि‍त आंदोलि‍त
जि‍नके शि‍र थे वे नृत्य-मग्न
सघनि‍त सुंदरतम स्वंर्ण सुमन
सन्निकट सरोवर के यद्यपि‍
दोलि‍त प्रवाह में लहरों का
मनहारी नर्तन होता था
पर पारंगत पुंजि‍त पुष्पों  का
उल्लासि‍त उद्दाम नृत्य
उसकी मोहकता हरता था
उस प्रमुदि‍त संगति‍ का सहचर
कवि‍ हर्षित ही हो सकता था
मैंने देखा फि‍र फि‍र देखा
देखता रह गया नि‍र्निमेष
नैसर्गिक सुषमा में अब भी
क्या और कहीं कुछ रहा शेष
पर इस अबाध अवलोकन में
इसका मुझको कुछ भान न था
वह अक्षय धन मि‍ल गया मुझे
अंतर को जि‍सका ज्ञान न था
बीते दि‍न कि‍न्तु अभी भी जब
होता है कुछ एकाकीपन
रहता है भाव रहि‍त यह मन
या करता अवसादी चिंतन
तब मन:चक्षु में होता है
एकांतवास का जो वि‍लास
उनका उद्भासित उद्भावन
अति‍ आह्लादित आनन्द मगन
तब नर्तन करता अंतर्मन
सहभागी होते स्वर्ण सुमन

‘प्रति‍रोध का सि‍नेमा’ का कन्वेंशन 1 मार्च को

नई दि‍ल्ली : जन संस्कृति मंच (जसम) के फिल्म समूह ‘द ग्रुप’ की ओर से 2006 में गोरखपुर से शुरू हुआ ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान का यह सिलसिला चार राज्यों के 12 केन्द्रों में नियमित हो चला है और जल्द ही इस अभियान से 10 और केन्द्रय जुड़ने वाले हैं। इस सक्रियता को व्यवस्थित करने हेतु पिछले वर्ष छठे गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल के मौके पर 24 मार्च, 2011 को ऐसे नये केन्द्रों का पहला राष्ट्रीय कन्वेंशन किया गया था।
1 मार्च, 2012 को गांधी शान्ति प्रतिष्ठान, दींनदयाल उपाध्याय मार्ग, दिल्ली में ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान का दूसरा राष्ट्रीय कन्वेंशन होने जा रहा है। इसका मकसद तमाम समूहों के बीच बेहतर तालमेल के अलावा इस अभियान की दिशा और दशा को परखने और जांचने का भी है।
कन्वेशन के दो सत्र होंगे।  पहला सत्र प्रतिनिधियों का होगा जो सुबह 11 से शाम 5.30 बजे तक चलेगा जिसमे निम्न बिन्दुओं पर चर्चा होगी-
एक: प्रतिरोध का सिनेमा की अवधारणा
दो: 2006 से अब तक प्रतिरोध का सिनेमा अभियान की यात्रा का संक्षि‍प्तल परिचय
तीन: प्रतिरोध का सिनेमा आयोजन कैसे करें
चार: अलग-अलग केन्द्रों के अपने अनुभव
पाँच: प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के लिये नियमित आमदनी का प्रबन्धर और केन्द्रों की ‘द ग्रुप’ के प्रति आर्थिक जिम्मेवारी
छह: वार्षिक कलेंडर का निर्माण
सात: ‘द ग्रुप’ के पदाधिकारियों का चुनाव
दूसरा सत्र शाम 6 से रात 8.30 बजे तक चलेगा और यह खुला सत्र होगा। इसमें ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जैसे तमाम सिने अभियानों को केन्द्रित कर ‘नये सिनेमा प्रयास : चुनौतियाँ, सवाल और उम्मीद’ का खुला सत्र होगा जिसमे शहर के महत्वपूर्ण फिल्मकारों के अलावा अभियान से जुड़े कवि-लेखक, चित्रकार, पत्रकार और एक्टिविस्ट अपनी बात रखेंगे। इस सत्र में पुराने केन्द्रों के प्रतिनिधि अपने अनुभव साझा करेंगे।
संजय जोशी, संयोजक, द ग्रुप, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी अपील-
आप सभी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि प्रतिरोध एक सिनेमा अभियान अपनी शुरुआत से अब तक छोटे-छोटे सहयोग के बलबूते विकसित हुआ है जो इसकी सबसे ख़ास बात और पहचान भी है। आपसे हम अपील करते हैं कि इस बड़े और महत्वपूर्ण आयोजन को सफल बनाने के लिये हमारी आर्थिक मदद करें। आपकी मदद किसी भी रूप में हो सकती है। चाहे आयोजन के किसी खर्च में हिस्सेदारी बटाऐं, नकद सहयोग करें या स्मारिका के लिए विज्ञापन उपलब्ध करा दें। हमें पूरी उम्मीद है कि पहले की तरह इस बार भी हमें आपका सहयोग मिलेगा।
अपना व्यक्तिगत सहयोग आप चेक के जरिये हमें दे सकते हैं। चेक EXPRESSION के नाम से बनाकर मेरे ग़ाज़ियाबाद के पते पर भेज सकते हैं या सीधे हमारे खाते में डाल सकते हैं। खाते में सहयोग जमा करवाके हमें इत्तिला जरूर करें-
EXPRESSION प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के सबसे पहले केन्द्रह गोरखपुर की फ़िल्म सोसाइटी का नाम है।
Bank Account name : Expression
Bank account no. : 558802010007442
Branch : 26 Battalion PAC, Bichia, Gorakhpur
Bank : Union Bank of India
संजय जोशी का पता-
संयोजक, द ग्रुप, जन संस्कृति मंच
सी – 303 , जनसत्ता अपार्टमेन्ट
सेक्टर 9, वसुंधरा, ग़ाज़ियाबाद – 201012
फोन: +91-9811577426, +91-120-4108090

जब तक हम हैं जमाना हमारा होगा : शेखर जोशी

कथाकार विद्यासागर नौटियाल और शेखर जोशी।

हाल ही मैं कथाकार विद्यासागर नौटियाल का देहांत हो गया। उन पर कथाकार शेखर जोशी का संस्‍मरण-

कभी-कभी लिखी गई पुरानी डायरी के एक पन्ने में दिनाँक 5 नवंबर 1958 को दर्ज ये पंक्तियाँ आधी शताब्दी पूर्व के उन दिनों की याद दिला देती है जब मैं सुरक्षा विभाग की एक वर्कशॉप में नियुक्ति पाकर इलाहाबाद पहुँचा था और विद्यासागर नौटियाल टिहरी से बनारस हिन्‍दू विश्वविद्यालय में पढ़ने पहुँचे वहाँ छात्र नेता के रूप में सक्रिय थे: 5 नवंबर’58

कल मार्शल आए थे। बनारस वि.वि. में वाडिया की मीटिंग के बाद उन्होंने जो भाषण दिया उसी को बातें कर रहे थे-

I stand here as the representative of the ten thousand or phans of BHU. I call them orphans because their father, the VC has disowned them and their mother, the university, has been murdered by the friends of their father.

उन्हें अफसोस था कि भैरव जी ने उनकी कहानी ‘फुलियारी’ की एडिटिंग कर के हत्या कर दी है। कहानी का अंत जो उन्होंने मूल रूप से दिया था मुझे अच्छा लगा। संघर्ष के इन दिनों में उनकी (लेखक की) मानसिक परिस्थिति की ही प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति थी।

मुझे याद नहीं कि नौटियाल जी के लिए यह ‘मार्शल’ संबोधन तब बनारस के सभी साथियों के बीच प्रचलित था अथवा भारत-नेपाल सीमा के एक जमींदार परिवार से आये चुलबुले छात्र अक्षोभ्येश्वरी प्रताप मिश्र से मैंने इसे ग्रहण किया था। अक्षोभ्य, जो बाद में ए. प्रताप के रूप में दूरदर्शन के प्रोड्यूसर बने और जिनका असमय ही देहान्त हो गया, उन कई बनारसी साथियों में से एक थे जो तब साहित्य को दुनिया में कदम रखने का प्रयत्न कर रहे थे।

उत्तर प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पहाड़ से आये हुये युवाओं ने छात्रसंघों की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और कालांतर में देश की राजनीति में भी उनका महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कॉमरेड पी.सी. जोशी,  नारायणदत्त तिवारी, हेमवतीनंदन बहुगुणा, पूरनचंद जोशी (आज के प्रसिद्ध समाजशास्त्री) इलाहाबाद और लखनऊ विश्वविद्यालयों के ख्यातिनाम छात्रनेता रहे हैं। उनकी पृष्ठभूमि कुमाऊँ-गढ़वाल के बड़े कस्बों की रही है जहाँ सामाजिक जीवन में अपेक्षाकृत अधिक जागरूकता थी। लेकिन विद्यासागर ने टिहरी के पिछड़े इलाके में आकर बनारस में अपनी धाक जमाई थी, यहाँ यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि मैदानी इलाके के बहुसंख्यक छात्रों के बीच अपनी बोली-बानी और चाल-ढाल से ये पहाड़ी युवा कुछ विशिष्ट लगते होंगे। जैसे- कहा जाता है, एक सज्जन कभी साइकिल चलाना नहीं सीख पाये और पैदल ही पूरा शहर छान मारते थे। यही नहीं, यूनिवर्सिटी से चौक की ओर जाते हुये (पहाड़ की आदत में अनुसार) अपने साथियों को सूचित कर जाते थे, ‘जरा नीचे चौक तक जा रहा हूँ पार्टी दफ्तर में’ या वहाँ से लौटते हुए पार्टी दफ्तर के कार्यकर्ताओं से कहते, ‘अब चलता हूँ, ऊपर यूनिवर्सिटी जाना है’। सुनते हैं, उन्हें याद दिलाना पड़ता था कि यहाँ सब समतल है, नीचे-ऊपर वाला मामला नहीं है। तो ऐसी परिस्थिति में मैदानी इलाके में आकर अपना सिक्का जमा लेना बड़ी बात थी। विद्यासागर नौटियाल का प्रभाव क्षेत्र बनारस तक ही सीमित नहीं था। वह सन् 1958 में मात्र 25 वर्ष की आयु में ऑल इण्डिया स्टूडैण्ट फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिए गए थे।

उन दिनों हिन्‍दी में जिन पत्रिकाओं की धूम थी उनमें हैदराबाद से प्रकाशित ‘कल्पना’ और सरस्वती प्रेस इलाहाबाद से निकलने वाली ‘कहानी’ पत्रि‍कायें प्रमुख थीं। नौटियाल जी की कहानी ‘भैंस का कट्या’ पहली बार 1954 में ‘कल्पना’ में छपी थी और उसकी अच्छी चर्चा रही थी। मार्कण्डेय का कहानी संग्रह ‘पानफूल’ भी ‘कल्पना’  से संबंधित प्रकाशन से ही प्रकाशित हुआ था। बनारस के युवा लेखकों का दल इलाहाबाद पहुँचता और हम लोग भी कभी-कभी बनारस का चक्कर लगा आते। तब बिरला छात्रावास में कविवर विश्वनाथ त्रिपाठी का कमरा, जिसके एक कोने में मेज पर अभिनेत्री नरगिस का फोटो रखा रहता था, हमारा स्थाई अड्डा था। अक्षोभ्येश्वरी प्रताप भी उसी छात्रावास में थे। विजयमोहन सिंह शायद शहर में कहीं अपने निजी आवास में रहते थे। विष्णुचंद्र शर्मा कालभैरव से गुटका पत्रिका ‘कवि’ का संपादन-प्रकाशन करते थे जिसके अगले अंक की सबको उत्सुक प्रतीक्षा रहती थी। केदार जी की नई कविताएँ सुनने का लोभ रहता था। उनसे इलाहाबाद आने का आग्रह करते। नामवर जी अक्सर इलाहाबाद आते रहते थे। वरिष्ठ पत्रकार श्रीकृष्णदास जी के घर पर मार्कण्डेय जी के कमरे में बैठकी जमती और वहीं ‘कहानी’ पत्रिका के लिए मासिक स्तंभ लिखा जाता।

नामवर जी ने जब चकिया-चन्दौली से लोकसभा के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से चुनाव लड़ा तब हम कुछ लोग इलाहाबाद से वहाँ पहुँचे थे। नौटियाल कंधे पर माइक रख कर दिन-दिन भर चुनाव प्रचार में जुटे रहे थे। खेतों के रास्ते, पगडंडियों पर धूप में चलते हुए, नारे लगाते लोगों का जुलूस और जोश देखते ही बनता था।

इन प्रारम्भिक मुलाकातों में ही मुझे विद्यासागर नौटियाल की जुझारू प्रकृति और स्पष्टवादिता का परिचय मिल गया था। उनमें एक पहाड़ी आदमी का अक्खड़ स्वभाव और आत्मसम्मान मुझे अपने अनुकूल लगा था। इस स्पष्टवादिता, अक्खड़पन और पहाड़ी स्वाभिमान ने उस बार इलाहाबाद में जो गुल खिलाया वह अप्रत्याशित था।

इलाहाबाद उन दिनों हिन्‍दी साहित्य का केन्‍द्र माना जाता था जहाँ एक ओर हि‍न्‍दी-उर्दू के अनेक प्रख्यात लेखक, कवि, कथाकार प्रगतिशील धारा से जुड़े थे वहीं दूसरी ओर एक अच्छी संख्या ऐसे प्रतिभाशाली रचनाकारों की भी थी जिनकी पहचान प्रयोगवादियों के रूप में की जाती थी। दोनों गुटों के बीच स्वस्थ रचनात्मक प्रतिद्वंद्विता के साथ वैचारिक वाद-सम्‍वाद भी चलता रहता था। सन् 1957 के दिसंबर माह में इलाहाबाद के प्रगतिशील लेखकों की पहल पर वहाँ पर एक अभूतपूर्व लेखक-सम्मेलन का आयोजन किया गया था। हिन्‍दी के प्रायः सभी नये-पुराने लेखक, कवि, कथाकार, नाटककार, आलोचक वहाँ उपस्थित हुए थे, शिवप्रसाद सिंह के साथ-साथ विश्वनाथ त्रिपाठी, विजयमोहन सिंह, अक्षोभ्येश्वरी प्रताप, विष्णुचंद्र शर्मा और विद्यासागर नौटियाल ने भी बनारस से आकर सम्मेलन में भागीदारी की थी।

लेखक सम्मेलन में सहित्य की विभिन्न विधाओं के लिए अलग-अलग कक्षों में गोष्ठियों की व्यवस्था की गई थी जहाँ उस विधा के रचनाकार और आलोचक अपनी विधागत समस्याओं पर विचार-विनिमय करने वाले थे। कहानी गोष्ठी की अध्यक्षता के लिए यशपाल जी का नाम प्रस्तावित था।

सम्मेलन स्थल पर गोष्ठी प्रारम्‍भ होने से पूर्व हम कुछ मित्रगण आगे होने वाले कार्यक्रम के सम्‍बन्‍ध में चर्चा कर रहे थे। इलाहाबाद में उन दिनों मैं और अमरकांत जी एक ही मुहल्ले में रहते थे। हमारे पड़ोस से ही संस्कृत के विद्वान और वृहद ‘संस्कृत साहित्य का इति‍हास’ के लेखक पंडि‍त वाचस्‍पति‍ गैरोला भी रहते थे जो गढ़वाल के मूल निवासी थे। यूँ गैरोला जी का हिन्‍दी कथा साहित्य से कुछ विशेष लगाव नहीं था लेकिन हम दोनों पड़ोसी कहानीकारों की संगत में उनकी मित्रता भैरवप्रसाद गुप्त और मार्कण्डेय से भी हो गई थी। गैरोला जी भी हम लोगों के साथ श्रोता और दर्शक के रूप में सम्मेलन स्थल पर पहुँचे थे।

उस जमाने में यशपाल हिन्‍दी के शीर्षस्थ जीवित कहानीकार माने जाते थे और मार्क्‍सवाद के प्रति‍ आस्था रखने वालों के लिये तो वह निर्विवाद प्रेरणा स्रोत थे। बातों-बातों में नौटियाल जी ने यशपाल की पहाड़ी पृष्ठभूमि पर लिखी हुई कुछ कहानियों का जिक्र करते हुए अपना मत प्रकट किया कि वह आज यशपाल जी से पूछेंगे कि उन्होंने उन कहानियों में पहाड़ की नारी का ऐसा चित्रण क्यों किया जिसे पढ़कर पाठक के मन में उसके प्रति अस्वस्थ धारण बनती है। फिर अन्य दूसरी बातें होती रहीं और नियत समय पर हम लोगों ने कहानी गोष्ठी वाले कक्ष में प्रवेश किया। वहाँ युवा कथाकारों का विशाल समूह एकत्र था। खूब गहमागहमी हो रही थी। मुझे याद है, कुछ देर बाद बहस शहरी बनाम ग्रामीण कहानी जैसे निरर्थक मुद्दे की ओर मुड़ गई थी। शहरी कथाकारों में राजेंद्र यादव और मोहन राकेश प्रमुख थे तो ग्रामीण कथाकारों में मार्कण्डेय और शिवप्रसाद सिंह! कमलेश्वर कस्बाई कथाकार की अलख जगाए थे। अधिकांश कहानीकार इस प्रकार के विभाजन के पक्ष में नहीं थे।

सहसा एक धमाका हुआ- श्रोताओं के बीच बंद गले का जोधपुरी कोट और चुस्त पैंट पहने एक कृशकाय व्यक्ति ने अध्यक्ष की ओर तर्जनी उठा कर तीखे स्वर में प्रश्न दागा, ‘‘आपने अपनी कहानियों में पर्वतीय नारी का अशोभन चित्रण क्यों किया है?’’ हॉल में सन्नाटा छा गया। यशपाल जी ने शायद कहा था, ‘‘मैं आपके पश्न का उत्तर दूँगा।’’ और गोष्ठी की कार्यवाही पूर्ववत चलने लगी। अपने अध्यक्षीय भाषण के समय यशपाल जी की नजरें क्रुद्ध प्रश्नकर्ता गैरोला जी को खोज रही थीं लेकिन वह प्रश्न दागने के तत्काल बाद ही उठ कर चल दिये थे। उत्प्रेरक बंधुवर नौटियाल भी शायद यशपाल जी के स्पष्टीकरण से संतुष्ट हो गए थे।

बनारस में रहते हुए विद्यासागर नौटियाल को कॉमरेड रुस्तम सैटिन, प्रो. चंद्रबली सिंह और जगत शंखधर जी से जो राजनीतिक, साहित्यिक संस्कार मिले थे उनका गहरा प्रभव तो था ही, उसके अतिरिक्त मुक्त पहाड़ी जीवन के प्रति दबा-छिपा आकर्षण उन्हें किसी सीमित जैविक दायरे में नहीं बाँध पाया और वह कुलवक्ती पार्टी कार्यकर्ता के रूप मे लौटकर पहाड़ आ गये। अपनी राजनीतिक व्यस्तताओं के चलते नौटियाल के साहित्यिक सरोकार भी कुछ शिथिल पड़ गये और भौगोलिक दूरी के कारण हम लोग परस्पर सम्‍पर्क विहीन हो गए।

याद है, कुछ वर्षों बाद एक दिन गर्मियों की दुपहर में अकस्मात नौटियाल इलाहाबाद में हमारे घर आ पहुँचे। नया सफेद झक्क खद्दर का कुर्ता-पाजामा और हाथ मे छाता लिये हुये। अपनी इस नई झक्क पोशाक में कुछ असहज सा अनुभव करते हुए उन्होंने स्वयं ही खुलासा कि‍या, ‘सुचेता भाभी ने दिया है। सीधे जेल से छूट कर आ रहा हूँ।’ उन दिनों सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं। देशभक्तों की कैद में नौटियाल जी ने राजनीतिक कारणों से लम्‍बा वक्त गुजारा है।

विद्यासागर नौटियाल ने देश-विदेश की अनेकों यात्राएँ की हैं। बहुत कुछ देख-सुना है। सम्‍भव है कभी इनके यात्रा संस्मरणों की पूरी पुस्तक ही पढ़ने को मिले। परन्‍तु अभी तो (डॉ. पूरन चंद्र जोशी की तरह) हमें भी उनसे पूछना है कि अपनी सोवियत संघ की यात्राओं के दौरान उन्हें सम्‍भावि‍त विघटन के लक्षणों का आभास हुआ था या नहीं? यदि हाँ, तो उन्होंने इसका उल्लेख कभी अपने लेखन मे किया या बहुत से अन्य लोगों की तरह ‘घर की बात’ समझ कर मौन रखना ही उचित समझा? यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान एक संक्षिप्त पत्र में उन्होंने मुझे वहाँ की जो स्‍थि‍ति‍ बयान की है वह उनकी पैनी दृष्टि और सामाजिक सरोकारों का प्रत्यक्ष उदाहरण है। दिनाँक 15 नवंबर 2005 को सनीवेल, कैलिफोर्निया से भेजे गये पत्र में विद्यासागर लिखते हैं-

‘मैं यहाँ किसी से ज्यादा सम्‍पर्क कर नहीं पाता। हमारे यहाँ पहुँच जाने के बाद 26 अक्‍तूबर को बेटी विद्युत के बेटे अतिशय ने जन्म लिया, जिसका पूरा नाम यों है- बालसुब्रमण्यन अच्तुत अतिशय। दीपावली उसी नये आये मेहमान के साथ बिताई। अपना समय भी उसके साथ कट जाता है। एक अपार्टमेंट के अन्‍दर रहते हुये अमेरिका को देखने-जानने लगा हूँ। एक डरा हुआ समाज, जिसमें किसी का किसी पर भरोसा नहीं। हर आदमी अपने में मस्त है या उलझा है। आपको होटल में, स्टोर में, पार्क में, सड़क पर या राह में कोई सुन्‍दर सा बच्चा दिखाई दिया। उसकी तरफ देख कर हँसना या कोई इशारा करना तो दूर की बात, हो सके तो उसकी ओर नजर ही मत डालिये। कोई पूछ सकता है- आपने मेरे बच्चे को इशारा क्यों किया? यह प्रश्न हथियार के बल पर भी पूछा जा सकता है।

अपने सबसे पास के पुस्तकालय में गया था एक दिन बेटी का कार्ड लेकर। वहाँ हिन्‍दी की कोई पुस्तक नहीं थी। लाइब्रेरियन ने मदद करनी चाही। कम्प्यूटर पर सूचना एकत्र कर एक दूसरी लाइब्रेरी का पता बताया, जहाँ हिन्‍दी की तीन पत्रिकाएँ आती हैं- सरिता, गृहशोभा और एक ऐसी ही पत्रिका जिसका मुझे नाम तक याद नहीं रह पाया। सनीवेल में भारतवासी चारों तरफ मौजूद मिलेंगे। उनकी संख्या नौ प्रतिशत है। पंजाबी, आंध्रा, तमिल, तेलुगु, गुजराती बड़ी दुकाने मौजूद हैं। सब प्रकार के भारतीय व्यंजन व पकवान उपलब्ध हैं। भारत के कच्चे, पक्के नारियल से लेकर अमूल मक्खन, हल्दीराम का प्रत्येक माल, हर तरह के मसाले, दालें और आंध्रा के चावल से लेकर देहरादून की बासमती तक सब कुछ मिल जाता है। दीवाली के मौके पर सड़क से जिन घरों में लडि़याँ जलती दिखाई देती थीं हम समझ जाते थे कि वे हिंदुस्तानी परिवारों के घर हैं। मेरे निकटतम अपार्टमेंट्स में कई भारतीय परिवार हैं। उनसे हमारी देखा-देखी होती है। दुआ-सलाम नहीं। उनमें से किसी को कभी हमारे घर आना होगा तो पहले फोन कर देंगे कि हम आ रहे हैं। अपने में उलझे हुए लोगों को कोई फुर्सत ही नहीं है।

लकड़ी के दुमंजिला भवन हैं, जिनमें हम रह रहे हैं। मेरे दामाद का कार्यालय यहाँ से बहुत करीब है: सिनाप्सिस एक सॉफ्टवेयर कम्पनी है। उसके भवन कई मंजिला हैं। लेकिन वे भी सब लकड़ी के बने हैं। बाहर से पता नहीं लग सकता कि यह भवन लकड़ी का बना होगा। अंदर बाथरूम तक में गलीचे बिछे हैं। स्नान टब से बाहर करने की कोई सुविधा या जरूरत नहीं। किचन में भी गलीचे बिछे हैं। आधी सर्दी तो यों ही दूर हो जाती है। घर के भीतर का बाथरूम आदि में कहीं भी जूता या चप्पल पहनने का सवाल ही पैदा नहीं होता।’

टिहरी बाँध के औचित्य को लेकर सरकार से एक लम्‍बे संघर्ष के दौर में उन्हें आर्थिक क्षति के साथ बहुत समय भी गँवाना पड़ा। इस दौरान उनकी साहित्यिक गतिविधियाँ प्रायः स्थगित रहीं। कुछ लोगों को शिकायत रही कि उन्होंने पराजय स्वीकार कर सरकार से अपनी जमीन-जायदाद का मुआवजा ले लिया है। शायद ये ऐसे ही लोग थे जो बाँध की योजना से अप्रभावित होने के साथ दूसरों से ही कुर्बानी देने की अपेक्षा रखते हैं। उन्हीं दिनों दिल्ली में मेरी उनसे भेंट हुई थी। उनके साथ युवा फिल्मकार अनवर जमाल भी थे जिन्होंने टिहरी पर एक वृत्तचित्र बनाया है। मैंने लोगों की शिकायतों के आधार पर मुआवजा स्वीकार करने के औचित्य पर उनसे प्रश्न किया तो उन्होंने बहुत व्यवहारिक उत्तर मुझे दिया था, ‘‘देखों भाई शेखर जी, किसी शहर में आपका मकान है, नगरपालिका वाले किसी योजना के तहत आपसे कहें कि हम यह मकान गिराएँगे, आप मुआवजा लेकर कहीं और बस जाओ। आपकी स्थिति अपने दम पर दूसरा मकान बना लेने की नहीं है और आप जानते हैं नगरपालिका आपके विरोध के बावजूद मकान ढहा ही देगी। तब आप क्या करेंगे? बाल-बच्चों को लेकर सड़क पर तो नहीं आ सकते। चार दीवारें उठा कर उनके ऊपर छत डालने के अलावा आपके पास चारा क्या है?’’ उनका तर्क मुझे ठीक लगा था। विशेष रूप से उस स्थिति में जब मुआवजे का लेन-देन भी एक धंधा बन गया हो और लोग नगरपालिका से साँठ-गाँठ कर मुआवजा लेने के लिए ढाँचे खड़े कर रहे हों। जिनके स्थायी भवन थे उनकी आधी-अधूरी कीमत भी भले सरकार ने दे दी हो लेकिन अपनी जड़ों से विस्थापन का कोई मूल्य चुका सकता है? जब तक आप जीवित रहेंगे आपको दिल में चुभे उस कांटे को बर्दाश्त करना ही होगा।

उत्तर प्रदेश सरकार में अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए विधायक कामरेड नौटियाल जब लखनऊ में सक्रिय रहे तब विधानसभा की कार्यवाही में योगदान देते हुए उन्हें एक बार भी सुन पाने का सुयोग मुझे नहीं मिल पाया। उनके भाषणों का पाठ करते हुए कल्पना ही कर सकता हूँ कि बी.एच.यू. का वह भूतपूर्व छात्रनेता वहाँ अपनी चुटीली भाषा में पहाड़ के अनाथों की कथा-व्यथा सुनाते हुए सरकार की कैसी खबर लेता होगा।

विधायकी का एक दौर और तीस वर्ष की वकालत की जीवनचर्या से मुक्ति पाकर विद्यासागर नौटियाल फिर एक बार साहित्य की दुनिया में लौट आए। यह उनके पाठकों और मित्रों के लिए प्रसन्नता का विषय है। कहानियाँ, उपन्यास, संस्मरण, साहित्यिक विमर्श हर विधा में महत्वपूर्ण योगदान देते हुए वह आज लेखनी के माध्यम से समाज का ऋण चुकता कर रहे हैं।

नौटियाल जी के यात्रा-संस्मरण ‘भीम अकेला’ को पढ़ कर मैंने उसे जातीय स्मृति का दस्तावेज कहा था। मेरी मान्यता है कि केवल भीम अकेला ही नहीं, नौटियाल जी का अधिकांश लेखन जातीय स्मृति का गौरवाशाली दस्तावेज है। यमुना के बागी बेटे, टिहरी, नंदादेवी, श्रीदेव सुमन, नागेंद्र सकलानी, मोहन उत्प्रेती, आचार्य डबराल जी की गाथा हमारी जातीय स्मृति की अनमोल धरोहर है।

टिहरी गढ़वाल के विभिन्न क्षेत्रों की छवियाँ उनके साहित्य में अपनी सम्पूर्ण अंतरंगता के साथ उपस्थित हैं। आकाश छूती ऊँचाइयों पर हरे-भरे बुग्यालों में अपने पशुओं के साथ एकाकी जीवन बिताने वाले गूजर हों अथवा घाटी में संघर्षशील जीवन व्यतीत करने वाले ग्रामीण, सभी अपनी विशिष्ट मुद्राओं में हमें अपनी जिजीविषा से चमत्कृत कर देते हैं। उनके जीवन प्रसंगों में काठिन्य, करुणा, दैन्य के अतिरिक्त प्रेम, माधुर्य और विनोद भी है। ऐसी विडंबनापूर्ण स्थितियाँ भी हैं जिन्हें पढ़ कर किसी संवेदनशील पाठक के होठों पर मुस्कान उतर आए, आँखें छलछला जाएँ। बिना बोहनी हुए उधार चाय न देने वाले दुकानदार के उधारी ग्राहक नकद चाय पीने वाले ग्राहक के आँगन में सुबह-सबेरे बैठे प्रतीक्षा कर रहे हैं कि वह कब सोकर उठे और दुकान की ओर चले। अधीर प्रतीक्षा के बीच वे उसे बीच-बीच में पुकार भी रहे हैं ‘अब उठ जा यार!’ जीवन को खुली आँखों देखने वाले विद्यासागर अबाधगति से रचनारत रहें, यही कामना है।

साहित्य के प्रमुख केंद्रों से दूर बैठकर साहित्य रचना करते हुए नौटियाल जी को निश्चय ही मित्रों के बीच अपनी रचनाएँ पढ़ने और उनका अभिमत जानने की ललक रहती होगी ताकि प्रकाशक को पाँडुलिपि देने से पूर्व वह अपने कृतित्व की नोक-पलक सुधार लें। यूँ, देहरादून में भी एक आत्मीय लेखक समाज है जिसमें हम्माद फारुकी साहब, जितेन्द्र जी, कांतिमोहन ‘सोज’, सुभाष पन्त, ओमप्रकाश वाल्मीकि, अल्पना मिश्र, कुसुम भट्ट, गुरदीप खुराना, विजय गौड़ आदि हैं लेकिन उनका मन होता होगा कि जिनके साथ उन्होंने लेखन की शुरुआत की थी वे उन्हें पहले की तरह अपनी खरी राय देकर आश्वस्त करें। दिनांक 12 मई 1993 को देहरादून से लिखे गये पत्र में वह कहते हैं-

अप्रैल अंत में त्रिलोचन शास्त्री की अध्यक्षता में सादतपुर में संपन्न एक गोष्ठी में, ‘सूरज सबका है’ का पाठ कर आया। इसके पाँच पृष्ठ कभी ‘सर्वनाम’ में छपे थे।

मैंने डॉ. काशीनाथ सिंह को लिखा है कि वे एक गोष्ठी जुलाई-अगस्त में काशी में आयोजित कर सकें तो लिखें, जिसमें मैं कुछ चुने हुए लोगों को ‘सूरज सबका है’ उपन्यास के कुछ अंश सुना सकूँ। काशी से आते-जाते क्या प्रयाग में एक ऐसी गोष्ठी आयोजित की जा सकेगी? निर्णय आपको करना है। मैं इधर लेखन पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर रहा हूँ।

सन् 1930 में टिहरी के सामंती शासन ने रवाई जनता पर निर्मम गोलीचार्ज किया था। उसे तिलाड़ी हत्याकांड के रूप में जाना जाता है। उसी पर एक उपन्यास की तैयारी कर रहा हूँ।

ऐसे सक्रिय रचनाकार के जीवन में एक व्यतिक्रम आ पड़ा। टिहरी बाँध के कारण उन्हें अपना गृहनगर छोड़ कर देहरादून में आकर घर बसाना पड़ा था। यह तब भी गनीमत थी कि वहाँ रहते हुए वह पहाड़ों से दूर नहीं हुए थे। लेकिन जून 2004 में जब मैं गर्मियाँ बिताने ईटानगर (अरुणाचल) गया हुआ था, नौटियाल ने 9 जून 2004 के पत्र में नोएडा से मुझे सूचित किया:

बीमार हूँ। घर में ताला डाल कर यहाँ एम्स में एन्जियोग्राफी करवाई- डॉक्टरों ने सर्जरी के लिए कहा है। छठी मंजिल में दिन गुजारने की विवशता है। यहाँ किसी से सम्‍पर्क नहीं हो पाता। कभी-कभार विष्णु को फोन कर लेता हूँ। हाथ से लिखने की आदत नहीं रह गई है, कंप्यूटर बिखरा पड़ा है। 8 पुस्तकें विजयमोहन जी से माँग लाया था। सोचा सर्जरी के बाद किसने देखा! एक दिन लौटा आया। अब कुछ भी अपने पास नहीं। सुबह को हिन्‍दी-अंग्रेजी अखबार आ जाते हैं, उन्हीं को ताका करता हूँ।

इसी क्षणिक अनिश्चितता की मनःस्थिति के बाद ही अगले पैराग्राफ में उनकी जीवन्तता और सामाजिकता मुखर हो उठी:

आपने हाथ चलाया और कहानी लिख डाली। मेरे लिए यह सबसे अच्छा समाचार है। आपकी श्रीमती जी का स्वास्थ्य आशा है अब पूरी तरह ठीक होगा। ईटानगर में रहते हुये डायरी तो लिख ही सकते हैं। बाद में काम आएगी। आप एक बार अपना आलस्य त्यागिए लिखने के मामले में। हम लोग अगले वक्तों के लोग नहीं हैं। जब तक हम हैं ज़माना हमारा होगा। अमरकांत के बारे में जान-सुन कर अच्छा लगता है। सक्रिय हैं, सब कुछ होने के बावजूद।

इधर मौसम बहुत अच्छा होने लगा है। दिन के बारह बज रहे हैं। बगैर पंखे के कमरे के अंदर बैठ कर यह पत्र लिख रहा हूँ। ‘साक्षात्कार’ में श्रीकांत वर्मा की डायरी प्रकाशित हुई है। अद्भुत है। वहाँ के समाचार दीजिए, अच्छा लगता है।

पुनश्चः निराश भूपेन हजारिका ने राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की है। बेचारे। यह भी सर मुंडवाकर ही हुआ।

कुछ माह पश्चात मैं पत्नी चंद्रकला के साथ नोएडा उनसे मिलने गया। सेक्टर-50 के ए.टी.एस. ग्रीन्स में एक बहुमंजिला इमारत के छठे माले में वह बिस्तर पर लेटे हुये थे। गढ़वाल के दुर्गम डांडों, गहरी घाटियों और आकाश छूते विस्तृत बुग्यालों को अपने पैरों से नापने वाला वह दुर्दान्त पगचारी सीमेंट के जंगल में छठी मंजिल के एक छोटे से कमरे में लाचार पड़ा था। मेरा मन भर आया। लेकिन नौटियाल जी के चेहरे पर बहुत दिनों बाद मिलने की खुशी फैली थी।

मैंने उन्हें केवल दो बार अपने आँसुओं को रोकते हुए देखा है। एक बार जब इलाहाबाद में उनकी बेटी अपने दो छोटे-छोटे बच्चों को अनाथ कर किसी गंभीर बीमारी के कारण चल बसी और दूसरी बार देहरादून के टाउनहॉल में जहाँ उन्हें प्रतिष्ठित ‘पहल’ सम्मान प्रदान किया जा रहा था। लेखकीय वक्तव्य में अपने जीवनानुभवों की चर्चा करते हुए एक प्रसंग पर उनका गला अवरुद्ध हो गया और आँखें भर आई थीं। वह प्रसंग एक सफाईकर्मी वृद्धा से जुड़ा था जो देहरादून के किसी मुहल्ले में घरों की सफाई निबटाकर उन घरों से मिली हुई रोटियां किसी मकान में भूमिगत नौटियाल जी और उनके साथियों के लिए रोज छिपा कर लाया करती थी। विद्यासागर उस अनाम माँ को नमन करते हुए भावुक हो गये थे।

विद्यासागर नौटियाल कई मामलों में एकदम मौलिक आदमी हैं। अपने बेटों के लिए इस्पाती और पंचशील तथा बेटियों के लिए विद्युत और अंतरिक्षा नाम चुनने वाले के लिए किसी ने कभी ‘मार्शल’ जैसा संबोधन चुना था तो वह गलत नहीं था।

अपने जन्मशताब्दी वर्ष में किसी रात नौटियाल जी के स्वप्न में आकर यदि पी.सी. जोशी उनसे कहें, ‘भाऊ, तेरा भवन अभी पूरा नहीं हुआ’ तो वह फिर पूरी शिद्दत के साथ पहाड़ की महागाथा लिखने में जुट जाएँगे।

यही कामना है।
(नोट: कुमाऊँनी में ‘भाऊ’ संबोधन छोटे भाई के लिए किया जा है।)

(शेखर जोशी की पुस्‍तक ‘स्‍मृति में रहें वे’ से साभार)

विश्व पुस्तक मेला शुरू

नई दिल्ली : प्रगति मैदान में 20वां विश्व पुस्तक मेला शुरू हो गया है। इसका उद्घाटन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने किया। मेला चार मार्च तक चलेगा। भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष इस मेले की थीम है। हॉल नंबर सात को थीम पैवेलियन बनाया गया है। जहां भारतीय सिनेमा से जुड़ी तमाम सामग्री व पुस्तकें उपलब्ध होंगी। साहित्य आधारित फिल्में भी दिखाई जाएंगी और कार्यशाला और विचार गोष्ठी का भी आयोजन होगा।

नई दिल्ली के राजधानी बनने के सौ वर्ष पूरे होने पर हॉल नंबर सात में विशेष प्रदर्शनी लगाई गई है। यहां दिल्ली के इतिहास की विभिन्न पुस्तकें भी उपलब्ध होंगी। इसके अलावा टैगोर की 150वीं जयंती के मौके पर हॉल नंबर छह में विशेष प्रदर्शनी लगाई गई है। पुस्तक मेले में बच्चों के लिए हॉल नंबर 14 में बाल मंडप बनाया गया है। जहां बच्चों के अनुकुल सामग्रियों का भंडार होगा और उनके लिए ज्ञानवर्धक कार्यक्रम भी होंगे।

इस मेले में साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियां प्रतिदिन हॉल नंबर 6, 8, व 14 में साहित्य पर आधारित संगोष्ठी, कार्यशाला व पुस्तक चर्चाएं और पुस्तक लोकार्पण के कार्यक्रम होंगे। साहित्य कला परिषद, दिल्ली सरकार द्वारा लाल चौक पर नियमित रूप से सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे।

इस मेले में सऊदी अरब हांगकांग, मलेशिया, जापान, पाकिस्तान, नेपाल, बंगलादेश, श्रीलंका, जर्मनी, संयुक्त अरब, अमीरात, चीन, तुर्की, दक्षिण कोरिया, स्पेन बेलारूस, फ्रांस, ईरान थाईलैंड, इजरायल और ब्रिटेन जैसे देशों के प्रदर्शकों के अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन यूनेस्को और विश्व बैंक जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी हिस्सा ले रहे हैं।

तोहरा नियर जिनगी में कोई ना हमार बा: सुधीर सुमन

कवि भोला

19 फरवरी, 2012 को जसम की गीत नाट्य इकाई ‘युवानीति‘ ने आरा में उसी जवाहरटोला की मुसहर टोली से अपने जनोत्सव अभियान की शुरुआत की, जहाँ से 34 साल पहले उसने अपना सफर आरम्भ किया था। इस मौके पर एक काव्यगोष्ठी भी आयोजित की गयी जिसमें कवि भोला, सुरेश कांटक, हीरा ठाकुर, सुमन कुमार सिंह, राकेश दिवाकर, जितेन्द्र कुमार आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। जनता के कवि भोला जी को उनके कविकर्म के लिए युवानीति-जसम और आरा शहर के नागरिकों की ओर से सम्मानित किया गया
इस अवसर पर युवानीति के नाटक ‘नौकर‘  की प्रस्तुति भी हुई और शाम को चेतन आनंद की मशहूर फिल्म ‘नीचा नगर‘ और बीजू टोपो व मेघनाथ के वृतचित्र ‘विकास बन्दूक के नाल से‘ का प्रदर्शन हुआ। युवानीति ने लगभग हर सप्ताह इस तरह के आयोजन पूरे शहर में करने का निर्णय लिया है।
कवि भोला के अभिनंदन समारोह के मौके पर लिखी गई लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की टिप्पणी और उनकी तीन कवितायें –

यह ऐतिहासिक मौका है कि ‘युवानीति‘ आज उसी मुहल्ले में नाटक करके अपने नये अभियान की शुरुआत कर रही है, जहां से उसने चैतीस साल पहले कथाकार मधुकर सिंह की कहानी ‘दुश्मन’ के मंचन के साथ अपने सफर का आरम्भ किया था। इस बार वह नाटक के साथ कविता और फिल्मों को लेकर भी आई है। फिल्में भी ऐसी जो आमतौर पर सिनेमा हाॅल और टीवी पर नजर नहीं आतीं, पर जो जनता के हित में हैं और उसकी बदहाली के वजहों की शिनाख्त करती हैं। जो जनता की जिंदगी को बदल देने का रास्ता बताती हैं। और कविता की वही परम्परा है जिसे रमता जी, नागार्जुन, गोरख पांडेय, विजेंद्र अनिल, अकारी जी, नरायण कवि आदि ने गढ़ा है, जो कविता गरीब-मेहनतकश जनता के संघर्षों की ऊर्जा और बुनियादी बदलाव के संकल्प से लैस है। भोला कवि की जिन्दगी की जद्दोजहद ने इसी परम्परा में उन्हें अपनी मुक्ति की तलाश के लिए प्रेरित किया है। आज यह सुखद संयोग है कि इस आयोजन में युवानीति-जसम और आरा शहर के नागरिकों की ओर से उनके कविकर्म के लिए उन्हें सम्मानित किया जा रहा है।

मैं और युवानीति के पूर्व सचिव सुनील सरीन ट्रेन के रद हो जाने के कारण इस आयोजन में शामिल नहीं हो पाये हैं। बेशक इस वक्त हम देश की राजधानी दिल्ली मंे हैं, जहां सिर्फ और सिर्फ देश की गरीब-मेहनतकश जनता को छलने की योजनायें बनती हैं, लेकिन आज हमारी निगाह अपने आरा शहर के इस छोटे से मुहल्ले पर लगी हुई है, जहां जनता के सांस्कृतिक-राजनीतिक और सामाजिक जीवन को बदलने की जद्दोजहद चल रही है, जहां दिल्ली-पटना के सरकारों के विकास और सुशासन के नकली दावांे के खिलाफ जनता के बदलाव की आकांक्षा को स्वर मिल रहा है। न केवल स्वर मिल रहा है, बल्कि इस आकांक्षा को यहां सम्मानित भी किया जा रहा है। भोला जी की कविताएं क्या हैं, आम जनता का दुख-दर्द ही तो है उनमें, जनता की जिन्दगी में बदलाव के लिये जो लम्बा संघर्ष चल रहा है, जो उसकी आजादी, बराबरी और खुदमुख्तारी का संघर्ष है, उसी के प्रति उम्मीद और भावनात्मक लगाव का इजहार ही तो है उनकी कवितायें। उन्होंने कोई पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार के लिए तो लिखा नहीं। जिस तरह कबीर कपड़ा बुनते हुए, रैदास जूते बनाते हुए कविताई करते रहे, उसी तरह भोला पान बेचते हुए कविताई करते रहे हैं। भोला आशु कवि हैं यानी ऐसे कवि जो तुरत कुछ पंक्तियां गढ़के आपको सुना देते हैं। महान कवियों के इतिहास में शायद भोला का नाम दर्ज न हो पाए, पर जिस तरह इतिहास में बहुसंख्यक जनता का नाम भले नहीं होता, लेकिन वह बनता उन्हीं के जरिये है, उसी तरह भोला की कवितायें भी हैं। वह आरा काव्य-जगत की अनिवार्य उपस्थिति रहे हैं। जसम के पहले महासचिव क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में हर साल होने वाली नुक्कड़ काव्यगोष्ठी ‘कउड़ा’ के आयोजन में भोला जी का उत्साह देखने लायक होता है। हमने देखा है कि जब भी उन्हें कार्यक्रमों में बोलने का मौका मिला है, वह कम ही शब्दों में बोलते रहे हैं, पर हमेशा उनकी कोशिश यह रही है कि कुछ सारतत्व-सा सूत्रबद्ध करके रख दें। और ऐसे मौके पर अक्सर लोग उनकी कुछ ही पंक्तियों के वक्तव्य पर वाह, वाह कर उठते रहे हैं।

भोला को मैं अपने बचपन से नवादा थाने के इर्द-गिर्द ही पान की गुमटी लगाते देख रहा हूं। वहीं बैठकर वे गरीब-मेहनतकशों पर जुल्म ढाने वाले थाने और कोर्ट को उड़ाने और जलाने की बात करते रहे हैं, बेशक व्यावहारिक तौर पर नहीं, जुबानी ही सही, पर इन संस्थाओं के प्रति जनता का जो गहरा गुस्सा है, वह तो इसके जरिये अभिव्यक्त होता ही रहा है। कितनी बार उन्हें प्रशासन के अतिक्रमण हटाओ अभियान के कारण वहां से हटना पड़ा, पर बार-बार वे वहीं आकर जम जाते रहे। उनका पान दूकान आरा में जनसंस्कृति और जनता की राजनीति से जुड़े लोगों के मेल-मिलाप का अड्डा रहा है। और वह खुद भी तो शहर में भाकपा-माले के हर आंदोलन और अभियान का अनिवार्य अंग रहे हैं। वह उन समझदार लोगों में नहीं हैं, जो सिर्फ अपनी और अपने घर-परिवार की ही जिन्दगी को बदलने में लगे रहते हैं, बल्कि वह उनकी कतार में रहे हैं, जो सबकी जिन्दगी को बदलते हुए अपनी जिन्दगी को बदलना चाहते हैं। भले व्यंग्य में कभी उन्होंने खुद पर बेवकूफ पान वाले का लेबल लगा लिया था, पर वह पढ़े-लिखे और अपने ही निजी स्वार्थ की दुनिया में खोये रहने वाले समझदारों में से नहीं हैं, बल्कि उन समझदारों में से हैं जिनके लिए रमता जी ने कहा था कि राजनीति सबके बूझे के बुझावे के पड़ी, देशवा फंसल बाटे जाल में छोड़ावे के पड़ी। भोला जी शहर में माले और जसम की गतिविधियों मे शिरकत करते और पान की दुकान पर बैठे हुए कांग्रेस और गैर-कांग्रेस की तमाम सरकारों को आते-जाते देखते रहे हैं और उन्होंने महसूस किया है कि गरीबों की पीड़ा खत्म ही नहीं हो रही है। आप इसी गीत को देख लीजिए-

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा

कांग्रेस के लंबे शासन के बाद लालू जी जो ब्राह्मणवाद और धार्मिक अंधविश्वास की आलोचना करते हुए सत्ता में आए थे, वह बहुत ही जल्दी उसी की शरण में चले गये, लेकिन भोला जी ने ऐसा नहीं किया, बल्कि अपनी पान की दुकान पर बैठकर उनकी सरकार की भी आलोचना की। जिन्दगी भर वे किराये के घर में रहे, बाल-बच्चों के लिए जितना करना चाहिए था, उतना कर नहीं पाए, लेकिन वह अपनी मुश्किलों के हल के लिए किसी देवी-देवता के शरण में नहीं गये और न ही मुश्किलों के कारण निराशा में डूबे। उनकी कविता में भी गरीब तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सवाल पूछता है और यह सवाल पूछना ही उनकी कविता और व्यक्ति दोनों की ताकत है। मुझे ‘जनमत‘ के पुराने अंक में पढ़ी हुई ‘मैं आदमी हूं’ शीर्षक की उनकी एक कविता याद आती है, जिसमें उन्होंने मेहनतकश मनुष्यों की जुझारू शक्ति, शान और सौन्दर्य के बारे में लिखा था। इतना ही नही, भोला ने जाने-अनजाने हमें यह सिखाया कि गरीब-मेहनतकश आदमी की निगाह से देखने से ही शासन-प्रशासन के दावों और समय का असली सच समझ में आ सकता है। ‘पढ़निहार बुड़बक का जनिहें, का पढ़ावल जा रहल बा’ कविता इसी की तो बानगी है, जिसमें वे अखबार की खबरों पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि नीचा को ऊंचा और ऊंचा को नीचा बताया जा रहा है, जिन्हें शरीफ कहा जा रहा है, दरअसल लोगों की निगाह वे लुच्चे हैं। उसी कविता में आगे वह कहते हैं गरीबन के कइसे गारल जा रहल बा। अपनी आवाज के जरिये वे बकायदा गारने (कसकर निचोड़ने) की प्रक्रिया को भी व्यक्त करते हैं।

आज जबकि बिहार सरकार ग्लोबल समिट के नाम पर जनता के करोड़ो रुपये फूंक रही है और जिस तरीके से जनता को बेवकूफ बनाने का खेल चल रहा है, उसके परिप्रेक्ष्य में मुझे ‘जनमत‘ में ही सितंबर 87 में छपी भोला जी की एक और कविता की याद आती है- जान जाई त जाई, ना छूटी कभी/बा लड़ाई इ लामा, ना टूटी कभी (जान जाए तो जाए, पर न छूटेगी कभी/है लंबी लड़ाई जो नहीं टूटेगी कभी)। और इस लंबी लड़ाई में यकीन के बल पर ही भोला आज दो टूक कहते हैं- जनता के खीस (गुस्सा), देखिंहे (देखेंगे) नीतीश। भोला जानते हैं कि यह लड़ाई लम्बी है और इसमें दुश्मनों और दोस्तों की पहचान लगातार होनी है। जिस तरह गरीब जनता सरकार और प्रशासन के नस-नस को जानती है, उसी तरह भोला भी उन्हें जानते-समझते हैं। उनके पैमाने से अफसर और मच्छड़, हड्डा और गुंडा, नेता और कुत्ता एक ही हैं। अब नेता तो जनता के संघर्ष के भी होते हैं, पर उनके लिए उनका पैमाना अलग है, यहां तो नेता साथी होते हंै। तभी तो 1987 की कविता में उन्होंने लिखा कि ‘साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल/नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी।’ और यह नेह कभी नहीं खत्म नहीं हुआ। आज भी वे उसी लगाव से कहते हैं-

तोहरा नियर केहू ना हमार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा।

अस्वस्थता के कारण भले ही उनका शरीर कमजोर हो गया है, पर जिनिगी का तार पहले की तरह ही मजबूत है। सलामत रहे भोला का गोला यानी उनकी कविताओं की पुस्तिकायें। सलामत रहे उनका लाल झोला और उसमें रखा उनका हथौड़ा, जिसके बल पर वे जनता के दुश्मनों से फरिया लेने का हौसला रखते रहे है।

कवि भोला की भोजपुरी रचनाएं और उनका हिंदी अनुवाद

तोहरा नियर केहू ना हमार बा

तोहरा नियर केहू ना हमार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
जिनिगी के जानि जवन खास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
हेने आव नाया एगो दुनिया बसाईं जा
जिनिगी के बाग आव फिर से खिलाईं जा
देखिए के तोहरा के मिलल आधार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
दहशत में पड़ल बिया दुनिया ई सउंसे
लह-लह लहकत बिया दुनिया ई सउंसे
छोडि़ जा दुनिया आव लागत ई आसार बा
(आप सब के जैसा कोई और हमारा नहीं है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
मन को आशा और विश्वास आप ही से मिला है
जिन्दगी को खास जान आप ही से मिला है
आप ही से मेरी जिन्दगी का तार जुड़ा है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
इधर आइए एक नई दुनिया बसाई जाए
जिन्दगी के बाग को फिर से खिलाया जाए
आपको देखके ही मुझे आधार मिला है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
यह सारी दुनिया दहशत में पड़ी हुई है
यह दुनिया लह-लह लहक रही है
इस दुनिया को छोड़के आइए, यही आसार लग रहा है)

जान जाई त जाई

जान जाई त जाई, ना छूटी कभी
बा लड़ाई ई लामा, ना टूटी कभी
रात-दिन ई करम हम त करबे करब
आई त आई, ना रुकी कभी
बा दरद राग-रागिन के, गइबे करब
दुख आई त आई, ना झूठी कभी
साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल
नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी
5 सितंबर, 87 समकालीन जनमत में प्रकाशित
(जान जानी है तो जाए, पर नहीं छूटेगी कभी
यह लड़ाई तो तो लम्बी है, नहीं टूटेगी कभी
रात-दिन यह कर्म तो हम करेंगे ही करेंगे
आना होगा तो आएगा ही, नहीं रुकेगा कभी
यह दर्द है राग-रागिनी का, जिसे गाऊंगा ही
साथी का यह साथ मुझे जबसे मिला है
स्नेह की यह लता तो नहीं कभी सूखेगी नहीं)

आज पूछता गरीबवा

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
जाति धरम के हम कुछहूं न जननी
साथी करम के करनवा बतवनी
ना रोजी, ना रोटी, न रहे के मकनवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा
माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी
दिहनी बहुते कुछुवो न पवन
इ लोरवा, इ लहूवा से बूझल पियसवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा।
( कौन है देवी-देवता और कौन है मालिक
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
बाढ़ में डूबे, सुखाड़ में सुखाए
जाड़ों की रातें कलप के बिताए
करें किस पर भरोसा, पूछें हम तरीका
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
जाति-धरम को हमने कुछ नहीं जाना
साथी कर्म के कारणों को बताए
न रोजी है, न रोटी और न रहने का मकान
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
मिट्टी, पत्थर, धातु और कागज पर देखे
उसे दिए बहुत, पर कुछ भी नहीं पाए
आंसू और खून से अपनी प्यास बुझाए
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।)

लेखक लघु या वृहत की चिंता न करें : नामवर सिंह

नई दि‍ल्‍ली : पि‍छले एक सौ पचास वर्षों में कहानी का वि‍कास हुआ है। आज की कहानी कि‍स तरह भि‍न्‍न है, कौन-कौन लि‍ख रहे हैं और उनका मनतव्‍य क्‍या है, यह समझने की जरूरत है। दूर-दराज के क्षेत्रों में जो लि‍ख रहे हैं, उन्‍हें मुख्‍यधारा में लाना चाहि‍ये। लेखक का काम है लिखना, उसे उसके लघु या वृहत होने की चिंता नहीं करनी चाहिये। यह बात वरि‍ष्‍ठ आलोचक नामवर सिंह ने भोपाल से नि‍कलने वाली त्रैमासि‍क पत्रि‍का ‘प्रेरणा’ के लघु उपन्‍यास पर केन्‍द्रि‍त अंक का लोकार्पण करते हुए कही। इस अवसर पर सि‍लीगुडी से नि‍कलने वाली पत्रि‍का ‘तीस्‍ता हि‍मालय’ का भी लोकार्पण कि‍या गया।

बलराम ने अमेरि‍कन लेखि‍का हेलेन के उपन्‍यास के बारे में बताया जि‍समें केवल पत्र शामि‍ल हैं। उन्‍होंने लघु पत्रि‍काओं की भूमि‍का को भी रेखांकि‍त कि‍या।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए शैलेन्‍द्र चौहान ने कहा कि‍ आज जो हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य जीवि‍त है, वह सि‍र्फ लघु पत्रि‍काओं की वजह से है। मुख्‍यधारा की पत्र-पत्रि‍काओं में साहि‍त्‍य को हाशि‍ये पर डाल दि‍या गया है। ये पत्र-पत्रि‍कायें साहि‍त्‍य को स्‍थान नहीं देतीं। इस अवसर पर महेश दर्पण, पल्‍लव, अशोक मि‍श्र, राजेन्‍द्र लहरया आदि‍ ने भी विचार रखे।

उड़ानें भर रहे हैं लम्‍बी लम्‍बी, परिंदे आबोदाना ढूंढते हैं

नई दिल्‍ली : ‘आनंदम  संगीत व साहित्य सभा’ की फरवरी माह की गोष्ठी 13 फरवरी, 2012 को कस्तूरबा गाँधी मार्ग स्थित हिमालय हाऊस के मैक्स न्यूयॉर्क के सभागार में आयोजित हुई। इसमें मुन्नवर सरहदी विशिष्ट कवि थे और उनके अतिरिक्त लाल बिहारी ‘लाल’, उमर हनीपा ‘लखीम्पुरी’, सैफ सहरी, नागेश चन्द्र, आशीष सिन्हा ‘कासिद’, हमीद जैदी, साज़ देहलवी, रमेश भाम्भानी,  मासूम गाजियाबादी, मजाज़ अमरोहवी आदि कवियों ने भाग लिया।

मुन्नवर सरहदी वैसे हास्य की शायरी के लिये प्रसिद्ध हैं, पर इस बार उन्होंने कुछ गंभीर नज्में भी सुनाईं। जैसे-
हम सुनाते है तुम्हें इक दास्ताने मुख़्तसर
देश प्यारा था जिन्हें वे देश के प्यारे गए
जंगे-आजादी में हिंसा और अहिंसा कुछ नहीं
खुद गरज़ ज़िंदा रहे और बेगरज मारे गए।

मजाज़ अमरोहवी हमेशा की तरह गज़ल के  रंग में  रहे। उनका एक शेर-
उड़ानें भर रहे हैं लम्‍बी लम्‍बी
परिंदे आबोदाना ढूंढते हैं।

गज़ल में साज़ देहलवी का जवाब नहीं। उन्होंने एक सशक्त गज़ल सुनाई-
इतना बेताब  ना हो क़र्ज़ की पगड़ी के लिये
रहन में आबरू और सूद को सर जाता है.

गज़ल का  एक  और रंग-
आँखों में जब तक है जगमग गाँव के गलियारों की
फीकी है तब तक हर रौनक  इन शहरी चौबारों की। (नागेश चन्द्र).

मासूम गाजियाबादी ने सुनाया-
भीख ठुकरा दी उस शख्स की एक भिखारिन ने यह कह कर
तेरे हाथों में इमदाद है तेरी आँखों में उन्माद है

दर्द देहलवी ने कहा-
दरिया है हम हमारी तू दरियादिली ना पूछ
जिस से मिले हैं उसको समुन्दर बना दिया.

अंत में  ‘आनंदम’ संस्थापक अध्यक्ष ने सभी कवियों का धन्यवाद करके गोष्ठी संपन्न की।
प्रस्‍तुति :  प्रेमचंद सहजवाला

 

पहला अनि‍ल सि‍न्‍हा स्‍मृति‍ कार्यक्रम 25 को

लखनऊ : अनि‍ल सि‍न्‍हा मेमोरि‍यल फाउंडेशन का पहला सालाना स्‍मृति‍ कार्यक्रम 25 फरवरी, 2012 को थ्रस्‍ट सभागार, भारतेन्‍दु नाट्य अकादेमी, लखनऊ में दोपहर 2 बजे से आयोजि‍त कि‍या जायेगा। मशहूर स्‍कॉलर और कला, थि‍येटर व फि‍ल्‍म आलोचक समि‍क बंधोपाध्‍याय ‘The Contested Ground of Culture ’वि‍षय पर अनि‍ल सि‍न्‍हा मेमोरि‍यल व्‍याख्‍यान देंगे। इस अवसर पर अनि‍ल सि‍न्‍हा अवॉर्ड भी दि‍या जायेगा। पहला अवॉर्ड एक राष्‍ट्रीय हि‍न्‍दी पत्रि‍का से जुडे़ और जन-पक्षधर ब्‍लॉग ‘जन-ज्‍वार’ चलाने वाले पत्रकार अजय प्रकाश को दि‍या जायेगा। भारत और बांग्‍लादेश में एथनोम्‍यूजि‍कोलॉजि‍कल रि‍सर्च से जुड़ी कलाकार और गायि‍का मौसमी भौमि‍क एक खास सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम पेश करेंगी। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता वरि‍ष्‍ठ हि‍न्‍दी कवि‍ आलोक धन्‍वा करेंगे।

कार्यक्रम में अनि‍ल सि‍न्‍हा के सफर पर फोटो स्‍लाइड्स/वीडि‍यो शो होगा। इस अवसर पर समारोह की ‘स्‍मारि‍का’ और चि‍त्रकार-लेखक अशोक भौमि‍क की कि‍ताब ‘भारतीय चि‍त्रकला : हुसैन के बहाने’ का लोकार्पण भी कि‍या जायेगा।

अलग रास्‍ता बनना सार्थक रचनाशीलता की पहचान : काशीनाथ

‘काशी का अस्सी’ के अंश सुनाते कथाकार काशीनाथ सिंह।

दिल्ली : नरभक्षी राजा चाहे कितना भयानक हो दुर्वध्य नहीं है, उसका वध सम्‍भव है। चर्चित उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ के एक अंश को सुनाते हुए साहित्य अकादमी पुरस्‍कार से सम्मानित हुये हिन्दी कथाकार काशीनाथ सिंह ने कहा कि अपना अलग रास्ता बनाना सार्थक रचनाशीलता की पहचान है। गुरु गोविन्‍द सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्विद्यालय के अंग्रेजी विभाग के युवा विद्यार्थियों को अपनी रचना प्रक्रिया से सम्बन्‍धि‍त रोचक तथ्यों को बताते हुए उन्होंने कहा कि यदि मेरे लेखन में पाठक को कुछ नया और मौलिक नहीं मिलता तो भला उसे कोई क्यों पढे़गा? उन्‍होंने युवा विद्यार्थियों को कहा कि वे अपने लिये जो काम पसन्‍द करें, उसे सर्वोत्तम ऊर्जा और निष्ठा के साथ पूरा करें तो उन्हें आगे जाने से कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने इस अवसर पर महान शायर फैज़ अहमद फैज़ से अपनी मुलाकातों को याद करते हुये अनेक संस्मरण भी सुनाये।

इससे पहले विश्वविद्यालय के कुल सचिव डॉ. बी.पी.जोशी ने सिंह का स्वागत करते हुए कहा कि अकादमिक संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे अपने समय के प्रतिनधि रचनाकारों-चिंतकों से युवा विद्यार्थियों को साक्षात सम्‍वाद के अवसर प्रदान करें। उन्होंने कहा कि ‘लेखक से मिलिये’ श्रृंखला का यह आयोजन ऐसे अवसर पर हो रहा है जब साहित्य अकादमी से सम्मानित होकर काशीनाथ जी हमारे बीच आये हैं।

युवा आलोचक और हिन्दू कॉलेज के सहा. आचार्य डॉ. पल्लव ने काशीनाथ सिंह के सृजन कर्म की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि विचारधारा से जुड़े लेखकों पर आरोप लगता है कि वे बहुधा प्रयोगशील नहीं हो पाते,लेकिन काशीनाथ सिंह का लेखन इस बात का उदाहरण है कि एक लेखक किस तरह लगातार अपना विकास कर सहित्य को श्रेष्ठ देता है। उन्होंने कहा कि कथ्य के साथ-साथ शिल्प में भी काशीनाथ सिंह ने लगातार नये और पाठकधर्मी प्रयोग किये हैं। अधिष्ठाता प्रो. अनूप बैनिवाल ने कहा कि मनुष्य में  सीखने की प्रक्रिया निरंतर चलती है और सृजनधर्मियों से संवाद सरीखे आयोजन इस प्रक्रिया को अधिक गतिशील बनाते हैं।

कार्यशाला में बनाये चित्रों को वि‍तरि‍त करते काशीनाथ सिंह।

आयोजन की शुरुआत में फैज़, मखदूम और पाब्लो नेरूदा की नज्मों-कविताओं की प्रस्तुति दी गयी। विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं द्वारा एक कार्यशाला में बनाये चित्रों को काशीनाथ सिंह द्वारा वितरित किया गया। साथ ही फैज़ अहमद फैज़ के जन्म शताब्दी वर्ष में आयोजित संगोष्ठी में भागीदारी करने वाले विद्यार्थियों को सिंह ने फैज़ की प्रतिनिधि शायरी की पुस्तक भी भेंट की। पुस्तक वितरण राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रायोजित किया गया था। विभाग की ओर से डॉ. विवेक सचदेव ने काशीनाथ सिंह का अभिनन्दन और स्वागत अंगवस्त्रम अर्पित कर किया और कुल सचिव डॉ. जोशी ने विनायक प्रतिमा भेंट की। आयोजन में डॉ. आशुतोष मोहन, डॉ.चेतना तिवारी, डॉ. शुचि शर्मा, डॉ. नरेश वत्स सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी भी उपस्थित थे।

प्रस्‍तुति‍ : डॉ. आशुतोष मोहन

अफसर मेहरबान तो कीडे़ पहलवान : वीरेन्‍द्र नारायण झा

वीरेन्‍द्र नारायण झा

चर्चित लेखक वीरेन्‍द्र नारायण झा का व्‍यंग्‍य-

बेगूसराय में गरीबी का दाना बना कीड़ों का निवाला। यह समाचार भले ही विपक्षियों के लिये घर बैठे मुद्दा बन गया हो लेकिन इसमें सरकारी अफसर की उदारता साफ झलकती है। आज तक जितनी भी सरकारें बनीं सभी गरीबों की भलाई के लिये प्रतिबद्ध रहीं। गरीबी ना हो तो मानो सरकार के पास हटाने के लिये कुछ बचता ही नहीं। चाहे राज्य सरकार हो या केन्द्र सरकार। गरीबी दूर करने के लिये लोक लुभावन योजनायें चलायी जा रही हैं। इनके नाम भी लुभाते हैं, काम तो खैर सुहाते ही हैं। लेकिन कोई सरकार ऐसी नहीं कि गरीब-लाचार कीड़े-मकोडे़, पशु-पक्षी, साँप-बिच्छू की खातिर सोचे। योजनाओं में अगर पशु-पक्षी शामिल भी हैं तो कीड़े-मकोडे़ के लि‍ये अलग से न कोई योजना है और न ही सपना।

हाँ, यह बात दीगर है कि पहले के साधु-सन्‍त उनके लिए भी दया का भाव रखते थे जैसे मानव प्राणी के लिये। उनके कष्ट से वे दुखी होते थे। इसलिये खुद कष्ट उठाकर उन्हें किसी प्रकार दुख नहीं देते थे। यह उनकी उदारता थी और सभी जीव-जन्‍तुओं के प्रति अगाध प्रेम। बिलकुल वही सहृदयता दिखाई है बिहार राज्य खाद्य निगम के गोदाम वालों ने।  बेगूसराय से सटे तिलरथ में एससीआई के गोदाम में गरीबो के लिये रखा गया 25 क्विटंल गेहूँ सड़ गया। सडा़ इसलिये कि गोदाम पिछले आठ महीने से खोला नहीं गया। खोला इसलिये नहीं गया कि उस पर ताला लटक रहा था और उसे खोला नहीं गया। ताला नहीं खुला क्योंकि गोदाम में तक़रीबन 50 हज़ार बोरे गेहूँ को सड़ना था। सड़ना इसलिये था कि उसे सड़ना था। सो हुआ। अब कितना सडा़ और कितना नहीं, यह जाँच के बाद पता चलेगा। सरकारी जाँच कि अपनी प्रक्रिया होती है। अपनी रफ़्तार होती है। तब तक सड़ने कि प्रक्रिया जारी रहेगी और कीड़े अंत्योदय, अन्नपूर्णा, बीपीएल व एपील सहित अन्य योजनाओं के लाभुको के हिस्से चट करने का सुअवसर प्राप्त करते रहेंगे। योजनाकारों के लिये यह आँखें खोलने वाली बात तो नहीं, वाक्या जरूर है। सरकारी भाषा में इसे सबक भी कहा जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिये कि योजनाकार अब सिर्फ गरीब-गुरबों के कल्याणार्थ योजनाओं पर ही विचार नहीं करेंगे, अपितु कीड़ों को भी सुध लेंगे।

सौ टके का सवाल यह है कि देश के कीड़ों के लिये कौन सोचेगा? कीडे़ की जिन्‍दगी जीनेवालों, जूठे पतल चाटकर भूख मिटानेवालों, कचरा बिन कर गुजर-बसर करने वालों के लिये अगर यह राज्य/देश सोच सकता है तो सही में कीट योनि मे जन्मे-पले-बढे़ कीड़ों के लिये कौन अपना वक्त बर्बाद करेगा?

लेकिन समय बडा़ बलवान होता है। जिसका कोई नहीं उसका खुदा होता है। खुदा दिखता नहीं, लेकिन माध्यम बनकर आता है। आज वह एफसीआई के हाकिमों के हवाले कीड़ों पर मेहरबान हुआ है। और ऊपरवाला मेहरबान तो कीडे़ भी पहलवान। एक-दो क्विंटल कौन कहे, हजारों क्विंटल अनाज से मालोमाल कर देता है। खाते रहो बदें सुशासन की शुक्रिया अदा करते रहो। जितना जी चाहे उतना खाओ। कौन रोकेगा, सारा गोदाम ही दे दिया। वो भी बंद गोदाम। कोई देखने वाला नहीं। कोई खोलने वाला नहीं। तनख्वाह मिलती रहे, तुम्हें भोजन नसीब होता रहे। भला हो अन्य उपजाने वालों का, भण्डारा करने वालों का और ताला जड़ने वालों का।

मगर सब दिन रहत ना एक समाना। आठ महीने के भोजन से कीड़ों की सारी जिन्दगी नहीं कटने वाली। उन्हें भी खाद्य सुरक्षा की गारण्टी चाहिये। लेकिन मजदूरों के पेट के कीडे़ जब भूख से बिलखिलाने लगे तो गोदाम मे बंद कीड़ों पर आफत आन पडी़। उन्हें अपने मुँह के निवाले छिनने के आसार नजर आने लगे जैसे गरीबों के हिस्से आने के पहले छिन जाते हैं। या छिन्‍न-भिन्‍न हो जाते हैं। और भूख के मारे ये कीडे़ न तो भ्रष्टाचार जानते हैं, न मंहगाई और न कालाधन। ये तो सिर्फ मुट्ठी भर अनाज जानते हैं। सो भी अब उनसे दूर होने वाला है।

जाँच के दौरान मजदूरों ने खुलासा किया कि उन्हें अपनी मजदूरी में से गोदाम के अधिकारियों को कमीशन देना पड़ता था। कमीशन देने से अगर मजदूरी मिलती रहे तो क्या बुरा है भाई। कमीशन देकर तो बडे़-बडे़ ठेके मिलते है़, लाइसेंस मिलते हैं, सदन में जगह मिलती है, रोजगार मिलते हैं। क्या नहीं मिलता है। मजदूरी के लिये अगर कमीशन देनी पडी़ तो कौन सा भ्रष्टाचार का पहाड टूट गया। हर कमीशन लेने वाला कई मकानों का मालिक तो नहीं होता कि उसके मकान में सरकारी स्कूल या गोदाम खोल दिया जाये और गोदाम मे बंद पडे़ कीडे़ तो कमीशन देने से रहे। तो ऐसे में मजदूरों को ही कमीशन देना पडे़गा न। लेकिन मजदूरों में जब दूसरा खुलासा किया तो बडे़-बडे़ के दिमाग के कीडे़ उ-लाला उ-लाला गाने लगे। रोज शाम को गोदाम बंद करते समय बोरों पर पानी का छिड़काव किया जाता था ताकि सुबह उठाव के वक्त वजन बढ़ जाये। इसे कहते हैं लल्लन टॉप तरीका। हींग लगे न फिटकिरी रंग चोखा।

इस पर पटना बिहारी का कहना था कि बोरों पर पानी फेंकना इसलिये भी जरूरी हो गया कि कीड़ों को भोजन के पश्चात जल की आवश्यकता थी। आखिर अन्न और जल दोनों चाहिये न। बिना पानी का भोजन थोडे़ न सम्पन्न होता है।

इस रहस्य को अफसर के सिवा भला और कौन जान सकता है?