Archive for: January 2012

समय का पहिया चले रे साथी समय का पहिया चले

 

क्रांतिकारी जनकवि गोरख पांडेय की याद में बिहार के पाँच जिलों में आयोजि‍त कार्यक्रमों की लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की रि‍पोर्ट-

गोरख पांडेय की स्मृति‍ में आयोजि‍त कार्यक्रम में काव्य पाठ करते जनकवि‍ भोला।

हर साल आरा में हमलोग जसम के प्रथम महासचिव क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में नुक्कड़ काव्य-गोष्ठी का आयोजन करते रहे हैं। इस बार यह आयोजन आरा से पंद्रह-बीस किमी दूर पवना बाजार में आयोजित था। चलते वक्त मुझे जनकवि भोला जी मिल गए। मधुमेह के कारण वह बेहद कमजोर हो गए हैं, पर जब उन्हें मालूम हुआ कि वहाँ जाने के लिए साधन का इंतजाम है  तो वह भी तैयार हो गये। पिछले तीस साल से देख रहा हूँ। भोला जी एक छोटी सी गुमटी में पान बेचते रहे हैं और कवितायें लिखते और सुनाते रहते हैं। कई पतली-पतली पुस्तिकायें भी उन्होंने छपवाईं, जिन्हें वह ‘भोला का गोला’ कहते हैं। शहर से जब हम निकले तो वह सरस्वती पूजा के माहौल में डूबा हुआ था। पूजा भी क्या है, भौंड़े किस्म के नाच-गाने हैं और बिना किसी साधना के कूल्हे मटकाना है। भोजपुरी के बल्गर गीत हैं, ऐसे गीत कि रीतिकाल के कवि भी शर्म से पानी-पानी हो जाएं, उस पर तेज म्यूजिक है, एक-दूसरे से टकराते हुए, मानो एक आवाज दूसरे का गला दबा देने को आतुर हो। लगभग 100-100 मीटर पर एक जैसी सरस्वती की मूर्तियाँ हैं, कहीं-कहीं अगल-बगल तो कहीं आमने-सामने। जैसे कोई प्रतिस्पर्धा है, कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता, न कहीं कोई साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी है, न कोई कलाकार, न कोई भक्त, कंज्यूमर किशोर हैं सतही मौज-मस्ती, मनोरंजन और सनसनी की चाह में मटकते-भटकते। कहीं कोई भक्ति गीत है भी तो उसके तर्ज और संगीत से भक्ति का कोई तुक तक नहीं जुड़ता प्रतीत होता। ऐसा लगता है कि सरस्वती अब ज्ञान की देवी नहीं हैं, बल्कि सतही आनंद और मनोरंजन की देवी होके रह गई हैं। 28 जनवरी से ही पूरा शहर शोर में डूबा हुआ है। भोला जी बिगड़ते हैं, अपनी माँ के लिए एक दिन भी नहीं जागेंगे और मिट्टी की मूर्ति के लिये रात-रात भर जागे हुए हैं। कल एक रिक्शावाला भी बिगड़ रहा था कि जिनको पढ़ने-लिखने से कुछ नहीं लेना-देना, वही जबरन चंदा वसूल कर मूर्तियाँ रखते हैं और मौज-मस्ती करते हैं, सब लंपट हैं।

साथी सुनील चौधरी के यहाँ जुटना था हमें। युवानीति से जुड़े रंगकर्मियों का इंतजार था। सारे रंगकर्मी हाईस्कूल और कॉलेज के छात्र हैं। किराये की जीप आती है और हम आरा शहर से पवना बाजार के लिए चल पड़ते हैं। शहर से बाहर निकलने के बाद शोर से थोड़ी राहत मिलती है। लेकिन कुछ ही देर बाद ड्राइवर ने होली का गीत बजा दिया। बाद में मेरी निगाह विंडस्क्रीन की ओर गई तो देखा कि ड्राइवर की बगल में ऊपर एक स्क्रीन है, जिसमें गानों का विजुअल भी चल रहा है। बेहद अश्लील और भद्दे हाव-भाव के साथ डांस का फिल्मांकन था। शब्द तो उससे भी अधिक अश्लील, द्विअर्थी भी नहीं, सीधे एकर्थी। स्त्री मानो सिर्फ और सिर्फ भोग की वस्तु हो। एक स्त्री की पूजा करने वाले किशोर-नौजवान भी इसी तरह के गीत बजा रहे हैं। जैसे किसी नशे में डूबो दिया गया हो सबको। बिहार सरकार की कृपा से हर जगह मिलती शराब की भी इस माहौल को बनाने में अपनी भूमिका है।

पवना पहुँचते ही एक कामरेड की दूकान पर हमें रसगुल्ले और नमकीन का नाश्ता कराया गया। एक अच्छी चाय भी मिली। उसके बाद कार्यक्रम शुरू हुआ। आसपास के सारे मजदूर-किसान, छोटे दुकानदार जमा हो गये। उनकी शक्ल और वेशभूषा ही सरकारों के विकास के दावों की पोल खोल रही थी। लेकिन वक्त का पहिया जिसे विपरीत दिशा में घुमाने की कोशिश हो रही है, उसे आगे वही बढ़ा सकते हैं, इस यकीन के साथ ही हम उनसे संबोधित थे। संचालक अरविंद अनुराग की खुद की जिंदगी भी उनसे अलग कहाँ है! बार-बार महानगरों से लौटे हैं, कहीं कोई ढंग का रोजगार नहीं मिला। निजी स्कूलों में पढ़ाया। परचुन की छोटी दूकान खोली। कुछ दिन होम्योपैथी से लोगों का इलाज भी किया। इस जद्दोजहद के बीच साहित्य-विचार का अध्ययन और लेखन उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। राजू रंजन के नेतृत्व में युवानीति के कलाकारों द्वारा गोरख पांडेय के गीत ‘समय का पहिया चले’ से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। उसके बाद मुझे यह बताने के लिए बुलाया गया कि गोरख कौन हैं? मैंने कहा कि शायद मेरे बताने की जरूरत नहीं है कि गोरख कौन हैं, उनके गीत ही यह बता देने के लिए काफी हैं कि वे कौन हैं। मैं भोजपुरी के उनके कुछ गीतों का नाम लेता हूँ और देखता हूँ कि लोगों के चेहरे पर चमक आ जाती है। ‘कानून’ कविता के हवाले से उन्हें बताता हूँ कि किस तरह उनके श्रम से फल को अलग किया जा रहा है। ‘डर’ कविता का जिक्र करते हुए कहता हूँ कि अभी भी तमाम दमनकारी साधनों के बावजूद शासकवर्ग आपके गुस्से और नफरत से डरता है। फिर ‘सुतल रहली सपन एक देखली’ गीत सुनाते हुए बैरी पैसे के राज को मिटाने की जरूरत पर बोलता हूँ। यह पैसे का ही तो राज है जिसने संस्कृति के क्षेत्र में भी जनता को उसकी निर्माणकारी भूमिका के बजाए महज विवेकहीन उपभोक्ता की स्थिति में धकेलने का काम किया है। गाँव-गाँव एक नया सांस्कृतिक जागरण आये और उस तकनीक को भी अपना माध्यम बनाये जिसके जरिए तमाम किस्म की अपसंस्कृति का प्रचार किया जा रहा है। जानता हूँ यह बहुत मेहनत का काम है। जहाँ रोजी-रोटी जुटाना ही बेहद श्रमसाध्य होता जा रहा है, वहाँ संस्कृति की लड़ाई तो और भी कठिन है। लेकिन जनता की जिंदगी का जो संघर्ष है, उसकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी तो जरूरी है। वे कब तक अपनी सृजनात्मक ऊर्जा भूलकर उपभोक्ता की तरह पूँजी की लंपट संस्कृति का जहर निगलते रहेंगे। गोरख पांडेय के गीतों को वे भूले नहीं है, यह एक बड़ी उम्मीद है। इस उम्मीद के साथ एक नई शुरुआत की संभावना जगती है।

संचालक अरविंद अनुराग समेत सुनील कुमार, सुधीर जी, मंगल प्रताप, रमाकांत जी, मिथिलेश मिश्रा जैसे स्थानीय कवियों की कविताओं को सुनते हुए भी उम्मीद बंधती है। वरिष्ठ कवि रमाकांत जी अपनी कविता में हल जोतते किसान की कठिन जिंदगी के प्रति संवेदित हैं, तो सुधीर एक शहीद की बेवा की चिंता करते हैं। धर्म के नाम हो रहे पाखंड पर सुधीर और मिथिलेश मिश्रा दोनों प्रहार करते हैं। मिथिलेश भी निजी स्कूलों में पढ़ाते रहे हैं। वे कहते हैं- ‘जय सरस्वती मइया, जय लक्ष्मी मइया, जय दुर्गा मइया/मूर्ति रखवइया, चंदा कटवइया, लफुअन के मुर्गा खिवइया, रंडी नचवइया..।’ अरविंद अनुराग राजनीति में उभरे नए सामंती-अपराधी किस्म के तत्वों पर व्यंग्य करते हैं। मंगल प्रताप ‘स्वाधीनता’ कविता सुनाते हैं और सुनाने से पहले अपनी तकलीफ शेयर करते हैं कि आज सब लोग अंदर से गुलाम हैं। अंदर से लोग कुछ हैं और बाहर से कुछ, समझ में नहीं आता कि आदमी को हो क्या गया है। दरअसल इस प्रश्नाकुलता और इस तरह की बेचैनी से कारणों की तलाश शुरू होती है। स्थानीय कवि सुनील एक गीत सुनाते हैं। जसम के राष्ट्रीय पार्षद कवि-आलोचक सुमन कुमार सिंह भी गीत के मूड में हैं और मौका देखकर भोजपुरी-हिंदी के चार गीत सुना देते हैं। मेरी जान बख्सें हुजूर, लिखूँ हुक्काम के खत और केहू जाने न जाने मरम रात के आदि गीतों में यह अभिव्यक्त हुआ कि आज किसान न ठीक से किसान रह गया है और न ही मजदूर, हुक्काम अपने सुशासन के प्रचार में यात्रायें कर रहे हैं, पर किसान नहीं चाहता कि वे गाँव आएँ, उसे शासकवर्ग पर कोई भरोसा नहीं रह गया है। राजदेव करथ हमेशा की तरह संकल्प और जोश से भरे हुए कहते हैं- एक कदम न रुकेंगे/तेरे जुल्मो सितम को मिटाएँगे। सुनील चौधरी गोरख का व्यंग्य गीत ‘समाजवाद का गीत’ सुनाते हुए उसकी व्याख्या भी करते जाते हैं कि कैसे सिर्फ नाम लेने से समाजवाद नहीं आ जाता, बल्कि उसकी आड़ में लूटतंत्र कायम रहता है। जनकवि भोला जब अपना गीत सुनाने को खड़े हुए तो मानो गरीब की पीड़ा साकार हो उठी। उन्होंने सुनाया-

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहु हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
जाति धरम के हम कुछहूँ न जननी
साथी करम के करनवा बतवनी
ना रोजी, ना रोटी, न रहे के मकनवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा
माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी
दिहनी बहुते कुछुवो न पवनी
इ लोरवा, इ लहूवा से बूझल पियसवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा।

( कौन है देवी-देवता और कौन है मालिक
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
बाढ़ में डूबे, सुखाड़ में सुखाए
जाड़ों की रातें कलप के बिताए
करें किस पर भरोसा, पूछें हम तरीका
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
जाति-धरम को हमने कुछ नहीं जाना
साथी कर्म के कारणों को बताए
न रोजी है, न रोटी और न रहने का मकान
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
मिट्टी, पत्थर, धातु और कागज पर देखे
उसे दिए बहुत, पर कुछ भी नहीं पाए
आँसू और खून से अपनी प्यास बुझाए
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।)

अध्यक्षीय वक्तव्य में जितेंद्र कुमार ने गरीबों के प्रति शासकवर्ग की उपेक्षा के तथ्यों से जनता को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि कारपोरेट कंपनियाँ और उनके इशारे पर चलने वाली सरकारें इस देश में किसान-मजदूरों को तबाह करने में लगी हुई हैं। प्रधानमंत्री ने खेतिहर मजदूरों के लिए तय न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी मनरेगा में देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो सरकार पर 1072 करोड़ का भार आ जाएगा, जबकि कारपोरेट को 4500 करोड़ छूट देने में उन्हें जरा भी हिचक नहीं हुई। उन्होंने नीतीश बाबू के सुशासन में फैलते भ्रष्टाचार की भी चर्चा की। स्कूलों में फर्जी नामांकनों के जरिए जनता के खजाने की लूट का जिक्र किया और सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आखिर किनके प्रतिनिधि हैं। जितेंद्र कुमार ने कारपारेट की मदद से जयपुर लिटेररी फेस्टिवल किए जाने और उसमें अंग्रेजी को महत्व दिये जाने की वजहों से से भी अवगत कराया और कहा कि किसान का बेटा राहुल गांधी से भी अच्छी अंग्रेजी या सोनिया गांधी से भी अच्छी इटैलियन बोले, यह कौन नहीं चाहेगा, लेकिन अपनी भाषाओं की कीमत पर अगर वह ऐसा करेगा तो वह अपने ही समाज और लोगों के साथ नहीं रह पाएगा। उन्होंने कहा कि सरकारों को बेरोजगारी दूर करने की कोई चिंता नहीं है, बल्कि 30-40 साल पहले जो पद सृजित किए गए थे, उन्हें भी लगातार खत्म किया जा रहा है। शिक्षकों की संख्या लगातार कम होती जा रही है, ऐसे में मजदूर-किसानों के बेटे कहाँ से अच्छी शिक्षा पा सकेंगे। खुद सरकारी आंकड़े के अनुसार देश की 72प्रतिशत जनता 20 रुपये से कम दैनिक आय पर जीवन गुजारने को विवश है और सरकार आधार प्रमाण पत्र बनाने में लगी हुई है और उसमें भी कमाई के लिए मार हो रही है। उन्होंने यह बताया कि आधार प्रमाण बनाने के लिए योजना आयोग और चिंदबरम के बीच क्यों टकराव हुआ और किस तरह दोनों के बीच बंदरबांट हो गई कि आधा-आधा कार्ड दोनों बनाएँगे। उन्होंने सरकारों के लूट और झूठ के तथ्यों का खुलासा करते हुए कहा कि जो लोग समग्र विकास और सच्चा समाजवाद चाहते हैं उनके संघर्षों में गोरख के गीत आज भी बेहद मददगार हैं। गोरख पांडेय के गीतों में गरीबों और भूमिहीन मेहनतकश किसानों के सपनों को अभिव्यक्ति मिलती है, उनकी लड़ाइयों के लिए वे एक मजबूत औजार की तरह हैं।

कार्यक्रम में नाटक प्रस्तुत करते कलाकार।

इस मौके पर युवानीति के रतन देवा, चैतन्य कुमार, कुमद पटेल, सूर्याप्रकाश, अमित मेहता, राजेश कुमार, साहेब, मु. फिरोज खान एवं राजू रंजन ने ग्रामीण दर्शकों की भारी मौजूदगी के बीच अपने नवीनतम नाटक ‘नौकर’ की प्रस्तुति की, जिसका दर्शकों ने काफी लुफ्त लिया। हास्य-व्यंग्य से भरा यह नाटक गरीबों को शिक्षित बनाने का संदेश देता लगा। भ्रष्टाचार, मुफ्तखोरी, महंगाई, बेरोजगारी की स्थिति को लेकर इसमें कटाक्ष भी किया गया है। नाटक में जब नौकर यह कहता है कि बताइए, क्या गरीबी और महंगाई के लिए हम दोषी हैं, तो लोग वाह, वाह कर उठे, क्योंकि यह तो उन्हीं के मन की बात थी। नौकर ने जब मुखिया के आदमी से इंदिरा आवास योजना के तहत घर के लिए आग्रह किया, तो उसने कहा कि वह गरीबों के लिए नहीं है, बल्कि मुखिया के आदमियों के लिए है और उनके लिए है जो पहले से ही सुविधा-संपन्न हैं, इस कटाक्ष से भी दर्शक बहुत खुश हुए। रमता जी के गीत ‘हमनी देशवा के नया रचवइया हईं जा/ हमनी साथी हईं आपस में भइया हईं जा’ के युवानीति के कलाकारों द्वारा गायन से कार्यक्रम का समापन हुआ।

उसके बाद स्थानीय आयोजको ने स्वादिष्ट लिट्टियों का भोज कराया। लौटते वक्त अंधेरा हो चुका था। इस बार ड्राइवर का वीडियो बंद था। युवानीति के कलाकार गाए जा रहे थे- महंगइया ए भइया बढ़ल जाता, अइसन गांव बना दे जहवां अत्याचार ना रहे/ जहां सपनों में जालिम जमींदार ना रहे, साथिया रात सपने में आके तूने मुझको बहुत है सताया। कोई जगजीत सिंह की गायी हुई गजल को गा रहा है तो उसके बाद कोई मुक्तिबोध को गा रहा है- ऐ मेरे आदर्शवादी मन, ऐ मेरे सिद्धांतवादी मन, अब तक क्या किया, जीवन क्या जीया…। हमारी समवेत आवाजें रात के सन्नाटे को चीर रही हैं। शहर पहुँचते ही फिर से शोरगुल से सामना होता है। भोला जी को उनके घर पहुँचाता हूँ। जीवन भर वे किराये के घर में रहे हैं। बताते हैं कि छोटा बेटा बैनर वगैरह लिखने का काम करने लगा है, जिससे घर का किराया दे पाना संभव हो पा रहा है। दर्जनों मूर्तियों और बल्गर गानों और तेज म्यूजिक से होते हुए वापस कमरे पर लौटता हूँ।

दरभंगा से समकालीन चुनौती के संपादक सुरेंद्र प्रसाद सुमन का फोन आता है, उत्साह और बढ़ जाता है। दरभंगा, मधुबनी, बेगूसराय और समस्तीपुर में भी आज गोरख की याद में आयोजन हुए हैं। दरभंगा में लोहिया-चरण सिंह कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता पृथ्वीचद्र यादव और रामअवतार यादव ने की और मुख्य वक्तव्य खुद सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने दिया। नवल किशोर सिंह, विनोद विनीत, डॉ. गजेंद्र प्रसाद यादव, प्रो. अवधेश कुमार, उमाशंकर यादव और आइसा नेता संतोष कुमार ने भी अपने विचार रखे।

मधुबनी जिले के चकदह में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. चंद्रमोहन झा ने की तथा संचालन कल्याण भारती ने किया। गोरख पांडेय के साथ जेएनयू में रह चुके प्रो. मुनेश्वर यादव ने उनसे जुड़ी यादों को साझा किया। यहाँ जनसंस्कृति के प्रति गोरख की अवधारणा पर विचार-विमर्श हुआ। प्रभात खबर के ब्यूरो चीफ अमिताभ झा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। नवगठित टीम के संयोजक अशोक कुमार पासवान के नेतृत्व में कलाकारों ने गोरख पांडेय, अदम गोंडवी, सफदर हाशमी के जनगीतों का गायन किया। धन्यवाद ज्ञापन कामरेड जटाधर झा ने किया।

समस्तीपुर में गोरख पांडेय स्मृति समारोह में वरिष्ठ कवि और आलोचक डा. सुरेद्र प्रसाद, रामचंद्र राय आरसी, वंदना सिन्हा, इनौस नेता सुरेद्र प्रसाद सिंह, आइसा नेता मिथिलेश कुमार, खेमस नेता उमेश कुमार और उपेंद्र राय तथा माले के जिला सचिव जितेंद्र कुमार ने अपने विचार व्यक्त किए। गीतों और नाटकों की प्रस्तुति भी हुईं।

बेगूसराय में जसम की नाट्य संस्था ‘रंगनायक’ ने नाटक ‘छियो राम’ की प्रस्तुति की और गोरख की याद में कवि गोष्ठी आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता मैथिली कथाकार प्रदीप बिहारी ने की। संचालन दीपक सिन्हा ने किया। इस मौके पर मनोज कुमार, विजय कृष्ण, दीनाथ सौमित्र, कुँवर कन्हैया, अभिजीत, प्रदीप बिहारी ने अपनी कविताओं का पाठ किया। धन्यवाद ज्ञापन अरविंद कुमार सिन्हा ने किया।

ग्यारह सि‍तम्बर के बाद : अनवर सुहैल

अनवर सुहैल

वरि‍ष्‍ठ लेखक और ‘संकेत’ के संपादक अनवर सुहैल की कहानी-

ग्यारह सितम्बर के बाद करीमपुरा में एक ही दिन, एक साथ दो बातें ऐसी हुईं, जिससे चिपकू तिवारी जैसे लोगों को बतकही का मसाला मिल गया।

अव्वल तो ये कि हनीफ़ ने अपनी खास मियाँकट दाढ़ी कटवा ली । दूजा स्कूप अहमद ने जुटा दिया…जाने उसे क्या हुआ कि वह दँतनिपोरी छोड़ पक्का नमाज़ी बन गया और उसने चिकने चेहरे पर बेतरतीब दाढ़ी बढ़ानी शुरू कर दी।

दोनों ही मुकामी पोस्ट-आफिस के मुलाजिम।

अहमद, एक प्रगतिशील युवक अनायास ही घनघोर नमाजी कैसे बना?

हनीफ ने दाढ़ी क्यों कटवाई?

सन्’चौरासी के दंगों के बाद सिक्खों ने अपने केश क्यों कुतरवाए…

अहमद आज इन सवालों से जूझ रहा है।

अहमद की चिन्ताओं को कुमार समझ न पा रहा था। कल तक तो सब ठीक-ठाक था ।

आज अचानक अहमद को क्या हो गया?

वे दोनों ढाबे पर बैठे चाय की प्रतीक्षा कर रहे थे।

कुमार उसे समझाना चाह रहा था, ‘‘छोड़ यार अहमद दुनियादारी को…बस ‘वेट एण्ड वाच’… जो होगा ठीक ही होगा।’’

‘‘वो बात नहीं है यार…कुछ समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए?’’, अहमद उसी तरह तनाव में था, ‘‘जाने कब तक हम लोगों को वतनपरस्ती का सबूत देने के लिए मजबूर किया जाता रहेगा।’’

कुमार खामोश ही रहा ।

वे दोनों चौंतीस-पैंतीस साल के युवक थे ।

करीमपुरा से दोनों एक साथ पोस्टआफिस काम पर आते ।

आफिस में अक्सर लोग उन्हें एक साथ देख मजाक करते- ‘अखण्ड भारत की एकता के नमूने…’

अहमद का दिमागी संतुलन गड़बड़ाने लगा।

‘‘अब मुझे लगने लगा है कि मैं इस मुल्क में एक किरायेदार की हैसियत से रह रहा हूँ, समझे कुमार…एक किरायेदार की तरह…!’’

यही तो बात हुई थी उन दोनों के बीच… फिर जाने क्यों अहमद के जीवन में अचानक बदलाव आ गया?

हनीफ़ के बारे में अहमद सोचने लगा।

पोस्टआफिस की डाक थैलियों को बसस्‍टैड तथा रेलवे स्टेशन पहुँचाने वाले रिक्‍शा चालक हनीफ। बा-वक्‍त पंचगाना नमाज़ अदा करना और लोगों में बेहद खुलूस के साथ पेश आना उसकी पहचान है । पीर बाबा की मज़ार पर हर जुमेरात वह फातिहा-दरूद पढ़ने जाता है । अहमद को अक्सर धार्मिक मामलात में वही सलाह-मशविरा किया करता ।

यकीन मानिए कि हनीफ एक सीधा-सादा, नेक-बख्‍त़, दीनदार या यूँ कहें कि धर्म-भीरू किस्म का इंसान है। वह खामखाँ किसी से मसले-मसायल या कि राजनीतिक उथल-पुथल पर छिड़ी बहस में कभी हिस्सा नहीं लेता। हाँ, अपने विवेक के मुताबिक आड़े वक्त बचाव में एक मशहूर शेर की पहला मिसरा वह अक्सर बुदबुदाया करता- ‘उनका जो काम है वह अहले सियासत जाने…’

हुआ ये कि ग्यारह सितम्बर के बाद दुनिया के समीकरण ऐसे बदले कि कोई भी अपने को निरपेक्ष साबित नहीं कर पा रहा था । सिर्फ दो ही विकल्प ! अमेरिका के आतंक-वि‍रोधी कार्यक्रम का समर्थन या विरोध… बीच का कोई रास्ता नहीं । यह तो एक बात हुई । ठीक इसी के साथ दो बातें गूँजी कि दुनिया में आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले लोग इस्लामी धर्मावलंबी हैं, दूसरा यह कि इस्लाम आतंकवादी धर्म नहीं। वही मिसाल कि ठण्डा और गर्म एक साथ… तर्क  की कोई गुंजाइश नहीं।

बहुत जल्दबाजी में ये बात स्थापित कर दी गई कि सारी दुनिया में आतंकवाद के बीज बोने वाले और संसार को चौदहवीं सदी में ले जाने वाले लोग मुसलमान ही हैं।

अरबियों-अफगानियों की तरह दाढ़ी के कारण धोखे में सिखों पर भी अमरीका में अत्याचार हुये। बड़े मासूम होते हैं अमरीकी !

वे मुसलमानों और सिखों में भेद नहीं कर पाते। बड़े अमन-पसंद हैं वे । आज उन्हें किसी ने ललकारा है। अमरीकियों को संसार में कोई भी ललकार नहीं सकता। वे बहुत गुस्से में हैं। इसीलिए उनसे ‘मिष्टेक’ हो सकती है । ‘मिष्टेक’ पर याद आया…

उर्दू में मंटो नाम का एक सिरफिरा कथाकार हुआ है। जिसने दंगाइयों की मानसिकता पर एक नायाब कहानी लिखी थी। ‘मिष्टेक हो गया’… जिसमें दंगाई धोखे में अपनी ही बिरादरी के एक व्यक्ति का क़त्ल कर देते हैं। असलियत जानने पर उनमें यही संवेदना फूटी- ‘‘कि साला मिष्टेक हो गया…’’

हनीफ ने शायद इसीलिए अपनी दाढ़ी कटवा ली हो, कि कहीं वह किसी ‘मिष्टेक’ का शिकार न हो जाए ।

और इस तरह चिपकू तिवारी जैसे लोगों को बतकही का मसाला मिल गया…

चिपकू तिवारी है भी गुरु-चीज़…‘गप्पोलोजी’ का प्रोफेसर…खूब चुटकी लेते हैं पोस्ट-मास्टर श्रीवास्तव साहब भी। हैं भी रोम के नीरो। अपनी ही धुन में मगन… चमचों की एक बड़ी फौज के मालिक। करीमपुरा इस क्षेत्र का ऐसा पोस्टआफिस, जिसमें सालाना एक-डेढ़ करोड़ की एन.एस.सी. बेची जाती है । बचत-खाता योगदान में जिले की यह सबसे बड़ी यूनिट है । इस औद्यौगिक नगर में पिछले कई सालों से जमे हैं श्रीवास्तव साहब। यदि कभी उनका कहीं तबादला हुआ भी तो एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर आदेश रुकवा लिये। श्रीवास्तव साहब अक्सर कहा करते- ‘करीमपुरा बड़ी कामधेनु जगह है…।’

सुबह-सुबह पोस्टआफिस में चिपकू तिवारी और श्रीवास्तव साहब की मण्डली ने अहमद का मूड ऑफ किया।

चिपकू तिवारी पहले बी.बी.सी. चैनल कहलाया करता था। लेकिन ग्यारह सितम्बर के बाद वह ‘अल-जज़ीरा’ के नाम से पुकारा जाने लगा।

हुआ यह कि सुबह जैसे ही अहमद पोस्टआफिस में घुसा, उसे चिपकू तिवारी की आवाज़ सुनाई दी । वह भांज रहा था, ‘‘अमेरिका में सिखों के साथ ग़लत हो रहा है । अमेरिकन ससुरे कटुवा और सिख में फर्क नहीं कर पाते ।’’

फिर किसी षड्यंत्र भनक से अहमद के क़दम ठिठक गए!

वह थोड़ी देर ठहर गया, और रुक कर उनकी बातें सुनने लगा।

श्रीवास्तव साहब ने फिकरा कसा, ‘‘चलो जो हुआ ठीक हुआ…अब जाकर इन मियाँ लोगों को अपनी टक्कर का आदमी भंटाया है ।’’

‘‘ हाँ साहब, अब लड़ें ये साले मियाँ और ईसाई… उधर इजराइल में यहूदी भी इन मियाँओं को चाँपे हुये हैं।’’

‘‘ वो हनीफवा वाली बात जो तुम बता रहे थे ?’’ श्रीवास्तव साहब का प्रश्‍न।

अहमद के कान खड़े हुए। तो हनीफ भाई वाली बात यहाँ भी आ पहुँची ।

‘‘ अरे वो हनीफवा… इधर अमेरिका ने जैसे डिक्लेयर किया कि लादेन ही उसका असल दुश्‍मन है, हनीफवा ने तत्काल अपनी दाढ़ी बनवा ली । आज वो मुझे सफाचट मिला तो मैंने उसे खूब रगड़ा। उससे पूछा कि ‘का हनीफ भाई, अभी तो पटाखा फूटना चालू हुआ है…बस इतने में घबरा गए? हनीफवा कुच्छो जवाब नहीं दे पाया।’’

भगवान दास तार बाबू की गुट-निरपेक्ष आवाज सुनाई दी, ‘‘सन चैरासी के दंगों के बाद सिखों ने भी तो अपने केश कतरवा लिए थे। जब भारी उथल-पुथल हो तब यही तो होता है ।’’

अपने पीछे कुछ आवाजें सुन अहमद दफ्तर में दाखिल हुआ।

उसे देख बतकही बंद हुई।

अहमद इसी बात से बड़ा परेशान रहता है। जाने क्यों अपनी खुली बहसों में लोग उसे शामिल नहीं करते। इसी बात से उसे बड़ी कोफ्त होती। इसका सीधा मतलब यही है कि लोग उसे गैर समझते हैं।

तभी तो उसे देखकर या तो बात का टॉपिक बदल दिया जाएगा या कि गप बंद हो जाएगी। अक्सर उसे देख चिपकू तिवारी इस्लामी-तहज़ीब या धर्मशास्त्रों के बारे में उल्टे-सीधे सवालात पूछने लगता है।

आजकल की ज्वलंत समस्या से उपजे कुछ शब्द, जिसे मीडिया बार-बार उछालता है, उनमें अमरीका,  अल-कायदा, ओसामा बिन लादेन, अफगान, पाकिस्तान,जिहाद तथा इस्लामी फंडामेंटालिज़्म से जुडे़ अन्य अल्फ़ाज़ हैं। इन्हीं शब्दों की दिन-रात जुगाली करता है मीडिया।

अहमद से चिपकू तिवारी अपनी तमाम जिज्ञासाएं शान्त किया करता। अहमद जानता है कि उसका इरादा अपनी जिज्ञासा शान्त करना नहीं बल्कि अहमद को परेशान करना है।

कल ही उसने पूछा था, ‘‘अहमद भाई ये जि‍हाद क्या होता है ?’’

अहमद उसके सवालों से परेशान हो गया।

चिपकू तिवारी प्रश्‍न उस समय पूछता जब श्रीवास्तव साहब फुर्सत में रहते ।

श्रीवास्तव साहब उसके प्रश्‍नों से खूब खुश हुआ करते ।

इधर अहमद इन सवालों से झुँझला जाता ।

वह कहता भी कि उसने इस्लामी धर्मशास्‍त्रों का गहन अध्ययन नहीं किया है। कहाँ पढ़ाया था मम्मी-पापा ने उसे मदरसे में । अंग्रेजी और हिन्दी माध्यम से शि‍क्षा ग्रहण की उसने । वह तो पापा की चलती तो उसका खतना भी न हुआ होता।

बड़े अजीबोगरीब थे पापा।

मम्मी और मामुओं की पहल पर उसका खतना हुआ।

पापा कितने नाराज हुए थे । वह नहीं चाहते थे कि उनका बेटा परम्परागत मजहबी बने। वह चाहते थे कि उनका बेटा इस्लाम के बारे में स्वयं जाने और फिर विवेकानुसार फैसले करे।

मुस्लिम परिवेश से अहमद बहुत कम वाकिफ था। पापा सरकारी महकमे में ‘ए’ क्लास आफीसर थे… उनका उठना बैठना सभी कुछ गैरों के बीच था। धार्मिक रूप से वह ईद-बकरीद भर में सक्रिय रहते थे । कारण कि विभागीय आला अफसरान और चहेते मातहतों के लिए दावत आदि की व्यवस्था करनी पड़ती थी। ‘फ्रेण्ड्स’ भी ऐसे कि ईद-बकरीद आदि के साथ वे अनजाने में मुहर्रम की भी मुबारकबाद दे दिया करते। उन्हें ये भी पता न होता कि मुहर्रम एक ग़म का मौका होता है।

मम्मी को पापा की ये आजाद-ख्याली फूटी आँख न भाती । मम्मी उन्हें समझाया करतीं। पापा हँस देते, ‘‘आखिरी वक्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे ।’’

वाकई वह मरने को मर गए किन्तु ईद-बकरीद के अलावा किसी तीसरी नमाज़ के लिए उन्हें समय मिलना था, न मिला। उस हिसाब से अहमद कुछ ठीक था। वह जुमा की नमाज़ अवश्‍य अदा किया करता । मम्मी की टोका-टाकी के बाद धीरे-धीरे उसने अपनी जिन्दगी में यह आदत डाली। निकाह के बाद कुलसूम की खुशि‍यों के लिए अव्वल-आखिर रोज़ा भी अब वह रखने लगा था।

अहमद के पापा एक आजाद ख्याल मुसलमान थे । वह अक्सर अल्लामा इकबाल का एक मशहूर शेर दुहराया करते-

‘‘ क़ौम क्या है क़ौमों की इमामत क्या है

इसे क्या जाने ये दो रकअ़त के इमाम !’’

चूँकि मम्मी एक पक्के मजहबी घराने से ताल्लुक रखती थीं,  इसलिए पापा की  दाल न  गल पाती । कहते हैं कि दादा-जान को पापा के  बारे में इल्म था कि उनका यह बेटा मजहबी नहीं है। इसलिए बहुत सोच विचार कर वह एक मजहबी घराने से बहू लाए थे, ताकि खानदान में इस्लामी परम्परायें जीवित बची रहें । अहमद के पापा वकील थे । वह एक कामयाब वकील थे । काफी धन कमाया उन्होंने। कहते भी थे कि अगर कहीं जन्नत है तो वह झूठों के लिए नहीं। इसलिए वहाँ की ऐशो-इशरत की क्या लालच पालें। सारे वकील संगी-साथी तो वहाँ जहन्नुम में मिल ही जायेंगे। अच्छी कम्पनी रहेगी।

इस दलील के साथ वह एक ज़ोरदार ठहाका लगाया करते।

एक सड़क हादसे में उनका इंतेकाल हुआ था। तब अहमद स्नातक स्तर की पढ़ाई कर रहा था । छिन्न-भिन्न  हो गई थी जि‍न्‍दगी…। उस बुरे वक्त में मामुओं ने मम्मी और अहमद को सम्भाल लिया था ।

ऐसे स्वतंत्र विचारों वाले पिता का पुत्र था अहमद और उसे चिपकू तिवारी वगैरा एक कठमुल्ला मुसलमान मान कर सताना चाहते ।

इसीलिए अक्सर अहमद का दिमाग खराब रहा करता।

वह कुमार से कहा भी करता, ‘‘ कुमार भाई, मैं क्या करूँ? तुमने देखा ही है कि मेरी कोई भी अदा ऐसी नहीं कि लोग मुझे एक मुसलमान समझें। तुममें और मुझमें कोई अन्तर कर सकता है ? मैं न तो दाढ़ी ही रखता हूँ और न ही दिन-रात नमाज़ें ही पढ़ा करता हूँ। तुमने देखा होगा कि मैंने कभी सरकार अथवा हिन्दुओं को कोसा नहीं कि इस मुल्क में मुसलमानों के साथ अन्याय किया जा रहा है। जबकि उल्टे मैंने यही पाया कि मुसलमानों की बदहाली का कारण उनकी अशि‍क्षा और दकियानूसी-पन है। चार पैसे पास आये नहीं कि ख़ुद को नवाबों-शहंशाहों का वंशज समझने लगेंगे। बच्चों के पास कपड़े हों या न हों। स्कूल से उन्हें निकाल दिए जाने की नोटिसें मिली हों, इसकी कोई चिन्ता नहीं। सब प्राथमिकतायें दरकिनार…घर में बिरयानी बननी ही चाहिए, वरना इस कमाई का क्या मतलब ! तालीम के नाम पर वही मदरसे और काम के नाम पर तमाम हुनर वाले काम ! कम उम्र में विवाह और फिर वही जि‍न्दगी के मसले। फिर भी लोग मुझे अपनी तरह का क्यों नहीं मानते।’’

कुमार अहमद के प्रश्‍नों को सुन चुप लगा गया। वह क्या जवाब देता?

ठीक इसी तरह अहमद चिपकू तिवारी के प्रश्‍नों का क्या जवाब देता ?

वह हिन्दू मिथकों, पुराण कथाओं और धर्म-शास्त्रों के बारे में तो आत्मविश्‍वास के साथ बातें कर सकता था, किन्तु इस्लामी दुनिया के बारे में उसकी जानकारी लगभग सिफ़र थी।

‘‘मुझे एक मुसलमान क्यों समझा जाता है, जबकि मैंने कभी भी तुमको  हिन्दू वगैरा नहीं माना । मुझे एक सामान्य भारतीय शहरी कब समझा जाएगा?’’

अहमद की आवाज़ में दर्द था ।

 

कल की तो बात है ।

वे दोनों आदतन बस-स्टैंड के ढाबे में बैठे चाय की प्रतीक्षा में थे। दफ्तर से चुराए चंद फुर्सत के पल… यही तो वह जगह है जहाँ वे दोनों अपने दिल की बात किया करते।

चाय वाला चाय लेकर आ गया ।

अहमद की तंद्रा भंग हुई ।

अम्बिकापुर से सुपर आ गई थी । बस स्‍टैंड में चहल-पहल बढ़ गई । सुपर से काफी सवारियाँ उतरती हैं।

करीमपुर चूँकि इलाके का व्यापारिक केन्द्र है अतः यहाँ सदा चहल-पहल रहती है।

चाय का घूँट भरते कुमार ने अहमद को टोका।

‘‘तुम इतनी जल्दी मायूस क्यों हो जाते हो ? क्या यही अल्पसंख्यक ग्रन्थि है, जिससे मुल्क के तमाम अल्पसंख्यक प्रभावित हैं ?’’

‘‘कैसे बताऊँ कि बचपन से मैं कितना प्रताडि़त होता रहा हूँ।’’ अहमद सोच के सागर में गोते मारने लगा।

‘‘जब मैं छोटा था तब सहपाठियों ने जल्द ही मुझे अहसास करा दिया कि मैं उनकी तरह एक सामान्य बच्चा नहीं, बल्कि एक ‘कटुआ’ हूँ ! वे अक्सर मेरी निकर खींचते और कहते कि ‘अबे साले, अपना कटा दिखा न! पूरा उड़ा देते हैं कि कुछ बचता भी है ?’ स्कूल के पास की मस्जिद से ज़ुहर के अज़ान की आवाज़ गूँजती तो पूरी क्लास मेरी तरफ़ देखकर हँसती। जितनी देर अज़ान की आवाज़ आती रहती मैं असामान्य बना रहता। इतिहास का पीरियड उपाध्याय सर लिया करते। जाने क्यों उन्हें मुसलमानों से चिढ़ थी कि वह मुगल-सम्राटों का जि़क्र करते आक्रामक हो जाते। उनकी आवाज़ में घृणा कूट-कूट कर भरी होती। उनके व्याख्यान का यह प्रभाव पड़ता कि अंत में पूरी क्लास के बच्चे मुझे उस काल के काले कारनामों का मुज़रिम मान बैठते।’’

कुमार ने गहरी साँस ली, ‘‘ छोड़ो यार… दुनिया में जो फेरबदल चल रहा है उससे लगता है कि इंसानों के बीच खाई अब बढ़ती ही जाएगी। आज देखो न,  अफ़गानियों के पास रोटी कोई समस्या नहीं। नई सदी में धर्मांधता, एक बड़ी समस्या बन कर उभरी है।’’

अहमद बेहद दुखी हो रहा था।

कुमार ने माहौल नरम बनाने के लिए चुटकी ली, ‘‘अहमद, सुपर से आज पूँछ-वाली मैडम नहीं उतरीं। लगता है उन्हें महीने के कष्ट भरे तीन दिनों का चक्कर तो नहीं ?’’

पूँछ-वाली यानी की पोनी-टेल वाली आधुनिका…

कुमार की इस बात पर अन्य दिन कितनी ज़ोर का ठहाका उठता था।

अहमद की खिन्नता के लिए क्या जतन करे कुमार !

चाय कब खत्‍म हो गई पता ही न चला ।

ढाबे के बाहर पान गुमटी के पास वे कुछ देर रुके । अहमद ने सिगरेट पी। कुमार ने पान खाया । अहमद जब तनाव में रहता, तब वह सिगरेट पीना पसंद करता। उसके सिगरेट पीने का अंदाज़ भी बड़ा आक्रामक हुआ करता ।

वह मुट्ठी बाँधकर उँगलियों के बीच सिगरेट फँसा कर, मुट्ठी को हाँठों के बीच टाइट सटा लेता। पूरी ताकत से मुँह से भरपूर धुआँ खींचता । कुछ पल साँस अंदर रख कर धुआँ अंदर के तमाम गली-कूचों में घूमने-भटकने देता। फिर बड़ी निर्दयता से होंठों को बिचकाकर जो धुआँ फेफड़े सोख न पाए हों, उसे बाहर निकाल फेंकता ।

कुमार ने उसके सिगरेट पीने के अंदाज से जान लिया कि आज अहमद बहुत ‘टेंशन’ में है।

वे दोनों चुपचाप पोस्टआफिस में आकर अपने-अपने जॉब में व्यस्त हो गए।

 

अहमद को कहाँ पता था कि उसके जीवन में इतनी बड़ी तब्दीली आएगी।

वह तेरह सितम्बर की शाम थी।

अहमद घर पहुँचा…देखा कि कुलसूम टीवी से चिपकी हुई है।

कुलसूम समाचार सुन रही है।

आश्‍चर्य! घनघोर आश्‍चर्य !! ऐसा कैसे हो गया…

अहमद ने सोचा, कुलसूम को समाचार चैनलों से कितनी नफ़रत है। वह अक्सर अहमद को टोका करती, ‘‘जब आप अखबार पढ़ते ही हैं, तब आपको समाचार सुनने की क्या जरूरत…। इससे अच्छा कि आप कोई धारावाहिक ही देख लिया करें। पूरा दिन एक ही खबर को घसीटते हैं ये समाचार चैनल…जिस तरह एक बार खाने के बाद भैंस जुगाली करती है।  जाने कहाँ से इनको भी आजकल इतने ढेर सारे प्रायोजक मिल जा रहे हैं।’’

अहमद क्या बताता। उसे मालूम है कि खाते-पीते लोगों के लिए आजकल समाचारों की क्या अहमियत है । अहमद जानता है कि समकालीन घटनाओं और उथल-पुथल से कटकर नहीं रहा जा सकता । यह सूचना-क्रान्ति का दौर है। करीमपुरा के अन्य मुसलमानों तरह उसे अपना जीवन नहीं गुजारना। वह नये जमाने का एक सजग, चेतना-सम्पन्न युवक है। उसे मूढ़ बने नहीं रहना है। इसीलिए वह हिन्दी अखबार पढ़ता है। हिन्दी में थोड़ी बहुत साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ भी कर लेता।

अहमद जानता है कि मीडिया आजकल नयी से नयी खबरें जुटाने में कैसी भी ‘एक्सरसाइज’ कर सकता है । चाहे वह डायना की मृत्यु से जुड़ा प्रसंग हो, नेपाल के राज परिवार के जघन्य हत्याकाण्ड का मामला हो, तहलका-ताबूत हो या कि मौजूदा अमरीकी संकट…अचार, तेल, साबुन, जूता-चप्पल,  गहना-जेवर, काम-शक्तिवर्धक औषधियों और गर्भ-निरोध आदि के उत्पादकों एवम् वितरकों से भरपूर विज्ञापन मिलता है समाचार चैनलों को। यही कारण है कि समाचार चैनल आजकल अन्य चैनलों से अधिक मुनाफा कमा रहे हैं।

कुलसूम न्यूज सुनने में इतनी मगन थी कि उसे पता ही न चला कि अहमद काम से वापस आ गया है।

कुलसूम बीबीसी के समाचार बुलेटिन सुन रही थी। स्क्रीन पर ओसामा बिन लादेन की तस्वीर उठाए पाकिस्तानी नौजवानों के जुलूस पर पुलिस ताबड़-तोड़ लाठी चला रही है। अमरीकी प्रेसीडेंट बुश और लादेन के चेहरे का मिला जुला कोलाज इस तरह बनाया गया था कि ये जो लड़ाई अफगान की धरती पर लड़ी जानी है वह दो आदमियों के बीच की लड़ाई हो।

सनसनीखेज समाचारों से भरपूर वह एक बड़ा ही खतरनाक दिन था।

अहमद कुलसूम की बगल में जा बैठा ।

कुलसूम घबराई हुई थी।

ऐसे ही बाबरी-मस्जिद विध्वंस के समय कुलसूम घबरा गई थी।

आज भी उसका चेहरा स्याह था। कुलसूम किसी गहन चिंता में डूबी हुई थी।

अहमद ने टीवी के स्क्रीन पर नज़रें गड़ाईं। वहाँ उसे बुश-लादेन की तस्वीरों के साथ चिपकू तिवारी और श्रीवास्तव साहब के खिल्लियाँ उड़ाते चेहरे नज़र आने लगे। उसे महसूस हुआ कि चारों तरफ़ चिपकू तिवारी की सरगोशि‍यों और कहकहे गूँज रहे हैं।

अहमद का दिमाग चकराने लगा ।

जब कुलसूम ने अहमद की देखा तो वह घबराकर उठ खड़ी हुई ।

उसने तत्काल अहमद को बाहों का सहारा देकर कुर्सी पर बिठाया। फिर वह पानी लेने किचन चली गयी। पानी पीकर अहमद को कुछ राहत मिली ।

उसने  कुलसूम से कहा, ‘‘जानती हो …सन्  चैरासी के दंगों के बाद अपने पुराने मकान के सामने रहने वाले सिख परिवार के तमाम मर्दों ने अपने केश कुतरवा लिए थे।’’

कुलसूम की समझ में कुछ न आया। फिर भी उसने पति की हाँ में हाँ मिलाई, ‘‘हाँ, हाँ, परमजीते के भाई और बाप दाढ़ी-बाल बन जाने के बाद पहचान ही में न आते थे ?’’

‘‘बड़ी थू-थू मची है कुलसूम चारों तरफ…हर आदमी हमें लादेन का हिमायती समझता है। हम उसकी लाख मज़म्मत करें कोई फर्क नहीं पड़ता।’’ अहमद की आवाज़ हताशा से लबरेज़ थी।

अचानक अहमद ने कुलसूम  से कहा, ‘‘मग़रिब की नमाज़ का वक्त हो रहा है। मेरा पैजामा-कुर्ता और टोपी तो निकाल दो।’’

कुलसूम चौंक पड़ी।

आज उसे अपना अहमद डरा-सहमा और कमज़ोर सा नजर आ रहा था।

 

मृत्युंजय : चंद्रकुँवर बर्त्‍वाल

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

कवि‍ चंद्रकुँवर वर्त्‍वाल और सूर्यकांत त्रि‍पाठी नि‍राला 1939 से 42 तक लखनऊ में एक-दूसरे के सम्‍पर्क में रहे। उसके बाद परि‍स्‍थि‍ति‍यां ऐसी बनीं कि‍ दोनों बि‍छुड़ गये। अस्‍वस्‍थ होने के कारण वर्त्‍वाल हि‍मवंत की ओर चले गये। नि‍राला भी उन दि‍नों अस्‍वस्‍थ थे। यातनाओं के बीच उनका जीवन चल रहा था। एक दि‍न वर्त्‍वाल ने नि‍राला को पत्र के रूप में ‘मृत्‍युंजय’ कवि‍ता भेजी जो उनके जीवन तथा नि‍राला के काव्‍य की उच्‍चतम व्‍याख्‍या है-

सहो अमर कवि ! अत्याचार सहो जीवन के,
सहो धरा के कंटक, निष्ठुर वज्र गगन के !
कुपित देवता हैं तुम पर हे कवि, गा गाकर
क्योंकि अमर करते तुम दु:ख-सुख मर्त्य भुवन के,
कुपित दास हैं तुम पर, क्योंकि न तुमने अपना शीश झुकाया
छंदों और प्रथाओं के नि‍र्बल में,
कि‍सी भांति‍ भी बंध ने सकी ऊँचे शैलों से
गरज-गरज आती हुई तुम्‍हारे नि‍र्मल
और स्‍वच्‍छ गीतों की वज्र-हास सी काया !
नि‍र्धनता को सहो, तुम्‍हारी यह नि‍र्धनता
एक मात्र नि‍धि‍ होगी, कभी देश जीवन की !
अश्रु बहाओ, छि‍पी तुम्‍हारे अश्रु कणों में,
एक अमर वह शक्‍ति, न जि‍स को मंद करेगी,
मलि‍न पतन से भरी रात  सुनसान मरण की !
‍अंजलि‍यां भर-भर सहर्ष पीवो जीवन का
तीक्ष्‍ण हलाहल, और न भूलो सुधा सात्‍वि‍की,
पीने में वि‍ष-सी लगती है, कि‍न्‍तु पान कर
मृत्‍युंजय कर देती है मानक जीवन को !

‘प्रगतिशील आंदोलन :कल और आज’ पर कार्यक्रम 1 को

नई दि‍ल्‍ली : लेफ्ट डेमोक्रेटिक टीचर्स फोरम की एक ओर से DIALOUGE के तहत भारत में प्रगतिशील आन्दोलन ने पचहत्तर साल पूरे के अवसर पर ‘प्रगतिशील आंदोलन : कल और आज’ कार्यक्रम का आयोजन कमरा नम्‍बर-22, आर्ट्स फैकल्टी, दिल्ली विश्वविद्यालय में 1 फरवरी को दोपहर एक बजे से शाम चार बजे तक कि‍या जा रहा है।

प्रगतिशील लेखक संगठन तथा ‘गोदान’, ‘राम की शक्ति पूजा’ और ‘कामायनी’ आदि रचनाओं के 75 वर्ष हो रहे हैं और नागार्जुन, केदार, शमशेर, फैज़, मजाज़ का यह जन्मशती वर्ष है।

कार्यक्रम में उमा चक्रवर्ती ‘प्रगतिशील आंदोलन में महिला आंदोलन की भूमिका’, विश्वनाथ त्रिपाठी ‘साहित्य में प्रगतिशीलता की धारा’, डायमंड ओबराय ‘इप्टा और ऋतिक घटक’, अली जावेद ‘हिंदी उर्दू विवाद’,  अशोक भौमिक ‘चित्रकला और प्रगतिशील आंदोलन’, प्रणय कृष्ण ‘प्रगतिशील काव्य: कल और आज’ और वैभव सिंह ‘प्रगतिशील नाट्य परंपरा’ पर वि‍चार रखेंगे।

वि‍ज्ञान मि‍त्र : वि‍वेक भटनागर

खेल-खेल में बच्‍चों को वि‍ज्ञान सि‍खाने और वैज्ञानि‍क सोच वि‍कसि‍त करने के उद्देश्‍य से प्रकाशि‍त ‘प्रथम वि‍ज्ञान’ पर युवा लेखक-आलोचक वि‍वेक भटनागर की टि‍प्‍पणी-

‘प्रथम विज्ञान’ का प्रवेशांक देखकर प्रसन्नता हुई। कारण यह है कि आज विज्ञान का युग है और हमारे दैनंदिन जीवन में विज्ञान ही ऐसी शक्ति है, जो न सिर्फ हमारे जीवन को सहज बनाती है, बल्कि एक प्रगतिशील नजरिया भी देती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि लोगों की सोच को वैज्ञानिक बनाया जाए, ताकि वे बाहरी और भीतरी दोनों तरह के विकास के साथ कदमताल कर सकें। ‘प्रथम विज्ञान’ से ये संभावनाएं जागती हैं कि यह पत्रिका बच्चों में वैज्ञानिक संस्कार जगा सकेगी। अवश्य ही बच्चे विज्ञान को एक रुक्ष विषय की तरह न लेकर, उसकी रसमयता में डूबेंगे और अपना बेहतर नजरिया विकसित करेंगे।

प्रथम वि‍ज्ञान ( द्वैमासि‍क बुलेटि‍न)
मूल्‍य: 10 रुपये
संपादन : आशुतोष उपाध्‍याय
संपादकीय कार्यालय: प्रथम रि‍सोर्स सेंटर
बी-4/54, सफदरजंग एनक्‍लेव,
नई दि‍ल्‍ली- 110092

 

क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब/ केहू का ना सोहाला त हम का करीं

क्रांतिकारी जनगीतकार रमाकांत द्विवेदी रमता का 24 जनवरी को स्मृति दिवस है। उन पर लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन को लेख और उनके कुछ गीत-

स्वाधीनता सेनानी और हिंदी-भोजपुरी के प्रसि़द्ध जनकवि रमाकांत द्विवेदी रमता 24 जनवरी 08 स्मृतिशेष हुये थे। आज भी परिवर्तन के प्रयास से जुड़े संस्कृतिकर्मियों की जुबान पर उनके गीत रहते हैं। उनका संघर्षमय जीवन क्रांतिकारी जनराजनीति और जनसंस्कृति के कार्यों में लगे लोगों के लिए बहुत उत्‍प्रेरक है। उनका जीवन इसका उदाहरण है कि स्वाधीनता आंदोलन ने जिन राजनीतिक आकांक्षाओं और जिस तरह के राष्ट्र के स्वप्न को जन्म दिया था, वे 1947 में पूरी नहीं हुये। उसके लिए संघर्ष 1947 के बाद भी जारी रहा और आंदोलनों के गर्भ से निकली जनसंस्कृति की परंपरा भी निरंतर जारी रही। रमाकांत रमता द्विवेदी हिंदी-भोजपुरी की जो जनधर्मी परंपरा है, उसके बहुत बड़े रचनाकार हैं, एक ऐसे रचनाकार जिनके रग-रग में जनता की राजनीति के प्रति जबर्दस्त प्रतिबद्धता थी। वह क्रांति की आकांक्षा के ही नहीं, बल्कि क्रांति के कर्म के कवि  थे। आज भोजपुर में जनसंस्कृति मंच के साथी उन्हें याद करेंगे। कल यहाँ की स्थानीय नाट्य संस्था ‘युवानीति’ और वीर कुंवर सिंह वि.वि., भोजपुरी विभाग की ओर से उनकी याद में एक काव्यगोष्ठी भी आयोजित की गई है।

30 अक्टूबर, 1917 में भोजपुर जिले के बड़हरा प्रखंड के महुली घाट में जन्मे रमता जी का पूरा जीवन आजादी और सुराज के लिए जारी संघर्षों के प्रति समर्पित रहा। उनमें क्रांति और समाजवाद के प्रति युवाओं-सी ऊर्जा, आवेग और आस्था थी। उनके विप्लवी जीवन ने कई पीढि़यों को क्रांतिकारी रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी।

युवावस्था में ही रमता जी आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। ‘घरे घरे चरखा चलइहें भारवसिया’ के सपने से उनके राजनीतिक सफर की शुरूआत हुई। 1932 में वह नमक सत्याग्रह के दौरान जेल गए। 1941 तक आते-आते गांधीवादी आंदोलन से उनका मोहभंग हो गया। 1941 में ही ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें फिर जेल में डाल दिया। जुलाई 1941 की एक कविता में उन्होंने ऐलान किया कि ‘क्रांतिपथ पर जा रहा हूँ/धैर्य की कडि़याँ खटाखट तोड़कर मैं आ रहा हूँ।’ 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सचमुच युवकों ने धैर्य की कडि़याँ तोड़ डालीं। रमता जी भी उस आंदोलन की अगली कतार में थे। इनके साथियों ने रेलवे पटरियाँ भी उखाड़ीं। 1943 में उनकी पुनः गिरफ्तारी हुई और उन्हें यातना भी दी गई। 1943 में ही उन्होंने अपनी एक रचना में भविष्य के अपने रास्ते का संकेत दे दिया- ‘रूढि़वाद का घोर विरोधी, परिपाटी का नाशक हूँ/ नई रोशनी का प्रेमी, विप्लव का विकट उपासक हूँ… मैं तो चला आज, जिस पथ पर भगत गए, आजाद गए/खुदीराम-सुखदेव-राजगुरु-विस्मिल रामप्रसाद गए।’

1947 की आजादी और उसके बाद के राजकाज से वह जरा भी संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने अपने एक भोजपुरी गीत में लिखा कि ‘हम त शुरूए में कहलीं कि सुलहा सुराज ई कुराज हो गइल/रहे जेकरा प आशा-भरोसा उ नेता दगाबाज हो गइल।’ इसके बाद लगातार वामपंथी राजनीति में उनकी दिलचस्पी बढ़ती गई। पहले वह सीपीएम में गए। सीपीएम में रहते हुए ही वह 1966 के बिहार बंद में जेल गए। उसके थोड़े दिनों के बाद ही उनका सीपीआई (एमएल) से जुड़ाव हुआ। 1980-81 में जब सीपीआई (एमएल) का बाकायदा सदस्यता अभियान शुरू हुआ तो वह भी सदस्य बन गए और जीवनपर्यंत पार्टी द्वारा संचालित आंदोलनों में सक्रिय रहे। माले के आंदोलनों के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। बिहार राज्य जनवादी देशभक्त मोर्चा और आईपीएफ के गठन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। वह माले के केंद्रीय कंट्रोल कमिशन के भी सदस्य थे।

भाकपा-माले को वह अपना घर समझते थे। मृत्यु से एक सप्ताह पूर्व जब वे आरा आए थे तो जिद करके पार्टी के जिला कार्यालय आए कि ‘हमरा आपन घर ले चल लोग।‘ शारीरिक स्तर पर कमजोरी के बावजूद वह दिसंबर में कोलकाता में आयोजित पार्टी के महाधिवेशन में जाने के लिए अड़ गए थे। किसी तरह कामरेडों ने उन्हें मनाया। 2002 में जब झारखंड में का. दीपंकर की गिरफ्तारी के खिलाफ जनप्रदर्शन का आयोजन किया गया था तो वह भी बिहार के लोगों के साथ पहुँच गए। वह उन वरिष्ठ क्रांतिकारियों में से थे जिन्होंने भोजपुर की मिट्टी में सीपीआई (एमएल) को स्थायित्व प्रदान करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जनगीत के पहलू से देखें तो गोरख पांडेय और विजेन्द्र अनिल ने रमता जी की ही वैचारिक परंपरा को आगे बढ़ाया। कुंवर सिंह पर रचित उनका गीत जनराजनीतिक दृष्टि से बेहद धारदार है। 1857 पर चल रही राजनीतिक बहसों के मद्देनजर भी उस गीत को देखा जाना चाहिए। ‘हमनी देशवा के नया रचवइया हईं जा/हमनी साथी हई, आपस में भइया हईं जा’, ‘राजनीति सब के बूझे के, बूझावे के परी/देश फसल बांटे जाल में, छोड़ावे के परी’, ‘भारत में रंगत दिखाय दियो रे, दिल्ली वाली रनिया’, ‘काहे फरके-फरके बानीं, रउरो आईं जी/हामार सुनीं, कुछ अपनो सुनाईं जी’, ‘पेरल जाई परजा, चुआवल जाई तेल/रनिया से बीसे रही रजवा के खेल’, ‘ढेवर के बैल’, ‘अब शहरे में रहे के विचार बा’,’हरवाह-बटोही संवाद’, ‘बेयालिस के साथी’, ‘किसान’, ‘सुरजवा के कारन छैला हो गइले दीवाना’, ‘शहीदों का गीत’, ‘मैं तो नक्सलवादी’, ‘जीने के लिए कोई बागी बने, धनवान इजाजत ना देगा/कोई धर्म इजाजत ना देगा, भगवान इजाजत ना देगा’, ‘भारत जननि तेरी जय हो’, ‘लाल मंतर’, ‘नया आदमी’, ‘सरकारी हिंसा हिंसा न भवति’, ‘आजादी की लगन लगी लगी जब’, ‘अमर शहीद कवि कैलाश’, ‘विद्रोही’, ‘क्रांतिपथ’, ‘जिंदा शहीद’, ‘नक्सलबाड़ी की जय’, ‘मुक्ति का पंथ’, ‘झंडा ना कबहूं झुकाइब’, ‘नई जिंदगी’ आदि उनकी चर्चित रचनाएं हैं। उनका रचनात्मक तेवर देखने लायक है- क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब/केहू का ना सोहाला त हम का करीं/लाल झंडा हवा में उड़इबे करब/केहू जरिके बुताला त हम का करीं।

रमता जी के गीत

1.
राजनीति सब के बुझे के बुझावे के परी
देश फंसल बाटे जाल में, छोड़ावे के परी

सहि के लाखों बरबादी, मिलल नकली आजादी
एहके नकली से असली बनावे के परी

कवनो वंशे करी राज, या कि जनता के समाज
जतना जलदी, जइसे होखे, फरियावे के परी

बड़-बड़ सेठ-जमींदार, पुलिस-पलटनिया हतेयार
सब लुटेरन, हतेयारन के मिटावे के परी

रूस, अमरीका से यारी, सारी दुनिया के बीमारी
अपना देश के एह यारी से बचावे के परी

कहीं देश फिर ना टूटे, टूटल-फूटल बा से जुटे
सबके हक के झंडा ऊंचा फहरावे के परी

सौ में पांचे जहां सुखिया, भारत दुनिया ऊपर दुखिया
घर-घर क्रांति के संदेशा पहुंचावे के परी
25.9.1984

2.
भारत जननि! तेरी जय, तेरी जय हो

हों वीर, रणधीर तेरी सु-संतान
तरी सभी संकटों पर विजय हो

आजाद, अस्फाक, बिस्मिल, खुदीराम
उधम, भगत सिंह का फिर उदय हो

चारू की, राजू की, किस्टा-भुमैया की
जौहर की आवाज गुंजित अभय हो

जनगण हों आजाद, कायम हो जनवाद
सत्ता निरंकुश का अंतिम प्रलय हो
18.2.1984

मैं तो नक्सलवादी
मैं तो नक्सलवादी वंदे! मैं तो नक्सलवादी रे
मुझसे तनिक सही ना जाए अब घर की बरबादी रे

लूटे मेरा देश विदेशी जंगखोर साम्राजी
साथ-साथ सामंत रिजाला, पूंजीवाला पाजी
सबके मन सहकाए, जो बैठे दिल्ली की गद्दी रे

खट-खट के खलिहान-खेत में, मिल में और खदान में
मर-मर सब सुख साज सजावे गांव-नगर-मैदान में
दो रोटी के लिए बने वह द्वार द्वार फरियादी रे

भ्रष्टाचार-भूख-बेकारी दिन-दिन बढ़े सवाई
अत्याचार विरोधी को सरकार कहे अन्यायी
यह कैसा जनतंत्र देश में, यह कैसी आजादी रे

मैं तो वंदे! अग्नि-पंथ का पंथी दूर मुकामी
मेरे संगी-साथी ये अंतिम जुझार संग्रामी
रोटी-आजादी-जनवाद हेतु जो करें मुनादी रे
30.4.85

बेयालिस के साथी
साथी, ऊ दिन परल इयाद, नयन भरि आइल ए साथी

गरजे-तड़के-चमके-बरसे, घटा भयावन कारी
आपन हाथ आपु ना सूझे, अइसन रात अन्हारी
चारों ओर भइल पंजंजल, ऊ भादो-भदवारी
डेग-डेग गोड़ बिछिलाइल, फनलीं कठिन कियारी
केहि आशा वन-वन फिरलीं छिछिआइल ए साथी

हाथे कड़ी, पांव में बेड़ी, डांड़े रसी बन्हाइल
बिना कसूर मूंज के अइसन, लाठिन देह थुराइल
सूपो चालन कुरुक करा के जुरुमाना वसुलाइल
बड़ा धरछने आइल, बाकी ऊ सुराज ना आइल
जवना खातिर तेरहो करम पुराइल ए साथी

भूखे-पेट बिसूरे लइका, समुझे ना समुझावे
गांथि लुगरिया रनिया, झुखे, लाजो देखि लजावे
बिनु किवांड़ घर कूकुर पइसे, ले छुंछहंड़ ढिमिलावे
रात-रात भर सोच-फिकिर में आंखों नींन न आवे
ई दुख सहल न जाइ कि मन उबिआइल ए साथी

क्रूर-संघाती राज हड़पले, भरि मुंह ना बतिआवसु
हमरे बल से कुरसी तूरसु, हमके आंखि देखावसु
दिन-दिन एने बढ़े मुसीबत, ओने मउज उड़ावसु
पाथर बोझल नाव भवंर में, दइबे पार लगावसु
सजगे! इन्हिको अंत काल नगिचाइल ए साथी
8.6.53

अइसन गांव बना दे
अइसन गांव बना दे, जहां अत्याचार ना रहे
जहां सपनों में जालिम जमींदार ना रहे

सबके मिले भर पेट दाना, सब के रहे के ठेकाना
कोई बस्तर बिना लंगटे- उघार ना रहे
सभे करे मिल-जुल काम, पावे पूरा श्रम के दाम
कोई केहू के कमाई लूटनिहार ना रहे

सभे करे सब के मान, गावे एकता के गान
कोई केहू के कुबोली बोलनिहार ना रहे
18.3.83

त हम का करीं
क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब
केहू का ना सोहाला त हम का करीं
लाल झंडा हवा में उड़इबे करब
केहू जरिके बुताला त हम का करीं

केहू दिन-रात खटलो प’ भूखे मरे
केहू बइठल मलाई से नाष्ता करे
केहू टुटही मड़इया में दिन काटता
केहू कोठा-अटारी में जलसा करे

ई ना बरम्हा के टांकी ह तकदीर में
ई त बैमान-धूर्तन के करसाज ह
हम ढकोसला के परदा उठइबे करब
केहू फजिहत हो जाला त हम का करीं

ह ई मालिक ना, जालिम जमींदार ह
खून सोखा ह, लंपट ह, हत्यार ह
ह ई समराजी पूंजी के देशी दलाल
टाटा-बिड़ला ह, बड़का पूंजीदार ह

ह ई इन्हने के कुकुर वफादार ह
देश बेचू ह, सांसद ह, सरकार ह
सबके अंगुरी देखा के चिन्हइबे करब
केहू सकदम हो जाला त हम का करीं

सौ में पंचानबे लोग दुख भोगता
सौ में पांचे सब जिनिगी के सुख भोगता
ओही पांचे के हक में पुलिस-फौज बा
दिल्ली-पटना से हाकिम-हुकुम होखता

ओही पांचे के चलती बा एह राज में
ऊहे सबके तरक्की के राह रोकता
ऊहे दुश्मन ह, डंका बजइबे करब
केहू का धड़का समाला त हम का करीं
30.1.83

हमनी साथी हईं
हमनी देशवा के नया रचवइया हईंजा
हमनी साथी हईं, आपस में भइया र्हइंजा

हमनी हईंजा जवान, राहे चलीं सीना तान
हमनी जुलुमिन से पंजा लड़वइया हईंजा

सगरे हमनी के दल,  गांव-नगर हलचल
हमनी चुन-चुन कुचाल मेटवइया हईंजा

झंडा हमनी के लाल, तीनों काल में कमाल
सारे झंडा ऊपर झंडा उड़वइया हईंजा

बहे कइसनो बेयार, नइया होइये जाई पार
हमनी देशवा के नइया के खेवइया हईंजा
1.5.85

हामार सुनीं
काहे फरके-फरके बानीं, रउरो आईं जी
हामार सुनीं, कुछ अपनो सुनाईं जी

जब हम करींले पुकार, राउर खुले ना केवांर
एकर कारन का बा, आईं समुझाईं जी

जइसन फेर में बानी हम, ओहले रउरो नइखीं कम
कवनो निकले के जुगुति बताईं जी

सोचीं, कइसन बा ई राज, कुछ त रउरो बा अंदाज
देहबि कहिया ले एह राज के दोहाई जी

जवन सांसत अबहीं होता, का-का भोगिहें नाती-पोता
एह पर रउरो तनि गौर फरमाईं जी

अब मत फरके-फरके रहीं, सब कुछ संगे-संगे सहीं
संगे-संगे करीं बचे के उपाई जी

सभे आइल, रउरो आईं, संगे रोईं-संगे गाईं
हम त रउरे हईं, रउरा हमार भाई जी
(ये गीत समकालीन प्रकाशन से 1996 में प्रकाशित रमता जी के हिंदी-भोजपुरी गीतों के एकमात्र संग्रह ‘हामार सुनीं’ से लिए गए हैं।)

जिन्हें नाज़ है : संजय ग्रोवर

गजलकार संजय ग्रोवर

चर्चित व्‍यंग्‍यकार और गजलकार संजय ग्रोवर की नज्‍म़-

जिन्हें नाज़ है उनके क्या राज़ खोलूँ
जो तोल के बोलूँ तो कुछ भी न बोलूँ

ये तहज़ीब की बन ज़ुंबाँ बोलते हैं
ये बनके तेरे मेहरबाँ बोलते हैं
ये ईमान पर, बेईमाँ बोलते हैं

जिन्हें नाज़ है उनके ……

ये चाहें तो तुझको तुझीसे लड़ा दें
तेरे घर में घुसकर वो बेघर बना दें
ये साज़िश करें और मुकद्दर बता दें

जिन्हें नाज़ है उनके ……

ये बढ़ते हुए माफ़िया ज़िंदगी के
ये रटते हुए, काफ़िया ज़िंदगी के
ये बन जाते हैं रहनुमाँ ज़िंदगी के

जिन्हें नाज़ है उनके ……

कोई टोपियों से कबूतर निकाले
क़िताबों से कोई है अक्षर निकाले
कोई जादूगर कफ्न से सर निकाले

जिन्हें नाज़ है उनके ……

अदू औरतों के, चले दोस्त बनकर
निशाना ये उनपर लगाएंगे छुपकर
उन्हीं के ये, हमदर्द कंधे पे रखकर

जिन्हें नाज़ है उनके ……

ये माँ बहन बेटी की माला जपे हैं
दिखे है जो औरत, ये सर नोंच ले हैं
ये उसपर हँसे हैं कि ख़ुदपर हँसे हैं

जिन्हें नाज़ है उनके ……

वो औरत भी ख़ुदको अजब ढूँढती है
वो मज़हब ही में अपना सब ढूँढती है
वो तब ढूँढती थी न अब ढूँढती है

जिन्हें नाज़ है उनके…..

इसे जिस धरम ने कहीं का न छोड़ा
उसे इसने अपना सबब मान छोड़ा
इस औरत ने ख़ुदको कहीं का न छोड़ा

जिन्हें नाज़ है उनके…..

कवि-संस्कृतिकर्मियों के सरोकार : सुधीर सुमन

सूफियान के स्मृति दिवस पर आयोजि‍त सभा में बोलते रामनिहाल गुंजन

बिहार के आरा शहर में मैं 13-14 जनवरी को दो कार्यक्रमों में शामिल हुआ। पहले दिन शहीद कामरेड सूफियान के स्मृति दिवस के अवसर पर वामपंथी दल भाकपा-माले द्वारा आयोजित प्रतिवाद सभा में था और दूसरे दिन जनवादी लेखक संघ द्वारा आयोजित एक कविता गोष्ठी में। ये दोनों अलग-अलग किस्म के कार्यक्रम थे, परंतु दोनों  कार्यक्रमों में मुझे कवियों और संस्कृतिकर्मियों का जो राजनीतिक-सामाजिक सरोकार और उनकी जो फिक्र देखने को मिली, वह बहुत आश्वस्त करने वाला है।

कामरेड सूफियान ने किशोर उम्र में शहरी गरीबों और फुटपाथी दुकानदारों के संघर्षों से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। देश की राजनीति को सांप्रदायिक एजेंडे पर धुव्रीकृत रखने वाली राजनीतिक ताकतों ने आरा शहर में जब भी दंगे का माहौल बनाया, सूफियान ने अपनी पार्टी के साथियों के साथ उसका सफल प्रतिवाद किया। तीन-तीन बार ऐसी साजिशें नाकाम हुईं। इन्हीं राजनीतिक पार्टियों के संरक्षण में पलने वाले अपराधियों ने जब शहर के आम अवाम का जीना मुश्किल कर दिया, तब उन्होंने लगातार उनके खिलाफ संघर्ष किया और उसी संघर्ष में शहीद भी हुए। बेशक उन्होंने मुस्लिम समुदाय के अपराधियों का भी मुखर प्रतिवाद किया और पूरे मुस्लिम समुदाय को अपराधी के तौर पर प्रचारित किये जाने की घृणित राजनीति का मुँहतोड़ जवाब दिया। उन्होंने नागरिकों का ध्यान अपराध के राजनीतिक संरक्षकों की ओर खींचा। चाहे पूर्व की राजद सरकार हो या बाद की नीतीश सरकार, दोनों के शासनकाल में अपराध के संरक्षकों पर कोई लगाम नहीं लगी। इसके अलावा जब वे वार्ड पार्षद बने तो उन्होंने पारदर्शी तरीके से काम करने की भी मिसाल कायम की। जाहिर था कि विकास योजनाओं की लूट के अपराध-तंत्र का जो संचालन करते हैं, उनकी आँखों की भी वह किरकिरी थे। अपराधी-राजनेता गठजोड़ के पालतू कुछ मीडियाकर्मियों ने उनकी हत्या को आपसी रंजिश का परिणाम बताया था। चार साल गुजर चुके हैं, पर मैं सूफियान को नहीं भूल पाया। एक कारण यह भी था कि वह अपनी राजनीतिक जिम्मेवारियों को निभाने के प्रति जितने प्रतिबद्ध थे, उतने ही सांस्कृतिक मोर्चे के साथियों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे। जब हमने भोजपुर के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के एक नायक कामरेड जगदीश मास्टर पर महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘मास्साहब’ की नाट्य प्रस्तुति की थी, तब भी उन्होंने हमारी मदद की थी। उनकी देखरेख में ‘साझी शहादत साझी विरासत’ के नाम से रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला पर एक भव्य आयोजन हुआ था। आरा शहर का अबरपुल मुहल्ला उस रोज लाल झंडों से सजा हुआ था। वहाँ तब एक स्थानीय गायन की टीम भी उभरी थी, जिसने बिस्मिल और अशफाक की गजलों को गाया था।

सूफियान की शहादत के बाद निश्चित तौर पर राजनीतिक कामकाज की गति इस इलाके में थोड़ी धीमी हुई है। अपराधी भी शायद इस मुगालते में हैं कि उनकी जीत हो गई है। मगर जैसा कि प्रतिवाद सभा में जसम, बिहार के राज्य अध्यक्ष कवि आलोचक रामनिहाल गुंजन ने कहा कि अपराध अमर नहीं होता, अपराध के खिलाफ लड़ाई अमर होती है, तो इस लड़ाई को जारी रखने के संकल्प में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों की आवाज भी पूरी निर्भीकता के साथ व्यक्त हो रही थी। गुंजन जी ने महान क्रांतिकारी कवि ब्रेख्त के हवाले से कहा कि अंधेरे वक्त में भी अंधेरे के खिलाफ गीत गाए जाएंगे। उन्होंने शमशेर को भी उद्धृत किया, जिनका उसी रोज जन्मदिन था- यह सलामी दोस्तों को है मगर/मुट्ठियां तनती हैं  दुश्मनों के लिए।

यह था एक वरिष्ठ कवि आलोचक का सरोकार, जो हमारी पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा का काम कर रहा था। कवि सुमन कुमार सिंह भी मंच पर पहुंचे और कहा कि वे सूफियान की हत्या के प्रतिवाद के साथ-साथ पूरे बिहार में बढ़ रही आपराधिक गतिविधियों के प्रति भी अपना प्रतिवाद दर्ज करते हैं। मैंने कामरेड सूफियान पर लिखी गई अपनी कविता तो सुनाई ही, युवानीति के कलाकारों ने रंगकर्मी-गीतकार अरुण प्रसाद द्वारा हाल में रचित एक जनगीत, जो शहीद गीत भी है- ‘साथिया रात सपने में आके तूने मुझको बहुत है सताया’ सुनाया। यह गीत उन्होंने खासतौर पर जनगीतकार अदम गोंडवी की स्मृति में जसम द्वारा आयोजित पिछले एक कार्यक्रम के लिए लिखा था, जिसमें एक पंक्ति यह भी आई कि ‘तेरे हत्यारे कुछ तो सलाखों में हैं, और उससे भी ज्यादा निगाहों में हैं’।

कवि की निगाह आज कहाँ-कहाँ है, यह दिखा दूसरे दिन जलेस की गोष्ठी में। हाल में नवें दशक के एक चर्चित कवि ने जिस तरह एक अखबार में राहुल गांधी का शर्मनाक तरीके से महिमा मंडन किया था, उससे मैं बेहद आहत था, लेकिन इस कविता गोष्ठी में संतोष श्रेयांश ने मानो अपनी लंबी कविता के जरिये इस तरह की सत्तापरस्ती का जवाब दे दिया। काव्यात्मक लिहाज से थोड़ी कमजोर, पर जनसरोकार और कथ्य के लिहाज से मजबूत उनकी कविता युवा कवियों की राजनीतिक सचेतनता और प्रतिवाद का बेहतरीन उदाहरण लगी। सत्ताधारियों के पाखण्‍ड, धोखाधड़ी और उनकी चालबाजियों के खिलाफ ऐसा ही मुखर अंदाज सुमन कुमार सिंह के गीत और कविता में भी मिला। रोजगार के चक्कर में बिछड़ने वाले अपने दोस्त को याद करते हुए  किस तरह कवि की पीड़ा उस  नौजवान के परिवार और समाज की पीड़ा तक फैलती जाती है और किस तरह लोगों को विस्थापित करने और परस्पर लड़ाने वाला राजनीतिक तंत्र उसके सवालों के दायरे में आता है, यह हमने सुनील श्रीवास्तव की कविता को सुनते हुए महसूस किया। कुर्बान आतिश की गजलें आज के दौर के अहम सवालों को उठा रही थीं और ए.के. आँसू की गजल तो आज के वक्त के तकाजें क्या-क्या हैं, उसी की सूची गर्मजोशी के साथ पेश कर रही थी। वरिष्ठ कवि जगदीश नलिन, श्रीराम तिवारी, जगतनंदन सहाय से लेकर राजाराम प्रियदर्शी, कुमार वीरेंद्र, अमृता प्रिया आदि तक समकालीन कविता का एक बड़ा रेंज सामने था। और आखिर में थी जनवादी कथाकार-गजलगो नीरज सिंह की जरूरी हिदायतें-

तमाम कोशिशें कि रौशनी मयस्सर हो
तमाम बंदिशें न हो सकें सहर लिखना
नई है बात कि कांटे बहार पर काबिज
खड़े हैं फूल किनारों पर नत नजर लिखना
खड़े वो महल बसेरा है जिनमें बाजों का
गिरे हैं जलजले से बुलबुलों के घर लिखना
तमाम हाल शहर का बयां करो न करो
जरूर लिखना कि लिखना है बाअसर लिखना।

कविताओं और गजलों में आज की व्यवस्था के प्रति असंतोष के स्वर और उससे टकराव की आकांक्षा को इस गोष्ठी में मौजूद प्रो. पशुपतिनाथ सिंह और सुधाकर उपाध्याय ने ठीक ही लक्षित किया और उन्होंने जीत की उम्मीद भी जाहिर की।

वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी और बद्री नारायण को शमशेर सम्‍मान

नई दिल्ली : 2011 का प्रतिष्ठित शमशेर सम्मान सृजनात्मक गद्य के लिए वरिष्ठ आलोचक और गद्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी व कविता के लिए हि‍न्‍दी के प्रतिष्ठित कवि बद्री नारायण को दि‍या जाएगा। सम्मान समारोह जून, 2012 में नई दिल्ली में होगा। इस सम्मान के लिए साहित्यकार का चयन देशभर से प्राप्त अनुशंसाओं के आधार पर वरिष्ठ रचनाकारों की एक समिति करती है। इस बार इस समिति में कवि विष्णु नागर, लीलाधर मंडलोई, राजेंद्र शर्मा व मदन कश्यप थे। सम्मानित रचनाकार को सम्मान निधि, प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिह्न दिया जाता है।

गाँव से लौटकर : नि‍त्‍यानंद गायेन

नि‍त्या‍नंद गायेन

कुछ दि‍न गाँव में रहकर लौटे युवा कवि‍ नि‍त्‍यानंद गायेन की कवि‍ता-

गाँव से
अभी-अभी
लौटा हूँ शहर में

याद आ रही है
गाँव की शामें
सियार की हुक्का हू
टर्र -टर्र करते मेंढक
सुलटी*के नवजात पिल्ले

कुहासा में भीगी हुई सुबह
घाट की युवतियाँ
सब्जी का मोठ उठाया किसान
धान और पुआल
आँगन में मुर्गिओं की हलचल

डाब का पानी
खजूर का गुड़
अमरुद का पेड़
मासी की हाथ की गरम रोटियाँ
माछ-भात

पान चबाते दाँत
और …
नन्ही पिटकुली* की
चुलबुली बातें

*सुलटी- हमारी कुतिया
*पिटकुली- छोटे मामा की 5 वर्ष की बिटिया