Archive for: December 2011

नये साल पर प्रकाश मनु के दो गीत

 

नये साल के अवसर पर वरिष्‍ठ कथाकार प्रकाश मनु के दो गीत-

नये साल क्या-क्या लाओगे?

नये साल क्या-क्या लाओगे?
प्यारा-प्यारा नया कलेंडर
ताजा दिन, ताजी-सी शाम,
चिडिय़ाघर की सैर, और फिर
हल्ला-गुल्ला मार तमाम।
हलुआ, पूड़ी, बरफी, चमचम
से मुँह मीठा करवाओगे?

मीठी-मीठी एक बाँसुरी
नयी कहानी, नयी किताब,
मीठी-मीठी अपने शामें
हँसता जैसे सुर्ख गुलाब।
खुशबू का एक झोंका बनकर
सबके मन को बहलाओगे?

या बुखार पढऩे का सब दिन
कागज-पतर रँगवाओगे,
टीचर जी की डाँट-डपट
मम्मी की झिडक़ी बन जाओगे।
खेलकूद के, शैतानी के
सारे करतब भुलवाओगे?

झगड़ा-टंटा रस्ता चलते
जाने कैसे-कैसे झंझट,
बिना बात की ऐंचातानी
बिना बात की सबसे खटपट।
गया साल सच, बहुत बुरा था,
उसकी चोटें सहलाओगे?

नया कलेंडर

पापा, नए साल पर लाना,
बढिय़ा सा
एक नया कलेंडर!

बैठक में जो टँगा हुआ है
हुआ कलेंडर बहुत पुराना,
उस पर मैंने कभी लिखा था
कालू-भालू वाला गाना।
मम्मी ने भी लिखा उसी पर
शायद राशन का हिसाब है,
इसीलिए बिगड़ा-बिगड़ा सा
जैसे डब्बू की किताब है!

नया कलेंडर लाना जिस पर
फूल बने हो
सुंदर-सुंदर!

फूलों पर उड़ती हो तितली
उसे पकडऩे डब्बू भागा,
आसमान में नया उजाला
सूरज भी हो जागा-जागा।
ऐसा नया कलेंडर जिसमें
गाना गाये मुनमुन दीदी,
सुनकर के पेड़ों पर बैठी,
चिडिय़ा चहके चीं-चीं, चीं-चीं!

नई सुबह आएगी पापा
उस नन्ही
चिडिय़ा-सी फुर-फुर!

चित्रांकन  : प्रगति त्‍यागी

दुष्‍यंत कुमार उम्‍मीद के शायर : नंद चतुर्वेदी

दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में मंचासीन अतिथि।

 

उदयपुर : दुष्यंत कुमार लोकतंत्र के बड़े एवं उम्मीदों के कवि थे। लोकतंत्र में उम्मीद एवं नाउम्मीद दोनों भाव होते हैं, पर दुष्यंत कुमार नाउम्मीदी के बीच उम्मीद के कवि-शायर थे। दुष्यंत की शायरी बर्फानी झील में रोशनी और उष्मा देने वाली रही है। यह विचार प्रो. नंद चतुर्वेदी ने  कवि-शायर दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि (30 दिसम्‍बर) पर आयोजित स्मराणांजलि कार्यक्रम में व्यक्त किये। कार्यक्रम का आयोजन प्रसंग संस्थान एवं वर्धमान महावीर कोटा खुला विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

वर्धमान महावीर कोटा खुला विवि सभागार में आयोजित कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि लोककलाविज्ञ डॉ. महेन्द्र भानावत ने कहा कि दुष्यंत कुमार भाषाई सौहार्द के कवि थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में विश्वास जगाया एवं नवोदित कवि-शायरों को गजलों की परम्‍परा दी।

प्रारम्‍भ में विश्वविद्यालय के निदेशक डॉ. अरुण चतुर्वेदी ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का संयोजन करते हुए प्रसंग संस्थान के संस्थापक-अध्यक्ष डॉक्‍टर इन्द्र प्रकाश श्रीमाली ने दुष्यंत कुमार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में खलील तनवीर, इकबाल सागर, मुश्ताक चंचल, शिवरतन तिवारी, हाजी मोहम्मद आदिल आदि ने भी शायर दुष्यंत कुमार की सृजन-यात्रा पर विचार व्यक्त किये। इस अवसर पर दुष्यंत कुमार की चर्चित गजलों को डॉ. रजनी चतुर्वेदी, डॉ. देवेन्द्रसिंह हिरण एवं डॉ. प्रेमसिंह भंडारी ने सस्वर प्रस्तुत किया। प्रसंग संस्थान की महासचिव डॉ. मंजु चतुर्वेदी ने दुष्यंत कुमार के साहित्यिक अवदान को रेखांकित करते हुए सभी सुधि श्रोताओं का आभार प्रकट किया। कार्यक्रम में ए.एल. दमामी, डॉ. विश्वम्‍भर व्यास, कौस्तुभ प्रकाश आदि उपस्थित थे।

प्रस्‍तुति : डॉक्‍टर मंजु चतुर्वेदी

सुनिए अन्ना सुनो केजरीवाल : आशुतोष कुमार

 

युवा आलोचक आशुतोष कुमार का अन्‍ना के लिए संदेश-

सुनिए अन्ना सुनो केजरीवाल
लोकपाल क्या दिलवाएंगे दौलत के दिक्पाल
दैयू भैयू संकर कंकर दागी दुष्ट दलाल
जोग जुगत उन को बेचें ये जिन पे है तर माल
मजदूरों के पास चलो मंझनी है अगर मशाल !

कैरिकेचर : सागर

नई रसायन

मेरी क्यूरी

प्रख्‍यात वैज्ञानिक मेरी क्‍यूरी को 1911 में रसायन विज्ञान के लिए नोबल पुरस्‍कार मिला था। इस उपलब्धि को 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्‍य में 2011 को ‘अंतरराष्‍ट्रीय रसायन वर्ष’ के रूप में मनाया गया। मेरी क्‍यूरी की जीवनगाथा परिकथा जैसी कल्पनापूर्ण और रोमांचकारी थी-

पेरिस में एक शाम गोधूलि वेला में एक स्त्री और पु़रुष अपने घर की ओर जा रहा थे। थके होने के कारण वे धीरे-धीरे चल रहे थे। महीनों तक उन्होंने दिन-दिन-भर एक गीले और गन्दे शैड में, जिसे वे अपनी प्रयोगशाला कहते थे, साथ मिलकर काम किया था। अधिकांश समय तक स्त्री ने खडे़ रहकर एक बडे़ बर्तन में उबलते हुए मिश्रण को अपने बराबर लम्बी लोहे की एक छड़ से चलाते रहने का काम किया था। उसके पति ने अनेक कठिनाइयों के बावजूद उबलने की क्रिया से प्राप्त पदार्थों का बडे़ नाजुक यंत्रों से, जिन पर गीलेपन और ठण्‍ड का भी प्रभाव पड़ता था, माप किया था। शैड की छत चूती थी और उनके पास इतना रुपया नहीं था कि वे उसे ठीक करा सकते। जब बारिश आती थी तो पानी की धार इन दोनों और उपकरणों के बीच गिरने लगती थी।

लेकिन अब मिश्रण को चलाने का कार्य समाप्त हो गया था और उन अमूल्य पदार्थों की नन्ही मात्राएं अलग करने का और उनका स्फटिकरण करने का काम खत्म हो गया था जो समस्त सन्देही वैज्ञानिकों के लिये प्रमाण होंगे। आखिर इन लोगों ने चार साल पहले की हुई भविष्यवाणी को ठीक सिद्ध कर दिया था। इसलिए थके होने के बावजूद उनके मस्तिष्क अपनी विजय की उत्तेजना से उत्तेजित थे और उनका चलने का समय योंही निकल गया।

मकान में आकर पत्नी तुरन्त अपनी चार साल की लड़की के पास गई जिसे नर्स सुलाने के लिए तैयार कर रही थी। नर्स से लड़की को लेकर माँ ने कहा, ‘‘आइरीन को मैं सुलाऊँगी। वह सदा यह चाहती है कि मैं ही उसे सुलाऊँ।’’

उसके पति ने बडी़ बेचैनी जाहिर की, ‘‘तुम उस बच्ची के अतिरिक्त कुछ भी नहीं सोचती।’’

‘‘यह बेकार की बात है, पियरे। मैंने सारे दिन एक भी बार उसके बारे में नहीं सोचा।’’

बच्ची बिस्तरे मे सो गई और फिर माता अपने पति के पास चली गई। यह नित्यप्रति का क्रम था, ये लोग अपने अध्ययन में चाहे जितने व्यस्त हों। दिन में आइरीन को नर्स के पास छोड़ना जरूरी था, लेकिन सुलाने से सम्बन्धित सारे काम, जो बच्चे की सुरक्षा की भावना के लिये बडे़ महत्वपूर्ण होते हैं, माँ स्वयं करती थी। आइरीन की माता चाहे सबसे बडी़ स्त्री-वैज्ञानिक थी, लेकिन वह एक माँ भी थी और ममतामयी माँ थी।

पियरे कमरे में इधर-उधर टहल रहा था। जब भी वह गहन विचारों में होता था तो ऐसे ही टहला करता था। उसकी पत्नी कुछ सिलाई का काम लेकर बैठ गई। लेकिन इस काम में उसका ध्यान नहीं लग सका। शायद पियरे की चहल-कदमी से उसका ध्यान बँट रहा था। शायद अपनी तेज विचारधारा के कारण वह कुछ समय बाद ही उठ खडी़ हुई और अपना काम फेंककर उत्तेजनापूर्वक पियरे के पास गई।

उसने कहा, ‘‘आइरीन सो गई है। चलो हम लोग वहीं चलें। मैं ‘उसे’ रात में देखना चाहती हूँ।

वह हमेशा ‘उस’ की बात किया करते थे। जब वे इस शब्द को बोलते थे तो ऐसा लगता था कि इसपर विशेष जोर दिया जा रहा हो। इस बार वे तेजी से गए। पियरे ने ताला हटाकर चरमराते हुए दरवाजे को खोला। अन्य रातों की अपेक्षा कमरे में कम अंधकार था। मेजों और आलमारियों पर इधर-उधर नन्हे-नन्हे हल्के चमकदार निशान थे- जुगनुओं की तरह या वैसे ही अन्य चमक देनेवाले कीड़ों की तरह।

‘‘मेरी, इसकी हमने कितनी प्रतीक्षा की है।’’

‘‘लेकिन, पियरे, यह उतना सुन्दर नहीं है जितना तुमने सोचा था। तुमने किसी विशेष और स्पष्ट रंग के बारे में सोचा था।’’

‘‘यह सुन्दर है।’’ पियरे ने कहा।

वह सुन्दर लगता था क्योंकि वह उन दोनों का अंश प्रतीत होता था- उनके प्रेम का फल, जैसे उनकी बच्ची थी।

अत: उस रात वे, पियरे और मेरी क्यूरी एक नये संसार के द्वार पर खडे़ थे।

मेरी स्लोडोव्स्का का जन्म 1867 की सर्दियों मे वार्सा में हुआ था। उसका परिवार छोटे जमींदारों की उस श्रेणी का था जिसने पोलैण्‍ड के अधिकांश प्रतिभाशाली व्यक्तियों को जन्म दिया था- कलाकार, लेखक, संगीतज्ञ और विद्वान। मेरी का पिता भौतिक विज्ञान एवं गणित का प्राध्यापक था, उसकी माँ ने एक लड़कियों का स्कूल चलाया था लेकिन जब उसका परिवार इतना बडा़ हो गया कि दुगुना काम उसके नाजुक स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक नुकसानदायक सिद्ध होने लगा तो उसे स्कूल छोड़ना पड़ा। क्योंकि पोलैण्‍ड के बच्चों को प्रायः उपनाम से ही पुकारा जाता है, इसलिए मेरी अपने बचपन में ‘मान्या’ रही।

उस ज़माने उस ज़माने में सदा से दुखी देश पोलैण्‍ड भारी दबावों के बीच था। रूस, आस्ट्रिया और प्रशिया के बीच इसका विभाजन हो गया था। अधिकांश भाग रूस के पास था और कठोर निर्दयता से वह इसके पोलिस लक्षणों को मिटा देना चाहता था। स्‍कूलों में पोलिश भाषा पढ़ाना मना था। रूसी पोलैण्ड एक पुलिस राज्य था जिसमें नाजी जर्मनी जैसा कठोर नियंत्रण था। रूसी शासन की आलोचना करने का मतलब था साइबेरिया के लिए देश निकाला। पोलिश देश-प्रेम, पोलिश झंडे़, पोलिश इतिहास, साहित्य और संगीत सबको कठोरता से दबा दिया गया था। एक गुप्त क्रान्ति  की योजना अवश्य थी, लेकिन इसको बिलकुल गोपनीय रखना पड़ता था।

बच्ची होने के बावजूद मान्या बडी़ देशभक्त थी। राष्ट्रीय चरित्र का उत्थान, रूस के प्रति सामूहिक घृणा और जार के दबाव का हर सम्‍भव विरोध करने के लिए वह अन्य लड़कें और लड़कियों के साथ मिल गई। इसके साथ ही स्कूल को रूसी हमले से बचाने के लिए उसके स्कूल की शिक्षकों ने उसकी चतुराई का प्रयोग किया। उसने बडी़ अच्छी तरह रूसी भाषा बोलना सीख लिया। हालाँकि सभी विद्यार्थियों को रूसी इतिहास पढ़ना होता था, लेकिन मान्या ने अपनी पक्की स्मरण शक्ति के कारण घटनाओं और शासकों को क्रमपूर्वक इतनी अच्छी तरह याद कर लिया कि वह किसी भी प्रश्न का उत्तर दे सकती थी। इसलिए, जब कभी भी रूसी अधिकारी स्कूल के निरीक्षण के लिए किसी निरीक्षक को भेजते थे तो छोटी सी मान्या को हमेशा सबक सुनाने के लिए बुलाया जाता था।

मान्या स्लोडोव्स्का पूर्णतः सामान्य बच्ची थी। अपनी बहनों और भाइयों और स्कूल के साथियों से उसमें केवल बुद्धि का ही अन्तर था। उसकी भावनायें और आस्था गहरी थीं और उसकी इच्छा-शक्ति हठ की तरह प्रबल थी। अपने परिवार के प्रति उसे बडी़ श्रद्धा थी और वह अपने भाई या बहन के लिए कोई भी त्याग कर सकती थी। जब वह परिवार से दूर रही तो उसे घर की याद ने बहुत सताया। तो भी उसमें कोई विकृति नहीं थी। वह बहुत कम नाराज होती थी और उसका ध्यान और रुचि अपने आप पर केन्द्रित नहीं थे। उसे अपनी होशियारी और बुद्धिमत्ता के कारण जो भारी महत्व मिला उसके बावजूद उसमें कोई अंहकार या दिखावा नहीं आया। उसमें बडा़ उल्लास था और उसने उस मनोरंजन के हर क्षण का आनन्द लिया जो उसे उस मजबूरी और गरीबी के जीवन में मिल सका।

वह सदा ही कठोर और अथक परिश्रम करती थी। उसने गणित का गहरा अध्ययन किया। प्रकृति के नियम उसे उतने ही अच्छे लगते जितने उसकी सुन्दरता के विभिन्न भाव। भौतिक एवं रासायनिक विज्ञान से सम्बन्धित हर चीज उसे अच्छी लगती। घर की बैठक में रखे एक काँच के बक्से में उसके पिता की प्रयोगशाला के कुछ यंत्र रखे थे- तुला, इलेक्ट्रोस्कोप, टेस्ट ट्यूबें और कुछ खनिजों के नमूने। इसके सामने वह बडी़ देर-देर तक खोई सी खडी़ रहती थी, जब तक उसके मस्तिष्क के चित्र जीवित से नहीं हो उठते थे। इनकी याद उसके लिए सदा ही सन्‍दर्भ  की तरह काम करती रही।

इस कम साधनों वाले परिवार को नित्यप्रति के निरन्तर कार्य से फुर्सत नहीं मिलती थी। अपनी माँ की बिगड़ती हुई हालत को देखकर मान्या को बडी़ व्यथा होती थी। श्रीमती स्लोडोव्स्का अपने बच्चों से बडा़ प्रेम करती थी लेकिन वह उनको पुचकार नहीं सकती थी। वह अलग खाना खाती और उसके लिए खाना अलग बर्तनों में दिया जाता था जिन्हें और लोग इस्तेमाल नहीं कर सकते थे क्योंकि उसे टी.बी. हो गई थी जो लाइलाज थी। उसे अपनी दशा का पूरा ज्ञान था और बडा़ भय था कि कहीं उसके बच्चों को भी इसकी छूत न लग जाए। उसकी मृत्यु से मान्या को गहरा घाव लगा जिसे ठीक होने में सालों लगे।

मान्या ने पन्द्रह साल की अवस्था में स्कूल की पढा़ई समाप्त कर ली। इसके बाद स्वच्छन्दता का थोडा़-सा अर्सा आया। ऐसा लगता है मानो देव ने उस स्त्री के लिये जिसे जीवन में फिर विश्राम नहीं मिलना था, थोडा़ सा मुआवजा दे दिया था। उसके पिता ने उसके लिए गाँव के सम्बन्धियों के पास एक साल तक छुट्टी मे रहने की व्यवस्था कर दी थी। बदले में वह उनके बच्चों को पढा़ देती थी या खाने का थोडा़-बहुत खर्चा दे देती थी। लेकिन मुख्य बात यह है कि वह पूर्णतः चिन्तामुक्त थी। जैसा उसकी जीवनी के लेखक ने लिखा है-

‘‘कैशोर्य के रहस्यपूर्ण परिवर्तन के दौरान जब उसका शरीर उठ रहा था और उसका मुख सुन्दर होता जा रहा था, मान्या अचानक बडी़ सुस्त हो गई। स्कूल की किताबों को त्यागकर उसने जीवन में पहली और आखिरी बार खाली रहने का आनन्द लिया।’’

वह बडी़ अच्छी घुडसवार बन गई, अपनी उम्र के लड़कें और लड़कियों के साथ उसने हर तरह के खेल खेले, सर्दियों में वह स्केटिंग और कोस्टिंग करती, बर्फ गाडि़यों से लम्बी-लम्बी यात्रायें करती और रात-रात भर नाचती। उसका एक बडा प्रिय शौक था ‘कुलिग’, पोलैण्‍ड का एक प्रकार का ग्रामीण सामूहिक नृत्य और तमाशा।

‘‘कुलिग… त्यौहारों के रंग में एक सर चकरानेवली रहस्यपूर्ण यात्रा। मान्या स्लोडोव्स्का और उनकी तीन चचेरी बहनों को,  मुँह ढके हुए क्रैको ग्रामीण लड़कियों की तरह कपडे़ पहनाकर, चादरों के नीचे छुपाए हुए दो बर्फ गाडि़यां शाम को बर्फ के ऊपर चल पड़ीं। विचित्र ग्रामीण कपडे़ पहने हुए नवयुवक टॉर्च घुमाते हुए, घोड़ों पर उनके साथ-साथ चले। फर के पेड़ों में से अन्य टॉचों की रोशनी चमकी और ठण्डी रात लय से परिपूर्ण हो गई, संगीतज्ञों की बर्फ गाड़ी आ गई जिसमें चार… पागल और आकर्षक प्राणी थे जो अगली दो रातों और दिनों में अपने साजों से वाज, क्राको वियाक और मजुर्का की नशीली तानें निकालेंगे…’’

संगीत से आकर्षित होकर आसपास के सब गाँवों से बर्फ गाडि़याँ आ आकर गाने बजानेवालों के चारों ओर इकट्ठी हो जातीं और फिर सब निकटतम मकान पर आ जाते। यहाँ युवक-युवतियाँ नाचते और खाते-पीते और अगले पड़ाव के लिये चल पड़ते और एक दिन और एक रात बाद वे अन्तिम और सबसे बडे़ मकान पर आ जाते और फिर देर तक संगीत और सामूहिक नृत्य होता।

यह ऐसा अनुभव था जिसे भुलाया नहीं जा सकता था और अपने उस वर्ष की समस्त आनन्दपूर्ण स्मृतियों की तरह यह भी मेरी को जीवन भर याद रहा। क्योंकि उसकी कठिनतम परीक्षाओं के क्षणों में यह स्मृति उसे सान्‍त्‍वना देती रही, इसलिए उसके कार्य की किसी भी कहानी का इसे अभिन्न अंग होना ही चाहिए।

जब मस्ती का साल खत्म हो गया तो यह लड़की, जो अपनी आयु से अधिक विकसित थी और काफी सुन्दर थी, बडे़ जोश के साथ उस काम पर लग गई जो उसके जीवन का मुख्य अंग बना। वार्सा में जोशीले विद्यार्थियों का बड़ा दल था- ऐसे छात्र और छात्रायें जो अपनी पढ़ाई के लिए कोई भी त्याग कर सकते थे। उन लोगों ने मिलकर एक संस्था बनाई जिसमें वह रूसी नियंत्रण की शिक्षा पद्धति से भिन्न स्वतंत्रता से पढ़ सकते थे। इस संस्था को वे ‘चलती फिरती पाठशाला‘ कहते थे। वे लोग एक-दूसरे के घरों पर मिला करते थे और वैज्ञानिक परीक्षण कार्य के लिए इन्हें एक प्रयोगशाला भी मिल गई, जिससे मेरी को बड़ी प्रसन्नता हुई।

इस दल के विद्यार्थी भिन्न-भिन्न व्यवसायों के ध्येय से पढ़ रहे थे। मान्या के भाई जोजेफ और उसकी बहन ब्रोन्या की तरह कुछ को डॉक्टर बनना था। अधिकांश को अध्यापक और प्राध्यापक बनना था, लेकिन उन सबको पराधीन पोलैण्‍ड से बाहर जाना था जहाँ वे अपने विचार स्वतंत्रता से व्यक्त कर सकें। ब्रोन्या और मेरी के लिये ध्येय और आशा पेरिस था। सोरबोने में या विश्वविद्यालय के एक बडे़ वैज्ञानिक स्कूल में पढ़ सकें, यही इन लड़कियों की कल्पना की सबसे बड़ी चाह थी। लेकिन जो कुछ थोड़ा-बहुत रुपया पास था उससे फ्रांस तक की यात्रा भी कैसे कर सकते थे, वहाँ जाकर रहन-सहन के खर्चे की तो बात ही क्या ? निरन्तर ये बहनें इस बारे में बातें करतीं, अन्दाजें लगातीं और योजनायें बनातीं, उन्होंने रुपया बचाया और जो कोई भी छोटा-मोटा काम मिला उसे किया ताकि वे कुछ धन इकट्ठा कर सकें जिसे वे मिलकर इस्तेमाल कर सकें। साथ ही दोनों अपने विधुर पिता को, जिसके लिये वे घर की व्यवस्था सम्भाले हुए थीं, छोड़कर जाने से हिचकती थीं!

मेरी स्लोडोक्रास्का ने जोर दिया कि पहले ब्रोन्‍या औषध विज्ञान का अध्ययन करने के लिए पेरिस जाए, जबकि वह अपने पिता के साथ (जो अभी भी पढ़ाया करता था) मिलकर जो कुछ थोड़ा-बहुत रुपया भेजा जा सकता भेजने में सहायता करेगी। मेरी इतनी हठी थी कि आखिर उसने अपनी बहन को मना ही लिया। ब्रोन्या गई, यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में उसने अच्छा रिकॉर्ड कायम किया और कुछ समय बाद वहाँ मेडिकल के एक पोलिश विद्यार्थी से शादी कर ली। इस प्रकार अन्त में वह मेरी की सहायता का कुछ बदला चुका सकी।

इस बीच मेरी को अपनी आजीविका कमाने का मार्ग ढूंढ़ना पड़ा। वार्सा से दूर एक गवर्नेस के पद के लिये उसे प्रस्ताव मिला। इसको स्वीकार करने में उसे अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती और अपने पिता को छोड़ने की अनिच्छा को दबाना पड़ता। लेकिन इस बार उसके पिता ने जोर दिया और मेरी को भी शीघ्र यह स्पष्ट हो गया कि यदि ब्रोन्या को अपने वायदे के अनुसार पेरिस मे रखना था तो इसके अलावा कोई और चारा नहीं था।

मध्यम वर्ग के जिस परिवार में वह गई उसने मेरी को पसन्द किया और उसकी प्रशंसा की, परन्तु वे बड़ा परिश्रम कराते थे। बिगड़े हुए और शैतान बच्चों को पढ़ाने के अतिरिक्त उसे बूढ़ों के साथ शतरंज खेलनी पड़ती और परिवार के अनगिनत सामाजिक कार्यों में भाग लेना पड़ता। इन सबके कारण वह अपने अध्ययन, जिसकी उसकी गहरी इच्छा थी, नहीं कर पाती थी, अपनी पढ़ाई और गणित के प्रश्न उसे रात में देर तक करने पड़ते थे जब सब लोग बिस्तरों में चले जाते थे। लेकिन इतना था कि मेरी स्लोडोव्स्का क्‍यूरी के जीवन में नींद की सबसे कम आवश्यकता थी।

एक अच्छी बात हुई, जो हालाँकि उसके लिए दुखान्तक रही। परिवार का बड़ा लड़का जो सुन्दर और प्रसन्न युवक था उसकी ओर आकर्षित हो गया और जीवन में पहली बार मेरी ने प्रेम किया। उसने मेरी से शादी करने के लिए कहा, और मेरी ने समझा की उसकी शादी निश्चित हो गई। लेकिन जब परिवार को बताया गया तो इतना हंगामा हुआ कि दोनों को अपनी आशा छोड़नी पड़ी!

अमरीकनों के लिए यूरोपीय मध्यम वर्ग में शादी के प्रति विचार समझने कठिन हैं- विशेषतः उन्नीसवीं सदी के अन्तिम दस वर्षों के विचार इस सम्पन्न पोलिश परिवार के लिये, जो काम करके धन कमाना नीचापन समझते थे, अपने सुन्दर लड़के का- जो शायद किसी रईस घर की लड़की से शादी करता- एक निर्धन गवर्नेस से शादी करना कल्पना से परे था। और अपने बालिग लड़कों पर भी माँ-बाप का इतना अधिकार था कि उस युवक के लिये अपना प्रेम भूल जाने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं था। छोटी मान्या के लिये इस पहली जागृति में यह गहरा धक्का सहना मुश्किल था, विशेषत: उसकी क्‍योंकि उसकी सच्‍चाई की भावना अभी तक संकुचित सामाजिक रीतियों से ऊपर थी। लेकिन बाद में उसने अपने भाग्य को सराहा होगा जिसने एक बार फिर बीच में आकर उसको अपने ध्येय की ओर अग्रसर किया।

गवर्नेस के इस दो वर्ष के कार्य के बाद- दो परिवारों में- ब्रोन्या ने उसे पेरिस में अपने और अपने पति के साथ रहने के लिए निमन्त्रित किया। एक बार तो उसने मना कर दिया कि उन पर बहुत अधिक भार हो जायेगा। लेकिन अन्त में यात्रा और पढ़ाई के खर्चे के लायक काफी रुपया इकट्ठा करके, जिसमें थोड़ा उसके पिता का भी योग था, रेल की चौथी श्रेणी की लकड़ी की सख्त सीटों पर सवारी करती हुई वह जर्मनी के पार स्वतन्त्र फ्राँस में पहुँच गई। फिर, पेरिस में उसके जीवन के सबसे कठिन और साथ ही महत्वपूर्ण वर्ष आरम्भ हो गये।

पेरिस में घोड़े वाली बस के ऊपर पहली बार सवारी करने में इस चौबीस वर्ष से कम आयु की लड़की को जो प्रसन्नता हुई उसे उसकी लड़की ईव क्यूरी ने उसकी जीवनी में बड़े आनन्द से वर्णन किया है-

‘‘जब रेल की यात्रा की थकान से परेशान-सी मान्या डिब्बे से गेअर डु नोर्ड के धुएँ भरे प्लेटफॉर्म पर उतरी तो दासता का परिचित बन्धन अचानक ढीला हो गया, उसके कन्धे सीधे हो गये और उसके मन में बड़ी शान्ति अनुभव हुई। पहली बार वह एक स्वतन्त्र देश की हवा में साँस ले रही थी और अपने जोश में उसे हर चीज बड़ी आश्चर्यजनक लग रही थी। आश्चर्य था कि इधर-उधर घूमते हुए लोग अपनी मनचाही भाषा बोल रहे थे। आश्चर्य था कि पुस्तक विक्रेता संसार भर की पुस्तकें बिना किसी पाबन्दी के बेच रहे थे।…. इन सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात यह थी कि सीधी सड़कें… उसे, मान्य स्लोडोव्स्का को, विश्वविद्यालय के खुले द्वारों की ओर ले जा रही थीं। और विश्वविद्यालय भी वह जो सबसे प्रसिद्ध था… यह सब परियों की कहानी जैसा था। मन्द, बर्फीली, अव्यवस्थित-सी बस वह जादुई सवारी थी जो गरीब और सुन्दर राजकुमारी को अपने साधारण घर से सपनों के महल तक ले गई।‘‘

जब से वह वहाँ पहुँची तभी से वह पूरे मनोयोग से काम में लग गई। अपनी बहन के मकान पर वह शीघ्र ही असन्तुष्‍ट रहने लगी। वह दिनभर सोरबोने में रहती लेकिन शाम उसे अपनी बहन और प्रसन्न तथा मनोरंजन-प्रेमी जीजा के पास बितानी पड़ती। इसके कारण उसका घर का पढ़ार्इ का काम नहीं हो पाता। वह मध्य-रात्रि तक पढ़ना चाहती थी। वे दोनों संगीत सुनने जाना चाहते थे। या, दोनों, डॉक्टर होने के कारण, मकान में मरीजों से बातें करते रहते। मेरी विघ्न सहन नहीं कर सकती थी। इसलिए उसने इन लोगों को, जिन्हें वह इतना प्रेम करती थी, छोड़ दिया और सोरबोने के निकट अपने लिये एक छोटा-सा कमरा ले लिया।

उसने सब मनोरंजन बन्द. कर दिये। साधारण कमरा छोड़ कर, जिसमें थोड़ा-बहुत आराम था, वह खुले क्वार्टरों में आ गई। मेरी ने एक स्मृतियों में लिखा है-

‘‘यह नया कमरा… एक अटारी में था। छोटे-से स्टोव से, जिसमें कोयला प्राय: कम रहता था, गर्म करने के कारण सर्दियों में यह पर्याप्त गर्म न होता था। विशेष अधिक सर्दी में रात में बेसिन में पानी जम जाना साधारण बात थी, सो सकने के लिए मुझे अपने सारे कपडे़ ओढ़ने की चादरों पर रखने पड़ते थे। उसी कमरे में एल्कोहल के लैम्प और कुछ बर्तनों से मैं अपना खाना बनाती थी। प्राय: खाने में एक कप चॉकलेट, अण्डे या फल के साथ डबल रोटी मात्र होती थी। घर के काम में मेरा कोई सहायक नहीं था और थोड़ा बहुत कोयला जो मैं इस्तेमाल करती थी मुझे स्वयं ही सीढि़याँ चढ़कर ऊपर ले जाना पड़ता था।’’

यह कितने सौभाग्य की बात थी कि गाँव में उसे वह एक वर्ष मिल गया था- वह वर्ष, जिसमें उसने घुड़सवारी, स्केटिंग, नृत्य करके और जाड़ों के खेल खेलकर इन कठिनाइयों को सहन करने योग्य दृढ़ शरीर बना लिया था। काफी समय तक उस पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ा। फिर एक दिन वह भूख से बेहोश हो गई। एक मित्र उसे उसकी बहन के पास ले गया-ब्रोन्या और उसके पति ने उसमें खून की भारी कमी पाई जिससे उसकी स्थिति खतरनाक थी, उन्होंने उसे तब तक अपने पास रखा जब तक उसका स्वास्‍थ्‍य, कम-से-कम कुछ समय के लिये नहीं सुधरा।

इस बीच, उसका कार्य बड़ा प्रतिभापूर्ण रहा। छब्बीस साल की आयु में उसने भौतिक विज्ञान में मास्टर डिग्री प्राप्त कर ली और पास करने वालों में वह प्रथम रही। अगले साल गणित में मास्टंर डिग्री की परीक्षा में द्वितीय रही। उसने फ्रैंच भाषा इतनी अच्छी तरह सीख ली कि उसमें उसकी अपनी बोली की झलक भी नहीं रह गई। लेकिन सबसे अधिक आनन्द उसे प्रयोगशाला में आता था, जहाँ वह उन टेस्ट ट्यूबों, रिटार्टों और नाजुक यंत्रों से काम कर सकती थी जिनसे उसके मस्तिष्क में अपने पिता के वार्सा वाले काँच के बक्से की याद जीवित हो उठती थी- जिस मूर्ति के सामने वह अपने बचपन में इतनी श्रद्धा से खड़ी रहती थी। यही एक प्रकार की सान्त्‍वना थी जिसके कारण वह कठिनाइयों को सहन कर सकी।

पियरे क्यूरी

इस प्रकार दो वर्षों में परियों वाली कहानी इस सिन्ड्रेला के लिए काफी दु:खपूर्ण कहानी बन गई। लेकिन तभी एक दिन, अचानक राजकुमार आ पहुँचा।

मेरी स्लोडोव्‍स्‍का और पियरे क्यूरी के एक समान मित्र ने दोनों को एक रात खाने पर बुलाया। इन दोनों को सा‍थ बुलाने में इस पोलिश प्राध्यापक, जोजेफ कोवाल्‍स्‍की, के दिमाग में प्रेम सम्बन्धी कोई विचार नहीं था। मेरी ने अपने एक कार्य के बारे में उसकी सलाह मांगी थी, और उसने उसे एक युवक से पूछने के लिए कहा था जो ‘क्रिस्‍टलोग्राफी’ पर कार्य कर रहा था। फिर उसने कहा, ‘‘तुम शाम को खाने पर आ जाओ, मैं तुम्हारा परिचय करा दूँगा।’’

पियरे क्‍यूरी बड़ा प्रभावित हुआ। वह उसका पहला अनुभव था कि वह एक स्त्री से विज्ञान पर सरलता से बात कर सका। लेकिन इस लड़की के लिये, जो उससे लगभग सात साल छोटी थी, जितनी भी शब्दावली उसने प्रयोग की उसमें से एक भी अपरिचित नहीं थी और वह बड़़ी सहभावना से उसके परीक्षणों के वर्णन समझ रही थी और उसके अनुसंधान की सम्भावनाओं पर उसकी आँखें उत्तेजना से चमक उठती थीं। सरलता से समझने की इस प्रतिभा के अलावा उसमें सुन्दरता और आकर्षण भी थे। जब उस रात वे लोग विदा हुए तो पियरे को लगा कि वह उससे बार-बार‍ मिलेगा।

उसके बाद जब वे मिले- एक बार भौतिक विज्ञान की संस्था की मीटिंग में और फिर कई बार मेरी के कमरे पर- तो उसे यह बात जाहिर हो गई कि मेरी ठीक उसी की तरह विज्ञान पर पूरी तरह समर्पित थी। फिर उसे लगा कि जब उन दोनों को विज्ञान से इतना प्रेम था तो उनको आपस में भी प्रेम हो जायेगा। एक-दूसरे के लिये वे एक समर्पण के प्रतीक होंगे। पियरे ने मेरी को बताया लेकिन उसने नहीं माना, उसको और बातों से भी लगाव था- अपने परिवार से, पोलैण्ड से जिसकी उसे बहुत याद आती थी, उसे अपने वृद्ध पिता के पास जाना था, प्रेम के लिये वह तैयार नहीं थी। फिर भी वह पुरुषों के विरुद्ध अपनी कसम को भुलाने और कार्य एवं विवाह की धारणाओं का सामंजस्य करने का प्रयत्न कर रही थी, जिसके लिये उसे समय चाहिये था। पियरे से मिलने के बाद वाली गर्मियों में वह पोलैण्ड गई और पियरे ने उसे मनाने के लिये प्रेम-पत्र लिखे, जो विज्ञान के इतिहास में सबसे सुन्दर प्रेम-पत्र हैं।

घर के शान्त जीवन में पुराने साथियों के पुनर्मिलन और पौष्टिक भोजन और आराम के साथ उसके मस्तिष्क में अपना भविष्य बिलकुल स्पष्ट हो गया। लेकिन जब अक्टूबर में वह दोबारा पेरिस आ गई तो उसकी हठी प्रकृति ने वसन्त ऋतु तक उसे मुँह में हाँ नहीं करने दी। जुलाई 1895 में उनकी शादी हो गई और वे दोनों हनीमून के लिये साइकिलों पर फ्राँस के पहाडों और जंगलों में निकल पडे़। ये साइकिलें मेरी ने दहेज में मिले रुपयों से खरीदी थीं।

उस वर्ष 1895 में एक जर्मन विलियम रोएन्टजन ने एक नयी प्रकार की किरणें उत्पन्न कीं जों कैथोड किरणों के एक निर्वायु ट्यूब के काँच पर टकराने से निकलती थीं। इन निकलने वाली किरणों का नाम उसने ‘एक्स’ रख दिया- उसी सिद्धान्‍त पर जिसके अनुसार अनजान वस्तु के लिए ‘एक्स’ कह दिया जाता है। एक्स-रे अपारदर्शक पदार्थ से भी गुज़र सकती थीं और अविष्‍कारकों के हाथों में आकर ये शल्य चिकित्सा के लिए बडी़ सहायक सिद्ध हुईं। रोएन्टजन की खोज से वैज्ञानिक संसार में इन किरणों पर अनुसंधान की बाढ़ आ गई। ये किरणें प्रकाश जैसी थीं, परन्तु वर्णक्रम (स्पेक्ट्म) में दिखाई नहीं पड़ती थीं। फोटो की प्लेटों पर इनका प्रभाव होता था।

एक फ्रैन्च, हेनरी वैक्यूरल, इस बाढ़ की लपेट में आ गया। उसने देखा कि यूरेनियम तत्व के लवणों सें भी ऐसी किरणें निकलती थीं जो अपारदर्शक पदार्थ में से गुजर सकती थीं। उसने फोटो की एक प्लेट को काले काग़ज़ मे लपेटकर एक अंधेरे कमरे मे रख दिया और उस पर थोड़ा-सा यूरेनियम का लवण भी रख दिया, और जब उसने प्लेट को धोया तो उस पर किरणों का प्रभाव मौजूद था। अत: उसने सोचा कि यूरेनियम फ्लोरेसेन्‍ट है- अर्थात प्रकाश मे रहने पर यह प्रकाश को अपने अन्दर इकट्ठा कर लेता है और अंधेरे मे निकल देता है। लेकिन फिर उसने ऐसे यूरेनियम के लवण से वही परीक्षण किया जिसे प्रकाश में नहीं रखा गया था, और इस बार फिर प्लेट पर उसी तरह का प्रभाव दिखाई पड़ा। उसने सोचा, क्या यह सम्‍भव है कि वह प्रदार्थ स्वयं किरण उत्पन कर लेता है ? बिना किसी विद्युत आवेग के, जो एक्स-रे के श्रोत कैथोड-रे के लिए आवश्यक है और बिना प्रकाश में रखे, यूरेनियम लवण से ये किरणें बराबर निकलती रहती थीं। इसका क्या उत्तर था ? क्या इस तत्‍व का विघटन होता था और यह अपने ही कण बाहर छोड़ता था?

जब वह इस बारे मे सोच रहा था तभी मेडम क्यूरी को उसके परीक्षण का पता लग गया और वह उनसे बड़ी प्रभावित हुई। यदि यूरेनियम का ऐसा व्यवहार था तो क्या अन्य तत्व भी इस तरह से किरणें नहीं छोड़ सकते थे? बड़ी तसल्‍ली से उसने हर परिचित तत्व से परीक्षण किये। एल्युमिनियम, बेरियम, बिस्मथ, कॉपर- इस तरह वह पूरी सूची देखती चली गयी। अंत ने उसे थोरियम मिला जो उसके प्रश्‍न का उत्तर था। उसने अपनी खोज की घोषणा करते हुए कहा, ‘‘मैं इन तत्वों को ‘रेडियो-एक्टिव’ कहती हूँ।’’ उस क्षण उसने भाषा में एक बड़ा महत्वपूर्ण शब्द दिया। आज हम इस शब्‍द को बीच का हाइफन निकालकर (रेडियोएक्टिव) प्रयोग करते हैं।

जैसा कि ट्रेनिंग प्राप्त भौतिक वैज्ञानिक हमेशा करते हैं मेरी क्यूरी ने भी नाप-तोल की। रेडियोएक्टिव तत्वों के चारों ओर की हवा की यंत्रों द्वारा कन्डक्टिविटि नापकर उसने इन किरणों की तीव्रता मालूम की। फिर वह चक्कर मे पड़ गयी। पिच ब्लैंडि से- कच्ची धातु जिससे थोरियम और यूरेनियम निकलते हैं- थोरियम या यूरेनियम की अपेक्षा कहीं अधिक तीव्र किरणें निकलती थीं। उसने सोचा कि इन दोनों से भी अधिक रेडियोएक्टिव एक या अधिक तत्व अवश्य होंगे। उसने पियरे से पूछा कि क्या उसे किसी ऐसे तत्व का पता लगनेवाला था जिसकी तब तक खोज नहीं हुई थी। पियरे क्यूरी, जो पास्‍चर की तरह ‘क्रिस्टलोग्राफी’ के अनुसंधान मे काफ़ी आगे बढ़ चुका था, अपनी पत्नी के कार्य से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उसकी सहायता करने के लिए अन्य सब काम छोड़ दिया।

वास्तव में काफी परीक्षण के बाद उसे पिच ब्लैंडि में दो अत्यन्त रेडियोएक्टिव तत्व मिले। एक को उसने पूज्य पिता के नाम पर ‘पोलोनियम’ कहा और दूसरे को ‘रेडियम’।

आइरीन क्‍यूरी पति जोलियट के साथ

अब तक उसके बच्चा हो गया था। उसका नाम उन्होंने रखा ‘आइरीन’। इसके बाद, अत्यन्त दिलचस्प प्रयोग कार्य के बावजूद, मेरी क्यूरी ने अपने समय का ‘आइरीन’ और रहस्यपूर्ण ‘पिच ब्लैंडि’ के बीच बँटवारा कर दिया। इसका बड़ा नाटकीय प्रमाण उसकी 1898 और 1899 की डायरी में है। 17 अक्टूबर 1898 को उसने लिखा है- ‘‘आइरीन अब अच्छी तरह चल सकती है, अब वह घुटनों के बल नही चलती।’’ 5 जनवरी, 1899 को उसने लिखा, ‘‘आइरीन के पन्द्रह दाँत हैं।’’ इन बातों के बीच एक नोट विज्ञान की एकादमी के लिए था। इस नोट का उसने इन शब्दों में अन्त किया है-

‘‘उपलिखित कारणों से हमें लगा कि इस नये रेडियोएक्टिव पदार्थ (पिच ब्लैंडि) में एक नया तत्व था जिसका ‘रेडियम’ नाम रखने का हमारा विचार है।’’

अकादमी की कार्यवाहियों में यह नोट प्रकाशित हुआ। हर जगह भौतिक एवं रासायनिक वैज्ञानिकों ने इसे पढा़ और सर हिला दिया। ये क्यूरी लोग कौन हैं ? निश्चित ही इनका रिकॉर्ड तो अच्छा है। इनके पास मास्टर की डिग्री है। लेकिन इनका कथन एक कल्पना, एक अन्‍दाज़ा भर है।(सन्देह एक वैज्ञानिक की प्रकृति का अंश है।) वह हमें कुछ शुद्ध रेडियम दिखायें। वे कहते हैं कि यह पिच ब्लैंडि में मौजूद है, लेकिन उन्होंने इसे निकाला तो नहीं है। उनके पास प्रमाण क्या है ?

इस प्रकार आइरीन के दाँतों, कदमों और शब्दों, उसके नहाने-खाने और रात को कहानी सुनाने के आनन्द के क्षणों के बीच मेरी अपने पति के साथ प्रयोगशाला में गयी और अपने कथन को सिद्ध करने के लिए चार वर्षों तक काम किया ।

यूरोपीय वैज्ञानिकों का ज्ञान के उस केन्द्र पेरिस में इन दोनों के शब्दों पर इतना भी विश्वास नहीं था कि उन्हें अपना काम करने के लिए एक अच्छी-सी वर्कशॉप मिल जाती। रू लोमोंड के भौतिक एवं रासायनिक विज्ञान के स्कूल ने उन्हें एक पुराना लकड़ी का शैड दे दिया, जो उनके पास खाली था। यहाँ पति-पत्नी मे इतना अधिक सहयोग रहा है कि किसी भी एक को विशेष श्रेय दे सकना सम्‍भव नहीं। हम केवल इतना जानते हैं कि शुरुआत मेरी ने की थी।

अपने कथन पर लोगों को सन्‍देह होने से क्यूरी विचलित नहीं हुये। वे उन सन्‍देहों से परिचित थे जिनका वैज्ञानिक इतिहास मे इतना महत्‍व रहा है। दूसरों की परिकल्पनाओं के बारे में उनका भी रुख़ उतना ही सन्‍देहात्मक होता था जितना औरों का उनकी परिकल्‍पना के बारे में था। इस बार उन्हें निश्चय था कि वे ठीक कह रहे थे, लेकिन औरों को दोषी नहीं ठहराया। वे स्वयं भी संसार को दिखाने के लिए प्रमाण रखना चाहते थे। उनकी परेशानी यही थी कि उपकरण-सम्बन्धी बाधाओं को दूर करने के लिए अमानवीय प्रयास की आवश्यकता थी।

सर्वप्रथम, यह तो स्पष्ट ही था कि पिच ब्लैंडि की कच्ची धातु में यह नया तत्व बहुत ही थोडी़ मात्रा में मौजूद था। हालाँकि क्यूरी के अनुसार रेडियम की रेडियोएक्टिविटी तो ‘बहुत अधिक’ थी, लेकिन उनके पास उपलब्ध पिच ब्लैंडि में रेडियम की मात्रा लगभग ना के बराबर थी। मेरी का पहला अनुमान था 1 प्रतिशत। यह अनुमान दस लाख गुना अधिक सिद्ध हुआ। उनको केवल 0.0000001 प्रतिशत परिमाण मिला।

फिर समस्या थी काफी पिच ब्लैंडि मिलने की। पिच ब्लैंडि महंगी चीज थी। मेरी ने देखा कि इस कच्‍ची धातु से एक बार यूरेनियम निकाल लेने के बाद बचे हुए भाग को- जिसमें अभी रेडियम और पोलोनियम बाकी थे, जिस बात पर बहुत कम लोगों का विश्वास था- बेकार समझा जाता था। एक मित्र के द्वारा क्यूरी को ऑस्ट्रिया में एक ऐसी खान का पता लगा जहाँ इस बेकार भाग की बडी़ मात्रा इकट्ठी हो गई थी। और इसी मित्र ने ऑस्ट्रियन सरकार को इस बात पर राजी किया कि वह उसमें से एक टन इन दो पागलों को भेंट कर दे।

आखिर वह आ ही गया, घोडे़ वाले एक बडे़ ट्रक में भरकर भरे हुए बोरे उतारकर पुराने शैड में लगा दिये गये। तब से काम नहीं रुका। जैसा मेरी को बाद में याद रहा और उसने अपने पति की जीवनी में लिखा-

‘‘मैं एक बार में लगभग बीस किलोग्राम पदार्थ प्रयोग करने लगी, जिससे द्रवों और अवशेषों (प्रेसिपिटेट) से भरे जारों से शैड भर जाता था। बर्तनों को ले जाना, द्रवों को उडेलना और गलाने वाली बेसिन में उबलते हुए पदार्थ को बराबर घंटों तक चलाना बडा़ जानलेवा काम था।’’

फिर भी उसने कहा है-

‘‘अपने कार्य की कठिनाइयों के बावजूद हम बडे़ प्रसन्न थे। हमारा दिन प्रयोगशाला में बीतता था। हमारे सादे से शैड में शान्ति का साम्राज्य था… हम लोग अपनी व्यस्‍तता में इस तरह रहते थे मानो सपने में हों…।’’

ईव क्यूरी ने, कार्य के बहुत मामूली परिणाम पर, अपने पिता के अधैर्य के बारे में लिखा है। ऐसा समय भी आया जब वह शुद्ध रेडियम निकालने के प्रयास को छोड़ देने के लिए तैयार हो गया। लेकिन यहाँ मेरी के हठी स्वभाव की विजय हुई।

‘‘1902 में, रेडियम के अस्तित्व की सम्भावना के विषय में क्यूरी की घोषणा के पैंतालीस महीने बाद आखिर मेरी की विजय हुई- वह एक डेसीग्राम (एक ग्राम का दसवाँ भाग) रेडियम निकालने में सफल हो गई…।

‘‘सन्देह करनेवाले केमिस्ट… केवल सर झुका सकते थे… सत्य के सामने, एक नारी की आलौकिक हठ के सामने।’’

अगले चार वर्ष न केवल क्यूरी के लिए बल्कि समस्त वैज्ञानिकों के लिए, जिनके सामने इस खोज ने नये अनुसंधान के मार्ग खोल दिए थे, बडे़ सफल रहे। शुद्ध रेडियम के साथ पदार्थ की रचना और बनावट से सम्बन्धित नये सिद्धान्तों पर वे अनेकानेक परीक्षण कर सके। एक आश्‍चर्यजनक परिणाम था इस बात का प्रमाण कि एक तत्व के कणों में दूसरे तत्वों के नन्हे कण हो सकते हैं, और रेडियोएक्टिविटी वास्तव में उन परमाणुओं के विघटन की क्रिया थी जिनका दो हजार वर्षों से अधिक तक विघटन असभ्य माना जाता रहा। अन्य शब्दों में, पुराने कीमियागरों का सपना सच हो गया था। क्यूरी ने, निश्चय ही सीसे को सोने में नहीं बदला था, लेकिन रेडियम के निस्सरण में उन्होंने हिलियम गैस का पता लगा लिया था। यह बात सही है कि शताब्दी बदलने से पहले ही उस बात के बारे में अनुमान लगने लगे थे जिसे मेरी ‘परमाणु परिर्वतन का विप्लव’ (कैटाक्लिज्म ऑफ एटॉमिक टान्स्फॉर्मेशन) कहती थी, लेकिन प्रमाण के लिए वास्तविक, अत्यन्‍त रेडियोएक्टिव पदार्थ की, जिसे अकाट्य प्रमाणों के लिए प्रयोगशाला में प्रयोग किया जा सकता था, और परमाणु रचना सम्बन्धी नये सिद्धान्तों की प्रतीक्षा करनी पडी़।

अतः रेडियो की खोज विज्ञान के भूत और भविष्य के बीच की कडी़ बन गयी। रेडियम ही ने अन्त में सबसे अधिक सन्देह करनेवाले केमिस्टों तक को यह यकीन दिलाया कि पदार्थ से सम्बन्धित समस्त पुराने सिद्धान्तों को आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। रेडियम ही से एल्बर्ट आइन्‍स्‍टीन के वेग सम्बन्धी परीक्षण सम्भव हो सके जिनसे उसके सापेक्षता के सिद्धान्त के निर्णयात्मक समीकरण निकले। और परमाणविक ऊर्जा की प्राप्ति के विकास में क्यूरी का कार्य एक अनिवार्य कदम था।

इससे आविष्कार को जो तुरन्त योग मिला वह था औषधि के लिए रेडियम का प्रयोग, जिससे रेडियम उत्‍पादन एक उद्योग बन गया। यह देखा गया कि रेडियम के निस्सरण में शरीर के रोगी सेलों को नष्ट करने की शक्ति थी। इस प्रकार कुछ कैन्सर की अवस्थाओं का इलाज किया जा सका। जब डॉक्टरों ने पास्चर की खोज पर अविष्कार कर्ताओं की तरह-  रेडियम से इलाज करना आरम्भ किया तो रेडियम का बडे़ पैमाने पर उत्पादन आरम्भ हो गया। लकडी़ के शैड में किया गया क्यूरी का काम कई गुने पैमाने पर फ्राँस की सेन्ट्रल केमिकल प्रोडक्ट्स- और बाद में संसार के कई भागों मे उसी तरह के कारखानों- जैसी फैक्ट्रियों में होने लगा।

रू लोमेन्ड की विजय के चार वर्ष बाद वह आदर्श सहयोगिता एक ऐसे दुःखान्त से मिट गई जिससे मेरी कभी भी पूरी तरह नहीं सम्भल सकी। इसके बाद उसने और बडे़-बडे़ काम किये और नाम पाया जो बहुत कम स्त्रियों ने (और किसी भी स्त्री वैज्ञानिक ने नहीं) पाया था। अपनी पहली खोज पर मिले नोबल पुरस्कार के बाद उसे एक और नोबल पुरस्कार मिला। उसे पाँच अन्य बडे़ पुरस्कार मिले, सोलह मेडल मिले और कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों से उन्नीस ऑनरेरी डॉक्टरेट की उपाधियाँ मिलीं- जिनमें से नौ अमरीका से थीं। वह अमेरिका आई और अमरीकनों ने उसे घेर लिया और उसकी लड़की ने उसे ‘प्रायः धार्मिक श्रद्धा’ से देखा। लेकिन उसकी हानि किसी तरह पूरी नहीं हुई।

पेरिस में बसन्त के दिन थे। पियरे हमेशा की तरह गहन विचारों मे खोया हुआ घर की ओर चला जा रहा था। और दिनों की अपेक्षा उस दिन वह अधिक खोया-खोया था। वह सड़क पर एक घोडा़गाडी़ के पीछे चल रहा था जिससे उसे सामने कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। घोडा़गाडी़ एक मोड़ पर आई, वह उससे अलग मुड़ गया और एक भारी वैगन को खींचतें हुए बडे़-बडे़ घोड़ों के झुंड में घुस गया। उनके बीच पियरे गिर पडा़, और हालाँकि ड्राइवर ने घोडों को रोकने की पूरी कोशिश की तो भी गाडी़ का भारी पहिया उसकी खोपडी़ पर से उतर गया।

एक घण्‍टे बाद जब मेरी, घटना से अनभिज्ञ घर पर आई तो उसे चुपचाप खडे़ लोग दिखाई पडे़- उसका अपना पिता, पियरे का पिता और दो प्राध्‍यापक। जब वे उस अविश्वसनीय समाचार को उसे बताने के लिए उसके सामने खडे़ थे, तो मेरी को कमरे में उस दुर्घटना का वातावरण अनुभव होने लगा। और फिर पॉल एपल, जिसने मेरी के पेरिस के आरम्भ के दिनों से ही उसे अपनी वार्ताओं से बडा़ प्रभावित किया था, बोला। उसने दुर्घटना का सीधा सच्चा ब्यौरा दे दिया।

‘‘लेकिन पियरे चल बसे? एकदम?’’

मेरी के इन शब्दों ने विवाह इतिहास की एक सबसे सुन्दर गाथा का अन्त कर दिया।

मेरी अपनी कहानी की पुनरावृत्ति देखने के लिए जीवित रही। ‘पन्द्रह दाँतों’ वाली आइरीन बडी़ हो गई और उसकी रुचियाँ अपनी माँ की तरह रहीं। काफी समय तक उसने अपनी माँ का साथ देकर पिता की मृत्यु से रिक्त स्थान को भरने में मदद की। माँ-बाप से उसे भारी प्रतिभा मिली थी। मेरी से उसने रेडियोलॉजी के गहरे रहस्यों को समझा और कार्य के लिए विज्ञान को चुना। उन्तीस साल की आयु में उसने माँ-बाप द्वारा स्थापित इन्स्टीट्यूट ऑफ रेडियम के एक प्रतिभाशाली कार्यकर्ता फ्रेड्रिक  जोलियट से शादी कर ली। जोलियट-क्यूरी ने मिलकर मेरी द्वारा प्रारम्भ किए हुए अनुसंधान को आगे बढा़या और शादी के बारह साल बाद कृत्रिम रेडियोएक्टिविटी के लिए नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। पुरस्कार वितरण की शाम को मेरी का स्‍वर्गवास हो गया।

विज्ञान के वैयक्तिक इतिहास में क्यूरी वंश जैसा अन्य वंश नहीं हुआ। व्यावसायिक सहयोग का, प्रेम, पारिवारिक सामंजस्य और पारस्परिक अनुराग के साथ जो सुन्दर समावेश था, उससे एक ऐसी कहानी की रचना हुई जो युवक अनुसंधानकर्ताओं की अनन्त पीढियों को प्रोत्साहन देगी। यह एक परियों वाली कहानी भी थी जो नन्ही मान्या के कल्पनापूर्ण सपनों से भी परे थी।

नोट : यह आलेख विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के अभियान से जुडे़ श्री कृष्‍ण जोशी के सौजन्‍य से प्राप्‍त हुआ है। आभार।

माँ का घर : संतोष चतुर्वेदी

युवा कवि और ‘अनहद’ के सम्‍पादक संतोष चतुर्वेदी की कविता-

मैं नहीं जानता अपनी माँ की माँ का नाम
बहुत दिनों बाद जान पाया मैं यह राज
कि जिस घर में हम रहते हैं
वह दरअसल ससुराल है माँ की
जिसे अब वह अपना घर मानती है
फिर माँ का अपना घर कहाँ है
खोजबीन करने पर यह पता चला
कि मामा के जिस घर में
गर्मियों की छुट्टियों में
करते रहते थे हम धमाचौकड़ी
वही माँ का घर हुआ करता था कभी
जहाँ और लड़कियों की तरह ही वह भी
अपने बचपन में सहज ही खेलती थी कितकित
और गिट्टियों का खेल
जिस घर में रहते हुए ही
अक्षरों और शब्दों से परिचित हुई थी वह पहले पहल
वही घर अब उसकी नैहर में
तब्दील हो चुका है

अपना जवाब खोजता हुआ मेरा सवाल
उसी मुकाम पर खड़ा था
जहाँ वह पहले था
माँ का घर एक पहेली था मेरे लिए अब भी
जब यह बताया गया कि
हमारा घर और हमारे मामा का घर
दोनों ही माँ का घर हैं
जबकि हमारा घर माँ की ससुराल
और मामा का घर माँ का नैहर हुआ करता था

हमारे दादा ने रटा रखा था हमें
पाँच सात पीढी़ तक के
उन पिता के पिताओं के नाम
जिनकी अब न तो कोई सूरत गढ़ पाता हूँ
न ही उनकी छोड़ी गयी किसी विरासत पर
किसी अहमक की तरह गर्व ही कर पाता हूँ
लेकिन किसी ने भी क्यों नहीं समझी यह जरूरत
कि कुछ इस तरह के ब्यौरे भी कहीं पर हों
जिनमें दर्ज किये जायं अब तक गायब रह गये
माताओं और माताओं की माताओं के नाम

हमने खंगाला जब कुछ अभिलेखों को
इस सिलसिले में
तो वे भी दकियानूसी नजर आये
हमारे खेतों की खसरा खतौनी
हमारे बाग बगीचे
हमारे घर दुआर
यहाँ तक कि हमारे राशन कार्डों तक पर
हर जगह दर्ज मिला
पिता और उनके पिता और उनके पिता के नाम
गया बनारस इलाहाबाद के पण्डों की पुरानी पोथियाँ भी
असहाय दिखायी पड़ीं
इस मसले पर

माँ और उनकी माँ और उनकी माताओं के नाम पर
हर जगह दिखायी पड़ी
एक अजीब तरह की चुप्पी
घूँघट में लगातार अपना चेहरा छुपाये हुए

तमाम संसदों के रिकार्ड पलटने पर उजागर हुआ यह सच
कि माँ के घर के मुददे पर
बहस नहीं हुई कभी किसी संसद में
दिलचस्प बात यह कि
बेमतलब की बातों पर अक्सर हंगामा मचाने वाले सांसदों ने
एक भी दिन संसद में चूँ तक नहीं की
इस अहम बात को लेकर
और बुद्विजीवी समझे जाने वाले सांसद
पता नहीं किस भय से चुप्पी साध गये
इस मुद्दे पर

और अपने आज में खोजना शुरू किया जब हमने माँ को
तब भी तकरीबन पहले जैसी दिक्कतें ही पेश आयीं
घर की मिल्कियत का कागज पिता के नाम
बैंकों के पासबुक हमारे या हमारे भाइयों या पिता के नाम
घर के बाहर टंगे हुए नामपट्ट पर भी अंकित दिखे
हम या हमारे पिता ही

हर जगह साधिकार खड़े दिखे
कहीं पर हम
या फिर कहीं पर हमारे भाई
या फिर कहीं पर हमारे पिता ही
जब हमने अपनी तालीमी सनदों पर गौर किया
जब हमने गौर किया अपने पते पर आने वाली चिट्ठियों
तमाम तरह के निमन्त्रण पत्रों
जैसी हर जगहों पर खड़े दिखायी पड़े
हम या हमारे पिता ही
अब भले ही यह जान कर आपको अटपटा लगे
लेकिन सोलहो आने सही है यह बात कि
मेरे गाँव में नहीं जानता कोई भी मेरी माँ को
पड़ोसी भी नहीं पहचान सकता माँ को
मेरे करीबी दोस्तों तक को नहीं पता
मेरी माँ का नाम

अचरज की बात यह कि
इतना सब तलाश करते हुए भी
जाने अंजाने हम भी बढे़ जा रहे थे
लगातार उन्हीं राहों पर
जिन्हें बड़ी मेहनत मशक्कत से सँवारा था
हमारे पिता
हमारे पिता के पिता
हमारे पिता के पिता के पिताओं ने
एक लम्बे अरसे से

खुद जब मेरी शादी हुई
मेरी पत्नी का उपनाम न जाने कब
और न जाने किस तरह बदल गया मेरे उपनाम में
भनक तक नहीं लग पायी इसकी हमें
और कुछ समय बाद मैं भी
बुलाने लगा पत्नी को
अपने बच्चे की माँ के नाम से
जैसा कि सुनता आया था मैं पिता को
बाद में मेरे बच्चों के नाम में भी धीरे से जुड़ गया
मेरा ही उपनाम

अब कविता की ही कारीगरी देखिए
जो माँ के घर जैसे मुद्दे को
कितनी सफाई से टाल देना चाहती है
कभी पहचान के नाम पर
कभी शादी ब्याह के नाम पर
तो कभी विरासत के नाम पर

न जाने कहाँ सुना मैंने एक लोकगीत
जिसमें माँ बदल जाती है
कभी नदी की धारा में
कभी पेड़ की छाया में
कभी बारिस की बूंदों में
कभी घर की नींव में होते हुए
माँ बदल जाती है फिर माली में
बड़े जतन से परवरिश करती हुई अपने पौधों की
फिर बन जाती है वह मिट्टी
जिसमें बेखौफ उगते अठखेलियाँ करते
दिख जाते हैं पौधे
पौधों में खोजो
तो दिख जाती है पत्तियों में
डालियों में फूलों में फलों में
फिर धीमे से पहुँच जाती हमारे सपनों में

धान रोपती बनिहारिने गा रही हैं
कि जिस तरह अपने बियराड़ से बिलग हो कर
धान का बेहन दूसरी धूल मिट्टी में गड़ कर
लहलहाने लगता है, फूलने फलने लगता है
उसी तरह गुलजार कर देती हैं अपनी विस्थापित उपस्थिति से
किसी भी घर को महिलाएं
खुद को मिटा कर

और जहाँ तक माँ के घर की बात है
मैं हरेक से पूछता फिर रहा हूँ
अब भी अपना यह सवाल
कोई कुछ बताता नहीं
सारी दिशाएं चुप हैं
पता नहीं किस सोच में

जब यही सवाल पूछा हमने एक बार माँ से
तो बिना किसी लागलपेट के बताया उसने कि
जहाँ पर भी रहती है वह
वहीं बस जाता है उसका घर
वहीं बन जाती है उसकी दुनिया
यहाँ भी किसी उधेड़बुन में लगी हुई माँ नहीं
बस हमें वह घोसला दिख रहा था
जिसकी बनावट पर मुग्ध हो रहे थे हम सभी।

(‘नया ज्ञानोदय’, दिसम्‍बर-2011 से साभार)

अर्थपूर्ण जनपक्षीय सिनेमा को आगे बढ़ा रहा है ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ : गिरीश कसरावल्ली

फिल्मोत्सव के उद्घाटन अवसर पर बोलते गिरीश कसरावल्ली।

इलाहाबाद : इलाहाबाद में पहली बार 6 से 8 दिसंबर तक ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ फिल्मोत्सव का आयोजन हुआ, जिसके प्रति शहर के बुद्धिजीवयों, संस्कृतिप्रेमियों और खासकर युवा दर्शकों में जबर्दस्त उत्साह देखने को मिला। ‘सेंटर फॉर थिएटर एण्ड फिल्म’ (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) में इलाहाबाद फिल्म सोसायटी एवं जन संस्कृति मंच की ओर से आयोजित फिल्मोत्सव का उद्घाटन करते हुए कन्नड़ के मशहूर फिल्मकार गिरीश कसरावल्ली ने कहा कि पूरी दुनिया और भारत में हमेशा अलग-अलग किस्म का सिनेमा बनता रहा है। एक ओर लेनिन ने सिनेमा को सारी कलाओं में महत्वपूर्ण कला बताते हुए उसे समाज के विकास का माध्यम बनाया तो दूसरी ओर मुसोलनी और हिटलर जैसे फासिस्टों और तानाशाहों ने अपनी आत्मछवि के प्रचार के लिए सिनेमा का इस्तेमाल किया। भारत में सिनेमा गाँधीवाद और मार्क्‍सवाद- दोनों से प्रभावित रहा। गिरीश कसरावल्ली ने कहा कि एक तीसरी तरह का सिनेमा भी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सामने आया, जो सिर्फ आर्थिक फायदे को ध्यान में रखकर बनाया जाता था। आज कारपोरेट घरानों की दखल के बाद वैचारिक, जनपक्षीय और अर्थपूर्ण सिनेमा को और अधिक हाशिये पर धकेलने की कोशिश की जा रही है। स्टेट और कारपोरेट घराने उन अर्थपूर्ण फिल्मों को जनता तक पहुँचने नहीं देना चाहते, जिनमें मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाया गया होता है या इस तंत्र को बदलने का संदेश होता है। ऐसी कुछ फिल्मों को सरकारों द्वारा पुरस्कृत किए जाने के बावजूद उनका रिलीज न हो पाना इसी की बानगी है। गिरीश कसरावल्ली ने कहा कि ऐसी ही स्थिति में ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ सामने आया, जो अर्थपूर्ण जनपक्षीय सिनेमा को ताकतवर बनाने की दिशा में बड़ी पहलकदमी है। यह प्रगतिशील सिनेमा आंदोलन से भी आगे बढ़ा हुआ कदम है।

फिल्मोत्सव आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार ने प्रगतिशील सिनेमा के 75 साल की यात्रा की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आप सबसे अहम सवाल यह है कि सिनेमा जो सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम है, उसे किसकी सेवा में लगा दिया गया है? क्यों वह सत्ता के हित साधन का माध्यम बन गया है? उन्होंने कहा कि जिन चीजों की व्यावसायिक सिनेमा अनदेखी कर रहा है, उसे देखने और दिखाने के प्रति ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ प्रतिबद्ध है। आम आदमी जिन बुनियादी समस्याओं से संघर्ष कर रहा है, ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान की कोशिश है कि वह सिनेमा में दर्ज हो, कैमरे उन तक पहुँचे।

उद्घाटन सत्र में प्रगतिशील सिनेमा के 75 साल विषय पर बोलते हुए प्रोफेसर ललित जोशी ने कहा कि जो लोग जिस्मानी और जेहनी तौर पर सताए हुए हैं, जिन्हें गुलामी की हालत में धकेल दिया गया है, प्रगतिशील सिनेमा उनके रोजमर्रे के संघर्षों को अभिव्यक्त करने वाला सिनेमा है। उन्‍होंने मूक फिल्मों के दौर में भी प्रगतिशील विषयों पर बनाई गई फिल्मों की चर्चा की। गिरीश कसरावल्ली के सिनेमा की खासियत के बारे में बताते हुए उन्होनें कहा कि ‘घटश्राद्ध’ जैसी फिल्म बनाने वाले गिरीश कसरावल्ली भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। उनके किरदार थके-हारे नहीं लगते, बल्कि वे मुश्किलों और परेशानियों से जूझने वाले किरदार हैं। उनकी फिल्में जिन जाँबाज औरतों के संघर्षों को सामने लाती है, वह बेहद महत्वपूर्ण है। उनकी फिल्में कर्नाटक के आम आदमी के जीवन की व्यथा है।

‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने कहा कि सिनेमा अगर जनता के पक्ष हो, अच्छा हो, तो किसी भी भाषा में होने के बावजूद दर्शक उसे देखते हैं, ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ फिल्मोत्सव इसकी मिसाल है। प्रतिरोध का सिनेमा बेहतर और सुन्दर सिनेमा का पर्याय है। इस अभियान को गाँव-कस्बों तक भी ले जाया जायेगा। कारपोरेट और राज्य जिस तरह लोकतांत्रिक संस्थानों को खत्म करने पर तुले हैं, यह उसका भी प्रतिकार है। उद्घाटन सत्र का संचालन के.के. पाण्डेय ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन अंकुर राय ने किया। इस अवसर पर वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी ने गिरीश कसरावल्ली को इलाहाबाद फिल्म सोसाइटी व जसम की ओर से प्रतीक चिह्न, पेंटिंग, किताब और फै़ज का कविता पोस्टर देकर सम्मानित किया।

फिल्मोत्सव के दौरान उमड़ी लोगों की भीड़।

फिल्मोत्सव का पर्दा गिरीश कसरावल्ली की फिल्म ‘कनासेम्बा कुदुरेयानेरी’ से उठा। कन्नड़ भाषा की इस फिल्म को देखने के लिए हिंदीभाषी क्षेत्र के दर्शक भारी संख्या में मौजूद थे। न केवल शुरू से अंत तक उन्होंने फिल्म देखी, बल्कि फिल्म प्रदर्शन के बाद गिरीश कसरावल्ली से उनका विचारोत्तेजक संवाद भी हुआ। मुर्दों के लिए कब्र खोदने वाले इरिया और रूद्री के परिवार की यह कहानी है। रूद्री एक किसान के खेतों में फूल चुनने का काम करती है। इरिया गांव के मालिक गौड़ा  की मृत्यु के बारे में एक सच्चा सपना देखता है, पर गौड़ा के बेटा नहीं चाहता कि मृत्यु की खबर फैले, क्योंकि उसे अपनी जमीन बेचनी है। उसने गौड़ा की लाश दफनाने से रोक दी है। गौड़ा का बेटा अपने बीमार बाप को देखने गाँव नहीं आया, बल्कि जमीन बेचने आया है।

फिल्मोत्सव के पहले दिन का समापन बिमल राय की बेहद मशहूर फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ के प्रदर्शन के साथ हुआ। 1953 में निर्मित इस फिल्म में सामंती कुचक्र और औद्योगीकरण के फलस्वरूप एक किसान के शहरी मजदूर और रिक्शा चालक में रूपांतरण की कहानी है। किसान जमींदार की फैक्ट्री के लिए अपनी जमीन नहीं देता और उसका कर्ज चुकाने के लिए कलकत्ता जाकर रिक्शा चलाने को मजबूर होता है। एक किसान की यंत्रणा को अपने जीवंत अभिनय से साकार करने बाले बलराज साहनी की यह यादगार फिल्म है। सलिल चौधरी के संगीत और शैलेंद्र के गीतों का जादू इतने वर्षों बाद भी दर्शकों पर गहरा असर छोड़ गया। खासकर भूमि अधिग्रहण, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, कृषि संकट और किसान आत्महत्याओं के इस दौर में यह फिल्म ज्यादा प्रासंगिक लगी।

इलाहाबाद फिल्मोत्सव का दूसरा दिन महिला फिल्मकारों और स्त्री-विमर्श के नाम रहा। दर्शकों ने यह देखा कि विषय और सरोकार के लिहाज से हमारी महिला फिल्मकारों का काम कितना महत्वपूर्ण है। वैसे दूसरे दिन फिल्म प्रदर्शन की शुरुआत नवयथार्थवादी धारा के मशहूर नाम फिल्मकार मणि कौल की फिल्म ‘दुविधा’ से हुई। विजयदान देथा की कहानी पर आधारित यह फिल्म मणि कौल ने 1973 में बनाई थी और इसे देश-विदेश में बेहद सराहना मिली थी। यह फिल्म पितृसत्तात्मक भारतीय समाज की उस दुविधा को लेकर है, जो स्त्रियों को समानता और स्वतंत्रता देने के मामले में आज भी मौजूद है। अपने पति की शक्ल वाले भूत से प्रेम करने वाली स्त्री के जरिए यह फिल्म पितृसत्तात्मक परिवार में स्त्रियों की कठपुतली सी नियति को सामने लाती है और पुरुष वर्चस्व को प्रश्नचिह्नित करती है। इसी कहानी पर अमोल पालेकर ने शाहरुख और रानी मुखर्जी जैसे स्टार को लेकर ‘पहेली’ फिल्म बनाई थी, लेकिन ग्लैमर और चमत्कार होने के बावजूद मूल कहानी की वह दुविधा कम है, जो मणि कौल की फिल्म में शुरू से लेकर अंत तक नजर आती है। यहाँ तक कि कौन असली पति है, इसका न्याय करने वाला गड़ेरिया भी भूत को कैद करने के बाद दुविधा में रहता है कि उसने सही न्याय किया या नहीं। मणि कौल की इस फिल्म में राजस्थानी लोककथा, लोकचित्रकला, गीत-संगीत और प्रकृति का जादू भी बड़े सहज तरीके से दर्शकों ने महसूस किया।

‘दुविधा’ के प्रदर्शन के बाद भारतीय महिला फिल्मकारों द्वारा बनाई गई पाँच महत्वपूर्ण डाक्यूमेंटरी फिल्में और एक फीचर फिल्म दिखाई गई। भारत में महिलाओं द्वारा डाक्यूमेंटरी निर्माण के शुरुआती दौर की जानी-मानी फिल्मकार मीरा दीवान की फिल्म ‘ससुराल’ के प्रदर्शन से महिला फिल्मकारों पर केंद्रित सत्र की शुरुआत हुई। भारतीय परिवारों में स्त्री के दोयम दर्जे की वजहों को बेहद मार्मिक तरीके से अभिव्यक्त करती यह फिल्म काफी विचारोत्तेजक थी। इसने विवाह प्रथा और स्त्री के अस्तित्व, पहचान और जीवन की सार्थकता तथा उसके शोषण-उत्पीड़न की सच्चाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। उपभोक्तावाद और पूँजीवाद के जरिए भी स्त्री की मुक्ति संभव नहीं हो सकती, यह पारोमिता वोहरा की फिल्म ‘मोरालिटी टीवी और लविंग जेहाद’ में दिखा। इस फिल्म ने मुनाफाखोरी और सनसनी में डूबे आज के पूँजीवादी मीडिया पर बहस छेड़ी, जो अपने स्वार्थ में अक्सर सामंती नैतिकता, पुलिसिया दमन, सांप्रदायिक-जातीय घृणा और स्त्री पराधीनता के पक्ष में खड़ा हो जाता है।

महिला फिल्मकार यथार्थ के कितने विविध रंग को अपनी फिल्मों में दर्ज कर रही हैं, निलिता वाछानी की फिल्म ‘सब्जी मंडी के हीरे’ इसकी बानगी थी। यह रीयल लाइफ के उन नायक-नायिकाओं की जिंदगी की असाधारणता को दर्ज करने वाली फिल्म थी, जिनके लिए मुख्यधारा की फिल्मों में प्रायः जगह नहीं होती। ‘सब्जी मंडी के हीरे बसों में बाम, पाउडर, पाचक, सूरमा और जादू की किताब बेचने वाले लोगों की जिंदगी की दास्तान को बड़े ही संवेदनशील तरीके से पेश किया गया।

फिल्में खुद जब किसी अभियान का हिस्सा हों  तो वे दर्शकों के बीच बहस को जन्म देती हैं, उन्हें विचारोत्तेजित करती हैं, यह दिखा कश्मीर में अपने लापता परिजनों की तलाश में लगी औरतों के अभियान पर बनाई गई फिल्म ‘व्हेयर हैव यू माई न्यू क्रिंसेट मून?’ (इफत फातिमा) के प्रदर्शन के दौरान। इफत फातिमा के साथ बेला नेगी भी फिल्मोत्सव में पहुँची थीं। यहाँ उनकी फीचर फिल्म ‘दायें या बायें’ दिखाई गई। विकास लोगों की परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए, इस धारणा के साथ उत्तराखण्‍ड के पहाड़ी गाँवों में पसरती उपभोक्तावादी संस्कृति के खतरों से यह फिल्म दर्शकों को दो-चार कराती है। यह फिल्म स्वस्थ मनोरंजक फिल्म का भी बेहतर उदाहरण लगी। इसी तर्ज पर फैजा अहमद खान की फिल्म ‘सुपरमैन ऑफ मालेगाँव’ को भी देखा जा सकता है। मालेगाँव में फिल्म निर्माण का शौकीन एक ग्रुप किस तरह अपनी जरूरतों के हिसाब से कम लागत में फिल्म बनाता है, इसे इस फिल्म ने बड़े दिलचस्प अंदाज में पेश किया। ये फिल्में विषय और कला के स्तर पर नई संभावनाओं को जगाने वाली थीं।

फिल्मोत्सव के आखिरी दिन जो फिल्में दिखाई गईं, उनके केंद्र में लोकतंत्र का सवाल था। इन फिल्मों में दर्शक कश्मीरी, मणिपुरी और आदिवासी इलाकों की जनता के दुख-दर्द और उनके संघर्ष से रूबरू हुए। फिल्मोत्सव की आखिरी फिल्म संजय काक की ‘जश्ने आजादी’ थी, जिसने कश्मीरी जनता की आजादी के संघर्ष से दर्शकों का साक्षात्कार कराया। भारतीय राजसत्ता किस तरह कश्मीरियों के लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचल रही है और किस तरह उन्हें लगातार पराया बनाया गया है, किस तरह उनकी देशद्रोही छवि बनाई गई है, फिल्म इन सबसे पर्दा उठाती है। यह हमारे एकाधिकारवादी राष्ट्रवाद को भी प्रश्नचिह्नित करती है। होबाम पबन कुमार निर्देशित फिल्म ‘ए.एफ.एस.पीए 1958’ ने भी हमारे राष्ट्रवाद और लोकतंत्र पर सवाल उठाया। यह फिल्म विशेष सशस्त्र बल अधिनियम का शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रही मणिपुर जनता के बर्बर पुलिसिया दमन की सच्चाई को सामने लाती है। फौज इतने अमानवीय ढंग से आंदोलनकारी छात्रों और महिलाओं के साथ व्यवहार करती है कि देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं और मन गुस्से से भर उठता है। दर्शकों के मन में सहज ही यह सवाल उठता है कि अपने ही देश की जनता के साथ फौज दुश्मनों के समान क्यों व्यवहार कर रही है। यह कैसा लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जो शांतिपूर्ण जनांदोलनों को भी इतने हिंसक तरीके से कुचलता है? इलाहाबाद फिल्मोत्सव ऐसे ही सवालों को पिछले 11वर्षों से अपने अनशन के जरिए उठा रहीं, मणिपुरी जनता की आवाज बन चुकीं इरोम शर्मिला के संघर्षों को समर्पित था।

हमारे देश के जो नीति निर्धारक हैं, वे आम अवाम के प्रति संवेदनहीन क्यों हैं और वे किनका हित साध रहे हैं, इसे विनोद राजा की डाक्यूमेंटरी ‘महुआ मेमोयर्स’ ने बखूबी दिखाया। देश के विभिन्न हिस्सों में कारपोरेट कंपनियों की स्वार्थपूर्ति के लिए किस तरह सरकार और पुलिस आदिवासियों से उनकी आजीविका छिन रही है, किस तरह वे अपनी जमीन और जंगल से बेदखल किए जा रहे हैं, उसे अत्यंत मार्मिक तरीके से इस डाक्यूमेंटरी फिल्म में दर्ज किया गया है।

फिल्मोत्सव में दिखाई गई फिल्में बॉलीवुड की फिल्मों की तरह एक ही तरह के फार्मूले या साँचे में ढली फिल्में नहीं थीं। इनमें मानव मन और जनजीवन के यथार्थ के बहुविध रंग थे, जो आमतौर पर व्यावसायिक फिल्मों में बहुत कम दिखता है। रोबर्ट इंरिको की फिल्म ‘ऐन ऑकरेंस ऐट आउलक्रिक ब्रिज’ फाँसी की सजा पाए एक किसान पर केंद्रित थी, जो वहाँ से भाग निकलने का सपना देखता है। नार्मन मैकलेरन की एनिमेशन फिल्में ‘नेबर’ और ‘अ चेअरी टेल’ दृष्टांत कथाओं की तरह थीं, जिनका दर्शकों ने खूब आनंद लिया। बर्ट हंस्तारा निर्देशित लघु फिल्म ‘ग्लास’ इस बात की बानगी थी  कि फिल्में सिर्फ बाजार का प्रोडक्ट नहीं होतीं, बल्कि फिल्मकार का कलात्मक सृजन होती हैं। बर्ट हंस्तारा गए तो थे काँच उद्योग के मजदूरों पर विज्ञापन फिल्म बनाने, पर उन्होंने यह फिल्म बना डाली, जिसे काफी लोकप्रियता मिली। जफर पनाही निर्देशित ईरानी फीचर फिल्म ‘ऑफ साइड’ स्त्री पुरुष के बीच समानता के विचार को बड़ी ही खूबसूरत ढंग से पेश करने वाली फिल्म लगी। ईरान जहाँ फुटबाल के मैदान में महिलाओं का जाना प्रतिबंधित है, इस फिल्म में वहाँ अपनी फुटबाल टीम और प्रिय खिलाडि़यों की दीवानी युवतियाँ वेश बदल कर मैदान में घुसने की कोशिश करती हैं, लेकिन पकड़ी जाती हैं। मगर विश्वकप में ईरान की जीत और जश्न के माहौल में पुलिस के वैन में मौजूद इन युवतियों की खुशी और उमंग के आगे प्रतिबंध और कानून बेमानी लगने लगते हैं। न कहीं कोई अश्लीलता, न कोई द्विअर्थी संवाद, न कोई आइटम सांग और न ही कोई सतही सनसनी या बहस, भारत की आम फार्मूला फिल्मों से बिल्कुल भिन्न किस्म की यह फिल्म इलाहाबाद के दर्शकों को बहुत पसंद आई। गीतांजलि राव की लघु फिल्म ‘प्रिंटेड रेनबो’ भी दिखाई गई।

आयोजन के दौरान इलाहाबाद फिल्म उत्सव के मौके पर प्रकाशित स्मारिका का लोर्कापण भी हुआ। लोकार्पण कथाकार शेखर जोशी ने किया। इस स्मारिका में इंकलाबी शायर फैज अहमद फैज, फिल्मकार मणि कौल, नाटककार बादल सरकार, जननाट्यकर्मी गुरशरण सिंह, मीडियाकर्मी और कवि कुबेर दत्त, आदिवासी संस्कृति और भाषा के विद्वान रामदयाल मुण्‍डा, जनगायक भूपेन हजारिका, उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल और गजल गायक जगजीत सिंह आदि पर लेख हैं। फिल्मोत्सव में दिखाई गई फिल्मों का परिचय भी इसमें है। प्रो. ललित जोशी का लेख ‘प्रगतिशील सिनेमा के नये सरोकारों की तलाश’, प्रोफेसर राजेंद्र कुमार का लेख ‘चलो-चलो कि वह मंजिल नहीं आई’ और दुर्गा सिंह का लेख ‘इरोम शर्मिला का संघर्ष और ए.एफ.एस.पी.ए. कानून’ भी इस स्मारिका को संग्रहणीय बनाता है।

किताबों और डीवीडी के स्टॉल पर खरीददारी करते लोग।

तीन दिनों तक चले इस फिल्मोत्सव में छात्र-युवाओं और महिलाओं की लगातार जबर्दस्त भागीदारी रही। फिल्मोत्सव के उद्घाटनकर्ता कन्नड़ फिल्मकार गिरीश कसरावल्ली और महिला फिल्मकार इफत फातमी एवं बेला नेगी से दर्शकों ने उनकी फिल्मों के संदर्भ में कई गंभीर सवाल भी पूछे। कुल मिलाकर सार्थक और जनपक्षीय सिनेमा को लेकर महत्वपूर्ण संवाद भी हुआ फिल्मोत्सव के दौरान। यह भी स्पष्ट तौर पर महसूस हुआ कि इस प्रचार में कोई सच्चाई नहीं है कि इन फिल्मों को लोग पसंद नहीं करते, इसलिए वितरणतंत्र उनकी उपेक्षा करता है। गिरीश कसरावल्ली की कन्नड़ फिल्म हो या जफर पनाही की ईरानी फिल्म या किसानों के विस्थापन के सवाल पर बनाई गई पुरानी हिंदी फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ या कश्मीर, मणिपुर, छत्तीसगढ़, झारखंड आदि इलाकों में चल रहे जनांदोलनों पर बनाई गई डाक्यूमेंटरी फिल्में- सबको दर्शकों ने पसंद किया। महिला फिल्मकार कितना महत्वपूर्ण काम कर रही हैं, इसकी भी झलक इस फिल्मोत्सव में देखने को मिली। नवयथार्थवादी सिनेमा की अलोकप्रियता के बारे में प्रचारित धारणा भी टूटती नजर आई। मणि कौल जैसे फिल्मकार की फिल्म ‘दुविधा’ को भी दर्शकों ने बेहद दिलचस्पी के साथ देखा।

इस मौके पर चित्रकार अजय जेतली, वरिष्ठ अधिवक्ता रविकिरण जैन, जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामजी राय, जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण, प्रोफेसर राजेंद्र कुमार, अली अहमद फातमी, सुरेंद्र राही समेत आयोजन समिति और शहर के कई जानेमाने साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी, सिनेप्रेमी मौजूद थे। आयोजन स्थल पर देश-दुनिया की कई महत्वपूर्ण फि़ल्मों के बड़े आकर्षक पोस्टरों की प्रदर्शनी लगाई गई थी। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी और जनमत की ओर से किताबों और डीवीडी का भी एक स्टॉल लगाया गया था।

आजादी के बाद आदिवासी काली चमड़ी वालों से शोषित: निर्मला पुतुल

बून्दी (राजस्‍थान) : लम्‍बी गुलामी के बाद देशवासियों को आजादी मिली है, पर आदिवासी उससे आज भी महरूम है। अगर आदिवासी में फर्क आया है तो वह केवल आवरण में जो दूर से देखने पर नजर आता है। अगर उस आवरण पर अँगुली का हल्का-सा दबाव डाला जाये तो वह बैंगा, सहरिया, शबर तक पहुँच जायेगी और तब पता चलेगा कि (संथाल, मीणा और मुण्‍डा) कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हालात अच्छे नहीं हैं। आदिवासियों के आजादी के बाद के हालात देखने के लिए 07-08 दिसम्बर, 2011 को राजकीय महाविद्यालय, बून्दी में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रायोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘आजादी के बाद आदिवासी ने क्या हासिल किया ?’  विषय पर आयोजित की गई। देशभर से आये विद्वानों रचनाकारों और शोधार्थियों ने पाँच दर्जन से अधिक शोध पत्रों को पढ़ा। पत्रों में यह बात पुरजोर ढंग से उभरकर सामने आयी कि आदिवासियों पर अगर शीघ्र कुछ नहीं किया गया तो बहुत-सी जनजातियाँ अपना अस्तित्व नहीं बचा सकेंगीं। यह एक ऐसा अवसर था जहाँ पर जीवन्‍त अनुभव सुनने को मिले। झारखण्‍ड वालों से पता चला कि अगर ऐसी संगोष्ठी वहाँ होती तो आयोजन स्थल पुलिस छावनी बन चुका होता।

उद्घाटन समारोह की मुख्य अतिथि प्रसिद्ध आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल, विशिष्ट अतिथि महाराष्ट्र के प्रसिद्ध आदिवासी कवि वाहरू सोनवणे व पूर्व उपकुलपति तथा ख्याति प्राप्त पत्रकार रामशरण जोशी थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के निदेशक व रचनाकार डॉक्‍टर आर.डी. सैनी ने की।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में आदिवासी शहीद बिरसा मुण्डा व दिवंगत डॉक्‍टर रामदयाल मुण्‍डा की तस्वीर पर दीप प्रज्‍ज्‍वलन व माल्यार्पण किया गया। प्राचार्य डॉक्‍टर डी.के. जैन ने संगोष्ठी का राष्ट्रीय महत्व बताते हुए सभी अतिथियों का हार्दिक स्वागत किया। विषय का प्रवर्तन करते हुए आयोजन सचिव डॉक्‍टर रमेश चन्द मीणा ने कहा कि विकास की नई-नई इबारत लिखते जा रहे देश में आदिवासी कहीं भी नजर नहीं आ रहा हैं। अतः ऐसे विकास को प्रश्नवाचक दृष्टि से देख लेना वाजिब है। इसीलिए इस संगोष्ठी का आयोजन किया गया है। एक तरफ देश का निरन्‍तर विकास हो रहा है और दूसरी तरफ विकास के ही नाम पर आदिवासियों का पलायन, विस्थापन जारी है। आदिवासी नक्सलवाद, ग्रीनहंट और सलवा जुडूम जैसे आपरेशनों से हिंसा के शिकार हो रहे हैं। उदारीकरण में बेशक विकास हो रहा है, पर यह विकास महज चंद लोगों का है। इस विषमतापरक विकास के खिलाफ आवाज अब भारत में ही नहीं, अमेरिका में भी उठ रही है। आदिवासी के सन्‍दर्भ में ठहर कर सोचने-विचारने की जरूरत है।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि वर्धा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रामशरण जोशी ने आदिवासियों के बीच लम्बे समय तक रहकर काम करने के अनुभवों को व्यक्त करते हुए आदिवासियों के विकास के बजाय पिछड़ते चले जाने पर चिन्‍ता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज हम स्वतंत्रता के छह दशक बाद भी विकास के मापदण्ड की कसौटी निर्धारित नहीं कर पाये हैं। वर्तमान विकास में अन्तर्विरोध हैं, जिस पर आत्ममंथन करने की जरूरत है। विकास की रणनीति पूँजीवादी चरित्र धारण किए हुए है, जिसमें आदिवासी किसी भी तरह से फिट नहीं हो रहे हैं। वैश्वीकरण के मॉडल में जो फिट नहीं होते वे बर्बाद हो जाते हैं। बर्बाद होने वाला वर्ग आदिवासी ही है। क्यों आदिवासी क्षेत्र सैनिक छावनियों में तब्दील होते चले जा रहे हैं? आदिवासियों में असंतोष और नफरत का भाव क्यों पैदा हो रहा है? वस्तुतः जब तक आदिवासियों की सहभागिता विकास की रणनीति में निर्धारित नहीं की जायेगी, सार्थक परिणाम नहीं आयेंगे। भारत एक राष्ट्र राज्य है जिसमें 10 करोड़ आदिवासी हैं। इस दस करोड़ आबादी की अवहेलना नहीं की जा सकती। आज जरूरत है समतावादी व विषमतामुक्त विकास की। आखिर हमें सोचना पडे़गा कि आदिवासी में नागरिकता की चेतना क्यों नहीं आ सकी है? विकास की रणनीति पर पुनः समीक्षा करने की महती आवश्यकता है।

भिलोरी भाषा के प्रसिद्ध कवि वाहरू सोनवणे ने आदिवासी संस्कृति को परिभाषित करने वाले कई गीत सुनाते हुए आदिवासी जीवन के उज्जवल पक्षों को रखा। उन्होंने जोर देकर कहा कि सभ्य कहे जाने वाले समाज और राजनेताओं की दृष्टि में आदिवासी समाज निर्जीव, अमानवीय तथा असभ्य है। उनको विकसित करने और मुख्यधारा में लाने के नाम पर सिर्फ छला जा रहा है। समता पर आधारित व प्रकृति का संरक्षण करने वाले समाज पर चारों तरफ से आक्रमण हो रहे हैं। उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि आदिवासियों की इतिहासकारों ने तो उपेक्षा की ही है, आज भी उनकी उपेक्षा पाठ्यक्रमों में देखी जा सकती है। पाठ्यक्रमों में आदिवासियों के लिए जो कुछ लिखा और पढ़ाया जाता है, उसमें आदिवासियों को चोर, शराबी, आलसी, कामचोर के रूप में दिखाया जाता है। क्या आदिवासियों में कोई अच्छाई नहीं है ? क्या उन्होंने किसी तरह से अच्छा काम नही किया? आजादी के दौरान किये आदिवासी बलिदानों को भुला दिया गया है। जब गांधी देश में आन्दोलन चला रहे थे, आदिवासी उसी लड़ाई को सुदूर जंगलों में लड़ रहे थे तथा हजारों आदिवासी अंग्रेजों द्वारा गोलियों से भून दिये गये थे लेकिन लोग गांधी, तिलक  आदि का गुणगान करते थकते नहीं और आदिवासियों का बलिदान भुला दिया जाता है। देश का असली जलियाँवाला हत्याकाण्ड मानगढ़ पहाड़ी पर हुआ था जिसमें अनगिनत आदिवासी मारे गये, पर इतिहास के पन्नों पर अंकित नहीं है। ऐसा क्यों? आदिवासियों ने मजबूरी में धर्म परिवर्तन किया, कांग्रेस में गये, भाजपा में गये, कम्युनिष्ट बने पर सभी जगह उनके साथ छल हुआ है। किसी ने उसे अपने पैरों पर खड़ा नहीं होने दिया, स्वावलम्बन का पाठ नहीं पढ़ाया, ऊपर से उन्हें सभ्य बनाने का दम्भ भरते हैं। आदिवासी जाति नही जमात है, मुख्यधारा में लाने की बात सही नहीं क्योंकि मुख्यधारा में भी दोष है। क्या मुख्यधारा में आने पर उनकी संस्कृति और मूल्य बचे रह सकेंगे? आज उनकी धार्मिक, संस्कृति पर आक्रमण हो रहे हैं।

मुख्य अतिथि निर्मला पुतुल ने कहा कि आदिवासी औरत को पुरुष हमेशा वासना की नजर से देखता है। आदिवासी स्त्री इस बात को अच्छी तरह से महसूस कर सकती है। यहाँ के इतिहासकारों तथा सभ्य समाज के बौद्धिक कहे जाने वाले लेखकों ने उन्हें गलत ढंग से चित्रित किया है तथा उन्हें ऐसा ही जाना व समझा गया है। आदिवासियों का शोषण आजादी से पहले गोरी चमड़ी के लोगों ने किया, अब काली चमड़ी के लोग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विकास कार्यक्रम और योजनाओं के माध्यम से आदिवासियों को छला जा रहा है। मुख्यधारा की मानसिकता साफ नहीं है। जहाँ तक आजादी हासिल होने की बात है, उसे जिल्लत, पशुता के सिवाय कुछ नही मिला हैं। कभी उसकी जमीन छीनी जा रही है तो कभी उसकी संस्कृति। यदि देश उसका विकास चाहता है तो कम से कम उसे उसकी जमीन पर तो रहने दो। संस्कृति को मत छीनो। सरकार नहीं चाहती कि हमारा विकास हो। देश का आदिवासी, दलालों के हाथों बिक रहा है। आदिवासियों के साथ हो रहे छल से उनमें अविश्वास का भाव पैदा हुआ है। आदिवासी की सम्पदा, परम्परा और संस्कृति कैसे नष्ट हो, हर योजना अंततः इसी मकसद से बनाई जा रही है।

अध्यक्षता कर रहे डॉक्‍टर आर.डी. सैनी ने आदिवासी शहीद स्थल मानगढ़ को राष्ट्रीय स्मारक बनाने की बात कही। इसका सभी ने सर्वसम्मति से समर्थन किया। डॉक्‍टर सैनी ने कहा कि हमें जोड़ने की बात करना चाहिए तोड़ने की नहीं। लोकतंत्र में कई फैसले दबाव में लिये जाते हैं। जिसका दबाव अधिक होगा उसके हक में फैसले हो जाते हैं। गोविन्द गुरु ने इसी दबाव का सहारा लिया। आदिवासी को अपनी लड़ाई लोकतांत्रिक तरीके से लड़नी चाहिए। जैसे गांधी, गोविन्द गुरु तथा महात्मा ज्योतिबाफुले ने लड़ी। अन्त में उन्होंने कहा, ‘‘करें कोई तरकीब ऐसी कि सब सम्‍भलते रहें, हवायें भी चलती रहें और दिये भी जलते रहें’’। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉक्‍टर ललित भारतीय तथा डॉक्‍टर विवेक मिश्र झालावाड़ ने किया।

उद्घाटन सत्र के बाद विभिन्‍न सत्रों में कार्यक्रम चला। इनमें ‘विकास की अवधारणा में आदिवासी’, ‘मीडिया में आदिवासी के लिए जगह’, ‘भारतीय साहिय में आदिवासी’, ‘उदार भारत में आदिवासी महिला’ आदि पर व्‍याख्‍यान हुए। साथ ही ‘डॉक्‍टर रामदयाल मुण्‍डा को याद करते हुए डॉक्‍टर वीरभारत तलवार का व्याख्यान हुआ। प्रथम सत्र की अध्यक्षता दलित साहित्यकार रत्नकुमार सांभरिया ने की। मुख्य वक्ता बजरंग बिहारी तिवारी और विशिष्ट वक्ता वीर सिंह रावत बांसवाड़ा व झारखण्ड से आये डॉक्‍टर वीरेन्द्र सोय रहे। डॉक्‍टर आदित्य गुप्ता झालावाड़ के साथ सत्र में लगभग 15 शोधपत्र प्रस्तुत किये गये। पत्रों में आजादी के बाद अपनाये गये विकास के मॉडल की विसंगतियों को कई तरह से उजागर किया गया। आज विकास के मॉडल में आदिवासियों की परिस्थितियों पर विचार नहीं किया जा रहा है। विकास के दुष्परिणाम आदिवासी भुगत रहे हैं। वे विस्थापित हैं। अपनी पुश्तैनी जमीन से,  देवता-से, पहाड़ और जीवन देने वाले जंगल से। सत्र संचालन डॉक्‍टर ललित भारतीय ने किया तथा धन्यवाद डॉक्‍टर लालचन्द कहार ने दिया।

पहले दिन के अंत में दो समानान्तर सत्र आयोजित किये गये। पहला सत्र ‘मीडिया में आदिवासी के लिए जगह’ तथा दूसरा ‘भारतीय साहित्य में आदिवासी’ विषय पर आयोजित हुआ। ‘भारतीय साहित्य में आदिवासी’ विषय पर आधारित सत्र के अध्यक्ष साहित्यकार पुन्नी सिंह तथा मुख्य वक्ता जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉक्‍टर वीरभारत तलवार रहे। सत्र में भारतीय साहित्य में आदिवासी साहित्य की पड़ताल करने वाले लगभग 12 शोध पत्र प्रस्तुत किये। डा. मनीषा शर्मा ने ‘कथा साहित्य में आदिवासी महिला की अस्मिता’, डॉक्‍टर सियाराम मीणा ने ‘ग्लोबल गाँव में आदिवासी’, कोमल सोमाणी ने ‘शैलूष के नटों की स्थिति’,  डॉक्‍टर गीता कपिल ने ‘अल्मा कबूतरी में आदिवासी नारी की संघर्ष गाथा’,  अनीता ने ‘ग्लोबल गाँव में आदिवासी अस्मिता’,  रुचि मिश्रा ने ‘कब तक पुकारूँ उपन्यास में चित्रित आदिवासी समाज’, नीतू सिंह चौहान ने ‘अल्मा कबूतरी उपन्यास में आदिवासी जीवन’,  दिव्या सिंह ने ‘भारत की आदिवासी महिलाओं के विकास की समस्याएँ’,  ज्योतिष चौहान ने ‘कलावे में उभरती भील शोषण की त्रासदी’,  सृष्टि भारतीय ने ‘भारतीय आदिवासी साहित्य और साहित्यकार’ विषय पर शोध पत्र प्रस्तुत किये,  जिनकी प्रोफेसर वीरभारत तलवार ने समीक्षा की। पुन्नी सिंह ने बताया कि भारतीय साहित्य में आदिवासी को वह स्थान नही मिला जिसका वह हकदार रहा है। सत्र का संचालन हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉक्‍टर विजयलक्ष्मी सालोदिया ने किया।

‘मीडिया में आदिवासी के लिए जगह’ विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता दिल्ली से आये साहित्यकार अनिल चमडि़या ने की तथा मुख्य वक्ता के रूप में जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के प्रोफेसर डा. श्रवण कुमार मीणा रहे। मुख्य वक्ता ने कहा कि आदिवासियों की समस्या और मुद्दों पर मीडिया की नजरिये पर विचार किये जाने पर पता चलता है कि लोकतंत्र का यह चौथा स्तम्‍भ भी आदिवासियों के मुद्दों को ठीक से नहीं उठा पा रहा है। वह हर समय पूँजीवादियों के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। राज्य की छवि को कॉरपोरेट स्टेट में बदलने में मीडिया की भूमिका रही है। जब से पेड न्यूज का चलन बढ़ा है तब से उसकी विश्वसनीयता कम हुई है। अनिल चमडि़या ने बताया कि मीडिया में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व का शुरू से ही अभाव रहा है। आज मीडिया में काम करने वालों में आदिवासी कहीं दिखाई नहीं देते। मीडिया में आदिवासियों के न होने के कारण आदिवासियों की आवाज मीडिया में कभी चिन्ता का कारण नहीं बनती है। इस सत्र में दिल्ली से आये पत्रकार शैलेश,  डॉक्‍टर केदार प्रसाद मीणा, पूर्णिमा उरांव, अरुण उरांव, वर्धा से आये चन्द्रीका ने आदिवासी और मीडिया के सवालों को शोध पत्रों में प्रस्तुत किया। अन्त में आयोजन सचिव डॉक्‍टर रमेशचन्द मीणा ने सभी अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

दूसरे दिन संगोष्ठी का चौथा सत्र 9 बजे से पुस्तकालय भवन में प्रारम्भ हुआ। अध्यक्षता निर्मला पुतुल ने की। मुख्य वक्ता डॉक्‍टर सपना चमडि़या, विशिष्ट वक्ता प्रो. मनोज कुमार एवं विवेक शंकर मिश्र रहे। वीरेन्द्र कुमार महतो ने ‘विकास की अवधारणा में आदिवासी’ पर अपना पत्र पढ़ा। लालचन्द कहार ने सोनवणे की कविता ‘आदिवासियों की अस्मिता’ एवं ‘पालमण्डी बस्ती’ कविताओं की विवेचना की। गुलाब चन्द पांचाल ने निर्मला पुतुल की कविता ‘उतनी दूर मत ब्याहना बाबा’ पर पत्र पढ़ा। रामस्वरूप मीणा ने आदिवासी महिला सशक्तिकरण समस्या व चुनौती, अशोक कुमार गुप्त ने लद्दाख की आदिवासी महिलाओं के शोषण तथा वहाँ की पारम्परिक प्रथाओं और आर्थिक स्थितियों पर पत्र पढ़ा। दामू ठाकरे ने महाराष्ट्र की आदिवासी महिला की स्थितियाँ रखीं। संचालन कर रहे विवेक मिश्र ने निर्मला पुतुल की कविता ‘उतनी दूर मत ब्याहना बाबा’ का पाठ एवं कविता की यथार्थपरक समीक्षा की। डॉक्‍टर कंचना सक्सेना ने आदिवासी शोषण व अत्याचारों पर पत्र पढ़ा। मुख्य वक्ता डॉक्‍टर मनोज कुमार ने अपना पत्र पढ़ा। ओम प्रकाश कुकी ने आदिवासी शिलालेखों एवं शैलचित्रों की लेपटॉप पर विडियो क्लिपें दिखाईं तथा विस्तार से जानकारी दी। विवेक शंकर मिश्र ने सहरिया जनजाति के आजादी के बाद विकास पर पर्चा पढ़ा। मुख्य वक्ता डॉक्‍टर सपना चमडि़या ने आदिवासी स्त्रियों की वर्तमान स्थिति पर पत्र पढ़ा। सत्र की अध्यक्ष कवयित्री निर्मला पुतुल ने सत्र में पढ़े गए शोध पत्रों पर विस्तार से विचार प्रस्तुत करते हुए स्त्री के प्रति पुरुष मानसिकता को बदलने की जरूरत बताई। जब तक उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता, तब तक बदलाव सम्‍भव नहीं हैं। जब आदिवासी बच्चा गर्भ से ही कुपोषित है तब बराबरी कैसे हो सकती है? आदिवासी को दोस्त समझे जाने की जरूरत है। डॉक्‍टर अनीता यादव ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

पाँचवाँ सत्र विशेष रूप से डॉक्‍टर रामदयाल मुण्डा की स्मृतियों को समर्पित था, जिनका देहावसान 30 सितम्बर, 2011 को हो गया। वह इसी महाविद्यालय में 2010 में हुई राष्ट्रीय आदिवासी संगोष्ठी में मुख्य अतिथि रहे थे। डॉक्‍टर वीर भारत तलवार ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। डॉक्‍टर मुण्डा शिकागो में रहकर अट्ठारह साल अध्यापन करने वाले शिक्षाविद् रहे हैं, परन्तु वेश-भूषा व व्यक्तित्व से अन्त तक अपने आदिवासी समाज से जुड़े रहे। वह अपने उद्बोधन के बाद बाँसुरी की धुन छेड़ना नहीं भूलते थे। मुण्‍डा राजनीतिज्ञ थे,  विद्वान थे और उच्चकोटि के बुद्धिजीवी थे, लेकिन असफल राजनेता रहे। डॉक्‍टर तलवार ने कहा कि मेरा उनसे परिचय 1974 में हुआ जो अंत तक बना रहा। उन्होंने राँची विश्वविद्यालय के भाषा विभाग को जिस तरह से बनाया और चलाया वह प्रेरणादायी और अनुकरणीय है। झारखण्‍ड को बनाने में उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। मुंडारी भाषा में अधिक कवि नहीं हुए फिर भी उन्होंने 1967 में मुंडारी कवियों का संग्रह निकाला। उनके प्रयास से अलग हटकर कवितायें लिखीं गईं। वह गीत गाते थे जो लोक में जाकर बदल जाया करते। एक पुस्तक राजनीति पर लिखी जिसमें झारखण्‍ड के भविष्य की चिन्‍ता देखी जा सकती है। आदिवासी समाज सोया हुआ है, उसकी गति धीमी है, उसे गति प्रदान करने वाले रहे हैं डॉक्‍टर मुण्‍डा। मुण्‍डा कवि थे,  कहानीकार थे। उनकी कहानियाँ महाश्वेता देवी से अधिक जीवंत रही हैं। उनकी कहानी ‘उस दिन रास्ते में’ कोमल किस्म की वेदना से युक्त है। जो रेणु की ‘रसिकप्रिया’ और रवीन्द्रनाथ टेगोर की कविता की याद दिला जाती है। वह मंडारी में ‘गीता’, ‘ध्रुवस्वामिनी’ का अनुवाद करते हैं। वह नारीवादी नहीं रहे हैं। डॉक्‍टर तलवार ने उनकी मुण्डारी भाषा में लिखी कविताओं का हिन्दी पाठ प्रस्तुत किया। उनके अनुसार बौद्धिक क्षमता में डॉक्‍टर मुण्डा का कोई सानी नहीं था।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक एन.एल. पवन ने पुलिस के नजरिये में आदिवासियों की स्थिति को बखूबी प्रस्तुत किया। उनका कहना था कि यह वर्ग अभी तक मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाया है। यह समाज की विड़म्बना है कि वीर, साहसी योद्धा आदिवासी समुदाय को छोटा कहा जाता है और चालबाज लोग बड़े कहलाते हैं। इतिहास भरा पड़ा है,  प्रश्न खड़ा है कि आदिवासी मुख्यधारा से दूर हैं। पुलिस की समाज में छवि इस अर्थ में हैं- ‘जो कमजोर है, जो छोटे हैं, जिसका दमन हो रहा है, उनके रक्षक होने चाहिए।’ दुख है कि पुलिस उनके साथ है जो उनका दमन करते हैं। पुलिस और पुरोहित दोनों में समानता है। दोनों ही जजमान से कुछ लिए बिना नहीं मानते हैं। पुलिस मत्स्य न्याय के खिलाफ बनाई गई थी। वह गरीब का काम नहीं करती। तभी ऐसे विषयों पर संगोष्ठियां करनी पड़ती है। उन्होंने ‘आरक्षण’ फिल्म का उदाहरण दिया और उपस्थित शिक्षक समुदाय से आग्रह किया कि भविष्य में एकलव्य के साथ द्रोणाचार्य जैसा व्यवहार न हो। सत्र के अध्यक्ष डॉक्‍टर हरिराम मीणा ने रामदयाल मुण्डा की याद में श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके अधूरे पड़े कामों को पूरा करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का समापन समारोह दोपहर 02.30 बजे आयोजित किया गया। इसके मुख्य अतिथि आदिवासी साहित्यकार हरिराम मीणा और अध्यक्ष क्षेत्रीय आदिवासी आयोग, जयपुर के निदेशक गोविन्द सोमावत रहे। हरिराम मीणा ने कहा कि सदियों से आदिवासी जंगल, जल, जमीन के दावेदार रहे हैं, किन्तु आज वकील पूछता है कि तुम्हारे पास क्या सबूत है कि यह जमीन तुम्हारी है़। आदिवासी के सन्दर्भ में यह प्रश्न बेतुका है, क्योंकि उनकी जमीन सरकारी कागजों में दर्ज ही नहीं हो पाई है। उनके यहाँ निजी सम्पत्ति की अवधारणा ही विकसित नहीं हो सकी है। इस कारण से भी वे जमीन खो रहे हैं। आज उन्हें शांतिभंग करने वाला कह कर मारा जा रहा है जो चिंता का विषय है। सत्र के अध्यक्ष गोविन्द सोमावत ने आदिवासियों की समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बेरोजगारी और गरीबी, उनकी प्रमुख समस्या है। उन्हें 365 दिन रोजगार चाहिए तथा शिक्षा, स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में आदिवासियों के लिए काम करने की आवश्यकता है। सरकार की योजनाओं की जानकारी पूर्ण न होने के कारण उनको लाभ नहीं मिलता है। प्राचार्य, डॉक्‍टर. डी.के. जैन ने बाहर से आये अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह संगोष्ठी देश और समाज के लिए उपयोगी सिद्ध होगी तथा आदिवासियों के संदर्भ में सकारात्मक माहौल निर्मित करेगी।

विकास की अवधारणा में आदिवासी शामिल हो इसके लिए संगोष्ठी में कुछ बिन्‍दु सामने आये- विस्थापन, पलायन, पुनर्वासन और जीविका-अर्जन के संसाधनों का लघु व बृहत स्तरों पर सर्वेक्षण किया जाए, विभिन्न परियोजनाओं से प्रभावित आदिवासियों की समस्याओं का समाधान होना चाहिए, वन कटाई और भूमिअर्जन के मामले में सम्‍बन्धित क्षेत्र के लोगों की पंचायत का निर्णय मान्य हो, निजी पूँजी के लोगों को किसी तरह की छूट नहीं दी जाए। इन अंचलों के लोगों के लिए विवेचनात्मक शिक्षा प्रणाली शुरू की जाए। अंचलों में संवेदनशील व प्रतिबद्ध प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति होनी चाहिए, छोटी-बड़ी परियोजनाओं के क्रियान्वयन में स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए। सक्रिय ‘आंतरिक औपनिवेशीकरण’ की समस्त प्रक्रियाओं का अन्‍त किया जाए। ऐसे बीस सूत्र रामशरण जोशी द्वारा सुझाए गए तो 1913 में राजस्थान के मानगढ़ में मारे गए भीलों के स्थल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किए जाने का प्रस्ताव पारित किया गया। आयोजन सचिव ने बाहर से आये अतिथियों, शोधार्थियों और विद्वानों का आभार व्यक्त करते हुए आदिवासी साहित्य लेखन और शोध कार्य करने की आवश्यकता बतलाई। साहित्यकारों, मीडियाकर्मियों और आदिवासियों के सचेत होने पर ही सार्थक परिणाम सामने आयेंगे।

प्रस्तुति – डॉक्‍टर सियाराम मीणा,  (राजकीय महाविद्यालय, बून्दी)

काशीनाथ सिंह को साहित्य अकादेमी पुरस्कार

काशीनाथ सिंह

नई दिल्ली : प्रख्यात हिन्दी कथाकार काशीनाथ सिंह को उनके उपन्यास ‘रेहन पर रग्घू’ के लिए हिन्दी भाषा के साहित्य अकादेमी पुरस्कार 2011 के लिए चुना गया है। अकादेमी पुरस्कार 2011 के लिए चुने गए छह अन्य उपन्यासकार हैं: गोपालकृष्‍ण पै (कन्नड),  क्षेत्री बीर (मणिपुरी),  कल्पनाकुमारी देवी (ओडि़या), बलदेव सिंह (पंजाबी),  अतुल कनक (राजस्थानी) और एस. वेंकटशन (तमिळ)।

अपने काव्य-संग्रहों के लिए पुरस्कृत आठ कवि हैं: (स्व.) कबीन फुकन (असमिया), मनींद्र गुप्त (बाङ्ला), प्रेमानंद मोसाहारि (बोडो), नसीम शफाई (कश्‍मीरी), मैल्विन रोड्रीगस (कोंकणी), आदित्य कुमार मांडी (संताली), हरेकृष्‍ण शतपथी (संस्कृत) और खलील मामून (उर्दू)।

ललित मंगोत्रा (डोगरी), ग्रेस (मराठी)  और शामला सदाशिव (तेलुगु) को निबंध-संग्रह हेतु पुरस्कृत किया गया।

रामचंद्र गुहा (अंग्रेजी) को विवरणात्मक इतिहास हेतु पुरस्कार दिया जाएगा, जबकि मोहन परमार (गुजराती) को कहानी-संग्रह,  एम.के. सानू (मलयाळम्) को जीवनी और मोहन गेहानी (सिंधी) को नाटक हेतु।

साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष श्री सुनील गंगोपाध्याय की अध्यक्षता में अकादेमी के कार्यकारी मंडल की दिल्ली में सम्पन्न बैठक में 21 दिसम्‍बर को विभिन्न भाषाओं के निर्णायक मण्डलों द्वारा चुनी गई 22 पुस्तकों को साहित्य अकादेमी पुरस्कार के लिए अनुमोदित किया गया। मैथिली के लिए बाद में पुरस्कार घोषित किया जाएगा। नेपाली भाषा के लिए कोई पुरस्कार नहीं दिया जा रहा।

साहित्य अकादेमी पुरस्कार के रूप में एक उत्कीर्ण ताम्रफलक,  शॉल और एक लाख रुपये की राशि दी जाती है। घोषित पुरस्कार 14 फ़रवरी 2012 को नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष समारोह में रचनाकारों को दिए जाएँगे।

साहित्य अकादेमी पुरस्कार 2011

भाषा                 शीर्षक एवं विधा                             रचनाकार
असमिया       एई अनुरागी एई उदास (कविता-संग्रह)                   (स्व.) कबीन फुकन
बाङ्ला                बने आज कनचेर्टो (कविता-संग्रह)                मनींद्र गुप्त
बोडो                  अखाफोरनि दैमा (कविता-संग्रह)                 प्रेमानन्द मोसाहारि
डोगरी                 चेतें दियां ग’लियाँ (निबंध)                     ललित मगोत्रा
अंग्रेज़ी                इण्डिया आफ़्टर गांधी (विवरणात्मक इतिहास)              रामचंद्र गुहा
गुजराती               अंचलो  (कहानी-संग्रह)                               मोहन परमार
हिन्दी                रेहन पर रग्घू (उपन्यास)                      काशीनाथ सिंह
कन्नड                स्वप्न सारस्वत (उपन्यास)                            गोपालकृश्ण पै
कश्‍मीरी               न छ़ाय न अक्स (कविता-संग्रह)                 नसीम शफाई
कोंकणी               प्रकृतिचो पास (कविता-संग्रह)                          मेल्विन रोड्रीगस
मलयाळम्             बशीर: एकान्त वीधियिले अवधूतन (जीवनी)        एम.के. सानू
मणिपुरी               नंगबु ङगाईबडा (उपन्यास)                     क्षेत्री बीर
मराठी                वार्याने हलते रान (निबंध-संग्रह)                 ग्रेस (मणिक गोडघाटे)
ओडि़या               अचिह्न बासभूमि (उपन्यास)                           कल्पनाकुमारी देवी
पंजाबी                ढावां दिल्ली दे किंगरे… (उपन्यास)               बलदेव सिंह
राजस्थानी             जून-जातरा (उपन्यास)                               अतुल कनक
संस्कृत               भारतायनम् (महाकाव्य)                              हरेकृष्‍ण शतपथी
संताली                बंचाओ लरहाई (कविता-संग्रह)                          आदित्य कुमार मांडी
सिन्धी                … ता ख्याबां जो छा तिंडो (नाटक)              मोहन गेहानी
तमिळ                कवल कोट्टम (उपन्यास)                      एस. वेंकटेशन
तेलुगु                 स्वरालयालु (निबंध-संग्रह)                      शामला सदाशिव
उर्दू                  आफ़ाक़ की तरफ़ (कविता-संग्रह)                 खलील मामून
———————————————————————————-
टिप्पणी:       1.  नेपाली में कोई पुरस्कार नहीं।
2.  मैथिली में पुरस्कार बाद में घोषित किया जाएगा।

प्राण शर्मा की तीन ग़ज़लें

ग़ज़लकार, कहानीकार और समीक्षक प्राण शर्मा का जन्म वजीराबाद (पाकिस्तान)  में 13 जून 1937 को हुआ। प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में हुई और पंजाब विश्वविद्यालय से एम. ए., बी.एड. किया। वह 1965 से यू.के. में प्रवास कर रहे हैं। उनकी दो पुस्‍तकें ‘ग़ज़ल कहता हूँ’ व ‘सुराही’ (मुक्तक-संग्रह) प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अलावा ‘अभिव्यक्ति’ में प्रकाशित ‘उर्दू ग़ज़ल बनाम हिन्‍दी ग़ज़ल’ और ‘साहित्य शिल्पी’ पर ‘ग़ज़ल: शिल्प और संरचना’ के 10 महत्‍वपूर्ण लेख हैं। उनकी तीन गज़लें-

1.

कुछ नया करके दिखाने को मचलता रहता है
मेरा ऐसा दोस्त है जो घर बदलता रहता है

धुन का पक्का कुछ न कुछ तो होता है वो साहिबो
मीठे फल के जैसा जिसका भाग्य फलता रहता है

पहले  जैसा तो  कभी  रहता  नहीं  वो  दोस्तो
धीरे-धीरे  आदमी  का  मन बदलता रहता है

किसलिए ए दोस्त अपने दिल को हम छोटा करें
ज़िन्दगी में घाटे का व्यापार  चलता  रहता है

ये  ज़रूरी  तो नहीं  औरों  की खुशियाँ देख  कर
हर बशर ही द्वेष की ज्वाला में जलता रहता है

ज़लज़ले या आधियाँ, तूफ़ान या बरबादियाँ
कुछ न कुछ संसार में ए दोस्त चलता रहता है

`प्राण`कोई क्या करेगा उसकी नीयत पर यक़ीन
रंग गिरगिट की तरह वो तो बदलता रहता है

2.

उड़ते  हैं  हज़ारों  आकाश में पंछी
ऊँची नहीं होती परवाज़ हरिक की

होना था असर कुछ इस शहर भी उसका
माना कि अँधेरी उस शहर चली थी

इक  डूबता  बच्चा कैसे  वो बचाता
इन्सान था लेकिन हिम्मत की कमी थी

इक शोर सुना तो डर कर सभी भागे
कुछ मेघ थे गरजे बस बात थी इतनी

सूखी सी जो होती जल जाती वो पल में
कैसे भला जलती गीली कोई लकड़ी

दुनिया को समझना अपने नहीं बस में
दुनिया  तो  है  प्यारे  अनबूझ  पहेली

पुरज़ोर  हवा  में  गिरना ही था उसको
ए ‘प्राण’ घरों  की दीवारें थी  कच्ची

3.

चेहरों पर हों कुछ उजाले सोचता हूँ
लोग हों खुशियों के पाले सोचता हूँ

तन के काले हों भले ही दुःख नहीं है
लोग मत हों मन के काले सोचता हूँ

हो भले ही धर्म और मजहब की बातें
पर  बहें  मत खूं  के नाले सोचता हूँ

वक़्त था जब दर खुले रहते थे सबके
अब  तो  हैं तालों  पे ताले सोचता हूँ

ढूँढ  लेता  मैं  कहीं  उसका ठिकाना
पाँव  में  पड़ते  न  छाले सोचता हूँ

सावनी ऋतु है, चपल पुरवाइयाँ हैं
क्यों  न  छायें मेघ काले सोचता हूँ

‘प्राण’ दुःख आये भले ही ज़िन्दगी में
उम्र  भर  डेरा  न  डाले  सोचता  हूँ

जिसने गजलों को जन प्रतिरोध का माध्‍यम बनाया : प्रणय कृष्‍ण

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में परसपुर के आटा ग्राम में 22 अक्टूबर, 1947 को जन्मे अवामी शायर अदम गोंडवी ( मूल नाम- रामनाथ सिंह)  ने 18 दिसम्‍बर, 2011 को  सुबह करीब पांच बजे पी. जी. आई, लखनऊ में अंतिम साँसे लीं। पिछले कुछ समय से वह लीवर की बीमारी से जूझ रहे थे।  अदम गोंडवी ने अपनी ग़ज़लों को जन-प्रतिरोध का माध्यम बनाया। उन्होंने इस मिथक को अपने कवि-कर्म से ध्वस्त किया कि यदि समाज में बड़े जन-आन्दोलन नहीं हो रहे हों तो कविता में प्रतिरोध की ऊर्जा नहीं आ सकती। सच तो यह है कि उनकी ग़ज़लों ने बेहद अँधेरे समय में तब भी बदलाव और प्रतिरोध की ललकार को अभिव्यक्त किया जब संगठित प्रतिरोध की पहलकदमी समाज में बहुत क्षीण रही। जब-जब राजनीति की मुख्यधारा ने जनता से दगा किया, अदम ने अपने साहित्य को राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल साबित किया।

अदम गोंडवी  आजीविका के लिए  मुख्यतः  खेती-किसानी करते थे। उनकी शायरी को इंकलाबी तेवर निश्चय ही वाम आन्दोलनों के साथ उनकी पक्षधरता से प्राप्त हुआ था। अदम ने समय और समाज की भीषण  सच्चाइयों से,  उनकी स्थानीयता के पार्थिव अहसास के साक्षात्कार लायक बनाया ग़ज़लको। उनसे पहले ‘चमारों की गली’ में ग़ज़ल को कोई न ले जा सका था।

‘मैं चमारों की गली में ले चलूँगा आपको’ जैसी लम्बी कविता न केवल उस ‘सरजूपार की मोनालिसा’ के साथ बलात्कार, बल्कि प्रतिरोध के संभावना को सूंघकर ठाकुरों द्वारा पुलिस के साथ मिलकर दलित बस्ती पर हमले की भयानकता की कथा कहती है। ग़ज़ल की भूमि को सीधे-सीधे राजनीतिक आलोचना और प्रतिरोध के काबिल बनाना उनकी ख़ास दक्षता थी-

जुल्फ- अंगडाई – तबस्सुम – चाँद – आईना -गुलाब
भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब
पेट के भूगोल में उलझा हुआ है आदमी
इस अहद में किसको फुर्सत है पढ़े दिल की किताब
इस सदी की तिश्नगी का ज़ख्म होंठों पर लिए
बेयक़ीनी के सफ़र में ज़िंदगी है इक अजाब

भुखमरी, गरीबी, सामंती और पुलिसिया दमन के साथ-साथ उत्तर भारत में राजनीति के माफियाकरण पर हाल के दौर में सबसे मारक कवितायेँ उन्होंने लिखीं।  उनकी अनेक पंक्तियाँ आम पढ़े-लिखे लोगों की ज़बान पर हैं-

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में

उन्होंने साम्प्रदायिकता के उभार के अंधे और पागलपन भरे दौर में ग़ज़ल के ढाँचे में सवाल उठाने, बहस करने और समाज की इस प्रश्न पर समझ और विवेक को विकसित करने की कोशिश की-

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये

छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये

इन सीधी अनुभवसिद्ध, ऐतिहासिक तर्क-प्रणाली में गुंथी पंक्तियों में आम जन को साम्प्रदायिकता से आगाह करने की ताकत बहुत से मोटे-मोटे उन ग्रंथों से ज़्यादा है जो सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने रचे। अदम ने सेकुलरवाद किसी विश्विद्यालय में नहीं सीखा था, बल्कि ज़िंदगी की पाठशाला और गंगा-जमुनी तहजीब के सहज संस्कारों से पाया था।

आज जब अदम नहीं हैं तो बरबस याद आता है कि कैसे उनके कविता संग्रह बहुत बाद तक भी प्रतापगढ़ जैसे छोटे शहरों से ही छपते रहे, कैसे उन्होंने अपनी मकबूलियत को कभी भुनाया नहीं और कैसे जीवन के आखिरी दिनों में भी उनके परिवार के पास इलाज लायक पैसे नहीं थे। उनका जाना उत्तर भारत की जनता की क्षति है, उन तमाम कार्यकर्ताओं की क्षति है जो उनकी गजलों को गाकर अपने कार्यक्रम शुरू करते थे और एक अलग ही आवेग और भरोसा पाते थे, ज़ुल्म से टकराने का हौसला पाते थे, बदलाव के यकीन पुख्ता होता था। इस भीषण भूमंडलीकृत समय में जब वित्तीय पूंजी के नंगे नाच का नेतृत्व सत्ताधारी दलों के माफिया और गुंडे कर रहे हों, जब कारपोरेट लूट में सरकार का साझा हो, तब ऐसे में आम लोगों की ज़िंदगी की तकलीफों से उठने वाली प्रतिरोध की भरोसे की आवाज़ का खामोश होना बेहद दुखद है, अदम गोंडवी को जन संस्कृति मंच अपना सलाम पेश करता है।

(जन संस्कृति मंच की ओर से महासचिव प्रणय कृष्ण द्वारा जारी)