Archive for: November 2011

गोविन्द माथुर को आचार्य निरंजननाथ सम्मान

 

उदयपुर : आचार्य निरंजननाथ स्मृति सेवा संस्थान और साहित्य त्रैमासिकी ‘संबोधन’ के संयुक्त तत्वावधान में इस साल का आचार्य निरंजननाथ सम्मान सुपरिचित कवि गोविन्द माथुर को उनकी काव्य कृति ‘बची हुई हँसी’ के लिए प्रदान किया गया। सम्मान में इकतीस हज़ार रुपये, श्रीफल, स्मृति चिह्न तथा प्रशस्ति पत्र कवि को भेंट किये गए। इस साल से नवोदित रचनाकारों के लिए भी एक और सम्मान दिया गया जिसके लिए नीलिमा टिक्कू की कृति ‘रिश्तों की बगिया’ को चुना गया था। उन्हें भी प्रशस्ति पत्र, श्रीफल, स्मृति चिह्न और ग्यारह हज़ार रुपये अर्पित किये गए।

समारोह के मुख्य अथिति और वरिष्ठ कवि नन्द चतुर्वेदी ने कहा कि आज देश में लोग स्वार्थों के कारण हिंसा पर उतारू हैं,जिससे रिश्ते ही ख़त्म होने की कगार पर हैं। पहले जहाँ जीवन कविता की तलाश करता था वहीं आज समय ने ऐसी करवट ली है कि कविता को जीवन की तलाश करनी पड़ रही है। उन्होंने पुरस्कारों की राजनीति और अविश्वसनीयता के बीच आचार्य निरंजननाथ सम्मान को महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह लघु प्रयासों से रचनाशीलता का हार्दिक सम्मान है।

अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कथाकार और ‘अक्सर’ के सम्पादक हेतु भारद्वाज ने इस कठिन और लालची समय में विचार की जरूरत पर बल देते हुए साहित्य की अर्थवत्ता बताई। विशिष्ट अतिथि उपन्यासकार राजेन्द्रमोहन भटनागर ने राजनेताओं के आचरण पर व्यंग्य करते हुए कहा कि हम जानते हैं सत्यनिष्ठा की शपथ लेने पर भी नेता कितना सत्य बोलते हैं। इससे पहले सम्मान के संयोजक और ‘संबोधन’ के सम्पादक क़मर मेवाड़ी ने बताया कि माथुर से पूर्व देश भर के बारह रचनाकारों को यह सम्मान दिया जा चुका है। आयोजन समिति के अध्यक्ष कर्नल देशबंधु आचार्य ने अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मान की रूपरेखा स्पष्ट की। समारोह में संबोधन के आचार्य निरंजननाथ विशेषांक का भी लोकार्पण किया गया। ज्ञातव्य है कि राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष रहे कवि, लेखक और यात्रा संस्मरणकार आचार्य निरंजननाथ का यह जन्मशताब्दी वर्ष भी है।

असमिया लेखि‍का इंदिरा गोस्वामी का निधन

इंदिरा गोस्वामी (14 नवम्बर, 1943 - 29 नवम्बर, 2011)

गुवाहाटी : ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त प्रख्यात असमिया लेखिका डॉक्‍टर  इंदिरा गोस्वामी का मंगलवार को प्रात: 7.45 बजे गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में निधन हो गया। असम में वह मामोनी रायसम गोस्वामी के नाम से लोकप्रिय थीं। वह 69 साल की थीं। वह 12 फरवरी से बीमार थीं। बीच में उन्हें इलाज के लिए गुडग़ांव के मेंदाता अस्पताल में भी भर्ती कराया गया था। तब से वह कोमा में थीं। असम सरकार ने उनके निधन पर तीन दिनों का राजकीय शोक घोषित किया  है। उनका अंतिम संस्कार बुधवार को राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा। इसलिए राज्य सरकार ने 30 नवंबर को सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की है।
महिलाओं के अधिकारों को अपनी रचना का आधार बनाने वाली डा. इंदिरा गोस्वामी का जन्‍म 14 नवम्‍बर, 1943 को गुवाहाटी में हुआ। वह रामायण की विशेषज्ञ भी थीं और उन्हें रामायणी के रूप में भी जाना जाता था। उन्होंने तुलसीदास और माधव कंदली के रामायण की तुलना पर डाक्टरेट की उपाधि ली थी। उनके लेखन के लिए वर्ष 2000 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा साहित्य अकादेमी पुरस्कार, असम साहित्य सभा पुरस्कार, कथा सम्मान आदि‍ कई पुरस्‍कारों से उन्‍हें सम्‍मानि‍त कि‍या गया।

डॉ. देवसरे बाल साहि‍त्य पुरस्कार से सम्मानि‍त

डॉ. देवसरे को सम्मा‍नि‍त करते ब्रजेन्द्र त्रि‍पाठी। साथ में उनकी पत्नी वि‍भा देवसरे।

गाजि‍याबाद : हिन्‍दी में साहित्‍य अकादेमी का बाल साहित्‍य पुरस्‍कार-2011 वरिष्‍ठ बाल साहित्‍यकार डॉ. हरिकृष्‍ण देवसरे को उनके आजीवन योगदान के लिए 28 नवम्‍बर को उनके आवास (ब्रजविहार, गाजियाबाद) पर साहित्‍य अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्‍द्र त्रिपाठी के हाथों प्रदान किया गया। पुरस्‍कार के अंतर्गत 50,000 रुपये की राशि का चेक और प्रतीक चिह्न शामिल हैं। इसके पहले उन्‍होंने पुष्‍पगुच्‍छ और शॉल ओढ़ाकर डॉ. देवसरे का अभिनंदन किया। उन्‍होंने प्रशस्‍ति-पाठ करते हुए डॉ. देवसरे के अमूल्‍य योगदान को रेखांकित किया। इस अवसर पर उनके श्री शशांक, पुत्री शिप्रा, पत्‍नी विभा देवसरे तथा बालसाहित्‍य लेखक शांता ग्रोवर, मधुमालती जैन एवं देवेन्‍द्र कुमार देवेश (तीनों अकादेमी में कार्यरत) उपस्‍थित थे। ज्ञातव्‍य है कि अकादेमी के बालसाहित्‍य पुरस्‍कार 24 भारतीय भाषाओं के लिए 14 नवंबर, 2011 को अकादेमी के अध्‍यक्ष सुनील गंगोपाध्‍याय के हाथों कोलकाता में समारोहपूर्वक प्रदान किए गए थे, जिसमें अस्‍वस्‍थता के कारण डॉ. देवसरे नहीं पहुँच पाए थे।

डॉ. देवसरे ने कहा कि साहित्‍य इतिहास के लोग अभी तक बाल साहित्‍य को साहित्‍य के इतिहास में सम्‍मिलित नहीं कर पाए, लेकिन अब निश्‍चित रूप से यह माना जाएगा कि बाल साहित्‍य साहित्‍य की एक ऐसी विधा है, जो निरंतर उन्‍नति कर रही है और अब वह ऐसे स्‍तर पर पहुँच गई है कि उसको इतिहास में भी महत्‍व मिलना चाहिए और मिलेगा, अवश्‍य मिलेगा। इस दिशा में काम भी हो रहा है और अच्‍छी बात यह है कि जो दृष्‍टिकोण है साहित्‍य अकादेमी का, वह नया है, आधुनिक है और वह समसामयिक है।

सरलता के सहारे हत्या की हिकमत : प्रभु जोशी

प्रभु जोशी

पि‍छले दि‍नों गृह मंत्रालय ने राजभाषा-हिन्दी को ‘आमजन  की भाषा’ बनाने का फरमान जारी कर दिया। इसके पीछे छि‍पे एजेंडे की पड़ताल करता वरि‍ष्‍ठ लेखक-पत्रकार प्रभु जोशी का आलेख-

भारत-सरकार का ‘गृह-मंत्रालय’, जिसको पता नहीं अतीत में जाने क्या सोच कर देश में ‘राष्ट्रभाषा’ के व्यापक प्रचार-प्रसार का जिम्मा सौंप दिया गया था, पिछले दिनों एकाएक नींद से जागा और जाग कर उसने देश के साथ, आजादी के बाद का सबसे ‘क्रूरतम’ मजाक किया कि उसने राजभाषा-हिन्दी को ‘आमजन  की भाषा’ बनाने का फरमान जारी कर दिया। यह इसलिए कि वह ‘कठिन’ और ‘अबोधगम्य’ है। पिछली लगभग आधी सदी से जो शब्द परिचित चले आ रहे थे, पता नहीं किस ‘इलहाम’ के चलते वे तमाम शब्द अचानक ‘अबोधगम्य’ व ‘कठिन’ हो उठे। उसने अपनी तरफ से काफी चतुराई-भरा परिपत्र  जारी करते हुए, समस्या-समाधान के लिये गालिबन सलाह दी जा रही हो कि हिन्दी में ‘उर्दू-फारसी-तुर्की’ के शब्दों का सहारा लिया जाये और साथ ही साथ आवश्यकता अनुसार ‘अंग्रेजी’ के शब्दों को भी शामिल किया जाये। अंग्रेजी को सबसे पीछे, उर्दू-फारसी की आड़ में खड़ा कर दिया गया। लेकिन मूलतः यह मंसूबा, साफ-साफ दिखायी दे रहा था कि देश के ‘खास-आदमी’ की दृष्टि से ‘आम-आदमी’ के लिए भाषा की छल-योजित ‘पुनर्रचना’ की जा रही है। इससे उनके भाषा-विवेक की वर्गीय पहचान तो प्रकट हो ही रही है, बल्कि यह भी पता चल रहा है  ‘वित्त-बुध्दि’ की सरकार, ‘सांस्कृतिक-समझ’ के स्तर पर कितनी कंगली है।

परिपत्र में बताया गया है कि मंत्रालय की ‘केन्द्रीय हिन्दी समिति’ की प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सम्पन्न होने वाली बैठक के बाद यह निर्णय किया गया। छोटे पर्दे की खबरों में कभी भी हिन्दी में बोलते नहीं दिखायी देने वाले प्रधानमंत्री की हिन्दी बैठक की सिर्फ कल्पना भर की जा सकती है  कि वह कैसी होती होगी। बहरहाल, इसमें देश की ‘राजभाषा’ को सरल सुगम बनाये जाने के लिए कोई निश्चित ‘प्रतिमान’ तो नहीं बनाया गया है कि ‘सरल’ बनाते समय अंग्रेजी शब्दों का प्रतिशत क्या होगा, कौन-सा शब्द ‘कठिन’ माना जायेगा और उसे प्रयोग से हमेंशा के लिये ही खदेड़ कर बाहर कर दिया जायेगा ? क्या किसी शब्द को अब ‘प्रचलन’ में लाने की कोशिश की जायेगी ? या कि हिन्दी के समाचार-पत्रों के कार्यालयों में जारी नीति की तर्ज पर हरेक का अपना मनमानापन ही उसका आधार होगा ? क्योंकि भाषा के रूप के अनुकरण के लिये तो अखबार को ही रखा गया है। उल्लेख चाहे पत्रिका कर दिया गया हो। लेकिन बतौर ‘प्रतिमानीकरण’ के लिए ‘सरल’ और ‘कठिन’ शब्दों की पहचान करते हुए ‘समिति’ ने पता नहीं देश के किस स्थान से प्रकाशित होने वाली कौन-सी पत्रिकाओं से उदाहरण दिया, वह निश्चय ही स्पष्ट रूप से बताता है कि उसकी दृष्टि में भोजन की जगह ‘लंच’, क्षेत्र की जगह ‘एरिया’, महाविद्यालय के बजाय ‘कॉलेज’, वर्षा-जल के बजाय ‘रेन-वॉटर’, नियमित की जगह ‘रेगुलर’, श्रेष्ठतम पाँच के स्थान पर ‘बेस्ट फाइव’, आवेदन की जगह ‘अप्लाई’, छात्रों के बजाय ‘स्टूडेण्ट्स’, उच्च शिक्षा के बजाय ‘हायर-एजुकेशन’ आदि-आदि का प्रयोग भाषा के सरलीकरण में सहयोगी होगा। आप यह पढ़ कर स्वयं स्पष्ट कर लें कि हिन्दी के शब्दों की तुलना में जो शब्द अंग्रेजी के बताये गये हैं, वे ‘सरल’ हैं और आमजन को आसानी से समझ में आ जायेंगे।

उनका यह भी कहना है कि इससे भाषा में ‘प्रवाह’ बना रहेगा। अब आप बखूबी अंदाजा लगा सकते हैं कि यह प्रवाह अंततः भाषा को किस दिशा में ले जायेगा। परिपत्र में बहुत बुद्धिमानी के साथ यह ‘सत्य’ भी उद्घाटित किया गया, जो हिन्दी के साहित्यकारों की  अभी तक की समझ में भी इजाफा करेगा कि ‘साहित्यिक भाषा के इस्तेमाल से उस भाषा-विशेष की ओर से आम-आदमी का रूझान कम हो जाता है और उसके प्रति ‘मानसिक-विरोध’ बढ़ता है।’  खैर यह नेक सलाह हिन्दी के साहित्यकार जानें, जो अभी तो पिछले बीस बरसों से, इसी झंझट से ही बाहर नहीं आ पा रहे हैं कि किसकी कविता को ‘प्रगतिशील’ बतायें और किसकी को ‘प्रतिक्रियावादी’ ?

बहरहाल, इस ऐतिहासिक परिपत्र में भाषा की ‘कठिनता’ की समस्या का समाधान खोजते हुए, पहले काफी बड़ी ‘चिन्तन-मनन’ से भरी भूमिका भी बांधी गयी और ‘उर्दू-फारसी-तुर्की’ के शब्दों के प्रयोग की बात कुछ ऐसे सदाशयी अंदाज में पूरे भोलेपन के साथ कही गयी है कि जैसे वे कोई नयी बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि यहाँ वे बस ‘गांधी-नेहरू’ वाली ‘बोलचाल’ की भाषा की बात को ही विनम्रता के साथ फिर से दोहरा रहे हैं।

लेकिन, मित्रो, हकीकत यह है कि ‘उर्दू-फारसी-तुर्की’ के शब्दों के शामिल किये जाने की बात से तो सिर्फ ‘बहाना’ बाहर आ रहा है, जबकि बुनियादी रूप से उनका मंसूबा सिर्फ ‘अंग्रेजी’ के शब्दों को शामिल करने का ही है। क्योंकि,  उन्होंने परिपत्र में जो अनुकरणीय उदाहरण दिया है, उनकी असली इच्छा ‘राजभाषा’ को उसी ‘रूप’ की ओर हाँकने की ही है, जिसको उन्होंने ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश’ पाते ही ‘धन्धों में धुत्त’ हो चुके अखबारों से ही उठा कर उसे उदाहरण के रूप में रखा है। और पिछले वर्षों से हिन्दी के अखबारों के महानगरीय संस्करणों में यह ‘भाषा-रूप पाठकीय’ इच्छा के विरूद्ध चलाया जा रहा है।  लेकिन पूरे परिपत्र में वे कहीं भी साफ-साफ ‘हिंग्लिश’ नहीं कहना नहीं चाहते। जबकि वे हिन्दी को ‘हिंग्लिश’ में बदलने का स्पष्ट संकल्प ले चुके हैं और ऐसा करना उनके लिये इसलिए भी जरूरी है कि उनकी यह विवशता है। चूंकि भारत में ‘विदेश से हासिल होने वाली आवारा पूँजी’ की यह अघोषित शर्त है। यहाँ यह याद रखा जाना जरूरी है कि यह पूँजी, केवल पूँजी की तरह नहीं आती है, वरन, वह सांस्कृतिक माल के लिये जगह बनाती हुई आती है।

कहने की जरूरत नहीं कि परिपत्र को पढ़ते ही अंग्रेजी के अखबारों ने उनके इस नेक इरादे को इसीलिए ही तुरन्त पढ़ लिया और उनकी बाँछें खिल गयीं। उन्होंने इस परिपत्र के स्वागत के उत्साह में प्रथम-पृष्ठ की खबर बनाते हुए कहा कि सरकार ने ‘देर आयद दुरूस्त आयद’ की तरह खुद को आखिरकार ‘अमेण्ड’ किया और देश के विकास के पक्ष में ‘हिंग्लिश’ के लिए रास्ता खोल ही दिया है। अंग्रजी अखबारों की सुर्खियां बनीं- ‘ हिंग्लिश गेन्स रेस्पेक्टैबिलिटी’। ‘हिंग्लिश गेन्स ग्राउण्ड इन इण्डिया’। ‘हिंग्लिश विल बी द ऑफिशियल लैंग्विज ऑव इण्डिया’। इन शीर्षकों में वस्तुतः अंग्रेजी-विजय की ही प्रतिध्वनियाँ हैं।

बहरहाल, यह सच अब किसी से भी छिपा नहीं रह गया है कि ‘बहुराष्ट्रीय-निगमों’ की ‘सांस्कृतिक-अर्थनीति’ के दलालों द्वारा भारत में ‘भूमण्डलीकरण’ के शुरू होते ही लगातार इस बात की वकालत की जाती रही है कि भारत में ‘अंग्रेजी’ किसी भी तरह देश की प्रथम-भाषा का ‘वैध’ स्थान प्राप्त कर ले। इसके लिए उन्होंने ‘विश्व हिन्दी सम्मेलन’ की तर्ज पर उससे भी कहीं ज्यादा धूम-धड़ाके वाला एक आयोजन, जो ‘माइका’ द्वारा प्रायोजित था, मुम्बई में किया, जिसमें गिरहबान पकड़ कर भारतीयों को बताया जाता रहा कि ‘भारत का भविष्य हिन्दी नहीं, हिंग्लिश में है’ और इससे नाक-भौंह सिकोड़ने की जरूरत नहीं, क्योंकि इसमें भी शेक्सपीयर पैदा हो जायेगा, और तीस वषों बाद यह ‘दुनिया की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा’ होगी। यह बात वे किसे बता रहे हैं ? कौन नहीं जानता कि संख्या के आधार के कारण भारतीय, जो भी भाषा बोलने लगेंगे वह दुनिया की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा अपने आप ही कह लायेगी। दूसरी बात यह कि जो अंग्रेजी दूसरा शेक्सपीयर पैदा नहीं कर पायी, वह ‘हिंग्लिश’ पैदा कर देगी ? फिर क्या भविष्य का एक काल्पनिक शेक्सपीयर भारत में पैदा हो जाये,  इसके लालच में उस भाषा को मार दें, जिसने वह यात्रा मात्र चौसठ वर्षों में पूरी कर ली, जिसे पूरी करने में अंग्रेजी को पाँच सौ वर्ष लगे ?

बहरहाल पेंगुइन प्रकाशन ने इस पूरे प्रायोजित अभियान पर केन्द्रित बड़ी-सी लगभग दो-सौ पृष्ठों की एक पुस्तक भी छापी है, ताकि भारत के उन काले अंग्रेजों को तर्कों के वे तमाम धारदार अस्त्र मिल जायें, जिनका वे जरूरत पड़ने पर अचूक इस्तेमाल जहाँ-तहाँ बहस-मुबाहिसों में कर सकें, क्योंकि निश्चय ही आगे-पीछे ‘गोबरपट्टी बनाम काऊबेल्ट’ के लद्धड़ लोग एक दिन ‘राष्ट्रभाषा’ के नाम पर एकजुट हो कर हो हल्ला मचायेंगे, तब सार्वजनिक-मंचों और छोटे पर्दे पर भाषा को लेकर होने वाली मुठभेड़ों में उन्हें विजयी बनाने में ये तर्क ही इमदाद करेंगे। लेकिन  इस परिपत्र के प्रकाशन के बाद हिन्दी-पट्टी में कहीं कोई चूं-चपड़ तक नहीं हुई, इस बात पर भी खुल कर प्रसन्नता प्रकट की गयी।

दूसरी ओर ‘धंधे में धुत्त’ हिन्दी के सामान्य से अखबारों ने आमतौर पर तथा उन अखबारों ने, जिन्होंने उदारीकरण के बाद ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश’ पर अपना साम्राज्य खड़ा किया है, उन्होंने खासतौर पर, ठीक ऐसी ‘छुपाये न छुपने वाली’ खुशी के साथ परिपत्र की अगुवाई की जैसे भारत और अमेरिका के बीच परमाणु सौदा सुलट गया है। बड़े-बड़े और लम्बे सम्पादकीय रगड़ते हुए उन्होंने अपने पाठकों को बताया कि जो काम इस सरकार ने कर दिखाया, वह उसकी शक्तिशाली राजनीतिक इच्छा का प्रमाण है। यह एक बहुप्रतीक्षित और अनिवार्य कदम था। हालाँकि  उन्होंने भी इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा कि उनकी टिप्पणी में भूले से भी कहीं ‘हिंग्लिश’ शब्द ना आ जाये। उन्हें चिन्ता भी थी कि सामान्य पाठक को इस परिपत्र  के अप्रकट आशय की भनक भी न लगे।

लेकिन, भाषा की ‘ऐतिहासिक-सामाजिक-सांस्कृतिक’ और ‘आर्थिक’ भूमिका के परिप्रेक्ष्य को अपेक्षित गहराई से समझने वाले दूरदृष्टा लोग, इस परिपत्र को किसी सरकारी कार्यालय के कारिन्दे द्वारा गाहे-ब-गाहे जारी कर दिया जाने वाला रस्मी ‘कागद’ नहीं, बल्कि भारतीय-भाषाओं के क्षेत्र में परमाणु सौदे से भी ज्यादा उलटफेर करने वाला ‘अस्त्र’ मान रहे हैं। तीन-सौ वर्षों के गुलामी के दौर में भारतीय भाषाओं का जितना नुकसान अंग्रेजों ने नहीं किया, उससे ज्यादा बड़ा नुकसान भारत-सरकार का गृह-मंत्रालय, इस परिपत्र  के जरिये करने वाला है। क्योंकि वे जानते हैं कि यह हिन्दी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं को भी जल्दी ही विघटित कर देगा। क्योंकि उन राज्यों की वे क्षेत्रीय भाषायें, संविधान की आठवीं अनुसूची वाली भाषायें हैं। निश्चय ही वहाँ भी यह फरमान तमिल को ‘तमलिश’ बांग्ला को ‘बांग्लिश’  बनाने का काम करेगा । वैसे इन भाषाओं के अखबार भी ये काम शुरू कर ही चुके हैं। यहाँ यह याद रखा जाना चाहिए कि दक्षिण की भाषायें अपनी वैकल्पिक-शब्दावली की तलाश में उर्दू-फारसी-तुर्की की तरफ नहीं जातीं। चूंकि वे अपना रक्त-सम्‍बन्‍ध संस्कृत से ही बनाती आयी हैं, अतः वे संस्कृत की तरफ जाती हैं। लेकिन इनके बोलने वालों के भीतर छुपे अंग्रेजी के दलालों की फौज- दलीलें देने के लिए आगे आयेगी कि जब भारत-सरकार द्वारा हिन्दी को हिंग्लिश बनाया जा रहा है, तब तमिल को ‘तमिलिश’ बनाने का अविलम्ब रास्ता खोल दिया जाना चाहिये, ताकि उसका भी आम-आदमी के हित में सरलीकरण हो सके। दरअसल हिन्दी के संस्कृतनिष्ठ-रूप का आग्रह तो दक्षिण ही सबसे ज्यादा करता रहा आया है।

कुल मिलाकर, इस महाद्वीप की सारी की सारी भाषाओं के निर्विघ्न विसर्जन का एकमात्र हथियार बनने वाला सिद्ध होगा, यह परिपत्र। एक से अनेक को निपटाने का कारगर हथियार। प्रकारान्तर से यही वही औपनिवेशिक विचार का एक किस्म का अप्रकट ‘डिवाइन-इण्टरवेंशन’ है, जिसके चलते कहा गया था कि ‘प्रोलिफरेशन ऑव लैंग्विज इज पेनल्टी ऑन ह्यूमेनिटी’। भाषा-बहुलता मानवता पर दण्ड है। अतः सभी भाषायें खत्म हों और केवल एक ‘पवित्र-भाषा’ अंग्रेजी ही बची रहे। हिन्दुस्तान अपनी भाषा की बहुलता के कारण वैसे ही पाप की काफी बड़ी गठरी अपने सिर पर उठाये चला आ रहा है। बहरहाल, भाषा सम्बन्धी ऐसी ‘पवित्र वैचारिकी’ भारत-सरकार के गृह-मंत्रालय के प्रति स्वयं को निश्चय ही बहुत कृतज्ञ अनुभव कर रही होगी।

कहना न होगा कि हिन्दी की भलाई करने का मुखौटा लगा कर सत्ता में बैठे ये लोग, निश्चय ही काफी पढ़े-लिखे हैं और बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि भाषायें कैसे मरती हैं और उन्हें क्यों और किस के फायदे के लिए मारा जाता है ? बीसवीं सदी में अफ्रीकी महाद्वीप की तमाम भाषाओं का खात्मा करके उसकी जगह अंग्रेजी को स्थापित करने की रणनीति क्या थी ? यह सब इनको बखूबी पता है और वही ‘कुचाल’ उन्होंने यहाँ चली और वे अब सफलता के करीब हैं।

जी हाँ, वह रणनीति थी ‘स्ट्रेटजी ऑव लैंग्विज-शिफ्ट’। इसके तहत सबसे पहले चरण में शुरू किया जाये- ‘डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि’। अर्थात स्थानीय भाषा के प्रचलित शब्दों को वर्चस्ववादी अंग्रेजी भाषा के शब्दों से ‘विस्थापित’ किया जाये। ध्यान रखें कि ‘डिस्लोकेशन शुड बी क्वाइट स्मूथ’। अन्यथा उस भाषा के लोगों में विरोध पैदा होना शुरू हो सकता है। अतः यह काम धीरे-धीरे हो। इसको कहा जाता है- ‘काण्टा-ग्रेजुअलिज्म’। शब्दों का ‘विस्थापन’ करते हुए,  इसका प्रतिशत सत्तर और तीस का कर दिया जाये। यानी सत्तर प्रतिशत शब्द अंग्रेजी के हो जायें तथा तीस प्रतिशत स्थानीय भाषा के रह जायें। एक सावधानी यह भी रखी जाये कि इसके लिये सिर्फ एक ही पीढ़ी को अपने एजेण्डे का हिस्सा बनायें। जब उस समाज की परम्परागत-सांस्कृतिक शब्दावली जिससे उसकी भावना जुड़ी हो, और यदि उसे ‘डिस्लाकेट’ या कहें अपदस्थ करने पर उस समाज में इस नीति के प्रति कोई प्रतिरोध नहीं उठे तो मान लीजिए कि ‘दे आर रेडी फॉर लैंग्विज-शिफ्ट’। इसके बाद ‘वॉल्टेण्टअरली दे विल गिव्ह-अप देअर लैंग्विजेज’।

बस, इसी निर्णायक समय में उसकी मूल-लिपि को हटाकर  उसकी जगह ‘रोमन-लिपि’ कर दीजिए। ‘दिस विल वी द फाइनल असाल्ट ऑन लैंग्विज’। यानी भाषा की अंतिम कपाल क्रिया। हालॉकि  इन दिनों विज्ञापन व्यवसाय व मीडिया और इसी के साथ उन समाजों और राष्ट्रों की सरकारों पर ‘विश्व-व्यापार संघ’, ‘अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष’ जैसे वित्तीय संस्थानों से दबाव डाला जाता है कि ‘रोल ऑफ योर गव्हर्मेण्ट आर्गेनाइजेशंस शुड बी इनक्रीज्ड इन प्रमोशन ऑफ इंग्लिश लैंग्विज’।

कहने की जरूरत नहीं कि इनके साथ हमारा प्रिण्ट और इलेक्टॉनिक मीडिया गठजोड़ करता हुआ, यह बताता भी आ रहा है कि देवनागरी को छोड़कर रोमन-लिपि अपना ली जाय। लोगों ने अपनाना भी शुरू कर दी है। यह अंग्रेजी के उस गुण की याद दिला रहा है, जिसके बारे में शायद बर्नार्ड शॉ ने कहा था कि ‘अंग्रेजों की सबसे बड़ी विशेषता ही यह है कि वह आपको इस बात के लिए राजी कर सकते हैं कि आपके हित में आपका मरना जरूरी है।’

बहरहाल, विश्व-बैंक द्वारा ‘सर्वशिक्षा-अभियान’ के नाम पर डालर में दिये गये ऋण का ही दबाव है, जो अपने निहितार्थ में ‘एजुकेशन फॉर आल’ नहीं,  -इंग्लिश फॉर ऑल’ का ही एजेण्डा है। इसी लिये बेचारे गरीब देशभक्त सैम पित्रोदा कहते आ रहे हैं कि ‘पहली कक्षा से ही अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू कर दी जाये’। चूँकि इससे उनके लैंग्विज-शिफ्ट वाले एजेण्डे में आसानियाँ बढ़ जायेंगी।

यह भारत-सरकार का वही नया पैंतरा है, और जो भाषा की राजनीति जानते हैं वह बतायेंगे कि यह वही ‘लिंग्विसिज्म’ है, जिसके तहत भाषा को ‘फ्रेश-लिंग्विस्टिक’ लाइफ देने के नाम पर उसे भीतर से बदला जाता है। पूरी बीसवीं शताब्दी में इन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप की भाषाओं को इसी तरह खत्म किया। वहाँ भी शुरूआत एफ.एम. रेडियो के जरिये वहाँ के संगीत और मनोरंजन में घुसकर की गई थी। उन्होंने वहाँ पहले फ्राँस की तर्ज पर रेडियो के जरिये भाषा-ग्राम अर्थात लैंग्विज-विलेज बनाये, जिसमें स्थानीय भाषाओं में अंग्रेजी के ‘मिक्स’ से भाषा-रूप बनाया और वहाँ की युवा-पीढ़ी को उसका दीवाना बना दिया। ये अफ्रीकी भाषाओं की पुनर्रचना का अभियान था। जी हाँ, रि-लिंग्विफिकेशन, जिसकी शुरूआत हमारे यहाँ भी एफ.एम. रेडियो में अपनायी गयी प्रसारण-नीति से शुरु की गई। यह ‘आनन्द द्वारा दमन’ की सिद्धान्तिकी कही जाती है।

दरअसल, हकीकत यह है कि चीन की भाषा मंदारिन के बाद दुनिया की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा हिन्दी से डरी हुई, अपनी ‘अखण्ड-उपनिवेश’ बनाने वाली अंग्रेजी ने ब्रिटिश कौंसिल के अमेरिकी मूल के जोशुआ फिशमेन की बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए, उदारीकरण के शुरू किये जाने के बस कुछ ही समय पहले एक ‘सिद्धान्तिकी’ तैयार की थी, जो ढाई-दशक से गुप्त थी, लेकिन इण्टरनेटी युग में वह सामने आ गयी। इसका ही नाम था रि-लिंग्विफिकेशन अर्थात ‘भाषा की पुनर्रचना’।

अंग्रेज शुरू से भारतीय भाषाओं को पूर्ण भाषा न मानकर उन्हें ‘वर्नाकुलर’ कहा करते थे। वे अपने बारे में कहा करते थे, ‘वी आर अ नेशन विथ लैंग्विज, व्हेयर एज दे आर ट्राइब्स विद डॉयलेक्ट्स’। फिर हिन्दी को तो तब खड़ी ‘बोली’ ही कहा जा रहा था। लेकिन दुर्भाग्यवश एक गुजराती-भाषी मोहनदास करमचंद गांधी ने इसे अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई में देश भर में ‘प्रतिरोध’ की सर्वाधिक शक्तिशाली भाषा बना दिया और नतीजतन एक ‘जन-इच्छा’ पैदा हो गयी कि इसे हम ‘राष्ट्रभाषा’ बनायें और कह सकें, ‘वी आर अ नेशन विद लैंग्विज’। लेकिन औपनिवेशिक दासता से दबे दिमागों के कारण यह ‘राष्ट्रभाषा’ के बजाय केवल ‘राजभाषा’ बन कर ही रह गयी। गांधी जी के ठीक उलट, नेहरू का रूझान शुरू से ही अंग्रेजी की तरफ ही था। चौदह अगस्त की रात में, जब वह बी.बी.सी. के सम्वाददाता को कह रहे थे कि ‘संसार को कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया है’ तो यह एक भाषा-समर की घोषणा थी, जबकि नेहरू एक नव-स्वतन्त्र राष्ट्र की संसद में अंग्रेजी में भाषण दे रहे थे। लेकिन गांधी ने हिन्दी को ‘राष्ट्रभाषा’ बनाने की बात कर के उसे भारतीय-राजनीति का हमेशा के लिये सालते रहने वाला कांटा बना दिया।

बहरहाल, चौंसठ वर्षों से सालते रहने वाले उस पुराने कांटे को अब निकाला जा सका है।

बहरहाल यह चमत्कार सा ही है कि अभी पाँच साल पहले तक हिन्दी में जो शब्द चिर-परिचित थे, अचानक ‘अबोधगम्य’ और ‘कठिन’ हो गये। एक और दिलचस्प बात यह कि हममें ‘राजभाषा’ के अधिकारियों की भर्त्‍सना की बड़ी पुरानी लत है और उसमें हम बहुत आनन्द लेते हैं,  जबकि हकीकतन वह सरकारी केन्द्रीय कार्यालयों का सर्वाधिक लतियाता जाता रहने वाला नौकर होता है। उसको ज्यादातर दफ्तरों में जनसम्पर्क के काम में जोत कर रखा जाता है। कार्यालय प्रमुख की कुर्सी पर बैठा अधिकारी उसे सिर्फ हिन्दी पखवाड़े में पूछता है और जब ‘संसदीय राजभाषा समिति’, जो दशकों से खानापूर्ति के लिए आती रही है, के सामने बलि का बकरा बना दिया जाता है। यह परिपत्र भी उन्हीं के सिर पर ठीकरा फोड़ते हुए बता रहा है कि हिन्दी के जो शब्द कठिन हैं, इनकी ही अकर्मण्यता और कारस्तानी के कारण है। और जबकि  इतने वर्षों में कभी पारिभाषिक शब्दावली का मानकीकरण सरकार द्वारा खुद ही नहीं किया गयात्र हर बार बजट का रोना रोया जाता रहा। जबकि अंग्रेजी के लिये सरकार के खजाने की थैली हमेशा खुली रही है।

कहने की जरूरत नहीं कि यह इस तथाकथित भारत-सरकार (जबकि गव्हर्मेण्ट ऑफ इण्डिया सरल शब्द है) का इस आधी शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन है, जो देश के एक अरब बीस करोड़ लोगों को अंग्रेजी सिखाने की महा-खर्चीली योजना का संकल्प लेती है, लेकिन साठ साल में वह देश को मुश्किल से हिन्दी के हजार-डेढ़ हजार पारिभाषिक-शब्द नहीं सिखा पायी ? और अब उसे उन्हें सरल बनाने के लिए अंग्रेजी के सामने धक्का देना पड़ा है।

दरअसल, सरल-सरल का खेल खेलती हुई वह किसे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है ? वह ‘राजभाषा’ के नाम पर देश के साथ सबसे बड़ा छल कर रही थी।

यह बहुत नग्न-सच्‍चाई है कि यह देश, अपने ‘कल्याणकारी राज्य’ की गरदन कभी का मरोड़ चुका है और कार्पोरेटी संस्कृति के सोच को अपना अभीष्ट मानने वाले अरबों के आर्थिक घोटालों से घिरे सत्ता के कर्णधारों को केवल ‘घटती-बढ़ती दर’ के अलावा कुछ नहीं दिखता। ‘भाषा’ और ‘भूगोल’ दोनों उनकी चिन्‍ता के दायरे से बाहर हैं। निश्चय ही इस अभियान में हमारा पूरा मीडिया भी शामिल है, जिसने ‘नव-उपनिवेशवादी’ मंसूबों के इशारों पर सुनियोजित ढंग से ‘यूथ-कल्चर’ का राष्ट्रव्यापी मिथ खड़ा किया और अंग्रेजी और ‘पश्चिम के सांस्कृतिक-उद्योग’ में ही उन्हें उनका भविष्य बताने में जुट गया। यह मीडिया द्वारा अपनाई गई दृष्टि उसी ‘रॉयल चार्टर’ की नीति का कार्यान्वयन है, जो कहता है, ‘दे शुड नॉट रिजेक्ट अवर लैंग्विज एण्ड कल्चर इन फेवर ऑफ देअर ट्रेडिशनल वैल्यूज। देअर स्ट्रांग एडहरेन्स टू मदर टंग हैज टू बी रप्चर्ड’। इसलिए उनमें एक ‘अविवेकवाद’ पैदा किया गया ताकि वे भारतीय भाषाओं को विदा करने में देश की तरक्की के सपने देखने लगें।

कहना न होगा कि ‘लैंग्विजेज शुड बी किल्ड विथ काइण्डनेस’ की रणनीति का यह प्रतिफल है, परिपत्र। इसे हिन्दी के ताबूत में आखिरी कील समझा जाना चाहिए और इसकी चौतरफा तीखी आलोचना और भर्त्‍सना तक की जाना चाहिए और कहा जाना चाहिए कि वे इसे अविलम्ब वापस लें। क्योंकि सरकार की नीति का खोट खुलकर सामने आ चुका है। परिपत्र इस का प्रमाण-पत्र है। अंग्रेजी अखबार जिसे पढ़ कर साफ-साफ बता रहे हैं, वहीं हिन्दी के अखबार उसे छुपा रहे हैं। वास्तव में, ऐसा करते हुए वे आग के आगे पर्दा खींच रहे हैं। यह निश्चय ही राष्ट्र के साथ पत्रकारिता का सबसे बड़ा धोखा कहा जायेगा। हम इस लांछन के साथ इस संसार से बिदा नहीं होना चाहेंगे कि ‘प्रतिरोध की सर्वाधिक चिंतनशीलभाषा’ का एक सांस्कृतिक-रूप से अपढ़ सत्ता ने हमारे सामने गला घोंटा और हम चुपचाप तमाशबीनों की तरह देखते रहे और कोई प्रतिरोध नहीं किया। जबकि  इस परिपत्र के सहारे तमाम भारतीय भाषाओं की पीठ में नश्तर उतार दिया जाना है। यह ‘सरलता के सहारे’ चुपचाप तमाम भारतीय भाषाओं की हत्या के लिए की जा रही जघन्य हिकमत है। ऐसे में हमारी चुप्पी हमें भी हत्यारों की फेहरिस्त में शामिल लोगों के साथ खड़ा कर देगी।

भाषा मनुष्य का सामाजिक-सांस्कृतिक आविष्कार है। ‘सम्प्रेषण’ के साथ ही ‘संस्कृतीकरण’ के मार्ग को इसी ने प्रशस्त किया। वह चिन्तन प्रक्रिया का हिस्सा भी है। जिस राष्ट्र के पास अपनी कोई भाषा नहीं, वह सांस्कृतिक रूप से अनाथ ही होगा। ‘अपनी भाषा में ही अपना भविष्य’ खोजने वाले चीन और जापान, जिनकी भाषायें ढाई हजार चिन्हों की चित्रात्मक लिपि वाली हैं और उसी में उन्होंने बीसवीं शताब्दी का सारा ज्ञान-विज्ञान विकसित कि‍या और आज वे सभी क्षेत्रों में लगभग निर्विवाद रूप से अपराजेय हैं। कन्नड़ सीख कर चपरासी की भी नौकरी नहीं मिल सकती का तर्क देकर भाषा को खत्म करने के लिए लोग हिन्दी के भी बारे में यही बात बोलते हुए उसके संहार के सरंजाम जुटा रहे हैं, जबकि हिन्दी में यदि हम अपने पड़ोसियों से ही व्यापार-व्यवसाय शुरू करने लगे तो हिन्दी अच्छी खासी कमाने वाली भाषा बन सकती है। ‘भाषा का अर्थशास्त्र’ खंगालकर यह बताया जा सकता है कि जब मनोरंजन के कारोबार’ में वह कमा रही है तो वह दूसरे क्षेत्रों में भी उतनी ही कमाऊ सिद्ध हो सकती है। लेकिन,  दुर्भाग्य यह कि हमने पूरे भारतीय समाज को कभी भी अंग्रेजी के औपनिवेशक शिकंजे से मुक्त होने ही नहीं दिया या हमें हमारी सत्ताओं ने नहीं होने दिया। नेहरू ने अपनी असावधानी के क्षणों में,  जो बात राष्ट्र-संघ के राजनय जॉन ग्रालब्रेथ के सामने लगभग पश्चात के स्वर में कही थी कि ‘आयम द लास्ट इंग्लिश प्राइम मिनिस्टर टू रूल इण्डिया’। पर उन्हें कहाँ मालूम था कि ‘नेहरू, तो फिर भी गाँव-गाँव धूल धक्कड़ खाकर घूमते हुए हिन्दी में ही बोलते-बतियाते प्रधानमंत्री थे’, लेकिन अब देश के पास बाकायदा अंग्रेज तो नहीं,  पर अंग्रेजी-प्राइममिनिस्टर तो है ही, जो संसद और अपनी पत्रकार वार्ताओं में भूल से भी हिन्दी शब्द नहीं बोलता। उसके पास हिन्दी लाल किले की सीढि़यों पर अपने रेडिमेड रूप में आती है। उसकी दृष्टि में वहाँ हिन्दी-भाषा, देश का गौरव नहीं,  राजनीति का रौरव है। और वे इस देश को वर्नाकुलर भाषाओं के नर्क से निकालना चाहते हैं।

अन्त में,  मैं सारे ही देशवासियों से कहना चाहता हूँ कि ये मसला केवल हिन्दी भाषा-भाषियों का नहीं है, बल्कि ‘सम्पूर्ण भारतीय-भाषाओं’ का है। क्योंकि बकौल राहुल देव के हमें ये अच्छी तरह से ये जान लेना चाहिये कि ‘हमारा भविष्य हमारी भाषाओं में ही है’। इसलिये इस नीति का खुल कर विरोध करें। और राजभाषा-विभाग को अपनी असहमति प्रकट करते हुए ई-पत्र लिखें। क्योंकि अफ्रीका में वह ‘किलर-लैंग्विज’ की तरह पहचानी जा चुकी है। उसके मुँह से खून की बू आ रही है। वे अंग्रेजी को पिंजरे से बाहर निकाल कर, कुछ इस तरह खुला छोड़ना चाहते हैं कि वह हिन्दी ही नहीं, तमाम भारतीय भाषाओं के शब्द-शब्द नोंच खायें।

रहता हूँ परदेस में लेकिन ख्वाहिश है घर जाने की

नई दिल्‍ली : जगदीश रावतानी की ‘आनंदम संगीत व साहित्य सभा’ की मासिक गोष्ठी नई दिल्ली के कस्तूरबा गाँधी मार्ग स्थित हिमालय हाऊस में मैक्स न्यू योर्क के गोष्ठी कक्ष में 14 नवमबर 2011 को हुई.। इसकी सदारत प्रसिद्ध शायर सैफ सहरी ने की तथा इसमें जाम बिजनौरी, मासूम गाजियाबादी, साज़ देहलवी, वीरेंद्र कमर, आरिफ देहलवी, साज़ देहलवी, दर्द देहलवी, भूपेंद्र कुमार, प्रेमचंद सहजवाला, नागेश चन्द्र, निखिल आनंद गिरि, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, आशीष सिन्हा कासिद, शाहीना खान, शकील इब्ने नज़र, समर हयात नेगान्बी ने भाग लिया। एक से बढ़ कर एक उम्दा गज़लों से सभा कक्ष वाहवाही से गूंजता रहा।

समर हयात नेगान्बी के एक शेर का नायाब अंदाज़ देखें-
पहले खिज़ां में लुट गए और अब बहार में
नुक्सान पूरे साल रहा कारोबार में

साज़ देहलवी के इस शेर में मुल्क की तस्वीर उजागर हो गई-
अब तक नहीं मिला है कोई कारवां का मीर
जब खिज्र ही ना हो तो क्या रस्ता दिखाई दे

दर्द देहलवी ने भी मुल्क की तस्वीर एक और ही अंदाज़ में पेश की-
वो अपने दौर की तारिख कैसे लिखेंगे
जो कमसिनी में मशीनों पे काम करते हैं

युवा शायर निखिल आनंद गिरि ने अति सुंदर गज़ल पढ़ी जिसका एक शेर-

आज बन बैठे अदू कैसे मुहब्बत के ‘निखिल’
वो भी थे दिन कि वो मजनू की तरह लगते थे

मासूम गाजियाबादी हमेशा की तरह ज़ोरदार रहे-
कोई पुरखों की ज़मीनें बेच कर भी बे सुकूं
हम गुबारे बेच कर भी सो गए आराम से

किसी भी ज़बान के अदीब के लिये अदब की क्या अहमियत है, यह वीरेंद्र कमर के इस शेर से स्पष्ट है-
हम अदब के फ़कीर हैं साहिब
अपनी दौलत को अपने घर रखिये

प्रेमचंद सहजवाला ने एक अच्छी गज़ल पढ़ी-
आसमां तक ना पहुँची पतंग
रास्तों में अटकती रही
जिंदगी हर नई शक्ल में
आदमीयत परखती रही

जाम बिजनौरी को शेर-
जब भी पूछेगी सहेली तेरे रोने का सबब
मेरी तस्वीर तेरी आँख से जारी होगी

ममता किरण ने शेर पढ़ा-
साँसें भी अपनी छोड़ के आ जाऊँ तेरे पास
कैसी अजब कशिश है ये तेरी पुकार में

शकील इब्ने नज़र ने फरमाया-
देखिये कब तक मुकम्मल मौत हो
मरते मरते इक ज़माना हो गया

नागेश चन्द्र ने सुनाया-
अपनी भी पहचान रखिये
इन परों में जान रखिये

लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने शेर पढ़ा-
कुछ किसी से भी माँगना न पड़े
हमने मंगा है बस यही सब से

शाहीना खान-
हाल बे हाल आँख पुरनम परेशां गेसू
तू ने देखा ही नहीं ओ छोड़ के जाने वाले

आरिफ देहलवी-
वो पहला हिन्दुस्तान कहाँ वो हिंद की पहली आन कहाँ
जो कल सोने की चिड़िया था उसकी है आज वो शान कहाँ

आनंदम अध्यक्ष जगदीश रावतानी-
ज़िन्दगी ने हम पे ढाया ही नहीं कोई सितम
डोर थी  सुलझी हुई हम खुद ही उलझाने लगे

गोष्ठी के सदर सैफ सहरी ने एक बहुत प्रभावशाली गज़ल पेश की जिसका मतला था-
लम्हा लम्हा मेरी माँ को आस है मेरे आने की
रहता हूँ परदेस में लेकिन ख्वाहिश है घर जाने की
और मकता था
आईना हैं टुकड़े टुकड़े हो जाएंगे सैफ मगर
हिम्मत तो कर दी है हमने पत्थर से टकराने की

गोष्ठी का संचालन ममता किरण ने किया। अंत में आनंदम अध्यक्ष जगदीश रावतानी ने सभी शायरों का धन्यवाद दिया।

हमें नकलची बंदर बनने से बचना होगा : स्वयं प्रकाश

स्वयं प्रकाश को मिले ‘कथाक्रम सम्मान’ और इस अवसर पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्‍ठी ‘वर्तमान समय के प्रश्न और रचनाकारों की भूमिका’ की रिपोर्ट-

लखनऊ : सुप्रसिद्ध कहानीकार-उपन्यासकार स्वयं प्रकाश को 19वें आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान से अलंकृत किया गया। उन्हें यह सम्मान आलोचक मुद्राराक्षस और उपन्यासकार गिरिराज किशोर ने दिया। सम्मान के तहत 15 हजार रुपये का चेक, स्मृति चिह्न, अंग वस्त्रम् और सम्मान पत्र दिया गया। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के यशपाल सभागार में हुए सम्मान समारोह के अध्यक्ष मुद्राराक्षस ने कहा कि बाजारवाद रोमन लिपि के जरिये लोगों में घुस चुका है। उन्होंने अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि आधी आबादी जो गरीबी रेखा के नीचे रहती है, वह नारकीय जीवन व्यतीत कर रही है, लेकिन यह आबादी लेखकों की नजरों में नहीं आती, जबकि प्रेमचंद के समय के समाज का समूचा चेहरा साहित्य में दिखता है.। यही कारण है कि हिन्दी सीमित हो गयी है।

इससे पूर्व आयोजन के संयोजक शैलेंद्र सागर ने स्व. श्रीलाल शुक्ल को याद करते हुए कहा कि वह हम सब के लिए कितना मायने रखते थे इसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। कथाक्रम के लिए तो यह और भी दुखदायी है क्योंकि वह इसके संरक्षक थे। बनारस हिन्‍दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉक्‍टर राजकुमार ने सम्मानित कथाकार स्वयं प्रकाश के लेखन पर रोशनी डालते हुए कहा कि सांप्रदायिकता के विषय पर लिखी गई उनकी कहानियाँ काफी चर्चित रही हैं। उनकी अधिकतर कहानियों का जन्म वास्तविक परिवेश में हुआ है। स्वयं प्रकाश की कहानियों की विशेषता है कि उनकी शुरुआत चरित्रों से नहीं, उनकी आंतरिक भावनाओं से होती है। वह प्रेमचंद की परम्परा के असल वाहक हैं, जो यथार्थ को दिशा देता है।

कथाकार स्वयं प्रकाश ने हाल ही में  ज्ञानपीठ से सम्मानित वरिष्ठ उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल को नमन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार अमरकांत को भी ज्ञानपीठ सम्मान से समादृत करने के लिए ज्ञानपीठ परिवार को बधाई दी। उन्होंने कहा कि पहली बार कहानीकारों का दिल ज्ञानपीठ वालों ने जीता। वैश्वीकरण और बाजारवाद पर प्रहार करते हुए स्वयं प्रकाश ने कहा कि बाजार हमारे छोटे भाइयों यानी नयी पीढ़ी में घुस चुका है। वह हमारे मूल्यों को नष्ट कर रहा है। इस कारण हमें सोचना होगा कि हमें किस प्रकार का समाज बनाना होगा। स्वयं प्रकाश ने सभी को आगाह किया कि नकलची बन्‍दर बनने से परहेज करें। उन्होंने कहा कि कहानीकार अक्सर अपने कथ्य के कारण याद किया जाता है, पर केवल कथ्य ही नहीं शिल्प भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार गिरिराज किशोर ने कहा कि सम्मानित कथाकार स्वयं प्रकाश का बहुत बड़ा पाठक वर्ग है और उन्होंने कहानी को नये तरीके से कथा सम्राट  प्रेमचंद के साथ जोड़ा है। वैश्वीकरण के हिन्‍दी पर प्रभाव की बात पर उन्होंने कहा कि जब तक गाँव  हैं, तब तक हिंदी पर खतरा नहीं है। हालाँकि बोलियों को जिस तरह से भाषा का दर्जा दिलाने की होड मची है, वह ठीक नहीं है क्योंकि इससे हिंदी दरिद्र हो जाएगी। सम्मान सत्र के तत्काल बाद ‘वर्तमान समय के प्रश्न और रचनाकारों की भूमिका’ विषय पर संगोष्ठी प्रारम्भ हुई जो अगले दिन भी जारी रही। इस चर्चा में जहाँ कई बार गर्मजोशी देखी गई वहीं साहित्य की सिमटती दुनिया पर चिन्‍ता में डूबे लेखकों के अपने आकलन और विवेचन भी थे। इस चर्चा का प्रारंभ कथाकार  राकेश कुमार सिंह के पत्र वाचन से हुआ जिन्होंने कहा कि भूमण्डलीकरण का नकाब मौजूदा समय में भी पूरी तरह से उतरना बाकी है। समाजशास्त्री अभय कुमार दुबे ने कहा कि साहित्यकार और अन्य लोग भी कहते हैं कि हिन्दी खत्म हो रही है।  कुछ लोग 30  या  40 साल में हिन्दी के खत्म होने की भविष्यवाणी करते है जिसका कोई औचित्य नहीं है। दुबे ने जोर देकर बताया कि परिवर्तन के प्रचलित औजार अब नाकाफी हैं और उनसे कुछ हो सकने की आशा बेकार है। साहित्यकार प्रभाकर श्रोत्रिय ने कहा कि साहित्य का दृष्टिकोण उस स्थितियों का होता है, जिसमें वह रह रहा होता है, लेकिन साहित्यकार की नजर कमजोर वर्ग पर होनी चाहिए। ‘उद्भावना’ के सम्पादक अजेय कुमार ने कहा कि अमेरिका ने जितने भी हमले किये वह तेल के साम्राज्य पर कब्जा करने के लिए हुए हैं। छह लाख से ज्यादा लोग मारे गये, लेकिन रचनाकारों का ध्यान उस तरफ नहीं गया। उपन्यासकार रवीन्द्र वर्मा ने कहा कि रचनाकारों का रास्ता प्रतिरोध का ही है। इस कारण समाज का सच्चा प्रेरक साहित्यकार ही होता है। रचनाकारों के लिए शब्द कर्म है और लेखकों को जकड़बन्दी से दूर होकर अपना काम करना होगा। कहानीकार शशांक ने अपने पुत्र के प्रसंग को सुनाते हुए कहा कि नयी पीढ़ी की डिमाण्ड को भी देखना होगा, जिससे नयी पीढ़ी उस भाषा और आचरण को अपना सके। इस सत्र की अध्यक्षता कर रही उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि सब बातें हुईं लेकिन स्त्रियों पर किसी ने कोई बात नहीं की, वह तो स्त्री विमर्श ही करेंगी। उन्होंने कहा कि साहित्यकारों ने कहा कि भाषा क्षीण हो रही है, कुछ खास लिखा नहीं जा रहा है, कुछ नया सोचा भी नहीं जा रहा, जो लिखा जा रहा है उसे पढ़ा भी नहीं जा रहा है, लेकिन आधी दुनिया को निष्क्रिय मत समझिये। बहुत कुछ लिखा जा रहा है और अच्छा भी लिखा जा रहा है। जो लोग भूमण्डलीकरण और बाजारवाद पर इतना प्रहार करते हैं पहले वह अपने घर से शुरुआत करें। विदेश में कमाई करने वाला बच्चा आखिर अपने साथ सिर्फ पैसा ही नहीं लाएगा बल्कि वह पश्चिमी संस्कृति को भी देश में लेकर जरूर आएगा। उन्होंने कहा कि महिलाओं पर तो आज भी काफी बंधन हैं, पहले बंधन हटायें तो कुछ काम बने। प्रेमचंद के समय की स्त्रियों से आज बहुत भिन्न स्थितियाँ हैं. लोग कहते हैं कि किताबें महंगी हो गयी है लेकिन शराब महंगी होने की बात कोई नहीं करता।

मुद्राराक्षस के साथ स्‍वयं प्रकाश।

कथाक्रम सम्मान समारोह के दूसरे दिन चर्चा में  मौजूदा समय का सबसे बड़ा प्रश्न भूमण्डलीकरण और नयी पीढ़ी के बीच घर बनाता जा रहा बाजारवाद रहा। उपन्यासकार शिवमूर्ति ने अपने चुटीले उद्बोधन में सवाल उठाया कि प्रेमचंद ने जो दिया उसके आगे हमने क्या किया। इरोम शर्मिला बारह साल से अनशन कर रही हैं, लेकिन कोई कुछ नहीं बोलता। लेखकों को अपनी भूमिका पर विचार करना होगा। सुरक्षित रास्ता अपनाने से काम नहीं चलने वाला है। वरिष्ठ कथाकार अखिलेश ने कहा कि बहुत नया होना भी साहित्य में संभव नहीं है, इसके लिए बलि देनी होती है। आज इंसानियत को बदल देने का सपना नहीं बचा है। उन्होंने कहा कि किसी भी चुनौती और प्रश्न का मुकाबला दो तरीके से करना होता है। एक उसी के प्रभाव में बह जाया जाए या दूसरा तरीका यह होता है कि चुनौतियों का मुकाबला किया जाए और प्रतिपक्ष में हो जाएं। मुद्राराक्षस ने कहा कि हिन्दी के मुकाबले उर्दू साहित्यकारों का जन सरोकार खूब रहा है, जबकि हिन्दी लेखकों का सरोकार सही मायने में जन सरोकार नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि हिन्दी स्तरीय लेखन की प्रक्रिया से दूर होती चली जा रही है। आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि आधुनिक साहित्य की शुरुआत से ही साहित्य को अपने समय के साथ मुठभेड़ करनी होगी। प्रेमचंद ने पचहत्तर  साल पहले समय के साथ मुठभेड़ करने की शुरुआत करने की घोषणा की थी। गुलाम भारत के आजादी के आंदोलन में जनता किस प्रकार उपस्थित थी, उसका लेखा- गोदान है। प्रेमचंद ने जहाँ से शुरू किया फिर वहीं से शुरुआत करनी होगी। उन्होंने आशा जतायी कि मुख्यधारा के लेखक अपने सरोकारों की तरफ फिर से वापस होंगे। वसुधा के सम्पादक राजेन्द्र शर्मा ने मार्क्सवाद को अप्रासंगिक ठहराये जाने को हास्यास्पद बताया। युवा आलोचक पल्लव ने कहा कि अपने समय के असली सवालों को पहचानने और चिन्हित करने की जरूरत है। उन्होंने लेखक संगठनों की पुन:प्रासंगिकता के संबंध मे भी विचार रखे। वरिष्ठ रंगकर्मी राकेश ने नयेपन की वकालत करने वालों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि आखिर नया किस प्रकार किया जाए, क्या सीधे चलने की बजाय उल्टा चलना ही नयापन है। युवा कथाकार राकेश बिहारी ने कहा कि बाजार सपने बेचता है। प्रो. रमेश दीक्षित ने लोगों को खुल कर अपने सरोकारों को स्वीकार करने का आह्वान किया। प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने कहा कि अब जीवन आगे-आगे चलता है और साहित्य पीछे-पीछे। ‘पुनर्नवा’ के सम्पादक राजेन्द्र राव ने बताया कि हिन्दी साहित्य में जातीय विभाजन की रेखा खींच दी गयी है। अन्य साहित्यकारों में कथाकार  कविता, सारा राय, डा. रंजना जायसवाल, अमरीक सिंह दीप, हरीचरन प्रकाश , मूलचंद गौतम  व प्रो. वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी आदि की भी सक्रिय भागीदारी रही।

गोष्ठी में जब तब विवाद-संवाद की स्थितियाँ बनीं। पहले दिन गिरिराज किशोर ने प्रलेस पर आरोप लगाया कि अपने समारोह में प्रकाशित स्मारिका में यशपाल जैसे लेखक का चित्र न छापकर बड़ी गलती की है। वहीं अंतिम क्षणों में स्थानीय पत्रकार के. विक्रम राव के अध्यक्षीय उद्बोधन के बाद भी बोलने पर आपत्ति की जाने से थोड़ी अप्रिय स्थिति हो गई, जिसे बाद में ठीक कर लिया गया। दो दिन चले इस आयोजन में बड़ी संख्या में लेखक-पाठक जुटे।

प्रस्तुति- विशेष संवाददाता

एक अपूर्व पहल के 75 वर्ष

कहानीकार योगेंद्र आहूजा

गाजियाबाद : जन संस्कृति मंच की नवगठित गाजियाबाद इकाई और जनसत्ता सहकारी आवास समिति की ओर से वसुंधरा में कहानीकार और पहल पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन पर केंद्रित एक कार्यक्रम हुआ। इस 21 नवंबर को ज्ञानरंजन अपनी उम्र के 75 साल पूरा कर रहे हैं।
20 नवम्बर को जनसत्ता सहकारी आवास समिति के लान में आयोजित जसम, गाजियाबाद के इस पहले आयोजन का संचालन युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने किया तथा अध्यक्षता आलोचक अर्चना वर्मा ने की। आयोजन स्थल को ‘पहल’ पत्रिका के कवर की इनलार्ज छायाप्रतियों और अशोक भौमिक की पेंटिंग की छायाप्रतियों से सजाया गया था।
इरफान द्वारा ज्ञानरंजन की चर्चित कहानी ‘पिता’ के पाठ से आयोजन की शुरुआत हुई। जिसमें दो पीढि़यों के बीच जीवन मूल्यों के टकराव को बखूबी दर्शाया गया है। आज जब उपभोक्तावाद ने पूरे मध्यवर्ग की जिंदगी को सुविधाओं के साथ-साथ भीषण रूप से बेचैन, असंतुष्ट और ईष्र्यालु बना दिया है, तब इस कहानी को सुनते हुए कई बार ऐसा लग रहा था कि पिता के व्यवहार और उसके औचित्य या अनौचित्य के बारे में नए सिरे से सोचना चाहिए। कहानी में पिता सुविधाओं और महंगी चीजों से खुद को अलग रखता है, बाजार से लाई महंगी चीजों, मिठाई और फल तक नहीं लेता, उसके बेटे उसे अहंकारी और ढोंगी   समझते हैं। उन्हें वह किसी बुलंद दरवाजे की तरह लगता है, जिससे टकराकर वे खुद को पिद्दी-सा हुआ जाता महसूस कर रहे हैं।
कवि-कथाकार संजय कुंदन ने भी ज्ञानरंजन की पुस्तक ‘कबाड़खाना’ के कुछ अंशों का पाठ किया। ‘हमारे बच्चों का भविष्य जनतांत्रिक घोडों के हाथों में कैद है’ शीर्षक टिप्पणी में ज्ञानरंजन ने बचपन की स्मृतियों से गुजरते हुए आज के बच्चों की दशा पर कई मार्मिक सवाल उठाए हैं, जिसे संजय कुंदन ने पढ़कर सुनाया। जीवन के आमफहम संदर्भों में साम्राज्यवादी बाजार और उसके मनोवैज्ञानिक हमलों के प्रति सोचने-विचारने की भी एक कोशिश उनके लेखन में नजर आई।
‘ज्ञानरंजन की कहानियां और समकालीन कहानी’ विषय पर बोलते हुए कहानीकार योगेंद्र आहूजा ने कहा कि जिस तरह व्यक्तियों का जीवन और उसके संकट होते हैं, उसी तरह कहानी के साथ भी होता है। आज साठ और सत्तर के दशक जैसा कुछ नहीं है, न राजनीति और न कहानी। लेकिन 40 साल पहले लिखी ज्ञानरंजन की कहानियां उसी तरह विचलित और परेशान करती हैं, जैसी पहली बार प्रकाशित होने के बाद किया होगा। ये कहानियां वक्त के साथ ठंडी, निर्जीव, निरावेग या कालातीत नहीं हुई हैं। वे सतत समकालीन हैं। उनके बाद की तीन पीढि़यों ने उन्हें अपने समकालीन पाया है। इहलौकिक आंख से विराट जीवन और मनुष्य के मन की गहराई को देखने वाली कहानियां हैं ये। ज्ञानरंजन की कहानियां कवितोन्मुख हैं, पर कविता में बदलने से इनकार करती हैं। हंसी के कई प्रसंग हैं उनकी कहानियों में, पर वह चैप्लिन सरीखी हंसी नहीं है, बल्कि वह ऐसी हंसी है, जो धीरे-धीरे एक उदासी और फिर दर्द में बदलती जाती है।
आलोचक गोपाल प्रधान ने कहा कि जब ज्ञानरंजन की उम्र साठ के आसपास थी, तब उनकी उनसे मुलाकात हुई और तब उनकी उम्र उनसे आधी थी। मगर आधी उम्र के फर्क को उन्होंने कभी महसूस नहीं होने दिया। परिवार नाम की संस्था के इर्द-गिर्द जो एक परिवेश बनता है, जहां उम्रदराज लोग सम्मान का पात्र बन जाते हैं, वैसा ज्ञानरंजन के साथ नहीं था। सम्मान के बजाए उन्हें बहस और विवाद छेड़ने में ज्यादा रुचि रहती थी। गोपाल प्रधान ने बताया कि हम दोनों की राजनीति में फर्क था, कि उन्होंने पहल के कविता विशेषांक में गोरख पांडेय की गैरमौजूदगी पर सवाल भी उठाया था, लेकिन इसके बावजूद ज्ञानरंजन ने उनकी डायरी को पहल में छापा। उन्होंने यह भी कहा कि ज्ञानरंजन के बारे में लोगों की यह भी धारणा थी कि वे किसी के मातहत काम नहीं कर सकते थे। उन्होंने हमेशा नई प्रवृत्तियों का स्वागत किया, और पहल को सिर्फ साहित्य का पत्रिका बनने नहीं दिया।
कवि मदन कश्यप ने कहा कि प्रलेस का पुनर्गठन और पहल की शुरुआत लगभग साथ-साथ हुई। दोनों के प्रति हमलोगों का आलोचनात्मक रिश्ता रहा। इमरजेंसी के बाद प्रगतिशील लेखक संघ के भीतर जो प्रगतिशील धारा थी, उसे उन्होंने  आखिरी दिनों तक बचाए रखा। मदन कश्यप ने कहा कि विचारधारा और पार्टी के साथ होने में फर्क होता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद पहल की और भी ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका रही। पिछले पंद्रह-बीस साल में भारतीय संदर्भ में माक्र्सवादी विचारधारा और वैश्विक स्तर पर जो भी नई चीजें आईं, सबको पहल में जगह मिली। छोटे छोटे शहरों में लेखकों को पहल ने तैयार किया। उसका कोई विकल्प नहीं था। वे एक संगठन में रहते हुए भी संगठन से बढ़के थे। सांगठनिक संकीर्णता के बजाए उन्होंने पहल को वैचारिक संघर्ष की ओर उन्मुख किया।
आशुतोष कुमार का कहना था कि पहल में हर तरह के जनवादी विचारों को मंच मिला।
कवि वीरेन डंगवाल ने बताया कि किस तरह जिन दिनों ज्ञानरंजन की ‘पिता’ कहानी का बड़ा शोर था, उन्हीं दिनों नैनीताल के माहौल पर लिखी उनकी कहानी छपी तो जबलपुर से ज्ञानरंजन ने उन्हें खत लिखा, तारीफ भी की और कहानी की खामियां भी गिनाईं। वीरेन डंगवाल ने बताया कि उनकी ज्यादातर कविताएं पहल में ही छपीं। ज्ञानरंजन कविताएं बहुत पढ़ते हैं और उनके गद्य में भी कविता की झांई है। वीरेन डंगवाल ने यह भी कहा कि नागार्जुन के बाद वे दूसरे ऐसी व्यक्ति हैं, जिनकी व्याप्ति अधिक है।
पत्रकार-कहानीकार प्रियदर्शन ने कहा कि वे पहल के पाठक और विक्रेता रहे और आज भी उन्हें पहल की वैचारिक उष्मा की जरूरत महसूस होती है।
अर्चना वर्मा ने एक समय हिंदी कहानी में जो तीन तिलंगे जिस तरह छाये हुए थे, उसमें सेंध लगाने वालों में ज्ञानरंजन थे। संबंधों को तिलांजलि देने वाली उन कहानियों पर तब उचित-अनुचित की बहसें होती थीं और नई पीढ़ी का होने के कारण खुद अर्चना वर्मा तोड़-फोड़ करने वाली उस पीढ़ी के ज्यादा करीब अपने को पाती थीं। उन्होंने कहा कि ज्ञानरंजन के सरोकार तय थे, लेकिन उसके निर्धारण के बावजूद वे जिंदगी का कोई कोना नहीं छोड़ना चाहते थे।
धन्यवाद ज्ञापन जनसत्ता सहकारी समिति के अध्यक्ष मनोज मिश्र ने किया। इस मौके पर कहानीकार अल्पना मिश्र, कहानीकार अशोक गुप्त, कवि रामकुमार कृषक, कवि हीरालाल नागर, कवि संजय चतुर्वेदी , पत्रकार बिरादरी के राजेश वर्मा, अनिल दुबे, पार्थिव कुमार, अरुण त्रिपाठी, रवींद्र त्रिपाठी, पंकज श्रीवास्तव, प्रेम भारद्वाज , सुधीर सुमन, विनोद वर्मा, आलोक  श्रीवास्तव , अनुपम, चित्रकार हरिपाल त्यागी, कवि विमल कुमार, कवि रंजीत वर्मा, युवा चित्रकार अनुपम राय , आलोचक संजीव कुमार और विभास वर्मा , कवि श्याम सुशील, कवियत्री ऋतुपर्णा मुद्राराक्षस, उमा गुप्ता, उदयशंकर,  अम्बेदकर कालेज, दिल्ली और जामिया मिलिया विश्विदालय, दिल्ली  के बहुत सारे छात्र- छात्राएं  और जनसत्ता हाऊसिंग सोसाइटी के लोंग भी मौजूद थे।

आरसी चौहान की तीन कवि‍तायें

आरसी चौहान

चरौवाँ,  बलिया,  उत्‍तर प्रदेश में 08 मार्च, 1979 को जन्‍में युवा कवि‍ आरसी चौहान के गीत, कवि‍ता, लेख, समीक्षा आदि‍ का वि‍भि‍न्‍न पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशन के अलावा आकाशवाणी से प्रसारण हो चुका है। उनकी तीन कवि‍तायें-

बेर का पेड़

मेरा बचपन
खरगोश के बाल की तरह
नहीं रहा मुलायम
न ही कछुवे की पीठ की तरह
कठोर ही

हाँ मेरा बचपन
जरूर गुजरा है
मुर्दहिया, भीटा और
मोती बाबा की बारी में
बीनते हुए महुआ, आम
और जामुन

दादी बताती थीं
इन बागीचों में
ठाढ़ दोपहरिया में
घूमते हैं भूत-प्रेत
भेष बदल-बदल
और पकड़ने पर
छोड़ते नहीं महिनों

कथा किंवदंतियों से गुजरते
आखिर पहुँच ही जाते हम
खेत-खलिहान लाँघते बागीचे
दादी की बातों को करते अनसुना

आज स्मृतियों के कैनवास पर
अचानक उभर आया है
एक बेर का पेड़
जिसके नीचे गुजरा है
मेरे बचपन का कुछ अंश
स्कूल की छुट्टी के बाद
पेड के नीचे
टकटकी लगाये नेपते रहते
किसी बेर के गिरने की या
चलाते अंधाधुंध ढेला, लबदा

कहीं का ढेला
कहीं का बेर
फिर लूटने का उपक्रम
यहाँ बेर मारने वाला नहीं
बल्कि लूटने वाला होता विजयी
कई बार तो होश ही नहीं रहता
कि सिर पर
कितने बेर गिरे
या किधर से आ लगे
ढेला या लबदा

आज कविता में ही
बता रहा हूँ कि मुझे एक बार
लगा था ढेला सिर पर टन्न-सा
और उग आया था गुमड़
या बन गया था ढेला-सा दूसरा
बेर के खट्टे-मीठे फल के आगे
सब फीका रहा भाई
यह बात आज तक
माँ-बाप को नहीं बताई
हाँ, वे इस कविता को
पढ़ने के बाद ही
जान पायेंगे कि बचपन में
लगा था बेर के चक्कर में
मुझे एक ढेला
खट्टा, चटपटा और
पता नहीं कैसा-कैसा
और अब यह कि
हमारे बच्चों को तो
ढेला लगने पर भी
नहीं मिलता बेर
जबसे फैला लिया है बाजार
बहेलिया वाली कबूतरी जाल
जमीन से आसमान तक एकछत्र।

पहाड़

हम ऐसे ही थोडे बने हैं पहाड़
हमने न जाने कितने हिमयुग देखे
कितने ज्वालामुखी
और कितने झेले भूकम्‍प
न जाने कितने-कितने
युगों चरणों से
गुजरे हैं हमारे पुरखे
हमारे कई पुरखे
अरावली की तरह
पड़े हैं मरणासन्न तो
उनकी संतानें
हिमालय की तरह खड़ी हैं
हाथ में विश्व की सबसे ऊँची
चोटी का झण्‍डा उठाये।

बारिश के बाद
नहाये हुए बच्चों की तरह
लगने वाले पहाड़
खून पसीना एक कर
बहाये हैं निर्मल पवित्र नदियाँ
जिनकी कल-कल ध्वनि
की सुर ताल से
झंकृत है भू-लोक, स्वर्ग
एक साथ।

अब सोचता हूँ
अपने पुरखों के अतीत
व अपने वर्तमान की
किसी छोटी चूक को कि
कहाँ विला गये हैं
सितारों की तरह दिखने वाले
पहाड़ी गाँव
जिनकी ढहती इमारतों व
खण्डहरों में बाजार
अपना नुकीला पंजा धंसाए
इतरा रहा है शहर में
और इधर पहाड़ी गाँवों के
खून की लकीर
कोमल घास में
फैल रही है लगातार ।

नथुनिया फुआ

ठेठ भोजपुरी की बुनावट में
घड़रोज की तरह कूदता
पूरी पृथ्वी को
मंच बना
गोंडऊ नाच का नायक-                                                                                                                            ‘नथुनिया फुआ’
कब लरझू भाई से
नथुनिया फुआ बना
हमें भी मालूम नहीं भाई !
हाँ, वह अपने अकाट्य तर्कों के
चाकू से चीर फाड़कर
कब उतरा हमारे मन में
हुडके के थाप और
भभकते ढीबरी के लय-ताल पर
कि पूछो मत रे भाई !
उसने नहीं छोड़ा अपने गीतों में
किसी  सेठ-साहूकार
राजा-परजा का काला अध्याय
जो डूबे रहे मांस के बाजार में आकंठ
और ओढे रहे आडम्‍बर का
झक्क सफेद लिबास
माना कि उसने नहीं दी प्रस्तुति‍
थियेटर में कभी
न रहा कभी पुरस्कारों की
फेहरिस्त में शामिल
चाहता तो जुगाड़ लगाकर
बिता सकता था
बाल-बच्चों सहित
राज प्रसादों में अपनी जिन्‍दगी के आखिरी दिन
पर ठहरा वह निपट गँवार
गँवार नहीं तो और क्या कहूँ उसको
लेकिन वाह रे नथुनिया फुआ
जब तक रहे तुम जीवित
कभी झुके नहीं हुक्मरानों के आगे
और भरते रहे साँस
गोंडऊ नाच के फेफडों में अनवरत
जबकि…
आज तुम्हारे देखे नाच के कई दर्शक
ऊँचे ओहदे पर पहुँचने के बाद
झुका लेते हैं सिर
और हो जाते शर्मशार …।

चकमक के 300वें अंक का वि‍मोचन

चकमक के 300वें अंक का वि‍मोचन करते गुलजार, अशोक भौमि‍क व अन्य अति‍थि‍गण।

भोपाल : चकमक के 300 वे अंक के प्रकाशन के मौके को एकलव्‍य ने 21 से 23 अक्‍टूबर तक वि‍शेष समारोहपूर्वक का आयोजन कि‍या। इसमें विभिन्‍न कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें एकलव्‍य के शिक्षा और प्रकाशन के काम से जुड़े देश के विभिन्‍न हिस्‍सों से आए अतिथि और स्‍थानीय नागरिक शरीक हुए।

स्‍कूलों में बाल साहित्‍य एक विमर्श :  जश्‍न–ए-बचपन के तहत समारोह की शुरूआत 21 अक्‍टूबर, 2011 को सुबह 11 बजे से भोपाल के हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन भवन में आयोजित विमर्श ‘बच्‍चों के लिए पुस्‍तकालय’ से हुई। इसमें एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक व विख्‍यात शिक्षाविद् प्रोफेसर कृष्‍णकुमार के साथ भोपाल में बच्‍चों के पुस्‍तकालय चला रही संस्‍थाओं मुस्‍कान, समावेश और एकलव्‍य के कार्यकर्ताओं ने इस बारे में अपने अनुभव साझा किए। प्रोफेसर कृष्‍णकुमार  ने कहा कि लायब्रेरी को भारत के स्‍कूलों का अनिवार्य अंग होना चाहिए। मसला यह है कि शिक्षा पाठ्यपुस्‍तक केन्द्रित है, इसलिए कोई भी यह नहीं मानता कि पाठ्यपुस्‍तक के बिना (खासकर बच्‍चों के पढ़ने लायक किताबें)  स्‍कूल चल सकते हैं। मसला यह भी है कि बाल साहित्‍य और शिक्षा की समझ शिक्षक तक कैसे पहुँचे। शिक्षक भी खुद कोई किताब नहीं खरीदता, और सरकार ने भी उसकी भूमिका को घटाकर कक्षा प्रबंधन तक सीमित कर दिया है। मुकुल प्रियदर्शिनी ने कहा कि शिक्षक को विश्‍वास नहीं है कि बाल साहित्‍य से भाषा का विकास हो सकता है।

शिक्षा में बाल साहित्य की भूमिका पर वि‍चार व्यक्त करते प्रोफेसर कृष्णकुमार

शिक्षा में बाल साहित्‍य की भूमिकाएक सम्‍वाद : 21 अक्‍टूबर, 2011 को ही टीटीटीआई सभागार में इस विषय पर हुए सम्‍वाद में प्रोफेसर कृष्‍णकुमार, मुकुल प्रियदर्शिनी और उदयन वाजपेयी ने विचार रखे। प्रोफेसर कृष्‍णकुमार ने कहा कि शिक्षा और साहित्‍य मे बैर है। साहित्‍य मुक्‍त करता है, शिक्षा बांधती है। साहित्‍य कल्‍पना और नये विचार देता है और शिक्षा सूचनायें, जानकारी और तथ्‍य रटवाती है। इस अन्‍तर्विरोध के कारण स्‍कूलों में साहित्‍य को जगह पाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उदयन वाजपेयी ने कहा कि बाल साहित्‍य पश्चिम से आई अवधारणा है। भारतीय समाज में तो बच्‍चे और बड़े सभी मिलकर लोककथाओं को सुनते रहे हैं। बच्‍चों के लिए अलग साहित्‍य के विचार ने बच्‍चों को अकेला कर दिया है। मुकुल प्रियदर्शिनी ने कहा कि शिक्षा के नये कानून में स्‍कूल में पुस्‍तकालय अनिवार्य कर दिया गया है। इस प्रस्‍तावित पुस्‍तकालय को जीवन्‍त बनाने की कोशिश करने पर शिक्षा और साहित्‍य के बीच रि‍श्‍ता बन सकेगा।

बाल साहित्‍य की वर्तमान चुनौतियां एक मंथन :  22 अक्‍टूबर को भारत भवन के अन्‍तरंग प्रभाग में सुबह साढ़े दस बजे से इस पर मंथन हुआ। इसमें गुलजार, सुशील शुक्‍ल, उदयन वाजपेयी, दिलीप चिंचालकर, राजा मोहन्‍ती और अनुष्‍का रविशंकर ने विचार रखे। गुलजार ने कहा कि कोई भी साहित्‍य जो बच्‍चों का मनोरंजन करता है, उसे बड़ों का मनोरंजन भी करना चाहिये। हमारे यहाँ बच्‍चों के लेखक इसलिए नहीं हैं, क्‍योंकि बच्‍चों के लिए लिखने के लिए बच्‍चा होना पड़ता है जो बहुत कठिन है। बच्‍चों गाय सफेद दूध देती है और अपनी पूँछ से मक्‍खी उड़ाती है, इस तरह का लेखन बच्‍चों का लेखन नहीं है ।

चकमक के सम्‍पादक सुशील शुक्‍ल ने कहा कि बच्‍चों के पास न तो विषय की सीमा है, न उनके पास भाषा का अकाल है। पर बड़ों के मन में बचपन की जो नकली छवि है, उसके कारण लेखक उनसे लिजलिजी भाषा में परियों और जादूगरों की बात करते हैं। बच्‍चों के जीवन में रोज मिलने वाले आसपास के लोग मोची, मजदूर और काम वाली बाई उनके साहित्‍य से बाहर ही रह जाते हैं।

उदयन वाजपेयी ने कहा कि बच्‍चे के लिए लिखना, बच्‍चे को ढूँढने की तरह है। सृजनशीलता का सारा संघर्ष अपने अन्‍दर के बच्‍चे को बचाये रखना है। यह सिर्फ लेखक का नहीं बहुत से बच्‍चों का बचपन होता है। अनुष्‍का रविशंकर ने कहा कि किताबें पढ़ने के आनन्‍द के लिए हैं। मैं नानसेंस लिखती हूँ, क्‍योंकि लेखन का अर्थ तो पाठक के मन में खुलता है। चित्रकार दिलीप चिंचालकर ने कहा कि वयस्‍क को बच्‍चे के लिए लिखने के लिए अपने अन्‍दर के बच्‍चे को जगाना चाहिए।

चकमक के 300वें अंक का विमोचन :  चकमक के 300वें अंक के विमोचन का समारोह 22 अक्‍टूबर को भारत भवन के अन्‍तरंग प्रभाग में शाम 5 बजे से शुरू हुआ। इस मौके पर बड़ों के साथ एकलव्‍य के अन्‍य केन्‍द्रों से आए 100 से अधिक बच्‍चे भी भारत भवन के अन्‍तरंग सभागार में मौजूद थे। गुलजार ने रविन्‍द्रनाथ टैगौर द्वारा लिखित बच्‍चों की कविताओं का पाठ किया। प्रयाग शुक्‍ल ने अपनी कुछ कवितायें बच्‍चों के साथ गाईं। चकमक का विमोचन इससे जुड़े बहुत से बच्‍चों और बड़ों ने गुलजार के साथ मिलकर किया।

गुरुजी विष्‍णु चिंचालकर पर फिल्‍म का प्रदर्शन : 23 अक्‍टूबर को सुबह 10 बजे से भारत भवन के अन्‍तरंग प्रभाग में विष्‍णु चिंचालकर के काम और उनके दर्शन पर आधारित फिल्‍म का प्रदर्शन किया गया।

टैगौर के चित्रों पर अशोक भौमिक की प्रस्‍तुति : फिल्‍म प्रदर्शन के बाद चित्रकार अशोक भौमिक ने रविन्‍द्रनाथ टैगौर के चित्रों के बारे में बनाये गये स्‍लाइड शो का प्रदर्शन किया। इसमें उन्‍होंने तत्‍कालीन यूरोपियन चित्रकला से टैगौर के चित्रों की भिन्‍नता, टैगौर के चित्रों की विषयवस्‍तु, उनकी शैली और खासियत के बारे में विचार रखे।

कहानी पाठ करते असगर वजाहत

कहानी पाठ : इसी दिन दोपहर 3 बजे से कहानी पाठ आयोजित हुआ। इसमें वरुण ग्रोवर, रिनचिन, प्रियम्‍वद, मंजूर एहतेशाम और असगर वजाहत ने कहानियाँ सुनाईं।

कविता पाठ : इसके बाद गुलजार, नरेश सक्‍सेना, उदयन वाजपेयी और प्रयाग शुक्‍ल ने अपनी कवितायें सुनाईं। किन्‍हीं कारणों से विनोदकुमार शुक्‍ल इस आयोजन में शामिल नहीं हो सके। उनकी कविता नरेश सक्‍सेना ने सुनाई।

बच्‍चों की गतिविधियाँ : इसी बीच भारत भवन के वागर्थ प्रभाग में बच्‍चों की गतिविधियां सम्‍पन्‍न हुईं। इसमें भोपाल शहर के विभिन्‍न स्‍कूलों, संस्‍थाओं और एकलव्‍य के कार्यक्रमों से जुड़े लगभग 550 बच्‍चों ने भाग लिया। बच्‍चों के लिए गतिविधियों के विभिन्‍न कार्नर रखे गए थे। इसमें विषय विशेषज्ञों के सहयोग से बच्‍चों ने मिट्टी के खिलौने, क्राफट, विज्ञान के प्रयोग, ओरीगामी, मुखौटे, अखबार की टोपी और दीवार अखबार बनाने जैसे रचनात्‍मक काम किए।

यशस्वी कथाकार ज्ञानरंजन पर वि‍शेष कार्यक्रम 20 को

ज्ञानरंजन

गाजि‍याबाद : यशस्वी कथाकार और सम्पादक ज्ञानरंजन 21 नवम्‍बर को 75 वर्ष के हो रहे हैं। इस मुबारक मौके की पूर्वसंध्या 20  नवंबर को उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर चर्चा करने के लि‍ए जन  संस्कृति मंच, गाज़ियाबाद  और जनसत्ता सहकारी  आवास समिति, वसुंधरा, गाज़ियाबाद की ओर से वि‍शेष कार्यक्रम ‘एक अपूर्व पहल के 75 वर्ष’ का आयोजन कि‍या जा रहा है। कार्यक्रम लॉन, जनसत्ता सहकारी आवास समिति, सेक्टर-9, वसुंधरा, गाज़ियाबाद में शाम 3.30 से शुरू होगा।

इस अवसर पर ज्ञानरंजन की कहानी ‘पिता’ का पाठ इरफ़ान करेंगे। उनकी किताब ‘कबाड़खाना’ के कुछ अंशों  का पाठ संजय कुंदन करेंगे। ज्ञानरंजन की कहानियाँ  और समकालीन कहानी पर योगेन्द्र आहूजा, पहल और आपातकालोत्तर सांस्कृतिक संघर्ष पर मदन कश्यप, उत्तर भारत में पोस्टर कला के विकास में ज्ञानरंजन और ‘पहल’ की भूमिका पर अशोक भौमिक, ‘पहल’ और हमारी कविता पीढी़ पर वीरेन डंगवाल तथा ज्ञानरंजन की विरासत पर मंगलेश  डबराल वि‍चार व्‍यक्‍त करेंगे। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता विश्वनाथ त्रिपाठी और संचालनक आशुतोष कुमार करेंगे। धन्यवाद ज्ञापन जनसत्‍ता आवास समि‍ति‍ के अध्‍यक्ष मनोज मिश्र देंगे।