Archive for: October 2011

कथाकार स्वयं प्रकाश को कथाक्रम सम्मान

स्वयं प्रकाश

लखनऊ  : वरिष्ठ कथाकार  स्वयं प्रकाश को वर्ष-2011 के प्रतिष्ठित ‘आनंद सागर कथाक्रम सम्मान’ से नवाजा जाएगा। कथाक्रम के संयोजक शैलेन्द्र सागर ने बताया कि स्वयं प्रकाश को यह पुरस्कार 12-13 नवम्बर को आयोजित होने वाले ‘कथाक्रम-2011’ कार्यक्रम के अवसर पर प्रदान किया जाएगा। यह निर्णय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त प्रख्यात लेखक श्रीलाल शुक्ल की अध्यक्षता वाली कथाक्रम सम्मान समिति द्वारा लिया गया है। कथा लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान करने वाले लेखक को प्रतिवर्ष दिये जाने वाले इस पुरस्कार के तहत 15 हजार रुपये नकद तथा प्रशस्ति पत्र दिया जाता है।

20 जनवरी 1947 को इंदौर में जन्मे स्वयं प्रकाश अपनी कहानियों और उपन्यासों के लिये विख्यात हैं। वह अब तक पाँच उपन्यास लिख चुके हैं, जबकि उनके नौ कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इससे पहले स्वयं प्रकाश को राजस्थान साहित्य अकादमी तथा पहल सम्मान पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। मूलत: राजस्थान के निवासी स्वयं प्रकाश के कथा साहित्य में वैज्ञानिक सोच और सहजता का अनूठा और विरल संगम है। उनकी रचनायें  पाठकों को  अपने साथ बहाकर ले जाते हुए वैचारिक रूप से उद्वेलित और समृद्ध भी  करती  हैं। अपनी अधिकतर रचनाओं में वह मध्यमवर्गीय जीवन के विविध पक्षों को सामने लाते हुए उनके अंतर्विरोधों,  कमजोरियों और ताकतों को कुछ इस तरह से प्रस्तुत करते हैं कि वे हमारे अपने अनुभव संसार  का हिस्सा बन जाते हैं। साम्प्रदायिकता एक और ऐसा इलाका है जहाँ स्वयं प्रकाश की रचनाशीलता  अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रदर्शित होती है। स्वयं प्रकाश की खिलंदड़ी भाषा और अत्यधिक सहज शैली का उन्हें हमारे समय के सर्वाधिक लोकप्रिय कथाकार बनाने में बड़ा योगदान है।

 

ओ.एन.वी. कुरुप की तीन कवितायें

ओ.एन.वी. कुरुप

27 मई 1931 को कोल्लम जिले के चवरा गाँव में ज‍‍न्‍में मलयालम के लब्धप्रतिष्ठ कवि ओ.एन.वी. कुरुप (ओट्टप्लाक्कल् नीलकंठन वेलु कुरुप) का रचना संसार काफी विस्‍तृत है। उन्‍हें साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार, ज्ञानपीठ पुरस्‍कार, केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार, केरल साहित्य अकादमी फेलोशिप, केरल विश्वविद्यालय से डी.लिट की उपाधि, पद्मश्री आदि से सम्‍मानित किया जा चुका है। सोवियत संघ, युगोस्लेविया, अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी आदि कई देशों में देशों की यात्रायें की। कविता, डायरी, अनुवाद आदि विभिन्‍न विधाओं में 35 किताबें प्रकाशित। उनकी तीन कवितायें। इनका अनुवाद मलयालम के युवा कवि और बहुभाषी अनुवादक संतोष अलेक्‍स ने किया है-

अपराधों का बयान

आज राह चलते दिखाई दी दीनता
व सुनाई पडे़ रूदन
मेरा पीछा करती है
जो अब भी मेरे दिल में हैं

वह पीडा़
शायद अदृश्य सलीब है
मेरी आत्मा की स्वर्णिम मूर्ति
उसे वहन करती है

इस दोरूखी जीवन में
मुश्किल रास्तों से गुजरते हुए
मुझे दिल की बात सुनाई देती है

दूसरों के दर्द में
तेज होती है मेरे दिल की धड़कन
शायद यही है मेरा बल
और मेरी दुर्बलता

मै अच्छे दिनों और अच्छे लोगों का
स्वप्न देखता हूँ
शायद यही मेरी बीमारी है
क्या इसका कोई इलाज है ?

छूने पर बजते तार-सी
कस गई है मेरी नसें
मेरे मन से रिसते हैं गीत
जैसे घाव से रिसता है खून

आज भी

आज भी आकाश घना है
कहीं सलीब पर
आज भी हमें प्यार करनेवाला
झटपटा रहा होगा

आज भी किसी रईस के भोज में
गरीब के मेमने को छीनकर
कोई वध कर रहा होगा 

आज भी कहीं
अपनों के खून से कोई
आँगन का लीपा-पोती कर रहा होगा 

आज भी आकाश घना है
कहीं एक बेचारी बहन पर
कोई अत्याचार कर रहा होगा

आज भी पडो़सी के
अँगूर के बाग को
कोई तबाह कर रहा होगा

आज भी हजारों गालों पर
खिलनेवाले केसर के फूलों को कोई
हड़प रहा होगा

आज भी थोडी़ से मृत सपनों के लिए
किसी के सीने में
जल रही होगी चिता

आज भी खुशी से
उड़ रहे नन्हे कपोत को
कोई बाण से गिरा रहा होगा

आज भी एक अधनंगे
बूढे़ को नमस्कार कर
कोई गोली चला रहा होगा

आज भी
आकाश घना होने पर
मेरा मन अंधकार से भर जाता है
क्या आज सूर्यास्त के बाद
सूरज फिर नहीं उगेगा ?

तू

यहाँ पहुँचते वसंत की जीभ को
तूने उखाड़ दिया
चिडियों की चोंच से
कोई आवाज नहीं निकलती 

तूने वसंत के सौभाग्य को
हड़प लिया
देख
अब यहाँ गंधहीन फूल खिले हैं

नदी में तैरते मछली परिवार को
तूने तबाह कर दिया
नदी भी तेरे द्वारा तोडे़ गए
दर्पण के टुकड़ों-सी
बिखरी पडी़ है

तू मनुष्य को धीमी गति से मरने की
गोलियों बेचकर
धनी बना
और अब खुद दवा के इंतजार में है
तू साँस लेता है हवा में
और पेय जल में
और इनमें मृत्यु का चारा टांगता है
जिस टहनी पर बैठा हुआ है
उसी को खुद काटता है

तू आँखें मलते उठते शहर को
विषैली गैस का कफन ओढ़ाकर
हमेशा के लिए सुलाता है

अगली शताब्दी का
इंतजार करती काली चिडिया का
गला घोंटता है तू
निषाद ! बंद कर यह सब !

जनवादी लेखक संघ की ओर से श्रीलाल शुक्‍ल को श्रद्धांजलि

नई दिल्‍ली : जनवादी लेखक संघ हिंदी के मूर्धन्य कथाकार श्रीलाल शुक्ल के आकस्मिक निधन पर गहरा शोक व्यक्त करता है। वह पिछले काफ़ी अरसे से बीमार थे।
श्रीलाल शुक्ल का जन्म 31 दिसंबर, 1925 को लखनऊ के अतरौली गाँव में हुआ था। वह एक प्रतिभाशाली छात्र थे। वह 1949 में राज्य सिविल सेवा में आये और सरकार के अनेक उच्च पदों पर काम किया और 1983 में सेवानिवृत्त हुए। श्रीलाल शुक्ल का पहला उपन्यास, ‘सूनी घाटी का सूरज’, 1957 में प्रकाशित हुआ था। उसके बाद ‘अंगद का पांव'(1958), और फिर उसके दस साल बाद ‘राग दरबारी’ (1968) प्रकाशित हुआ जिसने हिंदी कथा साहित्य में हलचल मचा दी क्योंकि उसमें चित्रित यथार्थ एक दम नये नज़रिये से लैस था, जो पुरानी मान्यता, ‘अहा ग्राम्यजीवन भी क्या है’ से हट कर समाज की कड़वी सचाई हमारे सामने रख देता है। इसी उपन्यास पर उन्हें 1969 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उसके बाद उनकी रचनाशीलता लगातार सक्रिय रही और एक के बाद एक उपन्यास प्रकाशित होते रहे, जिनमें ‘आदमी का ज़हर'(1972), ‘सीमाएं टूटती हैं'(1973), ‘मकान'(1976), ‘पहला पड़ाव'(1987), ‘विस्रामपुर का संत'(1998), ‘राग विराग'(2001) विशेष उल्लेखनीय हैं। बच्चों के लिए एक उपन्यास, ‘बब्बर सिंह और उसके साथी’ भी 1999 में प्रकाशित हुआ। इनके अलावा उनके चार कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। उनके कुछ उपन्यास अंग्रेज़ी और बांग्ला में भी अनूदित हुए। उनके व्यंग्य संग्रह, अनुवाद भी प्रकाशित हुए। इस तरह उन्होंने हिन्‍दी साहित्य को अपने प्रभूत लेखन से समृद्ध किया। उनके इस अभूतपूर्व अवदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2008 में पद्मभूषण से अलंकृत किया। उन्होंने व्यास सम्मान और ज्ञानपीठ पुरस्कार समेत दर्जनों पुरस्कार व सम्मान और पाठकों का स्नेह और आदर अर्जित किया। 1992 में जयपुर में जनवादी लेखक संघ के केन्‍द्रीय सम्मेलन के वह विशिष्ट अतिथि थे। उनका अध्यक्षीय भाषण भारत भर के कोने-कोने से आये लेखकों के लिए बहुत ही प्रेरणादायक था। हिन्‍दी साहित्य ने आलोचनात्मक यथार्थवाद का एक सशक्त चितेरा खो दिया, यह क्षति अपूरणीय ही है।
जनवादी लेखक संघ उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है, और उनके परिवारजनों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदनायें व्यक्त करता है।

(जलेस के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और  चंचल चौहान की ओर से जारी )

 

 

वरिष्ठ साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का निधन

श्रीलाल शुक्ल

लखनऊ : साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का शुक्रवार (28 अक्टूबर, 2011) सुबह लखनऊ के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 86 वर्ष के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे।
शुक्ल को सांस में तकलीफ के बाद 16 अक्टूबर को अस्पताल में दाखिल कराया गया था। श्रीलाल शुक्ल के परिवार में एक पुत्न तथा तीन पुत्नियाँ है। उनकी पत्नी का निधन कुछ वर्ष पहले हो चुका है।
श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को संयुक्त रूप से वर्ष 2009 के लिए 45वें ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए चुना गया था। उत्तंर प्रदेश के राज्यपाल बी.एल.  जोशी ने 18 अक्टूबर को अस्पताल के आईसीयू में ही उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया था।
श्रीलाल शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश में सन् 1925 में हुआ था तथा उनकी प्रारम्भिक और उच्च शिक्षा भी उत्तर प्रदेश में ही हुई। उनका पहला प्रकाशित उपन्यास ‘सूनी घाटी का सूरज’ (1957)  तथा पहला प्रकाशित व्यंग ‘अंगद का पाँव’  (1958) है। स्वतंत्रता के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन की मूल्यहीनता को परत दर परत उघाड़ने वाले उपन्यास ‘राग दरबारी’ (1968) के लिये उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शुक्ल को भारत सरकार ने 2008 मे पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया था।

रामनरेश राम भोजपुर के क्रांतिकारी सपूत : स्वदेश भट्टाचार्य

रामनरेश राम

आरा/भोजपुर : बिहार के कम्युनिस्ट आन्‍दोलन के मशहूर नेता और भोजपुर के क्रांतिकारी किसान आंदोलन के संस्थापक कामरेड रामनरेश राम के प्रथम स्मृति दिवस के मौके पर भाकपा (माले) की ओर से 26 अक्टूबर को आरा में संकल्प सभा आयोजित की गई तथा सहार में उनके स्मारक का शिलान्यास किया गया। जनांदोलनों के दौरान फर्जी मुकदमों में फँसाए गए आरा जेल में बंद राजनीतिक बंदियों ने भी रामनरेश राम को याद किया।

आरा में आयोजित संकल्प सभा को सम्‍बोधित करते हुए भाकपा (माले) के पोलित  ब्यूरो सदस्य कामरेड स्वदेश भट्टाचार्य ने कहा कि रामनरेश राम भोजपुर के क्रांतिकारी सपूत थे। एकाध बार तो कोई भी अच्छा काम कर लेता है, लेकिन जिन्‍दगी भर तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए अच्छा काम करने का नाम रामनरेश राम हैं। भोजपुर में उन्होंने जिस क्रांति की मशाल जलाई उससे बिहार ही नहीं, बल्कि पूरा देश रोशन  हुआ। उन्होंने कहा कि दीपावली का जो दीया है, वह सिर्फ रोशनी ही नहीं करता, बल्कि जो कीड़े-मकोड़े होते हैं, उसको भी जलाकर राख कर देता है। आज इस देश में भ्रष्टाचार, लूट और अपराध के जो कीड़े-मकोड़े हैं, उनको खत्म करने के लिए जिस बड़ी लड़ाई की जरूरत है, उसकी विरासत रामनरेश राम दे गए हैं। सिर्फ उत्पीडि़त जन ही नहीं, बल्कि समाज में जो भी भ्रष्टाचार और लूट के विरोधी हैं, जो अपराधी नहीं हैं, जो लोकतंत्रपसंद ईमानदार लोग हैं, उन सबको बदलाव के संघर्ष के लिए एकजुट होना होगा, इसी तरीके से रामनरेश राम के अधूरे कामों को पूरा किया जा सकता है। उन्‍होंने सामाजिक बदलाव और गरीब-मेहनतकशों की राजनीतिक दावेदारी को कायम करने में रामनरेश राम की ऐतिहासिक भूमिका पर केन्द्रित एक पुस्तिका का लोकार्पण भी किया। इससे पहले  कामरेड सुधीर सुमन ने रामनरेश राम की कम्युनिस्ट आंदोलन में निभाई गई बहुआयामी भूमिका की चर्चा की। उनकी स्मृति में एक मिनट का मौन रखा गया तथा उनके चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। इस मौके पर अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामेश्‍वर प्रसाद और राष्ट्रीय महासचिव धीरेंद्र झा, पूर्व विधायक अरुण सिंह, राज्य कमेटी सदस्य सुदामा प्रसाद, केंद्रीय कमेटी सदस्य अमर, स्वामी सहजानंद सरस्वती विचारमंच के आग्रेनन्‍द चौधरी, प्रो. पारसनाथ सिंह, प्रो. रामतवक्या सिंह, प्रो. तुंगनाथ चौधरी,  डॉक्टर बीके प्रसाद,  डॉक्‍टर आशुतोष कुमार, डॉक्‍टर सुनीति प्रसाद समेत शहर के कई गणमान्य नागरिक और बुद्धिजीवी मौजूद थे। संकल्प सभा में आए नागरिकों और बुद्धिजीवियों का स्वागत राजनाथ राम ने किया।

सहार (भोजपुर) प्रखंड मुख्यालय में सोन के किनारे रामनरेश राम के स्मारक का शिलान्यास भी किया गया। शिलान्यास स्वदेश भट्टाचार्य ने किया। गरीब-मेहनतकश समुदाय के स्थानीय निवासी और पार्टी कैडर मैनेजर ठाकुर ने स्मारक के लिए अपनी जमीन दी है। इस मौके पर खेत मजदूर सभा के जिला अध्यक्ष सिद्धनाथ राम ने झंडातोलन किया तथा उपस्थित पार्टी कार्यकर्ताओं, समर्थकों और आम जनता को संबोधित करते हुए कहा कि 18 साल की उम्र में अंग्रेज भगाओ आंदोलन से रामनरेश राम की जो राजनीतिक यात्रा शूरू हुई थी, उसमें वह कभी विचलित नहीं हुए, कभी भटके नहीं। शोषक-उत्पीड़क जमींदार वर्ग को उन्होंने सबक सिखाया और एक गाँव से जो लड़ाई शुरू हुई उसे सैकड़ों गांवों तक फैलाया। उन्होंने मेहनतकश किसानों के सारे जरूरी मुद्दों पर आंदोलन संगठित किए और कम्युनिस्ट आंदोलन को एक नया क्रांतिकारी रास्ता दिया।

खेत मजदूर सभा के जिला सचिव कामता प्रसाद सिंह ने कहा कि कभी भोजपुर सामंतों का गढ़ था, गरीब-शोषित-उत्पीडि़त जनता को खाट पर बैठने, जूते और अच्छे कपड़े पहनने तक का अधिकार नहीं था। उनकी  औरतों की मान-मर्यादा सुरक्षित नहीं थी। उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं था। रामनरेश राम और उनकी पार्टी के साथियों ने इस सामाजिक स्थिति को बदलने का ऐतिहासिक काम किया। नीतीश सरकार के कार्यकाल में सामंती शक्तियाँ फिर सर उठा रही हैं और उत्पीड़न व दमन के इतिहास को फिर से कायम करना चाहती हैं, जिनके खिलाफ रामनरेश राम की विरासत को लेकर संघर्ष को तेज करना होगा। नीतीश के विकास का मॉडल बिहार के गरीबों, खेत मजदूरों और लाखों मेहतनकश किसानों के हित में नहीं है।

स्मारक शिलान्यास के मौके पर आयोजित जनसभा के मुख्य वक्ता अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा के राष्ट्रीय महासचिव धीरेंद्र झा ने कहा कि का. रामनरेश राम ने कम्युनिस्टों की विरासत के साथ-साथ हिंदुस्तान में सामाजिक बदलाव की जो सदियों की विरासत है, उसे लेकर वामपंथी आंदोलन को नया तेवर दिया। जिसे कभी कबीर ने कहा था- कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ/जो घर फूँके आपना चले हमारे साथ, अपने समय में वैसी ही भूमिका रामनरेश राम ने निभाई। 1857 से लेकर भगतसिंह से होते हुए 1942 के आंदोलन और तेलंगाना व नक्सलबाड़ी विद्रोह की समर्पण और त्याग की जो लंबी राजनीतिक परंपरा है, उसकी विरासत को उन्होंने आगे बढ़ाने का काम किया। वह सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, पर आज भी हमारे मार्गदर्शक हैं और आज की परिस्थितियों में पूरे हिंदुस्तान की राजनीति को दिशा देने वाले प्रकाश स्तम्‍भ हैं।

उन्‍होंने कहा कि रामनरेश राम मानते थे कि आजादी जब तक गरीबों के घर तक नहीं पहुँचेगी तब तक उसका कोई मतलब नहीं है। आज जहाँ रोजाना 20 रुपये की आमदनी में करोड़ों लोग जीवन गुजारने को विवश हैं, वहां सवाल उठता है कि केंद्र से लेकर बिहार तक सरकारें जो विकास का शोर मचा रही हैं, उससे किसका विकास हो रहा है? जब देश के करोड़ों मजदूर किसान बदहाल हैं, नौजवान बेरोजगार हैं, तो इसका हिसाब तो लेना ही पड़ेगा कि ये रंगबिरंगी पार्टियों की सरकारें किनका विकास कर रही हैं। यह सिर्फ भाकपा (माले) की राजनीतिक दिशा का मामला नहीं है, बल्कि यह इस देश की बहुत बड़ी आबादी की जिंदगी से जुड़ा बेहद जरूरी सवाल है। महंगाई और भ्रष्टाचार की मार सबसे ज्यादा इसे ही झेलनी पड़ रही है। इसलिए जरूरी यह है कि गरीब-मेहनतकशों की एक बड़ी राजनीतिक गोलबंदी के जरिये मौजूदा सरकारों को बदला जाए, जो एक ओर तो साम्राज्यवादपरस्त नीतियों को बढ़ावा दे रही हैं और पूंजीपतियों के हित में काम कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर समाज में सामंती-सांप्रदायिक-रूढि़वादी शक्तियों को बढ़ावा दे रही हैं। बिहार में जिन सामंती शक्तियों को गरीबों ने अपनी लड़ाइयों के जरिये कमजोर किया था, विज्ञापन के बल पर काम करने वाली नीतीश सरकार उन्हें ही मजबूत कर रही है। इसके खिलाफ 21 नवंबर को पटना में भाकपा (माले) की रैली में बिहार के गरीब-मेहनतकश लोग, महिला, नौजवान और समाज के लोकतंत्रपसंद नागरिक बुद्धिजीवी बड़ी संख्या जुटेंगे और नीतीश सरकार के विकास की असलियत का पर्दाफाश करेंगे तथा भ्रष्टाचार और लूट के खिलाफ जमीनी स्तर पर विकास के लिए एक बड़ी जनगोलबंदी के साथ एक नई लड़ाई का शुरुआत करेंगे। पिछले साल पटना में आयोजित ‘जनाधिकार रैली’ में रामनरेश राम ने ऐसी ही बड़ी जनगोलबंदी और जुझारू जनसंघर्ष का आह्वान किया था।

जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने रामनरेश राम पर केंद्रित जनगीत सुनाए। संचालन रामकिशोर राय  ने किया।
आरा जेल में भी डिग्री यादव,  सतीश, महेंद्र सिंह और हरेराम के नेतृत्व में करीब 350 कैदियों ने एक स्मृति सभा करके रामनरेश राम की विरासत को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

ज्ञात हो कि पिछले साल विधानसभा चुनाव के बीच ही ब्रेन हेमरेज से का. रामनरेश राम का निधन हो गया था।

रामनरेश राम : सामाजिक बदलाव के नायक

रामनरेश राम

कम्युनिस्ट आंदोलन के मशहूर नेता और सामाजिक बदलाव के नायक कामरेड रामनरेश राम के 26 अक्‍टूबर को पहले स्मृति दिवस पर भाकपा (माले) की ओर से संकल्प सभा का आयोजन किया जा रहा है। भाकपा (माले) की ओर से सामाजिक बदलाव और गरीब-मेहनतकशों की राजनीतिक दावेदारी को कायम करने में उनकी ऐतिहासिक भूमिका पर केन्द्रित एक पुस्तिका का लोकार्पण भी किया जाएगा। इसका लोकार्पण पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य स्वदेश भट्टाचार्य करेंगे। पिछले साल विधानसभा चुनाव के बीच ब्रेन हेमरेज से रामनरेश राम का निधन हो गया था। उनके जीवन और सामाजिक बदलाव में उनकी भूमिका पर आलेख-

सन् 1924 में सहार प्रखण्‍ड के एकवारी गाँव में एक भूमिहीन दलित परिवार में जन्मे कामरेड रामनरेश राम 18-19 साल की उम्र में ही 1942 के आन्‍दोलन में शामिल हो गए थे। भगतसिंह और उनके साथियों के इंकलाबी विचारों और स्वामी सहजानन्‍द सरस्वती के नेतृत्व में चले किसान आन्‍दोलन का उनपर गहरा प्रभाव पड़ा था। 1947 में जो आजादी मिली, उससे बहुत सारे क्रान्तिकारियों की तरह वह सन्‍तुष्ट नहीं थे। उन्हें लग रहा था कि आजादी की घोषणा तो हो गई है, पर यह जमींदार और पूंजीपतियों की ही आजादी है और व्यवस्था के जनविरोधी स्वरूप में कोई बदलाव नहीं आया है। एक ओर कांग्रेसी सत्ता की बंदरबाट में लगे हुए थे, तो दूसरी ओर तेलंगाना किसान विद्रोह हो रहा था। रामनरेश राम तेलंगाना किसान आन्‍दोलन के समर्थन में और क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों के फाँसी के खिलाफ कम्युनिस्ट आन्‍दोलन में शामिल हुए और देश के करोड़ों शोषित-वंचित-मेहनतकश लोगों के लिए असली आजादी और वास्तविक लोकतंत्र की लड़ाई में आगे बढ़ चले। जनकवि रमाकांत द्विवेदी रमता समेत उस दौर के कई ईमानदार स्वाधीनता सेनानी उनके साथ थे। जब कम्युनिस्ट पार्टी प्रतिबंधित थी, तब रामनरेश राम उसमें शामिल हुए और शाहाबाद जिला कमेटी के सदस्य बनाए गए। उन्हें किसान सभा की जिम्मेवारी मिली। 1954 में उन्होंने सोन नहर में पटवन का टैक्स बढ़ा देने के खिलाफ जबर्दस्त आन्‍दोलन संगठित किया।

उनके लिए राजनीति जनता के संसाधनों को लूटकर घर भरने का माध्यम नहीं थी। उन्होंने गरीब-मेहनतकश लोगों की आजादी और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए राजनीति की और उसमें अपना पूरा जीवन लगा दिया। जनता के बुनियादी संघर्षों से वह कभी अलग नहीं हुए। उनकी राजनीति की दिशा गरीब, भूमिहीन खेत मजदूर और मेहनतकश किसानों के बुनियादी जनसंघर्षों के अनुसार तय होती रही। 1965 में वह भूस्वामियों के विरोध और साजिशों को धता बताते हुए एक बड़ी जनवादी गोलबन्‍दी के जरिये एकवारी पंचायत के मुखिया बने। भारत के नये लोकतंत्र का हाल यह था कि उनका मुखिया बनना भूस्वामी बर्दास्त नहीं कर पा रहे थे। जब 1967 में उन्होंने सीपीएम के उम्मीदवार के बतौर सहार विधानसभा का चुनाव लड़ा तो उन्होंने उनके चुनाव एजेंट जगदीश मास्टर पर जानलेवा हमला किया। तब तक नक्सलबाड़ी विद्रोह हो चुका था। चारु मजुमदार के नेतृत्व में भाकपा (माले) का निर्माण हो चुका था। लेकिन पश्चिम बंगाल में भीषण दमन और बिखराव के कारण पार्टी धक्के का शिकार थी, लेकिन जैसे ही उस विद्रोह की चिंगारी एकवारी पहुंची तो एक शक्तिशाली सामंतवाद विरोधी आंदोलन फूट पड़ा। 1974 में पार्टी का पुनर्गठन हुआ। 1975 तक जगदीश मास्टर, रामेश्वर यादव, शीला, अग्नि, लहरी, बूटन मुसहर और भाकपा (माले) के दूसरे महासचिव सुब्रत दत्त भी शहीद हो गए। रामनरेश राम को पुलिस सूँघती फिरती रही और हर मुठभेड़ के बाद उनकी मौत की खामख्याली पालती रही। लेकिन भूमिगत स्थिति में ही भाकपा (माले) को व्यापक जनाधार वाली पार्टी बनाने का उनका अभियान जारी रहा। उन्हीं के नेतृत्व में माले ने खुले मोर्चे आईपीएफ के जरिये चुनाव में शिरकत की शुरुआत की। उस वक्त उन्होंने कम्युनिस्टों की चुनाव में भागीदारी के सवाल पर एक पुस्तिका भी लिखी। इसके पहले ‘भोजपुर के समतल की लड़ाई’ नाम की एक पुस्तिका भी उन्होंने लिखी थी।

वह हमेशा संघर्ष के सारे रूपों को मिलाते हुए जनता के संघर्ष को संचालित करते रहे। उनकी राजनीति कभी भी हथियारों या धन की आश्रित नहीं रही, हमेशा उसके केन्‍द्र में जनता और उसकी पहलकदमी रही। जातीय दायरे को तोड़ते हुए उन्होंने गरीबों, खेत मजदूरों, किसानों, नौजवानों और लोकतंत्रपसंद-न्यायपसंद लोगों का एक व्यापक मोर्चा बनाने की कोशिश की। उन्‍होंने दलित परिवार में जन्म लिया, पर कभी भी दलित-पिछड़ों के नाम पर शासकवर्ग द्वारा संचालित जातिवादी राजनीतिक धाराओं के साथ नहीं गये। उन्होंने जीवन में वर्ग-संघर्ष की राह पकड़ी और हमेशा उस पर कायम रहे। उन्होंने अपने संघर्षों के जरिये बताया कि दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक लोगों की सामाजिक-आर्थिक मुक्ति वर्ग-संघर्ष के ही रास्ते संभव है, उसी के भीतर से निकलकर कुछ लोगों के शासकवर्ग में शामिल हो जाने से मुक्ति सम्‍भव नहीं है। उन्होंने चुनाव को वर्ग-संघर्ष के तौर पर ही लिया। जब 1995 में वह सहार से चुनाव जीत गए, तभी प्रतिक्रिया में शासकवर्ग ने अपने संरक्षण में रणवीर सेना को जन्म दिया। उस वक्त भी अपने अनुभवों को आधार पर उन्होंने कहा कि यह सेना किसी जाति का भी भला नहीं कर सकती, बल्कि जिस जाति के नाम पर बनी है, उसके लिए ही भस्मासुर हो जाएगी। रणवीर सेना ने महिलाओं, बच्चों और वृद्धों तक की हत्या की और भाकपा (माले) को खत्म करने की कोशिश की। लेकिन उनके कुशल राजनीतिक निर्देशन में जो चौतरफा लड़ाई लड़ी गई उससे न केवल रणवीर सेना खत्म हुई, बल्कि जिस जाति के नाम पर वह सेना बनी थी, उससे भी वह अलगाव में पड़ गई।

जातीय समीकरण की राजनीति की आड़ में भूस्वामियों, पूंजीपतियों, दबंगों और अपराधियों का हित साधने वाली राजनीतिक पार्टियों के लिए रामनरेश राम हमेशा एक चुनौती बने रहे। जब वह अपार जनसमर्थन से विधायक बने तो सत्ता ने उन्हें भूमिगत जमाने से भी ज्यादा खतरनाक समझा। कांग्रेसी राज के पुलिस रिकार्ड में वह मृत घोषित किए जा चुके थे। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार ने उन पर लादे गए सारे फर्जी मुकदमों को खत्म करने का ऐलान किया था। लेकिन लालू-राबड़ी राज में भी वे मुकदमें खत्म नहीं किए गए, बल्कि नए-नए फर्जी मुकदमे लाद दिए गए। ऐसा ही एक मुकदमा नीतीश राज में उनके निधन तक कायम रहा, जबकि पुलिस द्वारा उन्हें उग्रवादी कहे जाने के खिलाफ पूरा विपक्ष उबल पड़ा था। पुलिस ने उन्हें कई बार गिरफ्तार करने की कोशिश की, पर वह कभी उनके हाथ नहीं आये। जैसा माओ ने कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के बारे में कहा था कि जनता के साथ उनका रिश्ता पानी और मछली की तरह होना चाहिए, तो वैसा ही रिश्ता रामनरेश राम का भोजपुर की जनता के साथ था। इसी गहरे जुड़ाव के कारण ही उनके खिलाफ की जाने वाली सत्ता और प्रशासन की साजिशें कभी सफल नहीं हो पाईं।

जनता के व्यापक लोकतांत्रिक मुद्दों पर उनके नेतृत्व में भाकपा (माले) ने हमेशा हस्तक्षेप किया। यहाँ तक कि जब आपातकाल में दूसरी पार्टियों के नेता दमन और गिरफ्तारी से बचने के लिए नेपाल की ओर रुख कर रहे थे, तब सर पर भारी ईनाम के बावजूद वह भोजपुर के गाँवों में थे और आपातकाल के खिलाफ उनके साथी गाँव-गाँव पोस्टर लगा रहे थे। कार्यकर्ता बताते हैं कि उन्होंने शिक्षा और वैचारिक अध्ययन पर भी हमेशा जोर दिया। चुने हुए जनप्रतिनिधि के तौर पर उन्होंने जो भूमिका निभाई, वह किसी भी ईमानदार और जनपक्षधर जनप्रतिनिधि के लिए प्रेरणास्रोत का काम करेगा। आज जबकि मुखिया तक के चुनाव में लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं, तब भी उनके नेतृत्व में एक मुखिया से भी कम खर्च में उनकी पार्टी माले पूरे जिले में विधान सभा या लोकसभा का चुनाव लड़ती रही। जनता का मुखिया या जनता का विधायक कैसा होना चाहिए, वह इसके मिसाल थे। विकास योजनाओं में पारदर्शिता और उस पर जननियंत्रण की परम्‍परा वह हमें दे गए हैं। उन पर कमीशनखोरी या फण्‍ड के गबन का आरोप कभी नहीं लगा। उन्होंने सहार विधानसभा के प्रत्येक गरीब टोलों में सामुदायिक भवन और चबुतरे बनवाये। शायद इसके पीछे भी उनकी मंशा सामुदायिकता को मजबूत करने की ही थी । अनेक ऐसे गाँव जो मुख्य सड़कों से कटे हुए थे, उनको मुख्य सड़कों से जोड़ने का काम आजादी के बाद पहली बार उन्होंने किया। विधायक होते हुए भी जनांदोलनों को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। उनके नेतृत्व में सहार की जनता ने सड़क और सोन नदी में पुल को लेकर पन्‍द्रह दिनों तक प्रखण्‍ड कार्यालय पर घेरेबन्‍दी की थी, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने सिंचाई की व्यवस्था को दुरुस्त करने पर खास ध्यान दिया। अपने इलाके में साम्‍प्रदायिक सद्भावना कायम करने में भी उनकी अहम भूमिका रही। केन्‍द्रीय कमेटी और पोलित ब्यरो सदस्य समेत वह भाकपा (माले) की कई उच्चतर जिम्मवारियों में रहे। वह अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा के संस्थापक अध्यक्ष थे। वह माले विधायक दल के नेता भी थे।

रामनरेश राम को सदियों में हासिल जनता के सामूहिक ज्ञान और न्याय के लिए होने वाले संघर्षों और परम्‍पराओं के प्रति बेहद सम्मान था। उन्होंने 1942 में लसाढ़ी में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान शहीद हुए किसानों की स्मृति में भव्य स्मारक बनवाया। कुँवर सिंह समेत 1857 के महासंग्राम के शहीदों की याद में जगदीशपुर में आयोजित ‘बलिदान को सलाम’ कार्य़क्रम के मुख्य उत्प्रेरक वही थे। भगतसिंह की जन्मशती पर आयोजित समारोह में स्वाधीनता सेनानी और भोजपुर किसान आन्‍दोलन के साथी जनकवि रमाकांत रमता द्विवेदी के साथ वह शामिल हुए थे। वह सर्वहारा वर्ग की दृढ़ता और उसकी परिवर्तनकारी शक्ति के प्रति आस्था के नाम हैं। भ्रष्टाचार, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, कृषि की बदहाली, किसानों की आत्महत्या, मजदूरों की भुखमरी, महंगाई और बेरोजगारी की वाहक पतनशील राजनीति के इस दौर में वह एक ऐसी क्रांतिकारी जनराजनीतिक परम्‍परा हमें दे गए हैं, जिस पर भोजपुर ही नहीं, पूरे देश की जनता गर्व कर सकती है और उस राह पर चलते हुए परिवर्तन और इंकलाब की उम्मीदों को नई ऊँचाई दे सकती है।

(भारतीय की कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी) की भोजपुर जिला कमेटी की ओर से जारी)

गली रामकली : अनिल सिन्‍हा

जाने-माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा (11 जनवरी, 1942 – 25 फरवरी, 2011) की कहानी-

पाटानाला से कोई सौ गज आगे जाने पर दाहिने हाथ जो गली है उसमें बीसेक मकान होंगे, सभी एक-दूसरे से चिपके-चिपके कुछ ऐसे कि गली के मुहाने से सब एक ही मकान का आभास देते हैं। उनके रूप-रंग भी मिलते-जुलते। लगता लकड़ी के पुराने नक़्काशीदार, कोलतार-पुते खम्‍भों पर टिकी उनकी छतें जैसे नाले के ऊपर तक पहुँच रही हैं और हैरत से आगे फैले संसार को देख रही हैं। छतें ऐसी कि नजरें टपककर उनके नीचे के बरामदों में गिर जाएँ और जरा-सा उठकर दीवानखाने से होते हुए अन्‍दर आँगन तक चली जाएँ और चारों ओर के बरामदों में सिलसिलेवार बने कमरों को देखकर औचक हो जाएँ—अंदर क्या होगा मालूम नहीं; यहाँ से नजरें वहीं तक जा पाती हैं और पुराने अँधेरे में गुम हो जाती हैं।

सभी मकान खस्ताहाल! गोया सौ-डेढ़ सौ साल की उमर तो पार ही कर चुके हैं और उम्रदराजी की झुर्रियाँ लटकाये अपने झाँर्इंपन में पुराना उजास देखने की कोशिश कर रहे हों। पाँच-सात मकानों को छोड़ सबके रंग-रोगन उड़ चुके हैं। जिन पर रंग चढ़े हैं उन मकानों के बच्चे शायद बाहर कहीं ऐसा काम कर रहे हों कि रंगाई-पुताई, घर-खर्च के लिए कुछ पैसे यहाँ भी भेज रहे हों पर उनके पपड़ाये रंगों के पीछे से पुरानापन झाँक रहा है। इस पीढ़ी के दादा-परदादाओं ने कभी यहाँ जिन्दादिली और अपने तरीके के शान-ओ-शौकत के दिन गुज़ारे होंगे। अब तो यह पीढ़ी अपनी दाल-रोटी और आबरू बचा ले जाए यही बहुत है। उन्होंने अपने तरीक़े से ऐश किया, बच्चों के लिए कुछ खास नहीं छोड़ सिवा इन मकान के और कुछ सामानों व घर की व्यवस्था के! उन्हें अन्‍दाज भी न होगा कि ज़माना कुछ ऐसा आएगा कि बच्चों की हालत हमसे बेहतर न होगी और मकानों पर रंग चढ़ाना भी मुश्किल हो जाएगा- पीपल के पत्ते-सा कल को उन्होंने नहीं देखा, देखा अपने आज को!

जो भी हो अब इन घरों के लोगों के पास छोटी नौकरियाँ, दुकानें, रोजगार के कुछ अन्य छोटे-मोटे धंधे हैं जिनसे इनके दिन कटते हैं। शहर के नये मुहल्लों व नयी कॉलोनियों की तुलना में यहाँ पड़ोसन, जिन्दादिली और भाईचारा ज़्यादा है। जितना वक्त इन्हें मिलता है उसमें हँसी-मजाक, सुख-दु:ख, राय-मशवरा सब कुछ चलता। कुल मिलाकर गली एक बड़ा-सा परिवार लगती जिसमें अलग-अलग कौम के लोग थे पर सबके बीच हँसी-ठट्ठा, दु:ख-दर्द का बँटवारा, उधार-पैंचा भी चलता औऱ सब एक-दूसरे के भाई-बहन, चाचा-भतीजा, अम्मा-दादी, फूफी-मौसी, देवर-भाभी, बाबा-दादा का रिश्ता और छोटे-बड़े का लिहाज भी बरकरार था। इस गली की पहचान ही थी इसका सदाबहारपन, गो कि इसमें कमी आनी शुरू हो गयी थी। जिन्‍दगी के कठिन मरहले थे जिनके हल पैसों से ताल्लुक रखते थे पर अभी वे गली के नये-पुराने लोगों पर हावी नहीं हुए थे। असर बहुत धीरे हो रहा था और ऐसे असर को कम-से-कम इस गली में रोकने की कोशिश भी चलती रहती थी। आज के समय में भी गली खुशहाल थी, रौशन थी और जिन्दादिली के झोंके आया करते थे।

ऊपरी तौर पर यह अकेली गली खुश थी पर थी तो वह बदलते हुए एक बड़े शहर के बीच में ही जहाँ ज़िन्दगी और व्यवहार के तमाम तौर-तरीके बदल रहे थे। पहले जहाँ कोई पाटावाली गली पूछकर इन घरों में ठीक-ठाक से पहुँच जाता था अब उसे कई गलियों में भटकते और काफी पूछताछ के बाद पहुँचना सम्भव हो पाता था। जब से आबादी औऱ व्यवसाय के रूपों में बढ़ोत्तरी व बदलाव आया है, कई तरह की दुकानें, धन्धे, छोटी-छोटी कम्पनियाँ के छोटे-छोटे दफ्तर खुल गए हैं। अब कई घरों में ही फैक्ट्रियाँ जैसी चीजें लग गयी हैं। पुरानी पीढ़ियाँ लगभग निकल चुकी हैं और नयी पीढ़ियाँ आ चुकी हैं जो इस गली में भले ही न दिखाई देती हों पर गली से बाहर होते ही दिखाई देने लगती हैं। यहाँ तक कि अब इस गली की डाक भी गड़बड़ाने लगी है। पहले ‘नाम, पाटावाली गली’ के पते पर ही डाक आ जाती थी। यहाँ के लोगों को गुमान भी नहीं था कि इस पते पर अब डाक गड़बड़ाएगी। हो भी क्यों न! नयी पीढ़ी के नये धन्धे। लोग-ही-लोग, सवारियों की भरमार, खरीददारों की रेलम-पेल। पहले की तुलना में हज़ारों तरह के सामान और जरूरते जैसे सबके जीने का नक्शा ही बदल गया हो। तीन चौथाई लोग घर से जल्दी निकलते, शाम-रात के बीच घर लौटते। कुछ लोगों की तो देखा-देखी कई दिनों बाद होती, दुआ-सलाम कम होते पर जब होते तो बड़ी गर्मजोशी और हमदर्दी से। गनीमत थी गली अभी जीवित बची थी पर लोगों को परेशानी तब हुई ज्यादा जब मकान नम्‍बर- पाँच, ग्यारह और पन्द्रह के नाम आए मनीआर्डर वापस लौट गए, डाकिया इनमें दिये पते पर पहुँच नहीं पाया। इन घरों के बच्चे बाहर रहते थे और अपने परिवार के खर्चे के लिए पैसे भेजते थे। महीने का पैसा जब नहीं आया, बुजुर्ग परेशान हुए, डाकघर में दौड़-धूप की तो पता चला इन नामों के मनीआर्डर वापस कर दिए गए हैं क्योंकि डाकिए को पते मिले नहीं। अब आप लोग पता ठीक कराएँ तब डाक मँगाएँ। इस गली वालों के लिए यह एक नई आफत थी, कोफ्त अलग, पैसों के लाले अलग। पोस्टमास्टर ने सुझाव दिया, ‘गली का कोई नाम रखिए। नाम महापालिका में रजिस्टर कराइए। पाटानाला के पास अब कई गलियाँ हैं इसलिए नाम जरूरी है।महापालिका नाम हमारे पास भेजेगी फिर आपको डाक मिलने लगेगी। महापालिका का काम देर-सबेर होता रहेगा, यहाँ इस पोस्ट ऑफिस में गली के नाम की इत्तिला देकर जाइए अपने बाल-बच्चों को नया पता नोट कराइए। कोई दिक्कत नहीं होगी।’

इस गली में रहने वालों के सामने एक नया झमेला खड़ा हुआ- ‘इस तरह तो हम सबसे कट कर रह जाएँगे। कोई हल तो ढूँढ़ना ही होगा।’

इस मसले को लेकर यहाँ के बुजुर्गों ने जल्दी-जल्दी कई बैठकें कीं पर गली का कोई माकूल नाम सूझा नहीं। कुछ नौजवान भी थे गली में, लेकिन वे अपने कामधन्धे में इतना फँसे रहते कि ऐसी बैठकों में आने का उनके पास वक़्त ही नहीं। बुजुर्गों को सूझ नहीं रहा था कि इसका क्या नाम रखा जाय ताकि पता सटीक हो क्योंकि अब तो आसपास भी कई गलियाँ बस गई हैं। पहले उनमें इक्का-दुक्का लोग थे अब वहाँ नये व्यवसायी व कुछ किराएदार आ गए हैं। व्यवसायियों ने वहाँ बड़े-बड़े मकान बनवा लिए हैं, कुछ किराए पर उठाये है, कुछ खुद उनकी रिहाइश हैं; कुछ में घरेलू फैक्ट्रियाँ। अतंत: बुजुर्गों ने तय किया कि गली के नौजवानों को शामिल किए बिना गली का नाम तय नहीं हो सकता। बाजार की साप्ताहिक बन्दी का दिन तय हुआ और यह कि सबको बताया जाय और इस दिन की बैठक की अहमियत बतायी जाय।

नाम छोड़कर गली का हाल पुराना ही था-गुलज़ार- गुलज़ार-सा। गली के करीब आधा रिहाइशों की महिलायें अपने घर का सारा काम खुद करती थीं। झाडू, पोंछा, बर्तन, कपड़ा-सफाई, सब्जी, सौदा-सुलुफ। इनके साथ घर के मर्दों की ताबेदारी जो इनके स्वभाव का हिस्सा बन चुकी थी- दादी, अम्मा, बुआ,चाची, दीदी ने यही सिखाया था। शुरू में यह सिखाना-सीखना बड़ा नागवार गुज़रा होगा पर घुट्टी पीते- पीते आदत हो गई, अब रूटीन!

गली के मर्द भी हिंसक नहीं थे, शायद हिंसक होने की उनकी उम्र बीत चुकी थी। वे भी जानते थे प्यार-मुहब्बत की बातें और अपनत्व दिखा कर महिलाओं से जो चाहो करा लो। पुराने बाप-दादाओं ने सामंती संस्कार का यह छोटा-सा टुकड़ा अपने बच्चों में डाल दिया था यह सोचकर कि बाकी तो वे सँभाल ही लेंगे। इसका असर भी गली में दिखाई देता। वहाँ सबमें एक शांति और समझदारी दिखाई देती- अक्सर हँसी-ठट्ठा मजाक यानी गली में एक गुलजार बना रहता। दूसरी गलियों वाले इससे रश्क करते, उनके यहाँ तो आए दिन झांऊ-झांऊ मची रहती। वहाँ की महिलाएँ इस गली का हवाला देकर मर्दोंका गुस्सा और बढ़ा देतीं। इस गली के गुलज़ार रहने का एक बड़ा कारण और भी था। यहाँ के बाकी रिहाइशों में महरी काम करती। महरी क्या, वह तो घरों के सदस्य की तरह थी। जहाँ काम करती वहाँ की तो वह थी ही बाकी घरों की भी वह अपनी ही थी। इस गली में बस एक ही महरी का प्रवेश था। वह सबका हाल लेती। दादी, अम्मा, चाची, भाभी, दीदी का रिश्ता जोड़कर कभी हँसी-मज़ाक भी कर लेती, सबसे मीठे बोल, कभी सौदा-सुलुफ भी कर देती। इस तरह वह पूरी गली की एक ऐसी सदस्य थी जिसमें ऊर्जा और उत्साह भरा हुआ था। लोग उसे देखकर अपना आलस्य तोड़ देते। नाम उसका रामकली- कली की तरह खिली औऱ तनी हुई- सुगन्ध फेंकती, गली में घुसती तो गली हरसिंगार की तरह महक उठती।

दूसरी गलियों वाली सब जली रहतीं इस गली के गुलजारपन से। कहतीं रमकलिया का मन तो उसी गली में रमता है। हमारी तो वह सुनती तक नहीं। आवाज दो तो ऐंठ कर चली जाती है। वहीं कमाएगी, वहीं खाएगी, हँसी-ठट्ठा करेगी जैसे वह उसकी कामवाली गली न होकर नैहर-ससुराल हो। रमकलिया को कहीं खोजने जाने की जरूरत नहीं। जिसे खोजना हो पाटानाला की सबसे पुरानी गली में चला जाय कहीं-न-कहीं मिल ही जाएगी बतक्कड़ करते जवानी की ऐंठ दिखाती हुई। बेशरम को लाज-हया तो है नहीं। छोकड़ों के सामने तो छोड़ दो, बुजुर्गों के सामने भी दाँत दिखाती रहती है। चाचा-बाबा कहकर मटकती रहती है। उनके बीड़ी-तम्बाकू ला देती है, नसीहत भी देती है पर उनका कहा टालती भी नहीं। सबके दिल में घुसी हुई है…

पाटानाला की इस गली के आजू-बाजू की गलियों के, गली के मुहाने के लगभग सभी लोग रमकलिया को जानते हैं- उसकी चाल-ढाल को लेकर, बेबाकी को लेकर, सीन को लेकर, ‘नयनों से चलते बाण’ को लेकर और उसके उद्धत स्वभाव को लेकर- ‘कहीं कुछ कहा और वह चढ़ न बैठे।’ ललचाई व चोर नजरों से लोग उसे देखते, शायद मन-ही-मन आहें भी भरते हों पर सामने से कुछ नहीं। कभी चिढ़ में, कभी हँसी में कहते- ‘‘रमकलिया की तो एक ही गली है, उसी के लिए बनी है वह गली। वहाँ रहने वाले भी कैसे लोग हैं चमारिन को रखे हुए हैं। कोई भेदभाव नहीं, जैसे घर की लड़की हो, धरम का नाश कर रखा है। क्या हिन्दू, क्या मुसलमान। सभी घरों में वैसे ही जाती है। क्या कर रखा है इसने सब पर!’

कलाली, चिक्किन, टोला पार करते हुए बेधड़क चलीआती है अपनी गली में। भला कोई डर-भय है उसे, उतान हुई चलती रहती है हिरणी जैसी। एक पल में यहाँ, दूसरे पल वहाँ।

अरे! उसे क्या डर-भय। वह तो खुद ही धड़काए रहती है सबको। पिछले साल का वह किस्सा याद नहीं जब भवानी क्लॉथ स्टोर के मालिक के बेटे ने रास्ते में उसका हाथ पकड़ा था तो उसे वहीं पटककर मारा था रमकलिया ने- ‘छैलागिरी दिखाता है? बहू-बेटियों की इज्जत पर हाथ डालना चाहता है? हाथ तोड़ बाप के पास भेज दूँगी।’ सड़क, गलियारा सब सन्न! लोग ठिठके दखते रहे। दो-चार लात उसने उसके कूल्हे पर लगाई और सीधे अपनी गली में चली गयी थी।

पहले लोग छूत-अछूत के डर से रामकली से नहीं लगते थे, इस घटना के बाद उसके साहस से, अब उसके टपर-टपर बेबाक बोलने से जैसे दुनिया भर की जानकारी उसी के पास, सवर्ण और दलित का मसला वह जानती है, दलित भी  आदमी हैं यह वह जानती है, अपने पर आक्रमण करने वालों को सबक सिखाना वह जानती है- गली के बुजुर्गों ने उसे क्या-क्या नहीं बता दिया है आज के समय और समाज के बारे में जैसे वह उस गली की बेटी हो, कोई कुछ कहकर तो देखे। भवानी के बेटे वाली घटना के बाद गली के सब लोगों ने भवानी से शिकायत की, आगे कोर्ट जाने की बात कही तब वह गिड़गिड़ाया- ‘कोर्ट-कचहरी में हम फँसे दादा तो रोटी-दाल कैसे चलेगी। माफ करना….’ लोग भड़ास निकालते- ‘उसका क्या ठिकाना, जरा-सी टोक-टाक पर वह किसे क्या कह दे, गाली-गुफता, मार-पीट पर उतारू हो जाए।’

अब तो जमाना ही बदल गया न! मुसहर, चमार तो घर में घुसे रहते हैं औऱ ये शरीफ़ लोग, बुजुर्ग लोग उसे बेटी बनाए हुए हैं। आदमी, जाति-धरम का फ़र्क ही मिटा दिया है। अपना ही धरम बिगाड़ रहे हैं। वह तो अपने को दलित मानती ही नहीं उसकी चाल, बातचीत देखो तब समझोगे- जमाना बदल रहा है तेज़ी से। रामकली जब अपनी गली आती-जाती है तो नुक्कड़ पर खड़े लड़कों के दिल जलते हैं। कहते हैं ‘हमारी गली में तो आओ रामकली। हम बताएँगे कि गली क्या होती है’। जिन लोगों ने भवानी और उसके बेटे का हाल देखा है वे समझाते हैं छोकरों को- ‘रमकलिया से न लगना, लोक-परलोक बिगाड़ देगी। उसके बहुत सारे बाप-भाई हैं यहाँ…’

रामकली, जैसे सूरज के साथ झम्म-से गिरती है गली में और बहार आ जाती है। बूढ़े-बुजुर्ग सभी उठकर अपना हुक्का-पानी सँभालते हैं। सबका हाल लेती है रामकली। यह उसका रोज का काम है।

गली के ही बुजुर्ग बताते हैं- ‘बहुत पहले नक्खास से आगे ‘चमरटोली’ में रहते थे रामकली के घर वाले। समय के साथ इधर-उधर बिखर गए, कोई जूता-चप्पल का काम करता, कोई म्युनिस्पैलिटी में लग गया, कोई बिखरते हुए नवाबों के पड़पोतों के यहाँ सफाई के लिए चला गया। यह लड़की हमारे सामने बड़ी हुई। घर वाले इधर-उधर हुए। माँ ने मिट्टी, अद्धा, फूस, टाट, सेवार वग़ैरह से लीप-लापकर नाले के किनारे एक कोठरी-सी बनाई। हमारे पास आई, हमने काम कराया अब वह बूढ़ी लाचार-सी है। रामकली ही उसकी बेटा-बेटी है। हमारे यहाँ की घरवालियों ने उसे बेटी-सा माना अब वह हमारी गली की शोभा है- निडर, दिलेर और समाज को समझने वाली। आज भी रोज कुछ-न-कुछ पूछती-जानती रहती है…’

ऐसी रामकली के बुजुर्ग परेशान हैं कि उनकी गली का नाम क्या रखा जाय। जब तक गली का नाम दर्ज नहीं होगा उनका नाता-रिश्ता दुनिया से टूट जाएगा। उनके बाल-बच्चों का हाल उन्हें नहीं मिलेगा। शहर के ही नये लोग भटक जाएँगे। बुजुर्गों और गली के सभी लोगों में इस बात से परेशानी है। सब प्रतीक्षा में हैं कि कितनी जल्दी बाजार की साप्ताहिक बन्दी हो और पूरी गली के लोगों की मीटिंग हो। कोई नाम उभर कर आ जाए। ऐसा नाम जिससे सभी गली को पहचान लें। गली की एक छवि बने औऱ इसके नाम में अपनापा हो। बुजुर्गों की अपनी बातचीत में, रोज के मिलने-जुलने में भी गली के नामकरण का ज़िक्र निकल आता। लोगों का सोचना था किसी मजहब, सम्प्रदाय, देवी-देवता, अल्लाह-पैगम्बर, नेता आदि के नाम पर गली का नामकरण हो। लेकिन मुश्किल थी कि गली में कोई ऐसा बड़ा आदमी भी नहीं हुआ था जिसके नाम पर सबकी सहमति हो।

असमंजस की स्थिति में साप्ताहिक बन्दी का दिन आया। ग्यारह बजे दिन में बैठक-बैठी- बुजुर्ग, युवा, अधेड़ सब थे, कुछ महिलाएँ भी। रामकली समझ नहीं पा रही थी सब लोग इकट्ठे क्यों हुए हैं उसकी उत्सुकता बढ़ी हुई थी। बैठक में बुजुर्गों ने असली बात साफ की कि गली का नाम अब क्यों जरूरी हो गया है। देश-दुनिया से जुड़े रहने के साथ अपनी पहचान का भी सवाल था और गली को एक नया नाम देने का भी जिसमें आत्मीयता हो, अपनापन हो, एका हो और तुरंत लोगों की जबान पर नाम चढ़ जाए। उससे लगाव भी हो। सबने अपने-अपने सुझाव रखे पर बात बन नहीं रही थी। युवाओं की समझ में कुछ आ नहीं रहा था। अधेड़ भी अब चाह रहे थे किसी नेता के नाम पर सहमति हो और छुट्टी हो। काफ़ी समय बीत गया था सभी उठना चाहते थे, सबकी घर-गृहस्थी थी, आराम का दिन था, कई काम निपटाने थे, लोगों में निराशा भर रही थी इतनी कोशिशों के बावजूद असफलता! अन्त में पाँच नम्बर मकान वाले बुजुर्ग उठे- ‘भई! मैं थक गया, अब बैठ नहीं सकता। नाम नहीं सूझ रहा तो मेरी मानो। नाम रखो ‘गली रामकली’।’ सबने एक दूसरे को देखा और मुस्कुराए चेहरे पर था गहरा संतोष!

 

 

तीसरा नैनीताल फ़िल्म फेस्टिवल 30 से

नैनीताल : प्रतिरोध का सिनेमा का तीसरा नैनीताल फ़िल्म फेस्टिवल 30-31 अक्टूबर और 1 नवम्बर, 2011 को शैले हाल, नैनीताल क्लब, मल्लीताल, नैनीताल में जन संस्कृति मंच और युगमंच की ओर से आयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन मणि कौल, गुरुशरण सिंह और कुबेर दत्त की याद को समर्पित है।

इस बार के खास मेहमान अभिनेता और पत्रकार विश्‍व मोहन बडोला होंगे और कवि-पत्रकार मंगलेश डबराल उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करेंगे।

पहला दिन : रविवार 30 अक्टूबर, 2011
शाम 4 बजे से 5 बजे
उद्घाटन सत्र
प्रतिरोध का सिनेमा की जरूरत पर संजय जोशी, संयोजक, प्रतिरोध का सिनेमा का राष्ट्रीय अभियान का वक्‍तव्‍य
मुख्य अतिथि विश्व मोहन बडोला का वक्तव्य
अध्यक्षीय वक्तव्य मंगलेश डबराल
संचालन : ज़हूर आलम, संयोजक, तीसरा नैनीताल फ़िल्म फेस्टिवल
शाम 5 से 5.30 बजे
प्रणब मोहंती की चित्रकला प्रदर्शनी का विश्व मोहन बडोला द्वारा उद्घाटन
शाम  5.30 से 8 बजे रात
फीचर फ़िल्म ‘जाने भी दो यारों’ का प्रदर्शन
निर्देशक: कुंदन शाह/143 मिनट/रंगीन/हिन्‍दी/1983

दूसरा दिन :सोमवार 31 अक्टूबर 2011
पहला सत्र :
सुबह 11 बजे 1.30 बजे बच्चों का सत्र
रामा मोंटेसरी स्कूल, नैनीताल के बच्चों द्वारा लोक गीत और लोक नृत्य की प्रस्तुत्ति
30 मिनट/निर्देशन : अनिल कुमार / हिन्‍दी
बच्चों के लिए  धरती के गर्भ की यात्रा
60 मिनट/प्रस्तुति : आशुतोष उपाध्याय /हिन्‍दी
फीचर फ़िल्म ‘सन्डे’
60 मिनट / निर्देशक : पंकज अडवानी/रंगीन/1994/हिन्‍दी
1.30 से  2.15 बजे लंच ब्रेक

दूसरा सत्र
दुपहर 2.15  से शाम  4.30  बजे  : लघु  फ़िल्में और म्यूज़िक विडियो
‘द  स्टोरी ऑफ स्टफ़’
21 मिनट/निर्देशक: लुईस फोक्स /ब्लैक एंड व्हाइट/2007/हिन्‍दी
‘ग्लास’
11 मिनट/निर्देशक: बर्ट हान्स्त्र /रंगीन/1958/संवादरहित
‘मिरर’
10 मिनट
‘जू’
10 मिनट/निर्देशक: बर्ट हान्स्त्र /रंगीन/1962
‘भालो  खबर’
15 मिनट/निर्देशक: अल्ताफ माजिद /रंगीन/2010/ असमिया अंग्रेजी उपशीर्षकों के साथ
‘दुर्गा  के शिल्पकार’
15 मिनट/निर्देशक:राजीव कुमार/रंगीन/2011/हिन्‍दी
लाल बैंड, पाकिस्तान के म्यूज़िक विडियो
30 मिनट/हिन्दुस्तानी
An Occurence at Owl Creek Bridge
28 मिनट/निर्देशक : राबर्ट  एनरिको/ ब्लैक एंड व्हाइट /1962
चाय-पानी : शाम 4.30 से 5 बजे

तीसरा  सत्र :  शाम 5  से रात 8.15 बजे
व्याख्यान- प्रदर्शन भारतीय सिनेमा में बैकग्राउंड स्कोर  (score ) का सफ़र
60 मिनट/प्रस्तुति : प्रभात गंगोला/हिन्‍दी
व्याख्यान- प्रदर्शन  उड़ीसा में  विकास के नाम  पर मीडिया, राजनीति और कोरपोरेट  घरानों  में गठजोड़
75 मिनट/प्रस्तुति :सूर्यशंकर दाश/हिन्‍दी
व्याख्यान- प्रदर्शन  उत्तराखंड में बड़े बांधों द्वारा विनाश का कुचक्र
60 मिनट/प्रस्तुति: इन्द्रेश मैखुरी/हिन्‍दी

तीसरा दिन : मंगलवार 1 नवम्बर 2011
पहला सत्र : मणि  कौल  स्मृति
सुबह 11 से 12.30
फीचर फ़िल्म ‘दुविधा’ का प्रदर्शन
82 मिनट/निर्देशक: मणि कौल/रंगीन/1975/ हिन्‍दी
12.30 से 1 बजे  दुपहर  :    लंच ब्रेक

दूसरा सत्र : भारतीय डाक्यूमेंटरी सिनेमा में महिला फ़िल्मकारों का हस्तक्षेप
दुपहर 1 बजे से शाम 4.45 बजे
‘सब्जी मंडी के हीरे’
68 मिनट/निर्देशक: निलिता वाच्छानी/रंगीन/1992/ हिन्‍दी
कमलाबाई
47 मिनट/ निर्देशक: रीना मोहन  / रंगीन/ 1992/ मराठी, हिंदी
‘सुपरमैन ऑफ मालेगाँव’
52 मिनट/ निर्देशक: फैज़ा अहमद खान/रंगीन/2008 / हिन्‍दी
‘व्हेअर हैव यू हिडन माई न्यू क्रिसेंट मून ?’
28 मिनट/ निर्देशक: इफ्फत फातिमा / रंगीन/ 2009 / कश्मीरी, अंग्रेजी के उपशीर्षकों के साथ
शाम 4.45 से  5.15  चाय का ब्रेक

तीसरा सत्र : शाम 5.15 से  रात  9 बजे
नदियों के साथ
(जाम्बेजी, गंगा, ब्रह्मपुत्र और गोमती की रोमांचक  यात्राओं के किस्से, विडियो और तस्वीरें)
60  मिनट/प्रस्तुति : अपल / हिन्‍दी
टेलिविज़न ब्रोडकास्टिंग का सफ़र
75 मिनट/प्रस्तुति : के नन्द कुमार
‘मैं  तुम्हारा कवि हूँ’
40 मिनट/ निर्देशक: नितिन के पमनानी / रंगीन/2011 / हिन्‍दी
फ़िल्म के संपादक इमरान खान के साथ बातचीत
10 मिनट
कवि रमा शंकर यादव विद्रोही का एकल काव्य पाठ
30 मिनट
समापन समारोह
15 मिनट

अधिक जानकारी के लिए ज़हूर आलम से 09412983164, 05942-237674 पर और संजय जोशी से 09811577426, 0120-41089090 पर संपर्क कर सकते हैं।

आँखों की आभा जा बसी नीलकमलों में*: वरवर राव

वरवर राव

छत्तीसगढ़ में 5 जुलाई को एक आदिवासी लड़की को चंदो नामक गाँव के पास  एनकाउंटर में मारा गया था। इसको लेकर लिखा तेलुगु के जनकवि वरवर राव का लेख दैनिक ‘आंध्राज्योती’ में प्रकाशित हुआ। तेलुगु से हिन्‍दी में इसका अनुवाद आर. शांता सुंदरी ने किया है-

घने जंगल में अपने घर के चारों ओर छाए नीरव निश्शब्द में चहकते हुए हालचाल पूछनेवाले परिंदों को तरह-तरह के नाम देना मीना खल्को को पसन्द था। न जाने कितने अनगिनत घण्टे वह इसी तरह गुज़ार देती थी। कभी-कभार दिख पड़ने वाले जानवरों को भी वह इसी तरह नाम दे देती थी।

वह सोलह साल की थी। उसने पाँचवीं तक पढा़ई करके पाठशाला जाना बन्द कर दिया। जंगल में मवेशियों के साथ घूमने की इच्छा से पढ़ाई छोड़ दी थी उसने। उरान आदिवासी जाति के बुद्धेश्‍वेरी खल्को और गुतियारी के दो लडकियां थीं। मीना बड़ी थी और चौदह साल की सजंति छोटी थी। उनके पास पाँच बकरियाँ थीं। उन्हीं के सहारे उस परिवार का गुजारा चलता था। मीना माँ के साथ बकरियाँ चराते दिनभर जंगल में घूमती रहती थी। घर पर रहती तो भी सारा वक्त पशु-पक्षियों के संग ही बिताती थी। उसने अपनी पाँचों बकरियों के नाम भी रखे- सुखिनि, सुक्ता, सुराइला, भूट्नी और लधगुड्नी।

मीना के घर का आसपास बड़ा सुन्दर था, बस उनकी झोपड़ी ही जर्जर थी। घर के पास ही एक तालाब था। तालाब के किनारे पहाड़ थे। हरीभरी घास के मैदान पेडों की कतार जैसे एक-दूसरे के हाथ पकड़े खडे़ हों। झारखण्ड के जंगलों को छत्तीसगढ़ से जोड़ते से चुनचुना पहाड़, उन पहाड़ों से कूदते झरने।

बिजली की बात छोडि़ये वहां अबतक आधुनिकता का पदार्पण ही नहीं हुआ। जुलाई 5 तारीख को मीना अपनी सहेली से मिलने जंगल में गई। कर्चा से दो-तीन किलोमिटर दूर स्थित चंदो नामक गाँव के पास वह एक एनकांउटर में फंस गई।

‘‘तड़के तीन बजे के करीब हमने तीन बार गोलियाँ चलने की आवा़ज सुनी। डर के मारे घर से बाहर नहीं निकले। छः बजे जाकर देखा तो बाहर पुलिस वाले दिखाई दिये।’’ एनकांउटर जहाँ किया गया था, उसके सामनेवाले घर में रहनेवाली विमला भगत ने बताया। पुलिस ने उन्हें चेतावनी दी कि उस घटना के बारे में किसी से भी कुछ न कहें। चंदो और बलरामपुर के पुलिसवाले यह नहीं मान रहे हैं कि सिर्फ तीन बार गोलियों की आवाज सुनाई दी, पर उससे ज़्यादा गोलियाँ चलने के निशान वहाँ नहीं मिले। ‘एनकाउंटर कहां हुआ था? किसी भी एनकाउंटर में दोनों तरफ से कम से कम पचास-साठ राउंड चलते हैं। यहाँ सिर्फ तीन गोलियाँ चलाई गईं। उनमें से दो मीना के शरीर के पार हो गईं।’ ये बातें सिर्फ चंदो गांव के सरपंच ही नहीं, वहाँ के लोग भी कह रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री नानकीराम कंवर का कहना है कि मीना का इतनी रात गए जंगल में दिखाई देना ही यह सिद्ध करता है कि उसके माओवादियों से सम्बन्ध बने हुए हैं। वह एक घना बीहड जंगल है इसलिए वहाँ माओवादियों के होने की बात कही जा रही है। लेकिन पुलिस इस बात का सबूत पेश नहीं कर पा रही है कि वहाँ सचमुच माओवादी गुट छुपे हैं। अधिकारिक घोषणा के अनुसार एनकाउंटर तड़के तीन बजे हुआ था। कुछ घण्टे बाद मीना का घायल शरीर वहाँ पड़ा मिला। बलरामपुर का एस.पी. जितेन्द्र का कहना है कि बाकी नक्सलवादी भाग गए होंगे। उसका कहना है, ‘एनकाउंटर रात के अन्धेरे में किया गया था। पुलिसवालों ने सुबह छः बजे तलाशना शुरू किया, तब वह घायल स्थिति में उन्हें वहाँ दिखाई दी। उसने अपने कुछ नक्सलाइट साथियों के नाम भी बताए।’

एनकाउंटर जहाँ हुआ था उस जगह से चंदों पुलिस स्टेशन चार किलोमीटर दूर है। वह खुली जगह है जहाँ किसी तरह की ओट नहीं है।

‘‘नक्सलियों के साथ किसी के सम्‍बन्‍ध हों तो पडोसियों को ही नहीं दूर के रिश्तेदारों तक को पता चल जाता है। वह लड़की नक्सलवादी नहीं थी।’’ अयिकुराम ने कहा। वह कर्चा से बीस किलोमीटर दूर स्थित एक सरकारी पाठशाला में अध्यापक है।

इस एनकाउंटर के विरुद्ध सरगुजा के आसपास उमडे़ आन्‍दोलन के आगे छत्तीसगढ़ की सरकार को घुटने टेकने ही पडे़   । उसने मजिस्टीरियल जाँच कराने का आदेश दिया (छत्तीसगढ़ में एनकाउंटरों पर मजिस्टीरियल तहकीकत नहीं होती। कई बार पोस्टमार्टम भी नही होता। लाश को रिश्तेदारों के हवाले भी नहीं किया जाता)। केस सीआइडी को सौंप दिया गया। चंदों पुलिस स्टेशन के सभी पुलिस अधिकारियों को अंबिकापुर पुलिस लाइन्स में भेज दिया गया। मीना के परिवारवालों को दो लाख रुपये हर्जाना दिया गया। इस एनकाउंटर से किसी तरह का नाता न होने पर भी उसी वक्त मीना के भाई रवीन्द्र खल्को की चंदो बालिका हॉस्टल में नौकरी लग गई। पुलिस परोक्ष रूप से इसे झूठा एनकाउंटर स्वीकार कर चुकी है। यह सिद्ध करने के लिए चंदो के सरपंच ने कहा, ‘‘क्या आपने कभी नक्सलियों के भाइयों को सरकारी नौकरी मिलने की बात सुनी है।’’ जि़ला कलक्टर जी.एस. धनुंजय ने कहा, ‘‘यह नौकरी मुख्यमंत्री रमण सिंह के कहने पर ही दी गई थी। वे (खल्को जनजाति) आदिवासियों में सबसे गरीब हैं। इन्सानियत के नाते उस लडके को नौकरी दी हमने। हॉस्टल में चपरासी की जरूरत थी। योग्यता न होने के बावजूद दिहाडी पर उसे नौकरी दी। वह दसवीं पास कर लेगा तो स्थाई नौकरी मिल जाएगी। फिलहाल उसे चार हज़ार रुपये मिल रहे हैं।’’

अगर मीना के एनकाउंटर के बाद अपनी गलती सुधारने की बात पर यह किस्सा यहीं खतम हो जाती तो यह पूरी कहानी नहीं बनती। और न ही हमारे ‘हिन्‍दू’ देश में पुरुषों के नजरिये को समझने में इससे मदद मिल सकती। कहीं इस पुरुष स्वभाव को अपनी गलती मानना खल रहा था। अपमान की भावना जाग रही थी। राज्‍य सरकार, वह भी बी.जे.पी. सरकार को छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के विद्रोह को कुचल देने के लिए विपक्ष कांग्रेस और केन्द्र में कांग्रेस सरकार का समर्थन हमेशा से मिलता रहा है। केन्द्र आर्थिक और फौजी सहायता भी पहुँचा रहा है। जंगल में पूरे रूप से नक्सलियों का प्रभाव है, यह बात सारा संसार जानता है। वहाँ आदिवासी रहते हैं…अत्‍यंत निर्धन आदिवासी जनजातियाँ रहती हैं। और मीना ठहरी अति निर्धन आदिवासी जनजाति की लड़की। कितने ही तरह के अधिकार एक तरफ और कुचले जाने की कई योग्यताओं से युक्‍त एक अनाम लडकी एक तरफ। माओ ने जिन्हें चौथे जुआ का बोझ ढोने लायक कहा था, वह शायद इस तरह की स्त्री ही हों। और फिर यह तो और भी भोज डाले जाने लायक आदिवासी स्त्री थी। स्त्री भी नहीं, कुँवारी लडकी थी।

न जाने क्यों मुझे एक बारगी ‘पाथेर पांचाली’ फिल्म की दुर्गा और ‘समाप्ति’ फिल्म की मृणालिनी याद आ गई। मृणालिनी इसलिए कि उसमें भी प्रकृति के प्रति प्रेम भरा था। दुर्गा में भी यह बात थी। उसके लिए रेल एक अजूबा था। उसमें इस कदर भोलापन था कि अमीरों के आडम्‍बर और गहने-लत्‍ते देखकर अविश्वास से आँखें कमल की पंखुडियों की तरह फैल जातीं। समाज में असमानता इन्सानों पर क्या प्रभाव डालती है? दोनों पक्षों के इन्सानों को इन्सान न समझना सिखाती है। अमीरों के पास सबकुछ है। न्याय, नीति, पवित्रता, अधिकार…। अभावग्रस्त लोग चोर हैं, अपराधी हैं, पतित हैं, भ्रष्ट हैं। ये मापदण्ड कौन तय करता है? अमीर ही। जिनके पास शिक्षा है, जिनके पास अधिकार नहीं है, उनसे अधिकार प्राप्त करके वे अभावग्रस्तों के लिए एक अपराध से भरे संसार की सृष्टि करनेवाली दण्‍ड संहिता की रचना करते हैं।

मीना के एनकाउंटर होने के दो महीने बाद गृह मंत्री नानकीराम कंवर ने कहा, ‘‘मीना व्यभिचारिणी थी। ट्रक ड्राइवरों के साथ उसके नाजायज संबंध थे।’’ एनकाउंटर हुआ तब वह घर से दूर थी इसका कारण नक्सलियों से उसका संबंध है। इस बात की पुष्टि होती है, यह ज्ञान भी उस पुरुष सत्तात्मक पुलिस मंत्री के दिमाग में कौंध उठा। कुछ पुलिसवालों को भी यह विश्वास करने योग्य अभियोग लगा। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ‘मूत्र नली में छेद हो गए, गर्भाशय का ऊपरी भाग चिर गया’, इस तरह के लैंगिक अत्याचार को सूचित करनेवाली बातें जोडी़ गईं। एक अधिकारी का कहना था कि चंदो पुलिस स्टेशन से पूरी टुकडी को दूसरी जगह बदलने के बाद इस तरह की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पेश करना बडी़ हैरानी की बात है। ‘रिपोर्ट में सिर्फ घावों के बारे में और मौत की वजह के बारे में लिखा जाना चाहिए था’, यह उसका कहना था। गाँव वालों का कहना था कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मीना के शराबी होने की बात बाद में जोड़ दी होगी।

बलरामपुर के एस.पी. ने कहा कि मीना की योनि के अंश फोरेन्सिक लेब में भेजे गए हैं और नतीजे आने अभी बाकी हैं। लेकिन गृह मंत्री ने फैसला सुना दिया कि मीना बदचलन थी। सरपंच ने दुःख व्यक्त किया कि भले ही सभी गाँववाले खल्को परिवार का साथ दे रहे हों, फिर भी यह दाग उस परिवार का जीना दूभर कर देगा। क्या मीना नक्सल थी? बदचलन थी? उसकी मौत का राज़ उसके दोस्त जंगल के दिल को मालूम था। ‘‘उसपर पहले उन्होंने (पुलिस) अत्याचार किया। फिर उसे मार डाला। पहले मेरी बच्ची को उन लोगों ने नक्सल कहा। अब कहते हैं कि वह बदचलन थी। यही आरोप मुझे सबसे ज़्यादा दुःख पहुँचा रहा है’’, मौन तोड़कर बडी़ वेदना से भरी मीना की माँ बुद्धेश्वरी देवी कह रही हैं। मीना की छोटी बहन सजंति सोलह साल की अपनी बहन की पासपोर्ट साइज तसवीर हमेशा अपने पास रखती है और जो भी मिलने आता उसे दिखाती रहती है।

जुलाई छः तारीख को मीना की लाश को कन्हर नदी तट पर दफनाने के बाद उसका नेलपालिश, हेयरक्लिप, फ्राॅक और किताबों से भरी उसकी छोटी-सी संदूकची को उसके परिवार ने उसी नदी में बहा दिया। दुर्गा के (चोरी करके) छिपाये कण्‍ठहार को आँसू बहाते हुए जिस तरह अपू ने तालाब के पानी में छोड़ दिया था, उसी तरह इस बोझ को ढोनेवाली व्यवस्था से सजंति और उसके माँ-बाप कब मुक्त होंगे?

*तेलुगु के महाकवि गुरजाड अप्पाराव की कविता की एक पंक्ति

श्रीलाल शुक्‍ल के सुमचित इलाज के लिए जलेस की अपील

नई दिल्‍ली : हिन्‍दी साहित्य के जाने-माने रचनाकार श्रीलाल शुक्ल लखनऊ के सहारा अस्पताल में गंभीर हालत में हैं। हिन्‍दी के हम लेखकों को यह देख कर अत्यन्‍त दुख होता है कि उनकी इस हालत के प्रति उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और भारत के प्रधानमंत्री उदासीनता बरत रहे हैं। यह बात जनवादी लेखक संघ के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कही गई है। इसमें आगे कहा गया है कि हम उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री से अपील करते हैं कि वे श्रीलाल शुक्ल के समुचित इलाज के लिए तुरन्‍त व्यवस्था करें जिससे इस बड़े रचनाकार का जीवन बचाया जा सके।

प्रेस विज्ञप्ति में शिवकुमार मिश्र, अध्यक्ष जनवादी लेखक संघ, ज़ुबैर रज़वी, कार्यकारी अध्यक्ष जनवादी लेखक संघ, नामवर सिंह, प्रगतिशील लेखक सघ अध्यक्ष, राजेंद्र यादव, संपादक, ‘हँस’, चंचल चौहान, महासचिव, जनवादी लेखक संघ, कुँवर नारायण, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित, अशोक वाजपेयी, ललित कला अकादमी अध्यक्ष, राजेश जोशी, साहित्य अकादमी से पुरस्कृत, मनमोहन, कांतिमोहन ‘सोज़’, मंगलेश डबराल, संपादक, ‘पब्लिक एजेंडा’, रेखा अवस्थी, जवरीमल्ल पारख, संजीव कुमार आदि के हस्‍ताक्षर हैं।