Archive for: September 2011

क्रांतिकारी नाट्यकर्मी गुरुशरण सिंह को जसम की श्रद्धांजलि‍

संस्कृति की दुनिया में शहीद भगत सिंह की विरासत के वाहक पंजाब के विख्यात रंगकर्मी गुरुशरण सिंह नहीं रहे। वह उम्र के 82 साल पूरे कर चुके थे।

भगत सिंह उनके सबसे बड़े प्रेरण-स्रोत थे और उनके जीवन और सन्देश को वह लगातार अपने नाटकों में जीवंत ढंग से प्रस्तुत करते रहे। यह भी अजब संयोग है क़ि उनका निधन 28 सितम्बर को हुआ जो शहीद-ए-आज़म का जन्मदिवस है। चंडीगढ़ में उनका निधन हुआ और दोपहर बाद उनकी अंत्येष्टि संपन्न हुई। उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में आम नागरिक और संस्कृतिकर्मी शामिल थे। शोक सभा इतवार को होगी। परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटियाँ हैं।

महज 16 साल की उम्र में गुरुशरण सिंह ने कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और ता-उम्र कम्यूनिस्ट उसूलों पर कायम रहे। फोन पर जन संस्कृति मंच के साथियों से बात करते हुए गुरुशरण जी की बड़ी बेटी ने गर्व के साथ कहा क़ि उन्हें इस बात का हमेशा गर्व रहेगा क़ि उनके पिता ने कभी भी किसी सरकार के साथ कोई समझौता नहीं किया, अपने उसूलों से कभी पीछे नहीं हटे।

रसायन शास्त्र से एम्.एस.सी. करने के उपरांत वह पंजाब सरकार के सिंचाई विभाग में रिसर्च आफिसर के पद पर नियुक्त हुए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भाखड़ा नांगल बाँध और दूसरी महत्वपूर्ण परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहीं काम करते हुए उन्होंने 1956 से अपनी क्रांतिकारी नाट्य-यात्रा शुरू की। जब वह नाटक करते तो उसमें बेटियों सहित उनका पूरा परिवार भाग लेता। देश-विदेश में उन्होंने हज़ारों प्रस्तुतियां कीं। बगैर साजो-सामान के जनता के बीच गावों, मुहल्लों, चौराहों और सड़कों पर मामूली संसाधनों के साथ नाटक करना उनकी नाट्य-शैली का अभिन्न अंग था। सामंती शोषण, पूंजीवादी लूट और दमन तथा साम्राज्यवाद के विरोध में जन-जागरण इन नाटकों का मुख्य उद्देश्य होता। तमाम समसामयिक घटनाओं के सन्दर्भ भी मूलतः इन्हीं केन्द्रीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उनके नाटकों में नियोजित रहते थे।

गुरुशरण सिंह ने जनता के रंगमंच, आन्दोलनकारी और प्रयोगधर्मी थियेटर, ग्रामीण रंगमंच का पंजाब में उसी तरह विकास किया जैसा क़ि बादल सरकार ने बंगाल में। यह एक अखिल भारतीय प्रक्रिया थी जो देश में आमूलचूल बदलाव के लिए चल रहे जन-संघर्षों के साथ संस्कृतिकर्मियों द्वारा कंधे से कंधा मिलाकर चलने के संकल्प से उपजी थी। जिस तरह बादल सरकार मूल कर्मभूमि बंगाल होने के बावजूद कभी बंगाल तक सीमित नहीं रहे, वैसे ही गुरुशरण सिंह भी कभी पंजाब तक महदूद नहीं रहे। यही कारण था क़ि प्रधानतः हिंदी-उर्दू क्षेत्र के संगठन जन संस्कृति मंच के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और वह दिल्ली में अक्टूबर 1985 में सम्पन्न हुए उसके स्थापना सम्मलेन में संस्थापक अध्यक्ष बनाए गए। क्रांतिकारी कवि गोरख पाण्डेय महासचिव चुने गए।

गुरुशरण सिंह और अवतार सिंह ‘पाश’ ऐसे क्रांतिकारी संस्कृतिकर्मी थे जिन्होनें 1980 के दशक में अलगाववादी आन्दोलन में सुलगते पंजाब में पूरी निर्भीकता के साथ गाँव- गाँव जाकर भगत सिंह के सपनों, भारतीय क्रान्ति की जरूरत, समाजवाद की ज़रूरत, सामंती शोषण और साम्राज्यवाद के विरोध की आवाज़ को बुलंद किया। ‘पाश’ इसी प्रक्रिया में शहीद हुए।

गुरुशरण जी ने राजनीति में सक्रिय भूमिका से भी कभी गुरेज़ नहीं किया। ‘पंजाब लोक सभ्याचार मंच’ और ‘इंकलाबी मंच, पंजाब’ के तो वे संस्थापक ही थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के सदस्य रहे। भाकपा (माले) के बहुत करीबी हमदर्द रहे और लगातार उसके कार्यक्रमों में सरगर्मी से शिरकत करते रहे। वह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी महज कलाकार नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण और समर्पित संस्कृतिकर्मी की भूमिका में रहे। अपने अभिन्न मित्र बलराज साहनी की याद में उन्होनें ‘बलराज साहनी यादगार प्रकाशन’ की स्थापना कर सैकड़ों छोटी-बड़ी किताबों का प्रकाशन किया जिनकी कीमत बहुत ही कम हुआ करती थी। इन किताबों को वह अक्सर खुद अपने झोले से निकाल कर बेचा भी करते थे। उनके लिए कोई काम छोटा या बड़ा नहीं था।

लम्बे समय से बीमार रहने के बावजूद गुरुशरण जी सदैव राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से सजग और अपने उद्देश्यों के लिए सचेष्ट रहे। पंजाबी और हिन्दी में उनके ढेरों नाटक जनता की स्मृति में अमर रहेंगे। ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ या ‘जन्गीराम की हवेली’ जैसे उनके नाटक हिन्दी दर्शक भी कभी भूल नहीं सकते।

वह अपने सम्पूर्ण जीवन और संस्कृति-कर्म में जनवादी, खुशहाल और आज़ाद भारत के जिस सपने को साकार करने के लिए जूझते रहे, उसे ज़िंदा रखने और पूरा करने का संकल्प दोहराते हुए हम अपनी सांस्कृतिक धारा के जुझारू प्रतीक कामरेड गुरुशरण सिंह को जन संस्कृति मंच की और से लाल सलाम पेश करते हैं।

(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )

सुख : प्रबोध कुमार

प्रबोध कुमार

8 जनवरी, 1935 को जन्‍में सुप्रसि‍द्ध लेखक प्रबोध कुमार ने 1955-56 में लि‍खना-छपना शुरू कि‍या। करीब एक दशक तक उनकी कहानि‍याँ ‘कहानी’, ‘कल्‍पना’, ‘कृति’‍ आदि‍ प्रति‍ष्‍ठि‍त पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त होकर खासी चर्चित हुईं। उन्‍होंने करीब पैंतालीस वर्षों से न लि‍खने के बाद उपन्‍यास लि‍खा- नि‍रीहों की दुनि‍या। उनकी कहानी –

मीरा के दाँत जब भी टूटते, वह उन्हें चूहे के बिल में डाल देती जिससे दोबारा निकलने पर वे चूहे के दाँतों की तरह सुडौल हों। उस दिन जब फिर उसका एक दाँत टूटा तो उसे ले वह फुदकती बिल की तरफ चली। तभी न जाने कहाँ से आ, उसके हाथ से दाँत छीन, विशू भाग गया। वह रोते-राते उसके पीछे दौड़ी लेकिन विशू को पकड़ना आसान नहीं था। हारकर बरामदे में बैठ, वह बीच-बीच में बह आती नाक घुटकने लगी। सबसे बड़ा डर उसे यह था कि विशू ने दाँत यदि खपरैल पर फेंक दिया तो नया दाँत खपरे की तरह होगा। विशू की माँ उसकी माँ के साथ पड़ोस के घर में थीं जहाँ उसी रात घर की सबसे बड़ी लड़की सरला की शादी थी। उसकी शिकायत सुनने वाला दूसरा कोई वहाँ था नहीं। विशू बगीचे में खड़ा उसे मुँह चिढ़ा रहा था। मीरा की बेहद इच्छा हुई कि जा कर उसका मुँह नोंच ले लेकिन वह जानती थी कि विशू मुँह नुचवाने वहाँ खड़ा नहीं रहेगा।

विशू ने इस उम्मीद से कि मीरा उसके पीछे-पीछे भागेगी, कहा, ‘‘अच्छा ले जाओ अपना दाँत, हमें नहीं चाहिए’’, लेकिन उस पर कोई असर न होते देख वह घाट पर चला गया। छुट्टियों में अपनी माँ के साथ जब भी वह मीरा के घर आता तो उन दोनों का अधिकतर समय तालाब पर बीतता था। घने पेड़ों के कारण, पास होने पर भी वह घर से दिखाई नहीं देता था। वहाँ पहुँचने पर उन्हें लगता कि घर से बहुत दूर चले आये हैं। विशू को तालाब बहुत पसंद था। उसके तीन किनारों पर शहर के मकान आकर यदि ठहर न जाते तो पानी में गिर पड़ते। मकानों के बीच काफी संख्या में कलशदार मंदिर फँसे थे। उनकी नुकीली आकृतियाँ दिन भर पानी में डोलती रहतीं। तालाब की चौथी ओर नीली-भूरी पहाडिय़ाँ थीं जिनमें मीरा के अनुसार, चुड़ैल छिपकर रात में उन्हें सताने की योजना बनाती थी। पहले उन्हें, जब तक कोई बड़ा व्यक्ति साथ न हो, तालाब पर बिल्कुल जाने नहीं दिया जाता था। बाद में बड़ों की व्यस्त दिनचर्या में बच्चों को किसी बात के लिए मना करना शायद एक बेमतलब आदत बन गयी थी, क्योंकि वह एक बार मना करने के बाद कोई भी यह देखने का कष्ट नहीं करता कि उन्होंने कहना माना या नहीं। एक कारण शायद यह भी रहा हो कि अब उन्हें तैरना आ गया था, यद्यपि अब भी वे पानी में तभी उतरते जब घाट पर काफी लोग नहाते रहते। पिछली गर्मियों में मीरा के पिता ने उन्हें तैरना सिखाया था। मीरा की देखादेखी वह भी उसके पिता को बाबूजी कहता था। सुबह होते ही दोनों अपनी तूंबियाँ सहेज तैयार हो जाते। उसके बाद उन्हें लगता कि बाबूजी जानबूझ कर चाय पीने में या दाढ़ी बनाने में देर लगा रहे हैं। उतावली में वे, घाट के रास्ते में, बाबूजी से हमेशा दस-बीस कदम आगे रहते। वहाँ पहुँचते ही वे अपने ऊपर के कपड़े उतार, तूंबियाँ बाँधकर बड़े लड़कों की तरह सिर के बल पानी में कूदने का अभिनय करने लगते। बाबूजी आकर देखते कि उनकी तूंबियाँ ठीक से बंधी हैं या नहीं। मीरा की तूंबियाँ उन्हें रोज दोबारा बाँधनी पड़तीं। पानी में जाकर जब वह हाथ फैला खड़े हो जाते, तब दोनों एक के बाद एक पानी में कूद पड़ते। तैरते समय उनके नौसिखिया हाथ-पैरों से बहुत पानी छिटकता जिसका आसपास नहाते लोग बुरा मानते। मीरा पर तो कोई असर न होता लेकिन विशू थोड़ी देर को सहम जाता। पानी से भारी हो बार-बार नीचे खिसकता निकर ठीक करता वह मीरा को देखने लगता। मीरा की सफेद पतली चड्डी में हमेशा हवा भर जाती जिससे कपड़े का एक गुब्‍बारा पानी में हर जगह उसका पीछा करता, एक पिचकता तो दूसरा तैयार हो जाता। नहाकर जब वे निकलते तो उनके होंठों पर पपडिय़ाँ जमी रहतीं। तूंबियाँ खोलने के बाद वे गर्मी के दिन होने पर भी थोड़ी देर तक तौलियों में छिपे रहते। वह जब अपना बदन पोंछता तो पाता की मीरा की अपेक्षा उसकी कमर में रस्सी के लाल निशान कम उभरे हैं।

विशू ने जोर से पत्थर फेंका तो वह चार-पाँच बार पानी पर उचटता काफी दूर जाकर डूब गया। तिजहरिया में कपड़े धोती तीन वयस्क औरतों को छोड़ घाट पर और कोई नहीं था। जब मीरा साथ रहती तो उसका काफी समय इसी तरह पत्थर उचकाने में बीतता। तब यदि कोई घाट पर होता तो उन्हें खेल में बाधा पड़ने का डर लगा रहता। घाट के पास, कुछ दिन हुये, एक मढ़ि‍या बनी थी। वहाँ से वे पानी में फेंकने के लिये पत्थर की चीपों के छोटे-छोटे टुकड़े इकट्ठा करते। मीरा के फेंके पत्थर पानी पर उचटने की जगह हमेशा हवा में अधगोला बनाते डब्ब-से पानी के नीचे चले जाते। उसे आश्चर्य होता कि विशू कैसे पत्थरों को इतनी बार उचटा लेता है। कभी-कभी आसपास के कुछ लड़के आकर उनके खेल में शामिल हो जाते। उनसे जब विशू हारता तो मीरा को बुरा लगता, खेल में उसकी रुचि खत्म हो जाती।

‘‘अब घर चलो विशू, खूब देर हो गयी है।’’

‘‘अभी तो सब लोग सो रहे होंगे।’’

‘‘नहीं, वहाँ चलो, बगीचे में खेलेंगे।’’

‘‘अच्छा, रुको अभी चलते हैं।’’

विशू फिर खेल में व्यस्त हो जाता। मीरा तालाब की संकरी फसील पर चढ़ घूमने लगती। जब उसे तैरना नहीं आता था तो ऐसा करते हमेशा डरती कि कहीं पानी में न गिर पड़े। फसील पर अपनी समझ में काफी देर घूम चुकने के बाद वह अक्सर पेशाब करने बैठ जाती। इतनी बड़ी होकर भी उसे समय या जगह का जरा भी खयाल नहीं रहता था। चाची, एक-दूसरे की माँ को वे चाची कहते, के पास मीरा के पेशाब करने से सम्‍बन्‍धि‍त कि‍स्‍सों का ढेर था। चाची अक्‍सर उससे कहा करतीं कि‍ मीरा के लिए अब फिर से रबर की चादर लानी पड़ेगी। मीरा उनकी इस आदत से बहुत चिढ़ती थी। उसे सबसे बड़ी आपत्ति इस बात से थी कि वह विशू को क्यों सारी बातें बता देती हैं। विशू इतना खराब था कि झगड़ा होने पर उन्हीं बातों से उसे चिढ़ाता।

‘‘विशू, अब चलो।’’ मीरा उन लड़कों के साथ विशू को नया खेल शुरू करते देख उतावली हो उठती। विशू ध्यान नहीं देता तो वह गुस्से में पीछे से उसकी कमीज पकड़ लेती।

‘‘अब चलो विशू, सच्ची खूब देर हो गयी।’’

‘‘बस, थोड़ी देर और रुक जाओ।’’

‘‘नहीं, अब चलो।’’

‘‘तो तुम जाओ, हम अभी आते हैं।’’

‘‘हम चाची से बता देंगे कि विशू तालाब पर खूब शैतानी कर रहा है।’’

कहकर मीरा सचमुच चल पड़ती। कहने को तो विशू कह देता, जाओ बता देना, हमें किसी का डर नहीं पड़ा है, लेकिन जल्द ही उस धमकी का असर उस पर छा जाता। अधरस्ते ही वह मीरा को पकड़ लेता। खुशी में मीरा यह पूछना भूल जाती कि जब उसे किसी का डर नहीं पड़ा है तो फिर चला क्यों आया। रास्ते में हमेशा कोई फूलों का गुच्छा या कोई विचित्र से रंग का पत्ता तोडऩे के लिए विशू से आग्रह करती। कुछ पेड़ों पर तो वह चढ़ जाता, लेकिन कुछ इतने पतले या झाड़ीनुमा होते कि उनके फूल तोडऩे के लिए जमीन पर से ही कोशिश करना पड़ती।

जब वह उचक कर भी वहाँ तक नहीं पहुंच पाता तो मीरा उससे घोड़ा बनने को कहती। विशू दोनों हाथ जमीन पर टेक देता तो वह फूल तोडऩा छोड़ उसका गर्दन पर सवार हो जाती। उसकी चड्डी में से हमेशा पेशाब के साथ, धुले कपड़ों की मिली-जुली बास आती थी, जिसे वह सूँघना न चाहते भी सूँघता था। मीरा एक बार बैठ जाता तो तब तक उसकी गर्दन नहीं छोड़ती जब तक कि विशू खुद उसकी पतली टांगों के बीच से सिर न निकाल लेता। इस प्रयास में अक्सर दोनों ही जमीन पर गिर पड़ते। विशू कहता कि अब वह कभी उसके लिए फूल नहीं तोड़ेगा लेकिन ऐसी बातें या तो वह कहने के साथ ही भूल जाता, या उसे उसमें कुछ भी अजीब नहीं लगता कि वह जब कुछ कहता है तो फिर उसे करता क्यों नहीं।

मीरा के बिना विशू की समझ में नहीं आ रहा था कि घाट पर क्या करे। पत्थर उचटाने के खेल से बहुत जल्द ऊब कर अब वह एक पेड़ के नीचे बैठा था। तालाब के दूसरे किनारे के पास एक आदमी नंगे बदन डोंगे में बैठा, मछली मार रहा था। सारे तालाब पर छोटी-छोटी लहरें उभरी थीं। जिनके ऊपर सूरज गोल टुकड़ों में चिलक रहा था। कभी-कभी कोई चिडिय़ा बहुत तेजी से नीचे आ, पानी की सतह को छूती फिर आसमान में उड़ जाती। मीरा को रुला कर अब विशू को बहुत बुरा लग रहा था। उसे मीरा पर कुछ गुस्सा भी आया कि वह उतनी जल्दी रोने क्यों बैठ गयी। उसे आश्चर्य था कि मीरा इतनी-सी बात भी क्यों नहीं समझ सकी कि वह दाँत खपरैल पर कभी भी नहीं फेंकता। चूहे के बिल को छोड़ टूटे दाँत के लिए और कोई जगह होती ही नहीं।

मीरा ने जब कहा, ‘‘विशू चलो, तुम्हें चाची बुला रही हैं’’ तो वह चौंक गया। उसने मुड़ कर देखा तो वह दूसरी तरफ देखने लगी। पहले तो उसकी समझ में नहीं आया कि अम्मा को उसने कौन-सा काम आ पड़ा, लेकिन मीरा को दूसरी ओर देखता पा, वह काफी डर गया। उसकी इच्छा हुई कि चुगली करने पर मीरा को पकड़कर मार लगाए, लेकिन एक अपराध के बाद दूसरा अपराध करने पर उसमें हिम्मत नहीं थी।

‘‘जाओ, अम्मा से कह दो कि हम थोड़ी देर में आते हैं।’’

‘‘नहीं, उन्होंने कहा है कि उसे लेकर जल्दी आओ। वह बरामदे में खड़ी हैं।’’

‘‘तुमने चुगली क्यों की, हम क्या तुम्हें दाँत दे नहीं देते?’’ विशू ने मीरा को छोटा-सा सफेद दाँत लौटा दिया। मीरा मन में जरूर खुश हुई होगी। लेकिन विशू से बिना कुछ कहे वह उसके पीछे-पीछे चलने लगी।

‘‘हम अम्मा से कह देंगे कि दाँत तो हमने पहले ही मीरा को लौटा दिया था।’’

‘‘वह मानेंगी ही नहीं।’’

‘‘तुम चुप रहो। तुमसे कौन बात कर रहा है?’’

‘‘नहीं रहते, जाओ।’’

‘‘तुम्हें मार तो नहीं खानी, मीरा?’’

‘‘तुम हमें मारोगे तो चाची तुम्हें भूसे वाली कोठरी में बंद कर देंगी?’’

विशू कुछ नहीं बोला। एक बार मीरा को खेल-खेल में मारने पर सचमुच उसे काफी देर उस कोठरी में बन्‍द रहना पड़ा था। यदि मीरा की माँ उसे न निकालती तो उसकी माँ ने तो तय कर लिया था कि उसे रात भर बन्‍द रखेंगी। उसने एक बार मुड़ कर मीरा को देखा कि शायद बचाव का कोई रास्ता निकल आए, लेकिन वह जमीन की तरफ देखती चल रही थी। घर के अहाते में पहुँच विशू की चाल बहुत धीमी पड़ गयी। इधर-उधर देखता, जब वह बरामदे के बिल्कुल करीब पहुँचा तो उसे अम्मा कहीं नहीं दिखीं। इससे पहले कि वह मीरा से कुछ पूछता, उसकी पीठ पर एक घूँसा मार, क्या बुद्धू बनाया-क्या बुद्धू बनाया गाती मीरा चौके की तरफ भाग गयी।

उसे बचाने वालों की वहाँ कमी नहीं होगी, यह सोच विशू अपनी माँ के कमरे में आ, खाट पर लेट गया। इस तरह से बुद्धू बन जाना उसे बहुत अखरा। उस समय घर में हो रहा हल्ला उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। पड़ोसी के यहाँ जगह कम होने से उनके कई मेहमान मीरा के यहाँ टिके थे। उनके साथ आये बच्चे तमाम वक्त रोते-चिल्लाते रहते। उनसे, बहुत थोड़ी जान-पहचान होने के कारण, विशू कतराता था। वैसे, उन बच्चों का अपना गिरोह ही इतना बड़ा था कि उन्हें विशू या मीरा को अपने खेलों में शामिल करने की जरूरत महसूस नहीं होती थी। मीरा जरूर कभी-कभी उनमें से कुछ को फोड़ अपना अलग दल बना लेती जिसमें उसके चाहने पर भी विशू नहीं रहता था।

किवाड़ के पास से मीरा ने उसे पुकारा तो उसने आँखें बन्‍द कर लीं।

‘‘विशू, देखो हम कौन-सी किताब लाये हैं,’’  कहती वह उसका खाट के पास आ गयी।

‘‘विशू।’’

‘‘क्या है?’’

‘‘लो, यह किताब लाये हैं हम तुम्हारे लिए।’’

‘‘हमें नहीं चाहिए तुम्हारी किताब।’’

मीरा थोड़ी देर चुप खड़ी रही फिर किताब उसका खाट पर रख, बाहर चली गयी। अच्छी तरह से आश्वस्त होकर कि वह कहीं से देख नहीं रही है, विशू वह जासूसी उपन्यास पढऩे लगा। करीब दस-बारह पन्ने पढऩे के बाद आहट सुनकर वह फिर सोने का बहाना करने लगा। उसकी खाट से थोड़ा हट कर मीरा ने फर्श पर कैरम बोर्ड बिछा दिया। विशू अधमुंदी आँखों से उसे गोट गलत जमाकर खेलते देखने लगा। वह कैरम बोर्ड बहुत पुराना था। उस पर चारों तरफ खिंची समानांतर रेखायें लगभग मिट चुकी थीं। सिर्फ एक छेद को छोड़ बाकी की, मटमैली जालियाँ फट कर नीचे झूलने लगी थीं। उन फटी जालियों वाले छेदों में गोटें गिरतीं तो अक्सर लुढ़कती बहुत दूर तक चली जातीं। मीरा को खेल से अधिक ऐसी गोटों को पकडऩे में मजा आता था। कैरम बोर्ड की रेखायें यदि स्पष्ट  होतीं, तब भी मीरा के निकट कोई अन्‍तर न पड़ता। वह गप्पे को कहीं भी रखकर निशाना साधती थी।

‘‘मीरा, तुम बहुत हल्का कर रही हो।’’

मीरा इतनी जोर से चौंकी कि गप्पे पर उसका उँगली फिसल गयी।

‘‘हम तो खेल रहे हैं।’’

‘‘तुम बाहर जाकर क्यों नहीं खेलती?’’

‘‘तुम भी खेलों न हमारे साथ विशू।’’

‘‘तुमसे गोटें तक तो जमाते नहीं बनतीं।’’

‘‘अच्छा, दिखायें जमाकर?’’

विशू के हाँ कहने पर दोनों कुहनियाँ कैरम बोर्ड पर रख, मीरा बड़ी लगन से गोटें जमाने लगी। बीच-बीच में वह अपनी समझ में कोई गलती करती तो थोड़ी देर गाल में उँगली धँसा कर कुछ सोचने लगती, फिर किसी काली गोट की जगह सफेद या सफेद की जगह काली गोट रख देती। सभी गोटें रख चुकने पर उसने विशू की तरफ देखा तो वह, एकदम गलत, कहकर कैरम बोर्ड के पास जा बैठा।

‘‘ठीक तो है विशू।’’

जवाब न दे, वह उन्हें ठीक से जमाने लगा। मीरा ने नीला गप्पा अपने हाथ में ले लिया। काली गोटें उसे अच्छी नहीं लगती थीं। उसे पता था कि जो शुरू करता है, उसकी सफेद गोटें होती हैं।

वे खेलने लगे। मीरा जब अचरज से उसे एक के बाद एक गोटे लेते देखती तो विशू बहुत खुश होता, लेकिन थोड़ी ही देर में वह ऊब गया। मीरा इतनी जल्दी अपनी बारी खो देती कि उसे लगता वह अकेला ही खेल रहा है।

‘‘हमें तो भूख लगी है।’’

‘‘आज तो सरला दीदी के यहाँ खाने जाना है।’’

‘‘चलो चौके में कुछ खा लेंगे।’’

मीरा ने फिर एतराज नहीं किया। खाना उसके प्रिय कामों में एक था। चौके में उन्हें खाने को कुछ नहीं मिला, लेकिन मीरा को वह जगह मालूम थी जहाँ उनसे छिपाकर मिठाइयाँ या फल रखे जाते थे।

अच्छी तरह खा कर वे अपनी करतूत छिपाने में लगे थे कि तभी बाजों की आवाज सुनाई दी।

‘‘विशू, बारात।’’ मीरा लगभग चिल्ला पड़ी।

दौड़ते-दौड़ते वे पड़ोसी के घर पहुँच गये। मीरा के पिता उस घर के अन्य लोगों के साथ वहाँ खड़े थे। उन सभी के हाथों में मालायें थीं जिन्हें वे बारातियों को पहना रहे थे। वे दोनों भी एक-दूसरे का हाथ थामे, वहाँ जाकर खड़े हो गये। मीरा को कई लोगों ने प्यार से अपनी मालायें पहना दीं। विशू को भी शायद पहनाते, लेकिन वह थोड़ा हट कर खड़ा हो गया था। उसे उन लोगों से काफी शर्म लग रही थी। वैसे भी वह नये लोगों से बहुत झेंपता था। उसकी माँ जब किसी मेहमान से कहतीं, ‘मेरा विशू चौदह का हो गया है’ तब भी उसके कान जलने लगते।

सब लोगों के साथ विशू भी पण्‍डाल में आ गया। मीरा अपनी सरला दीदी को देखने घर में चली गयी। पण्‍डाल में लगी रंगीन कागज की झंडियाँ हवा में फरफरा रही थीं। बाहर का अन्‍धेरा तेज रोशनी में और भी घना हो गया था। वहाँ, रोशनी में चमकती आसपास के पेड़ों की निचली डालों के अतिरिक्त, कुछ भी नहीं दिख पड़ता था। उन लोगों को शरबत पीते देख विशू की भी इच्छा हुई कि पिए। उसने सोचा, यदि कोई खुद लाकर दे देगा तो वह पी लेगा। काफी राह देखने पर भी जब कोई उसके पास नहीं आया तो वह मीरा का इंतजार करता, पण्‍डाल के बाहर, विरल घास पर लेट गया। मीरा उसे ढूँढती जब उस किनारे पहुँची जहाँ वह लेटा था, तो विशू ने उसे बुला लिया।

‘‘विशू, सरला दीदी बहुत खराब है,’’ कहती वह उसके पास जाकर बैठ गयी।

‘‘क्यों?’’

‘‘उन्होंने हमसे बात ही नहीं की।’’

‘‘मीरा, तुमने शरबत पिया?’’

‘‘हाँ, दो गिलास। खूब अच्छा है। तुमने कितने गिलास पिये विशू?’’

विशू चुप रहा। उसने सोचा मीरा से अपने लिए मंगवाए, लेकिन टाल गया।

‘‘विशू, तुमने सरला दीदी की साड़ी देखी?’’

‘‘कैसी है?’’

‘‘इतनी चमक रही है कि क्या बतायें। अम्मा चाची से कह रही थीं कि बनारस से लायी है।’’ कहकर मीरा उसके पास लेट गयी।

‘‘हमें तो नींद आ रही है विशू।’’

‘‘यहाँ मत सोओ, घर चलकर सोना।’’

‘‘विशू, हमारा एक दाँत और हिल रहा है। तुमने चौके वाला बिल देखा है?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘खूब बड़ा है, सबेरे तुम्हें दिखायेंगे।’’

उसके बाद जब एक बार विशू कहकर वह काफी देर चुप रही तो विशू ने उसकी तरफ देखा। वह सो चुकी थी। उसका एक हाथ छाती पर पड़ा था। विशू के सिर में छोटे-छोटे कंकड़ गड़ रहे थे। उसने मीरा के पेट पर सिर रख लिया। काफी देर तक उसके पेट से आती गुड़-गुड़ आवाज सुनता इस बात से खुश होता रहा कि कल नहीं तो परसों तक वे पिन्ने बच्चे यहाँ से चले जायेंगे, फिर मीरा को घर ले जाने के लिए जगाने लगा।

अमरकांत होने का अर्थ : प्रणय कृष्‍ण

कथाकार अमरकांत को मि‍ले ज्ञानपीठ पुरस्‍कार के बहाने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की वि‍शेषताओं को रेखांकि‍त करता युवा आलोचक और जसम के महासचि‍व प्रणय कृष्‍ण का आलेख-

सादगी बड़ी कठिन साधना है। अमरकांत का व्यक्तित्व और कृतित्व, दोनों ही इसका प्रमाण हैं। अमरकांत के जीवन संघर्ष को कोई अलग से न जाने, तो उनके सहज, आत्मीय और स्नेहिल व्यवहार से शायद ही कभी समझ पाए कि‍ इस सहजता को कितने अभावों, बीमारियों, उपेक्षाओं और दगाबाजियों के बीच साधा गया है। आत्मसम्मान हो तो आत्मसम्मोहन, आत्मश्लाघा और आत्मप्रदर्शन की ज़रूरत नहीं पड़ती। मुझे लगता है कि‍ 16 साल की उम्र में बलिया के जिस बालक ने कॉलेज छोड़ जे. पी.- लोहिया- नरेन्द्र देव के नेतृत्व वाले ‘भारत छोडो़ आन्दोलन’ में कूद पड़ने का निर्णय लिया था, वह बालक अभी भी अमरकांत में ज़िन्‍दा है।

जिस रचनाकार की 2-3 कहानियाँ भी दुनिया के किसी भी महान कथाकार के समकक्ष उसे खडा़ करने में समर्थ हैं, (‘दोपहर का भोजन’, ‘डिप्टी कलक्टरी ‘, ज़िन्दगी और जोंक’ या कोई चाहे तो अन्य कहानियाँ भी चुन सकता है), उसे उपेक्षा की मार पड़ती ही रही। ये उनके छोटे बेटे अरविन्द और बहू रीता का ही बूता था कि अपनी स्वतंत्र ज़िंदगी छोड़ उन्होंने हिन्दी समाज के इस अप्रतिम कथाकार को हमारे बीच भौतिक रूप से बनाए और बचाए रखा है।

अमरकांत भारतीय जीवन की वि‍दूपताओं, उसकी घृणास्‍पद तफसीलों में बगैर कि‍सी अमूर्तन का सहारा लिए अपनी ठेठ निगाह जितनी देर तक टिका सकते हैं, उतना शायद ही कोई अन्य प्रेमचंदोत्तर कथाकार कर पाया हो।  उनका कथाकार भीषण रूप से अमानवीय होती  गयी  स्वातंत्र्योत्तर भारत  की परिस्थितियों के बीच बगैर भावुक हुए, बगैर किसी हाहाकार का हिस्सा बने पशुवत जीवन जीने को अभिशप्त किरदारों के भीतर भी इंसानियत की चमक को उभार देता  है। अमरकांत  साबित कर देते हैं  कि इसके लिए किन्ही बड़े आदर्शों का चक्कर  लगाना ज़रूरी नहीं, बल्कि जीवन खुद ऐसा ही है। जीवन से ज़्यादा विश्वसनीय कुछ और नहीं। ‘ज़िंदगी और जोंक’ का रजुआ एक असंभव सा पात्र है लेकि‍न पूरी तरह विश्वसनीय। हम आप भी रजुआ को जीवन में देखे हुए हैं, लेकिन उसके जीवन और चरित्र की जटिलताओं में जब हम अमरकांत की लेखनी की मार्फत प्रवेश करते हैं, तब हमारे सामने एक असंभव सा जीवन प्रत्यक्ष होता है, मानवता के सीमान्त पर बसर की जा रही ज़िंदगी  सहसा हमारे बोध में दाखिल होती है। विश्वनाथ त्रिपाठी ने ठीक ही लिखा है कि अमरकांत ‘कफ़न’ की परम्परा के रचनाकार हैं। ‘ज़िंदगी और जोंक’ के रजुआ का ‘करुण काइयांपन’ घीसू-माधो के काइयांपन की ही तरह उसकी असहायता की उपज है। यह कहानी उस अर्द्ध औपनिवेशिक और मज़बूत सामंती अवशेषों वाले भारतीय पूंजीवादी व्यवस्था पर चोट है जिसने गरीब आदमी को पशुता के स्तर पर जीने को मजबूर कर रखा है, जिसका ज़िंदा बचा रहना ही उसकी उपलब्धि है, जिसकी जिजीविषा ने ही उसे थेथर बना दिया है, जिसका इस समाज में होना ही व्यवस्था पर करारा व्यंग्य भी है और उसकी अमानवीयता का सूचकांक भी।

अमरकांत विडम्बनाओं और विसंगतियों को जिस भेदक व्यंग्य के साथ प्रकट करते हैं, वह दुर्लभ है। वह जिस बहुविध द्वंद्वों से घिरे समाज के कथाकार हैं, उसकी जटिल टकराहटों में निर्मित किरदारों और जीवन व्यापार को वह ऐसी सहजता से पेश करते हैं कि कोई धोखा खा जाए। पशु-बिम्बों में अंकित अनगिनत मानवीय भंगिमाएँ, कहानियों की निरायास प्रतीकात्मकता, माहौल को सीधे संवेद्य बनाने वाली बिलकुल सामान्य जीवन-व्यवहार से ली गईं नित नूतन उपमाएं, जनपदीय मुहावरों और कथन-भंगिमाओं से भरी, सहज और खरी चलती हुई ज़बान, अद्भुत सामाजिक संवेदनशीलता और मनोवैज्ञानिक गहराई से बुने गए तमाम दमित तबकों से खड़े किए गए उनके अविस्मर्णीय चरित्र, समाज और दुनिया को आगे ले जानेवाली बातों और भाव-संरचनाओं का गहरा विवेक उनके कथाकार की विशेषता है। रजुआ, मुनरी, मूस, सकलदीप बाबू , ‘इन्हीं हथियारों से’ की  बाल-वेश्या ढेला, सुन्नर पांडे की पतोह, ‘हत्यारे ‘ कहानी के दो नौजवान, बऊरईया कोदो खानेवाला गदहा जैसे अनगिनत अविस्मर्णीय और विश्वसनीय किरदारों के ज़रिए अमरकांत ने हमारे समाज की विडंबनाओं को जिस तरह मूर्त किया है, वह सरलता के जटिल सौन्दर्यशास्त्र का प्रतिमान है। उत्तरवादी और अन्तवादी घोषणाओं के नव- साम्राज्यवादी दौर में भी अमरकांत के यथार्थवाद को विकल्पहीनता कभी क्षतिग्रस्त न कर सकी। इसका प्रमाण है 2003 में प्रकाशित उनका  उपन्यास ‘इन्हीं हथियारों से’ जो सन् 1942 के ‘भारत छोडो आन्दोलन’ की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है।

प्रगतिशील आन्दोलन के 75वें साल में अमरकांत को यह सम्मान मिलना एक सुखद संयोग है। ज्ञानपीठ से सम्मानित हिंदी के अन्य मूर्धन्य साहित्यकारों का प्रगतिशील आन्दोलन से वैसा जीवन भर का सम्बन्ध नहीं रहा जैसा की अमरकांत का। अमरकांत को जितने सम्मान, पुरस्कार मिले हैं, उनकी कुल राशि से ज़्यादा उनके जैसे व्यापक रूप  से पढ़े जाने वाले लेखक की रायल्टी बनती थी, जिसे  देना उनके प्रकाशकों को गवारा न हुआ। पिछले 15 सालों से हमने अमरकांत को कम से कम तीन किराये के मकानों में देखा है। दो कमरों से ज़्यादा का घर शायद ही उन्हें मयस्सर हुआ हो।

‘इन्ही हथियारों से’ का एक अदना-सा पात्र कहता है, ‘‘बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े सिद्धान्त सिर्फ व्यवहार से ही सार्थक और सहज हो सकते हैं, जिसके बिना जीवन से ही रस खींचकर गढ़े हुए सिद्धान्त,जीवन से अलग होकर बौने और नाकाम हो जाते हैं।’’ अमरकांत का जीवन और रचना-कर्म खुद इस की तस्दीक करता है। काश ! हिन्दी के प्रतिष्ठान चलाने लोग अमरकांत होने के इस अर्थ को समझ पाते।

पन्‍द्रह छोटी-छोटी कवितायें : जवाहर लाल गोयल

प्रसि‍द्ध लेखक-चित्रकार जवाहर गोयल की छोटी कवि‍तायें –

1-

घर में रहते हुये

दिन डूबने पर लगता

काश घर में होते

2-

कुछ पढा़ नहीं जाता पर

हाथ अपने से बढ़ता

लगता पढ रहे होते

3-

झरती गिरी थीं पत्तियाँ

धूल में बिखरती रहीं

यह अलग सच था

पेड़ हरा होता रहा

4-

तेज हवा में नबी घास

बिछ गयी जमीन पर

बारिश थमते ही तनी खडी

फिर झूम के लहरा रही

5-

केवल मेरा

यह गूंजन करता भौंरा

सारे दिन मौन कुतरता

6-

शाम में

आता याद

अंधेरे का इतिहास

7-

पत्तों पर गिरते पत्ते

धूल माटी डंठल

धरती की गहरी साँस

धीमे से उड़ती राख

8-

होता प्रतिदिन सबके साथ

पर कितना अकस्मात

कितना नूतन कितना विराट

कोई भी पहला अनुभव स्मृत

9-

पत्तों से पत्तों पर गिरती

बारिश की आवाज

रात में ढोल मजीरों का उल्लास

10-

सूखी कडी़ मिट्टी

खोदने पर

नीचे नर्म मिलती

11-

जंगल में घुस

बढ़ता दिन खुलता

सब कुछ पीछे कर

पेड़ों को ले आता निकट

12-

पाने का मन याने लालच

होने का मन याने सत्ता

नाद याने उन्मुक्त गूँजती रिक्तता

13-

यह मैं हूँ।

कहाँ?

यहाँ कुछ भी नही!

केवल तुम्हें पाता मैं।

14-

अनुभव नहीं

ज्ञान नही

केवल क्षितिज सी मुस्कान

घंटी के स्वर

कम्पन्न

थमता मन

थिरता समय

15-

शब्द जमा हों और बहें

ढलान पर धारा में पारदर्शी

निथरते सूखते दाग छोड़ते

सोखे जाते विलीन होते

वत्सल धरा बनते

 

नैनीताल में “सिनेमा कैसे समझें” वर्कशाप 24 से

नैनीताल : उत्तराखंड में अर्थपूर्ण सिनेमा को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से जन संस्कृति मंच और युगमंच 2009  से प्रतिरोध का सिनेमा फिल्म फेस्टिवल हर वर्ष आयोजित कर रहे हैं.  इसी कड़ी में सितम्बर 24-25, 2011 को दो दिवसीय सिनेमा वर्कशाप  “सिनेमा कैसे समझें”  आयोजित की जा रही हैं. वर्कशाप में सीमित सीटें ही उपलब्ध हैं. नैनीताल से बाहर से आने वाले प्रतिभागियों को रहने -खाने की व्यवस्था खुद करनी होगी.
पहला दिन
सत्र एक: सिनेमा का संछिप्त इतिहास (2 घंटे )
सत्र दो: सिनेमा का मतलब (2 घंटे )
सत्र तीन : सिनेमा की भाषा  (2 घंटे )
दूसरा दिन
सत्र एक  : स्क्रिप्ट लेखन की मूल बातें (2 घंटे)
सत्र दो : स्क्रिप्ट को कैमरे से रिकार्ड करना   (3 घंटे )
सत्र तीन  : फुटेज को फिल्म में बदलना – एडिटिंग वर्कशाप  (3 घंटे )
वर्कशाप की ख़ास बातें :
इस वर्कशाप का मकसद सिनेमा माध्यम के प्रति लोगों को रुचिवान बनाना है. सिनेमा के विभिन्न पक्षों को समझाने के लिए विश्व सिनेमा की कालजयी कृतियों का इस्तेमाल किया जाएगा. इस तरह यह वर्कशाप सिनेमा की बारीकियों को समझने के साथ -साथ सिनेमा के आस्वाद की भी कुछ तमीज सिखा सकेगी.
वर्कशाप के संचालक :
इस दो दिन की सिनेमा वर्कशाप को सिनेमा और थियटर से जुड़े सुदर्शन जुयाल और संजय जोशी संचालित करेंगे.
वर्कशाप के लिए पात्रता
इस वर्कशाप के हर कोई व्यक्ति आमंत्रित है जो सिनेमा को तीन घंटे के सस्ते मनोरंजन के अलावा किसी दूसरे महत्त्वपूर्ण कला माध्यम के रूप में भी महत्व देता है.
वर्कशाप की फीस :
यह वर्कशाप बिना किसी आर्थिक लाभ के उद्देश्य के तहत सार्थक सिनेमा को लोकप्रिय बनाने के लिए बिना स्पांसरशिप के आयोजित की जा रही. हम हरेक प्रतिभागी से उम्मीद करते हैं कि युगमंच और द ग्रुप, जन संस्कृति मंच के इस अभिनव प्रयास को सफल बनाने के लिए वे ५०० रुपये का  न्यूनतम सहयोग
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें :

ज़हूर आलम, संयोजक, “सिनेमा कैसे समझें ” दो दिवसीय सिनेमा वर्कशाप
09412983164 

‘युवा रचनाधर्मिता- हिंदी कहानी’ पर चर्चा 24 को

नई दिल्‍ली: ‘अंजना – एक विचार मंच’ की ओर से ‘युवा रचनाधर्मिता- हिंदी कहानी’ पर विचारोत्तेजक सभा (आज के युवा कथाकार की हिंदी कहानी पर एक महत्वपूर्ण चर्चा) का आयोजन 24 सितम्बर, 2011 को समय शाम 5 बजे से हिंदी भवन, विष्णु दिगंबर मार्ग, दिल्ली  में किया जाएगा।

सभा में मुख्य अतिथि ममता कालिया और विशिष्ट अतिथि कमल कुमार होंगी। अध्यक्षता मैत्रेयी पुष्पा करेंगी। प्रेम भारद्वाज, मनीषा कुलश्रेष्ठ, अनुज व दिनेश कुमार विशिष्ट वक्ता होंगे। सभा में चार युवा साहित्यकारों को ‘डॉ अंजना सहजवाला साहित्य सम्मान’ दिया जाएगा। सभा के अंत में उपस्थित श्रोता विषय से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण मुद्दा उठा सकेंगे।

 

वीरेन डंगवाल, हेमंत कुकरेती औए उस्मान खान का कविता पाठ 22 को

नई दिल्‍ली : इंडिया हैबिटैट सेंटर द्वारा शुरू की गई काव्य-पाठ की कार्यक्रम-श्रृंखला ‘कवि के साथ’ के दूसरे आयोजन में 22 सितम्‍बर, 2011 को शाम सात बजे से कैजुरिना हॉल, इंडिया हैबिटैट सेंटर, लोधी रोड, नई दिल्ली में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कवि वीरेन डंगवाल कविता पाठ करेंगे। उनके साथ युवा कवि हेमंत कुकरेती और उस्मान खान  भी अपनी कविताओं का पाठ करेंगे।

कवि और कविता से कविताप्रेमी हिंदी समाज का सीधा संपर्क-संवाद बढ़े, इसी उद्देश्य से शुरू किये गए इस कार्यक्रम का आयोजन हर दूसरे माह में हुआ करेगा। इसमें हर बार हिंदी कविता की दो पीढ़ियां एक साथ मंच पर होंगी। पाठ के बाद श्रोता उपस्थित कवियों से सीधी बातचीत कर सकेंगे।
तीनों कवियों की एक-एक कविता-

कुछ चीजें आती हैं एक साथ : उस्मान खान

जैसे कोई कहे – प्यार

तो किनारे पड़ी एक नाव में उतरी शाम और
जंगली फूलों का गुच्छा तोहफे में
उदास रतजगों के मोड़ पर
अकेला खड़ा नीम

जैसे कोई कहे – घर
तो सिलाई मशीन की घड़-घड़

डम्मर लगे तीर
दांत काटे सिक्के
रोज़गार कार्यालय के सामने खड़ा खजेला कुत्ता एक

जैसे कोई कहे – देश
तो श्मशान में एक इमली का पेड़
जिस्म से जान खेंचता चाँद
घर लौटी औरतें
और घर नहीं लौटी औरतें
जो कहा गया था
’सारे जहाँ से अच्छा’
उसके अलावा भी बहुत कुछ
एक साथ कौंध्ता है बहुत कुछ
हालाँकि,
पर्यायवाची नहीं !

दुनिया का नागरिक : हेमन्त कुकरेती

मैं दुनिया का नागरिक हूँ

यह देश मेरा निवास है

मुझमें पराजय का क्रोध है
और लड़ने की हमेशा बची इच्‍छा

जब हम इतने अलग हैं
तो प्रेम कैसा ?

जब एक नहीं हैं तो किसका
यह देश और इसका प्रेम ?

जो ऐसे प्रेम के नाम पर दी जाती है
मैं उस यातना के खिलाफ हूँ

मैं जीवित हूँ कि सोचता भी हूँ
दूसरे के समान जीवन
जीने के बारे में।

कुछ कद्दू चमकाए मैंने : वीरेन डंगवाल

कुछ कद्दू चमकाए मैंने
कुछ रास्तों को गुलज़ार किया
कुछ कविता-टविता लिख दी तो
हफ़्ते भर ख़ुद को प्यार किया

अब हुई रात अपना ही दिल सीने में भींचे बैठा हूँ
हाँ जीं हाँ वही कनफटा हूँ, हेठा हूँ
टेलीफ़ोन की बग़ल में लेटा हूँ
रोता हूँ धोता हूँ रोता-रोता धोता हूँ
तुम्हारे कपड़ों से ख़ून के निशाँ धोता हूँ

जो न होना था वही सब हुवाँ-हुवाँ
अलबत्ता उधर गहरा खड्ड था इधर सूखा कुआँ
हरदोई मे जीन्स पहनी बेटी को देख
प्रमुदित हुई कमला बुआ

तब रमीज़ कुरैशी का हाल ये था
कि बम फोड़ा जेल गया
वियतनाम विजय की ख़ुशी में
कचहरी पर अकेले ही नारे लगाए
चाय की दुकान खोली
जनता पार्टी में गया वहाँ भी भूखा मरा
बिलाया जाने कहॉं

उसके कई साथी इन दिनों टीवी पर चमकते हैं
मगर दिल हमारे उसी के लिए सुलगते हैं

हाँ जीं कामरेड कज्जी मज़े में हैं
पहनने लगे है इधर अच्छी काट के कपडे
राजा और प्रजा दोनों की भाषा जानते हैं
और दोनों का ही प्रयोग करते हैं अवसरानुसार
काल और स्थान के साथ उनके संकलन त्रय के दो उदहारण
उनकी ही भाषा में :

” रहे न कोई तलब कोई तिश्नगी बाकी
बढ़ा के हाथ दे दो बूँद भर हमे साकी ”
“मजे का बखत है तो इसमे हैरानी क्या है
हमें भी कल्लैन द्यो मज्जा परेसानी क्या है ”

अनिद्रा की रेत पर तड़ पड़ तड़पती रात
रह गई है रह गई है अभी कहने से
सबसे ज़रूरी बात।


अमरकांत व श्रीलाल शुक्ल को ज्ञानपीठ पुरस्कार

नई दिल्ली : वर्ष 2009 के लिए 45वां ज्ञानपीठ पुरस्कार हिन्दी लेखक अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल को संयुक्त रूप से दिया जाएगा और वर्ष 2010 के लिए 46वां ज्ञानपीठ पुरस्कार कन्नड लेखक चंद्रशेखर कंबर को दिया जाएगा।
भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया के अनुसार सोमवार शाम चयन समिति की बैठक में वर्ष 2009 के लिए हिन्दी के लब्ध प्रतिष्ठित लेखक अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल को और कन्नड के नामचीन लेखक चंद्रशेखर कंबर को क्रमश: 45वां एवं 46वां ज्ञानपीठ पुरस्कार को देने निर्णय किया गया। सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता में हुई ज्ञानपीठ पुरस्कार चयन समिति की बैठक में अन्य सदस्य प्रो मैनेजर पांडे, के सच्चिदानंदन, प्रो गोपीचंद नारंग,गुरदयाल सिंह, केशुभाई देसाई, दिनेश मिश्र और रवीन्द्र कालिया शामिल थे।

शहरयार ज्ञानपीठ पुरस्‍कार से सम्‍मानित

नई दिल्ली : शायरी के शहजादे प्रो. अखलाक मोहम्मद खान ‘शहरयार’ को वर्ष 2008 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। 18 सितम्‍बर को आयोजित समारोह में फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन ने उन्हें इस पुरस्कार देकर सम्मानित किया। अमिताभ ने कहा कि वह हिन्दी-उर्दू की साझी तहजीब के नुमाइंदे हैं और उनकी शायरी के गहरे अर्थ हैं। उर्दू कविता उनसे गौरवान्वित हुई है। वह डाक्टर राही मासूम रजा की तरह ही हिन्दी-उर्दू के बीच बनी एक काल्पनिक दीवार को तोडऩे के पक्षधर रहे हैं और वह वास्तव में हिन्दी-उर्दू की साझी तहजीब के नुमाइंदे हैं।

उन्होंने कहा कि शहरयार साहब ने फासले, अंजुमन, गमन और उमराव जान के गीतों के रूप में फिल्मों को नायाब मोती दिए हैं जो अपने आप में विराट जीवन दर्शन को समेटे हुए हैं।

अमिताभ ने कहा कि हम सब अलग तरह से अपना जीवन जीते हैं और जीवन की आपाधापी में व्यस्त रहते हैं। इसमें बहुत कम ऐसे अवसर मिलते हैं जब हम जीवन के गहरे अर्थों को समझते हैं और उनसे साक्षात्कार करते हैं। शहरयार साहब की शायरी में विविध रंग दिखाई देते हैं। उनकी शायरी सामाजिक दायित्वों से जुड़ी हुई है और उसमें सामाजिक संघर्ष भी शामिल है।

शहरयार ने कहा कि भौतिक तरक्की से रूहानी तरक्की को अलग नहीं होना चाहिए। ललित कला और अदब यह काम करते रहे हैं। ज्ञानपीठ भी यही काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि मेरा नाम भी महाश्वेता देवी, फिराख, महादेवी वर्मा के साथ लिया जाएगा। शहरयार ने कहा कि वर्तमान समय में मानवीय मूल्यों की जरूरत है और अभी भी शायरी में दूसरों के दुख दर्द को महसूस करता हूँ।

इस अवसर पर गीतकार गुलजार ने शहरयार के चयनित शायरियों पर आधारित पुस्तक ‘शहरयार सुनो’ व ‘कविताएं बच्चन की चयन अमिताभ बच्चन का’ का विमोचन किया।

रिंकू और टिंकू: उमेश कुमार

युवा लेखक और पत्रकार उमेश कुमार की बाल कहानी-

छोटा-सा ही था रिंकू, पर था बड़ा नटखट। एक दिन वह स्कूल से घर आ रहा था। रास्ते में उसे एक पिल्ला मिल गया। गोल-मटोल पिल्ले को देखकर रिंकू रुक गया। पिल्ला बहुत ही प्यार था। उसने सोचा कि सभी का नाम होता है। इसका नाम भी जरूर होना चाहिए।
उसने कहा, ‘‘शेरू।’’
पिल्ला चुपचाप रहा।
‘‘टाइगर।’’
पिल्ले ने अब भी कोई हरकत नहीं की।
‘‘टिंकू।’’
पिल्ले ने मुँह उठाकर पूँछ हिला दी।
रिंकू खुशी से चिल्ला उठा, ”मिल गया…मिल गया। इसका नाम मिल गया। इसका नाम टिंकू है।’’
रिंकू ने प्यार से बुलाया, ”टिंकू…टिंकू…।’’
टिंकू पूँछ हिलाते हुए रिंकू के पास आ गया।
रिंकू मजे से टिंकू के साथ खेलने लगा। टिंकू भागता तो रिंकू उसे पकड़ता और रिंकू भागता तो टिंकू उसे पकड़ता। दोनों पकड़म पकडा़ई का खेल बहुत देर तक खेलते रहे। रिंकू को ध्यान आया कि उसे देर हो रही है। वह बोला, ”बाप रे, देर हो गई। मम्मी गुस्सा होगी। अच्छा टिंकू मैं घर जाता हूं। कल फिर
आऊँगा।’’
वह चल दिया। कुछ दूर जाकर उसने पीछे मुड़कर देखा। टिंकू उसके पीछे-पीछे आ रहा है। तब उसने टिंकू से पूछा, ”तुम कहाँ आ रहे हो? अपने घर जाओ।’’ पर टिंकू अपनी जगह खड़ा चुपचाप पूँछ हिलाता रहा।
”मैं अपनी मम्मी के पास जा रहा हूँ। तुम भी अपनी मम्मी के पास जाओ।’’ रिंकू ने बड़े प्यार उसकी पीठ सहलाते हुए कहा।
लेकिन टिंकू चुपचाप खड़ा रहा।
रिंकू ने पूछा, ”क्या तुम्हारा घर नहीं है?’’
टिंकू ने चुपचाप पूँछ हिला दी।
रिंकू ने सोचा, ”लगता तो यही है कि इसका घर नहीं है। इसे अपने साथ ही ले जाता हूँ।’’
रिंकू ने टिंकू से कहा, ”चलो टिंकू तुम मेरे घर चलो।’’ वह उसे अपने घर ले गया।
टिंकू को देखते ही मम्मी ने उसे डाँटा, ”इस पिल्ले को कहाँ से उठा लाया?’’
रिंकू ने कहा, ”मम्मी यह मेरा दोस्त टिंकू है। इसका कोई नहीं है- न मम्मी न पापा। इसका घर भी नहीं है। आज से यह हमारे घर में ही रहेगा, हमारे साथ!’’
मम्मी झुँझलाकर बोली, ”जा…जा…इसे बाहर छोड़ आ। सारे घर को गंदा कर देगा।’’
रिंकू टिंकू को अपने से अलग नहीं करना चाहता था। वह जब से यहाँ आया था, चुपचाप एक कोने में बैठा था। वह उसे हरहाल में अपने साथ रखना चाहता था। उसने मम्मी से बार-बार टिंकू को रखने के लिए कहा लेकिन वह तैयार नहीं हुईं।
अब रिंकू क्या करें? वह देर तक सोचता रहा। उसने टिंकू से कहा, ”मम्मी ने तुम्हें घर में रखने से मना कर दिया है। अब क्या करें?’’
टिंकू क्या जवाब देता। वह रिंकू की ओर देखकर आँखें टिमटिमाता रहा।
रिंकू को आइडिया आया कि घर के पिछवाड़े टिंकू के लिए घर बनाया जाए।
रिंकू और टिंकू घर के पिछवाड़े चले गए। रिंकू ईंटे और लकड़ी के दो फट्टे ले आया। उसने ईंटों से दीवार खडी कर दी। छत के लिए एक फट़टा लगा दिया और
दूसरे को दरवाजे की जगह लगा दिया। टिंकू के लिए घर तैयार हो गया। रिंकू ने टिंकू से कहता है, ”आज से तुम इस घर में रहोगे। मैं तुम्हारे लिए खाना ले आया करूंगा। अब मैं पढ़ने जा रहा हूं।’’
रिंकू जाने के लिए उठने लगा तो टिंकू ने उसके हाथ चाट लिए। रिंकू ने उसे समझाया, ”कुछ दिन की बात है। मैं मम्मी  को मना लूंगा। फिर तुम साथ मेरे कमरे में ही रहना।’’
रिंकू मम्मी से छिप-छिपकर टिंकू के लिए घर से खाना ले जाता था। रिंकू और टिंकू में काफी प्यार था। दोनों हमेशा साथ-साथ रहते। रिंकू स्कूल जाता
तो वह पीछे-पीछे चल देता। जब स्कूल की छुट्टी होती तो वह गेट पर पहुंच जाता।

अचानक एक दिन गांव के लोगों में बदहवासी दिखाई दी। एक पागल बिल्ली ने गांव में आतंक मचा दिया था। वह रात को लोगों पर सोते समय हमला कर काट लेती। गांव में सभी लोग काफी परेशान थे। गांव वाले बिल्ली से छुटकारा पाना चाहते थे, लेकिन उसे कोई पकड़ नहीं पाता था।
रिंकू और टिंकू को जब इस बात का पता चला तो दोनों ने गांव वालों को उस पागल बिल्ली से छुटकारा दिलाने की ठानी।
दोनों रात को बिल्ली की ताक में लगे रहते। एक रात बिल्ली रिंकू के पड़ोस में सो रहे एक बच्चे पर हमला कर दिया। बच्चे का शोर सुनकर रिंकू और टिंकू
जाग गए।
रिंकू ने टिंकू से कहा, ”कमॉन टिंकू।’’ टिंकू ने तेजी से बिल्ली का पीछा किया। भागते-भागते गांव से काफी दूर जंगल तक चले गए। बिल्ली डर गई। फिर
दोबारा गांव में नहीं आई।
गांव वालों ने रिंकू और टिंकू की बहादुरी पर दोनों को बधाई दी। मम्मी ने टिंकू को घर में रखने की इजाजत दे दी। उसके बाद रिंकू और टिंकू
साथ-साथ रहते। उनकी दोस्ती देखकर गांव वाले कहते, ”दोस्ती हो तो रिंकू और टिंकू जैसी।’’