Archive for: August 2011

व्यवस्था के शस्त्रागार का एक नया हथियार : आनन्‍द स्वरूप वर्मा

अण्‍णा हजारे के आंदोलन की सफलता, मीडिया व सत्‍ता के अंतर्संबंधों को रेखांकित करता ‘समकालीन तीसरी दुनिया ‘के सम्‍पादक और वरिष्‍ठ पत्रकार आनन्‍द स्‍वरूप वर्मा का लेख-

जो लोग यह मानते रहे हैं और लोगों को बताते रहे हैं कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट पर टिकी यह व्यवस्था सड़ गल चुकी है और इसे नष्ट किये बिना आम आदमी की बेहतरी संभव नहीं है उनके बरक्स अण्णा हजारे ने एक हद तक सफलतापूर्वक यह दिखाने की कोशिश की कि यह व्यवस्था ही आम आदमी को बदहाली से बचा सकती है बशर्ते इसमें कुछ सुधार कर दिया जाये। व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र से जिन लोगों का मोहभंग हो रहा था उस पर अण्णा ने एक ब्रेक लगाया है। अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधों का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन  से जुट गये जिसने उनकी जिन्दगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। शासन की बागडोर किसके हाथ में हो इस मुद्दे पर सत्ताधारी वर्ग के विभिन्न गुटों के बीच चलती खींचतान से आम जनता का भ्रमित होना स्वाभाविक है पर जहाँ तक इस वर्ग के उद्धारक की साख बनाये रखने की बात है, विभिन्न गुटों के बीच अद्भुत एकता है। यह एकता 27 अगस्त को छुट्टी के दिन लोकसभा की विशेष बैठक में देखने को मिली जब कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी और भाजपा की सुषमा स्वराज दोनों के सुर एक हो गये और उससे जो संगीत उपजा उसने रामलीला मैदान में एक नयी लहर पैदा कर दी। सदन में शरद यादव के भाषण से सबक लेते हुए अगले दिन अपना अनशन समाप्त करते समय अण्णा ने बाबा साहेब आंबेडकर को तो याद ही किया, अनशन तोड़ते समय जूस पिलाने के लिए दलित वर्ग और मुस्लिम समुदाय से दो बच्चों को चुना।

अण्णा हजारे का 13 दिनों का यह आंदोलन भारत के इतिहास की एक अभूतपूर्व और युगांतरकारी घटना के रूप में रेखांकित किया जाएगा। इसलिए नहीं कि उसमें लाखों लोगों की भागीदारी रही या टीवी चैनलों ने लगातार रात-दिन इसका प्रसारण किया। किसी भी आंदोलन की ताकत या समाज पर पड़ने वाले उसके दूरगामी परिणामों का आकलन मात्र इस बात से नहीं किया जा सकता कि उसमें लाखों लोगों ने शिरकत की। अगर ऐसा होता तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफोर्स को केंद्र में रखते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मंडल आयोग की रिपोर्ट पर आरक्षण विरोधी आंदोलन जैसे पिछले 30-35 वर्षों के दौरान हुए आंदोलनों में लाखों की संख्या में लोगों की हिस्सेदारी रही। किसी भी आंदोलन का समाज को आगे ले जाने या पीछे ढकेलने में सफल/असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस आंदोलन को नेतृत्व देने वाले कौन लोग हैं और उनका ‘विजन’ क्या है? अब तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी बना कर जनभावनाओं का दोहन किया जाता रहा है। अण्णा के व्यक्तित्व की यह खूबी है कि इस खतरे से लोग निश्चिंत हैं। उन्हें पता है कि रालेगण सिद्धि के इस फकीरनुमा आदमी को सत्ता नहीं चाहिए।

अण्णा का आंदोलन अतीत के इन आंदोलनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न है क्योंकि आने वाले दिनों में भारतीय समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों के बीच यह ध्रुवीकरण का काम करेगा। किसी भी हालत में इस आंदोलन के मुकाबले देश की वामपंथी क्रांतिकारी शक्तियां न तो लोगों को जुटा सकती हैं और न इतने लंबे समय तक टिका सकती हैं जितने लंबे समय तक अण्णा हजारे रामलीला मैदान में टिके रहे। इसकी सीधी वजह यह है कि यह व्यवस्था आंदोलन के मूल चरित्र के अनुसार तय करती है कि उसे उस आंदोलन के प्रति किस तरह का सुलूक करना है। मीडिया भी इसी आधार पर निर्णय लेता है। आप कल्पना करें कि क्या अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामैन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहाँ के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/अघनिष्ठ रूप से जुड़े/बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उद्धारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है।

क्या इस तथ्य को बार-बार रेखांकित करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार का मूल स्रोत सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियां हैं? इन नीतियों ने ही पिछले 20-22 वर्षों में इस देश में एक तरफ तो कुछ लोगों को अरबपति बनाया और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में मेहनतकश लोगों को लगातार हाशिये पर ठेल दिया। इन नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए अपार संभावनाओं का द्वार खोल दिया और जल, जंगल, जमीन पर गुजर बसर करने वालों को अभूतपूर्व पैमाने पर विस्थापित किया और प्रतिरोध करने पर उनका सफाया कर दिया। इन नीतियों की ही बदौलत आज मीडिया को इतनी ताकत मिल गयी कि वह सत्ता समीकरण का एक मुख्य घटक हो गया। जिन लोगों को इन नीतियों से लगातार लाभ मिल रहा है वे भला क्यों चाहेंगे कि ये नीतियां समाप्त हों। इन नीतियों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में जो उथल-पुथल चल रही है उससे सत्ताधारी वर्ग के होश उड़े हुए हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसा व्यक्ति सामने आता है जिसका जीवन निष्कलंक हो, जिसके अंदर सत्ता का लोभ न दिखायी देता हो और जो ऐसे संघर्ष को नेतृत्व दे रहा हो जिसका मकसद समस्या की जड़ पर प्रहार करना न हो तो उसे यह व्यवस्था हाथों हाथ लेगी क्योंकि उसके लिए इससे बड़ा उद्धारक कोई नहीं हो सकता। अण्णा की गिरफ्तारी, रिहाई, अनशन स्थल को लेकर विवाद आदि राजनीतिक फायदे-नुकसान के आकलन में लगे सत्ताधारी वर्ग के आपसी अंतर्विरोध की वजह से सामने आते रहे हैं। इनकी वजह से मूल मुद्दे पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

अण्णा के आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गांधीजी द्वारा चलाये गये सत्याग्रहों और आंदोलनों की उन लोगों को याद दिला दी जिन्होंने तस्वीरों या फिल्मों के माध्यम से उस आंदोलन को देखा था। गांधी के समय भी एक दूसरी धारा थी जो गांधी के दर्शन का विरोध करती थी और जिसका नेतृत्व भगत सिंह करते थे। जहाँ तक विचारों का सवाल है भगत सिंह के विचार गांधी से काफी आगे थे। भगत सिंह ने 1928-30 में ही कह दिया था कि गांधी के तरीके से हम जो आजादी हासिल करेंगे उसमें गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज हो जायेंगे क्योंकि व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होगा। तकरीबन 80 साल बाद रामलीला मैदान से अण्णा हजारे को भी यही बात कहनी पड़ी कि गोरे अंग्रेज चले गये पर काले अंग्रेजों का शासन है। इन सबके बावजूद भगत सिंह के मुकाबले गांधी को उस समय के मीडिया ने और उस समय की व्यवस्था ने जबर्दस्त ‘स्पेस’ दिया। वह तो टीआरपी का जमाना भी नहीं था क्योंकि टेलीविजन का अभी आविष्कार ही नहीं हुआ था। तो भी शहीद सुखदेव ने चंद्रशेखर आजाद को लिखे एक पत्र में इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि मीडिया हमारे बयानों को नहीं छापता है और हम अपनी आवाज जनता तक नहीं पहुंचा पाते हैं। जब भी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने वाली ताकतें सर उठाती हैं तो उन्हें वहीं खामोश करने की कोशिश होती है। अगर आप अंदर के रोग से मरणासन्न व्यवस्था को बचाने की कोई भी कोशिश करते हुए दिखायी देते हैं तो यह व्यवस्था आपके लिए हर सुविधा मुहैया करने को तत्पर मिलेगी।

अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ, दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल-पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।

(समकालीन तीसरी दुनिया/अगस्त-सितम्बर-2011 का सम्‍पादकीय)

 

 

यह जनता की जीत है : प्रणय कृष्‍ण

जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से उठी बहसों पर एक श्रृंखला लिखी है। इस लेखमाला की दो कडि़यां दी जा चुकी हैं। इस श्रृंखला का तीसरा और अंतिम लेख-

“It is not enough to be electors only. It is necessary to be law-makers; otherwise those who can be law-makers will be the masters of those who can only be electors. ” – Dr. Ambedkar

( महज मतदाता होना पर्याप्त नहीं . कानून -निर्माता होना ज़रूरी है, अन्यथा जो लोग कानून-निर्माता हो सकते हैं, वे उन लोगों के मालिक बन बैठेंगे जो कि महज चुननेवाले हो सकते हैं.”- डा. अम्बेडकर)

अन्ना ने अनशन तोड़ दिया… चुननेवालों ने कानून-निर्माताओं को बता दिया कि न तो वे सदा के लिए महज चुननेवाले बने रहेंगे और न ही कानून-निर्माताओं को अपना मालिक बनने देंगे। सिटिज़न  चार्टर, प्रदेशों  में  लोकायुक्त  की  नियुक्ति  का  प्रावधान  और  निचली  ब्यूरोक्रेसी  की  जांच, निरीक्षण और सज़ा को लोकपाल के दायरे में लाने की बात सिद्धांत रूप में संसद ने मानकर एक हद तक अपनी इज़्ज़त बचाई है। वोट अगर 184 के तहत होता तो इनके लिए इज़्ज़त बचाना और भी  मुश्किल होता। साफ़ पता चल जाता कि  कौन कहाँ है। क्रास-वोटिंग भी होती। शायद खरीद-फ़रोख्त भी। यह जीत सबसे ज़्यादा देश भर में  कस्बों और  गली-मोहल्लों में आबाद उन निम्नमध्यवर्ग और गरीब लोगों की है, अन्ना जिन  सबकी  आवाज़ बन गए, जिनके जुलूसों और नारों तक मीडिया की पहुँच नहीं थी  और  जिन्हें  इसकी  रत्ती  भर   परवाह  भी  नहीं  थी, जिन्हें  जाति-धर्म  के  नाम  पर  बरगलाया  न जा सका। शासकों को जनता ने मजबूर किया है कि सिर्फ़ विश्व-बैंक और अमेरिका के निर्देश में यहाँ कानून नहीं बनेंगे, बल्कि जनादेश से भी बन कर रहेंगे।
ये निश्चय ही जनता की जीत है। आंदोलन जब सांसदों को घेरने तक पहुँचा ऒर जेल भरो की तैयारी हो गई तो सारी ही पार्टियों को यह समझ में आया कि उनकी समवेत हार हो सकती है। इस आंदोलन का फ़ायदा न भाजपा उठा सकती थी, न कांग्रेस। कांग्रेस-भाजपा नूरा-कुश्ती तक नहीं कर पाए संसद में, जैसा कि वे न्यूक्लियर डील के सवाल पर कर ले गए थे। आगे हर किसी के सामने अनिश्चय की दीवार खडी़ थी, खुद आंदोलन के नेताओं के सामने भी। अभी भी संसदीय समिति के सामने संसद की भावना रखी जाने के बाद वह क्या करेगी, कहा नहीं जा सकता। ये बडे़ घाघ लोग हैं। फ़िर भी धमकी, चरित्र-हनन, दमन, छल-छंद, आंदोलन को तोडने का हर संभव प्रयास कर लेने के बाद ये हार गए। अन्ना भी कह रहे हैं कि लडाई में अभी पूरी जीत नहीं हुई है। यही सही बात है। आंदोलन का एक चरण पूरा हुआ।

आन्दोलन के कुछ दृश्य

1. 22 अगस्त, मानस विहार कालोनी, लखनऊ

हर दिन इस नई बस रही कलोनी में काम पर आए मज़दूरों के यहाँ से अन्ना के समर्थन में जुलूस निकलता है। सर पर गांधी टोपी पहने 5 साल का एक नन्हा हज़ारे अपनी माँ से ज़िद कर रहा है, मैं जुलूस के साथ जाऊंगा।

2. 24 अगस्त, भावनगर, गुजरात

भावनगर के स्कूल-कालेजों के 700 छात्र आइसा- इंकलाबी नौजवान सभा के आह्वान पर भ्रष्‍टाचार-विरोधी मार्च निकालते हैं। बडी तादाद में लड़कियां भी हैं। लाठीचार्ज ही नहीं, पुलिस बदसलूकी भी करती है। गिरफ़्तार किए गए चार छात्र नेता (दो लड़के और दो लड़कियां) जमानत लेने की जगह जेल जाना पसंद करते हैं। वे जेल से ही अपना वक्तव्य जारी करते हैं- “जब मोदी फ़र्ज़ी एनकाउन्टर और साम्प्रदायिक हिंसा में अपनी सरकार की भूमिका पर पर्दा डालने के लिए ईमानदार पुलिस अधिकारियों को दण्डित करता है, तो क्या यह भ्रष्टाचार नहीं?”. अगले दिन पूरे शहर के छात्र-छात्राएं थाना घेर लेते हैं। थानेदार माफ़ी मांगता है, छात्र बिना शर्त रिहा किए जाते हैं। मोदी द्वारा अन्ना के समर्थन का स्वांग तार-तार हो जाता है।

3. 24 अगस्त, द्वारका, सेक्टर-10, नई दिल्ली

एक अध्यापिका 17-18 साल के एक रिक्शाचालक के रिक्शे पर सवार होती हैं। बातचीत चल पड़ती है। रिक्शाचालक हरदोई का नौजवान है। कानपुर में स्कूल में पढ़ रहा था कि पिता की मौत  हो गई। नाम है मुख्तार सिंह (नाम से कहा नहीं जा सकता कि जाति क्या है)। मरते वक्त पिता ने पढा़ई जारी रखने के लिए कहा था। चाचा ने पैसे  देने से मना कर दिया। अब वह दिल्ली में रिक्शा खींचता है। मुख्तार सिंह इंटर के बाद बी. एड. करके स्कूल टीचर बनना चाहता है क्योंकि उसके मुताबिक यह पेशा सबसे अच्छा है जिसमें ज्ञान लिया ऒर दिया जाता है। अब मुख्तार ने प्राइवेट दाखिला लिया है। अध्यापिका पूछती है, “तुम दिन भर रिक्शा खींचते हो, तो पढते कब हो?” मुख्तार कहता है, ” मैडम, हर दिन शाम घर पहुँच कर मैं रोता हूँ, लेकिन सोचता हूँ कि अकेले में ही तो कष्ट नहीं उठा रहा हूँ। अब देखिए, अन्ना हज़ारे को, इस उम्र में भी कितना लड़ रहे हैं।” अध्यापिका का अगला सवाल है, “क्या रामलीला मॆदान गए थे?” “नहीं। हमें तो रोज़ कमाना है, रोज़ खाना है। चाह कर भी जा नही जा सके,” मुख्तार ने कहा।

4. 25 अगस्त, सलोरी, इलाहाबाद

यह इलाहाबाद का वह इलाका है जहाँ सबसे ज़्यादा छात्र रहते हैं। छोटे-छोटे कमरों में 2-2, 3-3 और कभी-कभी 4-4 छात्र। यहाँ रहना अपेक्षाकृत सस्ता है। ज़्यादातर छात्र अपना खाना खुद बनाते हैं, उन्हीं छोटे कमरों में। कई तो अपना राशन भी गाँव से ही लाते हैं। समझा जा सकता है कि ये किस तबके के छात्र हैं। जिस दिन अन्ना गिरफ़्तार हुए, इसी इलाके से लगभग एक हजार का जुलूस निकला। यह इस आन्दोलन का इलाहाबाद में आयोजित पहला जुलूस था। यों तो इलाहाबाद बहुत बडा़ शहर नहीं है, लेकिन सिविल लाइंस, हाई कोर्ट में फ़ंसी मीडिया की आंखें सलोरी तक नहीं पहुँच पाईं, तब भी नहीं जब यह जुलूस पांच किलोमीटर चलकर विश्वविद्यालय परिसर में 1942 के शहीद लाल पद्मधर की मूर्ति तक पहुँच गया।

यही आज भी होना तय था। मुझे भी सम्बोधित करना था। रामायन राम, सुनील मौर्य आदि छात्र नेता दिनभर इलाके में थे। वरिष्ठ छात्र राजेंद्र यादव सभा का संचालन कर रहे थे और बता रहे थे कि माध्यमिक शिक्षा परिषद, उच्चतर शिक्षा आयोग आदि में अध्यापक के पदों पर सामान्य, ओ.बी.सी. और अनु. जाति/जनजाति के अभ्यर्थियों के लिए अलग-अलग घूस के रेट्स क्या-क्या हैं। ये हर छात्र को यों भी मालूम है, जनरल नालेज की तरह। जे.एन.यू. छात्रसंघ के निवर्तमान अध्यक्ष संदीप सिंह ने भ्रष्टाचार और नई आर्थिक नीतियों के  अंतर्संबंध पर सारगर्भित भाषण दिया। मेरे बोलने के बाद ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ का एक गगनभेदी नारा किसी ने उठाया और आंधी-तूफ़ान की तरह लगभग एक हज़ार की संख्या में नौजवान  बढ़ चले परिसर की ओर, लाल पद्मधर के शहादत स्थल की ओर।

ऐसे हज़ारों दृष्य इस आन्दोलन के हैं, होंगे। हमें अपनी ओर से इनकी व्याख्या नहीं करनी। मत भूलिए कि चाहे कारपोरेट लूट हो या मंत्रियों, अफ़सरों द्वारा सरकारी खज़ानों में जमा जनता की गाढी़ कमाई की लूट हो, यह पूंजी का आदिम संचय है। भ्रष्टाचार के स्रोतों पर रोक लगाना पूंजी के आदिम संचय पर चोट करना है। इसी से इस पूंजीवादी लोकतंत्र के साझीदार सभी अपनी अपनी जाति-धर्म की जनता को इस आंदोलन से विरत करने में जुट चले। अगडा-पिछडा़-दलित-अल्पसंख्यक की शासक जमातों के नुमाइंदे संसद में एक साथ थे। उनकी वर्गीय एकजुटता देखने लायक थी। दूसरी ओर इन सभी तबकों के निम्नमध्यवर्गीय और गरीब लोग लगातार आंदोलन से आकर्षित हो रहे थे। लम्बे समय बाद जातिगत ऒर धर्मगत सामुदायिक चेतना में वर्गीय आधार पर दरारें दिखाई पडीं। अनेक दलों की गति सांप- छछूंदर की हुई। कभी समर्थन, कभी विरोध का नाटक चलता रहा। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि वे अपने जनाधार को इस आंदोलन में जाने से रोकने की ताकत रखते हैं या नहीं। हर दिन  कैलकुलेशन बदल रहे थे। जब उन्हें लगा कि वे उन्हें नहीं रोक पा रहे हैं तो समर्थन का नाटक करते और जैसे ही थोडा आत्मविश्वास आता कि रोक सकते हैं, तो पलटी मार जाते। लेकिन जहाँ चुनाव महज गणित से जीते जा सकते हैं, वहीं आंदोलन जिस तरह का रसायन तैयार  करते हैं, उनमें गणित करनेवालों को अक्सर ही हतप्रभ रह जाना पडता है। एक उदाहरण देखें। मनरेगा, बी.पी.एल. कार्ड और गरीबों के लिए दूसरी तमाम योजनाओं में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में गरीब लोग उतरेंगे ही, चाहे वे दलित हों, अति पिछडे हों, अल्पसंख्यक हों या अन्य। कोई मायावती, कोई लालू इसे नहीं रोक सकते, भले ही इस तबके का वोट वे विकल्प के अभाव में पा जाते हों या आगे भी पाते रहें।

प्रतीकों  की  राजनीति  में  भी इस  आंदोलन  को  फ़ंसाने  की कई  कोशिशें  हुईं। झण्डे, बैनर, नारों के विद्वतापूर्ण  विश्लेषणों से  निष्कर्ष निकाले गए। अब  आंदोलन  के नेताओं को  भी इस आंदोलन की कमज़ोरियों, सीमाओं  और  ताकत का विश्लेषण  करना होगा और ऐसी  राजनीतिक ताकतों को भी जो देश में आमूल बदलाव चाहती हैं। उम्मीद यह भी जगी है कि रोज़गार का मौलिक अधिकार, महिला आरक्षण बिल, चुने  हुए प्रतिनिधियों को  वापस बुलाने  का  अधिकार, नकारात्मक वोट देने का अधिकार, खास सेक्टरों के राष्ट्रीयकरण के कानून बनवाने तथा सेज़, न्यूक्लियर-डील, ए.एफ़.एस. पी.ए. जैसे दमनकारी कानूनों को रद कराने के बडे़ आंदोलन यह देश आगामी समय में देखेगा।

 

 

दिल्‍ली पुस्‍तक मेला शुरू

नई दिल्ली : शनिवार, 26 अगस्‍त से 17वां दिल्ली पुस्तक मेला शुरू हो गया। इसमें देश-विदेश के 270 प्रकाशक  भाग ले रहे हैं। इसमें शिरकत करने वाले विदेशी प्रकाशकों में पाकिस्तान, चीन, अमेरिका और ब्रिटेन शामिल हैं। पुस्तक मेला 4 सितंबर तक चलेगा। इसकी थीम ‘यात्रा एवं पर्यटन’ है। प्रगति मैदान स्थित हॉल नंबर 8 से 12 में विभिन्न प्रकाशकों ने स्टॉल लगाए हैं।

इस मेले के आयोजक इंडिया ट्रेड प्रमोशन आर्गनाइजेशन (आइटीपीओ) और सह आयोजक भारतीय प्रकाशक संघ (एफआइपी) है। प्रगति मैदान में यह मेला सुबह 11 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहेगा।

आइटीपीओ के महानिदेशक नीरज कुमार गुप्ता के अनुसार अगले साल से दिल्ली पुस्तक मेले के दौरान ई-बुक्स और अन्य गैजेट पर आधारित संस्करण का अलग से आयोजन किया जाएगा।

पुस्तक मेले के उद्घाटन मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल का करना था, लेकिन संसद में लोकपाल विधेयक पर चर्चा के चलते वह इसमें भाग नहीं ले सके। उन्‍होंने अपने संदेश में कहा कि साहित्य और किताबों के जरिये लोगों तक जानकारी पहुंचाने में प्रकाशन उद्योग महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है।

 

 

 

अन्ना और संसद : प्रणय कृष्ण

जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से उठी बहसों पर एक श्रृंखला लिख रहे हैं। प्रस्तुत है इस लेखमाला की दो कडि़यां-

“जिसे आप पार्लियामेंटों की माता” कहते हैं, वह पार्लियामेंट तो बांझ और बेसवा है। ये दोनों शब्द बहुत कडे हैं, तो भी उसे अच्छी तरह लागू होते हैं। मैंने उसे बांझ कहा, क्योंकि अब तक उस पार्लियामेंट ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उस पर जोर-दबाव डालनेवाला कोई न हो, तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है और वह बेसवा है क्योंकि जो मंत्रिमंडल उसे रखे, उसके पास वह रहती है। आज उसका मालिक  एसिक्वथ है, तो कल वालफर होगा तो परसों कोई तीसरा।”                                                                                            -हिंद स्वराज (1909) में गांधी

गांधी के उपरोक्त उद्धरण को यहाँ रखते हुए इसे न तो  मैं सार्वकालिक सत्य की तरह उद्धृत कर रहा हूं, न अपनी और से कुछ कहने के लिए, बल्कि इंग्‍लैंड की तब की बुर्जुआ पार्लियामेंट के  बारे में गांधी के विचारों को ही आज के, बिलकुल अभी के  हालात को समझने के  लिए रख रहा हूं।

अभी भी प्रधानमंत्री इस बात पर डटे हुए हैं कि अन्ना का आन्दोलन संसद की अवमानना करता है और इसीलिए अलोकतांत्रिक है। दरअसल लोकरहित संसद महज तंत्र है और इस तंत्र को  चलानेवाले (मंत्रिमंडल) के सदस्य तब से लोक को गाली दे रहे हैं, जब से अन्ना का पहला अनशन जंतर-मंतर पर शुरू  हुआ। लोकतंत्र और संविधान की चिंता  में दुबले हो रहे कुछ अन्य दल जैसे कि राजद और  सपा ने भी अपने सांसदों रघुवंश प्रसाद और मोहन सिंह के ज़रिए तब यही रुख अख्तियार कर रखा था। संसद  की  रक्षा में तब कुछ वाम नेताओं के लेख भी आए थे, जबकि संसद को जनांदोलन  से ऊपर रखने को मार्क्सवादी शब्दावली में  ‘संसदीय बौनापन’ कहा जाता है। यदि भाकपा (माले) जैसे वामदल और उससे जुडे़ संगठनों को छोड़ दें जिन्होंने जंतर-मंतर वाले अन्ना के अनशन के  साथ ही इस मुद्दे पर आन्दोलन का रुख अख्तियार कर लिया तो अन्य वामदलों ने जिनकी संसद में अभी भी अच्छी संख्या है, ‘वेट एंड वाच’ का रुख अपनाया। कर्नाटक और अन्यत्र तथा केंद्र में अपने पिछले कार्यकाल में भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों में फंसी भाजपा ने अन्ना के आन्दोलन के समानांतर रामदेव को खड़ाकर जनाक्रोश को अपने फायदे में भुनाने की भरपूर कोशिश की। संघ का नेटवर्क रामदेव के लिए लगा। लेकिन कांग्रेसियों ने खेले-खाए रामदेव को उन्हीं के जाल में फंसा दिया। योग के  नाम पर सत्ताधारी दल से जमीन और तमाम दूसरे फायदे उठाने वाले रामदेव का  हश्र होना  भी यही था।

बहरहाल आज स्थिति बदली हुई है। लोकपाल बिल पर सिविल सोसाईटी से किये हर वादे से मुकरने के बाद सरकार ने पूरी मुहिम चलाई क़ि अन्ना हठधर्मी हैं, संविधान और संसद को नहीं मानते। टीआरपी केन्द्रित मीडिया भले ही इस उभार को परिलक्षित कर रहा हो लेकिन अगर बड़े अंगरेजी अखबारों के हाल-हाल तक के सम्पादकीय पढ़िए तो लगभग सभी ने कांग्रेसी लाइन का समर्थन किया। किसी ने पलटकर यह पूछना गवारा न किया क़ि क्या जनता का एकमात्र अधिकार वोट देना है? जनता के अंतर्विरोधों को साधकर तमाम करोडपति भ्रष्ट और कारपोरेट दलाल मनमोहन सिंह, चिदंबरम, सिब्बल, शौरी, प्रमोद महाजन, मोंटेक आदि विश्व बैंक और अमरीका निर्देशित विश्व व्यवस्था के हिमायती अगर संसद को छा लें तो जनता को क्या करना चाहिए?

क्या वोट पाने के बाद सांसदों को कुछ भी करने का अधिकार है? क्या संसद में उनके कारनामों पर जनता का कोई नियंत्रण होना चाहिए या नहीं? यदि होना चाहिए तो उसके तरीके क्या हों? क्यों न जनादेश की अवहेलना करने वालों को वापस बुलाने का अधिकार भी जनता के पास हो? यदि यह अधिकार कम्युनिस्ट शासन द्वारा वेनेजुएला की जनता के लिए लाये गए संवैधानिक सुधारों में शामिल है, तो भारत जैसे कथित रूप से ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र’ में जनता को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्यों ‘किसी को भी वोट न देने’ या ‘विरोध में वोट देने’ का विकल्प मतपत्र में नहीं दिया जा सकता? लेकिन मीडिया बैरनों को ये सारे सवाल सत्ताधारियों से पूछना गवारा न था।

एक मोर्चा यह खोला गया क़ि जैसे जेपी आन्दोलन से संघ को फ़ायदा हुआ, वैसे ही अन्ना के आन्दोलन से भी होगा। अब मुश्किल यह है क़ि जिस बौद्धिक वर्ग में यह सब ग्राह्य हो सकता था, उसके पास नेहरू-गोविंदबल्लभ पन्त से लेकर राजीव गांधी तक कांग्रेस और संघ परिवार के बीच तमाम आपसी दुरभिसंधियों का डाक्युमेंटेड  इतिहास है। जेपी आन्दोलन से संघ को जो वैधता मिली हो, लेकिन आज़ादी के बाद संघ को समय-समय पर जितनी मजबूती प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कांग्रेस ने पहुंचाई है, उतनी किसी और ने नहीं। उसके पूरे इतिहास के खुलासे  की न यहाँ जगह है और न जरूरत। बहरहाल शबनम हाशमी और अरुणा राय जैसे सिविल सोसाईटीबाज़, जिनका एक्टिविज्म कांग्रेसी सहायता के बगैर एक कदम भी नहीं चलता, ‘संघ के हव्वे’ पर खेल गए। मुँहफट कांग्रेसियों ने अन्ना के आन्दोलन को संघ से लेकर  माओवाद तक से जोड़ा, लेकिन उन्हें इतनी बड़ी जनता नहीं दिखी, जो इतनी सारी वैचारिक बातें नहीं जानती। वह एक बात जानती है क़ि सरकार पूरी तरह भ्रष्ट  है और अन्ना पूरी तरह उससे मुक्त।

अभी कल तक कुछ चैनलों के संवाददाता अन्ना के समर्थन में आये सामान्य लोगों से पूछ रहे थे क़ि वे जन लोकपाल बिल और सरकारी बिल में क्या अंतर जानते हैं? बहुत से लोगों को नहीं पता था, लेकिन उन्हें इतना पता था क़ि अन्ना सही हैं और सरकार भ्रष्ट। जनता का जनरल नालेज टेस्ट कर रहे इन संवाददाताओं के जनरल नालेज की हालत यह थी क़ि वे यहाँ तक कह रहे थे क़ि आन्दोलन अभी तक मेट्रो केन्द्रों तक ही सीमित है। उन्हें सिर्फ प्रादेशिक राजधानियों में ही अन्ना का समर्थन दिख रहा था। देवरिया, बलिया, आरा, गोरखपुर, ग्वालियर, बस्ती, सीवान, हजारीबाग, मदुरै, कटक, बर्दमान, गीरिडीह, सोनभद्र से लेकर लेह-लद्दाख और हज़ारों कस्बों और छोटे कस्बों में निम्न मध्यवर्ग के बहुलांश में इनको परिवर्तन की तड़प नहीं दिख रही।

जबसे नयी आर्थिक नीतियाँ शुरू हुईं, तबसे भारत की शासक पार्टियों ने विभाजनकारी, भावनात्मक और उन्मादी मुद्दों को सामने लाकर बुनियादी सवालों को दबा दिया। इस आन्दोलन में भी जाति और धर्मं के आधार पर लोगों को आन्दोलन से दूर रखने की कोशिशे तेज हैं। बहुतेरी जातियों के कथित नेता और बुद्धिजीवी चैनलों में बिठाये जा रहे हैं ताकि वे अपनी जाति और समुदाय को इस आन्दोलन से अलग कर सकें। राशिद अल्वी का बयान खासतौर पर बेहूदा है क्योंकि वह साम्राज्यवाद विरोधी ज़ज्बे को साम्प्रदायिक नज़र से समझता है। अल्वी, जो कभी बसपा में थे और ज़ातीतौर पर शायद उतने बुरे आदमी नहीं समझे जाते, उन्हें कांग्रेसियों ने  यह समझाकर रणभूमि में भेजा कि अमेरिका से  अगर किसी तरह इस आन्दोलन का संबंध जोड़ दिया जाए तो मुसलमान तो जरूर ही भड़क जायेंगे। अमेरिका जो हर मुल्क की अंदरूनी हालत पर टिप्पणी करके अपने वर्चस्व और हितों की हिफाजत करता है, उसने अन्ना के आन्दोलन पर सकारात्मक टिप्पणी करके इसका आधार भी मुहैय्या करा दिया। जबकि अमेरिका से बेहतर कोई नही जानता कि यह आन्दोलन महज़ लोकतंत्र के किसी बाहरी आवरण तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें एक साम्राज्यवाद विरोधी संभावना है।

आईडेंटिटी पालिटिक्स के दूसरे भी कई अलंबरदार इस आन्दोलन को ख़ास जाति समूहों का आन्दोलन बता रहे हैं। पहले अनशन के समय रघुवंश प्रसाद सिंह के करीबी कुछ पत्रकार इसे वाणी दे रहे थे। अभी कल हमारे मित्र चंद्रभान प्रसाद इसे सवर्ण आन्दोलन बता रहे  थे एक चैनल पर। यह वही चंद्रभान जी हैं  जिन्होंने आज की बसपाई राजनीति की सोशल इंजीनियरिंग यानी ब्राह्मण-दलित गठजोड़ का सैद्धांतिक आधार प्रस्तुत करते हुए काफी पहले ही यह प्रतिपादित किया था कि पिछड़ा वर्ग आक्रामक है, लिहाजा रक्षात्मक हो रहे सवर्णों के साथ दलितों की एकता स्वाभाविक है। यह वही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने गुजरात जनसंहार में पिछड़ों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार बताते हुए इन्हें हूणों का वंशज बताया था। अब सवर्णों के साथ दलित एकता के इस ‘महान’ प्रवर्तक को यह आन्दोलन कैसे नकारात्मक अर्थों में महज सवर्ण दिख रहा है?  वफ़ा सरकार और कांग्रेस के प्रति जरूर निभाएं चंद्रभान, लेकिन इस विडम्बना का क्या करेंगें कि मायावती ने अन्ना का समर्थन कर डाला है। अगर किसी दलित को भ्रमित भी होना होगा तो वह मायावती से भ्रमित होगा या चंद्रभान जी से ?

आज का मध्यवर्ग और खासकर निम्न मध्य वर्ग आज़ादी के पहले वाला महज सवर्ण मध्यवर्ग नहीं रह गया है। अगर यह आन्दोलन आशीष नंदी जैसे अत्तरवादियों की निगाह में महज मध्यवर्गीय है, तो इसमें पिछड़े और दलित समुदाय का मध्यवर्गीय हिस्सा भी अवश्य शामिल है। पिछले अनशन में मुझे इसीलिये रिपब्लिकन पार्टी, वाल्मीकि समाज आदि के बैनर और मंच जंतर-मंतर पर देख ज़रा भी अचरज नहीं हुआ था। अब जबकि लालू, मुलायम और मायावती भी अन्ना की गिरफ्तारी के बाद लोकतांत्रिक हो उठे हैं, तो इस आन्दोलन को तोड़ने के जातीय कार्ड की भी सीमाएं स्पष्ट हो गई हैं।

बे अंदाज़ कांग्रेसियों ने अन्ना को अपशब्द और भ्रष्ट तक कहा. हत्या का मंसूबा रखने वाले जब देख लेते हैं  कि वे हत्या नहीं कर पा रहे, तो ‘चरित्र हत्या’ पर उतरते हैं। शैला मसूद की भाजपाई सरकार के अधीन हत्या की जा सकती थी, तो उनकी हत्या कर दी गई। अन्ना की हत्या नहीं की जा सकती थी, सो उनकी चरित्र हत्या की कोशिश की गई। अब राशिद अल्वी जैसे कांग्रेसियों को अन्ना के आन्दोलन के पीछे अमेरिकी हाथ दिखाई दे रहा है। कभी इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस अपने हर विरोधी को ‘सीआईए एजेंट’ की पदवी से नवाज़ा करती थी। राशिद अल्वी भूल गए हैं कि अमेरिकी हाथ वाला नुस्खा पुराना है, और अब दुनिया ही नहीं बदल गई है, बल्कि उनकी पूरी सरकार ही देश में अमेरिकी हितों की सबसे बड़ी रखवाल है। तवलीन सिंह आदि दक्षिणपंथी इस चिंता में परेशान हैं कि अन्ना खुद और उनके  सहयोगी क्यों भ्रष्टाचार को साम्राज्य्परस्त आर्थिक नीतियों से जोड़ रहे हैं?

गांधी ने हिंद स्वराज में लिखा था- “अगर पार्लियामेंट बाँझ न हो तो इस तरह  होना चाहिए। लोग उसमें अच्छे से अच्छे मेंबर चुन कर भेजते हैं… ऐसी पार्लियामेंट को अर्जी की जरूरत नहीं होनी चाहिए, न दबाव की। उस पार्लियामेंट का काम इतना सरल होना चाहिए कि दिन ब दिन उसका तेज बढ़ता जाए और लोगों पर उसका असर होता जाए। लेकिन इसके उलटे इतना तो सब कबूल करते हैं कि पार्लियामेंट के मेंबर दिखावटी और स्वार्थी पाए जाते हैं। सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं। सिर्फ डर के  कारण ही पार्लियामेंट कुछ काम करती है। जो काम आज किया उसे कल रद करना पड़ता है। आज तक एक ही चीज को पार्लियामेंट ने ठिकाने लगाया हो ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती। बड़े सवालों की चर्चा जब पार्लियामेंट में चलती है तब उसके मेंबर पैर फैला कर लेटते हैं, या बैठे-बैठे झपकियाँ लेते हैं। उस पार के मेंबर इतने जोरों से चिल्लाते है कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं। उसके एक महान लेखक ने उसे ‘दुनिया की बातूनी’ जैसा नाम दिया है…. अगर कोई मेंबर इसमें अपवादस्वरूप निकल आये तो उसकी कमबख्ती ही समझिये। जितना समय और पैसा पार्लियामेंट खर्च करती है, उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाए। ब्रिटिश पार्लियामेंट महज प्रजा का खिलौना है और वह खिलौना प्रजा को भारी खर्च में डालता है। यह विचार मेरे खुद के हैं, ऐसा आप न माने…. एक मेंबर ने तो यहाँ तक कहा है कि पार्लियामेंट धर्मनिष्ठ आदमी के लायक नहीं रही….. आज सात सौ बरस के बाद भी पार्लियामेंट बच्चा ही हो तब वह बड़ी कब होगी।”

 

लेखमाला की दूसरी किस्‍त-

अन्‍ना, अरुंधति और देश

आज अन्ना के अनशन का आठवाँ दिन है। उनकी तबियत बिगड़ी है। प्रधानमंत्री का ख़त अन्ना को पहुँचा है। अब वे जन लोकपाल को संसदीय समिति के सामने रखने को तैयार हैं। प्रणव मुखर्जी से अन्ना की टीम की वार्ता चल रही है। सोनिया-राहुल आदि के हस्तक्षेप का एक स्वांग घट रहा है जिसमें कांग्रेस, चिदंबरम, सिब्बल  आदि से भिन्न आवाज में बोलते हुए गांधी परिवार के बहाने संकट से उबरने की कोशिश कर रही है। आखिर उसे भी चिंता है क़ि जिस जन लोकपाल के प्रावधानों के खिलाफ कांग्रेस और भाजपा दोनों का रवैया एक है, उस पर चले जनांदोलन का फायदा कहीं भाजपा को न मिल जाये। ऐसे में कांग्रेस ने सोनिया-राहुल को इस तरह सामने रखा है मानो वे नैतिकता के उच्च आसन से इसका समाधान कर देंगे और सारी गड़बड़ मानो सोनिया की अनुपस्थिति के कारण हुई। इस कांग्रेसी रणनीति से संभव है क़ि कोई समझौता हो जाए और कांग्रेस, भाजपा को पटखनी दे फिर से अपनी साख बचाने में कामयाब हो जाये। फिर भी अभी यह स्पष्ट नहीं है क़ि संसदीय समिति अंतिम रूप से किस किस्म के प्रारूप को हरी झंडी देगी, कब यह बिल सदन में पारित कराने के लिए पेश होगा और अंततः जो पारित होगा, वह क्या होगा? कुल मिलाकर इस आन्दोलन का परिणाम अभी भी अनिर्णीत है। यदि जन लोकपाल बिल अपने मूलरूप में पारित होता है तो यह आन्दोलन की विजय है अन्यथा अनेक  बड़े आंदोलनों की तरह इसका भी अंत समझौते या दमन में हो जाना असंभव नहीं है। आन्दोलन का हस्र जो भी हो, उसने जनता की ताकत, बड़े राष्ट्रीय सवालों पर जन उभार की संभावना और जरूरत तथा आगे के दिनों में भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के खिलाफ विराट आन्दोलनों की उम्मीदों को जगा दिया है।

रालेगाँव सिद्धि से पिछले अनशन तक एक दूसरे अन्ना का आविष्कार हो चुका था और पहले अनशन से दूसरे के बीच  एक अलग ही अन्ना सामने हैं। ये जन आकांक्षाओं की लहरों और आवर्तों से पैदा हुए अन्ना हैं। ये वही अन्ना नहीं हैं. वे अब चाहकर भी पुराने अन्ना नहीं बन सकते। जन कार्यवाहियों के काल प्रवाह से छूटे  हुए कुछ बुद्धिजीवी अन्ना और इस आन्दोलन को अतीत की  छवियों में देखना चाहते हैं। अन्ना गांधी सचमुच नहीं हैं। गांधी एक संपन्न, विदेश-पलट  बैरिस्टर से शुरू कर लोक की स्वाधीनता की आकांक्षाओं के जरिये महात्मा के नए अवतार में ढाल दिए गए। हर जगह की लोक चेतना ने उन्हें अपनी छवि में बार-बार गढ़ा- महात्मा से चेथरिया पीर तक। अन्ना सेना में ड्राइवर थे। उन्हें अपने वर्ग अनुभव के साथ गांधी के विचार मिले। इन विचारों की जो अच्छाइयां-बुराइयाँ थीं, वे उनके साथ रहीं। अन्ना जयप्रकाश भी नहीं हैं। जयप्रकाश गरीब घर में जरूर पैदा हुए थे लेकिन उन्होंने अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। ये अन्ना को नसीब नहीं हुई। रामलीला मैदान में अन्ना ने यह चिंता व्यक्त की क़ि किसान और मजदूर अभी इस आन्दोलन में नहीं आये हैं। उनका आह्वान करते हुए उन्होंने कहा- “आप के आये बगैर यह लड़ाई अधूरी है।” जेपी आन्दोलन में ये शक्तियां सचमुच पूरी तरह नहीं आ सकी थीं। बाबा नागार्जुन ने 1978 में लिखा था-

जय हो लोकनायक: भीड़-भाड़ ने पुकारा
जीत हुई पटना में, दिल्ली में हारा
क्या करता आखिर, बूढा़ बेचारा
तरुणों ने साथ दिया, सयानों ने मारा
जय हो लोकनायक: भीड़-भाड़ ने पुकारा

लिया नहीं संग्रामी श्रमिकों का सहारा
किसानों ने यह सब संशय में निहारा
छू न सकी उनको प्रवचन की धारा
सेठों ने थमाया हमदर्दी का दुधारा
क्या करता आखिर बूढा बेचारा

कूएं से निकल आया बाघ हत्यारा
फंस गया उलटे हमदर्द बंजारा
उतरा नहीं बाघिन के गुस्से का पारा
दे न पाया हिंसा का उत्तर करारा
क्या करता आखिर बूढा़ बेचारा

जय हो लोकनायक: भीड़-भाड़ ने पुकारा
मध्यवर्गीय तरुणों ने निष्ठा से निहारा
शिखरमुखी दल नायक पा गए सहारा
बाघिन के मांद में जा फंसा बिचारा
गुफा में बंद है शराफत का मारा

अन्ना ने यह कविता शायद ही पढी हो लेकिन इस आन्दोलन में किसान-मजदूरों के आये बगैर अधूरे रह जाने की उनकी बात यह बताती है क़ि उन्हें खुद भी जनांदोलनों के पिछले इतिहास और खुद उनके द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन की कमियों-कमजोरियों का एहसास है। अन्ना सचमुच यदि गांधी और जेपी (उनकी महानता के बावजूद) की नियति को ही प्राप्त होंगे तो यह कोई अच्छी बात न होगी।

सरकार ने महाराष्ट्र के टाप ब्यूरोक्रेट सारंगी और इंदौर के धर्मगुरु भैय्यू जी महराज को अन्ना के पास इसलिए भेजा था क़ि अन्ना को उनके थिंक टैंक से अलग कर दिया जाये। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शिंदे भी बिचौलिया बनने के लिए तैयार बैठे थे। ये लोग उस अन्ना की खोज में निकले थे जो राजनीतिक रूप से अपरिपक्व थे, जो कुछ का कुछ बोल जाया करते थे, और गुमराह भी किये जा सकते थे। शायद भैय्यू जी आदि को वह अन्ना प्राप्त नहीं हुए, जो अपनी सरलता में गुमराह होकर अपने प्रमुख सहयोगियों का साथ छोड़ कोई मनमाना फैसला कर डालें। लोकपाल बिल के लिए बनी संसदीय समिति में लालू जी जैसे लोग भी हैं। अब यह संसदीय समिति डाईलाग के दरवाजे खोले खड़ी है। कांग्रेस सांसद प्रवीण ऐरम ने उसके विचारार्थ जन लोकपाल का मसौदा भेज दिया था। भाजपा के वरुण गांधी जन लोकपाल का प्राइवेट मेंबर बिल लाने को उद्धत थे। कुल मिलाकर कांग्रेस-भाजपा दोनों बड़ी पार्टियां जो जन लोकपाल के खिलाफ हैं, जनता के तेवर भांप अपने एक-एक सांसद के माध्यम से यह सन्देश देकर लोगों में भ्रम पैदा करना चाहती थीं कि वे जनता के साथ हैं। एक तरफ सारंगी, भैय्यू जी, शिंदे, ऐरन और वरुण गांधी आदि द्वारा आन्दोलन को तोड़ने या फिर अपने पक्ष में इस्तेमाल करने के प्रयास था, तो दूसरी ओर  तमाम भ्रष्टाचारी दल और नेताओं द्वारा आन्दोलन में घुसपैठ तथा आन्दोलन में जा रहे अपने जनाधार को मनाने-फुसलाने-बहकाने की कोशिशें तेज थीं। मुलायम और मायावती द्वारा अन्ना का समर्थन न केवल इस प्रवृत्ति को दिखलाता है बल्कि इस भय को भी क़ि जनाक्रोश भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश महज यूपीए के खिलाफ जाकर नहीं रुक जाएगा। उसकी आँच से ये लोग भी झुलस सकते हैं।

अरुणा राय, जो कांग्रेस आलाकमान की नजदीकी हैं, एक और लोकपाल बिल लेकर आयी हैं। उनका कहना है क़ि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में इस शर्त पर लाया जाये क़ि उस पर कार्यवाही के लिए सुप्रीम कोर्ट की रजामंदी जरूरी हो। शुरू से ही कांग्रेस का यह प्रयास रहा है क़ि जन लोकपाल के विरुद्ध वह न्यायपालिका को अपने पक्ष में खींच लाये, क्योंकि जन लोकपाल में न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को भी लोकपाल के अधीन माना गया है। बहरहाल, संसद न्यायपालिका को लोकपाल से बचा ले और न्यायपालिका संसद और प्रधानमंत्री को लोकपाल से बचा ले, इस लेन-देन का पूर्वाभ्यास लम्बे समय से चल रहा है। ‘ज्युडीशियल स्टैंडर्ट्स एंड एकाउंटेबिलिटी  बिल’ जिसे पारित किया जाना है, उसके बहाने अरुणा राय लोकपाल के दायरे से न्यायपालिका को अलग रखने का प्रस्ताव करते हुए प्रधानमंत्री के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सहमति का एक लेन-देन भरा पैकेज तैयार कर लाई हैं। ज्युडीशियल कमीशन के सवाल पर संसदीय वाम दलों सहित वे नौ पार्टियां भी सहमत हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का समर्थन किया है। भाजपा इस मुद्दे पर अभी भी चुप है। अब तक वह प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने के विरुद्ध कांग्रेस जैसी ही पोजीशन लेती रही है। शायद उसे अभी भी यह लोभ है क़ि अगला प्रधानमंत्री उसका होगा। वह न्यायपालिका को भी लोकपाल के दायरे में लाने के सवाल पर अपने पिछले नकारात्मक रवैय्ये पर किसी पुनर्विचार का संकेत नहीं दे रही। इसीलिये अन्ना के सहयोगियों ने भाजपा से अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की है।

अरुणा राय ने जन लोकपाल के दायरे से भ्रष्टाचार के निचले और जमीनी मुद्दों को अलग कर सेन्ट्रल विजिलेंस कमीशन के अधीन लाये जाने का प्रस्ताव किया है। सवाल यह है क़ि क्या सीवीसी के चयन की प्रक्रिया और भ्रष्टाचारियों को दण्डित करने का उसका अधिकार कानूनी संशोधन के जरिये वैसा ही प्रभावी बनाया जाएगा, जैसा क़ि जन लोकपाल बिल में है? अरुणा राय ने जन लोकपाल बिल को संसद और न्यायपालिका से ऊपर एक सुपर पुलिसमैन की भूमिका निभाने वाली संस्था के रूप में उसके संविधान विरोधी होने की निंदा की है। उनके अनुसार जन लोकपाल के लिए खुद एक विराट मशीनरी की जरूरत होगी और इतनी विराट मशीनरी को चलाने वाले जो बहुत सारे लोग होंगें, वे सभी खुद भ्रष्टाचार से मुक्त होंगें, इसकी गारंटी नहीं की जा सकती। आश्चर्य है क़ि बहन अरुंधति राय ने  भी लगभग ऐसे ही विचार व्यक्त किये हैं। उनके हाल के एक लेख में अन्ना के आन्दोलन के विरोध में अब तक जो कुछ भी कहा जा रहा था, उस सबको एक साथ  उपस्थित किया गया है।

अरुंधति राय का कहना है क़ि मूल बात सामाजिक ढाँचे की है और उसमें निहित आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक विषमताओं की। बात सही है लेकिन तमाम कानूनी संशोधनों के जरिये जनता को अधिकार दिलाने की लड़ाई इस लक्ष्य की पूरक है, उसके खिलाफ नहीं। अरुंधति ने इस आन्दोलन के कुछ कर्ता-धर्ताओं पर भी टिप्पणी की है। उनका कहना है क़ि केजरीवाल आदि एनजीओ चलाने वाले लोग जो करोड़ों की विदेशी सहायती प्राप्त करते हैं, उन्होंने लोकपाल के दायरे से  एनजीओ को बचाने के लिए और सारा दोष सरकार पर मढने के लिए जन लोकपाल का जंजाल तैयार किया है। अब सांसत यह है क़ि जो लाखों की संख्या में देश के तमाम हिस्सों में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, क्या वे सब केजरीवाल और एनजीओ को बचाने के लिए उतर पड़े हैं? रही एनजीओ की बात तो वर्ल्ड सोशल फोरम से लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों में ईराक युद्ध और नव उदारवाद आदि तमाम मसलों पर सिविल सोसाईटी के जो भी आन्दोलन हाल के वर्षों में चले हैं, उनमें एनजीओ की विराट शिरकत रही है। क्या इन आन्दोलनों में बहन अरुंधति शामिल नहीं हुईं? क्या इनमें शरीक होने से उन्होंने इसलिए इनकार कर दिया क़ि इनमें एनजीओ भी शरीक हैं? जाहिर है क़ि नहीं किया और मेरी अल्पबुद्धि के अनुसार उन्होंने ठीक किया। इसमें कोई संदेह नहीं क़ि एनजीओ स्वयं नव उदारवादी विश्व व्यवस्था से जन्मी संस्थाएं हैं। इनकी फंडिंग के स्रोत भी पूंजी के गढ़ों में मौजूद हैं। इनका उपयोग भी प्रायः आमूल-चूल बदलाव को रोकने में किया जाता है। इनकी फंडिंग की कड़ी जांच हो, यह भी जरूरी है। लेकिन किसी भी व्यापक जनांदोलन में इनके शरीक होने मात्र से हम सभी जो इनके आलोचक हैं,  वे शरीक न हों तो यह आम जनता की ओर पीठ देना ही कहलायेगा। बहन अरुंधति का लेख पुरानी कांस्पिरेसी थियरी का नया संस्करण है। कुछ जरूरी बातें उन्होंने ऐसी अवश्य उठायी है, जो विचारणीय हैं। लेकिन देश भर में चल रहे तमाम जनांदोलनों को चाहे वह जैतापुर का हो, विस्थापन के खिलाफ हो, खनन माफिया और भू-अधिग्रहण के खिलाफ हो, पास्को जैसी मल्टीनेशनल के खिलाफ हो या इरोम शर्मिला का अनशन हो- इन सभी को अन्ना के आन्दोलन के बरक्स खड़ा कर यह कहना क़ि अन्ना का आन्दोलन मीडिया-कारपोरेट-एनजीओ गठजोड़ की करतूत है, और वास्तविक आन्दोलन नहीं है, जनांदोलनों की प्रकृति के बारे में एक कमजर्फ दृष्टिकोण को दिखलाता है। अन्ना के आन्दोलन में अच्छी खासी तादात में वे लोग भी शरीक हैं, जो इन सभी आन्दोलनों में शरीक रहे हैं। किसी व्यक्ति का नाम ही लेना हो (दलों को छोड़ दिया जाए तो) तो मेधा पाटेकर का नाम ही काफी है। मेधा अन्ना के भी आन्दोलन में हैं, और अरुंधति भी मेधा के आन्दोलन में शरीक रही हैं।

अरुंधति ने अन्ना हजारे के ग्राम स्वराज की धारणा की भी आलोचना की है और यह आरोप भी लगाया है क़ि अन्ना पचीस वर्षों से अपने गाँव रालेगाँव-सिद्धि के ग्राम निकाय के प्रधान बने हुए हैं। वहाँ चुनाव नहीं होता, लिहाजा अन्ना स्वयं गांधी जी की विकेंद्रीकरण  की धारणा के विरुद्ध केन्द्रीकरण के प्रतीक हैं। अरुंधति की पद्धति विचार से व्यक्ति की आलोचना तक  पहुंचने की है। अन्ना तानाशाह हैं और विकेंद्रीकरण के खिलाफ, ऐसा मुझे तो नहीं लगता, लेकिन ऐसी आलोचना का हक़ अरुंधति को अवश्य है। अरुंधति ने मीडिया द्वारा इस पूरे आन्दोलन को भारी कवरेज देने और तिहाड़ में अन्ना की तमाम सरकारी आवभगत को भी कांस्पिरेसी थियरी के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है। यह सच है क़ि मीडिया तमाम जनांदोलनों की पूरी उपेक्षा करता है। जंतर-मंतर पर जब अन्ना अनशन कर रहे थे तब मेधा पाटेकर ने भी कहा था क़ि उनकी बड़ी-बड़ी रैलियों को मीडिया ने नजरअंदाज किया। हमें खुद भी अनुभव है क़ि दिल्ली में लाल झंडे की ताकतों की एक-एक लाख से ऊपर की रैलियों को मीडिया षड्यंत्रपूर्वक दबा गया। ऐसे में इस आन्दोलन को इतना कवरेज देने के पीछे मीडिया की मंशा पर शक तो जरूर किया जा सकता है, लेकिन इसका भी ठीकरा आन्दोलन के सर पर फोड़ देने का कोई औचित्य नहीं समझ में आता है। सच तो यह है क़ि मीडिया ने इस आन्दोलन में शरीक गरीबों, शहरी निम्न मध्यमवर्ग, दलित और अल्पसंख्यकों के चेहरे गायब कर दिए हैं। उसने इस आन्दोलन की मुखालफत करने वालों को काफी जगह बख्शी हुई है। तमाम अखबारों के सम्पादकीय संसद की सर्वोच्चता के तर्क से व्यवस्था के बचाव में अन्ना को उपदेश देते रहे हैं। इसलिए यह कहना क़ि मीडिया आंदोलन का समर्थन कर रहा है, भ्रांतिपूर्ण है। मीडिया कितना भी ताकतवर हो गया हो, अभी वह जनांदोलन चलाने के काबिल नहीं हुआ है। ज्यादा सही बात यह है क़ि जो आन्दोलन सरकार और विपक्ष दोनों को किसी हद तह झुका ले जाने में कामयाब हुआ है, उसकी अवहेलना कारपोरेट मीडिया के लिए भी संभव नहीं है। अन्यथा वह अपनी जो भी गलत-सही विश्वसनीयता है, वह खो देगा।

अरुंधति ने ‘वन्दे मातरम्’, ‘भारत माता की जय’, ‘अन्ना इज इंडिया एंड इंडिया इज अन्ना’ और ‘जय हिंद’ जैसे नारों को लक्ष्य कर आन्दोलन पर सवर्ण और आरक्षण विरोधी राष्ट्रवाद का आरोप जड़ा है। सचमुच अगर ऐसा ही होता तो मुलायम और मायावती को क्रमशः अपने पिछड़ा और दलित जनाधार को बचाने के लिए तथा भ्रष्टाचार विरोधी जनाक्रोश से बचने के लिए आन्दोलन का समर्थन न करना पड़ता। यह सच है क़ि इन दोनों ने आन्दोलन का समर्थन इस कारण भी किया है क़ि  भले ही वे केंद्र में यूपीए का समर्थन कर रहे हों, उत्तर प्रदेश में उन्हें एक दूसरे से ही नहीं, बल्कि कांग्रेस से भी लड़ना है। लिहाजा समर्थन के पीछे कांग्रेस विरोधी लहर का फ़ायदा उठाने का भी एक मकसद जरूर है। अब इसका क्या कीजिएगा क़ि जंतर मंतर पर अन्ना के पिछले अनशन के समय आरक्षण विरोधी यूथ फार इक्वालिटी के लोग भी दिखे और वाल्मीकि समाज, रिपब्लिकन पार्टी, नोनिया समाज आदि भी अपने-अपने बैनरों के साथ दिखे। इस आन्दोलन में सर्वाधिक दलित महाराष्ट्र से शामिल हैं। बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बैठ कर आये बड़े-बड़े लोग भी दिखे और चाय का ढाबा चलाने वाले तथा ऑटो रिक्शा चालक भी।

प्रकारांतर से अरुंधति ने नारों के माध्यम से आन्दोलन  में संघ की भूमिका को भी देखा है। मुश्किल यह है क़ि इन नारों को लगाने वाले तबके ज्यादा वोकल हैं और मीडिया के लिए अधिक ग्राह्य। इनसे अलग नारों और लोगों की आन्दोलन में कोई कमी नहीं। आन्दोलन के गैर-दलीय चरित्र के चलते ही लाल झंडे की ताकतों को इसी सवाल पर अपनी अलग रैलियाँ, अपनी पहचान के साथ निकालनी पड़ रही हैं। संघ को छिप कर खेलना है क्योंकि भाजपा खुद जन लोकपाल के खिलाफ रही है और अब तक पुनर्विचार के संकेत नहीं दे रही है। ऐसे में कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश को भुनाने के लिए संघ आन्दोलन में घुसपैठ कर रहा है जबकि भाजपा जन लोकपाल पर कांग्रेस के ही स्टैंड पर खड़ी है। यानी संघ-भाजपा का उद्देश्य यह है क़ि वह जन लोकपाल पर कोई कमिटमेंट भी न दे लेकिन आन्दोलन का अपने फायदे में इस्तेमाल कर ले जाए। दूसरे शब्दों में ‘चित हम जीते, पट तुम हारे’। संघ क्यों नहीं अपनी पहचान के साथ स्वतन्त्र रूप से इस सवाल पर रैलियाँ निकाल रहा है, जैसा क़ि लाल झंडे की ताकतें कर रही हैं? संघ को अपनी पहचान आन्दोलन के पीछे छिपानी इसलिए पड़ रही है क्योंकि वह अपने राजनैतिक विंग भाजपा को संकट में नहीं डाल सकता। लेकिन किसी राष्ट्रव्यापी, गैर-दलीय, विचार-बहुल आन्दोलन में संघ अगर घुसपैठ करता है तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसा भला कोई भी राजनीति करने वाला क्यों नहीं करेगा! जिन्हें इस आन्दोलन के संघ द्वारा अपहरण की चिंता है, वे खुद क्यों किनारे बैठ कर तूफ़ान के गुजरने का इंतज़ार करते हुए ‘तटस्थ बौद्धिक वस्तुपरक वैज्ञानिक विश्लेषण’ में लगे हुए हैं? आपके वैज्ञानिक विश्लेषण से भविष्य की पीढियां लाभान्वित हो सकती हैं, लेकिन जनता की वर्तमान आकांक्षाओं की लहरों और आवर्तों पर इनका प्रभाव तभी पड़ सकता है, जब आप भी लहर में कूदें। तट पर बैठकर यानी तटस्थ रहकर सिर्फ उपदेश न दें। आन्दोलन की लहर को संघ की ओर न जाने देकर रेडिकल परिवर्तन की ओर ले जाने का रास्ता भी आन्दोलन के भीतर से ही जाता है। तटस्थ विश्लेषण बाद में भी हो सकते हैं। लेकिन यदि कोई यह माने ही बैठा हो क़ि आन्दोलन एक षड्यंत्र है जिसे संघ अथवा कांग्रेस, कारपोरेट घरानों, एनजीओ या मीडिया ने रचा है  तो फिर उसे समझाने का क्या उपाय है? ऐसे लोग किसी नजूमी की तरह आन्दोलन क्या, हरेक चीज का अतीत-वर्तमान-भविष्य जानते हैं। वे त्रिकालदर्शी हैं और आन्दोलन ख़त्म होने के बाद अपनी पीठ भी ठोंक सकते हैं क़ि ‘देखो, हम जो कह रहे थे वही हुआ न!’

अन्ना का यह आह्वान क़ि जनता अपने सांसदों को घेरे, बेहद रचनात्मक है। उत्तर प्रदेश में इस आन्दोलन की धार को कांग्रेस ही नहीं, बल्कि मुलायम और मायावती के भीषण भ्रष्टाचार की ओर मोड़ा जाना चाहिए। यही छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात में भाजपा के विरुद्ध किया जाना चाहिए। कांग्रेस शासित प्रदेश तो स्वभावतः इसके निशाने पर हैं। बिहार में इसे लालू और नितीश, दोनों के विरुद्ध निर्देशित किया जाना चाहिए। ग्रामीण गरीबों, शहरी गरीबों, छात्र-छात्राओं, संगठित मजदूरों और आदिवासियों के बीच सक्रिय संगठनों को अपने-अपने हिसाब से अपने-अपने सेक्टर में हो रहे भ्रष्टाचार पर स्वतन्त्र रूप से केन्द्रित करना चाहिए। बौद्धिकों को भविष्यवक्ता और नजूमी बनने से बाज आना चाहिए, अन्यथा वे अपनी विश्वसनीयता ही खोएंगे।

 

गिर्दा : अतुल शर्मा

गिर्दा (10 सितम्बर, 1943-22 अगस्त, 2010)

 

प्रसिद्ध लोकगायक गिरीश तिवारी गिर्दा की पहली पुण्‍यतिथि पर उनको याद कर रहे हैं जनकवि अतुल शर्मा-

गिरीश तिवारी गिर्दा से पहली मुलाकात बाबा नागार्जुन ने 75वें जन्मदिवस पर जयहरिखाल में हुई। खादी का कुर्ता, मुसा हुआ पजामा, चप्पल, अंगुलियों में ठुंसी हुई बीड़ी, गीत गाते हुए और आंदोलनों की याद दिलाते हुए उन्होंने ‘ले मशालें चल पड़े हैं’ इतनी बार गाया कि बहुत समय तक लगा कि यह गिर्दा का लिखा गीत है। वह आंदोलनों का हिस्सा थे और यह गीत भी जयहरिखाल में ही पता चला। यह चीमा का गीत है जो कि उस समय सिख होने के नाते केश रखते थे। चीमा से भी यहीं पहली मुलाकात हुई थी।

बाबा नागार्जुन और गिर्दा उत्तराखण्‍ड में नुक्कड़ काव्य गोष्ठियों के माध्यम से चर्चित-परिचित भी थे। एक बार नशाबंदी आंदोलन के समय उन पर एक नशाबंदी फिल्म बनाने का जिम्मा देने की बात चली, उन्होंने साफ मना कर दिया। जहूर आलम का युगमंच और जन संस्कृति मंच दो-तीन दिन का नुक्कड़ नाट्य समारोह करते थे। इसमें दृष्टि  नुक्कड़ नाट्य के साथ कई वर्षों से मैं वहाँ जाता रहा। काव्‍य गोष्टियों और विचार गोष्टियों के साथ सांस्कृतिक जुलूसों का संचालन करते हुए सडक़ों, गांवों में  उनके साथ जनगीत गाकर निकटता बढ़ती रही। तब तक वह सांग एंड ड्रामा डिवीजन की नौकरी छोड़ चुके थे।

उत्तराखण्‍ड आंदोलन के दौरान देहरादून सहित पूरे उत्तराखण्‍ड में उनके साथ प्रभात फेरियाँ,  नुक्कड़ नाटक और मशाल जुलूस में भागीदारी करते रहे। कर्फ्यू में भी प्रभात फेरियाँ निकलीं। पहाड़ में सुबह सूर्य निकलने से पहले ही मेरा गीत गूंजता जिसमें गिर्दा, नरेंद्र सिंह नेगी, जहूर, लक्ष्मी नौटियाल, सुभाष रावत, सुरक्षा रावत, रमेश कुंडिय़ाल आदि के साथ जत्था आगे चलता। उत्तरकाशी में सौ दिन तक प्रभातफेरी रही। अंधेरे में खिडक़ी से लाइट नजर आती। फिर खिड़की खुलती, लोग झांकते, फिर दरवाजा खुलता लोग बाहर आते और चौराहे पर गिर्दा, हम सब जनगीत गाते हुए निकल जाते। उसी दौरान ठेठ बारिश के दिनों में उत्तरकाशी में जनकवियों के साथ एक काव्य गोष्ठी हुई। देहरादून से उत्तरकाशी तक कई जगह भूस्खलन हुआ था। उन सब को पार करते हुए आगे बढ़े। कला दर्पण की टीम के साथ सीधे वहीं पहुंच गये जहां कवि सम्मेलन था। वहाँ आंदोलनकारी मौजूद थे। गिर्दा ने खूब लम्‍बे गीत सुनाये। और कवि सम्मेलन के बाद कहा कि अब मैं अतुल का गीत- ‘राजा चुप है’, गाना चाहता हूँ।

उत्तरकाशी से टिहरी तक लौटते हुए उन्होंने कई गीतों के साथ यह गीत भी सुनाया। गिर्दा पुरानी टिहरी (जो अब जलमग्न है) में रुक गये और मैं, जहूर, चीमा श्रीनगर चले गए। इस दौरान गिर्दा ने बताया कि उन्होंने फैज अहमद फैज के साथ कई लोकगीतों और लोकधुनों को कुमांऊनी और हिंदी में गाया और गुनगुनाया है। वह एक हिंदी गीत गाते थे जिसका उन्होंने जबर्दस्ती कुमांऊनी अनुवाद किया था- हम मेहनतकश इंसान जब अपना हिस्सा मांगेंगे/एक गांव नहीं एक देश नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे।

बचपन में घर से भाग कर लखनऊ चले गए गिर्दा ने वहाँ रिक्‍शा चलाया। फिर लौट कर कुमांऊ आ गए। एक सरकारी कवि सम्मेलन में मैंने मंच से निमंत्रण पत्र को पढ़ा जो गलत छपा हुआ था। सबके नामों के साथ प्रूफ की गलतियां थीं। मैंने कहा था कि मुझे पता है कि आप मुझे अगली बार नहीं बुलायेंगे तो शायद संस्कृति विभाग कुछ सुसंस्कृत हो। उस मंच पर नीरज, वसीम बरेलवी के साथ नरेंद्र सिंह नेगी और गिर्दा भी मौजूद थे। सब चुप्पी साधे बैठे रहे। लेकिन बाद में गिर्दा ने कहा, ‘अभी इस व्यवस्था पर बहुत चोट करनी है। लंबा सफर है। इनको हमला करने का कोई भी अवसर मत दो। यह मेरे अनुभव की बात है।’ काफी दिन तक यह बात मुझे समझ नहीं आयी। फिर बाद में लगा कि गलत को उसके दुर्ग में ही भेदना चाहिए। और ये क्रिया लगातार चलाये रखने के लिए रणनीति भी जरूरी है। वह धीरे-धीरे इस तरह से अपना संदेश समाज को देते रहे।

एक बार उन्हें किसी कार्यक्रम में बुलाया गया और इतना पैसा भी नहीं दिया गया कि वह लौट सकें। वह आज के व्यवसायी कवियों की तरह थे नहीं कि पहले तय करते। लेकिन लोगों ने उन्हें ससम्मान नैनीताल पहुँचा दिया। आयोजकों को इसकी परवाह भी नहीं थी। पर कुछ दिन बाद उन्हीं आयोजकों ने उन्हें दुबारा बुलाया तो वह फिर आ गये। उनका काम संदेश देना था, वह देते रहे।

उनके साथ अंतिम भेंट हुई पेंग्विन प्रकाशन द्वारा ‘हिमालय की गूंज’ नामक एक राष्ट्रीय समारोह में जो दून लायब्रेरी एवं शोध संस्थान द्वारा आयोजित किया गया था। इसमें एक सत्र जनकवियों के साथ भी था। इसमें गिर्दा, नरेंद्र सिंह नेगी और मेरे गीत हुए। इसका संचालन शेखर पाठक ने किया। गिर्दा बहुत कमजोर लगे। वह दिल्ली से पुष्पेश पंत के साथ देहरादून पहुँचे थे। तभी उन्होंने होटल के कमरे में बताया था कि आपातकाल के दौरान उन्होंने कई नाटक खेले जिनमें ‘अंधेर नगरी’ और ‘थैंक्यू मि. ग्लाड’ का प्रभाव पड़ा। वह होली गायन परंपरा के शीर्षस्थ लोगों में से रहे।

मोहन उप्रेती, बी.एम. शाह, नईमा उप्रेती आदि के साथ उन्होंने खूब कार्य किया और आदि कवि ‘गौर्दा’ की तर्ज पर एक लंबी कविता भी लिखी। वह नृत्य भी बहुत अच्छा करते थे।

जब उनके निधन की सूचना हमें मिली तो मैं एक फोटो प्रदर्शनी में था। मैं उसे छोडक़र सीधे घर आया। घर आकर देखता क्या हूं कि देहरादून के तमाम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चैनल, अखबारों के संवाददाता फोन कर-कर के घर पर इकट्ठे हो गए। मैंने नैनीताल में शेखर पाठक और राजीव लोचन शाह को फोन पर यह स्थिति बताई तो उन्‍होंने कहा कि तुम देहरादून में प्रेस को संभालने का जिम्मा संभालो। मैंने ऐसे ही किया।

22 अगस्त, 2010 को गिर्दा के लीवर और स्टोन के ऑपरेशन के समय हल्द्वानी में निधन बताया गया। उनका जन्म 1943 को हुआ था। अंतिम यात्रा में लोग उनके जनगीतों को गाते हुए अंतिम विदाई देते रहे।

मुझे सूचना मिली कि उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट द्वारा 25 मार्च, 2011  को गिरीश तिवारी गिर्दा प्रथम सम्मान मुझे दिया जा रहा है। यह मैंने अखबारों और चैनल्स से ही जाना। मैं अपनी दोनों बहनों रेखा, रंजना के साथ रुद्रपुर गया और वहाँ0 सब लोग मिले। मैंने गिर्दा के ही गीत प्रस्तुत करके उन्हें याद किया।

गोविंद पंत राजू, योगेश धस्माना, पंतनगर वि.वि. के कुलपति श्री बिष्ट,  आजादी बचाओ आंदोलन के संयोजक डॉ. बनबारी लाल शर्मा और अपार भीड़ ने जो सम्मान चिह्न दिया उससे लगा कि गिर्दा हमेशा जीवित रहेंगे। य‍ह सम्मान कुछ ऐसा था- नीचे हुड़का उसके ऊपर पहाड़ और उसके ऊपर पहाड़ से जुड़ी हुई मुट्ठी। यह सम्मान चिह्न लेकर हम लेकर लौट रहे थे और लग रहा था कि गिर्दा हमारे साथ हैं।

बाल शिक्षा और वैज्ञानिक सोच की चकमक : प्रेमपाल शर्मा

बाल पत्रिका ‘चकमक’ का तीन सौवां अंक प्रकाशन की तैयारी में है। पत्रिका के शुरुआती वर्षों से लेकर आज तक की यात्रा पर कथाकार प्रेमपाल शर्मा का आलेख-

सितम्बर, 2011 का अंक बाल विज्ञान पत्रिका ‘चकमक’ का तीन सौवां अंक होगा। पच्चीस साल की अनवरत यात्रा। जुलाई, 1985 में ‘चकमक’ का पहला अंक आया था। शिक्षा में नवाचार के लिए मशहूर एकलव्य संस्थान से। संपादक : विनोद रायना। मेरी स्मृतियों में ‘चकमक’ अपने शुरुआती अंकों से बसी हुई है। शाम को मंडी हाउस स्थित श्रीराम सेंटर में नियमित जाना होता था और पहली बार ‘चकमक’ वहीं देखी और उसके बाद आज तक इसे देखे बिना मुझे चैन नहीं पड़ता। जितना खूबसूरत नाम उतनी ही खूबसूरत साज-सज्जा और सामग्री। निश्चित रूप से वक्त के साथ इसमें भी बदलाव आया है। स्मृति का सहारा लूँ तो शुरू की ‘चकमक’ अपेक्षाकृत छोटे बच्चों के लिए थी यानि पाँचवीं-छठी तक के बच्चों के लिए। मेरा लगातार ‘चकमक’ की तरफ झुकाव उन दिनों इसलिए भी था कि मेरे बच्चे उसी उम्र में प्रवेश कर रहे थे। उसमें छपे चित्र, कहानियाँ,  रोचक घटनाएं- कभी रेल की, कभी पृथ्वी की, कभी सूरज की जितना उन्हें आकर्षित करतीं उतनी ही मुझे। मेरे गाँव के बचपन में ऐसी कोई पत्रिका नहीं थी। कभी-कभी ‘चंदामामा’ की याद थोड़ी बहुत जरूर आती है। बहुत सादा कागज पर ‘चकमक’ के अनेक नियमित स्तम्‍भ आकर्षित करते थे जैसे- माथापच्ची, माह की पहेली, सवाली राम, एक मजेदार खेल आदि। ‘पाठक लिखते हैं’ में बच्चों के पत्र उनकी अनगढ़ भाषा, बोली में भी खूब छपते थे। यानि बच्चों और शिक्षा की एक मुकम्मिल दुनिया। बाल पत्रिकाएं तो इस बीच और भी छप रही हैं लेकिन ‘चकमक’ जैसी बाल मनोविज्ञान और शिक्षा दोनों को एक साथ साधने वाली पत्रिका शायद ही कोई हो।

चकमक में जो चीज पच्चीस वर्षों में लगातार कायम रही है वह है बच्चों के अंदर बहुत चुपके से एक वैज्ञानिक दृष्टि को रोप देना। साथ ही साथ उनकी रचनात्मकता को भी आगे बढ़ाना। किसी भी रूप में। चित्र, खेल, विज्ञान के प्रयोग, छोटी कहानियाँ, पत्र यानि कि जो कुछ उनकी जिन्दगी में सहज घटता है। ‘चकमक’ की यह आत्मा पहले संपादक विनोद रायना से लेकर मौजूदा संपादक सुशील शुक्ल और शशि सबलोक ने यथावत रखी है । बाजार के दबाव, चिकने पेपर पर आकर्षित चित्रों की मांग को देखते हुए पिछले सात-आठ सालों में ‘चकमक’ ने नये प्रयोगों को भी बखूबी निभाया है। निश्चित रूप से पुराने कथा कॉलम कम हुए हैं तो कुछ नये जुड़े भी हैं। मौजूदा ‘चकमक’ थोड़े और बड़े यानि कि आठवीं क्लास तक के बच्चों की जरूरतों को भी पूरा करती है।

‘चकमक’ का हर अंक बेहद खूबसूरत साजसज्जा के साथ सामने आता है दिलीप चिंचालकर जैसे वरिष्ठ चित्रकार और कनक आदि के सहयोग से। हाल ही में प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन को श्रद्धांजलि देते हुए जुलाई, 2011 अंक में उन पर बहुत सुन्दर सामग्री दी गई है। इतना खूबसूरत कवर हुसैन की पैंटिग्‍स पर शायद ही किसी पत्रिका ने निकाला हो। बच्चों की दुनिया में चित्रकार के जीवन को कैसे ले जाया जाए इसी उद्देश्य को सामने रखते हुए सुशील शुक्ल का लेख ‘एक चित्रकार था’ अद्वितीय कहा जा सकता है- ‘एक देश था। नहीं। एक चित्रकार था। वह घूमता रहता। गलियों में निकल जाता तो गलियों के साथ-साथ चलता चला जाता। नंगे पाँव चलने से गलियाँ उसके पाँव में लगती रहती।’ इतने बड़े चित्रकार की जीवनी ऐसी ही आत्मीयता और रचनात्मक भाषा में लिखी जा सकती है। इसी अंक में ‘हुसैन की कहानी अपनी जुबानी’ के भी कुछ अंश दिये हुए हैं। याद आ रहा है ऐसे ही एक अंक में कथाकार स्वयंप्रकाश द्वारा लिखा हुआ लेख- ‘जब गांधी जी की घड़ी चोरी चली गई।’ वाइस राय के साथ गांधी जी के छपे चित्रों के साथ इस कहानी को शुरू करते ही आप अधूरा नहीं छोड़ सकते । स्वयंप्रकाश पिछले दिनों से लगातार ‘चकमक’ में लिख रहे हैं। उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल का बच्चों पर लिखा उपन्यास इसमें धारावाहिक रूप से छपा है और अब पुस्तक रूप में उपलब्ध है। नाटककार असगर वजाहत भी लगातार पिछले दिनों  से हाजिर हैं। हिन्दी के जाने-माने कवि राजेश जोशी, देवी प्रसाद मिश्र, तेजी ग्रोवर, प्रभात से लेकर पुराने दिग्‍गज सहादत हसन मंटो, हरिशंकर परसाई, प्रेमचंद, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, संजीव लगातार इधर के अंकों में उपस्थित हैं। यानि कि नये रूप में पूरी पीढ़ी का रुख अपनी भाषा की ओर मोड़ती एक अनोखी पत्रिका।

यहाँ एक और अंक की याद आ रही है जिसमें हेलेन केलर के जीवन के कुछ अंश दिये गये थे। हेलन केलर प्रसिद्ध अमेरिकी लेखिका हैं जो दुर्भाग्‍य से डेढ़ वर्ष की उम्र में ही तेज बुखार से बहरी और अंधी हो गई थीं। उनकी शिक्षिका एनी सुलिवन की सूझबूझ और मेहनत ने उनको नया जीवन दान दिया। हेलेन केलर का यह कथन भूले नहीं भूलता कि हर स्वस्थ आँख वाले व्यक्ति को यह सोचना चाहिए कि यदि तीन दिन उसको दिखाई न दे तो कैसा लगेगा। ऐसी सैंकड़ों प्रेरणास्‍पद कहानियाँ ‘चकमक’ के अंकों में आ रही हैं। विज्ञान लेखक और ‘स्रोत’ के संपादक सुशील जोशी के लेखों के लिए भी य‍ह पत्रिका मेरी स्मृतियों में बसी हुई हैं। न्यूटन से लेकर बड़ी से बड़ी वैज्ञानिक घटनाओं, खोजों पर सुशील जोशी के लेख किस बच्चे में वैज्ञानिक बनने की जुंबिश पैदा नहीं कर देगें?

‘चकमक’ के तीन सौवें अंक पर बाल शिक्षा और वैज्ञानिक सोच के लिए समर्पित समस्त एकलव्य परिवार को हार्दिक बधाई।

चकमक- बाल मासिक पत्रिका
संपादक : सुशील शुक्ल, शशि सबलोक
एक प्रति : 30 रुपये, सालाना व्यक्तिगत सदस्यता 300  तथा संस्थागत सदस्यता 500, आजीवन : 4000 रुपये
पता : एकलव्य,
ई-10, शंकर नगर, बीडीए कॉलोनी, शिवाजी नगर,
भोपाल, मध्य् प्रदेश-462016.
फोन नं. 0755-4252927,2550976, 2671017.
फैक्स : 0755-2551108.

हरिकृष्‍ण देवसरे सहित 24 लेखकों को साहित्‍य अकादेमी बाल साहित्‍य पुरस्‍कार

नई दिल्‍ली : साहित्‍य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार-2011 की घोषणा कर दी गई है। हिन्‍दी के लिए इस बार हरिकृष्‍ण देवसरे को यह पुरस्‍कार उनके समग्र योगदान के प्रदान किया जाएगा। साहित्‍य अकादेमी की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार त्रिश्‍शूर में 16 अगस्त, 2011 को साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय की अध्यक्षता में अकादेमी के कार्यकारी मंडल की बैठक में विभिन्न भाषाओं के निर्णायक मण्डलों द्वारा चुनी गई 24 पुस्तकों को बाल साहित्य पुरस्कार के लिए अनुमोदित किया गया।

इस वर्ष बाल साहित्य पुरस्कार के लिए सात कविता-संग्रह, छह उपन्यास, पाँच कहानी-संग्रह, एक लोक-कथा एवं नाटक तथा पाँच लेखकों को बाल साहित्य में दिए गए उनके समग्र योगदान हेतु चुना गया है।

भारतीय भाषाओं के नाम, उनके लेखकों और उनकी रचनाओं के नाम-

असमिया / सेउजिया धरनी (उपन्यास)/ बंदिता फूकन
बांग्‍ला / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / सेलेन घोष
बोडो / पुराणनि सल फिथिखा (भाग 1-2)(कहानी) / महेश्‍वर नार्ज्‍जारी
डोगरी / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / श्‍यामदत्त ‘पराग’
अंग्रेज़ी / द ग्रासहोपर’स रन (उपन्यास) / सिद्धार्थ शर्मा
गुजराती / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / (स्व.)रमेश पारिख
हिन्दी / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / हरिकृष्‍ण देवसरे
कन्नड / मुलुगादे ओरिगे वंडावरु (लघु-उपन्यास) / एन. डी’सूजा
कश्‍मीरी / नव केंसा मेंसा (कविता एवं कहानी) / गुलाम नबी आतश
कोंकणी / वर्स फुकट वचंक ना (उपन्यास)/ गजानन जोग
मैथिली / जकर नारि चतुर होइ (कहानी) / मायानाथ झा
मलयाम/रुथाक्कुट्टियम माशुम (विज्ञान-उपन्यास)/ के. पापूट्टि
मणिपुरी/ ताल तारेट (लोक-कथा एवं नाटक)/ के. शांतिबाला देवी
मराठी / बोक्या सातबंडे (भाग 4 एवं 5)(लघु-कहानी)/ दिलीप प्रभवलकर
नेपाली / बाल-सुमन (कविता-संग्रह)/ स्नेहलता राई
ओड़िया / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / महेश्‍वर मोहांति
पंजाबी / बूझो बच्चेयों मैं हाँ कौन? (भाग 1-3)(कविता)/ दर्शन सिंह आष्‍ट
राजस्थानी / सतोलियो (कहानी)/ हरीश बी. शर्मा
संस्कृत/कौमारम् (कविता)/अभिराज राजेंद्र मिश्र
संताली / सिंगार अखरा (कविता)/ नूहुम हेम्ब्रह्म
सिन्धी/ नयों निरालो जंगल (उपन्यास)/ हुंदराज बलवानी
तमिल / शोलक कोल्लइ बोम्मई (कविता) / एम.एल. थंगप्पा
तेलुगु/उग्गुपाल्लु (कहानी)/ एम. भूपाल रेड्डी
उर्दू/कुल्लियात-ए-आदिल (भाग 1)(कविता)/आदिल असीर देहलवी

श्री नारायण सुर्वे : सूर्यनारायण रणसुभे

नारायण सुर्वे (15 अक्टूबर, 1926-16 अगस्त, 2010)

मराठी के कालजयी कवि नारायण सुर्वे की पहली पुण्‍यतिथि पर वरिष्‍ठ आलोचक सूर्यनारायण रणसुभे का आलेख और उनकी तीन कवितायें-

आधुनिक मराठी कविता की शुरुआत 1885 से श्री केशवसुत की कविताओं से होती है। अंग्रेजी शिक्षा के कारण जो नयी मानवतावादी मूल्य व्यवस्था यहाँ के वैचारिक जगत में प्रवेश कर रही थी, उसकी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति केशवसुत की कविताओं में मिलती है। 1885 से लेकर 1960 तक मराठी कविता विभिन्न मोड़ों से गुजरती है। यह सही है कि मार्क्‍सवादी विचारों को आधार बनाकर कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में 1921 में हुई। मुंबई में कामगार वर्ग काफी संख्या में था, इस कारण यहाँ यूनियन बनी। मार्क्‍सवाद का तेजी से प्रचार-प्रसार भी हुआ। परन्‍तु यहाँ के लेखकों, कवियों, बुद्धिजीवियों को मार्क्‍सवाद अधिक प्रभावित नहीं कर पाया। विशेषत: साहित्य के क्षेत्र में। स्‍मृतिशेष श्री नारायण सुर्वे तथा श्री शरदचंद्र मुक्तिबोध (हिंदी कवि श्री गजानन माधव मुक्तिबोध के बड़े भाई) मराठी में ये दो ही कवि ऐसे हैं जिन्होंने माकर्सवाद को आत्मसात कर, आम आदमी की व्यथा को और व्यवस्था की क्रूरता को पूरी ताकत के साथ अपनी कविताओं में व्यक्त किया है। श्री शरदचंद्र मुक्तिबोध की कविता मध्यवर्ग और बुद्धिजीवियों तक ही सीमित रही, परंतु श्री नारायण सुर्वे की कविता आम आदमी से लेकर बुद्धिजीवियों तक सबको आकर्षित करती रही। इसके मुख्य कारण दो हैं- 1. सुर्वेजी की सीधी, सरल पारदर्शी भाषा। 2- आम आदमी के जीवन की व्यथा को, उसके संघर्ष को, उसकी दृष्टि  से देखने, परखने और समझ लेने की उनकी निरीक्षण शक्ति। 84 वर्ष की जिन्‍दगी में सुर्वेजी ने केवल 145 कविताएं लिखीं और इन 145 कविताओं के कारण वह महाकवि कहलाए। वह अंग्रेजी भी नहीं जानते थे। उनकी पढ़ाई केवल सातवीं कक्षा तक हुई थी।

श्री नारायण सुर्वेजी का जन्म 15 अक्टूबर, 1926 में हुआ। यह जन्म तारीख भी ठीक-ठाक है कि नहीं, उन्हें भी पता नहीं। क्योंकि उनको जन्म देने के बाद उनकी जन्मदात्री माँ ने किसी मजबूरी के कारण उन्हें कामगारों की बस्ती के कूडे़ के ढेर पर फेंक दिया था। गंगाराम सुर्वे नामक एक कामगार मुंबई के इंडिया वुलन मिल के स्पिनिंग विभाग में काम करता था। उनकी पत्‍नी काशीबाई कमला मिल के बाइंडिंग विभाग में कार्यरत थी। इस दम्‍पति की नजर नवजात बालक पर प्रात:काल पड़ी। वे उसे घर ले आए। उनकी आर्थिक स्थिति तो बहुत अच्छी नहीं थी फिर भी उन्होंने इसकी परवरिश की। परल की एक चाल में ये रहते थे। इस बालक को उन्होंने ‘नारायण’ नाम दिया। पिता के स्थान पर अपना नाम दिया। माहीम के पेराडाइज थिएटर के सामने स्थित स्कूल में उन्होंने इसे दाखिला दिया- नारायण गंगाराम सुर्वे इस नाम से। यह घटना 1936 की। गंगाराम सुर्वे कामगार की नौकरी से निवृत्त हुए। मुंबई छोडक़र अपनी गाँव की ओर लौटने का उन्होंने निर्णय लिया। केवल दस रुपये नारायण के हाथ में रखकर वे चले गए। यहीं से सुर्वेजी का जीवन-संघर्ष शुरू हो जाता है। आसपास पूर्णरूप से कामगारों की बस्ती। घर और बाहर घनघोर दरिद्रता। अब भूख के साथ संघर्ष शुरू हुआ। होटल में कप-सॉसर धोने के काम से लेकर औरों का कुत्ता संभालने तक का काम वह किशोरावस्था में करते रहे। कुछ दिन गोदरेज के कारखाने में टिन उठाने का काम भी किया। टाटा ऑइस मिल में हमाली(मजदूरी) भी की। कामगारों की बस्ती में काम करते-करते वह कामगार आंदोलन की ओर मुड़ गए। यह आंदोलन आगे चलकर उनके जीवन का आधार बन गया। कॉमरेड एस.ए. डांगे, मिरजकर, एस.व्‍ही. देशपांडे आदि के साथ रहने का अवसर उन्हें मिलने लगा। साम्यवादी विचारधारा से परिचित होने लगे। कॉमरेड मिरजकर जब मुंबई के मेयर(महापौर) बने तब उन्होंने सुर्वेजी को महानगर पालिका के एक विद्यालय में चपरासी के रूप में नियुक्त की। यह घटना 1948 की। अब उन्हें खड़े होने के लिए जगह मिल गई। 1957 में वह वर्नाक्‍यूलर फाइनल (आज की भाषा में 7वीं कक्षा) की परीक्षा उत्तीर्ण हुए। 1959 में प्राथमिक शिक्षक सनद परीक्षा में वह बैठे और उत्तीर्ण हुए। 1961 में वह चपरासी से प्राथमिक शिक्षक बन गए। 1956 में उन्होंने कविता लिखना शुरू किया था। करीब 13 वर्षों तक प्राथमिक विद्यालय में चपरासी और 1961 से सेवानिवृत्त होने तक प्राथमिक शिक्षक के रूप में कार्यरत थे। कामगारों में और साम्यवादी मित्रों में उनकी पहचान ‘मास्टर’ के रूप में ही थी। 14-15 वर्ष की आयु में उन्होंने भारत-छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया था। 1946 के आर्मी-विद्रोह में भी उनका सहभाग था। 1948 में कृष्णाबाई से उनका प्रेम विवाह हुआ। वह भी अनाथ और सुर्वेजी के पड़ोस में रहती थीं।

सुर्वेजी की पहली कविता 1958 में प्रकाशित हुई। 1962 में इनका पहला काव्य संग्रह ‘ऐसा गा मी ब्रह्म’ प्रकाशित हुआ। इस काव्य संग्रह के आरंभ में उन्होंने लिखा- ‘जो मैंने अनुभव किया, जो मुझे बेचैन कर गया, वही शब्‍द रूप लेकर बाहर निकला है। इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। दोष होगा तो मेरे समय का। मैं खामोश बैठूंगा, शरीर भी चुप बैठेगा, पर आत्मा ? वह मुझे खामोश बैठने नहीं दे रही है। शब्द मुझे धकेलते रहे। मैं धकेला जाने लगा। आज की कविता में मैं कहाँ हूँ, यह प्रश्‍न मुझे सताता रहता है। पता नहीं क्यों मैं लिखते रहता हूँ,  लिखते रहूँगा। इसके सिवा कोई दूसरा विकल्प ही मेरे सामने नहीं है। जब मेरी हृदयगति रुक जाएगी, अथवा जब मुझे शब्द नहीं मिलेंगे (ऐसा भी एक दिन आनेवाला है), तब अलबत्ता मुझे रुकना ही होगा।’

इनके कुल पाँच काव्य संग्रह प्रकाशित हुए। ऐसा गा मी ब्रम्ह (1962), माझे विद्यापीठ (1966) और बाद के वर्षों में  सनद, जाहीरनामा और मानुष कलावंत (नये मनुष्य का आगमन)। इन पाँच काव्य संग्रहों में इनकी कुल 146 कवितायें प्रकाशित हुई हैं। और इन 146 कविताओं ने उन्हें लोकप्रियता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाया। सस्ती लोकप्रियता नहीं। मराठी काव्य-साहित्य की एक नई दिशा इन कविताओं ने दी। मराठी साहित्य का सर्वाधिक सम्मानित पद- अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन का अध्‍यक्ष पद उन्हें सहजता से प्राप्त हुआ। अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें प्राप्त हुए। एक प्राथमिक शिक्षक अपनी प्रतिष्‍ठा के बल पर विदेश अर्थात रूस हो आए थे।

मर्क्‍सवाद के लिए जरूरी- सामाजिक प्रतिबद्धता नारायण सुर्वे की कविता में है। प्रचारात्‍मक नहीं, बावजूद इसके कामगारों की व्‍यथाओं को, उनके संघर्ष को पूरी शक्ति के साथ प्रस्तुत करने वाली। प्रगतिशील आंदोलनों में वे अपनी विशिष्टता को बनाए रखते हुए औरों को साथ लेकर, संवाद और सहयोग करते आगे बढ़े। उनकी कविता ने सभी वर्गों, सभी स्तरों के लोगों को अपनी ओर आकृष्ट  कर लिया। मराठी काव्य साहित्य की एक पीढ़ी का निर्माण करनेवाला यह कवि था। मराठी कविता के वह एक महत्वपूर्ण मील के पत्थर हैं। इनकी कविता का परामर्श किए बगैर मराठी कविता का इतिहास ही लिखा नहीं जा सकता,  इतने वह महत्वपूर्ण कवि हैं।

सुर्वे केवल कवि ही नहीं थे, वह एक अच्छे संघटक थे। संगठनों का निर्माण करना, उन्हें आकार देना, उनमें सक्रिय होना, जरूरी हो तो प्रत्यक्ष सड़क पर उतर कर नारे लगाना- यह भी उन्होंने किया। लेखक, कवि और कार्यकर्ता इन सबका समन्वय उनके व्यक्तित्व में हुआ था। एक ही समय गांधी, नेहरू, लोहिया, मार्क्‍स, अम्‍बेडकर के जीवन विषयक दर्शन, तात्विक विवेचन-विश्‍लेषण की नींव पर उनकी कविता खड़ी है। ठीक उसी समय वह स्थानिक लोक साहित्‍य, लोक कला और लोक जीवन की शैली के संस्कार भी स्वीकार करते हैं। सुर्वेजी ने साहित्‍य का लक्ष्य केवल साहित्य की सुंदर, कलात्मक करने का नहीं है अपितु प्रत्‍येक का जीवन सुंदर हो और उस साहित्य का लक्ष्य है। प्रत्येक के जीवन में एक नयी खूबसूरत सुबह आए और उस हेतु चलने वाले आंदोलनों, संघर्षों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता तथा इन आंदोलनों और संघर्षों की अभिव्यक्ति हेतु साहित्य और कथायें माध्यम मात्र हैं, ऐसी सुर्वेजी की मान्यता रही है।

सुर्वेजी हिंदी के अच्छे पाठक थे। श्री हरिशंकर परसाई, प्रेमचंद और यशपाल उनके प्रिय लेखक थे। श्री परिसाईजी की अनेक व्यंग्य रचनाओं का आपने मराठी में अनुवाद किया था। प्रसिद्ध उर्दू लेखक श्री कृश्‍नचंदर जी का चर्चित उपन्यास ‘दादर पुल के बच्चे’ का मराठी अनुवाद आपने किया था।

उनकी कविताओं में व्यक्त यथार्थ दहकता हुआ है। ‘माझे विद्यापीठ’ काव्य संग्रह की अधिकांश कविताओं में इस दहकते यथार्थ के दर्शन होते हैं। समाज के श्रमिक, दलित, पीडि़त, व्यक्ति, मजदूर ही उनके आसपास हैं। इन श्रमिकों का विश्‍व ही कवि के लिए विश्‍वविद्यालय-विद्यापीठ है। यह मेरा विद्यापीठ है- इसे वह पूरे अभिमान से कहते हैं। उनकी कविताओं में दिन-रात खटकनेवाले सर्वहारा लोग हैं, सड़क की दीवारों पर रात अंधेरे में पोस्टर चिपकानेवाले लडक़े हैं, घोड़ों के पैरों में नाल ठोकनेवाला है,  वेश्यायें हैं,  मांयें हैं- एक नया अनुभव ‘माझे विद्यापीठ’ में प्रकट हुआ है। सुर्वे प्रत्यक्ष जीवन में और कविता में भी एक ही चेहरे से जीते रहे। इसी कारण वह लिखते हैं कि किसी को भी सलाम करना संभव भी नहीं हुआ। सुर्वे स्वाभिमानी और ईमानदार थे। जीवन में अनेक प्रतिकूल स्थितियों से वह गए परंतु स्वार्थवश उन्होंने कभी खुद से बेईमानी नहीं की। मराठी के कवि श्री शरदचंद्र मुक्तिबोध और विंदा करंदीकर, सुर्वेजी से पूर्व प्रगतिवादी विचारधारा को व्यक्त करनेवाले कवि हैं। उनकी कविताओं में भी यथार्थ की अभिव्‍यक्ति हुई है। परंतु सुर्वेजी की कविता में व्यक्त यथार्थ अधिक प्रखर है। विशेषत: सुर्वेजी की कविताओं में जो आशावाद या जीवन के प्रति जो आस्था व्याप्त हुई है, वह उस यथार्थ को जीनेवाले श्रमिकों के भीतर स्थित आस्था है। धीमी, निवेदनात्मक संवादों का उपयोग प्रभावपूर्ण पद्धति से करनेवाली, बोली भाषा के निकट जानेवाली, गद्य से नाता बतानेवाली काव्य शैली का उन्होंने निर्माण किया। मराठी कविता को मध्यवर्ग की चौखट से बाहर निकालने का काम सुर्वे की कविताओं ने किया है। अपनी कविताओं का काव्य पाठ उन्होंने महाराष्‍ट्र के देहातों से लेकर शहरों तक में किया। इस देश में जहाँ-जहाँ मराठी भाषिक हैं, उन्होंने उन्हें निमंत्रित किया और वह सभी जगहों पर पहुँचे। किसी भी प्रकार की शर्त न डालते हुए। उन्होंने कभी काव्य पाठ हेतु मानदेय की अपेक्षा नहीं की। समाज के सभी तबकों ने उनकी कविता को सुना, बेचैन हो गए। काव्य पाठ के समय उन्हें दो कविताएं सुनाने का आग्रह लोग करते। मास्टर, तुमचंय नाम लिख (मास्टरजी आप अपना ही नाम लिखिए) और पोस्टर। वह अपने बारे में पूरे आत्मविश्‍वास के साथ कहते कि ‘मैं जब जन्मा था, तब किसी भी प्रकार का नाम मैंने धारण नहीं किया था, परंतु जब मैं यहाँ नहीं रहूंगा तब इस पृथ्वी की पीठ पर एक नाम छोडक़र जाऊँगा- वह है नारायण गंगाराम सुर्वे।’ अपने इस कथन को वे सार्थक कर गए। जिन्‍दगी भर कामगार और शोषितों की भूख और रोटी की वेदना को अपनी कविताओं के माध्यम से पेश करनेवाली तलवार म्यान हो गई।

सैकड़ों बार चांद आया, तारा चमके, रात बेहोशी लेकर आई
परंतु रोटी का चांद खोजने में ही जिन्‍दगी बर्बाद हो गई।

श्रमिकों के इस जीवन-सत्य को प्रस्तुत करनेवाला यह कवि 16 अगस्त, 2010 को हमेशा के लिए हमारे बीच से चला गया। रोटी के चन्‍द्रमा का ही विलय हो गया।

अपनी कविता के प्रेरणास्थानों के सन्‍दर्भ में चर्चा करते हुए वह एक स्थान पर लिखते हैं कि ‘लुहार जैसे धधकती आग में लोहे से जो वस्तु बनानी होती है, ठीक वैसा आकार उसे वह देने लगता है,  ठीक उसी तरह मैं भी तैयार होता गया। मन, आँखें,  कान खोलकर मैं सब सुन रहा था, देख रहा था, मन में समाकर रख रहा था। कामगारों की यह बस्ती मेरी पाठशाला ही तो थी। मुंबई के एक छोटे से टुकड़े पर मैं रह रहा था। परंतु पूरे विश्‍व का दर्शन मुझे इस परिसर में हो रहा था।’ दूसरे एक लेख में वह लिखते हैं- ‘मुझे हमेशा लगता है कि दु:ख से मैं संवाद करूँ। इससे खुद को एक नया आधार मिल जाता है। फूल की पंखुड़ी की तरह एकेक दु:ख ढहने लगता है और मैं फिर नये रूप में नयी बातों के सम्मुख जाने लगता हूँ।’ उनका एक बड़ा सुन्‍दर लेख है- ‘कविता और मैं’। इसमें वह कविता विषयक अपनी दृष्टि का विस्तार से विवेचन करते हैं। लिखते हैं कि ‘कविता लिखने के पूर्व मेरे मन में कोई खास चित्र स्पष्ट  रूप से मेरे सम्मुख नहीं होता। काफी अस्पष्टता होती है। एक धागा, एक सूत्र मन के किसी कोने में तकलीफ देते रहता है। और मैं मन ही मन छटपटाने लगता हूँ। शब्द तुरन्‍त नहीं आते। वे काफी थमते हैं। और जिस पद्धति से वह कविता व्यक्त होना चाहती है, वह ठीक नहीं लगती। कुछ तो अधूरा-सा रह गया है का बोध होते रहता है। ऐेसे कई दिन निकल जाते हैं। भीतर ही भीतर वह अनुभूति संस्कारित होती रहती है। कई दिन और कई बार तो कई महीने अनुभूति का वह बीज भीतर ही भीतर कसमसाते रहता है। जब तक उसे ठीक शब्द, ठीक रूप, ठीक स्वर नहीं मिल पाता, तब तक ऐसा चलते रहता है। एक ही बैठक में कविता पूर्ण करना मुझसे कभी हुआ नहीं। कई बैठकें होती हैं। कविता लिखना सीधी, सरल और सहज सीधा बात है- ऐसा मुझे कभी भी नहीं लगा। वह असाध्य अथवा कष्‍टसाध्‍य क्रिया है। अर्थात् शब्‍दों से मेरा परिचय तो है ही। परंतु शब्‍द मुझे गौण लगते हैं। अनुभव की ही कविता होती है। मात्र शब्दों की जो कविता होती वह तो दिपावली के समय बजानेवाले पटाखों की तरह होती है।’

कविता पाठकों तक अर्थात् रसिकजनों तक कैसे पहुंचे इस प्रश्‍न को वह उठाते हैं। इस संघर्ष में केवल कवि को जिम्मेदार ठहराना वह उचित नहीं समझते। ठीक इसी प्रकार रसिक भी पूरी तरह से जिम्मेदार नहीं ठहराए जा सकते। प्रश्‍न इसके लिए कौन जिम्मेदार यह नहीं है अपितु इस पर से रास्ता निकालने का प्रश्‍न महत्वपूर्ण है। श्री सुर्वेजी ने इस दृष्टि से कुछ मार्ग सुझाए हैं-

1. कविता लोगों की समझ में आ जाए- ऐसी होनी चाहिए।
2. साहित्य संस्थाओं को चाहिए कि वे कम से कम लागत में काव्य संग्रह छापें और बेचें। कवि सम्मेलनों के टिकट कम से कम रखे जाएं। इन्‍हीं अवसरों पर काव्य संग्रह बिक्री हेतु रखे जाएं।
3. कवि सम्मेलनों में कवि कम से कम पारिश्रमिक या मानदेय स्वीकारें।
4. कवि सम्मेलन सार्वजनिक बगीचों, मैदानों में हों। कारखानों के हजारों मजदूरी के सम्मुख हों।
5. सभी साहित्यिक संस्थानों को चाहिए कि वर्ष में एक सप्ताह ‘कविता-सप्ताह’ के रूप में मनाएं।
6. रेडियो, दूरदर्शन और महाविद्यालयों में होनेवाले समारोहों में काव्य पाठ को विशेष स्थान दें। ग्रंथालयों में काव्य सम्मेलन हों। काव्य संग्रह के प्रदर्शन अथवा रसिकों की चर्चाएं आयोजित की जाएं।
7. संबंधित भाषा के दैनिक पत्र पूरे वर्ष में एक अंक ‘काव्य अंक’ के रूप में निकाले। उसमें संबंधित वर्ष की उत्कृष्ट  काव्य-संग्रह, उससे सम्‍बन्धित पाठकों के अभिप्राय हों। समीक्षायें हों।
8. कवियों को संगठित होकर, आगे आकर ‘बुक ट्रस्ट’ की स्थापना करनी चाहिए। उसके माध्यम से काव्‍यांक निकलें।

आम आदमी तक कविता की पहुँचाने के ये विभिन्न मार्ग हैं। पूरी निष्‍ठा से इसके लिए प्रयास होने चाहिए।

इसमें कोई संदेह नहीं कि श्री नारायण सुर्वे की कवितायें अपनी आंतरिक शक्ति के कारण आम आदमी तक गईं। आम आदमी से यहाँ आशय संवेदनशील आम आदमी है। इनकी कविता को चाहनेवाले सभी तबकों, सभी व्यवसायों में मिलेंगे। एक बार किसी शहर में वह सैलून में बाल कटवाने के लिए गए तो उन्हें देखकर वह नाई प्रसन्न हो उठा। उसने उन्हें पहचाना, इतना ही नहीं उनकी तीन-चार कवितायें उसने सुनाईं। मराठी कविता जो मध्यवर्ग तक सीमित थी, सुर्वेजी ने उसे सभी तबकों में पहुँचाया। उनका एक गीता तो लोकगीत की तरह गाँवों में गाया जाता है। गानेवालों को यह भी नहीं मालूम कि इसके गीतकार का नाम क्या है?

कविता और श्रमिक जीवन के प्रति इतना प्रतिबद्ध और इतना प्रतिभा संपन्न कवि यह अपवादात्मक स्थिति है। इन पंक्तियों के लेखक को उनका स्नेह तथा उनका सानिध्य निरंतर मिलता रहा। इसे वह अपने जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि मानता है। उनकी कुछ कविताओं के यहां अनुवाद दिए जा रहे हैं-

मुश्किल होता जा रहा है

हर रोज खुद को धीरज देते जीना, मुश्किल होता जा रहा है
कितना रोके खुद ही खुद को,  मुश्किल होता जा रहा है,
फूट-फूट कर रोनेवाले मन को, थपकियाँ दे-देकर सुलाता हूँ
भूसी भरकर बनाए हुए पशु को देखकर, रुकना मुश्किल है,
समझौते में ही जीना होगा, जीता हूँ, पर रोज, मुश्किल होता जा रहा है
अपना अलग से अस्तित्व होते हुए भी, उसे नकारना, मुश्किल होता जा रहा है
समझ पाता हूँ, समझाता हूँ, बावजूद समझाने के, नहीं समझ पाता हूँ
कोठरी में कभी जलती दियासलाई नहीं गिरेगी, इसकी गारंटी देना, मुश्किल होता जा रहा है।

खुद को रचते गया

आकाश की मुद्रा पर अवलंबित रहा नहीं मैं
किसी को भी सलाम करना कभी संभव नहीं हुआ, मुझे

पैगंबर कई मिले, यह भी झूठ नहीं
खुद को कभी हाथ जोड़ते हुए देखा नहीं मैंने

घुमा मैं सभी में, पर किसी को दीखा ही नहीं,
हम ऐसे कैसे? ऐसा प्रश्न कभी खुद से किया नहीं।

झुण्‍ड कर ब्रह्माण्‍ड में रंभाता घुमा नहीं
खुद को ही रचते गया, यह आदत कभी गई नहीं।

बुझते-बुझते खुद से

झूठ बोलकर जिन्‍दगी को कोई भी सँवार सकता है
ऐसे निमंत्रण हमें भी आए, नहीं ऐसा नहीं,

ऐसी कितनी ही ऋतुएँ सीटी बजाती हुई गईं घर पर से,
शब्दों ने आँख उठाकर उधर देख ही नहीं- ऐसा भी नहीं

शास्त्रों ने गोपनीय रखा अर्थ, हम तालियाँ ही बजाते रहे,
जिन्‍दगी का अनुवाद करते रहो, ऐसा कहने वाले काफी थे- नहीं ऐसा नहीं

ईमान खरीदने वाली दुकानें जगह-जगह पर
दिमाग को रेहन रखनेवाले महाशय नहीं हैं ऐसा नहीं
ऐसे बेईमान प्रकाश में एक बानी सुरक्षित रूप से ले जाते समय,
बुझते-बुझते खुद को सँवार नहीं पाया- ऐसा भी नहीं।

‘आनंदम’ की काव्य गोष्ठी सम्पन्न

नई दिल्‍ली : ‘आनंदम संगीत व साहित्य संस्था’ की ओर से 8 अगस्‍त, 2011 को कस्तूरबा गाँधी मार्ग स्थित हिमालय हाऊस में मैक्स न्यूयॉर्क के सभागार में मासिक काव्‍य गोष्‍ठी का आयोजन किया गया। इसमें कवि भूपेन्द्र कुमार, प्रेमचंद सहजवाला, मुनव्वर सरहदी, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, सरफराज़ फराज़  देहलवी, शैलेश सक्सेना, चाँद भरद्वाज, अब्दुल हमीद, साज़ देहलवी, अजय अक्स, अब्दुल रहमान मंसूद, लालचंद, अब्दुल रहमान मंसूर आदि कवियों ने काव्यपाठ किये। इसकी अध्यक्षता शायर मुनव्वर सरहदी ने की तथा संचालन ममता किरण ने किया।

देश की वर्तमान स्थिति पर लक्ष्मीशंकर वाजपेयी के दोहे दो टूक तरीके से बेहद सटीक चोट करते रहे। जैसे-

सुनो अली बाबा सुनो, जनता का यह शोर
कड़े नियंत्रण में रखो, अपने सारे चोर!

अयोध्या विवाद के फैसले पर प्रेमचंद सहजवाला का यह अप्रत्यक्ष किन्तु प्रत्यक्ष सा लगता शेर-

अदालत में गए ईश्‍वर पे हम सब फैसला सुनने,
मगर अफ़सोस सब आए फकत ईश्‍वर नहीं आया।

कवि भूपेन्द्र की कविता की कुछ पंक्तियाँ-

तन का जब जब सौदा करना पड़ता है,
मन को तब तब पल पल मरना पड़ता है।

शायर अब्दुल रहमान मंज़ूर की गज़ल के दो शेर-

सिर्फ इतना सवाल है मेरा,
क्या तुम्हें भी खयाल है मेरा,
तुम जहाँ साथ छोड़ जाओगे,
बस वहीं इंतकाल है मेरा।

अजय अक्स-

यार थे जो पुराने गए,
हाय वो भी ज़माने गए
कृष्ण अब तो सुदर्शन उठा
बांसुरी के ज़माने गए

‘आनंदम’ अध्यक्ष जगदीश रावतानी-

शायरी करने जो लगा हूँ मैं,
लगता है खुद से अब मिला हूँ मैं
अब नहीं चुभते ताने अपनों के
चांदनी धुप और हवा हूँ मैं

सरफराज़ फराज़ देहलवी-

सौंप कर उस बेवफा को ही चरागे  दिल  मियाँ
हमने अपनी जिंदगी में खुद अँधेरा कर दिया

संचालिका ममता किरण ने तरन्नुम में एक मधुर गीत सुनाया जिसने पूरे सभागार का मन मोह लिया-

भीगा भीगा मन डोल रहा/इस आँगन से उस अंगा/यादों की अंजुरी से फिसले/जाने कितने मीठे लम्हे/लम्हों में दादी नानी है

अंत में गोष्ठी अध्यक्ष मुनव्वर सरहदी ने खट्टे मीठे कई शेर सुनाए जिन से सभागार कहकहों से भर गया। पर प्रारंभ में उन्होंने कुछ गंभीर शायरी भी की-

अपना पाना नहीं रहा मक्सद,
अपना आईन सिर्फ खोना है
कौन समेट लेगा ये नहीं मालूम,
हम को बोना  है सिर्फ बोना है

गोष्ठी को संपन्न करते हुए जगदीश रावतानी ने सभी कवियों को धन्यवाद किया व स्वतंत्रता दिवस की बधाइयाँ दीं।

संवेदनापरक लघुकथायें : संतोष दीक्षित

क‍थाकार वीरेन्‍द्र नारायण झा का लघुकथायें विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर खासी चर्चित हुई हैं। उनके लघुकथा संग्रह ‘भगवान भरोसे’ पर संतोष दीक्षित की टिप्‍पणी-

आज के इस रफ्तारपसंद समय में सबकुछ फटाफट करने की प्रवृत्ति बहुत तेजी से पनप रही है। लघुकथाओं को भी साहित्य की फटाफट विधा कहा जा सकता है क्योंकि आज के समय में इसकी प्रासंगिकता काफी बढ़ चुकी है। यद्यपि लघुकथा के प्रचलन के साथ ऐसी बात नहीं। यह पुरानी विधा है और काफी पहले से एवं लगातार लिखी जा रही है। आज के समय में इसके बढ़ते प्रचलन का एक कारण इसका लघु आकार एवं सीमित शब्द संख्या तो है ही, जिसके कारण इसे फटाफट पढ़ा जा सकता है। लेकिन साहित्य और कला की दुनिया के लिए यह कोई उल्लेखनीय मानदंड नहीं। जाहिर है कि लघुकथाओं में आकार के अतिरिक्त भी कुछ ऐसा है जिसे ‘देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर’ जैसी उक्ति के साथ ही समझा जा सकता है। लघुकथा का इल्म और शिल्प इसी में है कि कितने कम से कम शब्दों का इस्तेमाल का हम कितनी मारक बात कह सकते हैं। यह बूंद में समुद्र का एहसास कराने से लेकर गागर में सागर भरने जैसा कठिन सृजनात्मक संकल्प है। इसीलिए इस विधा में उसी को पैठने का अवसर मिल सकता है जो इस कला के उस्ताद हो। वीरेन्द्र नारायण झा भी ऐसे ही उस्तादों की परंपरा की एक कड़ी के रूप में उभरते दीख पड़ते हैं। उनके लघुकथा संग्रह ‘भगवान भरोसे’ को पढक़र उनकी सृजनधर्मिता के प्रति इतना भरोसा तो किया ही जा सकता है।

वीरेन्द्र मिथिलांचल के हैं। वर्ष दर वर्ष बाढ़ की विभीषिका झेलते क्षेत्र के। यह विभीषिका कई जगह पूरी मार्मिकता के साथ तो कई जगहों पर चुटीले व्यंग्य के रूप में प्रकट हुई है इस संग्रह के ‘भगवान भरोसे’, ‘कटाक्ष’, ‘सपना’, ‘परदेशी’ जैसी लघुकथाओं में। पुस्तक का आवरण पृष्ठ भी इसी प्राकृतिक आपदा से जूझते लोगों के एक दृश्य को समर्पित है। ‘भगवान भरोसे’ संग्रह की बहुत सारी लघुकथायें संवेदनापरक हैं। यद्यपि लघुकथाओं में व्यक्त संवेदना इकहरी होती है लेकिन वीरेन्द्र झा ने कुछ लघुकथाओं में ऐसा कौशल दिखलाया है कि वह अपनी एक अमिट छवि हमारे हृदय पर अंकित कर जाती हैं। ‘शिक्षा’, ‘लेबर डे’, ‘दुखिया की भूख’, ‘सखी’, ‘स्वांग’, ‘नृशंस’, ‘उष्मा’, ‘मिट्टी की औरत’ आदि लघुकथाओं को इस दृष्टि से देखा, परखा जा सकता है।

आज के समय में बाजार और राजनीति को दरकिनार कर नहीं चला जा सकता। इस संग्रह में भी इन विषयों पर गंभीर लघुकथाएं हैं। ‘बाजार’, ‘शरण’ आदि के साथ-साथ राजनीतिपरक लघुकथाओं के रूप में ‘आग’, ‘बचाव’, ‘जातिवाले’, ‘झंडा’ आदि लघुकथाओं को रखा जा सकता है। लेखक आज के समाज में हो रहे परिवर्तनों से भी नावाकिफ नहीं। इसकी झलक ‘बच्चे की खुशी’, ‘खेल खेल में’ तथा ‘अपहरण’ जैसी अनेक लघुकथाओं में पायी जा सकती है। ‘पेड़ की जुबान से’ तथा ‘बदजात’ जैसी लघुकथाओं के माध्यम से लेखक की पर्यावरण सम्‍बन्‍धी चिंता जाहिर होती है।

वीरेन्द्र झा निश्चित रूप से एक रेखांकित किये जाने योग्य लघुकथाकार के रूप में इस संग्रह के माध्यम से उभरते हैं। उनके रचना कौशल की बानगी ‘नाइन्‍साफी’, ‘रिश्ते’, ‘ईमानदारी’, ‘डैशिंग अफसर’ जैसी लघुकथाओं में देखी जा सकती है। इस संग्रह में कुछ भर्ती की लघुकथाएं भी हैं। इससे बचा जा सकता था। कुल मिलाकर इस लघुकथा संग्रह में समकालीन जीवन की हलचल के साथ-साथ समकालीन समाज की विरूपताएं भी खुलकर प्रकट हुई हैं। लघुकथा जगत में इस संग्रह का स्वागत किया जाना चाहिए।

पुस्तक : भगवान भरोसे (लघुकथा संग्रह), मूल्य : 180/- रुपये मात्र
लेखक : वीरेन्द्र नारायण झा
प्रकाशक : साहित्य संसद, आर.जेड-35बी, गली नम्‍बर- 1ए, कैलाशपुरी एक्‍सटेंशन, नई दिल्ली-110045