Archive for: July 2011

प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक : भीमसेन त्‍यागी

प्रेमचंद (31 जुलाई, 1880 - 8 अक्टू्बर, 1936)

कथाकार और संपादक भीमसेन त्‍यागी का यह संपादकीय ‘भारतीय लेखक’ (जनवरी-मार्च, 2006) में प्रकाशित हुआ था। प्रेमचंद की प्रासंगिकता और उनके साहित्‍य की विशेषताओं को समझने में यह सहायक है

प्रेमचंद की प्रासंगिकता का सवाल पुराना है। अपने जीवन काल में ही वह और उनका साहित्य विवादों के घेरे में आ गए थे और उनकी प्रासंगिकता पर प्रश्र चिह्न लगने शुरू हो गए थे। ठाकुर श्रीनाथ सिंह जैसे कई यश पीडि़त लोगों ने विवाद खड़े किए। तब से यह सिलसिला आज तक जारी है।

इस सवाल के कई चेहरे हैं। प्रेमचंद प्रासंगिक हैं या नहीं?  हैं तो क्यों? किस हद तक? और नहीं तो क्यों नहीं?

प्रेमचंद के देहावसान के बाद उनके विरोध की नदी में बाढ़ आ गई। उस समय जो लेखक सृजनरत थे, उनमें से किसी का भी कद प्रेमचंद के निकट नहीं पहुंचता था। उस शिखर व्यक्तित्व के सामने खड़े रह सकने का एक ही विकल्प था यदि वे प्रेमचंद की ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकते तो उन्हें घसीट कर छोटा बना दें!

प्रेमचंद के परवर्ती उन लेखकों में प्रमुख थे जैनेंद्र कुमार और सच्चिदानंद वात्सयायन अज्ञेय। इन दोनों और इनकी शिष्य परंपरा के अन्य लेखकों तथा समीक्षकों ने कभी अप्रत्यक्ष तो कभी प्रत्यक्ष आरोप लगाये कि प्रेमचंद कलाकार नहीं, केवल मुंशी थे। ज्यादा से ज्यादा उन्हें समाज सुधारक माना जा सकता है। उनका लेखन तात्कालिक समस्याओं पर आधारित है। उसमें स्थायित्व नहीं, शाश्वतता नहीं। ऐसा लेखन अल्पजीवी होता है। समस्याओं के समाधान के साथ-साथ अप्रासंगिक हो जाता है।

प्रेमचंद नियोजित ढंग से लिखते थे। हर बड़ी रचना का आरंभ करने से पहले उसका विस्तृत प्रारूप तैयार करते थे। जैनेंद्र ने उनकी इस रचना प्रक्रिया पर भी टिप्पणी की- इस प्रकार की सायास चेष्टा से श्रेष्ठ साहित्य नहीं लिखा जा सकता। श्रेष्ठ साहित्य तो सहज तथा स्वत: स्फूर्त होता है!

एक तरफ प्रेमचंद के परवर्ती लेखक समीक्षक उनके खिलाफ जिहाद करके उनका कद छोटा करने की कोशिश कर रहे थे और दूसरी तरफ उनकी सहज तथा आत्मीय रचनाएं विशाल पाठक समूह के गले का हार बनती जा रही थीं। परवर्ती लेखक तथा समीक्षक प्रेमचंद को खारिज करते रहे और पाठक स्वीकार करते गए। अंतत: साहित्य का निर्णायक और सृजेता का असली माई-बाप तो पाठक ही है। उनकी प्रासंगिकता पर बार-बार प्रश्रचिह्न लगाया जाना, स्वयं उनकी प्रासंगिकता का प्रमाण है। जो लेखक सचमुच प्रासंगिक नहीं बन पाता या नहीं रह जाता, समय उसे बिना किसी शोर शराबे के इतिहास के कूड़ेदान में ढकेल देता है। आज कोई यह सवाल नहीं उठाता कि जैनेंद्र प्रासंगिक हैं या नहीं ? अज्ञेय प्रासंगिक हैं या नहीं? इलाचंद्र जोशी प्रासंगिक हैं या नहीं? भगवती चरण वर्मा प्रासंगिक हैं या नहीं? मोहन राकेश प्रासंगिक हैं या नहीं? और इन सबके साथ चलने वाली समीक्षकों की कतार प्रासंगिक है या नहीं? सवाल उठता है तो सिर्फ एक प्रेमचंद प्रासंगिक हैं या नहीं?

प्रेमचंद बड़े लेखक थे। और बड़प्पन अपने साथ उदारता लाता है। प्रेमचंद ने कभी अपने विरोधियों को आवश्यकता से अधिक महत्व नहीं दिया, बल्कि उनके प्रति स्नेहभाव बनाये रखा। जैनेंद्र अपनी कूट शैली में प्रेमचंद का विरोध कर रहे थे और प्रेमचंद ने जैनेंद्र के बारे में घोषणा कर की थी कि वह भारत के भावी गोर्की हैं। लेकिन समय बहुत क्रूर है। वह सबको छान देता है। प्रेमचंद की उदारताजनित भविष्यवाणी जैनेंद्र के किसी काम न आयी। अंतत: समय ने सिद्ध कर दिया कि यदि भारत के गोर्की कोई है तो केवल प्रेमचंद।

प्रश्र किसी एक लेखक की व्यक्तिगत कुंठा अथवा वैमनस्य का नहीं। यह अंतर चेतना के सूक्ष्म धरातल पर होता है। वर्ग विभाजित समाज में हर वर्ग अपनी वाणी को मुखरित करने के लिए अनायास अपने लेखक तैयार कर लेता है। या यों कहें कि लेखक का मानसिक परिवेश जिस वर्ग से जुड़ा होता है, वह अपने लेखन के माध्यम से सहज रूप से उसी वर्ग का हित साधन करता है।

मोटे तौर पर समाज में दो वर्ग हैं। एक सुविधाभोगी अथवा सुविधाकामी वर्ग है, जो अपने लिए अधिकतम सुविधाएं जुटाना चाहता है और इस नेक काम के लिए वृहत्तर समाज को खाद की तरह इस्तेमाल करता है। इस वर्ग के लिए साहित्य दिमागी अय्याशी का मयखाना होता है। इसके लेखक अपने समय के समाज से कटे हुए एकांतभोगी और अंतर्मुख होते हैं। वे अ’छी खासी सुखद स्थितियों में भी दुख खोजते रहते हैं। उनका रचना संसार स्वयं उनके भीतर की कुंठा तथा आत्मश्लाधा पीडि़त दंभ तक सीमित रहता है। अपने समय के समाज से उनका विशेष सरोकार नहीं होता है। सरोकार होता है तो सिर्फ इतना कि वे उस समाज को कैसे इस्तेमाल कर सकें। समाज उनके लिए वह दीवार होता है, जिस पर वे अपनी आत्ममुग्ध तस्वीर टांग सकें।

इसके विपरीत समाज का दूसरा वर्ग सुविधा वंचित और जीवन-स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए संघर्षरत होता है। कबीर ने कहा है- ‘सुखिया सब संसार है खावै और सोबै, दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै।’ समाज का पहला वर्ग और उसके प्रतिनिधि लेखक सुखिया संसार है और दूसरा वर्ग तथा उसके लेखक दुखिया दास कबीर। प्रेमचंद कबीर की इसी औघड़ परंपरा के लेखक थे। उनका रचना संसार समाज के इस छोर से उस छोर तक फैला था। उस समाज के सारे दुख उनके अपने दुख थे। उनके भीतर न जाने कितने होरी और घीसू कुलबुला रहे थे। प्रेमचंद का संपूर्ण साहित्य इस दुख से साक्षात्कार का साहित्य है। साक्षात्कार के अतिरिक्त उस दुख के कारणों की गहरी खोजबीन समाज के विभिन्न वर्गों के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अंतर्संबधों की परख और उन्हें बेहतर बना सकने की ललक- ये सब प्रेमचंद की चिंता का विषय थे। वह शाश्वतता के पीछे न भाग कर सार्थक साहित्य के सृजन के पक्षधर थे। शाश्वतता सायास नहीं जुटायी जा सकती। समय की कसौटी पर कसा जाकर ही साहित्य शाश्वत होता है। उपरोक्त दोनों धाराएं आधुनिक हिंदी साहित्य में आरंभ से चली आ रही हैं। पहली धारा के लेखक प्रसाद,  जैनेंद्र,  अज्ञेय,  भगवतीचरण वर्मा,  निर्मल वर्मा,  प्रियंवद आदि हैं तो दूसरी धारा के प्रतिनिधि लेखक हैं- प्रेमचंद, यथपाल, निराला, नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, अमरकांत,  भीष्म साहनी,  शेखर जोशी,  संजीव आदि। प्रेमचंद की परंपरा के इन लेखकों ने साहित्य को नये तेवर और नई पहचान दी है।

प्रेमचंद की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह अपनी साहित्य यात्रा में निरंतर विकासमान रहे। ‘सेवासदन’ और ‘प्रेमाश्रम’ जैसे सुधारवादी उपन्यासों से शुरू करके ‘गोदान’ जैसे यथार्थवादी, कालजयी उपन्यास तक पहुंचे। इसी तरह कहानियों में ‘नमक का दरोगा’ जैसी आदर्शवादी कहानियों से शुरू करके ‘नशा’, ‘पूस की रात’, ‘बड़े भाई साहब’ और ‘कफन’ तक का लंबा सफर तय किया।

इसके विपरीत जो शाश्वत साहित्य को सृजन का दंभ भरते रहे, वे अपनी साहित्य यात्रा में निरंतर अधोगति को प्राप्त होते रहे। जैनेंद्र तमाम कोशिशों के बावजूद ‘त्यागपत्र’ को नहीं लांघ सके, अज्ञेय का शिखर ‘शेखर’ बन कर रह गया और भगवतीचरण वर्मा ‘चित्रलेखा’ के मोहपाश में ऐसे बंधे कि उससे बेहतर सृजन के लिए मुक्त नहीं हो सके।

प्रेमचंद का देहावसान 1936 में हुआ। उसके बाद के 18 वर्ष लेखकों तथा समीक्षकों द्वारा प्रेमचंद की घोर उपेक्षा के वर्ष थे। ‘मैला आंचल’ का प्रकाशन आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास की विस्फोटक घटना था। इसने संपूर्ण साहित्य परिदृश्य को बदल दिया। कुंठित तथा दमित व्यक्ति-मन की रचनाएं पृष्ठभूमि में चली गयीं और सामाजिक यथार्थ अपनी संपूर्ण गरिमा के साथ चर्चा के केंद्र में आ गया। यह वह बिंदु था, जहां से प्रेमचंद की प्रासंगिकता की खोज एक नये कोण से आरंभ हुई। उसके पश्चात प्रेमचंद परंपरा के लेखक निरंतर अपने समय के जलते हुए सवालों से जूझते रहे और उन्हें साहित्य में अभिव्‍यक्‍त करते रहे।

प्रेमचंद आम आदमी के लेखक थे और आम आदमी की तरह ही जीते थे। उनकी अपेक्षा दाल-रोटी और तोला भर घी तक सीमित थी। उनकी सादगी में ही महानता थी। ऐसा नहीं कि प्रेमचंद के जीवन में ऐसे अवसर नहीं आये कि वे सुविधाओं का भरपूर उपयोग कर सकें। लेकिन उन्होंने उन अवसरों की तरफ से आंख फेर ली। प्रेमचंद फिल्में लिखने के लिए मुंबई आये तो अच्‍छा-खासा कमा रहे थे। लेकिन मायानगरी का व्यावसायिक माहौल उन्हें रास नहीं आया। वह वापस बनारस लौट आये और अपने लेखन में रत हो गये।

एक तरफ प्रेमचंद की यह जीवन शैली थी और दूसरी तरफ आज का अदना से अदना लेखक वे सब सुविधाएं प्राप्त करना चाहता है, जो अमरीकी लेखक को सुलभ है।

प्रेमचंद साहित्य में ऐसे कौन से तत्व हैं,  जो उसे कालजयी और आज भी प्रासंगिक बनाये हुए हैं? इस प्रश्र के मूल तक पहुंचने के लिए उन तत्वों की परख करनी होगी, जो किसी भी साहित्य को कालजयी बनाते हैं। पहला तत्व है- अपने समय की सही पहचान और उसे कलात्मक ढंग से वाणी देना। विश्व के सभी महान लेखक अपने समय के प्रति सचेत रहे। उन्होंने अपनी जनता के दुख-सुख को समझा और उसे कलात्मक अभिव्यक्ति दी। उनके समय को समझने के लिए इतिहास के शुष्क पन्ने उतनी मदद नहीं करते, जितनी कि उन महान लेखकों का साहित्य। वह साहित्य एक परंपरा के रूप में विकसित होता है और आने वाली पीढिय़ों को बीते समय से सबक लेकर अपने जीवन को ढालने और तराशने में मदद करता है। वह साहित्य शताब्दियों तक प्रासंगिक बना रहता है। इसी कारण वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, शेक्सपियर, टाल्सटाय, लू-शुन जैसे महान लेखक आज भी प्रासंगिक हैं। भारत में इस शताब्दी में वह काम जितने प्रभावी ढंग से प्रेमचंद ने किया, उतने प्रभावी ढंग से संभवत: और कोई लेखक नहीं कर सका।

दूसरा तत्व है- लेखक का समकालीन विश्व साहित्य से निकटता स्थापित करना और अपनी रचनाशीलता को उसके समकक्ष ले जाने में समर्थ होना। प्रेमचंद अपने समय के विश्वस्तरीय लेखकों का सूक्ष्य अध्ययन करते थे और इसी माध्यम से उनके साथ पारिवारिक ऊष्मा अनुभव करते थे। वह सबसे अधिक मक्सिम गोर्की से प्रभावित थे। गोर्की की मृत्यु के समाचार से वह विह्वल हो उठे थे।

उन दिनों प्रेमचंद गंभीर रूप से बीमार थे। उनकी पत्नी शिवरानी देवी ‘प्रेमचंद घर में’ लिखती हैं: ‘‘गोर्की की मौत पर ‘आज’ आफिस में मीटिंग होने वाली थी।… उन दिनों मुझे भी रात को नींद नहीं आती थी। मेरी आंख खुली तो देखा कि आप जमीन पर बैठे कुछ लिख रहे हैं। मैं बोली-आप क्या कर रहे हैं?’

‘बोले-कुछ नहीं।‘

‘मैं बोली- नहीं, कुछ तो जरूर लिख रहे हैं।‘

‘आप बोले- नींद नहीं आती तो क्या करूं? भाषण तो लिखना ही पड़ता।‘

‘मैं बोली- जब तबियत ठीक नहीं तो भाषण कैसे लिखा जाएगा?’

‘आप बोले- जरूरी है। बिना लिखे काम नहीं चलेगा…’

‘मैंने देखा कि लिखते समय उनकी आंखों में आंसू थे।‘

‘सुबह हुई। दूसरे दिन मीटिंग में जाने को तैयार हुए तो बोली- आप चल तो सकते नहीं। फिजूल में जा रहे हैं।‘

‘आप बोले- तांगे पर जाना है। पैदल तो जा नहीं रहा हूं।‘

‘मैंने उनके साथ में बड़े लड़के को भेज दिया। नीचे तक खुद पहुंचाने आयी। मैं डर रही थी कि कहीं जीने पर से ये गिर न जाएं।‘

‘जब वे वहां से लौटे तो मैं फिर दरवाजे पर मिली। वे ऊपर चढऩे लगे तो उनके पैर लडख़ड़ा गये। ऊपर आने पर चारपायी पर लेट गये… जब वे कुछ सुस्ता लिये, तब बोले- मैं वहां खड़ा न हो सका, भाषण पढऩा तो दूर रहा। एक और महाशय से भाषण पढ़वाया।‘

‘मैं बोली- मेरा कहा आप मानें तब न।‘

‘आप बोले- गोर्की के मरने से मुझे बहुत दुख हुआ। गोर्की की जगह लेने वाला कोई नहीं रहा।‘

‘गोर्की के मरने की चर्चा वे कई दिनों तक करते रहे। जब-जब गोर्की के विषय में बाते करते, तब तब उनके हृदय में एक प्रकार का दर्द-सा उठता दिखायी पड़ता… वही उनका अंतिम भाषण था… कौन जानता था कि दो महीने भी बीतने नहीं पायेंगे कि वह खुद चले जाएंगे…।‘

प्रेमचंद गोर्की से कभी नहीं मिले थे। लेकिन उनकी रचनाओं के माध्यम से ही इतना गहरा भावनात्मक जुड़ाव अनुभव करते थे, जितना निकट आत्मीय जानों से होता है। गोर्की के न रहने पर वह मर्मांतक पीड़ा से ग्रस्त हो गये। यह पीड़ा गोर्की के माध्यम से विश्व के उन असंख्य पीडि़त तथा दमित नागरिकों के प्रति भी थी, जिनके लिए गोर्की और स्वयं प्रेमचंद जिये और मरे।

किसी लेखक के महान और कालजयी होने की परख का तीसरा बिंदु- उसकी भविष्य में झांक सकने की क्षमता।

प्रेमचंद की एक कहानी का पात्र कहता है- स्वराज्य के आने का मतलब सिर्फ यह नहीं कि जॉन की जगह गोविंद गद्दी पर बैठ जाए। जब तक पूरी व्यवस्था को न बदला जाए, आम लोगों का भला नहीं होगा।

इस पात्र के मुंह से प्रेमचंद का भविष्यद्रष्‍टा बोल रहा है। उन्होंने अपने वैज्ञानिक चिंतन के आधार पर भविष्य दर्शन कर लिया था। आखिर हुआ क्या? आजादी के नाम पर जॉन की जगह गोविंद और फिर उसके वंशज गद्दी पर बैठते गये लेकिन आम लोगों का भला नहीं हो सका। प्रेमचंद की यह भविष्य दृष्टि  उनकी दूसरी रचनाओं में भी मौजूद है। और यह दृष्टि ही उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाये हुए हैं।

वर्तमान संदर्भ में प्रेमचंद की प्रासंगिकता को समझने के लिए आज के राजनीतिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक गणित को गहराई से समझना होगा। आज का विश्व समाज मुख्य रूप से साम्राज्यवाद की गिरफ्त में है। सोवियत रूस के पतन के पश्चात अमेरिका एकमात्र महाशक्ति रह गया है और इस अवसर का लाभ उठाकर वह समूचे विश्व में शोषण की कुटिल नीतियों का जाल फैला रहा है। कुछ संपन्न राष्ट्र उसके सहभागी हैं और अधिकांश देश खास तौर से तीसरी दुनिया के देश इस शोषण के शिकार। बहुराष्ट्रीय कार्पोरेशनें स्थानीय उद्योगों को चौपट कर रही हैं और आटोमेशन के कारण बेरोजगारी की दर भयानक रूप से बढ़ रही है। उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन उससे कहीं ज्यादा तेजी से गरीबी और भुखमरी बढ़ रही है। उपभोक्ता वस्तुएं समाज के एक सीमित वर्ग के लिए सुरक्षित हो गयी हैं। समाज का शेष बहुसंख्यक वर्ग उन वस्तुओं के सपने देखने और फिर सपनों के टूटने की पीड़ा झेलने के लिए अभिशप्त है।

टीवी चैनलों के माध्यम से अमेरिकी साम्राज्यवाद सीधे हमारे घरों में घुस आया है और उसकी जारज संताने भ्रष्टाचार, अपराध तथा अपसंस्कृति, खुलकर नंगा नाच रही हैं। आधुनिकता तथा उत्‍तर आधुनिकता के इस घटाटोय में प्रेमचंद की प्रासंगिकता खोजना एक दुष्कर कार्य प्रतीत होता है। लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं।

साम्राज्यवादी शोषण तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मायाजाल का बीज महाजनी सभ्यता में है। उसी महाजनी सम्यता में, जिसके वास्तविक रूप को सबसे पहले प्रेमचंद ने पहचाना। यहां प्रेमचंद का भविष्य–द्रष्‍टा फिर सामने आता है। स्वतंत्रता के दो-तीन दशक पूर्व ही उन्होंने देश की भावी दिशा को पहचान लिया था।

तीसरी दुनिया के देशों में जिनमें भारत भी एक है साम्राज्यवादी नीतियों के साथ-साथ सामंती मूल्य भी अपनी जकड़ बनाये हुए हैं। हम अर्धउपनिवेशी तथा अर्धसामंती स्थितियों में जी रहे हैं। प्रेमचंद ने इन दोनों समाजविरोधी शक्तियों को ठीक समय पर पहचान लिया था। उनका साहित्य इन दोनों महाशक्तियों के विरोध का साहित्य है।

प्रेमचंद के समय से अब तक गंगा में बहुत सा पानी बह गया है। जमाने ने रह-रहकर करवटें बदली हैं। लेकिन ये सब करवटें ऊपरी सतह पर, कायिक स्तर पर थीं। आत्मिक स्तर पर, सांस्कारिक स्तर पर देश उन्हीं मूल्यों से निर्देशित होता रहा। शहरों में और किसी हद तक गांवों में भी जो चमक-दमक नजर आती है, वह केवल ऊपरी पालिश है, भीतर वही शोषण का शिकंजा कसा है। आदमी जब-जब इस शिकंजे को ढीला करना चाहेगा, शोषण से मुक्त समाज की रचना करना चाहेगा तो उसे लौट कर प्रेमचंद के पास जाना होगा। प्रेमचंद की यह विशेषता ही उन्हें अत्याधुनिक तथा प्रासंगिक बनाती है।

 

 

 

 

पद्मभूषण रहीम फहीमुद्दीन डागर का निधन

नई दिल्ली: ध्रुपद उस्ताद पद्मभूषण रहीम फहीमुद्दीन डागर की बुधवार देर रात निधन हो गया। वह 84 वर्ष के थे और काफी समय से बीमार चल रहे थे। उनको गुरुवार को यहां सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। डागर के परिवार में उनकी पत्नी व पुत्री हैं।

ध्रुपद गायिकी की उनकी विविधता और विशेषज्ञता को देखते हुए संगीत नाटक अकादमी द्वारा उन्हें इस वर्ष रत्न सदस्यता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हालांकि अस्वस्थता के कारण यह पुरस्कार उन्हें अस्पताल में जाकर प्रदान किया गया। इसके पूर्व वर्ष 2008 में उन्हें पद्मभूषण, 2003 में राजस्थान संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, 2002 में बिहार ध्रुपद रत्न अवार्ड, 1996 में साहित्य कला परिषद सम्मान व 1993 में संगीत नाटक अकादमी अवार्ड सहित तमाम सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है।

डागर घराने की 19वीं पीढ़ी का  प्रतिनिधित्व करने वाले उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन का जन्म 1927 में राजस्थान के अलवर में हुआ था। उन्होंने पांच साल की उम्र में अपने चाचा उस्ताद नसीरुद्दीन खान डागर से ध्रुपद की शिक्षा लेनी शुरू की थी।

सोशल साइंस से बेखबर लोगों का दबदबा : अरशद अमानुल्लाह

फारबिसगंज गोलीकांड की रिपोर्टिंग से उपजे कुछ सवालों के माध्‍यम से उर्दू अख़बारों की दशा-दिशा पर डाक्यूमेंटरी निर्माता और शोधार्थी अरशद अमानुल्‍लाह का लेख-

बिहार के अररिया जिला में स्थित फारबिसगंज ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले भजनपुर गांव में 3 जून, 2011 को हुई पुलिसिया हिंसा को उर्दू अखबारों में जिस तरह से पेश किया गया,  क्या उसे भारतीय मुसलमानों में मौजूद विचारधारा की विविधता का एक ईमानदाराना मीडिया कवरेज माना जा सकता है ? उर्दू प्रिंट मीडिया के पाठक वर्ग का दायरा विभिन्न कारणों से मुसलमानों तक ही सीमित है। पूर्ववत है। उर्दू मीडिया का मंजर एक सामाजिक संस्था होने के नाते मीडिया भी बहुत हद तक, समाज में निहित विरोधाभासों का न सिर्फ आईना होता है बल्कि उनको बनाए रखने (रीप्रोडक्शन) में बड़ी हद तक एक असरदार रोल भी अदा करता है। उर्दू अख़बारात कोई अपवाद नहीं हैं। इनके अहम ओहदे और मिलकियत अमूमन अशरफ जाति के लोगों के हाथ ही में रहे हैं।

रिज़वानुल्लाह की आपबीती ‘कलकत्ता की उर्दू सहाफत और मैं’ (2006) में जिन किरदारों (अख़बारों के मालिकों व पत्रकारों) का ज़िक्र आया है, ऐसा लगता है कि उनमें से अक्सरियत का ताल्लुक अशराफिया से ही है। 1951 से 1976 के दौरान उन्होंने कलकत्ता के कई उर्दू रोजनामों में काम किया था। अशराफिया के एकाधिकार के नज़रिये से अगर देखा जाए तो उर्दू मीडिया का मंज़रनामा आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है। हर ओर है अगड़ों का दबदबा। मीडिया समाजशास्त्र पर मशहूर रिपोर्ट ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ (सम्पादन : प्रमोद रंजन, फिरोज मंसूरी, अशोक यादव इत्यादि)में, जो 2009 में छपी थी, यह बात सामने आई थी कि बिहार में पत्रकारिता में करीब 16 फीसद मुसलमान हैं, जिनमें अशराफ मुसलमानों की संख्या 12 फीसद और पसमांदा मुसलमान सिर्फ 4 फीसद हैं, जबकि आबादी के अनुसार हिन्दुस्तान में पसमान्दा 85 फीसद हैं और अशराफ महज़ 15 फीसद। उर्दू अखबारों के कुल पदों में 66 फीसद प्रतिनिधित्व अशराफ तबके का है जबकि पसमांदा तबके (ओबीसी) के पत्रकार 26 फीसद हैं।

यहां पर फारबिसगंज में पुलिस बर्बरता के सामयिक प्रसंग उदारीकरण को ज़ेहन में रखना भी बेहद जरूरी है। पुनर्जागरण से प्रेरित बौद्धिक परम्परा की बुनियाद पर विकास की जो समझ बनती है, उसमें औद्योगिकीकरण का कोई विकल्प नहीं है। और ‘विकास बरास्ते औद्योगिकीकरण’ की प्रवृत्ति हिंसात्मक ही है। हिंसा की जो किस्म फिलहाल भारत में सबसे ज्यादा व्याप्त है वह विकासीय हिंसा ही है। नंदीग्राम, सिंगुर व गैराविकासीय हिंसा से जुड़े चंद ऐसे नाम हैं जो विभिन्न कारणों से राष्ट्रीयस्तर पर चर्चा का विषय बन गए वरना विकासीय हिंसा के बेहतर वाकिआत मीडिया की नज़रों से ओझल रहते हैं। इस सन्दर्भ में देखा जाये तो फारबिसगंज हिंसा कोई समस्या नहीं, बल्कि एक बड़े समस्या का प्रतिबिम्ब मात्र है। अशराफिया राजनीति के लिए रामबाण इस हादसे की सबसे पहली खबर एक उर्दू अख़बार के पन्ने पर काफी छोटी छपी थी। उर्दू अखबारों ने शुरू में इस हादसे को मुख्यपृष्ठ पर नुमायां तौर पर नहीं छापा। इसकी एक वजह तो यही है कि पसमांदा मुसलमानों से हमदर्दी जताकर उनके अशराफ मालिकों ने सरकारी विज्ञापन से मिलने वाली मोटी रक़म को गंवा देना अक्लमंदी नहीं समझी। जब अशराफ पृष्ठ भूमिकी एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने, जिनकी कांग्रेस से नजदीकियां जगजाहिर हैं, केंद्र सरकार की तुलना में नीतीश हुकूमत को कम्युनल करार देने के लिए इस मसले में दिलचस्पी ली और पीड़ितों व घायलों के रिश्तेदारों को दिल्ली लाकर प्रेस कांफ्रेंस और विभिन्न किस्म के कमीशनों से सम्पर्क साधा तो उर्दू अख़बारों ने भी इस अशराफ महिला के वास्ते से आने वाली इन ख़बरों को पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापा।

इससे पहले 11 जून को लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) द्वारा दिल्ली में आयोजित एक प्रदर्शन को भी ठीक-ठाक कवरेज मिला था। इनके अलावा इक्की दुक्की ख़बरें तो क़रीब रोज़ ही छपती रहीं। जिस तरह लागत-आमदनी, सरकार की खुशनूदी और जातिवादी बर्ताव के त्रिकोणीय समीकरण जिसने हिन्दी अखबारों में फारबिसगंज हादसे की रिपोर्टिंग में निर्णायक भूमिका अदा की थी। उसी समीकरण ने बड़ी हद तक उर्दू अख़बारों में भी इस गोलीकाण्ड के कवरेज के मवाद व मिज़ाज को तय करने में फैसलाकुन रोल निभाया। इन अख़बारों ने इस हादसे को सेकुलर बनाम कम्युनल के दृष्टिकोण से देखा गया। इस हादसे की तुलना गुजरात दंगों से की और पाठकों को याद दिलाया कि नीतीश कुमार की सरकार में जद-यू का गठबंधन बीजेपी से है। वैचारिक स्तर पर एक विकल्प तो यही था कि इस घटना को विकासीय हिंसा के सन्दर्भ में समझने का प्रयत्न किया जाता, जबकि दूसरा विकल्प था पसमांदा बनाम अशराफिया दृष्टिकोण का। पसमांदा का एहसास मुल्क के हिन्दी व अंग्रेजी प्रेस को बखूबी है लेकिन उर्दू मीडिया इस तब्दीली से अनजान बनी हुई है? सोशल साइंस से नावाकिफ ज़मात। सवाल ये है कि वैचारिक स्तर पर उर्दू अखबारों के फ्रेमवर्क में किसी बहुआयामी घटना को उसकी पेचीदगियों की समग्रता के साथ अनुभव करने की क्षमता क्यों नहीं है? सिर्फ सेकुलर-कम्युनल फ्रेमवर्क के इस्तेमाल की एक वजह यह हो सकती है कि इधर कुछ वर्षो में उर्दू अख़बारों में मदरसे के पढ़े हुए छात्रों की तादाद बढ़ी है जो सोशल साइंस से अमूमन नावाकिफ होते हैं। लेकिन मदरसा-बैकग्राउंड के चंद लोगों का वजूद पूरे उर्दू प्रेस पर एक आयामी नजरिया की लगभग साठ बरस पुरानी गिरफ्त को जायज़ नहीं ठहरा सकता। ताज्जुब तो उस वक्‍त होता है, जब वामपंथी एक्टीविज्म से उपजे सामाजिक कार्यकर्ता भी इस फ्रेमवर्क की दिलरुबाइयों में गिरफ्तार नज़र आते हैं। इस बहस की रोशनी में यह पूछना शायद अप्रासंगिक नहीं हो कि क्या उर्दू मीडिया किसी समूह विशेष के विचारों और स्वाथरे का आईना बन कर रह गया है?

(दैनिक राष्ट्रीय सहारा की साप्‍ताहिक पत्रिका ‘हस्‍तक्षेप’ के 14 जुलाई के अंक से साभार)

‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ पर चर्चा आज

नई दिल्‍ली: वाणी प्रकाशन  की ‘क्लासिक’ उपन्यास पुनर्पाठ श्रृंखला के तहत 27 जुलाई, 2011 को शाम 6:00 बजे  कॉसरीना हॉल, हैबिटैट सेंटर में हजारी प्रसाद द्विवेदी के बहुचर्चित उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ पर चर्चा होगी। प्रो. नामवर सिंह के सान्निध्य व डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी के उपन्यास-परिचय के साथ बजरंग बिहारी तिवारी कार्यक्रम में संवाद करेंगे। ज्ञातव्‍य है कि ‘क्लासिक’ उपन्यास पुनर्पाठ श्रृंखला में 16 जून, 2011 को पहला संवाद यशपाल की ‘दिव्या’ पर हुआ था।

अचार: देवेन्‍द्र कुमार

कथाकार देवेन्द्र कुमार

कथाकार देवेन्‍द्र कुमार की कहानी और उस पर चर्चित कवि रमेश तैलंग की टिप्‍पणी-

नेपथ्य में सहजतापूर्वक खड़े हिंदी के सशक्त कथाकार देवेन्द्र कुमार की यूँ तो ‘दिलावर खड़ा है’, ‘कितने लाख असीम’, ‘चिड़िया’, ‘खेल’, ‘अचार’ जैसी  अनेक यादगार कहानियाँ हैं जो मुझे प्रिय हैं। पर ‘अचार’ इनमें अति- विशिष्ट है। इस कहानी का आरम्भ पति-पत्नी के बीच जिस  सहज संवादपटुता के साथ होता है, अंत उतनी ही मार्मिक वेदना के साथ घटित होता है।
शब्दों के मामले में देवेन्द्र सचमुच बहुत ही मितव्ययी हैं और कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा कहते हैं।
दूसरी विशिष्ट बात यह कि उनकी कहानियों में स्त्रियां, बच्चे, और पक्षी इतनी संवेदनशीलता के साथ उपस्थित होते हैं कि वे पाठक के हृदय में अपनी अनिवार्य  जगह बना लेते हैं।
‘अचार’ कहानी का बच्चा जहां एक ओर बाल श्रम की  मजबूरी  पर प्रश्नचिह्न लगता है वहीँ दूसरी ओर उस हादसे की ओर भी मार्मिकता के साथ इंगित करता है जो घटित तो एक हलकी-सी आवाज के साथ होता है पर उसकी अनुगूँज बहुत दूर तक सुनाई देती है- रमेश तैलंग

मैं अचार कभी नहीं खाऊंगा, यह कसम उठाने से भी अब छुटकारा मिलने वाला नहीं था। गर्मी की उमस भरी शाम भीड़-भाड़ भरे सब्जी बाजार में कैसी हो सकती है, इसे कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है।
वैसे गलती मेरी ही थी। पिछली शाम को भोजन करते हुए मैंने अचार मांग लिया। बस, आफत शुरू हो गई। पत्नी ने हठ ठान ली कि तुरंत बाजार जाकर आम लाने हैं और अचार डालना है।
‘‘तो ठीक है।’’ मैंने कहकर टालना चाहा था।
‘‘बाजार से कच्चे आम लाने होंगे।’’
‘‘हूँ।’’
अगली शाम दफ्तर से आया तो उन्होंने मेरे हाथ में एक बड़ा थैला और तौलिया थमा दिया।
‘‘यह तौलिया किसलिए। क्या हम नदी पर नहाने जा रहे हैं?’’ मैंने हँसकर बात को हल्का करना चाहा था।
‘‘आम खरीदकर धोना, पोंछना और फिर कटवाकर लाने होंगे। आम का अचार क्या ऐसे ही मिल जाएगा?’’ एक गंभीर स्वर आया।
कार्यक्रम बन चुका था। अब मेरे कंधों पर टिकाकर उस पर अमल होना था।
मैंने उमस और भीषण गर्मी की आड़ में छिपना चाहा लेकिन कुछ देर बाद मैं और वह बाजार की ओर बढ़ रहे थे।

सब्जी बाजार में सामान्य से अधिक यानी बेहद भीड़ थी। शायद लोग समझते थे, सब्जी वहाँ फ्री मिलती थी। संकरी सड़के के दोनों ओर फुटपाथों पर और उनसे पीछे सब्जियों के ढेर लगे थे। सब्जी वालों ने फुटपाथ से आगे बढ़कर सड़क पर काफी हिस्सा घेर रखा था। बची हुई संकरी सड़क-पट्टी पर ट्रैफिक पी.पी. करता रेंग रहा था। सब्जी बेचने वाले अलग-अलग सुरों में बोलियां बोल रहे थे। और मैं सब तरफ से धकियाता हुआ मेले में भटके हुए बच्चे की तरह चौंधियाई आंखों से देखता सोच रहा था- अचार! … कैसे पड़ेगा अचार!
‘‘भई, मैं नहीं रुक सकता। थोड़ी देर यहाँ रहा तो पागल हो जाऊंगा। अच्छा यही होगा कि हम बाजार से अचार का डिब्बा मंगवा लें।’’
‘‘जी नहीं, पता है बाजार का अचार कितना महंगा होता है। और फिर क्वालिटी का क्या भरोसा?’’  पत्नी ने जवाब देते हुए सब्जियों के टीलों के बीच कहीं-कहीं नजर आती कच्चे आमों की ढेरियों पर नजरें टिका दीं। एक तो उमस भरी गर्मी, ऊपर से गैस लालटेनों की चौंधरी भुकभुकाहट। मैंने कुछ कहने के लिए मुंह खोलना चाहा, पर पत्नी तब तक एक सब्जी वाले से झुककर मोलभाव करने में व्यस्त हो गई थीं।
मैंने मन में कहा- ‘चलो, आम तो मिले।’
लेकिन नहीं…. शायद भाव ज्यादा थे या और कुछ गड़बड़ थी। मैंने पत्नी को दूसरे, तीसरे और फिर पता नहीं कौन से नंबर के ढेर की ओर झुकते, मोलभाव करते और फिर सिर हिलाकर आगे बढ़ते देखा। लगातार उनके पीछे चलना जरूरी था। अब हम सब्जी वाले के छोर तक जा पहुंचे थे। इससे आगे अंधेरा था।
अब मुझे मौका मिला, ‘‘कोई बात नहीं, हम फिर किसी दिन आ जाएंगे। अब हमें घर चलना चाहिए। आगे तो आम हैं नहीं।’’
‘‘नहीं, अभी हम दूसरी तरफ तो गए ही नहीं हैं। देखो-देखो, कैसे ढेर लगे हैं!’’ और फिर मेरे जवाब का इंतजार किए बिना वह सड़क को लांघकर दूसरी तरफ चली गईं और यहां भी वही सिलसिला दोहराया जाने लगा।
बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी कि हम कैसे क्या करेंगे। आम खरीदना, एक-एक आम को धोना, तौलिए से पोंछना और आम का कटवाकर घर पहुंचाना। बाजार में ठीक से खड़े रहने की तो गुंजाइश थी नहीं, फिर अचार के लिए इतना कुछ करना! कैसे… कैसे…!

आखिर एक सब्जी वाले से दाम तय हुए।
वह तोलने को तैयार हुए तो पत्नी ने पूछा, ‘‘आमों को धोने का इंतजाम है?’’
सब्जीवाला फिर हँसा, ‘‘आप भी बहन जी! यहां इतनी देर से गला सूख रहा है। पीने के लिए तो पानी है नहीं और आप… जरा उधर देखिए, सब बहनजियां ऐसे ही आम कटवा रही हैं… देखिए… वहां उधर…।’’
संकेत की दिशा में देखा- अरे हां, वही तो, कुछ औरतों एक झुंड में खड़ी थीं। आवाजें आ रही थीं- ‘मेरे आम पहले काटो… ऐ सुना नहीं… हम… कब से खड़े हैं…!’
इसके साथ ही सरौते से खट-खट की आवाज भी आ रही थी। तो आम काटने वाला भी पास ही मौजूद है! लेकिन इससे पहले आमों को धोना, पोंछना…।
गुस्सा दिखाने का मौका मिला था, ‘‘अगर ऐसी ही बात थी तो हमें बाल्टी में पानी लेकर आना चाहिए था… या फिर आम घर ले चलो- वहीं सब कर लेंगे।’’ मैं चिड़चिड़ा रहा था।
‘‘बस, रहने दो। घर पर आम काटने का सरौता कहां है और फिर काटेगा कौन? आम की जगह उंगलियां काटेंगे। नहीं-नहीं, यहां इंतजाम है। एक लड़का काट रहा है।’’
‘‘लेकिन धोना… इसका इंतजाम…!’’ मैंने उनकी कमजोरी पकड़ ली थी।
‘हूं।‘ पत्नी ने चिंताकुल नजरों से इधर-उधर देखा। यह तो सचमुच मुश्किल हुई। लगा, शायद इसी बात से छुटकारा मिल जाए।
तभी एक आवाज सुनाई दी, ‘‘मैं धुलवा दूंगा आपके आम।’’
पतली, पिनपिनाती आवाज! मैंने घूमकर देखा- आठ-नौ बरस का एक छोकरा था। शायद वह हमारी नोक-झोंक में रस ले रहा था।
मुझे गुस्सा उतारने का पहला मौका मिला था, ‘‘धो देगा! धो दे फिर… कहां धोएगा?’’
‘‘यहीं धोऊंगा।’’ वह मेरी बात से हिला तक नहीं था।
‘‘पानी है?’’ पत्नी ने पूछा।
‘‘हां, है।’’
‘‘कहां है पानी?’’ मैंने इधर-उधर देखा। वह सरासर झूठ बोल रहा था।
‘‘वहां है, उधर…!’’ वह पता नहीं, कहां इशारा कर रहा था?
‘‘तो लेकर आ…!’’
‘‘आप जाना मत। मैं अभी लेकर आया पानी। फिर आम काट भी दूंगा। वहां सरौता भी हैं।’’ कहकर वह तुरंत भीड़ में गायब हो गया।
दुकानदार ने आम तोलकर एक तरफ डाल दिए। मैं आम थैले में भरने लगा तो पत्नी ने टोका-‘‘पहले धुलेंगे, फिर पोंछना होगा। अभी गड़बड़ मत करे।’’

हमें खड़े-खड़े काफी देर हो गई पर वह छोकरा पानी लेकर नहीं आया। मैं भड़ास निकालने का मौका तलाश रहा था, पर तभी वह आ गया। आवाज सुनाई दी, ‘‘आ गया पानी।’’
‘‘कहां है पानी?’’
उसके हाथ में प्लास्टिक की बड़ी थैली थी। उसमें भरे पारदर्शी पानी में रोशनियां चमक रही थीं।
‘‘इसमें कैसे धुलेंगे आम?’’
वह मुस्कराया, शायद मेरे अनाड़ीपन पर- ‘‘मैं थैली पकड़कर खड़ा रहूंगा। आप हाथ में एक-एक आम पकड़कर इसमें डुबाकर रगडऩा। आम धुल जाएंगे। फिर उन्हें कपड़े से पोंछकर थैले में रख लेना।’’
‘‘अगर आम डालने से थैली फट गई और पानी गिर गया तो…!’’
‘‘जैसे वह कह रहा है, वही ठीक है।’’ पत्नी ने मुझे अपनी बात पूरी नहीं करने दी। मैंने थैली में भरे पानी में एक आम सावधानी से डुबाया और उसे धोने लगा। छोकरा थैली भर पानी को हाथों से पकड़े सावधान मुद्रा में खड़ा था।
जब मैं आम को धोकर बाहर निकालता तो उसके चेहरे पर छींटे पड़तीं, लेकिन वह जैसे मूरत की तरह स्थिर खड़ा था। आंखें बिना झपके खुली हुईं, होंठ सख्ती से एक-दूसरे पर चिपके हुए। मैं आम धोकर पत्नी को थमाता, वह तौलिए से पोंछकर उसे टोकरी में डालती जातीं, जिसे सब्जी वाले ने बड़ी मेहरबानी करके हमें दे दिया था। लगा इस धोने-पोंछने के काम में कई घंटे बीत गए थे। हमारे अचार अभियान का एक दौर पूरा हो चला था। लेकिन अभी तो बहुत कुछ करना बाकी था।

‘‘मैं आम कटवा दूंगा, एक किलो के तीन रुपये लगेंगे।’’ लड़के ने कहा और थैली भर पानी जो आम धोने के बाद अपारदर्शी हो चुका था, सड़क पर फेंक दिया। छींटे उछले और सब्जी वाले की झापड़ उसके गाल पर पड़ा, ‘‘हरामी के… देखता नहीं…।’’
वह बिना गाल सहलाए चुप खड़ा रहा, फिर टोकरा सिर पर रखकर बोला, ‘‘मेरे पीछे आओ। मैं आम कटवा देता हूं।’’
इससे पहले कि मैं और पत्नी कुछ कह पाते वह पलक झपकते ही भीड़ में खो गया।
मैं पागल की तरह इधर-उधर देखने लगा। सड़क पर रेंगते ट्रैफिक के सब तरफ बेशुमार भीड़ में हम कहां खोजेंगे ? अगर वह न मिला तो ?
मुझे गुस्सा आ गया। मैंने दुकानदार से कहा, ‘‘वह कहां गया?’’
‘‘मैं क्या जानूं!… अच्छा, आप आमों के पैसे दीजिए और एक तरफ हो जाइए। दूसरे ग्राहकों को लेने दीजिए।’’ उसे लगा था कि इस चक्कर में हम उसके पैसे मारकर भागने की फिराक में थे।
मैंने पैसे दिए और पत्नी का हाथ पकड़कर आगे चला, ‘‘अब कहां खोजें उसे ?’’
पत्नी ने कुछ कहा नहीं। लड़का शायद आम लेकर रफूचक्कर हो चुका था। कैसे प्यार से आम धुलवाने का नाटक कर रहा था। कोई ठिकाना है इस दुनिया का!
‘‘तुम्हें उसका ध्यान रखना चाहिए था। जब वह आमों का टोकरा लेकर चला था तो उसके पीछे जाना चाहिए था।’’

पता नहीं, अभी और क्या-क्या सुनना बाकी था। अब कुछ कहने को नहीं था। मैं पत्नी का हाथ थामे उस हुजूम में धक्के खाते, घिसटते हुए ट्रैफिक के बीच मेंढक की तरह फुदकते, बचते-बचते, खुद को कोसते हुए पूरी सड़क के कई चक्कर काट आया, पर वह छोकरा कहीं दिखाई न दिया।
यह सब पत्नी की आम धुलवाने की जिद के चलते हुए था और शायद अब उन्हें भी अपनी गलती का एहसास हो गया था। वह चुपचाप मेरे पीछे-पीदे चलती जा रही थीं।
तभी आवाज आई, ‘‘बाबूजी…!’’
मैंने आवाज की दिशा में देखा- वही था। वही छोकरा, जो हमारे आम लेकर गुम हो गया था, सब्जी के ढेर के पीछे से हाथ हिलाकर हमें बुला रहा था। मन हुआ, दौड़कर गर्दन पकड़कर घसीट लाऊं। लेकिन यह संभव नहीं था। वह सब्जियों के ढेर के पीछे था। आगे कई औरतें खड़ी थीं। खट-कट, कट-खट की आवाजें आ रही थीं जैसे कुछ काटा जा रहा हो, पर दिखाई कुछ नहीं दे रहा था।
मैंने चिल्लाकर कहा, ‘‘कहां भाग गया था?… हम कब से ढूंढ रहे थे!’’
वह सब्जियों के ढेर के पीछे से निकलकर बाहर आया, ‘‘मैं तो आम लेकर यहीं आ गया था। यहीं तो काट रहा हूँ आम। पर आप ही पता नहीं कहां…!’’
‘‘अच्छा-अच्छा, ज्यादा बातें न बना- हमारे आम कहाँ हैं?’’
‘‘वो रहे आपके आम…।’’ उसने एक टोकरी की तरफ इशारा किया। देखकर तसल्ली हुई। हां, वही थे हमारे आम…।
‘‘तो अब तक काटे क्यों नहीं!’’
‘‘आपसे पूछकर ही तो काटता…। एक आम की कितनी फांकें काटनी हैं? आठ, बारह या सोलह!’’ उसने सफाई दी।
‘‘अभी टैम लगेगा पहले औरों के कटेंगे… और भाव होगा होगा रुपये किलो…!’’ सामने ढेर के पास बैठे दुकानदार ने सख्त आवाज में कहा, फिर छोकरे से कहा, ‘‘वहां क्या बिटर-बिटर कर रहा था। जल्दी से काट-पीटकर काम खत्म
कर…!’’
छोकरा फिर से सब्जियों के ढेर के पीछे जा पहुंचा। अब मैं उसे देख नहीं पा रहा था। और हमारे आम भी नजर नहीं आ रहे थे।
‘‘आप जरा हटकर खड़े हो जाइए… मैंने बताया न अभी टैम लगेगा। आपसे पहले भी कई लोग खड़े हैं।’’
मैंने देखा एक तरफ कुछ औरतें गोलबंद खड़ी थीं, आवाजें उभर रही थीं- ‘‘जल्दी…, देखो हमारे आम दूसरे आमों में मिल न जाएं।’’
अब प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। जैसे राक्षस की जान तोते में थी,  मैं आम में था। जब तक आम कटकर थैले में भरे जाकर घर नहीं पहुंच जाते, मेरी मुक्ति नहीं हो सकती थी।
भीड़ बढ़ती जा रही थी।
‘खट-कट… कट-खट’ की आवाजें लगातार आ रही थीं। पता नहीं छोकरा हमारे आम काट रहा था या… मैंने पुकारा, ‘‘ओ अरे…!’’
‘‘बाबूजी, आपने तो नाक में दम कर लिया!’’ सब्जी वाला गुर्राया, फिर पीछे मुड़कर चिल्लाया, ‘‘पीछे से उठकर बाहर आ… तेरी कट-कट ने तो मेरी दुकानदारी ही चौपट कर दी है।’’
उसने छोकरे का हाथ पकड़कर बाहर खींचा और सड़क पर धकेल दिया। साथ में सरौता और एक बोरा भी फेंके गए।
‘‘हमारे आम… हमारे आम…!’’ कई बेचैन आवाजें उभरीं।
‘‘आपके आम जरूर मिलेंगे…!’’ सब्जी वाले ने छाती पर हाथ मारकर एक औरत की तरफ सिर झुकाया।
छोकरा अब सड़क के बीचोंबीच अपना बोरा बिछाकर बैठ गया था। उसने सरौता टिका लिया था और फिर से आम काटने में जुट गया था। खट-कट-खट आम कट रहे थे, पर वे हमारे आम नहीं थे।
‘‘भई, हमारे आम काट दो।’’
लेकिन वह तो हमारी ओर देख ही नहीं रहा था। बस सिर झुकाए आम काटे जा रहा था। फिर उसके नीचे झुके मुंह से आवाज ऊपर आई, ‘‘बाबूजी, बस थोड़े-से रह गए हैं। फिर तसल्ली से काट दूंगा।’’
मैंने देखा, वह चारों ओर से घिरा हुआ था। भीड़ के बीच अंधेरे में बैठा आम काट रहा था, आवाजें आ रही थीं- कट-खट-खट-खट… पर वह खुद दिख नहीं रहा था।
लोगों से घिरी उस जगह में रोशनी नहीं पहुंचने दी जा रही थी। दुकानदार ने न जाने क्यों उसे वहां बिठा दिया था।
‘‘बारह फांकें काटो। नहीं-नहीं- सोलह करो। ये ज्यादा बड़ी हैं।’’
‘‘मैं सोलह कर देता हूं। उसकी आवाज किसी गहरे कुएं में से आ रही थी।’’
‘‘हां, सोलह ठीक हैं।’’
‘‘पैसे इधर… पैसे इधर…!’’ सब्जी वाले की आवाज गूंज उठी… ‘‘आम कटवाकर पैसे इधर दीजिए, नहीं तो हिसाब गड़बड़ हो जाएगा।’’
‘‘हिसाब… कैसा हिसाब…!’’
कट-खट… खट-कट… आम कट रहे थे। उसके चारों ओर अचार के आम कटवाने वालों की भीड़ थी, जैसे किसी बाजीगर के चारों ओर मजमा लगा हो।
कट-खट… खट!
‘‘जल्दी करो… हमें दूर जाना है। जल्दी…’’
कट-खट… खट-खट…!
‘‘जल्दी…!’’
और फिर उस कट-खट के बीच एक-दूसरी आवाज हुई थी, हल्की-सी सिसकारी…! हां, मैंने सुना था… सरौता आम पर नहीं पड़ा था।
बाजीगर का जादू टूट गया था। लोग लहर की तरह उछले थे, काई की तरह फट गए थे। वे अपने आम उठा रहे थे, आपस में छीनाझपटी कर रहे थे। उन्हें आम चाहिए थे।
लेकिन हमारे आम कहां थे? मुझे वे कहीं नजर नहीं आ रहे थे। शायद वे काटे ही नहीं गए थे। अब मैं वहां नहीं रुक सकता था। हां, वह आवाज, जो सरौते के आम पर गिरने की नहीं थी, मैंने सुनी थी।
सोम बाजार अपने पूरे निखार पर था। भीड़, रोशनी, होका, माल बिक रहा था लेकिन आम…? वे कहां कट रहे थे? हमारे आम… कौन काटेगा उन्हें… और अचार… मुझे कुछ पता नहीं था। मैं पत्नी का हाथ पकड़कर पीछे हट रहा
था- हमारे आम!

 

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जन सांस्कृतिक मूल्यों के लिए काम करेगा अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन: वीरेन डंगवाल

अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन के कार्यक्रम में मंगलेश डबराल, मैनेजर पाण्डेय और वीरेन डंगवाल।

 

नई दिल्‍ली : ईमानदारी के साथ अनवरत अपने विचारों और मूल्यों के साथ सक्रिय रहने वाले शख्स कभी हमख्याल लोगों द्वारा विस्मृत नहीं किये जाते, इसका साक्ष्य मिला 23 जुलाई की शाम को अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन की ओर से ललित कला अकादमी के कौस्तुभ सभागार में आयोजित पहले आयोजन में, जिसमें अनिल सिन्हा के परिजनों और जसम-सीपीआई (एमएल) के साथियों के साथ-साथ वाम-लोकतांत्रिक साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जगत के बड़े दायरे के लोगों ने भाग लिया। लखनऊ जहां उनके जीवन का लंबा समय गुजरा, वहां से जसम के उनके कई महत्वपूर्ण साथी इस आयोजन में मौजूद थे। उनकी बेटी रितु ने कहा कि फाउंडेशनों की भीड़ में यह अलग किस्म का फाउंडेशन होगा, जो व्यक्ति तक सिमटा नहीं रहेगा, बल्कि उन मूल्यों, सिद्धांतों और संघर्षशील चेतना को आगे बढ़ाएगा, जो अनिल सिन्हा की जिंदगी का मकसद था। साहित्य-कला-पत्रकारिता की दुनिया में मौजूद अजीब से बनावटीपन और सरोकारों की कमी का जिक्र करते हुए रितु ने अनिल सिन्हा की एक कहानी के शब्दों के हवाले से कहा कि पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में भारत में एक ऐसा समाज उभरा है, जो भूमंडलीकरण का शिकार है। बाजार की शक्लें परिवार के भीतर तक पैठ कर चुकी हैं। कलाकार, पत्रकार, साहित्यकार भी कहीं न कहीं इन परिस्थितियों से जूझ रहे हैं, अनिल सिन्हा मेमेरियल फाउंडेशन की नींव ऐसे ही लोगों को संबल देने के लिए डाली गई है। उन्‍होंने बताया कि हर साल लखनऊ में फाउंडेशन की तरफ से आयोजन होगा, जिसमें अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान और संगोष्ठी होगी तथा उनके नाम पर एक सम्मान दिया जाएगा।

इस मौके पर अनिल सिन्हा के दूसरे कहानी संग्रह एक पीली दोपहर का किस्साका लोकार्पण मशहूर कवि वीरेन डंगवाल ने किया। अनिल सिन्हा के साथ दोस्ती के अपने लंबे अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि वह हमेशा विनम्र और सहज रहे। उनकी तरह लो प्रोफाइल रहकर गंभीरता के साथ काम करने वालों को हिंदी साहित्य समाज प्रायः वह सम्मान नहीं देता, जिसे वे डिजर्व करते हैं। कला-साहित्य की कई विधाओं में उनकी रुचि का जिक्र करते हुए वीरेन डंगवाल ने कहा कि अनिल एक संजीदा पाठक भी थे। जसम की स्थापना में उनकी भूमिका को याद करते हुए उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि फाउंडेशन उन्हीं जन सांस्कृतिक मूल्यों के लिए काम करेगा, जिसके लिए जसम की स्थापना हुई थी।

 

मंगलेश डबराल

चर्चित कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि जीवन के ऐसे निर्माणाधीन दौर में अनिल सिन्हा से उनकी दोस्ती हुई, जिस दौर में बनी दोस्ती हमेशा कायम रहती है। लखनऊ में ‘अमृत’ अखबार में काम करने के दौरान सहकर्मी और बतौर साथी अजय सिंह, मोहन थपलियाल और सुभाष धुलिया को भी उन्होंने याद किया। उन्होंने कहा कि हमलोगों के नाम व्यक्तिवाचक नहीं थे, हम भाववाचक संज्ञाओं की तरह रहा करते थे। मंगलेश डबराल ने कहा कि बिना कोई शिकायत किए अनिल सिन्हा जिस तरीके से अपने पारिवारिक जरूरतों और वैचारिक मकसद के लिए पूरे दमखम के साथ संघर्ष करते थे, वह उन्हें आकर्षित करता था। सभागार में अनिल सिन्हा की पत्नी आशा सिन्हा भी मौजूद थीं। मंगलेश डबराल ने कहा कि आशा जी और अनिल जी की जोड़ी बहुत आदर्श जोड़ी मानी जाती थी। अनिल सिन्हा के साथ आशा सिन्हा ने भी बहुत संघर्ष किया। उन दोनों में अद्भुत तालमेल था। आर्थिक और वैचारिक संघर्ष के साथ-साथ ही बतौर पिता बच्चों को सुशिक्षित और योग्य नागरिक बनाने में अनिल सिन्हा की जो भूमिका थी, उसे भी मंगलेश डबराल ने याद किया। मंगलेश डबराल ने फोटोग्राफी के उनके शौक और कला-संबधी उनके लेखन का खास तौर पर जिक्र किया और कहा कि उनके कलासंबधी लेखन की पुस्तक जरूर प्रकाशित की जानी चाहिए। विस्तार से लिखने की अनिल सिन्हा की आदत की भी उन्होंने चर्चा की, जिसके कारण उनके लेख प्रायः लंबे हो जाया करते थे।

‘समकालीन तीसरी’ दुनिया के संपादक आनंदस्वरूप वर्मा ने सत्तर के दशक से शुरू हुई अनिल सिन्हा के साथ अपनी दोस्ती को याद करते हुए कहा कि उनके विचारों में जबर्दस्त दृढ़ता और व्यवहार में लचीलापन था। साहित्य-संस्कृति और राजनीतिक-सामाजिक समस्याओं से संबंधित उनके लेखन की तो जानकारी मिल जाती है, लेकिन मूलतः वे पत्रकार थे। उन्होंने 80 के दशक में सरकार और पुलिस द्वारा एक जनपक्षीय पत्रकार के दमन और हत्या के विरुद्ध भडके जनाक्रोश और स्कूटर इंडिया के कर्मचारियों के आंदोलन की पृष्ठभूमि में पत्रकारों और श्रमिकों के बीच एकता की जरूरत महसूस की थी। नेता, पुलिस, ब्यरोक्रेसी और दलाल पत्रकारों के नेक्सस के खिलाफ उन्होंने जनपक्षीय पत्रकारों को संगठित करने की पहल भी की। मीडिया पर ग्लोबलाइजेशन का जो खतरनाक असर हुआ, खास तौर से उसके बारे में उन्होंने काफी लिखा। जब 93 में नवभारत टाइम्स से 92 पत्रकारों को हटाया गया, तब उसी बिल्डिंग से निकलने वाला टाइम्स ऑफ इंडिया एक दिन के लिए भी बंद नहीं किया गया। कर्मचारियों में कोई हलचल नहीं हुई, एक दिन भी उन्होंने अपना काम बंद नहीं किया। होना तो यह चाहिए था कि लखनऊ के सारे अखबार कम से कम एक दिन के लिए बंद कर दिए जाते। इसे लेकर अनिल सिन्हा ने लेख भी लिखे। उन्होंने लिखा कि इस घटना ने यह भी सिद्ध किया है कि वर्तमान पत्रकार संगठन और ट्रेड यूनियन किस तरह विभाजित, असंगठित और अपने अंतर्विरोधों का शिकार हैं। अखबारों में फिर से नए रूप में ट्रेड यूनियन का गठन करना चाहिए। बहुत जल्दी चीजों को समझ लेना और दूर तक देखना अनिल सिन्हा की खूबी थी। नितांत निजी स्वार्थों के लिए निरतंर श्रमिक विरोधी होती पत्रकारिता के प्रति वे बेहद चिंतित रहते थे। वह देख रहे थे कि कि किस तरह हिंदी पत्रकारिता पर लहराने वाले संकट के पीछे दलाल चरित्र के संपादक और अखबार मालिक जिम्मेवार हैं। वह अपनी गरिमा व काम की महत्ता को ताक पर रखकर सरकारी अधिकारियों और सरकार के चाकर बन गए हैं। नवभारत टाइम्स से अलग होने के बाद उन्होंने एक फ्रीलांसर की तरह काम किया। दरअसल इस सिस्टम में वे रांग फान्ट की तरह थे। आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि अनिल चाहे नौकरी में रहे या नौकरी से अलग हुए, उनके चेहरे पर हमेशा विनम्रता और लाचारगी-सी रहती थी, जिसे देखकर दया आती थी, पर उनके व्यक्तित्व में बेचारगी कभी नहीं देखी गई, उनमें संघर्ष की अदम्य इच्छाशक्ति थी। उनका हमारे बीच न होना, एक दुखद अनुभूति है, पर यह देखकर अच्छा लग रहा है कि इतने सारे लोग अनिल को याद करने इकट्ठे हुए हैं। निश्चित तौर पर वे सब उस पत्रकारिता, उस विचार और उस साहित्य साधना को आगे ले जाएंगे, जो संघर्ष में विश्वास बनाना चाहते हैं या सामाजिक बदलाव में अपनी भूमिका तय करना चाहते हैं।

 

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में उपस्थित लोग।

इरफान ने अपनी सधी हुई आवाज में अनिल सिन्हा के एक पीली दोपहर का किस्सासंग्रह की एक कहानी गली रामकलीका पाठ किया। कुछ तो इरफान की आवाज का जादू था और कुछ कहानीकार की उस निगाह का असर जिसमें एक दलित मेहनतकश महिला के प्रति निर्मित होते सामाजिक सम्मान के बोध की बारीक दास्तान रची गई है, उसने कुछ समय के लिए श्रोताओं को अपने मुहल्लों और कस्बों की दुनिया में पहुंचा दिया।

बेहतर दुनिया के लिए ख्वाब और उन ख्वाबों के लिए होने वाले संघर्षों को अपनी चित्रकला में जगह देने वाले एक विलक्षण कलाकार थे चित्त प्रसाद, जिनकी चित्रकला के बारे में पिछले मार्च में गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में चित्रकार-कथाकार अशोक भौमिक ने पहला अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान दिया था। वही व्याख्यान-प्रदर्शन उन्होंने इस आयोजन में भी पेश किया। अपनी कला-समीक्षाओं में अनिल सिन्हा की जितनी गहरी निगाह चित्रकारों के सामाजिक सरोकारों पर रहती थी, उसी परंपरा को मानो अशोक भौमिक ने बडे प्रभावशाली तरीके से मूर्त किया। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चले तेलंगाना, तेभागा जैसे क्रांतिकारी किसान आंदोलनों और नाविक विद्रोह पर बनाए गए चित्रों की राजनीतिक पृष्ठभूमि, रचना-प्रक्रिया और उनकी विशेषताओं को देखना-सुनना खुद को आज के दौर में राजनीतिक-सांस्कृतिक ऊर्जा से लैस करने के समान था।

आयोजन की अध्यक्षता कर रहे प्रो. मैनेजर पांडेय इस व्याख्यान-प्रदर्शन से बेहद प्रभावित दिखे। उन्होंने चित्त प्रसाद की सारी व्यापकता, गहराई और नवीनता को सहज-सरल और संप्रेषणीय ढंग सामने रखने के लिए अशोक भौमिक की तारीफ की। अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन के बारे में प्रो. पांडेय ने दो सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि हिंदी और अंग्रेजी में अनिल सिन्हा का जो लेखन इधर-उधर बिखरा हुआ है, उसे एक क्रम में व्यवस्थित करके ठीक से एक जगह रखा जाना चाहिए। उन्होने कहानी, आलोचना, पत्रकारिता के साथ-साथ राजनीतिक-सामाजिक विचारों के क्षेत्र में जो काम किया है, उसके बारे में व्यवस्थित बात होनी चाहिए तथा लेख लिखे जाने चाहिए। संचालन युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने किया।

अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन का ईमेल है- anilsinhafoundation@gmail.com

प्रस्‍तुति : सुधीर सुमन

‘आनंदम’ की काव्य गोष्ठी संपन्न

न्यूयॉर्क : जगदीश रावतानी द्वारा संचालित ‘आनंदम’ संगीत व साहित्य संस्था की काव्य गोष्ठी 4 जुलाई, 2011 को कस्तूरबा गाँधी मार्ग स्थित हिमालय हाऊस के सभागार में संपन्न हुई।  इसकी अध्यक्षता विख्यात कवि बुद्धिनाथ मिश्र ने की तथा मासूम गाज़ियाबादी, लक्ष्मी शंकर बाजपेई, ज़र्फ ‘देहलवी’, बिशन लाल, विशाल ‘बाग’,  भूपेंद्र कुमार, नरेश कुमार, ए.एच ‘साज़’, आसिफ अली’, अजय ‘अक्स’, वीरेंद्र ‘कमर’, पूनम अगरवाल, रवीन्द्र शर्मा ‘रवि’, शांति अगरवाल,  अबुल फैज़ अज़्म, सहरियानवी, दर्द ‘देहलवी’, अहमद अली बर्की ‘आज़मी’, सुरेश यादव,  रंजन अग्रवाल, मुनव्वर ‘सरहदी’, ज़फर आदिल व मोइन अहमद ने भाग लिया।  गोष्ठी का संचालन ममता किरण ने किया।
गोष्ठी में गज़ल, गीत व छंद मुक्त कविता की अच्छी धूम रही.  ज़र्फ देहलवी की एक गज़ल का यह शेर-
दुनिया के लोग खुद पे नज़र फेंकते नहीं
आईना दिखाते हैं मगर देखते नहीं
सभागार मासूम गाज़ियाबादी के शेरों पर वाह-वाह कर के झूम उठा-
कोई पुरखों की ज़मीनें बेच कर भी पुर-सुकूँ
हम गुबारे बेच कर भी सो गए आराम से
लक्ष्मी शंकर वाजपेयी की संक्षिप्त छंद गज़ल-
तू है बादल/ तो बरसा जल
एक शून्य को/ कितनी हलचल.
नाम ही माँ का/ है गंगाजल
‘आनंदम’ संस्थापक जगदीश रावतानी की कविता पर भी खूब वाह वाह की दाद मिली- जल्दी मत कर देर हो जाएगी/ पचास वर्ष की आयु जब होती है पार/ मनुष्य उतावलेपन में डूब करता है विचार/ उतावलेपन में मनुष्य हर कार्य जल्दी जल्दी करने लगता है/ स्वप्न अधूरे ना रह जाएं/ ये सोच कर डरने लगता है…
संचालक ममता किरण ने एक कविता सुनाई ‘शिकायत’-
किताबों के होंठों पर शिकायत है इन दिनों/ की अब उनमें महकता खत रख कर/ नहीं किया जाता/ उनका आदान प्रदान.
गोष्ठी का समापन अध्यक्ष बुद्धिनाथ मिश्र ने अपने रसीले गीतों को तरन्नुम में गा कर किया-
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे/ जाने किस मछली में बंधन की चाह हो
अंत में जगदीश रावतानी ने सभी कवियों का धन्यवाद करके गोष्ठी संपन्न की.

प्रस्तुति: प्रेमचंद सहजवाला


पद्मश्री गिरिजा देवी सहित कई को सम्मान

नई दिल्ली : बनारस घराने की मशहूर गायिका पद्मश्री गिरिजा देवी को शुक्रवार को प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी रत्न सदस्यता पुरस्कार 2010 से सम्मानित किया गया। संगीत नाटक अकादमी द्वारा आयोजित पुरस्कार समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने  उन्हें पुरस्कार स्वरूप स्मृति  चिन्ह व तीन लाख रुपए का चेक प्रदान किया। गिरिजा देवी के अतिरिक्त टीके मूर्ति, रहीम फहीमुद्दीन डागर व नटराज रामकृष्णा को भी वर्ष 2010 के संगीत नाटक अकादमी रत्न सदस्यता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नटराज रामकृष्णा को यह सम्मान मरणोपरांत प्रदान किया गया। इस दौरान छन्नू लाल मिश्रा, यशपाल, बुधादित्य मुखर्जी, नित्यानंद हल्दीपूर सहित 36 अन्य को अकादमी पुरस्कार 2010 से सम्मानित किया गया।
शुक्रवार को कमानी सभागार में आयोजित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2010 समारोह के दौरान गिरिजा देवी, टीके मूर्ति, रहीम फहीमुद्दीन डागर व नटराज रामकृष्णा को रत्न साहित्य सम्मान से अलंकृत किया गया। इसके अतिरिक्त संगीत, नाटक, नृत्य, पारंपरिक, लोक, जनजातीय नृत्य, संगीत, नाटक एवं पुतुलकला आदि के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदानों को देखते हुए 36 अन्य लोगों को अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनमें छन्नू लाल मिश्रा (हिंदुस्तानी गायन), यशपाल (हिंदुस्तानी गायन), बुधादित्य मुखर्जी (सितार), नित्यानंद हल्दीपूर (बांसुरी), सुगुणा पुरूषोत्तमन (कर्नाटक गायन), मैसूर नागमणि श्रीनाथ (कर्नाटक गायन), नागई आर मुरलीधरन (वायलिन), श्रीमुशनम वी राजाराव (मृदंगम), एमवी सिंहाचल शास्त्री (हरिकथा) को संगीत के क्षेत्र में किए गए योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
नृत्य के क्षेत्र में योगदान  के लिए मालविका मित्र (कथक), कलामंडलम गोविंद नायर (कथकलि), फान्जौबम इबोतोन सिंह (मणिपुरी), रत्ना कुमार (कूचिपूडि़), अरुणा मोहन्ती (ओडिसी), माणिक बड़बायन (सत्रिय), उत्तरा अशा कूर्लावाला (सृजनात्मक नृत्य), कलामंडलम पेनकुलम रामन (कूटियाट्टम) व एस राजेश्वरी (भरतनाट्यम) को अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
नाटक के क्षेत्र में डी विजय भास्कर (नाट्य लेखन, तेलुगु), आत्मजीत (नाट्यलेखन, पंजाबी), वीणापाणि चावला (निर्देशन), उर्मिल कुमार थपलियाल (निर्देशन), दिलीप प्रभावलकर (अभिनय), बनवारी तनेजा (अभिनय), माया कृष्ण राव (अभिनय) व स्वातिलेखा सेनगुप्ता (अभिनय) को उक्त पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
पारंपरिक, लोक, जनजातीय नृत्य, संगीत, नाटक एवं पुतुलकला के क्षेत्र में हरभजन सिंह नामधारी (गुरबाणी कीर्तन), नजीर अहमद खान वारसी व नसीर अहमद खान वारसी (कव्वाली), द्विजेन मुखर्जी (रवींद्र संगीत), टी सोमसुंदरम (लोकनृत्य), कृष्णा कुमारी (लोक संगीत), चंदाताई जगदीश तिवाड़ी (लोक
नाटक), के चिन्न अंजनम्मा (छाया पुतुल), केवी रामकृष्णन व केसी रामकृष्णन (दस्ताना पुतुल) को सम्मानित किया गया। प्रदर्शन कलाओं में समग्र्र योगदान/विद्वता के क्षेत्र में अशोक डी रानाडे (संगीत) व जयदेव तनेजा (नाटक) को सम्मानित किया गया। उपराष्ट्रपति ने इन लोगों को स्मृति चिन्ह व एक लाख का चेक प्रदान किया गया। इस दौरान सांस्कृतिक मंत्री कुमारी शैलजा, संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष लीला सैमसन आदि उपस्थित रहीं।

 

प्रतिरोध का सिनेमा अभियान का पहला बलिया फिल्म फेस्टिवल 10 सितम्‍बर से

नई दिल्‍ली : 2006 से जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित प्रतिरोध का सिनेमा अभियान का उन्नीसवां और बलिया का पहला प्रतिरोध का सिनेमा फिल्म फेस्टिवल 10 और 11 सितम्बर को बलिया के बापू भवन टाउन हाल में सुबह 10 बजे से होगा। यह हाल बलिया रेलवे स्टेशन के बहुत नजदीक है।
इस फेस्टिवल में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व के वृत्त चित्र, लघु फिल्म और फीचर फिल्म के अलावा संकल्प, बलिया द्वारा भिखारी ठाकुर के  प्रसिद्ध नाटक बिदेशिया का मंचन, गोरख पाण्डेय की कविता पोस्टरों और जन चेतना के चितेरे के नाम से प्रगतिशील चित्रकार चित्त प्रसाद, जैनुल आबेदीन और सोमनाथ होड़ के प्रतिनिधि चित्रों की प्रदर्शनी भी आयोजित की जायेगी। फिल्म फेस्टिवल में प्रमुख भारतीय फिल्मकारों के शामिल होने की भी  संभावना है। इस पूरे आयोजन में  प्रवेश नि:शुल्क है और किसी भी  प्रकार के औपचारिक निमंत्रण की जरूरत नही है।
विस्‍तृत जानकारी के लिए संपर्क करें-
आशीष त्रिवेदी, सचिव, संकल्प,जन संस्कृति मंच, बलिया
9918377816, ashistrivedi1@gmail.com
संजय  जोशी, संयोजक, द ग्रुप, जन संस्कृति मंच
9811577426, thegroup.jsm@gmail.com

कठमुल्लापन के खिलाफ जुनूनी जंग : अनुराग

जाने-माने कथाकार साजिद रशीद का 11 जुलाई, 2011 को असामयिक निधन हो गया है। श्रद्धांजलि स्‍वरूप उनके बारे में ले‍ख-

दादा ने जमींदारों के खिलाफ बगावत की और एक गरीब औरत के साथ बुरी हरकत करने पर दरोगा और सिपाहियों को पेड़ से बंधवाकर पीटा। पिता की शख्सियत भी दिलकश थी। वह छुआछूत को नहीं मानते थे। इन दोनों के प्रभाव से बना था साजिद  रशीद का चरित्र। उनकी लेखन के साथ-साथ कठमुल्लापन के खिलाफ जंग चलती रही।
साजिद रशीद का जन्म 11 मार्च 1955 को उत्तर प्रदेश के गांव सगडि़हवा (गोंडा) में हुआ। चचा अब्दुरसत्तार ने नवजात शिशु के कान में अजान दी। दादा मुंशी करामत अली सरपंच ने हलवाहे भगवती को पोते की पैदाइश के शगुन पर एक रुपया दिया और चीखकर कहा, ” हे सत्तार, नाम अब्दुर्ररशीद होगा। बंबई में मुहम्मद सिद्दीक के खबर भिजवाय दो।’’
बड़े भाई को तार से खबर देने के लिए सत्तार साइकिल से बीस किलोमीटर दूर उतरौला कस्बे के डाकघर गए और झुटपुटा होने पर हफ्ते भर का पान, घर का जरूरी सामान और असली घी से बनीं मिठाइयों के दोने लेकर आए। भरा-पूरा घर चचा-चची, फूफी, दादी और छह-सात बच्चे। इनमें साजिद का बड़ा भाई अब्दुल अजीज भी था।
भगवती हलवाहे जात के अहीर थे। वे घर के सदस्य की तरह थे। घर के सभी छोटे उन्हें भगवती बाबा कहते थे। छोटों को उनका आदर उसी तरह करना होता था, जिस तरह बाबा करामत अली का। होली में भगवती और उन जैसे हिंदू दोस्त करामत अली के सफेद कुर्ते पर खूब रंग लगाते। तीसरे पहर करामत अली नहाते और मस्जिद में असिर की नमाज पढऩे चले जाते।
करामत अली गडरहिया के जमींदार मलिक अब्दुर्रहमान के यहां सीरवार थे। खेती-बाड़ी बिरसे में मिली थी, लेकिन जमींदारों के लिए करामत अली उस धुनिया बिरादरी के दलित मुसलमान ही थे, जो अपने नाम के आगे सिद्दीकी, शेख और मंसूरी लगाते थे। मलिक बिरादरी ऊँचे कुल वाली ठहरी। इलाके के पठान उनके उमरा में शामिल थे। करामत अली छह फुटे लठैत थे। चार जमात तक पढ़े
थे। साक्षरता और जुर्रत ने उन्हें पिछड़ी बिरादरी में (जिनमें हिंदू भी शामिल थे) बेहद लोकप्रिय बना दिया था। आसामियों पर जमींदारों के बढ़ते जुल्म और जब्र के खिलाफ एक रोज उन्होंने आसमियों की तरफ से लगान देने से इनकार कर दिया और खलिहान की चौथाई में मजदूरों के साथ होने वाली बेईमानी पर लाठी उठा ली। उनकी एक लाठी क्या उठी, गरीबों की लाठियां भी कड़-कड़ा कर बज उठीं। पठानों ने जमींदारों के दस्तरखाने पर सिर्फ पराठे तोड़े थे, वे गुस्से में आए आसमियों से अपनी हड्डियां तुड़वाने को राजी नहीं थे।
उतरौला स्टेट में जमींदारों के खिलाफ पिछड़ी बिरादरी की पहली और सबसे कामयाब बगावत करामत अली की यह गद्दारी थी, जो जमींदारों के लिए नाकाबिले-बर्दाश्त थी। उन्होंने ‘बदजातों के देश’ में छोटों के हाथों जिल्लत उठाने पर, खुदा के बनाए मुल्क पाकिस्तान में जा बसने को तरजीह दी और अपनी जमीनों का सौदा पठानों और मलिकों से किया। लेकिन करामत अली ने लाठी और पांच भाइयों की जमा पूंजी की ताकत से जमीदारों से एक हजार बीघे जमीन झटक ली। ग्राम पंचायत का चुनाव हुआ तो करामत अली पिछड़ों के वोटों की ताकत से ‘सरपंच’ चुन लिए गए। यह बात अशरफ (सवर्ण) मुसलमानों को बहुत नागवार गुजरी थी।
सन् 1960 में जमींदारों के उजडऩे के बाद सरकार की जमींदारी कायम हो गई। इसका ताकतवर पुर्जा है पुलिस। सन् 1965-66 में करामत अली ने उतरौला पुलिस के एक जालिम दरोगा और उसके सिपाहियों को एक गरीब औरत के साथ
बदसलूकी करने पर पेड़ से बांधकर पिटवाया। पुलिस ने बदले की कार्रवाई में कई तरह की क्रिमिनल दफाओं के तहत पूरे करामत खानदान पर मुकदमा कर दिया। यहां तक कि सारे इटई रामपुर को डरा-धमका कर करामत अली के खेतों का पानी बंद करवा दिया। तब सारे पठान और मलिकों ने इकट्ठे होकर पुलिस और प्रशासन के साथ अपनी वफादारी का इजहार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे वक्त भगवती और उन जैसे पिछड़ी जाति के किसानों-मजदूरों ने कसम खायी कि करामत अली के खेतों को अगर पानी न मिला तो हम अपने खून से सींचेंगे। करामत अली ने जमींदारों के बाद उतरौला थाने को भी लखनऊ सेशन कोर्ट में सात-आठ मुकदमेबाजी के बाद मात दे दी।
साजिद के पिता मुहम्मद सिद्दीक की शख्सियत अनोखी और दिलकश थी। वह 13 वर्ष की उम्र में घर से भाग गए थे। फकीरों के साथ घूमते रहते। लखनऊ, कानपुर, अलीगढ़, कलकत्ता में छोटे-मोटे काम किए। गर्ज कि पूरे हिंदुस्तान का चक्कर लगाया। अंत में मुंबई पहुंचे। मजबूत कद-काठी थी। बंबई में जीविका चलाने के लिए गुंडों की सोहबत में पड़ गए। जल्द ही उन्होंने जगह बना ली।

यह 1940 की बात है। उन दिनों फिल्मों के टिकट ब्लैक करने का धंधा जोरों पर था। उन्हें एक आदमी को सबक सिखाने के लिए भेजा गया। वह आदमी टिकटों के ब्लैक करने के धंधे का किंग था। मुहम्मद सिद्दीक ग्रांट रोड के मिनर्वा थियेटर गए और डंडे से वार कर दिया। इसी बीच किसी ने किंग को चाकू मार दिया। इलजाम सिद्दीक पर लगा। उन्होंने थाने में सारा किस्सा सुनाया। इंस्पैक्टर अंग्रेज था। उसने उन्हें बचा लिया।
उन्होंने इंस्पैक्टर से कहा कि वह अब इस धंधे में नहीं रहना चाहते। इज्जत की जिदंगी जीना चाहते हैं। इंस्पैक्टर ने अमेरिकन कंपनी ‘फायर स्टोन’ के जनरल मैनेजर के नाम पत्र लिख दिया। उनकी वहां नौकरी लग गई। वह मोल्ड डिपार्टमेंट में उबलते-पिघलते रबड़ को सांचे में डालकर मजबूत टायर बनाने लगे। वह ट्रेड यूनियन के सक्रिय सदस्य की हैसियत से कंपनी के मैनेजमेंट से टकराते रहे। एक दिन यूनियन के सेक्रेटरी भी हुए। वह सिर्फ दस्तखत करना जानते थे। अखबार पढ़वा कर सुनते थे। बीबीसी लंदन उनकी पसंदीदा न्यूज सर्विस थी।
तीन महीने की छोटी उम्र में साजिद ने अभी ठीक से चेहरों और रिश्तों को पहचाना भी न था कि मुहम्मद सिद्दीक ने उन्हें मुंबई बुला लिया। मुंबई के घर में जब उसने आंखें खोली तो घर के माहौल को तमाम भेदभाव से दूर मजहबी पाया। घर की दीवारों पर अल्लाह रसूल और कुरान की आयतों के तुगरों के बीच एक फोटो फ्रेम की हुई लटकी थी। साजिद को लगता कि तरहदार मूंछों और कमान जैसी भंवों वाले, जिसने तुर्की टोपी पहन रखी है, करामत बाबा के दादा जी होंगे। बहुत बाद में उसे पता चला कि वह उसके किसी रिश्तेदार की तस्वीर नहीं थी। वह तो तुर्की के शासक मुस्तफा कमाल अतातुर्क थे। कठमुल्लाओं के कातिल की हैसियत से उनकी शोहरत के बावजूद वह पूरी दुनिया के मुसलमानों
में यूरोप को नीचा दिखाने की वजह से प्रसिद्ध थे। उनकी तस्वीर उप-महाद्वीप के मुसलमानों ने घर-घर लगा रखी थी।
मुहम्मद सिद्दीक छुट्टियों में जब गांव जाते तो दलित हलवाहों को चारपाई पर अपने साथ बिठाते। उनके लोटे से पानी पी लेते। उनकी हथेली पर मली खैनी खा लेते। मार्क्‍स के छोटे-छोटे किताबचों के अध्ययन करने से बहुत पहले साजिद को अपने पिता की तर्जे-जिंदगी ने समानता और इंसानी दर्दमंदी का सबक पढ़ा दिया।
सभी चचा सत्तार से अकसर रात को हफीज जलांधरी की लंबी कविता ‘शाहनाम-ए-इस्लाम’ सुनते। रात को खाने-पीने के बाद सभी उन्हें घेर के बैठ जाते। वे लालटेन की रौशनी में बड़ी कुशलता से ‘शाहनाम-ए-इस्लाम’ पढ़ते और अकीदत से झूम उठते। उनमें भगवानदास काका भी शामिल होते।
मुंबई में साजिद की जिद पर अम्मा उसे रामायण सुनाती। वह जिस गांव की थीं, वहां ब्राह्मणों और अहीरों की बहुतायत थी। रामकथा के पाठ में वह अपनी मां के साथ शरीक होती थीं। इससे वह बहुत अच्छी किस्सा-गो बन गई थीं। वह कहानी इस तरह कहतीं कि खुशी में बच्चे हंसने लगते और दु:ख में रोते। वह जब सीता की अग्नि परीक्षा और उनके धरती में समा जाने का अध्याय सुनातीं तो साजिद रो पड़ता। वह राम को बुरा-भला कहने लगता। अम्मा समझाती, ”ऐसा नहीं कहते बेटे, राम जी भगवान थे और भगवान कभी गलती नहीं करते।’’
अम्मा से सुन-सुनकर साजिद को कहानियां पढऩे का चस्का लग गया। चौथी जमात से ही उसने कहानियां पढऩी शुरू कर दीं। धीरे-धीरे उसे कहानी कहने का शौक हो गया। वह हमउम्र बच्चों को कहानियां सुनाता। चार-चार, पांच-पांच घंटे मनगढंत कहानियां सुनाता रहता। छठी में बच्चों की कहानियां लिखनी शुरू कर दीं। उसे अपना नाम कामन लगा। उसने सोचा कि अधिकतर मुस्लिम नामों के आगे अब्दुल या मोहम्मद होता है। इसलिए नाम बदलकर कर दिया- साजिद रशीद। साजिद का मतलब है सजदा करने वाला और रशीद का रास्ता दिखाने वाला।
उसके उर्दू के टीचर मौलाना अब्र्दुर रहमान परवाज इसलाही थे। उन्होंने साजिद का टेलेंट भांप लिया। उसे प्रोत्साहित किया। साजिद की कहानियां बच्चों की पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं। वह सातवीं में था। बिजनौर से बच्चों के लिए प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका ‘गुंचा’ में उसका बाल उपन्यास छपा।
साजिद अपने पिता की अंगुली पकड़कर ट्रेड  यूनियन के दफ्तर और गेट मीटिंगों में कई बार गया। मजदूरों की एकता और अधिकार, बोनस-मैनेजमेंट, मस्जिदे अक्सा, किब्लए अव्वल, फिलस्तीन, अल्फतह, पाकिस्तान जैसे शब्द और नारे उसके कान में पड़ते।
मुहम्मद सिद्दीक मजहबी इंसान थे और साजिद रफ्ता-रफ्ता मजहब में दूर जा रहा था। उसे धार्मिक नैतिकता इंसानी नैतिकता से बहुत कमतर मालूम होने लगी। सांप्रदायिक सौहार्द के लिए शहीद होने वाले गांधी जी के नरकवासी होने की कोई वजह उसकी समझ में नहीं आती। किसी एक संप्रदाय से खुदा के अन्यायपूर्ण लगाव ने उसके कच्चे जहन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या खुदा ने कोई सियासी पार्टी बनाई हुई है, जिसके गलत कारकून को तो हुकूमत में हिस्सा मिलेगा, लेकिन जो मुखालिफ पार्टी में होगा, वह फिर चाहे जितना अच्छा समाज-सेवी हो उसे हुकूमत से बेदखल रखा जाएगा।
मुहम्मद सिद्दीक नमक आंदोलन में जेल गए थे। लेकिन उन्होंने आजादी के बाद कोई सुविधा नहीं ली। बंटवारे के बाद उन्होंने हिंदुस्तान ही की मिट्टी को अपनी कब्र के लिए चुना क्योंकि गांधी जी से कहीं अधिक उन्हें पंडित नेहरू महबूब थे। उनकी शक्लो-सूरत नेहरू से मिलती-जुलती थी। इसलिए वह खादी की सदरी, कुरता-पजामा और सफेद टोपी पहनते थे। यह टोपी उन्होंने अयोध्या में शिलान्यास के रोज उतार दी तो फिर मरते दम (अप्रैल 2000)  तक नहीं पहनी।
साजिद की जिंदगी उस दिन बदल गई, जब मुंबई में भायकला के छोटे से घर में तीसरे पहर मुहम्मद सिद्दीक को दिल का दौरा पड़ा। उस समय साजिद आठवीं जमात में था। कॉलेज जाने के लिए सिर्फ दो जोड़ी कपड़े थे। जेब खर्च उतना ही होता कि शर्मिदंगी से बचा जा सके। वह दोस्तों में अपनी जिंदादिली और दोस्तदारी की वजह से मकबूल था। अब घर की आर्थिक स्थिति और अपनी जेब की कैफियत को देखते हुए दोस्तों की महफिलों से फासला रखने लगा कि रिश्तों को जोडऩे वाली गोंद अमूमन रुपया ही साबित हुआ है। लेकिन साहित्य के कारण एस.सी.सी. तक ऐसी बहुत सारे हमदर्द दोस्त बन गए, जिनसे रिश्ता कायम करने के लिए किसी गोंद की जरूरत न थी। उसके ये हमदर्द दोस्त थे- प्रेमचंद, कृश्‍न चंदर, सआदत हमन मंटो, राजेंद्र सिंह बेदी, चेखव, मोपासां, दोस्तोवस्की और इब्ने सफी।
अहमद सेलर हाई स्कूल, नागपाड़ा में साजिद के साथ दाऊद और उसका भाई साबिर पढ़ते थे। आठवीं के बाद दाऊद ने क्राइम की दुनिया में कदम बढ़ा दिए।
साजिद के मुहल्ले में अरुण गवली रहता था। ऊपर से साजिद का तेज-तर्रार स्वभाव। पूरी संभावना थी कि वह भी अपराधी बन जाता, लेकिन साहित्य ने उसे सही राह दिखाई।
मुहम्मद सिद्दीक दिल के दौरे से बहुत डर गए थे। उन्होंने लंबी छुट्टी ले ली। वह कंपनी में सुपरवाइजर थे। ट्रेड यूनियन के लीडर थे। दो साल तक आधी तनख्वाह मिली। अम्मा सुघड़ गृहणी थीं। जैस-तैसे घर चलता रहा। साजिद के साथ पांचवी से अली हसन और अकबर कुरैशी पढ़ते थे। वे उसके घनिष्ठ मित्र थे जो उसका पूरा खयाल रखते।
दो साल बाद मुहम्मद सिद्दीक कंपनी से इस्तीफा देकर पत्नी के साथ गांव चले गए। साजिद फर्स्‍ट  ईयर में पढ़ रहा था। उसे बड़े भाई के पास छोड़ गए। बड़े भाई पिताजी की ही कंपनी में नौकरी करते थे।
साजिद को पहली कहानी 1972-73 में दिल्ली की पत्रिका ‘वाकयात’ में प्रकाशित हुई। उस पर मंटो की शैली का असर था। उसके फौरन बाद एजाज सिद्दीक ने मासिक ‘शायर’ में उनकी कहानी ‘जर्द चेहरों का ख्वाब’ प्रकाशित की।
साजिद रशीद इस कहानी के जरिए अदब में संजीदगी के साथ दाखिल हुए। साजिद ने इंटर, आर्ट से 1975-76  में की। इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। तब तक वह साहित्य बहुत पढ़ चुके थे। उन्हें लगता कि टीचर जो पढ़ा रहा है, उससे अधिक वह जानते हैं। दिमाग में एक बात और बैठ गई कि बड़ा आदमी बनने के लिए पढऩा जरूरी नहीं। दूसरी तरफ भाई का दबाव था कि वह कुछ करें।
सन् 1975 का साल साजिद के शऊर का संगेमील साबित हुआ। इंदिरा गांधी की फासिस्ट हुकूमत के खिलाफ जयप्रकाश नारायण की तहरीक के जुलूस की आखिरी कतार में वह भी शामिल हो गए। लेकिन मोहम्मद सिद्दीक गांव में कांग्रेस से अकीदे की तरह वाबस्ता रहे। साजिद की इमरजेंसी की नीरस दोपहरें और सहमी शामें मिजगांव में उर्दू के वामपंथी शायर और आलोचक बाकर मेहदी के मकान में गुजरने लगीं। वहां नौजवान शायर याकूब राही और अफसाना निगार अनवर खां भी आते। चंदा करके शराब मंगवायी जाती। जब शाम के साये इंदिरा गांधी के राजनीतिक दमन की तरह सख्त और गहरे होने लगते तो ऐसे में खिड़की से कूद कर चे गुएवारा अपनी कैप संभालते हुए बाकर साहब की बगल में आ बैठते। उनकी कैप का सितारा बल्ब की रोशनी में लिश्कारे मारता। बाकर साहब अपनी मजबूत उंगलियों में फंसा क्यूबन सिगार निकालकर एक लंबा कश ले कर साजिद की तरफ बढ़ा देते। वह बड़ी अकीदत से सिगार को होटों से लगा कर उसके धुंए को फेफड़ों में खींच लेते।
बाकर मेहदी के इसरार पर चे गुएवारा बाकर साहब के गिलास से रम का घूंट लेते हुए बोलिविया के जंगलों की दास्तानें सुनाने लगते और साजिद बड़ी उत्सुकता से उनकी कलाइयों पर उन निशानों की तलाश करने लगते, जो सी.आई.ए. एजेंटों के जरिए उन्हें कत्ल करने के बाद उनकी हथेलियों को काट लेने की वजह से बन गए थे। साजिद बाकर मेहदी के मकान में नक्सलवादियों से भी गले मिले। एक रोज याकूब राही दरम्यान कद के एक गंजे सेहतमंद जिस्म वाले शख्स के साथ अचानक बाकर साहब के मकान पर आ धमके। उनके कमरे में दाखिल होते ही बाकर मेहदी ने दरवाजा बंद कर लिया। गंजे आदमी ने कालर वाले बंद गले के कोट में से सुर्ख जिल्दों वाली कुछ किताबें निकालकर साजिद की तरफ बढ़ा दीं। उन्होंने डर और ललक के मिले-जुले जज्बे से किताबों को ले लिया। इस तरह माओ और उनकी किताबों से साजिद की पहली मुलाकात हुई।
इमरजेंसी की मुखालफत ने उन्हें एक रूमानी किस्म के ऐडवेंचर में मुब्तिला कर रखा था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दमन पर रोज बहसें करते और बजाहिर न दिखायी देने वाली खुफिया पुलिस से आंख-मिचौली करते। इमरजेंसी के खिलाफ कहानियां लिखते। ‘नाखून, दांत और लहू रंग परचम’ साजिद की उन्हीं दिनों की कहानी है। यह कहानी 1976 में आलोचक अतीकुल्लाह ने ‘तनाजुर’ में प्रकाशित की। इसी दौरान उन्होंने इमरजेंसी के दमन के खिलाफ ‘रंगों में जमी बर्फ’ उपन्यास लिखा। इसके छपते ही गिरफ्तारी के डर से इटई रामपुर (जिला-गोंडा अब बलरामपुर) चले गए।
सरदार जाफरी साजिद रशीद के लिए बहुत मोहतरम थे, लेकिन वे इमरजेंसी के दिनों में इंदिरा गांधी की डिक्टेरशिप और इमरजेंसी की हिमायत में उठ खड़े हुए थे। जाफरी साहब भी कामरेड डांगे की तरह पंडित नेहरू के रूमानी सोशलिज्म के बंदी थे। साजिद का मानना है कि जाफरी साहब ने प्रगतिशील आंदोलन को एक साहित्यिक और सामाजिक आंदोलन से ज्यादा नेहरू खानदान का समर्थक बना दिया था। प्राइम मिनिस्टर हाउस के लॉन पर पंडित नेहरू के साथ नेहरूवियन सोशलिज्म की चाय पीते हुए कम्युनिस्टों ने अपने इंकलाब को चाय में शक्कर की तरह घोल कर पी लिया था। जाफरी साहब के अंदर के इंकलाबी ने हिंदुस्तान के सबसे बड़े साहित्यिक आंदोलन की ज्वाला और अपने बागियाना तेवर को नेहरू की शेरवानी में लगे गुलाब के साथ टांक दिया था। अपने आइडियज्म का यह पतन साजिद के लिए तकलीफ देह था।
इमरजेंसी के बाद 1980 में साजिद का पहल कहानी संग्रह ‘रेत घड़ी’ प्रकाशित हुआ। इसके पेश लफ्ज में उन्होंने लिखा-  लोग इतने दु:खी क्यों हैं ? महात्मा बुद्ध के इस दु:ख के पस मंजर में इंसानी दु:खों की दास्तान। सदियों पर छायी हुई है। शायद मेरा अपना दु:ख भी यही है! इस कहानी संग्रह को कोई खास शोहरत नहीं मिली। कहीं कोई समीक्षा नहीं छपी। केवल डाक्टर कमर रईस, असरार गांधी और अली अहमद फातमी ने इस संग्रह की चर्चा की और इसे महत्वपूर्ण कहानी संग्रह माना। साजिद की कहानियां ‘कहानी’, ‘नई कहानी’, ‘संचेतना’, ‘रविवार’ आदि पत्रिकाओं में छपने लगीं।
साजिद रशीद की पहली नौकरी 1977 में दैनिक ‘इंकलाब’ में पार्ट टाइम उपसंपादक की लगी। तनख्वाह 375 रुपए महीना। साजिद की शादी 1975 में पिता जी ने करा दी थी। उन्हें डर था कि तेज मिजाज और जिद्दी साजिद गुंडागर्दी न करने लगे।
साजिद की नौकरी लगने के बाद बड़े भाई ने अलग कर दिया। इससे उन्हें गहरा मानसिक आघात लगा। वह इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। तय हुआ कि भाई जो मकान लेंगे, आधे पैसे साजिद देंगे। भाई ने छब्बीस हजार में मकान लिया। साजिद ने तेरह हजार चुकाए। कभी-कभी स्थिति ऐसी हो जाती कि एक पाव दूध खरीदने के लिए भी पैसे नहीं होते।
साजिद सोशल वर्क भी करते। उसी मुहल्ले में अरुण गवली रहता था। उसने साजिद की चाल के गटर के पास शराब बेचनी शुरू कर दी। साजिद ने विरोध किया। उनके साथ पांच-छह लड़के और थे। इन सबका गैंग था। लीडर साजिद थे। उन्होंने कहा कि गटर में कूड़ा फेंकने चाल की बहू-बेटियां जाती हैं। इससे उन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। अरुण गवली को मानना पड़ा।
मुहल्ले में कैरम क्लब खुल गए। इनकी आड़ में ब्राउन शुगर का धंधा होता। साजिद ने उस धंधे को बंद करवाना शुरू कर दिया। मारपीट हुई। लेकिन साजिद की टीम डटी रही। पुलिस की मदद से इन्होंने क्लब तुड़वा दिए। सब गुण्डे एकजुट हो गए। उन्होंने साजिद को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया।
सन् 1983 में जिस दिन भारत ने क्रिकेट वर्ल्‍ड कप जीता, उसी रात साजिद को धमकी मिली कि उस पर कातिलाना हमला होगा। धमकी देने वालों में एक ऐसा बदमाश था, जो हत्या के मामले में सजा काट चुका था। साजिद ने पुलिस से गुहार लगाई। पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। मजबूर होकर साजिद ने अरुण गवली के ब्रेन समझे जाने वाले बाबू रेशम से बात की। बाबू रेशम समझदार किस्म का गुण्डा था। उसने कहा, ”मैं आपको जानता हूं। आप जाओ मैं उसे देख लूंगा।’’ बाबू रेशम ने अपने गैंग के साथ गुण्डों पर अटैक कर दिया। दूसरे दिन गुण्डे छिपते रहे। उन्होंने साजिद को मैसेज भिजवाया कि वे पैर पकड़ते हैं। माफी मांगते हैं। इस तरह साजिद ने कैरम क्लब बंद करवाए।
अन्याय के साथ-साथ कठमुल्लापन के खिलाफ भी साजिद ने लड़ाई लड़ी। मामला
मुस्लिम समुदाय में तलाक  को लेकर था। साजिद का कहना था कि कुरान में लिखा है कि बीवी को एक बार तलाक कहने के बाद उस महिला के मासिक धर्म के बाद दूसरी बार और फिर इसी तरह से तीसरी बार ‘तलाक’ कहने पर ही तलाक होना चाहिए। लेकिन मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग में एक साथ तीन बार तलाक को मान्यता है। साजिद का कहना था कि कुरान में लिखा अहम है या किसी खलीफा का कहा। यह औरत को छोडऩे का आसान रास्ता अपना लिया है। साजिद ने ‘मुस्लिम फॉर सेकुलर डेमोक्रसी’ के माध्यम से कट्टरपंथियों के खिलाफ मुहिम छोड़ दी। वह उसके वाइस प्रेसीडेंट थे। प्रेसीडेंट जावेद अख्तर थे।
साजिद पर 14 अगस्त, 2004 को कातिलाना हमला हुआ। हमलावरों ने उनकी पीठ पर चाकू से वार किए। छत्तीस टांके आए। कुछ धर्मांधता को मानने वाले लेखकों ने कहा कि साजिद पर हमला सही हुआ है। यह धर्म का मामला है। साजिद के लिए टांके लगने से अधिक तकलीफदेह लेखकों का यह रवैया था। लेकिन लेखकों का बड़ा वर्ग साजिद के पक्ष में खड़ा था।