Archive for: June 2011

नागार्जुन की काव्य-चेतना ही जनचेतना है : आलोकधन्वा

बाबा नागार्जुन के गांव तरौनी से जसम ने पिछले वर्ष उनके जन्‍मशताब्‍दी समारोह की शुरुआत की थी। इस वर्ष 25 जून को आरा में आयोजित समारोह के साथ यह संपन्‍न हो गया। संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन की रिपोर्ट-

आरा : नागार्जुन इसलिए बडे़ कवि हैं कि वे वर्ग-संघर्ष को जानते हैं। वे सबसे प्रत्यक्ष राजनीतिक कवि हैं। आज उन पर जो चर्चाएं हो रही हैं, उनमें उन्हें मार्क्सवाद से प्रायः काटकर देखा जा रहा है। जबकि सच यह है कि  नागार्जुन नहीं होते तो हमलोग नहीं होते। और खुद हमारी परंपरा में कबीर और निराला नहीं होते तो नागार्जुन भी नहीं होते। नागार्जुन की कविता बुर्जुआ से सबसे ज्यादा जिरह करती है। उनकी कविताएं आधुनिक भारतीय समाज के सारे अंतर्विरोधों की शिनाख्त करती हैं। नागार्जुन की काव्य धारा हिंदी कविता की मुख्य-धारा है। उनकी जो काव्य-चेतना है, वही जनचेतना है। यह बात नक्सलबाड़ी विद्रोह की धारा के मशहूर कवि आलोकधन्वा  ने नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा में 25 जून, 2011 को नागार्जुन जन्मशताब्दी समापन समारोह का उद्घाटन करते हुए कही।

उन्‍होंने खुद को भोजपुर में चल रहे सामाजिक न्याय की लड़ाई से जोड़ते हुए कहा कि मनुष्य के लिए जितनी उसकी आत्मा अनिवार्य है, राजनीति भी उसके लिए उतनी ही अनिवार्य है। बेशक हमारा आज का दौर बहुत मुश्किलों से भरा है, लेकिन इसी दौर में नागार्जुन के प्रति पूरे देश में जैसी उत्कंठा और सम्मान देखने को मिला है, वह उम्मीद जगाता है। संभव है हम चुनाव में हार गए हैं, लेकिन जो जीते हैं, अभी भी विरोध के मत का प्रतिशत उनसे अधिक है। वैसे भी दुनिया में तानाशाह बहुमत के रास्ते ही आते रहे हैं। लेकिन जो शहीदों के रास्ते पर चलते हैं, वे किसी तानाशाही से नहीं डरते और न ही तात्कालिक पराजयों से विचलित होते हैं। भोजपुर में जो कामरेड शहीद हुए उन्होंने कोई मुआवजा नहीं मांगा। उन्होंने तो एक रास्ता चुना, कि जो समाज लूट पर कायम है उसे बदलना है, और उसमें अपना जीवन लगा दिया।

पिछले साल 25-26 जून को समस्तीपुर और बाबा नागार्जुन के गांव तरौनी से जसम ने उनके जन्मशताब्दी समारोहों की शुरुआत की थी और यह निर्णय किया था कि इस सिलसिले का समापन भोजपुर में किया जाएगा। उसी फैसले के अनुरूप नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा में 25 जून को नागार्जुन जन्मशताब्दी समापन समारोह का आयोजन किया गया।  जनता, जनांदोलन, राजनीति, इंकलाब और कविता के साथ गहन रिश्ते की जो नागार्जुन की परंपरा है, उसी के अनुरूप यह समारोह आयोजित हुआ। लगभग एक सप्ताह तक जनकवि नागार्जुन की कविताएं और उनका राजनीतिक-सामाजिक स्वप्न लोगों के बीच चर्चा का विषय बने रहे। अखबारों की भी भूमिका साकारात्मक रही। समारोह की तैयारी के दौरान आरा शहर और गड़हनी व पवना नामक ग्रामीण बाजारों में चार नुक्कड़ कविता पाठ आयोजित किए गए, जिनमें नागार्जुन के महत्व और उनकी प्रासंगिकता के बारे में बताया गया तथा उनकी कविताएं आम लोगों को सुनाई गईं। अपने जीवन के संकटों और शासकवर्गीय राजनीति व संस्कृति के जरिए बने विभ्रमों से घिरे आम मेहनतकश जन इस तरह अपने संघर्षों और अपने जीवन की बेहतरी के पक्ष में आजीवन सक्रिय रहने वाले कवि की कविताओं से मिले। यह महसूस हुआ कि जो जनता के हित में रचा गया साहित्य है उसे जनता तक ले जाने का काम सांस्कृतिक संगठनों को प्रमुखता से करना चाहिए। यह एक तरह से जनता को उसी की मूल्यवान थाती उसे सौंपने की तरह था।

नागार्जुन का भोजपुर से पुराना जुड़ाव था। साठ के दशक में वह पूर्वांचल नाम की संस्था के अध्यक्ष बनाए गए थे। जनांदोलनों में शामिल होने के कारण उन्हें बक्सर जेल में भी रखा गया था। नागार्जुन ने तेलंगाना से लेकर जे.पी. के संपूर्ण क्रांति आंदोलन तक पर लिखा, लेकिन भोजपुर के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन में तो जैसे उन्हें अपना जीवन-स्वप्न साकार होता दिखता था। ‘हरिजन गाथा’ और ‘भोजपुर’ जैसी कविताएं इसकी बानगी हैं।

बारिश दस्तक दे चुकी थी, उससे समारोह की तैयारी थोड़ी प्रभावित भी हुई। लेकिन इसके बावजूद 25 जून को नागरी प्रचारिणी सभागार में लोगों की अच्छी-खासी मौजूदगी के बीच समारोह की शुरुआत हुई। सभागार के बाहर और अंदर की दीवारों पर लगाए गए  नागार्जुन, शमशेर, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध जैसे कवियों की कविताओं पर आधारित राधिका  और अर्जुन द्वारा निर्मित आदमकद कविता-पोस्टर और बाबा नागार्जुन की कविताओं व चित्रों वाले बैनर समारोह स्थल को भव्य बना रहे थे। कैंपस और सभागार में बाबा की दो बड़ी तस्वीरें लगी हुई थीं। बाबा के चित्रों वाली सैकड़ों झंडियां हवा में लहरा रही थीं।

विचार-विमर्श के सत्र में ‘प्रगतिशील आंदोलन और नागार्जुन की भूमिका’ विषय पर बोलते हुए जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि जिन्हें लगता है कि प्रगतिशीलता कहीं बाहर से आई उन्हें राहुल सांकृत्यायन, डी.डी. कोशांबी, हजारी प्रसाद द्विवेदी  और नागार्जुन की परंपरा को समझना होगा। सारी परंपराओं को आत्मसात करके और उसका निचोड़ निकालकर प्रगतिशील आंदोलन को विकसित किया गया। हिंदी कविता में तो बाबा प्रगतिशीलता की नींव रखने वालों में से हैं। नागार्जुन की काव्य यात्रा के विभिन्न पड़ावों का जिक्र करते हुए प्रणय कृष्ण ने कहा कि वे प्रगतिशीलता के आंदोलन के आत्मसंघर्ष के भी नुमाइंदे हैं। ऊंचे  से ऊंचे दर्शन को भी उन्होंने संशय से देखा। बुद्ध और गांधी पर भी सवाल किए। योगी अरविंद पर भी कटुक्ति की। वे किसी से नहीं डरते थे, इसलिए कि वे अपनी परंपरा में उतने ही गहरे धंसे हुए थे। बाबा शुरू से ही सत्ता के चरित्र को पहचानने वाले कवि रहे। नामवर सिंह 1962 के बाद के दौर को मोहभंग का दौर मानते हैं, लेकिन नागार्जुन, मुक्तिबोध और केदार जैसे कवियों में 1947 की आजादी के प्रति कोई मोह नहीं था, कि मोहभंग होता। स्वाधीनता आंदोलन के कांग्रेसी नेतृत्व में महाजनों-जमींदारों के वर्चस्व को लेकर इन सबको आजादी के प्रति गहरा संशय था। नागार्जुन ने तो कांग्रेसी हुकूमत की लगातार आलोचना की। दरअसल प्रगतिशीलता की प्रामाणिक दृष्टि हमें इन्हीं कवियों से मिलती है। तेलंगाना के बाद साठ के दशक के अंत में नक्सलबाड़ी विद्रोह के जरिए किसानों की खुदमुख्तारी का जो संघर्ष नए सिरे से सामने आया, उसने प्रगतिशीलता और वर्ग संघर्ष को नई जमीन मुहैया की और सत्तर के दशक में जनांदोलनों ने नागार्जुन सरीखे कवियों को नए सिरे से प्रासंगिक बना दिया। बीसवीं सदी के हिंदुस्तान में जितने भी जनांदोलन हुए, नागार्जुन प्रायः उनके साथ रहे और उनकी कमजोरियों और गड़बडि़यों की आलोचना भी की। लेकिन नक्सलबाड़ी के स्वागत के बाद पलटकर कभी उसकी आलोचना नहीं की। जबकि संपूर्ण क्रांति के भ्रांति में बदल जाने की विडंबना पर उन्होंने स्पष्ट तौर पर लिखा। आज जिस तरीके से पूरी की पूरी राजनीति को जनता से काटकर रख दिया गया है और जनता को आंदोलन की शक्ति न बनने देने और बगैर संघर्ष के सत्ता में भागीदारी की राजनीति चल रही है, तब जनता की सत्ता  कायम करने के लिहाज से नागार्जुन पिछले किसी दौर से अधिक प्रांसगिक हो उठे हैं।

आइसा नेता रामायण राम ने नागार्जुन की कविता ‘हरिजन-गाथा’ को एक सचेत वर्ग-दृष्टि का उदाहरण बताते हुए कहा कि इसमें जनसंहार को लेकर कोई भावुक अपील नहीं है, बल्कि एक भविष्य की राजनैतिक शक्ति के उभार की ओर संकेत है। उत्तर भारत में दलित आंदोलन जिस पतन के रास्ते पर आज चला गया है, उससे अलग दिशा है इस कविता में। एक सचेत राजनीतिक वर्ग दृष्टि के मामले में इससे साहित्य और राजनीति दोनों को सही दिशा मिलती है।

समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने ‘भोजपुर’ और नागार्जुन का जीवन-स्वप्न विषय पर बोलते हुए कहा कि नागार्जुन अपने भीतर अपने समय के तूफान को बांधे हुए थे। मार्क्सवाद में उनकी गहन आस्था थी। अपनी एक कविता में उन्होंने कहा था कि बाजारू बीजों की निर्मम छंटाई करूंगा। जाहिर है उनके लिए कविता एक खेती थी, खेती- समाजवाद के सपनों की। भोजपुर उन्हें उन्हीं सपनों के लिए होने वाले जनसंघर्षों के कारण बेहद अपना लगता था और इसी कारण भगतसिंह उन्हें प्यारे थे। वह भारत में इंकलाब चाहते थे। उसे पूरा करना हम सबका कार्यभार है।

विचार-विमर्श सत्र की अध्यक्षता डा. गदाधर सिंह, जलेस के राज्य सचिव कथाकार डा. नीरज सिंह, प्रलेस के राज्य उपाध्यक्ष आलोचक डा. रवींद्रनाथ राय और जसम के राज्य अध्यक्ष आलोचक रामनिहाल गुंजन ने की। संचालन सुधीर सुमन ने किया। डा.रवींद्रनाथ राय ने समारोह की शुरुआत में स्वागत वक्तव्य दिया और जनता के राजनीतिक कवि नागार्जुन के जन्मशताब्दी पर भोजपुर में समारोह होने के महत्व के बारे में चर्चा की। डा. गदाधर  सिंह ने छात्र जीवन की स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि उनके कविता पाठ में छात्रों की भारी उपस्थिति रहती थी। वे एक स्वतंत्रचेत्ता प्रगतिशील कवि थे।  उन्होंने केदारनाथ अग्रवाल, मजाज और गोपाल सिंह गोपाली पर केंद्रित समकालीन चुनौती के विशेषांक का लोकार्पण भी किया। डा. नीरज सिंह ने कहा कि बाबा नागार्जुन सीधे-सीधे किसान आंदोलन में शामिल हुए और किसान-मजदूरों की मानसिकता को जिया। वे चाहते थे कि परिवर्तन जब भी हो, मजदूर-किसानों के लिए हो। बाबा ने अपनी कविताओं के जरिए जनांदोलनों को शक्ति दी। रामनिहाल गुंजन ने कहा कि बाबा हमारे दौर के जनपक्षधर साहित्यकारों और जनता की राजनीति करने वालों के लिए बड़े प्रेरणास्रोत हैं। सही मायने में उन्होंने ही कविता को जनता के संघर्षों का औजार बनाया। कथाकार सुरेश कांटक ने एक संस्मरण सुनाया कि किस तरह बाबा को जब खून की जरूरत पड़ी, तो संयोगवश जिस नौजवान का खून उनसे मिला, वह भोजपुर का निवासी था। इस नाते भी बाबा कहते थे कि उनकी रगों में भोजपुर का खून दौड़ता है।

दूसरे सत्र की शुरुआत युवानीति द्वारा बाबा की चर्चित कविता ‘भोजपुर’ की नाट्य प्रस्तुति से हुई। उसके बाद कवि जितेंद्र कुमार की अध्यक्षता और कवि सुमन कुमार सिंह के संचालन में कविता पाठ हुआ, जिसमें कृष्ण कुमार निर्मोही, श्रीराम तिवारी, रामनिहाल गुंजन, जगतनंदन सहाय, दीपक सिन्हा, कुमार वीरेंद्र, संतोष श्रेयांश, ओमप्रकाश मिश्र, सरदार जंग बहादुर, सुनील चैध्री, रहमत अली रहमत आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। समारोह स्थल पर एक बुक स्टाल भी लगाया गया था। समारोह में शामिल होने के लिए उत्तर बिहार के जसम के साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी सुरेंद्र प्रसाद सुमन के नेतृत्व में भोजपुर पहुंचे थे। 24 जून को इन लोगों ने अपनी सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत बाबा नागार्जुन के ननिहाल सतलखा चंद्रसेनपुर से की थी, जहां एक सभा में उनके ननिहाल के परिजनों ने उनकी मूर्ति स्थापना, पुस्तकालय और उनके नाम पर एक शोध संस्थान बनाने के लिए एक कट्ठा जमीन देने की घोषणा की। उसके बाद साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी दरभंगा और समस्तीपुर में सभा करते हुए पटना पहुचे  और फिर 25 को नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह में शामिल हुए। समारोह में जसम राष्ट्रीय पार्षद संतोष सहर, जसम बिहार के सचिव संतोष झा, कवि राजेश कमल, संस्कृतिकर्मी समता राय, प्रो. पशुपतिनाथ सिंह आदि भी मौजूद थे।

समारोह में बाबा नागार्जुन की कविता पाठ का वीडियो प्रदर्शन और कवि मदन कश्यप का काव्य-पाठ भी तय था। लेकिन ट्रेन में विलंब के कारण ये कार्यक्रम अगले दिन स्थानीय बाल हिंदी पुस्तकालय में आयोजित किए गए। कवि-फिल्मकार कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई नागार्जुन के काव्य पाठ के वीडियो का संपादन रोहित कौशिक ने किया है और इसके लिए शोध कवि श्याम सुशील ने किया है। करीब 13 मिनट का यह वीडियो नागार्जुन के सरोकार और कविता व भाषा के प्रति उनके विचारों का बखूबी पता देता है। बाबा इसमें मैथिली और बांग्ला में भी अपनी कविताएं सुनाते हैं। एक जगह इसमें नागार्जुन कहते हैं कि कविता में अगर कवि को गुस्सा नहीं आता, अगर वह निडर नहीं है, डरपोक है, तो बेकार है। इस वीडियो में बाबा नागार्जुन को कविता कविता पाठ करते देखना और उनके विचारों को सुनना नई पीढ़ी के लिए एक रोमांचक और उत्प्रेरक अनुभव था।
मदन कश्यप के एकल कविता पाठ की अध्यक्षता नीरज सिंह और रामनिहाल गुंजन ने की तथा संचालन कवि जितेंद्र कुमार ने किया। उन्होंने गनीमत, चाहतें, थोड़ा-सा फाव, सपनों का अंत और चिडि़यों का क्या नामक अपनी कविताओं का पाठ किया। उनकी कुछ काव्य-पंक्तियां गौरतलब हैं-
सपने के किसी अंत का मतलब
स्वप्न देखने की प्रक्रिया का अंत नहीं है।
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गनीमत है
कि पृथ्वी पर अब भी हवा है
और हवा मुफ्त है…
गनीमत है
कि कई पार्कों में आप मुफ्त जा सकते हैं
बिना कुछ दिए समुद्र को छू सकते हैं
सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य देख सकते हैं
गनीमत है
कि गनीमत है।

इस तरह नागार्जुन जन्मशताब्दी  समारोह तीन दिनों तक चला, जो बाबा के जन्मस्थान सतलखा चंद्रसेनपुर से शुरू होकर भोजपुर में उनके महत्व और प्रासंगिकता पर विचार विमर्श से गुजरते हुए उनपर केंद्रित वीडियो के प्रदर्शन के साथ संपन्न हुआ। यद्यपि भोजपुर के सांस्कृतिक जगत के लिए तो पूरा हफ्ता ही नागार्जुनमय रहा।

भोमा और ग्रीन हंट : अशोक भौमिक

वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक इन दिनों नयी चित्र  श्रृंखला  ‘भोमा और ग्रीन हंट ’ बना रहे हैं। हमने उनसे इन चित्रों के बारे में लिखने के लिए कहा। इस पर उन्‍होंने जो टिप्‍पणी की वह उनके चार चित्रों के साथ दी जा रही है-

मैं चित्रों के शीर्षक पर दो शब्द जरूर कहना चाहूँगा। ‘भोमा और ग्रीन हंट’ में भोमा बादल सरकार  के प्रसिद्ध

नाटक ‘भोमा’ से लिया हुआ है।

सुंदरबन के आदिवासी इलाकों में रहने वाला भोमा ‘भूखा रहता है ताकि हमें भात मिलता रहे’,  ‘ऐसे  भोमाओं का खून’ रोज़  हमारी थालियों में  सफ़ेद भात बन कर चमेली की तरह खिल उठता है’। बादल सरकार ने ‘भोमा’  नाटक  में एक सवाल पूछा था कि ‘कब ‘मै’,  तुम ‘सब’ से मिल कर एक ‘हम’ बनेंगे।’ ये सवाल मेरी इस चित्र श्रृं खला की मूल प्रेरणा हैं।

पर यह सच है कि  शब्दों के जरिये किसी चित्र की व्याख्या से चित्रों के रंग फीके पड़ जाते है, रेखाएं मिटने लगती हैं और धीरे-धीरे चित्र आपके सामने से गायब हो जाता है। पर जो रह जाता है वह है  व्याख्याकार का पांडित्य !

तो क्या  चित्र और चित्रकार  से चित्र की गलत-सही व्याख्या पेश करने  वाला व्यक्ति ज्यादा महत्वपूर्ण है ? क्या आप  कवियों से  यह उम्मीद  करते  हैं  कि  कविता  के  साथ- साथ  कविता  का  अर्थ  भी  अलग  से लिखकर  दिया  करे, या  फिर  किसी  संगीतकार  या  किसी नर्तक  से हम  ऐसी  मांग  करते  हैं ?

ऐसी स्थिति में हमें  इसमें आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये कि मेरे चित्रों में,  हमारे देश के जंगलों मे जीने वालें लोगों से उनकी जमीन और जंगल छीनने के षड्यंत्र के विरोध में लामबंद होते आदिवासियों को किसी विस्तृत व्‍याख्‍या के बगैर हम नहीं पहचान पाते हैं। उस  लाल चिड़िया के सन्देश को समझने के लिये व्याख्या की मांग करते है। या कि हम महानगरों मे रहने वाले लोगों को  उस लाल नगाड़े की आवाज़ नहीं सुनाई दे रही है। आज मुझे उन आदिवासी देशवासियों के शरीर पर धारियां दिख रही हैं। मैं सपने मे एक हरा शेर देखता हूँ जो लाल चिड़िया के कूक से, लाल नगाड़े की आवाज़ से एक नई लड़ाई के लिये तैयार  हो रहा है।

‘ मैं ‘,  उन सबसे मिलकर एक व्यापक  हम बनने की जरुरत को महसूस करता हूँ। मेरे चित्रों का अर्थ समझने से  ज्यादा जरूरी है कि उस लाल नगाड़े के आवाज़ को समझ कर उन हरे शेरों तक पहुंचा जाये।

नोट : भौमिक जी ‘चित्र और उनकी व्याख्या विषय पर लेख लिख रहे हैं। पूरा होते ही उसे ‘लेखक मंच ’ में प्रकाशित किया जाएगा। इन चित्रों पर अपनी बात के लिए आप उनसे bhowmick.ashok@googlemail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

गौरैया का पंख: केवल तिवारी

युवा लेखक-पत्रकार केवल तिवारी की कहानी-

गर्मियां शुरू होने पर दो बातें हमेशा कुछ परेशान-सी करती हैं। मुझसे ज्यादा मेरी पत्नी और बच्चे को। एक समस्या को पत्नी अपने हिसाब से कम-ज्यादा मान बैठती है, दूसरी शाश्वत समस्या है। इन समस्याओं में एक तो  कूलर को अपने मन से शुरू न कर पाने का दंश और दूसरा बच्चे के स्कूल से मिला भारी-भरकम होमवर्क। कूलर हम कई बार इसलिए अपने मन से नहीं खोल पाते क्योंकि अक्सर हमारा वह कबूतरों के लिए ‘मैटरनिटी सेंटर’ बन जाता है। कूलर खोलते ही कभी वहां कबूतरनी अंडों को  सेती हुई दिखती है और कभी छोटे-छोटे बच्चों के मुंह में खाने का कुछ सामान ठूंसती हुई सी। कबूतरों का मेरे कूलर के प्रति प्रेम कई वर्षों से है। जब मेरी मां जीवित थी, कहा करती थी घर में चिडि़यों का घोंसला बनाना बहुत शुभ होता है। किराये के एक मकान में एक बार कबूतर ने हमारे घर में घोंसला बनाया, अंडे दिए और उसके बच्चे हमारे सामने उड़े। उसके कुछ माह बाद मेरे घर में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। घोंसला बनाना और उसमें बच्चे होना शुभ होता है, यह बात मेरी पत्नी के दिमाग में घर कर गई है। लेकिन कबूतरों के प्रति मेरे मन में स्नेह कभी नहीं पनप पाया। उल्टे एक बार चोरी-छिपे मैंने उसके घोंसले को  तोड़ दिया था। असल में उसका घोंसला अभी बन ही रहा था कि गर्मियों ने ऐसा तेवर दिखाना शुरू कर दिया कि कूलर की जरूरत महसूस होने लगी। मेरी पत्नी ने ताकीद की कि कूलर की सफाई करने में मेरी मदद करो। मैंने तुरंत हां कर दी और काम की शुरुआत पहले मैं ही करने के इसलिए राजी हो गया क्योंकि मुझे पूरी आशंका थी कि घोंसला देखते ही वह कूलर वाली खिड़की के किवाड़ बंद कर देगी। और न जाने कितने दिन ये किवाड़ बंद रहेंगे। हो सकता है पूरी गर्मी भर। इस आशंका को भांपते हुए मैंने पत्नी को चाय बनाने भेजा और कूलर वाली खिड़की खोलने लगा,  देखा कबूतरों का एक जोड़ा अपना घर बनाने में मशगूल है। खिड़की खोलते ही जोड़ा तो  उड़ गया, लेकिन आशियाना लगभग तैयार था। मैंने सबसे पहले उसे उठाकर नीचे फेंक दिया। असल में हमारे पूरे मोहल्ले में इतने अधिक कबूतर हैं कि हर समय वही चारों तरफ दिखते हैं। जहां बैठे तुरंत गंदगी कर देते हैं। बालकनी को दिनभर साफ करते रहो। कपड़े तार में डाले नहीं कि तुरंत गंदा कर दिया।

कूलर अंदर खिसकाने की आवाज सुनते ही पत्नी आई और बोली कोई घोंसला तो  नहीं बनाया है न कबूतरों ने। मैंने कहा, नहीं। उसने ‘अच्छा’ इतनी जोर से कहा, जैसे आश्चर्य और खुशी दोनों बातें उसमें मिली हुई हों। खैर वह गर्मी हमारी ठीक कटी। कूलर चलने के बाद जब तक वह रोज खुलता, बंद होता कोई पक्षी वहां अपना आशियाना बसाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। उन्होंने आसपास अपना ठौर ढूंढ़ लिया। वह वर्ष बच्चे के स्कूल का पहला साल था, इसलिए होमवर्क भी बहुत नहीं मिला था और वह गर्मी हमारे लिए बहुत अच्छी बीती।

इस साल भी गर्मी भयानक पड़ी और गर्मी शुरू होने से पहले से ही कबूतरों का खौफ मेरे मन में था। माताजी वाले कमरे का कूलर हमने अंदर ही निकाल रखा था। क्योंकि मां अब इस दुनिया में रही नहीं, वह कमरा अमूमन खाली भी रहता है। कभी कोई मेहमान आ गया तो ठीक। या फिर टीवी देखना हो या खाना खाना हो  तो  हम उस कमरे का इस्तेमाल करते हैं। उस कमरे के कूलर को पहले से इसलिए अंदर निकालकर रख दिया गया कि कहीं दूसरे कूलर के पास अंडे-बच्चे हो गए तो  इस कूलर का इस्तेमाल किया जा सकेगा। दूसरे कमरे के कूलर के आसपास भी मैं कबूतरों को फटकने नहीं दे रहा था। होते-करते कबूतर मुक्त कूलर की खिड़की हमें मिल गई, लेकिन उनका अड्डा बालकनी और अन्य स्थानों पर होने लगा। उनकी संख्या लगातार इस कदर बढ़ रही थी कि कभी-कबार पत्नी भी झल्ला जाती। खासतौर पर तब, जब उसे धुले कपड़े दोबारा धोने पड़ते।

इस गर्मी में कूलर तो गर्मी शुरू होते ही चल निकला, लेकिन बच्चे को होमवर्क अच्छा-खासा मिल गया। खैर यह होमवर्क तो मिलना ही था, इसलिए यह मान लिया गया कि कोई बात नहीं, किसी तरह से कराएंगे। बच्चा अपनी मां के साथ लखनऊ एक विवाह समारोह में चला गया और योजना बनी कि कुछ दिन वहां मेरे बड़े भाई के घर रहा जाए। बच्चा अपने ताऊ और ताई के साथ रहना और मौज-मस्ती करना बहुत पसंद करता है। इधर छोटे से बच्चे को  भी अपने होमवर्क की बहुत चिंता थी। मैंने भरोसा दिलाया कि कुछ काम लखनऊ में पूरा हो जाएगा। मेरी दीदी का छोटा बेटा कुछ करा देगा और कुछ काम मैं पूरा करा दूंगा। उसके मिले तमाम कामों में एक यह भी शामिल था, जिसमें पांच प्रकार की चिडि़यों के पंखों को एकत्र करना था। मैंने इस काम को  पूरा करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।घर में अकेला था।

एक दिन सुबह देर से उठा, बालकनी का दरवाजा खुला तो देखा वहां गौरैया इधर-उधर घूम रही है। कबूतरों से नफरत करने वाला मैं गौरैया को देखते ही बहुत खुश हो गया। मुझे इस बात का दुख हुआ कि मेरे पास कैमरा नहीं है। एक पुराना कैमरा है भी तो रील वाला, उसमें रील नहीं है। मेरे बालकनी में जाने से वह भाग नहीं जाए, इस आशंका से मैं अंदर आ गया। जिज्ञासावश थोड़ी देर बाद मैं फिर बालकनी मैं गया। मैंने चारों तरफ देखा मुझे गौरैया नहीं दिखी। मुझे तमाम उन खबरों की जानकारी थी, जिसमें कहा जा रहा था कि गौरैया अब कहीं नहीं दिखती। उनकी प्रजाति विलुप्‍त होने की कगार पर है। मुझे लगा हो  न हो मेरा भ्रम रहा होगा। वह पंछी गौरैया तो  नहीं रही होगी। तभी मैंने देखा फुर्र से उड़ती हुई बालकनी की छत से गौरैया सामने की छत की तरफ उड़ गई। मैंने जिज्ञासावश बालकनी की छत की ओर देखा। वहां पंखा लगाने के लिए बने बिजली के बड़े छेदनुमा गोले में कुछ घासफूस लटकती दिखाई दी। गौरैया मेरे घर में घोंसला बना रही है। मैं इतना खुश हो गया मानो मुझे कोई खजाना मिल गया हो। मैंने बालकनी में कुछ चावल के दाने बिखेर दिए और बालकनी बंद कर कमरे में आ गया। अब मैं दरवाजे के छेद से देख रहा था, गौरैया बार-बार उन दानों को उठाती। फिर कहीं से तिनका लाती और बालकनी की छत में अपने आशियाना बनाने में मशगूल हो जाती। मैं मन ही मन बहुत खुश हुआ कि चलो  शायद गौरैया जिसके बारे में कहा जा रहा है कि विलुप्‍त होने वाली है अब कुछ बच्चों को  यहां जनेगी।

अब मेरी जिज्ञासा रोज बढ़ती। सुबह उठकर मेरा पहला काम उस घोंसले की तरफ देखना होता था। नीचे रखे गमले में मैं कुछ पानी भर देता। शायद इसमें से वह पानी पी लेगी। एक दिन तो मेरी खुशी सातवें आसमान पर थी। मैंने देखा गौरैया का छोटा सा बच्चा मुंह खोलकर चूं-चूं कर रहा है और उसकी मां इधर-उधर से कुछ लाकर उसके मुंह में डाल रही है। कई बार टुकड़ा बड़ा होता तो  नीचे गिर जाता। गौरैया फट से नीचे आती उस गिरे टुकड़े को उठाकर ले जाती और अपने बच्चे के मुंह में डाल देती। इस बार आश्चर्यजनक यह था कि मेरे वहां खड़े होने पर भी गौरैया डर के मारे भाग नहीं रही थी। मैं यह देखकर कुछ चावल के दाने और ले आया। मेरे सामने ही गौरैया उन दानों पर टूट पड़ी। मैंने फिर बालकनी का दरवाजा बंद किया और अपने काम में मगन हो गया। मन किया कि लखनऊ फोन करके बताऊं कि गौरैया ने एक घौंसला बनाया है। बालकनी की छत पर। उसका बच्चा भी हो गया है। शायद मेरी पत्नी बहुत प्रसन्न हो।  इसलिए कि अक्सर कबूतरों को  भगाने और उन्हें घोंसला नहीं बनाने देने को  आतुर एक चिडि़या का घोंसला देखकर कितना खुश हो  रहा है। लेकिन एक हफ्ते बाद वे लोग आ ही जाएंगे, फिर उन्हें सारा नजारा दिखाऊंगा, यह सोचकर मैंने फोन नहीं किया। कैमरा नहीं होने का दुख मुझे सालता रहा। मैं बालकनी बंद कर घर में आ गया और नहाने के बाद आफिस के लिए निकल गया। आफिस के रास्ते में अनेक मित्र मिले, मैंने सबसे गौरैया के घोंसले की बात बताई। किसी ने कहा, वाह कितनी अच्छी बात है। ज्यादातर ने यह कहा कि गौरैया का घोंसला बनाना तो बहुत शुभ होता है। इधर बच्चे के होमवर्क के लिए चिडि़यों के पंख एकत्र करने की बात मुझे याद आई। कबूतरों के तो अनगिनत पंख मेरे इर्द-गिर्द रहते हैं, कभी-कभार देसी मैना भी दिख जाती है। मैंने कहा, पंख एकत्र हो  ही जाएंगे। मेरे मन में इन दिनों रोज-रोज बढ़ते गौरैया के बच्चे को लेकर उत्सुकता बनी हुई थी। मैं कल्पना करता काश! यहीं गौरैया अपना स्थायी निवास बना ले। यह बच्चा हो, इसके बच्चे हों। कभी दूसरी गौरैया आए। इस तरह के तमाम खयाल मेरे मन में आते। गौरैया परिवार की चर्चा भी अक्सर अपने मित्रों से करता।

खैर एक दिन गौरैया के बच्चे को अपनी मां के मुंह से रोटी का छोटा-सा टुकड़ा खाता देख मैं आफिस चला गया। अगले दिन मैं किसी मित्र के यहां रात में रुक गया। उसकी अगली दोपहर घर पहुंचा तो  सबसे पहले बालकनी में पहुंचा। बालकनी में बच्चा जो  धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था उल्टा लटका हुआ था। वह अक्सर तब भी ऐसे ही लटकता दिखता था, जब उसकी मां उसे खाना खिलाती थी। मैं दो-चार मिनट तक उसे लगातार देखता रहा। मेरा दिल धक कर रहा था। उसमें कोई हरकत नहीं दिख रही थी। उसकी मां भी कहीं नहीं दिख रही थी। एक दिन पहले वहां डाले चावल के दानों में से कुछ किनारे पर पड़े हुए थे। मैं कुछ समझ नहीं पाया। मैंने कुर्सी लगाकर जोरदार तरीके से ताली बजाई। लेकिन बच्चे में कोई हरकत नहीं हुई। वह बस उसी अंदाज में उल्टा लटका हुआ था। मैंने गौर से देखा कि बच्चा मर चुका था। उसकी मां गायब थी। मैं अंदर आकर धम से बैठ गया। मन बहुत खिन्न हो  गया। कभी इधर जाता,  कभी इधर। पानी पीने को  भी मेरा मन नहीं हुआ। फिर बालकनी में गया, मरे हुए बच्चे का एक पंख नीचे गिर गया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि इस पंख को अपने बच्चे के होमवर्क के लिए सहेज कर रख लूं या उड़ जाने दूं।

 

हिंदी भारतीय भाषाओं को करीब लाने का सर्वोत्तम माध्‍यम : महापात्र

नई दिल्ली : हिंदी सिर्फ भाषा नहीं है, बल्कि भारतीय भाषाओं को करीब लाने का एक सर्वोत्तम माध्यम है। किसी कृति का हिंदी अनुवाद के बाद उसका अन्य भारतीय भाषा में अनुवाद आसान हो जाता है। यह बात ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता उडिय़ा कवि डा. सीताकांत महापात्र ने 24 जून, 2011 को दिल्‍ली सचिवालय में आयोजित हिंदी अकादमी, दिल्‍ली के सम्‍मान समारोह में कही। उन्‍होंने कहा कि भाषा केवल वर्णमाला की वस्तु नहीं हैं, बल्कि संस्कृति, सामाजिक इतिहास और समर्थ भाषा उच्च साहित्य को जन्म देती है।

कोशकार अरविंद कुमार को वर्ष 2010-11 के शलाका सम्‍मान से सम्‍मानित किया गया। इसके तहत दो लाख रुपये और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। उनके ऑनलाइन शब्दकोश ‘अरविंद लैक्सिकन’  को आज ही शुरू किया गया। उनके अलावा रमणिका गुप्ता को विशिष्ट योगदान सम्मान, कृष्ण शलभ को बाल साहित्य सम्मान, गिरधर राठी को काव्य सम्मान, देवेंद्र राज अंकुर को नाटक सम्मान, बृजमोहन बख्शी को ज्ञान प्रौद्योगिकी सम्मान और आलोक पुराणिक को हास्य व्यंग्य सम्मान दिया गया। प्रो. परमानंद श्रीवास्तव को गद्य विधा सम्मान दिया गया,  लेकिन वह स्वास्थ्य कारणों से कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके। अन्य सम्मान के रूप में 50-50 हजार रुपये और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया।

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा कि किसी भी अन्य राज्य की बजाय दिल्ली की हिंदी अकादमी अधिक सक्रिय हैं और पिछले कुछ सालों में इनका दायरा बढ़ गया है।
हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने कहा कि साहित्य जीवन की पुनर्स्‍थापना है। कार्यक्रम के अंत में दिल्ली सरकार की मंत्री किरण वालिया ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

आज मिलेगा शब्दों का अनोखा खजाना

नई दिल्‍ली: कोशकार अरविंद कुमार शब्‍दों का एक और अनोखा खजाना आज देने जा रहे हैं। 24 जून, 2011 की शाम को हिंदी अकादेमी दिल्ली की ओर से उन्‍हें सन् 2010-2011 का ‘शलाका सम्मान’ दिया जा रहा है। इस शुभ अवसर पर उनकी चिरप्रतीक्षित वेबसाइट ‘अरविंद लैक्सिकन’ ऑनलाइन हो रही है। इस पर शब्दों की खोज नि:शुल्‍क की जा सकेगी। साइट का पता है— http://arvindlexicon.com

वेबसाइट के दो मुख्य भाग हैं— एक ब्‍लॉग (Blog) और दूसरा लैक्सिकन (LEXICON)।

ब्लाग के प्रमुख आकर्षण हैं— अरविंद कुमार द्वारा लिखित भाषा संबंधी सारगर्भित लेख, तथा अन्य रचनाएँ। उनके द्वारा अनूदित कुछ क्लासिक कृतियाँ। जैसे- श्रीमद् भगवद् गीता, शैक्सपीयर कृत त्रासदी ‘जूलियस सीज़र’ का काव्यानुवाद,  ‘जूलियस सीज़र’ का भारतीयकरण ‘विक्रम सैंधव’, जर्मन महाकवि गोएथे के अमर क्लासिक ‘फ़ाउस्ट’ का अविकल काव्यानुवाद, अनेक पुस्तक और फ़िल्म समीक्षाएँ।

और शीघ्र ही अरविंद कुमार द्वारा लिखित हिंदी फ़िल्म इतिहास के शिलालेख सीरीज़ में ‘मदर इंडिया’, ‘मुग़ले आज़म’, ‘प्यासा’ जैसी अमर फ़िल्मों के उपन्यास से भी अधिक रोचक विवरण…। इनके साथ-साथ हिंदी-इंग्लिश वर्ड पावर बढ़ाने वाले वे असंख्य लेख जो ‘अहा ज़िंदगी’ में प्रकाशित हुए थे। या अब नए लिखे जा रहे हैं।

भारत और विदेशों में हिंदी या इंग्लिश भाषा शिक्षण संस्थानों, कालिजों, विश्वविद्यालयों आदि की सूचियाँ भी संकलित की जाएँगी।

लैक्सिकन के तीन संस्करण हैं। किसी भी संस्करण का लाभ उठाने के लिए अरविंद लैक्सिकन की वेबसाइट का सदस्य बनना (अपने को रजिस्टर करना) आवश्यक है।

निःशुल्क (FREE) यह संस्करण अरविंद लैक्सिकन परिवार के हर सदस्य को नि:शुल्क प्राप्य है। इसमें 8,500 आर्थी कोटियों के अंतर्गत 85,000 हिंदी और 73,000 इंग्लिश पर्याय और विपर्याय हैं। दैनिक जीवन में हरएक को इनकी ज़रूरत पड़ती है। इनकी सहायता से छात्र परीक्षाओं के लिए पर्याय याद कर सकते हैं और अध्यापक गण छात्रों से अभ्यास के ज़रिए उन की शब्दावली समृद्ध कर सकते हैं।

सशुल्क उच्चस्तरीय (PREMIUM)यह संस्करण मुख्यतः लेखकों, अनुवादकों और भाषाकर्मियों के लिए है। इन्हें अपने व्यावसायिक जीवन में सही शब्द की खोज नित्य प्रति पड़ती है। इस संस्करण में 20,000 आर्थी कोटियों के अंतर्गत 3,35.000 हिंदी और 3,00,000 इंग्लिश पर्याय और विपर्याय शब्द हैं।

पुस्तकालय (LIBRARY)जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि यह सर्वोच्च संस्करण पुस्तकालयों, ट्रांसलेशन एजेंसियों, विज्ञापन एजेंसियों, दूतावासों आदि के लिए है। इसमें 38,500 आर्थी कोटियों के अंतर्गत 5,20,000 हिंदी और 4,30,000 इंग्लिश पर्याय और विपर्याय हैं। यह एकल सदस्य को नहीं मिलेगा। कम से कम दस कंप्यूटरों पर स्वतंत्र उपयोगियों का होना आवश्यक है।

आम आदमी का काम नि:शुल्क संस्करण से भी चल जाएगा। उसे जीवन भर कोई शुल्क नहीं देना है। यह शब्द भंडार लगातार विकसित होता रहेगा, नए शब्द जुड़ते रहेंगे।

सपंर्क—
मीता लाल
कृते अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि.
ई-28 प्रथम तल, कालिंदी कालोनी, नई दिल्ली- 110065
lallmeeta@airtelmail.in

 

 

गौरैया का पुनर्वास : कान्तिकुमार जैन

सुबह-सुबह धूप में फुदकती-चहकती गौरैया अब अमूमन दिखाई नहीं पड़ती। यह नन्‍ही-सी चिड़िया दुर्लभ होती जा रही है। गौरैया को लेकर चर्चित संस्‍मरणकार कांतिकुमार जैन का संस्‍मरण-

बचपन में ही जिन पक्षियों से मेरी पहचान हो गई थी, उनमें गौरैया और कौआ प्रमुख हैं। मुझे गौरैया अच्छी लगती है। सहज, शालीन, निराभिमानी और प्रसन्न। वह कोई शोर नहीं करती, न जबरदस्ती स्वयं को आप पर लादती है। वह घरेलू पक्षी है- अहिंसक और शांतिप्रिय। दूसरों की भावनाओं का खयाल रखने वाला कौआ भी घरेलू पक्षी है, पर वह उद्घत और कर्कश है। आप उसका भरोसा नहीं कर सकते। कृष्ण नंद जब आंगन में खेल रहे हैं- माखन रोटी खाते हुए और कौए ने क्या किया ? ‘हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।’ यह आजकल की चेन स्नैचिंग की तरह का घटिया काम था। गौरैया ऐसा नहीं करती। कौआ बोलता भी तो कैसा है- कांव, कांव कर्कश। गौरैया मृदुभाषिणी है। बहुत हुआ तो चीं-चीं करेगी। अंग्रेजी में ‘टी वी टुट टुट।’ हिन्दी के प्रकृतिप्रेमी कवि सुमित्रानंदन पंत की चिड़िया ‘टी वी टुट टुट’ बोलती है। इन दिनों लोकप्रिय नेताओं और अभिनेताओं के जो ट्विटर छपते हैं, वे यही हैं ‘टी वी टुट टुट।’ कौआ किसी के सिर पर बैठ जाए तो बड़ा अपशगुन होता है। गौरैया के साथ ऐसा नहीं होता। वह तो दो वियोगियों को मिलाने वाला पक्षी है- जायसी ने गौरैया को प्रमाण पत्र दिया है – ‘जेहि मिलावै सोई गौरवा।’ गौरैया के लिए मेरे मन में बड़ा प्यार है।
बचपन में मैंने एक कहानी पड़ी थी। एक राजा की कहानी पर मुझे अब लगता है कि उस कहानी का शीर्षक होना चाहिए था- एक गौरैया की कहानी। गौरैया ने कैसे अपनी अक्ल और लगन से एक किसान की जान बचाई थी और राजकुमारी से उसका ब्याह  करवाया था। आप भी सुनें-
एक राजा था, कहानियां सुनने का बेहद शौकीन, पर उसकी एक शर्त होती थी, कहानी ऐसी हो, जो कभी खत्म न हो। यदि कहानी खत्म हो गई तो कहानी सुनाने वाले का सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। पर यदि कहानी ऐसी हो, जिसका कभी अंत ही न हो तो पुरस्कार भी बड़ा था। आधा राज्य और राजा की एकमात्र सुन्दर बेटी से विवाह। राज्य के और बाहर के भी अनेक प्रतिस्पर्धी आए। कोई एक रात कहानी कह पाया कोई दो रात। तीन-चार रातों तक कहानी सुनाने वाले भी आए, पर सबका अंत एक ही होता, सिर धड़ से अलग कर दिया जाता। पर आधे राज्य की और उससे बढ़कर राजकुमारी के पाणिग्रहण की संभावना इतनी आकर्षक थी कि लोग सिर हथेली पर रखे खींचे चले आते और बाजी हारकर प्राण गंवा बैठते।
राजा के राज्य में एक युवा किसान भी था। बड़ा विदग्ध, धैर्यवान, समझदार और चतुर। उसने एक रणनीति बनाई और चला आया राजा को कहानी सुनाने। लोगों ने लाख मना किया, पर वह युवक इतना आत्मविश्वास दीप्त था कि जैसे उसे पता हो इस पूरे प्रसंग का अंत क्या होगा? उसने कहानी शुरू की- एक था राजा। राजा ने टोका, तुमको कहानी की शर्त तो पता है न ! कहानी खत्म हुई कि तुम गए काम से। युवक ने राजा को शर्त के उत्तरार्ध की याद दिलाई। राजा ने हुंकारी भरी। युवक ने कहानी का सिरा पकड़ा-
एक था राजा । उसके राज्य की धरती बड़ी उर्वर थी। उसमें बहुत धान होता। राजा ने राज्य में बड़े-बड़े भंडार बनवा रखे थे। उन भंडारों में धान इकट्ठा की जाती। राज्य में सूखा पड़े, अकाल आए तो भी कोई भूखा न मरे। प्रजा तो प्रजा, उस राजा के राज्य में पशु-पक्षी भी बड़े सुखी थे। गौरैया तो जब चाहती, भंडार में आकर दाना ले जाती। एक दिन एक गौरैया आई और भंडार से एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। फिर एक चिड़िया और आई और एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। फिर एक चिड़िया और आई और एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। राजा इस फुर्र-फुर्र से उक्ता रहा था, बोला, ‘कहानी आगे बढ़ाओ।’ भावी दामाद बोला, ‘कैसे बढ़ाएं? राजा के राज्य में न धान की कमी थी, न गौरैयाओं की।’ उसने फिर फुर्र-फुर्र शुरू  की। एक रात बीती, दूसरी बीती, तीसरी के बाद चौथी आई। अब राजा को गुस्सा आ गया, कहानी आगे बढ़ा, नहीं तो तेरी गर्दन धड़ से अलग हो जाएगी। किसान चतुर था। उसने कहा शर्त तो यही है कि जब तक कहानी खत्म न हो, तब तक आप कुछ नहीं कर सकते। उसने फिर शुरू किया- एक गौरैया आई और एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। राजा को पसीना आ गया। समझ गया कि इस बार किसी चतुर आदमी से पाला पड़ा है। आखिर में हार कर राजा ने उस चतुर युवक को अपना आधा राज्य सौंप दिया और राजकुमारी के साथ उसके सात फेरे करवाए।

बचपन की यह कहानी मेरा पीछा नहीं छोड़ती। मैंने इस कहानी से यह सीखा कि आदमी में धैर्य हो और वह थोड़ी समझदारी से काम ले तो जीत उसी की होती है। उसके सहायक  भी भरोसे के होने चाहिए। गौरैया आदमी की सबसे अच्छी दोस्त है। वह संकट में आपका साथ देती है। चीन में वहां के नेताओं ने हरित क्रांति के फेर में एक  नारा दिया था- ‘एक गौरैया मारो और एक चवन्नी ले जाओ।’ एक चवन्नी के लालच में वहां की गौरैया की आबादी बहुत कम हो गई। फलस्वरूप खेती के दुश्मन  कृमि-कीटों की संख्या बढ़ गई। चीनी नेताओं को अपनी गलती समझ में आई। उन्होंने अपनी नीति बदली और देश में कृषि उत्पादन की वुद्घि के लिए उन्हें  गौरैयाओं का पुनर्वास करना पड़ा।
बचपन की प्यारी गौरैया का मैं कुछ भला कर सकूं, इसका मौका पिछले साल मुझे अनायास ही मिला। विगत वर्ष सितंबर-अक्टूबर की एक सुबह मैंने देखा कि मेरे घर की बैठक झड़ चुकी थी, फिर उसमें खिड़की के नीचे ये तिनके कहां से आए? पत्नी ने बताया कि ये तिनके उस घोंसले के हैं, जो गौरैया इन दिनों खिड़की की मच्छर जाली और कांच के बीच बना रही है। चिड़िया अपनी चोंच में एक तिनका दबाकर लाती और बड़ी जुगत से खिड़की की मच्छर जाली और कांच के बीच जमाती। उसका चिड़ा भी इस काम में उसकी मदद कर रहा था। मैंने कहा कि उसका घोंसला अलग करो, इससे बैठक की साफ-सफाई में दिक्कत होती है, पर पत्नी मुझसे सहमत नहीं हुई। पत्नी ने बताया कि पिछले साल चिड़िया ने़ अपना घोंसला सामने के  प्रवेश द्वार पर लगी चमेली में बनाया था, पर जब चमेली से आंगन में कचरा बढ़ने लगा तो चमेली का वितान अलग करना पड़ा था। वितान अलग हुआ तो गौरैया का घोंसला भी उजड़ गया। अब गौरैया दंपत्ति अपने आशियाने के लिए सुरक्षित स्थान की तलाश में था। लगता है उसे खिड़की के कांच और मच्छरजाली के बीच का ठिकाना सुरक्षित लगा। अब उसे उजाड़ना ठीक नहीं। घोंसला मिटेगा तो बेचारी के अंडे कहां होंगे? वह आसन्न प्रसवा है। फिर उसके चूजे कहां जाएंगे?
पत्नी गौरैया के मातृत्व को लेकर चिंतित थी। मुझे उसकी चिंता सही लगी। मुझे लगा सुरुचि और व्यवस्था के नाम पर किसी का घर-बार उजाड़ना ठीक नहीं। हमने उस साल घर की पुताई नहीं करवाई। पुतैया ने कहीं घोंसले को उखाड़ दिया तो, वहां कोई खतरा मोल नहीं लिया जा सकता।
एक दिन सबेरे हम लोग चाय पी रहे थे कि घोंसले से चीं-चीं की आवाजें आईं। गौरैया के अंडे फूट गए थे। मां प्रसन्न थी, पिताजी भी अपने पितृत्व की खुशी में फुदक-फुदककर नाच रहे थे। पत्नी ने आंगन में एक सकोरे में पानी भर दिया और मुरमुरे फैला दिए थे।
अम्माजी आतीं, चोंच में दाने समेटतीं और चूजों को दाना खिलातीं, उसे चोंच में भरकर पानी ले जाते भी हमने यह चोंचलेबाजी देखी। पर यह चोंचलेबाजी बहुत दिनों तक नहीं चली। चूजे बड़े हो गए, वे अपने पर खोलने लगे, घोंसले से बाहर उड़ने लगे, खुद दाने चुगने लगे और चोंच भी तर करने लगे। चिड़िया और चिड़े ने  उन्हें इस लायक बना दिया कि वे अपनी देखरेख स्वयं कर सकें।
एक दिन हमने देखा गौरैया का आशियाना खाली है। अब हमारी बैठक में तिनके नहीं गिरते। अब हम खिड़की के पल्ले खोलने लगे हैं। थोड़ी-सी संवेदना से हमने गौरैया की एक पीढ़ी को बचा लिया।
एक विस्थापित गौरैया का पुनर्वास कर हमें बड़ी खुशी हुई। पत्नी ने उसके बाद यह नियम ही बना लिया है कि वह रोज सबेरे आंगन में रखे सकोरे में पानी भर दे और नीचे मुरमुरे, कनक बिखेर दे। आओ गौरैया आओ, पानी पियो और दाना खाओ। आखिर तुमने एक युवा की जान बचाई और राजकुमारी से उसकी शादी करवाई थी। उस किसान का जो तुमने भला किया था, उसका प्रतिदान संभव नहीं है, पर तुम्हारे लिए हम जो भी थोड़ा-बहुत कर सकें, हमें करना चाहिए।



आरा में नागार्जुन की कविता जनता के बीच : सुधीर सुमन

तीन दिन से बारिश हो रही है। बादल बड़े प्रिय थे नागार्जुन को। बादल को हम घिरते हुए ही नहीं, बल्कि लगातार घेरा  डाले हुए देख रहे हैं। मौसम बदल गया है। आरा शहर में वार्ड पार्षद नगर निगम के गेट पर लगातार भ्रष्टाचार के सवाल पर धरना दिए हुए हैं, पूरे शहर की सफाई की मांग कर रहे हैं। बारिश होते ही नगर की नालियां सड़कों पर उमड़ पड़ी हैं। मुहल्लों में कीचड़ से होकर पहले भी गुजरना पड़ता था, आज भी गुजरना पड़ रहा है। बिजली तो वैसे भी किसी एहसान जताने वाले दोस्त की तरह आती है, जब तेज हवा के साथ बारिश हो, तब उसकी आंख-मिचैली देखने लायक होती है। मोबाइल भी पूरी तरह चार्ज नहीं हो पा रहा है। लेकिन गरमी से निजात मिली है, हरियाली से मन को सुकून मिल रहा है। बारिश अच्छी लग रही है, पर थोड़ी चिंता भी बढ़ रही है। 25 जून को  यहां के नागरी प्रचारिणी सभागार में बाबा नागार्जुन का जन्मशताब्दी समारोह होना है। पिछले साल 25-26 जून को समस्तीपुर और बाबा के गांव तरौनी से  समारोहों के सफर की जो शुरुआत हुई थी, उसकी मंजिल हमने भोजपुर ही तय की थी। समारोह की तैयारी बाधित हो रही है, क्या करें! कितना अच्छा होता कि बादल रात में बरस के चले जाते और दिन हमारे लिए छोड़ देते, मगर उनकी तो अपनी गति है, अपना चाल है, अपनी मर्जी है।
आज 20 जून है। आज से बाबा की कविताओं का नुक्कड़ों पर पाठ करना है। कल रविवार था। किसी भी आयोजन के लिए रविवार का दिन बड़ा अहम होना होता है। सहयोग जुटाने के लिए लोगों से मिलने जाइए, तो उनसे मुलाकात की संभावना रहती है। लेकिन रविवार की झमाझम बारिश, उसी में एक प्रेस कांफ्रेस। हम चाहते थे कि भोजपुर के  तमाम सांस्कृतिक संगठनों और स्वंतत्र लेखक-बुद्धिजीवी भी जनता को संबोधित करें, लेकिन बारिश में किस पर जोर डालें। हम आयोजक हैं, लिहाजा हमें तो किसी तरह पहुंचना ही था। अब बाबा की कविताओं को लेकर सीधे जनता के बीच जाना है और बारिश है कि होड़ लिए हुए है! दोपहर बाद तीन बजे का समय तय है, आरा रेलवे स्टेशन के परिसर में पहुंचना है।
अरे वाह! बारिश तो थम गई। रेलवे स्टेशन से करीब मैं ही हूं। अभी-अभी वरिष्ठ आलोचक रवींद्रनाथ राय का कॉल आया- ‘मैं घर से निकल रहा हूं।’ तीन तो  बज गए। पता नहीं, कोई आया है या नहीं, आएगा तो कॉल तो करेगा ही, लपककर निकल लूंगा, यही सोचकर मुख्य समारोह के आमंत्रण पत्र को लिफाफे में डालने में व्यस्त हो गया। अरे, साढ़े तीन बज गए, बारिश के कारण शुरुआत ही  गड़बड़ाएगी क्या! चलो चला जाए, शायद लोग थोड़ी देर में आएं। बैनर उठाया और चल दिया। स्टेशन पर भारी भीड है़, लग रहा है, देर से कोई ट्रेन नहीं आई। इतनी भीड़ में कौन कहां है, कैसे पता चले। अचानक किसी का हाथ कंधे पर पड़ता है। अरे, मुझसे भी पहले जसम, बिहार के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन हाजिर हैं, एकदम हमेशा समय पर पहुंचने के अपने रिकार्ड को बरकरार रखते हुए। बाकी लोग कहां हैं, भाई। मिस्ड कॉल मारता हूं। पांच मिनट हो गए, किसी ने पलटकर कॉल नहीं किया। ‘अरे यार तुम यहां क्या कर रहे हो, तुम्हें तो  नगर निगम के गेट पर होना चाहिए था’- अचानक सत्यदेव दिखाई पडत़े हैं, तो उनकी ओर लपकता हूं। छात्र राजनीति में रहे, हमलोगों के साथ नाटक भी किया। तो हम दो से तीन हो गए। और अब चार भी हो गए, दूर से ही नजर आने वाले हमारे लंबू साथी शमशाद प्रेम अपनी बाइक से उतरकर हमारी ओर आ रहे हैं। सबके पहुंचने के बाद पहुंचने के अपने रिकार्ड को उन्होंने ध्वस्त कर दिया। आखिरकार हमारे उत्साही साथी सुनील चौधरी भी आ गए। रवींद्रनाथ राय भी पहुंच गए। कवि सुमन कुमार सिंह कहां हैं, जल्दी बुलाइए भाई, बारिश थमी है, वर्ना फिर शुरू हो गई तो बड़ी मुश्किल होगी। सुमन तो स्कूल से घर गए होंगे, खाना खाकर चले होंगे। मोबाइल से बात होती है- ‘आ रहे हैं, रास्ते में हैं।’ आखिर वह भी आ गए, लेकिन उनके पीछे-पीछे बारिश की हल्की फुहार भी आई। हम सब प्लेटफार्म की ओर भागे। लेकिन पांच मिनट बाद ही वापस बाहर आ गए। बारिश ने हमें मोहलत दे दी। एक और शख्स का इंतजार है, उनकी नागार्जुन से मुलाकात हुई थी। कॉल करिए भाई, देखिए कहां हैं। सुनील बताते हैं- ‘स्वीच ऑफ है।’ तो चलिए शुरू किया जाए।
रेलवे स्टेशन परिसर में दो पेड़ों से बैनर को बांध दिया जाता है। थोड़ी देर विचार-विमर्श चलता है। नागार्जुन के किसी गीत से शुरुआत की जाए या उनके बारे में कुछ बताते हुए कविता पाठ का सिलसिला शुरू किया जाए। दूसरा तरीका ही अपनाया जाता है। सुनील संचालन शुरू करते हैं- ‘आज जबकि देश के हुक्मरान भ्रष्टाचार और लूट में डूबे हुए हैं और उसे बरकरार रखने के लिए हर किस्म की तिकड़म और दमन पर उतारू हैं, तब नागार्जुन जैसे जनकवि नए सिरे से प्रासंगिक लगने लगते हैं। इसी तिकड़म, भ्रष्टाचार और दमन के खिलाफ तो उन्होंने आजीवन लिखा।’ सुनील बोल रहे हैं, लोग धीरे-धीरे हमारे आस-पास जुट रहे हैं। सत्यदेव जन्मशताब्दी समारोह में लोगों के शामिल होने की अपील वाला पर्चा लोगों के बीच बांटने लगते हैं। इसी बीच वे पहुंच जाते हैं, जिनका हमें इंतजार था। माथे पर लाल पगड़ी बांधे, उघारे बदन, हाथ में एक छोटा डंडा लिए। थैला भी लाल रंग का। ये किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती के अनुयायी हैं, हमेशा इसी वेशभूषा में रहते हैं। अपने हर भाषण में वे  नागार्जुन की कविता- ‘किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है’ का बड़े प्रभावशाली अंदाज में इस्तेमाल करते हैं। किसान नेता आग्रेनंद चौधरी बोलना शुरू करते हैं, लोगों की तादाद बढ़ने लगती है। आग्रेनंद जी बताते हैं कि 1982 में पहली बार उनकी मुलाकात नागार्जुन जी से हुई थी। वे बताते हैं कि वे किसान-मजदूर के कवि थे और उन्हीं की तरह रहते थे। सचमुच जनता के कवि थे। हमारे इर्द-गिर्द जो जनसमूह मौजूद है, मानो उसके दुख-दर्द, उसके मन की बात, उसके ही अनुभवों को आग्रेनंद जी के भाषण में सामने आ रहा है, यह उनके चेहरे और प्रतिक्रियाओं से जाहिर हो रहा है। आग्रेनंद जी कहते हैं कि जितनी भी सरकारें हैं वे किसान विरोधी हैं। वे अमीरों और गरीबों के बीच भेदभाव को बढ़ा रही हैं। बाबा नागार्जुन ने इसी भेदभाव के खिलाफ लिखा था। जनता के इतने बड़े कवि के जन्म की सौंवी वर्षगांठ की याद सरकारों को नहीं आती। जनता के लिए वे जरूरी हैं, इसलिए वह उनको याद कर रही है। आग्रेनंद जी अपने छोटे-से वक्तव्य में भारत में व्यवस्थाजनित व्यवस्थाओं पर बड़े प्रभावशाली ढंग से सवाल उठाते हैं।
इस सिलसिले को प्रलेस, बिहार के राज्य उपाध्यक्ष रवींद्रनाथ राय आगे बढ़ाते हैं। बाबा को जनता का महान राजनीतिक कवि बताते हुए वे लोगों को याद दिलाते हैं कि नागार्जुन ने हमेशा भारतीय राजनीति के गरीब-विरोधी प्रवृत्तियों, परिवारवाद, मौकापरस्ती, लूट, भ्रष्टाचार और तानाशाही का विरोध किया। अपने वक्तव्य के अनुरूप ही वे बापू के बंदरों के कारनामों को लेकर लिखी गई नागार्जुन की कविता सुनाते हैं। भाषण तो हमने उनका प्रायः सुना है नुक्कड़ों और चौराहों पर, पर इतने प्रभावी ढंग से कविता का पाठ करते हुए पहली बार सुन रहे हैं।

सामने जनता है और रचनाकार जैसे अपने जकड़न को झाड़कर नए आवेग से खड़े हो रहे हैं। सुमन कुमार सिंह पाठ के लिहाज से एक कठिन कविता चुनते हैं- मंत्र और उसी पूरी ताकत से प्रस्तुत करते हैं। वे ध्यान दिलाते हैं कि बाबा हर तरह के पाखंड और छद्म के विरोधी थे। युवा कवि ओमप्रकाश मिश्र मानो नई पीढ़ी के रचनाकारों की तरफ से हिंदी कविता और समाज को आश्वासन देते हैं कि उसने अपनी प्रगतिशील-जनवादी परंपरा से नाता नहीं तोड़ा है, उसके प्रेरणास्रोत नागार्जुन जैसे कवि ही हैं। वे सुनाते हैं- जो नहीं हो सके  पूर्ण काम, मैं उनको करता हूं प्रणाम।
संचालक मुझे भी मौका देते हैं और मैं मेहनतकश जनता के राष्ट्र निर्माण के लिए इंकलाब का सपना देखने वाले इस कवि की मशहूर कविता ‘भोजपुर’ सुनाता हूं।
जसम, बिहार के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन नागार्जुन पर केंद्रित अपनी कविता सुनाते हैं, जिसमें उनकी कई रचनाओं के पात्रों का नाम भी आता है। गुंजन जी उनको हमारे वर्तमान दौर के लिए बेहद प्रासंगिक कवि बताते हैं।
हम सब लगातार लोगों से अपील करते हैं कि वे 25 जून को बाबा नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह में ज्यादा से ज्यादा संख्या में शामिल हों। कोई माइक और लाउडस्पीकर नहीं है, पूरी ताकत से बोलना पड़ता है। उसी ऊंची पिच पर कविता का पाठ भी किया गया। बीच-बीच में रेलवे की उद्घोषणाएं भी होती रहीं, लेकिन कोई बाधा कविता और जनता के बीच के रिश्ते के आड़े नहीं आ पाई।
कविता पाठ अपनी मंजिल पर पहुंचता है और बादलों द्वारा तय समय सीमा मानो खत्म होती है। मेघ बज नहीं रहे, बरस रहे हैं। ‘अलाव’ पत्रिका में छपे एक सज्जन का लेख की याद हो आती है, जिसमें उन्होंने साबित करने की कोशिश की है कि नागार्जुन जनकवि होने पर बार-बार जोर देते हैं, पर वे जनकवि नहीं हैं। सवाल तो यह भी है कि वे किस तरह के जनकवि हैं। अगर ऐसी परिस्थितियां हैं जो जनता को उसके लिए हितकर कविता से दूर करती हैं, तो मामला तो उन परिस्थितियों को बदलने का और उस कविता को जनता तक ले जाने का भी है। लौटते वक्त एक पढ़े-लिखे परिचित मित्र धीरे से बताते हैं कि इतनी बार ‘किसकी जनवरी है किसका अगस्त है’ सुना है, पर नहीं पता था कि यह नागार्जुन का लिखा हुआ है।
कविता पाठ सफल रहा, पर अभी बहुत कुछ करना है। समारोह के लिए जो धन जुटा है, वह अभी बिल्कुल अपर्याप्त लग रहा है। सारे लोग सोच रहे हैं कि और सहयोग कैसे जुटाया जाए। कल से सीधे लोगों के बीच चंदे का डब्बा लेकर जाना है और हर छोटा-बड़ा सहयोग जुटाना है। जनता के कवि के लिए समारोह तो जनसहयोग से ही होगा। हमारे लिए यह कोई रस्मी आयोजन नहीं है। बेशक मौका बाबा के जन्मशताब्दी वर्ष के समापन का है। मगर हमारा मकसद तो जनता की कविता को जनता तक ले जाना है। इस दिशा में मिली हर सफलता हमारे लिए सार्थकता है। अखबार हमारे इस अभियान को महत्व दे रहे हैं, यह सुखद लग रहा है। पिछले दो तीन दिन से लगातार जन्मशताब्दी समारोह की खबरें अखबारों में आ रही हैं। आखिर बाबा सिर्फ जन संस्कृति मंच के तो हैं नहीं, वे तो सबके हैं, उन सबके जो इस व्यवस्था से असंतुष्ट हैं, जो इस देश और देश की मेहनतकश जनता की जिंदगी को बेहतर बनाना चाहते हैं, जिन्हें इस धरती से सचमुच प्यार है। पहलकदमी जरूर जसम की है, लेकिन भोजपुर में यह आयोजन जनता का अपना आयोजन बन जाए, इसके लिए हम सब प्रयासरत हैं। हम तो चाहते हैं कि अखबार खुद बाबा नागार्जुन के महत्व पर अपनी ओर से कुछ दें, उनके जमाने के लोगों के संस्मरणों को प्रकाशित करें, उनकी प्रासंगिकता पर परिचर्चा करवाएं। हमें तो जो करना है, अपनी क्षमता अनुसार कर ही रहे हैं।

भोजपुर में नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह 25 को

आरा : जनकवि नागार्जुन के गांव तरौनी, दरभंगा से 26 जून 2010 को उनके जन्मशताब्दी समारोहों के आयोजन का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसका समापन 25 जून 2011 को नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा, भोजपुर में हो रहा है। यह भोजपुर के साहित्यकार, संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों के साथ-साथ आम जनता के लिए भी गर्व की बात है। दरअसल बाबा नागार्जुन का भोजपुर के सांस्कृतिक जगत और जनांदोलनों से गहरा संबंध था। साठ के दशक में आलोचक चंद्रभूषण तिवारी और उनके साथियों के सहयोग से बनाए गए पूर्वांचल संस्था के वह अध्यक्ष थे। बिहार में जनांदोलनों के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा था। एक बार वे बक्सर जेल में बंद किए गए थे।
बाबा ने मिथिलांचल में जन्म लिया था, पर पूरा देश उनके घर की तरह था। देश के विभिन्न इलाकों के साहित्याकारों और सामान्य जनता के पास उनसे जुड़ी बेहद आत्मीय और अंतरंग स्मृतियां हैं, पर भोजपुर से उनका खास लगाव था। यहां की क्रांतिकारी पंरपरा मानो उनके मिजाज में घुली हुई थी।  जुल्म और गैरबराबरी के रस्मो-रिवाज और शासकवर्ग के दमन-शोषण-उत्पीड़न का मुखर विरोध करने की जो उनकी प्रवृत्ति थी, वह भी उन्हें भोजपुर की माटी से जोड़ती थी। कभी हार न मानने वाली और बार-बार नए सिरे से संघर्ष के लिए उठ खड़े होने वाली जनता को वह बड़ी उम्मीद से देखते थे। इसी उम्मीद में वे संपूर्ण क्रांति आंदोलन में शामिल हुए, जिसमें भोजपुर के नौजवानों की भी अहम भूमिका थी, लेकिन वे जानते थे कि क्रांति सिर्फ सुगबुगाई है। जैसे ही संपूर्ण क्रांति संपूर्ण भ्रांति में तब्दील होती प्रतीत हुई, वे उससे बाहर आ गए। लेकिन किसी प्रयोग के असफल होने या उसकी गड़बडि़यों को लेकर पस्त और निराश होने वाले कवि वे नहीं थे। आपातकाल और 1977 में बेलछी जनसंहार के बाद के वर्षों में लिखी गई अपनी दो कविताओं- ‘हरिजन गाथा’ और ‘भोजपुर’ में उन्होंने भोजपुर के किसान आंदोलन को नई उम्मीद से देखा। भगतसिंह ने अपने बहुचर्चित लेख में जिस दलित समुदाय को असली सर्वहारा कहा था, उनके राजनीतिक उभार की संभावना की ओर नागार्जुन ने ‘हरिजन गाथा’ कविता में स्पष्ट संकेत किया। बेशक इस संघर्ष ने भोजपुर को गैरजनतांत्रिक सामंती मूल्यों के खिलाफ एक नए जनवादी समाज के निर्माण के संघर्ष भूमि के रूप में देश-दुनिया में मशहूर कर दिया। बाबा नागार्जुन ही नहीं, बल्कि दूसरे लेखकों की रचनाओं में भी भोजपुर का संघर्ष मानवीय प्रगति के इतिहास के एक अहम दौर की तरह दर्ज हुआ।
बाबा नागार्जुन की चेतना में 1970 और 1980 का भोजपुर हमेशा के लिए पैवस्त रहा। ‘हरिजन गाथा’ में भोजपुर के आंदोलन की छाया साफ तौर पर दिखती है। उस दलित सर्वहारा नायक और उसकी राजनीति के बारे में लिखी गईं कुछ पंक्तियां देखने लायक है-
समझ-बूझकर ही समता का
असली मुद्दा पहचानेगा
अरे देखना इसके डर से
थर-थर कांपेंगे हत्यारे
चोर-उचक्के-गुंडे-डाकू
सभी फिरेंगे मारे-मारे
इसकी अपनी पार्टी होगी
इसका अपना ही दल होगा….
श्याम सलोना यह अछूत शिशु
हम सबका उद्धार करेगा
आज यही संपूर्ण क्रांति का
बेड़ा सचमुच पार करेगा
हिंसा और अहिंसा दोनों
बहनें इसको प्यार करेंगी
इसके आगे आपस में वे
कभी नहीं तकरार करेंगी।
अंतिम चार पंक्तियां गौर करने लायक है, जो इसका स्पष्ट संकेत करती हैं कि बाबा के लिए संघर्ष के रूपों का मामला उतना महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि जनता की राजनीतिक मुक्ति, सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में बदलाव यानी संपूर्ण क्रांति उनका मकसद था, और उसके लिए संघर्ष के सारे रूप उन्हें मंजूर थे। यही मकसद उन्हें भगतसिंह और उनके साथियों से जोड़ता था। और भोजपुर ने उन्हें इसलिए भी आकर्षित किया कि यहां उन्हें भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद के प्रतिरूप दिखाई पड़े, भूमिपुत्रों का संग्रामी तेवर दिखाई पड़ा, जिसका उन्होंने ‘भोजपुर’ कविता में आह्लाद से स्वागत किया और खुद अपने जनकवि समेत सबको इससे जुड़ने का आह्वान किया।
बाबा नागार्जुन ने अपनी लेखनी से भोजपुर को अपूर्व गौरव प्रदान किया और साहित्य के इतिहास में हमेशा के लिए उसे गरिमापूर्ण जगह दी, इस नाते भी भोजपुरवासियों द्वारा उन्हें उनकी जन्मशताब्दी पर याद करने का खास अर्थ है। समारोह में ‘भोजपुर’ कविता और नागार्जुन का जीवन-स्वप्न पर समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय अपना वक्तव्य देंगे।
यह साल भारतीय उपमहाद्वीप में प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन के 75 साल पूरा होने का भी साल है। बाबा नागार्जुन शुरू से लेकर जीवनपर्यंत इस प्रगतिशील-जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन के साथ थे। वे इस सांस्कृतिक आंदोलन के बहुत बड़े जनकवि हैं। प्रगतिशील आंदोलन में उनकी भूमिका पर जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण अपना वक्तव्य देंगे। बाबा ने कई महत्वपूर्ण उपन्यास भी लिखे। उनकी कविता, कहानी और उपन्यास पर चंद्रेश्‍वर, प्रो. नंदकिशोर नंदन, सुरेंद्र प्रसाद सुमन समेत कई विद्वान विचार रखेंगे। बाबा का रचनाकर्म जनांदोलनों के साथ साहित्य के अटूट रिश्ते की बानगी है। इस संबंध में कवि मदन कश्यप, रामायण राम, संतोष सहर आदि वक्तव्य देंगे। समारोह में बाबा की महत्वपूर्ण कविताओं को साहित्यकार पढ़ेंगे। साथ ही मदन कश्यप, चंद्रेश्‍वर समेत स्थानीय कवियों का कविता पाठ भी होगा।
बाबा ने अपनी एक कविता में कहा था-
जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं
जनकवि हूं साफ कहूगा, क्यों हकलाऊं।
दरअसल ऐसी साफगोई और बेबाकी, ऐसी जनपक्षधरता आज पहले से भी ज्यादा जरूरी है। बाबा नागार्जुन पर आरा में आयोजित समारोह कोई रस्मी आयोजन भर नहीं है, बल्कि इसका मकसद यह है कि बाबा की परंपरा को आगे बढ़ाया जाए, बाबा के रचनात्मक मकसद को समझा जाए और उनके अधूरे स्वप्न को साकार करने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाए। इसलिए भी समारोह में ज्यादा से ज्यादा आम लोगों की भागीदारी की कोशिश की जा रही है। बाबा जनता के कवि थे, साहित्य के जनरूपों का उन्होंने इस्तेमाल किया था। इसलिए मुख्य समारोह से पहले कुछ नुक्कड़ों पर उनकी कविताओं का पाठ भी किया जाएगा। सोमवार 20 जून को शाम में रेलवे स्टेशन परिसर, 22 जून को गड़हनी तथा 23 जून को वीर कुंवर सिंह पार्क के सामने बाबा की चुनिंदा कविताओं का जनता के समक्ष पाठ किया जाएगा। इस बीच समारोह से संबंधित बैनर और फेस्टून लगाने का काम शुरू हो चुका है।
भारी बारिश के बावजूद आज (19जून, 2011) जसम की प्रेस कांफ्रेंस ज्ञानपीठ पब्लिक स्कूल में हुई, जिसमें जसम के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन, जनमत संपादक सुधीर सुमन, राष्ट्रीय पार्षद सुनील चौधरी और कवि सुमन कुमार सिंह मौजूद थे।

समारोह तैयारी समिति की ओर से सुधीर सुमन द्वारा जारी

नागार्जुन सर्वश्रेष्‍ठ जनकवि : नामव‍र सिंह

नई दिल्‍ली : नागार्जुन जैसा प्रयोगधर्मा कवि कम ही देखने को मिलता है, चाहे वे  प्रयोग लय के हों,  छंद के हों, विषयवस्तु के हों। यह बात वरिष्‍ठ आलोचक नामवर सिंह ने 15 जून को त्रिवेणी सभागार में आयोजित नागार्जुन जन्‍मशती उत्‍सव में कही। इसका आयोजन जनवादी लेखक संघ, सहमत, जन नाट्य मंच  और एक्ट वन के संयुक्त रूप से किया। नामवर सिंह ने कहा कि हिंदी , मैथिली, संस्कृत और बांग्ला भाषाओं पर समान अधिकार रखने वाले नागार्जुन ने जब भी लिखा, जो भी लिखा, सहज- सरल भाषा में लिखा और आम आदमी के लिए लिखा। उनकी यही विशेषता उन्हें सर्वश्रेष्ठ जनकवि का दर्जा दिलाती है। वह सच्चे अर्थों में जनकवि थे।

जलेस के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह  ने कहा कि आज के दौर के भयंकर संकट के क्षणों में जनकवि नागार्जुन का कृतित्व नये रचनाकारों के लिए प्रेरणादायी है, अंधकार में मशाल की तरह है। इसके बाद नागार्जुन की तीन कविताओं, ‘लाल भवानी’, ‘लाजवंती’ व ‘शासन की बंदूक’ को संगीतात्मक समूहगान के रूप में प्रस्तुत किया गया।

इस अवसर पर ‘नया पथ’ के नागार्जुन जन्मशती विशेषांक के लोकार्पण किया गया। परिचर्चा सत्र में शिवकुमार मिश्र ने नागार्जुन के जीवन संघर्षों और उनके बहुआयामी रचनाकर्म को उनकी कविताओं के अर्थ खोलते हुए पेश किया। राजेश जोशी ने कहा कि नागार्जुन की कविताएं 1936 से 1998 तक के इतिहास की विविध करवटों की गवाह हैं। बाबा के मैग्नीफाइंग ग्लास और ट्रांजिस्टर का जिक्र करते हुए उनकी प्रतीकात्मकता को रेखांकित किया।

आयोजन की सबसे आकर्षक विशिष्टता नागार्जुन की कविताओं को दृश्य-श्रव्य कलारूपों के माध्यम से शास्त्रीय संगीत गायिका अंजना पुरी और सूफी संगीत गायक मदनगोपाल सिंह की प्रस्‍तुतियां रहीं। बीच-बीच में  नागार्जुन की कविताओं का पाठ जुबैर रज़वी, मैत्रेयी पुष्पा, लीलाधर मंडलोई, दिनेश कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल और अशोक तिवारी ने किया। एन.एस.डी. के रंगकर्मी केशव के निर्देशन में ‘बिगुल’ नाट्य ग्रुप ने बाबा की कविताओं का एक नाट्य-कोलाज पेश किया जिसकी सात कडि़या थीं और यह एक अनोखा प्रयोग था। अंत में नागार्जुन की कविता ‘मेघ बजे’ को शास्त्रीय संगीत की बंदिश में जन नाट्य मंच(कुरुक्षेत्र) के कलाकारों ने पेश किया। कार्यक्रम का संचालन जलेस के महासचिव, चंचल चौहान ने किया।

 

वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब-जालिब कहता था : मृत्‍युंजय

पाकिस्‍तान के अवाम के शायर हबीब जालिब पर युवा कवि मृत्‍युंजय का आलेख और उनकी कुछ रचनाएं-

“वली दकनी से लगाय आज तलक, सुनने वालों की इतनी बड़ी ज़मात का शायर पैदा नहीं हुआ। वे हकीकतन अवाम के शायर  हैं।”- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
एजाज़ अहमद साहब ने पाकिस्तान के उपरले तबकों के बीच चल रहे सियासी दाव-पेंचों को बखूबी दिखाने के नाते सलमान रश्दी के बहुचर्चित उपन्यास ‘शरम’ की तारीफ़ की है। बात तो सच है, पर मुझे तो इस उपन्यास को पढ़ने के दौरान पाकिस्तान की आम-अवाम का ख्याल आया, जिनकी ज़म्हूरियत की ख्वाहिश पर अयूब,  भुट्टो और जिया से लेकर आज तक के हुक्मरां कहर की तरह नाजिल हैं। उपन्यास में आम-अवाम हाशिये पर भी नहीं है और मैं इसकी मांग करने की बेवकूफी भी नहीं करूंगा। पर यह सवाल तो मौजूं है ही क़ि पाकिस्तानी आम-अवाम की जुबान आखिर है कहाँ? साहित्य जगत में उसकी तरफ से कौन बोलता है? हुक्मरानों के सियासी सवालों के जवाब कौन देता है? बिलाशक हबीब जालिब।
हबीब जालिब मैट्रिक में थे जब देश तक्सीम हुआ। वालिद सूफी इनायतुल्लाह खुद पंजाबी के शायर थे। तक्सीम में जालिब वालिदैन के साथ पाकिस्तान आये। यहाँ जालिब ने कुछ वक्त ‘डेली इमरोज़द’ में प्रूफ रीडरी की और फिर कविता के पूरावक्ती कार्यकर्ता बन गए। मार्क्सवादी-लेनिनवादी जालिब पहले पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे, पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा और उसने नेशनल अवामी पार्टी के नाम से काम करना शुरू किया। जालिब अपनी पूरी शिद्दत से इस आन्दोलन में शरीक हो गए। उन्होंने अपना मोर्चा चुन लिया था- कविता का मोर्चा। 1956 में उनका पहला दीवान साया हुआ- ‘बुर्ज ए आवारा’। बाद के तीन संग्रहों अलग-अलग निजामों के दौर में ज़ब्त हुए- ‘ज़िक्र बहते खून का’, ‘गुम्बद ए बेदर’, और ‘सर ए मक्तल’। पाकिस्तान जैसे तानाशाहियों के मारे  अभागे मुल्क में अगर आप प्रतिरोध का परचम उठाते हैं तो जेल जाने से आपको खुदा भी नहीं बचा सकता। इसी मोर्चे पर लड़ते- भिड़ते जालिब बार-बार जेल गए, लगभग सभी हुक्मरानों ने उन्हें इस सम्मान से नवाज़ा। ज़रा उनकी  गिरफ्तारियों के सालों पर नज़र डालिए- 1954, 1964 , 1966, 1973, 1976, 1984  और 1985। सुनते हैं क़ि जालिब साहब के बदन पर पाकिस्तानी निज़ाम की लाठियों के नीलगूं नक्श हमेशा ही दर्ज रहा करते थे। उनकी बिटिया के एक इंटरव्यू से शब्द उधार लें तो ‘अब्बा तकरीबन तीस साल जेल में रहे। आधी उमर जेल में और आधी अस्पताल में।’ यों हेमिंग्वे के कालजयी उपन्यास ‘ओल्ड मैं एंड द सी’ की इस बात को जालिब ने मजबूती से दर्ज किया कि आदमी को मारा जा सकता है, पर उसे हराया नहीं जा सकता।
हुक्मरान चाहे जिस रंग के रहे हों,  हुक्मरानों के बरक्स प्रतिरोध की आवाज़ बुलंद की हबीब जालिब ने। पाकिस्तान में ज़नरल अयूब खान ने जब नया फौजी संविधान बनाया, तो हबीब जालिब ने लिखा- दीप जिसका महल्लात ही में जले/ चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले/ वो जो साए में हर मसलहत के पले/ ऐसे दस्तूर को, सुबहे बेनूर को/ मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता।यह नज़्म पाकिस्तान में ज़म्हूरियत का अकीदा है। जन विरोधी कानूनों, जिनसे की आज हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और बांग्लादेश, तीनों मुल्कों की अवाम जूझ रही है, के खिलाफ यह नज़्म आज भी उतनी ही मौजूं है। तीनों मुल्कों की सरकारें संविधान को आम-अवाम के खिलाफ खड़ा करने के लिए दृढ-संकल्प रहती हैं। जालिब लोकतंत्र  के सवाल को बहुत ही जमीनी सच्चाइयों से जोड़ देते हैं और तीसरी दुनिया की अवाम की आवाज़ से आवाज़ मिलाते हुए हुक्मरानों और अवाम की दो दुनियायों में से अपना पक्ष चुनते हैं।
हबीब जालिब के शब्दकोश से शक और वहम तब गायब हो जाता है जब वे सियासतदारों से बात करते हैं। गहरे आत्मविश्वास के रथ पर सवार बेख़ौफ़ गूंजती हुई आवाज। इस रथ में ईमान के पहिये हैं, सत्य की पताका है, आन्दोलनों के घोड़े हैं, विचारधारा का चाबुक है, अभय सारथी है और गद्दीनशीनों की हकीकत समझने की कूबत का वेग। ज़रा इस आवाज में यह बेख़ौफ़ टिप्पणी सुनिए- अगर मैं फिरंगी का दरबान होता/ तो जीना किस कदर आसान होता/ मेरे बच्चे भी अमरीका में पढ़ते/ हर गर्मीं में इंगलिश्तान होता/ मेरे बच्चे भी अमरीका में पढ़ते/ हर गर्मीं में मैं इंगलिस्तान होता/ मेरी इंग्लिश भी बला की चुस्त होती/ बला से जो न मैं उर्दूदान होता/ सर झुका के जो हो जाता सर मैं/तो लीडर भी अजीमुस्सान होता/ज़मीनें मेरी हर सूबे में होतीं/मैं वल्लाह सदरे पाकिस्तान होता।लेकिन अवाम से बातचीत करते हुए उनकी आवाज करुणा से भर जाती है और तीखी शैली समझाने-बुझाने में बदल जाती है- छलनी हैं कलियों के सीने खून में लतपत पात/ और न जाने कब तक होगी अश्कों की बरसात/ दुनियावालों कब बीतेंगे दुख के ये दिन रात/ख़ून से होली खेल रहे हैं धरती के बलवान/बगिया लहू लुहान,जैसी नज्मों से गुजरते हुए अपनी पैदाइश से ही कत्लो-गारत झेलते मुल्क की पुरनम आँखें हमारे जिगर में पैवस्त हो जाती हैं।
तक्सीम ने जालिब के मन में गहरे घाव किये थे। फ़ैज़ की ही तरह उनकी शायरी में भी तक्सीम बेहद दुखभरी याद है। न सिर्फ हिन्दुस्तान-पाकिस्तान, बल्कि पाकिस्तान-बांग्लादेश का बंटवारा भी पाकिस्तानी अवाम की किस्मत में बदा था। अपनी ‘जाग मेरे पंजाब’ वाली नज़्म में जालिब बंटवारे के अगले चरणों को रोकने के लिए पंजाब की अवाम को आवाज़ देते हुए बताते है कि हुक्मरानों के ‘इसी चलन से हमसे अलग बंगाल हुआ’। आगे एक शेर में कश्मीर के बारे में वे लिखते हैं-ये जमीं तो हसीन है बेहद/ हुक्मरानों की नीयतें हैं बद हबीब जालिब एक मुश्तरका तहजीब का नाम है। प्रतिरोध की तहजीब। पाकिस्तान के इतिहास में सियासी विपक्ष बार-बार न सिर्फ कमजोर पड़ा बल्कि कई बार तो सिरे से उखाड़ फेंका गया। ऐसे में जालिब की शायरी सियासी विपक्ष की जगह ले लेती  है। यह अनायास नहीं कि लगभग हर दौर के निजामों ने, चाहे वे तानाशाह हों  या भुट्टो जैसे तथाकथित जम्हूरियतपसंद, उनकी मुठभेड़ जालिब की शायरी से हुई। नतीजे में जालिब जेल जाते रहे। और उन्हीं के शब्दों में ‘आमिरों के जो गीत गाते रहे/वही इनामो-दाद पाते रहे’।
तंज़, जालिब की शायरी की खूबसूरती है। पर इस व्यंग्य में हंसी से बेहद  कम है। यह आंसुओं से लथपथ व्यंग्य है। जनता में शामिल जालिब बार-बार उसकी  हकीकतों और सपनों के बीच की आसमान जैसी खाई के अंतर को बुझी-बुझी आँखों से देखते हैं। जनता, जिसे सदियों से अपने लिए ज़म्हूरियत की तलाश है, जो चंद ताकतवर लोगों की कठपुतली की तरह इस्तेमाल की जाती रही है। दूसरी तरफ पाकिस्तानी शासक है, लाशों और खून के अम्बार पर मुस्कुराते हुक्मरां हो गए कमीने लोग।  अपनी प्यारी मातृभूमि और अवाम के हालात एक कवि के लिए भयानक हैं। वह क्या करे? फ़ैज़ साहब ने एक रास्ता लिया, करुणा का और उसमें से उभरते प्रतिरोध का। जालिब ने अपने लिए करुणा से उबरते व्यंग्य का रास्ता चुना। यह व्यंग्य कोई शैली भर नहीं है। गहरी राजनीतिक समझ की सान पर पैनी हो जनता की यह आवाज ‘स्रवन द्वार ह्वै संचरै, बेधै सकल शरीर’ की तासीर पैदा करती है। पाकिस्तानी हुकूमतों के खौफ़ का तसव्वुर किये बगैर इस व्यंग्य की गहराई समझनी मुश्किल है। और तब तानाशाही की लम्बे चलन वाले मुल्क में जालिब सड़कों पर अपने हज़ारों समर्थकों के साथ चीख पड़ते हैं- बिरसे में हमें जो ग़म है मिला, उस ग़म को नया क्या लिखना
जालिब की आवाज में एक ख़ास जादू है। गहरी बेचैनी से भरी मीठी आवाज में उनकी शायरी अपने हर सुनने वाले से सीधे संवाद करती है, उनके दिल में उतरती चली जाती है। इसलिए भी जालिब जैसे शायरों पर लिखना बेहद मुश्किल काम है  क्योंकि उनकी शायरी और अवाम के बीच फासला लगभग न के बराबर है। शुरुआत से ही  कविता मूलतः सुनने की विधा रही आयी है। सीधे अपनी अवाम से बात करने के लिए, उससे मुखातिब शायर को इस फ़न की जरूरत है। जालिब ने कविता के इस मूल  गुण को पकड़ा और अवाम से सीधे संबोधित हुए।  फ़ैज़ साहब चाहे अपने कलाम बहुत अच्छी तरह न पढ़ते रहे हों,  इससे कौन इनकार करेगा क़ि  हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के तमाम फनकारों ने उनके कलाम को लोगों को सुनाया और समझ बढ़ाई।
जालिब ने कभी-कभार फिल्मों के लिए भी गीत लिखे पर उन गीतों में भी जालिब की ख़ास बेचैनी की मुहर लगी होती। इस सिलसिले में ‘ज़रक़ा’ फिल्म का एक गीत मौजूं  है, मेहदी हसन साहब ने इसे आवाज़ दी है- तू कि नावाकिफे-आदाबे-गुलामी है अभी/रक्स जंजीर पहन कर भी किया जाता है। प्रसंग यह कि नीलू नाम की अभिनेत्री को पश्चिमी पाकिस्तान के गवर्नर, कालाबाघ के नवाब अमीर मोहम्मद खान ने अपने विदेशी मेहमानों के सामने रक्स करने के लिए बुलवाया। नीलू ने आने से मना किया तो पुलिस पहुँची। नीलू के सामने मुश्किलें बढ़ती गयीं और इस सबके नतीजतन आखिरकार उस खुद्दार महिला ने  खुदकुशी की कोशिश की। इसी घटना पर यह नज़्म जालिब ने लिखी थी।
हबीब जालिब का कहा हुआ पहला शेर गौर फरमाएं- ‘वादा किया था आयेंगें इन शब जरूर वो/वादाशिकन को देखते वक्ते सहर हुआ’। यह उर्दू शायरी की खासियत है क़ि वह इंसानी जज्बातों और रिश्तों के नाज़ुक पेंचो-ख़म के मुहाविरे को इतना फैला देती है क़ि बड़ी-बड़ी घटनाएं और कौमी तजुर्बे शायरी में घुल-मिल जाते हैं। शायरी की यह रवायत उर्दू शायरी की जान है। ग़ालिब के एक शेर के मार्फ़त बात थोड़ी और साफ़ करने की कोशिश करता हूं। ग़ालिब, दो दुनियाओं के बीच खड़े थे. संक्रमण का दौर. अंग्रेज आ रहे थे और देशी निज़ाम ढह रहा था. ग़ालिब की तरफदारी कोई साफ़ न थी। ऐसे में शेर में  बंधीं इस उपमा को देखिये- ‘चलता हूं थोड़ी दूर हर एक तेज रौ के साथ/ पहचानता नहीं हूं अभी राहबर को मैं’। फ़ैज़ हों या जालिब, यह अर्थ-संभावनाएं इन सभी कवियों को विरासत में मिलीं। इश्क के कभी पुराने न पड़ने  वाले मुहाविरे में लिखे गए जालिब के ऊपर के शेर के वादा शब्द को ज़रा उनकी काफी बाद की  ग़ज़ल के एक शेर के ‘वादे’ के संग मिलाकर पढ़िए- या वादा था हाकिम का/या अखबारी कालम था। यहां ‘वादा’ शब्द की अर्थ छवियाँ माशूक के वादे की याद दिलाती तो हैं, पर उसका बहुत बेहतरीन रूपांतर अपने ही मुल्क की सियासत की वादाफरोशी के लिए कर लिया गया है। अर्थ के रूपांतरण की इस गली में बात थोड़ी और आगे तक जाती है क़ि माशूक जालिम होता आया है। सियासतदान भी जालिम  हैं। पर ‘वादे’ के माशूक वाले अर्थ में माशूक से इश्क ही असली बात है। जालिब इस अर्थ के एक ही हिस्से को अपनाते हैं क़ि सियासतदान इसी मुल्क के  हैं पर उनसे इश्क की बात को पलट देते हैं। वह ऐसा कैसे कर पाते हैं ? इसके लिए वे तंज़ का सहारा लेते हैं। पूरी ग़ज़ल, जिसका शेर ऊपर दर्ज है, जनरल जिया के समय हुए जनमत-संग्रह का मज़ाक उड़ाते हुई कही गई है- ‘शहर में हू का आलम था, जिन था या रिफरेंडम था’। ज्यों-ज्यों आप ग़ज़ल पढ़ते जाते हैं, तानाशाह पर तंज़ और जनता के प्रति करुणा का एक विस्तार खुलता जाता है। इस संरचना से गुजरते हुए जब  आखिर में वादा’ वाला शेर आता है, तब तक पाठक सत्ता की कारगुजारियों से खूब वाकिफ हो चुका होता है। अब ‘वादा’ को मनचाहे अर्थ में इस्तेमाल किया जा सकता है, और जालिब ने यही किया। इसी तरह ‘धर्म के मुहावरे के साथ काव्यात्मक छेड़छाड़ करने की उर्दू कविता की पुरानी रवायत को वह अपने तईं  बरतते हैं। फ़ैज़ ने  ऐसा अपने चर्चित तराने ‘हम देखेंगें’ में बेहद खूबसूरती से किया। ज़रा जालिब का प्रयोग देखिये- ‘एक नजर अपनी ज़िंदगी पर डाल/एक नजर अपने अर्दली पर डाल, फासला खुद ही कर ज़रा महसूस/यूं न इस्लाम का निकाल जुलूस!’ एक तानाशाह को दी गई इस सीख में एक टुकड़े को गौर से  देखिये। ‘इस्लाम का जुलूस’, जुलूस माने चौकी। हास्यास्पद बना देना। बराबरी के बुनियादी इस्लामी उसूल को जालिब अपनी शायरी के चुनते हैं और उसे हुक्मरानों के खिलाफ खड़ा कर देते हैं। याहिया खान के लिए कहा गया एक और शेर यों रहा- ‘जो शख्स तुम से पहले यहाँ तख़्तनशीं था/उसको भी खुदा होने पर, इतना ही यकीं था। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं क़ि जालिब उर्दू शायरी की धर्म संबंधी तीखी आलोचनाओं के वारिस नहीं हैं। वह धर्म के आधुनिक रूप को देख रहे थे। हिन्दुस्तान की ही तरह पाकिस्तान में भी धर्म को राजनीति के औज़ार की तरह  इस्तेमाल किया जाता रहा है। एक ज़माना पाकिस्तान में ऐसा भी गुजरा जब पार्टियों को इस्लामी और गैर-इस्लामी में बांटा जा रहा था। जालिब ने अपनी शैली में ग़ज़ल कही- ‘खतरे में इस्लाम नहीं। और अब जालिब की शायरी में दर्ज अआधुनिक मौलाना के भी ज़रा दर्शन करते चलें- ‘नहीं मैं बोल सकता झूठ इस दर्जा ढिठाई से, यही है जुर्म मेरा और यही तक़सीर मौलाना/ हक़ीक़त क्या है ये तो आप जानें और खुदा जाने, सुना है जिम्मी कार्टर आपका है पीर मौलाना
12 मई, 1993 को अवाम के इस शायर का इंतकाल हुआ। सरकारों ने चैन की सांस ली और मरने के बाद 1996 में निशान ‘ए इम्तिआज़’ और 2009 में निशान ‘ए हिलाल पुरस्कार’ देकर जालिब की कविता को दूर अतीत में फेंकने की कोशिश की। नवाज़ शरीफ ने जालिब की शायरी की कीमत 25 लाख रूपये लगाई, पर उनकी खुद्दार बेगम साहिबा को जालिब के उसूल प्यारे थे। उन्होंने यह खैरात लेने से मना कर दिया। जालिब की कवितायें हमेशा पाकिस्तानी ही नहीं,  हुक्मरानों की किसी भी जाति को चुभती रहेंगी। जालिब को पचा पाना असंभव है। जब भी पाकिस्तान की आम अवाम अमन और जम्हूरियत के लिए अपने शासकों के खिलाफ बगावत का परचम उठायेगी, जालिब की कवितायें उसकी संगी होंगी। यह उसकी कविता की ताकत थी क़ि उसके कवि मित्रों ने मुल्क के इस हिरावल शायर को इस तरह याद किया-
अपने सारे दर्द भुलाकर औरों के दुःख सहता था
हम जब गज़लें कहते थे वो अक्सर जेल में रहता था
आखिरकार चला ही गया वो रूठ के हम फरजानों से
वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब जालिब कहता था
कतील शिफाई

हबीब जालिब की कुछ रचनाएं-

दस्तूर1

दीप जिसका महल्लात2 ही में जले
चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले
वो जो साये में हर मसलहत के पले

ऐसे दस्तूर को सुब्हे बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
मैं भी ख़ायफ़ नहीं तख्त-ए-दार3 से
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़ियार से
क्यूँ डराते हो जिन्दाँ4 की दीवार से

ज़ुल्म की बात को, जेहल की रात को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
फूल शाख़ों पे खिलने लगे, तुम कहो
जाम रिंदों को मिलने लगे, तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे, तुम कहो

इस खुले झूठ को जेहन की लूट को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
तूमने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फुसूँ
चारागर दर्दमंदों के बनते हो क्‍यों
तुम नहीं चारागर, कोई माने मगर
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
1. संविधान, 2.  महलों, 3. फांसी का तख्ता, 4. जेल

मुशीर1

मैंने उससे ये कहा
ये जो दस करोड़ हैं
जेहल का निचोड़ हैं

इनकी फ़िक्र सो गई
हर उम्मीद की किरन
ज़ुल्मतों2 में खो गई

ये खबर दुरुस्त है
इनकी मौत हो गई
बेशऊर लोग हैं
ज़िन्दगी का रोग हैं
और तेरे पास है
इनके दर्द की दवा

मैंने उससे ये कहा
तू ख़ुदा का नूर है
अक्ल है शऊर है
क़ौम तेरे साथ है
तेरे ही वज़ूद से
मुल्क की नजात है
तू है मेहरे सुबहे नौ3
तेरे बाद रात है
बोलते जो चंद हैं
सब ये सरपसंद4 हैं
इनकी खींच ले ज़बां
इनका घोंट दे गला

मैंने उससे ये कहा
जिनको था ज़बां पे नाज़
चुप हैं वो ज़बां दराज़
चैन है समाज में
वे मिसाल फ़र्क है
कल में और आज में
अपने खर्च पर हैं क़ैद
लोग तेरे राज में
आदमी है वो बड़ा
दर पे जो रहे पड़ा
जो पनाह मांग ले
उसकी बख़्श दे ख़ता

मैंने उससे ये कहा
चीन अपना यार है
उस पे जाँ निसार है
पर वहाँ है जो निज़ाम
उस तरफ़ न जाइयो
उसको दूर से सलाम
दस करोड़ ये गधे5
जिनका नाम है अवाम
क्या बनेंगे हुक्मराँ
तू यक़ीं ये गुमाँ
अपनी तो दुआ है ये
सदर तू रहे सदा

मैंने उससे ये कहा
1.  सलाहकार, 2.  अंधेरा, 3.  नई सुबह का सूरज, 4.  शरारती तत्व,  5. जब यह नज़्म लिखी गई उस वक्त पाकिस्तान की आबादी दस करोड़ थी।

भए कबीर उदास

इक पटरी पर सर्दी में अपनी तक़दीर को रोए
दूजा जुल्फ़ों की छाओं में सुख की सेज पे सोए
राज सिंहासन पर इक बैठा और इक उसका दास
भए कबीर उदास

ऊँचे ऊँचे ऐवानों में मूरख हुकम चलाएं
क़दम क़दम पर इस नगरी में पंडित धक्के खाएं
धरती पर भगवान बने हैं धन है जिनके पास
भए कबीर उदास

गीत लिखाएं पैसे ना दे फिल्म नगर के लोग
उनके घर बाजे शहनाई लेखक के घर सोग
गायक सुर में क्योंकर गाए क्यों ना काटे घास
भए कबीर उदास

कल तक जो था हाल हमारा हाल वही हैं आज
‘जालिब’ अपने देस में सुख का काल वही है आज
फिर भी मोची गेट पे लीडर रोज़ करे बकवास
भए कबीर उदास

ख़तरे में इस्लाम नहीं

ख़तरा है जरदारों को
गिरती हुई दीवारों को
सदियों के बीमारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

सारी जमीं को घेरे हुए हैं आख़िर चंद घराने क्यों
नाम नबी का लेने वाले उल्फ़त से बेगाने क्यों

ख़तरा है खूंखारों को
रंग बिरंगी कारों को
अमरीका के प्यारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

आज हमारे नारों से लज़ी है बया ऐवानों में
बिक न सकेंगे हसरतों अमों ऊँची सजी दुकानों में

ख़तरा है बटमारों को
मग़रिब के बाज़ारों को
चोरों को मक्कारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

अम्न का परचम लेकर उठो हर इंसाँ से प्यार करो
अपना तो मंशूर1 है ‘जालिब’ सारे जहाँ से प्यार करो

ख़तरा है दरबारों को
शाहों के ग़मख़ारों को
नव्वाबों ग़द्दारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं
1. घोषणा पत्र

मौलाना

बहुत मैंने सुनी है आपकी तक़रीर मौलाना
मगर बदली नहीं अब तक मेरी तक़दीर मौलाना

खुदारा सब्र की तलकीन1 अपने पास ही रखें
ये लगती है मेरे सीने पे बन कर तीर मौलाना

नहीं मैं बोल सकता झूठ इस दर्जा ढिठाई से
यही है जुर्म मेरा और यही तक़सीर2 मौलाना

हक़ीक़त क्या है ये तो आप जानें और खुदा जाने
सुना है जिम्मी कार्टर आपका है पीर मौलाना

ज़मीनें हो वडेरों की, मशीनें हों लुटेरों की
खुदा ने लिख के दी है आपको तहरीर मौलाना

करोड़ों क्यों नहीं मिलकर फ़िलिस्तीं के लिए लड़ते
दुआ ही से फ़क़त कटती नहीं जंजीर मौलाना
1.   उपदेश, 2. पाप

बगिया लहू लुहान

हरियाली को आंखे तरसें बगिया लहू लुहान
प्यार के गीत सुनाऊँ किसको शहर हुए वीरान
बगिया लहू लुहान

डसती हैं सूरज की किरनें चांद जलाए जान
पग पग मौन के गहरे साये जीवन मौत समान
चारों ओर हवा फिरती है लेकर तीर कमान
बगिया लहू लुहान

छलनी हैं कलियों के सीने खून में लतपत पात
और न जाने कब तक होगी अश्कों की बरसात
दुनियावालों कब बीतेंगे दुख के ये दिन रात
ख़ून से होली खेल रहे हैं धरती के बलवान
बगिया लहू लुहान

बीस घराने

बीस घराने हैं आबाद
और करोड़ों हैं नाशाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

आज भी हम पर जारी है
काली सदियों की बेदाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

बीस रूपय्या मन आटा
इस पर भी है सन्नाटा
गौहर, सहगल, आदमजी
बने हैं बिरला और टाटा
मुल्क के दुश्मन कहलाते हैं
जब हम करते हैं फ़रियाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

लाइसेंसों का मौसम है
कंवेंशन को क्या ग़म है
आज हुकूमत के दर पर
हर शाही का सर ख़म है
दर्से ख़ुदी देने वालों को
भूल गई इक़बाल की याद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

आज हुई गुंडागर्दी
चुप हैं सिपाही बावर्दी
शम्मे नवाये अहले सुख़न
काले बाग़ ने गुल कर दी
अहले क़फ़स की कैद बढ़ाकर
कम कर ली अपनी मीयाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

ये मुश्ताके इसतम्बूल
क्या खोलूं मैं इनका पोल
बजता रहेगा महलों में
कब तक ये बेहंगम ढोल
सारे अरब नाराज़ हुए हैं
सीटो और सेंटों हैं शाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद
गली गली में जंग हुई
ख़िल्क़त देख के दंग हुई
अहले नज़र की हर बस्ती
जेहल के हाथों तंग हुई
वो दस्तूर1 हमें बख़्शा है
नफ़रत है जिसकी बुनियाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद
1. संविधान

हबीब जालिब की आवाज में कुछ नज्‍म सुनने के लिए क्लिक करें-

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