Archive for: May 2011

चालाक चिडिय़ा और दो गप्पी

ये दो बाल कहानियां मुंशी प्रेमचंद के नाती और वरिष्‍ठ लेखक प्रबोध कुमार से प्राप्‍त हुई हैं। उनका कहना है कि उनकी मां कमला देवी (प्रेमचंद जी की पहली संतान) ये कहानियां बचपन में हम भाई-बहन को सुनाती थीं-

चालाक चिडिय़ा

एक पेड़ पर एक घोंसला था जिसमें चिड़ा और चिडिय़ा की एक जोड़ी रहती थी। एक दिन चिडिय़ा ने चिड़ा से कहा, ‘‘आज मेरा मन खीर खाने को कर रहा है, जाओ जाकर कहीं से चावल, दूध और चीनी ले आओ।’’ चिड़ा ने चिडिय़ा को समझाया, ‘‘आजकल बहुत महंगाई है। लोग चावल खाते नहीं है या कम खाते हैं। चावल लाने में बड़ी मुसीबत है, लोग झट भगा देते हैं। और दूध ? उसका भी मिलना बड़ा कठिन है और मिला भी तो दूध के नाम सफेद पानी ! कहीं ऐसा भी दूध होता है भला- न गाढ़ापन और न चिकनाई ! और चीनी ? अरे बाप रे ! बिल्कुल नदारद, लोग तरस रहे हैं चीने के लिए ! ऐसे में कैसे बनेगी तुम्हारी खीर ?  हाँ, खिचड़ी-विचड़ी बनाना चाहो तो बना लो हालांकि वह भी सरल नहीं है।’’
पर स्त्री की जिद बुरी होती है। चिडिय़ा बोली,  ‘‘नहीं,  खीर ही बनेगी। जाओ इंतजाम करो और नहीं तो दूसरी चिडिय़ा तलाश लो, मैं बाज आई ऐसे कामचोर चिड़ा से। अरे ये झंझट तो रोज की है और इन्हीं के लिए बैठे रहो तो हो गई जिंदगी। मैं रोज तो किसी बड़ी चीज की फरमाइश करती नहीं हूँ। कभी कुछ अच्छा खाने का मन हुआ भी तो तुम ऐसे निखट्टू हो कि वह साध भी पूरी करने में इधर-उधर करते हो। मैं खीर खाऊँगी और आज ही खाऊँगी। अब जाओ जल्दी से और करो सारा इंतजाम। खीर क्या मैं अकेली खाऊँगी, तुम्हे भी तो मिलेगी।’’ अब चिड़ा करे तो क्या करे ! निकला खीर की सामग्री जुटाने। जैसे-तैसे चावल लाया,  दूध लाया और चीनी नहीं मिली तो कहीं से गुड़ ले आया।
चिडिय़ा तो बस खुशी से निहाल हो उठी और लगी चिड़ा को प्यार करने। खैर, खीर पकाई गई। दूध के उबाल की सोंधी महक चिडिय़ा की तो नस-नस में नशा छा गई। खीर तैयार हो जाने पर चिड़ा से कहा, ‘‘थोड़ी ठंडी हो जाए तब हम खीर खाएँगे। तब तक मैं थोड़ा सो लेती हूँ और तुम भी नहा-धोकर आ जाओ। चिड़ा नहाने चला गया तो चिडिय़ा ने सारी खीर चट कर डाली। और फिर झूठ-मूठ में सो गई। नहा-धोकर चिड़ा लौटा तो देखा चिडिय़ा सो रही है। उसने चिडिय़ा को जगाया और कहा, ‘‘मुझे बहुत भूख लगी है, चलो खीर खाई जाए। चिडिय़ा बोली, ‘‘तुम खुद निकालकर खा लो और जो बचे उसे मेरे लिए हांडी में ही रहने दो,  मैं तो अभी थोड़ा और सोऊँगी। आज इतनी थक गई हूँ खीर बनाते-बनाते कि कुछ मत पूछो !’’
चिड़ा ने छोटी-सी खीर की हाँड़ी में चोंच डाली तो खीर की जगह उसकी चोंच में चिडिय़ा की बीट आ गई। सारी खीर खाकर चिडिय़ा ने छोड़ी हाड़ी में बीट जो कर दी थी। चिड़ा गुस्से से चिल्ला पड़ा, ‘‘सारी खीर खाकर और हांड़ी में बीट कर अब नींद का बहाना कर रही हो !’’ चिडिय़ा ने अचरज दिखाते हुए कहा, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो ? मैं तो थकावट के मारे उठ तक नहीं पा रही हूँ और तुम मुझ पर झूठा इलजाम लगा रहे हो ? मैंने खीर नहीं खाई । मुझे क्या पता कौन खा गया। मैं तो खुद अब भूखी हूँ।’’ चिड़ा फिर चिल्लाया,  ‘‘अच्छा, खाओ कसम कि तुमने खीर नहीं खाई।’’ चिडिय़ा बोली,  ‘‘मैं तैयार हूँ। बोलो कैसे कसम खाऊँ।’’ चिड़ा ने कहा, ‘‘चलो, मेरे साथ कुएँ पर चलो तो बताता हूँ।’’ दोनों कुएँ पर गए। चिड़ा ने एक कच्चा, सूत का धाग कुएँ के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बाँधा और चिडिय़ा से कहा,  ‘‘इस धागे को पकड़कर इस ओर से उस ओर तक जाओ। यदि तुमने खीर खाई होगी तो धागा टूट जाएगा और तुम पानी में गिर जाओगी। और जो नहीं खाई होगी तो मजे से इस ओर से उस ओर पहुंच जाओगी।’’ चिडिय़ा धागे पर चली। खीर से उसका पेट भरा था। उसने तो सचमुच खीर खाई थी। चिड़ा से वह झूठ बोली थी सो बीच रास्ते में धागा टूट गया और वह धम्म से पानी में जा गिरी। चिड़ा गुस्से में उसे  झूठी,  बेईमान  कहता वहां से उड़ गया और चिडिय़ा पानी में फडफ़ड़ाने लगी।
तभी शिकार की खोज में एक बिल्ली कुएँ पर पहुँची। उसकी नजर चिडिय़ा पर पड़ी वह सावधानी से कुएँ में उतरी और चिडिय़ा को मुँह में दबाकर निकाल लाई। बिल्ली ने अब चिडिय़ा को खाना चाहा। चिडिय़ा तो चालाक थी ही,  झट बोली, ‘‘बिल्ली रानी, अभी मुझे खाओगी तो मजा नहीं आएगा। थोड़ा ठहर जाओ। मुझे धूप में सूखने रख दो,  मेरे पंख सूख जाएँ तब खा लेना। और हाँ, न हो तो तुम भी मेरे पास बैठ जाना। तुम भी गीली हो गई हो। धूप में सूख भी जाओगी और मेरे ऊपर नजर भी रख सकोगी।’’
बिल्ली को चिडिय़ा की बात जँच गई। उसने चिडिय़ा को धूप में सूखने के लिए रख दिया और खुद भी वहीं पास में बैठ धूप का मजा लेने लगी। चिडिय़ा के पंख धीरे-धीरे सूखने लगे। गीले पंख लेकर वह ठीक से उड़ नहीं सकती थी। इसलिए उसने बिल्ली को यह सलाह दी थी। उसने सोचा था, जैसे ही मेरे पंख सूखें और मुझ में उडऩे की शक्ति आई फिर देखूँगी बिल्ली रानी मेरा क्या बिगाड़ सकती है ! इधर बिल्ली सावधान थी। इसकी पूरी नजर चिडिय़ा पर थी, पर वह धूप की गरमाहाट का मजा भी ले रही थी। चिडिय़ा के पंख जब काफी कुछ सूख गए और उसे लगा कि अब वह ठीक से उड़ सकती है तब उसने बिल्ली की ओर नजर फेरी। बिल्ली उसे पूरी तरह सावधान दिखी। उसने बिल्ली से कहा, ‘‘बिल्ली रानी,  मेरे पंख बस सूखने ही वाले हैं। वे सूख जाएँ तो तुम्हें अपनी पसंद का गरम-गरम गोश्त खाने को मिल जाएगा पर हाँ, बिल्ली रानी,  उसके पहले आँखे बंद कर तुम थोड़ी देर भगवान का ध्यान कर लो तो कितना अच्छा रहे ! भगवान का स्मरण कर मुझे खाओगी तो मेरा अगला जीवन सुधर जाएगा और मेरा कल्याण करने से भगवान भी तुमसे बहुत प्रसन्न होंगे।’’ चिडिय़ा की सलाह बिल्ली को अच्छी लगी। उसने आँखें बंद कर लीं और भगवान का स्मरण करने लगी। चालाक चिडिय़ा तो इसी मौके का इंतजार कर रही थी। जैसे ही बिल्ली की आँखें बंद हुईं वह फुर्र से उड़ कर एक पेड़ पर जा बैठी और बोली, ‘‘ बिल्ली रानी, आँखें खोलकर देखा तो सही मेरे पंख कैसे सूख गए ! ’’ बिल्ली ने आँखें खोली तो चिडिय़ा को पेड़ पर बैठी देख उसके गुस्से का ठिकाना न रहा। वह चिल्ला पड़ी,  ‘‘बेईमान, धोखेबाज चिडिय़ा….।’’ लेकिन बिल्ली की गालियाँ सुनने वाला पेड़ पर अब कौन था। चिडिय़ा तो आसमान में चहचहाती इधर-उधर चक्कर लगा रही थी। बिल्ली अपनी मूर्खता पर खिसिया कर रह गई और चिडिय़ा के गोश्त का स्वाद याद करते-करते अपनी जीभ अपने ही मुँह पर फेरने लगी।

दो गप्पी

एक छोटे से शहर में दो गप्पी रहते थे। दूर की हाँकने वाले। अपने को सबसे बड़ा बताने वाले। एक दिन दोनों में ठन गई। देखें कौन बड़ा गप्पी है। शर्त लग गई। जो जीते दो सौ रुपये पाए और जो हारे वह दो सौ रुपये दे।
बात शुरू हुई। गप्पें लगने लगीं। पहला बोला, ‘‘ मेरे बाप के पास इतना बड़ा, इतना बड़ा मकान था कि कुछ पूछो मत। बरसों घूमों,  दिन-रात घूमों पर उसके
ओर-छोर का पता न चले।’’ दूसरे ने कहा, ‘‘सच है भाई, वह मकान सचमुच इतना बड़ा रहा होगा।’’ उसे मालूम था कि पहला गप्पी बिल्कुल झूठ बोल रहा है, लेकिन इस होड़ में यह शर्त थी कि कोई किसी को झूठा नहीं कहेगा, नहीं तो शर्त हार जाएगा। इसीलिए उसे, ‘सच है भाई’, कहना पड़ा।
पहला गप्पी फिर बोला,  ‘‘उस बड़े मकान में घूमना बहादुरों का काम था, कायरों का नहीं। मेरे बाप ने उस मकान को ऐसे बनवाया था- ऐसा, जैसे चीन की दीवार हो। बाप भी मेरे बस दूसरे भीमसेन ही थे- इतने तगड़े, इतने तगड़े कि बस हाँ।
दूसरा गप्पी बोला, ‘‘भाई,  मेरे बाप के पास इतना लम्बा बाँस था कि कुछ पूछो मत- इतना लम्बा कि तुम्हारे बाप के मकान के इस सिरे से डालो तो उस सिरे से निकल जाए और फिर भी बचा रहे। उस बाँस से यदि आसमान को छू दो तो बस छेद हो जाए आसमान में और झर-झर-झर वर्षा होने लगे, पानी की धार लग जाए।’’
पहले गप्पी ने कहा,  ‘‘ठीक है भाई ठीक है, और अब मेरी सुनो- मेरे बाप उस मकान से निकले तो उन्हें मिल गई एक घोड़ी। घोड़ी क्या थी, हिरण बछेड़ा थी। हवा से बातें करती थी- उड़ी सो उड़ी, कहो दुनिया का चक्कर मार आए। हाँ,  तो बाप थे मेरे घोड़ी पर सवार और तभी किसी कौए ने बीट कर दी घोड़ी पर और उग आया उस पर एक पीपल का पेड़। मेरे बाप तो आखिर मेरे बाप ही थे न। अकल में भला कोई उनकी बराबरी कर सकता था। उन्होंने झट पीपल के पेड़ पर मिट्टी डाली और खेत तैयार कर उसमें ज्वार बो दी। अब बिना पानी के ज्वार बढ़े तो कैसे बढ़े ! पानी बरस नहीं रहा था। लोग परेशान थे। फसलें बर्बाद हो रही थीं। बस समझो कि अकाल पड़ गया था, अकाल ! तभी मेरे बाप को वह लम्बा बाँस याद आया जिससे तुम्हारे बाप आसमान में छेदकर पानी बरसाते थे। बस घोड़ी पर सवार मेरे बाप तुम्हारे बाप के घर पहुँच गये और उन्हें पानी बरसाने के लिए मना लिया। फिर क्या कहना था ! जहां-जहां तुम्हारे बाप आसमान में छेद कर पानी बरसाते, वहां-वहां मेरे बाप घोड़ी को ले जाते और जहां-जहां घोड़ी जाती, वहां-वहां पीपल और जहां-जहां पीपल, वहां-वहां ज्वार का खेत। भाई मेरे, कुछ पूछो न ! ऐसी ज्वार हुई, ऐसी ज्वार हुई जैसे मोती- सफेद झक्क और मोटे दाने। ज्वार क्या थी भाई, अमृत था ! अब जो तुम्हारे बाप ने देखी वैसी अजूबा ज्वार तो मचल गए और पांच सौ रुपये की ज्वार लेकर ही रहे। मेरे बाप ने पैसे माँगे तो बोले, ‘अभी मेरे पास नहीं हैं, उधार दे दो।’ मेरे बाप बड़े दरियादिली तो थे ही, उन्होंने उधार दे दी ज्वार। और भाई क्या कहें, तुम्हारे बाप भी बड़े ईमानदार थे। उन्होंने कहा, ‘अगर मैं यह कर्ज न उतार सकूँ तो मेरे बेटे से पूरे पैसे ले लेना। मेरा बेटा बहुत अच्छा है और अच्छे बेटे अपने बाप का कर्ज जरूर अदा करते हैं।’’
दूसरे गप्पी ने यह सूना तो उसकी तो बोलती बंद ! न तो वह,  सच है भाई,  कह सकता था न,  झूठ है,  ही कह सकता था। सच कहता तो पाँच सौ रुपये का कर्ज चुकाना पडे़गा और झूठ कहता तो शर्त हारने के दो सौ रुपये देने पड़ेंगे। मतलब यह कि इधर कुँआ तो उधर खाई। उसने सोचा कुँए से तो खाई ही भली। वह झट बोला, ‘‘झूठ-झूठ-झूठ मेरे बाप ने कभी तुम्हारे बाप से पाँच सौ रुपये की ज्वार नहीं ली।’’ उसका इतना कहना था कि पहला गप्पी बोला, ‘‘मैं जीत गया, लाओ दो सौ रुपये दो।’’ दूसरे गप्पी ने दो सौ रुपये देकर अपनी जान छुड़ाई।

चित्रांकन : प्रगति त्‍यागी, कक्षा-11

बच्चों की दुनिया के अंग संग :अवध बिहारी पाठक

कवि रमेश तैलंग के बालगीतों में प्रयोगधर्मी विविधता है। उनके बालगीतों के संग्रह ‘मेरे प्रिय बालगीत’ पर वरिष्‍ठ कवि अवधबिहारी पाठक की आलोचनात्‍मक टिप्‍पणी-

‘हर रात/लौटता हूं/रेंगता रेंगता/उसी गली में/जहां मुस्कुराता है एक
बच्चा/हर शाम/मुझे पंख देने के लिए- राजकुमार केसवानी (‘बाकी बचें जो’ से)
बीसवीं सदी के अर्धशतक तक साहित्य सृजन, पठन पाठन आदमी की जिंदगी का एक अहम हिस्सा बना रहा, परंतु उसके बाद का समय साहित्य के पठन-पाठन भी बड़ी दर्दनाक तस्वीर खींचता है। लेखन में उदात्तता आई,  परंतु पढऩे वालों का अकाल पड़ गया, क्योंकि साहित्य में इन दिनों बाजारवाद की बड़ी जोरदार धमक है। अर्थ जहां जिंदगी का लक्ष्‍य बन जाए, वहां बाल साहित्‍य और बाल संवेदना कैसे जिंदा रहे।  परिणामत: उसकी भी उपेक्षा हुई, किंतु ऐसी जटिल परिस्थिति में भी बाल साहित्‍य लिखा जा रहा है  तो यह प्रयत्न उत्साहवर्धक है और नई संभावनाओं से लैस भी, क्योंकि बकौल राजकुमार केसवानी बच्चे समाज की जिंदगी को उड़ान भरने की ताकत देते हैं। मेरे देखने में रमेश तैलंग की पुस्‍तक ‘मेरे प्रिय बाल गीत’ अभी-अभी आई है, जो बाल सहित्‍य लेखन में एक अद्भुत प्रयत्न है। यूं रमेश तैलंग बाल साहित्य लेखन के अप्रतिम स्तंभ है।  उनका योगदान इस क्षेत्र में बहुत चर्चित रहा है, सम्मानित पुरस्‍कृत भी।
जाहिर है, बच्चों की दुनिया उनकी अपनी दुनिया होती है- सभी प्रकार के काइयांपन से कोसों दूर, वहां सब कुछ नैसर्गिक है, कवि का मन और विचार चेतना बच्चों की दुनिया में बहुत गहरे डूब कर एकाकार हो गई। फलत: बच्‍चों की दुनिया का हर पहलू सोच-विचार, आचार, मान-अपमान, स्वाभिमान, प्यार, दुलार, धिक्कार और हकों की मांग भी शामिल है बच्चों की इस गीत दुनिया में। मनुष्य की ‘चतुराई का शिल्प’ नहीं उसके स्थान पर शुद्ध नैसर्गिक मन की हलचल मूर्त हुई है जो तैलंग जी के संवेदना पक्ष को उजागर करती है।
यहां रचना के कन्टेंट की बात कहना भी जरूरी-सा लगता है। पुस्‍तक में 163 बालगीत हैं जो छोटे, मझोले, बड़े सभी आकार हैं। ये गीत वस्‍तुत: बालक के मन पर आई  उस मनोवैज्ञानिक स्थिति की व्याख्या है, जो बालक अपने समग्र परिवेश के प्रति व्यक्त करता है। कवि इतना समर्थ है बाल मनोविज्ञान को पढऩे में कि बालक की बात काल्पनिक हो या यथार्थ लेखक ने हर उस विचार-लहर को पकड़ा है, जहां उसके क्रियाकलाप उसके अंतर्मन के गंभीर विचार प्रस्ताव बन जाते हैं, वे रोचक हैं, त्रासक भी और चैलेंजिंग भी। हर बाल गीत की अपनी एक जमीन है और उसमें बच्चे के उस मोहक क्षण का वर्णन है, जहां बच्चा निपट अकेला खड़ा होकर अपने परिवेश को रूपायित करता है। फलत: उनमें बाल जीवन का आल्हाद भी है और विडम्‍बनाएं भी। सभी कविताओं में निहित कवि भी व्यंजना को प्रस्तुत करने में विस्तार मय है अस्तु बिल्कुल जीवंत रूपकों का दर्जा यहां इष्ट है। यथा।
बाल श्रमिक हमारे देश की दुखती रग है। हजार कानून बने, परंतु बाल श्रमिकों का शोषण अब भी जारी है। उन्हें अपने शिक्षा के अधिकार की जानकारी भी शासन नहीं दे सका। बाल श्रमिकों के माता-पिता पेट की आग की गिरफ्त में पड़कर बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते। ‘भोलू’ नामक कविता में बाल श्रमिक भोलू का साथी उसे स्कूल जाने को प्रेरित करता है तो भोलू उत्तर देता है कि ठीक है मैं पढऩे जाऊंगा, परंतु ‘अच्छा पढऩे की तनख्वाह क्या दोगे ?’ (पृष्‍ठ-34)  कवि यहां उन बच्चों का हाहाकार उकेर सका, जो पेट की खातिर अपने हर क्रियाकलाप को केवल पैसे से तोलते हैं। ‘ मैं ढाबे का छोटू हूँ’ कविता होटलों में देर रात तक काम करने वाले बच्चों की पीड़ा को साकार कर सकी है- ‘देर रात में सोता हूँ/कप और प्याली धोता हूँ/रोते-रोते हँसता हूँ/हँसते- हँसते रोता हूँ।’ यहाँ बाल श्रमिक की लाचारी साकार हो उठी है जिसकी चिंता न समाज को है और न शासन को। कवि यहां एक भयंकर सच को व्यक्त कर गया कि शायद कविता के बहाने ही सही, किसी का ध्यान इस तरफ जाए और कुछ कारगर उपाय हों।
हमारे देश में प्रांतों की विविधता से विविधवर्णी संस्कृति का मेल हमें घरों में भी दिखाई देता है। ‘घर है छोटा देश हमारा’  कविता में घर में विभिन्न प्रांतों की उन मां,  चाची,  भरजाई का जिक्र है जो अलग होकर भी खानपान,  आचार-विचार के स्‍तर पर सामान्‍जस्‍य बैठाकर घर चलाती हैं- ‘छोटे से घर में हिलमिलकर सारे करें गुजारा।’ (पृष्‍ठ 46)। जैसा कथन देश प्रेम और एकता की प्रेरणा देता है।
‘पापा की तनख्वाह’ और ‘महंगे खिलौने’  कविताएं बच्चों के मुंह से कही गई बाजार में व्याप्त महंगाई की कहानी हैं,  जहां खिलौनों के अभाव में उनका बचपन छीज रहा है। बच्चा अबोध है, परंतु भीतर से कितना जागरूक कि उसके पापा ‘चिंटू का बस्ता/मिंटी की गुडिय़ा/अम्‍मा की साड़ी/दादी को पुडिय़ा’ (पृ0 64)। बाजार से उधार लाए हैं। इसका घाटा अगले महीने खर्च कम करके झेलना पड़ेगा। यहां कवि मझोले पगारधारी लोगों के बच्चों की तकलीफ को ठीक से प्रस्तुत कर गया है। आगे का दृश्य और भी मोहक है। बच्चा भले ही छोटा है, परंतु बाजार की उठक-पटक से अनजाना नहीं है। एक अन्‍य कविता ‘महंगे खिलौने’ में बच्‍चा कहता है-  ‘छोटे हैं, फिर भी हम इतना समझते/ कैसे गृहस्थी के खर्चे है चलते/जिद की जो हमने तो पापा जी अपने/न चाहते भी उधारी करेंगे/रहने दो, रहने दो ये महंगे खिलौने/ जेब पर अपनी ये भारी पड़ेंगे,’ (पृष्‍ठ 137)। अर्थ ने कितना समझदार बना डाला है बच्‍चों को कि वे अपना बचपन भी इस महंगाई के सामने समर्पित, नहीं सरेंडर कर देते हैं। कवि की दृष्टि यहां गहरी होकर भीतर तक हिला जाती है, बच्चों की बेबसी से।
विज्ञान की दौड़ और शहरीकरण की बीमारी के चलते आज के बच्चों का प्रकृति से निकट का वास्ता लगभग टूट ही गया है। कवि ने बच्चों के दर्द की बखूबी पकड़ा है- ‘पेड, फूल, फल पड़े ढूंढने/ हमको रोज किताबों में/हरियाली रह जाय विंधकर/सिर्फ हमारे ख्वाबों में/ ऐसा जीवन नहीं चाहिए (पृष्‍ठ 163)। चिडिय़ों की कमी से भी चिंतित है बच्चा- ‘क्या उसको/बढ़ती आबादी के दानव ने मार दिया?’ (पृष्‍ठ 76)। कविता ‘पंछी बोल रहे है’ में अपील है- ‘पंछी, पेड़, जानवर, जंगल/बचे रहे तो होगा मंगल’ (पृष्‍ठ 90)। कवि यहां समग्र पर्यावरण के प्रति बच्चों की वाणी में चौकस है। विश्व में भले ही कंप्यूटर की तूती बोले, पर धरती से जुड़ा़ बच्चा, उसे ‘दुनिया का कूड़ा’ (पृष्‍ठ 163) मानता है। बच्चे तन और मन दोनों स्तरों पर फुर्ती चाहते हैं, किंतु मशीनीकरण से फुर्ती तो आई परंतु ‘मन बूढ़ा हो गया’। उल्‍लास  रहित बच्‍चे ईमेल के पक्षधर नहीं- ‘ऐसी त्वरित गति किस काम की जिसमें ‘पोस्टकार्ड हो गया फिसड्डी और चिट्ठी-पत्री फेल हो रही हो’(पृष्‍ठ 146)। पत्र अपने प्रिय के पास पहुंचकर मन में जो एक अजीब सिहरन पैदा करते थे, वो फोन-ईमेल ने छीन ली। अब ‘मेल मिलाप हो गया जल्दी, पर खतरों का है ये खेल’ उन वैयक्तिक विडंबनाओं की ओर संकेत है जो उसे सहज न रख कर तनावयुक्त ही करते है, मुक्त नहीं। फोन कर संवादों में अब वह गर्माहट कहां? बड़ा प्रश्न है, ‘फ्रिज है रईसों के घर भी निशानी/ पर भैया, अमृत है मटके का पानी’ (पृष्‍ठ 126)। कविता में सप्रमाण मटके की उपयोगिता दिखी जो आधुनिक साधनों को नकारती है।
बच्चों भी प्रकृति में तर्क और जिज्ञासा सदैव से रहते आए हैं। ‘डॉक्टर अंकल’ कविता में डॉक्‍टर भी बच्‍चे के तर्क से पराजित होता दिखा। इसी तरह काली बकरी द्वारा दिया गया दूध सफेद, और हरे रंग की मेहंदी की पत्‍ती का रचाव लाल रंग का कैसे?  हवा की मुट्ठी में न आना ऐसे स्थल है कविताओं के जिनमें बच्चों की प्रश्नाकुलता मूर्तिमान हुई है। यहां एक तथ्य ओर भी उल्‍लेखनीय है कि प्रत्येक कविता के साथ उसके भाव को चित्र में मूर्तिमान किया गया है। इससे कवि के मूल काव्य विम्ब योजना तक पहुंचने में सुविधा होती है।
पुस्तक फ्लेप पर उल्‍लेख है कि बाल गीतों का वय के अनुसार शिशु काल और किशोर गीतों जैसा कोई तकनीकी वर्गीकरण नहीं है। पर यह बात मेरे गले नहीं उतरी क्‍योंकि ‘धत् तेरे की अपनी किस्मत में तो बोतल का दूध लिखा है’ जैसी कविताएं शुद्धत: शिशु भाव पर केन्द्रित  हैं। इसी प्रकार ‘पापा ! घोड़ा बनो’, ‘ढपलूजी रोए आँ… ऊँ’, ‘मैं त्‍या छतमुत तुतलाता हूं’ जैसी कविताएं बाल वय की एवं इसी तरह, ‘ऐसा जीवन नहीं चाहिए’ और ‘दूध वाले भैया’ आदि गीत किशोर मन की अभिव्‍यक्तियां हैं। अस्‍तु वर्गीकरण साफ है।
कवि का भाषा पर असाधारण अधिकार है। भाषा और भाव का कथनों में अद्भुत मेल है। तत्ता, म्हारा, थारा, गप्प, गुइयां जैसे विभिन्न बोलियों के शब्‍द कथ्‍य को प्रभावी बना सके हैं।
सामाजिक फलक पर बच्चों को देखें तो इस अर्थ युग में सामाजिक जीवन में बच्चे बोझ की ही अनुभूति देते हैं और यदि बोझ नहीं तो किनारे पर तो अवश्य ही कहे जायेंगे। वह यूं कि अभिजात्य वर्ग के सभी भौतिक सुविधाओं से लैस बच्चे मां-बाप के सानिध्य को तरसते हैं क्योंकि माता-पिता के पास उनसे बोलने-बताने का समय ही नहीं, मध्यवर्ग के बच्चे महंगाई और उच्च वर्ग की नकल न कर पाने से कुंठित और निम्न वर्ग के बच्चे सीमित साधनों और अभावों के कारण माता-पिता का दुलार नहीं पाते। इस प्रकार से बचपन तो साफतौर पर ठगा ही जा रहा है क्योंकि मातृ-पितृ स्‍नेह के जो दो पल बच्‍चे को मिलने चाहिए, उनसे बच्‍चे वंचित हैं और ऐसे में तैलंग जी द्वारा  लिखित बाल गीत मन में गुदगुदी तो पैदा करते ही हैं, जो एक बड़ी बात है आज के वक्त में। कुल मिला कर कहा जाए तो निराश होने की बात नहीं है। राष्ट्रकवि दिनकर ने समाजवाद के पक्ष में गर्जना की थी, ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ की टोन पर तैलांग जी ‘सड़कें खाली करो कि बच्चे आते हैं’ की घोषणा करते हैं तो एक आशा बंधती है कि आगामी कल बच्चों का होगा, जिन पर भविष्य का भार है। पुस्तक बाल साहित्याकाश मैं एक सितारा बन कर चमकेगी इसी आशा के साथ और कवि के लिए सतत लेखन की शुभकामनाओं के साथ।

पुस्‍तक: मेरे प्रिय बालगीत (संग्रह, 2010), पृष्‍ठ: 180, मूल्‍य:250 रुपये  प्रकाशक : कृतिका बुक्‍स, 19 रामनगर एक्‍स्‍टेंशन-2, निकट पुरानी अनारकली का गुरुद्वारा, दिल्‍ली-110051

रमेश तैलंग की बाल कविताओं से संबंधित लिंक-

-रमेश तैलंग के बालगीत

-रमेश तैलंग की शीघ्र प्रकाश्‍य पुस्‍तक से कुछ बालगीत

दलित संत साहित्य और सामाजिक सुधार : सूर्यनारायण रणसुभे

सूर्यनारायण रणसुभे

भक्ति साहित्‍य की सामाजिक भूमिका पर प्रश्‍नचिह्न लगाता और उसके पुनर्मूल्‍यांकन की मांग करता मराठी के वरिष्‍ठ आलोचक सूर्यनारायण रणसुभे का आलेख-

सम्‍भवत: भारतीय भाषाओं के भक्ति साहित्‍य को धर्म और वर्ण में बांटकर अध्‍ययन करने की मानसिकता केवल हिंदी के ही संदर्भ में देखी जा सकती है। धूर्तता इतनी ही कि वर्ण या धर्म का नाम न देते हुए यहां दार्शनिक शब्दों का प्रयोग किया गया। परंतु आशय तो वर्ण और धर्म से ही था। यह मानसिकता श्री रामचंद्र शुक्ल जी के इतिहास से शुरू की जाती है। श्री रामचंद्र शुक्ल अपने इतिहास ग्रंथ में यह लिखते हैं कि ‘इस प्रकार देश में सगुण और निर्गुण के नाम से भक्ति काव्य की दो धाराएं विक्रम की 15वीं शताब्‍दी के अंतिम भाग से लेकर 17वीं शताब्दी के अंत तक समानांतर चलती रहीं।’(1) श्री शुक्लजी का यह कथन केवल हिंदी साहित्य के संदर्भ में सही है। देश की किसी भी भाषा के भक्ति साहित्य में सगुण-निर्गुण इस प्रकार को कोई विभेद नहीं माना गया है। वहां के समीक्षकों ने भी इस प्रकार का वर्गीकरण नहीं किया है। शुक्लजी हिंदी भक्ति काव्य को सगुण और निर्गुण में बांटते हैं। केवल बांटते ही नहीं अपितु सगुण काव्य में सभी सवर्ण कवियों को तथा निर्गुण काव्य के अंतर्गत सभी उपेक्षित- आज की भाषा में दलित कवियों को रखते हैं। और इस निर्गुण को भी प्रेमाश्रयी और ज्ञानाश्रयी दो हिस्‍सों में बांटते हैं तथा प्रेमाश्रयी में मुसलमान कवियों को रखते हैं। मराठी संत काव्य में पचास से अधिक मुस्लिम संत कवि हैं, परंतु उन्‍हें वहां अलग से वर्गीकृत नहीं किया गया है।
मराठी संत काव्य- इस भक्ति काव्य को संत काव्य ही कहते हैं, के अंतर्गत अनेक सवर्ण दलित कवि हैं। परंतु यहां सगुण-निर्गुण या प्रकारांतर में सर्वण-दलित जैसा विभाजन नहीं किया गया है। संतों को
दलित-अदलित विशेषण से संबोधित करना किस मानसिकता को सूचित करता है ? फिर हिंदी में दलित और सवर्ण कवियों को ‘भक्त’ कहा गया। मानो संत भक्त हैं ही नहीं। हिंदी में यह जो सगुण-निर्गुण का संघर्ष है, वह दार्शनिक स्तर पर भले ही हो, उसके मूल में सर्वण (सगुण) और दलित( निर्गुण)  का सांस्कृतिक संघर्ष दिखलाई देता है। सूरदास की कविता में जो उद्धव-गोपी संवाद अथवा भ्रमरगीत प्रसंग है,  वहां से इस संघर्ष के संकेत मिलने लगते हैं। सगुण भक्ति श्रेष्ठ कि निर्गुण भक्ति। अब सभी निर्गुण पंथी पिछड़े समाज के हैं, दलित हैं। और सगुण भक्ति वाले सवर्ण हैं। इनमें से कौन श्रेष्ठ, यही तो विवाद का विषय है। भ्रमरगीत में अंतत: सगुण की श्रेष्‍ठता को सिद्ध किया जाता है। वहां से यह जो भ्रमरगीत परंपरा शुरू की जाती है, वह जगन्नाथदास रत्नाकर तक चलती है। अनेक प्रमाणों द्वारा सवर्णों की भक्ति को प्रकारांतर में श्रेष्ठ साबित किया जाता है। इस प्रकार एक को श्रेष्ठ तथा दूसरे को कनिष्ठ साबित करने की कोई परंपरा न मराठी भक्तिकाव्य में है और न कन्‍नड़ के। आश्‍चर्य तो इस बात का है कि निर्गुण भक्ति को ज्ञानाश्रयी कहा गया, परंतु ज्ञान पर आधारित, विवेक पर आधारित इस भक्ति की सतत हंसी उड़ायी गई, यह किस मानसिकता का सूचक है ? जिनके पास ज्ञान की परंपरा भी उन्‍हें ज्ञानाश्रयी कहा, जिनके पास अज्ञान की परंपरा थी, उनकी भक्ति को ज्ञानआश्रित कहा। अनजाने में शुक्ल जी कितना बड़ा सच बोल गए कि जिनके पास अज्ञान की परंपरा थी, उन्‍होंने ही अज्ञान पर आश्रित भक्ति को स्‍वीकारा।
उपरोक्त सारी बहस इसलिए कि संत, जो जाति-धर्म से परे जाकर, मनुष्य मात्र को एक मानकर अपनी बात कर रहे थे,  उनके साथ दलित विशेषण लगाकर उन्हें अपमानित क्यों किया जा रहा है ? दूसरी बात संतों की जाति खोजकर हम क्या साबित करना चाह रहे हैं ? संत हो या भक्त उसकी दृष्टि  कितनी विशाल अथवा संकुचित है, इस पर बहस हो अथवा तत्‍कालीन मनुज-विरोधी व्‍यवस्‍था को लेकर वे क्या कर रहे थे, इस पर बहस हो। मैं अपनी सारी बहस संतों की जाति को केंद्र में रखकर करना नहीं चाहता अपितु सम्‍पूर्ण संत साहित्‍य का सामाजिक सुधार के संदर्भ में क्या योगदान है,  इस पर चर्चा करना चाहता हूं।
यहां मैं इस बात को स्पष्ट  करना चाहता हूं कि डॉ. बाबा साहब अंबेडकर संत साहित्य के न केवल अध्‍येता अपितु विशेषज्ञ भी थे। अपने ‘जनता’ पत्र में वे लिखते हैं- ‘मैंने संत साहित्‍य को जितना गहराई में जाकर अध्‍ययन किया है, उतना अध्‍ययन करने वाले महाराष्ट्र में बहुत कम लोग हैं।’(2) संत साहित्य का गहरा प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ चुका था। जब उन्होंने अपना पहला पत्र शुरू किया ‘मूकनायक’ तब उसके आरंभ के पृष्ठ पर वे संत तुकाराम के अभंग (मराठी का एक छंद प्रकार) की दो पंक्तियां उदृधत करते थे, जिसका आशय था- ‘ अब संकोच करने का कोई मतलब नहीं। अब नि:शंक होकर बात करूंगा। मूक होकर जीना ठीक नहीं। लाज संकोच से किसी का हित नहीं होगा।’ तो ‘बहिष्कृत भारत’ पर ज्ञानेश्‍वरी से ली गई पंक्तियां उदृधत की गई हैं। संत साहित्‍य पर लिखी उनकी समीक्षा केवल नकारात्मक नहीं है। संतों की नैतिक शिक्षा सामाजिक सौहार्द के लिए जरूरी है- ऐसा बाबा साहब अकसर कहते थे। परंतु संतों के इतर विश्वासों,  श्रद्धाओं (या कि अंधश्रद्धाओं), भाग्यवाद,  वर्णाश्रम, धर्म की श्रेष्ठता को उन्‍होंने नकारा है। संत साहित्य के प्रभाव के संदर्भ में वे लिखते हैं- ‘क्‍या है आपके इस संत साहित्‍य में? नाम स्‍मरण से तुम्‍हारा कोई काम होने वाला है क्‍या?’ अतिवाद पर जाकर वे लिखते हैं- ‘अब तक लिखी गई सभी मराठी पुस्‍तकें तथा संपूर्ण साहित्‍य अगर कोई अरब समुंदर में डुबो दे अथवा जला दे, तो मुझे मुझे कोई दु:ख नहीं होगा। केवल दो अपवाद हों एक तुकराम की गाथा तथा दूसरी ज्ञानेश्‍वर की ज्ञानेश्वरी। इन दो ग्रंथों के आधार पर मेरी मराठी शाश्वत रूप में रहेगी। अभिमान से डोलती रहेगी।’(4) संत साहित्य और सामाजिक सुधार ये दो शब्द वास्तव में परस्पर विरोधी हैं। क्योंकि संत साहित्य के मूल में ‘वैयक्तिक मोक्ष’ या ‘जन्‍म-मरण से मुक्ति’ की कामना है। संतों के साहित्य का वही लक्ष्य रहा है। वे भौतिक जीवन की घोर उपेक्षा करते है, जबकि ‘सामाजिक सुधार’ की भावना ही व्यक्ति के स्थान पर समाज को केंद्र में रखती है। सामाजिक सुधार की प्रक्रिया भौतिक जगत को उसकी पूरी समग्रता में स्वीकार करने के बाद ही शुरू हो जाती है। इसी कारण संत साहित्य में सामाजिक सुधार की वृत्ति को ढूंढना उन पर अन्याय ही करना है।
डॉ. बाबा साहब अंबेडकर संत साहित्‍य पर विचार करते समय प्रखर बौद्धिम दृष्टि अपनाते हैं। संतों की नैतिक शिक्षा का वह बार-बार उल्‍लेख करते हैं। नैतिक शिक्षा के संतों के आग्रह के कारण कई समीक्षकों को यह भ्रम हो गया कि संत साहित्य में सामाजिक सुधार के बीज हैं। डॉ. अंबेडकर संत साहित्‍य के संदर्भ में ‘विद्रोह’ और ‘क्रांति’ इन दो शब्दों की सूत्रमय व्याख्या करते हैं और लिखते हैं कि ‘संत साहित्य विद्रोही साहित्य है,  क्रांतिकारी नहीं। विद्रोह कभी भी समाज व्‍यवस्‍था में मूलभूत परिवर्तन नहीं कर पाता। विद्रोह समाज व्‍यवस्‍था में हलचल पैदा कर देता है, वह उस पर आघात करता है, परंतु परिवर्तन नहीं। क्रांति अलबत्ता परिवर्तन को साकार करती है। इसी कारण विद्रोह हमेशा असफल होता है। पराजित हो जाता है। क्रांति मूल्यों का निर्माण करती जाती है। वह पुराने मूल्यों को ध्वस्त कर देती है और नये मूल्यों को जन्‍म देती हैत्र इस दृष्टि से देखें तो संतों का विद्रोह था,  क्रांति नहीं।’(5) मराठी संतों ने वर्ण व्‍यवस्‍था पर कहीं भी आघात नहीं किया, चाहे वे सवर्ण हो या दलित। हिंदी संतों ने- विशेषत: कबीर ने वर्ण व्‍यवस्‍था पर जमकर हमला किया है और कबीर अंबेडकर के प्रेरणास्रोत थे।
भक्ति का मुलम्‍मा चढ़ाने से मनुष्‍यता का मूल्‍य बढ़ता है, यह एक मिथ्‍या धारणा है। संतों की व्यक्तिगत उपलब्धियां बहुत हैं, परंतु सामुदायिक-सामाजिक उपलब्धियां क्या हैं ? व्यक्तिगत उपलब्धियों से व्यक्ति श्रेष्ठ साबित होता है,  परंतु समाज एक इंच भी आगे नहीं सरकता। ऐसी उपलब्धियों का समाज को क्या फायदा?
वास्तव में संत साहित्य के मूल में अध्यात्म है,  ईश्वर के प्रति कृतज्ञता और समर्पण की भावना है तो समाज सुधार के केंद्र में स्‍थापित व्‍यवस्‍था और उसके कारण मनुष्य के विकास की गति में जो अवरुद्धता उत्‍पन्‍न हो जाती है,  उसकी खोज तथा इस अवरुद्धता को हटाने के उपायों की चर्चा होती है। उसके लिए सामूहिक प्रयत्‍न शुरू हो जाते हैं। अर्थात् समाज सुधार का प्रस्‍थान बिंदू ही स्‍थापित व्‍यवस्‍था के प्रति असंतोष तथा उस व्यवस्था को बदलने की दिशा में आगे बढऩे की वृत्ति होती है। संत साहित्य ने उलटे स्‍थापित व्यवस्था का समर्थन किया है। अपवाद अकेले कबीर हैं। संत साहित्य ने भाग्यवाद का,  कर्म सिद्धांत का समर्थन किया है। तुलसीदास भी संतोष धन को बनाए रखने का आग्रह करते हैं- जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए। समाज सुधार के मूल में व्यवस्था के प्रति असंतोष होता है।
वास्तव में भारत में समाज सुधार की प्रकिया 19वीं शती के नवजागरण काल में शुरू होती है। इस काल में जितने भी सुधार आंदोलन शुरू होते हैं, उनमें ‘समाज’ शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारतीय दर्शन, चिंतन और मानसिकता में इसके पूर्व ‘समाज’ शब्द पूर्णत: उपेक्षित-सा था। देखिए ब्रह्म समाज (1828),  प्रार्थना समाज (1861),  सत्यशोधक समाज (1873), आर्यसमाज(1875)। इस देश में समाज सुधार की शुरुआत इन्‍हीं चार प्रमुख समाजों द्वारा होती है। इनके संचालकों में से किसी एक ने भी संत साहित्य को प्रेरणास्रोत के रूप में स्वीकार नहीं किया है। राजा राममोहन राय,  तर्खडकर बंधु, जोतिबा फुले और महर्षि दयानंद सरस्वती(6) अपने काल के सर्वोच्च बुद्धिजीवी थे। इनमें से किसी ने भी संत साहित्य को समाज सुधार के माध्यम के रूप में स्वीकार नहीं किया है। इसके क्या कारण हो सकते हैं? इन संस्थाओं के अलावा जिन व्यक्तियों ने समाज-सुधार हेतु प्रयास किए उनमें से किसी के भी प्रेरणास्रोत संत नहीं है। (यहां फिर अपवाद कबीर का है)। जोतिबा फुले, रामस्वामी नायकर से लेकर बैरिस्टर सावरकर जैसे हिंदुत्ववादी ने भी संतों को प्रेरणास्रोत के रूप में स्वीकारा नहीं है। उलटे मराठी के श्रेष्ठ बुद्धिजीवी श्री वि. का. राजवाडे़ जी ने तो यहां तक लिखा है कि संत साहित्‍य के कारण यह देश स्थितिवादी हो गया। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि सामाजिक सुधार के संदर्भ में संत साहित्य की कोई प्रासंगिकता नहीं है। हां, व्‍यक्ति पर जहाँ तक नैतिक-संस्‍कारों का प्रश्‍न है, वहाँ तक तो संत साहित्‍य के योगदान को स्वीकार करना ही पड़ेगा। मराठी के दलित संतों ने अपनी जाति के कारण खुद को हीन माना है। इस जाति में जन्म के लिए पूर्वजनम के कर्म कारण हैं- ऐसा भी वे मानते हैं।
समाज सुधार की दृष्टि  से संत साहित्य का यह विवेचन है। इस आयाम की दृष्टि से संत साहित्‍य की इस सूक्ष्मता से खोज करें तो हाथ कुछ लगेगा नहीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि मध्यकाल की उस विशिष्ट राजनीतिक और धार्मिक परिवेश में संत साहित्य ने जो आस्था का स्वर भर दिया वह अपने आप में विशिष्ट  है। उन्होंने कर्मकांडों का विरोध किया, अंधश्रद्धा पर प्रहार किए, विवेक का आग्रह पकड़ा, ये समाज सुधार के ये कुछ पहलू हैं। परंतु संपूर्ण व्यवस्था पर उन्होंने प्रहार नहीं किए हैं। व्यवस्था परिवर्तन की बात वे आग्रहपूर्वक नहीं करते। वर्षों से हम संत साहित्य का उदात्‍तीकरण करते आए हैं,  कम-से-कम अब तो पूरे विवेक और बुद्घिमत्‍ता के आधार पर संत साहित्य की जांच-पड़ताल करें, यह आग्रह भरा निवेदन।
संदर्भ :
1. हिंदी साहित्य का इतिहास : श्री रामचंद्र शुक्‍ल : आठवां संस्‍करण, पृष्‍ठ-70, 2. मराठी ग्रंथ- ‘जनता’: संपादक श्री अरुण कांबले, प्रस्‍तावना, पृष्‍ठ-41, 3. मराठी ग्रंथ- आंबेडकरांचे  बहिष्कृत भारत, पृष्‍ठ-345, 4. मराठी ग्रंथ : जनता : संपादक अरुण कांबले, पृष्‍ठ-40, 5.  मराठी ग्रंथ : पत्रकार डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर ( लेखक – डॉ. गंगाधर पानतावणे) पृष्‍ठ- 234, 6. सत्यार्थ प्रकाश : महर्षि दयानंद सरस्वती : 36वां संस्करण, पृष्‍ठ- 187-274

कोई भूखा, कहीं खाने की बर्बादी : सुशील राघव

होटलों, रेस्‍त्रां और शादी-ब्‍याह जैसे सामाजिक समारोह में खाने की बर्बादी को रोकने पर जोर दे रहे हैं युवा पत्रकार सुशील राघव-

आपने अपने आसपास या फिर रेड लाइट सिग्नल पर ऐसे बच्चों और बुजुर्गों को जरूर देखा होगा, जो दूसरों से मांगकर अपना पेट भरते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि इन्हें पूरे दिन कुछ नहीं मिल पाता और भूखे पेट ही सोना पड़ता है। भूख किसी भी सभ्य समाज के लिए एक बदनुमा दाग की तरह होती है। फिर भी इस हकीकत को दरकिनार कर देते हैं। दरअसल, इसके लिए हमारी कुछ आदतें ही जिम्मेदार हैं। जब आप किसी होटल या रेस्त्रां में लंच या डिनर करने जाते हैं तो वहां एक से ज्यादा डिश ऑर्डर तो कर देते हैं, लेकिन पूरा खाना किसी भी रूप में संभव नहीं होता। और जो खाना आप रेस्त्रां की मेज पर छोड़कर आते हैं, वह बर्बाद ही होता है। इसी तरह शादी या किसी समारोह की पार्टी में जो लोग जाते हैं, उनमें से ज्यादातर अपनी प्लेट में अधिक खाना रख लेते हैं, जिसे बाद में कूड़ेदान के हवाले कर दिया जाता है। जरा सोचिए, यह खाना कई लोगों की भूख शांत कर सकता था, लेकिन कूड़ेदान में जाकर बर्बाद हो जाता है।
खाने की बर्बादी पर पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ के फूड एंड एग्रीकल्चर संगठन यानी एफएओ की रिपोर्ट में ऐसा आंकड़ा उजागर किया है, जो पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में एक साल में करीब 130 करोड़ टन खाद्य सामग्री या तो बेकार हो जाती है या फिर उसे फेंक दी जाती है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि खाना बेकार करने की समस्या औद्योगिक देशों में सबसे ज्यादा है। आंकड़ों के मुताबिक, विकासशील देशों में 63 करोड़ टन और औद्योगिक देशों में 67 करोड़ टन खाने की बर्बादी हर साल होती है। अफ्रीका महाद्वीप में हर साल करीब 23 करोड़ टन भोजन का उत्पादन होता है, जबकि अमीर देशों में 22.2 करोड़ टन खाना बर्बाद हो जाता है। कहने का अर्थ यह है कि जितना खाना एक महाद्वीप में रहने वाले लोगों की एक साल में भूख मिटाता है, उतना तो अमीर देश बर्बाद कर देते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि पूरी दुनिया में कई देश भुखमरी की समस्या से जूझ रहे हैं और दूसरी ओर बड़े पैमाने पर खाने की बर्बादी हर साल हो रही है।
एक अध्ययन के मुताबिक अमेरिका और ब्रिटेन में संपन्न लोग जितना भोजन खराब करते हैं, उससे दुनिया के 1.5 अरब भूखे लोगों को खाना खिलाया जा सकता है। पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका और ब्रिटेन में संपन्न लोग रेस्त्रां में थोड़ा-बहुत भोजन खाकर शेष छोड़ देते है। यदि इस बचे हुए भोजन को गरीब लोगों को खिला दिया जाता तो इसका सदुपयोग हो जाता, परंतु रेस्त्रां के मालिक इस बचे हुए भोजन को कूड़ेदान के हवाले कर देते हैं।
खाने की बर्बादी में भारत भी कम पीछे नहीं है। हमारे यहां सबसे ज्यादा खाने की बर्बादी शादी समारोहों और पार्टियों में होती है। छोटे से छोटे समारोह में भी कम से कम 20 पकवान तैयार कराए जाते हैं। और मामला किसी रईस का हो तो पकवानों की गिनती करना ही मुश्किल हो जाता है। हमारे देश में सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ शादियों की तड़क-भड़क भी बढ़ती ही जा रही है। समाज का नव धनाढ्य तबका विवाह समारोहों को अपनी हैसियत दिखाने का एक अवसर मानता है और इस मौके पर बेहिसाब खर्च करता है। बड़ी शादियों में खाने की स्टॉल कई सौ मीटर तक फैली हो सकती हैं। इसमें शामिल होने वाले लोग पहले तो अपनी क्षमता से ज्यादा प्लेट में खाना परोस लेते हैं, जो जब खाया नहीं जाता तो उसे बर्बाद कर देते हैं।
हमारे यहां शादियों में मेहमानों की संख्या पर कोई प्रतिबंध नहीं है। इसलिए मेजबान हमेशा कुछ अधिक लोगों के भोजन का इंतजाम करके चलता है ताकि अधिक लोग आने पर खाने की कमी नहीं रहे, लेकिन ऐसा बहुत कम ही होता है कि किसी समारोह में भोजन कम पड़ जाए। समारोहों में अक्सर खाना ज्यादा बन जाता है और अंत में उसे कूड़ेदान के हवाले ही करना पड़ता है। कैटर्स भी मानते हैं कि शादी या दूसरी पार्टिंयों में कई प्रकार के व्यंजन रखने से खाने की बर्बादी होती है। उनके मुताबिक, खाने की बर्बादी दो तरह से होती है, एक तो लोगों द्वारा थाली में ज्यादा जूठन छोडऩे से और दूसरा- मेहमानों के उम्मीद से कम आने पर। कैटर्स का मानना है कि जितने ज्यादा पकवान होंगे उतनी ही बर्बादी होगी।
पिछले दिनों भारत सरकार ने शादी-ब्‍याह और अन्‍य सामाजिक समारोहों में खाने की बर्बादी को लेकर चिंता जताई और इसे रोकने के लिए गंभीर कदम उठाने की बात भी कही। खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री केवी थॉमस का कहना था कि इसके लिए जागरूकता अभियान तो चलाया ही जाएगा और सरकार जल्द ही ऐसा विधेयक लाने वाली है, जिससे शादियों में बनने वाले विभिन्न व्यंजनों की संख्या पर रोक के साथ-साथ मेहमानों की संख्या को भी नियंत्रित किया जा सके। सरकार का कहना है कि इसके लिए पाकिस्तान में शादियों के लिए लागू एक व्यंजन व्यवस्था का अध्ययन किया जाएगा। अगर यह हमारे देश के हिसाब से सही रही तो इसे कानून बनाकर लागू किया जा सकता है। थॉमस का कहना था कि सरकार ने विवाह समारोहों में खाने की बर्बादी का पता लगाने के लिए कोई विधिवत अध्ययन तो नहीं कराया है, लेकिन अनुमान है कि यह बर्बादी 15 से 20 प्रतिशत तक की है।
भारत जैसे देश के लिए जहां अब भी एक बड़ा तबका भुखमरी का शिकार है, यह शर्मनाक है। शादी में अपव्यय रोकने के लिए तमाम सामाजिक तथा धार्मिक संगठन भी अपनी ओर से पहल करते रहे हैं, लेकिन उसका कोई खास असर पड़ता नजर नहीं आ रहा है। सवाल है कि क्या सरकार के प्रयासों का कोई लोगों पर प्रभाव पड़ेगा? वैसे तो सामाजिक समारोहों पर किसी तरह के नियंत्रण का विचार कोई नया नहीं है। साठ के दशक में सरकार गेस्ट कंट्रोल ऑर्डर ला चुकी है। सरकार जो करेगी, वह तो बाद की बात है, लेकिन इससे पहले हमें इस बात का प्रण लेना होगा कि आगे से हम जब भी किसी शादी या पार्टी में जाएंगे, वहां उतना ही खाना अपनी प्लेट में लेंगे, जितना हम खा सकते हों। साथ ही अपने साथियों, रिश्तेदारों और दोस्तों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।
भारतीय परंपराओं में माना गया है कि किसी भूखे व्यक्ति को खाना खिलाना सबसे बड़ा पुण्य होता है। खाने की बर्बादी को रोककर हम न केवल अपने देश से बल्कि पूरी दुनिया से भुखमरी नामक राक्षस का अंत कर सकेंगे। यदि भोजन की बर्बादी तुरंत नहीं रोकी गई तो वह दिन दूर नहीं, जब पूरी दुनिया के देशों भयानक अकाल का सामना करना पड़ेगा। खाने की बर्बादी को हमें हर हालत में रोकना होगा ताकि कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए।

चन्द्रबली सिंह के रूप में प्रेरणा स्रोत खो दिया

नई दिल्ली : हिन्दी के सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, संगठनकर्ता और विश्व कविता के श्रेष्टतम अनुवादकों में शुमार कामरेड चन्द्रबली सिंह का 23 मई को  87 वर्ष की आयु में बनारस में निधन हो गया।  चन्द्रबली जी का जाना एक ऐसे कर्मठ वाम बुद्धिजीवी का जाना है जो मार्क्सवादी सांस्कृतिक आन्दोलन के हर हिस्से में बराबर  समादृत और प्रेरणा का स्रोत रह।
चन्द्रबली जी रामविलास शर्मा, त्रिलोचन शास्त्री  की पीढी़ से लेकर प्रगतिशील संस्कृतिकर्मियों की  युवतम पीढी़  के साथ चलने की कुव्वत रखते थे। वे जनवादी लेखक संघ के संस्‍थापक महासचिव और बाद में अध्यक्ष रहे।  उससे पहले तक वे प्रगतिशील लेखक संघ के महत्वपुर्ण स्तम्भ  थे। जन संस्‍कृति मंच के साथ उनके आत्‍मीय संबंध ताजिन्‍दगी रहे। बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद राष्ट्रीय एकता अभियान के तहत सांस्कृतिक संगठनों के साझा अभियान की कमान बनारस में उन्हीं के हाथ थी और इस  दौर में उनके और  हमारे संगठन के  बीच जो आत्मीय रिश्ता  कायम हुआ, वह सदैव ही चलता रहा। उनके साक्षात्‍कार ‘समकालीन जनमत’ में प्रकाशित हुए। चन्‍द्रबली जी वाम सास्‍कृतिक आंदोलन के समन्‍वय के प्रखर समर्थक रहे।
चन्द्रबली जी ने मार्क्सवादी सांस्कृतिक  आन्दोलन के भीतर की बहसों के  उन्नत रूप और स्तर के लिए  हरदम ही संघर्ष किया। ‘नई चेतना’ 1951 में उनका लेख छपा था- ‘साहितय का संयुक्‍त मोर्चा’। ( बाद में वह ‘आलोचना का  जनपक्ष’ पुस्तक में संकलित भी हुआ। चन्‍द्रबली जी ने इस लेख में लिखा, ‘सबसे अधिक निर्लिप्त और उद्देश्यपूर्ण आलोचना आत्‍मालोचना कम्‍यूनिस्‍ट- लेखकों और आलोचकों की और से आनी चाहिए। उन्‍हें अपने भटकावों को स्‍वीकार करने में किसी प्रकार की झेंप या भीरुता नहीं दिखलानी चाहिए,  क्योंकि  जागरूक क्रांतिकारी की यह सबसे बड़ी पहचान है कि वह आम जनता को अपने साथ  लेकर चलता है और वह यह जानता है कि दूसरों की आलोचना के साथ-साथ जब तक वह  अपनी भी आलोचना नहीं करता, तब  तक वह न सिर्फ जनता को ही साथ न ले सकेगा, वरन स्वयं भी वह अपने लिए सही मार्ग का निर्धारण नहीं करा पाएगा। दूसरों की आलोचना में भी चापलूसी करने की आवश्यकता नहीं,  क्योंकि चापलूसी उन्हें कुछ  समय तक धोखा दे सकती है,  किन्तु उन्हें सुधार नहीं सकती। मैत्रीपूर्ण आलोचना का यह अर्थ नहीं कि हम दूसरों की गलतियों को जानते हुए भी छिपाकर रखें। आत्‍मालोचना के स्‍तर और रूप की यही विशेषता- मार्क्‍सवादी आलोचना होनी चाहिए कि हम उसके सहारे आगे बढ़ सकें।’ आज से 60 साल पहले लिखे गए इस लेख में आपस में और मित्रों के साथ पालेमिक्स  के रूप,  स्तर और उद्देश्य  की जो प्रस्तावना  है, वह आज और भी ज़्यादा  प्रासंगिक है। उन्‍होंने अपने परम मित्र और साथी रामविलास शर्मा के साथ अपने लेखों में जो बहसें की हैं, वे स्वयं उनके बनाए निकष का प्रमाण हैं।
उनकी आलोचना की दोनों ही पुस्तकें ‘आलोचना का जनपक्ष’  तथा ‘लोकदृष्टि और हिंदी साहित्य’  दस्तावेजी महत्त्व की हैं। इनमें हिंदी साहित्‍य और संस्‍कृति के प्रगतिशील अध्याय के तमाम उतार-चढ़ाव- बहसों और उप‍लब्धियों की झांकी ही नहीं मिलती,  बल्कि आज के संस्कृतिकर्मी  और अध्येता के लिए इनमें तमाम अंतर्दृष्टिपूर्ण सूत्र बिखरे पड़े हैं।
पाब्लो नेरूदा, नाजिम हिकमत, वाल्ट व्हिटमैन और एमिली डिकिन्सन की कविताओं के उनके अनुवाद उच्च  कोटि की काव्यात्मक संवेदना,  चयन दृष्टि और सांस्कृतिक अनुवाद के प्रमाण हैं। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि ब्रेख्त, मायकोवस्की और तमाम अन्य कवियों के उनके अप्रकाशित अनुवाद और दूसरी  सामग्रियां जल्द ही प्रकाशित होंगी।
जन संस्कृति मंच  वाम सांस्कृतिक आन्दोलन की अनूठी शख्सियत साथी चन्द्रबली सिंह को लाल सलाम पेश  करता है और शोकसंतप्त परिजन,  मित्रों,  साथियों के प्रति हार्दिक संवेदना प्रकट करता है।
– प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

मृत्यु का दृश्य : सलीम

तेलुगु के युवा लेखक सैयद सलीम के पाँच उपन्यास, 140 कहानियां और 100 से अधिक कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। मानवतावादी दृष्टिकोण उनके रचनाकर्म की विशेषता है। उनकी इस कहानी का अनुवाद आर.शांता सुंदरी ने किया है-

इतवार का दिन, दोपहर का समय था। हवा जैसे थम गई थी, जैसे उसे लॉकर में बंद करके किसी ने रख दिया हो! बडी उमस थी।
सायन्ना खाना खा रहा था। उसने अपनी बीवी की ओर देखा और कहा, ‘‘ज़रा पंखा तो चला देना!” बीवी ने कनखियों से उसकी ओर देखकर कहा, “पिछले महीने बिजली का बिल चार सौ का आया था, भूल गए?”
“अरे कोई बात नहीं। बडी़ गर्मी है। खाने का मन नहीं कर रहा है। थोडी़ देर के लिए चला दे।” वह बीवी का स्वभाव जानता था। पैसे का बडा मोह है उसे। एक भी पैसा खर्च नहीं करने देती…जैसॆ अपनी जान निकालकर देना पड़ रहा हो, ऐसे बर्ताव करती है। वह कितना भी हाड़तोड़ मेहनत करे तो भी खुश नहीं होती, ऊपर से कहती है, “बस इसी के लिए दिन-रात खटते रहते हो?”
उसने नाक भौंह सिकोडते हुए पंखा चला दिया। पंखे की हवा आने लगी तो सायन्ना को राहत मिली…जैसे बदन में जान वापस आ गई हो।
“ज़रा सा छाछ तो डाल दे।” उसने बीवी से कहा। पनीली छाछ डाल दी बीवी ने।
“यह क्या? इसमे छाछ तो है ही नहीं.पानी ही पानी है!”
“हां हां ! तेरी कमाई में यह नहीं तो क्या दही और मलाई वाली लस्सी मिलेगी?” बस, सायन्ना चुपचाप खाने लगा। इतने में बाहर से किसी की आवाज़ सुनाई दी। उसनॆ थाली उठाकर रही सही छाछ पी और बाहर भागा। वहां अरुणोदया अपार्टमेंट्स का वाचमैन खडा था। बोला, “बिजली गई है! साब ने तुझे फौरन आने को कहा है।”
सायन्ना के घर के आसपास दो-तीन अपार्टमेंट्स हैं। वह पैसा ज़्यादा नहीं मांगता और काम मन लगाकर करता है, इसलिए बिजली का काम हो तो सायन्ना को ही बुलाते हैं लोग। कमीज़ पहनकर, अपना सामान का थैला लेकर घर से निकल पडा वह।

अरुणोदया अपार्टमेंट्स के सेक्रटरी बहुत बेचैन था। तीन साल पहले उसने वालंटरी रिटाइरमेंट ले लिया था। दोनों बच्चे अमेरिका में सेटल हो गए। उसने सोचा रिटायर होने के बाद मिलने वाले पैसों पर जो ब्याज मिलेगा उससे ज़िंदगी आराम से गुज़र जाएगी, पर सरकार ने बैंक के डिपाजिटों पर ब्याज आधा करके रख दिया तो उसके सारे सपने अधूरे रह गए।
इसीलिए वेलफेयर चुनाव में खडे़ होकर जीत हासिल की और सॆक्रटरी बन गया। हाथ में काम भी है और पैसा भी आता है। कुल साठ फ्लेट हैं। मेंटिनेंस के नाम पर हर फ्लैट से हर महीने पांच सौ रुपये वसूल किए जाते हैं। यानी महीने में तीस हज़ार। झूठे खर्च खाते में लिखना, किए गए खर्च कुछ बढा़कर लिखना, ऐसे काम तो वह खूब जानता है।
एक घंटे पहले ट्रान्सफार्मर में से ज़ोर की आवाज़ हुई और लपटें निकलने लगीं। बिजली गुल हो गई। सॆक्रटरी होने के नाते इसे ठीक कराने की ज़िम्मेदारी उसकी थी… सिरदर्द का काम। पर सचमुच बडी उमस थी। शायद बारिश होनेवाली है। पसीने से बदन तरबतर हो रहा था। वैसे भी कांक्रीट जंगल जैसे बडे-बडे फ्लैट। कहीं पेड-पौधों का नाम ही नहीं…पत्थर और सीमेंट के सिवा हरियाली तो है ही नहीं।
सायन्ना का इंतज़ार करते हुए वह और भी खीजने लगा। उसे देखते ही पूछा, “इतनी देर क्यूं कर दी ?”
“खाना खा रहा था साब!” कहकर एक ही पल में वह फटाफट टान्सफार्मर पर चढ़ गया।
“ज़रा जल्दी कर।” कहकर सॆक्रेटरी अपने फ्लैट मे घुस गया। मन ही मन खुश हो रहा था कि सायन्ना को दो सौ देकर खाते में एक हज़ार लिख दूंगा।

श्रीनिवास को बहुत झुंझुलाहट हो रही थी। वह एक टीवी चैनल में कैमरामैन था। वह एक ऐसा डाक्युमेंटरी बनाना चाहता था जो पुरस्कार प्राप्त करने के स्तर की हो। वह सोच रहा था कि ऐसा कौन-सा विषय होगा जो इस स्तर का होगा।
बाल कर्मचारी, कूडे़ में से कागज़ बीनते गरीब, बचपन में ही वेश्यावृत्ति में लगाई गई अभागिन लड़कियां, अरब शेखों के हाथों बिकनेवाली अमीनाओं की कहानियां…ये सब पहले ही बन चुके थे। नया विषय चुनना होगा। बिलकुल नया और अनोखा हो। नेशनल ज्‍योग्रफी चैनल में हाल ही में उसने एक अद्भुत कार्यक्रम देखा था। एक हिरण को बाघ के मारने का दृश्य। बाघ हिरण का पीछा करता है, हिरण जान बचाने के लिए भागता है। बाघ मारना चाहता है और हिरण बचना चाहता है। अंत में बाघ हिरण को पकड़ ही लेता है। तब कैमरामैन ने उस हिरण की आंखों में मौत के खौफ को बहुत ही स्पष्ट रूप से कैमरे में बांधा था। ऐसा ही कोई विलक्षण चीज बनाना चाहता था श्रीनिवास।
सिगरेट पर सिगरेट फूंकते हुए सोच ही रहा था कि इतने में ज़ोर की अवाज़ आई। चौंककर उसने खिड़की से बाहर झांका। फ्लैट के सामने बने ट्रान्सफार्मर से धुआं निकल रहा था। बिजली भी चली गई थी। गर्मी से राहत पाने के लिए खिड़की के पाट पूरी तरह खोल दिए। अब उमस के कारण घबराहट होने लगी तो ठीक से सोच भी नहीं पा रहा था।
कुछ देर चहलकदमी की, लेटने की कोशिश की, लेटा नहीं गया, पता नहीं यह कब तक  ठीक कराया जायेगा। उसने तीसरी मंज़िल में रहनेवाले सेक्रेटरी को फोन लगाया। उधर से झिड़की सुनाई दी, “यह चौबीसवां फोन है…।”
एक घंटा बीत गया।
उसने खिड़की से बाहार एक बार और नज़र घुमाई। सायन्ना बडी़ फुर्ती से ट्रान्सफार्मर पर चढ़ रहा था। वह समझ नहीं सका कि अगर ट्रान्सफार्मर जल गया तो ऊपर चढ़कर सायन्ना क्या करेगा। छोटा-मोटा रिपेयर तो नहीं कि पैसों के लिए जान जोखिम में डाल दे…जीवन संघर्ष…इस शीर्षक से डाक्युमेंटरी बनाई जा सकती है ! यह बात दिमाग में आते ही उसने हेंडीकैम चला दिया और सायन्ना पर ज़ूम कर दिया।

सायन्ना दसवीं फेल था। फिर उसने बिजली का काम सीख लिया। अब उसे दस साल का तजुर्बा है। वह इलेक्ट्रिकल इंजीनियर तो नहीं है फिर भी फौरन गड़बड़ समझकर पल में उसे ठीक कर देता है। कहां छूने से जान को खतरा है, यह वह अच्छी तरह जानता था।
उसके हाथ चुस्ती से चलने लगे। वह जल्द से जल्द नुक्स को पकड़कर उसे ठीक कर देना चाहता था। किसी दूसरी जगह से भी बुलावा आया था। यह काम खत्‍म करके वहां जाएगा तो पैसे ज़्यादा मिलेंगे, यही सोच रहा था। उस समय अचानक उसे अपनी बीवी याद आ गई। उसकी कैंची जैसी चलती ज़बान, पैसों का मोह, घायल कर देनेवाली बातें,  हज़ार वोल्‍ट के झटके की तरह सताने लगे।
ध्यान बंटने से हाथ फिसल गया, ऐसी जगह पर पडा़ जहां पड़ना नहीं चाहिए था। सायन्ना चीखकर उछल पडा। मानो हाथ को किसी ने धारदार चाकू से ज़ोर से कतर दिया हो, ऐसा दर्द उठा। ट्रान्सफार्मर पर बने जंगले पर धडाम से मुंह के बल गिर गया।
चीख सुनते ही श्रीनिवास सतर्क हो गया। इतना ज़ोर का झटका लगा…अब यह बच नहीं पाएगा। यह सोचकर उसने कैमरा सायन्ना पर ज़ूम किया। वह अभी सांस ले रहा था। मृत्यु वेदना से छटपटा रहा था…मौत के मुंह में जा रहा था। रह-रहकर उसका शरीर झटके खा रहा था। इसका शीर्षक-  ‘मौत का दृश्य’ रखा जा सकता है, यह सोच मन में आते ही वह बडे़ ध्यान से दृश्य का चित्रण करने लग गया।
उस अपार्टमेंट में रहने वाले लोग बाहर आकर सायन्ना को देखते खडे़ रहे। सेक्रेटरी भागता हांफता आ गया। कटी पतंग की तरह ट्रान्‍सफार्मर के जंगले पर निढाल पडे़ सायन्ना को देखकर उसकी बी.पी. बढ़ गया। वह परेशान होने लगा कि पैसा बचाने के चक्कर में यह कैसी झंझट सिर पर ले ली ! उसने गौर से देखा। सायन्ना के शरीर में हरकत बिलकुल नहीं हो रही थी। यह कहीं पुलिस केस न बन जाए, यह सोच मन में आते ही वह सिहर गया। इतने में किसी ने कहा, “बिजली विभाग को फोन लगाइए। वे जबतक पवर सप्लाइ बंद नहीं करेंगे इसे नीचे नहीं उतारा जा सकता। बस सेक्रेटरी फोन करने को दौड़ पडा़।

बिजली के दफ्तर में साम्बमूर्ति अखबार के पन्ने पलटता बैठा था। वह भी नाखुश था। नाम के वास्ते बिजली का दफ्तर है, पर ऊपर पंखा न जाने कितने पुराने युग का है । हवा कम और शोर ज़्यादा देता है। कभी भी टूटकर गिर सकता है, यह डर बना रहता है। बडी़ उमस थी।
और दो घंटों की बात है, फिर ड्यूटी खत्‍म हो जाएगी। मुझे रिलीव करने जो आता है वह बदमाश तो शराबी है। पता नहीं समय पर आएगा या नशे में किसी सड़क किनारे पडा़ होगा। वैसे भी आज खास दिन है। बीवी बच्चों को लेकार गांव गई है। शाम को श्यामला को बुलाया है। वह ताला देखकर कहीं लौट न जाए। उसे चमेली के फूल बहुत पसंद हैं। रास्ते में खरीद लूंगा। साथ में क्वार्टर बोतल व्हिस्की और दो चिकेन बिरियानी के पेकेट भी।
फोन बज उठा। उधर से किसी ने कहा, “ट्रान्सफार्मर पर चढ़कर एक लड़का बिजली का झटका लगने से गिर पडा़।’’
यह सुनते ही साम्बमूर्ति तनकर सीधा बैठ गया। पूछा, “कहां?”
जवाब आया, “वहीं ट्रान्सफार्मर पर ही…।”
“मैं पूछ रहा हूं आप कहां से बोल रहे हैं? हादसा कहां हुआ?”
उधर से पता बताया गया।
तुरंत साम्बमूर्ति को तसल्ली हो गई। “प्राइवेट आदमी को ट्रान्सफार्मर पर नहीं चढा़ना चाहिए, क्या अपको मालूम नहीं?” उसने कहा।
“वह सब बाद में देखेंगे। हमें यह भी मालूम नहीं कि लडका ज़िंदा है या मर गया…उसे नीचे उतारना है। आप फौरन इस एरिया का कनेक्‍शन काट दो!”
“मैंने कम्‍प्‍लेंट लिख ली है। आपका नंबर है- छत्तीस। सब कर्मचारी कम्‍प्‍लेंट ठीक करने बाहर गए हैं, आते ही भेज दूंगा।”
“मैं ट्रान्सफार्मर की मरम्मत की बात नहीं कर रहा हूं। इस लाइन की बिजली काट देंगे तो हम उस लड़के को उतार लेंगे।”
“मैं भी यही कह रहा हूं जनाब ! कम्‍प्‍लेंट लिख ली है। जब भी बन पडे़गा भेज दूंगा।”
“अरे! आप हालत की नज़ाकत को समझो भाई ! यहां आदमी मौत से जूझ रहा है और..।” साम्बमूर्ति ने फोन काट दिया।
‘‘सरकारी नौकर जैसे सबका नौकर हो गया। ऐसे चिल्ला रहा है जैसे मेरा बास है। बुलाते ही दौड़कर जाना होगा?’’ वह झुंझला उठा।

वाचमैन ने खबर दी तो सायन्ना की बीवी रोती-कलपती आ गई। सेक्रेटरी को पहले ही डर था कि कहीं यह पुलिस का केस न बन जाए। अब यह औरत इतना शोर मचा रही थी तो उसका दिल ज़ोरों से धडकने लगा।
रोते-रोते उसने सेक्रेटरी को देखा तो कहने लगी, “आपने बुलाया तो चला आया साब! वह नहीं जानता था कि यह मौत का बुलावा है।”
यह सुनते ही सेक्रेटरी का दिल धक से हो गया। और कुछ देर इसी तरह बोलने दिया तो साफ कहेगी कि तुम्हारी वजह से ही मरा है । उसने मन ही मन हिसाब लगाया। पुलिस केस होगा तो हज़ारों रुपये खर्च करनॆ पडेंगे। इससे अच्छा है कि पैसे का लालच देकर इसका मुंह बंद किया जाए। यह सस्ता सौदा होगा। हर एक घर से पांच सौ मिल जाएं तो भी तीस हज़ार रुपये हो जाएंगे। और थाने के चक्कर काटने से भी बच सकते हैं। पति मर गया…अकेली औरत…बेसहार बेवा…ऐसे कहने पर हर कोई पैसा दे देगा।
ऐसा सोचते ही वह उस औरत के पास गया और तसल्ली देते हुए कहा, “तुम दुखी मत हो। सायन्ना बडा़ अच्छा है। हमारे कांप्लेक्स में हर कोई उसे जानता है और मानता भी है। हम सब मिलकर पच्चीस तीस हज़ार तुम्हें देंगे। उससे कुछ काम धंधा करके गुज़ारा कर लेना।”
यह सुनते ही एक पल के लिए उसकी आंखों में आशा की चमक कौंध गई, पर उसे छुपाते हुए फिर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी, “हाय मैं क्या करूं…मेरा सुहाग छीन लिया तूने हे भगवान…दया नहीं आयी तुझे…!”

“धत् तेरे की…इस एस.आई. साले को मुफ्त के केस ही मिलते क्या ?” थाने से बाहर आते ही पुलिस सिपाही से यह कहकर दूसरी ओर मुंह करके थूक दिया हेड कांस्‍टेबल ने। सिपाही ने सिर हिलाकर हां में हां मिलाई। हेड ने फिर कहा, “वह कोई गधा ट्रान्सफार्मर पर चढ़कर मरा तो हमारी शामत आ गई। उसे नीचे उतारना, लाश का पंचनामा कराना और उसके परिवारवालों के सुपुर्द करना,  ये सारे काम करने तक हमारी ज़िंदगी कुत्ते की ज़िंदगी ही रहेगी।”
“मैंने तो एस.आई. के घर बरतन भी मांजे, मेडम के लिए सब्ज़ी खरीद लाया…इसके बावजूद वह हमसे खुश क्यों नहीं है, समझ में नहीं आता।”
“अरे, समझाकर! उसकी जात और हमारी जात अलग है। यही असली वजह है। मुझे गुस्सा आ गया ना तो इसपर डी.जी.पी. को लिखूंगा…इसके खिलाफ केस कर दूंगा हां! तब देखना इसे नक्सलाइट एरिया में भेज दिया जाएगा।”
बात करते-करते दोनों अरुणोदया अपार्टमेंट्स पहुंच गए। पहलॆ सोचा था कि यह फायदा का सौदा नहीं था, पर सेक्रेटरी के बर्ताव को और उसके डरे-डरे चेहरे को देखते ही वह समझ गया कि कहां ज़ोर देने से पैसे मिलेंगे। उसने सारा मामला सेक्रेटरी से उगलवाया। केस निपटाने के लिए कितना खर्च होगा यह बता दिया। आधे घंटे तक दाम पर बहस करने के बाद कुछ तय हुआ, तब देखा सायन्ना की ओर, जो चमगादड की तरह लटका था।
“अब पांच बज चुका है। यह तो बहुत देर पहले मरा था न ? अबतक लाश को नीचे क्यों नहीं उतारा ? क्या कर रहे थे आप ?” वह गरजा।
“उसे उतारने के लिए ऊपर चढ़ना था। पावर बंद नहीं किया गया तो कैसे चढते ? आप ही कुछ करो ना ?” गुस्से को पीकर सेक्रेटरी ने कहा।
“मुझे क्या पता? क्या मैं कोई इलेक्ट्रीशियन हूं?  फिर एक बार फोन करो। कहो एस.आई. साहब का हुक्‍म है। नहीं मानता तो ऊपर बैठे अफसर को शिकायत करेंगे। ”
छ्ह बजे जीप में बिजली विभाग से एक ए.ई. और दो कर्मचारी आए। सेक्रेटरी से कुछ देर बात करके इंजीनियर ने ऊपर सायन्ना की ओर देखा और कहा, “इतना बडा़ झटका लगने के बाद बचना मुश्किल है। वह तो मर गया होगा।”
“अरे क्या हम नहीं जानते वह मर गया है ? इसके लिए तेरे सर्टिफिकेट की ज़रूरत है क्या ?” मन ही मन सेक्रेटरी बुदबुदाया और कहा, “आप बिजली बंद करवाओ तो हम लाश को उतारें।”
“नहीं पहले मेरे बास को रिपोर्ट करनी पडॆ़गी।” यह कहकर तीनों वापस जीप में बैठकर चले गए।

श्रीनिवास बहुत खुश था, जैसे कोई बहुत बडा़ काम कर रहा हो। रह-रहकर सायन्ना के शरीर में होनेवाली हरकत देख वह फूला नहीं समा रहा था। मृत्यु के पलों को इस तरह क्लोज़प में बांधना ही एक रिकार्ड है, इस बात से उसका उत्साह और बढ़ने लगा।
वाचमैन की बीवी ऐलम्मा, को यह सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। उसकी उम्र चालीस के करीब होगी। छरहरा बदन पर मेहनत करने की वजह से चुस्त बहुत थी। गांव में बिजली के तारों से उलझने से जलकर मरनेवाले कौवों को उसने एक-दो बार देखा था। सायन्ना को देखकर वे कौवे याद आए तो उसका मन भर आया। उसे उतारने की कोई  कोशिश नहीं कर रहा है, इस बात से वह हैरान थी। उसने तय किया कि अब किसी से  उम्मीद न करके खुद कुछ करना चाहिए। वह जाकर सीढी़ ले आई। उसे ट्रान्सफार्मर से लगाया और साडी को दोनों पैरों के बीच से बांधकर चढ़ने को तैयार हो गई।
“ऎ…क्या करती है?…मरेगी तू…बिजली चालू है।” वाचमैन नीचे से चिल्लाया।
“कुछ नहीं होगा…नहीं मरूंगी मैं…तू चुप रह।”
वह ऊपर चढ़ गई और ट्रान्सफार्मर को छूए बिना खडी़ हो गई। एक हाथ की दूरी पर पडा़ था सायन्ना का शरीर।
“छूना मत… झटका लग जाएगा और तू भी मरेगी।” वाचमैन फिर चिल्लाया।
इस बार उसे भी डर लगा।
नीचे उतर आई और घर से लकडी का लंबा टुकडा ले आई। वह दो फुट लंबा था। उसने उससे सायन्ना के शरीर को धकेलने की कोशिश की। धकॆलना आसान था, पर नीचे गिरने से कहीं सर फट गया तो! नीचे देखते हुए कहा, “एक गद्दी डाल दो नीचे।”
“अरे मरे हुए को चोट का डर क्या? नीचे फेंक दो!” वाचमैन ने कहा।
उधर श्रीनिवास बडी चुस्ती से यह सब रिकार्ड कर रहा था।
सेक्रेटरी ने अपने घर से गद्दी मंगवाई। नीचे चटाई डालकर उसपर गद्दी डाली और पुरानी चादर भी बिछाई।
ऐलम्मा ने पूरा ज़ोर लगाकर सायन्ना को नीचे की ओर धकेला। धम्म से वह गद्दी पर गिर पडा।
सब लोग उसकी ओर भागे। सायन्ना की बीवी फिर रोने लगी।
हेड कांस्‍टेबल ने सायन्ना की नाक के पास उंगली रखकर देखा। कुछ समझ नहीं आया तो छाती पर हाथ रखकर देखा और दो मिनट बाद चिल्लाया, “यह अभी ज़िंदा है! एंबुलैन्स को फोन करो।”
आधे घंटॆ बाद एंबुलैन्स आयी। जब सायन्ना को उसमे चढा़या जा रहा था तो उसमे सांस बाकी थी। अस्पताल पहुंचने से पहले, बीच रास्ते में वह मर गया।

श्रीनिवास ने कैमरा बंद किया और अलमारी में रख दिया।
साम्‍बमूर्ति तीन पेग पीने के बाद श्यामला के साथ बिरियानी चखने में लगा था।
इस अचानक आए खर्च को किस तरह भरा जाए इसी सोच में डूबा था सेक्रेटरी।
क्रिया कर्म के खर्च तो दे दिए, पर वह पच्चीस तीस हज़ार दॆगा या नहीं यही चिंता सायन्ना की बीवी को बेचैन कर रही थी। उस समय साथ कोई भी नहीं था जो गवाही दे सके, यह सोचते ही उसका दिल बैठने लगा।
“मैंने यह काम तीन घंटे पहले किया होता तो वह बच जाता।” ऐलम्मा को यही सोच खाए जा रही थी। वह अपराध बोध से ग्रस्त हो गई।

सितारा : कमल जोशी

उत्‍तराखंड में महिलाओं के लिए काम कर करे सामाजिक संगठन ‘महिला समाख्‍या’ ने कई ऐसी महिलाओं का जीवन वृत्‍त प्रकाशित किया है, जो विषम परिस्थितियों का मुकाबला कर खुद तो पैरों पर खड़ी हुई हीं, अन्‍य महिलाओं का भी सहारा बनीं। ऐसी ही साहसी महिला है- सितारा। सितारा की जीवन गाथा सामाजिक विश्‍लेषण की मांग करती है, जिसे लिखा है वरिष्‍ठ फोटो जर्निलिस्‍ट और लेखक कमल जोशी ने-

सितारा आज खुश है। उसे स्वयं पर गर्व है कि वो किसी जरूरतमंद महिला के काम आ सकी है। रामन्ती बार-बार सितारा का हाथ पकड़ कर उसकी अहसामंद हो रही है। सितारा के साहस के कारण ही उसकी मजदूरी मिल पाई है। रामन्ती को इन पैसों की कितनी सख्त जरूरत थी। वो बीमार बेटी का इलाज अब अच्छी तरह करवा पायेगी।

सितारा नरमी और स्नेह से रामन्ती का हाथ दबाती है। रामन्ती गाँव की सभी महिलाओं की शुक्रगुजार है, सबने उसका साथ न दिया होता तो पंचायत का वार्ड सदस्य रामन्ती की मेहनत की कमाई कब उड़ा गया, पता ही नहीं चलता। सीधी-सादी रामन्ती से वार्ड सदस्य ने मनरेगा कार्यक्रम में मजदूरी करने के लिए बना जाब कार्ड मांगा। रामन्ती ने सोचा, अपने गाँव का जाना-पहचाना आदमी है। मजदूरी के रुपये लेने में सहायता करने के लिये ही जाब कार्ड माँग रहा है। वार्ड सदस्य ने कहा भी यही था। पता नहीं कब उसने जाब कार्ड में 32 दिन का रोजगार चढ़ाकर 3632 रुपये की मजदूरी स्वंय ले ली।

कई दिनों तक जाब कार्ड वापिस न मिलने पर रामन्ती ने वार्ड सदस्य से जाब कार्ड वापिस माँगा। वो बहाने करने लगा। उसके बहानों से रामन्ती को शक हुआ। छानबीन करने पर पूरी सच्चाई रामन्ती के सामने खुल गई। उसने गाँव के महिला संगठन की बैठक में वार्ड सदस्य की धोखाध्ड़ी की समस्या रखी। उस दिन बैठक में सितारा भी मौजूद थी। सितारा ने पूरी घटना की जानकारी खण्डविकास अधिकारी को दी तथा जाँच करने का आग्रह किया। बी.डी.ओ. के बात करने के तरीके से सितारा समझ गई कि ये कोई कार्यवाही करने वाला नहीं है।

वो कुछ महिलाओं को लेकर ब्लाक आफिस में बी.डी.ओ. से फिर मिली। बी.डी.ओ. जाँच का झूठा आश्वासन देकर चुप बैठ गया। इसी बीच महिलाओं ने सितारा के साथ मिलकर एक रणनीति बनाई। वार्ड सदस्य को बैठक में बुलाकर बताया कि उन्हें उसकी बेईमानी की सारी सच्चाई पता चल गई है। यदि वो लिखित माफी माँग ले, तो ही बच सकता है वरना वो सब उसके खिलाफ जाँच करवायेंगी। उसने सोचा, इनकी शिकायत से कहीं वार्ड मेम्बरी न चली जाये। लिखा हुआ देने पर ये अनपढ़ महिलाऐं क्या कर लेंगी और लिखित माफीनामें में पूरी घटना का स्पष्ट जिक्र कर दिया।

संगठन को यही चाहिए था। कुछ महिलाएं सितारा को साथ लेकर पुनः ब्लाक कार्यालय शिकायत करने पहुँची। वहाँ किसी ने महिलाओं की बात पर तवज्जो नहीं दी। हारकर महिलाओं ने पत्रकारों से संपर्क किया और पूरी घटना की जानकारी उन्हें दे दी। अगले दिन यह घटना सभी अखबारों की सुर्खियां बन गई। अखबारों में घटना की खबर पढ़कर मुख्य विकास अधिकारी ने बी.डी.ओ. को घटना की जाँच करने के आदेश दिये।

बी.डी.ओ. को सारी फसाद की जड़ सितारा ही दिखाई दी। उसने स्थानीय मुस्लिम समुदाय के प्रभावशाली लोगों और पंचायत सदस्यों से संपर्क कर उनके द्वारा सितारा पर दबाव बनाने की बहुत कोशिश की। दो सौ से ज्यादा लोगों की बैठक बुलाई गई। इसमें अकेली सितारा ही मुस्लिम महिला थी। सारे मुस्लिम प्रतिनिधि धर्म का वास्ता देकर मामले को रफादफा करने का दबाव डालते रहे।

सितारा हैरान थी। सितारा को लगा था, उसका हौसला देखकर सारा मुस्लिम समुदाय उसकी तारीफ करेगा। पर यहां तो मामला उल्टा था। सभी उस बेईमान को छोड़ देने की बात कर रहे थे। उसने बेखौफ साफ-साफ कहा-

‘‘मेरे धर्म ने मुझे सच्चाई से अन्याय का विरोध करना सिखाया है। इसलिए मैं महिलाओं का साथ दूँगी। मैं धर्म से पहले फर्ज निभाऊँगी। चाहे आप लोग मुझे धर्म से निकाल दें। सितारा की हिम्मत के आगे कोई दबाव नहीं टिका। बी.डी.ओ. को वार्ड सदस्य के खिलाफ रिपोर्ट देनी पड़ी और रामन्ती को उसके हक के 3632 रुपये मिल गये। सितारा की इस जीत के पीछे पूरे संगठन की ताकत थी। संघ की महिलाओं ने उसकी हिम्मत की तारीफ की।

आज सितारा मुस्कुरा रही थी। पर उसकी जिंदगी हमेशा मुस्कुराहटों से भरी नहीं रही। उसने तो बस कांटों भरे तथा पथरीले रास्ते ही देखे थे। अपनी जिंदगी के पिछले पृष्ठों को टटोलते ही उसे झुरझुरी होने लगती है। जिंदगी में तमाम अभाव थे। बस दो ही चीजें उसके पास थी- हिम्मत और साथ में कुछ सपने। इन्हीं के सहारे जिंदगी का सफर तय कर आज वो यह मुकाम पा सकी। मुश्किल से मुश्किल दिनों में भी उसके सपने जिंदा रहे।

सितारा कट्टर सुन्नी परिवार में 15 दिसम्बर, 1968 को देहरादून में पैदा हुई। उसे गिनना भी नहीं आया था,  तब भी उसके परिवार में 15 की गिनती बार-बार सुनाई पड़ती। अभावग्रस्त परिवार में 15 सदस्य थे जिनके मुँह के लिए निवाले जुटाना आसान नहीं था। दो भाई और तीन बहनों में दूसरे नम्बर पर सितारा थी। घर में अब्बू-अम्मी के अलावा दादा-दादी दो बुआ व चार-चार चाचा रहा करते थे।

वो नहीं जानती कि अचानक उसके पिता ने उसकी माँ तथा बच्चों को बिजनौर के पुश्तैनी मकान में क्यों भेज दिया। वे वहां के हालातों से समझौता कर ही रहे थे कि वालिद दुर्घटना का शिकार हो गए। कमाने वाला बीमार हो तो पैसों की दिक्कत होना लाजिमी था। उन दिनों खाने के नाम पर आलू का घोल ही होता था। अम्मी का उदास चेहरा देखकर बच्चे कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

बडे़ भाई ने मजदूरी शुरू की। भाई के कमाये दो रुपये से घर चलता। इसी बीच छोटी बहन बीमार हो गई। अब हाल ये था कि दो रुपये में घर के लिये खाना लिया जाये या बहन के इलाज पर खर्च किया जाये। यहाँ भूख ने बाजी मारी और बहन बिना इलाज के गुजर गई। धर्म ने यहाँ कुछ सहायता नहीं की। आस पड़ोस की लड़कियों को स्कूल जाते देख कर सितारा की भी पढ़ने की इच्छा होती।

उन्हीं दिनों उनकी एक रिश्तेदार की लड़की होमसांइस की परीक्षा का सामान ले जाने के लिए सितारा को अपने साथ स्कूल ले गई। स्कूल के माहौल ने सितारा पर जादू कर दिया। वो घरवालों के पीछे पड़ गई कि वह पढ़ेगी। उसके रोने-धोने से अजीज आकर उसका दाखिला यतीमखाने के स्कूल में कर दिया गया। कक्षा शुरू हुए 6 माह हो चुके थे। मेहनती सितारा ने 6 माह पढ़ने पर ही कक्षा एक पास कर ली। माँ थोड़ा खुश हुई। सितारा जाने क्यों उन्हें ज्यादा अच्छी लगती थी। पढ़ने जो लगी थी। शायद वो भी कभी पढ़ना चाहती होंगी!

अचानक ही वालिद ने परिवार को देहरादून बुला लिया। यहाँ पहला काम नन्हीं सितारा ने अपने लिए स्कूल ढूँढने का किया और जिदकर माजरा के महेशानन्द स्कूल में दाखिला ले लिया। स्कूल के बच्चे हाफटाइम में गडेरी, चाकलेट,  छोले खाते। सितारा की फीस के लिए भी पैसे नहीं होते थे तो उसे चाट खाने के पैसे कहाँ जुटते। वो मन मसोस कर रह जाती। एक दिन स्कूल जाते समय उसकी नजर 50 पैसे के सिक्के पर पड़ी। माँ ने वह किसी काम के लिये आले पर रखा था। सितारा की नीयत डोल गई। उसने चुपके से वह अठन्नी बस्ते में डाल ली। स्कूल जाते हुए जान बूझ कर वह अठन्नी सड़क पर गिराकर भाई से बोली-

‘‘अठन्नी गिरी है। चल उठाते हैं।’’ हाफ टाइम में दोनों भाई-बहन ने जमकर चाट-पकौड़े की ऐश उड़ाई। ऐसे मौके उन गरीबों को कहाँ से मिलते थे!

गरीब घर में 50 पैसे भी बहुत होते हैं। लौटने पर अम्मी ने पूछा कि आले पर रखे 50 पैसे किसने उठाए ? सितारा साफ मुकर गई। डाँट के डर से भाई ने पोल खोल दी कि सितारा को आज रास्ते में 50 पैसे मिले थे- अम्मी माजरा समझ गई। माँ ने सितारा की खूब पिटाई की। सितारा को क्या मालूम था कि अम्मी के लिये 50 पैसे की कितनी कीमत थी। माँ गुस्सा सितारा पर नहीं,  अपने हालातों पर उतार रही थी। पिटाई के बाद ऐसे कामों से सितारा ने तौबा कर ली। शायद अम्मी का दुःख भी उसे साल गया था।

वो छठी कक्षा में पहुँची ही थी कि वालिद फिर बीमार पड़ गए। कमाई का जरिया रुक गया। दादा-दादी ने कोई मदद नहीं की। हालात ये थे कि चार भाई-बहन तथा माँ एक ही चारपाई पर सोते थे। ऐसे में सितारा की पढ़ाई कैसे होती। पर माँ ने हिम्मत जुटाई- मुहल्ले से बुनाई का काम ले लिया। रात-रात भर बुनाई करती। सितारा माँ की बुनाई में सहायता करती-फिर थककर बगल में सो जाती। माँ के साथ बुनाई करते-करते सितारा जिंदगी के तानों-बानों को भी समझ रही थी। पिता की बीमारी के खर्चों की वजह से परिवार के खाने तक के लाले पड़ गए। इसके बावजूद सितारा ने स्कूल नहीं छोड़ा- इन्हीं हालातों में आठवीं पास की। शायद सितारा को यह समझ आ रहा था कि पढ़ाई ही परिवार की बीमारी का इलाज है।

माँ की हिम्मत तथा बेटी की दिलेरी ही थी कि विषम परिस्थितियों में भी पिता का स्वास्थ्य ठीक होने लगा। वे थोड़ा कामकाज करने लगे। घर के हालात कुछ सुधरे।

इधर घर के हालात सुधरे, पर सितारा के अपने हालात बिगड़ने लगे। वो 14 साल की हो गई थी। दादा ने स्कूल न जाने का फरमान सुना दिया- ‘‘सितारा बड़ी हो गई है। उसे पर्दे की हद में रहना होगा। घर से बाहर जाना वाजिब नहीं।’’

सितारा की समझ में नहीं आया कि जब वे भूखों मर रहे थे, तब दादा को कोई फर्ज याद नहीं आया- आज उसे अचानक पर्दे में बांधने,  बाहर जाने से रोकने के फर्ज पर ये मुस्तैदी क्यों ? पुरुषों के बनाए समाज पर यह उसका पहला सवाल था।

माजरा गाँव में आठवीं से आगे का स्कूल नहीं था। आगे पढ़ने देहरादून के कालेज में जाना था। दादाजी ने सख्त हिदायद दी- ‘‘हमारे खानदान की कोई लड़की बिना बुर्के के घर से बाहर नहीं जाती। ऐसे में सितारा स्कूल कैसे जा सकती है?’’

‘‘पता नहीं वो खानदान कहाँ था- जब हम भाई-बहन बिना खाए  सोते, बिना कपड़ों के सर्दी का मौसम काटते।’’-  सितारा सोचती। खानदान आया तो बस पढ़ाई रोकने और बुर्का पहनाने। बुर्के के नाम से ही उसे ऐसा लगता जैसे उसे कैद में जकड़ दिया गया है- वो जानती थी कि अगर उसने पढ़ाई छोड़ी तो ऐसे माहौल में वह जिंदा भी नहीं रह पाएगी।

विरोध की पहली सीढ़ी के रूप में उसने घर का सारा काम करना बंद कर दिया। कई दिनों तक खाना नहीं खाया। उसकी एक पक्की सहेली सुमन गुरुनानक स्कूल में दाखिला लेने जा रही थी। सितारा से रहा नहीं गया। वह भी घरवालों से लड़-झगड़ कर उसके साथ गुरुनानक स्कूल में एडमिशन फार्म भर आई। अम्मी के साथ बुनाई कर उसने कुछ पैसे जोडे़ थे। बचत के पैसे से एडमिशन की फीस जमा की। सुमन के किसी रिश्तेदार की सहायता से,  जो उसी कालेज में काम करता था,  उसे फीस माफी का फार्म भी मिल गया। फीस माफी की भी दर्खास्त दे दी। हिम्मत वालों का साथ खुदा के बंदे दे न दें- खुदा देता ही है। एडमिशन के साथ ही फीस माफ हो गई। यहाँ सब काम में अम्मी की पूरी सहमति थी।

सितारा के स्कूल जाने से घर में झगड़े बढ़ने लगे। परिवार के पुरुषों का अहम आड़े आ रहा था। उसका शहर के स्कूल में अकेले बस से जाना, जहाँ मर्द भी हों,  अपने समुदाय में उसके परिवार की बेइज्जती थी। कई बार लड़के पीछा करते,  ताने कसते,  इसकी सजा भी हर लड़की की तरह सितारा को ही मिलती। लड़कों द्वारा छेड़े जाने पर मार सितारा को पड़ती। सितारा के कारण अम्मी को बहुत कुछ सुनने को मिलता। हर ओर से पिसती अम्मी भी कभी-कभी कह देती- ‘‘मैं तुझे स्कूल भेज रही हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि तू अपनी मनमानी करने लगे।’’

वो समझ ही नहीं पाती कि बस में जाने पर, लडकों के ताने देने से उसकी मनमानी कैसे हुई। पर पढ़ाई की वजह से चुप रहती और अन्ततः लड़को की छेड़खानी की सजा उसको मिल गई। धर्म का वास्ता देकर घरवालों ने उसका स्कूल जाना बंद कर दिया। जब सितारा का पूरा परिववार भूखों मर रहा था,  उस समय ये धर्म काम नहीं आया। धर्म का वास्ता देकर डाले गये ये बंधन सितारा को कभी समझ नहीं आये। उसे पर्दे में डाल दिया गया।

परिस्थिति ने सितारा का साथ दिया। उसकी पढ़ाई के सबसे कट्टर विरोधी दादा जी का इन्तकाल हो गया। दादा के इंतकाल पर सितारा हंसी तो नहीं,  पर इत्मिनान की सांस जरूर ली। माहौल देखकर सितारा ने पढ़ाई के लिए माँ की खुशामद शुरू कर दी। सितारा की इच्छा समझकर, समझदार माँ ने इजाजत दे दी। सितारा फिर स्कूल जाने लगी।

परम्पराओं की छाया में पली सितारा की फूफी को सितारा की हरकतें बिल्कुल पंसद नहीं थी। वह परिवार और समाज के पुरुषों की ही भाषा बोलकर उसकी पढ़ाई की खिलाफत करती थी। हमेशा सितारा के वालिद से कहती- ‘‘तुम्हारी लड़की एक दिन भाग जायेगी। टोपी उछाल देगी, नाक कटवायेगी। खैर चाहते हो तो इसकी पढ़ाई बंद कर दो।’’

फूफी के उकसाने पर रोज घर में झगड़ा होता। सितारा पर पाबन्दियाँ लगनी शुरू हो गईं। पर्दे में रहोगी,  स्कूल बुर्का पहन कर जाओगी,  जोर से हंसोगी नहीं,  सहेलियों से नहीं मिलोगी। ढेरों दम घोटू हिदायतें। यहाँ तक कि अब वह स्कूल भी अकेले नहीं जा सकती थी। अम्मी फिर सहारा बनीं। सितारा की अम्मी बुर्का पहनकर उसे स्कूल छोड़ने,  लेने आने लगी। अन्य जगहों पर जाना तो एकदम बंद कर दिया गया था।

एक दिन, जब वो माँ के साथ स्कूल से वापस आ रही थी,  दो मनचलों ने उसका पीछा किया। वे स्कूटर में सवार हो उसके आगे-पीछे घूम-घूम कर परेशान कर रहे थे। सितारा का गुस्सा पूरे समाज पर तो था ही। इन्हीं के जैसे शोहदों की वजह से लड़कियों पर पाबन्दियाँ लगती हैं। उन शोहदों को न तो सितारा की हिम्मत के बारे में पता था और नहीं उसके अन्दर फूट रहे ज्वालामुखी का। अपनी हरकतों से बाज न आते लड़के जैसे ही पास आए,  सितारा ने स्कूटर को धक्‍का देकर लड़कों को गिरा दिया। एक तो झटपट उठकर भाग गया, पर दूसरे की किस्मत ऐसी नहीं थी। सितारा ने उसे पकड़कर पीटना शुरू किया। लोगों की भीड़ जमा हो गई। सितारा ने तो उसे पीटा ही, भीड़ ने भी दो-चार हाथ जड़ दिये। उसके बाद मजाल था कि कोई मनचला उसके आस-पास भी फटकता।

कठिन परिस्थतियों से जूझते हुए सितारा ने इण्टर पास कर लिया। वो डिग्री कालेज में पढ़ना चाहती थी। घरवालों ने आगे पढ़ाने से साफ इन्कार कर दिया। सितारा किस बूते पर लड़-झगड़कर डिग्री कालेज की पढ़ाई का हौसला कर पाती। कोई रास्ता सुझाई नहीं दिया और हार कर घर की चार दीवारी में कैद हो गई। चौखट से बाहर निकलना मुश्किल था। सहेलियों के घर जाने की सोचना भी गुनाह था। पाबन्दियों का हाल ये था कि सहेली के मिलने आने पर उसे छोड़ने बाहर तक जाने की हिम्मत करे तो भी उसे डांट पड़ती। एक बार तो घर की चौखट से बाहर झांकने भर से बड़े भाई ने पिटाई कर दी।

सितारा बुनाई का काम कर घर खर्च के लिए आय बढ़ाने में अम्मी का हाथ बंटाती। सितारा बंध नहीं सकती थी। उसने घर से बाहर आने-जाने का बहाना ढूँढ ही लिया। अम्मी को बुनाई का सामान लेने बाजार जाना झँझट लगता था। एक-आध बार वो माँ के साथ ही बुनाई का सामान लेने बाजार गई। मोल-भाव ठीक कर लेती थी सितारा। माँ अब अकेले उसे ही सामान लाने बाजार भेजने लगी। इस पर रोक-टोक कम होने लगी,  क्योंकि उसे हिसाब-किताब आता था। कोई उसे ठग नहीं सकता था। सबसे बड़ी बात- पैसे जो बचते थे। इस बहाने बाहर जाने की थोड़ी ढील मिल जाती थी।

जो आज सितारा झेल रही थी, अम्मी ने भी यही सब झेला होगा। इसलिए उनकी सहानुभूति सितारा के साथ थी। बुनाई का सामान लाने के बहाने सितारा सहेलियों से भी मिल लेती। अम्मी के साथ बुनाई कर उसने थोड़े पैसे भी जमा कर लिये थे। इसी बीच उसे एक सहेली से बी.ए. के फार्म आने का पता चला। वह बुनाई के सामान लाने के बहाने घर से निकली तथा सहेली के साथ जाकर देहरादून के एम.के.पी. गर्ल्‍स कालेज से बी.ए. का फार्म भर आई। ये राज उसने सिर्फ अम्मी के साथ बांटा। कभी-कभी कक्षाएं लगतीं तो माँ की चिरौरी कर उसे साथ ले जाती। बेटी क्लास में पढ़ती,  माँ बाहर बैठकर बुनाई करती।

माँ-बेटी दोनों मेहनती थीं। सितारा सुबह आठ बजे से शाम आठ बजे तक बुनाई करती। माँ घर का काम दिन में करती। रात के खाना बनाने में वो माँ का हाथ बटांती और फिर देर रात तक पढ़ती। इसी तरह उसने बी.ए. सेकेंण्ड इयर पास कर लिया। यही नहीं अपनी बुनाई के दम पर सितारा ने अस्सी हजार रूपये भी जमा कर लिए।

समाज पाबन्दियाँ लगा रहा था। प्रकृति बिना पाबंदी से काम कर रही थी। अब सितारा जवान हो गई। ‘‘जवान’’ लड़की घर की समस्या होती है- जिसका एक ही हल होता है- निकाह याने शादी। घर में सितारा के निकाह की चिन्ता होने लगी। माँ-बाप चुपके-चुपके आपस में बात करने लगे। उसकी मनमानी से परेशान भाई भी छुटकारा चाहता था- सितारा की शादी उन पर बोझ नहीं थी। उसने अपनी मेहनत से अस्सी हजार रुपये जो जमा किए हुए थे। इन पैसों से सितारा आगे पढ़ना चाहती थी, पर घरवालों के लिए यह शादी का खर्चा था। इस मामले में सितारा की एक न चली।

1990 में सितारा का निकाह तो हो गया पर विदाई नहीं हुई। बिना दहेज के ससुराल जा नहीं सकती थी। दहेज जुटाने में 6 माह लग गए। बीच-बीच में सास-ससुर आकर अपनी जरूरतों को किसी बहाने बताते रहते। दहेज की लिस्ट लंबी होने लगी। हैसियत के अनुसार दहेज जुटाया गया था- फ्रिज, कूलर, फर्नीचर, हैसियत भर सोना,  कपड़े धोने की मशीन, वगैरह। पर जब सितारा ससुराल पहुँची तो देखा सब नाराज हैं। वो लोग एक कलर टी.वी. चाहते थे- जो नहीं दिया गया था। उसी के लिये ताने दिए जाते। यह सिलसिला लम्बे समय तक चला।

ससुराल भी लम्बा चौड़ा था। पति के तीन भाई तथा पाँच बहने थीं। कुल 12 जनों का परिवार था। ससुर स्थानीय इण्टर कालेज में अध्यापक थे। निकाह के वक्त बताया गया था कि सितारा का शौहर दिल्ली में खाते लिखने का काम करता है। निकाह के बाद तो उसने अपने शौहर को घर पर ही देखा। दिल्ली गया ही नहीं।

ससुराल में बुर्का लाजिमी हो गया था। एक साल के भीतर ही उसकी बेटी पैदा हुई। यह खुशी उसी तक ही सीमित रही। लड़की के पैदा होने से शौहर और परिवार वाले खुश नहीं थे। बेटी के पैदा होने पर न छठ की,  न हमीमा किया और न कोई जश्न। अम्मी ने जरूर कुछ सामान बेटी के जन्म पर भेज दिया।

पढ़ी-लिखी सितारा आज के तौर-तरीके जानती थी। वो जानती थी कि बच्चे को टीके वगैरह लगवाने कितने जरूरी हैं। बेटी के पैदा होने के तीन माह बाद जब उसे वो टीका लगवाने जाने लगी तो शौहर नाराज हो गया। बोला-  ‘‘टीका लगवाने की क्या जरूरत है। मेरी भी तो पाँच बहने हैं,  किसी को टीका नहीं लगवाया,  सब ठीक हैं।’’  इस बात पर ही झगड़ा हो गया। शौहर बेटी को पंसद नहीं करता। वह कभी नहीं चाहता था कि सितारा बेटी की ज्यादा देखभाल करे।

सितारा ने लड़-झगड़ कर बेटी का टीकाकरण करवाया। परिवार में टकराहट शुरू हो गयी थी। सितारा अपने शौहर से खर्चा मांगती, वो खर्चा देने के बजाय झगड़ा व मारपीट करता और कहता, ‘‘मुझे पढ़ी-लिखी बीबी नहीं चाहिये थी, गाँव की बिना पढ़ी-लिखी बीबी चाहिए थी।’’ हालात ये थे कि बेटी के खर्चे तक के लिये सितारा अपनी माँ की मोहताज थी। सुबह-शाम गन्ने की सूखी पत्तियों से सारे परिवार के लिये खाना बनाती। ढाई किलो से ज्यादा आटे की रोटियाँ थेपती। आँखों से आँसू बहते। कभी धुंए से तो कभी अपनी परिस्थितियों से। हर वक्त काम,  साथ ही किसी न किसी बात पर या बहाने पर शौहर की मार।

जाहिल पति को सितारा की जहनियत पसंद न थी। वो हर बात पर सितारा पर शक करता। ‘यहाँ खड़ी किसे देख रही है ? मेरे पीछे किससे बात करती है ? देहरादून जाकर कहाँ-कहाँ जाती है ? किस-किस से मिलती है?’ ऐसे सवाल हर वक्त सितारा का पीछा करते। वो चुपचाप सहती। इसी में भलाई थी।

सितारा फिर गर्भ से थी। काम कम नहीं हुआ। पति की ज्यादतियाँ चालू थीं। इन स्थितियों के चलते सितारा को मजबूरन अपनी 8 माह की बच्ची को अम्मी के पास देहरादून भेजना पड़ा।

और फिर 1992 में उसने एक लड़के को जन्म दिया। सारे ससुराल वाले खुश,  लड़का जो हुआ था। लड्डू खिलाए गए, मिठाई बाँटी गई- खूब जश्न हुआ। सितारा को समझ में नहीं आया कि नया क्या हुआ जो इतने खुश हैं। जैसे बेटी पैदा हुई थी, वैसे ही बेटा। ये अबूझ पहेलियाँ थीं।

बेटे का खर्च परिवार वाले खुशी से उठा रहे थे। एक बार वे बेटे के लिये कपड़े खरीदने बाजार गए। बेटे के लिए सूट खरीदने के बाद बेटी के लिए फ्राक की मांग करते ही शौहर ने बाजार में ही हँगामा खड़ा कर दिया। घर आकर सितारा के घरवालों को, अम्मी को गाली देकर कहने लगे ‘‘अपनी बेटी को तो बिगाड़ ही रखा है, अब बेटी की बेटी को भी बिगाड़ रही हैं।’’

सितारा की ममता बेटी को देखना चाहती थी। शौहर मायके भेज ही नहीं रहे थे। घर में तनाव बढ़ रहा था। बहुत खुशामद पर शौहर तैयार हुआ। उसे देहरादून स्टेशन पर आटो में बैठाकर बोला, ‘‘तुम घर जाओ। मैं काम निपटा कर आता हूँ।’’ और अगले दिन तक भी नहीं आया।

पता चला कि पड़ोसी के घर नाराज होकर बैठा है। बार-बार बुलाने के बावजूद वो घर नहीं आया। जब वह खुद उसे बुलाने गई तो बिफर पड़ा। पता नहीं किस बात का गुस्सा था कि वो बाहर आकर सड़क पर मायके वालों के सामने ही उसे मारने लगा और यह कह कर चला गया कि वो अब उसे नहीं रखेगा। सितारा भी अब ज्यादा सह नहीं सकती थी। शरीर से टूटी और मन से बिखरी सितारा ने तय कर लिया कि अब वापस नहीं जायेगी। मायके में ही रहेगी। पर पड़ोसियों के तानों से वालिद-वालिदा परेशान हो गये। अम्मी-अब्बू की परेशानी समझकर वह 10 माह बाद सास की खुशामद करने के बाद इस शर्त पर पुनः ससुराल जाने को राजी हुई कि वे उसे बी.ए. फाइनल की परीक्षा देने की इजाजत देगें।

ससुराल में जाकर फिर वही खर्चे की तंगी। इस बार सितारा ने तय किया कि वह परिस्थितियों से समझौता नहीं करेगी,  उन्हें बदलेगी। उसने घर में ही बच्चों का स्कूल खोलने की ठानी। घर के बारमदे में स्कूल चलाने लगी। इससे घर में ही चार पैसों की आमदनी होने लगी। मायके में भी पैसे की तंगी तो थी ही। इसलिए सितारा छुप-छुपकर माँ को बेटी की देखभाल के लिए पैसे की मदद भी करने लगी।

परिवार की आर्थिक स्थिति में योगदान से ससुराल में अब उसकी बात सुनी जाने लगी। शौहर भी थोड़ा नर्म हुआ। स्थितियाँ पक्ष में देखकर सितारा ने पति को समझाया कि उन्हें कोई नौकरी करनी चाहिए। निठल्ले रहेंगे तो घरवाले भी इज्जत नहीं करेंगे। शायद अपनी इज्जत के ख्याल से शौहर ने मुस्लिम फंड में नौकरी कर ली। जून में सितारा अपनी बिटिया से मिलने मायके गई। वापस आने पर उसे एक नई बात पता चली। पता चला कि उसका शौहर किसी औरत के चक्कर में ज्यादा समय अपने एक दोस्त के घर बिताता है। उसने पीछा कर सच जानने की कोशिश की तो शौहर को पता चल गया। इसी बात पर पति ने इतना मारा कि बचने की भी उम्मीद नहीं थी। सास को सब पता था। फिर भी कहती थी, ‘‘परिवार की इज्जत की खातिर तुम्हें चुप रहना चाहिए।’’  ऐसी ‘इज्जत’ को सितारा समझ नहीं पाई।

एक दिन तो हद ही हो गई। सितारा के शौहर ने कहा, ‘‘मेरा दोस्त चाहता है कि तुम उसके साथ दोस्ती कर लो।’’ पहले सितारा को पति की यह ख्वाहिश समझ में नहीं आई। पर धीरे-धीरे पति की चालबाजी समझ गई। उसका शौहर चाहता था कि दोस्त सितारा के चक्कर में चुपचाप रहे  और वह दोस्त की बीबी के साथ जैसे भी चाहे  रहे। वह सितारा पर गैर मर्द के साथ दोस्ती का लांछन भी लगाना चाहता था। सब समझकर सितारा ने अपने पति को आड़े हाथों लिया। उसे बताया कि वो सब समझती है कि ऐसा क्यों चाहता है। सितारा शौहर के दोस्त के घर गई। उसने दोस्त के रिश्तेदारों से सब बातें कह दीं। उसने अपने शौहर के दोस्त का घर में आना बंद करा दिया।

अब सितारा को यह महसूस होने लगा था कि उसका शौहर उसके साथ रहना पंसद नहीं कर रहा है। उसने तो पत्नी के रूप में गूँगी गुडि़या चाही थी। सितारा सब कुछ देख समझकर गूँगी नहीं रह सकती थी। सितारा का शौहर मारपीट करता और गालियां देता,  उसके बाद माफी माँगता- मिन्नतें करता। जरूरत पड़ने पर पैर पकड़ लेता। हमारे समाज की हर औरत की तरह उसे लगता ये आदमी मुझे छोड़ेगा नहीं। वह इतनी ज्यादतियाँ तथा अपमान सहकर भी पति की एक मीठी बात से पिघल जाती।

आने वाले दिनों की आहट पहचान कर सितारा ने तैयारी शुरू कर दी। उसने दिन में स्कूल चलाया और रात को स्वेटर बुने। स्कूली बच्चों को टाफी, बिस्कुट बेचने लगी। घर के खर्च चलाने के बाद बचे पैसों को बैंक में जमाकर देती। पर शौहर अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। हद तो तब हुई जब वह अपने ममेरे भाई को यह सिखा-पढ़ाकर आया कि अपनी भाभी से अकेले में छेड़खानी करना। वो फोटो खींच लेगा। सितारा को बदनाम कर पीछा छुड़ा लेगा। इससे पहले कि वे अपने षड्यंत्र में सफल होते,  सितारा उनका इरादा समझ गई। उसने मामा के लड़के को डांट कर भगा दिया। इस सबके बावजूद उसका शौहर जलील करने की हरकतों से बाज नहीं आया। जलालत की जिंदगी और पति की हरकतों से तंग आकर सितारा ने अपने सास-ससुर से कहा कि इन हालातों में वह ससुराल में नहीं रह सकती। उसे मायके भेज दिया जाए। वे कहाँ मानते। ज्यादतियां दिन-ब-दिन बढ़ती गईं। ससुराल वाले झूठे इल्जाम लगाते। पति उसके चरित्र पर बेबुनियाद आरोप लगाता और मारपीट करता।

झूठे इल्जामों से अजीज आकर सितारा ने ससुराल वालों को धमकी दी कि वे उसके ऊपर लगाये इल्जाम का प्रमाण दें, नहीं तो वह अपने ऊपर मिट्टी का तेल छिड़कर जान दे देगी। उसकी ध्मकी से शौहर डर गया। उसने माना कि वो झूठे इल्जाम लगाता है।

पर इससे जिंदगी सरल कहाँ होने वाली थी। जब उसने इन सब बातों का जिक्र अपनी माँ से किया तो समाज के नियमों से डरी हर माँ की तरह उसकी माँ ने भी शौहर के सुधर जाने की दिलासा दिया। सितारा सिर्फ सह ही सकती थी। सोचती, कभी खुदा की नजरें इनायत उस पर भी हों और सितारा का नसीब चमके।

अचानक एक हादसा हुआ। उसके देवर का उठना-बैठना अपराधी प्रवृति के लोगों के साथ था। किसी मामले में जब उसके दोस्त पकड़े गए तो पुलिस वाले उसके देवर की खोज में घर पर आये। घर में सितारा, उसकी ननद तथा देवर थे। रात को लगभग तीन चार बजे 15-20 पुलिस वाले दरवाजा खटखटाने लगे। दरवाजा न खुलने पर वे आंगन की दीवार फलांग कर आंगन में आ गए। पुलिसवाले कमरे की कुण्डी बंदूक की बट से तोड़कर उसके देवर को जबर्दस्ती उठाकर ले गए। सारा परिवार डर गया, पर सितारा ने हिम्मत नहीं हारी। वह अपने स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के परिवार के सम्पर्क से किसी वकील के साथ थाने जाकर देवर को छुड़ा ले आई। घर का दरवाजा तोड़ने वाले तीन पुलिस के सिपाहियों को पहचान कर उनके खिलाफ रिपोर्ट भी लिखवा आई।

इस घटना से सुसराल वालों पर अच्छा प्रभाव पड़ा। कुछ दिन अच्छे बीते। पर सितारा को अभी बहुत कुछ देखना बाकी था। कुछ ही दिनों बाद सितारा की दूसरी बेटी पैदा हुई। दकियानूसी परिवार में बहू का दूसरी लड़की पैदा करने से बड़ा अपराध क्या हो सकता था ?  सितारा गोद में बेटी लिये सारा दिन अपराधी की तरह घर के काम करती- ताने सुनती। कुछ साल पहले ही बेटा जनकर वाह-वाही पाने वाली सितारा, दूसरी बेटी के आते ही अपराधी थी। ससुराल वालों के साथ ही शौहर का व्यवहार भी बदल गया।

अन्ततः सितारा ने तय किया कि वो उस परिवार के साथ नहीं रहेगी, जहाँ उसकी बेटियों की कोई गिनती नहीं। उसे हमेशा बड़ी बेटी की याद आती। उसके प्रति स्वंय को अपराधी महसूस करती। बेटी बड़ी होने पर जब पूछेगी कि सबके साथ तूने भी मुझे क्यों छोड़ा ? तो वह क्या जवाब देगी। सितारा मन मसोस कर रह जाती। ससुराल वाले उसे ही दोष देते। बेटी पैदा करने की जिम्मेदारी अकेली सितारा की तो नहीं थी, फिर वो अकेली अपराधी कैसे हो गई ? उसने पति को साफ-साफ कह दिया कि वह अब अपनी गृहस्थी अलग करेगी। पहले शौहर ने मना किया,  बहुत मिन्नतों के बाद वह मान गया और वो लोग देहरादून आकर किराये के मकान में रहने लगे।

सितारा के शौहर ने हकीमी का डिप्लोमा लिया था। सितारा ने स्कूल चलाकर तथा बुनाई से जो पैसा जमा किया था, उससे 20 हजार रुपये अपने शौहर को हकीम की दुकान खोलने के लिए दिये।

दो-चार दिन ठीक रहने के पश्चात शौहर फिर पुराने ढर्रे पर आ गया। उसके चरित्र पर इल्जाम लगा और बेटियाँ पैदा करने की तोहमत लगा, शराब पीकर मारपीट करने लगा। अगस्त 1998 की सुबह सितारा को कभी नहीं भूलेगी। इसी दिन सितारा ने अपने को सब से ज्यादा दुखी, अकेली तथा असहाय पाया था। यह भी सच है, इसी घटना ने उसकी जिंदगी को एक नया मोड़ दिया।

सितारा का शौहर दिलफेंक किस्म का इन्सान था। अपनी आदतों से बाज कहाँ आता ? देहरादून आकर फिर इश्क में फँस गया। धर्म ने उसे एक से अधिक शादी करने का विशेषाधिकार दिया हुआ था। 5 अगस्त, 1998 को सुबह-सुबह शराब के नशे में चूर,  झूठे इल्जाम लगा,  मारपीट कर तीन बार ‘तलाक, तलाक, तलाक’ कह  सितारा से बँधे निकाह के रिश्ते से मुक्त हो गया।

शौहर के मुँह से निकले ये शब्द सितारा के कानों में पिघले शीशे की तरह उतर गये। शौहर तलाक के हथियार से सितारा को मारकर चला गया। सदमें से सितारा कुछ समय तक तो उबर नहीं पाई। जिंदगी के सबसे हसीन और ऊर्जावान साल चूस कर उसके शौहर ने उसे तीन बच्चों के साथ तीन कपड़ों में चौराहे पर खड़ा कर दिया था। कोई रास्ता ऐसा नहीं था, जिधर उसे सहारा मिल सके। सितारा ने किसी तरह अपने को समेटा। अपनी माँ तथा सास दोनों को संदेशा दे बुला भेजा। माँ दौड़कर चली आई,  पर सास ने कहा, ‘‘मेरे बेटे ने जो करना था कर दिया,  तुम्हें जो करना है करो।’’

माँ उसे मायके ले आई। उसका दिल गुस्सा, मजबूरी, ग्लानि से भरा हुआ था। कचहरी के सामने गुजरते हुए अचानक उसने देखा कि वहाँ नईम (यही उसके शौहर का नाम था) एक औरत के साथ खड़ा है। उसे झटका लगा। जिस व्यक्ति ने उसे चैराहे पर ला खड़ा किया था, वही व्यक्ति एक दूसरी औरत के साथ निकाह के चक्कर में कचहरी में खड़ा था। सितारा का खून खौल गया। सब्र का बाँध टूट गया। वह दौड़ कर गई और बिना सोचे-समझे उस हैवान पर झपट पड़ी। उसकी गर्दन पकड़कर मारने लगी। लातों से,  घूंसों से, जिससे वह उसे मार सकती थी। उसके सामने तो तीन बेसहारा मासूम बच्चों के चेहरे घूम रहे थे। वहाँ पर खड़े वकील तथा अन्य लोग नईम को छुड़ाने लगे। उसे होश कहाँ था। गैरहोशी में बस इतना याद था कि इस शैतान ने उसे किस तरह पीटा, जलील किया है। जैसे-जैसे उसे याद आता,  पागलों’सी वह और जोर-जोर से उसे घूँसों-लातों से मारने लगती। भीड़ जमा हो गई। पुलिसवाले भी आ गए। उसने पुलिस वालों को बताया कि इस आदमी ने उसे सात-आठ साल से परेशान किया है। अपने शरीर पर पहले दिन की चोट के निशान दिखाए। पुलिस वालों के साथ उसे वह थाने ले गई। सितारा ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि इस व्यक्ति ने उसे जहर देकर मारने की कोशिश की है। इस पर पुलिस ने उस व्यक्ति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की तथा उसे जेल भेज दिया। उस व्यक्ति को अपना शौहर बताने में सितारा को शर्म महसूस होने लगी थी।

नईम को बड़ी मुश्किल से जमानत मिली। उसने नईम को सबक सिखाने की ठान ली। वो सोचती कितनी मुश्किल से मांग-तांग कर उसने बी.ए. पास किया है। जब इतना पढ़ने के बाद वो ही हार जायेगी तो उसके समाज की बाकी लड़कियाँ क्या करेंगी, जिन्हें चौखटों के अन्दर पर्दे में बंद कर बेजुबान किया हुआ है। उसे ऐसा कुछ करना है जिससे तलाक के तीन शब्द बोलकर बरी होने वाले आदमियों को कुछ सबक मिल सके।

सितारा ने नईम को वकील के मार्फत अपनी मेहर तथा बच्चों की सुपुर्दगी के मुकदमें का नोटिस भेजा। अब वो डर गया था। सितारा का विकराल रूप देख ही चुका था। उसने सितारा के वकीलों के सामने समझौते का प्रस्ताव रखा। लिखित समझौते के अनुसार सितारा को मेहर के तीस हजार रुपये,  दहेज का सामान तथा अपने बच्चों पर अधिकार मिल गया। तलाक के बाद मुस्लिम धर्म की रीति के अनुसार तीन माह दस दिन के लिये इद्दत की रस्म निभानी होती है। यह माना जाता है कि इद्दत की रस्म शौहर के तलाक देने या मर जाने पर कर्ज होती है। सितारा को लगा कि वह यह कर्ज ढो कर क्या करेगी। जब उसने वो रिश्ता ही थूक दिया तो कर्ज भी थूक देगी। उसने इद्दत की रस्म निबाही- यह मानकर नहीं कि उसे तलाक मिला है- बल्कि यह मानते हुए कि वह व्यक्ति मर गया है।

इद्दत के दौरान नमाज पढ़ते वह अक्सर अपने भविष्य के बारे में सोचती। फिर खुद ही उसे जवाब मिलता कि शौहर के नाम से जो शख्स उसके साथ रहता था, वह कोई जिम्मेदारी नहीं निभाता था। उसका जीवन ही दूभर किये था। अब उसे जो भी करना है, अपने लिये खुद ही करना है।

ऐसे अवसाद के दिनों में जब वो जिंदगी के सवालों से उलझ रही थी, उसकी अम्मी ने उसे मानसिक सहारा दिया। शायद ये एक औरत का दूसरी औरत के साथ समझ का और दर्द बांटने का रिश्ता था। अम्मी कहतीं, ‘‘फिक्र मत कर, जब तक मैं जिंदा हूँ- जितना होगा मिल बाँटकर खा लेंगे।’’

फिलहाल वो अपने मायके में ही रहने लगी। इद्दत की मुद्दत में सितारा ने तय कर लिया वो अपनी दोनों बेटियों की जिंदगी में इद्दत की सजा नहीं आने देगी। इसके लिए उसे समाज और धर्म से जितना लड़ना पड़े, वो लड़ेगी।

जहाँ वो फिलहाल रह रही थी, वहां अब भाई की छाया थी- छाया में रहने के लिये अपने अस्तित्व को मिटाना जरूरी था- हर बात के लिये हाथ फैलाना था- अपने आत्म सम्मान को खो देना था।

इद्दत की मुद्दत खत्म होते ही उसने घर में अपना फैसला सुनाया कि ‘वह कहीं कुछ नौकरी करेगी, जिससे उसे अपने बच्चों की परवरिश के लिये हाथ न फैलाना पड़े।’ भाई जो अब सर्वेसर्वा हो गया था, ने कहा, ‘‘उसे इस घर में रहना है तो पर्दे में रहे।’’

इस पर सितारा ने अपने भाई से कहा, ‘‘मेरे तीन बच्चे हैं। मुझे उनका भविष्य भी देखना है। तुम चाहते हो कि मैं घर से बाहर काम के लिए न जाऊँ, पर्दे में रहूँ तो ठीक है। तुम बच्चों की परवरिश के लिए मुझे तीन हजार रुपये हर महीने दे दो।’’ इस बात का जवाब भाई के पास न था।

अम्मी ने यहाँ भी उसका साथ दिया। उसका हौसला बढ़ाया। सितारा काम की तलाश में निकल पड़ी। किस्मत से उसे घर के पास ही एक संस्था में छह सौ रुपये महीने की नौकरी मिल गई। संस्था में सरकारी योजनाओं की जानकारी आमजन तक पहुँचाने का कार्य किया जाता था। उसने संस्था का कार्य समझा और मेहनत से काम करने लगी। पर संस्था से भी उसे धोखा ही मिला। दो महीने तक तनख्वाह न मिलने के कारण उसने वहाँ काम छोड़ दिया। बाद में संस्था प्रबंधक पर उसने कानूनी कार्यवाही हेतु दबाव बनाकर अपनी तनख्वाह ले ली।

नौकरी तो गई पर उसकी मेहनत व्यर्थ नहीं गई। संस्था में उसने जाति प्रमाण पत्र,  मूल निवास प्रमाण पत्र जैसे कागजात बनाने की तथा समाज कल्याण विभाग की योजनाओं की अच्छी जानकारी हासिल कर ली थी। वो लोगों के विभिन्न प्रमाण पत्र बनवाने व समाज कल्याण विभाग की योजनाओं हेतु आवेदन करने में सहायता करने लगी। लोग अपनी खुशी से, हैसियत के अनुसार 30 से 100 रुपये तक देते थे। इससे ही उसकी आय होने लगी।

वो लोगों के बीच जगह बनाने लगी। अपनी जरूरतों की जानकारी लेने के लिये लोग उससे मिलने लगे। इस तरह अजनबियों का सितारा से मिलना, उसकी तारीफ करना कई लोगों को पंसद नहीं आया। हमारे समाज में औरत किसी भी जाति धर्म की हो,  पुरूष वर्ग उसे मोहताज बना देखना चाहता है। जिससे उसकी लाचारी,  मोहताजी का फायदा उठा सके। फिर वो तो एक तलाकशुदा औरत थी जिसका कोई कथित मालिक नहीं था। वे तरह-तरह की बातें बनाते- पर सितारा जानती थी,  वो जो कर रही है सही कर रही है। उसने कोई परवाह नहीं की। तय कर लिया कि बहुत रो लिया,  बहुत सह लिया, अब और नहीं सहेगी। दुनिया जहान का उसूल है, रोतों को छोड़ कर आगे बढ़ते जाना। वो रोती ही रही तो जमाने के साथ समय भी उसके हाथ से छूट जायेगा।

सितारा की जिंदगी आसान नहीं थी। भाभी उसकी परिस्थितियाँ या तो समझ नहीं रही थी या अनजान बन रही थी। वो प्रमाण पत्र बनवाने और आवेदन करवाने में लोगों की मदद करने के लिये घर से बाहर रहने के कारण घर के कामों में हाथ नहीं बँटा पाती थी। भाभी इसी बात से नाराज रहती। भाई से शिकायत करती और भाई उससे लड़ता। सितारा समझ गई थी कि वो इस घर में ज्यादा नहीं रह पाएगी। अपने बूते ही इंतजाम करना होगा।

पड़ोस में एक सस्ता मकान बिक रहा था। सितारा ने अपनी जमा पूँजी-जेवर,  माँ की सहायता- सब कुछ जोड़ कर देखा। बहुत कम पैसे हो पा रहे थे। उसे डर था कि वो जब तक मकान खरीदने की रकम जोड़ पाएगी, तब तक कहीं मकान बिक ही न जाय। भले ही सितारा के पास रुपये कम थे, पर हिम्मत की कमी नहीं थी। बचपन से ही गुरबत से लड़ते रहने की ताकत उसके काम आई।

मकान को बेचने वाले मुश्ताक भाई शायद सितारा की मजबूरी जानते थे। वो थोड़ी-सी रकम लेकर सितारा मुश्ताक भाई से मिली, अपनी स्थिति बताई। उनसे अनुरोध किया कि मकान के बयाने के रूप में ये रकम कुबूल कर लें। वो कुछ दिनों में बाकी पैसे का इंतजाम कर लेगी। सितारा की स्थिति तथा हिम्मत देखकर मुश्ताक भाई मान गए।

धीरे-धीरे पैसे जोड़कर,  समाज कल्याण की योजना से तथा अन्य कई जगहों से ऋण लेकर सितारा ने मुश्ताक भाई से मकान खरीद लिया। मकान खरीदते वक्त जब वो मुश्ताक भाई का शुक्रिया अदा कर रही थी, उसकी आँखों में आँसू थे। पहली बार ये आँसू खुशी के थे। वो मुश्ताक भाई का अहसान कभी नही भूलेगी। अब सितारा अपने उस घर में रहने लगी जहाँ वो खुद मुख्तार थी। जहाँ से कोई उसे तीन कपड़ों में बाहर नहीं निकाल सकता था। जहाँ बच्चों की जिम्मेदारी के साथ उनका भविष्य उसका इन्तजार कर रहा था। दिनभर संघर्ष की थकान के बाद जहाँ कोई भी शख्स उसकी नींद में खलल डालने वाला नहीं था। समझदार सितारा ने अपने को बच्चों के साथ एक कमरे में समेट लिया। दो कमरे किराये पर दे दिए। मकान के किराये से उधर चुकाने लगी- तीन बच्चों के साथ जिंदगी कम आय में काटनी मुश्किल हो रही थी। संस्था के साथ कार्य करते हुये उसे जानकारी हो गई थी कि तलाकशुदा औरत बच्चे पालने के लिए अपने शौहर से मुवावजा ले सकती है। उसने तय किया कि जिस व्यक्ति की वजह से वो इन हालातों में हैं, बच्चों की परवरिश के लिये उसी से खर्चा माँगेगी। उसके पास बच्चों की परवरिश के लिए ही पैसे नहीं थे- तो मुकदमा लड़ने का खर्चा कहाँ से आता ? काफी कोशिश के बाद उसने एक ऐसे वकील को ढूँढ लिया जो मुकदमा जीतने के बाद ही फीस लेने को तैयार था।

जैसे ही नईम  को मुकदमे का नोटिस मिला, उसने बिजनौर से बच्चों की गार्जियनशिप का उल्टा मुकदमा कर दिया। अब सितारा डरने लगी कि इस नये मुकदमे को लड़ने के लिए खर्च कहाँ से आएगा। अन्ततः हिम्मतवालों का साथ मुकद्दर भी देता है। उन्हीं दिनों सितारा को हरिद्वार में स्वजल परियोजना में फील्ड वर्कर का कार्य मिल गया- जिससे उसे साढ़े चार हजार मानदेय मिलने लगा। सितारा की हिम्मत बढ़ गई। इससे मुकदमा लड़ने में सक्षम हो गई। साथ ही बच्चों की पढ़ाई भी जारी रही।

इसी बीच नईम ने दूसरी शादी कर ली थी। ये सितारा के हक में रहा। जब सितारा ने कोर्ट में नईम की दूसरी शादी साबित कर दी तो नईम गार्जियनशिप का मुकदमा हार गया। सितारा की जिंदगी में आर्थिक कठिनाई बनी रही। दुनिया में बुरे लोगों के साथ अच्छे लोग भी हैं। स्वजल परियोजना में काम के लिए हरिद्वार जाने को भी पड़ोसी गलत तरीके लेकर उसे बदनाम करते। लेकिन वहीं ऐसे भी अनजान लोग थे जिन्होंने सितारा की सहायता की। ऐसे ही एक शख्स सलमान साहब थे। हरिद्वार ट्रेन में जाते वक्त उनसे मुलाकात हुई। औपचारिक बातों के बाद जब उन्होंने परिवार के बारे में पूछा तो सितारा ने कहा कि शौहर मर गया है- तीन बच्चे हैं- उनको किसी तरह पालती हूँ। सलमान साहब ने अपने संपर्कों से हिम ज्योति फाउंडेशन से उसे आर्थिक सहायता दिलवाई। बच्चों के बीमार पड़ने पर सलमान साहब ने ही मुख्यमंत्री निधि से बच्चों का इलाज करवाया।

जिंदगी के कठिन सफर के बावजूद सितारा टूटकर थकने वाली नहीं थी। ऐसे वक्त में भी उसने स्वर्ण जंयती रोजगार योजना से चालीस हजार रुपये कर्ज लेकर मकान में एक कमरा और बनवा दिया तथा किराये के पैसों से ऋण चुका दिया।

गुजारा भत्ता का मुकदमा चल ही रहा था कि उसे खबर मिली, नईम ने दूसरी बीबी को तलाक देकर तीसरी शादी कर ली है। उसने ये तमाम सबूत कोर्ट में पेश किए और अपनी तथा बच्चों की परवरिश के भत्ते का मुकदमा जीत गई। कोर्ट ने फैसला दिया कि नईम सितारा को बच्चों की परवरिश के लिए 3000 रुपये मासिक अदा करे। नईम हाई कोर्ट गया। सितारा ने किसी तरह हाई कोर्ट में वकील किया। नईम को वहाँ भी नहीं छोड़ा। वहाँ से भी जीत कर डिस्ट्रिक कोर्ट से रिकवरी के आदेश ले आई। पैसे न देने पर नईम के खिलाफ वांरट जारी हो गए। वो भोपाल भाग गया। सितारा उसका ऐसे इंतजार करती रही जैसे बिल्ली चूहे का। पर वो हत्थे नहीं आया। उसने नईम का मकान कुड़क करवाकर नीलाम करवाया तथा अपने सत्ताइस हजार रुपये वसूले।

मुकदमें के दौरान परेशान नईम सितारा से गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘तू अब क्या चाहती है?’’ सितारा ने शान्त होकर कहा, ‘‘मैं तुझे इतना परेशान करना चाहती हूँ कि तेरी सात पुश्तें याद रखें  और वे औरत के साथ ऐसा बर्ताव न करें, जैसे तूने मेरे साथ किया है।’’ नईम मुँह ताकता रह गया।

मुकदमेबाजी में तीन वर्ष गुजर गये थे। हरिद्वार में स्वजल परियोजना समाप्त हो गई। सितारा बेरोजगार हो गई। ऐसे मुश्किल वक्त में सितारा की हिम्मत उसकी माँ तथा मुश्ताक भाई ने बढ़ाई। सितारा खुद बेरोजगार थी पर वह मां के लिए जो बूढ़ी हो चली थी, कुछ करना चाहती थी। उसके मायके का मकान कच्चा था। वह चाहती थी कि उसकी अम्मी भी पक्के मकान में रहे। सितारा ने दौड़भाग की। मकान के कागजात बैंक में जमाकर माँ के नाम से लोन लिया। प्रधानमंत्री ग्रामीण योजना तथा समाज कल्याण से अनुदान का इंतजाम किया और माँ की काबिल बेटी ने पक्के मकान में 12 कमरे बनवायें। माँ-बाप समझ चुके थे कि काबिल बेटी एक अलग ही मिट्टी की बनी है।

इस सबके बावजूद सितारा मन ही मन दुखी थी। बेरोजगारी ने बच्चे पालना मुश्किल किया हुआ था। ऐसे मुश्किल दौर में सितारा ने अखबार में महिला समाख्या का विज्ञापन देखा। हालात ये थे कि रजिस्ट्री तक के पैसे पास में नही थे। मुश्ताक भाई ने फिर साथ निभाया और आवेदन के लिये रजिस्ट्री के पैसे दिये।

महिला समाख्या में पहले लिखित परीक्षा हुई फिर साक्षात्कार। घर के काम में ही व्यस्त होने तथा रोजी-रोटी के लिए ही दौड़भाग करने के चक्कर में सितारा की पढ़ाई छूट गई थी। लिखित परीक्षा बहुत अच्छी नहीं हुई। इंटरव्यू में सितारा ने साफ-साफ अपनी स्थिति तथा जीने के लिए की गई लड़ाइयों के बारे में बता दिया। महिलाओं की स्थिति तथा व्यक्तिगत जिंदगी के विषय में उससे कितने ही सवाल किए गए। साक्षात्कार कर्ताओं को उसके जीवन के संघर्ष में ऐसा कुछ दिखाई दिया कि उसे महिला समाख्या में काम का मौका मिल गया।

एक बार फिर सितारा थोड़ी-सी चैन की साँस ले सकती थी। सितारा बहुत-सी संस्थाओं में काम कर चुकी थी- पर उसने महसूस किया कि महिलाओं के बारे में इतनी गहराई से छोटी-छोटी बातों पर कोई वैसा ध्यान नहीं देता, जैसा महिला समाख्या वाली बहनें देतीं। शुरू-शुरू में तो समझ ही नहीं पाई कि क्यों ये लोग सिर्फ काम की ही बात नहीं करते ?  क्यों एक-दूसरे के सुख-दुख बाँटते हैं, जैसे सब उनके अपने घर के ही हों ? ऐसा तो उसने किसी और संस्था में नही देखा था। वह बड़ी असमंजस में रहती थी।

सितम्बर, 2006 को उसे कार्य अनुभव के लिए पौड़ी जिले के थलीसैण ब्लाक भेजा गया। पौड़ी जिले का सबसे बीहड़ इलाका,  सितारा ने कभी इतने ऊँचे पहाड़ और इतनी कठिन चढ़ाई नहीं देखी थी। पर उसकी जरूरत ने उसका साहस बनाये रखा। उसे गढ़वाली समझ में नहीं आती थी। गाँव की सब महिलाऐं और महिला समाख्या की साथिनें गढ़वाली में ही बात करतीं। साथी बहनें  सितारा को विस्तार से बाद में समझाती कि गाँव संघ की बहनें क्या बातचीत कर रही थीं। मुस्लिम होने के बावजूद गाँव की महिलाएं भी उसे परिवार की सदस्या की तरह समझतीं। औरतों ने गाँव में संघ बनाए हुए थे। संघ सदस्याएं अपनी साझी तथा व्यक्तिगत समस्याओं को वहाँ बाँटती- समाधन ढूँढ़ने की कोशिश करतीं। सितारा को यह सब अच्छा लगा- वह खुद भी हल्का महसूस करने लगी।

महिला समाख्या की पौड़ी इकाई के कार्यक्षेत्र में काम का अनुभव लेने के बाद उसे ऊधमसिंह नगर में कार्य करने का मौका मिला। वो साथी कार्यकर्ताओं के साथ काम सीखती और गाँव-गाँव में महिलाओं का संगठन बनाती।

पहली बार उसे पता चला कि समाज में उसके अलावा भी महिलाओं की जिंदगी में कठिन संघर्ष गाथाएं छिपी हुई हैं। जिंदगी, समाज, रूढि़वादिता से वही अकेली संघर्ष नहीं कर रही है, बल्कि हजारों महिलाएं या यों कहें हर महिला किसी-न-किसी स्तर पर ये लड़ाइयाँ लड़ रही हैं। वह कार्यक्रम में जुड़कर महिलाओं की स्थितियों,  उसके कारणों पर समझ विकसित करने लगी। गहराई से सोचने लगी।

पर यहाँ भी उसे सुकून नहीं मिला। हमारे समाज में तलाकशुदा अकेली औरत पुरुषों के नजर में सर्वसुलभ मानी जाती है। पुरुष मानसिकता उसे सार्वजनिक सम्पत्ति समझने की भूल हमेशा से ही करते आई हैं। लोग पूछते, वो कौन है ? एक मुस्लिम महिला अकेले क्यों रह रही है? कई बार काम के लिए रात को गाँवों में भी रहना पड़ता। लोग सोचते कि ये रात-रात भर कहाँ रहती है ? इसका पति कहाँ है ? वे उससे किसी-न-किसी बहाने पूछते। वो जानती थी कि उसे अकेली समझ, सहानुभूति के नाम पर ये भेडि़ये उसके साथ क्या कुछ नहीं कर सकते। उसने शुरू-शुरू में झूठ बोला कि मेरा शौहर देहरादून में मोटर मैकेनिक है- बच्चे उन्हीं के पास रहते हैं।

फिर लोगों ने उसके बारे में छानबीन शुरू की- महिला समाख्या कार्यालय में शिकायत की कि ये रात-रात कहाँ रहती है? महिला समाख्या में सबने उसे इन परेशानियों से उबरने में सहयोग दिया। सितारा ने लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दिया- कोई जवाब नहीं दिया। मेहनत से अपना काम करती रही। वो जान रही थी कि वक्त आने पर उसके काम पर की गई मेहनत ही उसकी गवाही देगी। झक मार कर लोग चुप हो गए। धीरे-धीरे सितारा के काम की चर्चा उन तक पहुँच ही रही थी। सितारा महिला समाख्या में रहकर अपना एक और सपना पूरा करने की ओर बढ़ी। एम.ए. की परीक्षा दी और पास हो गई।

उसके बच्चे जो अब बड़े हो गए हैं, माँ के पास देहरादून रहते हैं। उसने महिला समाख्या से जो भी सीखा- उससे केवल गाँव की महिलाओं की सहायता नहीं की वरन अपने आप को भी मजबूत किया।

महिला समाख्या उसके परिवार की तरह है। उसके बच्चों की अब वही एक माँ नहीं- सभी साथिनें उनकी माँ हैं- उनकी चिंता करने वाली हैं। व्यक्तिगत जीवन में भी अब वह उन्ही के अनुभवों तथा सलाहों से काम करती है। महिला समाख्या ने उसे आर्थिक मदद तो दी ही है, उससे ज्यादा तो गाँव की औरतों से रिश्ते, अपनापन तथा अन्दरूनी ताकत दी है, जो शायद ही कहीं से मिल पाती। वह महिला समाख्या की ऋणी है। जब भी वह महिलाओं की समस्या, मुद्दे सुलझाती है उसे नहीं लगता कि वो किसी और औरत की समस्या सुलझाने जा रही है। उसे तो लगता है वह अपने ही जीवन की गाँठ खोल रही है। सैकड़ों औरतों के साथ से उसके संघर्ष को धार मिल गई है।

उसने गाँव में जो महिला संघ बनवाए, वे ही उसकी ताकत बन गए हैं। प्रशासनिक अधिकारी उसका सम्मान करते हैं। अब उन्हें तलाकशुदा अकेली सितारा नहीं दिखती- बल्कि उसके पीछे खड़ी महिलाओं की फौज दिखाई देती है, जिन्हें सितारा ने संगठित किया है। वो सोचती है, ‘हम औरतें सारी दुनिया में एक क्यों नहीं हो जातीं। जाति-धर्म में बँटी हम औरतों को तोड़ना पिद्रशाही के ठेकेदारों के लिए कितना आसान होता है, पर महिलायें कभी तो अपना हक समझेंगी और एक होकर इस समाज की समानता की लड़ाई लडेंगी।’

कहाँ हैं हम अकेली,  दीदी लोग नारीवादी आन्दोलन के संघर्ष के बारे में लगातार बताती हैं। हम सब उसी संघर्ष का हिस्सा हैं। हम लडे़गी, टूटेंगी, बिखरेंगी तो एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेंगी, यही सच है। एक दिन तो हमारा होगा। आने वाले दिनों के बारे में सोच कर ही वो मुस्करा दी।

‘‘सितारा ऐसे अकेले क्यों मुस्करा रही हो?’’  प्रमिला ने पूछा। मुद्दा सुलझाकर जा रही सितारा को अकेले-अकेले मुस्कराता देख प्रश्न पूछना लाजिमी था। सितारा क्या बताए, उसने आज फिर एक औरत की मदद की है। आज फिर उसने एक गाँठ खोली है। आज फिर बोझ हल्का हुआ है। सहेली की पीठ पर धौल जमाती हुई वो बोली, ‘‘मेरा भी तो हक है मुस्कराहट पर!’’

सरसों के फूलों से भरे खेत के बीच की पगडण्डी पर चलती दोनों सहेलियाँ खिल खिला कर हंस पड़ीं। उनकी खिलखिलाहट सुनकर उनके आगे चल रहा कुत्ता चौंककर भाग गया।

(महिला समाख्‍या उत्‍तराखंड द्वारा प्रकाशित पुस्‍तक ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे’ से साभार)

बादल सरकार- एक परिचय : अशोक भौमिक

सुप्रसिद्ध रंगकर्मी बादल सरकार का 13 मई को कलकत्‍ता में निधन हो गया। उन पर वरिष्‍ठ चित्रकार अशोक भौमिक का आलेख-

15 जुलाई, 1925 को कोलकाता के एक ईसाई परिवार में बादल उर्फ सुधीन्द्र सरकार का जन्म हुआ। पिता महेन्द्रलाल सरकार स्काटिश चर्च कॉलेज में पढ़ाते थे और विदेशियों द्वारा संचालित इस संस्था के वे पहले भारती प्रधानाचार्य बने थे। मां, सरलमना सरकार से बादल सरकार को साहित्य की प्रेरणा मिली।
1941 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक पास करने के बाद वे शिवपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में भर्ती हुए और 1946 में वे सिविल इंजीनियर बने। इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ते समय वे मार्क्‍सवादी विचारधारा और राजनीति से सघन रूप से जुड़ गए। कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय रूप से कई वर्षों तक जुड़े रहने के बावजूद, बाद में वे पार्टी राजनीति से अलग हट गए।
बादल सरकार ने 1947 में नागपुर (तब मध्‍य प्रदेश) के पास एक निर्माण संस्‍था में पहली नौकरी की। बाद में वे फिर कोलकाता लौट आए जहां उन्होंने जादवपुर और कोलकाता विश्वविद्यालय में इंजीनियर की नौकरी की। वे उन दिनों नौकरी के साथ-साथ शिवपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में सायंकालीन कक्षाओं में ‘टाउन प्‍लानिंग’ का डिप्‍लोमा के लिए पढ़ाई करते रहे।
1953 में दोमादर वैली कारपोरेशन की नौकरी लेकर माइथन गए। माइथन में बादल सरकार 1956 तक थे। इसी दौरान नाटक के प्रति उनका रुझान दिखने लगा। दफ्तर के सहकर्मियों के साथ मिलकर एक अभिनव रिहर्सल क्‍लब की शुरुआत की जहां, बादल सरकार के शब्‍दों में ‘रिहर्सल होगा पर नाटक का मंचन कभी नहीं होगा।’ जैसा अभिनव नियम लागू किया गया था, पर बाद में सदस्यों के उत्साह से इस नियम में तोड़कर नाटकों के मंचन की शुरुआत हुई।
बचपन से ही बादल सरकार नाटकों के प्रति आकर्षित थे। उन्हें नाटकों में हास्य रस सबसे ज्यादा पसंद था, लिहाजा यह स्वाभाविक ही था कि उनके प्रारंभिक नाटकों में हमें यह तत्व ज्यादा मुखर दिखता है। वे इसे ‘सिचुएशन कामेडी’ कहते हैं।
उनका 1956 में लिखा गया पहला नाटक ‘सल्यूशन एक्स’ था। यह नाटक एक विदेशी फिल्म, Monkey Business की कहानी पर आधारित एक सिचुएशन कॉमेडी के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
1957 से 1958, इन दो वर्षों के दौरान उन्होंने इंग्लैंड में ‘टाउन-प्‍लानिंग’ को कोर्स करने के साथ-साथ नौकरी की। इसी दौरान उन्‍हें प्रसिद्ध अभिनेताओं का अभिनय देखने का मौका मिला। विवयन ली, चार्लस लैटन, माइकल रॉडरेथ, मार्गरेट कॉलिन्‍स आदि के अभिनय और वहां के रंगकर्म से वे बेहद प्रभावित हुए। पर शायद उनके ‘तीसरे रंगमंच’ की नींव की पहली ईंट के रूप में फ्रेंच कवि रासिन की कृति ‘फ्रिड्रे’ नाटक को देखने का अनुभव था। 21 फरवरी, 1958 को देखे गए ‘थिएटर-इन-राउण्‍ड’ में इस प्रस्तुति के बारे में अपने अनुभवों को डायरी के पन्नों में दर्ज करते हुए उन्होंने लिखा था, ‘आज जो देखा उसे कभी भुला न पाऊंगा।‘ मुक्त मंच के इस अनुभव को हम वर्षों बाद उनके तीसरे रंगमंच की अवधारणाओं में विकसित होते देख पाते हैं।
इंग्लैंड प्रवास के दिनों में ही उन्होंने ‘बोड़ो पीशी मां’ (बड़ी बूआजी) लिखा। इसी समय उन्‍होंने एक छोटा नाटक ‘शनिवार’ लिखा। यह नाटक जी.बी. प्रिस्‍टले के नाटक ‘एन इन्स्पेक्टर कॉल्स’ पर आधारित था। 1959 में वे इंग्लैंड से कोलकाता लौट आए और आते ही अपने उत्साही मित्रों के साथ ‘चक्रगोष्ठी’ नाम से एक नाट्य संस्था की नींव रखी। हर शनिवार को इस गोष्ठी में नाटक के साथ-साथ संगीत, साहित्‍य, विज्ञान आदि विभिन्न विषयों पर चर्चा होती थी।
इसी ‘चक्रगोष्ठी’ के प्रयास से उनके कई आरंभिक नाटकों से दर्शक परिचित हुए। ‘बोड़ो पीशीमां’, ‘शोनिबार’, ‘समावृत’, ‘रामश्यामजदु’ आदि जिनमें प्रमुख हैं।
इसके बाद बादल सरकार फ्रांस सरकार के आर्थिक अनुदान पर वहां गए और फिर तीन वर्षों तक नाइजीरिया में नौकरी की। इस विदेश प्रवास के दौरान उन्होंने ‘एबों इन्द्रजित’, ‘सारा रात्तिर’, ‘बल्लभपुरेर रूपकथा’, ‘जोदी आर एकबार’, ‘त्रिंश शताब्दी’, ‘पागला घोड़ा’, ‘प्रलाप’, ‘पोरे कोनोदिन’ जैसे महत्वपूर्ण नाटक लिखे।
देश में लौटने के पहले ही ‘एबों इन्द्रजित’ बहुरूपी नाट्य पत्रिका में (अंक : 22, जुलाई, 1965)  प्रकाशित हुआ। इसके प्रकाशन के साथ ही बादल सरकार की ख्याति चारों ओर फैल गई। इसका पहला मंचन ‘शौभनिक’ नाट्यसंस्था ने 16 दिसंबर, 1965 को किया। नाटक के प्रकाशन और मंचन ने नाट्य जगत में मानों धूम मचा दी। 1968 को उन्हें इस नाटक के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
नाइजीरिया से देश लौटने के तुरंत बाद उन्होंने ‘बाकी इतिहास’ लिखा। उन दिनों शंभु मित्र रंगमंच के शीर्षस्थ व्यक्तियों में थे। उनकी नाट्य संस्था ‘बहुरूपी’ ने ‘बाकी इतिहास’ का सफल मंचन किया।
ये दोनों नाटक उनके सिचुएशनल कामेडी वाले नाटकों से बिल्कुल भिन्न थे- जो भारतीय रंगमंच में एक नए युग का संकेत था।

1967 में उन्होंने अपने साथियों के साथ ‘शताब्दी’ नाट्य संस्था की स्थापना की। 18 मार्च, 1967 को रवीन्द्र सरोवर मंच से ‘शताब्दी’ ने अपनी रंगयात्रा शुरू की। 1956 से लेकर 1967 तक के सभी नाटक बादल सरकार ने प्रोसेनियम मंच के लिए लिखे थे। लिहाजा ‘शताब्दी’ की आरंभिक प्रस्तुतियां प्रोसेनियम ही थीं।
1971 से रंगमंच को लेकर बादल सरकार की अवधारणाएं तेजी से बदलने लगी थीं और वे निरंतर प्रयोग कर रहे थे। प्रयोगों के इस दौर से गुजरते हुए वे ‘तीसरे रंगमंच’ तक जल्द ही पहुंच सके। वे मानने लगे थे कि ‘नाटक एक जीवंत कला माध्यम है- Live slow ! लोगों का दो समूह- एक ही वक्‍त, एक ही स्‍थान पर इकट्ठे होकर एक कला माध्‍यम के साथ जुड़ रहे हैं- अभिनेताओं और दर्शकों के दो समूह के रूप में। यह एक मानवीय क्रिया है- मनुष्‍य का मनुष्‍य के साथ जुड़ाव। सिनेमा हमें ऐसे प्रत्‍यक्ष जुड़ाव का मौका नहीं देता।’ ऐसे ही विचारों से रंगमंच पर प्रयोग करते हुए, उन्‍होंने अन्‍तत: रंगमंच को सार्थक कला माध्‍यम के रूप में स्‍थापित करने के उद्देश्‍य से, प्रोसेनियम रंगमंच को त्याग, तीसरे रंगमंच को आम जनता तक एक ‘फ्री-थिएटर’ के रूप में ले जाने में कामयाबी हासिल की।
1970 से 1993 तक बादल सरकार के सभी नाटक तीसरे या विकल्प के रंगमंच को ध्यान में रखकर लिखे गए। ‘शताब्दी’ के अलावा पूरे देश में इन नाटकों को विभिन्न भाषाओं में, छोटे-बडे़ शहरों-कस्‍बों में विभिन्‍न नाट्य संस्‍थाओं द्वारा खेला गया। बादल सरकार के तीसरे रंगमंच ने भारत की भाषाई,  प्रांतीय और सांस्कृतिक दूरियों को खत्म कर पहली बार एक सार्थक भारतीय रंगमंच विकसित करने की दिशा में एक सफल प्रयास किया। मराठी,  हिंदी,  पंजाबी, गुजराती,  मलयाली, कन्नड़,  ओडिय़ा आदि भारतीय भाषाओं में उनके नाटक मंचित हुए और किसी न किसी रूप में देश के सभी प्रांतों के रंगकर्मियों को तीसरे रंगमंच ने अपनी ओर आकर्षित किया।
हाल ही में प्रसिद्ध कला और साहित्य समीक्षक चिन्मय गुहा ने बादल सरकार के जीवन और कृतित्व पर चर्चा करते हुए ‘आनंद बाजार पत्रिका’ 18 जुलाई, 2008 में लिखा है कि जो बेहद गौरतलब है- ‘आज से सौ वर्ष बाद शायद इस बात पर बहस हो कि क्या बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के संधि काल में, एक ही साथ तीन-तीन बादल सरकार हुए थे जिनमें से एक ने सरस पर बौद्धक रूप से प्रखर
संवादों से भरे, कॉमिक स्थितियों की बारीकियों पर अपनी पैनी नजर साधे, बेहद प्रभावशाली हास्य नाटक लिखे थे।
दूसरे, जिन्होंने समाज में हिंसा के, विश्व राजनीतिक खींचातानी के चलते युद्ध की काली परछाई के,  परमाणु अस्त्रों के,  आतंक के और समाज में बढ़ती आर्थिक असमानता के खिलाफ अपनी आवाज को अपने नाटकों में दर्ज किया था।
और तीसरे, जिन्होंने प्रेक्षागृहों के अंदर कैद मनोरंजन प्रधान रंगमंच को एक मुक्ताकाश के नीचे आम जनता तक पहुंचाने का सपना देखा था।’

आज से सौ वर्ष बाद के पाठकों को शायद इन तीनों बादल सरकार को एक ही व्यक्तित्व के रूप में चिह्नित करने में कठिनाई होगी। लेकिन राहत की बात कि भारतीय जनता के सुख-दुख, उनकी चिंताओं,  उनकी समस्याओं और सत्ता द्वारा उनके शोषण की समानता के चलते उनकी जो एक विशिष्ट  पहचान बनी थी- भाषा, प्रांत और संस्कृति के बीच की दीवारों को तोड़े कर बनी थी। इसी विशिष्ट
पहचान को आधार मानकर भारतीय रंगमंच का विकास संभव हुआ था। बंगाल का ‘मिछिल’ कब पूरे देश का जुलूस बन गया था, यह जानना दिलचस्प रहेगा। रंगाबेलिया गांव का ‘भोमा’ कैसे अधूरे आर्थिक विकास का शिकार बन पंजाब के खेतों के काम कर रहे बिहार के मजदूरों के बीच दिख गया था। जर्मन नाटककार ब्रेष्ट  का नाटक ‘कॉकेशियन चाक सर्कल’, भारत के भूमिहीन मेहनतकश खेत
मजदूरों की कहानी कैसे बन सकी थी और यह भी कि काल और स्थान की सीमाओं को तोड़कर कैसे आम भारतीय के लिए रोमन क्रीतदास ‘स्पार्टकस’  की कथा उनके लिए इतना प्रासंगिक हो गया था। ‘बासी खबर’ नाटक के इन संवादों को, जो दरअसल ‘समाचार’ में रूप में दर्शकों को पेश किए गए थे, उन्हें वे किस रूप में देखेंगे?
तीन : 1978 के पहले नौ महीनों में हरिजनों पर अत्याचार के 3,019 घटनाएं सामने आये हैं। 175 हरिजनों की हत्या की गई है, 129 हरिजन महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ है, लूटपाट और दंगों की 289 घटनाएं…
चार : एक सन्‍थाल अपने खेत की फसल, अपना हल, बैलों को अपने और परिवार के साथ बेच कर ही कर्जे का ब्याज दे पाएगा। अपने कर्ज की रकम का दस गुना अदा करने के बाद भी उस पर कर्जे का बोझ…
पांच : 13 अप्रैल, 1978  पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में पुलिस ने प्रवेश और निकास के रास्तों को बंद कर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे 500  मजदूरों पर गोलियां चलाईं। 150  मजदूर मारे गए, घायलों की संख्या का पता अब भी नहीं चल पाया है। लाशों को गन्ने के खेत में इकट्ठा कर खेत में आग लगा दिया गया है।
छ : ‘शांतिप्रिय, निरक्षर संथाल इस तरह से ठगे जाते थे कि वे अपनी जायदाद से हाथ धो बैठते थे। उनके अनाज,  भेड़-बकरियों, सब्जियों आदि उनसे छीन लिया जाता था। उनको मारा-पीटा और अपमानित किया जाता था। उनकी महिलाओं के साथ बलात्‍कार तो आम बात थी। शोषण के सभी तरीके उन पर आजमाये जा रहे थे…।
सात : बिहार के बाजितपुर में हरिजनों पर अत्याचार की एक और घटना सामने आई है। पास के गांव के जोतदार और उसके चार सौ गुंडों के दल ने 15  नवंबर को सुबह नौ बजे से दोपहर चार बजे तक गांव में लूटपाट किया। नौ हरिजन महिलाओं के साथ बीच बाजार में सामूहिक बलात्कार किया। उनके घरों में आग लगा दी गई और संपत्ति लूट ली गई थी।
आठ : पचास पागल हाथियों को सन्‍थालों के गांव में खुला छोड़ दिया गया था जिससे पूरा गांव, उसकी झोपडिय़ां और स्‍त्री-पुरुष-बच्‍चों की आबादी को तहस-नहस किया जा सके।
एक : अगस्‍त 1971 में बरहानगर में दो दिनों में 150 लोग पुलिस के संरक्षण में मारे गए थे। लाशें खुली सड़क पर बिछी पड़ी थीं, बाद में उन्हें रिक्शों और ठेलों पर लादकर हुगली नदी में बहा दिया गया था। साठ साल के एक वृद्ध को जलाकर मार दिया गया था, क्योंकि उसने अपने भतीजे के बारे में जानकारी देने से इंकार किया था। एक स्कूली लड़की का हाथ काट लिया गया था।…
दो : मार्शल-लॉ, अमानवीय और बर्बर कानून। बे-रोक टोक लूटपाट, नरसंहार, विध्‍वंस, अत्याचार, महिलाओं का अपमान और आतंक। संथाल परगना और वीरभूमि तब अत्याचार, ध्वंस और नरसंहार की आंधी तले…
तीन : डायमण्‍ड हारबर में गंगा के किनारे, 1971 की जनवरी में छ: लोगों की लाशें मिलीं। सभी के शरीर पर गोलियों के निशान थे और उनके दोनों हाथ पीछे बंधे थे। जून, 1971 में कोन्नगर में नौ लाशें जमीन के नीचे गड़े मिले थे। सभी के सर शरीर से कटे हुए थे और उनके शरीर पर घावों के निशान थे।
चार : जब तक वे खडे़ होकर लड़ते रहे हम उन पर गोलियां बरसाते रहे। सभी संथाल जिन्‍हें हमने कैद किया उनका शरीर गोलियों से लहू-लुहान था। पर संथाल लोग…
पांच : सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर, 1970 से अप्रैल, 1973 के बीच पश्चिम बंगाल और बिहार की जेलों में पुलिस और राजनीतिक कैदियों के बीच मुठभेड़ में 80 कैदियों की मौत और 645 कैदी घायल हुए थे। लाठियों से पीट-पीटकर 39 कैदियों की हत्या की गई थी।
छह : न केवल एक या दो नेताओं को बल्कि उन इलाकों की समूची जनता को, जहां विद्रोह हुआ हो बर्मा के खतरनाक जंगलों में निष्‍काशित किया जाए या फिर उन्हें फांसी पर लटकाया जाए, या गोली मार दिया जाए…
सात : बिहार के जादूगोड़ा इलाके से पकड़े गए सभी 54 लोगों को दो सालों तक हजारीबाग सेंट्रल जेल में जंजीरों से बांधकर रखा गया। इनमें से अधिकांश कैदियों की उम्र 18 से 20 वर्ष की थी। वे न्यायिक हिरासत के कैदी थे, पर उन पर तीन वर्षों बाद भी मुकदमा नहीं चलाया गया।
आठ : उनमें से 46 बच्‍चों की उम्र नौ से दस की थी। उन्हें कोड़े लगाने की सजा मिली थी। बाकी को सात से चौदह वर्षों की जेल की सजा सुनाई गई थी। उनमें से बहुत से कैदियों की मौत जेल में ही हुई…
नौ : पश्चिम बंगाल के पुलिस मुख्‍यालय लाल बाजार के खुफिया विभाग में जिरह के वक्‍त पंद्रह वर्ष के कक्षा दस के छा. की कलाई मरोड़कर तोड़ दिया गया था। उसके शरीर पर जलती सिगरेट से उकेरे घावों के असंख्य निशान थे, हाथों और पैरों के नाखून उखाड़ लिए गए थे। महिला राजनीतिक कैदियों को जिरह के नाम पर हर महीने एक बार…
कोरस का पहला दल : उन्‍नीसवीं सदी…
कोरस का दूसरा दल : बीसवीं सदी…
पहला दल : पांचवां दशक…
दूसरा दल : सत्‍तर दशक…
पहला दल : ब्रिटिश भारत…
दूसरा दल : आजाद भारत…
एक : मृत्‍यु, खून और डर का राज है आज इस धरती पर। हम सब जानते हैं कि जेल की दीवारों के पीछे क्या होता है, और क्या होने वाला है। फिर क्यों नहीं इसके विरोध में चीख उठते हैं हम ? क्या अभी इसका वक्त नहीं आया है ? क्या
अब भी सही वक्त का हमें इंतजार है?
(‘बासी खबर से)

इसी प्रकार आने वाले कल के पाठक भी इन सवालों को जांचेंगे-परखेंगे और शायद कुछ हद तक आश्चर्यचकित भी होंगे कि बाजारू सिनेमा-टेलीविजन और तमाम अन्य मनोरंजन के साधनों के जरिए जहां सत्ता की संस्कृति जन संस्‍कृति के खिलाफ व्यापक रूप से सक्रिय हो रही थी और जनता के सरोकारों और सवालों से उन्हें भ्रमित करने में लगी थी,  तब समाज परिवर्तन के उद्देश्य से न सही,  महज एक देशव्यापी प्रतिरोध की संस्कृति को जिंदा रखने के लिए, तीसरे रंगमंच ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बादल सरकार और उनके तीसरे रंगमंच को आने वाले कल के पाठक उसी तरह तरह से अपने करीब पाएंगे- जितने करीब और आत्‍मीय सरकार आज हमारे हैं।

( अशौक भौमिक की पुस्‍तक ‘बादल सरकार : व्‍यक्ति और रंगमंच’ से साभार)

बादल सरकार से संबंधित अन्‍य आलेख-

मेहनतकश जनता के महान नाट्यकर्मी का अवसान

 

समाज की हकीकत से रूबरू करा रहा है प्रतिरोध का सिनेमा

इंदौर : मौजूदा दौर में आम बंबईया फिल्मों द्वारा समय व समाज की वास्तविकताओं से दूर जिस अपसंस्कृति व फूहड़ता को समाज में बड़े पैमाने पर फैलाया जा रहा है, उसके विरुद्ध भी एक और सिनेमा है जो हमें समाज की हकीकत से रूबरू कराने का सार्थक प्रयत्न कर रहा है। एक ऐसा सिनेमा जिसमें आज के सुलगते हुए सवालों को उठाया गया है, जिसके केंद्र में है हाशिये के लोग, उनका जीवन संघर्ष, समस्याएं और भूमंडलीकरण के दौर में जन्म लेते संवेदनहीनता के नये स्वरूप। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ प्रतिबद्ध फिल्मकारों की ऐसी ही फिल्मों को मंच देने का एक सार्थक प्रयत्न है। जन संस्कृति मंच द्वारा इलाहाबाद,  बरेली,  लखनऊ, पटना,  गोरखपुर,  नैनीताल,  भिलाई  इत्यादि विभिन्न स्थानों पर गत छह  वर्षों में  16 फिल्मोत्सव इसी तर्ज पर सफलतापूर्वक आयोजित किये जा चुके हैं। सांस्कृतिक एवं सामाजिक सरोकारों को पूर्णत: समर्पित इंदौर की कला संस्था ‘सूत्रधार’  के विशेष अनुरोध पर जन संस्कृति मंच ने म.प्र. में पहली बार इंदौर में दो दिवसीय प्रतिरोध का सिनेमा फिल्मोत्सव का आयोजन किया। दिनांक 16 व 17 अप्रैल, 2011 को इंदौर प्रेस क्लब के राजेंद्र माथुर सभागृह में यह फिल्मोत्सव ‘सूत्रधार’ एवं ‘जन संस्कृति मंच’ के संयुक्त तत्वावधान में इंदौर प्रेस क्लब के सहयोग से संपन्न हुआ। शुभारंभ कार्यक्रम में भूमिका रखते हुए ‘सूत्रधार’ के संयोजक सत्यनारायण व्यास ने फिल्मोत्सव आयोजित करने के उद्देश्य को स्पष्ट किया। ‘जन संस्कृति मंच’ के फ़िल्म समूह ‘द ग्रुप’ के संयोजक  संजय जोशी ने कार्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश डालते हुए पूर्व में आयोजित किये गये फिल्मोत्सवों के अनुभवों को दर्शकों के समक्ष रखा। उन्होंने आशा व्यक्त की कि भविष्य में इंदौर में प्रतिवर्ष तीन या चार दिवसीय फिल्मोत्सव भी आयोजित किये जा सकेंगे। विशेष अतिथि सुप्रसिद्ध फिल्म लेखक व समीक्षक श्री बृजभूषण चतुर्वेदी ने इंदौर में पहली बार आयोजित किये जा रहे समस्यामूलक फिल्मों के इस उत्सव के प्रति प्रसन्नता व्यक्त करते हुए जानकारी दी कि बंबई, दिल्ली इत्यादि बड़ी जगहों पर कई वर्षों से डॉक्यूमेंटरी फिल्मों के उत्सव नियमित तौर पर आयोजित किये जाते हैं, लेकिन इंदौर में ‘सूत्रधार’ व ‘जन संस्कृति मंच’ ने यह सार्थक पहल की है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध फिल्म समीक्षक व फिल्म विधा के पुरोधा श्रीराम ताम्रकर ने आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुये आशा व्यक्त की कि इस तरह के लीक से हटकर फिल्मों के उत्सव भविष्य में भी आयोजित किये जाते रहेंगे। इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने अपने संबोधन में आश्वस्त किया कि इंदौर प्रेस क्लब भविष्य में भी इस तरह के आयोजन को पूर्ण सहयोग देता रहेगा।

फिल्मोत्सव का शुभारंभ सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक संजय काक की फिल्म ‘जश्ने आजादी’ से हुआ। लगभग सवा दो घंटे की यह फिल्म कश्मीर के जनमानस को अभिव्यक्त करते हुए कई सवाल उठाती है और दर्शकों को उद्वेलित करती है। फिल्म ने सचमुच बड़ी गहमागहमी पैदा की,  इसी से जाहिर है कि समाप्ति के बाद भी दर्शक फिल्म के बारे में व कश्मीर के बारे में और भी संवाद करना चाहते थे।

दूसरे दिन रविवार  17 अप्रैल को फिल्मोत्सव का प्रारंभ बच्चों के लिए बनाई गई एक बड़ी प्यारी फ्रेंच फिल्म ‘द रेड बलून’  से हुआ। एक बच्चे व लाल गुब्बारे की मैत्री को बड़े स्वाभाविक व मार्मिक रूप से इस फिल्म में चित्रित किया गया है। बड़ी संख्या में उपस्थित बच्चों ने फिल्म का भरपूर आनंद लिया। इसके बाद ‘ओपन-ए-डोर’  सीरिज की छह संवाद रहित लघु फिल्में प्रदर्शित की गईं। विभिन्न देशों की इन फिल्मों का केंद्रीय तत्व यह निर्देश था कि एक बंद दरवाजे के खुलते ही पांच मिनट में बच्चे क्या करेंगे या क्या कर सकते हैं? कई देशों के फिल्मकारों ने इस थीम पर सुंदर फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें से छह फिल्मों को यहां दिखाया गया।अगली फिल्‍म संकल्प मेश्राम निर्देशित ‘ छुटकन की महाभारत’ के केंद्रीय पात्र छुटकन के दिवा स्‍वप्‍नों से पैदा हुई हास्‍यास्‍पद स्थितियों ने  दर्शकों को लोटपोट कर दिया।

भोजनावकाश के बाद के सत्र में दो एनिमेशन फिल्‍म ‘ ऐ चेयरी टेल’ व ‘नेबर्स’ एवं चार म्यूजिक विडियो फिल्‍म ‘अमेरिका अमेरिका’, ‘गांव छोड़ब नाही’, ‘रिबन्‍स फॉ‍र पीस’ व ‘ मैंने तुझसे ये कहा’  के अलावा चार लघु फिल्‍में ‘गाड़ी लोहरदगा मेल’, ‘शिट’, ‘प्रिंटेड रेनबो’ और ‘नियामराजा का विलाप’ दिखाई गई। रांची-लोहारदगा के बीच चलने वाली पेसेंजर ट्रेन के अंतिम सफर में लोक गायकों व कलाकारों द्वारा अभिव्यक्त किये गये उद्गारों को ‘गाड़ी लोहरदगा मेल’ में बड़ी मार्मिकता से फिल्माया गया। ‘शिट’ में आजादी के 63 वर्ष बाद भी अपने सिर पर मैला  ढोते सफाईकर्मियों की समस्या को उठाया गया है। अकेलेपन से जूझती एक अकेली बूढ़ी औरत व उसकी साथी बिल्‍ली की भावुक कथा ‘प्रिंटेड रेनबो’ में दर्शाई गई है। उड़ीसा में नियागिरी  पहाड़ को राज्य सरकार द्वारा एक मल्टीनेशनल कंपनी को बेच दिये जाने पर पैदा हुए पर्यावरण संकट का ‘नियामराजा का मिलाप’ में हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है।

सायंकालीन अंतिम सत्र सुप्रसिद्ध फिल्मकार आनंद पटवर्धन की सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली फिल्म- ‘राम के नाम’ से प्रारंभ हुआ। सवा घंटे की इस फिल्म में धर्म के नाम पर सांप्रदायिक उन्माद, असहिष्णुता और हिंसा फैलाने वाली कुत्सित राजनीति का भंडाफोड़ करने के साथ ही सच्चाई से रूबरू कराने का प्रयत्न भी किया गया है। समारोह की अंतिम प्रस्तुति दो घंटे की फीचर फिल्‍म ‘बाएं या दाएं’ थी। फिल्‍मकार बेला नेगी की इस प्रथम फिल्‍म को गंभीर रुचि के फिल्म दर्शकों व समीक्षकों द्वारा पूरे देश में सराहा गया है।

इंदौर फिल्मोत्सव में बेला नेगी उपस्थित थीं। उन्होंने अपनी इस फिल्म के प्रदर्शन के पूर्व दर्शकों से अपने अनुभव भी सांझे किए। पूर्ण्‍रूप से उत्तराखंड  में फिल्माई गई इस फिल्म के निर्माण में आई व्यावहारिक दिक्कतों व कठिनाइयों के बारे में भी उन्होंने काफी जानकारी दी। फिल्म में रमेश नाम के एक सीधे-सादे पहाड़ी युवक की कहानी है जो बंबई की ग्लैमरयुक्त दुनिया से उकताकर अपने गांव लौट आया है और वहीं सादगी और शांति का जीवन व्यतीत करना चाहता है। गांव से जबकि हर व्यक्ति बंबई जाने के सपने दिन-रात देखता है, वहीं इस युवक का गांव में लौट कर आना लोगों को हजम नहीं होता। एक सीधी-सादी कहानी को जितनी भावुकता व शिद्दत से बेला ने फिल्माया है वह देखने से ताल्लुक रखता है। फिल्मोत्सव में उपस्थित दर्शकों ने भी फिल्म को भरपूर सराहा और फिल्म समाप्ति के पश्चात भी बेला से गुफ्तगू होती रही।

इंदौर फिल्मोत्सव में दो दिनों में कुल 21 फिल्में दिखाई गईं। निश्चित ही दर्शकों के मानस में इस फिल्मोत्सव ने एक अमिट छाप छोड़ी है।
इंदौर के किसी आयोजन में सम्‍भवत: पहली बार दर्शकों से सहयोग करने की अपील की गई। इस वास्ते आयोजन स्थल के बाहर सहयोग के लिए दो डिब्बे रखे गए थे जिनमें लोगों ने प्रतिरोध का सिनेमा की मूल भावना का सम्‍मान करते हुए यथायोग्‍य सहयोग किया। हॉल के बाहर गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के सक्रिय कार्यकर्ताओं  बैजनाथ मिश्र और गोपाल राय द्वारा संचालित फिल्मों की डीवीडी और पुस्तक प्रदर्शनी ने भी लोगों को आयोजन से जुड़े रहने में  महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रस्‍तुति : सत्यनारायण व्यास, संयोजक, सूत्रधार, इंदौर

एक आतंकवादी की मौत और अमेरिकी साम्राज्यवाद के मंसूबे : सुधीर सुमन

अमेरिका द्वारा आसोमा को मारने के लिए की गई कार्रवाई के पीछे की सच्‍चाई को उजागर करता और अमेरिका के नापाक इरादे से भारत के राजनीतिज्ञों को आगाह करता वरिष्‍ठ लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन का लेख-

ओसामा मारा गया और भारत में एसएमएस वीर सक्रिय हो उठे। मुझे भी इस तरह के एसएमएस मिले, जिनका आशय था कि मुझे आनंदित होना चाहिए। समझ में नहीं आया कि इसमें इतना ज्यादा आनंदित होने की क्या बात है! ओसामा तो वैसे भी कुछ वर्षों से कमजोर पड़ चुका था, और जिसने बनाया उसने मिटा दिया, इसमें मुझे क्यों खुश होना चाहिए? वैसे मारने वाला भी अमेरिका था और घटना का गवाह भी वही और वही उसे समुद्र में दफनाने वाला भी। आज दुनिया यह जानना चाहती है कि ऐसी हड़बड़ी उसे क्यों थी? इसे लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं और कई तरह की थ्योरी सामने आ रही हैं, लेकिन मेरे लिए तो बड़ा सवाल यह है कि हमें चिंतित क्यों नहीं होना चाहिए कि अमेरिका एकदम पड़ोस में डेरा डाल चुका है और आतंकवादियों को मिटाने के नाम पर वहां अपनी जड़ें और मजबूत करता जा रहा है।

चलिए, मान लिया कि ओसामा के मास्टर माइंड की वजह से ही अमेरिकी चौधराहट को कायम रखने वाला एक केंद्र- वर्ल्ड ट्रेड सेंटर ढह गया था, जिसमें महान अमेरिका के तीन हजार नागरिक मारे गए थे और उसने गुनाहगार को उसके कुकृत्य की वाजिब सजा दे दी। लेकिन मारे गए अमेरिकी नागरिकों के प्रति संवेदना की आड़ लेकर अमेरिकी न्याय के पक्ष में खड़ा कैसे हुआ जा सकता है? जबकि उसके खुद के अन्याय की लंबी फेहरिश्त हमारे सामने है और आज भी उसके द्वारा अन्याय का सिलसिला जारी है। सच तो यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चुनाव से पहले एक उपलब्धि हासिल करने के लिए ही सारे अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानून का उल्लंघन करते हुए ओसामा की हत्या की है। ओसामा के हाथ निर्दोषों के खून से सने हुए थे, इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन अमेरिकी नेवी सील ने जिस तरह एक लाइसेंसी आपराधिक गिरोह की तरह ओसामा की क्रूरतापूर्ण तरीके से हत्या की है, उससे हम भारतीय लोगों को आह्लादित क्यों होना चाहिए? अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रबल विरोधी विचारक नोम चोम्स्की ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि ‘‘यह अधिक से अधिक साफ होते जाने से कि यह एक योजनाबद्ध अभियान था, अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सबसे बुनियादी नियमों के उल्लंघन का मामला भी उतना ही गहराता जा रहा है।…. जिन समाजों में कानून को लेकर थोड़ा भी सम्मान होता है, वहां संदिग्धों को पकड़कर उन्हें निष्पक्ष सुनवाई के लिए पेश किया जाता है। मैं ‘संदिग्ध’ शब्द पर जोर दे रहा हूं।’’ जिस अमेरिका की खुफियागिरी का इतना गौरव-गान हो रहा है, उस अमेरिका से पूछा जाना चाहिए कि जब तालिबान कह रहे थे कि सबूत दो कि ओसामा अफगानिस्तान में है, तब उसने सबूत क्यों नहीं दिए? नोम चोम्स्की तो अमेरिका के इस दावे पर ही संदेह करते हैं कि 9/11 की योजना अलकायदा ने अफगानिस्तान में बैठकर बनाई थी। सच्‍चाई जो भी हो, लेकिन चोम्स्की ने ओसामा की मौत और मौत के बाद की परिस्थितियों का जो आकलन किया है, वह गौर करने लायक है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘मीडिया में वाशिंगटन के गुस्से के बारे में भी बहुत चर्चा हो रही है कि पाकिस्तान ने बिन लादेन को उसे नहीं सौंपा, जबकि पक्के तौर पर फौज और सुरक्षा बलों के कुछ अधिकारी एबटाबाद में उसकी मौजूदगी से वाकिफ थे। पाकिस्तान के गुस्से के बारे में बहुत कम कहा जा रहा है कि अमेरिका ने एक राजनीतिक हत्या के लिए उनकी जमीन में हस्तक्षेप किया। पाकिस्तान में अमेरिका-विरोधी गुस्सा पहले से बहुत है, और इस घटना से वह और बढ़ेगा। जैसा अंदाजा लगाया जा सकता है, लाश को समुद्र में फेंक देने के फैसले ने मुसलिम जगत में गुस्से और संदेह को ही भड़काया है।

हम खुद से यह पूछ सकते हैं कि तब हमारी प्रतिक्रिया क्या होती, जब कोई इराकी कमांडो जॉर्ज डब्ल्यू बुश के घर में घुसकर उसकी हत्या कर देता और उसकी लाश अटलांटिक में बहा देता। यह तो निर्विवाद है कि बुश के अपराध बिन लादेन के अपराधों से बहुत अधिक हैं और वह ‘संदिग्ध’ नहीं हैं, बल्कि निर्विवाद रूप से उसने ‘फैसले’ लिये।’’

दरअसल आज अमेरिका के खिलाफ दुनिया में जो नफरत है वह उसके किसी भी दुश्मन को छुपाने का आधार बन सकती है, यह उसे क्यों समझ में नहीं आता? जिस तरह के बदले की कार्रवाई को अमेरिका न्याय की जीत बता रहा है, यही तर्क ओसामा द्वारा किए गए बदले की कार्रवाइयों पर क्यों नहीं लागू हो सकता, आखिर उसे भी ऊर्जा तो अमेरिका द्वारा मुस्लिम देशों में मचाई जा रही तबाही के कारण ही मिल रही थी? बेशक ओसामा साम्राज्यवाद-विरोध की राजनीति करने वाला कोई राजनेता नहीं था, वह एक जुनूनी और कट्टर मुसलमान था, जेहादी था, लेकिन ओसामा के प्रति जन-समर्थन का आधार क्या सिर्फ इस्लामिक कट्टरपंथ था, क्या महज सांप्रदायिक कट्टरता की वजह से ही लोग उसका समर्थन करते थे। इस सवाल की ओर आमतौर पर आज अमेरिका के प्रायोजित शौर्य में डूबे लोग ध्यान नहीं देना चाहते? ओसामा इस्लाम के विजय की ध्वजा फैलाने निकला कोई मध्ययुगीन शहंशाह तो नहीं था। वह तो कई हुकूमतों के बीच चक्कर लगा रहा था, कुछ दिनों के लिए भी अपनी स्थाई हुकूमत तो उसकी भूगोल के किसी हिस्से में नहीं बन पाई थी। वह बुश या ओबामा की तरह किसी राष्ट्र का प्रतिनिधि भी नहीं था। उसकी ताकत के उभार से लेकर पतन तक कोई ऐसा राष्ट्र सामने नहीं आया, जिसने उसे अपना प्रतिनिधि चेहरा बनाया हो। दरअसल ओसामा बिन लादेन और अलकायदा अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के खिलाफ इस्लामी जगत में हुई जबर्दस्त प्रतिक्रिया के दौर में अमेरिका की सोवियत-विरोधी रणनीति के खतरनाक बाईप्रोडक्ट थे। आज के दौर का जो आतंकवाद है वह प्रायः अमेरिकी रणनीति की सीधी प्रतिक्रिया है, अमेरिका इस पर लगाम नहीं लगा सकता, इसे खत्म नहीं कर सकता, भले ही ओसामा खत्म हो गया हो। कुछ लोग ओसामा के अंत की तुलना हिटलर के अंत और फासीवाद के पराजय से कर रहे हैं। सिर्फ 1 मई को होने वाली मौत की घोषणाओं के कारण की जा रही ये तुलनाएं निराधार हैं। हिटलर का अंत द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत का स्पष्ट संकेत था और दुनिया में फासीवाद के ऐतिहासिक पराजय का भी। लेकिन ओसामा की हत्या न तो आतंकवाद का अंत है और न ही अमेरिकी साम्राज्यवाद का। जाहिर है इराक, अफगानिस्तान, लिबिया और पाकिस्तान में जो कुछ भी अमेरिका कर रहा है, उससे आतंकवाद पैदा होगा, मिटेगा नहीं। ओसामा की हत्या के चंद रोज बाद ही हाल में सत्ताविरोधी लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए चर्चित काहिरा में मुस्लिम-ईसाई दंगों की खबरें आई हैं। जाहिर है इससे अमेरिकी रणनीतिकारों को तो हर्ष ही होगा।

ओसामा की हत्या के बाद मुझे एक दूसरा एसएमएस मिला, जिसमें ग्रेट ओबामा की शान में कशीदे काढ़े गए हैं और यह कल्पना की गई है कि अमेरिका एक दिन पाकिस्तान समेत सारे मुस्लिम राष्ट्रों को ध्वस्त कर देगा। उसमें एक बात और कही गई है कि जिस तरह दुनिया में बुश और ओबामा हैं, उस तरह भारत में नरेंद्र मोदी हैं। भारत में मोदी मिजाज वाले ये तथाकथित राष्ट्रभक्त अब पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी शिविरों को अमेरिकी स्टाइल में ध्वस्त करने की हुंकार भरने लगे हैं? पर वे यह क्यों भूल जाते हैं कि अमेरिका ने बाहर से पाकिस्तानी राष्ट्र पर अचानक हमला नहीं कर दिया है, बल्कि वह तो वहां पाकिस्तानी सरकार की मर्जी से मौजूद है। प्रचार तो यही है कि अमेरिका पाकिस्तानी सरकार के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साझेदारी निभा रहा है। और लगता है कि भारत भी इसी तरह की घनिष्ठ साझेदारी के लिए लालायित है, क्योंकि कुख्यात एफबीआई और सीआईए के साथ इसकी नजदीकियां कुछ ज्यादा ही बढ़ती जा रही हैं। इसकी शुरुआत एक दशक पहले एनडीए के शासनकाल में ही हो चुकी थी, जिसकी प्रक्रिया यूपीए के शासनकाल में जोर-शोर से जारी है। इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि निकट भविष्य में कुछ आतंकवादी घटनाएं भारत में घटें और अमेरिका यहां भी तारणहार बनकर आ जाए। तब किस तरह का आतंकवाद-विरोधी अभियान चलेगा, पाकिस्तान में हो रहे हमलों को देखते हुए इसकी कल्पना की जा सकती है। जो मारे जाएंगे वे आतंकवादी ही होंगे, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होगी। वैसे भी भारत में पिछले दो दशकों में हुई आतंकवादी घटनाओं की गहरी तहकीकात प्रायः नहीं की गई है। अमेरिका की तर्ज पर भारत में भी पूरे मुस्लिम समुदाय को आतंकवाद के लिए संदेह के घेरे में डाला गया, सैकड़ों बेगुनाह नौजवान फर्जी मुकदमों में फंसाए गए और उन्हें यातनाएं दी गईं, लेकिन उन पर न्यायालय में कोई आरोप साबित नहीं किया जा सका, जिससे सरकारों की भद्द भी पिटी। आखिर जिस देश में करीब तीन हजार लोगों की हत्या के लिए जिम्मेवार नरेंद्र मोदी ठाठ से मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं, वहां किस तरह इस्लाम की आड़ में आतंक फैलाने वालों पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकती है? क्या यह सच नहीं है कि आजादी के बाद जितने दंगे और सांप्रदायिक कत्लेआम हुए हैं, उसमें मुसलमानों को ज्यादा जानमाल का नुकसान उठाना पड़ा है? ऐसे में अगर कुछ मुसलमान प्रतिक्रिया में आतंकवाद के रास्ते पर चल निकल पड़ते हैं, तो क्या इसके लिए सिर्फ इस्लाम धर्म के बारे में प्रचारित कट्टरता और पाकिस्तान को ही दोषी ठहराया जाए?

इतने वर्षों से भारतीय सरकारें चिल्लाती रही हैं कि पाकिस्तान में आतंकवादियों के प्रशिक्षण कैंप चलते हैं और वही आतंकवादियों को धन देता है, तो ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल तो यह है कि खुद पाकिस्तान के पास धन और हथियार कहां से आते हैं ? जहां से धन आता है, उसका विरोध क्यों नहीं किया जाता? और यदि पाकिस्तान आतंकवाद का पनाहगाह है तो आतंकवादी पाकिस्तान में भी कत्लेआम क्यों मचाए रहते हैं? विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने लादेन की हत्या को ‘ऐतिहासिक’ और ‘मील का पत्थर’ बताते हुए कहा कि पिछले कुछ सालों में हजारों निर्दोष पुरुष, महिलाएं और बच्चे इन आतंकवादी गुटों के हाथों मारे गए। विदेश मंत्री का कहना है कि वे अमेरिका पर दबाव डालेंगे। क्या शेखचिल्ली का सपना है! अगर आतंकवाद को बढ़ावा देने में पाकिस्तान का हाथ है और उसके सिर पर अमेरिका का हाथ है, तो अमेरिका से भारत अपनी यारी तोड़ता क्यों नहीं, क्यों अमेरिका के चारण बनने के लिए हमारे नेता भी बेकरार हैं?

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर निर्दोष पुरुष, महिलाएं और बच्चों की हत्या करने वालों का विरोध ही भारत का मकसद है, तो उसकी उंगली सबसे पहले अमेरिका पर क्यों नहीं उठती? आखिर पाकिस्तान से हमारे देश को ज्यादा खतरा है या अमेरिका से? आतंकवादी क्या हमारे लिए उन अमेरिकापरस्त नीतियों को लागू करने वाले शासकवर्ग से भी ज्यादा खतरनाक हैं जिनकी वजह से लाखों किसानों ने आत्महत्या कर ली है? क्या कुछ सिरफिरे आतंकवादियों द्वारा मारे गए लोगों के प्रति संवेदित होना ही काफी है, या उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि भारत में प्राकृतिक संपदा और जीविका के संसाधनों को अमेरिकी और अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर देने का जो खतरनाक खेल चल रहा है, उसका तीखा विरोध किया जाए? क्या अब भीषण लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ उभर रहे जनता के प्रतिरोध का मुकाबला यहां की सरकारें आतंकवाद-विरोधी अभियानों के जरिए करेंगी? छत्तीसगढ़ में तो इसका रंग-रूप हम देख ही रहे हैं। क्या हमारे शासकवर्ग का जो निरंतर अमेरिकीकरण हो रहा है, वह खतरनाक नहीं है?

इस देश की शासकवर्गीय पार्टियां ही नहीं, आमतौर पर भारतीय उपमहाद्वीप की मीडिया भी तुरंत भूल गई कि ओसामा की हत्या के ठीक एक दिन पहले नाटो ने लिबिया में हमला करके गद्दाफी के सबसे छोटे बेटे सैफ अल अरब और तीन पोतों को मार डाला, जबकि गद्दाफी ने नाटो से बातचीत की पेशकश की थी। इस पर नाटो कमांडर का कहना था कि नाटो ने गद्दाफी के परिवार को नहीं, बल्कि सैन्य ठिकाने को निशाना बनाते हुए हमला किया था। यह एक अपवाद घटना नहीं है, जितना अकेले वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में लोग मारे गए उससे कहीं अधिक बेगुनाह नागरिक अमेरिकी सेना द्वारा हाल के वर्षों में इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में मारे जा चुके हैं? आखिर इसकी सजा अमेरिका को क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

ओसामा ऑपरेशन के बाद भारत में 26/11 के मास्टर माइंड लोगों के खिलाफ सीधी कार्रवाई की मांग उठने लगी है। और हद है कि भारतीय सेना और एयरफोर्स के चीफ ने इस तरह के गैरजिम्मेदार बयान दिए हैं कि भारत भी इसी तरह का ऑपरेशन पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादियों के खिलाफ कर सकता है। इस तरह से युद्धोन्माद बढ़ेगा, जो पाकिस्तान को पता नहीं कितना नुकसान पहुंचाएगा, पर अमेरिका को जरूर फायदा दिलाएगा। जबकि भारत को इस वक्त चाहिए कि जो व्यवहार अमेरिका ने पाकिस्तान में किया है, उसके आलोक में वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों की समीक्षा करे। बेशक भारत पाकिस्तान से आतंकवादियों के प्रत्यर्पण की मांग करे, लेकिन खाली खबर बनाने के लिए उन्हें आतंकवादियों की बड़ी लिस्ट देने के बजाए, कुछ आतंकवादियों के बारे में ठोस सबूत दे। कुछ खुफियागिरी की काबलियत तो हमारी सरकारें भी दिखाएं। ओसामा ऑपरेशन के पहले रेमंड डेविस के मामले में भी पाकिस्तान की संप्रभुता और आजादी का माखौल उसके साझेदार अमेरिका ने खुलकर उड़ाया। दो बेगुनाह पाकिस्तानी नागरिकों की दिनदहाड़े हत्या करने वाले इस सीआईए एजेंट को पाकिस्तान में कोई दंड नहीं मिला। ओबामा ने बाकायदा पाकिस्तान पर दबाव डाला और कहा कि वह अमेरिकी राजनयिक था, इसलिए उस पर स्थानीय कानून के अनुसार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अब तो अमेरिका के सारे सहयोगियों और उसके साथ गलबहियां होने को आतुर भारत को सावधान हो जाना चाहिए। आतंकवाद और साम्राज्यवाद एक समान खतरे हैं पाकिस्तान और भारत के लिए। इसका सामना इन देशों को खुद मिलकर करना होगा। अमेरिका को दक्षिण एशिया से बाहर खदेड़ना बेहद जरूरी है, वर्ना उसकी बर्बरता का अखाड़ा यह इलाका बनेगा और मध्यपूर्व की तरह हमें भी भीषण तबाही झेलनी पड़ेगी।

अमेरिकी सेना किसी आतंक-वातंक को मिटाने और स्वतंत्रता व लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनी ही नहीं है, बल्कि अमेरिकी पूंजी के विस्तार और दुनिया के संसाधनों की लूट को ध्यान में रखकर ही उसका इस्तेमाल किया जाता है, आखिर इस सच से आंखों को कैसे मूंदा जा सकता है? जिन खतरों का प्रचार करके उसने इराक पर हमला किया और सद्दाम हुसैन की हत्या की, वे प्रचार तो सही साबित नहीं हुए। कोई रासायनिक हथियार तो नहीं मिला। बल्कि दुनिया के अधिकांश लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि खाड़ी में अमेरिकी आतंक का मकसद क्या है? क्या महज तेल पर अपने वर्चस्व के लिए ही उसने मध्यपूर्व में सीधे सैनिक हमलों और प्रतिबंधों के जरिए लाखों लोगों की हत्या नहीं की है? जब तक अमेरिकी साम्राज्यवाद है, क्या हम दुनिया में अमन की उम्मीद कर सकते हैं? ओसामा जैसों से लाख गुना खतरनाक है अमेरिकी साम्राज्यवाद, जिसके कारनामों की विस्तार से चर्चा करती और अमेरिकी नागरिकों की मौतों के प्रति संवेदित लोगों को संबोधित करती एम्मानुएल ओर्तीज की लंबी कविता- ‘एक मिनट का मौन’ के साथ मैं इस लेख को समाप्त करना चाहता हूं। यह कविता 9/11 की घटना के बाद लिखी गई थी। कवि असद जैदी ने इसका अनुवाद किया है-

एक मिनट का मौन

इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूं
मेरी गुजारिश है कि हम सब एक मिनट का मौन रखें
ग्यारह सितंबर को वल्र्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन में मरे लोगों की याद में
और फिर एक मिनट का मौन उन सबके लिए जिन्हें प्रतिशोध में
सताया गया, कैद किया गया
जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दी गईं
जिनके साथ बलात्कार हुए एक मिनट का मौन
अफगानिस्तान के मजलूमों और अमेरिकी मजलूमों के लिए
और अगर आप इजाजत दें तो
एक पूरे दिन का मौन
हजारों फिलस्तीनियों के लिए जिन्हें उनके वतन पर दशकों से काबिज
इस्राइली फौजों ने अमरीकी सरपस्ती में मार डाला
छह महीने का मौन उन पंद्रह लाख इराकियों के लिए, उन इराकी बच्चों के लिए,
जिन्हें मार डाला ग्यारह साल लंबी घेराबंदी, भूख और अमरीकी बमबारी ने

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं
दो महीने का मौन दक्षिण अफ्रीका के अश्वेतों के लिए जिन्हें नस्लवादी शासन ने
अपने ही मुल्क में अजनबी बना दिया।
नौ महीने का मौन
हिरोशिमा और नागासाकी के मृतकों के लिए, जहां मौत बरसी
चमड़ी, जमीन, फौलाद और कंक्रीट की हर पर्त को उधेड़ती हुई,
जहां बचे रह गए लोग इस तरह चलते फिरते रहे जैसे कि जिंदा हों।
एक साल का मौन वियतनाम के लाखों मुर्दों के लिए….
कि वियतनाम किसी जंग का नहीं, एक मुल्क का नाम है…..
एक साल का मौन कंबोडिया और लाओस के मृतकों के लिए जो
एक गुप्त युद्ध का शिकार थे…. और जरा धीरे बोलिए,
हम नहीं चाहते कि उन्हें यह पता चले कि वे मर चुके हैं।
दो महीने का मौन
कोलंबिया के दीर्घकालीन मृतकों के लिए जिनके नाम
उनकी लाशों की तरह जमा होते रहे
फिर गुम हो गए  और जबान से उतर गए।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं।
एक घंटे का मौन एल सल्वादोर के लिए
एक दोपहर भर का मौन निकारागुआ के लिए
दो दिन का मौन ग्वातेमालावासियों के लिए
जिन्हें अपनी जिंदगी में चैन की एक घड़ी नसीब नहीं हुई।
45 सेकेंड का मौन आकतिआल, चिआपास में मरे 45 लोगों के लिए,
और पच्चीस साल का मौन उन करोड़ों गुलाम अफ्रीकियों के लिए
जिनकी कब्रें समुंदर में हैं इतनी गहरी कि जितनी ऊंची कोई गगनचुंबी इमारत भी न होगी।
उनकी पहचान के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं होगा, दंत चिकित्सा के रिकार्ड नहीं खोले जाएंगे।
उन अश्वेतों के लिए जिनकी लाशें गूलर के पेड़ों से झूलती थीं
दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम
एक सदी का मौन
यहीं इसी अमरीका महाद्वीप के करोड़ों मूल बाशिंदों के लिए
जिनकी जमीनें और जिंदगियां उनसे छीन ली गईं
पिक्चर पोस्टकार्ड से मनोरम खित्तों में…..
जैसे पाइन रिज वूंडेड नी, सैंड क्रीक, फालन टिंबर्स, या ट्रेल ऑफ टियर्स।
अब ये नाम हमारी चेतना के फ्रिजों पर चिपकी चुंबकीय काव्य-पंक्तियां भर हैं।
तो आप को चाहिए खामोशी का एक लम्हा
जबकि हम बेआवाज हैं
हमारे मुंहों से खींच ली गई हैं जबानें
हमारी आंखें सी दी गई हैं
खामोशी का एक लम्हा
जबकि सारे कवि दफनाए जा चुके हैं
मिट्टी हो चुके हैं सारे ढोल।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं
आप चाहते हैं एक लम्हे का मौन
आपको गम है कि यह दुनिया अब शायद पहले जैसी नहीं रह जाएगी
इधर हम सब चाहते हैं कि यह पहले जैसी हर्गिज न रहे।
कम से कम वैसी जैसी यह अब तक चली आई है।
क्योंकि यह कविता 9/11 के बारे में नहीं है
यह 9/10 के बारे में है
यह 9/9 के बारे में है
9/8 और 9/7 के बारे में है
यह कविता 1492 के बारे में है।
यह कविता उन चीजों के बारे में है जो ऐसी कविता का कारण बनती हैं
और अगर यह कविता 9/11 के बारे में है, तो फिर:
यह सितंबर 9, 1973 के चीले देश के बारे में है,
यह सितंबर 12, 1977 दक्षिण अफ्रीका और स्टीवेन बीको के बारे में है,
यह 13 सितंबर 1971 और एटिका जेल, न्यूयार्क में बंद हमारे भाइयों के बारे में है।
यह कविता सोमालिया, सितंबर 14, 1992 के बारे में है।
यह कविता हर उस तारीख के बारे में है जो धुल-पुंछ रही है और मिट जाया करती है
यह कविता उन 110 कहानियों के बारे में है जो कभी कही नहीं गईं,
110 कहानियां इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में जिनका कोई जिक्र नही पाया जाता,
जिनके लिए सीएनएन, बीबीसी, न्यूयार्क टाइम्स और न्यूजवीक में कोई गुंजाइश नहीं निकलती।
यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए है।

आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए?
हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन:
बिना निशान की कब्रें
हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएं
जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
इस कविता को शुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए खामोश हो सकते हैं
या इतना कि हम धूल से ढंक जाएं
फिर भी आप चाहेंगे कि
हमारी ओर से कुछ और मौन

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रोक दो तेल के पंप
बंद कर दो इंजन और टेलिविजन
डूबा दो समुद्र सैर वाले जहाज
फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट
बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां
डिलीट कर दो सारे इंस्टेंट मैसेज
उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेल ट्रांजिट।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन, तो टैको बैल की खिड़की पर्र ईंट मारो,
और वहां के मजदूरों का खोया हुआ वेतन वापस दो। ध्वस्त कर दो तमाम शराब की दुकानें,
सारे के सारे टाउन हाउस, व्हाइट हाउस, जेल हाउस, पेंटहाउस और प्ले बॉय।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रहो मौन ‘सुपर बॉल’ इतवार के दिन
फोर्थ ऑफ जुलाई के रोज
डेटन की विराट 13 घंटे वाली सेल के दिन
या अगली दफे जब कमरे में हमारे हसीं लोग जमा हों

और आपका गोरा अपराधबोध आपको सताने लगे।
अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो अभी है वह लम्हा
इस कविता के शुरू होने से पहले।
(11 सितंबर, 2002)

जाहिर है कि 9/11 की घटना के लिए अमेरिका द्वारा दोषी करार दिए गए ओसामा की हत्या के बाद भी अमेरिका से यारी बढ़ाने की बजाए उसकी शैतानियत की लंबी फेहरिश्त के मद्देनजर उसके वास्तविक मंसूबों पर निगाह रखना ज्यादा जरूरी है। आतंकवाद की सचाइयों और साम्राज्यवाद के साथ उसके रिश्ते के आधार को जानना-समझना भी जरूरी है, जैसा कि फिल्मकार माइकल मूर ने अपनी बेहद लोकप्रिय डाक्यूमेंट्री फैरेनहाइट 9/11 में इसका खुलासा किया था कि किस तरह बुश और ओसामा के खानदान के बीच तेल के धंधे में साझीदारी थी। और उनके बीच टकराव में इस धंधे की भी बड़ी भूमिका रही। एक बाद तो तय है कि ओसामा जैसों का आतंकवाद दुनिया से साम्राज्यवाद का नाश नहीं कर सकता और अमेरिकी साम्राज्यवाद जब तक रहेगा तब तक आतंकवाद खत्म नहीं हो सकता।