Archive for: April 2011

जिल्लत से जंग लड़ते दो मासूम : हरीश जोशी/केशव भट्ट

पास्टर के साथ पूजा और राहुल।

मानव समाज की सामाजिक-आर्थिक व्यावस्था , सामजिक भ्रांतियों, विकास और पुनर्वास योजनाओं के सच को उजागर करता पत्रकार हरीश जोशी व केशव भट्ट का आलेख-

उत्तराखंड राज्य में सरकार का कॉलर ऊंचा करने के लिए संचालित कन्याधन, गौरादेवी, बालिका शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं का सुविधाओं से वंचित परन्तु प्रतिभावान छात्रा पूजा राना के लिए कोई मायने नहीं है। पूजा की कहानी मानव समाज की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था, सामाजिक भ्रान्तियों और विकास व पुनर्वास की योजनाओं के सच पर कड़ा प्रहार करती है। एड्स की जानलेवा बीमारी ने पूजा से पहले पिता और फिर मॉं का साया छीन लिया और 12 वर्षीय पूजा अपने 11 वर्षीय भाई राहुल को साथ ले ईसाई मिशनरी के प्रार्थना भवन में पास्टर विक्टर सिंह के व्यक्तिगत संरक्षण में संघर्षों के बीच अपनी पढ़ाई की मंजिल पर पग बढ़ा रही है।
अभावों में जी रही पूजा राना और उसके भाई राहुल राना की त्रासदी की कहानी शुरू होती है 2003 में उनके पिता जीवन सिंह राना की एड्स की बीमारी से मौत के बाद। विकास खंड गरूड़ के मन्यूड़ा, सीर ग्राम के किसान आनन्द सिंह राना का गबरू जवान बेटा जीवन सिंह राना वर्ष 94-95 में रोजगार के लिए मुंबई महानगरी में जा वहां होटल लाइन का रोजगार करता है। इसी दौरान वहां उसका मराठी मूल की अंजलि से प्रेम परवान चढ़ता है और दोनों वर्ष 97 में प्रेम विवाह कर लेते हैं। जीवन-अंजलि दंपति के मुंबई में ही वर्ष 99 में बेटी पूजा और वर्ष 2001 में बेटे राहुल का जन्‍म होता है।
जीवन का हंसता-खेलता परिवार वर्ष 2002 में अपने पैतृक गांव मन्यूड़ा लौटता है। वक्त बीतने के साथ ही जीवन अकसर बीमार रहने लगता है। परीक्षणों से पता लगता है कि उसे जानलेवा बीमारी एड्स है। कई यातनाएं झेलने के बाद वह 2003 में दम तोड़ देता है। जीवन के पिता बेटे की मौत के बाद अपनी बहू अंजलि और उसकी दो संतानों की परवरिश करते हैं। इस बीच अंजलि भी बीमार पड़ने लगी। परीक्षण में पता चला कि अंजलि भी एड्स एच.आई.वी. संक्रमित है। इसके बाद उसके प्रति सभी का नजरिया बदल जाता है और यहीं से छूत की बीमारी मान अंजलि और उसकी संतानें सड़क पर आ जाती हैं।
अंजलि के लिए अपने और बच्चों के पेट के आगे बीमारी और इलाज गौण हो जाते हैं। भरण-पोषण के लिए वह गरूड़ टीट बाजार के एक रेस्टोरेंट में काम शुरू करती है। उसकी बीमारी उसे अंदर ही अंदर घुन की तरह खाए जा रही थी। काम करने के दौरान एक दिन रेस्टोरेंट में ही अंजलि मूर्छित हो जाती है। तभी वहीं बगल में ईसाई मिशनरी का प्रार्थना भवन संचालित कर रहे पास्टर विक्टर सिंह, अंजलि को अपनी बेटी मान उसे व उसके दो बच्चों को प्रार्थना भवन में ही शरण देने के साथ ही यथाशीघ्र उसका इलाज कराते हैं। बकौल पास्टर सिंह कई सम्पर्कों के बाद सरकार से अंजलि के इलाज के लिए मात्र पच्चीस हजार रुपये की नाकाफी इमदाद मिली, और अंततः बीमारी से जूझते 30 मई, 2010 को अंजलि ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। अंजलि की मृत्यु पूर्व सहमति पर उसका अंतिम संस्कार ईसाई धर्म रीति से किया गया। पूजा व राहुल के लिए सुकून रहा कि एड्स की बीमारी में मॉं-बाप खो देने पर भी इनका एचआइवी परीक्षण नकारात्मक है।
पास्टर के अनुसार अंजलि और उसके बच्चों का कोई भी धर्मान्तरण नहीं किया गया है। धर्मान्तरण का दबाव पड़ने पर उन्होंने मिशनरी ही छोड़ दी। वर्तमान में पास्टर मकानों में रंग-पुताई कर स्वयं व बच्चों का भरण पोषण के साथ ही बच्चों की शिक्षा का प्रबन्ध कर रहे हैं। पूजा राना राजकीय बालिका इंटर कालेज, पाये गरूड़ में कक्षा सात की संस्थागत छात्रा है। राहुल राना राजकीय इंटर कालेज, गरूड़ में कक्षा छह का संस्थागत छात्र है। पूजा की उपलब्धि है कि अभावों के ऐसे संघर्ष और झंझावतों के बीच उसने गत् सत्र में कक्षा छह की परीक्षा में 84 व वर्तमान में कक्षा सात में 87 प्रतिशत अंक प्राप्त कर अपने विद्यालय पाये में सर्वोत्तम का स्थान हासिल किया है। पूजा की कहानी व उपलब्धि को व्यापक पहचान के लिए जब राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल कोएलिशन फॉर एजूकेशन, नई दिल्ली को भेजा गया तो कोएलिशन द्वारा महिला एवं बालिका शिक्षा पर ग्लोबल एक्‍शन वीक में आयोजित कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए पूजा को चुन लिया गया। कोएलिशन के संयोजक रमाकान्त राय एवं एडवोकेसी कोआर्डिनेटर उमेश कुमार गुप्ता ने बताया कि  नई दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठारन में 3 व 4 मई को शिक्षा, मानव संसाधन विकास, महिला व बाल शिक्षा, सामाजिक अधिकारिता, बचपन बचाओ क्षेत्र के विषय विषेशज्ञों एवं मंत्रालय से जुड़े अधिकारी व मंत्रियों के बीच पूजा राना अपनी दास्तांम का खुद बखान करेगी। दो दिवसीय इस कार्यक्रम में देश भर से मात्र 10 बच्चों को अवसर मिला है। उत्तराखंड में से पूजा राना का इसमें चयन हुआ है।
इन्हे परवरिश दे रहे 63 वर्षीय पास्टर विक्टर सिंह के अनुसार वह अपने जीते जी न तो इन बच्चों का धर्मान्तरण होने देंगे और न ही वह इन्हें किसी मिशनरी, संस्था और अनाथालय में ही जाने देंगे। परन्तु उम्र के इस पड़ाव में विक्टर सिंह की मेहनत-मजदूरी की भी सीमायें हैं और इस सबके बीच जुड़ा़ है इन होनहार नौनिहालों का सुनहरा किन्तु अनिश्चित भविष्यड। काबिले गौर है कि विपरीत परिस्थितियों में जहां पर इन बच्चों की परवरिश हो रही है वहां से महज पांच किमी की दूरी पर उनके गुजर चुके मॉं-बाप का सुसम्पन्न परिवार है।
पूजा का दुर्भाग्य कहें या शासन-प्रशासन की लापरवाही,  उसकी इस संघर्षपूर्ण उपलब्धि पर उसे ईनाम तो दूर कहीं से दो बोल प्रशंसा के भी नहीं मिले। जबकि वह इस सबके लिए बड़े से बड़े प्रोत्साहन की हकदार है। भविष्य  के प्रति पूजा का रूझान अभी अध्यापक बनना है। अध्यापकों का स्नेह ही इसका कारण है।
अभावों में जूझ रहे इन नौनिहालों की यह दर्द भरी कहानी हमारे तथा कथित सुसभ्य-सुसंस्कृत समाज के आगे कई प्रश्नक खड़े करती है। मसलन इन बच्चों के पैतृक संबन्धी कानूनी अधिकार क्या हैं ? एड्स पीडि़त परिवारों के पुनर्वास की योजनाओं का क्या यही सच है ? महज एक बीमारी के चलते क्या अपने ही कानूनी रूप से बेगाने हो सकते हैं ? बागेश्वेर जनपद और उत्तराखंड राज्य में परियोजनाओं के नाम पर करोड़ों के वारे-न्यारे कर रही स्वैच्छिक संस्थाओं की क्या जिम्मेदारी है ? पूजा के लिए राज्य की उन महत्वकांक्षी योजनाओं के क्या मायने हैं जिन्हें कन्याधन और बालिका शिक्षा जैसे नाम दिए गये हैं ? शिक्षा का अधिकार जैसे राष्ट्रीय विधेयक पूजा-राहुल के साथ क्या इंसाफ कर सकते हैं ? पूजा-राहुल की इस दास्तान में ऐसे ही सवालों की लंबी फेरहिस्त हो सकती है जो समय रहते निश्चित उत्तर और समाधान चाहते हैं।
फिलवक्त पूजा, राहुल व विक्टर सिंह के इस संघर्ष में जरूरत है ऐसे मददगार हाथों की जो आर्थिक रूप से इनका संबल बन सकें। परन्तु ये तीनों बहुत बड़े वोट फैक्टर नहीं हैं इसलिए राजनीति से ऐसी उम्मीद करना व्यर्थ है। इन्हें सहारा देने के लिए समाज की मानवीय संवेदनाओं को ही जागना-जगाना होगा। शायद ऐसा हो सके ! बहरहाल ये दो मासूम जिंदगी के साथ ही जिल्लत से जंग लडने को भी मजबूर हैं।
नोट : पूजा राना के नाम भारतीय स्टेट बैंक शाखा, गरूढ़, कोड- 2544, जिला बागेश्‍वर, उत्तराखंड में बचत खाता संख्यां 31671346296 खोला गया है। कोई भी योगदान इस खाते में सीधे दिया जा सकता है। मोबाइल नंबर 09917628543 पर उनसे संपर्क किया जा सकता है। इसके अलावा हरीश जोशी का मोबाइल नंबर- 09411574220 और केशव भट्ट का मोबाइल नंबर- 09412106119 है।

 

मणिपुर एक तिरछी गड़ी वर्णमाला है राष्ट्र के कलेजे में : मृत्युंजय

भारत के पूर्वोत्तर में चले आ रहे कई पृथक्तावादी आंदोलनों की चुनौती से निपटने के लिए उस इलाक़े में सरकार ने सशस्त्रबल विशेषाधिकार क़ानून लागू किया है। इसके तहत सेना की कार्रवाई किसी भी क़ानूनी जांच परख के परे है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का दावा है कि सुरक्षा बल इस क़ानून का फ़ायदा उठाकर आम बेगुनाहों को निशाना बनाती है। मणिपुर की आंदोलनकारी इरोम शर्मिला इस क़ानून को पूरी तरह से हटाए जाने की मांग को लेकर वर्ष 2000 से भूख हड़ताल पर हैं। इस पर युवा कवि मृत्युंजय की कविता-

 संसद चलती रही दस साल
दस साल चलती रही विधानसभा
कंपनियों ने नए किस्म के पिज्जे तैयार किये
पेप्सी और कोक ने मरोड़ दी गर्दन
आये नए सुवाद भरे चमकीले
केंटुकी चिकन और बेहूदा बर्गर
स्वाद सब बंद हुए पाउच में।

दस साल का वक्त आजकल बहुत वक्त होता है
किसी ग्लोबल गाँव में !

प्यारी इरोम
तुमने कुछ खाया नहीं
तुम्हारी जीभ को जंग लग गया होगा
सिर्फ नारे लगा-लगा थक चुकी होगी जुबान
सो गयी होंगीं आंत
शांत मत रहो ऐसे
मेरी प्यारी
ज़रा हंसो, मुस्कुराओ तो सही

मणिपुर एक तिरछी गड़ी वर्णमाला है राष्ट्र के कलेजे में
तिर्यक आखेटकों के भेजे में
फंसी हुई हूक
नेजे की तरह चुभती।
मैं अपनी पलकें
तुम्हारी सपनीली आँखों के रास्ते में बिछा कर
थोड़ा रोना चाहता था
तुम्हें मंज़ूर है ये ?

तुम्हारे घर में कौन-कौन है?
भाई? बहन? अम्मी? अब्बू?
चाय के झुरमुटों बीच सीधी रेखाओं में निहाँ कोरस?
तुम्हारे पड़ोस में कौन रहता है?
कितने हत्यारे हैं तुम्हारे मोहल्ले में
जिन्हें आजकल ‘ज़वान’ कहते हैं लोग.
उनकी गश्त का वक्त क्या है?
कितने बजे नहीं रहते वे?
हम कब मिल सकते हैं?

सौ सालों बाद तुम हो कि वही हो
सौ जनम बाद, शायद सौ शताब्दियों बाद
तुम हो बिना नली लगाए
अपनी उस नाक के साथ
जिसका सुघरापन मुझे बेहद पसंद है.

इरोम
तुम्हारे घर के चारो तरफ लाशें बिखरी पड़ी हैं आईनों की तरह
तुम्हारी सखी मनोरमा सात पुरुषों के नीचे से चीख रही है इरोम
इरोम
दिल्ली बहरे कातिलों और पागल हत्यारों और दोगले कवियों और नीच बाबाओं और गोरे बलात्कारियों से भरी हुई है
तुम किससे जिरह कर रही हो!

हज़ार फुट की गहराई वाले वाले अपने घर से निकल
लाख फुट निचाई वाले इस रौरव नरक में
तुम आई क्यों?
तुम पागल
बेवकूफ तुम

दस साल में कोई दस दिन ऐसे नहीं थे
कि दुनिया का कुछ बिगड़ पाता, बन पाता
आमरण अनशन की दो पंचवर्षीय योजनायें
बाबा साहेब को हाज़िर-नाज़िर जानकर
पंडित नेहरू को श्रद्धांजलि स्वरूप

शैतानी कानूनों की इजाज़त बख्शते इस
संविधान का क्या करूं मैं?
अब इन संवलाए खेतों में कोई धान नहीं है जिसे इसके वरक पर सुनहरे अक्षरों की जगह चिपका सकूं मैं
इरोम, कहाँ गयीं तुम?

सात जन आये
सात ए के सैंतालीस से लैस
शासन में बैठे सत्तर फीसदी
सैंतालीस के नुमाइंदे
सो जाओ संभ्रांत बुज़ुर्ग संतों-कवियों
सत्य की कब्र में
ज़ब्र का हाथ थाम
सात जन आये
लांग बूट, फेल्ट कैप
लोहे का छल्लेदार नोकदार ट्रैप था पंजों में
होठों से नीचे सीधे चीरते चले गए
सात नौज़वान स्त्रियों की लाश है मणिपुर
चीथी गयी रौंदी गयी
भूखी
सूखी हड्डियों वाली
सीधे बालों और नन्हें मज़बूत हाथों वाली लाश
जिनके दफ़न के लिए एक गज ज़मीन पूरे हिन्दुस्तान में नहीं बची है।

दस थीं महिलाएं
और एक तुम थीं, ग्यारह
दिगंबर. बेख़ौफ़. करुणा से सीझी हुई।
जिस्म की सारी हरकतें सिमट आयीं
पगलाई गहरी उन आँखों में।
नंगे थे हुक्मरान फौजी क्रूर,
लम्पट पुंसत्व का गलीज ठाठ-बाट
घाट-घाट ह्त्या
मस्तक को छेदता भीषण अपमान

हत्यारे
सखि मनोरमा के घर पहुंचे थे
क्या था वध-उत्सव
सब कोई मारे गए
ज़िंदा धमनियों में नश्तर उतारे गए
संगीनों कतरी गयी
चाय की नन्ही सी छोटी
मासूम शाख
भाई जो भाग रहा, पीठ पर लगी गोली
भहराकर गिर गया

दस साल सलवा जुडूम
किरकेट की बूम-बूम
खून-खून दस साल
दस साल झील डल
लोहू से भल्ल-भल्ल
दस साल सोपिया
दस साल मनोरमा
दस साल लंबा हत्या-अभियान
सत्ता के दशानन का यह रण संधान
दस साल, अनशन के दस साल

दिल्ली के जंगल में कहाँ गयी मेरी प्रिय
सात बहनों में सबसे छोटी इरोम!
जिद्दी, बातूनी और हडबड़ सी पुतली
तुम्हारे पहाड़ तुम्हारे लिए चीख रहे हैं मस्तक झुकाकर
बांस के लम्बे दरख्त सर पटक रहे है एक-दूसरे के कन्धों पर

मैं तुमसे प्यार करता हूँ इरोम
जितना कर सकता हूँ मैं
तुम्हारे दोनों होठों को चूम लेना चाहता हूँ मैं
जब तुम अपनी अनंत भूख हड़ताल से उठो तो
पपडियाये होठों के नीचे दफ़्न मुस्कराहट
का सुकून

आ…मी…न

काले धन की अर्थ व्‍यवस्‍था से हर वर्ग प्रभावित : अरुण कुमार

उदयपुर : काले धन की अर्थ व्यवस्था का साम्राज्य प्रत्येक क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके प्रभाव से समाज का हर वर्ग बुरी तरह प्रभावित हैं। दुर्भाग्य है कि भारत का प्रत्येक नागरिक कालेधन की अर्थ व्यवस्था के दुश्प्रभावों का शिकार है। भ्रष्टाचार काले धन का एक हिस्सा है। कालेधन की अर्थ व्यवस्था पब्लिक तथा प्राईवेट सेक्टर का संयुक्त उत्पाद है। यह विचार  19 अप्रैल को आयोजित डॉ. मोहनसिंह मेहता मेमोरियल व्याख्यान देते हुए प्रसिद्ध शिक्षाविद् तथा लेखक डॉ. अरुण कुमार ने व्यक्त किए। डॉ. कुमार ने कहा कि कालेधन की अर्थ व्यवस्था में 35 लाख करोड़ रूपया प्रति वर्ष पैदा होता है तथा 3.5 लाख करोड़ देश से बाहर चला जाता है। कालेधन की वजह से सकल घरेलू उत्पादन, सार्वजनिक सेवा, विधायिका तथा कार्यपालिका पर विपरित प्रभाव दृष्टिगत होता है। उन्‍होंने बताया कि कालेधन की अर्थव्यवस्था नहीं होने पर देश का सकल घरेलू उत्पादन 7.5 की वर्तमान दर के बजाय 13 प्रतिशत होता। कालेधन की अर्थ व्यवस्था का लाभ मात्र तीन प्रतिशत की है, जबकि इसके परिणाम सतानवें प्रतिशत जनता भुगतती है।
कालेधन की अर्थ व्यवस्था के कारणों की चर्चा करते हुए डॉ. कुमार ने कहा कि उपभोक्तावाद के कारण लालच की वृद्धि हुई है तथा सामुहिक सोच के बजाय व्यक्तिवादिता बढ़ी है। समाज में मिडिल मेन कल्चर आने से कालेधन की अर्थ व्यवस्था पुष्‍ठ हुई है। उन्‍होंने कालेधन की अर्थ व्यवस्था का चित्रण करते हुए बताया कि समाज में सब चलता है कि सोच ने विकृति पैदा की है। शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे ‘नोबल लॉज’ को भी इस अर्थ व्यवस्था ने ‘नॉन नोबल’ बना दिया है। कालेधन की अर्थ व्यवस्था ने देश के विकास की गति को मंथर बनाते हुए राजनीति को कैद कर लिया है। डॉ. कुमार ने बताया कि टैक्स रेट सतत् कम होने के बावजूद कालाधान पनपता है। अपराधी सत्ता में आते हैं, इसका कारण भी काला धन है। प्रजातांत्रिक संस्थाओं की मूल्याधारित जिवन्तता तथा उनमें मूल्यों का समावेश ही काले धन पर काबू पा सकती है।
प्रश्नोत्तर करते हुए डॉ. कुमार ने कहा कि प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं को मजबूत बनाने से ही उत्तरदायित्व आता है तथा इससे काले धन पर रोक लग सकती हैं।
विद्याभवन के अध्यक्ष रियाज तहसीन ने स्वागत करते हुए कहा कि नागरिकता की भावना के ह्रास होने से काली अर्थ व्यवस्था पनती है। विषय परिचय सेवा मंदिर की मुख्य संचालक प्रियंका सिंह ने किया तथा धन्यवाद ट्रस्ट अध्यक्ष विजय एस.मेहता ने ज्ञापित किया।
पूर्व विदेश सचिव प्रो. जगत एस. मेहता, पूर्व कुलपति जेएनयू प्रो. एम.एस. अगवानी, सेवामंदिर के वरिष्ठ प्रन्यासी मोहन सिंह कोठारी, समाजसेवी रवि भंण्डारी, समाजविद किशोर संत, समाजनैत्री विजया खान आदि ने भाग लिया।

सृजन के सैद्धांतिक नेपथ्‍य को विचार में लेते हैं संजीव : रवीन्‍द्र त्रिपाठी

संजीव कुमार को देवीशंकर पुरस्कार प्रदान करते विश्‍वनाथ त्रिपाठी।

नई दि‍ल्‍ली : युवा आलोचक संजीव कुमार को उनकी आलोचना-पुस्तक ‘जैनेन्द्र और अज्ञेय: सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ के लिए पंद्रहवां देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार वरिष्‍ठ आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने प्रदान किया। 05 अप्रैल, 2011 को नई दिल्‍ली स्थित साहित्‍य अकादेमी के रवीन्‍द्र भवन में आयोजित समारोह में विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी समाज अवस्‍थी जी के प्रति बहुत ही आत्‍मीय और अपनापन महसूस करता है। इसलिए युवा आलोचक संजीव कुमार को यह सम्‍मान प्रदान करते हुए मैं स्‍वयं को सम्‍मानित महसूस कर रहा हूं।
समारोह के संचालक रवीन्‍द्र त्रिपाठी ने कहा कि युवा आलोचक संजीव कुमार की आलोचना नितांत समसामयिकता तक महफूज रहने के बजाए आधुनिक परंपरा के उन तत्‍वों की ओर ध्‍यान देती है जोकि या तो पहले गंभीरता से देखे-परखे नहीं गए है या गंभीर कुपाठ का शिकार हुए हैं। वह अध्‍यवसाय और सूक्ष्‍म-द़ृष्टि द्वारा सृजन के सैद्धांतिक नेपथ्‍य को विचार में लेते हैं और उसकी सहायता से कृति को समझने की कोशिश करते हैं। उनकी पुरस्‍कृत पुस्‍तक ऐसी कोशिश का सुफल है।
दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में अवस्‍थी जी के सहकर्मी रहे सत्‍यदेव चौधरी ने संस्‍मरणात्‍मक वक्‍तव्‍य में कहा कि अवस्‍थी जी अपने अध्‍ययन-अध्‍यापन, लेखन व जीवन-शैली में आधुनिक थे। उन्‍होंने हमेशा अख्‍यात और नए लेखकों को लेखन के लिए प्रेरित और प्रोत्‍साहित किया। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि निधन से पूर्व उनकी केवल पांच पुस्‍तकें प्रकाशित हुईं, जबकि उसके बाद से अब तक कई किताबें आ चुकी हैं और लगातार चर्चा में रही हैं।
पुरस्‍कृत आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि यह अवसर मुख्‍यत: अवस्‍थी जी का जन्‍मदिन मनाने का है और किसी युवा आलोचक को उसके कार्य के लिए प्रोत्‍साहित करना तो उसका हिस्‍सा भर है। उन्‍होंने इस तथ्‍य की ओर ध्‍यान दिलाया कि छत्‍तीस साल की छोटी-सी उम्र में अवस्‍थी जी ने साहित्यिक हलके में जैसा और जितना हस्‍तक्षेप किया, वह हम जैसों के लिए गहरे आश्‍चर्य का विषय है और अपने समय का कोई ज्‍वलंत प्रश्‍न नहीं रहा होगा जिस पर अवस्‍थी जी ने लिखित मुठभेड़ न की हो। और इस मुठभेड़ के लिए भारतीय काव्‍य और काव्‍यशास्‍त्र की परंपरा से लेकर पश्चिम के साहित्‍य सिद्धांतों के अपने ज्ञान का समुचित उपयोग ने किया हो।
इस अवसर पर आयोजित ‘उपन्‍यास और हमारा समय’ विषयक विचार गोष्‍ठी का प्रारंभ करते हुए पंकज बिष्‍ट (रामजी यादव द्वारा पढ़े गए पर्चे में) ने कहा कि उपन्‍यास की पहली और आखिरी विशेषता उसकी समकालीनता ही है और इस रूप में उपन्‍यास और हमारे समय पर बात करने का दूसरा अर्थ उपन्‍यास और हमारा समाज या फिर समाज और उपन्‍यास के रिश्‍ते को रेखांकित करना है। आजादी के बाद हिंदी उपन्‍यास को हाशिए पर धकेल दिए जाने का परिणाम भी हम देख रहे हैं। कितनी बड़ी विडंबना है कि 40 करोड़ हिंदीभाषियों के पास 40 अच्‍छे उपन्‍यासकार नहीं हैं। रवीन्‍द्र त्रिपाठी ने कहा कि समाज कोई निश्चित या पारिभाषिक शब्‍द नहीं है। इससे गांव-शहर, परंपरा-आधुनिकता के साथ बहुत कुछ समाया है। हिंदी में उपन्‍यास-आलोचना का आत्‍मविश्‍वास कविता-आलोचना की तुलना में काफी संकट में रहा है। आशुतोष कुमार ने समय के साथ उपन्‍यास के रिश्‍ते को विश्‍लेषित करते हुए कहा कि उपन्‍यास समय की सूची अवधारणा के खिलाफ खड़ा है और स्‍मृति, यथार्थ और कल्‍पना के बीच की दूरी उपन्‍यास की औपन्‍यासिकता को तय करती है, औपनिवेशिक इतिहास के शोषण के रूपों का आख्‍यान बनाती है और इस तरह वह खंडित होते मनुष्‍य के मनुष्‍य होने के अहसासों को रेखांकित करता है।
संजीव कुमार ने कहा कि लेखक पाठक को रोना तो रोते हैं, लेकिन खुद उन्‍होंने इस पाठक तक जोड़ने, उसे लोकप्रिय बनाने के लिए क्‍या किया ? अगर किसी ने ऐसा किया तो उसे भाषीय खिलंदड़ापन करता गप्‍पोड़ कहा गया। उपन्‍यासकार को अगर उपन्‍यासकार बने रहना है तो उसे तरह-तरह की आवाजों को स्‍पेस देना ही होगा।
अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में अशोक वाजपेयी ने महाकाव्‍य और उपन्‍यास के अंतर को स्‍पष्‍ट करते हुए कहा कि महाकाव्‍य मनुष्‍य को पवित्रता के बोध से मुक्‍त नहीं हो पाता ओर उपन्‍यास मनुष्‍य की अपवित्रता के बोध से। एक लोकतांत्रिक कर्म के रूप में उपन्‍यास ने ही सबसे अधिक चालू नैतिकता को चुनौती दी है, एक तरह की नैतिक प्रश्‍नवाचकता को चिह्नित किया है। इस मायने में वह हमारी स्‍वतंत्रता का विस्‍तार करता है, उसके प्रति हमारी जवाबदेही पुष्‍ट करता है।
अंत में अनुराग अवस्‍थी ने सभी को धन्‍यवाद ज्ञापित किया।

एक पहाड़ी मैना की मौत : कांतिकुमार जैन

विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई पहाड़ी मैना को लेकर प्रसिद्ध लेखक कांतिकुमार जैन का संस्‍मरणात्‍मक आलेख-

पहाड़ी मैना की पूरी प्रजाति के ही विलुप्ति का शिकार होने की आशंका है। पहाड़ी मैना जितना निरीह, सुकुमार और विलक्षण प्रतिभासंपन्न प्राणी विश्व में शायद ही कोई दूसरा हो। आधी बित्ते से भी छोटा परिंदा जिसे आप अपनी हथेली पर बैठा लें, में और सब कुछ तो सामान्य मैना जैसा है पर इस नन्ही-सी जान में प्रकृति से पता नहीं कैसी अनुकरण की क्षमता मिली है कि वह मानव द्वारा उच्चरित ध्वनि की हूबहू नकल कर सकती है, बिना किसी अभ्यास या प्रशिक्षण के। आप बोलिए और पहाड़ी मैना उसकी नकल करती चली जाएगी, जैसे किसी ने उसके गले में कोई टेप-रिकॉर्डर फिट कर दिया हो। यह मैना केवल छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के पहाड़ों में ही पाई जाती है, इसलिए इसे बस्तरिहा मैना भी कहते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसकी अनन्यता को स्वीकृति प्रदान करने के लिए इसे राज्य के पक्षी वर्ग का प्रतीक घोषित किया है। राज्य के अन्य प्रतीक चिह्न  हैं, पेड़ों में साल और पशुओं में अरना भैंसा। अरना अर्थात जंगली भैंसा। पक्षियों में तोता ही एक ऐसा जीव माना जाता है, जिसके मनुष्य की बोली की नकल करने के सैकड़ों किस्से हमारी लोक-कथाओं और महाकाव्यों में भरे पड़े हैं। जायसी के पद्मावत के हीरामन को कौन नहीं जानता ? शुक-सारिका अपने प्रेमालाप के लिए प्रसिद्ध हैं, पर शुक को सिखाना पड़ता है, पहाड़ी मैना को मनुष्य की बोली का अनुकरण करना सिखाना नहीं पड़ता है। पहले के कलारसिक अपने घरों में शुक भी पालते थे और सारिका भी।
बस्तर के जंगलों में जो सारिका या मैना पाई जाती है उसकी नकल सुनकर बड़े-बड़े ध्वनि विशेषज्ञ चकरा जाएं। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जब बस्तर के दौरे पर आईं थीं, तब वे ओरछा और नारायणपुर भी गई थीं। यह वही क्षेत्र है जो इन दिनों नक्सलवादी उथल-पुथल के लिए समाचारों में छाया रहता है। किंवदंती है कि इंदिराजी ने नारायणपुर के विश्रामगृह में जब अपनी ही आवाज सुनी तो वे कौतूहल से भर गईं। यहां मेरी आवाज में बोलने वाला कौन है? उनके सामने पिंजरबद्ध बस्तरिका मैना प्रस्तुत की गई। इंदिराजी को विश्वास नहीं हुआ। वहां के वन अधिकारियों ने पहाड़ी मैना की मानव ध्वनि अनुकरण विलक्षणता के बारे में बतलाया। पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने मैना से स्वयं बातचीत की… यह क्या? मैना उनके संवादों को ज्यों का त्यों, उसी आरोह-अवरोह और बलाघात में दुहरा रही है। इंदिराजी ने जानना चाहा कि इसे पहाड़ी मैना क्यों कहते हैं ? क्योंकि ये पहाड़ों में रहती हैं, केवल बस्तर के पहाड़ों में। क्या कोई मैदानी मैना भी होती है?
हां, होती है पर उसे कौंदी मैना कहते हैं। कौंदी अर्थात् गूंगी। जब मैं बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर के महाविद्यालय में हिंदी का प्राध्यापक होकर पहुंचा तब तक पूरे बस्तर में इंदिराजी और पहाड़ी मैना के किस्से किंवदंती बन चुके थे। यहां विद्यालय का मेरा एक विद्यार्थी था प्रफुल्ल कुमार सामंतराय। प्रफुल्ल का गला बेहद मीठा था, उसकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी, उसे गालिब के सैकड़ों शेर कंठस्थ थे। वह विख्यात अंग्रेजी साप्ताहिक ब्लिट्ज का क्षेत्रीय संवाददाता था। वह बैलाडिला की अयस्क खदानों की रिपोर्टिंग के लिए वन्यांचल के सुदूर क्षेत्रों में जा रहा था। तब वह मुझसे मिलने आया। सर, मैं बैलाडिला से आपके लिए क्या लाऊं?
पत्नी के मुंह से बेसाख्ता निकला- माड़ी मैना।
माड़ी बस्तर की बोली में पहाड़ी को कहते हैं। बस्तर का दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र इसीलिए अबूझमाड़ कहलाता है। हफ्तेभर बाद जब प्रफुल्ल अबूझमाड़ का दौरा कर लौटा तो बांस की तीलियों से बना एक सुंदर-सा पिंजरा उसके साथ था। उस पिंजरे में एक सुकुमार पक्षी था- पहाड़ी मैना। पक्षी बड़ा निरीह-सा लगा, पर जब प्रफुल्ल ने हल्बी में उससे बात की तब उस सुकुमारी मैना ने उसको ज्यों-का-त्यों दुहरा दिया। यदि हमारी पीठ प्रफुल्ल की ओर होती तो हम समझते कि यह मैना नहीं, प्रफुल्ल ही बोल रहा है।
हमने प्रफुल्ल की बताई हुई सारी सावधानियां बरतीं, खाने के लिए चावल की कनकी, कोदों के दाने, घास के बीज। देखो, यहां शोर मत करो, यहां बस्तर की जादूकंठी मैना सो रही है। हम लोगों ने उस विलक्षण मैना का नाम भी रखा- अरण्यप्रिया, दंडकारण्य की उस अनन्य मैना का दूसरा नाम होता भी क्या ? पर उसे देखने के लिए पूरा महाविद्यालय हमारे यहां जुट आया। पर उसे देखने
के लिए पूरा महाविद्यालय हमारे यहां जुट आया। जो आता वह बरांडे में टंगे पिंजरे में झांकता, कोई सीटी बजाता, कोई हंसता। चौथे दिन मैना कुछ लस्त-सी दिखी। पांचवें दिन सबेरे हमने जब दरवाजा खोला तो पिंजरा यथावत था, मैना भी सो रही थी, पर उसकी देह निस्पंद थी- रात बड़ा कोहरा था, सर्द हवा चली थी। मैना के गले में कांटे उग आए थे और ठंड से वह प्रकृति प्रिया अकड़ गई थी। लेकिन मुझे लगा न तो वह ठंड से अकड़ी थी, न ही कोहरे से निस्पंद हुई थी। पिंजरे का बंधन उसे रास नहीं आया था। नगर का कृत्रिम जीवन उसे भारी पड़ गया था, वह वन की स्वच्छंद विहारी थी, शहर में रहना उसे रास नहीं आया, मनुष्यों के संपर्क ने उसके जीवन में जैसे विष घोल दिया हो। दंडकवन की सुरम्य प्रकृति की बाल विहारिनी की मानव निर्मित कारा में मृत्यु हमारे बस्तर प्रवास की सबसे मर्मांतक घटना थी। हम लोग उस मैना को जीवनभर नहीं भूल पाए, उसके बाद हमने किसी भी पक्षी को बंदी नहीं बनाया।
पहाड़ी मैना की प्रजाति अब विलुप्ति के कगार पर है। उसकी मानव ध्वनि की असाधारण अनुकरण क्षमता ही उसकी सबसे बड़ी शत्रु सिद्ध हुई। मुंबई, दिल्ली, पुणे, हैदराबाद जैसे महानगरों के कला रसिकों की वह इतनी बड़ी पसंद सिद्ध हुई कि दूर-दूर के व्यापारी उसे खरीदने के लिए बस्तर आने लगे और विदेशों में भी उसका निर्यात होने लगा। अबूझमाड़, बैलाडिला, ओरछा, छोटे डोंगर, बारसूर, कुटमसरे की पहाडिय़ां पहाड़ी मैना का प्राकृतिक रहवास हैं। नागर जलवायु और असंयमित आहार उसे रास नहीं आया। ध्वनि प्रदूषण उसके लिए महारोग से कम नहीं। उसके गले में कांटे उगे नहीं कि उसकी स्वर तंत्रिका नष्ट हो जाती है। पहाड़ी मैना को संरक्षण की सख्त जरूरत है।

देश के संसाधन जनता के हाथ में आएं : बनवारीलाल शर्मा

गिरदा सम्मान ग्रहण करते जनकवि अतुल शर्मा।

रुद्रपुर : आज समाज में कई प्रकार के भूकम्प पैदा हो रहे हैं। पहला भूकंप यूरोप में औद्योगिक क्रांति के रूप में यदि 1789 में आया था तो जिसके बाद दूसरा बड़ा भूकम्प सूचना क्रांति के रूप में दिखा। ग्लोबलाइजेशन की बात तो ठीक है किन्तु इसके नाम पर कारपोरेटाइजेशन ही हो रहा है। इससे कई परिभाषायें बदल गई हैं। कभी लोकतंत्र का मतलब ‘जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए’ था। लेकिन अब लोकतंत्र का यह अर्थ ‘कारपोरेट का शासन, कारपोरेट के लिए, कारपोरेट के द्वारा’ हो गया है। देश के संसाधन जनता के हाथों में आने चाहिए। इसके लिए जन आंदोलन करने, विभिन्न जनांदोलन संगठित रूप से हों तभी बात बन सकती है। ये बातें आजादी बचाओ आन्दोलन के संयोजक बनवारीलाल शर्मा ने रुद्रपुर में 25 मार्च को आयोजित 21वें उमेश डोभाल स्मृति एवं सम्मान समारोह में कहीं।
मुख्यवक्ता डॉ. शर्मा ने कहा कि देश के संसाधन जनता के हाथों में आने चाहिए। इसके लिए जन आंदोलन करने और विभिन्न जनांदोलन संगठित रूप से हों तभी बात बन सकती है।
रुद्रपर के जवाहरलाल नेहरू कम्युनिटी हाल में हुये इस आयोजन में राज्य के अलावा दिल्ली,  इलाहाबाद, लखनऊ आदि स्थानों से पत्रकार, लेखक, संस्कृतिकर्मी, जनान्दोलनकारी आदि जुटे।
सत्र का आरम्भ मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन और उमेश डोभाल पत्रकारिता पुरस्कार वितरण के साथ हुआ। दूसरे सत्र में वैकल्पिक मीडिया पर चर्चा हुई। इसके उपरान्त मंचासीन व्यक्तियों के द्वारा उमेश डोभाल, राजेंद्र रावत तथा गिरीश तिवारी गिर्दा के चित्रों पर पुष्पाजंली अर्पित की गई। ट्रस्ट द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य करने वाले व्यक्तियों को सम्मानित किया गया। इनमें जनकवि डॉ. अतुल शर्मा को कविता के क्षेत्र में ‘गिरदा सम्मान’, विजय जड़धारी को पारम्परिक बीजों के क्षेत्र में की जा रही पहल के लिये ‘राजेन्द्र रावत जनसरोकार सम्मान’ तथा डॉ. शेरसिंह पांगती को संस्कृति व परम्पराओं के संरक्षण के लिये ‘उमेश डोभाल स्मृति सम्मान’ मुख्य वक्ता बनवारीलाल शर्मा के हाथों प्रदान किये गये। ट्रस्ट द्वारा 2010 में प्रिन्ट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के क्षेत्र में अच्छा काम करने वाले दो पत्रकारों को पुरस्कृत किया गया। मीडिया के क्षेत्र में दिया जाने वाला उमेश डोभाल युवा पत्रकारिता पुरस्कार पिथौरागढ़ में कार्यरत्त दैनिक जागरण के संवाददाता भक्तदर्शन पाण्डे को व इलेक्ट्रानिक मीडिया श्रेणी का पुरस्कार पिथौरागढ़ के ई.टी.वी. संवाददाता विजयवर्द्धन उप्रेती को मुख्य अतिथि गोविन्दबल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. बी.एस. बिष्ट द्वारा प्रदान किये।
डॉ. बी.एस. बिष्ट ने कहा कि खबर को तथ्यों की भली-भांति पुष्टि के बाद ही भेजना चाहिये ताकि वे अतिरंजित न हों। खबरों में तथ्यों की गलती से कई बार भ्रामक स्थिति पैदा हो जाती है तथा इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता को आघात लगता है। इससे अपना काम ठीक से अंजाम दे रहे लोगों का मनोबल गिरता है। उन्होंने अपील की कि पत्रकार अच्छे कार्यों की भी उदारतापूर्वक रिपोर्टिंग करें।
डॉ. अतुल शर्मा ने गिर्दा की पसंदीदा पंक्तियां- ‘राजा बोला रात है, मंत्री बोला रात है, अफसर बोला रात है, यह सुबह-सुबह की बात है’ और गिर्दा का गीत ‘जेता कोई न कोई तो ल्यालो दिन या दुनि में’ प्रस्तुत किया। उन्होंने अपना जनप्रिय गीत ‘अब तो होश में आ जाओ ओ शब्दों के सौदागर’ गाकर उपस्थित लोगों को झकझोर दिया। विजय जड़धारी ने कहा कि आधुनिक खेती एक तरह से रासायानिक खेती ही है जिसका भूमि और किसानों पर दुष्प्रभाव हो रहा है। आधुनिक खेती के चलते ही देश के दो लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। आधुनिक तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बहकावे में आकर जिन किसानों ने एकल खेती की वे सर्वाधिक नुकसान में रहे और उत्तराखंड जैसे तमाम क्षेत्रों में जहां परम्परागत और जैविक खेती होती रही वहां के किसानों को अधिक परेशानी नहीं हुई। उन्होंने जैव विविधता को बचाने और जैविक खेती को अपनाने की अपील की। डॉ. शेरसिंह पांगती ने कहा कि आधुनिकता के प्रभाव के कारण हमारी परम्परायें व विरासत मिट रही हैं। इनके संरक्षण के लिये सरकारी पहल की आवश्यकता है। विजयवर्द्धन उप्रेती तथा भक्तदर्शन पाण्डे ने भी अपनी बात रखी।

डॉ. गोविंद पंत राजू ने कहा कि आज की पत्रकारिता पूंजी के पक्ष में है, लेकिन यह भी सही है कि मीडिया संस्थानों के तमाम निर्मम रवैयों के बावजूद उमेश डोभाल जैसी धारदार पत्रकारिता जिंदा है। अभी पत्रकारों को देश और समाज की बहुत चिंता है। उन्होंने पत्रकारिता में आ रही गिरावट के दौर में जनपक्षधर वैकल्पिक मीडिया खड़ा करने पर जोर दिया ताकि जनता की आवाज दब न सके। इस सत्र का संचालन क्रमशः कस्तूरी लाल तागरा, रूपेश कुमार सिंह और डॉ. योगेश धस्माना ने किया।
‘वैकल्पिक मीडिया की चुनौतियां’ संगोष्ठी का आगाज करते हुए दि ट्रिब्यून के कुमाऊं ब्यूरो प्रमुख राजीव खन्ना ने इस बात पर चिंता जताई की बड़े मीडिया में आम जनता के सवाल हाशिये पर डाल दिए गये हैं और उसने आम आदमी की सोचने-समझने की क्षमता पर ग्रहण लगा दिया है। हमें क्या करना चाहिए, हमारी क्या जरूरतें हैं और हम कैसे रहें यह मीडिया हमें बता रहा है और हम वह जो चाहता है उसके अनुरूप संचालित हो रहे हैं। उन्होंने वैकल्पिक मीडिया के विभिन्न रूपों पर बात करते हुए बताया कि मोबाइल, इंटरनेट, सामुदायिक रेडियो और लघु पत्र-पत्रिका में से किसी को भी हम वैकल्पिक मीडिया के रूप में अपनी क्षमता के हिसाब से अपना सकते हैं। दिल्ली के पत्रकार और पत्रकारिता के शिक्षक भूपेन सिंह ने पूंजीपतियों के मीडिया द्वारा जनता के खिलाफ किए जा रहे विभिन्न षड्यंत्रों की जानकारी दी। उन्होंयने कहा कि वर्तमान मीडिया के ढांचे को समझे बगैर इसके जनविरोधी चरित्र की पहचान नहीं हो सकती और वैकल्पिक मीडिया की तैयारी भी नहीं हो सकती।
‘आधारशिला’ पत्रिका के संपादक दिवाकर भट्ट ने कहा कि पत्रकारिता लोगों तक सूचना और ज्ञान पहुंचाने का माध्यम रहा है। उन्होंने वैकल्पिक पत्रकारिता के साथ ही वैकल्पिक राजनीति की भी जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि जिस तरह जनता आज की राजनीति से निराश है, उसी तरह आज की पत्रकारिता से भी उसका भरोसा उठ गया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान मीडिया से बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती। हमें गंभीरता से वर्तमान पत्रकारिता और राजनीति के विकल्पों की तलाश करनी चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. उमाशंकर थपलियाल ने कहा कि पत्रकारिता अब मिशन नहीं रहा। आज खबर बिक रही है। बाजारवाद ने मीडिया को बाजारोन्मुखी बना दिया है। पूर्व विधायक मुन्नासिंह चौहान ने कहा कि उमेश डोभाल स्मृति समारोह अनुकरणीय है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानव सभ्यता के विकास की अहम साधन रही है। लोकतंत्र का कोई भी अंग यदि अपनी स्वतंत्रता को सत्ता अधिष्ठान के पास गिरवी रख देता है तो उसके खिलाफ बगावत करना जनता का अधिकार है। उत्तराखंड की देवभूमि जिसे भारत का भाल कहकर भरमाया जाता रहा है, में आज भ्रष्टाकचार, व्यभिचार और शराबखोरी व्याप्त हो चुकी है। उन्होंने कहा कि आज जब मुख्यधारा के मीडिया में जनता की आवाज नहीं आ रही है, ऐसे में वैकल्पिक मीडिया पर गंभीर चिंतन-मनन किया जाना चाहिये।
कला, संस्कृति एवं साहित्यिक संस्था ‘उजास’ के मुकुल ने वैकल्पिक मीडिया के तमाम उदाहरण देते हुए कहा कि वैकल्पिक मीडिया स्थापित किया जा सकता है बशर्ते हम अतीत के अनुभवों से सीख लेते हुए गंभीर चिंतन-मनन और बेहतर तैयारियां करें। वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह ने कहा कि बड़े घरानों के मीडिया का लक्ष्य पूंजी कमाने तक सीमित हो गया है। ऐसे में छोटी पत्र-पत्रिकायें ही जनता की आवाज को उठा सकती हैं।
मुख्य अतिथि बनवारी लाल शर्मा ने परमाणु रिएक्टरों की देश में स्थापना के खिलाफ हुई एकजुटता की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जापान के भूकम्प ने सारी जनता को हिलाकर रख दिया है। वहां पर जिस तरह से विकीरण का खतरा पैदा हो गया है उसने सब को चेताया है। आज महाराष्ट्र के जैतापुर में 10 हजार मेगावाट क्षमता का परमाणु संयन्त्र बन रहा है वह क्षेत्र भूकम्पीय जोन में आता है। इसके बनने से हजारों किसानों का विस्थापित तो होना ही होगा साथ में कृषि भूमि बरबाद होगी। उन्होंने कहा कि यही समय है जब परमाणु ऊर्जा के मामले में हम सरकार के समक्ष कड़ी चुनौती खड़ी कर सकते हैं। शर्मा ने कहा कि यह व्यवस्था जनता की समस्याओं को दूर नहीं कर सकती। अब समय आ गया है कि इस शोषक और अन्यायी व्यवस्था को उखाड़ फेंका जाए। यह जनता और देश के हित के लिए जरूरी है।
अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा कि आज स्थिति यह हो गई है कि जनता के पक्ष में बोलने वाला देशद्रोही करार दिया जाता है। ट्रस्ट के अध्यक्ष गोविंद पंत राजू ने आशा जताई कि समारोह में शामिल हुए लोगों ने मोटे तौर पर वैकल्पिक मीडिया की जरूरत को शिद्दत से महसूस किया गया है और हम आशा करते हैं कि इस पर जल्द ही कोई आम राय जनपक्षधर लोगों द्वारा कायम कर आगे बढ़ा जाएगा। अन्य वक्ताओं ने भी सत्ता और कारपोरेट्स के उत्तरोत्तर होते जा रहे चरित्र को रेखांकित करते हुए इससे सावधान रहने और विरोध की शक्तियों को एकजुट करने पर जोर दिया। इस सत्र का संचालन गोविंद पंत राजू ने किया। इसमें मुकुल सुनील ममगाईं, सूरज कुकरेती ने भी अपनी बात रखी और भटक रहे मीडिया के चेहरे को उजागर किया।

समारोह में लैंसडौन के चित्रकार देवेन्द्र नैथानी द्वारा लगाई गई कविता पोस्टर प्रदर्शनी ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। इसमें अनेक कवियों की जनपक्षीय कविताओं के पोस्टर लगाये गये थे। समारोह में इतिहासकार पद्यमश्री शेखर पाठक, आनंद बल्लभ उप्रेती, अयोध्या प्रसाद ‘भारती’, खेमकरण ‘सोमन’, हरीश पंत, जगमोहन रौंतेला, सीताराम बहुगुणा, भवनी शंकर, सुधीर भट्ट, वीरेन डंगवाल, ललित कोठियाल, वीरेश कुमार सिंह, सुरेंद्र रावत, ए.पी. घायल, त्रिभुवन उनियाल, सुनील ममगाई, छायाकार अरविंद मुदगल व देवानंद भट्ट, रत्नाकर भारती, डॉ. अजय शुक्ला, दीवान नगरकोटी, रेखा शर्मा आदि लगभग 250 पत्रकार, साहित्यकार, रंगकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता और जनांदोलनों से जुड़े लोग मौजूद थे।
तीसरे और अंतिम सत्र में ‘नवांकुर नाट्य समूह’ पौड़ी के कलाकारों ने नाटक ‘समरथ को नहीं दोष गुसाईं’ प्रस्तुत कर व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र की झलक पेश की। उनकी प्रस्तुति पर आयेाजन समिति के प्रेम अरोरा और बी.सी. सिंघल उनको पुरस्कृत किया।
सम्मेलन में सर्वसम्मति से निम्न प्रस्ताव पारित किये गये –
-यह सम्मेलन पत्रकारिता को महज व्यवसाय बना देने के लिये जिम्मेवार पेड न्यूज की प्रवृत्ति की भर्त्स्ना करता है और सरकार राजनीति दलों व राजनेताओं से उम्मीद करता है कि वे इससे परहेज करें।
-यह सम्मेलन उत्तराखण्ड में पत्रकार मान्यता समिति की नीति व पत्रकारों के व्यवसायगत सुविधाओं को बढ़ाने के लिये जरूरी उपाय करने की मांग करता है।
-यह सम्मेलन सरकार से अपेक्षा करता है कि राज्य में जनसरोकार के कार्य से जुडे लोगों को सन्देह की दृष्टि से देखना बन्द करे। सम्मेलन राज्य में जलविद्युत परियोजनाओं के खिलाफ शान्तिपूर्ण आन्दोलन करने वाले आन्दोलनकारियों का दमन बन्द करने तथा ऐसे आन्दोलनकारियों की बिना शर्त रिहाई की भी मांग करता है।
-सम्मेलन मांग करता है कि राज्य में आपदा, राहत पुनर्वास की जनसहभागिता आधारित पारदर्शी नीति बनाई जानी चाहिये। हिमालयी राज्यों में आपदा राहत के मानकों को नये सिरे से गठित किया जाय ताकि पीडित लोगों को न्याय मिल सके।
-सम्मेलन चाहता है कि राज्य के वनों में आगजनी रोकने के लिये स्थानीय समाज की भागीदारी बढ़ाने के लिये प्रयास किया जाना चाहिये और इसे आर्थिक आधार दिया जाय।
-सम्मेलन चाहता है उत्तराखण्ड के किसानों की रक्षा के लिये उत्तराखण्ड की परिस्थितियों के अनुकूल नीतियां बनाई जानी चाहिये ताकि यहां की बची-खुची कृषि भूमि बरबाद होने से बच सके। सम्मेलन चाहता है पर्वतीय क्षेत्र में पारम्परिक बीज और मिश्रित खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिये और इसके लिये नीतियां बनाई जानी चाहिये। ठेका खेती का विचार पहाड़ के लिये उपयोगी नहीं होगा।
-सम्मेलन राज्य में बढ़ रहे पलायन को रोकने के लिये सरकार से दीर्घकालिक नीतिगत उपायों को करने की मांग करता है ताकि पर्वतीय क्षेत्र में कृषि, बागवानी, कुटीर उद्योगों की कल्पना साकार हो सके।

श्रमिकों महिलाओं ने की स्‍त्री आंदोलन की शुरुआत : उमा चक्रवर्ती

अनिल सिन्हा की स्मृति में कविता पोस्टर का लोकार्पण करते अशोक भौमिक और उमा चक्रवर्ती। साथ में बी. मोहन नेगी और आशुतोष कुमार।

गोरखपुर में 23 से 27 मार्च तक चले छठें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल पर संस्‍कृतिकर्मी सुधीर सुमन की रिपोर्ट-
गोरखपुर : ‘‘आज जो स्त्री आंदोलनों की शताब्दी मनाई जा रही है, उसकी शुरुआत श्रमिक महिलाओं ने की थी। भारत में सौ-सवा सौ साल के दौरान स्त्रियों के संघर्ष का जायजा लेते हुए प्रसिद्ध इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने कहा कि उन्नीसवी सदी में जो समाज सुधार का आंदोलन था, वह औरतों की स्थिति पर टिका हुआ था। वह मध्यवर्गीय परिवार के दायरे में सीमित था। जो औरतें खेतों में काम करती हैं, पत्थर तोड़ती हैं, उनकी चर्चा नहीं मिलती। परिवार में औरतों की जिंदगी में क्या और कितना बदलाव लाना है, समाज सुधारक प्रायः यही तय कर रहे थे। हालांकि उस दौर में स्त्रियां क्या सोच रही थीं, इतिहास में इसके साक्ष्य कम मिलते हैं, लेकिन जो साक्ष्य मिले हैं वे बताते हैं कि उस वक्त स्त्रियों का स्वर ज्यादा प्रतिरोधी था। उदाहरण के तौर पर ताराबाई शिंदे और रमाबाई के लेखन और संघर्ष को देखा जा सकता है। ये बातें उन्‍होंने छठे गोरखपुर फिल्‍म फेस्टिवल के उद्घाटन करते हुए कही। उन्‍होंने कहा कि स्त्री का संघर्ष सिर्फ भौतिक जरूरतों यानी रोजी-रोटी के लिए ही नहीं, बल्कि सोचने, अनुभव करने और अपने आत्म को हासिल करने का भी संघर्ष है। महिला आंदोलन के साथ संस्कृतिकर्म के गहरे रिश्ते के कई अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि महिला आंदोलन और प्रतिरोधी संस्कृतिकर्म के बीच घनिष्ठ रिश्ता होना चाहिए, इस एकजुटता से ही नाजुल्मी समाज बन पाएगा।’’

अंतरिक्ष विज्ञान कार्यशाला में बच्चों के साथ उषा श्रीनिवासन।

यह फेस्टिवल मानो इस तरह की एकजुटता की अभिव्यक्ति ही था। शहीद-ए-आजम भगतसिंह के शहादत दिवस के अवसर पर शुरू इस फेस्टिवल के प्रेक्षागृह के प्रवेशद्वार पर प्रसिद्ध चित्रकार चित्त प्रसाद की एक मशहूर पेंटिंग लगी थी, जिसमें भगतसिंह निर्भीकता और जोश के साथ फांसी के तख्ते की ओर बढ़ रहे हैं। 23 मार्च क्रांतिकारी वामपंथी आंदोलन के बड़े कवि अवतार सिंह पाश का भी शहादत दिवस है। उद्घाटन सत्र में युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने उनकी कविता ‘सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना’ को याद करते हुए प्रतिरोध की सांस्कृतिक धारा को और मजबूत बनाने की जरूरत पर जोर दिया। जनकवि रमाशंकर यादव और बल्ली सिंह चीमा का काव्यपाठ तथा हिरावल (पटना) और संकल्प (बलिया) द्वारा फैज, गोरख पांडेय, विजेंद्र अनिल की रचनाओं और भिखारी ठाकुर के विदेशिया का गायन भी फेस्टिवल का आकर्षण था। बच्चों के सत्र में उषा श्रीनिवासन के अंतरिक्ष विज्ञान कार्यशाला में सूर्य, चांद, ग्रह, धरती, मौसम आदि के संबंध में ढेर सारी जानकारियां बड़े सहज अंदाज में मिलीं। बच्चों ने ढेर सारे चित्र और रेखांकन बनाए। उन्हें जफर पनाही की फिल्म ‘व्हाइट बलून’ दिखाई गई। पूरे फेस्टिवल के दौरान बी. मोहन नेगी के कविता पोस्टर और युवा चित्रकार अनुपम राय के चित्रों ने भी लोगों का ध्यान खींचा। प्रेक्षागृह के बाहर लेनिन पुस्तक केंद्र और गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की ओर से किताबों का स्टाल लगाया गया था। इस मौके पर प्रकाशित स्मारिका का लोकार्पण भी समारोह में हुआ। इस मौके पर उमा चक्रवर्ती ने स्त्री अधिकार आंदोलन और अन्य लोकतांत्रिक आंदोलनों से संबंधित अपने निजी संग्रह में मौजूद पोस्टरों पर आधारित एक महत्वपूर्ण व्याख्यान भी दिया। ये पोस्टर पिछले तीन-चार दशक के राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों के ऐतिहासिक साक्ष्य की तरह थे। इमरजेंसी के प्रसंग से शुरू होकर उनका व्याख्यान आज के अघोषित इमरजेंसी के प्रसंग पर पहुंचा। अंतिम पोस्टर विनायक सेन का था, जिसमें नेल्शन मंडेला और आंग सान सूकी के साथ उनकी तस्वीर है और जिसमें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाया गया है। उमा चक्रवर्ती ने स्पष्ट तौर पर कहा कि आज भारतीय लोकतंत्र गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है।

फेस्टिवल पत्रकार-लेखक-जनसंस्कृतिकर्मी अनिल सिन्हा की स्मृति को भी समर्पित था। अनिल सिन्हा का ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ नामक इस अभियान से गहरा जुड़ाव था। अनिल सिन्हा एक प्रखर जनवादी कला समीक्षक भी थे। इस मौके पर गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की ओर से अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान की शुरुआत की गई। चित्रकार अशोक भौमिक ने ‘चित्त प्रसाद और भारतीय पेंटिंग की प्रगतिशील परंपरा’ पर पहला अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान दिया। उन्होंने अपने व्याख्यान के दौरान बताया कि किस तरह पीपुल्स वार, जनयुद्ध और स्वाधीनता जैसे कम्युनिस्ट पार्टी के अखबारों में चित्त प्रसाद ने अकाल, लूट और शोषण के चित्र बनाकर चित्रकला और पत्रकारिता को नए आयाम दिए। फेस्टिवल में अनिल सिन्हा की पत्नी आशा सिन्हा का हौसले से भरा एक मार्मिक संदेश भी पढ़ा गया जिसमें यह कहते हुए कि साम्राज्यवाद विरोधी, वामपंथी और लोकतांत्रिक साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों का जो एक विशाल परिवार है, अनिल सिन्हा उसके सदस्य थे, उन्होंने यह संकल्प जाहिर किया है कि वे और उनके बच्चे प्रतिबद्धता की उसी राह पर कायम रहेंगे। अनिल सिन्हा की याद में भगवान स्वरूप कटियार द्वारा लिखी गई कविता के पोस्टर का लोकार्पण भी इस दौरान हुआ। लोकार्पण उमा चक्रवर्ती ने किया।
विभिन्न कलाओं और विधाओं के अंतर्संबंधों के बारे में तो अनिल सिन्हा लिखते ही रहे, एक संगठक के बतौर उनकी गहरी निगाह संस्कृति के क्षेत्र में उभरने वाली नई प्रगतिशील प्रवृत्तियों और संभावनाओं पर भी रहती थी। इस फेस्टिवल में विभिन्न राज्यों से पहुंचे प्रतिनिधियों ने प्रतिरोध के सिनेमा का राष्ट्रीय नेटवर्क बनाकर उन्हें मानो सही श्रद्धांजलि दी। फिलहाल देश के 22 शहरों और कस्बों में फिल्म सोसाइटी बनाने और फिल्म फेस्टिवल करने का निर्णय हुआ। जो राष्ट्रीय कमेटी बनेगी, उसमें कुछ महत्वपूर्ण फिल्मकार, रंगकर्मी, साहित्यकार, चित्रकार आदि भी शामिल होंगे। प्रतिनिधियों के बीच इसे लेकर पूरी सहमति थी कि इस मुहिम में साम्राज्यवादी पूंजी से पोषित किसी संस्था, सरकार, कारपोरेट या माफिया की कोई मदद नहीं ली जाएगी। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जनता के सहयोग के बल पर ही विकसित होगा। इसकी नीतियों और रणनीतियों पर हुए विचार-विमर्श में अशोक चैधरी, मनोज सिंह, आशुतोष कुमार, संतोष झा, सुभाषचंद्र कुशवाहा, समता राय, स्वाधीन दास, मदन चमोली, शैलेंद्र, नितिन, अंकुर, भगवान स्वरूप कटियार, अवंतिका आदि शामिल थे।
ऐसा सिनेमा जिसमें जनता के दुख-दर्द और उसके संघर्ष और प्रतिरोध का अक्स हो, उसे उस तक पहुंचाया जाए, इसी मंशा से आज से पांच साल पहले गोरखपुर से ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ नामक अभियान की शुरुआत हुई थी। इस बीच लखनऊ, नैनीताल, दुर्ग, पटना जैसे शहरों में भी इसी नाम से फिल्मोत्सवों का सिलसिला शुरू हुआ। इस बार 23 मार्च से 27 मार्च तक आयोजित छठा गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल इस तरह का सोलहवां आयोजन था।

 

सबा दीवान की फिल्म द अदर सांग का दृश्य ।

यह फिल्म फेस्टिवल इस मायने में खास था कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर इसमें 17 भारतीय महिला फिल्मकारों की फिल्में दिखाई गईं। गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो. रामकृष्ण मणि त्रिपाठी ने कहा कि पूंजीवादी और उपभोक्तावादी संस्कृति ने अन्याय को बढ़ावा दिया है। प्रतिरोध और जनांदोलन आज की जरूरत हैं, इसके लिए संवाद जरूरी हैं। हमारे समाज की जमीनी सचाइयों के मद्देनजर तमाम मुद्दों समेत महिला प्रश्न पर भी गंभीर संवाद होना चाहिए।
यह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का शताब्दी वर्ष मनाने की कोई रस्मअदायगी भर नहीं थी, बल्कि  यह एक तरह से महिलाओं के संघर्ष और सृजनात्मकता के प्रति एकजुटता का इजहार भी था। इस फिल्म फेस्टिवल में दर्शकों ने देखा कि विषय और सरोकार के लिहाज से हमारी महिला फिल्मकारों का काम कितना महत्वपूर्ण है। ‘व्हेन वीमन यूनाइट’ आंध्र प्रदेश में शराबबंदी के लिए हुए महिलाओं के एक सफल आंदोलन पर केंद्रित फिल्म थी जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया। मानवाधिकार और नागरिक आंदोलनों के लिए ख्यात जी. कन्नाविरन के जीवन और कर्म पर केंद्रित फिल्म ‘द एडवोकेट’ (दीपा धनराज) को भी सजग दर्शकों का साथ मिला। फिल्में खुद जब किसी अभियान का हिस्सा हों, तो वे दर्शकों के बीच बहस को जन्म देती हैं, उन्हें विचारोत्तेजित करती हैं, यह दिखा कश्मीर में अपने लापता परिजनों की तलाश में लगी औरतों के अभियान पर बनाई गई फिल्म ‘व्हेयर हैव यू माई न्यू क्रिंसेट मून?’ (इफत फातिमा) के प्रदर्शन के दौरान। स्त्री की पराधीनता की वजहों की पड़ताल और मुक्ति की तड़प और जद्दोजहद कई फिल्मों में नजर आई। ‘ससुराल’ (मीरा दीवान) ने जहां पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के दोयम दर्जे के यथार्थ को अत्यंत मार्मिक तरीके से दर्शाया, वहीं फॉर माया (वसुधा जोशी) में चार पीढि़यों की स्त्रियों के संघर्षों का जायजा लिया गया। समृद्धि और आधुनिकता के चकाचौंध वाली देश की राजधानी दिल्ली में भी औरतें किस कदर असुरक्षित हैं और इस महानगर का पूरा परिवेश किस कदर पुरुष वर्चस्व से भरा है, इस पर से पर्दा उठाया ‘मेरा अपना शहर’ (समीरा जैन) ने। मोरालिटी टीवी और लविंग जेहाद (पारोमिता वोहरा) ने मुनाफाखोरी और सनसनी में डूबे आज के पूंजीवादी मीडिया पर बहस छेड़ी, जो अपने स्वार्थ में अक्सर सामंती नैतिकता, पुलिसिया दमन, सांप्रदायिक-जातीय घृणा और स्त्री पराधीनता के पक्ष में खड़ा हो जाता है। अभिजात्य नैतिकता किस तरह स्त्रियों के श्रम और प्रतिभा का इस्तेमाल करने के बावजूद उन्हें सम्मान से वंचित रखती है, उन्हें उपेक्षित करती है, यह रसूलन बाइ्र्र समेत कई अन्य ठुमरी गायिकाओं की जिंदगी पर केंद्रित फिल्म ‘द अदर सांग’ (सबा दीवान) में दर्शकों ने देखा। ‘कमलाबाई’ (रीना मोहन) प्रथम मूक फिल्म और मराठी नाट्य मंच की मशहूर अभिनेत्री की जिंदगी पर आधारित थी। इसमें कमलाबाई की जीवनीशक्ति देखने लायक थी। ‘गॉडेसेज’ (लीना मणिमेकलै) और ‘सब्जी मंडी के हीरे’ (निलिता वाछानी) रीयल लाइफ के उन नायक-नायिकाओं की जिंदगी की असाधारणता को दर्ज करने वाली फिल्में थीं, जिनके लिए मुख्यधारा की फिल्मों में प्रायः जगह नहीं होती। ‘गॉडसेज’ तमिलनाडु के निम्नवर्गीय महिलाओं की जिंदगी पर केंद्रित थी और ‘सब्जी मंडी के हीरे’ बसों में बाम, पाउडर, पाचक, सूरमा और जादू की किताब बेचने वाले लोगों से संबंधित थी। गागर में सागर की कहावत को चरितार्थ करती भारत में संगीत रिकार्डिंग के सौ वर्ष (कमलिनी दत्त) हो या भक्ति आंदोलन के मौजूदा सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को उजागर करती ‘सबद निरंतर’ (राजुला शाह) या फोटो स्टूडियोज की स्मृतियों के जरिए जनजीवन को समझने की कोशिश करती ‘सिटी ऑफ फोटोज’ (निष्ठा जैन)-इन फिल्मों में अपनी विरासत, स्मृति और परंपरा के प्रति महिला फिल्मकार काफी सचेत दिखीं। उर्दू जबान की अहमियत के प्रति दर्शकों को सोचने को बाध्य करती सियासत, ‘पोस्ट बॉक्स नं. 418’ (शाजिया इल्मी) भी ऐसी ही फिल्म थी। विकास लोगों की परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए, इस धारणा के साथ उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में पसरती उपभोक्तावादी संस्कृति के खतरों से दो-चार कराती ‘दायें या बायें’ (बेला नेगी) को भी दर्शकों ने पसंद किया। इसी तर्ज पर ‘सुपरमैन ऑफ मालेगांव’ (फैजा अहमद खान) को देखें, तो मालेगांव में फिल्म निर्माण का शौकीन एक ग्रुप किस तरह अपनी जरूरतों के हिसाब से कम लागत में फिल्म बनाता है, इसे इस फिल्म ने बड़े दिलचस्प अंदाज में पेश किया।
इस समारोह ने इस ओर संकेत किया कि फिल्म सोसाइटियां अच्छे और जनपक्षधर सिनेमा के निर्माण को भी प्रोत्साहित करने का माध्यम भी बन सकती हैं। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जनता की जरूरतों की ही उपज है। अब गोरखपुर फिल्म सोसाइटी ने फिल्म निर्माण की ओर भी कदम बढ़ा दिया है। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की ओर से बनाई जा रही तीन फिल्मों के असंपादित अंश फेस्टिवल में दिखाए गए। पहली फिल्म ‘प्रोटेस्ट’ कसेया में मैत्रेयी प्रोजेक्ट के खिलाफ आंदोलनरत किसानों के आंदोलन पर है, दूसरी फिल्म ‘नाद’ साझी संस्कृति के प्रतीक मुस्लिम समुदाय के नाथपंथी साधुओं और योगियों पर है और तीसरी फिल्म गोरखपुर के इलाके में वर्षों से मौजूद जापानी बुखार की ज्वलंत समस्या से संबंधित है, जिससे 1978 से अब तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 20000 और गैरसरकारी आंकड़ों के अनुसार एक लाख बच्चों की मृत्यु हो चुकी है।

भोजपुरी सिनेमा के पचास साल पूरे होने पर आयोजित संगोष्ठी में भाग लेते लालबहादुर ओझा, सुधीर सुमन और पारोमिता वोहरा।

जनकवि विद्रोही पर केंद्रित नितिन के पमनानी की फिल्म- ‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ और समीरा जैन की फिल्म- ‘मेरा अपना शहर’ का प्रीमियर भी इस फेस्टिवल में हुआ। श्याम बेनेगल की अपने समय की चर्चित फिल्म ‘भूमिका’ भी दिखाई गई। फेस्टिवल के दौरान भोजपुरी सिनेमा के पचास साल और नया मीडिया, नए मुहावरे, नई मंजिलें विषय पर विचारोत्तेजक बातचीत भी हुई। जिसमें पत्रकार लालबहादुर ओझा, चंद्रभूषण अंकुर, पारोमिता वोहरा, सुधीर सुमन तथा कुमार हर्ष, आशुतोष कुमार, राममणि त्रिपाठी, कपिल देव ने हिस्सा लिया। भोजपुरी सिनेमा पर  बातचीत करते हुए वक्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आज की भोजपुरी फिल्मों का  भोजपुरी इलाके के लोगों के दुख-दर्द और आकांक्षा से कोई वास्ता नहीं है। वे दर्शकों की संवेदना का विस्तार नहीं कर रहीं, बल्कि उसे महज उपभोक्ता बना रही हैं। इसके खिलाफ भोजपुरी में मौलिक और वैचारिक सिनेमा निर्माण करना होगा, फिल्म सोसाइटी मूवमेंट की इसमें सार्थक भूमिका हो सकती है। इंटरनेट, ब्लॉग, फेसबुक आदि सूचनाओं के आदान-प्रदान के नए तरीकों पर बातचीत करते हुए वक्ताओं ने कहा कि यह देखना होगा कि यह हमारे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों, प्रतिरोध और हमारी सामूहिकता के लिए कितना मददगार है। प्रो. रामकृष्ण मणि ने कहा कि तकनीक और मीडिया पर जनता का कंट्रोल कैसे हो, हमारी मुख्य चिंता यह होनी चाहिए। डेमोक्रेसी की आड़ में जो झूठ, विभ्रम और गलत तथ्य साम्राज्यवादी मीडिया उसके नक्शेकदम चलने वाली देश की ऑफिसियल मीडिया के जरिए फैलाया जा रहा है, उसके जवाब में जनता का वैकल्पिक मीडिया बनाना होगा।

 

बेदखली : शम्‍भू राणा

चर्चित कथाकार शम्‍भू राणा की कहानी-

बडे़ से लॉन में उगायी गयी अमेरिकन घास के बीच-बीच में उग आयी चलमोड़िया घास की जड़ें खोदने में खड़क सिंह इस कदर मशगूल था कि उसे बहुत देर तक झुलसाती हुई धूप का अहसास ही नहीं हुआ। सूरज की किरणें जब खिड़की के शीशे में टकराकर उसकी आँखों में चुभने लगीं तब कहीं उसका ध्यान टूटा। उसने कुदाल जमीन पर रख कर आसमान की ओर देखा। सूरज अखरोट के पेड़ की ओट से निकलकर ऊपर उठ आया था। समय का अहसास हुआ तो भूख-प्यास भी महसूस हुई। वह घुटनों पर हाथ रखकर उठ खड़ा हुआ और पसीना पोंछता मोरपंखी की छाया में जा बैठा।

रोटी का कौर चबाते हुए खड़कसिंह ने खिड़की के शीशे की तरफ देखा पर ठीक से देख नहीं पाया। चमक से आँखें चुंधिया गयीं। पल भर को आँखों में न जाने कितने किस्म के रंग और बेलबूटे भर गये। उसने कस कर आँखें भींच लीं और रोटी-चटनी चबाता रहा़…

अपने हाथ की रोटियाँ निगलते हुए खड़कसिंह को अक्सर एक किस्म की चिढ़, गुस्सा और असन्तोष-सा महसूस होता है। रोटियाँ या तो जल जातीं या अधपकी रह जातीं। कोई बीच में मोटी तो कोई किनारों में। जैसी रोटियाँ वह चाहता या उसकी कल्पना में थीं वैसी तवे पर नहीं उतर पातीं। वह झुंझला कर रह जाता।

ऐसे में अक्सर उसे तुलसी की याद आती है। वैसी गोलगप्पे-सी फूली-पकी और संतुलित रोटियाँ मुँह में रखते ही गल-सी जातीं। कटोरे में सब्जी डालने तक वह एकाध यूँ ही खा जाता। बकौल तुलसी भूख के साथ। खड़कसिंह जवाब देता नहीं, स्वाद के साथ… तुलसी कहती आ़… हा़…हा स्वाद… हो गया हो, तुम भी बस़…! कभी-कभी वह तुलसी से कोई प्यारी-सी शर्त लगा देता कि यह रोटी नहीं फूलेगी, तेरा बाप भी इसे नहीं फुला सकता। अगर नहीं फूली तो याद रखना शर्त क्या है़…. और रोटी गप्प से फूल जाती। वह झुंझला कर गालियां देने लगता और तुलसी हँस पड़ती। कभी-कभी रोटी नहीं फूलती, तुलसी हार जाती…।

आज जब कभी खड़कसिंह ऐसे पलों को याद करता है तो एक टीस-सी कलेजे में उठती है और समझ में आता है कि उसका मान रखने को ही तुलसी कभी-कभार हारती थी। चूल्हे से उठती लपटों और दिये के उजाले में दमकता चेहरा, लजाती आँखें, होठों से रिसती मुस्कान…। वह सब किसी हारे हुए के चेहरे में नहीं हो सकता।

कितने बरस बीत गये तुलसी को गये, खड़कसिंह दिमाग पर जोर डालता है… पाँच साल। एकाएक यकीन-सा नहीं होता उसे। समय कितनी तेजी से गुजरता है…। लौट कर न समय आता है न गुजरा आदमी। बस, एक चीज इंसान के साथ अखिर तक साये की तरह चलती है- लिए हुए फैसलों से उत्पन्न नियति। फैसले में जरा-सी चूक हुई नहीं कि यादों के भूत आखिरी साँस तक मुँह चिढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। तब भीतर कहीं जो नश्तर-सा चुभता है, वह जाने कहाँ चुभता है कि तड़प शब्दातीत हो जाती है। एक कांटा-सा भीतर कहीं और गहरा धँसता जाता है।

इसी जमीन पर जहाँ आज अमेरिकन घास और बिलायती फूल उगे हैं, तब गेहूँ, मक्का, सरसों, मडुवा, मादिरा उगता था। सिर्फ उगता ही था, लहलहाता नहीं था। जैसे खुशहाल गाँव और खेती सरकारी विज्ञापनों में नजर आती है, वही सब होता तो यह सब नहीं होता… कुल जमा बीसेक मवासों का गाँव यूँ उजड़ न गया होता। लोग एक-एक कर कब गाँव छोड़ गये, अंदाजा नहीं आया। गाँव के जो लोग फौज या दूसरी नौकरियों में थे, वे तो नहीं आये कम से कम लौट कर। नीचे मैदानों में न जाने कहाँ-कहाँ जा बसे। जो लोग नौकरी-रोजगार के सिलसिले में शहरों में रहे आये थे, उन्हें गाँव में रहना कुछ वैसा ही लगता, जैसे जूता पहनने के आदी को नंगे पाँव चलने में महसूस होता है। वे लोग शहरी जीवन, आराम, सुविधाओं और कई बुराइयों के ऐसे आदी हो कर वापस लौटते कि जो गाँव में मुमकिन नहीं थीं और कई चीजों का तो गाँव में लोगों ने नाम भी नहीं सुना था। गाँव में न रहने के पीछे उनके तर्क थे। यहाँ गाँव में क्या रखा है। बाल कटवाने तक को आठ किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। बच्चों को कहाँ पढ़ायें ? हर एक किलोमीटर पर स्कूल तो खोल दिया पर उनका स्तर क्या है़… ऐसे स्कूलों में बच्चा न तो ढंग से पढ़ पाता है न उसकी मासूमियत बरकरार रहती है़… अब देखो, तीन महीने से ट्रांसफार्मर फुंका पड़ा है,  है कोई सुनने वाला ? पता नहीं, कहाँ आ बसे हमारे बुजुर्ग़… ठीक ही कहता था रमिया हवलदार शायद। पर यह सब उसी जैसे लोग कह सकते हैं। जिनके पास शहर में बसने लायक पैसा था, फिलहाल अच्छी तनख्वाह और बाद में पेंशन थी। बाकी लोग किस सहारे ऐसा कहते।

कैसी अजीब बात सुनने में आई कि दिल्ली, बम्बई, लखनऊ, नोएडा न जाने कहाँ-कहाँ से आ-आकर साहब लोग यहाँ की लगभग बंजर जमीन को खरीदना चाहते हैं! लगा, कहीं साहब मजाक तो नहीं कर रहे। क्या करेंगे आखिर इस जमीन का ? इसमें होता क्या है, है किस काम की? अपने ठाठ में राजाओं तक को शार्मिन्दा कर देने वालों को क्या जरूरत है इस जमीन की, क्या करेंगे इस उजाड़ में… क्योंकि नीचे काफी भीड़-भाड़ है शोर-गुल है, अशान्ति है, भागमभाग है़… और भी न जाने क्या-क्या है वहाँ जो साहबों को रास नहीं आता। इसलिये सोचते हैं कि यहां एक कुटिया-सी बनवा लें। जब कभी फुर्सत मिले, आकर ताजी हवा में साँस लें, दो पल शान्ति से गुजारें और सामने हिमालय देखें। पैसा काफी कमाया, पूरी दुनिया की खाक छानी़… पैसा कोई चीज नहीं ठाकुर साहब हाथ का मैल है। शांति और प्रेमभाव असल चीज है। देवभूमि में…

रमिया हवलदार पहला आदमी था जिसने अपनी जमीन किन्हीं रिटायर्ड कर्नल खन्ना को बेची। जमीन के एवज में मिली रकम से उसने हल्द्वानी में बड़ा-सा मकान बनवा लिया। बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं। मकान से ढेर सारा किराया आता है। ठाठ ही ठाठ है़… खबरें आती रहतीं… इधर खन्ना साहब ने रमिया की जमीन पर छोटा-सा बंगला बनवा लिया साल भर के अन्दर- जैसा अक्सर कलैंडरों में छपा होता है। कर्नल साहब कभी-कभार यहाँ आकर रहते। कभी अकेले तो कभी सपरिवार। बेगानों की तरह, गाँव वालों से कटे-कटे से। गाँव का ही एक लड़का बंगले में खानसामे, चौकीदार और माली की नौकरी पा गया। कर्नल के पीछे बंगला उसी के जिम्मे रहता।

धीरे-धीरे गाँव में जमीन बिकने लगी। रमिया हवलदार के बाद जिन लोंगों ने अपनी जमीनें बेंची, उनमें अधिकांश परिवार ऐसे थे कि जिनका कोई सदस्य बाहर नौकरी करते हुए शहर की सुविधाओं का आदी हो चुका था। उसका परिवार भी दो-चार बार उसके पास जाकर उन सुविधाओं को देख और एक हद तक भोग चुका था। वे सुविधाएँ और चमक-दमक उन्हें कितनी मुहैया थी, वो बात और है। कुछ चीजों के दर्शन ही काफी होते हैं। ऐसे ही लोगों की देखा-देखी बाकियों के दिमाग में भी एक कीड़ा-सा कुलबुलाने लगा। जमीन की एवज में जो रकम मिल रही थी, उसके गाव, तकिये से सर टिकाकर एक दरिद्र आदमी चाहे जो सपना देख ले। लोग सोचते, अखिर यह जमीन हमें दे क्या रही है? साल भर मेहनत करके पेट भरना मुश्किल होता है। बाकी लोग ऐश कर रहे हैं, हम ही क्यों रेत से तेल निकालने की उम्मीद में मर-मर कर जियें। इतने रुपयों से क्या नहीं हो सकता। दुनिया का कौन-सा सुख और आराम है जो नहीं जुटाया जा सकता?

जिन लोगों ने जमीन बेची थी उनकी एकाएक कायापलट हो गयी थी। हर ऐशोआराम की चीज उनके पास थी। लड़कियों की शादियाँ बड़ी धूम-धाम से अच्छे घरों में हुईं। लड़के नये-नये फैशन के कपड़े पहनते और रात में भी काला चश्मा लगाये घूमते। खा-पीकर पडे़ रहना या समय बीताने को जुआ खेलना और शाम को लड़खड़ाते हुए घर लौटना परिवार के पुरुषों का नियम था। महिलाओं के शगल अलग थे। जिनकी जमीनें नहीं बिक पायी थीं या जिनकी आत्मारूपी कटखनी कुतिया फिलहाल जमीन बेच देने के खयाल को दिलोदिमाग की चौखट नहीं लांघने दे रही थी, ऐसे लोगों को पड़ोसियों के ठाठ-बाठ देखकर एक अजीब-सी कुढ़न होती। रातों को देर तक पुरखों की थात बेच खाने के लिये उनकी बुराइयाँ होतीं। मगर अटक-बिटक मजबूरन हाथ उन्हीं के आगे पसारना पड़ता। पड़ोस से गोश्त पकने की महक आ रही होती और इधर आलू का थेचुआ उबल रहा होता या लहसुन का नमक पिस रहा होता। ऐसे में अक्सर खड़कसिंह जैसों को हीनता बोध आ घेरता और मन उदास हो जाता। जी चाहता कि हमारी बेवकूफी के लिये कोई जूता लेकर हम पर पिल पड़ता तो मन कुछ हल्का हो जाता और एक किस्म का सन्तोष होता।

शुरू-शुरू में जब कभी खड़कसिंह जमीन बेचने की बात करता तो तुलसी बुरी तरह लड़ने लगती। मगर धीरे-धीरे उसकी आवाज में वह बात नहीं रह गयी थी। पैसे ने उसे भी ललचाना शुरू कर दिया था। उसके पास इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं था कि इतने रुपयों से हम क्या नहीं कर सकते। उसके विरोध का स्वर अब कुछ-कुछ ऐसा हो चला था जैसे किसी ने मुंह में कपड़ा ठूँस दिया हो- ‘जो भी करोगे ठीक से सोच-समझ कर करना, जग हँसाई ठीक नहीं।’ जमीन बेचने का फैसला खुद खड़कसिंह के लिये भी इतना आसान नहीं था। एक अनजाना-सा डर अंत तक मन के किसी कोने में बना ही रहा। डेढ़-दो साल की कशमकश और उधेड़बुन के बाद आखिर एक दिन उसने फैसला कर ही लिया। सड़क से लगभग सटी हुई अपनी ज्यादातर जमीन उसने नोएडा के किन्हीं शर्मा जी के हाथों बेच दी। शर्मा जी की कई शहरों में न जाने काहे की मिलें थीं।

खड़कसिंह रातों-रात अमीर हो गया था। उसे एकाएक यूँ महसूस हुआ जैसे वह पूरी दुनिया को ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर देख रहा हो। खुद को वह मोटे गद्दों पर चलता हुआ-सा महसूस करता। जिन बातों पर वह कल तक लोंगों से झगड़ पड़ता था, उन्हीं बातों पर अब वह यूँ हँस पड़ता जैसे- बडे़ बच्चों की बातों पर हँसते हैं। उस पर हर वक्त कुछ वैसी ही मस्ती और भारहीनता-सी छाई रहती जैसी वह कुछ घण्टों के लिये होली के दिन महसूस करता था। हर चीज नई-नई और खुशगवार, जी चाहता कि पत्थर को भी प्यार से सहला दे…।

शुरू-शुरू में ठाट-बाट में पड़ोसियों को पीछे छोड़ने की कोशिशें की गयीं। हफ्ते के सातों दिन गोश्त पका। दिखा-दिखाकर सोना खरीदा और पहना गया। तमाम देनदारियाँ चुकाई गयीं। बतौर शुक्राना सौ-पचास रुपया या कोई उपहार अलग़…। खड़कसिंह उन दिनों एकाएक मैं से हम हो गया। सपरिवार अक्सर शहर जाना होता और ढेर सारी बेमतलब की खरीददारी की जाती। जो खड़कसिंह पहले बआसानी जीपों की छतों में बैठ कर या लटक कर सफर कर लेता था, अब गाड़ियों में थोड़ी-सी भीड़ देखकर नाक-भौं चढ़ाकर अक्सर टैक्सी किराये पर ले लेता।

परिवार की आदतें बिगड़ने लगीं। जमीन बिक चुकी थी। काम-धाम कुछ था नहीं। हाथों को ही नहीं दिमाग को भी कड़ी मेहनत की पुरानी आदत थी। खाली रहने का खयाल भी दुखदायी होता। करें क्या, बस खुराफातें सूझतीं…। तुलसी को रिश्तेदारों के निमंत्रण मिलने लगे। धीरे-धीरे उसे भी घूमने का चस्का लग गया। वह अक्सर दौरे पर ही रहती। उसकी गैरमौजूदगी में घर न जाने कब शराब और जुए का अखाड़ा बन गया। खड़कसिंह जो पहले ताश का एकाध आधा-अधूरा खेल ही जानता था, अब एक मझा हुआ खिलाड़ी बन चुका था।

इसी धक्कम-पेल और नई-नई अमीरी के हो-हल्ले में एक यह अच्छा काम हुआ कि लड़की की शादी काफी धूम-धाम से ठीक-ठाक घर में हो गयी। लड़का आठवीं के बाद घर बैठ गया। तथाकथित इण्टर कॉलेज काफी दूर था और लड़के को पढ़ाई के प्रति कुछ खास दिलचस्पी भी नहीं थी। यूँ तो खड़क सिंह ने उसे पढ़ाई छोड़ देने पर डांटा, पर मन ही मन सोचा कि पढ़ कर ही कौन-सा राजा हो जायेगा। एक से एक पढे़-लिखे घूम रहे हैं। एक ही तो लड़का है सब इसी का है। पड़ा भी रहेगा तो जिन्दगी भर ठाट से खा लेगा। साढ़े तीन लाख रुपया क्या कम होता है। खड़क सिंह का सोचना ठीक ही था। उसने कभी साढे़ तीन हजार भी शायद एकमुश्त न देखे हों उससे पहले। उसे पैसे की टेढ़ी चाल कौन समझाता कि तू तो अनाप-शनाप फूँक रहा है पैसा तो रखे-रखे भी बिला जाता है। कौन कहे खड़क सिंह जैसों से कि बैंक बैलेंस एक पीकदान की तरह है जिसमें नियमित रूप से अगर न थूका जाये तो उसे सूखते देर नहीं लगती।

करीब तीन-चार साल का जीवन मैदानी नदी की तरह शान्त चलता रहा। घटनाविहीन दुखों और तनावों से दूर। सभी तरह के सुखों और आराम से भरपूर। ख्वाब और नशे की-सी स्थिति। एक तरह से हवा में उड़ने का-सा अहसास… खड़कसिंह को पाँव तले वही खुरदरी जमीन होने का अहसास तब कहीं जाकर हुआ जब तुलसी ने अचानक मुरझा कर बिस्तर पकड़ लिया। पेट में मरोडे़ं उठते और मारे दर्द के वह सर पटकने लगती। करीब महीने भर तक तरह-तरह के टोने-टोटके गंडे-ताबीज और जागर चलता रहा। कोई फायदा नहीं। मर्ज बढ़ता गया। फिर बारी आई अस्पतालों और डॉक्टरों की। खड़कसिंह तुलसी को लिये-लिये न जाने कहाँ-कहाँ फिरता रहा। तकलीफ किसी की समझ में नहीं आयी। इलाज चलता रहा। दो-एक महीने में तुलसी और उसके जेवर दोनों ही निपट गये।

दुनिया में चारों ओर उदासी और उचाटपन था। सब तरफ दुख, अभाव और पीड़ा। अजब बेगानापऩ… सूरज पता नहीं कहाँ था। असमान में काले घने बादल। धरती पर नीम अंधेरा। हर चीज उल्टी और बेतुकी। कोई हँसता तो अपनी ही हालत पर हँसता जान पड़ता। फूलों को पाला मार गया था। तितलियों के पंख टूटे थे। हरी दूब पर न जाने किसने नमक बुरक दिया था। कानों में अनगिनत गैर फहम आवाजें मगर आँखों के आगे स्याही-सा गाढ़ा अंधेरा… हवा में अजीब-सा कसैलापन और चितायें जलने की बू। खड़क सिंह की हालत कंटीली झाड़ियों में अटके तीर बिंधे अधमरे परिन्दे सी थी़… या तो आदमी अपनी जान ले ले या दीवाना हो जाये। इसके सिवाय दुनिया में कहीं पनाह नही़ं…।

खड़कसिंह कहाँ जाये। किससे कहे। किसके गले लगे कर रोये। किस दीवार से अपना सर पटक दे। किसका कत्ल कर दे। पानी में डूबते-उतरते की-सी दशा़… कोई आकर या तो बीच कपाल में गोली मार दे या उबार ले। खड़क सिंह आखिर करे क्या ? थक-हार कर एक दिन उसने शर्मा जी के निर्माणाधीन बंगले में मजदूरी माँग ली। उन्हीं शर्मा जी का बंगला बन रहा था जिन्हें उसने जमीन बेची थी। खेतों को तोड़कर बडे़ से मैदान में बदला जा रहा था। मैदान के बीचों-बीच बंगले की बुनियाद खोदी जा रही थी। चारों ओर पत्थर, रेता और कंक्रीट बिखरा पड़ा था। अपने हाथों जोती, बोयी और सींची हुई जमीन पर पड़ता हर, गैती-फावड़ा उसे अपने ही सीने पर घाव करता-सा जान पड़ता । भीतर कहीं एक हूक-सी उठती। कलेजे को जैसे मसल रहा हो कोई। दिन मानो अपनी ही कब्र खोदने में बीत जाता पर रात काटना अपनी गर्दन काटना हो जाता। अंधेरा होते ही कानों में अजीब-सी खिल्ली उड़ाने वाली हँसी गूँजने लगती और आँखों के आगे न जाने कैसे साये तांडव करने लगते।

खड़कसिंह को यह सब किसी बेतुके ख्वाब-सा लगता है। कभी-कभी लगता है कि नहीं, यह सब हुआ नहीं, बल्कि मैं ऐसा सोच रहा था, बुरा सपना था… वह खुद को हकीकत और ख्वाब के दलदल में धँसता-उबरता महसूस करता- हाथ-पाँव मारता किसी ठोस चीज को थामने के लिए। उसे याद नहीं कि वह कैसे इस दलदल में आ गिरा। खुद गिरा या धकेला गया। सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं आता। सब आपस में गडमड हो जाता है। खड़क सिंह दिमाग पर जोर डालकर भी ठीक से याद नहीं कर पाता कि कब उसका बेटा शर्मा जी के नोएडा वाले बंगले में दरबान बन कर चला गया। कब यह बंगला बना, कब वह वहाँ चौकीदार और माली की हैसियत से नौकरी करने लगा। कब… अपनी बेटी को न देखे उसे कितने बरस हो गये ? कब आई थी चम्पा आखिरी बार माँ के मरने के बाद… क्या कहा था उसने यही लॉन में रोते हुये… हाँ… ना… हाँ… कि बाबू यह कोठी मेरा मायका जो हुआ, तुम यहाँ नौकर ठहरे… मायका तो खण्डहर हो गया… मेरे भाग में कभी-कभार मायके आने का सुख भी नहीं…। तुम्हारी सूरत कैसी डरावनी हो गयी है। मुझे पहचान भी रहे हो कि नहीं बाबू।

चम्पा… चम्पा… हरीश… क्या सचमुच मेरे दो बच्चे हैं… सुना कि चम्पा के भी बच्चे हैं… कुसूरवार हूँ  रे तुम सबका… किससे जाकर अपनी करनी की सजा मांगूँ… किस अंधेरे में जाकर मुँह छिपाऊँ… तुलसी ने बर्तनों को राख से मल कर आंगन की दीवार में औंधे रख दिया है। कांसे की पतीली धूप में कैसी सोने-सी चमक रही है। देखो तो आँखें चुंधिया जाती हैं।

खड़क सिंह की आँखें खुलीं तो सूरज की किरणें खिड़की के शीशे में टकराकर उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। मोरपंखी की छाया में न जाने कब उसे नींद आ गयी। सूरज हल्का-सा पश्‍चि‍म की तरफ उतर चुका था। खड़कसिंह आँखें मलता हड़बड़ा कर उठ बैठा। फिर काफी देर हथेलियों में सर थामे बैठा रहा- सर में चोट खाया-सा। कुछ देर बाद उसने मुँह धोकर पानी पिया और घुटनों पर हाथ रखकर उठ खड़ा हुआ। चलमोड़िया घास की जडे खोदने और बिलायती फूलों को सींचने के लिये।

 

 

प्रतिरोध का सिनेमा का पहला इंदौर फिल्म फेस्टिवल 16 से

नई दिल्‍ली : प्रतिरोध का सिनेमा अभियान का सत्रहवां और इंदौर का पहला फिल्म फेस्टिवल 16  और 17 अप्रेल को इंदौर के राजेन्द्र माथुर सभागृह , इंदौर प्रेस क्लब परिसर में आयोजित होगा। यह आयोजन इंदौर की सांस्कृतिक संस्था सूत्रधार, जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह द ग्रुप और इंदौर प्रेस क्लब द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन पूरी तरह से निशुल्क है और इसमें प्रवेश के लिए किसी भी तरह के  औपचारिक  निमंत्रण की जरुरत नही है। 16 अप्रेल को शाम 6 बजे फिल्म फेस्टिवल का शुभारम्भ होगा। कश्मीर में आजादी का क्या मतलब है इस मुद्दे की पड़ताल करती संजय काक की फिल्म  ‘जश्ने आज़ादी’  का प्रदर्शन होगा।

17 अप्रेल को सुबह 10 बजे से बच्चों के लिए विशेष सत्र होगा। इसमें एक लघु फिल्म  ‘रेड बैलून’, पांच मिनट की लघु फिल्में और एक फीचर फिल्म छुटकन की महाभारत’ का प्रदर्शन होगा।
दुपहर के सत्र में भारतीय और विदेशी वृत्तचित्र और लघु फिल्में दिखाई जाएँगी। इनमे से कुछ महत्वपूर्ण फिल्में हैं – गाड़ी लोहरदगा मेल (निर्देशक: बीजू टोप्पो ), चेअरी और नेबर्स ( निर्देशक: नार्मन मेक्लेरन), शिट (निर्देशक: अमुधन आर पी), प्रिंटेड रेनबो ( निर्देशक: गीतांजलि राव), नियामराजा का विलाप (निर्देशक: सूर्य शंकर दाश), अमेरिका-अमेरिका और गाँव छोरब नाही ( निर्देशक: के पी ससी), रिबंस फार पीस (निर्देशक: आनंद पटवर्धन), मैंने तुझसे ये कहा (निर्देशक: लाल बैंड, पाकिस्तान) और महुआ मेमोयर्स (निर्देशक: विनोद राजा)। शाम के सत्र में आनंद पटवर्धन का  चर्चित वृत्तचित्र राम के नाम’ और बेला नेगी की हिंदी फीचर फिल्म दायें या बाएं’ दिखाई जायेगी। निर्देशिका बेला नेगी फेस्टिवल में शामिल होंगी।

फिल्म फेस्टिवल के विभिन्न सत्रों में श्रीराम ताम्रकार, ब्रजभूषण चतुर्वेदी, सत्यनारायण व्यास, बेला नेगी और संजय जोशी दर्शकों के साथ संवाद कायम करेंगे। आयोजन परिसर में द ग्रुप, जन संस्कृति मंच द्वारा ‘जन चेतना के चितेरे’ शीर्षक से चित्तप्रसाद, जैनुल आबेदीन और सोमनाथ होड़ के चित्रों की प्रदर्शनी भी लगाई जायेगी। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के स्टाल से दर्शक वृत्तचित्रों की डी वी डी और किताबें भी खरीद सकेंगे।   
(विस्‍तृत जानकारी के लिए सत्यनारायण व्यास, संयोजक, सूत्रधार  से मोबाइल नंबर 09827503834 पर  और संजय जोशी, संयोजक, द ग्रुप, जन संस्कृति मंच से मोबाइल नंबर 09811577426  पर सम्‍पर्क कर सकते हैं।)

विकास कुमार झा को इंदु शर्मा कथा सम्‍मान

नई दिल्‍ली : हिंदी के उपन्यासकार विकास कुमार झा को इस साल के अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान के लिए चुना गया है। यह पुरस्कार उन्हें एंग्लो-भारतीय गांव के कथानक पर आधारित उपन्यास ‘मैकलुस्कीगंज’ के लिए दिया जा रहा है। कथा (यूके) के महासचिव तेजेंद्र शर्मा ने बताया कि 27 जून को लंदन के हाउस ऑफ कॉमंस में आयोजित एक समारोह में झा को यह पुरस्कार दिया जाएगा। समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर 47 वर्षीय झा हिंदी पत्रिका राष्ट्रीय प्रसंग के संपादक हैं।

इस उपन्यास के अलावा झा की रचनाओं में बिहार : राजनीति का अपराधीकरण (विश्‍लेषण), भोग (उपन्यास), इस बारिश में (कविता संग्र्रह), परिचय पत्र (बांग्ला निबंध) और सत्ता के सूत्रधार (भारत की स्वतंत्रता के बाद की राजनीतिक इतिहास) भी शामिल हैं।
अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान कवयित्री और लेखिका इंदु शर्मा की स्मृति में दिया जाता है। 1995 में कैंसर के कारण उनकी मौत हो गई थी। अब तक यह प्रतिष्ठित सम्मान चित्रा मुद्गल, संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, विभूति नारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असग़र वजाहत, महुआ माजी, नासिरा शर्मा, भगवान दास मोरवाल एवं हृषिकेश सुलभ को प्रदान किया जा चुका है।