एब्सर्ड नाटकों के जनक हैं भुवनेश्‍वर : नंद किशोर आचार्य
नंदकिशोर आचार्य

दिल्ली : भुवनेश्‍वर द्वारा लिखित नाटक ‘तांबे का कीड़ा’ (1946)  भारतीय ही नहीं, अंग्रेज़ी तथा अन्य विदेशी भाषाओं में भी लिखा गया पहला ‘एब्सर्ड’ (असंगत)  नाटक है। पश्‍चि‍म में भी इसकी शुरुआत द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद होती है। अतः भुवनेश्‍वर को ‘एब्सर्ड’  नाटकों का जनक कहा जाना चाहिये। यह विचार प्रसिद्ध कवि, आलोचक और नाट्यचिंतक [...]

आलोचना का लोकधर्मी प्रतिमान
jeevan singh.AAKANTH

‘आकंठ’ के आलोचक जीवन सिंह पर केन्‍द्रि‍त अंक पर युवा कवि‍ रामजी तिवारी की टि‍प्‍पणी- पिपरिया, मध्य प्रदेश से हरिशंकर अग्रवाल के सम्‍पादन में निकलने वाली पत्रिका ‘आकंठ’ का, हमारे समय के महत्वपूर्ण आलोचक ‘जीवन सिंह’ पर केंद्रित अंक पिछले दिनों आया है। साहित्य के तथाकथित केन्द्रों से दूर रहते हुए जीवन सिंह ने जिस [...]

हवामहल से काशी : विष्णुचंद्र शर्मा
विष्णुचंद्र शर्मा

वरिष्ठ कवि-लेखक विष्णुचंद्र शर्मा पि‍छले दि‍नों बनारस प्रवास में थे। इस दौरान लि‍खी उनकी कवि‍तायें- 1. नदी ने मौन रखा है ज्ञान का प्रवाह फिर भी बंद है पुल पर दौड़ते हैं ट्रक सिर्फ मैं, नदी से बोलता हूँ। सूर्य, पेड़ों, अनबने घर, खेत, टूटी सड़क से संलाप करता है : ‘साँझ मेरी तरह उड़ना [...]

अपसंस्कृति के मुकाबले स्वस्थ सांस्कृतिक वातावरण बनाना जरूरी : यादव
jan sanskratik morcha

सारण में आयोजि‍त बि‍हार राज्‍य जनवादी सांस्‍कृति‍क मोर्चा के सम्‍मेलन की रि‍पोर्ट- सारण : ‘विकल्प’ अखिल भारतीय जनवादी सांस्कृतिक सामाजिक मोर्चा से सम्बद्ध बिहार राज्य जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा का 9वाँ सम्मेलन छपरा के सारण-जनपद के गाँव कोहड़ा-बाजार में भारी उत्साह एवं साहित्य-कला-संस्कृति के क्षेत्र में नई संकल्पबद्धता के साथ 24 से 26 मार्च, 2012 को [...]

भारतीय जमीन में खड़े रहकर पश्‍चि‍मी आधुनिकता से टकराती एक कालजयी रचना : महेश चंद्र पुनेठा
त्रि‍लोचन (20 अगस्त, 1917 - 9 दि‍सम्ब‍र, 2007)

प्रगति‍शील कवि‍ त्रि‍लोचन की प्रसि‍द्ध कवि‍ता ‘चम्पा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’ के माध्‍यम से उनकी काव्‍यात्‍मक दृष्‍टि‍ का वि‍श्‍लेषण करता प्रसि‍द्ध कवि‍ महेश चंद्र पुनेठा का आलेख- त्रिलोचन की कविता को लेकर मलयज ने अपनी डायरी में लिखा है, ‘‘मुझे यह साफ दि‍ख पड़ता है कि आज त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की भारतीयता को [...]

अनवर सुहैल की कवि‍तायें
cricket

वरि‍ष्‍ठ कवि‍ और ‘संकेत’ के सम्‍पादक अनवर सुहैल की कवि‍तायें- वनडे क्रिकेट और बच्चे पदयात्रियों, मोटर-गाड़ियों से बेपरवाह बीच सड़क पर क्रिकेट खेलते बच्चे डरा नहीं करते पिता-चाचा या दादा की घुड़कियों से भुनभुनाएं बुजुर्ग चिड़चिड़ाएं अध्यापक तो क्या करें बच्चे पाकिस्तान के विरुद्ध खेली गई पारियों को देखते हैं वे ही लोग सारा काम [...]

भाषा हमारे अस्तित्व का मूल : नोम चोम्‍स्‍की
नोम चोम्‍स्‍की

वि‍श्‍व वि‍ख्‍यात भाषावैज्ञानि‍क, दार्शनि‍क, वामपंथी लेखक नोम चोम्‍स्‍की ने भाषाविज्ञान संबंधी कई क्रान्‍ति‍कारी सिद्धांतों का सूत्रपात किया। भाषा और भाषा के वि‍कास को लेकर उनका यह साक्षात्‍कार वि‍ज्ञान पत्रि‍का ‘डि‍स्‍कवर’ में 29 नवम्‍बर, 2011 को प्रकाशि‍त हुआ था। उनसे यह बातचीत ‘डिस्कवर’ के संवाददाता वेलरी रॉस ने की थी। इसका अनुवाद वरि‍ष्‍ठ लेखक-पत्रकार आशुतोष उपाध्‍याय [...]

विवेक भटनागर की तीन गजलें

एक यह नहीं देखा कि कंधों पर खड़ा है लोग यह समझे कि वो सबसे बड़ा है पुण्य के आकाश की सीमा नहीं है पाप जल्दी भरने वाला इक घड़ा है भूख क्यों हर रोज लगती है, न जाने इस गरीबी का ये मुश्किल आँकड़ा है देवता को हम भला क्यों पूजते हैं पूजिए, मजदूर [...]

Posted on 5th May 2012 author: admin Under: गजल | Tags: · , , , | 10 Comments »
मार्कण्‍डेय वर्तमान को बदलने वाले कहानीकार : रवि‍भूषण
markandey

  इलाहाबाद/नई दि‍ल्‍ली : प्रसिद्ध कहानीकार मार्कण्‍डेय की जन्‍मतिथि पर 2 मई को इलाहाबाद में म्‍यूजि‍म हॉल में दोपहर 2.30 बजे से आयोजित कार्यक्रम में लोकभारती से प्रकाशित मार्कण्‍डेय की कहानियों का संग्रह ‘हलयोग’ तथा ‘कल्‍पना’ पत्रिका में ‘चक्रधर’ के नाम से ‘साहित्‍यधारा’ स्‍तम्‍भ में लिखी टिप्‍पणियों के संकलन ‘चक्रधर की साहित्‍यधारा’ का विमोचन प्रख्‍यात कहानीकार [...]

अभियान : गोपाल प्रधान
गोपाल प्रधान

अस्सी के दशक में बनारस में नाट्य संस्‍था ‘अभि‍यान’ ने सांस्‍कृति‍ हलचल पैदा की थी। इसके सदस्‍य रहे युवा लेखक गोपाल प्रधान का संस्‍मरण- हिन्‍दी कवि एक लम्‍बे अरसे से कविता के जरिये जनता से जुड़ने की कोशिश करते रहे और कविता में बड़ी-बड़ी क्रान्‍ति‍याँ करते रहे जो उन्हें लगातार जनता से दूर खींचती रहीं [...]