Archive for: March 2011

रमेश तैलंग के बाल गीत

रमेश तैलंग के शीघ्र प्रकाश्य बाल-गीत संग्रह ‘काठ का घोड़ा टिम्मक टूँसे कुछ नये मनोरंजक बाल-गीत-

माँ जो रूठे

चाँदनी का शहर, तारों की हर गली
माँ की गोदी में हम घूम आए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

पंछियों की तरह पंख अपने न थे,
ऊँचे उड़ने के भी कोई सपने न थे,
माँ का आँचल मिला हमको जबसे मगर
हर जलन, हर तपन भूल आए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

दूसरों के लिए सारा संसार था,
पर हमारे लिए माँ का ही प्यार था
सारे नाते हमारे थे माँ से जुड़े
माँ जो रूठे तो जग रूठ जाए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

अम्माँ की रसोई में

हल्दी दहके
धनिया महके
अम्माँ की रसोई में।

आन बिराजे हैं पंचायत में
राई और जीरा,
पता चले न यहाँ किसी को
राजा कौन फकीरा
सिंहासन हैं ऊँचे सबके
अम्माँ की रसोई में।

आटा-बेसन, चकला-बेलन
घूम रहे हैं बतियाते,
राग-रसोई बने प्यार से
ही, सबको ये समझाते,
रूखी-सूखी से रस टपके
अम्माँ की रसोई में।

थाली- कडुछी और कटोरी
को सूझी देखो मस्ती,
छेड़ रही है गर्म तवे को
दूर-दूर हँसती-हँसती,
दिखलाती हैं लटके-झटके
अम्माँ की रसोई में।

समुंदर की लहरों!

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।
हवाओं का गुस्सा न हम पर उतारो।

बनाएंगे बालू के घर हम यहाँ पर,
जगह ऐसी पाएंगे सुंदर कहाँ पर?

न यू अपनी ताकत की शेखी बघारो,
कभी झूठी-झूठी ही हमसे भी हारो।

हमें तो यहाँ पर ठहरना है कुछ पल,
दिखा लेना गुस्से के तेवर कभी कल,

करो दोस्ती हमसे, बाँहें पसारो।
बहो धीरे-धीरे, थकानें उतारो।

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।

जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई !

दद्दू को आई तो दादी को आई,
जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई!

लगा छूत का रोग जैसे सभी को
मुँह खोले बैठे हैं सारे तभी तो,
करे कोई कितनी भी क्यों न हँसाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

छुपाए न छुपती, रूकाए न रूकती,
बिना बात छाने लगी सब पे सुस्ती,
हमने तो चुटकी भी चट-चट बजाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

हद हो गई अब, दवा कोई देना,
जम्हाई को आ कर भगा कोई देना,
न फिर से हमें घर में दे ये दिखाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

बारिश के मौसम के हैं कई रूप

पिछली गली में झमाझम पानी
अगली गली में है सुरमई धूप
बारिश के मौसम के हैं कई रूप।

माई मेरी, देखो चमत्कार कैसा,
धोखाधड़ी का ये व्यापार कैसा,
किसना की मौसी की टोकरी में ओल,
बिसना की मोसी का सूखा है सूप।

सुनता नहीं सबकी ये ऊपर वाला,
उसके भी घर में है गड़बड़ घोटाला
चुन्नू के घर में निकल गए छाते
मुन्नू के घर वाले रहे टाप-टूप।

बारिश के मौसम के हैं कई रूप ।

वाह, मेरे किशन कन्हाई!

मेट्रो में घूमे न शापिंग मॉल देखा,
मूवी-मूवी देखी न सिनेमाहॉल देखा,
माखन के चक्कर में खाई पिटाई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

बाँसुरी की धुन में ही मस्त रहे हर दिन,
काम कैसे चल पाया सेलफोन के बिन ?
थाम के लकुटिया बस गैया चराई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

काश कहीं द्वापर में इंटरनेट होता,
ईमेल से सबका कांटेक्ट होता,
गली-गली ढूँढ़ती न फिर जसुदा माई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

भारत का बनेगा क्या : सुधीर सुमन

मुख्यधारा के सिनेमा द्वारा फिल्मों के माध्यम से शहीद भगतसिंह की गलत छवि पेश करने की साजिश को उजागर करे रहे हैं चर्चित लेखक सुधीर सुमन-

मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा प्रायः शासकवर्ग की संस्कृति और विचारधारा का  ही प्रचार-प्रसार करता है, अपनी व्यावसायिक बाध्यताओं के कारण वह किसी  क्रांतिकारी विषय या चरित्र को उठाता भी है  तो इतनी सावधानी के साथ कि  शासक वर्ग के लिए वह कोई गंभीर संकट न खड़ा कर दे। गौर से देखें  तो आमतौर पर भारतीय राजनीति और समाज पर जिनका वर्चस्व है- जो शासक वर्ग है,  उसके लिए भगतसिंह की विचारधारा आज भी खतरनाक है। इसके बावजूद इक्कीसवीं सदी की शुरुआत होते ही, पांच-पांच फिल्में बनाने की घोषणाएं हुईं, सन् 2002 में तीन फिल्में प्रदर्शित भी हुईं, जिनमें से धर्मेंद्र और राजकुमार संतोषी द्वारा बनाई गई फिल्में अक्सर देशभक्ति के लिए तय दिवसों को किसी न किसी टीवी चैनल पर दिखाई जाती रही हैं। इनके बाद एक और फिल्म आई- रंग दे बसंती।
भगतसिंह निर्विवाद रूप से आजादी की लड़ाई के सर्वाधिक लोकप्रिय नायक रहे हैं। पोपुलर सिनेमा में गांधी, सावरकर या किसी अन्य चरित्र को लेकर शायद ही कभी ऐसी प्रतिस्पर्धा हुई होगी, जैसी भगतसिंह और उनके साथियों को लेकर  हाल के वर्षों में रही है। बेशक आज देश जिस तरह के संकट से गुजर रहा है, उसमें लोगों की स्वाभाविक आकांक्षा है कि भगतसिंह जैसा राष्ट्रनायक फिर से  पैदा हों। हिंदी सिनेमा इस जनाकांक्षा को भुनाने के चक्कर में ही अचानक  भगतसिंह की जीवन-गाथा की ओर दौड़ पड़ा। लेकिन जिस तरह सर्वव्यापी  भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और अपराधियों और काले धन वालों के वर्चस्व के तले पीस रही जनता के विक्षोभ को संगठित न होने देने और उसे गलत दिशा में भटका देने के लिए शासक वर्ग सांप्रदायिक, जातिवादी-अंधराष्ट्रवादी उन्माद का सहारा लेता है या ऐसे भूतपूर्व नौकरशाहों, कारपोरेट संतों और राजनेता पुत्रों को नायक के बतौर उभारता है, जो वास्तव में पूंजी की सत्ता का विनाश करने वाले नहीं बल्कि उसके चारण होते हैं, उसी तर्ज पर हिंदी सिनेमा ‘सुपरमैन’ से लगने वाले लड़ाकों को पेश करता है, जो किसी भी समस्या  की मूल वजह नहीं तलाशते, उनके सामने कोई एक दुश्मन रहता है, जिसे खत्म कर देना ही हर समस्या का समाधान होता है। उसके लिए भगतसिंह एक ऐसे ‘ही मैन’ हैं, जो देश के दुश्मन अंग्रेजों से दिलेरी के साथ लड़ते हुए फांसी पर चढ़ गए। भगतसिंह साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति के नायक हैं और वे और  उनके साथी एक आधुनिक धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण के लिए राजनैतिक-वैचारिक संघर्ष चला रहे थे, यह तथ्य भगतसिंह पर बनी फिल्मों में  प्रायः नहीं है।
‘राष्ट्रवाद’ की अन्य धाराओं से भगतसिंह और उनके साथियों की जो बहसें थी, जो वैचारिक टकराव थे, वे सामने नहीं आते। भगतसिंह पर बनी फिल्मों में सबसे ज्यादा आपत्तिजनक प्रसंग धर्मेंद्र की फिल्म ‘शहीद: 23 मार्च 1931’ में दिखाई देता है। इसमें भगतसिंह को एक उग्र हिंदू अंधराष्ट्रवादी के रूप में  दिखाया गया है। फिल्म के शुरुआती हिस्से में भगतसिंह जब एक देशभक्ति गीत  गाते हैं तब वहां मंच की पृष्ठभूमि में भारतमाता की जो तस्वीर है, वह आरएसएस द्वारा प्रचारित छवि से मेल खाती है। अकारण नहीं है कि भगतसिंह जो साम्राज्यवाद प्रेरित युद्धों के कट्टर विरोधी थे, उन पर बनी फिल्म को देखते वक्त पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगे थे। बॉबी देओल ने बाकायदा एक साक्षात्कार में कहा था- ‘‘भगतसिंह का किरदार निभाने से पता चला कि वे किस मिट्टी के बने थे, वे कितने बुद्धिमान व विचारवान थे और उनके क्या अहसास  थे। अंग्रेज शासकों की तरह पाकिस्तान के खिलाफ भी हम सब भारतीयों को एकजुट  होना चाहिए।’’
‘23 मार्च 1931 शहीद’ में भगतसिंह को हिंदूसभाई लाला लाजपत राय के  अंधअनुयायी की तरह दिखाया गया है। एक लिजलिजी श्रद्धा है, जो भगतसिंह के  व्यक्तित्व से मेल नहीं खाती। इतिहास गवाह है कि भगतसिंह और उनके साथी  लाला लाजपत राय के सांप्रदायिक विचारों के सख्त विरोधी थे। राय की हत्या का प्रतिशोध भावनात्मक कम, राजनीतिक रणनीति अधिक थी। मगर एक दूसरी फिल्म ‘शहीद-ए-आजम’ में भी इसे महज भावनात्मक प्रतिक्रिया के रूप में ही दिखाया गया है। राजकुमार संतोषी की फिल्म ‘लिजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ इस मायने में सर्वथा भिन्न है। उसमें भगतसिंह का वैचारिक-राजनैतिक स्टैंड स्पष्ट रूप से सामने आता है। अधिकांश समीक्षकों ने संतोषी की फिल्म को भगतसिंह पर बनी फिल्मों में अधिक तथ्यपरक माना। इसकी वजह यह भी है कि यह पीयूष मिश्रा के नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ पर आधारित है। इसके गीतों में निहित भावों को एआर  रहमान का संगीत अत्यंत संवेदनात्मक कुशलता से अभिव्यक्त करता है। यह पहली  फिल्म है जो भगतसिंह और उनके साथियों पर पड़े रूसी क्रांति के प्रभावों की ओर संकेत करती है।
अपने शिक्षक विद्यालंकार जी से उनका जब पहले-पहल समाजवादी अवधारणाओं  से परिचय होता है, उस वक्त पृष्ठभूमि में दर्शकों को मार्क्स और लेनिन की तस्वीरें नजर आती हैं। भगतसिंह और उनके साथी समाजवादी हैं, यह तथ्य ‘शहीद-ए-आजम’ में भी है, पर समाजवाद का मकसद क्या है, इसके बारे में यह फिल्म चुप रहती है। संतोषी की फिल्म ‘द लिजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ जरूर उस मकसद के बारे में बताती है हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी की प्रसिद्ध फिरोजशाह कोटला मीटिंग के दृश्य में भगतसिंह कहते हैं- ‘‘सिर्फ आजादी हमारा मकसद नहीं है। अगर कांग्रेस की राह से आजादी आ भी गई तो उससे गरीबों, मजदूरों और किसानों की हालत में कोई बदलाव नहीं आएगा। गोरे साहब की जगह भूरे साहब आ जाएंगे और आगे चलकर धर्म और जात-पांत के नाम पर पूरे देश में जो आग  भड़केगी, आने वाली पीढि़यां उसे बुझाते-बुझाते थक जाएंगी। हमारा मकसद इस शोषण करने वाली व्यवस्था को खत्म कर समाजवाद लाना है।’’ इसी मीटिंग में एच.आर.ए. के साथ ‘सोशलिस्ट’ शब्द जुड़ा। इस फिल्म में एच.एस.आर.ए. की बैठकों में क्रांतिकारी एक दूसरे को कामरेड कहकर संबोधित करते हैं। जहां  दूसरी फिल्मों में चंद्रशेखर आजाद को छोड़कर सारे पात्र भगतसिंह के पिछलग्गू जान पड़ते हैं, वहीं ‘द लिजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ में कामरेडों का एक पूरा ग्रुप उभरता है। शिव वर्मा और अजय घोष भी नजर आते हैं।
आमतौर पर असेंबली में बम फेंकने की साहसपूर्ण कार्रवाई की चर्चा के क्रम में लोग यह भूल जाते हैं कि भगतसिंह ने मजदूर हड़तालों को कुचलने के लिए बनाए जा रहे ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ के विरोध में बम फेंका था। ‘द लिजेंड ऑफ़  भगतसिंह’ इस मामले में सचेत रही है। फिल्म में अन्यत्र भी भगतसिंह अपनी बातों को किसान-मजदूरों तक पहुंचाने की जरूरत पर जोर देते हैं। मगर  वे कौन सी बातें हैं, वे कैसे विचार हैं, जिनको भगतसिंह किसान-मजदूरों, नौजवानों और बुद्धिजीवियों तक पहुंचाना चाहते थे, उनकी आज क्या प्रासंगिकता है, इस बारे में यह फिल्म भी बहुत कुछ नहीं बताती।
इसके लिए राजकुमार संतोषी को जरूर बधाई देना चाहिए कि भगतसिंह के मंगेतर  वाले प्रसंग को छोड़कर उन्होंने आमतौर पर ऐतिहासिक तथ्यों से कोई खिलवाड़ नहीं किया है। एक ओर जहां सन्नी देओल अपनी फिल्म में पार्टी का नाम तक  नहीं लेते, वहीं संतोषी अपनी फिल्म में उस पार्टी का नाम और सोशलिज्म के  प्रति उसकी आस्था को बेझिझक सामने लाते हैं। अपनी फिल्म के अंत में  स्क्रीन पर दर्शकों के लिए वे एक सवाल छोड़ते हैं- ‘‘भगतसिंह और उनके  साथियों ने अपना जीवन एक आजाद, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए  बलिदान किया। आज भी हम भारत में सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार और शोषण का सामना कर रहे हैं। क्या हमने उनके बलिदान के साथ विश्वासघात नहीं किया?’’ आखिर अंग्रेजी में लिखे इस सवाल का दर्शकों पर कितना असर पड़ता है ? विश्वासघात आखिर किसने किया, रहनुमाओं ने या आमलोगों ने ?
भगतसिंह पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, वर्णभेद, सांप्रदायिकता और अंधविश्वास के विरोधी थे। गांधी से उनका टकराव सिर्फ हिंसा-अहिंसा को लेकर नहीं था, जबकि भगतसिंह पर बनी फिल्में कमोबेश उन्हें हिंसा-अहिंसा के प्रतीकों में  तब्दील कर देती हैं। गांधी जी के वर्ग समन्वय और अध्यात्मवाद से भी क्रांतिकारियों का विरोध था। गांधी और लाला लाजपत राय, दोनों बोल्शेविक किस्म की क्रांति के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि साम्यवादी विचारों के प्रचार से पूंजीपति सरकार के साथ मिल जाएंगे। क्रांतिकारियों ने पूंजीपतियों के सहयोग से चलने वाले संघर्ष पर काफी व्यंग्य भी किया था। उन्होंने तो लाला लाजपत राय पर सरकार के लिए क्रांतिकारियों की मुखबिरी  करने का आरोप भी लगाया था। सरकार कांग्रेस और गांधी जी पर इसलिए मेहरबान  थी कि वे किसी जनक्रांति, खासकर कम्युनिस्ट क्रांति के पक्षधर नहीं थे। अपने ‘महात्मापन’ के प्रति सदैव सचेत रहने वाले गांधी जी ने ‘ऐतिहासिक कलंक’ की आशंका के बावजूद अगर भगतसिंह को बचाने के लिए कुछ नहीं किया  तो इसकी एकमात्र वजह यही थी। भगतसिंह पर बनाई गई सारी फिल्मों में यह दिखाया गया है कि ब्रिटिश सरकार भगतसिंह को येन-केन-प्रकारेण खत्म कर देना चाहती थी। आखिर क्यों ? सिर्फ इसलिए नहीं कि भगतसिंह साम्राज्यवाद के खिलाफ आजीवन  समझौताविहीन संघर्ष चलाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे, बल्कि इसलिए कि वे क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन विकसित करना चाहते थे। गुप्तचर ब्यूरो के तत्कालीन निदेशक डेविड पेट्रिक की रिपोर्ट में भी कम्युनिज्म के प्रति सरकार के खौफ को महसूस किया जा सकता है।
साम्राज्यवादियों को आज भी कम्युनिज्म बर्दाश्त नहीं होता। उनकी पिट्ठू सरकारें आज भी कम्युनिज्म के भय से कांपती हैं। अपने देश की सरकारों की साम्राज्यवादपरस्ती तो जगजाहिर है। 2002 में जब ये फिल्में प्रदर्शित हुईं, तब फिल्म सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष ने भगतसिंह द्वारा लेनिन की जीवनी  पढ़ने पर इसलिए एतराज किया था कि कहीं लोग यह न मान लें कि वे वामपंथी विचारधारा के थे। उनका बयान था कि ‘‘हम नहीं चाहते कि दूसरे राष्ट्रीय  नेताओं की कीमत पर भगतसिंह की तारीफ की जाए। जहां तक लेनिन का सवाल है, हम रूस का महिमामंडन क्यों करें?’’ मृत्यु के इतने सालों के बाद भी भगतसिंह के विचारों के प्रति शासकवर्ग के खौफ की यह बानगी है। उनके विचारों और जीवन पर केंद्रित किताबें बेचने को भी इस आजाद देश की सरकारों ने गुनाह  ठहराया और लोगों को जेल में डाला। कुछ ऐसे ही हाल देखकर कभी गीतकार शैलेंद्र ने लिखा था- भगतसिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की/देशभक्ति  के लिए आज भी सजा मिलेगी फांसी की। खैर, देखने लायक है कि वे कौन से विचार हैं, जिनके लिए आज भी भगतसिंह को मारने के लिए शासकवर्ग हरसंभव कोशिश करता है। असेंबली बमकांड वाले केस में सेशन कोर्ट में बयान देते हुए उन्होंने कहा था- ‘‘देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है और जो लोग इस बात को महसूस करते हैं उनका कर्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धांतों पर समाज का पुनर्निमाण करें। जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जो साम्राज्यशाही के नाम से विख्यात है, समाप्त नहीं कर दिया जाता, तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असंभव है।’’
यह संयोग मात्र नहीं है कि भगतसिंह पर केंद्रित फिल्मों में साम्राज्यवाद के नए हमलों के प्रति कोई चिंता नहीं दिखाई पड़ती। बल्कि बाद में प्रदर्शित ‘रंग दे बसंती’, जिसमें आज के कुछ नौजवान भगतसिंह और उनके साथियों की जिंदगी को जीने की कोशिश करते हैं और एकाध भ्रष्ट नेताओं की हत्या के जरिए बदलाव का सपना देखते हैं, उसमें भी साम्राज्यवाद के साथ भारतीय शासकवर्ग का रिश्ता कहीं नहीं दिखता, बल्कि भ्रष्टाचार और राष्ट्रवाद का भी जो संदर्भ है, वह सेना से ही जुड़ा हुआ है। अब इसका क्या करें कि देशभक्ति का पर्याय बना दी गई सेना के भ्रष्टाचार के किस्से भी अब सरेआम हो चुके हैं। सवाल यह है कि फौज और पुलिस किनके हितों की रक्षा करती है, किनके हितों के लिए सिपाही कुर्बान होते हैं ? पूरे देश को बहुराष्ट्रीय कंपनियों का चारागाह बना देने वाली सरकारें क्या देशभक्त  हैं? भगतसिंह ने कहा था कि ‘‘अगर कोई सरकार जनता को उसके मूलभूत अधिकारों  से वंचित रखती है तो जनता का केवल यह अधिकार ही नहीं, बल्कि आवश्यक  कर्तव्य बन जाता है कि ऐसी सरकारों को समाप्त कर दे।’’ क्या मौजूदा रंग-बिरंगी पार्टियों की सरकारों ने जनता को उनके मूलभूत अधिकारों से  वंचित नहीं कर रखा है ? और क्या जो लोग अपने मूलभूत अधिकारों के लिए लड़  रहे हैं उनको बर्बरता के साथ कुचलने के मामले में  इन सारी सरकारों के बीच एकता नहीं है?
पाकिस्तान विरोधी अंधराष्ट्रवाद का मामला हो या धर्म और सांप्रदायिकता के राजनीतिक इस्तेमाल का, भारत की अधिकांश पार्टियां और सरकारें इससे व्यवहार  में सहमत दिखती हैं, जबकि भगत सिंह इसके प्रबल विरोधी थे। अपने स्वाधीनता आंदोलन की बुनियादी गड़बड़ी का जिक्र करते हुए उन्होंने ‘सांप्रदायिक दंगों और उसका इलाज’ लेख में लिखा है कि ‘‘ऐसे नेता जो सांप्रदायिक आंदोलन  में जा मिले हैं, वैसे तो जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं, जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं, और सांप्रदायिकता की ऐसी  बाढ़ आई हुई है कि वे भी उसे रोक नहीं पा रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।’’ भगतसिंह ने इसीलिए धर्म से राजनीति  को अलग रखने पर जोर दिया और सच्चे इंकलाब और समाजवाद के लिए नास्तिकता के  पक्ष में जोरदार तर्क दिया। बाकुनिन, मार्क्स और लेनिन की नास्तिकता और  सफल क्रांतियों के बीच उन्हें एक सम्बद्धता महसूस होती थी। मगर सिर्फ ‘लिजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ फिल्म के भगतसिंह कहते हैं कि रब में उनका यकीन नहीं है। वैसे संतोषी भी नास्तिकता के पक्ष में उनके प्रबल तर्कों को सामने  लाने से कतरा जाते हैं। मजेदार तथ्य यह है कि इसी फिल्म के कैसेट और सीडी  जारी करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने कहा था कि फिल्म देखकर ऐसा लगता है, जैसे भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु का एक बार फिर जन्म हो गया है। बात इतनी ही होती तो कोई बात न थी। लेकिन वे यह भी बताना नहीं भूले कि ‘हमारे देश में पुनर्जन्म पर विश्वास किया जाता है।’ राव यह भी कह सकते थे  कि अभिनेताओं ने जीवंत अभिनय किया है। यह महज लहजे का फर्क नहीं है, यह है पुनर्जन्म में विश्वास और आस्तिकता का आग्रह जिसके कारण एक ओर उग्र  हिंदूवादी भगतसिंह (बाबी देओल/शहीद: 23 मार्च 1931) अपनी मां से पुनर्जन्म की बात करता है तथा बताता है कि भगवान का वास हम सबके भीतर है  और थोड़े उदार किस्म का भगतसिंह (सोनू सूद/शहीद-ए-आजम) आस्तिकता-नास्तिकता के संबंध में कही गई विवेकानंद की उक्ति को दुहराता है, जबकि ऐसा नहीं है कि इन फिल्मों को बनाने वाले भगतसिंह के बहुचर्चित लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ से अनभिज्ञ रहे होंगे।
फिल्मों की तो नहीं,  पर अखबारों की भूमिका की आलोचना करते हुए भगतसिंह ने लिखा था- ‘‘अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था, लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना, भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है  कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
विडंबना यह है कि ये फिल्में भगतसिंह के सपनों के विरुद्ध जो भारत बना है, उसकी ओर संकेत कर मौन हो जाती हैं या उस ‘अवांछित भारत’ के लिए जिम्मेवार सामंती-पूंजीवादी, सांप्रदायिक और साम्राज्यवादपरस्त शक्तियों के राष्ट्रवाद के दायरे में ही प्रायः चक्कर लगाती रह जाती हैं। कोई भी फिल्म ‘भारत का बनेगा क्या ?’ यानी भारत के भविष्य, उसके नवनिर्माण के सपनों से  प्रेरित होकर नहीं बनाई गई है। इसलिए इनमें निर्माण की वह ताकत यानी  किसान-मजदूर गायब हैं, जिन्हें संगठित करने का आह्वान भगतसिंह ने नौजवानों से किया था। ‘रंग दे बसंती’ के नौजवानों के सामने से वह वैचारिक-सांगठनिक  पर्सपेक्टिव गायब है। हकीकत में जिन लोगों ने भगतसिंह सरीखी जिंदगी और मौत का चुनाव किया या जो भगतसिंह और उनके साथियों के रास्तों पर चल रहे हैं, उनकी राजनीति की गहराइयों में जाने से व्यावसायिक सिनेमा हमेशा गुरेज करता है। जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष और भाकपा-माले के नेता चंद्रशेखर के जीवन पर संभावित फिल्म के बहाने समकालीन जनमत के मार्च 2011 के अंक में कविता कृष्णन ने इस सवाल को उठाया है कि क्या व्यावसायिक सिनेमा क्रांतिकारी के  साथ न्याय कर सकता है ? दरअसल आज के सूचना माध्यमों, खासकर तथाकथित लोकतंत्र के चौथे खंभे यानी अखबारों और टीवी चैनलों में जिनकी पूंजी लगी है, उनके हित में जिस तरह से जनांदोलनों और जनराजनीतिक कार्रवाइयों की उपेक्षा की जाती है या उनकी नकारात्मक छवि बनाई जाती है, लगभग उसी तरह का काम हिंदी सिनेमा भी करता है। कहीं क्रांति का कोई नायक, कोई विचार या कोई संगठित आंदोलन जनता को नायक में तब्दील न कर दे, कोई कहानी इंकलाबी उभार की उत्प्रेरक न बन जाए, इसका फिल्मकार प्रायः ध्यान रखते हैं।

कमला प्रसाद को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

नई दिल्ली :आज सुबह (25 मार्च) ही हम सब प्रो. कमला प्रसाद के असामयिक निधन का समाचार सुन अवसन्न रह गए। रक्त कैंसर यों तो भयानक मर्ज़  है, लेकिन फिर भी आज की तारीख में वह लाइलाज नहीं रह गया है। ऐसे में यह  उम्मीद तो बिलकुल  ही नहीं थी कि कमला जी को इतनी जल्दी खो देंगे। उन्हें चाहने वाले, मित्र, परिजन और सबसे बढ़कर प्रगतिशील, जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन की यह भारी क्षति है। इतने लम्बे समय तक उस प्रगतिशील आंदोलन का बतौर महासचिव नेतृत्व करना जिसकी नींव सज्जाद ज़हीर, प्रेमचंद, मुल्कराज आनंद, फैज़ सरीखे अदीबों ने डाली थी, अपन आप में उनकी प्रतिबद्धता और संगठन क्षमता के बारे में बहुत कुछ  बयान करता है।
14 फरवरी, 1938 को सतना में जन्में कमला प्रसाद  ने 70 के दशक में ज्ञानरंजन के साथ मिलकर ‘पहल’ का सम्पादन किया, फिर 90 के दशक से  वे ‘प्रगतिशील वसुधा’ के मृत्युपर्यंत सम्पादक रहे। दोनों ही पत्रिकाओं के कई  अनमोल अंकों का श्रेय उन्हें जाता है। कमला प्रसाद जी ने  पिछली सदी के उस अंतिम दशक में भी प्रलेस का सजग नेतृत्व किया जब सोवियत विघटन हो चुका था और समाजवाद को पूरी दुनिया में अप्रासंगिक करार  देने की मुहिम चली हुई थी। उन दिनों दुनिया भर में कई तपे तपाए अदीब भी मार्क्सवाद का खेमा छोड़ अपनी राह ले रहे थे। ऐसे कठिन समय में प्रगतिशील आन्दोलन की मशाल थामें रहनेवाले कमला प्रसाद को आज अपने बीच न पाकर एक शून्य महसूस हो रहा है। कमला जी की अपनी मुख्य कार्यस्थली मध्य प्रदेश थी। मध्य प्रदेष कभी भी वाम आन्दोलन का मुख्य केंद्र नहीं रहा। ऐसी जगह नीचे से एक प्रगतिशील सांस्कृतिक संगठन को खडा करना मामूली बात न थी। ये कमला जी की सलाहियत थी कि ये काम भी अंजाम पा सका। निस्संदेह  हरिशंकर परसाई जैसे अग्रजों  का प्रोत्साहन और मुक्तिबोध जैसों की विरासत ने उनका रास्ता प्रशस्त किया, लेकिन यह आसान फिर भी न रहा होगा।
कमला जी को सबसे काम लेना आता था, अनावश्यक आरोपों का जवाब  देते  उन्हें शायद ही कभी देखा गया हो। जन  संस्कृति मंच के पिछले दो सम्मेलनों  में उनके विस्तृत सन्देश पढ़े गए और दोनों बार प्रलेस के प्रतिनिधियों को  हमारे आग्रह पर सम्मेलन संबोधित करने के लिए उन्होनें भेजा। वे प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के बीच साझा कार्रवाइयों की  संभावना तलाशने के प्रति सदैव खुलापन  प्रदर्शित करते रहे और अनेक बार इस सिलसिले में हमारी उनसे बातें हुईं। इस वर्ष कई कार्यक्रमों के बारे में  मोटी रूपरेखा पर भी उनसे विचार विमर्ष हुआ था जो उनके अचानक बीमार पड़ने से  बाधित हुआ। संगठनकर्ता के सम्मुख उन्होंने अपनी आलोचकीय और वैदुषिक  क्षमता,  अकादमिक प्रशासन में अपनी दक्षता को उतनी तरजीह नहीं दी। लेकिन इन  रूपों में भी उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। मध्यप्रदेश कला परिषद और केन्द्रीय हिंदी संस्थान जैसे शासकीय निकायों में काम करते हुए भी वे  लगातार प्रलेस के अपने सांगठनिक  दायित्व को ही प्राथमिकता में रखते रहे।  उनका स्नेहिल स्वभाव, सहज व्यवहार सभी को आकर्षित करता था। उनका जाना सिर्फ प्रलेस, उनके परिजनों और मित्रों के लिए  ही नहीं,  बल्कि समूचे वाम-लोकतांत्रिक  सांस्कृतिक आन्दोलन के लिए भारी झटका है। जन संस्कृति मंच .प्रो. कमला प्रसाद को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित  करता है। हम  चाहेंगे कि वाम आन्दोलन की सर्वोत्तम परम्पराओं को विकसित करनेवाले संस्कृतिकर्मी इस शोक को शक्ति में बदलेंगे और उन तमाम कामों को मंजिल तक  पहुचाएँगे जिनके लिए कमला जी ने जीवन पर्यंत कर्मठतापूर्वक अपने दायित्व का  निर्वाह किया।
प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच

’कथा’ से मार्कण्डेय को समझने का प्रयास

नई दिल्ली : मार्कण्डेय द्वारा स्थापित ’कथा’ का पन्द्रहवाँ अंक मार्कण्डेय पर आधारित है। इसमें उनसे जुड़े संस्मरण, उनका मूल्यांकन, उनकी रचनाएँ, लेख आदि शामिल हैं। मार्कण्डेय जी को लिखे पत्र एवं उनकी तस्वीरें इस अंक के मुख्य आकर्षण हैं। इसमें प्रकाशित सामग्री जिन खण्डों के अन्तर्गत हैं वे हैं संस्मरण, पत्र, कवितायें, वैचारिकी, मूल्यांकन, तस्वीरें आदि। संस्मरण खण्ड में शेखर जोशी का संस्मरण ’यादें और यादें’, अमरकान्त का संस्मरण ’हिरनिया के बोल को तरसेंगे लोग’, नामवर सिंह का संस्मरण ’कम लोगों में होता है ऐसा स्वाभिमान’ तथा राजेन्द्र यादव का संस्मरण ’मार्कण्डेय : द सूत्रधार’ उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त हरीशचन्द्र पाण्डे, श्रीप्रकाश मिश्र, मधुकर गंगाधर, अरुण कमल, भगवान सिंह आदि के संस्मरण भी आकर्षित करते हैं।

’पत्र’ खण्ड में मार्कण्डेय को लिखे रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, भगवतशरण उपाध्याय, नागार्जुन, भैरव, ओमप्रकाश ग्रेवाल, उपेन्द्रनाथ ’अश्क’, रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, नामवर सिंह आदि के पत्र शामिल हैं। इन पत्रों में सामान्य हालचाल से लेकर रचना-सम्बन्धी चिन्ता, विश्लेषण आदि तो हैं ही, उस दौर की साहित्यिक गहमागहमी भी दिखती है। कुछ पत्र ’कथा’ से सम्बन्धित भी हैं जिससे पता चलता है कि मार्कण्डेय ’कथा’ की सामग्री को लेकर कितने प्रयत्नशील रहते थे। ’कथा’ के प्रवेशांक के लिए ’समाजवाद’ पर आधारित बहस के लिए इन्दिरा गाँधी एवं मोरारजी देसाई तक से लेख के लिए सम्पर्क किया गया था।

’कविता’ खण्ड में मार्कण्डेय की कुछ अप्रकाशित कविताएँ हैं जो राजनीतिक चेतना से लैस हैं। ’वैचारिकी’ खण्ड में मार्कण्डेय द्वारा लिखित ’मेरी कथा यात्रा’ एवं ’प्रेमचन्द के बाद हिन्दी के ग्राम-उपन्यास’ लेख शामिल हैं जिसमें कहानी-उपन्यास से सम्बन्धित उनके गम्भीर विचारों की झलक मिलती है।

रजत की क्यारी में पिल्ले : डा. सुनीता

चर्चित लेखिका डा. सुनीता की  बाल कहानी-

पिछले दो दिनों से भूरे रंग की एक कुतिया आकर रजत के घर के बाहर बनी क्यारी में, जब देखो तब बैठी दिखाई देती थी। रजत और उसके दोस्तों ने उसका नाम भूरी रख दिया था। उन्हें भूरी का इस तरह दिन भर एक ही जगह बैठे रहना अजीब लगता था।
एक दिन रजत ने मम्मी से पूछा, ’’मम्मी, क्या यह बीमार है? यह कल से यहीं बैठी है। कहीं और क्यों नहीं जाती?’’
रजत की मम्मी अंजली जी उसे देखकर समझ गईं कि यह पिल्लों को जन्म देने वाली है। उन्होंने रजत से कहा, ‘‘बेटे, इसे मारना नहीं। शायद इसकी तबीयत ठीक नहीं है। ठीक होते ही अपने आप चली जाएगी।’’
रजत ने देखा, भूरी बहुत उदास आँखों से उसे देख रही थी। वह भीतर जाकर एक रोटी ले आया और उसे खिलाने की कोशिश करने लगा। भूरी ने धीरे से एकाध टुकड़ा खाया, बाकी रोटी वहीं पड़ी रही।
अगले दिन इतवार था। उस दिन रजत को स्कूल नहीं जाना था, इसलिए वह देर से उठा। उठते ही उसने मम्मी से पूछा, ‘‘मम्मी, वो चली गई?’’
‘‘कौन?’’ मम्मी समझ नहीं पाईं, रजत किसके बारे में पूछ रहा है।
‘‘वही जो कल से हमारी क्यारी में बैठी थी?’’
‘‘अरे, मैंने तो देखा ही नहीं। चलो, देखते हैं।’’
रजत और उसकी मम्मी गेट का ताला खोलकर ज्यों ही क्यारी के पास आए, तो रजत खुशी से चीख पड़ा, ‘‘मम्मी, देखो-देखो, वन-टू-थ्री-फोर… चार-चार पिल्ले! एक काला, एक भूरा, एक धब्बे वाला और चौथा काला और सफेद।’’ वह खुशी से तालियाँ बजाने लगा और तुरंत दौड़कर अपने दोस्त अमित और साबिर को बुला लाया।
तीनों क्यारी के भीतर पिल्ले उठाने जा रहे थे, तो अंजली ने बड़ी मुश्किल से उन्हें रोका,  ‘‘नहीं बेटे, अभी उनके पास मत जाओ। वे बहुत छोटे हैं। उनकी अभी आँखें भी नहीं खुली हैं। और उनकी माँ को देखा है? इस समय वह अपने बच्चों को हाथ भी नहीं लगाने देगी। काट लेगी, इसलिए दूर से देखो।’’
रजत ठिन-ठिन करने लगा और पिल्ले लेने के लिए मचलने लगा। अपनी आँखों के ठीक सामने बिल्कुल रेशम की तरह चमकते चार-चार सुंदर पिल्लों को देखकर वह किसी भी तरह अपने पर काबू नहीं रख पा रहा था।
अंजली जी ने कहा, ‘‘अच्छा बेटे, ठीक है! पहले इसे कुछ खाने के लिए देते हैं। फिर इसे लगेगा कि हम इसके दोस्त हैं, तो यह हमें अपने पास आने देगी। तभी हम इसके पिल्लों को छू सकेंगे।’’
रजत और उसके दोस्त मान गए और गेट के पास ही बनी सीढिय़ों पर बैठ गए। अंजली ने फटाफट लपसी बनाई और उसे एक खुली-सी प्लेट में डाल दिया। फिर वह बाहर ले आईं। कुछ देर बाद अंजली जी हाथ में लपसी की प्लेट लिए क्यारी के अंदर गईं।
पहले तो पिल्लों की माँ अंजली को चौकन्नी होकर देखती रही। फिर विश्वास हो जाने पर, उसने धीरे-धीरे लपसी खाना शुरू किया! अंजली ने धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरा, तो उसकी आँखों में कृतज्ञता उभर आई। फिर धीरे से अंजली ने पिल्लों को भी छुआ। इतने में ही जैसे ही रजत और उसके दोस्त क्यारी के अंदर आने लगे, तो वह जोर से गुर्राई। अंजली ने फिर धीरे-से उसे पुचकारा तो उसे अहसास हो गया कि ये मेरे दोस्त ही हैं, दुश्मन नहीं।
अब रजत, अमित और साबिर ने भी उन्हें डरते-डरते छुआ। पर जैसे ही रजत ने एक पिल्ले को उठाने की कोशिश की, तो उनकी माँ फिर गुर्राई। रजत फौरन क्यारी से बाहर हो गया।
खैर, अगले दिन से पिल्लों और उनकी माँ से रजत और उसके दोस्तों की जान-पहचान हो गई। अब वे उन्हें गोद में उठा सकते थे। रजत तो जितना समय मिलता, पिल्लों के आसपास ही बिताता। अब स्कूल जाना भी उसे अच्छा नहीं लगता था। उसे लगता था, सारे खिलौने एक तरफ और ये पिल्ले एक तरफ। यही उसके सबसे अच्छे खिलौने हैं।
कुछ दिन बाद पिल्लों की आँखें खुल गईं और वे घर के अंदर भी आने लगे। अंजली उन्हें दिन में तीन बार एक खुली प्लेट में दूध देती थीं जिसे वे पिल्ले अपनी पूँछ हिलाते हुए और एक-दूसरे से होड़ लगाते हुए, पाँच-सात मिनट में ही सफाचट कर जाते। रजत इस सीन में इतना तन्मय और खुश होता कि ऐसे समय उसे कोई वहाँ से हिला नहीं सकता था। जितनी तेजी से वे दूध पीते, उतनी तेजी से उनकी पूँछ हिलती थी। कभी-कभी तो यह देख, रजत की मम्मी को जोर से हँसी आ जाती थी।
पिल्ले कुछ और बड़े हुए तो उन्होंने दौडऩा-भागना शुरू किया। रजत या उसके मम्मी-पापा में से कोई भी घर से बाहर जाता, तो वे थोड़ी दूर तक उसके साथ-साथ जरूर जाते- एक-दूसरे से कुश्तियाँ लड़ते हुए, और फिर वापस क्यारी के आसपास ही बने रहते।
पिछले दो दिन से रजत को एक नया खेल मिल गया है। वह पिल्ले की पूँछ पकड़ता है, तो पिल्ले की दोनों पिछली टाँगें उठ जाती हैं। फिर वह अगली दो टाँगों से चलता है। पूँछ जोर से पकड़े जाने पर पिल्ले को जोर से दर्द होता है, तो वह ‘कैं-कैं, कैं-कैं’ करके चिल्लता है। इस पर रजत खुश होकर ताली पीटता है। यह खेल वह अपने दोस्तों को भी दिखाने लगा है।
कल जब रजत की मम्मी ने उसे ऐसा करते देखा, तो उसे पहले डाँटा और फिर प्यार से समझाया, ‘‘बेटे, अगर कोई तुम्हारी एक टाँग पकड़कर ऊपर उठा दे, तो तुम्हें कितना दर्द होगा? बस, वैसे ही समझ लो, इन पिल्लों को भी दर्द होता है। तभी तो ये दर्द से चिल्लाते हैं। ये बोल नहीं सकते, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि हम इन्हें अपने मजे के लिए बेवजह परेशान करते रहें। मेरी बात समझ रहे हो न रजत? आगे से ऐसा नहीं करोगे न?’’
‘‘नहीं!’’ रजत ने धीरे से कहा। पर उसका मन कुछ और कह रहा था।
इसके थोड़े ही दिन बाद की घटना है। रजत अब घर के अंदर पिल्लों की पूँछ नहीं पकड़ता था। पर स्कूल जाते हुए जब पिल्ले बस स्टॉप तक उसके पीछे-पीछे चलते तो उसका मन बेकाबू हो जाता। उसके हाथ उनकी पूँछ पकडऩे को मचलने लगते।
आज सुबह ऐसा ही हुआ। रजत स्कूल की बस पकडऩे जा रहा था। आदतन पिल्ले भी खूब उछलते-कूदते उसके पीछे चल पड़े। रजत ने फौरन एक पिल्ले की पूँछ पकड़ी और उसे जमीन से ऊपर उठा दिया। पिल्ला जोर-जोर से कैं-कैं करके चिल्लाने लगा। तभी उसकी माँ झटपट कहीं से भागती हुई आई और जिस हाथ से रजत ने पूँछ पकड़ी थी, वहीं काट लिया। बस आ चुकी थीं, पर रजत के हाथ से खून टपकता देख और उसे रोते देख, कंडक्टर उसे घर छोड़ गया।
रोते हुए रजत ने मम्मी को बताया कि उसे पिल्ले की माँ ने काट लिया है।
मम्मी घाव धोते हुए बोलीं, ‘‘मना किया था न तुम्हें, पर तुम नहीं माने। अब देख लिया न, किसी को बेवजह परेशान करने का क्या नतीजा होता है!’’
अंजली उसे तुरंत डॉ. वर्मा के यहाँ ले गईं। डाक्टर ने ऐंटी-रैबीज के पाँच इंजेक्शन एक दिन छोड़कर लगने की बात कही। सुनकर रजत की हालत खराब हो गई। उसकी मम्मी अलग परेशान!
अब रजत के घाव पर पट्टी बँधी है। एक दिन छोड़कर इंजेक्शन भी लग रहे हैं। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया है। पिल्ले तो पिल्ले हैं। वे अब भी उसके आगे-पीछे घूमते हैं। कभी उसका पैर चाट लेते हैं, कभी हाथ! पर अब रजत ने सोच लिया है कि वह नाहक किसी को परेशान नहीं करेगा। वैसे भी ये पिल्ले तो उसके सबसे खूबसूरत और जानदार खिलौने हैं। फिर उन्हें तंग करने और रुलाने से फायदा ?

मार्कण्डेय को याद करना पूरे युग को याद करना है : शेखर जोशी

इलाहाबाद : मार्कण्डेय को याद करना पूरे युग को याद करना है। 1950-60 का दशक आजादी के बाद के साहित्य का स्वर्णकाल है और इसका केन्द्र इलाहाबाद रहा। उस समय साहित्य में एक साथ कई प्रतिभाएँ आयीं। कई विधाएँ आयीं, उनमें प्रयोग भी खूब हुए। इस दौर में हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ पत्रिकाएँ आयीं। वैचारिक विमर्श और वैचारिक द्वन्द्व भी उस दौर सर्वाधिक रहा। यह बात कथाकार शेखर जोशी ने मार्कण्‍डेय की पहली पुण्‍यति‍थि‍ पर ‘कथा’ के मार्कण्‍डेय वि‍शेषांक के लोकार्पण समारोह में कही। कार्यक्रम का आयोजन इलाहाबाद संग्रहालय में कि‍या गया था।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शेखर जोशी ने कहा कि इलाहाबाद फकीरों का शहर था। जिन्होंने फकीराना अन्दाज में अपने को साहित्य के लिए समर्पित कर दिया, उनमें निराला, फिराक़, श्रीकृष्णदास, लक्ष्मीकान्त वर्मा जैसे लोग थे। इस शहर का उस समय ऐसा आकर्षण था कि बाहर से भी लोग यहीं आते थे। राहुल सांकृत्यायन, भदन्त आनन्द कौत्स्ल्यायन, महादेव साहा, फादर कामिल बुल्के आते थे, जिससे यह शहर सांस्कृतिक उर्जा और जीवन्तता ग्रहण करता था। मैं खुद इसी आकर्षण में आया था, लेकिन सोचा नहीं था कि यहीं का होकर रह जाऊँगा। इसी क्रम में उन्होंने कह कि मार्कण्डेय इस फकीरों की परम्परा में शाही फकीर थे और इस परम्परा को उन्होंने अपने रचनकर्म, सम्पादन और व्यवहार से बनाया और विकसित किया।

दूधनाथ सिंह ने कहा कि कथा को बखानने में और कहानी लिखने में फर्क होता है। मार्कण्डेय के कहानी लेखन में बखानने की कला नहीं है। विचार और कल्पना के मेल से उन्होंने कहानी लिखी और विचार भी बहुत सख्त जो उन्होंने मार्क्सवाद से लिया था। उन्होंने कहा कि मार्कण्डेय की कहानियाँ उनकी गाँव की रची स्मृतियों का उपख्यान हैं, लेकिन उनमें वर्ग विभाजन है। उनकी कहानियाँ गरीबों, स्त्रियों, जमींदारों के बीच के संघर्ष और अन्तर्विरोध से रचित हैं। जैसे-जैसे गँवई स्मृतियाँ कम हुईं, वैसे-वैसे उनका लेखन कम हुआ। उन्‍होंने कहा कि मार्कण्डेय की भाषा प्रेमचन्द की भाषा से भिन्न है। मार्कण्डेय के यहाँ अवधी-भोजपुरी मिश्रित शब्द हैं। गाँव की भाषा का खड़ी बोली के व्याकरण में अनुवाद है।

रामजी राय ने कहा कि मार्कण्डेय के यहाँ बखानने की जो कला है वह निरर्थक नहीं है। उसके माध्यम से वे बात करते हैं और आज वह बात ही गायब है। उनकी बातों और यादों के भीतर से सार्थक बातें निकलती थीं। वह पी.सी. जोशी को जब याद करते हैं तो उनकी उस विशेषता की तरफ इशारा भी करते हैं कि मनुष्य निर्माण और संगठन निर्माण कैसे हो ? उन्होंने नई कहानी के सन्दर्भ में मार्कण्डेय को याद करते हुए कहा कि मार्कण्डेय ने नई कहानी में सिर्फ गाँव को लाने का काम नहीं किया,  वह तो औरों ने भी किया। मार्कण्डेय ने नई कहानी में ग्राम को और ग्राम को देखने की नजर को रेखांकित किया। वह अपने लेख ‘ग्राम-चेतना और हिन्दी उपन्यास प्रेमचन्द के बाद’ में कहते हैं कि स्वतन्त्रता बाद के अधिकांश कथाकार प्रेमचन्द की सामाजिक दृष्टि के अनुसार प्रायः परिवर्तन के पक्षधर हैं। लेकिन वे वास्तविकताओं के मात्र निदर्शन से सन्तुष्ट नहीं हैं,  वे सामाजिक यथार्थ की सीमाओं में रहते हुए ऐसे चरित्रों की परिकल्पना करते हैं जो परिवर्तनों के लिए संघर्ष कर सकें, जबकि वास्तविक सामाजिक सन्दर्भों में ऐसे चरित्र उपस्थित नहीं हैं। उनके ऐसा करते ही उन पर सामाजिक स्थितियों को झुठलाने और कल्पना द्वारा आत्मिक चरित्र प्रस्तुत करने का आरोप लग जाता है। आलोचक महोदय कहते हैं कि सामाजिक सन्दर्भों में जब तक ऐसे बदलाव लक्षित न हों, ऐसे चरित्र काल्पनिक माने जायेंगे इसलिए उनमें से कुछ का मानना है कि ‘बलचनमा’ के बालचन की क्रान्तिकारित यथार्थ के उतने नजदीक नहीं है, जितनी श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ का यह कथन कि, ‘वैद्य जी थे,  वैद्य जी हैं और वैद्य जी रहेंगे।’ यद्यपि चरित्रों के परिवर्तन हीन होने की वकालत वही लेखक करता है, जिसका सामाजिक परिवर्तन में विश्वास न हो या वह जो मान चुका हो कि ग्रामीण समाज का यथास्थितिवादी ढाँचा इतना सुदृढ़ है कि वह कभी टूट नहीं सकता। वह शायद आज के इस सत्य को पहचान नहीं पा रहा है कि वह वर्गीय संघर्ष से चाहे न टूटे, लेकिन जातीय आधार ने तो पहले ही चरण में उसे छिन्न-भिन्न कर दिया है। तो हम जब भी मार्कण्डेय पर बात करेंगे तो वह सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि समाज पर भी बात करनी पड़ेगी।

उन्होंने आगे कहा कि मार्कण्डेय के यहाँ गाँव और शहर विभाजित नहीं है और जो कहते हैं कि मार्कण्डेय ग्राम चेतना के कथाकार हैं वे भी ठीक नहीं हैं। मार्कण्डेय दरअसल आधुनिक चेतना के कहानीकार हैं।

राजेन्द्र कुमार ने कहा कि मार्कण्डेय के यहाँ आजादी के बाद के गाँव के चित्र मिलते हैं। लेकिन कहीं भी गाँव पर लिखते हुए वे सिर्फ गाँव की दयनीयता ही नहीं दिखाते थे, बल्कि उनकी कहानियों में संघर्ष करता हुआ गाँव है। गाँव के विकास के शासक वर्गीय नाटक के विरुद्ध मार्कण्डेय के विचारों में गाँव का एक विकास का खाका मिलता है। नीलकान्त ने कहा कि मार्कण्डेय अपनी रचना प्रक्रिया में प्रेमचन्द की परम्परा को पकड़ते हैं। उन्होंने ‘गुलरा के बाबा’ कहानी की चर्चा करते हुए कहा कि वह कहानी ‘पंच परमेश्वर’ जैसी तो नहीं है लेकिन पंच परमेश्वर के समानान्तर चलती कहानी है। उन्होंने ‘भूदान’ कहानी को महत्वपूर्ण कहानी मानते हुए कहा कि इस कहानी ने भूदान को लेकर शासक वर्ग के पाखण्ड को उघाड़कर रख दिया है। उन्होंने मार्कण्डेय की कहानी ‘आदर्श कुक्कुट गृह’ की चर्चा करते हुए कहा कि इस कहानी में पंचवर्षीय विकास की हकीकत क्या है, उस पर जबर्दस्त व्यंग्य है। नीलकान्त ने इस कहानी के ट्रीटमेण्ट को अन्तेन चेखव जैसा बताया और कहा कि पढ़ते हुए इस कहानी को अन्तेव चेखव याद आते हैं।

कार्यक्रम में काशी विद्यापीठ वाराणसी से आये सत्यदेव त्रिपाठी ने मार्कण्डेय की कहानियों की भाषा के बारे में दूधनाथ के विचारों का खण्डन करते हुए कहा कि मार्कण्डेय की भाषा ठण्डी दाल में पड़े हुए घी की तरह है। जिसे मिला देने के बाद भी वह छोटे-छोटे खण्डों में बना रहता है। उन्होंने ‘मधुपुर के सीवान का एक कोना’ कहानी की चर्चा की और कहा कि मार्कण्डेय के यहाँ प्रेम की अभिव्यक्तियाँ सूक्ष्म, सांकेतिक और गहन हैं। उन्होंने कहा कि मार्कण्डेय न होते तो नई कहानी वैसी ही न होती जैसी आज हम लोगों के सामने वह आती है।

झारखण्ड से आये बलभद्र ने मार्कण्डेय की कहानियों को कैसे पढ़ा और समझा जाय इस पर प्रकाश डाला। इस क्रम में उन्होंने ‘गुलरा के बाबा’, ‘सोहगइला’, ‘बीच के लोग’, ‘मधुपुर के सीवान का एक कोना’ कहानी की रचना प्रक्रिया और पाठ पर बातचीत रखी। इस अवसर पर सुधीर सिंह,  क्षमा शंकर पाण्डेय आदि ने भी विचार रखे। मार्कण्डेय को याद करने के लिए शहर के बुद्धिजीवी, साहित्यकार, आन्दोलनकर्मी, छात्र, पत्रकार, रंगकर्मी बड़ी संख्या में एकत्रित हुए।

 

प्रतिरोध का सिनेमा का छठा गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल 23 से

नई दिल्‍ली : प्रतिरोध का सिनेमा अभियान का सोलहवां और गोरखपुर का छठा फिल्म फेस्टिवल इस बार आधी दुनिया के संघर्षों की शताब्दी  और लेखक-पत्रकार अनिल सिन्हा की स्मृति को समर्पित होगा। आयोजन गोकुल अतिथि भवन, सिविल लाइंस, गोरखपुर में होगा।

यह वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का शताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में महिला फिल्मकारों और महिला  मुद्दों को प्रमुखता दी जा रही है। इसके अलावा जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्य और लेखक-पत्रकार अनिल सिन्हा स्मृति को भी छठा फेस्टिवल समर्पित है। इस फेस्टिवल से ही अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान की शुरुआत होगी। पहला व्याख्यान फेस्टिवल के दूसरे दिन 24 मार्च की शाम  मशहूर चित्रकार अशोक भौमिक ‘चित्तप्रसाद और भारतीय चित्रकला की प्रगतिशीलधारा’ पर देंगे।

23 मार्च की शाम 5 बजे प्रमुख नारीवादी चिन्तक उमा चक्रवर्ती के भाषण से फेस्टिवल की शुरुआत होगी। पांच दिन तक चलने वाले फेस्टिवल में इस बार 16 भारतीय महिला फिल्मकारों की फिल्मों को जगह दी गयी है। इन फिल्मकारों में से इफ़त फातिमा, शाजिया इल्मी, पारोमिता वोहरा और बेला नेगी समारोह में शामिल भी होंगी। फेस्टिवल में दो नयी फिल्मों का पहला प्रदर्शन कि‍या जाएगा। ये फिल्में हैं- नितिन के. की कवि विद्रोही की कविता और  जीवन को  तलाशती ‘मैं तुम्हारा कवि हूँ’ और  दिल्ली शहर और एक औरत के रिश्ते की खोज करती समीरा जैन की फिल्म ‘मेरा अपना शहर’। बेला नेगी की चर्चित कथा फिल्म ‘दायें या बाएं’ से फेस्टिवल का समापन होगा।

इस बार दूसरी कला विधाओं को भी प्रमुखता दी गयी है। अशोक भौमिक के व्याख्यान के अलावा उद्घाटन वाले दिन उमा चक्रवर्ती पोस्टरों के अपने निजी संग्रह के हवाले महिला आन्दोलनों और राजनीतिक इतिहास के पहलुओं को खोलेंगी। मशहूर कवि बल्ली सिंह चीमा और विद्रोही का एकल काव्य पाठ फेस्टिवल का प्रमुख आकर्षण होगा। पटना और बलिया की सांस्कृतिक मंडलियाँ हिरावल और संकल्प के गीतों का आनंद भी दर्शक ले सकेंगे। महिला शताब्दी वर्ष के खास मौके पर संकल्प की टीम भिखारी ठाकुर के ख्यात नाटक ‘बिदेशिया’ के गीतों की एक घंटे की प्रस्तुति देंगे। बच्चों के सत्र में रविवार को उषा श्रीनिवासन बच्चों को चाँद-तारों की सैर करवाएंगी।

फिल्म फेस्टिवल में ताजा मुद्दों पर बहस शुरू करने के इरादे से इस बार भोजपुरी सिनेमा के 50 साल और समकालीन मीडिया की चुनौती पर बहस के दो सत्र संचालित किये जायेंगे। इनमें देशभर से पत्रकारों के भाग लेने की उम्मीद है।

गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल से ही 2006 में प्रतिरोध का सिनेमा का अभियान शुरू हुआ था। पांच वर्ष बाद फिर से गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल ने इस बार एक महत्वपूर्ण पहलकदमी की है। इसके तहत देशभर में स्वंतंत्र रूप से काम कर रही फिल्म सोसाइटियों का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन कि‍या जाएगा। फेस्टिवल के दूसरे दिन इन सोसाइटियों का सम्मेलन होगा। इसमें प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के बारे में महत्वपूर्ण विचार-विमर्श होगा और उनके राष्ट्रीय नेटवर्क का निर्माण भी होगा।

इरानी फिल्मकार जफ़र पनाही के संघर्ष को सलाम करते हुए उनकी दो महत्वपूर्ण कथा फिल्मों ‘ऑफ़साइड’ और ‘द व्हाइट बैलून’ को फेस्टिवल में शामिल किया गया है। गौरतलब है कि इरान की निरंकुश  सरकार ने राजनीतिक मतभेद  के चलते जफ़र पनाही को 6 साल की कैद और 20 साल तक किसी भी प्रकार की अभिव्यक्ति पर पाबंदी लगा दी है।

आयोजन में शामिल होने के लिए किसी भी तरह के प्रवेश पत्र या औपचारिकता की जरूरत नही है।

 

 

होली के रंग कवि‍ताओं के संग

रंगों के त्‍यौहार होली पर भवानी प्रसाद मिश्र, कन्हैया लाल मत्त, घमंडी लाल अग्रवाल, प्रकाश मनु, योगेन्द्र दत्त शर्मा, गोपीचंद श्रीनागर, नागेश पाण्डेय ‘संजय’, देवेन्द्र कुमार और रमेश तैलंग की कवि‍ताएं-
 

फागुन की खुशियाँ मनाएं : भवानी प्रसाद मिश्र

 
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं!
आज पीले हैं सरसों के खेत, लो;
आज किरणें हैं कंचन समेट, लो;
आज कोयल बहन हो गई बावली
उसकी कुहू में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
 
आज अपनी तरह फूल हंसकर जगे,
आज आमों में भोंरों के गुच्छे लगे,
आज भोरों के दल हो गए बावले
उनकी गुनगुन में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
आज नाची किरण, आज डोली हवा!
आज फूलों के कानों में बोली हवा
उसका सन्देश फूलों से पूछें, चलो
और कुहू करें गुनगुनाएं।
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं
 
 

रंगों का धूम-धड़क्का : प्रकाश मनु

 
फिर रंगों का धूम-धड़क्का, होली आई रे,
बोलीं काकी, बोले कक्का—होली आई रे!
मौसम की यह मस्त ठिठोली, होली आई रे,
निकल पड़ी बच्चों की टोली, होली आई रे!
 
लाल, हरे गुब्बारों जैसी शक्लें तो देखो—
लंगूरों ने धूम मचाई, होली आई रे!
मस्ती से हम झूम रहे हैं, होली आई रे,
गली-गली में घूम रहे हैं, होली आई रे!
 
छूट न जाए कोई भाई, होली आई रे,
कह दो सबसे—होली आई, होली आई रे!
मत बैठो जी, घर के अंदर, होली आई रे,
रंग-अबीर उड़ाओ भर-भर, होली आई रे!
 
जी भरकर गुलाल बरसाओ, होली आई रे,
इंद्रधनुष भू पर लहराओ, होली आई रे!!
फिर गुझियों पर डालो डाका, होली आई रे,
हँसतीं काकी, हँसते काका—होली आई रे!
 
 

हाथी दादा की होली: प्रकाश मनु

 
जंगल में भी मस्ती लाया
होली का त्योहार,
हाथी दादा लेकर आए
थोड़ा रंग उधार।
 
रंग घोल पानी में बोले—
वाह, हुई यह बात,
पिचकारी की जगह सूँड़ तो
अपनी है सौगात!
 
भरी बालटी लिए झूमते
जंगल आए घूम,
जिस-जिस पर बौछार पड़ी
वह उठा खुशी में झूम!
 
झूम-झूमकर सबने ऐसे
प्यारे गाने गाए,
दादा बोले—ऐसी होली
तो हर दिन ही आए!
 
 

जमा रंग का मेला : कन्हैया लाल मत्त

 
जंगल का कानून तोड़कर जमा रंग का मेला!
भंग चढ़ा कर लगा झूमने बब्‍बर शेर अलबेला!
 
गीदड़ जी ने टाक लगाकर एक कुमकुमा मारा!
हाथी जी ने पिचकारी से छोड़ दिया फब्बारा!
 
गदर्भ जी ने ग़ज़ल सुनाई कौवे ने कब्बाली!
ढपली लेकर भालो नाचा, बजी जोर की ताली!
 
खेला फाग लोमड़ी जी ने, भर गुलाल की झोली!
मस्तों की महफ़िल दो दिन तक, रही मनाती होली!
 
 

होली का त्यौहार : घमंडी लाल अग्रवाल

 
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
रंग-बिरंगी पोशाकें अब मुखड़े बे-पहचान,
भरा हुआ उन्माद हृदय में अधरों पर मुस्कान,
मस्त महीना फागुन वाला लुटा रहा है प्यार!
 
डफली ने धुन छेड़ी प्यारी, भरें कुलांचें ढोल,
मायूसी का हुआ आज तो सचमुच बिस्तर गोल,
भेदभाव का नाम मिटा दें, महक उठे संसार!
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
 
 

सतरंगी बौछारें लेकर : योगेन्द्र दत्त शर्मा

 
सतरंगी बौछारें लेकर
इन्द्रधनुष की धरें लेकर
मस्ती की हमजोली आई,
रंग जमाती होली आई!
 
पिचकारी हो या गुब्बारा,
सबसे छूट रहा फुब्बारा,
आसमान में चित्र खींचती
कैसी आज रंगोली आई!
 
टेसू और गुलाब लगाये,
मस्त-मलंगों के दल आये
नई तरंगों पर लहराती,
उनके संग ठिठोली आई!
रंग जमाती होली आई!
 
 

होली के दो शिशुगीत : गोपीचंद श्रीनागर

 
कोयल ने गाया
गाया रे गाना!
होली में भैया
भाभी संग आना!
……………
मैना ने छेड़ी
छेड़ी शहनाई!
होली भी खेली
खिलाई मिठाई!
 
 

जब आएगी होली : नागेश पाण्डेय ‘संजय’

 
नन्ही-मुन्नी तिन्नी बिटिया,
दादीजी से बोली-
“खूब रंग खेलूंगी जमकर,
जब आएगी होली!
 
मम्मी जी से गुझिया लूंगी,
खाऊंगी मैं दादी!
उसमें से तुमको भी दूँगी,
मैं आधी की आधी!”
 
 

होली के  दिन: देवेन्द्र कुमार

 
होली के दिन बेरंग पानी
ना भाई ना!
 
जंगल घिस कर हरा निकालें
आसमान का नीला डालें
धूसर, पीला और मटमैला
धरती का हर रंग मिला लें
 
अब गन्दा पानी नहलाएं
फिर होगी सतरंगी होली!
हाँ भाई हाँ!
 
काली, पीली, भर भर डाली
मिर्च सभी ने मन भर खाली
मुंह जलता है पानी गायब
मां, अब सब कुछ शरबत कर दे
मटके सारे नदियाँ भर दे
 
जो आये मीठा हो जाए
तब होगी खटमिट्ठी  होली!
हाँ भाई हाँ!
 
 

होली का गीत : रमेश तैलंग

 
मुखडे़ ने रँगे हों तो
होली कि‍स काम की ?
रंगों के बि‍ना है, भैया !
होली बस नाम की।
 
चाहे हो अबीर भैया,
चाहे वो गुलाल हो,
मजा है तभी जब भैया,
मुखड़ा ये लाल हो,
 
बंदरों के बि‍ना कैसी
जय सि‍या-राम की ?
 
रंग चढ़े टेसू का या
कि‍सी और फूल का,
माथे लगे टीका लेकि‍न
गलि‍यों की धूल का,
 
धूल के बि‍ना ना मने
होली घनश्‍याम की।
 
 
 
 

‘जनता के समर्थन से ही इस व्यावसायीकरण को रोका जा सकता है : डॉक्‍टर अनूप सराया

विश्‍व बैंक लगातार तीसरी दुनिया के देशों की सरकारों को सामाजिक क्षेत्र में वित्तीय कटौती की सलाह देता रहा है और यहां की दलाल सरकारें इन नीतियों को लागू करने में जुटी हुई हैं। पिछले कुछ वर्षों से इस बात की लगातार कोशिश की जा रही है कि एम्स में अब तक जो सुविधाएं उपलब्ध हैं उनके बदले मरीजों से पैसे लिए जायं जो बाजार की दर पर हों। इसके लिए सरकार की ओर से तरह-तरह के सुझाव पेश किये जा रहे हैं। सारा प्रयास एम्स के बुनियादी चरित्र को बदलने का है। इसी क्रम में वेलियाथन कमेटी का गठन हुआ और प्रधानमंत्री कार्यालय इस कमेटी की सिफारिशों को लागू करने पर जोर दे रहा है। ‘प्रोग्रेसिव मेडिकोज ऐंड साइंटिस्ट फोरम’ के सक्रिय सदस्य और एम्स के गैस्ट्राइटिस विभाग में प्रोफेसर डॉ. अनूप सराया का कहना है कि एम्स ऐक्ट के मुताबिक एम्स के कामकाज में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं हो सकता- प्रधनमंत्री भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसके स्वरूप में कोई भी बुनियादी तब्दीली संसद में बहस के बिना नहीं की जा सकती है। डॉ. सराया का यह भी कहना है कि  उन संस्थाओं के लिए जो जनता की सेवा के लिए हैं वित्तीय आधर पर स्वायत्‍तता  की अवधरणा ही गलत है। इसके पीछे असली मकसद एम्स को आम जनता की पहुंच से दूर करना है… प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-

आखिर सरकार एम्स के चरित्र में बदलाव क्यों चाहती है ?

दरअसल स्वास्थ्य संबंधी नीति में भूमंडलीकरण के बाद जो आमूल परिवर्तन आया है उसी का यह असर है। आज ये लोग रेवेन्यू पैदा करने के मॉडल की ओर जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और वर्ल्ड बैंक के स्ट्रक्चरल ऐडजस्टमेंट प्रोग्राम के तहत सामाजिक सुरक्षा में कटौती की नीति जब से बनी है तो स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में भी कटौती की योजना बनी। राजस्व पैदा करने के मॉडल पर ये लोग चलना चाहते हैं और कह रहे हैं कि हम उन लोगों को जिनके लिए बहुत जरूरी है और जो बीपीएल कार्ड होल्डर हैं उनको फ्री कर देंगे। अब सवाल ये है कि बीपीएल कार्ड कौन हासिल कर सकता है। अगर राज्य कहता है कि हमारे यहां गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या ज्यादा है तो केंद्र इस पर सवाल खड़े करता है। बीपीएल के साथ दिक्कत यह भी है कि अगर यह दूसरे राज्य का है तो हो सकता है दिल्ली में इसे स्वीकार न किया जाय। मसलन इंस्टीट्यूट ऑफ बिलिअरी साइंसेज जैसी कुछ संस्थाएं ऐसी हैं जिसमें केवल दिल्ली का बीपीएल कार्ड होल्डर ही फायदा ले सकता है। अगर दूसरे राज्य से कोई इलाज कराने आ गया और बीपीएल कार्ड उसके पास नहीं है तो क्या आप उसका इलाज नहीं करेंगे?

जो लोग बीपीएल से ऊपर हैं उनमें से भी तो बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनको यहां इलाज कराने की जरूरत पड़ती है।

बिलकुल ठीक कह रहे हैं। जो लोग गरीबी रेखा से ऊपर हैं उनकी भी हैसियत ऐसी नहीं है कि वे अच्छी चिकित्सा के लिए पैसे खर्च कर सकें। अब ये लोग नयी नीति के तहत बहुत सारे लोगों को इलाज से वंचित कर रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल करने (इन्क्ल्यूजन) की बजाय अब ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे दूर करने (एक्सक्ल्यूजन) की नीति पर ये लोग चल रहे हैं। इसके अलावा लगातार व्यावसायीकरण की एक मुहिम चल रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्‍व बैंक के नुस्खे के बाद आप देखेंगे कि स्वास्थ्य के बजट में बढ़ोत्तरी नहीं हुई। यूपीए ने अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में कहा था कि इसे तीन प्रतिशत करेंगे जो आज भी डेढ़ प्रतिशत से नीचे ही है। भारत जैसे एक गरीब देश में जहां बड़ी तादाद में लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, जहां 77 प्रतिशत लोग 20 रुपये से कम की दैनिक आय पर गुजारा करते हैं वहां अगर आप चिकित्सा को महंगी कर देंगे तो लोगों की क्या हालत होगी। एन सी सक्सेना कमीशन की रिपोर्ट हो या योजना आयोग की ढेर सारी रपटों को अगर आप देखें तो साफ पता चलता है कि इस देश में कितनी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो चिकित्सा पर पैसा नहीं खर्च कर सकते। हालांकि उन रिपार्टों में भी जो उन्होंने प्रति व्यक्ति कैलोरी का मानदंड रखा है वह आईसीएमआर की गाइड लाइंस को अगर देखें या नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन की गाइड लाइन देखें तो वह कैलोरी इनटेक भी कम है। यानी अगर आप उसे भी उपयुक्त कैलोरी पर ले आयें तो यह संख्या और भी ज्यादा बढ़ जाएगी। तो ऐसी हालत में भारत जैसे देश में स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार की हो जाती है। लेकिन सरकार अपना पल्ला झाड़ रही है और कह रही है कि वह महज प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करेगी। यानी प्राथमिक से ऊपर की जरूरत है तो वह खरीदकर उसका लाभ उठायें। जहां पहले ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ की बात होती थी अब एफोर्डेबुल हेल्थ पर बात होने लगी है। इतना ही नहीं सरकारी अस्पताल में भी बहुत सारी सेवाएं अब आउट सोर्स की जाने लगी हैं। धीरे-धीरे सरकार अब अपने हाथ खींचने लगी है। नियुक्तियों में भी अगर आप देखें तो मनमाने ढंग से काम हो रहा है। सरकार धीरे-धीरे अपनी संस्थाओं को तबाह करके प्राइवेट संस्थाओं को मदद करने में लगी है।

क्या पिछले 10 वर्षों में एम्स में इसकी कोई झलक मिली है ?

पिछले 10 वर्षों से लगातार इस दिशा में सरकार काम कर रही है। यहां एम्स में पहले 1992-93 में यूजर्स चार्जेज लगाने की कोशिश की गयी। उसके बाद 1996-97 में उसका विरोध कर हमने उसे रुकवाया। इसी वर्ष के आस पास इन्सेंटिव स्कीम लागू करने की कोशिश की गयी कि जो आय होगी उसका एक हिस्सा डॉक्टरों में बांटा जाएगा। उसको भी हम लोगों ने रुकवाया। हमने कहा कि हमारा सबसे बड़ा इन्सेंटिव यही है कि हमारा मरीज सही सलामत ठीक होकर यहां से चला जाय। हमने कहा कि आप जो भी इन्सेंटिव देंगे वह पैसा गरीब आदमी की जेब से ही निकलकर आयेगा इसलिए हमें उसकी जरूरत नहीं है। हां, आप अगर इन्सेंटिव देना ही चाहते हैं तो सरकार अपने किसी मद से इसकी व्यवस्था कर दे। आप किस तरह का इन्सेंटिव देना चाहते हैं। हमने कहा कि यह तो लूट में हिस्सेदारी होगी जो हमें नहीं चाहिए। फि‍र इन्होंने 2002 में कुछ यूजर्स चार्जेज लगाने की कोशिश की। फि‍र उसका विरोध हुआ। मेन इंस्टीट्यूट में तो नहीं लगा लेकिन जहां-जहां सेंटर बन गये हैं,  जैसे कार्डियो-न्यूरो सेंटर में- वहां लगा दिया। मेन इंस्‍टीट्यूट में वही जांच निःशुल्क होती है लेकिन इस सेंटर में उसके पैसे देने पड़ते हैं, जबकि वह भी इंस्टीट्यूट का ही हिस्सा है। यह लगभग सन् 2000 से शुरू हुआ। फि‍र इन्होंने 2005 में बाकायदा ‘रेश्‍नलाइजेशन ऑफ चार्जेज’ के नाम पर (जिसे मैं कामर्शियलाइजेशन ऑपफ हेल्थ केयर कहता हूं) हर जांच के,  हर ऑपरेशन के, हर चीज के पैसे लगा दिये। ये शुरू भी हो गया। सितंबर, 2005 से यह लागू हुआ जिसका फि‍र हम लोगों ने लगातार विरोध किया। इसके लिए हम लोगों ने लिखने से लेकर धरना-प्रदर्शन सब कुछ किया। लगातार सांसदों से मिलकर इस मुहिम को चलाया। अंततः आठ महीने बाद उस आदेश को वापस लिया गया। यह भूमंडलीकरण के दौर में हमारी एक बड़ी जीत थी। अब फि‍र से उसको किसी न किसी तरीके से लागू करना चाहते हैं। पहले फैकल्टी का कोई भी व्यक्ति छूट दे सकता था जिसे अब विभागाध्यक्ष तक सीमित कर दिया गया है। इनकी कोशिश है कि किसी तरह फि‍र से पैसा वसूला जाय लेकिन हम लोग लगातार इसका विरोध कर रहे हैं।

इसका मतलब यहां के डॉक्टरों में एक तरह की चेतना है?

हम लोग लगातार इन मुद्दों पर लड़ते रहे हैं इसलिए कुछ चीजों को रोक पाते हैं।

अच्छा ये बताइए कि वेलियाथन कमेटी का गठन किस मकसद से किया गया?

पहली चीज तो यह समझ लीजिए कि वेलियाथन साहब हैं कौन। वेलियाथन साहब जब श्री चित्रा इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर थे तो वहां उन्होंने एक रेवेन्यू जेनरेशन मॉडल लागू किया था। उसके बाद उन्होंने अवकाश ग्रहण करने के बाद मनीपाल ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल के लिए प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के खोलने का काम शुरू किया। तो इस प्रकार वेलियाथन साहब इंडस्ट्री के मददगार और रेवेन्यू जेनरेशन मॉडल की वकालत करने वाले डॉक्टर हैं। इसलिए मनमोहन सिंह और मंटेक सिंह अहलूवालिया की सोच के साथ उनका तालमेल पूरी तरह बैठ गया और उनकी अध्यक्षता में एक कमेटी बनायी गयी। पहली बार जब यहां रेवेन्यू जेनरेशन प्रोग्राम लागू करने की कोशिश की गयी थी उसमें मुंह की खानी पड़ी। दूसरी बार मई, 2006 में यह कोशिश हुई। वह एम्स में आरक्षण विरोधी आंदोलन का दौर था और आंदोलन के जोर पकड़ने के साथ एम्स में अराजकता का माहौल बन गया। यहां के डायरेक्टर पूरी तरह आरक्षण विरोधि‍यों को समर्थन दे रहे थे। और कांग्रेस में भी एक बड़ा सेक्शन था जो आरक्षण विरोधि‍यों के साथ खड़ा था। अब देखिए कि प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह प्रोटोकोल तोड़ कर हड़ताली डॉक्टरों से दो बार मिले, जबकि कोई भी प्रधनमंत्री यही कहता कि पहले आप हड़ताल समाप्त करिए फि‍र बात करिए। वह हड़ताल अदालत के आदेश का उल्लंघन करके चल रही थी। उसमें न कोर्ट हस्तक्षेप कर रहा था और न स्थानीय प्रशासन। डॉक्टरों को हड़ताल के लिए टेंट लगवाये जा रहे थे, कूलर लगवाये जा रहे थे और सारी व्यवस्था की जा रही थी। तो पूरी तरह से अराजकता का माहौल था। उसमें यह कमेटी बनायी गयी थी जो इसकी कार्यक्षमता बढ़ाने के तरीकों का सुझाव दे सके। लेकिन उसने उन कारणों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की जिसकी वजह से अराजकता पैदा हुई थी। हां, उसने यह जरूर बताया कि एम्स को किस तरह बड़े उद्योगों के लिए उपलब्ध कराया जाय। यह रिपोर्ट तैयार हो गयी। इसमें भी एक बात ध्यान देने की है। कमेटी की रिपोर्ट को इंस्टीट्यूट के निकाय ने स्वीकृति नहीं दी। उस सूरत में इसकी कोई वैधता नहीं थी। तब भी पीएमओ यह बार बार लिख रहा है कि वेलियाथन की सि‍फारिशों को लागू करिए। कैबिनेट मीटिंग में प्रधनमंत्री ने इंस्टीट्यूट को तीन महीने का समय दिया था कि इसे लागू कर दिया जाय। इस प्रकार हम देखते हैं कि जो रिपोर्ट तैयार की गयी है वह इंस्टीट्यूट के कामकाज के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि इंस्टीट्यूट को इंडस्ट्री के लिए कैसे उपलब्ध कराया जाय। उसका इरादा ही कुछ और है।

तो अगर एम्स पर यह लागू हो जायेगा तो जितने पीजीआई हैं उन पर भी यह लागू होगा ?

देखिए, यह कमेटी इंस्टीट्यूट के लिए बनायी गयी थी। लेकिन सरकार अपनी नीयत साफ कर चुकी है। प्लानिंग कमीशन की मीटिंग के बाद मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने साफ कहा है कि एम्स जैसी संस्थाओं को पीपीपी मोड पर डाल दिया जाय- प्राइवेट-पब्लिक पार्टीसिपेशन। लिहाजा जितनी और संस्थायें हैं या बनेंगी वे सभी प्राइवेट-पब्लिक पार्टीसिपेशन के तरीके पर ही चलेंगी। अभी तो तमाम कमियों के बावजूद गरीब से गरीब आदमी को भी यहां से राहत मिल जाती है, लेकिन अब यह जो आखिरी उम्मीद है वह भी खत्म हो जायेगी। इसका चरित्र ही बदल जायेगा। गौर करिये कि इस इंस्टीट्यूट को किस लिए बनाया गया था। जब नेहरू मंत्रिमंडल में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अमृतकौर ने संसद में इसका बिल पेश किया तो उसमें कहा गया था कि इसका मकसद गरीब से गरीब आदमी को उत्तम स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करना, राष्ट्र के हित में शोध करना,  चिकित्सा के लिए लोगों को प्रशिक्षित करना और अध्यापन के नये तरीके विकसित करना है। इसका मतलब अनुसंधान और मरीजों की देखभाल पर मुख्य जोर था।

अब जब आप इंडस्ट्री के साथ जुड़ेंगे तो इसका इस्तेमाल इंडस्ट्री करेगी, जो कंसल्टेंट हैं वे इंडस्ट्री के लिए काम करेंगे, पढ़ाई पर बुरा असर पड़ेगा, मरीजों की स्वास्थ्य सुविधा पर बुरा असर पड़ेगा और अगर आप इसका व्यावसायीकरण करेंगे तो गरीब से गरीब आदमी को आप इलाज नहीं दे सकेंगे। इसका जो मुख्य उद्देश्य है उससे आप दूर हो जायेंगे। इसलिए बुनियादी चरित्र में कोई भी परिवर्तन अगर आप लाना चाहते हैं तो उसके लिए संसद में बहस की जानी चाहिए।

अभी आपको इसका भविष्य कैसा दिखायी दे रहा है? क्या आप लोग इस बदलाव को रोक पायेंगे?

हम लोग तो इसको रोकने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमको जनता से जितना ही अधि‍क समर्थन मिलेगा और राजनीतिक क्षेत्रों से जो समर्थन मिलेगा उतना ही हम इसे रोक पायेंगे। लेकिन राजनीतिक दलों से कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि अगर वे इसके प्रति गंभीर होते तो काफी पहले ही इसे रोकने की दिशा में कुछ करते। जहां तक मीडिया का सवाल है, जो मेनस्ट्रीम अखबार हैं और नयी आर्थिक नीति का समर्थन करते हैं, वे हर क्षेत्र की तरह स्वास्थ्य सेवाओं के भी निजीकरण और व्यावसायीकरण के ही समर्थन में आमतौर पर दिखायी देते हैं। इसलिए उन अखबारों में ये खबरें जगह नहीं पातीं।0

क्या स्वतंत्रा रूप से डॉक्टरों का ऐसा कोई समूह है जो आम जनता के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हो और उसकी तरफ से कोई सामूहिक प्रयास किया जा रहा हो?

जब तक हम लोग रेजिडेंट डॉक्टर थे, यह कोशिश हमारी लगातार चलती रही। ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का अंतिम अधि‍वेशन 1987 में हुआ। उसमें इस तरह के तमाम मुद्दे हमने उठाये थे और इस पर प्रस्ताव पारित किये थे। इसमें स्वास्थ्य नीति से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बजट बढ़ाने तक की बातें शामिल थीं। हम लोगों ने मेडिकल संस्थाओं में कैपिटेशन फी का विरोध किया था। आज मानव संसाध्न मंत्रालय, यूजीसी और मेडिकल काउंसिल ये सभी डॉक्टरी की पढ़ाई के निजीकरण और व्यावसायीकरण के पक्ष में हैं। जितने कॉलेज सरकारी सेक्टर में खुले हैं उससे ज्यादा प्राइवेट सेक्टर में हैं। प्रतिभा के इन सारे पुजारियों को उस समय मेरिट की याद आ जाती है जब हम लोग जाति आधरित आरक्षण की बात करते हैं। उन मेडिकल कॉलेजों में जहां सिर्फ पैसे से एडमिशन दिया जाता है वहां इन्हें मेरिट की चिंता नहीं होती। दरअसल जो सुविधाप्राप्त वर्ग है उसने अपने लिए कुछ अपने संस्थान खोल लिए हैं और सरकार अब उन्हीं को मदद करना चाहती है। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि यूजीसी ने हाल में एक निर्णय लिया है कि वे लोग जो प्राइवेट विश्वविद्यालयों या प्राइवेट कालेजों में भी हैं वे भी रिसर्च ग्रांट के लिए हकदार हैं और आवेदन कर सकते हैं। अब अगर आपने इसकी अनुमति दे दी तो आप देखेंगे कि प्राइवेट संस्थानों के लोगों को ही सारी फेलोशिप जायेगी। इनके निहितार्थों पर गौर करिए। वे लोग जो अभी मेडिकल एजुकेशन की सीट्स के लिए एक एक करोड़ तक दे रहे हैं वो फि‍र धीरे-धीरे यूजीसी से टाईअप करके कुछ फेलोशिप्स भी अपने यहां रख लेंगे। वे कहेंगे आप इतना दे दीजिए हम आपको फेलोशिप दे देंगे। तो जो पैसा अभी रेजीडेंसी का देना पड़ता है वे भी ये संस्थान नहीं देंगे। रेजीडेंसी की जो तनख्वाह देनी पड़ती वे भी न देकर वे फेलोशिप दे देंगे। तो यह सब एक सुनियोजित ढंग से लूट की साजिश चल रही है। प्राइवेट कैपिटल के लिए सब कुछ है, आम जनता के लिए कुछ नहीं। यही निदेशक सिद्धांत बन गया है।

वेलियाथन कमेटी रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज करने की जरूरत है या इसकी कुछ सिफारिशों को स्वीकार किया जा सकता है ?

यह जिस भावना से लिखी गयी है उसमें ही यह बात निहित है कि इसका पूरा मकसद बहुसंख्यक गरीब जनता के खिलाफ और सुविधासंपन्न वर्ग तथा उद्योगों के हित में है। इसलिए इसे तो पूरी तरह खारिज करने की जरूरत है। इसमें सब कुछ आउटसोर्सिंग पर आधरित है। अब इसकी अनुसंधान परिषद (रिसर्च काउंसिल) के ढांचे की परिकल्पना देखिए जिसमें कहा गया है कि उद्योग क्षेत्र से दो लोग होंगे और एक विख्यात वैज्ञानिक होगा। यह वैज्ञानिक भी किसी फर्मास्यूटिकल उद्योग का नामांकित व्यक्ति होगा। इसमें अनुसंधान और शोध को भी उद्योगों के हित के लिए बताया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि एम्स ऐक्ट में संशोध्न कर दिया जाय और इसके निकायों में जिन लोगों को रखा जाय उनमें उद्योग के लोग हों, सीआईआई और पिफक्की से लोग लिए जायं। इंस्टीट्यूट के काम काज के बारे में इन्होंने जिनसे राय मांगी वे सभी उद्योग क्षेत्र से आते हैं। इसमें रिसर्च इंसेंटिव देने की बात कही गयी है जिसके खिलाफ हम 150 लोगों ने हस्ताक्षर करके भेजा कि हमें यह नहीं चाहिए क्योंकि इससे हमारा पूरा ओरिएंटेशन गड़बड़ हो जायेगा, फर्जी रिसर्च किए जाएंगे और फि‍लहाल उसे रोक दिया गया है।

(डॉक्‍टर सराया से यह बातचीत समकालीन तीसरी दुनि‍या के संपादक और वरि‍ष्‍ठ पत्रकार आनन्‍द स्‍वरूप वर्मा ने की है। समकालीन तीसरी दुनि‍या, जनवरी-2011 से साभार)