Archive for: February 2011

हि‍मपात की डायरी : अतुल शर्मा

पहाड़ी क्षेत्रों में हि‍मपात का सि‍लसि‍ला जारी है। मंसूरी में बर्फ पड़ने पर कवि‍ और सामाजि‍क कार्यकर्ता अतुल शर्मा को ऐसी स्‍थि‍ति‍यों में की गई यात्राओं का स्‍मरण हो आया-

मंसूरी से देहरादून तक पैदल यात्रा के कई संस्‍मरण हैं। यहां 16 फरवरी की रात पड़ी बर्फ का ही जि‍क्र अभीष्‍ट है। मंसूरी में बर्फ पड़ी। देहरादून में दो दि‍न बादल घि‍रे रहे। ओले, बारि‍श और सर्द हवाओं ने मोटे स्‍वेटर नि‍कलवा दि‍ए। कुछ समय  पहले जब मैं नींद में था, तब मंसूरी धनौल्‍टी में खूब बर्फ पड़ी। 17 फरवरी सुबह खि‍ली धूप में मन हो रहा था कि‍ बर्फ के पास चल दूं। पहले भी कई बार गया हूँ। मुझे ऐसी यात्राएं याद आ गईं। देहरादून से राजपुर तक बस में गए। वहां से शहंशाही आश्रम से कुछ आगे मंसूरी की तरफ पैदल चल दि‍ए। उस समय चूने की खानें बंद नहीं थीं। वहां छोटे ट्रक जि‍न्‍हें गट्टू कहते थे, उन पर सवार होकर तीन कि‍लोमीटर की चढ़ाई चढ़ गए। वहां से एक छोटी सी पगडंडी से पहाड़ी का एक छोटा हि‍स्सा चढ़कर मंसूरी का पैदल रास्‍ता शुरू हो गया। ये पहाड़ी रास्‍ता झाड़ीपानी तक ले जाता था। बायीं तरफ से दून घाटी दूर तक दि‍खती थी। और इधर छोटा-सा पहाड़ी गांव गुमसुम और ठंड में डूबा हुआ था। पैदल चलना थकाने वाला बि‍ल्‍कुल नहीं था। मेरे साथ सुप्रसि‍द्ध हास्‍य कवि‍ ओमप्रकाश आदि‍त्‍य, गीतकार रमानाथ अवस्‍थी, कथाकार रमेश गौड़ आदि‍ थे। पि‍ताजी ने मेरी ड्यूटी लगा दी इन्‍हें पैदल मंसूरी यात्रा करवाने की। झाड़ीपानी पहुंचने पर पहाड़ और सड़क के कि‍नारे बर्फ दि‍खने लगी थी। सभी पुलकि‍त थे। वहां चाय पी और गुड़ खरीदा। छोटे से पहाड़ी रास्‍ते की घुमावदार सड़कें कुछ देर बाद बर्फ से ढकीं मि‍लीं। गुड़ और ताजी बर्फ खाते हुए आगे नि‍कल पडे़। नीचे के रास्‍ते को इंगि‍त करके ऊपर चल रहे लोगों ने रमानाथ जी का गीत गुनगुनाया था। धीरे-धीरे चलते हुए बर्फ हमारा साथ दे रही थी। पि‍क्‍चर पैलेस मंसूरी से पहले बार्लोगंज में आधे घंटे बैठे। वहां सैलानि‍यों के हि‍मपात और स्‍थानीय लोगों के हि‍मपात में अन्‍तर समझ आया था। पि‍क्‍चर पैलेस पहुंचने से पहले सीढ़ि‍यों, छतों, पेडों की पत्‍ति‍यों से बर्फ झड़ रही थी। मोड़ों के साथ धूप आती और फि‍र पहाड़ी के पीछे छि‍प जाती।

बहुत सालों बाद दि‍ल्‍ली में आकाशवाणी के लि‍ए रि‍कार्डिंग के सि‍लसि‍ले में गया तो वहां वि‍वि‍ध भारती के प्रोडयूसर के रूप में रमानाथ अवस्‍थी मि‍ले। यह 1971 की बात होगी। कवि‍ व रेडि‍यो नाटकों के प्रख्‍यात अभि‍नेता देवराज दि‍नेश से परि‍चय कराया तो अवस्‍थी जी बोले, ‘‘अतुल, तुम्‍हारे साथ पैदल मंसूरी चढ़ गये थे। वहां से लाये छोटे-छोटे पत्‍थर आज भी मेरे बगीचे के पेड के नीचे रखे हैं।’’

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रातभर बर्फ पड़ी। जब मैं सो रहा था, मुझे बर्फ के कई रंग याद आने लगे। सुबह मुझे याद आया कि‍ एक दूसरी मंसूरी हि‍मपात यात्रा में मैं घनश्‍याम रतूड़ी़ सैलानी के साथ चल रहा था। सैलानी ने प्रसि‍द्ध चि‍पको आन्‍दोलन में जनजागरण का नब्‍बे प्रति‍शत कार्य अपने गीतों से कि‍या था। मुझे इस सूनी सड़क के कि‍नारे चलते हुए एक अंग्रेज दि‍खाई दि‍या। वह अपनी मस्‍ती में चल रहा था। मैंने बर्फ का गोला बनाया और उसकी पीठ पर दे मारा। उसकी कोई प्रति‍क्रि‍या नहीं थी। वह सड़क कि‍नारे खड़ा हो गया। हम लोगों को उसके पास से नि‍कलना पड़ा। वह कुछ नहीं बोला। कुछ देर बाद अंग्रेज पीछे था और हम आगे। एकाएक सोच की चुप्‍पी तोड़ते हुए एक बर्फ का गोला मेरी गर्दन से होते हुए बनि‍यान में घूस गया। अंग्रेज ने ठहाका लगाया और बोला, ‘‘दि‍स इज दे वे। इन्‍जॉय द स्‍नोफॉल।’’ उसने हमसे हाथ मि‍लाया और यह कहकर पगडंडी में गुम हो गया- ‘‘आई एम रस्‍कि‍न बॉंड।’’

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मंसूरी की पैदल यात्रा रेखा, रंजना, रीता, वि‍क्‍की, बेबी, अलका और कथाकार भीमसेन त्‍यागी (जि‍न्‍हें हम अंकल कहते थे) के साथ हुई। ये यात्रा बड़ी गुमसुम चल रही थी। त्‍यागी जी के लतीफे-ठहाके गुंजते। बर्फ के गोले मारने का खेल शुरू नहीं हुआ था। सब त्‍यागी अंकल से संकोच कर रहे थे। बच्‍चों के साथ बच्‍चा बनने का हुनर उनके पास था। एकाएक बर्फ के गोले मारने की शुरुआत त्‍यागी जी ने कर दी। फिर जो बर्फ के गोलों की भरमार हुई, उससे आसपास के पर्यटक भी अछूते नहीं रहे। हमारा काफि‍ला और बड़ा हो गया। पीछे-पीछे बच्‍चों की फौज और आगे-आगे बर्फ का गोला उछालते त्‍यागी अंकल चल रहे थे।

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यह आन्‍दोलन के दि‍न थे। उत्‍तराखंड आन्‍दोलन में 100 दि‍न तक उत्‍तरकाशी में कलादर्पण संस्‍था ने प्रभातफेरि‍यां नि‍कालीं। सर्दियों में गि‍रती हुई बर्फ में मेरा गीत गाती हुई टोली पारम्‍परि‍क ढोल दमाऊ के साथ सुबह नि‍कल जाती- ‘वि‍कास की कहानी गांव से है दूर-दूर क्‍यों/नदी पास है मगर ये पानी से दूर-दूर क्‍यों।’ 0बर्फ पड़ती रहती और आन्‍दोलन की आग भड़कती रहती।

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कल रात पड़ी बर्फ पूरे गढ़वाल-कुमाऊं के ऊंचाई वाले क्षेत्रों को ढक गई। कढ़की में ऐसी ही एक सर्द मौसम में डॉक्‍टर कौशि‍क, डॉक्‍टर मधुसूदन कम्‍बल लेकर नि‍कल पडे़ और रात ग्‍यारह बजे ठि‍ठुरती ठंड में फुटपाथों, स्‍टेशनों और दुकानों के बंद शटर के बाहर बि‍ना कम्‍बल के सोते हुए लोगों को कम्‍बल उढ़ाते हुए नि‍कल पडे़। सुबह उठकर जि‍सने कम्‍बल देखा होगा, उसे पता ही नहीं होगा कि‍ उसे ये गर्माहट कि‍सने दी।

आकर्षित कर रहीं हैं नई बाल-पुस्तकें : रमेश तैलंग

वर्ष 2010 में प्रकाशि‍त बाल साहि‍त्‍य पर सुप्रसि‍द्ध कवि‍ रमेश तैलंग का आलेख-

हर वर्ष की तरह, इस वर्ष भी सैंकड़ों बहुरंगी बाल पुस्तकों ने हिंदी बाल-साहित्य को अपनी नव्यता एवं भव्यता के साथ समृद्ध किया है। चाहे विषयों की विविधता हो या सामग्री की उत्कृष्टता, चित्रों की साज-सज्जा हो या मुद्रण की कुशालता, हर दृष्टि से हिंदी की बाल-पुस्तकें अब अंग्रेजी बाल-पुस्तकों के बरक्स विश्‍वस्तरीय मानदंडों को छू रही हैं। पर, जैसा कि हर बार लगता है, पुस्तकों की कीमत पर एक हद तक नियंत्रण होना अवश्‍य लाजमी है। यदि 48 पृष्ठों की पुस्तक के लिए आपको 150 रुपये खर्च करने पड़ें तो कम से कम हिंदी बाल-पाठकों की जेब पर यह भारी ही पड़ता है।

लेकिन इस बहस में पड़ेंगे तो हरि अनंत हरि कथा अनंता वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी। अतएव हियां की बातें हियनै छोड़ो अब आगे का सुनो हवाल… की डोर पकड़ें तो,  हाल-फ़िलहाल पचास के लगभग नई बाल-पुस्तकें मेरे सामने हैं और उनमें बहुत सी ऐसी हैं जो विस्तृत चर्चा की हक़दार हैं। पर हर पत्रिका की अपनी पृष्ठ-सीमा होती है और इस सीमा के चलते यदि इन बाल पुस्तकों पर मैं परिचयात्मक टिप्पणी ही कर सकूं तो आशा है सहृदय पाठक-लेखक-प्रकाशक अन्यथा नहीं लेंगे।

तो सबसे पहले दो बाल-उपन्यास, जो मुझे हाल ही में मिले हैं। पहला है डॉ. श्री निवास वत्स का गुल्लू और एक सतरंगी ( किताबघर, दिल्ली) और दूसरा है राजीव सक्सेना का मैं ईशान ( बाल शिक्षा पुस्तक संस्थान, दिल्ली)।

श्रीनिवास वत्स एक सक्षम बाल कथाकार हैं और काफी समय से बाल-साहित्य सृजन में सक्रिय हैं। मां का सपना के बाद गुल्लू और एक सतरंगी उनका नया बाल-उपन्यास आया है जिसका मुख्य पात्र यूं तो गुल्लू नाम का बालक है पर उपन्यास की पूरी कथा और घटनाएं सतरंगी नाम के एक अद्भुत पक्षी के चारों ओर घूमती हैं। यह पक्षी मनुष्य की भाषा समझ और बोल सकता है इसीलिए गुल्लू और सतरंगी की युगल-कथा पाठकों को अंत तक बांधे रखती है। 159 पृष्ठों में फैले इस उपन्यास का अभी पहला खंड ही प्रकाशिात हुआ है जो आगे जारी रहेगा। देखना यह है कि आगे के खंड एक श्रंखला के रूप में कितने लोकप्रिय होते हैं। वैसे लेखक ने इसे किसी भारतीय भाषा में लिखा गया प्रथम वृहद् बाल एवं किशोरोपयोगी उपन्यास माना है।

दूसरा उपन्यास- ‘मैं ईशान’ राजीव सक्सेना का प्रयोगात्मक बाल-उपन्यास है। उपन्यास क्या है, ईशान नाम के एक बालक की आत्मकथा है जिसमें उसी की जुबानी उसकी शैतानियां, उसकी उपलब्धियां, उसकी कमजोरियां, और उसकी परेशानियां बखानी गई हैं। संभव है, इसे पढ़ते समय ईशान के रूप में बाल-पाठक अपना स्वयं का चेहरा तलाशने लगें क्योंकि बच्चे तो सभी जगह लगभग एक से ही होते हैं।

कथा-साहित्य के फलक पर ही आगे नजर डालें तो मदन बुक हाउस, नई दिल्ली द्वारा आरंभ की गई मेरी प्रिय बाल कहानियां श्रंखला में पांच सुपरिचित लेखकों की कहानियों के संग्रह इस वर्ष प्रकाशित हुए हैं। ये लेखक हैं- मनोहर वर्मा, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र,  देवेन्द्र कुमार, भगवती प्रसाद द्विवेदी एवं प्रकाशा मनु। इससे पूर्व डॉ. श्रीप्रसाद की प्रिय कहानियों का संग्रह भी यहां से प्रकाशिात हो चुका है। मेरी समझ में ऐसे संग्रहों का महत्व इसलिए अधिक है कि इनमें लेखकों के शुरुआती दौर से लेकर अब तक की लिखी गई प्रतिनिधि कहानियों का संपूर्ण परिदृशय एक जगह पर मिल जाता है।

इन संग्रहों की यादगार कहानियों में मनोहर वर्मा की नन्हा जासूस, मां का विश्‍वास, चाल पर चाल, लीना और उसका बस्ता, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र की समुद्र खारा हो गया, एक छोटा राजपूत, टप-टप मोती, साहसी शोभा, भगवती प्रसाद द्विवेदी की फिसलन, भटकाव, गलती का अहसास, छोटा कद-बड़ा पद, देवेन्द्र कुमार की बाबा की छड़ी, मास्टर जी, डाक्टर रिक्शा, पुराना दोस्त, धूप और छाया, प्रकाश मनु की गुलगुल का चांद, आईं-माईं आईं-माईं मां की आंखें, मैं जीत गया पापा के नाम लिए जा सकते हैं।

भगवती प्रसाद द्विवेदी ने फिसलन और भटकाव जैसी कहानियों में किशोरावस्था के ऐसे अनछुए बिंदुओं (योनाकर्षण एवं फिल्मी दुनिया के मायाजाल) को छुआ है जिन्हें बाल-साहित्य में ‘टेबू’ समझ कर छोड़ दिया जाता है।

ऐसा ही एक और कहानी संग्रह डॉ. नागेश पाण्डेय संजय का यस सर-नो सर (लहर प्रकाशन, इलाहाबाद ) है जिसमें उनकी 14 किशोरोपयोगी कहानियां संकलित हैं। नागेश पांडेय ने लीक से हटकर कहानियां/कविताएं लिखी हैं। यही कारण है कि उनकी बाल-कहानियां आधुनिक संदर्भों से जुड़कर पाठकों को बहुत कुछ नया देती हैं।

यहां मैं डॉ. सुनीता के बाल-कहानी संग्रह ‘दादी की मुस्कान’ ( सदाचार प्रकाशन, दिल्ली) की चर्चा भी करना चाहूंगा जिसमें उनकी छोटी-बड़ी 21 मनभावन कहानियां संकलित हैं। गौर से देखें तो सुनीता की कहानियों में जगह-जगह एक गंवई सुगंध या कहें,  एक अनगढ़ सौंदर्य देखने को मिलता है। सुनीता देवेन्द्र सत्यार्थी की तरह अपनी कहानियों में पत्र-शौली, यात्रा-कथा, सामाजिक, ऐतिहासिक जीवन-प्रसंग तथा पारिवारिक संबंधों की जानी-पहचानी मिठास…. सभी कुछ रचाए-बसाए चलती हैं जो पाठकों को एक अलग ही तरह का सुख देता है।

मेरी प्रिय बाल कहानियां के अलावा धुनी बाल-साहित्य लेखक और चिंतक प्रकाश मनु के इधर और भी अनेक कहानी संग्रह इस वर्ष प्रकाशित हुए हैं। यथा- रंग बिरंगी हास्य कथाएं ( शशांक पब्लिकेशन्स, दिल्ली), तेनालीराम की चतुराई के किस्से, बच्चों की 51 हास्य कथाएं, ज्ञान विज्ञान की आशचर्यजनक कहानियां ( तीनों के प्रकाशक डायमंड पाकेट बुक्स, दिल्ली ), अद्भुत कहानियां ज्ञान-विज्ञान की ( कैटरपिलर पब्लिशर्स, दिल्ली), जंगल की कहानियां, ( स्टेप वाई स्टेप पब्लिशर्स, दिल्ली),  चुनमुन की अजब-अनोखी कहानियां ( एवरेस्ट पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली),  सुनो कहानियां ज्ञान-विज्ञान की ( ग्लोरियस पब्लिशर्स, दिल्ली),  रोचक कहानियां ज्ञान-विज्ञान की ( बुक क्राफ्ट पब्लिशर्स, दिल्ली)  । ज़ाहिर है कि प्रकाश मनु न केवल अपने लेखन में गति और नियंत्रण बनाए हुए हैं, बल्कि समकालीन बाल-साहित्य के समूचे परिदृश्‍य पर भी एक पैनी नजर रखे हुए हैं। मैं नहीं जानता, इतने विविध और महत्वपूर्ण बाल कहानी-संग्रह एक साथ एक ही वर्ष में किसी और लेखक के प्रकाशित हुए हैं।

जाने-माने कथाकार अमर गोस्वामी  की 51 बाल कहानियों का एक नया संग्रह ‘किस्सों का गुलदस्ता’ (चेतना प्रकाशन, दिल्ली) भी इधर आया है जिसमें बाज की सीख, घमंडी गुलाब, चुनमुन चींटे की सैर, लौट के बुद्धु के अलावा उनकी मशहूर बाल कहानी शोरसिंह का चशमा भी शामिल है। पाठक इन सभी कहानियों का भरपूर आनंद उठा सकते हैं।

लोक-परक, पौराणिक एवं प्रेरक बाल-कथा साहित्य के अंतर्गत आनंद कुमार की ‘जीवन की झांकिया, ( ट्रांसग्लोबल पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली),  मनमोहन सरल एवं योगेन्द्र कुमार लल्ला द्वारा संपादित भारतीय गौरव की कहानियां, ( बुक ट्री पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली),  हरिमोहन लाल श्रीवास्तव तथा ब्रजभूषण गोस्वामी द्वारा संपादित मूर्ख की सूझ, विष्णु दत्त ‘विकल’ की इंसान बनो, दो खंडों में प्रकाशिात राज बहादुर सिंह की चरित्र निर्माण की कहानियां (सभी के प्रकाशाक एम.एन. पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली),  सावित्री देवी वर्मा रचित इन्सान कभी नहीं हारा,  प्यारे लाल की गंगा तेली, ( दोनों के प्रकाशक-सावित्री प्रकाशन, दिल्ली), राम स्वरूप कौशल की पाप का फल, ( स्वास्तिक प्रकाशन, दिल्ली )  तथा डॉ. रामस्वरूप वशिष्ठ की एक अभिमानी राजा (ओरिएंट क्राफ्ट पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली)  के नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं।

कथा-साहित्य की तरह ही बाल कविताएं भी अपनी सहजता, मधुरता और सामूहिक गेयता के कारण हमेशा से बच्चों को प्रिय रही हैं।

यह हर्ष की बात है कि इस वर्ष हमारे समय के पुरोधा बालकवि डॉ. श्रीप्रसाद के तीन संग्रह क्रमश: मेरे प्रिय शिशु गीत ( हिमाचल बुक सेंटर, दिल्ली), मेरी प्रिय बाल कविताएं ( विद्यार्थी प्रकाशन, दिल्ली)   और मेरी प्रिय गीत पहेलियां ( सुधा बुक मार्ट, दिल्ली),   एक साथ प्रकाशिात हुए हैं। इन काव्य-संग्रहों में श्रीप्रसाद जी की लंबी बाल-काव्य यात्रा का विस्तृत परिदृश्य अपनी पूरी वैविध्यता के साथ देखा जा सकता है। श्रीप्रसाद जी के अलावा डॉ. प्रकाशा मनु के भी 101 शिशु गीत इधर चेतना प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुए हैं जिनका मजा नन्हे-मुन्ने़ पाठक ले सकते हैं।

शिशु गीतों की बात चली है तो संदर्भवश मैं यहां यह भी उल्लेख करना चाहूंगा कि अंग्रेजी में रेन रेन गो अवे,  ब बा ब्लेकशीप, हिकरी-डिकरी,  जैसे बहुत से ऐसे नरसरी राइम्स हैं जिनके पीछे कोई न कोई ऐतिहासिक, सामाजिक घटना जुड़ी है। जिज्ञासु पाठक यदि चाहें तो,  इन घटनाओं का संक्षिप्त ब्‍योरा www.rhymes.org.uk वेबसाइट पर देख सकते है। हिंदी शिशु गीतों, खासकर जो लोक में प्रचलित हैं, में ऐसे संदर्भों को ढूंढना श्रम-साध्य होने के बावजूद रोचक होगा। क्योंकि कोई भी लेखक या शिशु गीत रचयिता अपने समय से कटकर कुछ नहीं रच सकता।

इस वर्ष जिन अन्य बाल-कविता संग्रहों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया है उनमें डॉ. शकुंतला कालरा का हंसते-महकते फूल ( चेतना प्रकाशन, दिल्ली ),   डॉ. बलजीत सिंह का गाओ गीत सुनाओ गीत, डा. शंभुनाथ तिवारी का धरती पर चांद  ( दोनों के प्रकाशक हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर), प्रत्यूष गुलेरी का बाल गीत ( नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली),   डॉ. आर.पी. सारस्वत के दो संग्रह- नानी का गांव और चटोरी चिड़िया ( दोनों के प्रकाशक नीरजा स्मृति‍ बाल साहित्य न्यास, सहारनपुर),    राजा चौरसिया का अपने हाथ सफलता है ( बाल वाटिका प्रकाशन, भीलवाड़़ा), अजय गुप्त का जंगल में मोबाइल ( श्री गांधी पुस्तकालय प्रकाशन, शाहजहांपुर ), चक्रधर नलिन का विज्ञान कविताएं( लहर प्रकाशन, इलाहाबाद),   और गया प्रसाद श्रीवास्तव श्रीष का वीथिका ( कवि निलय,  रायबरेली) प्रमुख हैं।

डॉ. आर पी सारस्वत अपेक्षाकृत नए बाल कवि हैं पर उनकी बाल-कविता चटोरी चिड़िया की गेयता और उसका चलबुलापन सचमुच चकित करता है। सच कहूं तो बाल-कविता के सामने बहुत सी चुनौतियां हैं जिनमें सबसे बड़ी चुनौती लोकलय एवं पारिवारिक संबंधों की प्रगाढ़ता को बचाए रखने की है।

कवि‍ता के बाद नाटक विधा की बात करें तो बाल नाटकों की इधर दो किताबें मुझे मिली हैं। ये हैं डॉ. प्रकाश पुरोहित की ‘तीन बाल नाटक’ ( राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर) तथा भगवती प्रसाद द्विवेदी की आदमी की खोज ( कृतिका बुक्स इंटरनेशनल, इलाहाबाद),  जिसमें उनके सात बाल एकांकी संग्रहीत हैं।

अन्य विधाओं में मनोहर वर्मा की भारतीय जयन्तियां एवं दिवस ( साहित्य भारती, दिल्ली) महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसमें लेखक ने भारतीय महापुरुषों के संक्षिप्त जीवन परिचय के साथ उनकी जयंतियां मनाने का सही तरीका तथा आवश्‍यक उपदानों का रोचक ढंग से वर्णन किया है। जिन पाठकों को महापुरूषों के प्रेरणादयी वचनों के संग्रह में रुचि है उन्हें गंगाप्रसाद शर्मा की पुस्तक 1001 अनमोल वचन (स्वास्तिक प्रकाशन, दिल्ली) सहेजने योग्य लग सकती है। इनके अलावा, जैसा कि सब जानते हैं,  हर वर्ष भारत के कुछ बच्चों को उनके साहस और वीरता भरे कारनामों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाता है। रजनीकांत शुक्ल ने ऐसे ही राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित सोलह बहादुर बच्चों की सच्ची कहानियां लिखी हैं जो छोटे-बड़े सभी पाठकों को प्रेरणादायी एवं रोमांचकारी लगेंगी।

आध्यात्मिक गुरु, चिंतक एवं वक्ता ओशो ने एक बार कहा था कि जब हम ईश्‍वर से बात कर रहे होते हैं तो वह प्रार्थना कहलाती है और जब हम ईश्‍वर की बात सुन रहे होते हैं तो वह साधना बन जाती हैं। सच कुछ भी हो पर यह तो मानना पड़ेगा कि प्रार्थना हर मनुष्य को आंतरिक शक्ति प्रदान करती है और शायद यही कारण है कि लगभग हर घर, संस्थान, विद्यालय में अलग-अलग समय पर प्रार्थनाएं गाई जाती हैं। ऐसी ही शक्तिदायी प्रार्थनाओं और राष्ट्रीय वंदनाओं का एक रुचिकर संग्रह शान्ति कुमार स्याल का विनय हमारी सुन लीजिए (विद्यार्थी प्रकाशन, दिल्ली)  है जिसमें एक सौ के लगभग प्रार्थनाएं संग्रहीत हैं।

बाल-साहित्य में रुचि रखने वाले बहुत से पाठकों को साहित्यकारों के बचपन और उनके जीवन के बारे में भी जानने की उत्सुकता रहती है। इस संदर्भ में दो पुस्तकों का उल्लेख मैं यहां करना चाहूंगा। पहली पुस्तक है बचपन भास्कर का (साहित्य भारती,  दिल्ली) जिसमें प्रख्यात साहित्यकार रामदरश मिश्र के बचपन के प्रसंग हैं और दूसरी पुस्तक है ‘वह अभी सफ़र में हैं’ ( प्रवाल प्रकाशन, गाजियाबाद) जिसमें जाने-माने बाल-साहित्यकार योगेन्द्र दत्त शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर मार्मिक लेख हैं। ज्ञातव्य है कि योगेन्द्र दत्त शर्मा के दो बालगीत संग्रह आए दिन छुट्टी के और अब आएगा मजा पहले ही काफी चर्चित हो चुके हैं।

और अंत में चलते-चलते प्रकाशान विभाग नयी दिल्ली से प्रकाशित देवेन्द्र मेवाड़ी की पुस्तक- विज्ञान बारहमासा का उल्लेख करना चाहूंगा जिसमें लेखक ने प्रकृति से जुड़े अनेक सवालों के जवाब सीधे, सरल और सटीक ढंग से दिए हैं। निस्संदेह, देवेन्द्र मेवाड़ी की यह पुस्तक विज्ञान पर लिखी गई महत्वपूर्ण बाल पुस्तकों में अपना यथोचित स्थान बनाएगी।

(आजकल, नवंबर, 2010 में प्रकाशि‍त आलेख के संपादि‍त अंश)

जाने माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा का नि‍धन

नई दि‍ल्‍ली : जाने-माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे। 25 फरवरी को दिन के 12 बजे पटना के मगध अस्पताल में उनका निधन हो गया। 22 फरवरी को जब वे दिल्ली से पटना आ रहे थे, ट्रेन में ही उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उन्हें पटना के मगध अस्पताल में अचेतावस्था में भर्ती कराया गया। तीन दिनों तक जीवन और मौत से जूझते हुए 25 को उन्होंने अन्तिम सांस ली। उनका अन्तिम संस्कार पटना में ही होगा। उनके निधन की खबर से पटना, लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद सहित तमाम जगहों में लेखको, संस्कृतिकर्मियों के बीच दुख की लहर फैल गई। जन संस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। उनके निधन को जन सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।

ज्ञात हो कि अनिल सिन्हा एक जुझारू व प्रतिबद्ध लेखक व पत्रकार रहे हैं। उनका जन्म 11 जनवरी, 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में हुआ। उन्होंने पटना वि‍श्‍वविद्यालय से 1962 में एम.ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। वि‍श्‍वविद्यालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने पीएचडी बीच में ही छोड़ दी। उन्होंने प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विषयों पर शोध जैसे कई कार्य किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’ साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यवर्त, आज, ज्योत्स्ना, जन, दिनमान से भी वह जुड़े रहे। 1980 में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ, उन्होंने इस अखबार में काम किया। अमृत प्रभात लखनऊ में बन्द होने के बाद में वे नवभारत टाइम्स में आ गये। दैनिक जागरण, रीवाँ के वह स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने यह अखबार छोड़ दिया।

अनिल सिन्हा बेहतर, मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष में अटूट विश्‍वास रखने वाले रचनाकार थे। वह मानते थे कि एक रचनाकार का काम हमेशा एक बेहतर समाज का निर्माण करना है, उसके लिए संघर्ष करना है। उनका लेखन इस ध्येय को समर्पित है। वह जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में थे। वह उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। वह जन संस्कृति मंच उत्‍तर प्रदेश के पहले सचिव थे। वी क्रान्तिकारी वामपंथ की धारा तथा भाकपा (माले) से भी जुड़े थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जेसे क्रान्तिकारी संगठन के गठन में भी उनकी भूमिका थी। इस राजनीति जुड़ाव ने उनकी वैचारिकी का निर्माण किया था।

कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नाम से उनका कहानी संग्रह 2005 में भावना प्रकाशन से प्रकाशि‍त हुआ। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता: इतिहास, स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनुदित पुस्तक ‘साम्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मुलन’ छपकर आयी थी। उनकी सैकड़ों रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में छपती रही है। उनका रचना संसार बहुत बड़ा है, उससे भी बड़ी है उनको चाहने वालों की दुनिया। मृत्यु के अन्तिम दिनों तक वह अत्यन्त सक्रिय थे तथा 27 फरवरी को लखनऊ में आयोजित शमशेर, नागार्जुन और केदार जन्तशती आयोजन के वह मुख्य कार्यकर्ता थे।

उनके निधन पर शोक प्रकट करने वालों में मैनेजर पाण्डेय, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, प्रणय कृष्ण, रामजी राय, अशोक भैमिक, अजय सिंह, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेन्द्र कुमार, भगवान स्वरूप कटियार, राजेश कुमार, कौशल किशोर, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, चन्द्रशेखर, वीरेन्द्र यादव, दयाशंकर राय, वंदना मिश्र, राणा प्रताप, समकालीन लोकयुद्ध के संपादक बृजबिहारी पाण्डेय आदि रचनाकार हैं। अपनी संवेदना प्रकट करते हुए जारी वक्तव्य में रचनाकारों ने कहा कि अनिल सिन्हा आत्मप्रचार से दूर ऐसे रचनाकार रहे हैं जो संघर्ष में यकीन करते थे। इनकी आलोचना में सर्जानात्मकता और शालीनता दिखती है। ऐसे रचनाकार आज विरले मिलेंगे जिनमें इतनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सर्जनात्मकता हो। इनके निधन से लेखन और विचार की दुनिया ने एक अपना सच्चा व ईमानदार साथी खो दिया है।

शमशेर, केदार और नागार्जुन जन्‍मशती पर आयोजन 27 को

नई दि‍ल्‍ली : कवि‍ शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की जन्‍मशती के अवसर जन संस्‍कृति‍ मंच, लखनऊ की ओर 27 फरवरी, 2011 को उत्‍तर प्रदेश हिंदी संस्‍थान, हजरतगंज, लखनऊ में कार्यक्रम काल से होड़ करती कवि‍ता का आयोजन कि‍या जा रहा है। कार्यक्रम में मुख्‍य अति‍थि‍ मैनेजर पाण्‍डेय और वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍ राजेन्‍द्र कुमार व बलराज पाण्‍डेय होंगे। कार्यक्रम का पहला सत्र दोपहर 3.30 शुरू होगा। इसकी अध्‍यक्षता नरेश सक्‍सेना करेंगे। इसमें शमशेर, केदार और नागार्जुन की कवि‍ताओं का पाठ कि‍या जाएगा। साथ ही चंद्रशेखर के कवि‍ता संग्रह अब भी का लोकार्पण कि‍या जाएगा। इनके अलावा हमारे वक्‍त शमशेर का महत्‍व व प्रासंगि‍कता पर मैनेजर पाण्‍डेय, हमारे अपने व जरूरी नागार्जुन पर राजेन्‍द्र कुमार और समय के महत्‍वसि‍द्ध कवि‍ केदार पर बलराज पाण्‍डेय का व्‍याख्‍यान होगा।

दूसरा सत्र शाम 7.00 बजे शुरू होगा। इसमें हमारे सम्‍मुख शमशेर के तहत उनके कवि‍ता पाठ की वीडि‍यो फि‍ल्‍म का प्रदर्शन कि‍या जाएगा।

सीमा ति‍वारी का भोजपुरी के उत्‍थान के लि‍ए अभि‍यान

नई दिल्ली : भोजपुरी की लोकप्रिय गायिका सीमा तिवारी भोजपुरी भाषा से अश्‍लीलता मिटाने एवं भाषा उत्थान के लिए प्रयासरत हैं। इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्‍तर पर कार्यक्रम  कर रही हैं। इस अभि‍यान के तहत भारतीय सांस्कृतिक एवं सम्बन्ध परिषद भारत सरकार की ओर से 7 से 18 फ़रवरी तक ग्रुप के साथ यूरोप के दौरे पर गयीं। कार्यक्रम के दौरान उन्‍होंने भोजपुरी की विधा सोहर, झूमर, सहाना, जेवनार, कजरी, कटनी, रोपनी, विदेशिया, होली, चैती आदि गीतों की शानदार प्रस्तुति की। यूरोप में मुख्य रूप से सोहर और विदेशिया गीतों की काफी सराहना हुई। जर्मनी के स्वबेश हॉल शहर में भगवान  कृष्ण पर आधारित जेवनार गीत कृष्ण मुरारी चलेले ससुरारी…..पर लोग मंत्र मुग्ध हो गए। नीदरलैंड और पोलैंड में होली गीत नकबेसर कागा ले भागा… और  नइहरे में कइल पानी पानी ऐ राजा  जी… पर लोगों ने ठुमके लगाये एवं रंग गुलाल से होली भी मनाई। पोलैंड में पहली बार भोजपुरी कार्यक्रम देखकर पोलैंड वासी भारतीय और भोजपुरी संस्कृति से परिचित हुवे और भारतीय वाद्य यंत्रों पर खूब तालियाँ बजाईं।

प्रस्तुति : लाल बिहारी लाल

हिदी के कुछ प्रसिद्ध कवियों की बाल कविताएँ

हिंदी के सुप्रसि‍द्ध कवि‍ श्रीधर पाठक, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुंद गुप्त, सुखराम चौबे गुणाकर, कामता प्रसाद गुरु, प. सुदर्शनाचार्य और राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन की बाल कवि‍ताएं-

देल छे आए : श्रीधर पाठक

बाबा आज देल छे आए,
चिज्जी-पिज्जी कुछ ना लाए!
बाबा क्यों नहीं चिज्जी लाए,
इतनी देली छे क्यों आए?
का है मेला बला खिलौना,
कलाकद लड्डू का दोना।
चू चू गाने वाली चिलिया,
चीं चीं करने वाली गुलिया।
चावल खाने वाली चुइया,
चुनिया मुनिया मुन्ना भइया।
मेला मुन्ना मेली गैया,
का मेले मुन्ना की मैया।
बाबा तुम औ का से आए,
आ-आ चिज्जी क्यों न लाए?

कोकिल : महावीर प्रसाद द्विवेदी

कोकिल अति सुदर चिड़िया है,
सच कहते हैं अति बढ़िया है।
जिस रगत के कुवर कन्हाई,
उसने भी वह रगत पाई।
बौरों की सुगध की भाती,
कुहू-कुहू यह सब दिन गाती।
मन प्रसन्न होता है सुनकर,
इसके मीठे बोल मनोहर।
मीठी तान कान में ऐसे,
आती है वशीधुनि जैसे।
सिर ऊंचा कर मुख खोलै है,
कैसी मृदु बानी बोलै है!
इसमें एक और गुण भाई,
जिससे यह सबके मन भाई।
यह खेतों के कीड़े सारे,
खा जाती है बिना बिचारे।

हिम्मत : बालमुकुंद गुप्त

‘कर नहीं सकते हैं’ कभी मुँह से कहो न यार,
क्यों नहीं कर सकते उसे, यह सोचो एक बार।
कर सकते हैं दूसरे पाँच जने जो कार,
उसके करने में भला तुम हो क्यों लाचार।
हो, मत हो, पर दीजिए हिम्मत कभी न हार,
नहीं बने एक बार तो कीजे सौ-सौ बार।
‘कर नहीं सकते’ कहके अपना मुँह न फुलाओ,
ऐसी हलकी बात कभी जी पर मत लाओ।
सुस्त निकम्मे पड़े रहें आलस के मारे,
वही लोग ऐसा कहते हैं समझो प्यारे।
देखो उनके लच्छन जो ऐसा बकते हैं,
फिर कैसे कहते हो कुछ नहिं कर सकते हैं?
जो जल में नहिं घुसे तैरना उसको कैसे आवे,
जो गिरने से हिचके उसको चलना कौन सिखावे।
जल में उतर तैरना सीखो दौड़ो, सीखो चाल,
‘निश्चय कर सकते हैं’ कहकर सदा रहो खुशहाल।

बनावटी सिंह : सुखराम चौबे गुणाकर

गधा एक था मोटा ताजा
बन बैठा वह वन का राजा!
कहीं सिंह का चमड़ा पाया,
चट वैसा ही रूप बनाया!
सबको खूब डराता वन में,
फिरता आप निडर हो मन में,
एक रोज जो जी में आई,
लगा गरजने धूम मचाई!
सबके आगे ज्यों ही बोला,
भेद गधेपन का सब खोला!
फिर तो झट सबने आ पकड़ा,
खूब मार छीना वह चमड़ा!
देता गधा न धोखा भाई,
तो उसकी होती न ठुकाई!

छड़ी हमारी : कामता प्रसाद ‘गुरु’

यह सुदर छड़ी हमारी,
है हमें बहुत ही प्यारी।
यह खेल समय हर्षाती,
मन में है साहस लाती,
तन में अति जोर जगाती,
उपयोगी है यह भारी।
हम घोड़ी इसे बनाएँ,
कम घेरे में दौड़ाएँ,
कुछ ऐब न इसमें पाएँ
है इसकी तेज सवारी।
यह जीन लगाम न चाहे,
कुछ काम न दाने का है,
गति में यह तेज हवा है,
यह घोड़ी जग से न्यारी।
यह टेक छलाँग लगाएँ,
उँगली पर इसे नचाएँ,
हम इससे चक्कर खाएँ,
हम हल्के हैं यह भारी।
हम केवट हैं बन जाते,
इसकी पतवार बनाते,
नैया को पार लगाते,
लेते हैं कर सरकारी।
इसको बंदूक बनाकर,
हम रख लेते कधे पर,
फिर छोड़ इसे गोली भर,
है कितनी भरकम भारी।
अधे को बाट बताए,
लगड़े का पैर बढ़ाए,
बूढ़े का भार उठाए,
वह छड़ी परम उपकारी।
लकड़ी यह बन से आई,
इसमें है भरी भलाई,
है इसकी सत्य बड़ाई,
इससे हमने यह धारी।

हाऊ और बिलाऊ : प. सुदर्शनाचार्य

किसी गाँव में थे दो भाई–
हाऊ और बिलाऊ,
दोनों में था बडा़ बिलाऊ
छोटा भाई हाऊ,
था धनवान बिलाऊ पर था
वह स्वभाव का खोटा,
था गरीब, पर चतुर बहुत था
हाऊ भाई छोटा।
गाय-बैल थे बहुत
बिलाऊ के घर रुपया-पैसा,
पर गरीब हाऊ के केवल
था एक बूढ़ा भैंसा।

बंदर सभा : राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन

हियॉं की बातें हियनै रह गईं अब आगे के सुनौ हवाल,
गढ़ बंदर के देश बीच माँ पड़ा रहा एक खेत विशाल!
सौ जोजन लबा अरु चौड़ा अरबन बानर जाय समाय,
तामें बानर भये इकट्ठा जौन बचे वे आवैं धाय!
जब सगिरा मैदनवा भरिगा पूछें टोपी लगीं दिखाय,
सबके सब कुरसिन से उछले हाथ-पाँव से ताल बजाय!
इतने माँ मल्लू-सा आए, बंदरी और मुसाहिब साथ,
बंदरी बड़ी चटक-चमकीली थामे मल्लू-सा को हाथ!
ओढ़े गउन लगाए टोपी, हीरे जड़े पांत के पांत,
मटकत आवत भाव दिखावत, आखिर मेहरारू की जात!

(नीरजा स्‍मृति‍ बाल साहि‍त्‍य न्‍यास, सहारनपुर से प्रकाशि‍त और बाल साहि‍त्‍यकार कृष्‍ण शलभ द्वारा संपादि‍त पुस्‍तक बचपन एक समंदर से साभार)

कोई सोचे कि साहित्य खत्म हो जाएगा तो बेवकूफी है : रामवि‍लास शर्मा

प्रख्यात आलोचक डा. रामविलास शर्मा को 1991 में व्‍यास सम्‍मान प्रदान कि‍या था। इस अवसर पर कथाकार प्रकाश मनु ने उनसे अंतरंग बातचीत की थी-

डॉ. रामविलास शर्मा (1912-2000) हिंदी आलोचना के शीर्षपुरुष थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की परंपरा को आगे बढ़ाने और उसे सामाजिक विकास की चेतना और पक्षधरता से जोडऩे वालों में उनका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। उनका जीवन एक आलोचक की निरंतर विकास और संघर्ष-यात्रा का पर्याय कहा जा सकता है और एक कडिय़ल आलोचक और चिंतक का आदर्श उनमें देखा जा सकता है। निराला पर उनका काम किसी रचनाकार को संपूर्णता से थाहने के लिहाज से आज भी हमें उतना ही बड़ा, उतना ही चुनौतीभरा लगता है—करीब-करीब अतुलनीय! यह रामविलास जी के काम करने के ढंग और प्रकृति को बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है। निराला की तरह उन्हें भी एक साथ कई मोरचों पर लडऩा पड़ा। साथ ही परंपरा की पहचान के लिए विचार और भाषा की जड़ों तक जाने का गंभीर काम उन्होंने किया। और भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान का तो अभी तक मूल्यांकन होना बाकी है। उन्होंने एक साथ दस आलोचकों के बराबर काम कर दिखाया और बड़े ही चुपचाप, इसलिए कि उनके यहाँ दिखावा या ‘पोस्चर’ सबसे कम है—और पश्‍चि‍म से चार अक्षर उधार लेकर उछलने वाली कलाबाजी तो बिलकुल नहीं है। उनके आग्रह कभी-कभी दुराग्रह भले ही लगते रहे हों, पर वे उन आलोचकों की तरह नहीं थे जो सुबह कुछ कहते हैं, शाम को कुछ और! आलोचना में इस तरह की हलकी नेतागिरी की जगह रामविलास जी ने अलग रहकर चुपचाप ठोस काम करना बेहतर समझा और उम्र के आखिरी चरण में भी किसी जवान आदमी के जोश के साथ अपने काम में जुटे रहे।

उन्हें व्यास सम्मान दिए जाने के अवसर पर उनके जीवन और कामों को लेकर लंबी बातचीत करने का मन था। मैं उनसे मिलने गया, तो वे अपनी छड़ी लिए घूमने जाने के लिए करीब-करीब तैयार थे। मैंने साथ चलने की इच्छा प्रकट की, तो वे खुशी से राजी हो गए। पूरे रास्ते वह प्रफुल्ल उत्साह के साथ बतियाते, तेज-तेज चलते रहे (वैसे भी पुराने दिनों और मित्रों की याद उनके चेहरे पर जैसी मुलायमियत भरी मुसकराहट ले आती है, उसे देख पाना खुद में एक अनुभव है।) और लौटे तो फिर वैसे ही बातचीत के लिए तैयार! एक आलोचक के सुदीर्घ जीवन के अनुभवों और मुश्किलों से शुरू हुई यह बातचीत करीब-करीब बहस की शक्ल लेती हुई प्रगतिशील आंदोलन के उतार-चढ़ाव, नई कविता के आत्मसंघर्ष, हिंदी-उर्दू के झगड़े और भाषा की समस्याओं तक को अपनी गिरफ्त में लेती है और रामविलास जी के व्यक्‍ति‍गत जीवन के संवेदनों को बार-बार छू जाती है। बीच में दो-एक बार वह उत्तेजित भी हुए, पर ज्यादातर उनकी मुद्रा ‘बड़े भाई’ की तरी शांत व्याख्याकार की रही। बीच-बीच में अतीत में लौटने का सुख उनकी आँखों में चमक भर जाता।

करीब ढाई घंटे बाद जब मैं उठा, तो चेहरे पर उतर आई हलकी थकान के बावजूद उनका उत्साह चकित कर देने वाला था! अलबत्ता बीच में चाय पीते समय मैंने देखा, प्याला उठाते समय उनके हाथ काँपते हैं। और एकाएक कडिय़ल आलोचक के रूप में उनकी लंबी संघर्ष-यात्रा मेरी आँखों के आगे घूम गई।

यहाँ अनेक मोड़ों और पड़ावों से गुजरी इस लंबी, विचारोत्तेजक बातचीत के कुछ अंश दिए जा रहे हैं-

डॉक्टर साहब, एक लेखकखासकर आलोचक के रूप में लंबी यात्रा तय की है आपने। तो क्या आप बताएँगे कि एक आलोचक के रूप में आपकी सबसे बड़ी मुश्किल क्या हैऔर सबसे बड़ी तकलीफ क्या है?

(हँसते हुए) भई, मुझे तो आलोचना में मजा आता है। अलबत्ता तकलीफ दूसरों को हो सकती है। बेहतर होता, अगर आप पूछते कि मजा क्या आता है आलोचना में…?

ठीक है, यही बताइए…!

आलोचना में जो सबसे बड़ा काम हम करते हैं, वह है किसी साहित्यिक कृति या अनेक साहित्यिक कृतियों और प्रवृत्तियों के आपसी संबंधों को पहचानना। कभी-कभी यह एक लेखक और उसकी युग के दूसरे लेखकों के बीच होता है और कभी अनेक युगों के लेखकों के बीच। अब उदाहरण दूँ आपको! तुलसी और निराला तो एक युग के नहीं हैं, लेकिन तुलसी और निराला में जब मैं साम्य देख लेता हूँ तो मुझे खूब मजा आता है। इसी तरह महावीरप्रसाद द्विवेदी और निराला को लोक एक-दूसरे का विरोधी मानते हैं, पर मैंने खोज की तो पता चला कि ऐसा नहीं है। निराला तो महावीरप्रसाद द्विवेदी की परंपरा का ही विकास कर रहे हैं, उनके सच्चे उत्तराधिकारी हैं…

लेकिन कहा तो यह जाता है कि महावीरप्रसाद द्विवेदी ने जूही की कली सरस्वती के मंदिर से लौटा दी थी…

(दृढ़ता के साथ) नहीं, यह ठीक नहीं है…!

तो क्या यह बात गलत प्रचारित है कि द्विवेदी जी मुक्त छंद से चिढ़ते थे, इसलिए जूही की कली उन्होंने लौटा दी थी…?

बिलकुल। इसलिए कि अगर ऐसा होता तो निराला ‘अनामिका’ में महावीरप्रसाद द्विवेदी के लिए ऐसे सम्मानसूचक शब्द न लिखते! और फिर द्विवेदी जी ने निराला की मुक्त छंद में लिखी कविताओं की प्रशंसा की थी…

और डॉक्टर साहब, एक आलोचक के रूप में आपकी सबसे बड़ी मुश्किल क्या है?

सारी सामग्री की समेटकर, उसे व्यवस्थित करके, विश्‍लेषि‍त करके सही निष्कर्ष तक ले जाना! इसमें काफी समय और भारी परिश्रम लगता है।

आपकी आलोचना-पद्धति पर आरोप भी लगते रहे कि उसमें लचीलापन कम है, कट्टरता है। कुछ न उसे कठमुल्लापन कहा! आपने खुद भी शायद कहीं लिखा है कि आप इस मारधाड़ वाली आलोचना से ऊब गए हैं और अब कुछ और करना चाहते हैं।

मारधाड़ वाली आलोचना मैंने नहीं कहा, मेरे मित्र अमृतलाल नागर ने एक दफा कहा था। मुझसे छोटे थे, पर अकसर बड़ों जैसी बात कहते थे, बेबाक राय देते थे।

उन दिनों मैं प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा हुआ था। तो प्रगतिशील साहित्य पर जो आक्रमण होते, उनका मैं जवाब दिया करता था। वैसे भी अगर कोई रचना मुझे लगता कि सामाजिक विकास की चेतना में रुकावट खड़ी करने वाली है, तो मैं उस पर जमकर प्रहार करता! उसे देखकर उन्हीं दिनों नागर जी ने लिखा था, ”क्या हर कुत्ता जो तुम्हारे घर आकर भौंकता है, उसे देखकर तुम लाठी लेकर मारने दौड़ोगे? तब तो तुम्हारी बहुत सी ताकत इसी में जाया हो जाएगी। कोई ठोस काम क्यों नहीं करते?’’ तो मैंने फिर इस तरह की चीजें छोड़ दीं सन् 52 में। ऐसा लेखन सन् 43 से 52 तक ही ज्यादा मिलेगा, जब मैं प्रगतिशील लेखक संघ का नेता था। उसके बाद यह कम, बहुत कम हो गया। ऐसा नहीं कि मैंने आरोपों के जवाब नहीं दिए। जहाँ बहुत जरूरी लगा, वहाँ दिए भी। जैने ‘नई कविता और अस्तित्ववाद’ में कहीं-कहीं बहुत सख्ती से नामवर सिंह की खबर ली है। लेकिन अब यह नहीं है कि मैं हर किसी के बारे में लिखूँ- या यही देखता रहूँ कि कौन मेरे खिलाफ लिख रहा है…

तो आप मानते हैं कि एक दौर था, जब आपकी आलोचना में कट्टरता ज्यादा थी…?

ज्यादा थी, लेकिन वह समय की जरूरत भी थी। वैसे लोग भूल जाते हैं कि मैंने मारा है तो मार खाई भी खूब है। अब इस बात का क्या किया जाए कि मेरा लिखा तो लोगों को याद रहता है, जबकि दूसरों का लिखा वे भूल जाते हैं! (हँसते हैं)

आपको शायद याद नहीं, रांगेय राघव ने मेरी तीखी आलोचना की थी, यशपाल ने, पंत जी ने भी! मैंने सन् 48 में लिखा था पंत जी पर, जब वह ‘ग्राम्य’ की जमीन को छोड़कर स्वर्णशिखरों पर चढ़ाई करने लगे थे…

किस पत्र में?  ‘हंस में क्या…?

जी हाँ, ‘हंस’ में। वही हमारा मुखपत्र था। और फिर पंत जी ने भी उसका जवाब दिया था। एक बार मिले तो उन्होंने खुद बताया, ”रामविलास जी, मैंने आपकी बातों का जवाब दिया है अपनी पुस्तक की भूमिका में।’’

कई बार ऐसा नहीं लगता कि ऐसी आलोचना व्यक्तिगत उठापटक में खर्च हो जाती है और साहित्य या साहित्यिक चेतना के विकास में इससे कोई मदद नहीं मिलती?

देखिए, कोई रचना मेरे सामने हो तो सबसे पहले मैं यह देखूँगा कि उसके पीछे लेखक की दृष्टि क्या है। वह सामाजिक विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है या उसमें रोड़े खड़े करती है। इस लिहाज से उपयोगी हुई तो मैं उसकी विशेषताएँ बताऊँगा और अगर समाज को अस्वस्थ करने वाली चीज हुई तो मैं पूरे जोर से उस पर आक्रमण करूँगा। और उसमें दो-एक खासियतें भी हों तो उनकी चर्चा की मुझे जरूरत नहीं लगती। जैसे अगर मान लीजिए, आज कोई नायिका-भेद की कविता लिखे और उसमें सुंदर-सुंदर शब्द, कल्पनाएँ ले आए तो आज जमाना तो है नहीं नायिका-भेद का, इसलिए उसमें कैसी कलात्मक खासियतें हैं, यह चर्चा करने की मैं जरूरत नहीं समझता।

नहीं, मैं एक और बात कह रहा था। जैसे निराला की आप चर्चा करते हैं निराला का साहित्य साधना में तो बड़ी सहानुभूति से उनकी तकलीफों और संघर्षों को देखते हैं और यह भी कि उनके साहित्य में ये चीजें कैसे आती हैं, लेकिन मुक्तिबोध को देखते हैं तो यह सहानुभूति गायब हो जाती है। आप उनके संघर्षों को भूल जाते हैं और कमजोरियों को फैला-फैलाकर दिखाने लगते हैं।

देखिए, मुक्तिबोध शुरू में ऐसे नहीं थे, बाद में चलकर हुए। सन् 46 के आसपास! और सिर्फ वही नहीं, पूरा का पूरा दृश्य ही बदल रहा था उन दिनों। वे तमाम लोग जो घोषित मार्क्‍सवादी थे, वे अब टूटने, झुकने लगे थे। सन् 46 के आसपास एक बड़ा बदलाव आपको दिखाई देगा। उसमें अज्ञेय ही नहीं, भारतभूषण अग्रवाल, नेमिचंद जैन, मुक्तिबोध, दिनकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन सब बदले नजर आएँगे। यह मोटे तौर से अमरीकी प्रभाव था जो अस्तित्ववाद की शक्ल में समाने आया था। अस्तित्ववाद को अमरीका हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा था हमारे मनोबल को तोडऩे के लिए। इसी समय भारतभूषण अग्रवाल और नेमिचंद्र जैन जैसे घोषित मार्क्‍सवादी रातोंरात बदल गए। बालकृष्ण शर्मा नवीन संघर्ष पथ छोड़कर ‘क्वासि’ लिखने लग गए। पूरे देश में कम्युनिस्टों की धरपकड़ हो रही थी और पंत ‘स्वर्ण किरण’ और ‘स्वर्णधूलि’ लिख रहे थे।

पर यह जरूरी तो नहीं कि अस्तित्ववाद अमरीकी हथियार ही हो! वह एक विचारधारा है और किसी भी विचारधारा की सीमाएँ हो सकती हैं, लेकिन यह आप कैसे कहते हैं कि…?

भई, देखना तो यह होगा कि किस चीज पर कौन जोर दे रहा है और किस मकसद से? अमरीका इनका पूरा समर्थन कर रहा था और भारत में मार्क्‍सवाद की जगह अस्तित्ववाद नजर आए, इसमें उसकी पूरी दिलचस्पी थी। और अज्ञेय पूरी तरह अमेरिकी गिरफ्त में थे ही। उनके आसपास धर्मवीर भारती, सर्वेश्‍वरदयाल सक्सेना, लक्ष्मीकांत वर्मा, ये सारे जो लोहियावादी घिर आए थे, इन्हीं को लेकर उन्होंने प्रयोगवाद चलाया और आगे चलकर नई कविता भी! दोनों में बुनियादी रूप में ज्यादा फर्क नहीं था और अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक सब उसमें शामिल थे।

लेकिन आप अज्ञेय और मुक्तिबोध को एक साथ कैसे रख सकते हैं? अज्ञेय ने इतने समझौते किए और मुक्तिबोध जीवन भर अपने आप से झगड़ते रहे—’ब्रह्मराक्षस’ जैसा आत्मसंघर्ष और कहाँ है?

लेकिन एक बात में दोनों समान हैं—विघटन और अवसाद।

यों देखें डॉ. साहब, तो अवसाद तो छायावाद में भी है, बल्कि यों कहें कि विषाद और नैराश्य उसकी मूल वृत्ति है।

विषाद है, लेकिन उससे उबरकर उल्लास की ओर जाने वाला भाव भी है।

तो क्या छायावाद में कम पलायन है। वे तो एक दूसरी दुनिया ही बसा लेते हैं जिसका कहीं अस्तित्व नहीं है, भागकर वहाँ छिप जाते हैं?

(खीजकर) भई, पीड़ा है, लेकिन संघर्ष भी तो साथ ही चलता है। निराला के यहाँ है यह संघर्ष।

निराला को छोड़ दें डॉक्टर साहब, क्योंकि छायावाद में उनकी स्थिति ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत’ है। बाकी महादेवी, प्रसाद, पंत के यहाँ कहाँ है संघर्ष?

भई, आपको पता नहीं, प्रसाद ने केवल रोमानी कविताएँ ही नहीं लिखीं, कुछ आशा जगाने वाली कविताएँ भी हैं। उनके नाटकों में संघर्ष है।

लेकिन डॉक्टर साहब, कविता की ही बात करें तो?

कुछ कविताएँ उनकी हैं, महादेवी के यहाँ भी मिल जाएगा ‘जाग तुझको दूर जाना…’

एक बात बताएँ डॉक्टर साहब, इनमें वह समय कहाँ है जिसमें ये लिखी जा रही थींगुलामी की पीड़ा, आम आदमी की यातनाएँ, विवशता, दारिद्र्य, यह सब कहाँ है महादेवी के गीतों में! वे तो सौ साल पहले लिखी जाती या बाद में, ऐसी ही होतीं…!

तकलीफें हैं, लेकिन इस बारे में मेरी और आपकी दृष्टि में फर्क है शायद…

और जो छायावाद का पलायन है, ‘ले चल मुझे भुलावा देकर…’ यह शराब पीकर गम भुलाना नहीं है क्या?

यह फिर भी बेहतर है क्योंकि इसमें पीड़ा से दूर जाने की इच्छा तो है, पीड़ा को मूल्य तो नहीं बना दिया गया नई कविता की तरह?

यानी पीड़ा का चित्रण और पीड़ा को मूल्य बना देना, इसमें बारीक सा अंतर है। वह समझाएँगे आप?

बारीक सा नहीं, काफी बड़ा अंतर है।

तो वह पता कैसे चले? कसौटी क्या होगी उसकी?

बताया न, कोई रचना कुल मिलाकर सामाजिक चेतना को आगे बढ़ाती है या नहीं, इस आधार पर हम निर्णय करेंगे।

डॉक्टर साहब, आलोचना में क्यों कभी-कभी ऐसा भी होता है कि व्यक्तिगत संबंध रचना के मूल्यांकन में प्रभाव डालें। मसलन निराला को आप निकट से जानते हैं तो आपने उन पर जो लिखा, उसमें उनके व्यक्तित्व की एक-एक रेखा बोलती है, लेकिन उन्हीं स्थितियों से गुजरे और भी लोग थे और भी बड़े लेखक, वे आपको नजर नहीं आए?

अगर आपका यह कहना है कि मैं व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर निर्णय करता हूँ तो यह सही नहीं है। मैं इसका खंडन करता हूँ। निराला जी को मैं जानता था, इसीलिए उन पर ऐसा लिखा हो, यह जरूरी नहीं। न जानता होता तो भी यही लिखता। इसी तरह तुलसीदास से तो मैं कभी नहीं मिला, लेकिन उन्हें मैं बड़ा कवि मानता हूँ। निराला से भी बड़ा। रांगेय राघव, यशपाल मेरे निकट थे, लेकिन उन पर मैंने बहुत तीखी आलोचनाएँ लिखीं। यशपाल पर लिखा लेख तो मैं उन्हें दिखाने ले गया था। उन्हें सुनाया भी और उन्हें खूब बुरा लगा, लेकिन मैंने वह कभी छपने नहीं दिया। वह आज तक नहीं छपा। हाँ, मैंने उन्हें बता दिया कि तुम्हारे बारे में मेरी राय क्या है। तो मैं इस बात का खंडन करता हूँ कि व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर मैं रचना को अच्छी-बुरी ठहाराता हूँ।

नहीं, मैं सायास प्रभाव की बात नहीं कर रहा, लेकिन किसी से किसी कारण सहानुभूति है तो उसका गुप्त प्रभाव पड़ता होगा। जैसे निराला की हीनताओं और विभाजित व्यक्तित्व की आप सहानुभूति से परख करते हैं और कविता में चमरौधा जूता आपको दुस्साहसिक प्रयोग लगता है, लेकिन मुक्तिबोध की परेशानियाँ, यहाँ तक कि बीड़ी की तलब पर आप व्यंग्य करते हैं। ऐसे ही साही हैं। आप जैसा साबित करना है, वैसे कुटेशंस ढूँढ़ लेते हैं। तो यह कैसे होता है कि…?

(थोड़ा उत्तेजित होकर…) इस पर बहस करें तो मेरा ख्याल है सारा समय इसी में चला जाएगा। बेहतर है कि हम लोग कविता के अलावा किसी और विषय पर आएँ।

डॉक्टर साहब, हमारे विश्वविद्यालय हिंदी साहित्य में क्या कुछ बना या बिगाड़ रहे हैं, इस पर कुछ कहेंगे?

देखिए, हमारे समय में तो विश्वविद्यालयों में रामचंद्र शुक्ल, श्यामसुंदर दास जैसे लोग होते थे जो अपने-अपने क्षेत्र के विद्वान थे। आजकल तो पता नहीं। मैं लगभग बीस वर्षों से साहित्य से कटा हुआ हूँ। ज्यादा पढ़ नहीं पा रहा।

विश्वविद्यालयों में जो हिंदी पढ़ाई जाती है, वह इतनी कृत्रिम और आडंबर भरी है, बोलचाल की भाषा से इतनी दूर है कि ताज्जुब होता है कि अगर यह हिंदी है तो वह क्या है! यह स्थिति क्या परेशान करने वाली नहीं है?

अगर ऐसा है, तब तो ठीक नहीं है। इतना फर्क बोलने और लिखने की भाषा में होना नहीं चाहिए। मराठी में बंगला में ऐसा फर्क आपको नहीं मिलेगा।

अपने देश में हिंदी और उर्दू का झगड़ा खामखा बना और बढ़ा दिया गया है और कुछ लोग इसे लगातार उकसाते हैं, जबकि आम आदमी के सामने यह मुश्किल नहीं है। वह जो भाषा बोलता है, उसमें हिंदी, उर्दू दोनों सहज ही मिल जाती हैं। तो इस झगड़े का क्या हो जो हम पर खामखा थोप दिया गया है?

मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। हिंदी-उर्दू में तो उतना फासला भी नहीं है जितना हिंदी और उसकी बोलियों में है। और विरोध तो कतई नहीं है! दोनों ने क्रिया-पद मिलते हैं जबकि हिंदी और भोजपुरी या हिंदी और मैथिली के क्रिया-पद एक नहीं हैं। मुझे लगता है, उर्दू का जो भी साहित्य है, वह सारा देवनागरी लिपि में आए, यह जरूरी है। और फिर आप जैसे लोगों को इस क्षेत्र में खूब काम करना चाहिए। गाँव-गाँव कस्बे-कस्बे में जाकर लोगों को यह बात बतानी चाहिए कि सच्चाई क्या है।

लेकिन डॉक्टर साहब, जब तक राजनीति इस मामले में जहर घोलती रहेगी, तब तक ये रचनात्मक काम कुछ सफल होंगे? यकीन है आपको?

तो राजनीतिक प्रोपगैंडा का राजनीतिक तौर से ही मुकाबला किया जाना चाहिए।

राजनीतिक यानी…समझाएँगे!

देखिए, प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ मुस्लिम कवियों की बड़ी अटूट परपंरा है। लोगों को उसके बारे में बताया ही नहीं जाता। अगर ये सारी बातें सामने आएँ तो लोगों का नजरिया बदल सकता है। नवयुवकों को इस काम के लिए दूर-दराज के इलाकों में जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह इस क्षेत्र में काम करने वालों को वजीफे दे। इससे बेरोजगारी मिटेगी और देश के निर्माण में कुछ ठोस काम होगा जिसका असर अगले बीस वर्षों में दिखाई देगा।

लेकिन डॉक्टर साहब, पूरी दुनिया में जो उथल-पुथल पिछले कुछ वषों में हुई है, उसके बारे में क्या सोचते हैं आप? लगता नहीं कि सोवियत संघ के पतन से पूरी दुनिया में समाजवादी आंदोलन को धक्का पहुँचा है?

समाजवादी देश ही नहीं, जो पूंजीवादी देश अपना स्वतंत्र विकास करना चाहते हैं, उन्हें भी धक्का पहुँचा है। यह अमरीकी साम्राज्यवाद की बहुत बड़ी विजय है।…अच्छा, मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ। बगैर विदेशी कर्ज के आप काम चला सकते हैं कि नहीं चला सकते? मेरा दावा है कि चला सकते हैं। वही हालत सोवियत संघ में थी। जब उसने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ जीतीं, तब तो कर्ज नहीं लिया। फिर अब कर्ज लेने की क्या जरूरत थी?… फिर जो कर्ज देगा, वह अपनी शर्तें भी रखेगा और मनवाएगा। आपकी स्वतंत्रता फिर कहाँ रही? सिर्फ पिछलग्गू बन सकते हैं आप!

हमारे देश में आम आदमी के लिए जीने के रास्ते लगातार तंग होते जा रहे हैं। विषमता बढ़ी है और लोगों का यह विश्वास बुरी तरह हिला है कि सच्चाई और ईमानदारी से भी कुछ पाया जा सकता है। तो अब रास्ता क्या हो?

यही कि लोगों को संगठित होकर अपनी आवाज उठानी होगी। उसमें पढ़े-लिखे, अनपढ़, बुद्धिजीवी, किसान, मजदूर सब शामिल हों। और केवल भारत में ही क्यों? सभी देश मिलकर हल खोजें। बल्कि अब तो मुझे लगता है कि पाकिस्तान और पूरे एशिया भर के लोग भी इसी तरह इकट्ठे हो सकते हैं और दुनिया का नक्शा बदलते देर नहीं लगेगी…

आपके खयाल से अकादमियाँ और साहित्यिक संस्थाएँ कुछ भला कर रही हैं साहित्य का…या कर सकती हैं?

ज्यादातर तो अकादमियाँ हों या यूनिवर्सिटियाँ, सभी रिपीट कर रही हैं कुछ कामों को…दोहराव बहुत ज्यादा है, जैसे-तैसे लीक पीट दी जती है। उदाहरण के लिए शोध को लीजिए, उन्हीं घिसे-पिटे विषयों पर घिसे-पिटे ढंग से होते हैं। कोई समझ में नहीं आता कि अकादमियाँ कर क्या रही हैं? नई से नई योजनाएँ बनाकर काम हो, तो बहुत सारा काम हो सकता है। अकादमियाँ मिलकर तय करें कि भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए वे क्या कर सकती हैं। एक अकादमी तमिल सिखाने की व्यवस्था करे, दूसरी तेलुगु, मलयालम। इससे आप देखेंगे कि एक वातावरण बनेगा, दूरियाँ कम होंगी और एक मजबूत देश की छवि बनेगी।…

साहित्यिक पुरस्कारों के पक्ष और विपक्ष में काफी कहा जाता है। आपके खयाल से सही भूमिका क्या हो सकती है पुरस्कारों की?

पुरस्कार लेखक की साहित्य-साधना का सम्मान करने के लिए हो, इसमें तो कोई हर्ज नहीं। लेकिन अकसर होता यह है कि पुरस्कार बड़ा होता है उसके साथ जुड़ी हुई बड़ी राशि से। जितनी बड़ी राशि, उतना बड़ा पुरस्कार…! मैं कई बार कल्पना करता हूँ कि क्या दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक, लेखक मिलकर कोई ऐसी बॉडी नहीं बना सकते जो अच्छे वैज्ञानिकों, लेखकों को सिर्फ सर्टिफिकेट दे। क्या यह सर्टिफिकेट बड़े से बड़े पुरस्कार से कम होगा? और कुछ नहीं तो कम से कम हम भारत में तो यह कर सकते हैं।…वैसे में चाहता हूँ, कुछ समय के लिए अकादमियाँ, साहित्यिक संस्थाएँ, के.के. बिड़ला फाउंडेशन भी पुरस्कार देना बंद कर दे और जो पुरस्कार की राशि हो, वह हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में लगाई जाए। साक्षर लोग ज्यादा होंगे तो साहित्य के पाठकों की भी कमी नहीं रहेगी।

प्रगतिशील आंदोलन की विफलता के लिए आप किन कारणों को जिम्मेदार समझते हैं?

नहीं, विफल कहाँ? नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल ये सब लिख तो रहे हैं।

नहीं, मैं इधर की पीढ़ी की बात कर रहा हूँ। नागार्जुन, केदार के बाद वाली…?

वह मैं नहीं बता सकता, क्योंकि मैं आजकल पढ़ नहीं पा रहा हूँ। साहित्य से कुछ दूर चला आया हूँ। मेरी कुछ योजनाएँ हैं, उन्हीं पर काम में जुटा हूँ।

अच्छा, यह जो समीक्षकों का विचार है कि प्रगतिशील आंदोलन तो आगे नहीं चला, लेकिन नई कविता की एक धारा ने ही प्रगतिशील कविता की भूमिका निभाई, इस बारे में आपका क्या कहना है?

नहीं, यह ठीक नहीं। नई कविता पूरी तरह प्रगतिवाद के विरोध में खड़ी थी।

बहुत से प्रगतिशील लेखक इसलिए भी प्रगतिवादी आंदोलन से कट गए कि उसमें सपाटता बहुत आ गई थी और अंतर्विरोधों पर खुलकर बहस नहीं होती थी। क्या आपको नहीं लगता ऐसा?

आप मुझे बताइए, किस दौर में साहित्य ऐसा लिख गया जिसमें सपाटता बिलकुल न हो। अगर कमियाँ हैं, अंतर्विरोध है तो उनको दूर कीजिए। यह तो नहीं कि आप खुद दूर आ गए। मैं जब प्रगतिशील लेखक संघ में सक्रिय था तो ऐसे बहुत से मामलों पर मैंने बहसें चलाईं। भाषा को लेकर लंबी बहस चली। मैं कम्युनिस्ट पार्टी की भाषा-नीति से असहमत था और जो कुछ लिखता था वह कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र में छपा करता था। आप इससे अंदाजा लगाइए हमारी स्वतंद्धता का।

एक और बात! यह जो प्रतिशीलता का एक संकुचित अर्थ बन गया है कि उसमें मजदूर-किसान और क्रांति के गाने गाए जाएँगे, इससे भी लोग बिदके होंगे! क्योंकि लोग वास्तविक जीवन में तो इनके निकट थे नहीं, तो बड़ी बनावटी रचनाएँ आतीं थी। साठोत्तरी लघु पत्रिकाओं का मुझे पता है। उनमें बहुतेरी लाल क्रांति का परचम फहराती थीं। वे कविता-कहानियाँ कहाँ गईं, आज पता नहीं चलता?

प्रगतिशील की यह परिभाषा गलत है और ऐसी बातें विरोधियों ने हमें बदनाम करने के लिए उड़ाई हैं। हाँ, इतना जरूर है कि हमें आम जनता के निकट आना होगा। उनकी मुश्किलें समझकर उनसे जुड़कर लिखें।

केदारनाथ अग्रवाल ने अपनी प्रगतिशीलता को पार्टीवाद से अलग घोषित कियाकि यानी पार्टीवाद या पार्टी दखल से वे भी परेशान हैं?

लेकिन पार्टी तो कभी नहीं कहती कि यह लिखो वह लिखो, कहेगा तो कोई लेखक ही न?

तो भी एक तरह का सेंसरशिप तो लगता है?

देखिए, पार्टी क्या है—एक तरह की विचारधारा है और विचाराधारा का प्रभाव तो होगा ही। जैसे गाँधी जी की विचारधारा का प्रभाव था, वैसे ही कम्युनिस्ट विचारधारा का। लेकिन विचारधारा से तो कोई लेखक मैच्योर ही बनता है।

लेकिन यह सेंसरशिप स्वत:स्फूर्त रचना में बाधक भी तो बनती है?

मेरा मानना है कि कोई रचना पूरी तरह स्वत:स्‍फूर्त नहीं होती। लेकिन इतनी तो जरूर होती है कि अगर हम यह सोचकर बैठ जाएँ कि अच्छी रचना ही लिखनी है तो वह नहीं लिखी जाती और कभी वह ऐसे ही बन जाती है।

तब भी लेखक कुछ शब्दों को चुनता है, कुछ को रिजेक्ट करता है—यानी वह अपना आलोचक खुद होता है। इस रूप में रचना स्वत:स्फूर्त कभी नहीं होती।

अच्छाअब एक अलग तरह का सवाल! जो आलोचना आप लिखते हैं या आपके लिखे पर जो आलोचना होती है, उससे कई बार क्षोभ और गुस्सा भी तो आता होगा। उससे आपके व्यक्तिगत या पारिवारिक जीवन पर भी कोई प्रभाव पड़ता है?

नहीं, मुझ पर तो कभी नहीं। जिन पर मैंने लिखा, उनका कह नहीं सकता। (हँसी)

कई बार आलोचना सिर्फ दूसरों की कमजोरियाँ तलाशने का धँधा बन जाती है। इसे एकांगी आलोचना नहीं कहेंगे?

कवि‍ता के नए प्रतिमान पर लिखे गए लेखों में आपने नामवर के अंतर्विरोधों को खोला है, लेकिन उनकी तारीफ में एक शब्द भी नहीं है?

‘कविता के नए प्रतिमान’ में नामवर सिह कुल मिलाकर प्रगतिवाद के विरोध में खड़े हैं, इसीलिए इतनी सख्त आलोचना की जरूरत पड़ी।

इस तरह की आलोचना से आपने काफी दुश्मन भी बना लिए होंगे?

नहीं, मेरे मन में तो ऐसी कोई बात नहीं है। हाँ, लोगों ने वैसा किया हो, तो कह नहीं सकता। वैसे तो मेरा खयाल है ऐसा नहीं हुआ। नामवर सिंह पर मैंने सबसे सख्त लिखा है, पर हम लोग खूब अच्छे मित्र हैं और सम्मान करते हैं एक-दूसरे का। रांगेय राघव को मुझ पर कुछ लिखना होता था तो किताबें मुझसे ही माँगकर ले जाते थे और आपको शायद मालूम हो, मेरी बहुत कटु आलोचना की है उन्होंने। भगवतीचरण वर्मा के ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ पर मैंने बहुत तीखा लेख लिखा था, हालाँकि हम मित्र थे, बाद में भी रहे।…उस उपन्यास के जवाब में रांगेय राघव ने ‘सीधा सादा रास्ता’ लिखा तो मेरे घर आए। बोले—मैं आपके लेख को भूमिका के रूप में देना चाहता हूँ। मैंने कहा, ठीक है खुशी से छापो।

अपने जीवन-संघर्ष के किसी कमजोर क्षण में मार्क्‍सवाद से क्या कभी मोहभंग नहीं हुआ आपका?

देखिए, मार्क्‍सवाद सिखाता है कि हर चीज पर डाउट करो। तो मैं मार्क्‍सवाद को भी आलोचनात्मक नजरिए से देखता हूँ। मैं यह नहीं मानता कि मार्क्‍स कोई गलती नहीं कर सकता।

इतने लंबे आलोचक जीवन में आपने तमाम लोगों पर तमाम तरह की चीजें लिखीं। क्या आपको कभी कनफेस करने की भी जरूरत पड़ी?

यह तो काल्पनिक प्रश्न हुआ, उदाहरण देकर बताए।

वहीं पंत जी वाला लेख, जिसमें लघु-लघु की गिनती होता है या वे लेख जिन्हें नागर जी ने मारधाड़ वाले लेख कहा ?

सच तो यह है मेरे पास समय नहीं, नहीं तो मैं तो और लिखूँ! पंत जी ने ‘स्वर्ण किरण’, ‘स्वर्णधूलि’ वाले ढोंग का विरोध करना जरूरी था। एक बात बताऊँ आपको, पंत जी आध्यात्मवादी कभी थे ही नहीं। यह अध्यात्म सिर्फ उन्होंने ओढ़ रखा था। निराला जी से प्रतिद्वंद्विता…

आपका मतलब है, पंत जी आतंकित थे निराला जी से?

इनके संबंध बड़े अद्भुत थे। निराला बहुत प्यार करते थे पंत जी से। उन्हें अच्छा कवि भी मानते थे। पंत मन ही मन आतंकित थे निराला जी से। समझते थे कि वह बहुत बड़े कवि हैं, लेकिन यह बात स्वीकार कभी नहीं करते थे।

क्या आपको लगता है, निराला से मिलने के बाद आपमें एक व्यक्तित्वांतर हुआ। यानी उनसे न मिले होते तो ठीक-ठीक ऐसे न होते…?

लेखक तो मैं तब भी होता। एक तो घर का माहौल ऐसा था कि सभी भाई खूब पढ़ते थे, रुचि लेते थे। खुद पिता जी ने अभावों में रहते हुए भी कई भाषाएँ सीखी थीं। हमें भी प्रोत्साहन देते। फिर संयोग से अध्यापक भी अच्छे मिले जो खूब स्नेह करते थे। जब मैं सोलह वर्ष का था, मेरा एक निबंध मेरे अध्यापक ने कक्षा में पढ़कर सुनाया और खूब तारीफ की थी। फिर बी.ए. में पढ़ता था, तब भी ऐसा ही हुआ। तो मुझे लगता था, लेखक तो मैं हो सकता हूँ। निराला जी से भेंट बहुत बाद में हुई, जब मैं इलाहाबाद में एम.ए. का छात्र था…

उसे भेंट की याद है आपको? तब क्या निराला बिलकुल स्वस्थ थे?

हाँ, मैं ‘परिमल’ खरीद रहा था कि कहीं से घूमते-फिरते वह आ गए। मेरे हाथ में ‘परिमल’ देखकर बोले, इसमें कुछ अतुकांत कविताएँ हैं जो आपको शायद ज्यादा पसंदन आएँ। मैंने कहा, वही तो मुझे ज्यादा पसंद हैं। सुनकर निराला को आश्‍चर्य हुआ था। उनकी आँखों में प्रसन्नताभरी चमक मैंने देखी…

तब के निराला तो बिलकुल देवपुरुषों जैसे थे। उस समय निराला अपने चरम थे, कहीं कोई असामान्यता नहीं! कविताएँ सुनाने का खूब शौक था, लेकिन अपनी नहीं, दूसरों की। सैकड़ों कविताएँ उन्हें याद थीं, पार्क में रात देर तक बैठकर सुनाया करते थे। रवींद्रनाथ टैगोर की कितनी ही कविताएँ मैंने शब्दश: उनसे सुनी हैं।

बाद में आप आलोचना से कटकर भाषा विज्ञान की ओर आए। आपको क्या लगता है, कौन से सवाल, कौन सी चुनौतियाँ थीं जो आपको इधर खींच लाईं?

एक तो मैंने जब से होश सँभाला, यही सुनता आया हूँ कि एक थे आर्य, एक थे द्रविड़। आर्य अक्रांता थे, द्रविड़ों को खदेड़ा था। आज भी आर्य भारत अलग है, द्रविड़ भारत अलग। तो मैं सोचा करता था, क्या यह वाकई ऐसा है? क्या आर्य सचमुच बाहर से आए थे? दूसरे, यह कहा जाता था कि हिंदी में तो इतनी बोलियाँ हैं और सब एक-दूसरे से जुदा-जुदा तो हिंदी एक भाषा कैसे रही? देश एक कहाँ है…? मुझे लगा कि इन प्रश्‍नों को सुलझाया जाए। हिंदी बोलने वाले हम इतने सारे लोग हैं। भाषा-संबंधी देन भी हमारी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं, लेकिन कुछ गलतफहमियों के सहारे उन्हें नकारा जाता था और हममें हीनता पैदा की जाती है। मैंने पहले तो यही देखा कि क्या आर्य वाकई बाहर से आए थे? मैंने पाया—और इसे सभी भाषाविज्ञानी मानते हैं, कोई विवाद नहीं इसमें—कि सघोष महाप्राण ध्वनियाँ (जैसे घ, भ इत्यादि) केवल हिंदी, संस्कृत में हैं। तो अगर ये आर्य कहीं बाहर से आए होते तो दूसरी भाषाओं में भी ये ध्वनियाँ होनी चाहिए, लेकिन नहीं मिलीं—संसार की किसी भी और भाषा में नहीं। अब सवाल यह है कि हमारी भाषा में सुरक्षित कैसे रहीं, कहाँ से आईं? तो बहुत सारी बातें जिन्हें भाषाविज्ञानी अब तक रूढि़ की तरह ढोते चले आए थे, मैंने नए सिरे से परखा…और जैसे-जैसे आगे बढ़ा, मुझे मजा भी बहुत आया। जिन दिनों के.एम. मुंशी संस्थान में था, मैंने सोचा अवसर का लाभ उठाया( जाए। उन दिनों भाषा विज्ञान के बारे में जमकर अध्ययन किया।

आपकी किताब घर की बात पढ़कर अच्छा लगा, थोड़ा खेद भी हुआ। भाषा की इतनी बढिय़ा अर्थ-छवियाँ बिखरी पड़ी हैं वहाँ कि लगा, आप बहुत अच्छे उपन्यासकार हो सकते थे। पर आपको भारी भरकम आलोचक ने उसे दबा दिया।

(हँसकर) मैंने बिलकुल शुरू में एक उपन्यास लिखा था, ‘चार दिन’। अब भी उपन्यास लिखने का इरादा खत्म नहीं हुआ। उम्मीद रखिए…

अपने साहित्यिक मित्रों के बारे में कुछ बताइए? सुना है, खूब छेड़छाड़, शरारतें होती थीं नागर जी के साथ?

निराला जी के यहाँ ही भेंट हुई थी नागर जी से। हमसे छोटे थे चार साल, लेकिन बातें बड़ों जैसी समझदारी की करते थे। हम कहते, ”हम बड़े हैं, आप कहा करो, क्या ‘तुम…’, ‘तुम’ करते हो?’’ तो जवाब मिला, ”आप हमसे नहीं बोला जाएगा। नरेंद्र शर्मा को बोल सकते हैं पर तुमसे नहीं!’’ आपको बताया है कि उन्होंने ही मुझे मारधाड़ वाली आलोचना से रोका था। बैसवाड़ा के न होते हुए भी इतनी बढिय़ा बैसवाड़ी वह बोल लेते थे कि ताज्जुब होता था। उनके उपन्यासों में—खासकर संवादों में बैसवाड़ी के कुछ बहुत ही बढिय़ा प्रयोग मिलते हैं। अभी उनकी ग्रंथावली पर लिखने के लिए मैं उनके उपन्यास दुबारा पढ़ रहा था तो उनमें एक-दो जगह ठेठ गाँव के मुहावरे इतने बढिय़ा ढंग से आए हैं कि मैं कुछ देर तक किताब दूर रखकर हँसता ही रहा कि शहर का यह आदमी जान कैसे गया इन्हें?

केदारनाथ अग्रवाल से भी लंबी मित्रता है। हमसे बड़े हैं, मगर चार साल नहीं, एक साल। बहुत लंबा पत्र-व्यवहार है उनसे, अभी पीछे छपा भी है। इनकी कविताएँ बहुत आकर्षित करती हैं मुझे। लेकिन गद्य और भी गजब का है। मुझे लगा, इस गद्य की ताकत लोगों को बतानी चाहिए। लोग अब देख रहे हैं, खुद समझ रहे हैं कि क्या कुछ है इन पत्रों में।

और नागार्जुन?

नागार्जुन से भी मित्रता है, पर उनसे लंबा पत्र-व्यवहार नहीं हुआ।

केदार और नागार्जुन के व्यक्तित्व की जाहिर है, अलग-अलग रेखाएँ आपको खींचती होंगी! क्या फर्क लगा आपको उनमें?

केदार के यहाँ संवेदनाशीलता बहुत है, सौंदर्यानुभूति उनकी बहुत सजग, बहुत तीव्र है, इसलिए उनके प्रकृति चित्रण का जवाब नहीं। ऐसे दृश्यों की सुंदरता देखकर आप मुग्ध हो जाएँगे लेकिन व्यंग्य केदार के यहाँ बहुत नीचे हैं। नागार्जुन के यहाँ व्यंग्य नंबर एक पर हैं, बहुत उम्दा हैं, लेकिन सौंदर्य चित्रण देखें तो तीसरे-चौथे नंबर पर। केदार के मुकाबले बहुत हलके पड़ते हैं।

प्रगतिवाद में केदार जी की चर्चा सबसे कम हुई है। बड़े प्रगतिवादी आलोचक हलके टोन में उनकी चर्चा करके छोड़ देते हैं, ऐसा क्यों?

आप ठीक कह रहे हैं। मैंने तो इस पर बकायदा लिखा है कि केदार जी की उपेक्षा हुई है और यह गलत है।

हिंदी साहित्य का मौजूदा दृश्य कुछ-कुछ निराश पैदा करने वाला नहीं लगता आपको? किताब पाठकों से दूर चली गई। एक तो पाठक कम हैं, फिर किताबें महंगी भी बहुत हैं।

लेकिन आप जरा जाकर पता लगाइए, प्रकाशक तो बढ़े हैं और उनकी हालत देखें तो लेखक तो वहीं का वहीं है और प्रकाशक कहाँ से कहाँ पहुँच गए! किताबें बिकती नहीं, तो कैसे होता ऐसे?

सरकारी खरीद की ओर भागते हैं सभी। किताबें बोरों में बंद हो जाती हैं, पाठकों तक नहीं आतीं…

यह तब भी होता था। प्रकाशक इसी चीज के पीछे भागता था। पाठक को संस्कार देने काकाम उसने नहीं किया और आज भी ऐसा ही है। पर दूसरी भाषाओं में ऐसा नहीं है, बंगला में देखें, मराठों में देखें! कुछ वर्ष पहले अखबारी कागज पर छपा हुआ माइकेल मधुसूदन दत्त का काव्य बहुत सस्ते में खरीदा था मैंने!…उन लोगों की पुस्तकें सजिल्द कम होती हैं। किताब लाइब्रेरी की बजाय पाठकों तक पहुँचे यह ज्यादा है। हमारे यहाँ उलटा है। अमरीकी प्रभाव ज्यादा है। किताब की साज-सज्जा बढिय़ा होगी, लेकिन दाम इतना रखेंगे कि कोई खरीद ही नहीं सकता।

क्या मीडिया का दबाव भी साहित्य की इस दुर्गति के लिए जिम्मेदार हैखासकर टी.वी.?

देखिए, साहित्य का तो एक तरह का नशा है, जिसे एक बार लग गया उसे लग गया। फिर आसानी से छूट नहीं सकता। दूरदर्शन ने आपके पाठक छीने नहीं, वह तो नए दर्शक पैदा कर रहा है। जिसे किताबें पढऩी होंगी, वह किताबें ही पढ़ेगा। मैं खुद बहुत कम देखता हूँ टीवी। इसकी बजाय तो मुझे संगीत सुनना अच्छा लगता है और वह मैं सुनता हूँ ट्रांजिस्टर से।

लेकिन जिस तरह लेखक ललचाते हुए दूरदर्शन की ओर भाग रहे हैं, फिर वहाँ चाहे उनका अपमान हो, कहानियों में दूरदर्शनी सीरियलों जैसा जो कामचलाऊपन आ रहा है और लोगों को लगने लगा है कि दूरदर्शन में तो इतने दर्शक हैं, वे किस स्तर के हैं इससे फर्क नहीं पड़तातो एक क्रेज तो बना ही है कि…

यह सब बहुत थोड़े समय के लिए होता है, चला जाता है। कोई सोचे कि इससे साहित्य खत्म हो जाएगा, तो यह बेवकूफी है!…साहित्य इतनी हलकी चीज नहीं।

आज साहित्य में इतने कटघरे और गुटबंदियाँ हैं कि नया लेखक जिधर भी जाए, अपने सामने काँटेदार बाड़ देखता है। यह हालत कैसे बदले?

नए लेखकों को चाहिए कि वे अलग से या मिलकर इस काँटेदार बाड़ को तोड़ें। आगे बढऩे वालों को कोई रोक सका है भला।

आजकल आप क्या विशेष कर रहे हैं?…किस तरह की योजना?

मैं ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान पर एक तरह का शोध कार्य कर रहा हूँ। एशिया और ऋग्वेद से संबंधित पुस्तक आशा है, जल्दी ही आएगी। ऋग्वेद कई दृष्टियों से मुझे महत्वपूर्ण लगा है, खासकर भाषा-संबंधी अध्ययन और प्रागैतिहासिक काल की संस्कृति, जीवन शैली, शिल्प और विकास की अनेक प्रकार की प्रक्रियाओं की खोज के लिए।

और ज्यादातर समय इसी में जाता होगा?

काफी एकांत है यहाँ…स्थान थोड़ा दूर भी है, इसलिए कभी-कभार ही कोई आता है मिलने। लिखने-पढऩे के लिए काफी समय मिल जाता है।

कहते-कहते मुसकरा देते हैं रामविलास जी। मैं देवेंद्र सत्यार्थी पर लिखी गई किताब ‘तीन पीढिय़ों का सफर’ उन्हें भेंट करता हूँ और बताता हूँ, ”आज ही सत्यार्थी जी मिले थे। कह रहे थे—कोई कितना ही मना करें, पुरस्कार के लिए कहीं एक लालच तो होता ही है मन में। रामविलास जी से मामले में हम सबसे आगे हैं। और उन्होंने बताया कि एक किताब उन्होंने समर्पित की थी आपको, ‘उठाइए लाठी आलोचक जी’ इस ललकार के साथ…’’

रामविलास जी हँस पड़ते हैं, ”और वह किताब आज तक मुझे नहीं मिली। उनसे कहिएगा—मुझे क्यों नहीं भेजी वह किताब?’’

मैं आलोचना के इस शिखर पुरुष को प्रणाम कर लौट पड़ता हूँ।

समर्थों को जीने का सलीका सिखाती निरीहों की दुनिया : रामदेव शुक्ल

वरि‍ष्‍ठ लेखक और एंथ्रोपॉलोजि‍स्‍ट प्रबोध कुमार ने करीब पैंतालीस वर्षों से न लि‍खने के बाद उपन्‍यास लि‍खा- नि‍रीहों की दुनि‍या। बेहतर दुनि‍या की तलाश करने वाले इस उपन्‍यास पर डॉ. रामदेव शुक्‍ल का आलोचनात्‍मक आलेख-

लोकतंत्र अबतक आजमाई गयी सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली है, किन्तु बीसवीं सदी में यह प्रणाली जितनी विकृत हुई है, उसकी कल्पना भी पहले कभी नहीं की गई। लोकतंत्र को भ्रष्ट करने वाले कौन हैं और कौन लोग सबसे ज्यादा लोकतंत्र के शत्रुओं के हाथों छले जाते है? इससे भी आगे बढ़कर वे उपाय कौन से हैं जो लोकतंत्र की बहाली कर सकते हैं? इन सवालों और इन जैसे अनेक सवालों के जवाब के लिए पंचतंत्र के शिल्प में एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है- ‘निरीहों की दुनिया’, जिसके लेखक प्रबोध कुमार छठे-सातवें दशक में मानव-मन की अतल गहराइयों में झाँकने वाली कहानियाँ लिखने के लिए पहचाने जाते थे। इस कथा में प्रबोध कुमार कछुआ, कछुई, खरगोश और चिड़ियों के मन की गहराइयों में प्रवेश करके उनके अनुरूप भाव का अनुभव करते हैं। आधार सूत्र है किसी समय कछुआ और खरगोश की दौड़ में अप्रत्याशित रूप से खरगोश की हार और कछुए की जीत की कहानी। उन दोनों की दौड़ में आदमी का हस्तक्षेप लेखक ने इब्ने इंशा के माध्यम से दिखाया है, जिसने हार-जीत के निर्णय को एक शर्त के साथ जोड़ दिया कि जो जीतेगा, वह हारने वाले के कान काट लेगा। इस दौड़ में गंतव्य स्थल तक खरगोश पहले पहुँच गया और जब लम्बी प्रतीक्षा के बाद हारने वाला कछुआ नहीं आया तो मरने से पहले खरगोश वसीयत कर गया कि कछुआ जब भी वहाँ पहुँचे, उसके कान काट लिए जाएँ। उपन्यास में तीसरी दौड़ का सस्पेंस परी कथा में व्याप्त है। खरगोश नीम के टीले पर पहुँच गया है, कछुआ अपने ऊपर हुए पत्थरों के आक्रमण के बीच अपनी जान बचाकर कछुई के पास लौट आया है। आगे की बात सोची जा रही है। यहीं से चलकर कथा चक्राकार-भारतीय अवधारणा में काल-गति के अनुरूप सम्पन्न हो जाती है और पाठक कथा-रस के साथ अपनी शक्ति और सीमा के अनुसार लोकतंत्र के प्रति अपनी भूमिका को लेकर बेचैन हो उठता है।

कथाकार की अनेक बड़ी उपलब्धियों में एक है बच्चों को अपनी पकड़ में लेकर उनके दिलदिमाग पर छा जाने वाली सरल, तरल भाषा। हिन्दी में मुहावरा है- ‘यह बात उसने एक साँस में कह दी।’ इस उपन्यास की भाषा अर्द्धविराम आदि से लगभग मुक्त है। लगातार अनेक वाक्यों तक बातें ऐसी सरपट दौड़ती हैं कि जब पूर्ण विराम आता है, तभी पाठक को साँस लेने की सुधि आती है। ‘निरीहों की दुनिया’ की बोलती-बतियाती भाषा भावावेग के दबाव में उमड़ती-घुमड़ती बच्चों की भाषा है, जो पाठक की चेतना पर छा जाती है। ऐसी भाषा में प्रौढ़ों की गम्भीर समस्याओं को कदम-कदम पर इस कदर बिम्बित कर दिया गया है कि उनकी अर्थ व्यंजना बेचैन करती है और इस दारुण समय की विडम्बनाओं का रेशा-रेशा उधेड़ कर रख देती है।

उपन्यास शुरू होता है, रास्ते में सड़क पर अपने ऊपर की गई पत्थरों की बौछार से बचकर अपने अड्डे लौट रहे कछुए को देखकर कछुई के गुस्से से। ‘कछुई के फूले मुँह को देख कछुआ बोला कुछ नहीं, बस एक ठंडी साँस ले उसके पास जा लेटा और आसपास में इधर-उधर भागने की कोशिश में बादलों की हर पल बनती-बिगड़ती शक्लें देखने लगा। कछुई का गुस्सा चिंता में बदल गया। दौड़ बीच में छोड़कर पहले वह जब भी अड्डे पर लौटा था तो सफाई देने के नाम पर किसी मजेदार घटना का वर्णन कर उसने खुश कर दिया था उसे और फिर दौड़ जारी करने तक का समय उन्होंने बच्चे पैदा करने में लगाया था। जरूर कोई गम्भीर बात है नहीं तो भला बच्चे पैदा करने का ऐसा अवसर कछुआ छोड़ता, यह सोच उसने कछुए की पीठ सहलाते जानना चाहा कि वह लौट कैसे आया ? कोई स्नेह से पीठ सहलाए तो सभी प्राणियों को अच्छा लगता है, उनका मनमरापन गायब हो जाता है और मन में छिपा रखा सब कुछ उड़ेल देने की इच्छा होने लगती है। कछुए के साथ भी यही हुआ।’

कछुए कछुई का यह शारीरिक मानसिक सहचार दाम्पत्य-रस का आस्वादन कराने वाला है, जो अन्य प्राणियों में तो अभी तक सुरक्षित है, किन्तु ‘सभ्य वैज्ञानिक’ होते जा रहे मनुष्य-समाज में दुर्लभ होता जा रहा है। कोई गम्भीर बात न होती तो इस अवसर को वे दोनों बच्चे पैदा करने के अवसर में बदल देते। इसी का नतीजा है कि ‘उसका कुटुम्ब इतना बड़ा हो गया है कि अब पोखरे में मुश्किल से समा रहा है।’ पृथ्वीरूपी पोखरे में यही हाल मानुष बच्चों के कारण भी हो रहा है, जिनके माता-पिता उस वर्ग के हैं जिनके जीवन में सुख के नाम पर केवल ‘रति सुख’ बचा है। इसका कारण यह है कि दुनिया की सत्तर फीसदी दौलत उनके कब्जे में है, जिनका श्रम केवल ‘रति श्रम’ है। श्रम और सुख की यह विषमता ही धरती को रसातल की ओर लिए जा रही है। कछुए ने दौड़ से लौटने का जो कारण बताया, वह सभ्य मनुष्य के असभ्य आचरण का नमूना है जो आज के समाज में निरंतर बढ़ता जा रहा है। ‘यही कारण है कि अपने स्वाभाविक आवास से कटा हुआ हर प्राणी मनुष्य की छाया से भी दूर रहने में अपना कल्याण समझता है।’ यह उपन्यास कथाप्रवाह में यह भी बता देता है कि सृष्टि के अन्य प्राणियों के दारुण भय का कारण मनुष्य क्यों और कैसे बनता जा रहा है। कछुए-खरगोश की मस्ती भरी दुनिया में ‘आदमी’ के हस्तक्षेप से उपजी समस्या पर सोचने के लिए कछुई पोखरे में जाती है तो अनगिनत बच्चों में से एक उसकी पीठ पर सवार होकर वह सवाल पूछता है जो उसने पतंग उड़ाने वाले बच्चे के बाप से सुना है- ‘दुनिया में एक भी पेंच ऐसा नहीं है, जिसकी काट न हो।’ बच्चा जानना चाहता है कि यह बात वह जानती है या नहीं। प्रबोध कुमार यहाँ बालपन में उगने वाले प्रश्‍नों, उनके अचेतन मन में चले जाने और जीवन भर प्रभावित करते रहने को लाक्षणिक रूपक में रचते हैं। ‘बात मामूली थी लेकिन बचपन में ऐसी बातों को अद्भुत मान बच्चे हर किसी को इतनी बार सुनाते हैं कि बात बेचारी घबरा कर उनके मन की पिटारी में ऐसे छिपकर बैठ जाती है कि लाख ढूँढ़ने पर भी नही मिलती।’ कछुई के बहाने कथाकार भारतीय समाज की स्त्रियों की मनोदशा की एक तस्वीर बनाता है- ‘कछुई को औरतों की तरह पतंगबाजी से चिढ़ थी, जिसकी एक वजह यह भी थी कि पतंग की तरह वह आसमान में उड़ नहीं सकती थी।’ व्यथा भारी है कछुई की या औरतों की?

चतुर कछुई की सुरक्षा का पुख्ता प्रबन्ध करने के लिए कछुए को मुखिया तथा अपने को मुखिनी घोषित कर देती है। पूरे कछुआ समाज में इसे प्रसारित करा देती है। सत्ता का खेल शुरू होते ही ‘सत्ता के दलाल’ का प्रवेश होता है। ‘कछुई की चौथी बेटी के सातवें बेटे के भेष में स्कूल के बच्चों से सुन-सुनकर वह अंग्रेजी बोलने लगा है पर देसी बोली कामचलाऊ जानता है, क्योंकि वे बच्चे उसमें ज्यादा बात नहीं करते।’ भारत की शिक्षा ओर सारे ज्ञान पर एकाधिकार जताने वाले विलैती ज्ञानियों की एक झलक है यह। अंग्रेजीभाषी कछुआ मुखिनी से कछुआ समाज में अपने लिए नम्बर तीन का पद पक्का कर लेता है और अपना नाम डबल ओ सेवन (007)  चुन लेता है। आदमियों ने अपने लिए नम्बर से पहचाना जाना स्वीकार कर लिया है, इसलिए कछुआ समाज में भी नाम के लिए नम्बर का चलन होगा। मनचाहे नम्बर देने के लिए कछुओं से घूस लेने का काम अंग्रेजीभाषी कछुआ खुद ही शुरू कर देता है। अंग्रेजीभाषी कछुआ पूर्णतः निरीह कछुआ समाज को आधुनिक अंग्रेजी (विलायती) सभ्यता के सारे दुर्गुण सिखा देना चाहता है। इसके लिए जासूसी ऐय्यारी हथकण्डों से लेकर हथियार जमा करने और भ्रष्टाचार को सबकी चाहत बना देने की कोशिश करता है। उसका आखिरी लक्ष्य है प्रगाढ़ मित्र कछुआ और खरगोश में मित्रभेद उपजा कर कछुआ समाज का मुखिया बन जाना। खरगोश और कछुआ मित्र हैं, एक दूसरे के लिए त्याग करने को तत्पर रहते हैं। उनके लिए खेल मनोरंजन और त्याग भाव से युक्त है। अंग्रेजीभाषी कछुआ (007) खेल में किलर इंस्टिंक्ट (प्रतिस्पर्धी के प्रति घृणा और उसको मार कर जीतने की हिंसक भावना) की सीख देना चाहता है। आधुनिक सभ्य आदमियों की सारी बुराइयों से कछुआ समाज को भर देने की इच्छा से परिचालित डबल ओ सेवन किसी तरह शान्त, सुखी, सहज कछुआ-खरगोश, चिड़ियों की दुनिया मे जहर घोलना चाहता है। अंत में वे निरीह कैसे अपना बचाव करते हैं और अंग्रजीभाषी सत्ताकामी की परिणति क्या होती है, इसे जानने के लिए पाठक को उपन्यास का आखिरी शब्द तक पढ़ना पड़ेगा। चमत्कार यह कि उपन्यास पढ़ने के लि‍ए पाठक को अपनी ओर से प्रयत्‍न नहीं करना पडे़गा। एकबार पढ़ना शुरू करने पर उसकी पकड़ से छूटना गैरमुमकिन है।

मुक्तिबोध ने रचना को सभ्यता-समीक्षा कह दिया। हिन्दी आलोचक इस पर इतना लुब्ध हुआ कि आज लगभग हर किताब ‘सभ्यता-समीक्षा’ बताई जाती है। ‘निरीहों की दुनिया’ किस अर्थ में ‘सभ्यता-समीक्षा’ है ? यह उपन्यास बार-बार बताता है कि सभ्य आदमी कितना बर्बर हो गया है ओर सभ्यता की छाया से भी दूर निरीह पशुपक्षी परस्पर व्यवहार में कितने शिष्ट, भावनाप्रवण, सहनशील, त्यागी, सहज बचे हुए हैं। आदि काल से अब तक संतों ने जिस ‘रहनी’ की बात की है, वह अब पशुपक्षियों में ही सुरक्षित रह गयी है। आदमी तो इतना ‘सभ्य’ हो गया है कि लगभग ‘भस्मासुर’। इसीलिए पशुपक्षी आपस में तय करने जा रहे हैं कि जहां वे जन्मे और पले बढ़े हैं, उस जगह को छोड़ने की जरूरत न पड़े। इसके अलावा भी क्या कोई उपाय अपनाया जा सकता है जिससे आदमियों के बीच सुरक्षित रहा जा सके।’ मुखिया कछुआ सोचता है- ‘डबल ओ सेवन को उसके अपराधों के लिए कड़ी से कड़ी सजा देना जरूरी है नहीं तो कछुआ समाज को आदमि‍यों में दिन पर दिन बढ़ती उन बुराइयों से बचाना मुश्किल हो जाएगा जिन्हें फैलाने की वह कोशिश कर रहा है।’ सभ्य मनुष्यों के समाजों ने अपनी-अपनी भाषाओं में इस प्रकार के मुहावरे गढ़ लिए हैं जिससे किसी ‘कदाचारी’ आदमी को ‘जानवर’ कह दिया जाता है। यह उपन्यास ऐसे मुहावरों को उलट कर ‘आदमियत’ की रक्षा करने की जुगत बताता है। इस समय सुविधा सम्पन्न नागरजन अपने बच्चों पर कितना अमानवीय अत्याचार कर रहें हैं, उन्हें ‘बड़ा’ बनाने की कोशिश में, इसे वे जानते भी नहीं। ‘‘कछुआ और खरगोश समाज में बच्चों को बच्चों की ही तरह पलने बढ़ने दिया जाता है, माने बच्चों की आदतों पर कोई लगाम नहीं लगाई जाती और इसीलिए इन समाजों में बच्चे बिल्कुल बच्चों की तरह प्यारे, नटखट, शैतान होते हैं और जैसा कि होना भी चाहिए। झगड़ते, मचलते ओर रूठते भी हैं।’’ बच्चों से आज उनका बचपन क्रूरतापूर्वक छीना जा रहा है, इसका रोना सभी रोते हैं। कछुआ और खरगोश अपने बच्चों को कैसे बढ़ने देते हैं आदमी उनसे सीख सके तो मनुष्यता नष्ट होने से बच सकती है। आदमियों को कछुआ सलाह देना चाहता है कि ‘‘टी.वी., कम्प्यूटर, मोबाइल के ऊपर भरोसा न कर वे अपना अधिक से अधिक समय अपने बच्चों के साथ बिताएं। इससे दोनों को फायदा होगा। बड़ों की बातें बच्चे अपनी यादों की पिटारी में सहेज कर रख लेंगे और जब बड़ा बनने का मन हुआा तो पिटारी में से उन्हें निकाल लेंगे। बड़े भी बच्चों के साथ मिलते-जुलते रहने से अपने मन में कहीं गहरे दबी बचपन की यादों को ढूँढ़ निकालेंगे और अपनी ढलती उम्र की ऊब से राहत पाने के लिए उन यादों की मदद से कभी-कभी बच्चे बन जा सकेंगे।’’

‘शिक्षित’ और ‘समझदार’ बनाने के नाम पर आदमी अपने बच्चों को क्या बना देता है, मुखिनी कछुई का एक बयान यह बताने के लिए काफी है। ‘‘वह अभी तक यह समझती थी कि आदमी जन्म से ही बदमाश होते हैं, लेकिन जिस प्यार से पतंग उड़ाते एक लड़के ने उसके एक छोटे बच्चे को अपनी जेब में रखा और जिस प्यार से स्कूली लड़के-लड़कियां उसे खिलाते-पिलाते हैं और नई-नई बातें सिखाते हैं उससे अब वह इस नतीजे पर पहुंच रही है कि बालिग आदमियों से उनके लड़के-लड़कियों की जात अलग होती है।’’

निरीहों की दुनिया की आचार संहिता वही है, जिसका सपना मानव समाज के सच्चे पथप्रदर्शक सदा से देखते रहे हैं। कछुआ, खरगोश और चिड़ियों के समाज में किसी के ऊपर हंसना बुरा माना जाता है। अभिव्‍यक्‍ति‍ की स्वतंत्रता का कछुआ समाज में यह आलम है कि ‘किसी को भी बोलने से नहीं रोकना चाहिए।’ कछुआ समाज में कोई अपने को और कछुओं से ऊंचा समझे, इसे अच्छी बात नहीं माना जाता। डबल ओ सेवन आदमियों की नकल करके कछुआ समाज को बांटना चाहता है तो उसे दंड मिलना ही चाहिए। कछुआ समाज नंबर वाली बात को नकार देता है क्योंकि कछुआ समाज में तो नामों की जरूरत भी नहीं है। उनके लिए इतना जानना काफी है कि वे नर हैं या मादा, बच्चे हैं या बूढ़े। कछुआ समाज में बच्चों को भी दंडित नहीं किया जा सकता। खरगोश यहां तक सोचता है कि किसी का बच्चा कभी नहीं मरे। चिड़िया भी नहीं चाहती कि कोई मरे या घायल हो। आदमियों के समाज में बड़ी आसानी से उन्हें भी मुखिया बना दिया जाता है, जो कोई सजा काट चुके होते हैं, कछुआ समाज में ऐसा नहीं होता। कथाकार वर्तमान राजनीति के धुरंधरों की ‘राजनीति’ की एक झलक देते हैं- ‘‘कछुआ समाज में सबको पता रहता है कि अगला मुखिया कौन बनेगा’’ जबकि आदमियों के समाज में अपने लिए जेल जाने का अवसर आने पर मुख्यमंत्री अपनी निरक्षर पत्नी को मुख्यमंत्री बना देता है। आदमियों के समाज में मानवीय भावनाओं के नाम पर अमानवीय कृत्य के अनेक उदाहरण मिलते हैं। एक है ‘भावनाओं का आहत होना’। एक फिल्म को और एक कला प्रदर्शनी के चित्रों को दर्शकों सहित जला दिया गया। कारण बताया गया कि फिल्म और चित्रों से जलाने वालों की भावनाएँ आहत हुई हैं। खरगोश एक खास बात यह बताया है कि दोनों जगहों की आक्रामक भीड़ के सभी सदस्यों के हाथों में कोई न कोई हथियार था, जबकि दर्शक पूरी तरह निहत्थे थे। वास्तव में जिनकी भावनाएँ आहत हुईं, फिल्म बनाने वाले, चित्रकार और दर्शक- उनकी ओर से कौन बोले? चिड़ियों का बसेरा उजड़ते देखकर खरगोश काटे गए पेड़ के शेष साथियों के पास जाकर कहता है- ‘‘एक निरीह अन्य निरीहों को सांत्वना छोड़कर और दे ही क्या सकता है?’’

यह उपन्यास ऐसे ही मर्मभेदी घटना-विन्यास के माध्यम से आत्मघाती दौड़ में शामिल सभ्य नागरिकों को आचरण की सभ्यता सिखाता चलता है।

पाठक की चेतना में अपनी बात बिठा देने के लिए कथाकार किस प्रकार के बिंब रचता है। एक उदाहरण- खरगोश अपने दोस्त कछुवे को बताना चाहता है, ‘‘बातों के भूखे को जबतक कोई सुनने वाला नहीं मिलता, तब तक वह उस मछली की तरह तड़पता है जिसे तपती बालू पर छोड़कर कोई कछुआ अपनी बीड़ी सुलगाने लगा हो।’’ ‘रेत की मछली’ हिन्दी भाषा का समर्थ मुहावरा है। इसी नाम का एक उपन्यास भी है। प्रबोध कुमार ने तपती रेत पर तड़पती मछली और बगल में अपनी बीड़ी सुलगाते कछुवे को साथ रखकर जीवन्त बिंब निर्मित कर दिया है। इस उपन्यास की भाषा एक शब्द में भी बिंब रचती है। मनमरापन, गुत्थमगुत्था, खोजीपने की आदत, लादीपोटी जैसे देशी शब्द पूरे दृश्य को मूर्त कर देते हैं।

वकील और पत्रकार बुद्धि व्यवसाय और लेखन कौशल के बल पर स्याह को सफेद करने को अपनी उपलब्धि मानते हैं। डबल ओ सेवन वकील की सलाह मुखिया कछुआ को सुनाता है- ‘‘मुखिया यदि हारी बाजी जीतना चाहता है तो उसे अपने में किलर इंस्टिंक्ट पैदा करना होगा और उसके लिए यह जरूरी है कि मुखिया खरगोश से इतनी नफरत करने लगे कि उसे मार डालने के लिए तैयार हो जाए।’’ वह आगे कहता है कि ‘‘वकील बहुत लालची होते हैं और उनसे भी बढ़कर लालची होते हैं पत्रकार, जिनकी जरूरत असली खरगोश को नकली साबित करने के लिए पड़ेगी।’’ जघन्य अपराधों का वर्णन करते समय ‘‘पत्रकार मसालेदार, दिलचस्प और रोचक जैसे शब्दों का इस्तेमाल धड़ल्ले से करते हैं।’’ दूसरी ओर खरगोश को बेहोश करके उसके पेट से सभी अंग काटकर निकाले जाने के बाद भी खरगोश की नींद न टूटने को ‘मजेदार बात’ कह देने के लिए खरगोश माफी माँगता है।

हिंसा, आतंक, प्रदूषण, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अमानवीय शोषण जैसी ज्वलंत समस्याएँ इस कथा में पशुपक्षियों की जबानी बच्चों की समझ में आने वाली झरने की तरह प्रवाहित प्रसन्न भाषा में मूर्त कर दी गई है। इस अद्भुत कथा को पढ़कर 1909 ई. में लिखी महात्मा गाँधी की किताब ‘हिन्द स्वराज’ याद आती है। उसमें वकील, जज, डॉक्टर आदि को आदमी के स्वास्थ्य और सहज न्याय का वध करने वालों के रूप में देखा गया है। विश्‍वविख्यात शिकारी और कथा लेखक जिम कारबेट ने अपने संस्मरणों के संग्रह ‘माई इण्डिया’ में आदिवासियों के चित्त में बसी न्याय-भावना के उत्कृष्ट उदाहरण देकर बताया है कि अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय समाज में सहज न्याय भावना थी। उसे अंग्रेजों ने अपने कानून और उसके व्यवहार से नष्ट कर दिया। पशुपक्षियों के रूपक में लिखी विश्‍वविख्यात व्यंग्य कथा ‘एनीमल फार्म’ को भी स्मरण किया जा सकता है। जार्ज आरवेल ने कम्युनिस्ट व्यवस्था के मॉडल की परिणति बताई है। एक फार्म हाउस के दो युवा सूअर नेपोलियन और स्नोबाल दो पैर वालों के विरुद्ध वि‍द्रोह करके सभी जानवरों के नेता बन जाते हैं। अंतिम दृश्य में वे दोनों मोटे गद्दों पर लेटकर सेब का रस पीते हुए दिखाई पड़ते हैं और श्रमिक बैल, घोड़े सूखी घास चबाने की नियति झेल रहे हैं। ‘निरीहों की दुनिया’ अत्याचारियों के प्रति न घृणा का पोषण करती है, न व्यंग्य का। इस दुनिया में दुश्मन के प्रति भी करुणा और मैत्री की अंतःसलिला प्रवाहित है। हथियार को सबकुछ मानने और उसी की तिजारत के बल पर पूरी पृथ्वी को विनाश की कगार पर ला खड़ा करने वालों को अभ्यासवश मनुष्य भले कह दिया जाय, उनकी असलियत क्या है, यह बात ‘निरीहों की दुनिया’ इस तरह बयान करती है- ‘‘आदमियों का कोई भरोसा नहीं। खरगोशों और कछुओं को तो वे मारते ही हैं पर उनसे भी बहुत बहुत ज्यादा वे उन आदमियों को मार डालते हैं जो बिल्कुल उन्हीं जैसे होते हैं। सच तो यह है कि आदमी ने पता लगा लिया है कि हथियार से बढ़कर कोई ताकत दुनिया में नहीं है और जिसके पास हथियार है वह जो मन चाहे कर सकता है।’’ पाठक की चेतना में कुवैत, ईराक, अफगानिस्तान जैसे दृश्य अपने आप उभर आते हैं। खरगोश आगे कहता है- ‘‘हथियार हाथ में होने से वह खरगोशों, कछुओं की कौन कहे बड़े-बड़े जानवरों और अच्छे बुरे सभी तरह के लोगों की हत्या कर सकता है। ऐसे में खरगोश और कछुए जैसे निरीह प्राणी उससे अपनी रक्षा कैसे कर सकते हैं ?’’

कथा के आखिरी पृष्ठ पर मुखिनी कहती है- ‘‘आदमी से बचने का सबसे सरल उपाय उसके हथियार से दूर रहना है, क्योंकि बिना हथियार के वह उन्हीं जैसे निरीह होता है।’’ कछुआ उस दुनिया के बारे में सोचने लगता है जो सिर्फ निरीह प्राणियों की होगी। विश्‍व से सारे हथियारों के मिट जाने के बाद आदमी भी निरीह प्राणियों में शुमार हो जाएगा। तब उसके पास प्रेम, सहजीवन और त्याग की अपराजेय शक्ति होगी। खरगोश कछुए की तीसरी दौड़ खारिज कर दी जाती है। कथाकार बच्चों की कथालिप्सा का पोषण करते हुए मुखिनी से कहलवाते हैं- ‘‘यह खारिज दौड़ जब भी हो तो निरीहों की दुनिया की पहली खरगोश और कछुए की दौड़ होगी।’’

यह पंचतंत्र-परम्परा की वह कथा है जो कूटनीति को भी हथियार की तरह ही त्याज्य समझकर खारिज कर देती है। अपने समय की जटिलता से सहमे हुए, बेहतर दुनिया की तलाश करने वाले प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति को यह उपन्यास बेहद आत्मीय लगेगा। लेखक के प्रति कृतज्ञता और प्रकाशक को बधाई।

पुस्तक : नि‍रीहों की दुनि‍या, पृष्ठ  : 136, मूल्य  : 70 रुपये
प्रकाशक- रोशनाई प्रकाशन, 212 सी.एल./ए., अशोक मि‍त्र रोड,
कांचरापाड़ा, उत्तर 24 परगना, पश्‍चि‍म बंगाल

क्रिकेट के जन्म की लोककथा : कांतिकुमार जैन

सभी का मानना है कि‍ क्रि‍केट का जन्‍म इंग्‍लैंड में हुआ, लेकि‍न यह सच नहीं है। इस खेल का जन्‍म छत्तीसगढ़, भारत में हुआ और वह भी त्रेता युग में। इसके जन्‍मदाता हैं राम जी और लखनजी। यकीन नहीं हो रहा है तो पढ़ि‍ए चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन का संस्‍मरण-

उस समय मुझे यह पता नहीं था कि जिसे सारी दुनिया क्रिकेट के नाम से जानती है, वह हम बैकुंठपुर के लड़कों का पसंदीदा खेल रामरस है। ओडगी जैसे पास के गांवों में रामरस को गढ़ागोंद भी कहते थे, पर सिविल लाइंस में रहने वाले हम लोगों को रामरस नाम ही पसंद था। रामरस यानी वह खेल, जिसे खेलने में राम को रस आता था। अब आप यह मत पूछिएगा कि राम कौन ? अरे राम- राजा राम, अयोध्या के युवराज, त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथनंदन राम। मुझे राम और राम रस के संबंधों का पता नहीं था। वह तो अचानक ही खरबत की झील के किनारे मुझे जगह-जगह पर पत्थर के रंगबिरंगे गोल टुकड़े मिले- टुकड़े क्या-बिल्कुल क्रिकेट की गेंद जैसे आकार वाले ललछौंहे रंग के पत्थर। खरबत झील से लगा हुआ पहाड़ है। बैकुंठपुर से कोई सात मील यानी लगभग चार कोस दूर। इतवार की सुबह हमने तय किया कि आज खरबत चला जाए, वहीं नहांएगे, तैरंगे और झरबेरी खाएंगे। हम लोगों ने यानी मैंने और जीतू ने, जीतू मेरा बालसखा था। मेरे हरवाहे का लड़का- हम उम्र, हम रुचि। साइकिल थी नहीं तो हम लोग पैदल ही खरबत नहाने निकले। रास्ता सीधा था। छायादार। पास के गांव यानी नगर के तिगड्डे से बिना मुड़े सीधे सामने चले चलो। खरबत की झील आ जाएगी। सामने पहाड़, हराभरा जंगल। खरबत की झील का जल इतना पारदर्शी और निर्मल था कि चेहरा देख लो। हम लोगों ने निर्मल जल में सिर डुबोया ही था कि टकटकी बंध गई। जल में यह किसका प्रतिबिंब है ? आईने में अपने चेहरे का प्रतिबिंब तो रोज ही देखते थे, पर वह चेहरा इतना सुंदर और मनोहारी होग, यह कभी लगा ही नहीं। वह तो अच्छा हुआ कि उस समय तक मैंने नारसीसस की कथा नहीं पढ़ी थी अन्यथा मैं अपना प्रतिबिंब छूने के लिए नीचे झुकता और कुमुदिनी बनकर खरबत झील में अब तक डूबा होता। झील में कुमुदिनी के फूलों की कमी नहीं थी- कुमुदिनी को वहां के लोग कुईं कहते अर्थात् मुझसे पहले भी मेरी वय के लड़के वहां पहुंचे थे, उन्होंने जल में अपना प्रतिबिंब निहारा था और इस प्रतिबिंब को छूने या चूमने के लिए नीचे झुके थे और गुड़प- उनकी वहां जल समाधि हो गई होगी और कालांतर में वहां कुईं का फूल उग आया होगा।

कभी-कभी अज्ञान भी कितना लाभदायी होता है। असल में कुईं के फूलों की तुलना में खरबत की झील और खरबत पहाड़ के बीच के मैदान में ललछौहें रंग के जो गोल-गोल पत्थर पड़े थे, उनमें हम लोगों का मन ज्यादा अटका हुआ था। समझ में नहीं आया कि इतने सारे पत्थर, वह भी एक ही रंग के सारे मैदान में क्यों बिखरे हैं। एक पत्थर उठाया, देखा वह मृदशैल का था- रंध्रिल, हल्का, स्पर्श-मधुर। इतनें में वहां से एक बुड्ढा गुजरा। मैंने उसे बुड्ढा नहीं कहा। कहा- सयान, एक गोठ ला तो बता। सयान कहने से वह बुड्ढा खुश हो गया, उसे लगा कि हम उसे सम्मान प्रदान कर रहे हैं। वह रुका- बोला, नगर के छौंड़ा हौं का?

हम लोग बैकुंठपुर के लड़के थे, बैकुंठपुर रियासत की राजधानी थी, उसे सभी कोरियावासी नगर ही कहते थे। उसने- सयाने, अनुभवी पुरुष ने हमें बताया कि खरबत पहाड़ पर गेरू की खदाने हैं। जोर की हवा चलती है तो वहां के पत्थर लुढ़कते हुए नीचे आते हैं गेरू से लिपटे हुए। इतने जोर की आंधी और शिखर से तल तक आने में इतनी रगड़ होती है कि पत्थरों के सारे कोने घिस जाते हैं और पत्‍थर बिल्कुल गोल बटिया बन जाते हैं। वह बैठकर वहीं चोंगी सुलगाने लगा। सरई के पत्ते की चोंगी में उसने माखुर भरी, टेंट से चकमक पत्थर निकाला, बीच में सेमल की रुई अटकाई और पत्थरों को रगड़ा ही थी कि भक्क से आग जल गई- दो चार सुट्टे लिए ही होंगे कि उसकी कुंडलिनी जाग्रत हो गई। अब उसके लिए न काल की बाधा थी, न स्थान की। काहे का कलयुग, काहे का द्वापर। मैंने जीतू से कहा कि यार, नहाएंगे बाद में, पहले इन गोल-गोल गेदों को बीनो और झोले में भर लो- जितनी आ जाएं। कान्ति भैया, अपन इन टुकड़ों का करेंगे क्या? मैं बोला- करेंगे क्या, इन पर साड़ी की किनारी लपेटेंगे, चकमकी मिट्टी का पोता फेरेंगे और रामरस खेलेंगे। रामरस सुनना था कि छत्तीसगढ़ का वह सयाना चैतन्य हुआ, उसने अपनी चोंगी से इतने जोर का सुट्टा लिया कि लौ तीन बीता ऊपर उठ गई। शायद वह त्रेता युग में पहुंच गया था। वह राम-लक्ष्मण को रामरस खेलते देख रहा था। इतने में एक सारस आया, वह हम लोगों से थोड़ी दूर पर एक टांग के बल खड़ा हो गया, उद्ग्रीव। बैठक वैसे ही जैसे कोई दर्शक क्रिकेट मैच में खिलाड़ी को बैटिंग करते देख रहा हो। ध्यानावस्थित, तदगतेन मनसा।

हम लोग लोग उस सयाने के पास बैठ गए। वह सयाना सचमुच सयाना था, सज्ञान, सुजान। हमें लगा कि वह सदैव से सयान था,  न कभी वह बालक रहा था, न तरुण,  जैसा वह त्रेता में था, वैसे ही आज भी है। वह चोंगी का एक कश लेता, सरई के पत्ते की मोटी बीड़ी से लौ उठता और एक युग पार कर लेता। तीसरे कश में तो वह जैसे राम के युग में ही पहुंच गया। कहने लगा कि राम, सीता और लखन भैया वनवास मिलने पर चित्रकूट से सीधे खरबत आए। सीधे अर्थात् चांगभखार के रास्ते से, जनकपुर, भरतपुर होते हुए। खरबत की झील देखकर सीता दे ने जिद पकड़ ली- बस, कुछ दिन यहीं रहूंगी। कहा रहोगी, न यहां कंदरा, न गुफा। न मठ, न मढ़ी। लखन भैया ने कोई बहस नहीं की। अपनी धनुही उठाई, कांधे पर तूणीर टांगा और खरबत पहाड़ी की टोह लेने निकल गए। जिन खोजा तिन पाइयां। बड़के भैया और भाभी वहां झील तीरे चुपचाप बैठे थे। राम कह रहे थे- थोड़ा आगे चलो, सरगुजा में एक बोंगरा है। लंबी खुली गुफा। वह स्थल भी बड़ा सुरम्य है। वहां के निवासी भी बड़े अतिथिवत्सल हैं, पर सीताजी रट लगाए बैठी थीं- खरबत, खरबत। लक्ष्मण ने लौटकर अग्रज को बताया कि यहां से कोसेक की दूरी पर तीन गुफाएं प्रशस्त हैं, स्वच्छ हैं, जलादि की सारी सुविधाएं हैं। हम लोग चातुर्मास यहीं बिता सकते हैं। तो ठीक है, भाभी को ले जाओ, दिखाओ, उन्हें पसंद आती है तो हम लोग चार महीने यहीं रहेंगे। गुफाओं को देखकर सीताजी प्रसन्न हो गईं। उन्हें अपने मायके मिथिला की याद आई।

ऐसी ही हरतिमा, ऐसा ही प्रकाश, ऐसा ही मलय समीर। लखन भैया, तुम इस गुफा में रहना, यहां मेरा रंधाघर होगा। सीताजी वहां की रसोई को रसोई न कहकर स्त्रियों की तरह रंधागृह कहतीं- रंधनगृह। यह गुफा थोड़ी बड़ी है- इसमें हम दोनों रहेंगे। राम ने भी गुफाओं को देखकर सीताजी के मत की पुष्टि की। चतुर पतियों की तरह। चलो, यहां सीता का मन लगा रहेगा। खरबत में राम परिवार के चार माह बड़े आराम से कटे। विहान स्नान-ध्यान में कटता, प्रात: जनसंपर्क के लिए नियत था। स्त्रियां भी आतीं, पुरुष भी। मध्याह्न में दोनों भाई आखेट के लिए निकल जाते। यही समय फल-फूल, कंदमूल के संचय का होता। आखेट से लौटने के बाद वे क्या करें ? एक सांझ लखनलाल ने दादा से कहा- दादा, शाम को हम लोग कोई खेल खेलें। क्या खेल खेलें ? लक्ष्मण बड़े चपल, बड़े कौतुक प्रिय, बड़े उत्साही। बोले- खरबत पहाड़ के नीचे जगह-जगह गोल-गोल पत्थर पड़े हुए हैं- ललछौंहे रंग के, बिलकुल कंदुक इव। मैं कल भाभी से उनकी सब्जी काटने का पहसुल मांग लूंगा और उससे महुआ की छाल छील लाऊंगा। महुआ की छाल यों ही लसदार होती है। खूब कसकर पाषाण कंदुक पर लपेटेंगे तो एक आवेष्टन बन जाएगा। उससे चोट नहीं लगेगी।

दूसरे दिन लखन सचमुच मधूक वृक्ष का वल्कल ले आए। ललछौंहे पाषाण खंड पर मधूक वल्कल का वह एक आवेष्टन ऐसे चिपका कि गेंद पर परिधान का अंतर ही मिट गया। राम को एक उपाय सूझा। उन्हें याद आई कि सीता के पास एक पुरानी साड़ी है। उसकी किनारी बड़ी सुंदर है- चमकीली। गोटेदार। यदि उस किनारी को मधूक आवेष्टन पर लपेट दिया जाए तो गेंद के आघात का कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा। लखनलाल को अब कंदुक क्रीड़ा की कल्पना साकार होती हुई लगी। लखन पास के ही एक गर्त से चकमिकी मिट्टी उठा लाए। चकमिकी यानी चकमक वाली। बैकुंठपुर में नदी-नालों की सतह पर जो चकमिकी मिट्टी दिखाई पड़ती है, वह और कुछ नहीं, अभ्रक है।

लखन की लाई हुई अभ्रक में गेंद को लिथड़ाया जा रहा है। सीता देखकर हँस रही हैं- अरे, ये काम तुम लोगों के नहीं हैं, तुम लेोग तो तीर-धनुष चलाओ। वह सरई के पत्तों की चुरकी में झील से थोड़ा-सा जल भर लाई हैं। अभ्रक पर उन्होंने जल सिंचन किया है। थोड़ा-सा जल अपनी हथेलियों में लेकर गोंद को भी आर्द्र किया है। अरे, गेंद तो अब चमकने लगी है। अब अंधेरा भी होए तो गेंद गुमेगी नहीं, दिखती रहेगी। खेल के नियम तय किए जा रहे हैं। राम ने सीता खपडिय़ों को लेकर तरी ऊपर जमा लिया है- खपड़ी यानी खपरे के टुकड़े, तरी ऊपर यानी नीचे-ऊपर। राम ने उन सात खपडिय़ों की सुरक्षा का भार स्वत: स्वीकार किया है यानी बल्लेबाजी। लखनजी को गेंद ऐसे फेंकनी थी कि सात खपडिय़ों वाला स्तूप ढह जाए। राम जी सावधान-सतखपड़ी के सामने ऐसी वीर मुद्रा में खड़े होते कि लखनजी को लक्ष्य पर आघात का मौका ही नहीं मिलता। इधर लखनजी ने गेंद फेंकी, उधर रामजी ने उस गेंद को ऐसे ठोका कि कभी सामने खड़े आंवले के तने से टकराती, कभी दाएं फैली खरबत पहाड़ी की तलहटी से। कभी-कभी तो रामजी अपना बल्ला ऐसे घुमाते कि गेंद खरबत झील का विस्तार पारकर उस पार। अब लखनजी गेंद के संधान में लगे हैं। दिन डूब जाता, सूर्यदेव अस्त हो जाते। दोनों भाई गुफा में वापस लौटते। क्लांत भाभी देवर से मजाक करती- आज फिर दिनबुडिय़ा। दिनबुडिय़ा यानी दिन डूब गया है और तुम दांव दिए जा रहे हो। लखन कहते- भाभी, भैया ने बहुत दौड़ाया। बल्ला ऐसे घुमते हैं कि जैसे उनके बल्ले में चुंबक लगा हो, गेंद कैसे भी फेंको, भैया, उसे धुन ही देते हैं। दो-एक दिन तो ऐसे ही चला, फिर सीताजी ने मध्यस्थता की। उन्हें देवर पर दया आई- कल से तुम दोनों बारी-बारी से कंदुक बाजी और बल्लेबाजी करोगे। मैं तुम दोनों भाइयों का खेल देखूंगी। कोई नियम विरुद्ध नहीं होना चाहिए।

रामजी को मर्यादा का बड़ा ध्यान रहता है। ये मर्यादा पुरुषोत्तम यों ही तो नहीं कहलाते। फिर सीताजी जैसे निर्णायक। खेल में वे कोई पक्षपात नहीं करतीं। गोरे देवर, श्याम उन्हें के ज्येष्ठ हैं। फिर दर्शक दीर्घा में सारस भी तो हैं- एक टांग पर खड़े क्रीड़ा का आनंद उठाते हुए। निर्णय देने में जरा-सी चूक हुई कि सारस वृंद क्रीं-क्रीं करने लगता है। रामरस की ऐसी धूम मची कि खरबत के आदिवासी युवा तो वहां समेकित होने ही लगे, बैकुंठपुर, नगर, ओडग़ी के तरुण भी खेल देखने के लिए एकत्र हो रहे हैं। चतुर्दिक रामरस का उन्माद छाया हुआ है। राम के परिवार में आनंद ही आनंद है। लोक से जुडऩे का संयोग अलग से। रामजी ने देखा कि आसपास के गांवों के युवा भी इस खेल में सम्मिलित होना चाहते हैं। उन्होंने सीताजी से परामर्श किया, लखनभाई से भी पूछा। सब खेल को व्यापक आधार देने के पक्ष में हैं। अगले दिन से अभ्यास पर्व मनाए जाने की घोषणा हुई। बल्ले सब अपने-अपने लाएंगे। शाखाएं चुनी जा रही हैं, टंगिया से डगालें काटी जा रही हैं, हंसिया से उन्हें छीला जा रहा है। ऊपर का भाग पतला-मूठवाला। हाथ से पकडऩे में आसानी हो। नीचे का भाग चौड़ा, समतल। बल्ला तैयार हो गया तो उसे मंदी आंच पर तपाया जा रहा है। सामने से कितनी भी तेज गेंद आए, बल्लेबाज का बल्ला उसे ऐसे ठोके कि सीमा के पार। राम नवमी के दिन राम और लखन के दल में विशेष प्रतिस्पर्धा होगी। गांव के सयाने आमंत्रित हैं- खरबत के ही नहीं, आसपास के गांवों के भी। नगर के, ओड़गी के। निर्णय निष्पक्ष होना चाहिए। एक चत्वर बनाया गया। धर्माधिकारी उस चत्वर पर बैठेंगे, वाद-विवाद होने पर पंचाट का निर्णय सर्वमान्य होगा। रामरस मर्यादा का खेल है, भद्रजनों का। रामरस से मर्यादा के जो नियम निर्धारित हुए थे, वे आज भी न्यूनाधिक परिर्वतन के साथ अक्षुण्ण रूप से प्रचलित हैं। अब लोग उसे रामरस नहीं कहते, क्रिकेट कहते हैं, पर नाम में क्या धरा है- आज जब कोई कहता है ‘ये तो क्रिकेट नहीं है’ तो भैया, हमारी तो छाती चौड़ी हो जाती है। बैकुंठपुर में क्रिकेट के पूर्वज रामरस का बचपन बीती। छत्तीसगढ़ में क्रि‍केट का पहला मैच खेला गया।

वह सयाना त्रेता युग की पूर्व स्मृतियों में खो गया। उसकी चोंगी की लौ धीरे-धीरे मंदी पड़ रही थी। उसने उस ओर देखा जिस ओर सारस खड़े थे। वह जनता था कि सारस रामरस के ऐसे दर्शक हैं, जिन्हें न भूख प्यास व्यापती है, न प्यास। वे रात-दि‍न रामरस में ऐसे डूबे रहते हैं कि खेलनेवाले थक जाएं, पर उन्हें कोई क्लांति नहीं होती। सीताजी की रसोई तैयार थी- आईं। दोनों भाइयों को ब्यालू की सूचना दी। सभी सयानमन से कहा दादाजी- आप भी ब्यालू हमारे साथ ही करें। धर्मरक्षक लोगों से भी आग्रह किया कि ब्यालू के बाद ही जाइएगा। हम लोगों को लगा कि हम भी तेता युग में हैं। सीताजी ने, लखनलाल ने दादा राम ने भी रोका, पर हम लोग रुके नहीं। घर में बोलकर नहीं आए थे, कौन विश्‍वास करेगा। पिताजी को पता चलेगा तो सौ सवालों का जवाब देना पड़ेगा। हम लोगों ने कहा- दीदी, हम लोग बराबर आते रहेंगे। हम लोगों को भी रामरस में रस आने लगा है। रामरस में कौन अभागा है, जिसे आनंद न आए?

(सामयि‍क बुक्‍स से प्रकाशि‍त पुस्‍तक बैकुंठपुर में बचपन से साभार)

रवीन्द्रनाथ संवाद के कवि‍ : चक्रधर

नई दि‍ल्‍ली : रवीन्द्र संवाद के कवि थे। यह बात हि‍न्‍दी अकादमी, दि‍ल्‍ली के उपाध्‍यक्ष अशोक चक्रधर ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर की द्विपारवी, जन्मकथा और प्राज नामक कविताओं के उदाहरण देते हुए कही। उन्‍होंने कहा कि‍ रवीन्द्रनाथ ठाकुर कवियों के कवि हैं। नवजागरण की जो चेतना रवीन्द्र में है वही भारतेन्दु के साहित्य में भी दिखाई देती है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने हमें पहली बार भूमंडलीकृत होने का गौरव दिलाया। उन्‍होंने यह वि‍चार हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा 12 फरवरी को रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 150 वीं जयंती के अवसर पर त्रिवेणी सभागार, तानसेन मार्ग, मंडी हाउस, नयी दिल्ली में आयोजि‍त संगोष्‍ठी में व्‍यक्‍त कि‍ए। संगोष्ठी की अध्यक्षता जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. बी.बी. भट्टाचार्य ने की।

डा. बलदेव वंशी ने कहा कि रवीन्द्र के समूचे साहित्य में अध्यात्म दृष्टि रूप में मिलता है। कबीर की वाणी का फक्कड़पन रवीन्द्र अपनी रचनाओं में लाए हैं। उन्होंने कबीर के सौ दोहों का अनुवाद भी किया। रवीन्द्र विश्‍व मानवता के ध्वज हैं। उन्होंने कहा कि हम रवीन्द्र जैसे कवि, चिंतक, औलिया और पैगम्बर के उत्‍तराधिकारी हैं। वह हमें ज्योति का महासमुद्र दिखते हैं। उन्होंने  रवीन्द्र की गीतांजलि पर चर्चा करते हुए कहा कि विश्व के किसी कवि ने इस प्रकार की कविता नहीं लिखी हैं। डॉ. वंशी ने गीतांजलि में संकलित भारतीय तीर्थ, धूलि मंदिर, जाने के दिन और मीत मेरे दो विदा पर विस्तार से चर्चा की।

डॉ. विभाष चन्द्र वर्मा ने कहा कि रवीन्द्र हिन्दी में भक्तिकाल और छायावाद दो प्रकार के बीच का सेतु हैं। निराला हिन्दी के पहले ऐसे कवि हैं जिन्होंने रवीन्द्र को हिन्दी भाषियों से परिचय कराया। रवीन्द्र के कवि और संगीत रूप को अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा रवीन्द्र की रचनाओं में साधारण मनुष्य की संवेदना दिखाई देती है। साहित्य की समस्त विविधता उनके साहित्य में मिलती है।
हिन्दी अकादमी के सचिव, प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ ने संगोष्ठी का प्रारंभ करते हुए कहा कि विश्‍व गुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने न केवल बंगाल, बांग्ला और देश का गौरव बढ़ाया, बल्कि उन्होंने कविता नाटक आदि को नई दृष्टि दी जो अपने आप में विलक्षण है। उन्होंने कबीर को नये सिरे से गीतांजली में खोजा है। रवीन्द्र भारत के नवजागरण के अग्रदूत हैं। उन्‍होंने रवीन्द्र की ब्रज बोली रचनाओं की गहन समीक्षा और आलोचना किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. बी.बी. भट्टाचार्य ने कहा कि रवीन्द्र के संगीत में मनुष्य के जीवन के सभी पक्ष मिलते हैं। हर चिंता का समाधान उनके संगीत में है। रवीन्द्र विश्‍वगुरु और दार्शनिक थे। उन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर को पढ़ने की जरूरत पर बल दिया। दुख में रहकर भी मन को ऊपर कैसे करें, इसका समाधान भी रवीन्द्र के साहित्य में मिलता है।

इस अवसर पर ‘नृत्य के सौन्दर्यशास्त्र’ पुस्तक की लेखिका सुश्री शिखा खरे ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर में भानु पदावली पर अधारित कथक नृत्य की प्रस्तुति की।