Archive for: January 2011

माफ करना हे पिता! : शंभू राणा

वरि‍ष्‍ठ लेखक शंभू राणा का अपने पि‍ता पर लि‍खा यह संस्मरण अद्भूत है। पि‍ता पर जि‍स तरह से बेबाकी से उन्होंने लि‍खा है, ऐसा बहुत कम पढ़ने को मि‍लता है-

सभी के होते हैं, मेरे भी एक (ही) पिता थे। शिक्षक दिवस सन् 2001 तक मौजूद रहे। उन्होंने 70-72 वर्ष की उम्र तक पिता का रोल किसी घटिया अभिनेता की तरह निभाया,  मगर पूरे आत्मविश्वास के साथ। लेकिन मैं उन्हें एकदम ही ‘पीता’ नहीं कहने जा रहा। इसलिये नहीं कि मेरे बाप लगते थे, बल्कि इसलिये कि चाहे जो हो आदमी कुल मिलाकर कमीने नहीं थे। किसी भी आदमी का यही एक ‘दुर्गुण’ बाकी सारे ‘गुणों’ पर भारी है। बाकी शिकायत, बल्कि शिकायतों का कपड़छान तो यही कि उन्होंने पिता के रोल की ऐसी तैसी करके रख दी। न जाने किस बेवकूफ ने उन्हें बाप बना दिया।

उनका बारहवाँ और वार्षिक श्राद्ध तो मैं हरिद्वार जाकर कर आया था। उधार और चंदे के पैसों से, जैसा भी बन पड़ा। आज सोचता हूँ कि कलम से भी उनका तर्पण कर दूँ। ऊपर मैंने शिकायतों का जिक्र किया लेकिन यह तर्पण जाहिर-सी बात है श्रद्धावश ही है, शिकायतन नहीं।

पिता का मेरा साथ लगभग 32 वर्षों तक रहा, लगभग मेरे जन्म से उनकी मृत्यु तक। माँ का साथ काफी कम और वह भी किस्तों में मिला। पिता के साथ यादों का सिलसिला काफी लम्बा है। यादें देहरादून से शुरू होती हैं। मेरी पैदाइश भी वहीं की है। यादें आपस में गुड़-गोबर हुई जा रही हैं, कौन पहले, कौन बाद में। लेकिन शुरू कहीं से तो करना पड़ेगा ही। सबसे पहले दिमाग में जो एक धुँधली-सी तस्वीर उभरती है वह यूँ है- गर्मियों के दिन हैं, पिता बेहद हड़बड़ी में दोपहर को घर आते हैं। शायद दफ्तर से इजाजत लिये बिना आये हैं। मैं बीमार हूँ। मुझे कम्बल में लपेट कर दौड़े-दौड़े डॉक्टर के पास ले जाते हैं। डॉक्टर मुझे सुई लगाता है। पिता लौट कर माँ से कहते हैं- ‘‘डॉक्टर कह रहा था कि आधा घंटा देर हो जाती तो बच्चा गया था हाथ से।’’ उस दिन तो बच्चा हाथ आ गया पर फिर कभी उनके हत्थे नहीं चढ़ा।

एक और तस्वीर है यादों के एलबम में… बारिश हो रही है, सड़क में एड़ियों से ऊपर तक पानी भरा है। मुझे उल्टी-दस्त हो रहे हैं और पिता भीगते हुए पब्लिक नल में सरे बाजार मुझे धो रहे हैं। इन दोनों घटनाओं का जिक्र उन्होंने अपने अंतिम समय तक अक्सर किया कि ऐसे पाला तुझे मैंने। ऐसी बातें सुनकर अपने भीतर से अपना ही कोई अनाम/अदृश्य हिस्सा बाहर निकल कर सजदे में गिर जाता है। और हो भी क्या सकता है? ऐसी बातों का कैसा ही जवाब देना न सिर्फ बेवकूफी है, बल्कि बदतमीजी भी। मैं एक आदर्श बेटा नहीं, मगर ‘राग दरबारी’ का छोटे पहलवान भी नहीं हो सकता जो अपने बाप कुसहर प्रसाद से कहता है कि हमने लिख कर तो दिया नहीं कि हमें पैदा करो। तो पिताजी महाराज, ऋणी हूँ तुम्हारा और इस ऋण से उऋण होने की कोई सूरत नहीं। न तुम्हारे जीते जी था, न आज हूँ किसी लायक। जब तक रहे तुम पर आश्रित था, आज दोस्तों पर बोझ हूँ। इनसान के अंदर जो एक शर्म नाम की चीज होती है, जिसे गैरत भी कहते हैं, मैंने उसका गला तो नहीं दबाया पर हाँ, उसके होटों पर हथेली जरूर रखे हूँ। शर्म आती है लेकिन जान कर बेशरम बना हूँ। सच कहूँ तुम्हारे जाने के बाद स्थितियाँ ज्यादा खराब हुई हैं। परिस्थितियों के डार्क रूम में किसी नैनहीन-सा फँसा पड़ा हूँ। कामचोर तो नहीं पर हाँ, एक हद तक निकम्मा जरूर हूँ।

लेकिन यह उऋण होने का खयाल मेरे मन में आ ही क्यों रहा है? मैं तो इस खयाल से सहमत ही नहीं कि माँ-बाप के ऋण से कोई उऋण भी हो सकता है। क्या यह किसी लाले-बनिये का हिसाब है, जिसे चुका दिया जाये? हाँ, लाला बोले, कितना हिसाब बनता है तुम्हारा? हाँ, यार ठीक है ‘वैट’ भी जोड़ो, डंडी मार लो, छीजन काट लो, औरों से दो पैसा ज्यादा लगा लो और कुछ? हाँ, अब बोलो। दो दिन देर क्या हुई यार कि तुमने तो चौराहे पर इज्जत उतार ली। लो पकड़ो अपना हिसाब और चलते-फिरते नजर आओ। आज से तुम्हारा हमारा कोई रिश्ता नहीं। अब ऋण तो कुछ इसी तर्ज में चुकता किया जाता है। क्या माँ-बाप से इस जबान में बात करनी चाहिये? मैं तो नहीं कर सकता। क्यों न हमेशा उनका कर्जदार रहा जाये और एक देनदार की हैसियत से खुद को छोटा महसूस करते रहें। माँ की प्रसव पीड़ा और पिता का दस जिल्लतें झेल कर परिवार के लिये दाना-पानी जुटाने का मोल तुम चुका सकते हो नाशुक्रो कि उऋण होने की बात करते हो?

शहर वही देहरादून, मोहल्ला चक्कूवाला या बकरालवाला जैसा कुछ। पास में एक सूखा-सा नाला या नदी है, जहाँ खास कर सुबह के वक्त सुअर डोलते हैं। कतार में मिट्टी-गारे से बनी खपरैल की छत वाली चार-छ: कोठरियाँ हैं। हर कोठरी में अलग किरायेदार रहता है। कोठरी के भीतर एक दरवाजा है, जो इस कोठरी को उस से जोड़ता है। यह दरवाजा अपनी-अपनी ओर सब बन्द रखते हैं। बाहर-भीतर जाने का दरवाजा अलग है। एक दिन माँ इस दरवाजे की झिर्री में हाथ डाल कर दरवाजे के उस ओर रखे कनस्तरों तक पहुँचने की कोशिश कर रही है। झिर्री काफी छोटी है, न उसका हाथ पहुँच पाता न मेरा। इस ओर कनस्तर खाली हैं। मुझे भूख लगी है, शायद माँ भी भूखी है। पिता कहाँ हैं, कनस्तर क्यों खाली हैं, पता नहीं। याद नहीं। इस चित्र के चित्रकार भी तुम्हीं हो पिता मेरे। इस तस्वीर को मैं नोंच कर फेंक नहीं सकता एलबम से। लेकिन यह सब कह कर आज तुमसे शिकायत नहीं कर रहा। ऐसा करके क्या फायदा। वैसे भी तुम कभी घरेलू मामलों में जवाबदेह रहे नहीं। सूचना का अधिकार तुम पर लागू नहीं होता था। शिकायत या कहो कि झुँझलाहट मुझे खुद पर है कि मैं इस चित्र का कोई रचनात्मक उपयोग नहीं कर पाया। तब से आज तक यह अनुभव दिमाग की हंडिया में बस खदबदा रहा है। मैं इसे दूसरों के आगे परोसने लायक नहीं बना पाया कि औरों की तृप्ति से मेरा असंतोष कम हो। ऐसी बातों को यूँ सपाटबयानी में कहने से दूसरों के दिलों में सिर्फ दया ही उपजती है जो कि अपने काम की नहीं। अब ऐसा भी नहीं कि हर चीज हमेशा काम की न होती हो, दया-ममता लड़कियों के भी तो नाम होते हैं।

इसी कोठरी में मुझसे तीनेक साल छोटी बहन लगभग इतनी ही उम्र की होकर गुजर जाती है। उससे कुछ समय बाद, जब एक दोपहर पिता मुझे डॉक्टर के पास ले गये थे। बीमार हम दोनों थे, वह कम, मैं ज्यादा। उस बच्ची का नाम याद है, गुड्डी था। माँ, पिता और मेरी जो एक मात्र फोटो मेरे पास है, उसमें वह भी माँ की गोद में है- शहद वाला निप्पल चूसती हुई। पिता कुर्ते की बाँहें समेटे मुझे गोद में लिये बैठे हैं। मैंने उस वक्त किसी बात पर नाराज होकर अपना एक हाथ अपने ही गरेबान में अटका लिया था। वह हाथ आज भी वहीं टँगा है। वैसे मुझे याद नहीं, पर इस तस्वीर को देख कर पता चलता है कि माँ की एक आँख दूसरी ओर देखती थी। दो भाई-बहन मुझसे पहले गुजर चुके थे, दो मेरे बाद मरे। मुझमें पता नहीं क्या बात थी कि नहीं मरा। बाद में पिता ने कई बार मन्नत माँगी कि तू मर जाये तो मैं भगवान को सवा रुपये का प्रसाद चढ़ाऊँ। यार, नंगा करके चौराहे पर सौ दफे जुतिया लो, पर ऐसी ‘बेइज्जती खराब’ तो मती करो! प्रसाद की रकम पर मुझे सख्त ऐतराज है। कुछ तो बढ़ो। मैं इनसान का बच्चा हूँ भई, चूहे का नहीं हूँ। सवा रुपये में तो कुछ भी नहीं होगा, बुरा मानो चाहे भला। इनसान की गरिमा और मानवाधिकार नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं? भगवान से या शैतान से, जिससे मर्जी हो कह दो कि जो चाहे उखाड़ ले, सवा रुपये में तो हम किसी भी सूरत नहीं मरेंगे। भूखे नंगे रह लेंगे, मरेंगे नहीं। प्रसाद खाकर तुलसीदास की तरह मस्जिद में सो रहेंगे।

फिर याद आता है कि माँ मायके चली जाती है। न जाने कितने अर्से के लिये और क्यों। मैं पिता के पास क्यों रह जाता हूँ जबकि उस उम्र के बच्चे को माँ के पास होना चाहिये? पिता मुझे साथ लेकर दफ्तर में रहने लगते हैं। दफ्तर में दो-एक लोगों की आज भी याद है। एक दीक्षित जी थे, थोड़ा मोटे से, शकल याद नहीं। बड़ी ही संक्रामक हँसी हँसते थे। एक जल्ला सिंह थे। पिता की तरह चपरासी (बकौल पिता- ‘चढ़ बेटा फाँसी’)। शायद कांगड़ा के रहने वाले थे। जल्ला सिंह एक दिन घर से आयी चिट्ठी पढ़ रहे थे। उसकी एक पंक्ति याद है- कमर झुकाने का समय है, छुट्टी लेकर आ जाओ। मैंने पिता से इसका मतलब पूछा, उन्होंने बताया कि खेती-बाड़ी का समय है। धान यूँ झुक कर रोपते हैं। जल्ला सिंह को आज भी ग्रुप फोटो में नामों का क्रम देखे बिना पहचान लेता हूँ। पिता अर्थ एवं संख्या (सांख्यिकी) विभाग में थे। उनके कहे मुताबिक डीएम साला उनके विभाग के बिना दो कदम नहीं चल सकता। सारे डाटा हमारे पास होते हैं। डीएम हम से घबराता है।

शाम लगभग सात-आठ बजे का समय है। पिता खाना बना रहे हैं। मैं बरामदे में खेल रहा हूँ। गेट खोल कर ऑफिस का कोई कर्मचारी अहाते में दाखिल होता है। पिता उसका कमरा खोल देते हैं। वह आदमी बैठ कर कोई फाइल निपटाने लगता है। पिता फिर रसोई में जुट जाते हैं। करीब आधे घंटे बाद वह आदमी बाथरूम में घुस जाता है और तभी बिजली चली जाती है। पिता लालटेन या मोमबत्ती लेकर दफ्तर के खुले कमरे में जाते हैं। कुछ देर इन्तजार करने के बाद आवाज देते हैं। वह आदमी और जवाब दोनों नदारद। पिता मुझे कंधे में बिठाते हैं और हाथ में डंडा लेकर अंधेरे बाथरूम में ताबड़तोड़ लाठी चार्ज कर देते हैं। जवाब में जब किसी की चीख नहीं सुनाई दी तो उन्होंने नतीजा निकाला कि बिजली चली जाने के कारण वह आदमी बिना बताये चला गया। उनकी इस हरकत का मतलब मैं कभी नहीं समझ पाया। दुर्घटनावश मेरा खोपड़ा डंडे की जद में नहीं आ पाया।

कुछ समय बाद माँ फिर देहरादून आ जाती है। हम पास ही किराये की एक कोठरी में रहने लगते हैं। यह कोठरी पहले वाली से बेहतर है। कतार में चार-पाँच कोठरियाँ हैं, छत शायद टिन की है। मकान मालिक का घर हम से जरा फासले पर है। वह एक काफी बड़ा अहाता था जिसमें आम, लीची और कटहल वगैरहा के दरख्त हैं। अहाते में एक कच्चा पाखाना था जिसकी छत टूट या उड़ गयी थी। जब कोई पाखाने में हो उस वक्त दरख्तों में चढ़ना अलिखित रूप से प्रतिबंधित था। इसी तरह कोई अगर दरख्त में चढ़ा हो तब भी… अहाते में एक ओर मकान मालिक के दिवंगत कुत्तों की समाधियाँ थीं जिनमें वह हर रोज सुबह को नहा-धोकर फूल चढ़ाता था। फूल चढ़ाने के बाद हाथ जोड़ कर शीश नवाता था कि नहीं, भगवान की कसम मुझे याद नहीं।

मकान मालिक लगभग तीसेक साल का था। दुबला पतला, निकले हुए कद का, चिड़चिड़ा-सा, शायद अविवाहित था। परिवार में उसकी विधवा माँ और दो लहीम-शहीम-सी बिन ब्याही बहनें थीं। एक का नाम रागिनी था, दूसरी का भी शर्तिया कुछ होगा। परिवार में एक नौकर था श्रीराम। गठा हुआ बदन, साँवला रंग और छोटा कद। उसके नाम की पुकार सुबह के वक्त कुछ ज्यादा ही होती थी। मालिक मकान के परिवार का मानना था कि इस बहाने भगवान का नाम जबान पर आ रहा है। वे राम पर श्रद्धा रखने वाले सीधे-सच्चे लोग थे, हाथ में गंडासा लेकर राम-राम चिल्लाने वाले नहीं। ऐसे लोग तब अंडे के भीतर जर्दी के रूप में होंगे तो होंगे, बाहर नहीं फुदकते थे। बेचारा श्रीराम अपने नाम का खामियाजा दौड़-दौड़ कर भुगत रहा था। परिवार वाले उसे काम से कम बेवजह ज्यादा पुकारते।

एक दिन सुबह के वक्त मैं खेलता हुआ मकान मालिक के आँगन में जा पहुँचा। सामने रसोई में श्रीराम कुछ तल-भुन रहा था और मुझ से भी बतियाता जा रहा था। तभी अचानक न जाने क्या हुआ कि आँगन में एक ओर बने गुसलखाने का दरवाजा भड़ाम से आँगन में आ गिरा। भीतर मकान मालिक की बहन नहा रही थी। दरवाजा गिरते ही वह उकड़ूँ अवस्था में न जाने किस जानवर की-सी चाल चलती तथाकथित कोने में खिसक गयी- श्रीराम को पुकारती हुई। श्रीराम ने रसोई से निकल कर श्रीकृष्ण की सी हरकतें कीं। उसने दोनों हाथों से टिन का दरवाजा उठाया, उसकी आड़ से गुसलखाने के भीतर एक भरपूर नजर डाल कर दरवाजा चौखट से यूँ टिका दिया जैसे लाठी दीवार से टिकाते हैं। आइये दो मिनट का मौन धारण कर उस लड़की की हिम्मत को दाद दें। ऐसे गुसलखाने कई बार देखे कि जिनके भीतर जाते ही गूँगा आदमी भी गवैया बन जाता है। मगर वैसा चौखट से जुदा, कील-कब्जों से सर्वथा विरक्त दरवाजे वाला बाथरूम फिर देखने में नहीं आया और न नहाती हुई लड़की ही फिर कभी दिखी। समय भी कई बार अजीब हरकत कर बैठता है। अब भला लॉलीपॉप की उम्र के बच्चे को शेविंग किट भेंट करने की क्या तुक है?

शाम का वक्त है। पिता मेरा हाथ थामे द्वारका स्टोर बाजार (शायद यही नाम था) की ओर जा रहे हैं। कंधे में झोला है, झोले में तेल के लिये डालडा का डमरूनुमा डब्बा। राशन लेने निकले हैं। दुकान में भीड़ है। पिता उधार वाले हैं, उनका नम्बर देर तक नहीं आता। मैं काउण्टर से सट के खड़ा हूँ। खड़े-खड़े टाँगें दुखने लगी हैं। छत से टँगे तराजू में जब सामान तोल कर उतारा जाता है तो उसका एक पल्ला पेंडुलम की तरह झूलता है और मैं हर बार अपना सर बचाने के लिये पीछे हटता हूँ। यह दृश्य उधार वाले ग्राहक के प्रति दुकानदार की नापसंदगी के प्रतीक के रूप में मुझे खूब याद है। यह बिम्ब भी अकसर कोंचता है। तगादा-सा करता हुआ यादों के मुहाफिजखाने में कहीं मौजूद है। इसका भी कोई इस्तेमाल नहीं हो पाया।

पिता दफ्तर से दो-एक किलो रद्दी कागज उड़ा लाये हैं, जिन्हें बेच कर कुछ पैसे मिल जायेंगे। शाम के झुरमटे में साइकिल में मुझे साथ लिये कबाड़ी के पास जा रहे हैं। साइकिल दुकान के बाहर खड़ी कर मेरा हाथ थामे पानी-कीचड़ से बचते आगे बढ़ते हैं कि एकाएक बड़ी फुर्ती से मुझे गोद में उठा कर साइकिल की ओर भागने लगते हैं। बहुत देर तक ताबड़तोड़ साइकिल चलाते रहते हैं। साँसें बुरी तरह फूली हुई हैं। मैं कुछ भी समझ नहीं पाता, डरा-सहमा-सा साइकिल का हैंडल कस कर पकड़े हूँ। बाद में पिता बताते हैं कि कबाड़ी की दुकान में सीआईडी का आदमी खड़ा था ताकि उन्हें सरकारी कागज बेचते रंगे हाथ पकड़ ले। पिता के मुताबिक साइकिल ने इज्जत रख दी, वर्ना जेल जाना तय था। उन्हें अपनी साइकिल पर बड़ा नाज था। बकौल उनके वह मामूली साइकिल नहीं थी, रेलवे की थी। रेलवे की साइकिल का मतलब अब वही जानें। शायद ‘रेले’ को रेलवे कहते हों। जहाँ तक मुझे याद है, वह साइकिल उनकी अपनी नहीं थी, किसी की मार रखी थी।

देहरादून की ये यादें सन् 1971 के आस-पास और उसके कुछ बाद की हैं। समय का अंदाज एक घुँधली-सी याद के सहारे लगा पाता हूँ। शाम को रोशनदानों में बोरे ठूँस दिये जाते थे और कमरे के अंदर जलती हुई ढिबरी को गुनाह की तरह छिपाया जाता। बाहर घटाटोप अंधेरा। यकीनन उस समय सन् 71 की भारत-पाक जंग चल रही होगी। उसी के चलते अंधेरे का राज था- ब्लैक आउट। रोशनी से परहेज जंग में ही किया जाता है। न सिर्फ दिये की रोशनी से बल्कि दिमाग पर भी स्याह गिलाफ चढ़ा दिये जाते हैं। जो कोई अपने दिमाग पर पर्दा न डाले, युद्घ के वास्तविक कारणों, जो कि अमूमन कुछ लोगों के अपने स्वार्थ होते हैं, पर तर्कसंगत बात करे, वह गद्दार है। सामान्य दिनों में देश को अपनी माँ कह कर उसके साथ बलात्कार करने वाले अपनी माँ के खसम उन दिनों खूब देशभक्ति का दिखावा करते हैं।

माँ बीमार है, अस्पताल में भर्ती है। पिता दफ्तर, अस्पताल और घर सब जगह दौड़े फिर रहे हैं। मैं दिन भर घर में छोटे भाई के साथ रहता हूँ। यह भाई कब कहाँ से टपका, मुझे याद नहीं। मैं खुद बहलाये जाने की उम्र का हूँ, उसे नहीं बहला पाता। उसे झुलाने, थपकियाँ देने के अलावा बोतल से दूध पिलाता हूँ और अपनी समझ के मुताबिक पानी में चीनी घोल कर देता हूँ। शहद वाले निप्पल से कई बार बहल भी जाता है। उसे बहलाते हुए अकसर मुझे नींद आ जाती है। रोते-रोते थक कर वह भी सो जाता है। गर्मियों के दिन, दरवाजे चौपट खुले हुए।

शाम को पिता दफ्तर से लौट कर खाना बनाते हैं। फिर छोटे भाई को गोद में लिये एक हाथ से दरवाजे में ताला लगाने का करतब करते हैं। कंधे में बिस्तरा, झोले में खाना और चाय का सामान, एक हाथ में स्टोव लिये मुझे साथ लेकर पैदल अस्पताल जाते हैं। अस्पताल के बरामदे में लकड़ी की दो बेंचों के मुँह आपस में जोड़ कर बिस्तरा बिछाया जाता है, जिसमें दोनों बच्चे सो जाते हैं। पिता रात भर माँ और हमें देखते हैं। यह सिलसिला न जाने कितने दिन, लेकिन कई दिनों तक चला। दून अस्पताल की धुँधली-सी यादें हैं। गेट के बाहर सड़क में खाली शीशियाँ बिका करती थीं। तब अस्पताल में अनार के जूस-सा दिखने वाला एक घोल भी मरीजों को मिलता था, जिसके लिये लोग शीशी खरीदते थे। समझदार लोग शीशी घर से लाते, दस-बीस पैसे की बचत हो जाती। यह घोल मिक्चर कहलाता और हर मर्ज में मुफीद मान कर दिया जाता था। मिक्चर स्वाद में शायद कसैला-सा होता था लेकिन मीठा तो हरगिज नहीं।

उन्हीं दिनों कभी मैंने पिता से पूछा कि क्या इंदिरा गांधी तुमको जानती है ? क्योंकि वह खुद को सरकारी नौकर बताते थे और लोग कहते थे कि सरकार इंदिरा गांधी की है। मतलब कि वह इंदिरा गांधी के नौकर हुए। मालिक अपने नौकर को जानता ही है। मेरा सवाल ठीक था। ऐसे ही एक बार मैंने उनसे पूछा, जब मैं तुम्हें याद कर रहा था तब तुम कहाँ थे, क्या कर रहे थे।

देहरादून की यादें बस इतनी-सी है। शायद सन् 74 में देहरादून छूट गया और आज तक फिर कभी वहाँ जाने का इत्तेफाक नहीं हुआ। कई चीजें और वाकयात आज भी यूँ याद हैं जैसे हाल ही की बात हो। पिता का दफ्तर, पास ही में चाय की दुकान, तिराहे पर साइकिल मैकेनिक गुलाटी। उसके बाँये मुड़ कर थोड़ा आगे अहाते के भीतर हमारी कोठरी। चित्रकार होता तो ये सब कैनवस में उकेर सकता था।

फिर पिता का तबादला अल्मोड़ा हो जाता है, बकौल उनके ऑन रिक्वेस्ट। अल्मोड़ा आकर हम गाँव में रहने लगे। पिता गाँव से शहर नौकरी करने आते-जाते हैं। कुछ समय बाद माँ फिर बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हो जाती है। पता नहीं क्या मर्ज था। पिता तीमारदारी और नौकरी साथ-साथ करते हैं। मुझे ननिहाल भेज दिया जाता है। एक दिन नानी के साथ माँ से मिलने गया था। याद नहीं हमारी क्या बातें हुई थीं। स्टूल में बैठा पाँव हिलाता उसे देखता रहा। पिता दहेज में मिले तांबे-पीतल के थाली-परात (जो कि उनकी गैरमौजूदगी के कारण ननिहाल में सुरक्षित थे) बेच-बेच कर दवा-दारू कर रहे थे।

माँ से वह आखिरी मुलाकात थी। माँ की याद मेरे लिये कभी भी भावुक कर देने वाली नहीं रही। ऐसा शायद इसलिये कि उसका मेरा साथ काफी कम रहा। हाँ, मुझे काठ का बना एक गोल डब्बा अकसर याद आता है। धानी रंग के डब्बे में लाल-हरी फूल-पत्तियाँ बनी थीं। माँ का सपना था कि कभी पैसे जुटे तो अपने लिये नथ बनावाऊँगी, यह डब्बा नथ रखने के काम आयेगा। वह डब्बा मैं संभाल कर नहीं रख पाया। माँ साक्षर थी, मुझे पढ़ाया करती थी। गाँव में एक बार उसने मेरे पूछने पर पशुओं की मिसाल देकर बताया कि इनसान के बच्चे भी इसी प्रक्रिया से पैदा होते हैं। मैं हैरान होता हूँ इस बात को सोच कर। ऐसी बातें आजकल की उच्च शिक्षित माँएं भी अपने बच्चों को बताने की जुर्रत नहीं करतीं। तब तो बच्चा अगर किसी बात पर ‘मजा आ गया’ कहता तो तमाचा खाता था। क्योंकि तब माँ-बाप को मजा सिर्फ एक ही चीज में आता था, जिसके नतीजे में कम से कम दर्जन भर बच्चे हर वक्त मजे को बदमजगी में बदल रहे होते, जिन्दगी अजीरन बन जाती।

सुबह का समय है। दिन जाड़ों के धूप निकली है मगर खुद ठिठुरी हुई-सी। आँगन में छोटे मामा मुझे पीट-पीट कर हिन्दी पढ़ा रहे हैं। ऊपर सड़क में जो एक दुकान है, वहाँ से बीच वाले मामा को आवाज देकर बुलाया जाता है। मामा मुझे भेज देते हैं कि जाकर पूछ आऊँ  कि क्या काम है। ताकि अगर कोई बबाली काम हो तो बहाना बनाया जा सके। पाले से भीगे पथरीले रास्ते पर नंगे पाँव चलता हुआ करीब आधा किमी दूर दुकान में जाता हूँ। दुकानदार मुझे लौटा देता है कि तेरे मतलब की बात नहीं, नवीन को भेज। थोड़ी देर बाद मामा आकर बताते हैं कि अस्पताल में माँ चल बसी। तब डाक विभाग के हरकारे डाक के थैले लेकर पैदल चला करते थे। उन्हीं से पिता ने जवाब भिजवाया था। मेरे कॉपी-किताब किनारे रखवा दिये जाते हैं। मेरे लिये सीढ़ियों में बोरा बिछा दिया गया। लोग कहते हैं, देखो कैसा बड़ों की तरह रो रहा है। वे लोग दहाड़ें सुनने के आदी थे। दहाड़ें मारते हुए सर फोड़ने को आमादा आदमी को संभालने और संसार की असारता पर बोलने के सुख से अनजाने ही उन्हें वंचित कर रहा था मैं।

इसके शायद दूसरे ही दिन छोटे मामा मुझे पिता के पास गाँव छोड़ गये, जहां पिता माँ का क्रियाकर्म कर रहे थे। शायद तकनीकी मजबूरी के कारण ऐसा करना पड़ा होगा। मैं काफी छोटा था और चचा-ताऊ  कोई थे नहीं। हिन्दुओं के शास्त्र भारतीय संविधान की तरह काफी लचीले हैं, जैसा बाजा बजे वैसा नाच लेते हैं। चाहें तो हर रास्ता बंद कर दें और अगर मंशा हो तो हजार राहदारियाँ खुल जाती हैं।

माँ के क्रियाकर्म से निपट कर पिता फिर दफ्तर जाने लगे। सुबह मेरे लिये खाना बना कर रख जाते हैं। रात को 8-9 बजे लौट कर आते हैं। टॉर्च और जरकिन लेकर एकाध किमी दूर नौले से पानी लाते हैं। खाना बनाते हैं। उनके लौटने तक मैं दूसरों के घरों में बैठा रहता हूँ। बाद में पिता पानी का जरकिन सुबह साथ लेकर जाते हैं जिसे रास्ते में पड़ने वाले गाँव में रख जाते हैं। शाम को उसी दिशा में नौले जाने का फेरा बच जाता है। मैं दिन भर सूखे पत्ते-सा यहाँ-वहाँ डोलता रहता। दूसरे बच्चों के साथ गाय-बकरियाँ चराने जाता (अपनी कोई गाय बकरी नहीं थी)। दूसरे बच्चों की देखादेखी कीचड़नुमा पानी के तालाब में नहाता, काफल के पेड़ों में चढ़ता-गिरता। लगभग साल भर यूँ ही बीत गया। इसी दरमियान मैं स्कूल भी जाने लगा, कुछ उसी तर्ज पर जैसे गाय-बकरियाँ चराने जाता था और वह भी सीधा तीसरी क्लास में। शायद इसलिये कि मेरी हिन्दी चौथी-पाँचवी के बच्चों से अच्छी थी। मास्टर का बोला हुआ मैं कम या बिना गलती के लिख लेता। शायद इसी बात से मास्टर साहब प्रभावित हो गये हों। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि शिक्षा की बुनियाद रखते ही हिल गयी। इस ऐतबार से मेरी गिनती घोड़े में न गधे में। बाद में दुश्मनों ने काफी समझाया-उकसाया कि भई ऊपर का माला पक्का करवा लो और दीवारों में पलस्तर भी। अब भला झुग्गी की छत भी कहीं सीमेंट और लोहे की हो सकती है।

माँ की मौत के साल बीतते-बीतते पिता जब्त नहीं कर पाये और दूसरी शादी की बातें होने लगीं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण मुझे बताया गया कि मेरी देखभाल कौन करेगा। घर, खेती-बाड़ी सब वीरान हो जायेंगे। यह सब बहाना था, बकवास था। पिता साफ झूठ बोल रहे थे। कारण शुद्ध रूप से शारीरिक था, इतनी समझ मुझमें तब भी थी (बाकी आज भी नहीं)। पिता अपने निजी, क्षणिक सुख के लिये शादी करना चाह रहे थे। मुझे देखभाल की ऐसी कोई जरूरत नहीं थी और खेती-बाड़ी ऐसी माशाअल्लाह कि आम बो कर भी बबूल न उगे।

पिता ने बड़ा ही अराजक किस्म का जीवन जिया था। अपनी जवानी का लगभग तीन चौथाई हिस्सा हरिद्वार, मुरादाबाद और बिजनौर जैसी जगहों पर किसी छुट्टे साँड-सा बिताया था। बाद में उनके जीजा जी ने पकड़-धकड़ कर उनकी शादी करवायी थी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, उनकी शादी उस समय के हिसाब से काफी देर में हुई थी। पिता मुरादाबाद में किसी भाँतू कॉलोनी का जिक्र अक्सर किया करते थे कि गुरु हम वहाँ शराब पीने जाया करते थे़.़.। बाद में मेरे एक दोस्त ने भाँतू कॉलोनी के बारे में जो मुझे मोटा-मोटा बताया, उसे मैं यहाँ जानबूझकर नहीं कह रहा। क्योंकि हो सकता है कि बात गलत हो और भाँतू कॉलोनी का कोई शरीफजादा मुझ पर मुकदमा लेकर चढ़ बैठे। पिता कहते थे कि हमने अपना ट्रांसफर बिजनौर या मुरादाबाद से देहरादून इसलिये करवाया ताकि हम जौनसार की ब्यूटी देख सकें। देखी या नहीं, वही जानें।

तो पिता ने दूसरा विवाह कर लिया। नतीजतन बाप-बेटे के बीच जो एक अदृश्य मगर नाजुक-सा धागा होता है उसमें गाँठ पड़ गयी, शीशे में बाल आ गया। पिता के पास शायद वह आँख नहीं थी कि उस बाल को देख पाते। उस समय वह सिर्फ अपनी खुशी देख रहे थे। मानो मैं गिनती में था ही नहीं। अगर था भी तो शायद वह मान कर चल रहे थे कि उनकी खुशी में मैं भी खुश हूँ या कुदरती तौर पर मुझे होना चाहिये। मैं इस तरह का बच्चा नहीं था कि पूड़ी-पकवान और हो-हल्ले से खुश हो लेता, बहल जाता। पिता जो कर रहे थे वह मुझे हरगिज मंजूर नहीं था। लेकिन मैं उन्हें रोक भी नहीं सकता था। विमाता से मैं कई सालों तक हूँ-हाँ के अलावा कुछ नहीं बोला। मजबूरी में बोलना भी पड़ा तो ऐसे कि जैसे किसी और से मुखातिब होऊँ। आज भी किसी संबोधन के बिना ही बातचीत करता हूँ। दोषी मेरी नजर में पिता थे, विमाता की क्या गलती? पिता ने मेरे लिये अजीब-सी स्थिति पैदा कर दी थी। मैं उनकी इस हरकत (शादी) को कभी भी नहीं पचा पाया। जाहिर-सी बात कि मैं कोई सफाई नहीं दे रहा, सिर्फ अपनी स्थिति और मानसिक बनावट का बयान कर रहा हूँ। विमाता का व्यवहार कभी मेरे लिये बुरा नहीं रहा। संबंध हमारे चाहे जैसे रहे हों पर मान में मेरी ओर से कोई कमी नहीं और मान मेरी नजर में कोई दिखावे की चीज नहीं।

विमाता की एक बात ने मुझे तब भी काफी प्रभावित किया था। शादी के एकाध महीने बाद वह एक दिन पूड़ी-पकवानों की सौगात लिये मेरी ननिहाल अकेले जा पहुँची कि मुझे अपनी ही बेटी समझना, इस घर से नाता बनाये रखना। ऐसी बातें जरा कम ही देखने में आती हैं। आज मेरे संबंध ननिहाल में चाहे तकरीबन खत्म हो गये हों पर गाँव में मेरा जो परिवार है उसके ताल्लुकात मेरी जानकारी में अच्छे हैं, सामान्य हैं।

इस शादी से पिता शुरुआती दिनों के अलावा कभी खुश नहीं रह पाये। साल भर भी नहीं बीतने पाया कि लड़ाई-झगड़े शुरू हो गये। मनमुटाव का ऐसा कोई खास कारण नहीं, बस झगड़ना था। पिता महिलाओं के प्रति एकदम सामंती नजरिया नहीं रखते थे (उनके कद के हिसाब से सामंती शब्द कुछ बड़ा हो गया शायद)। गाँव में उनका मजाक इसलिये उड़ाया जाता कि यह आदमी अपनी बीवी को तू नहीं तुम कह कर पुकारता है। बावजूद इसके झगड़ा होता था। हाँ, पिता काफी हद तक टेढ़े थे, कान के कच्चे और कुछ हद तक पूर्वाग्रही भी। ऐसे लोग हर जगह होते हैं जो दानों पक्षों के कान भर कर झगड़ा करवाते हैं और खुद दूर से मजा लेते हैं। विमाता का भी यह दूसरा विवाह था, एक तरह की अल्हड़ता मिजाज में काफी कुछ बची रह गयी थी और सौंदर्यबोध का सिरे से अभाव। हालाँकि अपनी नजर में कोई भी फूहड़ नहीं होता, सभी का अपना-अपना सौंदर्यबोध होता है। पिता बड़े सलीकेदार, गोद के बच्चे को भी आप कह कर बुलाने वाले और कबाड़ से जुगाड़ पैदा करने वाले आदमी थे। नहीं निभनी थी, नहीं निभी।

पिता के दिमाग की बनावट बेहद लचकदार थी। वह कई मामलों में वैज्ञानिक सोच रखने वाले, परम्पराओं के रूप में कुरीतियों को न ढोने वाले व्यक्ति थे। उनका गाँव वालों से कहना था कि हमें मडुवा-मादिरा जैसी परम्परागत और लगभग निरर्थक खेती को छोड़ ऐसी चीजें उगानी चाहिये, जिनकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। खुद हमें इन चीजों को खरीदना पड़ता है। मसलन हल्दी, अदरक, गंडेरी, आलू, दालें वगैरा। फलों के पेड़ और फूल भी। हमें शहरों में जाकर बर्तन मलने, लकड़ी बेचने जैसे जिल्लत भरे कामों के करने की जरूरत नहीं है। जहाँ तक जंगली जानवरों द्वारा फसल को नुकसान पहुँचाने की बात है, अगर सारा गाँव इस काम को करने लगेगा तो बाड़ और पहरे का भी इंतजाम हो जायेगा। एक अकेला आदमी ऐसा नहीं कर सकता। उनके दिमाग की बनावट को समझने के लिये एक और मिसाल देने का लोभ नहीं छोड़ पा रहा। गाँव में कोई किसी को लोटे के साथ अपने खेत में बैठा देख ले (रिवाज दूसरे के खेत में ही बैठने का है) तो गरियाने लगता है कि अरे बेशर्म तुझे गंदगी फैलाने को मेरा ही खेत मिला? बैठा हुआ आदमी बीच में ही उठ कर किसी और के खेत में जा बैठता है। पिता के विचार इस बारे में जरा अलग और क्रांतिकारी थे। उनका कहना था कि एक तो तुम उसके खेत को इतनी महान खाद मुफ्त में दो और बदले में गाली खाओ, क्या फायदा? क्यों न धड़ल्ले से ससुर अपने खेत में जाकर बैठो। खुला खेल फर्रुखाबादी।

एक रोज सीढ़ियों से लुढ़क कर मैं अपना माथा फुड़वा बैठा। लोगों ने घाव में चीनी-चरस ठूँस कर कपड़ा बाँध दिया। कुछ दिन बाद घाव पक कर रिसने लगा, उसमें मवाद पड़ गया। पिता एक दिन मुझे अल्मोड़ा ले आये। जहाँ दो-एक हफ्ते तक घाव की मरहम-पट्टी होती रही और ढेर सारे पेंसिलीन के इन्जेक्शन लगे। पिता मुझे साथ लेकर दफ्तर में रहने लगे। कहीं से एक स्टोव ले आये, अटक-बिटक के लिये सरकारी हीटर था ही। भगौने का ढक्कन तवा, उल्टी थाली चकला, गिलास बेलन बन गया। बैंच-टेबलें खटिया और पर्दे-कुशन बिस्तरा। कुछ ही समय बाद पास ही में किराये की कोठरी (फिर कोठरी) मिल गयी। मेरा दाखिला स्कूल में करवा दिया गया। यह सब सन् 81-82 की बात है।

इसके बाद दो-चार बार गाँव जाना हुआ, पर वहाँ मेरा मन नहीं लगा। मुझे शहर रास आने लगा था। आखिरी बार गाँव मुझे यज्ञोपवीत संस्कार के लिये ले जाया गया। यह तब की बात है जब नवाज शरीफ पहली बार (जाहिर-सी बात है कि पाकिस्तान के) प्रधानमंत्री बने थे। गाँव में रहने का अनुभव बस तीनेक साल का है।

पिता का गाँव आना-जाना लगा रहा। शायद उन्होंने जादू टोना भी एकाध बार करवाया- मेरे गाँव न जाने को लेकर। पिता ने फिर से चार संतानें पैदा कीं। पहली मरी हुई, बाकी तीन स्वस्थ हैं, पर शायद प्रसन्न न हों। उन्होंने संतत्ति के रूप में अपनी अंतिम रचना रिटायरमेंट के बाद प्रस्तुत की। गोया रिटायर कर दिये जाने से खुश न हों और अपनी रचनात्मक क्षमता साबित कर उन्होंने सरकार को मुँहतोड़ जवाब दिया हो।

रिटायर होने के ठीक अगले दिन उन्होंने सड़क में बैठ कर लॉटरी बेचना शुरू कर दिया। ऐसा करने की हार्दिक इच्छा उनकी काफी समय से थी। उनका खयाल था कि जिस दिन वह लॉटरी बेचने लगेंगे उस दिन सब (दूसरे लॉटरी वाले) अपना बिस्तरा गोल कर लेंगे। और कि गुरु, हमारे चारों ओर लोग यूं उमड़ पड़ेंगे जैसे गुड़ में मक्खियाँ लगती हैं। उनका खयाल था कि वह इस धंधे में लखपति़.़. शायद करोड़पति भी बन सकते हैं। उनका कहना था कि हम यहाँ से अपने गाँव तक एक पुल बनायेंगे। वगैरा-वगैरा। हाँ, तो लोग उनके इर्द-गिर्द खूब मँडराये। लोगों ने दो-एक महीने में ही गुड़ में से ‘ड़’ चूस लिया और ‘गु’ छोड़ दिया। अब क्योंकि ‘ड़’ के बिना ‘गु’ अकेला मीठा नहीं होता, इसलिये मक्खियों ने दूसरे बाग-बगीचों का रुख किया। खेल खतम, पैसा हजम। बच्चा लोग बजाओ…, ताली बजाने को कोई मौजूद नहीं था।

उन जैसा स्वप्न विश्लेषक शायद ही कोई दूसरा हो, एक नम्बर वाली लॉटरी के मामले में। मसलन वह कहेंगे कि गुरु हमने कल रात सपने में गाय को सीढ़ी चढ़ते देखा, हमें उसकी चार टाँगें दिखायी दीं। तो चढ़ने का बना चव्वा और चार टाँगों का भी चव्वा ही बनता है। इन दोनों को जोड़ कर बना अट्ठा। मतलब कि आज चव्वा और अट्ठा पकड़ लो और सपोर्ट में रख लो दुक्की। कई दिनों से बंद पड़ी है दुक्की। सपने में अगर शादीशुदा औरत दिखे तो मतलब कि आज जीरो खुलेगा, क्योंकि औरतें बिन्दी लगाती हैं। कुँवारी लड़की का नम्बर अलग बनता था और अगर प्रश्नकर्ता सपने में महिला के साथ कुछ ऐसी-वैसी हरकत कर रहा हो तो उससे कुछ और नम्बर निकलता था। मैं अधिकांश प्रतीकों को भूल गया हूँ, जो कि अद्भुत थे। सपनों से नम्बर निकालने के पीछे जो कारण और तर्क थे वो कल्पनातीत थे। मेरे खयाल में यह सट्टे के तौर-तरीके हैं और पिता ने मैदानी इलाकों में रहते हुए सट्टा न खेला हो, ऐसी गलती उनसे कैसे हो सकती थी?

एक बार किसी ने आकर उन्हें बताया कि मैंने कल रात खुद को हाथी पर बैठे देखा। पिता ने इसका मतलब उन्हें बताया कि आज अट्ठा पड़ेगा। दो-एक दिन बाद वही साहब कहने लगे कि मैं जमीन में खड़ा हूँ। हाथी मेरे बगल में खड़ा है। पिता ने कहा कि आज आप चव्वा पकड़ लें। प्रश्नकर्ता ने कहा ऐसा कैसे? जवाब मिला – अब क्या जिन्दगी भर हाथी में ही बैठे रहेंगे? परसों हाथी में थे तो अट्ठा खुला, आज हाथी से उतर गये हैं तो उसका जस्ट आधा कर लीजिये। कौन-सा कठिन है।

मेरे एक दोस्त ने उन्हें एक काल्पनिक सपना कह सुनाया कि मैंने जंगल में आग लगी देखी तो उस पर पानी डालकर बुझा दिया। प्रश्नकर्ता का मकसद लॉटरी का नम्बर निकलवाना नहीं था, उसे पिता के जवाब में दिलचस्पी थी। पिता ने बिना सोचे जवाब दिया- हाँ ठीक तो है। आपने आग में पानी डाल दिया, आग बुझा दी… बस। बड़ा आसान है। योगेश बाबू, पढ़े-लिखे जवान आदमी हो, इतना भी नहीं समझते कि इस उम्र में ऐसे सपने आते हैं।

दो-एक महीने तक अपने आसपास मक्खियों का भिनभिना महसूस कर पिता अज्ञातवास में गाँव चले गये। करीब छ: महीनों तक हम दोनों ने एक दूसरे की कोई खोज-खबर नहीं ली। मैं इस अर्से में कबाड़ से जुगाड़ पद्धति से जिन्दा रहा। पिता की पेंशन न जाने कहाँ अटक गयी थी। वह ऐसे महारथी थे कि गाँव में रह कर भी हरकारों के जरिये लॉटरी के शेयर मार्केट में अपना दखल बनाये रहे। सपने देख-देख कर नम्बर निकाल रहे थे। लॉटरी हार- जीत रहे थे। अब हरकारे कितनी ईमानदारी बरतते होंगे कहना मुश्किल है। वह छ: महीने बाद अचानक प्रकट भये एक दिन गोर्की जैसी मूछें बढ़ाये हुए। पेंशन चल पड़ी थी।

लॉटरी उनसे तब तक नहीं छूटी जब तक सरकार ने इसे बंद न कर दिया। इस धंधे में असफल रहने का कारण उनकी नजर में मैं था। बकौल उनके- गुरु, हम तो क्या का क्या कर दें, इस शख्स से जो हमें इतना-सा सहयोग मिल जाये। मैंने कब उनके हाथ बाँधे, उन्होंने मेरा कहा कब किया, याद नहीं। जो भी चीज उनके मन मुताबिक न होती, उसका ठीकरा मेरे सर फोड़ा जाता। उन्होंने कुछ ऐसी बातें भी मेरे साथ चस्पा कर रखी थीं कि जिनका मुझ से कोई मतलब नहीं था। उनके कहे मुताबिक वह बीमार पड़ना तब से शुरू हुए जब से उन्होंने भात खाना शुरू किया। वर्ना पहले तो हम उस घर में ही नहीं जाते थे जहाँ चावल पक रहा हो। गुरु, हमारी शादी (पहली) में सात गाँवों की पंचायत बैठी, सिर्फ हमारी वजह से भात का प्रोग्राम कैंसिल कर पूड़ियाँ बनीं। तो चावल वह मेरी वजह से अपनी जान पर खेल कर खाये जा रहे थे। जबकि सच यह है कि मुझे चावल कोई इतने पसंद नहीं कि भात खाये बिना खाया हुआ सा न लगे। पिता सुबह को चावल बना कर परोस दें तो मैं क्या कर सकता था, सिवाय इसके कि चुपचाप खा लूँ और देखने वाले की नजर में अपने बाप की सेहत से खिलवाड़ करता हुआ रंगे हाथों पकड़ा जाऊँ। गुनहगार कहलाऊँ। पिता दूसरों की नजर में बुजुर्ग, सीधे और भलेमानुष, मैं कमीना और बूढ़े बाप को सताने वाला। परिस्थितियाँ कभी भी मेरे अनुकूल नहीं रहीं।

मकान मालिक लोगों की जो जमीन यूँ ही पड़ी-पड़ी कूड़ेदान का काम कर रही थी, पिता ने उसमें शाक-सब्जियाँ उगाना शुरू कर दिया। यह काम वह पहले भी करते ही थे। अब होलटाइमर थे। बारहों महीने मौसम के मुताबिक सब्जी खेत में मौजूद। सब्जी तोड़-तोड़कर पास-पड़ोस में बाँट रहे हैं। इस-उस को दे रहे हैं। पेड़ों को पब्लिक नल से पानी ढोकर सींच रहे हैं। और मजे की बात कि न आप मिर्च खाते हैं न बैगन। बैगन का नाम आपके मुताबिक दरअसल बेगुन है, इसमें कोई गुण नहीं होता। भगवान इसकी रचना भूलवश कर बैठा। अचार के सीजन में बड़े-बड़े केनों में अचार ठुँसा पड़ा है। लहसुन छील-छील कर उँगलियों के पोर गल गये हैं। आपके कथनानुसार कोई खाता नहीं, वर्ना हम तो ससुर टर्रे का भी आचार डाल दें। टर्रा मतलब मेंढक। बड़ियों के मौसम में बड़ी मुंगौड़ियों की रेलम-पेल। बड़ी पिता के मुताबिक स्वास्थ्य खराब करने वाली चीज है, उसकी तासीर ठंडी होती है। एक बार उन्होंने 17 किलो माश की बड़ियाँ बना डालीं। 17 किलो माश को धोना, साफ करना और सिल में पीसना अपने आप में एक बड़ा काम है- संस्था का काम है। पर उन्होंने पीस डाला रो-धोकर मुझे सुनाते हुए रुआँसी आवाज में कि मेरा कोई होता तो माश पीस देता। ऐसे चूतियापे के कामों में सचमुच मैंने कभी उनका साथ नहीं दिया। सिवाय इसके कि अचार का आम या बड़ियाँ छत में सूखने पड़ी हैं, बूँदाबाँदी होने लगी तो उन्हें उठा कर भीतर रख दूँ। सोचने वाले सोचते कि इस आदमी ने अचार-बड़ियों का कुटीर उद्योग खोल रखा है। अच्छा-भला मुनाफा हो रहा है। इसका लड़का अगर थोड़ा हाथ बँटा देता तो क्या बुरा था। आखिर यह बूढ़ा आदमी इतनी मेहनत किसके लिये कर रहा है। सचमुच बेटा इसका नासमझ है और कमीना भी। मुझे कहीं पनाह नहीं थी।

पाव या आधा लीटर दूध को दिन भर में चार-छ: बार उबाल कर उसकी मलाई निकाली जा रही है, फिर 10-15 दिन में उससे घी बन रहा है। आने वाले को दिखाया जाता है- देखिये, हमारे हाथ का घी, मलाई से बनाते हैं हम। देखने वाला वाह करता, मेरा मन उसे तमाचा जड़ने का होता। क्योंकि वह 100 ग्राम जो घी है मैं जानता हूँ वह जैतून और बादाम के तेल से भी महंगा पड़ गया है। और उस पर तुर्रा ये कि अमूमन घी अचानक गायब हो जाता। पूछने पर पता चलता कि फलाँ को दे दिया। बेकार चीज है, खाँसी करता है।

ताश खेलना उन्हें बेहद पसंद था। उनकी नजर में यह एक महान खेल था जो कि दिमाग के लिये शंखपुष्पी और रोगने-बादाम जैसी प्रचलित चीजों से ज्यादा गुणकारी था। उनके मुताबिक अगर बच्चों को अक्षर ज्ञान ताश के पत्तों के जरिये करवाया जाये तो वे जल्दी सीखेंगे और उनका दिमाग भी खुलेगा। जरा ऊँचा सुनते थे, ऐसे मौकों पर मैं चिढ़कर लुकमा देता कि वे बच्चे नौकरी-रोजगार से न भी लग पाये तो जुआ खेल कर रोजी कमा ही लेंगे। सामने बैठा आदमी इस पर हँसने लगता। पिता सोचते कि वह उनकी बात पर हँस रहा है। इसलिये जोश में आकर दो-चार ऐसी बातें और कह जाते। मैंने उन्हें घंटों अकेले ताश खेलते देखा है। ताश में एक खेल होता है ‘सीप’। यह खेल उन्हें ज्यादा ही पसंद था। चाहे जितनी तबियत खराब हो, सीप का जानने वाला कोई आ जाये तो कांखते-कराहते उठ बैठते और खेल जारी रहने तक सब दर्द तकलीफ भूल जाते। अगर दो-एक बाजी हार जाते तो चिढ़ कर खेल बंद कर देते कि- बंद करिये, हमारी तबियत ठीक नहीं। पता नहीं साला केंसर है, न जाने क्या है। जीतने पर उनका जोश बढ़ जाता। फिर सामने वाला खिलाड़ी चाहे गणित में गोल्ड मैडलिस्ट क्यों न हो, उसे सुनना पड़ता कि गुरु, आपका हिसाब बड़ा कमजोर है। कौन पत्ता फेंक दिया, कौन-सा हाथ में है, इत्ता-सा हिसाब नहीं रख सकते।

खिलाने-पिलाने के बड़े शौकीन थे। तरह-तरह के प्रयोग खाने में अकसर होते रहते। करेले की रसेदार सब्जी मैंने उन्हीं के हाथ बनी खायी। सब्जी परोसते हुए उन्होंने रहस्योद्घाटन किया कि असल में करेला ऐसे नहीं बनता। इसे बारीक काट कर तवे में सूखा बनाया जाता है। जरा भी कड़वा नहीं होता। एक बार उन्होंने मेरे कुछ दोस्तों को बुलवा भेजा। आइये गुरु, देखिये आज हमने आपके लिये क्या बनाया है! उस दिन बिच्छू घास की सब्जी बनी थी। शराब मैंने पहली बार उन्हीं के साथ चखी। जब कभी पास में पैसे हों, मूड हो तो कहते वाइन लेगा, है मूड? आज साली ठंड भी है यार। मैं चुपचाप हाथ पसार देता और जाकर पव्वा ले आता। दोनों बाप-बेटे हमप्याला हम निवाला होते, कुल्ला करके सो जाते।

आखिरी दो-तीन सालों में उनका दम बेहद फूलने लगा था इसलिये धूम्रपान छोड़ कर सुर्ती फटकने लगे थे। अब उनकी नजर में सुर्ती भी एक महान चीज थी। एक बार उन्होंने मेरे एक दोस्त को सुर्ती पेश की। दोस्त ने कहा मुझे आदत नहीं है, चूने से मुँह फट जायेगा। पिता ने उसे समझाया- गुरु, शादी से पहले लड़कियाँ भी इसी तरह डरती हैं… बाद में सब ठीक हो जाता है। आपको भी आदत पड़ जायेगी। खाया कीजिये, बड़ी महान चीज है, दिमाग तेज करती है।

कई बार वह ऐसी बातें सिर्फ कहने के लिये कह जाते कि जिसकी निरर्थकता का उन्हें खुद भी अहसास होता। मसलन, गुरु, कुत्ता बड़ा महान जीव होता है। उसके धार्मिक खयालात बहुत ऊँचे होते हैं। उसे अगर रास्ते में दूसरे कुत्ते काट खाने को न आयें तो वह रातोंरात हरिद्वार जाकर नहा आये। मेरा ऐतराज था कि जो कुत्ते उसका रास्ता रोकने को बैठे रहते हैं वो खुद क्यों नहीं उससे पहले हरिद्वार चले जाते? पिता बात बदल देते या चिढ़ जाते।

किसी को अंग्रेजी शराब पीता देखते तो कहते- ये साली बड़ी बेकार चीज है, ठर्रा बड़ी महान चीज है। ठर्रे वाले को राय होती कि ये कोई अच्छी चीज थोड़ा है, आँतें गला देती है। कम लो, अच्छी चीज लो, इंगलिश पिया करो। इसी तरह उनका दिन चाय पीने और चाय की बुराइयाँ गिनवाने में बीतता।

उनका दावा था कि अगर कोई उन्हें सात फाउंटेन पैनों में सात रंग की स्याहियाँ भर कर ला दे तो वे असल जैसा दिखने वाला नकली नोट बना सकते हैं। उनका इतना-सा काम किसी ने करके नहीं दिया और भारतीय अर्थव्यवस्था चौपट होने से बच गयी। इस नेक काम में मैंने भी सहयोग नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने कहा- देखना गुरु, अब अटलजी मैरिज कर लेंगे। सैटल हो गये हैं न। पिता जैसे थे मैंने ठीक वैसे ही कलम से पेंट कर दिये। न मैंने उनका मेकअप किया, न उन पर कीचड़ उछाला। उन्हें याद करने के बहाने माँ, जिसकी याद मुझे जरा कम ही आती है, को भी याद कर लिया और खुद अपने अतीत की भी गर्द झड़ गयी। बात से बात निकलती चली गयी, डर है कहीं रौ में कुछ गैरजरूरी न कह गया होऊँ।

मेरे लिये पिता की दो छोटी सी ख्वाहिशें थीं- एक तो मुझे किसी तरह चार-छ: बोतल ग्लूकोज चढ़ जाये। जिससे मैं थोड़ मोटा हो जाऊँ। मेरा दुबलापन उनके अनुसार सूखा रोग का लक्षण था। ग्लूकोज चढ़ने से मैं बकौल उनके ‘बम्म’ हो जाता। और दूसरी ख्वाहिश थी कि अनाथालय से मेरी शादी हो जाये। जाहिर -सी बात है कि मैंने हमेशा की तरह यहाँ भी उन्हें सहयोग नहीं किया और नतीजतन इतना दुबला हूँ कि मेरी उम्र मेरे वजन से ज्यादा है।

माँ-बेटे के कोमलतम रिश्ते की विरल अनुभूतियों का बयान : रमेश तैलंग

साहित्‍य अकादमी के पहले बाल साहित्‍य पुरस्‍कार से सम्‍मानित कथाकार प्रकाश मनु के बाल उपन्‍यास एक था ठुनठुनिया का अवलोकन कर रहे हैं चर्चित लेखक रमेश तैलंग-

कथा-पुरुष देवेन्द्र सत्यार्थी अक्सर कहा करते थे कि पाठक (आलोचक) को किसी भी कृति का मूल्याँकन लेखक की ज़मीन पर बैठ कर करना चाहिए। सत्यार्थीजी की यह उक्‍ति‍ मुझे इसलिए भी याद आ रही है कि ‘एक था ठुनठुनिया’ को पढ़ते हुए मैं कई बार कई जगह पर फिसला हूँ। शायद यही कारण है कि रचना कई बार पुनर्पाठ की अनिवार्यतः माँग करती है।

सरसरी तौर पर देखें तो एक था ठुनठुनिया एक पितृहीन पाँच साल के बच्चे की साधारण-सी कथा है जो अपनी चंचलता और विनोदप्रियता से अपनी माँ के साथ-साथ पूरे गांव वालों का प्रिय बन जाता है और किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते अपनी सूझ-बूझ, कला-प्रवीणता और मेहनत से एक दिन अपनी माँ का सहारा बनकर सफलता की ऊँचाइयाँ हासिल करता है। पर इस साधारण-सी दिखने वाली कथा में कई असाधारण बिंदु गुंफित हैं।

मसलन, पहला बिंदु तो ठुनठुनिया की माँ के ममता भरे उस सपने से जुड़ा है जिसमें वह ठुनठुनिया के बड़े तथा सक्षम होने पर परिवार के भरण-पोषण की समस्या का निदान खोज रही है। पुत्रजन्म के एक साल बाद ही पति का देहावसान किसी भी माँ के लिए बज्राधात से कम नहीं होता खासकर उस गरीब परिवार में जहाँ जीवनयापन का अर्थ सतत संघर्ष के सिवा कुछ और नहीं है- ‘‘बस यही तो मेरा सहारा है, नहीं तो भला किसके लिए जी रही हूँ मैं। ……अब जरूर मेरे कष्ट भरे दिन कट जाएँगे।…… मेरा तो यही अकेला बेटा है ….. लाड़ला! इसी के सहारे शायद बुढ़ापा पार हो जाए।’’

दूसरा बिंदु,  ठुनठुनिया की माँ के मन में पल रहे उस अज्ञात डर का है जो उसे सदैव इस आशंका से आतंकित किए रहता है कि उसका इकलोता बेटा और एकमात्र सहारा ठुनठुनिया अगर किसी कारणवश उससे दूर चला गया तो उसका क्या होगा। क्या वह उसका वियोग सह पाएगी? और एक दिन जब मानिक लाल कठपुतली वाले के साथ ठुनठुनिया सचमुच गाँव छोड़ कर चला जाता है और काफी दिनों तक माँ की सुध नहीं लेता तो माँ का यही डर प्रत्यक्ष हो कर उसके सामने आ खड़ा होता है। पूर्वअध्यापक अयोध्याप्रसाद जब ठुनठुनिया को अपने साथ लेकर गाँव लौटते हैं तो कई दिनों से बीमार पड़ी माँ का अकुलाता हृदय ठुनठुनिया के सामने उपालंभ भरे स्वर में फट पड़ता है- ‘‘बेटा ठुनठुनिया, तूने अपनी माँ का अच्छा ख्याल रखा। कहा करता था-‘माँ, माँ, तुझे मैं कोई कष्ट न होने दूँगा। पर देख, तूने क्या किया?’’

तीसरा बिंदु शैशव और किशोरावस्था के बीच झूलते ठुनठुनिया के उस निश्छल, विनोदप्रिय एवं निर्भीक स्वभाव का है जिसके तहत वह अपने गाँव गुलजारपुर के भारीभरकम सेहत वाले जमींदार गजराज बाबू को हाथी पर सवार देखकर विनोद करता है- ‘‘माँ! माँ! देखो, हाथी के ऊपर हाथी…, देखो माँ,  हाथी के ऊपर हाथी।’’ ठुनठुनिया के विनोदी एवं निर्भीक स्वभाव का वहाँ भी परिचय मिलता है जहाँ वह भालू का मुखौटा लगा कर रात को रामदीन काका सहित बहुत से गाँव वालों को पहले डराता है और कुछ दिनों बाद गाँव के ही एक उत्सव में भालू नाच दिखाने के बाद इस रहस्य का पर्दा भी खोल देता है,  बिना इस भय के कि उसकी इस शरारत के लिए उसे सजा भी मिल सकती है। यह और बात है कि उसे सजा तो नहीं मिलती, गजराज बाबू द्वारा गुलजारपुर के रत्न का खिताब अवश्य मिल जाता है।

यहाँ यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि आमतौर पर बहुत से बच्चों में पढ़ाई से हट कर कंचे खेलने, पतंग उड़ाने, पेंच लड़ाने या कुछ ऐसा कर गुजरने की इच्छा बलवती होती है जो दूसरे न कर सके। ठुनठुनिया इसका अपवाद नहीं। वह भी इन सभी कामों में अपनी महारत सिद्ध करना चाहता है और ऐसा कर भी लेता है । यही नहीं उसकी एक दबी हुई इच्छा यह भी है कि वह पढ़ाई की जगह खिलौने बनाकर या कठपुतली का नाच दिखा कर अपने तथा अपनी माँ के लिए खूब पैसा कमाए। उसकी यही इच्छा उसे पहले रग्घु काका के खिलौने बनाने तथा बाद में मानिक लाल के कठपुतली नचाने की कला के प्रति आकर्षित करती है और अचानक माँ से दूर एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ थोड़ा पैसा और शोहरत तो है पर वह माँ नहीं है जिसकी जिंदगी का हर पल उसी के सहारे टिका हुआ है।

स्कूली शिक्षा से विचलन और कम से कम समय में येन-केन प्रकारेण ज्यादा पैसा कमा लेने की चाह अंकुरण के बाद पल्लवित होती आज की नई पीढ़ी को किस तरह उनके सही लक्ष्‍य तथा अपने प्रियजनों से दूर भटका रही है इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण ठुनठुनिया के चरित्र में देखने को मिलता है।

पर वो कहते हैं न कि अंत भला सो सब भला।

अपने पूर्व अध्यापक अयोध्या प्रसाद के साथ जब ठुनठुनिया आगरा से वापस अपने गाँव गुलजारपुर लौटता है तो उसके जीवन की राह ही बदल जाती है। अब वह दोबारा स्कूल में दाखिला लेकर पढ़ाई में पूरी तरह जुट जाता है और हाईस्‍कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करता है। पढ़ाई के साथ-साथ उसकी क्रियात्मक कलाओं में अभिरुचि तथा प्रवीणता उसे एक दिन कपड़ा फैक्टरी के मालिक कुमार साहब तक पहुँचा देती है जो इंटर पास करने के बाद ठुनठुनिया को उसकी कुशलता तथा विश्वास पात्रता के चलते अपने डिजाइनिंग विभाग में असिस्टेंट मेनेजर की नौकरी दे देते हैं। इस तरह ठुनठुनिया जहाँ अपनी मां गोमती का वर्षों से पाला हुआ सपना पूरा करता है, वहीं गोमती अपने बेटे के लिए उसके अनुरूप बहू भी ढूंढ़ लेती है।

एक था ठुनठुनिया का एक और बेहद मनोरंजक प्रसंग वह है जहाँ ठुनठुनिया अपने दोस्तों के उपहास से तंग आकर अपनी माँ के सामने अपना नाम बदलने की पेशकश रखता है। उत्तर में जब माँ उसे शहर जा कर कोई नया नाम खोज लेने के लिए कहती है तो ठुनठुनिया की कशमकश देखते बनती है। जब वह अशर्फीलाल को भीख माँगते, हरिश्चंद्र को जेब काटते और छदामीमल को सेठ की जिंदगी जीते हुए देखता है तो उसको समझ आ जाती है कि उसे और किसी दूसरे नाम की जरूरत नहीं, वह तो ठुनठुनिया ही भला।

आह वे फुंदने वाले प्रसंग को पढ़कर मुझे राम नरेश त्रिपाठी की कहानी सात पूंछों वाला चूहा स्मरण हो आई। लोक में ऐसी कथाएं अनेक रूपों में प्रचलित होकर लेखकों को प्रेरित करती है जहाँ कहीं-कहीं साम्य भी नजर आ जाता है।

एक था ठुनठुनिया की एक प्रमुख विशेषता है प्रकाश मनु की बाल-सुलभ चुलबुली भाषा और कथा कहने का खिलंदड़ा अंदाज जो उन्हें कथा लेखक से कहीं ज्यादा कुशल कथावाचक के रूप में स्थापित करते हैं।

पुस्तक- एक था ठुनठुनिया (2007),  पृष्ठ-95
प्रकाशक- शब्दकलश,  एस-55 प्रताप नगर, दिल्ली-110007
मूल्य- 100 रुपये

हिलजात्रा का प्रदर्शन 29 को मध्‍य प्रदेश में

नई दि‍ल्‍ली : मध्य प्रदेश में आयोजित होने वाले 26 वें लोकरंग समारोह में मोहन उप्रेती लोक संस्कृति कला एवं विज्ञान शोध समिति कुमाऊ की सांस्कृतिक झांकी प्रस्तुत करेगी । आदिवासी लोक कला एवम् तुलसी साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित इस समारोह में देश के चुनिन्दा सांस्कृतिक संस्थाओ के अतिरिक्त अन्तरराष्ट्रीय सांस्कृतिक दल भी अपनी प्रस्तुति देगें । उत्तराखण्ड का प्रतिनिधित्व करते हुए मोहन उप्रेती लोक संस्कृति कला एवं विज्ञान शोध समिति पिथोरागढ़ की हिलजात्रा का भव्य प्रदर्शन 25 लोक कलाकारो के साथ 29 जनवरी 2011 को करेगी। अधि‍क जानकारी के लि‍ए मोबाइल नम्‍बर- 09412306663, 09811504696 पर सम्‍पर्क कर सकते हैं।

सुपरमैन हैं मेरे पापा : विवेक भटनागर

युवा कवि‍ वि‍वेक भटनागर की बाल कवि‍ता-

सुपरमैन हैं मेरे पापा…।
अक्सर चीतों से भिड़ जाते
शेरों से न तनिक घबराते
भालू से कुश्ती में जीते
हाथी तक का दिल दहलाते
मगरमच्छ का जबड़ा नापा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।

भूत-प्रेत भी उनसे डरते
सारे उनकी सेवा करते
सभी चुड़ैलें झाड़ू देतीं
सारे राक्षस पानी भरते
उनमें पापा का डर व्यापा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।

आसमान तक सीढ़ी रखते
खूब दूर तक चढ़ते जाते
इंद्रलोक में जाकर वह तो
इंद्रदेव से हाथ मिलाते
उनसे डर इंद्रासन कांपा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।

जाने कहां गया : मीना पाण्‍डे

युवा लेखि‍का और सृजन से की संपादक मीना पाण्डे की गजल-
दूर तक ये शुष्क मरूस्थल दहक रहा,
कलरव वो कोकिलों का जाने कहां चला गया!
मजहब से तौलते हैं इंसानियत सभी,
हम एक हैं विश्वास जाने कहां गया!
मुर्दा है खौफ़ से मासूम निगाहें,
हंसता हुआ जहां वो जाने कहां गया!
खुलेआम कत्ल हो रही इंसानियत यहां,
सारे जहां से अच्छा दंगों में खो गया!
हम हिन्दु-मुसलमान में बंटते चले गये,
अनेकता में एकता नारा ही रह गया!
संभले ना ’गर’ हम अभी तो कल ये कहेंगे,
भारत मेरा महान वो जाने कहां गया!

भीमसेन जोशी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता : जसम

संगीतज्ञों में शहंशाह भीमसेन जोशी ने सोमवार को पुणे में 89  बरस की उम्र में आखीरी सांसे लीं। अपने धीरोदात्त, मेघ-मन्द्र स्वर के सम्मोहन में पिछले  60 सालों से भी ज़्यादा समय से संगीत विशेषज्ञों और सामान्य लोगों को एक साथ बांधे रखनेवाले जोशी जी संभवत: आज की दुनिया के महानतम गायक थे। वे सचमुच भारत रत्न थे। जन संस्कृति मंच उनके निधन पर गहरा दुःख व्यक्त करता हे और उस महान साधक को अपनी श्रद्धांजलि भी।
जोशी जी  4 फरवरी, 1922 को कर्नाटक के गदग, (धारवाड़)  में जन्में थे। उन्हें भारत रत्न (2008) , तानसेन सम्मान (1992) , पद्म भूषन (1985) , संगीत के लिए संगीत नाटक एकेडमी पुरस्कार (1975)  और पद्मश्री (1972)  समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका था। उन्होंने अपनी अंतिम प्रस्तुति 2007 में सवाई गन्धर्व महोत्सव में दी। अब्दुल करीम खान के शिष्य सवाई गन्धर्व उनके गुरु थे और जोशी जी उनकी याद में हर साल पुणे में संगीत सम्मलेन आयोजित करवाते थे।
शुरू से ही जोशी जी यायावर थे। तीन साल की उम्र के जोशी जी घर से गायब हों या तो मुआज्ज़िन की अज़ान की नक़ल करते या फिर किसी मंदिर में ‘हवेली संगीत’ सुनते पाए जाते। किराना घराने के उस्ताद अब्दुल करीम खान का गाया राग झिंझोटी रेडियो पर सुना और 11 साल की उम्र में घर छोड़ गुरु की तलाश में उत्तर की और निकल भागे। बिना पैसे के खड़गपुर, कोलकाता, दिल्ली घूमते-घामते जालंधर पहुंचे और फिर वहां से सलाह मिली कि अब्दुल करीम खान साहब के प्रखर शिष्य सवाई गन्धर्व से सीखो। इस दौरान उन्होंने कई तरह के काम किये। अंततः उन्हें गुरु मिले सवाई गन्धर्व।
हिन्दुस्तानी के साथ ही मराठी और कन्नड़ संगीत में भी उनके योगदान को कभी भुलाया न जा सकेगा।  शास्त्रीय संगीत को जनप्रिय बना देने की उनमें अद्भुत सलाहियत थी। तुकाराम सहित ढेरों भक्त कवियों की कविताओं को उन्होंने संगीत में पिरोकर श्रोताओं का मान उन्नत करने का यत्न किया। उनके लिए शास्त्रीय संगीत कोई उच्च भ्रू विशिष्टों की जागीर न था। शास्त्रीय संगीत के दरवाज़े उन्होंने आम इनसान के लिए खोल दिए थे।
जोशी जी की सांगीतिक प्रतिभा बहुआयामी थी। उन्होंने फिल्मों के लिए भी कुछ गाने गाये, भजन गाये, और शास्त्रीय संगीत तो खैर उनका अपना घर ही था। किराना घराने की उस्ताद अब्दुल करीम खान साहब से चली आ रही परम्परा में जोशी जी ने बहुत कुछ जोड़ा। घरानों की शुद्धता के नियम के वह कभी आग्रही नहीं रहे।  दरअसल किराना घराने के तो वह उस्ताद थे ही, पर अपनी गुरु बहन गंगूबाई हंगल से अलग, दूसरी रंगत और घरानों के प्रभाव भी उनकी गायकी में घुल-मिल जाते हैं। उनका मानना था कि  एक शिष्य को गुरु की दूसरे दर्जे की नक़ल करने की बजाय उसके गायन को विकसित करने वाला होना चाहिए। उनके गायन में कहीं सवाई गन्धर्व और रोशन आरा बेगम का असर है तो कहीं मल्लिकार्जुन मंसूरऔर केसरी बाई का। ऐसा मानते हैं कि जोशी जी की सा (षडज) की अदायगी में केसरीबाई का काफी असर है। जोशी जी अपनी शैली से भी लगातार लड़ते रहे,  विकसित  करते रहे। इसी जज्बे और संशोधनों का प्रमाण है कि किराना घराने की लम्बी परम्परा में सिर्फ उन्होंने ही राग रामकली को गाने की हिम्मत की।
उदात्तता से भरी उनकी मंद्र आवाज़ में जबरदस्त ताकत थी। पौरुषेय ताकत जिसका अपना एक अलग सौंदर्य होता है। बावजूद इसके कि वह हिन्दुस्तान के सबसे बड़े शास्त्रीय संगीतकारों में शुमार किये जाते थे,  जोशी जी की खासियत स्वरों के मूल स्वरूप पर उनकी अद्भुत पकड़ थी। अपने अंतिम दिनों के एक इंटरव्यू में भी उन्होंने रोजाना लम्बे रियाज की बात तस्लीम की थी।  मज़ाक में अपने को संगीत का  हाई कमिश्नर कहने वाले जोशी जी सच में इस ओहदे से कहीं जियादा के हकदार थे, कहीं बड़ी शख्सियत थे । हिंदी की दुनिया की तरफ से श्रद्धांजलि स्वरूप  उनपर लिखी हिन्दी कवि वीरेन डंगवाल की कविता प्रस्तुत है-
भीमसेन जोशी
मैं चुटकी में भर के उठाता हूँ
पानी की एक ओर-छोर डोर नदी से
आहिस्ता
अपने सर के भी ऊपर तक
आलिंगन में भर लेता हूँ मैं
सबसे नटखट समुद्री हवा को
अभी अभी चूम ली हैं मैंने
पांच उसाँसे रेगिस्तानों की
गुजिशता  रातों की सत्रह करवटें
ये लो
यह उड़ चली 120 की रफ़्तार से
इतनी प्राचीन मोटरकार
यह सब रियाज़ के दम पर सखी
या सिर्फ रियाज़ के दम पर नहीं!
(जन संस्कृति मंच की और से प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )

शास्‍त्रीय गायक भीमसेन जोशी का नि‍धन

नई दि‍ल्‍ली : हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के मशहूर गायक भारत रत्‍न पंडित भीमसेन जोशी (89) का सोमवार सुबह 8 बजे पुणे के सहयाद्री अस्‍पताल में निधन हो गया। वह दो साल से बीमार थे। पि‍छले कई दि‍नों से उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी। जोशी खय्याल गायकी और भजन के लिए मशहूर थे। जोशी का जन्म कर्नाटक के गडक जिले में 4 फरवरी, 1922 को हुआ था। उनको 2008 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्‍मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्‍हें पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्मश्री समेत कई अलंकरण और सम्मान दि‍ए जा चुके थे।

पंडित भीमसेन जोशी को बचपन से ही संगीत का बहुत शौक था। वह किराना घराने के संस्थापक अब्दुल करीम खान से बहुत प्रभावित थे। 1932 में वह गुरु की तलाश में घर से निकल पड़े। अगले दो वर्षो तक वह बीजापुर, पुणे और ग्वालियर में रहे। उन्होंने ग्वालियर के उस्ताद हाफिज अली खान से संगीत की शिक्षा ली। घर वापसी से पहले वह कलकत्ता और पंजाब भी गए। वर्ष 1936 में पंडित भीमसेन जोशी ने जाने-माने खयाल गायक और अब्दुल करीम खान के शिष्य सवाई गंधर्व पंडित रामभन कुंडगोलकर से गडग के नजदीक कुंडगोल में संगीत की विभिन्न विधाओं का प्रशिक्षण प्राप्त किया। वहाँ उन्होंने सवाई गंधर्व से कई वर्षों तक खयाल गायकी की बारीकियाँ भी सीखीं। पंडित भीमसेन जोशी ने अपनी विशिष्ट शैली विकसित करके किराना घराने को समृद्ध किया और दूसरे घरानों की विशिष्टताओं को भी अपने गायन में समाहित किया। उनको इस बात का भी श्रेय जाता है कि उन्होंने कई रागों को मिलाकर कलाश्री और ललित भटियार जैसे नए रागों की रचना की। उन्हें खयाल गायन के साथ-साथ ठुमरी और भजन में भी महारत हासिल थी।

छंटते बादल खि‍लती धूप : जवाहर गोयल

लेखक-चि‍त्रकार जवाहर गोयल करीब डेढ़ साल से प्लाज्मा सेल ल्यूकीमि‍या से पीडि‍त हैं। उनका दो बार स्टेम सेल ट्रांसप्लांट हो चुका है। इलाज के दौरान उनका कई कैंसर पीड़ि‍तों से मि‍लना हुआ। इन अनुभवों के आधार पर लि‍खा उनका यह आलेख कैंसर को लेकर सामाजि‍क दृष्टिकोण में बदलाव की मांग करता है-
कैंसर एक ऐसा शब्द है जिसका उच्चारण करने में सभी एक बार ठिठकते हैं, क्योंकि यह एक ऐसी बीमारी है जो आम धारणा में लाइलाज है। बिना अग्रिम सूचना दिए शरीर में फैलती जाती है। जब तक कोई आसार शरीर में दिखने आरंभ होते हैं, बहुत फैल चुकी होती है, लगभग अंतिम दौर तक। जल्दी ही जान ले लेती है। कैंसर का जानलेवा होना ही वह शाप है कि लोग इसका नाम लेने में झिझकते हैं। यहां तक कि जब कोई सामाजिक बुराई लाइलाज हो जाती है तो उसे मुहावरे में कैंसर हो जाना कहते हैं।
क्या कैंसर सचमुच लाइलाज है ? कैंसर है क्या ? यह किसे, कब और क्यों होता है ? कैसे पहचाना जाता है ? कितना कष्टदायी होता है ? इसका इलाज कैसे किया जाता है ? कितना लंबा चलता है ? क्या सचमुच बहुत खर्चीला होता है ? क्या इसे रोका जा सकता है ? रोगी कब तक जी सकता है ? किस-किस तरह के वैकल्पिक इलाज उपलब्ध हैं ? आदि ऐसे असंख्य सवाल हैं जो अक्सर दिमाग में तब आते हैं, जब स्वयं अथवा अपने किसी परिचित को कैंसर हो जाता है। जब उनकी संघर्ष गाथा सुनने लगते हैं। इलाज से जुड़ी बातें गाहे बगाहें हवा में तैरनी लगती हैं। भले ही बिगड़े हुए रूप में होती हैं।
कैंसर के एक रोगी को इससे बहुत अधिक झेलना होता है। उसे जो सबसे पहले घेरकर डसता है, वह है भय। इसका बिना किसी चेतावनी के अकस्मात होना। इसके लिए किसी की भी पूर्व तैयारी नहीं होती, न ही सही अर्थ में संभव है। यह ऐसे ही हुआ कि क्या आप अब जल्दी से मर जाने के लिए तैयार हैं। अब आप जीवन के जितने भी विविध पहलू हैं- व्यक्तिगत, सामाजिक या पारिवारिक उनके समस्त दायरों में इस मृत्यु का अर्थ टटोलिये। किंतु याद रखें कि अखबार से मृत्यु की खबर हमें वह नहीं जताती जो जब हम स्वयं खतरे में पड़ते हैं, तब जानते हैं। पड़ोस की दुर्घटना इससे अधिक वास्तविक लगती है, तब भी उतनी कभी नहीं, जब हम स्वयं उसके शिकार होते हैं। यहां तक कि मृत्यु की कल्पना करना, उस पर कविता लिखना, सागर के किनारे से दूर लहरों को देखने के समान होता है, सचमुच में सागर में डूबते-उतराते लहरों से जूझने के संघर्ष से बहुत भिन्न।
किसी ने कहा है कि यदि आप सुबह उठकर जीवन के अंतिम दिन के समान उसे अच्छी तरह बिता सकते हैं तो आप सुखी हैं। कैंसर की चिकित्सा के दौरान यह चुनौती रोगी के मन को लगातार ठेलती रहती है। उलझाती रहती है। जीवन और मृत्यु से जुड़े प्रश्न बार-बार मन में आते हैं। लोग अपनी-अपनी तरह से उसका समाधान खोजते हैं। पर कोई भी हल आखिरी नहीं होता। अक्सर आप वापिस उन्हीं प्रश्नों के सामने अपने को खड़ा पाते हैं- पुन: हल खोजते हुए, पुन: अपनी शक्ति बटोरते हुए, पुन: अपना पुननिर्माण करते हुए। संभवत: अपने परिष्कार का यह सिलसिला सदैव रहता है। फर्क केवल इतना है कि कैंसर सरीखी बीमारी में आपकी मानसिक चेतना कई गुणा अधिक एकाग्र हो जाती है। तब अपने ही स्वभाव की कई बातें स्वत: थोथी लगने लगती हैं, अपने कई काम व्यर्थ लगने लगते हैं। जिसे पहले आप स्वयं या आमतौर पर सभी सफलता या सार्थकता का प्रमाण मानते रहे, उसे अब बेकार के प्रयोजन सोचने लगते हैं। आपसी संबंधों की वह सारी व्यावहारिकताएं, जो दरअसल आपसी उपयोगिता के अर्थ में ही पलती-पुसती रहती हैं, ढकोसला लगने लगती हैं। सूझ-बूझ वाले सभ्य समाज के शालीन रीति-रिवाज कितने सतही और बाहरी होते हैं, दिखने लगता है। इनमें सच्ची आत्मीयता का कितना अभाव होता है तथा सौजन्य का दस्तूर कितना ऊपरी तौर पर निबाहने का प्रयास मात्र है, समझ में आने लगता है। ताज्जुब तो यह है कि‍ यह भी नहीं सोचा जाता कि जिसके प्रति हम अपनी पीड़ा या संवेदना जताना चाह रहे हैं, सचमुच वह कर रहे हैं या उसका कष्ट बढ़ा रहे हैं। उस पर हम अपना भार लाद रहे हैं, उस पर अपना मानसिक कूड़ा डाल रहे हैं। रोगी के घर में रिश्तेदारों और परिचितों की भीड़ उसका नुकसान ही करती है। सीधे-सीधे और परोक्ष रूप में भी। ज्यादातर लोग कैंसर के रोगी को यह आभास दे जाते हैं कि वे उसके अंतिम दर्शनों को आए हैं। अक्सर उसे वह दया या सहानुभूति का पात्र बना देते हैं। कोई विरला व्यक्ति ऐसा होता है जो रोगी की स्थिति में स्वयं को रखकर देखता हो। जब ऐसा होता है, तब उसका मौन भी साथ देने में सहायक होता है।
दुर्भाग्य तो इस बात का है कि लोग आसानी से यह मान लेते हैं, हर कोई जुगाड़ लगा मतलब सिद्ध करने की जल्दी में है और ऐसा करना ही वाजिब है। इस सोच में उष्ण आत्मीयता का अभाव, ऊपरी व्यवहार, सतही संवेदनाएं या दिखावे का बोलबाला खुद-ब-खुद होने लगता है। अक्सर ये लोग अपनी विकृतियों से परिचित नहीं होते या यों कहें कि जान-बूझकर ऐसा नहीं करते, बल्कि उनकी जीवन-शैली उनसे ऐसा करवाती है। कैंसर के रोगी को आपसी संबंधों में विकार, उनके रेशे स्पष्ट नजर आते हैं। जब आप कगार पर खड़े होते हैं तो एक तरह से बहुत कुछ आसान हो जाता है। यह दौर कितना विचित्र है कि जो संवेदनशील हैं, वे भी संपर्क करने से कई बार कतरा जाते हैं, यह सोचकर कि- ‘क्या बात करेंगे।’ मेरे ऐसे अनेक परिचित हैं, जिनकी मुझसे संबंधित चिंताएं मुझ तक पहुंचती रहीं- अन्य परिचितों के माध्यम से। किंतु वे स्वयं लंबे अर्से तक मुझसे सीधा संपर्क नहीं कर सके। उन्हें मैंने स्वयं फोन करके कहा- ‘कैसे हो ?’- बोलने से ही तो बात हो जाती है। आप अपने बारे में कुछ बतिया सकते थे। मन में इस डर को लेकर बैठे रहना कि- ‘कैंसर का मारा है, अब मरा, तब मरा’-  मान बैठना ठीक नहीं है। रोगी के साथ जब दूसरों का व्यवहार सामान्य से अलग होने लगता है, तब वह दुनिया से कटने लगता है। इससे उसके मन पर बोझा बढ़ता ही है। अक्सर ऐसी छोटी-छोटी अनके बातें उसका मनोबल क्षीण करती हैं।
जो खुल्लम-खुल्ला दिखावा करते हैं, महज औपचारिकता निभाते हैं- संवेदनहीन हैं, झूठा व्यवहार करते हैं। किंतु जो रोगी के भले की सोचते हैं, वे सचेत हो सकते हैं।
पिछले एक वर्ष के दौरान मुझे अपनी बीमारी ‘प्लास्मा सेल ल्यूकीमिया’ का इलाज करवाते हुए अनेक रोगियों से मिलने, बात करने, उनकी समस्याओं और कहानियों को सुनने का मौका मिला। इन सब में एक बात एकदम साफ थी कि कैंसर से संबंधित समस्याएं, प्रांत और आर्थिक स्तर भिन्न होने के बावजूद लगभग एक-सी होती हैं।

मैं ही क्यों?

हर कोई कठिनाइयों से बचना चाहता है, किंतु संकट में पड़ जाने पर एक विचार अक्सर चमगादड़ की तरह मन में चक्कर काटने लगता है कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ? मुझसे क्या गलती हो गई ? क्या सारी मुसीबतें मेरे ही भाग्य में हैं ? मेरा जीवन कभी आसान नहीं रहा ! आदि। इन्हें हम नेगेटिव विचार या मन कमजोर करने वाली बातें कहकर टाल नहीं सकते। कतई नहीं।
लेकिन ठंडे दिमाग से इन प्रश्नों  के उत्तर खोजें तो पाएंगे कि ऐसा क्या है जीवन में जिसे चुनने का हमको हक मिला ? हमारा जीवन किस प्रांत, शहर में हो, हमने नहीं चुना। माँ-बाप, भाई-बहिन हमने नहीं चुने, देश, भाषा, धर्म आदि भी जन्म के संयोग से पाया। संभवत: इस सबकी कभी शिकायत भी नहीं की। इसे संयोग जानकर स्वीकार कर लिया। स्कूल, कॉलिज डिग्री, नौकरी, पेशा आदि को चुनने में भी परिस्थितियों का जोर अधिक रहा। पल भर में हमारे संसार को उलट-पुलट कर देने वाली सारी घटनाएं/दुर्घटनाएं इसी तरह होती हैं।
कैंसर पर सदियों से काम हो रहा है। हाल के सालों में इलाज की संभावनाओं में तेजी से प्रगति हुई है, किंतु इसके होने के कारण को अभी तक विज्ञान पकड़ नहीं सका है। तब फिर हम इसे जीवन के अन्य संयोगों की तरह स्वीकार क्यों नहीं कर पाते ? सामान्य रहते हुए आगे का क्यों नहीं सोचते ? ठीक ही कहा गया है- सारी कठिनाइयाँ मनुष्य को माँजने के लिए होती हैं। सफाई करते हुए जिन बर्तनों को अधिक रगड़ा जाता है, वे ज्यादा चमक उठते हैं।

बीमार कौन है?

जब हाथ या पैर में चोट लगती है तो आप कहते हैं- मेरा अँगूठा कट गया या मेरा पैर टूट गया। किसी दूसरी बीमारी के होने पर भी उसे हम मात्र अपनी देह का एक विकार मानते हैं। तब ऐसा नहीं मानते कि बीमारी ने हमारे पूरे अस्तित्व को निगल लिया है। लेकिन कैंसर का रोगी मृत्यु के भय से इतना विचलित हो जाता है कि उसे अपने देह की बीमारी मानने के बजाय अपने समूचे अस्तित्व को बीमार मान बैठता है। वह जानता है कि उसका अस्तित्व शरीर मात्र नहीं है। अपनी देह की सीमाओं के परे बृहत और सर्वांगीण जीवन क्षमता है उसमें, जो ज्यादातर अन्य योनि के जीव-जन्तुओं में नहीं होती है।
मैं सोचता हूं कि मुझे कैंसर है अर्थात मेरी देह बीमार है, किंतु मैं बीमार नहीं हूं। मेरा मन, मेरी चेतना, मेरा व्यक्तित्व, मेरी सोच, मेरी भावना- कुछ भी बीमार नहीं है। मेरी आत्मा तो अक्षुण्णि है। हां! मैं दूसरों का प्रतिबिंब बनकर भी नहीं रह सकता। मैं अपने को दूसरों की नजर से देखूं, यह भी गलत होगा। न तो मैं किसी की दया का पात्र हो सकता हूँ, न ही किसी की सहानुभूति का- जो कोई ‘मुझे मृत्यु के लिए नामांकित’ का बिल्ला लगाकर देखना चाहते हैं, यह उन्हीं का दोष है, उन्हीं की समस्या है, मेरी नहीं। मैं ईश्व र के समक्ष स्वयं को देख सकता हूँ। पहले की तरह अब भी अपने भीतर ईश्वर के आलोक का अनुभव कर सकता हूँ।
पानी की प्यास में तड़पते, पानी खोजते पांडव भाइयों से सरोवर के सामने यक्ष द्वारा पूछे गए पाँच प्रश्नों का महाभारत का प्रसंग सभी को याद होगा। एक प्रश्न था- आश्चर्य क्या है ? युधिष्ठिर का उत्तर था- ‘मृत्यु निश्चित होती है- जानकर भी जीवन पर्यंत सभी इससे बेखबर रहते हैं, यही आश्चर्य है।’ कोई भी दूसरे से अधिक क्षण-भंगुर नहीं होता है। जीवन को जी लेने में ही सार है, जीते हुए जीवन विहीन होने में नहीं। हम कितना लंबा जीवन जीते हैं, इसका कोई महत्व नहीं। महत्वपूर्ण है कि हम कैसा जीवन जीते हैं। यही सब कुछ है।

बीमारी क्या है?

जिस डॉक्टर ने मेरी ब्लड रिपोर्ट देखकर सबसे पहले मेरा रोग पहचाना था, उन्होंने भी ‘कैंसर’ शब्द का उपयोग किये बगैर झिझकते हुए यही कहा था कि- ‘बहुत डिस्टर्बिंग है, किंतु केमोथेरैपी से ठीक हो जाना चाहिए।’
स्टेम रोल ट्रांसप्लांट करवाने श्री लंका से ऐक्टेक (टाटा मेमोरियल सेंटर, मुंबई) आई एक महिला से जब मैंने पूछा, ‘आपको कौन सा कैंसर है ?’ तो वह लगभग घबरा गईं। अर्से से उनका इलाज चल रहा था, लेकिन वह बोलीं, ‘भाई साहब, उस बीमारी का नाम मत लीजिए। मैं इसके बारे में कुछ भी नहीं जानती। मुझे इसके नाम से घबराहट होती है। आप मेरे पति से बात कीजियेगा।’ मैंने उनसे यही कहा, ‘बहिनजी, यह बीमारी तो आपको है। इलाज आपका हो रहा है। इससे लडऩा भी आपको ही है। जब दुश्मन इतना खतरनाक है तो इसकी पूरी जानकारी के बिना आप इसे परास्त कैसे करेंगी ? ज्यादा जानकर आप, कम से कम घबराहट से तो बचेंगी। यह आपको चौंकाएगा नहीं, बल्कि इलाज में आपकी और डॉक्टर की मदद ही होगी। उनकी सलाह समझ- मान सकेंगी। अधिक सावधानी ले सकेंगी।’
सच तो यह है कि आज कैंसर की बीमारी लाइलाज नहीं रही। अधिकतर किस्म के कैंसर या तो ठीक किये जा सकते हैं या फिर उन्हें काबू में रखकर रोगी को दीर्घायु किया जा सकता है। अनुमान है कि आने वाले चार-पांच साल में सभी किस्म के कैंसर ठीक किये जा सकेंगे। इस क्षेत्र में तेजी से विकास हो रहा है। बिना जाने, अज्ञान के अंधकार में खोए रहने की बनिस्पत जानकारी बढ़ाते रहना अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने में सहायता करता है। मानसिकता सही बनी रहती है। आप अपनी चिकित्सा में सहायक होते हैं।
जिन्हें उचित इलाज पाने की सुविधा नहीं है या जो पैसा बनाने वाले डॉक्टरों के चंगुल में फंस जाते हैं, वे भी बच सकते हैं। अपने सीमित साधनों में भी इलाज करवा सकते हैं।
ऐसे कई किस्से हैं, जहां लाइलाज मान लिए गए रोगी मजबूत और सही मानसिकता से सभी को चकित करते हुए डॉक्टरों की भविष्यवाणी को झुठलाते हुए दीर्घायु हुए और समर्थ जीवन बिता पाए।
यदि रोगी को इलाज का नक्शा न मालुम हो तो वह अपने सीमित साधनों को योजनाबद्ध तरीके से नियोजित नहीं कर पाता। न ठीक-ठाक व्यवस्था होती है, न ही मन में अपेक्षित संतुलन बन पाता है। सही मानसिकता उचित इम्यूनिटी बनाने में भी सहायक होती है। यही दीर्घायु करती है।
‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का अर्थ भी यही है- मुझे अज्ञान के अंधकार से आलोक अर्थात ज्ञान में ले जाओ। ज्ञान ही ईश्वर है, किंतु जानकारी युक्त ज्ञान नहीं बल्कि वह जो हमें संयत, संतुलित और स्थिरचित करता है। आत्मा को आलोकित करता है।

‘क्या कैंसर हमारे पूर्वजन्म के पाप का परिणाम है?’

मुजफ्फरपुर, बिहार से एक महिला कैंसर के इलाज के लिए ऐक्टेक, मुम्बई आ रही थीं। टे में साथ बैठे एक पैसेंजर ने सांत्वना देते हुए उनसे कहा- ‘बहिन जी, यह कैंसर तो आपके पूर्वजन्मों के पापों का परिणाम है। इसमें आप अब क्या कर सकती हैं ?’
वह महिला अस्पताल में मेरे बगल के बेड पर थी। बताते हुए उनकी आँखों में आँसू आ गए। मैंने कहा, ‘बहिन जी, आपने उस सज्जन से नहीं पूछा कि ऐसा कहकर वह पाप कर रहे हैं या पुण्य ? इसका क्या फल मिलेगा आपको ? क्या आप दूसरों में पाप की भावना रखने वाला स्वयं पापी नहीं हैं ?’
दरअसल यह एक अत्यंत गंभीर प्रश्न है, जो बार-बार जाने-अनजाने संकट से घिरे हर भारतीय को तंग करता है, क्योंकि पूर्वजन्म का सिद्धांत हमारे धार्मिक सोच का आधार है। इसके पहले कि हम इस प्रश्न को गंभीरता से परखें, इलाहाबाद की एक महिला का किस्सा इस प्रश्न की गहराई को अधिक स्पष्ट करेगा। वह एक कॉलिज में पढ़ाती थीं। भूतपूर्व प्रधानमंत्री के परिवार से संबंधित थीं तथा स्तन कैंसर का इलाज करवा रही थीं। बताया कि जब वह अपने गाँव गईं तो गाँव की ज्यादातर स्त्रियों ने उनके घर का बहिष्कार-सा कर दिया। उनकी बीमारी को अपशगुन माना गया था। उन्हें बहुत पीड़ा हुई। इसके बावजूद उन्होंने मुझसे कहा कि- ‘आप जो भी बोलिये भाई साहब, पाप-पुण्य तो होता है। कुछ तो है जो हम समझ नहीं पाते।’
हम इन दोनों किस्सों की बातों को अत्यंत सहानुभूति और गंभीरता से समझने की चेष्टा करें। फिलहाल पुनर्जन्म के सिद्धांत को अलग रख केवल पाप-पुण्य के सिद्धांत की जांच करें।
अगर कैंसर मेरे पूर्वजन्म के पापों का परिणाम है तो इस जन्म में न तो मैं न ही अन्य कोई इसके लिए उत्तरदायी है। तब तो लोग फल, सब्जियों और अनाज में तरह-तरह के केमिकल्स और प्रतिबंधित कीटनाशक छिड़काव का इस्तेमाल करते हैं, जिनसे कैंसर सरीखी बीमारियां होती हैं, वे सब बरी हो जाते हैं। कई तरह की हवा में दूषण बढ़ाने वाली हानि‍कारक गैस अथवा भोपाल गैस कांड, जि‍ससे शरीर की क्षति‍ होती है, जि‍म्मेदारी से बच जाते हैं। पैक्ड  फूड, फास्ट फूड या आधुनि‍क जायकेदार खाने, जि‍नसे प्रि‍जर्वेटि‍व्स व रंग व स्वाद बढ़ाने वाले नुकसानदायक तत्व जो शरीर की क्षति करते हैं, दोषमुक्त हो जाते हैं। जो स्त्रियां बच्चों को स्तन का दूध नहीं पिलातीं तथा प्राकृतिक ढंग से अपना रख-रखाव नहीं कर पातीं, वे सब अपनी लापरवाही से बरी हो जाती हैं।
इसे भी जांचे कि क्या हमें ऐसा सोचने की छूट है कि जिन लाखों यहूदियों आदि को अमानुषि‍क हिटलर ने गैस चेंबरों में क्रूरता से मार डाला, क्या वह उन्हें पूर्वजन्म के पापों की सजा दे रहा था ? आतंकवादी जब निर्दोष व निहत्थे लोगों व बच्चों की आँख मूँदकर बिना कुछ सोचे हत्या करते हैं, क्या उन्हें पूर्वजन्म के पापों की सजा दे रहे होते हैं ? बिल्कुल भी नहीं।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था- ‘सबसे निकृष्ट मिथ्या बात जो आप अपने से कहते है, वह यह है कि हम पापी होकर जन्में हैं, हम बुराई लेकर जन्में हैं। पापी वही है, जो दूसरों में पाप की भावना रखता है। पापी और दुष्टों को दुष्टता ही दुष्टता नजर आती है। पर पुण्यात्मा को कहीं नहीं। अत: पापियों के लिए संसार नरक स्वरूप है। मध्यकोटि वाले के लिए स्वर्ग रूप है और परिपक्कषाय के लिए ब्रह्मरूप है। उन्हें ब्रह्मा ही दिखाई पड़ता है। यह समझना भ्रम है कि हम अशुद्ध है, परिमित है और बिलग हैं। आत्मा ही एक अद्वितीय सत्ता है।’
स्वामी जी ने एक अन्य जगह लिखा है- ‘वेदांत पाप को नहीं मानता, किंतु भूल होती है, यह मानता है। वेदान्त के अनुसार सबसे बड़ी भूल है स्वयं को कमजोर मानना, स्वयं को पापी मानना, स्वयं को निकृष्ट प्राणी मानना, अपने को अशक्त मानना और यह कहना कि हम लाचार हैं।’

शमशेर की कवि‍ता में प्राइवेट-पब्‍लि‍क के बीच अंतराल नहीं : डंगवाल

नई दि‍ल्‍ली: शमशेर अपनी काव्य प्रेरणाओं को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ जोड़ते हैं। उनकी कविता में प्राइवेट-पब्लिक के बीच कोई अंतराल नहीं है। उनसे हमें भौतिक दुनिया की सुंदर सच्चाइयों से वाबस्ता रहने की सीख मिली। 21 जनवरी को गांधी शांति प्रतिष्ठान में जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित दो दिवसीय शमशेर जन्मशती समारोह में ‘शमशेर और मेरा कविकर्म’ नामक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए चर्चित कवि वीरेन डंगवाल ने यह बात कही। इस संगोष्ठी से पूर्व शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और फैज की रचनाओं पर आधारित चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा बनाए गए पोस्टरों और जनकवि रमाशंकर विद्रोही की पुस्तक ‘नई खेती’ का लोकार्पण प्रसिद्ध आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय ने किया। डॉ. पांडेय ने कहा कि कविता को जनता तक पहुंचाने का काम जरूरी है। विद्रोही भी अपनी कविता को जनता तक पहुंचाते हैं। किसान आत्महत्याओं के इस दौर में ऐसे कवि और उनकी कविता का संग्रह आना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि चित्रकला के जरिए कविता को विस्तार दिया जा सकता है। इस मौके पर कवि कुबेर दत्त द्वारा संपादित शमशेर पर केंद्रित फिल्म का प्रदर्शन किया गया, जिसमें उनके समकालीन कई कवियों ने उनकी कविता के बारे में अपने विचार व्यक्त किए थे।

कवि अनामिका ने कहा कि शमशेर की कविताएं स्त्रियों के मन को छुने वाली हैं। वे बेहद अंतरंग और आत्मीय हैं। वे सरहदों को नहीं मानतीं। कवि मदन कश्यप ने उन्हें प्रेम और सौंदर्य का कवि बताते हुए कहा कि वह सामंती-धार्मिक मूल्यों से बनी नैतिकता को कविता में तोड़ते हैं, पर उसे सीधे चुनौती देने से बचना चाहते हैं। इसलिए उनकी प्रेम कविताओं में अमूर्तन है। त्रिनेत्र जोशी ने कहा कि शमशेर संवेदनात्मक ज्ञान के कवि हैं। अपने ज्ञान और विचार को संवेदना को कैसे संवेदना के जरिए समेटा जाता है, हमारी पीढ़ी ने उनसे यही सीखा है। शोभा सिंह का कहना था कि शमशेर बेहद उदार और जनपक्षधर थे। स्वप्न और यथार्थ की उनकी कविताओं में गहरा मेल दिखाई पड़ता है। मार्क्सवाद के प्रति उनकी पक्षधरता थी और स्त्री की स्वतंत्र बनाने पर उनका जोर था। उनके प्रभाव से उनका कविता,  मार्क्सवाद और जन-आंदोलन से जुड़ाव हुआ। इब्बार रब्बी ने शमशेर की रचनाओं और जीवन में निजत्व के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उनकी काव्य पंक्तियां मुहावरे की तरह बन गई हैं। नीलाभ ने कहा कि शमेशर का व्यक्ति जिस तरह से जीवन को देखता है,  उनकी कविता उसी का लेखाजोखा है। उनकी कविता में 1947 से पहले आंदोलन से उपजा आशावाद भी है और उसके बाद के मोहभंग से उपजी निराशाएं भी हैं। इसके साथ ही पार्टी और व्यक्ति का द्वंद्व भी। गिरधर राठी ने कहा कि भाषा और शब्दों का जैसा इस्तेमाल शमशेर ने किया, वह बाद के कवियों के लिए एक चुनौती-सी रही है। वे सामान्य सी रचनाओं में नयापन ढूंढ लेने वाले आलोचक भी थे। ऐसा वही हो सकता है जो बेहद लोकतांत्रिक हो। मंगलेश डबराल ने कहा कि शमशेर मानते थे कि कविता वैज्ञानिक तथ्यों का निषेध नहीं करती। उनकी कविता आधुनिकवादियों और प्रगतिवादियों- दोनों के लिए एक चुनौती की तरह रही है। कथ्य और रूप के द्वंद्व को सुलझाने के क्रम में हर कवि को शमशेर की कविता से गुजरना होगा। यद्यपि नागार्जुन के बाद उनकी कविता के सर्वाधिक पोस्टर बने, लेकिन वे जनसंघर्षों के नहीं, बल्कि संघर्षों के बाद की मुक्ति के आनंद के कवि हैं। संगोष्ठी का संचालन युवा कवि अच्युतानंद मिश्र ने किया।

दूसरे सत्र में काव्यपाठ की शुरुआत शमशेर द्वारा पढ़ी गई उनकी कविताओं के वीडियो के प्रदर्शन से हुई। काव्यपाठ की अध्यक्षता इब्बार रब्बी और गिरधर राठी ने की तथा संचालन आशुतोष कुमार ने किया। शोभा सिंह, कुबेर दत्त, दिनेश कुमार शुक्ल, लीलाधर मंडलोई, अनामिका, रमाशंकर यादव विद्रोही, राम कुमार कृषक, मदन कश्यप, नीलाभ, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, त्रिनेत्र जोशी, पंकज चतुर्वेदी आदि ने अपनी कविताएं सुनाईं, जिनमें कई कविताएं शमशेर पर केंद्रित थीं।

समारोह के दूसरे दि‍न 22 जनवरी को आयोजि‍त कार्यक्रम कर अध्‍यक्षता करते हुए चर्चित मार्क्सवादी आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि‍ शमशेर की कविताएं विद्वानों के लेखों या शब्दकोशो के जरिए कम समझ में आती हैं,  जीवन-जगत के व्यापक बोध से उनकी कविताएं समझ में आ सकती हैं। प्रगतिशील और गैरप्रगतिशील आलोचना में यह फर्क है कि‍ प्रगतिशील आलोचना रचना को समझने में मदद करती है, लेकिन गैरप्रगतिशील आलोचना रचना के प्रति समझ को और उलझाती है।

साहित्यालोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि कठिन प्रकार में बंधी सत्य सरलता बिना किसी भीतर से जुड़ी़ विचारधारा के बिना संभव नहीं है। शमशेर का गद्य जीवन से जुड़ा गद्य है। वे जनसामान्य के मनोभाव की अभिव्यक्ति के लिए गद्य को प्रभावशाली मानते थे। गद्य ही सीमाएं को तोड़ता हैं। इसे मुक्ति का माध्यम समझना चाहिए।

वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि एक पल शमशेर की कविता में बहुत आता है, लेकिन यह असीम से जुड़ा हुआ पल है। काल के प्रति शमशेर का जो रुख है, वह बेहद विचारणीय है।

इलाहाबाद से आए आलोचक प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि शमशेर ऐसे कवि थे जो अभावों से अपनी भावमयता को संपन्न करते रहे। तमाम किस्म की प्रतिकूलताओं से उनकी होड़ रही। वह हकीकत को कल्पना के भीतर से बाहर लाने की तमन्ना वाले कवि है। कवि-आलोचक सुरेश सलिल ने शमशेर, मुक्तिबोध, केदार और नागार्जुन जैसे कवियों को आपस में अलगाए जाने की कोशिशों का विरोध करते हुए इस पर जोर दिया कि इन सारे कवियों की सांस्कृतिक-वैचारिक सपनों की परंपरा को आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है।

युवा कथाकार अल्पना मिश्र ने कहा कि शमशेर का गद्य पूरे जनजीवन के यथार्थ को कविता में लाने के लिए बेचैन एक कवि का वैचारिक गद्य है। यह गद्य जबर्दस्त पठनीय है। कला का संघर्ष और समाज का संघर्ष अलग नहीं है,  इस ओर वह बार-बार संकेत करते हैं। युवा कथाकार योगेंद्र आहूजा ने कहा कि शमशेर केवल कवियों के कवि नहीं थे। नूर जहीर ने शमशेर से जुड़ी यादों को साझा करते हुए कहा कि हिंदी-उर्दू की एकता के वह जबर्दस्त पक्षधर थे। उर्दू के मिजाज को समझने पर उनका जोर था। गोबिंद प्रसाद ने शमशेर की रूमानीयत का पक्ष लेते हुए कहा कि उनके समस्त रोमान के केंद्र में मनुष्य का दर्द मौजूद है।

युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि शमशेर और अज्ञेय की काल संबंधी दृष्टियों में फर्क है। शमशेर एक क्षण के भीतर के प्रवाह को देखने की कोशिश करते हैं। उनकी कविता एक युवा की कविता है,  जो हर तरह की कंडिशनिंग को रिजेक्ट करती है। कवि-पत्रकार अजय सिंह ने शमशेर संबंधी विभिन्न आलोचना दृष्टियों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए शमशेर को गैरवामपंथी वैचारिक प्रवृत्तियों से जोड़कर देखे जाने का विरोध किया। हालिया प्रकाशित दूधनाथ सिंह द्वारा संपादित संस्मरणों की किताब के फ्लैप पर अज्ञेय की टिप्पणी को उन्होंने इसी तरह की प्रवृत्ति का उदाहरण बताया। उन्होंने शमशेर की कुछ कम चर्चित कविताओं का जिक्र करते हुए कहा कि उनमें आत्मालोचना, द्वंद्व और मोह भी है।

आयोजन में कला आलोचक रमण सिन्हा ने चित्रकला के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ शमशेर की चित्रकला पर व्याख्यान-प्रदर्शन किया। यह व्याख्यान उनके चित्रों और कविताओं को समझने के लिहाज से काफी जानकारीपूर्ण था। कला आलोचक अनिल सिन्हा ने कहा कि विडंबना यह है कि उत्तर भारत में विभिन्न विधाओं का वैसा अंतर्मिलन कम मिलता है, जैसा शमशेर के यहां मिलता है। शमशेर का गद्य भी महत्वपूर्ण है जो उनके चित्र और कविता को समझने में मदद करता है और उसी तरह चित्रकला उनकी कविता को समझने में मददगार है।

सुप्रसिद्ध चित्रकार-साहित्यकार अशोक भौमिक ने चित्रकला के जनसांस्कृतिक परंपरा की ओर ध्यान देने का आग्रह किया और कहा कि बाजार ने जिन चित्रकारों से हमारा परिचय कराया वही श्रेष्ठता की कसौटी नहीं हैं। इसका उदाहरण शमशेर की चित्रकला है। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार भाषा सिंह ने किया।

बाबा नागार्जुन: कुछ संस्मरण : अतुल शर्मा

जनशताब्दी वर्ष पर बाबा नागार्जुन को शि‍द्दत से याद कर रहे हैं कवि‍, लेखक और सामाजि‍क कार्यकर्ता अतुल शर्मा-
प्रतिष्ठित जनकवि बाबा नागार्जुन उम्र की जिस दहलीज पर मिले, उस समय स्वाभाविक थकान घेरे रहती है। लेकिन बाबा नागार्जुन इसके अपवाद रहे। मैंने पहली मुलाकात में ही मस्ती, घुमक्कड़ी फक्कड़पन और ठहाकों से घुली मिली अद्भुत गहरी जि‍जि‍वि‍षा अनुभव की।
डी.ए.वी. कॉलेज देहरादून का यूनियन वीक। एक तरफ चुटकुलेबाजों का तथाकथित कवि सम्मेलनीय मंच और दूसरी तरफ युवाओं से भरे हॉल में बाबा नागार्जुन का इंतजार। यह जनपक्षीय संदेश देने के लिए किया गया कार्यक्रम था। साहित्य का जनसंघर्षों के साथ भीतरी रिश्ता नागार्जुन जैसे प्रतीक को लेकर किया गया आयोजन था।
बाबा देहरादून पहुंचे। कुछ समय बाद उन्हें एक बड़े होटल में ठहरा दिया गया। मोटा खादी का कुर्ता, ऊंचा पजामा, खि‍चड़ी दाढ़ी, सिर से गले तक मफलर और मफलर के ऊपर टोपी। मोटा खादी का कोट, हाथ में छड़ी। एक दरी में छोटा सा बिस्तर रस्सी से बंधा था। एक झोला था जिसमें किताबें व दवाई की बोतलें थीं। सहज देहाती युगपुरुष बाबा नागार्जुन भव्य होटल के रंगीन पर्दों, दीवारों, खिड़कियों और फर्नीचरों के बीच चल रहे थे। पीछे युवाओं की उत्साही भीड़ थी। एक सुविधाजनक सोफे में बैठकर उन्होंने अपनी सांसों को संयत करने के लिए पानी मांगा। एक नजर युवाओं की तरफ डाली और मुस्कुफराये। फिर पैर सोफे पर चढ़ा कर बैठ गए। छात्र संघ अध्यक्ष जो उन्हें सादतपुर से गाड़ी में लाए थे, उन्हें इशारे से बुलाया और कहा, ‘‘अतुल को बुला सकते हो?’’
मेरे पास फोन आया- ‘बाबा देहरादून पहुंच गए हैं। आपको याद कर रहे हैं।’ कुछ ही देर बाद मैं बाबा के सामने था। वह मेरा हाथ पकड़कर बैठ गए। हंसे और कुछ बातें कीं। फिर धीरे-धीरे उठे, अपना छोटा सा रस्सी बंधा बि‍स्तर सामने रखवाया, झोला कंधे पर टांगा और छड़ी ढूंढने लगे। न मैं कुछ समझ पाया और न कोई और।
‘‘अतुल के घर जाऊंगा।’’ विनम्रता और दृढ़ता के साथ बाबा ने कहा। सब चौंके। उन्होंनें मेरा हाथ पकड़ा। सब बाहर की तरफ चलने लगे। न कोई विवाद न कोई संवाद। मेरी क्या हिम्मत मैं कुछ कहूँ। मेरे लिए तो यह अप्रत्याशित सौभाग्य था।
‘‘वहीं रहूंगा।’’ बाबा ने निर्णायात्मक स्वर में कहा। बाहर निकल छात्रसंघ अध्यक्ष ने मुझे अलग बुलकर कहा, ‘‘एक- डेढ़ घंटे बाद कार्यक्रम है। बाबा को वहां भी पहुंचना है।’’
‘‘मुझे बताओ मैं क्या कर सकता हूं ?’’ मैंने कहा।
‘‘मैं आपके साथ चलता हूं और साथ ही कॉलेज ले आयेंगे।’’ छात्रसंघ अध्यक्ष ने कहा। गाड़ी में बाबा बहुत खुश थे।
हम जहां पहले रहते थे, उसके सामने बजरी बिछा एक लॉन था। और उसके आसपास पिताजी के लगाए बावन तरह के गुलाब, कैक्टस, बोगेनवैलिया, कुछ सब्जियां और अन्य पौधे लगे थे। जाफरी वाला मकान, टीन की छत, नींबू के पेड़ से सटा हुआ एक कमरा। वहां रखी चारपाई और दो कुर्सियां। बाबा वहीं बैठे, फिर लेट गए। मैंने परिवार में अम्मा जी, रीता, रेखा और रंजना को मिलवाया। वह उठकर बैठ गए। एकदम बोले, ‘‘अतुल, मुझे तो मेरा परि‍वार मि‍ल गया।’’ अम्मा जी से कहा, ‘‘थोड़ी सी खिचड़ी खाऊंगा।’’ हमें बहुत अच्छा लग रहा था, पर छात्रसंघ पदाधिकारियों की धड़कनें बहुत बढ़ रही थीं।
बाबा मेरा हाथ पकड़कर बाहर आये। और क्यारियों में घूमने लगे। अपनी छड़ी से इशारा करते हुए बोले, ‘‘यह तो सर्पगंधा है। रक्तचाप की अचूक औषधि। यह कैलनडूला एन्टीबायटिक।’’ ऐसे कई पौधे उन्होंने गिना दिये। वह कहने लगे, ‘‘लगता है बहुत जानकार आदमी थे शर्मा जी।’’ (शर्मा जी यानी स्वतंत्रता सेनानी कवि श्रीराम शर्मा प्रेम)। काफी देर गुलाब को देखते रहे। और फिर कमरे की ओर जाने लगे। इतनी देर में खिचड़ी बन चुकी थी। उन्होंने बहुत थोड़ी-सी खिचड़ी और सब्जी खाई। और फिर मुझसे पूछा, ‘‘कितनी देर में है आयोजन?’’ मैंने कहा, ‘‘शुरू ही होने वाला होगा।’’ ‘‘तो फिर चलते हैं वहीं पर, सामान यहीं रहेगा। मैं भी यहीं रहूंगा।’’ मैंने न जाने क्यों पूछ लिया, ‘‘यहां कोई असुविधा तो नहीं होगी?’’  इस पर वह नाराज हो गए। उन्होंने कहा, ‘‘खबरदार जो मेरे घर को असुविधाजनक कहा।’’
डी.ए.वी. कॉलेज हॉल- बाबा के आने से खलबली मच गई। राहुल सांकृत्यायन के साथ तिब्बत यात्रा और निराला के समकालीन आपातकाल में सक्रिय काव्यमय विद्रोह करने वाले मैथिली साहित्य में साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त हिंदी के वरिष्ठतम कवि, गद्यकार व आन्दोलनकारी बाबा नागार्जुन बार-बार मंच से यही कहते रहे कि- जन से होते हुए जन तक पहुंचना ही लक्ष्य है। दिल्ली से उनके साथ आये महेश दर्पण और देहरादून के कवियों के साथ उन्होंने काव्यपाठ किया। ‘मंत्र’ कविता सुनाई। छात्र-छात्राओं के साथ घंटों बैठे रहे। रिश्ते जोड़ लिये। सबको हमारे घर का पता देते रहे। और अद्भुत निरन्तरता के संवाद बाबा नागार्जुन से मिलने दो दिन तक हमारे यहां मेला लगा रहा। चाय का बड़ा भगोना रेखा ने चढ़ा दिया था। युवा और वृद्ध, साहित्यकार और रंगकर्मी अलग-अलग सोच के राजनीतिक लोगों से हमारा घर भरा रहा। बाबा क्या आये जश्न हो गया। तभी तो वे जनकवि हुए।
अगले दिन मेरे आग्रह पर महादेवी पीजी कॉलेज के हिन्दी विभाग में भी उन्होंने शिरकत की। रात को सोते समय कहने लगे, ‘‘आज मेरी पांच हजार से ऊपर फोटो खिंची होंगी। ये सोच रहे हैं कि मैं इतनी जल्दी चला जाऊंगा। इन्हें पता नहीं कि अभी बहुत दिन जियूंगा।’’ वह ठहाका मार कर हंसे। मैंने मन ही मन सोचा, बाबा नागार्जुन कभी समाप्त हो ही नहीं सकते। वह हमारे यहां कई दिन तक रहे।
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जयहरि‍खाल, पौड़ी गढ़वाल- बाबा का पिचतरवां जन्मदिवस। वाचस्पति के यहां आकर वह हर साल रहते थे। उसका फोन आया कि ‘‘बाबा का पिचतरवां जन्मदिवस है। तुम्हें आना है।’’ मैं यह अवसर कैसे चूकता। लैंसडाउन के पास छोटी-सी बस्ती जयहरिखाल पहुंच गया। वहां वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित बाबा नागार्जुन की काव्यपुस्तक ‘ऐसा क्या कह दिया मैंने’ का विमोचन हुआ। शेखर पाठक, गिर्दा आदि मौजूद थे। काव्यगोष्ठी  हुई। बाबा ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘अकाल’ सुनाई। और लोगों ने भी काव्य पाठ किया। मैंने दो जनगीत सुनाए। उसकी एक पंक्ति पर बाबा काफी देर तक बोले। यह मेरे लिये उत्साहजनक था। पहली पंक्ति थी-
‘ये जो अपनी शिरायें हैं सारी पगडंडियां गांव की हैं।’
और दूसरी कविता की पंक्ति थी- ‘जिस घर में चूल्हा नहीं जलता, उसके यहां मशाल जलती है।’ मेरी इन दोनों पंक्तियों पर काफी देर तक चर्चा की। जयहरिखाल को केन्द्र मान कर कई कविताएं लिखी थीं जो गढ़वाल विश्वविद्यालय के कोर्स में पढ़ाई जाती हैं।
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नैनीताल- नागार्जुन, गिर्दा और मैं नुक्कड़ कवि सम्मेलन में काव्यपाठ कर रहे थे। बाबा ने एक पंक्ति सुनाई- ‘एक पूत भारत माता का। कंधे पर है झंडा। पुलिस पकड़ कर जेल ले गई। बाकी रह गया अंडा।’ यह सबको बहुत पसंद आई। साहित्य समझ भी आये और परिवर्तन की दिशा में कार्य भी करे। यह मकसद ठीक लगा। उन्होंने चलते समय अपनी घड़ी देते हुए कहा, ‘‘अतुल, यह लो मैं तुम्हें समय देता हूं।’’ यह कहकर वह खुद ही ताली बजाकर बच्चों की तरह खिलखिलाये और बाबाओं की तरह चले गये मुड़कर नहीं देखा।
ये दृश्य कभी भूलता नहीं। ऐसे बहुत से संस्मरण मेरे पास हैं जो नैनीताल, हल्द्वानी, कौसानी, पौड़ी, अल्मोड़ा, देहरादून ही नहीं, बल्कि दिल्ली तक फैले हुए हैं। बहुत लोगों में बाबा इस तरह से जीवित हैं।
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दिल्ली विश्वपुस्तक मेला। एक स्टॉल पर बाबा बैठे हैं। वह किसी पुस्तक का विमोचन करने को तैयार हैं। उनसे मिले बहुत वर्ष हो गये थे। सोचा कि पहचान भी पायेंगे कि नहीं। उनके पास गया और प्रणाम किया। वह किसी और से बात करने लगे। मैं चलने लगा। उन्होंने लपक कर मेरा हाथ पकड़ा, ‘‘अरे, इतनी जल्दी क्या है? देहरादून जाना है क्या?’’ वह फिर चिरपचित हंसी के साथ मिले। अच्छा लगा कि भीड़ भरी दुनिया में अभी कुछ लोग ऐसे हैं जो मन से जुड़ते हैं। उन्होंने गढ़वाल की कई बातें पूछीं। एकएक दिल्ली के नामवर लोगों ने उन्हें घेर लिया। भीड़ के पीछे खड़ा मैं भी बाबा के साथ जुड़ा रहा। आज भी जुड़ा हूं।