Archive for: December 2010

नया साल मुबारक : भीमसेन त्‍यागी

वरि‍ष्‍ठ कथाकार भीमसेन त्‍यागी का यह व्‍यंग्‍य नूतन सवेरा के जनवरी, 1997 अंक में प्रकाशि‍त हुआ था।  उस समय त्‍यागीजी ने जो शंकाएं प्रकट की थीं, दुर्भाग्‍यवश वे और भी भीषण रूप में सामने है-

नया साल करीब आ रहा है और मेरी डाक में रंग-बिरंगे, खुशबूदार बधाई कार्डों की संख्या बढ़ती जा रही है। इन कार्डों में फूल हैं, पत्ते हैं, चिडिय़ा हैं, सुख-समृद्घि की शुभकामनाएँ हैं। मैं इन पत्रों को पढ़ता हूँ और दु:खी हो जाता हूँ। आश्‍चर्य है- इस प्रदूषित राजनैतिक माहौल में लोग खुशियों को मन के किस कोने में छिपाकर रखते हैं!
नये साल के शुभ अवसर पर आप मेरी बधाई स्वीकार करें। यह वर्ष निरंतर आपत्तियों और आशंकाओं से भरा रहे। केन्द्र और राज्यों में फिर चुनाव हों। लेकिन सरकार कहीं भी न बन सके। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पदों के लिए बराबर खींचतान चलती रहे। हम लोकतंत्र का असली मजा चखते रहें।
भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों और मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमें चलते रहें। जिन नेताओं का नकाब अभी तक नहीं उठा है, उनका भी उठ जाए। सब सुखी हो जाएं। तिहाड़ जेल संसद भवन बन जाए। जय ललिता के घर से एक टन सोना और एक लाख जूते बरामद हों, ताकि देश अपनी समृद्घि पर गर्व कर सके! जो नेता भ्रष्ट सिद्घ हो जाएं उनका सार्वजनिक अभिनंदन हो और जो अभी तक भ्रष्ट नहीं हुए हों, उन पर राष्ट्रद्रोह के मुकदमे चलाए जाएं।
राजनैतिक भ्रष्टाचार के साथ-साथ सांस्कृतिक भ्रष्टाचार का भी विकास हो। सभी संस्कृतिकर्मी राजनेताओं के पिछलग्गू बन जाएं। भ्रष्टाचार की बहती गंगा में गोते लगाएं और मानद पदों के ऊँचे सिंहासन प्राप्त करें। जो इनाम पाकर भी सरकार को गाली देने का दु:साहस करें, उन्हें उनकी औकात बता दी जाए।
केन्द्र और राज्यों में कहीं सरकार हो तो उनका संचालन पार्टी प्रमुखों के रिमोट कंट्रोल से हो। राजनैतिक पार्टियों की अपनी-अपनी सेनाएं हों। तमाम गुण्डे उन सेनाओं के नायक हों। शांति तथा व्यवस्था बनाए रखने और सामाजिक न्याय दिलाने का काम उनके जिम्मे हो।
कोई किसी भले आदमी के मकान में लम्बे अर्से से रह रहा हो और सिर्फ किराया देकर मकान में जमें रहना चाहता हो तो नायक धमकी के बल पर मकान खाली करवा कर बेचारे मकान मालिक को सामाजिक न्याय दिलवायें। किरायेदार नायकों को धमकी में न आए तो वे प्रेमपूर्वक हत्या करके उसे तमाम दु:खों से मुक्त कर दें। पत्रकार ऐसे कल्याणकारी कामों का विरोध करें तो उनकी जम कर ठुकायी हो और समाचार पत्रों के खिलाफ धर्मयुद्घ घोषित कर उनके दफ्तरों पर हमले किए जाएं।
नये साल में राजनेताओं और धर्मगुरूओं क संबंध प्रगाढ़ हों। वे मिलजुल कर घोटाला उद्योग का विकास करें। कोई सिरफिरा लक्खूभाई उन्हे मुकदमें में फंसाकर तिहाड़ भिजवा दे तो वे एक दूसरे के आंसू पोंछ कर आध्यात्मिक सुख प्राप्त करें।
देश में भीषण बाढ़ आए और अकाल पड़ें। नेता हेलिकॉप्टरों में बैठ कर त्रस्त इलाकों का दौरा करें और उनकी मदद के लिए मोटी-मोटी रकम मंजूर कराएं !
पुलिस के उच्च अधिकारी सुदंर महिलाओं की लिस्ट बनाएं और निर्भीक होकर एक-एक के साथ छेडख़ानी करें।
अति-अति महत्वपूर्ण दो प्रतिशत लोगों की भाषा हिं‍गलीश को देखकर देश की राष्ट्रभाषा घोषित की जाय। हिन्दी तथा अन्य प्रादेशिक भाषाओं में काम करने और बोलने को अपराध माना जाय!
नये साल में फिल्मी तारों और तारिकाओं के यहां बड़े-बड़े छापे पड़ें, ताकि उनके स्टेटस और काम करने के पारिश्रमिक की दरों में बृद्घि हो।
माइकेल जैक्सन बार-बार हमारे देश में आएं और फूहड़ भांड संस्कृति को स्थापित करें। वह ज्यादा से ज्यादा भारतीय लड़कियों के साथ नाचें, ताकि वे नहाना-धोना बंद कर दें और इस तरह जो पानी बचे, उससे कुछ प्यासों की प्यास बुझायी जा सके!
हमारे तमाम बेहतरीन खिलाड़ी खूबसूरत माडलों और एक्ट्रेसों से शादी कर लें और खेल के मैदान में दूसरों को जीतने का मौका देकर अपनी उदारता का परिचय दें!
देश में अंतर्राष्टरीय सौंदर्य प्रतियोगिता का आयोजन हो और फिर मुहल्ले-मुहल्ले में वैसी प्रतियोगिताएं होती रहें! तमाम खूबसूरत लड़कियां कपड़ों में से निकल कर फ्लोर पर आ जाएं और दर्शकों की आंखों की सिकाई करती रहें।
भूमंडलीकरण और नयी आर्थिक नीति का खुल कर विस्तार हो। देश में बहुराष्टरीय कंपनियों की बाढ़ आ जाए। बाजार बिदेशी माल से पटे रहें। विज्ञापन का जादम लोगों में अंतराष्ट्रीय स्तर की विदेशी चीजें इस्तेमाल करने का उन्माद जगाए। देशी कारखाने एक-एक कर बंद होते रहें। मुल्क में बेरोजगारी बढ़े। नौजवानों को भरपूर आराम और मनोरंजन के अवसर मिलें।
देश में विदेशी टी.वी. चैनलों की भरमार हो! वे टी.वी. चैनल देशी भगवान को बेच कर खाते रहें। ज्यादा से ज्यादा सैक्स और अपराध परोसें! बेडरूम सिमटकर टी.वी. के स्क्रीन पर आ जाए। अवैध संबंधों और बलात्कारों में उफान आए। फैशन की मारी अधनंगी समाजसेविकाएं बलात्कार के विरूद्घ प्रदर्शन करती रहें !
गली-गली में बीयर बार खुले। घी-दूध की तमाम नदियां सूख जाएं और उनमें शराब उफन-उफन कर बहे। सुदंर बार-बालाएं अपने ग्राहकों का हर तरह से मनोरंजन करती रहें।
हम गरीबी, बेरोजगारी और भूखमरी का ताज पहन कर शान के साथ इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करें।
नया साल आपके लिए छोटी-छोटी खुशियां और बड़े-बड़े गम लेकर आए।

भोजपुरी के सम्मान के लि‍ए सड़क पर उतरने की चेतावनी

नई दि‍ल्लीः प्रसिद्ध साहित्यकार केदारनाथ सिंह ने कहा कि भोजपुरी हमारा घर है और हिंदी देश। न घर को छोड़ा जा सकता है और न देश को, इसे सरकार को समझना होगा। सरकारी संरक्षण से अधिक जरूरी यह है कि भोजपुरी में बढि़या लेखन हो और इस क्षेत्र के बड़े लेखक भोजपुरी में लिखने के लिए आगे आएं। उन्होंने यह बात भोजपुरी समाज द्वारा नई दिल्ली में आयोजित भोजपुरिया शिखर सम्मेलन में कही।
भोजपुरी गायक व सिने स्टा‍र मनोज तिवारी ने कहा है कि यदि भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने में देरी हुई तो सड़क पर भी  संघर्ष होगा। 20 करोड़ लोग भोजपुरी भाषा बोलते हैं, लेकिन सरकार लगातार उनकी उपेक्षा कर रही है। उन्हों ने कहा कि आठवीं अनुसूची में कई ऐसी लोकभाषाए हैं, जिन्हें बोलने वाले महज 20 से 50 लाख के बीच हैं। मैं इनका विरोध नहीं करता,  लेकिन यह कहां तक उचित है कि 20 करोड़ लोगों की भाषा को उपेक्षित रखा जाए।
भोजपुरी की लड़ाई को अमलीजामा पहनाने और भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए भोजपुरी समाज के  बैनर तले आयोजित इस कार्यक्रम में सांसद व फिल्म कलाकार शत्रुध्न सिन्हा ने कहा कि यदि 15 वीं लोकसभा चलेगी तो भोजपुरी उसमें रहेगी। भ्रष्टाचार की वजह से 15 वीं लोकसभा का क्या  होगा कहना मुश्किल है, लेकिन मैं आप लोगों से वादा करता हूं कि जब भी संसद का सत्र चलेगा भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए मैं पटल पर जोरदार मांग रखूंगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भोजपुरी समाज के अध्यक्ष अजीत दुबे  ने कहा कि 30 अगस्त, 2009 को भोजपुरी के विषय को कॉलिंग अटेंशन मोशन में  सांसद संजय निरुपम, रघुवंश प्रसाद सिंह और जगदंबिका पाल ने संसद में  उठाया, जिसके लिए भोजपुरी समाज उनका आभारी है। भोजपुरी स्टार मनोज तिवारी के नाम पर हॉलैंड में डाक टिकट जारी हो चुका है। देश से बाहर मॉरिशस, सूरीनाम, फिजी जैसे देशों में भोजपुरी व्यापक रूप से  बोली जाती है, मॉरिशस में तो इसे संवैधानिक दर्जा भी प्राप्त है, इसके बाद भी सरकार को इस भाषा की सुध नहीं है। सरकार नहीं चेती तो भोजपुरी समाज सड़क पर उतरकर संघर्ष करने को बाध्यम होगा।

लोकतंत्र को उम्रकैद: प्रणय कृष्ण

डा. बिनायक सेन को उम्रकैद की सजा के खि‍लाफ देश-वि‍देश में आवाज तेज हो गई है। सत्‍ता के घृणि‍त चेहरे को उजागर करता जन संस्कृति मंच के महासचि‍व प्रणय कृष्ण का आलेख-

25 दिसम्बर, 2010

ये मातम की भी घडी है और  इंसाफ की एक बडी लडाई छेडने की भी। मातम इस देश  में बचे-खुचे लोकतंत्र का गला घोंटने पर और  लडाई- न पाए गए इंसाफ के लिए जो  यहां के  हर नागरिक का अधिकार है। छत्तीसगढ की निचली अदालत ने विख्यात मानवाधिकारवादी, जन-चिकित्सक और  एक खूबसूरत इंसान डा. बिनायक सेन को  भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी और  धारा 124-ए, छत्तीसगढ विशेष  जन सुरक्षा कानून की धारा 8(1),(2),(3)  और (5) तथा गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून की धारा 39(2) के  तहत राजद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेडने की साज़िश  करने के  आरोप में 24 दिसम्बर के दिन उम्रकैद की सज़ा सुना दी। यहां कहने का अवकाश नहीं   कि कैसे ये सारे कानून ही कानून की बुनियाद के खिलाफ हैं। डा. सेन को  इन आरोपों में 24 मई, 2007 को  गिरफ्तार किया गया और सर्वोच्च न्यायालय  के हस्तक्षेप से पूरे दो साल साधारण कैदियों से भी कुछ मामलों में बदतर स्थितियों में जेल में रहने के बाद,  उन्हें ज़मानत दी गई। मुकादमा उनपर सितम्बर, 2008 से चलना शुरु हुआ। सर्वोच्च   न्यायालय ने यदि उन्हें ज़मानत देते हुए यह न कहा होता कि इस मुकदमे का निपटारा जनवरी, 2011 तक कर दिया जाए, तो   छत्तीसगढ़ सरकार की योजना थी कि मुकदमा दसियों साल चलता रहे और जेल में ही बिनायक सेन बगैर किसी सज़ा के दसियों साल काट दें। बहरहाल जब यह सज़िश  नाकाम हुई  और मजबूरन मुकदमें की जल्दी-जल्दी सुनवाई में सरकार को   पेश   होना पडा, तो   उसने पूरा दम लगाकर उनके खिलाफ फर्ज़ी साक्ष्य जुटाने शुरु किए।

डा. बिनायक पर आरोप था कि वे माओंवादी नेता नारायण सान्याल से जेल में 33 बार 26 मई से 30 जून, 2007 के बीच  मिले। सुनवाई के दौरान साफ हुआ कि नारायण सान्याल के इलाज के सिलसिले में ये मुलाकातें जेल अधिकारियों  की अनुमति से,  जेलर की उपस्थिति में हुईं। डा. सेन पर मुख्य आरोप यह था कि उन्होंने नारायण सान्याल से चिट्ठियां लेकर उनके  माओवादी साथियों तक उन्हें पहुंचाने में मदद की। पुलिस ने कहा कि ये चिट्ठियां उसे पीयुष गुहा नामक एक कलकत्ता के व्यापारी से मिलीं जिसतक उसे डा. सेन ने पहुंचाया था। गुहा को  पुलिस ने 6 मई, 2007 को रायपुर में गिरफ्तार किया। गुहा ने अदालत में बताया कि वह 1 मई को   गिरफ्तार हुए। बहरहाल ये पत्र कथित रूप से गुहा से ही मिले, इसकी तस्दीक महज एक आदमी अ़निल सिंह ने की जो  कि एक कपड़ा व्यापारी है और पुलिस के गवाह के बतौर उसने कहा कि गुहा की गिरफ्तरी के समय वह मौजूद था। इन चिट्ठियों पर न कोई नाम है, न तारीख, न हस्ताक्षर,  न ही इनमें लिखी किसी बात से डा. सेन से इनके  सम्बंधों  पर कोई प्रकाश    पडता है। पुलिस आजतक भी गुहा और डा़ सेन के बीच किसी पत्र-व्यवहार, किसी फ़ोन-काल, किसी मुलाकात का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाई। एक के बाद एक पुलिस के गवाह जिरह के  दौरान टूटते गए। पुलिस ने डा. सेन के घर से मार्क्सवादी साहित्य और तमाम कम्यूनिस्ट पार्टियों   के दस्तावेज़, मानवाधिकार रिपोर्टें,  सी.डी़ तथा उनके   कम्प्यूटर से तमाम फाइलें बरामद कीं। इनमें से कोई चीज़ ऐसी न थी जो  किसी भी सामान्य पढे़-लिखे, जागरूक आदमी को प्राप्त  नहीं हो  सकतीं। घबराहट में पुलिस ने भाकपा (माओंवादी) की केंद्रीय कमेटी का एक पत्र पेश    किया जो  उसके  अनुसार डा. सेन के  घर से मिला था। मज़े की बात है कि इस पत्र पर भी भेजने वाले के  दस्तखत नहीं हैं। दूसरे, पुलिस ने इस पत्र का ज़िक्र उनके  घर से प्राप्त वस्तुओं  की लिस्ट में न तो  चार्जशीट में किया था, न ”सर्च मेमों” में। घर से प्राप्त हर चीज़ पर पुलिस द्वारा डा. बिनायक के   हस्ताक्षर लिए गए थे, लेकिन इस पत्र पर उनके   दस्तखत भी नहीं हैं। ज़ाहिर है कि यह पत्र फर्ज़ी है। साक्ष्य के   अभाव में पुलिस की बौखलाहट तब और हास्यास्पद हो  उठी जब उसने पिछली 19 तारीख को  डा. सेन की पत्नी इलिना सेन द्वारा वाल्टर फर्नांडीज़, पूर्व  निदेशक, इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट ( आई.एस.आई.), को  लिखे एक ई-मेल को   पकिस्तानी आई.एस. आई. से जोडकर खुद को  हंसी का पात्र बनाया। मुनव्वर राना का शेर याद आता है-
“बस इतनी बात पर उसने हमें बलवाई लिक्खा है
हमारे घर के बरतन पे आई.एस.आई लिक्खा है”
इस ई-मेल में लिखे एक जुमले ”चिम्पांज़ी इन द वाइटहाउस” की पुलिसिया व्याख्या में उसे कोडवर्ड  बताया गया.( आखिर मेरे सहित तमाम लोग इतने दिनॉं से मानते ही रहे हैं कि ओंबामा से पहले वाइट हाउस में एक बडा चिंम्पांज़ी ही रहा करता था.)। पुलिस की दयनीयता इस बात से भी ज़ाहिर है कि डा. सेन के  घर से मिले एक दस्तावेज़ के  आधार पर उन्हें शहरों  में माओंवादी नेटवर्क फैलाने वाला बताया गया। यह दस्तावेज़ सर्वसुलभ है। यह दस्तावेज़ सुदीप चक्रवर्ती की पुस्तक, ”रेड सन- ट्रैवेल्स इन नक्सलाइट कंट्री” में परिशिष्ट  के  रूप में मौजूद है। कोई भी चाहे इसे देख सकता है। कुल मिलाकर अदालत में और बाहर भी पुलिस के  एक-एक झूठ का पर्दाफाश  होता गया। लेकिन नतीजा क्या हुआ? अदालत में नतीजा वही हुआ जो  आजकल आम बात है। भोपाल गैस कांड़ पर अदालती फैसले को  याद कीजिए। याद कीजिए अयोध्या पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के  फैसले को। क्या कारण है कि बहुतेरे लोगों को  तब बिलकुल आश्‍चर्य नहीं होता  जब इस देश के  सारे भ्रष्‍टाचारी, गुंडे, बदमाश, बलात्कारी टी.वी. पर यह कहते पाए जाते हैं कि वे न्यायपालिका का बहुत सम्मान करते हैं?
याद ये भी करना चाहिए कि भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह  की धाराएं कब की हैं। राजद्रोह की धारा 124 -ए जिसमें डा. सेन को दोषी करार दिया गया है 1870 में लाई गई जिसके   तहत सरकार के   खिलाफ ”घृणा फैलाना”, ” अवमानना करना” और ” असंतोष  पैदा”करना राजद्रोह है। क्या ऐसी सरकारें घृणित नहीं है जिनके  अधीन 80 फीसदी हिंदुस्तानी 20 रुपए रोज़ पर गुज़ारा करते हैं? क्या ऐसी सरकारें अवमानना के  काबिल नहीं जिनके  मंत्रिमंडल राडिया, टाटा, अम्बानी, वीर संघवी, बरखा दत्त और प्रभु चावला की बातचीत से निर्धारित होते हैं ? क्या ऐसी सरकारों के  प्रति हम और आप असंतोष  नहीं  रखते जो   आदिवसियों  के   खिलाफ ”सलवा जुडूम” चलाती हैं,  बहुराश्ट्रीय कम्पनियों  और अमरीका के  हाथ इस देश  की सम्पदा को   दुहे जाने का रास्ता प्रशस्त करती हैं। अगर यही राजद्रोह की परिभाशा है जिसे गोरे अंग्रेजों  ने बनाया  था  और काले अंग्रेजों ने कायम रखा, तो  हममे से कम ही ऐसे बचेंगे जो  राजद्रोही न हों। याद रहे कि इसी धारा के    तहत अंग्रेजों  ने लम्बे समय तक बाल गंगाधर तिलक को  कैद रखा.
डा. बिनायक और उनकी शरीके-हयात इलीना सेन देश  के   उच्चतम शिक्षा संस्थानॉं से पढकर आज के   छत्तीसगढ में आदिवसियों के   जीवन में रच-बस गए। बिनायक ने पी.यू.सी.एल के    सचिव के   बतौर छत्तीसगढ़ सरकार को  फर्ज़ी मुठभेड़ों पर बेनकाब  किया, सलवा-जुडूम की ज़्यादतियों  पर घेरा, उन्होंने  सवाल उठाया कि जो   इलाके   नक्सल प्रभावित नहीं हैं, वहां क्यों  इतनी गरीबी, बेकारी,  कुपोषण  और  भुखमरी है?. एक बच्चों  के   डाक्टर को   इससे बडी तक्लीफ क्या हो  सकती है कि वह अपने सामने नौनिहालों  को  तड़पकर मरते देखे?
इस तक्लीफकुन बात के   बीच एक रोचक बात यह है कि साक्ष्य न मिलने की हताशा में पुलिस ने डा. सेन के   घर से कथित रूप से बरामद माओवादियों की चिट्ठी में उन्हें ”कामरेड” संबोधित  किए जाने पर कहा कि ”कामरेड उसी को कहा जाता है, जो   माओवादी होता  है ”. तो  आप में से जो  भी कामरेड संबोधित किए जाते हों (हों भले ही न), सावधान रहिए। कभी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कबीर के   सौ पदों   का अनुवाद किया था। कबीर की पंक्ति थी, ”निसिदिन खेलत रही सखियन संग”. गुरुदेव ने अनुवाद किया, ”Day and night, I played with my comrades’। मुझे इंतज़ार है कि कामरेड शब्द के   इस्तेमाल के   लिए गुरुदेव या कबीर पर कब मुकदमा चलाया जाएगा?
अकारण नहीं है कि जिस  छत्तीसगढ में कामरेड शंकर गुहा नियोगी के   हत्यारे कानून के  दायरे से महफूज़ रहे,  उसी छत्तीसगढ में नियोगी के  ही एक देशभक्त, मानवतावादी, प्यारे  और निर्दोष चिकित्सक शिष्य को   उम्रकैद दी गई है। 1948 में शंकर शैलेंद्र ने लिखा था-

“भगतसिंह ! इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की !

यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे–
बंब संब की छोड़ो, भाषण दिया कि पकड़े जाओगे !
निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,
कांग्रेस का हुक्म; जरूरत क्या वारंट तलाशी की ! “

ऊपर की पंक्तियों  में ब़स कांग्रेस  के  साथ भाजपा और  जोड़  लीजिए.
आश्चर्य है कि साक्ष्य होने पर भी कश्मीर में शोंपिया बलात्कार और हत्याकांड  के दोषी,  निर्दोष नौजवानॉं को आतंकवादी बताकर मार देने के दोषी सैनिक अधिकारी खुले घूम रहे हैं और अदालत उनका कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वे ए.एफ.एस. पी.ए. नामक कानून से संरक्षित हैं, जबकि साक्ष्य न होने  पर भी डा. बिनायक को उम्र कैद मिलती है।
मित्रो मैं यही चाहता हूं कि जहां जिस किस्म से हो, जितनी दूर तक हो   हम डा. बिनायक सेन जैसे मानवरत्न के  लिए आवाज़ उठाएं ताकि इस देश   में लोग उस दूसरी गुलामी से सचेत हों  जिसके  खिलाफ नई आज़ादी के  एक योद्धा हैं डा. बिनायक सेन।

पूज्य पंत जी: मीना पाण्डे

28 दिसंबर को छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत की पुण्यतिथि है। उनकी रचनाओं और उपलब्धियों को पिरोकर लिखी गई सृजन से की संपादक मीना पाण्डे की कविता-
चुप है वीणा तार 
गुंजन किसे बुलाता है
बैठी राह में नयन बिछाए
मन चिदम्बरा का प्यासा है
वरहणी सी व्याकुल है ग्रंथी 
कुछ पल्लव कहना चाहता है
पूज्य पंत जी फिर आ जाओ, 
पहाड़ तुम्हें बुलाता है

 हिम षिखरों के मन व्यथित हैं
 नदियों की कल-कल है सूनी
 खग-विहग सब मौन पड़े हैं
 है कविता वाली बात अधूरी
 तुम्हें लोचन उलझाने फिर
बालों का बाल-जाल बुलाता है                                                                                                                                                                                 पूज्य पंत जी फिर आ जाओ,
 पहाड़ तुम्हें बुलाता है  

 बसंत के मौसम में जब भी
 छू कर जाती मंद पवन
 याद हमे आते हैं अक्सर
 पहाड़, प्रकृति ‘औ’ पंत
 तुम्हें निमंत्रण नक्षत्रों सा
 अवनी का कण-कण देता है
 पूज्य पंत जी फिर आ जाओ,
 पहाड़ तुम्हें बुलाता है
 
 हे युग निर्माता ज्ञानपीठ
 हे कविता के छायावादी
 अब भी वर्षा ऋतु बादल का
 घुंघट ओढ़े है आती
 अब शैल में जलद, 
जलद में शैल देखा जाता है
 पूज्य पंत जी फिर आ जाओ, 
पहाड़ तुम्हें बुलाता है 

 

लाल बिहारी लाल को लघुकथा सम्मान

नई दिल्ली: कथाकार लाल बिहारी लाल को दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका हम सब साथ-साथ द्वारा आयोजित लघु कथा प्रतियोगिता-2010 में उनकी लघु कथा साजिश के लिए लघुकथाकार-2010 सम्मान प्रदान किया गया। मुख्य अतिथि वरिष्ठ कथाकार चित्रा मुद्गल एवं वरिष्ठ साहित्यकार डा. सुरजीत सिंह जोवन ने संयुक्त रूप से उन्हें यह पुरस्कार गांधी शान्ति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित समारोह में प्रदान किया। समारोह की अध्यक्षता डा. जोबन ने की। सानिध्य वरिष्ठ लेखक विनोद बब्बर तथा बलराम का रहा। इस अवसर पर देश के 15 प्रदेशों के 21 लघुकथाकारों को सम्मानित किया गया। अतिथियों द्वारा लघुकथा के विकास एवं दशा तथा दिशा पर संतोष व्यक्त किया।पत्रिका के कार्यकारी संपादक किशोर श्रीवास्तव ने सबको धन्यवाद दिया। प्रस्तुतिः सोनू गुप्ता

कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास में मुक्तिबोध से आगे हैं अज्ञेय : नामवर सिंह

 

नई दिल्ली : शब्दों का वैभव अज्ञेय के पूरे कविता संसार में देखा जा सकता है। कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वह मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी। यह बात सुविख्यात आलोचक नामवर सिंह ने कही। वह दिल्ली विश्‍वविद्यालय के हिन्दू कालेज में अज्ञेय की जन्म शताब्दी के अवसर पर विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से ‘आज के प्रश्‍न और अज्ञेय’  विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोल रहे थे। इस दो दिवसीय आयोजन में अनेक महविद्यालयों के अध्यापकों, शोधार्थियों और युवा विद्यार्थियों ने भागीदारी की।

प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि अज्ञेय को प्रयोगवादी कवि कहा जाता है, लेकिन अज्ञेय प्रयोगवादी कवि नहीं हैं। वे पूरी परम्परा के प्रतीकों में जैसा इस्तेमाल करते हैं वह सचमुच विरल है। उन्‍होंने अज्ञेय की चर्चित कविताओं ‘नाच’ और ‘असाध्य वीणा’ को उधृत करते हुए कहा कि अज्ञेय के काव्य के सभी कला रूपों का दर्शन ‘नाच’ में होता है।

कवि-संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने कहा कि हमारा समय मध्य वर्ग को गोदाम बनाने का युग है, जहां दुनिया को विचार के बदले वस्तुओं से बदल देने पर जोर है। उन्होंने कहा कि इस सन्दर्भ में अज्ञेय का रचना कर्म महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे विचार पर पूरा आग्रह करते हैं। वाजपेयी ने अज्ञेय की कई महत्वपूर्ण
कविताओं  का पाठ करते हुए कहा कि वे खड़ी बोली के सबसे बड़े बौद्ध कवि हैं जो शान्ति और स्वाधीनता का संसार रचते हैं। उन्होंने कहा कि परम्परा से हमारे यहाँ साहित्य और कला चिंतन साझा रहा है लेकिन हिंदी आलोचना दुर्भाग्य से साहित्य तक सीमित  रही है। इस सन्दर्भ में अज्ञेय के चिंतन को उन्होंने महत्वपूर्ण बताया। वरिष्ट समालोचक नित्यानंद तिवारी ने कहा कि सभ्यता ऐसे बिंदु पर पहुँच गई है, जहां पूंजीवाद और प्रकृति में एक को चुनना पड़ेगा और तब हम देखेंगे कि अज्ञेय की कविता अंततः पूंजी के नहीं, प्रकृति और मनुष्यता के पक्ष में जाती है। उन्‍होंने कहा कि अज्ञेय में दार्शनिक विकलता का चरम रूप असाध्य वीणा में है, जो ध्यानात्मक होती चली गई है। अज्ञेय की कुछ बहुत छोटी-छोटी कविताओं की चर्चा करते हुए प्रो. तिवारी ने कहा कि बड़े संकट में छोटी चीज़ें भी अर्थवान हो जाती हैं,  ये इसका उदाहरण है। इससे पहले हिन्दू कालेज के प्राचार्य प्रो. विनय कुमार श्रीवास्तव ने स्वागत किया और संयोजक डॉ.विजया सती ने संगोष्ठी की रूपरेखा रखी। सत्र का संयोजन कर रहीं डॉ. रचना
सिंह ने वक्ताओं का परिचय दिया।

दूसरे सत्र में विख्यात कवि और अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरे सप्तक के रचनाकार केदारनाथ सिंह ने कहा कि
मौन अज्ञेय के साहित्य का स्थाई भाव है और उनका  पूरा लेखन इसी मौन की व्याख्या है। उन्होंने कहा कि अज्ञेय की कविता पाठक और अपने बीच एक ओट खडा करती है और यह उनकी  कविता की ख़ास तिर्यक पद्धति है। ‘भग्नदूत’ और ‘इत्यअलम’ जैसे उनके प्रारंभिक संकलनों को पुनर्पाठ के लिए जरूरी बताते हुए केदारजी ने कहा कि बड़ी कविता में वे रेहटरिक हो जाते थे वहीं छोटी  कविताओं में उनकी पूरी रचनात्मक शक्ति और सामर्थ्य दिखाई पड़ती है। वैविध्य की दृष्टि से अज्ञेय को उन्होंने हिंदी के थोड़े से कवियों में बताया। उन्‍होंने कहा कि अज्ञेय कविता के बहुत बड़े अनुवादक भी हैं। ‘आधुनिक भावबोध और अज्ञेय की कविता’ विषयक इस सत्र में दिल्ली विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और सुपरिचित आलोचक प्रो. गोपेश्‍वर सिंह ने शीतयुद्ध के दौर में हिन्दी आलोचना के सन्दर्भ में अज्ञेय के कृतित्व पर विचार करते हुए कहा कि भारतीय कविता श्रव्य परम्परा की रही है जिसे आधुनिक बनाने की कोशिश अज्ञेय ने की। उन्‍होंने कहा कि इसी दौर में लघुमानव और महामानव की बहस में साहित्य को
लघु मानव अर्थात सामान्य मनुष्य की ओर मोड़ने के लिए भी अज्ञेय को श्रेय दिया जाना चाहिए, जिनका मनुष्य की गरिमा में गहरा विश्‍वास है। उन्होंने कहा कि जिस यथार्थवाद की कसौटी पर अज्ञेय को खारिज किया जाता है वह ढीली-ढाली है। अतः कविता के इतिहास पर दुबारा बात की जानी चाहिए।

जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र के प्रो. गोबिंद प्रसाद ने कहा कि अज्ञेय बेहद आत्मसज़गता के कवि थे, जो ताउम्र अपनी छाया को ही लांघते रहे, अपने से लड़ते  रहे। उन्होंने कहा कि अज्ञेय ने आधुनिकता को
एक निरंतर संस्कारवान होने की प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा है, जहां स्व और आत्म पर बेहद आग्रह है। उन्‍होंने कहा कि इसका एक सिरा जहां अस्मिता और इयत्ता से जुड़ता है, वहीं दूसरा आत्मदान और दाता भाव से भी। कवि और कविता की रचना प्रक्रिया पर जितनी कवितायें अज्ञेय ने लिखी हैं, उतनी और किसी हिन्दी कवि ने नहीं। इस सत्र का संयोजन विभाग के अध्यापक  डॉ. पल्लव ने किया।
दूसरे दिन सुबह पहले सत्र में वरि‍ष्‍ठ आलोचक गोपाल राय ने ‘शेखर एक जीवनी’ पर अपने सारगर्भित व्याख्यान में कहा कि बालक के विद्रोही बनने की प्रक्रिया में अज्ञेय ने गहरी अंतरदृष्टि और मनोवैज्ञानिकता का परिचय दिया है, वहीं प्रेम के प्रसंग में भी उनका वर्णन और भाषाई कौशल अद्भुत है। उन्होंने विद्रोह, क्रान्ति और आतंक में
भेद बताते हुए कहा की यदि इस उपन्यास का तीसरा भाग आ पता तो शेखर के विद्रोह का सही चित्र देखना संभव होता,  उपलब्ध सामग्री में विद्रोह कर्मशीलता में परिणत नहीं हो पाया है।

कथाकार और जामिया मिलिया के हिंदी आचार्य प्रो. अब्दुल बिस्मिलाह ने अज्ञेय की कहानियों पर अपने व्याख्यान
में श्रोताओं का ध्यान कई नए बिन्दुओं की ओर आकृष्ट किया। उन्होंने आदम-हव्वा की प्राचीन कथा का सन्दर्भ देते हुए कहा कि सांप मनुष्य को विद्रोह के लिए उकसाने वाला जीव है और अज्ञेय की कहानियों में सांप की बार-बार उपस्थिति अकारण नहीं है। उन्‍होंने कहा कि विभाजन और साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में लिखी गई अज्ञेय की कहानियां अब और अधिक महत्वपूर्ण और प्रसंगवान हो गई हैं। उन्होंने कहा कि अज्ञेय के साहित्य में विद्रोह वही नहीं है जो दिखाई दे रहा है अपितु भीतर-भीतर पल रहा विद्रोह कम नहीं है।  

आलोचक और हिन्दू कालेज में सह आचार्य डॉ. रामेश्‍वर राय ने कहा कि अज्ञेय के लिए व्यक्ति मनुष्य की सत्ता उसकी विचार क्षमता पर निर्भर करती है और उनके लिए विचार होने की पहली शर्त अकेले होने का साहस है। उन्‍होंने ईश्‍वर, विवाह और नैतिकता के सम्बन्ध में अज्ञेय के चिंतन पर चर्चा करते हुए कहा कि उनके यहाँ विद्रोह जंगल हो जाने की आकांक्षा है जिसके नियम इतने सर्जनात्मक हैं कि व्यक्ति के विकास में कोई दमन न हो। समापन समारोह में वरिष्ट आलोचक निर्मला जैन ने कहा कि अज्ञेय को कविता में किसी भी वस्तु या विषय के ब्रांडधर्मी उपयोग पर आपत्ति थी और उनके लिए कविता तथा जीवन का यथार्थ एक ही नहीं था। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की अद्वितीयता में अज्ञेय की आस्था अडिग है और वे इतनी दूर तक ही ‘मैं’ को समाज के लिए अर्पित करने को प्रस्तुत हैं कि उनका अस्तित्व बना रहे। उन्‍होंने अज्ञेय की चर्चित कविता ‘नदी के द्वीप’ को उधृत करते हुए कहा कि अज्ञेय अपने चिंतन को कविता के रूप में बयान करते हैं। उन्होंने शताब्दी वर्ष में केवल रचनाकार के गुणगान तक सीमित रह जाने के खतरे से आगाह करते हुए कहा कि क्लिेश में जाने कि बजाय पलट-पलट कर देखना होगा कि दूसरी आवाजें तो नहीं आ रहीं हैं।

कवि-संस्कृतिकर्मी प्रयाग शुक्ल ने कहा कि अज्ञेय सोचते हुए लेखक-कवि हैं जो आधुनिक बोध को लाये। उन्होंने कहा कि हिन्दी को अज्ञेय की जरूरत थी। शुक्ल ने अज्ञेय की कई महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ करते हुए
कहा कि वे भाषा के सावधान प्रयोग के लिए याद किये जायेंगे। उन्होंने अज्ञेय से जुड़े अपने कई संस्मरण भी सुनाये।

वरिष्ट कथाकार राजी सेठ ने कहा कि उनका चिंतन कर्म और काव्य कर्म वस्तुतः अलग नहीं है, लेकिन यहाँ समस्या
होती है कि क्या अज्ञेय की कविता उनके चिंतन की अनुचर है?
आयोजन स्थल पर अज्ञेय साहित्य और अज्ञेय काव्य के पोस्टर की प्रदर्शनी को  भरपूर सराहना मिली। आयोजन में अंग्रेजी समालोचक प्रो. हरीश त्रिवेदी, कवि अजित कुमार, युवा आलोचक वैभव सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रोताओं ने
भाग लिया।

कार्टून पोस्टर प्रदर्शनी ‘खरी-खरी’ ने 25 साल पूरे किए

नई दिल्ली। वर्ष 1985 में 100 रंगीन पोस्टरों के साथ शुरू हुई किशोर श्रीवास्तव की जन चेतना कार्टून पोस्टर प्रदर्शनी ‘खरी-खरी’ ने इस माह 25 वर्ष पूरे करते हुए 26वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है।  झाँसी में रहते हुए पढ़ाई और संगीत के साथ कार्टून बनाने हुए किशोर के कार्टून लोटपोट, सा. हिंदुस्तान,  दै.  सन्मार्ग,  सत्यकथा,  नूतन कहानियां,  पराग,  नवनीत,  दै. जागरण आदि प्रतिष्ठित पत्र/पत्रिकाओं में छपने लगे थे। उन्हीं दिनों दंगों और विभिन्न सामाजिक विसंगतियों ने उन्हें इतना उद्वेलित किया कि उन्होंने ‘खरी-खरी’ नाम से लगभग सौ रंगीन पोस्टर तैयार कर लिए। इनमें साम्प्रदायिक सद्भाव, विभिन्न सामाजिक, साम्प्रदायिक आदि विसंगतियों जैसे दहेज, धूम्रपान, भिक्षावृत्ति व्यवसाय, कन्या भ्रूण हत्या, अपराधियों का हौसला, वृद्धावस्था की त्रासदी, फर्जी वृक्षारोपण, आतंकवाद, गुडागर्दी, रिश्वतखेरी, बाढ़ की समस्या, जल की खोज, क्षेत्रवाद, वेलेंटाइन डे, दलबदल, बेरोज़गारी, धार्मिक उन्माद आदि विषयों पर केंद्रित लगभग सौ कार्टून, छोटी कविताएं और लघु कहानियां शामिल हैं।
इस प्रदर्शनी का पहली बार 1985 में झांसी में प्रदर्शन किया गया। तत्पश्चात इसका प्रदर्शन ललितपुर में बाकायदा टिकट से किया गया और जनता की बेहद मांग पर यह प्रदर्शनी दो दिनों तक चलती रही। किशोर के दिल्ली आने के बाद विगत 25 वर्षों में विभिन्न साहित्यिक/सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा इस प्रदर्शनी के सैकड़ों आयोजन दिल्ली सहित आगरा,  मथुरा,  खुर्जा,  झांसी, ललितपुर, देवबंद, जबलपुर, अंबाला छावनी, गाजियाबाद, शिलांग, बेलगाम व गोवा आदि शहरों में संपन्न हो चुके हैं। कोई भी प्रतिष्ठित संस्था आदि अवकाश के दिनों में इस प्रदर्शनी का अपने यहां निःशुल्क आयोजन करवा सकती है। इस प्रदर्शनी में समय-समय पर बदलाव भी किया जाता रहा है। प्रदर्शनी के पोस्टरों और दर्शकों की प्रतिक्रियाओं को ‘खरी-खरी’ नाम से पुस्तक का रूप भी दिया गया है। किशोर का संपर्क सूत्र – email- kishorsemilen@gmail.com  
प्रस्तुतिः लाल बिहारी लाल

रामकुमार और विश्वनाथन आनंद को लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड

नई दिल्ली : दिल्ली सरकार ने सुप्रसिद्ध चित्रकार रामकुमार और शतरंज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद को लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दोनों को 11-11 लाख रुपये के चेक और प्रशस्तिपत्र प्रदान किया। 23 दिसंबर को दिल्ली सचिवालय में आयोजित समारोह में जाने-माने कलाकारों, विद्वानों व लेखकों ने शिरकत की।
शीला दीक्षित ने कहा कि कलाकार और लेखक किसी भी राष्ट्र की दौलत माने जाते हैं। वे समाज को दिशा, दर्शन और मार्गदर्शन देते हैं। उन्होंने कहा कि रामकुमार और विश्वनाथ आनंद को लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित करके सरकार स्वयं को गौरवांवित महसूस कर रही है।
दिल्ली सरकार की साहित्य कला परिषद ने 2004 में इस पुरस्कार की शुरुआत की थी, जो नृत्य, संगीत, रंगमंच, कला, खेल और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जाता है।

जवाहर गोयल की कुछ कवि‍ताएं

एक जमाने में नौकरी व कला साधना के बीच नौकरी को चुनने वाले जवाहर गोयल पि‍छले चालीस वर्षों से कला का अनवरत अभ्‍यास करते आ रहे हैं। इस दौरान चि‍त्र बनाना, गल्‍प और कवि‍ताएं लि‍खना उनकी फि‍तरत में शामि‍ल रहा। 36 साल सरकारी नौकरी करने के बाद वह सेवानि‍वृत्‍त हो गए हैं। करीब डेढ़ साल से प्‍लाज्‍मा सेल ल्‍यूकीमि‍या से पीडि‍त हैं। दो बार स्‍टेम सेल टांसप्‍लांट हो चुका है। इस इलाज के दौरान मुंबई/कोलकाता में अपना समय बीताते हुए उन्‍होंने ये कवि‍ताएं लि‍खी हैं। वह मानते हैं कि‍ कवि‍ताएं लि‍खकर और चि‍त्र बनाकर अपनी मानसि‍कता को स्‍वस्‍थ रख पाए-

आओ, जल में जल की छाया देखो

आओ, जल में जल की छाया देखो

बि‍न काया यह माया देखो

सुनो ताप के तले सतह को

देखो धरती के खुले वक्ष को

फैले अक्ष का अट्टहास सुनो

नि‍र्जन पेड़ों में चट्टानों को गि‍नो

जल में अपनी छाया नि‍रखो

लहराते पत्‍थर हि‍लती काया को छू लो

सुन्‍न दोपहरी पेड़ों की माया देखो

आओ, जल में जल की छाया देखो।

यह मेरा शरीर है

यह मेरा शरीर है

गेहूं के दाने की तरह

छि‍लका उजला दाना भारी

जल में डूबा करता अंकुरण की तैयारी

अंकुरि‍त हो हरा जवारा हो जाता है

दाना हो या शरीर, खाली हो जाता है

जवारे में रस है, जीवन का संचरण है

शरीर बस नि‍मि‍त्‍त है गेहूं के दाने की तरह

परि‍धि‍यां

शून्‍य:

शून्‍य वि‍स्‍तृत अपरि‍मि‍त।

ध्‍वनि‍:

ध्‍वनि‍ शून्‍य की धरा।

शब्‍द:

शब्‍द शून्‍य की धरा का वि‍स्‍तार।

शब्‍द धरा का अंकुरण।

शब्‍द धरा का वि‍स्‍तारता संसार।

अर्थ:

आनन्‍द की लयकार।

वास्‍तवि‍क संसार।

लय का ताल।

भ्रम:

शब्‍द में अर्थ होता है एकाकार।

जि‍जि‍वि‍षा

एक आग्रह कुछ करते जाने का

कराता जाता है ढेर सारे काम

ये काम तब नि‍यम बनकर बांध लेते

नि‍यमबद्ध हम करते जाते तमाम काम।

एक आग्रह कुछ समझ पाने का

कराता है काम हरदम सोचते रहने का

सोचा हुआ जब समझ में आता है

इस बात का सुख दे जाता है कि‍ वह पूरा हुआ।

इनका न कोई आदि‍ है न अन्‍त

तब भी एक भ्रम बना रहता

इनका स्‍वयं में असल कुछ होने का।

एक चि‍त्र में भूलवश खोजते हैं हम

आकारों के अर्थ, लकीरों के तर्क

उसके आकाश की शुरुआतें

धब्‍बों में घटनाओं की वजहें

और सैरे (लैंड स्‍केप) में ब्‍योरावार जगहें।

क्‍यों नहीं आग्रहवि‍हीन हो पाते हैं

मुक्‍त बहते स्‍याह या आकार वह

जो आकस्‍मि‍क हुआ उतना ही

जि‍तना वह उभरकर हुआ

पूर्ण कोरी कल्‍पना का खरा

जिसका न अर्थ न आदि‍ न अन्‍त।

कुछ खोना भी कुछ पाना है

बीमारी का अतीत हो न हो

आने वाला कल सदा होता है।

बीता समय याद हो न हो

आने वाला समय बरबस

आज पर हावी रहता है।

समय का मौन साहस सा लगता है

जि‍समें मृत्‍यु भी खो जाती है।

पहाड़ों पर लगातार बारि‍श धुंध हो जाती है

कवि‍ता की तरह पास आती है

गोद में सि‍र रख बेटी की तरह सो जाती है।

जब जीत-हार का झूठापन ढह जाता है

कुछ खोना भी कुछ पाना बन जाता है

अनुभव का ताप चके पर सान चढ़ा जाता है।

धूप भरी बारि‍श में भीगते हम

आने वाले दुखों को अनुमान

दु:ख नहीं नि‍राशा देता है।

अक्‍सर वे दु:ख जो आशंकि‍त होते हैं

आते कभी नहीं हैं, पर

उनका बोझा बढ़ता ही जाता है।

पुराने कर्ज की तरह यह

कभी भी चुकता नहीं है।

देर से जब यह समझ में आता है

दु:ख ही देता है देर हो जाने का।

धूप भरी बारि‍श में भीगते हम

तब सि‍र्फ चकि‍त रह जाते हैं।

अस्‍ति‍त्‍व

वि‍चार और वास्‍तवि‍कता के मध्‍य

हमारा शरीर होता है।

भय और साहस के मध्‍य

हमारी समझ होती है।

अनुभूति‍ और अनुभव के मध्‍य

हमारी संवेदना होती है।

संवेदना और सरोकार के मध्‍य

हमारे प्रयास होते हैं।

प्रयास और साकारता के मध्‍य

हमारा नि‍श्‍चय होता है।

अव्‍यक्‍त ओर व्‍यक्‍त के मध्‍य

हमारा नि‍मि‍त्‍त होता है।

होने और न होने के मध्‍य

हमारा शून्‍य होता है।

छायाएं हमें अपनी ओर खींचती हैं

छायाएं हमें अपनी ओर खींचती हैं

तमतमाती धूप की तरह दूर नहीं करतीं

छायाएं बढ़ कर आपस में घुलमि‍ल जाती हैं

संध्‍या में गांवों को, पेड़ों को, पहाड़ को

खींचकर दूर टि‍मटि‍माती लौ तक ले जाती हैं

ध्‍वनि‍यों की तरह स्‍वयं पास आकर छूती हैं

छायाएं सूर्य की तरह अस्‍थि‍यों में जाकर

हमें स्‍नान नहीं करा सकतीं, पर

गोल गुम्‍बद के व्‍योम की तरह

आत्‍मा को इस तरह समो लेती हैं कि‍

वह भी छाया की तरह सब में घुलमि‍ल जाती हैं।

हम जानते नहीं हैं, क्‍योंकि‍ जानना चाहते नहीं हैं

क्‍या तुम सच्‍चे और झूठे देवता में फर्क कर पाते हो ?

क्‍या तुम घृणा के स्रोतों को जान पाते हो ?

क्‍या तुम घृणा को मानवीयता के दायरे में पाते हो ?

जो हम समझ नहीं पाते, उन्‍हें भी जान सकते हैं।

वि‍डंबना है समझ पाना भी एक अर्थ में उसको संगत बनाता है।

घाव को याद रखना भी हमें पीड़ा से बचा सकता है।

पीड़ा से गुजरते, सहने या न सहने की बनि‍स्‍पत

पीड़ा को देख पाना, उससे उबार लेता है।

देख पाना भी क्रमश: साहस बनता जाता है।

घृणा की शर्म में जीते हुए

असकी माया से मोहि‍त हों या अचंभि‍त

भागीदार दोनों हैं।

जो जानते हैं कहते नहीं हैं।

जो अनजान हैं पूछने से कतरा जाते हैं।

पूछ हुए का कोई उत्‍तर नहीं पाते हैं।

आंख-कान-मुंह बंद कर जीना

नहीं जानने के भ्रम का बचाए रखता है

हम उसे झूठ में शामि‍ल नहीं, इस झूठ को भरमाए रखता है

हम जानते नहीं हैं, क्‍योंकि‍ जानना चाहते नहीं हैं।

कुछ कि‍ए बि‍ना

पहाड़ों का नि‍र्भीक मौन

सूर्य की हथेलि‍यों से स्‍नान करता है

उज्‍जवल हरा पेड़ों को संवारता है

वि‍स्‍तीर्ण आयाम गाय की आंखों सा ताकता है

टूटी टांग लि‍ए कौआ फुदककर आगे बढ़ता है

गर्दन मोड़ता है, चोंच खोलता है,

हमें मि‍त्र भाव से देखता है।

कुछ कि‍ए बि‍ना लगातार इतना कुछ होता है

जो नि‍र्भय करता है

मन को भरता है।

भय की पीठ का नाम है साहस

भय की पीठ का नाम है साहस

जो भय को समझने से आप दि‍खता है

भय की तरह सदैव रहता है हमारे साथ।

भय ढोल बजाते आता है

नाचता है गाता है सि‍र पर चढ़ जाता है।

साहस धीरे से चुपचाप आता है।

कुछ भी नहीं कहता है

हमारे पीछे चलता रहता है।

उसकी पदचाप सुनकर ही

हम साथ हैं यह जान पाते हैं।

उसे जानने को न कुछ पूछना होता है

न मुड़कर पीछे देखना होता है

केवल सि‍र उठाकर दूर तक सामने देखते

चलना होता है एक एक कदम

हर बार, हर दम, जब तक न पहुंचे हम।

यह भी जानना अनि‍वार्य होता है

हर एक की तरह हैं हम उनके संग।

समर्थ असमर्थ, अच्‍छे बुरे, समान असमान

साहस सभी में होता है।

जो डरते हैं उनमें भी वह होता है।

बस, उन्‍हें भय की आंखों में देखने में संकोच होता है।

पि‍ता की जि‍म्‍मेदारि‍यां

पि‍ता की अनेक जि‍म्‍मेदारि‍यां में

कुछ आम हैं, कुछ अनि‍वार्य

कुछ को चुनने का है आप पर दारोमदार।

आम है कि‍, उन्‍हें हम सैर पर ले जाएं।

कब क्‍या सपने देखे हमने, उन्‍हें बताएं।

जहां पीछे मुड़कर देखना छोड़ दें वे

वहां तक उनके साथ जाएं।

अनि‍वार्य है, दुनि‍या सबकी है बताएं।

खुदा तर्क से मि‍लता नहीं, जताएं।

चाबि‍यों में तालों का ब्‍योरा छोड़ जाएं।

तब भी कुछ चुनने को छूट जाएगा

जि‍सके लि‍ए थोड़ा वक्‍त बचाएं-

सारी उमर कि‍तना बचपन बजाए रखना है, दि‍खा जाएं।

असल सदा सपनों से छोटा ही रहता है

तब भी इंसान तो सपनों से ही बनता हैं, बता जाएं।

अनगि‍न बूंदों से बनी है आत्‍मा अपनी

हर आत्‍मा में हम भी एक बूंद हैं

इस राग को गूंजते हुए गाएं

गाते-गाते उन्‍हें भी यह जता जाएं।

ठि‍ठके बि‍ना, बस हम जागे हुए रहते हैं

हम स्‍पर्श करते हैं और छुअन नहीं पाते हैं।

चबाते जाते हैं और स्‍वाद को नहीं जानते हैं।

श्‍वास को भीतर तक खींचकर छोड़ देते हैं अनजाने।

देखते हैं साफ-साफ बि‍ना कुछ पहचाने।

ढंकी बर्फ के नीचे जमीन खुरदुरी है, मालूम है।

कहीं भी कुछ छूटा हुआ नहीं है, पर वह अपना नहीं है।

सबके लि‍ए बने रहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते।

समय को छाया में धूप सा सरकते देखते हैं।

अंधेरे को भी दि‍न सा समीप पाते हैं।

कुछ भी चौंकाता क्‍यों नहीं है, जान नहीं पाते।

बैठे रह गए, उठकर न चलने का अफसोस करते हैं।

ठि‍ठके बि‍ना, बस हम जागे हुए रहते हैं।

कथाकार उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार

नई दिल्ली : हिन्दी के प्रसिद्ध कथाकार कवि एवं पत्रकार उदय प्रकाश, उर्दू के जाने-माने शायर शीन काफ निजाम, राजनीतिज्ञ तथा लेखक वीरेंद्र कुमार समेत 22 लेखकों को वर्ष 2010 के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया है। इस वर्ष आठ कविता संग्रहों, चार उपन्यास, तीन कहानी संग्रह, चार आलोचना, एक यात्रा संस्मरण, एक आत्मकथा तथा एक नाटक को यह पुरस्कार दिया गया है। मैथिली तथा तेलुगू के पुरस्कार अभी घोषित नहीं किए जा सके हैं। इनकी घोषणा बाद में की जाएगी। पुरस्कार में एक लाख रुपये, तामपत्र, प्रशस्तिपत्र तथा शॉल आदि दि‍या जाता है। ये पुरस्कार अगले वर्ष 15 फरवरी को साहित्योत्सव समारोह में दिए जाएंगे। इस बार साहित्योत्सव का विषय रवीन्द्र नाथ टैगोर के साहित्य पर है। इस वर्ष टैगोर की 150वीं जयंती मनायी जा रही है।
1 जनवरी, 1952 को मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के सीतापुर गांव में जन्मे उदयप्रकाश को उनके कहानी संग्रह ‘मोहनदास’ के लिए यह पुरस्कार दिया गया है । उनकी कई कहानियों पर नाटक तथा फिल्में भी बन चुकी हैं। तिरिछ, छप्पन तोले का करधन और अंत में प्रार्थना, पीली छतरीवाली लडकी, हीरालाल का भूत, पाल गोमरा का स्कूटर आदि‍ उनकी चर्चित कहानि‍यां हैं।