Archive for: October 2010

भाषाओं का परिवर्तन : बालकृष्‍ण भट्ट

भारतेंदु युग के प्रमुख निबंधकार, नाटककार और पत्रकार बालकृष्‍ण भट्ट ने हिंदी में हो रहे बदलाव को लेकर यह लेख 125 साल पहले लिखा था-

यह एक सामान्य सिद्धांत है कि किसी भाषा पर प्रभुत्व होना या उससे अच्छी तरह परिचित हो जाना तभी लोग मानते हैं जब सीखने वाला उसी भाषा में सीख सके अर्थात चित्तवृत्ति उसके मनन करने के विषयों को उसी भाषा के ढंग से ग्रहण करे। इसके मानने में किसको इनकार होगा कि हर एक भाषा के ढंग निराले ही हैं। दो भाषा व्याकरण की रीति पर कुछ मिलती भी हों, परन्तु वे चीजें जिनको महाविरे कहते हैं कभी नहीं मिल सकते और यही महाविरे ही हर भाषा की जान हैं। हिन्दी और अंगरेजी ही को लीजिए इन दो भाषाओं में थोड़ा थोड़ा कहीं कहीं व्याकरण के नियमों का तो भेद हई है। किन्तु बड़ा भारी अन्तर महाविरों की निराली चाल का है। जहाँ कहीं इन महाविरों की कोई गलती सुनने में आती है तो वह कान से चट खटकजाती है। यह लोग कदापि न समझे कि मुहाविरे अंगरेजी ही में हैं और जब उन पर आक्षेप होता है तो ‘राधा बाजार अंगरेजी’ या ‘बाबुओं की अंगरेजी’ इत्यादि शब्द तज़या निन्दा की राह से कहे जाते हैं। जब तक किसी भाषा में जान है अर्थात रोजमर्रे के काम में उसे लोग वर्तते हैं और पुष्टरीति पर उसके स्थिति बनी रहती है तब तक नये नये मुहाविरे नित्य उसमें बनते ही जायेंगे।

सृष्टि के चेतन पदार्थों का जो नियम है कि वे कभी एक सा नहीं रहते वरन दिन प्रतिदिन परिवर्तन की सान पर चढ़ते ही जाते हैं। यह नियम भाषा के सम्बन्ध में पूरी रीति पर लगता है। क्योंकि कुछ ऐसा मालूम होता कि रुधिर और अस्थि मनुष्य के शरीर से उतना निकट सम्बन्ध नहीं रखते जितना उनकी भाषा रखती है। और इसी कारण बड़े से बड़े पण्डित के आगे कोई अशुद्ध संस्कृत शब्द बोलिए तो वह इतना न खटकेगा जितना एक सामान्य से सामान्य बे मुहाविरे हिन्दी शब्द कान को चोट पहुँचावेगा। क्योंकि संस्कृत अब बोल चाल की भाषा न रह गई। विचार कर देखिये तो जो हिन्दी हम आज कल बोलते हैं वह पहले क्या थी और अब क्या है। अब फारसी उर्दू शब्द उसमें मिलते जाते हैं। क्योंकि जब आपके बड़े बड़े प्रामाणिक हिन्दी कवियों ने फारसी अरबी के शब्द ग्रहण किये तो हमारे और आपके निकाले वे सब जो हमारी भाषा के नस नस में अन्तः प्रविष्ट में हो रहे हैं क्यों कर निकाल सकते हैं। बल्कि बिरुद्धता दिखलाना वैसा ही है जैसा किसी वेगगामिनी नदी के प्रवाह को अकेले एक हाथ से रोककर उलट देने का प्रयत्न करना है। जिस तरह ये शब्द सर्वसाधारण अपनी भाषा में प्रचलित कर लेते हैं या जिस तरह के शब्द अपने नित्य के बोलचाल से लोग निकाल कर फेंक देते हैं उस पर आपको कुछ भी अधिकार नहीं है। आप मनुष्यों की भाषा तभी बदल सकते हैं जब जुलू या हबशी की रपूत का कई आदमी इन देशों में पैदा कर सकें या उससे भी बढ़कर कोई दूसरा प्राकृतिक अनर्थ जो सर्वथा प्रकृति विरुद्ध है कर सकें। क्योंकि यह कैसे संभव है कि प्रबल कालचक्र अपनी निशानी सब चीजों पर न छोड़ जाय। मुसलमानों के अत्याचार का फल जैसा हम अपनी रीति रसम सामाजिक व्यवहार अपनी और अपने यहाँ की स्त्रियों की दशा सबमें पाते हैं तब यह क्यों कर हो सकता है कि मुगलों की भाषा का असर हमारी भाषा में न हो।

सोचिये कि जिस हिन्दी को हम बोलते हैं वह कितने हजार वर्ष से घिसते-घिसते करोड़ै टक्करें खाकर और न जानिये कौन-कौन सी मुसीबतैं झेलकर न मालूम किसका किसका जमाना देखभाल आज हमारे बोलचाल के काम में आ रही है। यदि प्रकृति को भी हिन्दी ही मान लीजिये तो देखिये कि आजकल की हिन्दी से और चांद और पृथ्वीराज के समय की हिन्दी से और चांद के समय की हिन्दी से और कालिदास के समय की हिन्दी से काल का कितना अन्तर है। क्योंकि कालिदास भवभूत प्रभृति कवियों के समय में भी संस्कृत जैसी उनके नाटकों में पाई जाती है केवल विद्वानों ही की मण्डली में बोली जाती थी और वे लोग भी कवित्व शक्ति के प्रकाशक गझिन शास्त्रार्थ के बाद घर जाते रहे होंगे तो नौकरों या लड़के वालों या स्त्रियों से (या सृष्टि सृष्टुराध्या) के जाड़े की बड़े धूम धाम की संस्कृत न बोलते रहे होंगे। जैसा वेद की संस्कृत का व्याकरण व्यास वाल्मीकि तथा कालिदास आदि कवियों की संस्कृत के व्याकरण से कुछ पृथक है वैसा ही नाटक की प्राकृतों का व्याकरण चन्द आदि की प्राकृतों से बिभिन्न है अर्थात जो एक समय के विद्वानों की साधु भाषा थी वही किसी पूर्व समय के बेपढ़े लिखे लोगों की भाषा रही और इस अदल बदल में एक बात सदा ध्यान देने लायक है कि भाषा का परिवर्तन शब्दों पर इतना निर्भर नहीं जितना उसके व्याकरण सम्बन्धी विषयों पर या मुहाविरों के अदल बदल होने पर अर्थात नये शब्दों की भरती होने से कुछ डर की बात नहीं है बल्कि पढ़े लिखे लोग या सर्व साधारण उन शब्दों को अपना कर मान ले तो भाषा और भी पुष्ट हो जाएगी।

फारसी में देखिये तो यही हाल है अंगरेजी में देखिये तो यही हाल है पृथ्वी की और और भाषाओं में यही नियम पाया जाता है कि दूसरी भाषा के शब्द को बेधड़क अपना कर लेते हैं जैसा कोई किसी लड़के को गोद ले वैसा ही वह शब्द उसी भाषा का होकर रह जाता है। एक दूसरी विचित्र बात यह भी है एक भाषा का शब्द जब दूसरी भाषा में जाता है तो बहुधा अपने शुद्ध रूप में कभी नहीं रहता और जब ऐसा अशुद्ध शब्द भी दूसरी किसी भाषा में अच्छी तरह मिल जाता है तो फिर उसके शुद्ध करने का प्रयत्न भी व्यर्थ ही है क्योंकि बोलने वालों के मन या जबान पर जो एक बार चढ़ गया वह कभी नहीं निकल सकता।

भाषाओं के इतिहास में आप हिन्दी की दशा देख यह मत समझ लीजिये कि भाषा की सूरत बदलने के लिये विदेशी भाषा के साथ टक्कर खाना जरूरी बात है। ऐसा ख्याल करना भूल है कि अगर विदेशियों की भाषा के साथ यह भाषा टक्कर न खाये होती तो शुद्ध रीति पर बनी रहती। क्योंकि वेद की संस्कृति को नाटक और काव्यों की संस्कृत में किसने उतार दिया। या संस्कृत को प्राकृतों के रूप में किसी विदेशी भाषा के साथ टक्कर खाने ने बदल दिया। और फिर भाषा की बाहरी आकृति पर विदेशियों का कुछ असर पहुँच सकता है पर उसके भीतरी नियमों को तिल भर भी खसकाना किसी के सामर्थ्य में नहीं है। हमने ऊपर कहा कि भाषा भी संसार को इतर चैतन्य सृष्टि का नियम मानती है। इस तरह जैसा पीटने से गदहा घोड़ा नहीं हो सकता उसी तरह बाहर वालों का सम्पर्क भी कुछ बहुत हानिकारक नहीं हो सकता और फिर भाषा के सम्बन्ध में (हानि) शब्द का पूरा पूरा तात्पर्य तय करना बड़ा कठिन है। क्योंकि परिवर्तन के बीज तो भाषा में आप ही आप भरे हैं क्यों संस्कृत से प्राकृत हुई और प्राकृतों से वर्तमान हिन्दी। हम लोगों का केवल इतना ही कर्त्तव्य है कि देखते जायं कि क्या क्या अदल बदल हुए हैं अभेद्य दुर्ग सदृश पाणिनि के व्याकरण के आगे हिन्दी का व्‍याकरण छोटी सी फूस की झोपड़ी है। ये तो प्रगट है कि अब हमें उतने बड़े व्याकरण की आवश्यकता न रह गई एक वह समय था कि अनेक जंजालों से भरे हुए पाणिनि कात्यायन पंतजलि के सूत्र वार्तिक भाष्य में एक मात्रा का भी हेर फेर हो जाने पर एक बड़ी भारी इमारत को ढहाकर फिर से खड़ी करना था। और इसी का परिणाम यह हुआ कि हमारे यहाँ का व्याकरण ऐसा झंझट से भरा हुआ शास्त्र हो गया जैसा पृथ्वी के किसी कोने में न हुआ होगा। सच पूछिये तो दो गाड़ी के बोझ की पुस्तकें शेखर मंजूषा कैदर बड़े बड़े जगड़ जाल जो रच गये उनमें और है क्या। सिवा इसके कि कीचड़ में पाँव फिर धोओ एक बड़े यत्न और प्रयास से। एक बने बनाये सुन्दर और मनोहर महल को तोड़ फोड़ छिन्नभिन्न कर पीछे पछताय फिर उसी को बनाया है। इन्हीं विफल चेष्टाओं में व्याकरण इतना बड़ा शास्त्र हो गया जिसमें नवीन और प्राचीनों का झगड़ा पढ़ते पढ़ते उमर की उमर बीत जाती है कोरे के कोरे मूर्ख रह जाते हैं। ऐसी सरल भाषा हिन्दी में इस सब खट पट का अब कुछ काम ही न रह गया पर क्यों ऐसा हुआ यह तो आदमी तभी तै कर सकेगा जब और भी सैकड़ों हजारों (क्यों) का उत्तर दे सकेगा। जैसा क्यों मनुष्य संसार में पैदा होता है? क्यों फिर यहाँ से चला जाता है? इत्यादि इत्यादि। अब एक प्रश्‍न उसके सम्बन्ध में और उठता है कि यदि भाषा की धारा ऐसे अपरिवर्तनीय इतने जोर शोर के साथ बह रही कि उसमें चूं भी नहीं कर सकते तो किसी समय के अच्छे अच्छे लेखकों का क्या दबाव या असर उस पर होता है इस प्रश्‍न का उत्तर सहज में मिल सकता है। पुरानी हिन्दी को ही लीजिये पुराने ठेठ हिन्दी शब्दों को कोई अच्छी तरह सोच विचार कर लिखने वाला फिर से जिला कर समाज में प्रचलित कर सकता है। अपनी निज की भाषा के कामकाजी शब्दों की मर जाने या मृतक प्राय हो जाने से बचाना अच्छे लेखकों का काम है। बाहरी भाषाओं के शब्दों को अपना सा कर डालना जिससे भाषा दिन प्रतिदिन अमीर होती जाय यह भी एक बड़ा काम है। और सबसे बड़ा काम है अपने भाषा के विषयों को दूना चौगुना करते जाना अर्थात जो जो विषय भाषा में पहले कम थे उनको देना और जो विषय कभी थे ही नहीं उनको बाहर से लाय भरती करना। इस सबका असर यह होगा कि भाषा की नमन शक्ति बहुत बढ़ जायेगी अर्थात जिस तरह के विषय पहले उससे बाहर समझे जाते थे वे जल्द उसकी पहुँच के भीतर आ जायंगे। हमारे देखते ही देखते अंगरेजी मेमों ने हिन्दुस्तानी गहनों का पहनना आरंभ कर दिया जैसा सोने की चूड़ियाँ जड़ाऊ कंठे आदि। इसी तरह यदि हम अपनी मातृभाषा को अंगरे

प्रेम जनमेजय को आचार्य निरंजननाथ सम्‍मान

नई दिल्‍ली : चर्चित व्‍यंग्‍यकार और व्‍यंग्‍य यात्रा के संपादक प्रेम जनमेजय को 12वां आचार्य निरंजननाथ सम्‍मान 5 दिसंबर को राजसमंद (राजस्‍थान) में आयोजित समारोह में प्रदान किया जाएगा।

सम्‍मान समिति के संयोजक कमर मेवाडी के अनुसार कर्नल देशबंधु आचार्य की अध्‍यक्षता में संपन्‍न बैठक में यह निर्णय लिया गया।

यह सम्‍मान राजसमंद के साहित्‍यकार, राजनेता और राजस्‍थान साहित्‍य अकादमी के पूर्व अध्‍यक्ष निरंजननाथ की स्‍मृति में आचार्य निरंजननाथ स्‍मृति सेवा संस्‍थान द्वारा साहित्यिक पत्रिका संबोधन के माध्‍यम से दिया जाता है।

यह सम्‍मान हिंदी के किसी एक रचनाकार को अलग-अलग विधाओं पर प्रतिवर्ष प्रदान किया जाता है। इसके अंतर्गत प्रशस्ति पत्र के अतिरिक्‍त 25000 रुपये, शाल, श्रीफल और स्‍मृति चिह्न भेंट किया जाता है। इस बार निर्णायक मंडल के सदस्‍य विष्‍णु नागर, फारूक आफरीदी और भगवतीलाल व्‍यास थे।

चुन्नू की फौज : उमेश कुमार

तमालपुर गांव बहुत सुंदर था। गांव के चारों तरफ खूब हरियाली थी। यहां सब लोग मिल-जुलकर रहते थे। तुषार के पिता रामप्रसाद खेती करते थे। वह सीधे-साधे इनसान थे। जो कुछ खेती से बचता, उसी से गुजारा कर लेते थे। तुषार पढऩे में होशियार था। पढ़ाई के साथ-साथ वह पिता के काम में जब-तब मदद करता रहता।

तुषार के घर में चूहे बहुत हो गए थे। चूहे थे भी बहुत शरारती। दिनभर इधर-उधर उछल-कूद करते रहते। जो भी सामान मिलता कुतर देते। कोई जा रहा हो तो उसके ऊपर कूद जाते। वह डर के मारे चिल्‍लाता तो सारे के सारे छिप जाते। घर के सभी लोग चूहों से परेशान थे। उन्‍होंने तुषार की नई किताब ही काट डाली। इससे तुषार को बहुत गुस्‍सा आया।

‘चूहों का कुछ न कुछ तो करना होगा।‘ तुषार ने सोचा। अगले दिन से वह चूहों के लिए रोटी के छोटे-छोटे टुकडे़ करके रखने लगा।

आश्‍चर्य ! अब चूहों ने तुषार के घर में नुकसान करना बंद कर दिया। वह दिनभर भाग-दौड़ करते रहते, लेकिन कोई सामान कुतरते नहीं।

तुषार रोज स्कूल जाने से पहले चूहों के लिए रोटी रख्‍ देता। स्कूल से आकर जब वह देखता तो चूहे रोटी खा चुके होते थे। उसे यह सोचकर खुशी होती कि चूहे उसके मन की बात समझ गए हैं।

एक दिन तुषार आंगन में बैठा होमवर्क कर रहा था। उसे अचानक कुट-कुट की आवाज सुनाई दी। उसने देखा कि  एक गोलमटोल चूहा रोटी का टुकड़ा कुतर-कुतर कर खा रहा है। बीच-बीच में वह तुषार की तरफ आंखें मटका कर देखता। थोड़े ही दिन में उस चूहे की तुषार से दोस्ती हो गई।

शुरू-शुरू में तो वह तुषार से थोड़ा डरता भी था। धीरे-धीरे वह उससे अच्छी तरह घुल-मिल गया। चूहा तुषार के साथ खूब खेलता। तुषार पढ़ाई करता तो वह आकर उसकी मेज पर बैठ जाता।

तुषार ने सोचा कि हर किसी का नाम होता है। क्यों ने चूहे का भी एक अच्छा सा नाम रखा जाए। बहुत सोचने के बाद तुषार ने चूहे का नाम रखा- चुन्नू।

शाम को चूहा उसके पास आया। तुषार ने उससे कहा, ”मैंने तुम्हारा नाम रखा है चुन्नू। क्या तुमको पसंद है?’’

चूहे ने अपनी आंखें टिमटिमाईं और नाचने लगा। तुषार समझ गया कि उसे यह नाम पसंद है।

उसने चुन्नू से कहा, ”अब मैं तुम्हें इसी नाम से पुकारा करूँगा।’’

चुन्नू ने मुंह मटकाया और भाग गया। तुषार भी अपना होमवर्क पूरा करने में जुट गया।

अब तो तुषार और चुन्नू की दोस्ती खासी पक्की हो गई थी। तुषार चुन्नू कहकर पुकारता तो वह आकर नाचने लगता। स्कूल से आकर तुषार काफी देर तक चुन्नू के साथ खेलता।

इस बार बरसात न होने के कारण गांव में भयंकर सूखा पड़ा। फसल बरबाद हो गई। लोगों के सामने भूखे मरने की नौबत आ गई। किसानों के पास जो अनाज था, वह थोड़े ही दिन में खत्म हो गया।

ऐसे में धनीराम की मौज आ गई। धनीराम जमींदार था। उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। गांव के लोग मुसीबत में उसी से कर्जा लिया करते थे। कर्जा देते समय धनीराम किसान से जमीन गिरवी रखवा लिया करता था। वह शर्त रखता कि अगर एक वर्ष में पैसे वापस नहीं दिए तो जमीन उसकी हो जाएगी। वह एक वर्ष में ही मूल से ज्यादा ब्याज कर देता। इस कारण अधिकतर किसान कर्जा नहीं चुका पाते थे। कर्जा न चुकाने पर वह लोगों की जमीन हड़प लेता। उसने इसी तरह से गांव के कई लोगों की जमीन हड़प ली थी। इस बार रामप्रसाद को भी मजबूरी में उससे कर्जा लेना पड़ा गया। हालात कुछ ऐसे बने कि एक साल बीत जाने पर रामप्रसाद कर्जा नहीं चुका पाए।

धनीराम ने शर्त के मुताबिक उनसे जमीन देने का कहा। रामप्रसाद ने कुछ समय की मोहलत मांगी, लेकिन धनीराम नहीं माना। उसने रामप्रसाद की जमीन पर कब्जा कर लिया। रामप्रसाद बहुत उदास थे। रोहित ने उनसे दुखी होने का कारण पूछा। रामप्रसाद बताना नहीं चाहते थे, लेकिन तुषार के जिद करने पर उसे बता दिया।

तुषार किताब लेकर बैठा तो था, लेकिन पढ़ाई में उसका मन नहीं लग रहा था। चुन्नू थोड़ी देर में उसके पास आ गया। वह तुषार की मेज के चारों तरफ चक्कर लगाने लगा। तुषार कुछ नहीं बोला। वैसे ही उदास बैठा रहा। चुन्‍नू उसके कंधे पर चढ़ गया और पंजे मारने लगा। तुषार ने उसे प्‍यार से सहलाया और कहा, ‘‘दोस्‍त, बड़ी मुश्किल हो गई है। धनीराम ने जमीन के कागज लेकर कब्‍जा कर लिया है। समझ में नहीं आ रहा कि क्‍या किया जाए।’’

यह सुनकर चुन्‍नू भी उदास हो गया। वह थोड़ी देर मुंह लटकाए बैठा रहा। अचानक उसने मेज पर छलांग लगाई और एक कागज को पंजों से उठा लिया। वह उसे लेकर इधर-उधर दौड़ने लगा। तुषार समझ गया कि चुन्नू क्या पूछ रहा है। तुषार ने चुन्नू को कंधे पर बैठाया और धनीराम का घर दिखा दिया।

और तब तमालपुर में वह दृश्य दिखाई दिया, जिसे पहले किसी ने न देखा और न सुना था। इसकी किसी ने कल्‍पना भी नहीं की थी। अंधेरा होते ही चुन्नू अपनी फौज के साथ धनीराम के घर जा पहुंचा। धनीराम सो चुका था। चुन्‍नू उसके मुंह के पास गया और अपनी पूंछ उसकी नाक में डाल दी। धनीराम को जोरदार छींक आई। वह करवट बदलकर सो गया। चुन्‍नू ने अपनी फौज को इशारा कर दिया। कुछ सिपाही उसके साथ पलंग पर चढ़ गए और बाकी काम पर लग गए। कोई उसकी पेंट में घूस गया तो कोई कमीज के नीचे। धनीराम की नींद खुल गई। उसने देखा कि पलंग पर बहुत सारे चूहे हैं। वह डर के मारे चीख उठा। वह एक चूहे को कमीज से निकालता तो दूसरा पेंट में घूस जाता। वह चूहों से बचने के लिए कुर्सी पर चढ़ तो चुन्‍नू की फौज वहां भी पहुंच जाती। धनीराम कमरे के इस कोने से उस कोने तक भाग-भाग कर परेशान हो गया। चुन्‍नू की फौज के बाकी सिपाहियों ने धनीराम के घर में रखे सारे कागजात कुतर दिए। इनमें किसानों की जमीन के कागजात भी थे।

सुबह हो गई थी। धनीराम ने रो-पीटकर गांव वालों की इसकी सूचना दी। सभी यह सुनकर हैरान थे। तुषार भी वहां खड़ा था और धनीराम की हालत देख, मन ही मन मुसकरा रहा था।

चुन्नू को अभी चैन कहा हुआ। वह अपनी फौज के साथ दूसरी रात भी धनीराम के घर पर जा पहुंचा। धनीराम तोंद फुलाकर तेज-तेज खर्राटे ले रहा था। चुन्नू उसकी छाती पर बैठ गया, उसने अपनी पूंछ धनीराम की नाक में फि‍र घुसा दी। मानो भूचाल आ गया हो। धनीराम को इतनी तेज छींक आई कि चुन्नू जमीन पर जाकर पड़ा। वह जैसे-तैसे संभल पाया। चुन्नू के सिपाही धनीराम की पेंट में घुस गए। धनीराम इधर से उधर उछलता-कूदता फिरता रहा। बहुत देर तक धनीराम को तंग करने के बाद चुन्नू फौज के साथ वापस घर चला गया।

चुन्नू की फौज ने लगातार एक सप्ताह तक धनीराम के घर जाकर धमाल मचाया। धनीराम इतना परेशान हो गया कि उसने गांव छोडऩे का निर्णय कर लिया। एक दिन गांव वाले सुबह सोकर उठे तो देखा धनीराम अपने परिवार के साथ गांव छोड़कर जा चुका था।

तुषार चुन्नू की तरफ देखकर मुसकराया। चुन्नू ने नाच-नाचकर तुषार को खूब हंसाया।

लेखक का नहीं, संघर्षों का सम्‍मान : अमरकांत

इलाहाबाद : केके बिरला फाउंडेशन की तरफ से मिलने वाला वर्ष 2009 का व्यास सम्‍मान  कथाकार अमरकांत को इलाहाबाद संग्रहालय में शनिवार को उपन्‍यास ‘इन्हीं हथियारों से’ के लिए दिया गया। अमरकांत ने कहा कि यह लेखक का सम्‍मान नहीं है। यह संघर्षों का सम्‍मान है। उन्होंने अपने स्कूल के दिनों और आजादी की लड़ाई के भी संस्मरण सुनाये। पुरस्कार के रूप में अमरकांत को ढाई लाख रुपये नकद, स्मृति चिह्न, प्रशस्ति पत्र दिया गया और शाल ओढ़ाया गया। तमिलनाडु के हिन्दी प्रेमियों की ओर से अमरकांत को अंगवस्त्रम भी भेंट किया गया।

विशेष वक्ता के रूप में मौजूद प्रो. राजेन्द्र कुमार ने अमरकांत के लेखन और व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उपन्यास ‘इन्हीं हथियारों से’ एक साहित्यिक कृति होते हुए भी तमाम ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रखती है। इसमें छोटे से जनपद बलिया में हुई आजादी की लड़ाई का प्रभावशाली वर्णन मिलता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता व्यास सम्‍मान समिति के अध्यक्ष प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने की।

कार्यक्रम की शुरुआत केके बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक निर्मलकांत भट्टाचार्य ने अतिथियों के स्वागत से की। कार्यक्रम में कथाकार शेखर जोशी, संग्रहालय के निदेशक एसपी शर्मा,  प्रो. ओपी मालवीय, प्रो. अली अहमद फातमी,  जियाउल हक, प्रो. हरिदत्त शर्मा,  श्रीप्रकाश मिश्र, डा. राजेश मिश्र,  प्रो. एसके के शर्मा, सूर्यनारायण, प्रणय कृष्ण, अनीता गोपेश, मुश्ताक अली आदि रहे।

खबरों के आगे खिंचता नेपथ्य : प्रभु जोशी

पिछले दिनों इन्‍दौर में हिन्दी के हिंग्लिशीकरण के विरोध में प्रतीकात्‍मक ढंग से प्रमुख समाचार पत्रों की होली जलायी गई। इस पर समाचार पत्रों के रुख और हिंग्लिशीकरण के प्रति सचेत करता वरिष्‍ठ लेखक और पत्रकार प्रभु जोशी का आलेख-

दुनिया भर में, ‘विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र‘ की तरह ख्यात भारत ने, जब एक ‘नव-स्वतंत्र राष्ट्र‘ की तरह, विश्व-‘राजनीति में जन्म लिया, तब निश्चय ही न केवल ‘पराजित‘ बल्कि, लगभग हकाल कर बाहर कर दी गयी ‘औपनिवेशिक-सत्ता‘ के कर्णधारों की आँखें, इसकी ‘असफलता‘ को देखने के लिए बहुत आतुर थीं। चर्चिल की बौखलाहटों को व्यक्त करती हुई, तब की कई उक्तियाँ इतिहास के सफों पर आज भी दर्ज हैं। अलबत्ता, उनकी ‘अपशगुनी उम्मीदों‘ के बार-खिलाफ, जब-जब इस ‘महादेश‘ में संसदीय चुनाव हुए, तब-तब इस बात की पुष्टि काफी दृढ़ता के साथ हुई कि बावजूद ‘सदियों की पराधीनता‘ के, भारतीय-जनमानस में एक अदम्य ‘लोकतांत्रिक-आस्था‘ है, जो केवल उसके सोच भर में स्पंदित नहीं है, बल्कि, उसकी तमाम संस्थाओं में, वह लगभग ‘दहाड़ती‘ हुई उपस्थित है। कहने की जरूरत नहीं कि उसके ‘चौथे खंभे‘ में तो ‘नृसिंह‘ की-सी शक्ति है, जो सत्ता के पेट को चीर सकती है। आपातकाल में तो उसने यह पूरी शिद्दत से प्रमाणित कर दिया था कि न केवल ‘लिख कर‘ बल्कि इसके विपरीत ‘न लिखकर‘ भी वह अपनी आवाज को इस तरह बुलन्द कर सकती है, जो हजारों-हजार लिखे गए लफ्जों से कहीं ज्यादा प्रखर प्रतिरोध का रूप रख सकती है। सम्पादकीय की जगह खाली छोड़ने से ‘मौन की तीखी अनुगूँज‘ राष्ट्रव्यापी बन गयी थी।

बहरहाल, इन्दौर नगर में पिछले दिनों ‘गाँधी-प्रतिमा स्थल‘ पर कतिपय बुद्धिजीवियों ने देश भर के कोई बीस-बाइस हिन्दी समाचार पत्रों की एक-एक प्रति जुटाकर, तमाम अखबारों के द्वारा ‘अकारण‘ ही तेजी से किये जा रहे हिन्दी के हिंग्लिशीकरण बनाम ‘क्रिओलीकरण’ के जरिए, जिस ‘बखड़ैली भाषा‘ को जन्म देने में लगे है, उसके प्रति हिन्दी भाषाभाषी पाठकों की पीड़ा और प्रतिकार को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए, उनकी होली जलायी। निश्चय ही प्रतिकार की इस ‘प्रतीकात्मकता‘ से जो लोग असहमत थे, वे इसमें शामिल नहीं हुए। उनके पास अपने तर्क और अपनी स्पष्ट मान्यताएँ थीं, जबकि अखबारों की ‘होली‘ जलाने वालों के पास अपनी सिद्धान्तिकी थी। दोनों के पक्ष-विपक्ष में एक गंभीर विमर्श भी बन सकता था।

बहरहाल, घटना छोटी-सी और निर्विघ्न सी थी, लेकिन भारतीय पत्रकारिता के विगत तिरेसठ साल के इतिहास में पहली बार घट रही थी। लेकिन देश के किसी भी हिन्दी अखबार ने ( हालांकि, जनसत्ता ने खबर तो नहीं, लेकिन, राजकिशोर के लेख में इस खबर को यथावत और विस्तार से दिया है।) यह खबर प्रकाशित नहीं की। इण्टरनेट के ब्लागों और ‘फेस बुक‘ पर अवश्य इस पर बहस के लिए अवकाश (स्पेस) निकला, लेकिन, आरंभ में उसका रूप जिस तरह की गंभीरता लिए हुए शुरू हुआ था, दूसरे दिन वह ‘भर्त्सना‘ और ‘भड़ास‘ की शक्ल अख्तियार कर चुका था। उसमें मनोरंजन और मसखरी भी शामिल हो चुकी थी। अतः पूरी बात विचार के दायरे से ही लगभग बाहर हो गयी। यहाँ यह बात गौर करने लायक है कि कदाचित् सम्पूर्ण हिन्दी समाचार-पत्रों ने, इस कार्यवाही को अपनी सत्ता के प्रति एक ‘बदअखलाक चुनौती‘ की तरह लिया है। हो सकता है समाचार-पत्र, चूंकि वे समय और समाज में विचार के लिए वाजिब जगह बनाने की जिम्मेदारी अपने ही हिस्से में समझते हैं, अतः वे इस कार्यवाही के खिलाफ निस्संदेह ठोस बौद्धिक-असहमति रखते हैं। लेकिन प्रश्न उठता है कि जो समाचार पत्र, वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन, ’समय और समाज’ की खाल खींच कर उसमें नैतिकता का नमक डालने पर तत्पर रहता है, क्या वह तिरेसठ वर्ष के अपने जीवनकाल में मात्र एक दिन किसी एक शहर में अपने पाठक की असहमति और उसका प्रतीकात्मक प्रदर्शन तक बरदाश्त नहीं कर सकता? जबकि, वह इस महाकाय जनतंत्र की रक्षा का एक सर्वाधिक शक्तिशाली कवच है? क्या समूचा समाचार-जगत ’विचार’ के स्तर पर, व्यक्ति की सी स्वभावगत ’एकरूपता’ रखता है ? जबकि, वह व्यक्ति नहीं संस्था है। मुझे यहाँ याद आता है कि नेहरू के विषय में कहा जाता रहा है कि उनका अहम् काफी अदम्य था और वे अमूमन अपनी असहमति की अवमानना पर तिक्त हो जाते थे। एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है। ’टाइम्स ऑफ इण्डिया’ के तब के ख्यात सम्पादक मुलगांवकर प्रधानमंत्री आवास पर स्वल्पाहार हेतु आमंत्रित थे और जिस सुबह वे आमंत्रित थे, ठीक उसी दिन उन्होंने नेहरू तथा ’नेहरू-सरकार’ के विरूद्ध अपने अखबार में बहुत तीखी सम्पादकीय टिप्पणी छाप दी। लगभग आठ बजे प्रधानमंत्री-आवास से दूरभाष पर सूचना दी गयी कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से पूर्व में स्वल्पाहार के समय प्रधानमंत्री के साथ निर्धारित भेंट निरस्त की जा रही है। यह सूचना पाते ही श्री मुलगांवकर ने नेहरू को फोन किया कि ठीक है कि आज का सम्पादकीय आपके तथा आपकी सरकार के खिलाफ है, लेकिन इसका हमारे नाश्ते से क्या लेना-देना है ?

बहरहाल, नेहरू ऐसे थे कि सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर रहते हुए भी ठिठक कर बुद्धिजीवियों द्वारा की गई अपनी आलोचना सुन सकते थे। कदाचित् उनके इसी जनतांत्रिक धैर्य को ध्यान में रखकर दुनिया भर की प्रेस उन्हें ’डेमोक्रेटिक प्रॉफेट’ के विशेषण से सम्बोधित भी करती थी।

बहरहाल, इन्दौर नगर में भारतीय समाचार पत्रों को उनकी भाषागत नीति को केन्द्र में रखकर उसके प्रतिरोध में होली जलाने वाली कार्यवाही को लेकर इतना आहत और क्रोधित नहीं होना चाहिए कि उनके द्वारा अकारण किये जा रहे क्रिओलीकरण के खिलाफ शुद्ध गाँधीवादी प्रतिकार की खबर को वे अपने पृष्ठों पर तिल भर भी जगह न दें। यह काम निश्चय ही सम्पादक का नहीं हो सकता। तो क्या हमारे समाचार-पत्रों में एक किस्म की ‘कॉरपोरेट सेंसरशिप‘ अघोषित रूप से आरंभ है ? जबकि, ठीक उसी दिन ‘दैनिक भास्कर‘ ने क्रिओलीकरण के विरूद्ध लिखी गयी मेरी तीखी टिप्पणी ससम्मान और प्रमुखता से छापी और ‘नईदुनिया‘ ने इसके दो दिन पूर्व ही ‘भाषा के खिलाफ हो रही साजिश को समझो‘ शीर्षक से हिन्दी के ‘क्रिओलीकरण‘ के खतरे की तरफ पाठकों नहीं, सम्पूर्ण हिन्दी भाषा-भाषियों को सचेत करने वाली उस टिप्पणी को एक ऐसी सम्पादकीय टीप के साथ प्रकाशित किया, जो ‘जन-आह्वान‘ के स्वर में थी। यह तथ्य दोनों ही अखबारों के ‘खुलेपन‘ और ‘जनतांत्रिक उदारता‘ के स्पष्ट प्रमाण हैं। तो अब प्रश्न यह उठता है कि क्या उनकी यह ‘उदारता‘ इतनी ज्वलनशील है कि प्रदर्शन की आँच की खबर से भस्म हो सकती है ? हाँ, राजनीतिक सत्ताएँ विचारको खतरा मानती हैं और उससे डरती भी हैं, लेकिन अखबर की ताकत तो विचारही है। विचारतो उसके लगभग प्राण हैं ? फिर चाहे वे सहमतिके रूप में हों, या असहमतिके रूप में। मैं मानता हूँ कि आज हमारा समाज जितना ‘सूचना-सम्पन्न‘ हुआ है, उसके पीछे प्रमुख रूप से ‘लिखे-छपे शब्द‘ की बहुत बड़ी भूमिका है, ‘बोले गये‘ शब्द वाले माध्यम की तो प्राथमिकताएँ और प्रतिबद्धताएँ केवल मनोरंजन ही है। अतः मुझे उस माध्यम से कुछ नहीं कहना। वह अभी तक परिपक्व ही नहीं हो पाया है। अधिकांश का ‘समाचार-विवेक‘ तो सांध्यकालीनों की सनसनी के समांतर ही है। वे ‘सचाई‘ के साथ फ्लर्ट (!) करते हैं। उनका ‘रिमोट‘ सच के किसी दूसरे ‘सनसनाते संस्करण‘ को बदलने का उपकरण है। लेकिन सुबह के दैनिक अखबार यह मानते हैं कि वह मालिकों का कम पाठकों का ज्यादा हैं। इसीलिए, यदि पाठकों का एक छोटा-समूह ‘संवादपरक प्रतिरोध‘ की संभावना के पूरी तरह निशेष हो जाने के बाद, यदि निहायत ही गाँधीवादी तरीके से अपना विरोध होली जलाकर प्रकट कर रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि समाचार-पत्रों में हो आयी उसकी आस्था का पूर्णतः से लोप हो गया है। गाँधीजी ने, जब विदेशी वस्त्रों की होली जलायी थी तो वे ‘वस्त्रोत्पादन‘ के विरूद्ध कतई नहीं थे। ना ही वस्त्र धारण करने के काम से उनकी आस्था उठ गयी थी। वे तो प्रतीकात्मक रूप से एक अचूक सूचना दे रहे थे कि हमें ‘औपनिवेशिक विचार‘ का विरोध करना है, जो वस्तुओं में शामिल है।

अंत में इन दिनों जिस ‘शक्ति-त्रयी‘ की बात की जा रही है, उसमें ‘सूचना‘ भी राज्य सत्ता के समानान्तर मानी जा रही है। ‘सूचना‘ का निर्माण और वितरण करने वाली दुनिया की चार पांच संस्थाओं को ‘सत्ता‘ का सर्वोपरि रूप माना जा रहा है, क्योंकि वे ही ‘विश्वमत‘ गढ़ती या बनाती हैं। उनमें किसी भी मुल्क या उसकी सरकार को ध्वस्त करने की भी अथाह कुव्वत है, लेकिन वे अपने मुल्क के ‘प्रतिरोध की आवाजों‘ की अनसुनी नहीं करती वर्ना, नोम चॉमस्की जैसे लोगों के विचारों की आहटें शेष संसार को सुनाई ही नहीं देती।

मुझे ब्रिटिश प्रधानमंत्री चेम्बर लेन के आक्सफर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में दिये गये भाषण की याद आती है। उन्होंने कहा था, ‘आक्सफर्ड‘ ने हमें जब-जब जैसा-जैसा करने को कहा हमने हमेशा ही ठीक वैसा-वैसा किया; लेकिन जब आक्सफर्ड को हमने अपने जैसा करने को कहा, उसने वैसा कभी नहीं किया और एक ब्रिटिशर की तरह मुझे इन दोनों बातों पर अपार गर्व है।

कुल मिलाकर चेम्बर लेन ने यही कहना चाहा हम ब्रिटिशर्स विचार के स्तर पर इतने उदार हैं। हम अपनी प्रखरतम आलोचना का सम्मान करते हैं, लेकिन, हमें अपने मुल्क की बुद्धिजीवी बिरादरी पर भी गर्व है, जो असहमतियों को व्यक्त करने में भीरू नहीं है। किसी भी देश और समाज में भीरूता का वर्चस्व बौद्धिकों में व्याप्त होने लगे, तब शायद यह मान लेना चाहिए कि वह फिर से पराधीन होने के लिए तैयार हैं।

अंत में कुल जमा मकसद यही है कि लोहिया की विचारधारा में गहन आस्था रखने वाले श्री अनिल त्रिवेदी, तपन भट्टाचार्य और जीवनसिंह ठाकुर ने भारतीय भाषाओं के आमतौर पर तथा हिन्दी के क्रिओलीकरण (हिंग्लिशीकरण) को लेकर खासतौर पर एक शांत और नितान्त निर्विघ्न प्रदर्शन किया तो वस्तुतः वे निश्चय ही इसके दूरगामी खतरों की तरफ पूरे देश और समाज को चेतन करना चाहते हैं। वे ठीक ही कह रहे हैं ‘भाषा का प्रश्न‘ महज भाषा भर का नहीं होता, वह समूचे समाज को सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था का भी अनिवार्य अंग होता है। क्या हमें यह नहीं दिखाई दे रहा कि अमेरिका और ब्रिटेन ‘ज्ञान समाज‘ के नाम पर, मात्र अपने सांस्कृतिक उद्योग की जड़ें गहरी करने में लगे हैं। ‘कल्चरल इकोनॉमी‘ उनकी अर्थव्यवस्था का तीसरा घटक है, जो अँग्रेजी सीखने-सिखाने के नाम पर अरबों डॉलर की पूंजी कमाना चाहते हैं। हिन्दी, यदि संसार की दूसरी सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा की चुनौतीपूर्ण सीमा लांघने को है, तब उसे एक धीमी मौत मारने के लिए उसका क्रिओलीकरण क्यों किया जा रहा है ? अभी षड्यंत्र की यह पहली अवस्था है, ‘स्मूथ डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि‘। अर्थात हिन्दी के शब्दों का चुपचाप अँग्रेजी के शब्दों द्वारा विस्थापन इसे सर्वग्रासी हो जाने दिया गया तो अंत में आखिरी प्रहार की अवस्था आ जाएगी और वह होगा, देवनागरी लिपि को बदलकर उसके स्थान पर रोमनलिपि को चला देना। यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि 5 जुलाई 1928 को ‘यंग इंडियामें जब गाँधीजी ने लिखा कि अँग्रेजी साम्राज्यवादी भाषा है और इसे हम हटा कर रहेंगे’, तब गोरी हुकूमत अँग्रेजी के प्रसार प्रचार पर छह हजार पाऊण्ड खर्च करती थी (तब भी यह राशि बहुत ज्यादा थी)। गाँधीजी की इस घोषणा को सुनते ही उन्होंने लगे हाथ अँग्रेजी के प्रचार-प्रसार का बजट बढ़ा दिया। 1938 में बजट की राशि थी तीन लाख छियासी हजार पाऊण्ड। यदि अखबारों की होली जलाकर प्रकट किये गये इस विरोध के बाद हिन्दी के समाचार पत्रों मे भाषा के ‘क्रिओलीकरण‘ की गति तेज हो जाये तो यह स्पष्ट सूचना जायेगी कि भाषा संबंधी नीतियों के पीछे अँग्रेजी की ‘नवसाम्राज्यवादी‘ शक्तियाँ दृढ़ता के साथ काम कर रही हैं।

दूसरा नैनीताल फ़िल्म फेस्टिवल 29 से

नैनीताल: पिछले दिनों उत्तराखंड में लगातार बारिश और भूस्खलन के कारण हुए जानमाल के नुकसान के चलते 24 से 26 सितम्बर तक होने वाले दूसरे नैनीताल फिल्म फेस्टिवल को स्थगित कर दिया था। इसकी नई तारीख घोषित हो गई है। जहूर आलम, अध्यक्ष युगमंच और संजय जोशी, संयोजक, द ग्रुप, जन संस्कृति मंच ने बताया फिल्म फेस्टिवल 29 से 31 अक्‍टूबर तक करने का निश्‍चय किया है। इच्छुक सिने प्रेमी दर्शकों से अनुरोध है कि नैनीताल पहुंचकर प्रतिरोध के सिनेमा अभियान को सफल बनाएं। इस संबंध में विस्तृत जानकारी के लिए ज़हूर आलम से 09412983164 या yugmanch.nainital@gmail.com पर तथा संजय जोशी से 09811577426 या thegroup.jsm@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

यादों में रहेंगे सदा: सन्तोष कुमार चतुर्वेदी

प्रेमचंद के बाद हिंदी कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन को पुनर्स्‍थापित करने वालों में महत्‍वपूर्ण कथाकार मार्कण्‍डेय पर उनके साथ कथा पत्रिका में सहायक रहे युवा कवि सन्‍तोष कुमार चतुर्वेदी का संस्‍मरण और लंबी कविता-

कवि केदार नाथ सिंह की एक छोटी कविता ‘जाना’ की पंक्तियां हैं-

मैं जा रही हूं- उसने कह

जाओ – मैंने उत्तर दिया

यह जानते हुए कि जाना

हिन्दी की सबसे खौफनाक क्रिया है।

18 मार्च, 2010 को सायं सवा पांच बजे के आसपास आजमगढ़ से जब मार्कण्डेयजी की बड़ी पुत्री डॉ स्वस्ति सिंह का फोन आया कि ‘पापा नहीं रहे’- तब मैंने हिन्दी की इस सबसे खौफनाक क्रिया को शि‍द्दत से महसूस किया। मैं स्तब्ध था क्योंकि ठीक इसी दिन वह दिल्ली से आजमगढ़ लौटने की तैयारियां कर रहे थे। कैफियात एक्सप्रेस से उनको आजमगढ़ लौटना था। इलाहाबाद में हम अपने तरीके से उनकी अगवानी की तैयारियों में लगे हुए थे। लेकिन एक पल में जैसे सब कुछ गड़बड़ हो गया। अब लौट रहा था ताबूत में रखा हुआ उनका पार्थिव शरीर और हम इलाहाबाद जंक्‍शन पर शेखर जोशी, दूधनाथ सिंह, श्री प्रकाश मिश्र, सूर्यनारायण आदि साथियों के साथ सुबह सवा नौ बजे के आसपास अत्यन्त भीगे मन से रीवांचल एक्सप्रेस का इन्तजार कर रहे थे।

मार्कण्डेय सिर्फ एक नाम भर नहीं थे। वे सिर्फ एक कहानीकार, उपन्यासकार, एकांकी लेखक, आलोचक, कवि या सम्पादक भर नहीं थे, सिर्फ नयी कहानी आन्दोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक नहीं थे- अपितु बहुत कुछ और भी थे। इलाहाबाद को जुनून की हद तक चाहने वाले, प्यार करने वाले। जीवन के अन्तिम समय तक गंवई संस्कारों को अपने में सुरक्षित संरक्षित रखने वाले। अपने से जुड़े हुए लगभग सारे लोगों का बहुत बहुत ख्याल रखने वाले। अत्यन्त विनम्र स्वभाव वाले, हर दिल अजीज और सबसे बढ़कर असीम संवेदनाओं से भरे हुए वे एक बेहतर इन्सान थे। उनके चेहरे की चिरपरिचित हंसी हमेशा बहुत कुछ कहती थी। यद्यपि आज वह स्मृतियों में जीवित हैं, अपनी रचनाओं में जीवित हैं, लेकिन एक कटु सच्चाई यह है कि आज उनका न होना इलाहाबाद को बहुत खल रहा है।

जगदीश गुप्त, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लक्ष्मीकान्त वर्मा, सत्यप्रकाश मिश्र के बाद मार्कण्डेय का जाना इलाहाबाद को गहरे तौर पर सूना कर गया है। शेखर जोशी और अमरकान्त जैसे अपने इस अभिन्न मित्र के इस तरह अचानक चले जाने से अवाक और एकदम अकेले पड़ गये हैं। और हम जैसे नये रचनाकारों के लिए, जिन्होंने साहित्य का ककहरा सीखना अभी शुरू ही किया है, तो यह वज्रपात के समान है। उनके होने भर से हम अपने प्रति गहरे तौर पर आश्‍वस्त होते थे। उनके होने भर से हमारा आत्मविश्‍वास जैसे अपने चरम पर होता था।

समय का पहिया भला कब रूका है कि वह हमारे लिए रुकता। समय के प्रवाह के इस क्रम में हम आज जैसे अपना सब कुछ गवां बैठे थे। इसी बीच महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्‍वविद्यालय के इलाहाबाद स्थित दूरस्थ शि‍क्षा केन्द्र के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. सन्तोष भदौरिया का फोन आया कि 20 मार्च, 2010 को केन्द्र के हॉल में सायं 5 बजे से मार्कण्डेय जी पर एक श्रद्धान्जलि सभा का आयोजन है। संयोगवश यह शनिवार का दिन था। पिछले 14-15 वर्षों से शनिवार और रविवार का दिन मेरे लिए वह खास दिन होता था कि जैसे ही घड़ी की सुइयां शाम के 4 बजातीं दादा का फोन आ जाता- ‘क्या कर रहे हो भाई, उठो और जल्दी से आ जाओ। चाय बन रही है। कथा का बहुत सारा काम करना है।’ इतना सुनना होता कि मैं यन्त्रवत तैयार हो कर जल्दी-जल्दी रिक्‍शे से उनके राजापुर स्थित आवास ए डी-2, एकाकी कुंज, मेयो रोड पहुंच जाता, जो हमारे लिए ‘कथा’ का मुख्यालय भी हुआ करता।

जब हम उनके घर पहॅुचते, हमारे लाख मना करने के बावजूद, जैसाकि उनका स्वभाव था, वे अपने हाथों एक प्लेट में मिठाइयां और ठण्डा पानी लाते। मम्मी विद्यावती जी (मार्कण्डेय जी की पत्नी) गठिया के अपने असहनीय दर्द को दरकिनार कर चाय बनातीं। और तब उनकी पसन्दीदा चना लाई और चाय के साथ बातचीत का अन्तहीन दौर शुरू हो जाता। बीच-बीच में हम कथा के लिए लेखकों को कुछ चिट्ठियां लिखते और लेखकों से रचनाओं के लिए फोन करते-कराते। पिछले कई वर्षों से मेयो रोड से गुजरते हुए, जहां उनका आवास एकाकी कुंज है, एक बार भी ऐसा नहीं हुआ होगा कि दादा से मिले बिना हम निकल जायें। और इस 20 मार्च को पहली बार जब जाना भी हो रहा था तो दादा पर ही आयोजित श्रद्धांजलि सभा में भाग लेने के लिए। इससे बढ़कर विडम्बना मेरे लिए और क्या हो सकती थी।

दादा को सबकी परवाह रहती थी। उनका स्पेस बहुत व्यापक था जिसमें कॉलोनी के घरों में चौका बासन करने वाली निम्न वर्ग की लड़कियां और महिलाएं होती थीं। घर में काम करने वाला बिजली का मिस्त्री होता था। कॉलोनी के छोटे’छोटे बच्चे होते थे तो दूसरी तरफ साहित्य शीर्ष पर आसीन प्रोफेसर नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, शि‍व कुमार मिश्र या नन्द किशोर नवल होते थे। घर पर काम करने वाली महरी का बच्चा बीमार है तो उसे दवाई दिलवाना, अगर उसकी लड़की ने कक्षा 8 पास कर लिया तो नवें दर्जे में एडमिशन दिलवाना, दूध देने वाले के बच्चे के लिए कहीं नौकरी की व्यवस्था कराना, किसी कवि या कहानीकार ने अगर कुछ लिखा है तो उस पर गोष्ठी के आयोजन की व्यवस्था कराना आदि-आदि तमाम तरह की समस्याएं दादा की अपनी समस्या बन जाती थीं। वे खुद आगे आ कर उन सारी समस्याओं के निराकरण का प्रयास करते थे। दूसरी तरफ उनकी चिन्ता का विषय यह भी होता कि वरिष्ठ आलोचक शि‍व कुमार मिश्र को रिटायरमेन्ट के बाद बहुत कम पेन्‍शन मिल रही है। इतनी महंगाई के जमाने में उनका गुजारा कैसे होता होगा। वरिष्ठ आलोचक नन्द किशोर नवल जो वर्ष 2009 में अधिकांश समय तक तमाम बिमारियों से जूझते रहे, के स्वास्थ्य को ले कर भी वे अक्सर चिन्तित दिखायी पड़ते और मेरे जाते ही कहते, ‘सन्तोष जरा जल्दी से नवल जी को फोन मिलाओ। उनके तबियत की खबर ली जाए।’ शेखर जोशी आजकल कहानियां नहीं लिख रहें किसी तरह से उनसे नयी कहानी लिखवानी है। सतीश जमाली का स्वास्थ्य और उनकी आर्थिक दिक्कतें जैसे दादा की अपनी दिक्कतें बन जाती थीं।

संभवतः वर्ष 2009 के दिसम्बर महीने की वह 20 तारीख थी, जब स्वस्ति दीदी उनके गले की समस्याओं के मद्देनजर बनारस हिन्दू विश्‍वविद्यालय के मेडिकल कॉलेज में उनको दिखलाने के लिए लिवा गयी थीं। जांच के बाद यह पता चला कि उनके गले में फिर से कैन्सर ग्रोथ हो गया है। यह बात दादा को बतायी नहीं गयी थी। लेकिन लगता है कि दादा को इसका आभास अच्छी तरह से हो चुका था। दो साल पहले भी गले के कैन्सर से वे जूझ चुके थे, पर इस बार जैसे उनको सब पता था। उसी दिन रोज की तरह ही जब उनसे मेरी बात हुई तब उन्होंने मुझे बताया- ‘सन्तोष मामला फिर गड़बड़ हो गया।’ मैंने उन्हें मजबूत करने के उद्देश्‍य से कहा- ‘दादा इलाज से सब कुछ ठीक हो जायेगा। आप बिल्कुल चिन्ता मत करिए।’ तब दादा ने कहा -‘हां, ठीक ही कहते हो। लेकिन… चलो… देखा जायेगा।’

और फिर वह भी दिन आया जब दिल्ली के रोहिणी में राजीव गांधी कैन्सर इन्स्टीट्यूट में उनके गले के कैन्सर की पुष्टि हो गयी। 29 जनवरी को उन्हें दिल्ली रेडियोथिरेपी कराने के लिए जाना था। मैं उनसे मिलने तथा स्टेशन तक छोड़ने के लिए उनकी छोटी बेटी डॉ. शस्या ठाकुर के आवास थार्नहिल रोड स्थित टेमेरिन ट्री गया। हमेशा उत्साहित रहने वाले तथा हम सबको हमेशा उत्साहित करने वाले हम सबके दादा आज मुझे पहली बार बहुत हतोत्साहित लगे।

उनका मनोबल बढा़ने के लिए हम तमाम बातें कर रहे थे, गढ़ रहे थे, लेकिन सब जैसे व्यर्थ साबित हो जा रहा था। एक विषाद उनके चेहरे पर साफ-साफ पढा़ और महसूस किया जा सकता था। प्रयागराज एक्सप्रेस पर उन्हें बिठाते हुए और दिल्ली के लिए रवाना करते हुए हम पहली बार बहुत अजीबोगरीब महसूस कर रहे थे। हमारे लिए जैसे अनहोनी का पूर्वाभास था, जिसे नकारने की कोशि‍शों में हम लगे हुए थे। दादा का यह इलाहाबाद का छोड़ना अन्तिम बार का इलाहाबाद का छोड़ना होगा, यह हम कहां जान पाये थे। यह हम कहां स्वीकार कर पाये थे।

दादा के गले की रेडियोथिरेपी एक बार फिर से 01 फरवरी से दिल्ली के रोहिणी के राजीव गांधी कैन्सर इन्स्ट्टीट्यूट में चालू हो गयी। विशेषज्ञ डाक्टरों ने उनकी उम्र और रोग की जटिलता से जुड़ी आगे आने वाली तमाम संभावित दिक्कतों का जिक्र किया। यह भी पता चला कि यह कैन्सर अब उनके फेफडों तक पहुंच चुका है, जो लाइलाज है। स्वस्ति दीदी ने तमाम किन्तु-परन्तु के बावजूद उनके गले की रेडियोथिरेपी कराने का निर्णय लिया। अब हम सबके सामने कोई विकल्प भी तो नहीं बचा था। उनकी उम्र के व्यक्ति के लिए रेडियोथिरेपी और वह भी दो ही साल के अन्दर दुबारा झेल पाना बहुत मुश्‍कि‍ल भरा काम था। फिर भी उनकी रेडियोथिरेपी चालू हुई और फिर वह मौत के साथ दो-दो हाथ करने में मजबूती से जुट गये।

विगत 8-10 सालों से एक ऐसा सिलसिला बन गया था जिसमें प्रायः उनसे रोज ही दसियों बार कथा के संदर्भ में बातचीत होती। हालांकि बीमारी के मद्देनजर मैं अब उनसे बातें करने में संकोच करता, लेकिन वह किसी भी वक्त फोन मिला कर दिल्ली से ही मुझसे तमाम योजनाओं पर बात करने लगते। ‘सपने तुम्हारे थे’ (कविता संग्रह) और ‘पत्थर और परछाइयां’ (एकांकी संग्रह) जो कम्पोज हो गया है, उसे अब छपवा देना है। उसका कवर बेहतर बनवाना है। सरोज सिंह की थिसिस जो प्रेमचन्द पर है, किताब के रूप में जल्दी लानी है। और हां-‘कथा’ के अगले अंक की तैयारियों के लिए क्या कर रहे हो आदि आदि तमाम बातें उनकी जुबान पर होती थीं। मैं उनसे यही कहता- ‘यह सब काम आपके इलाहाबाद लौटने तक हो जायेगा। आप जल्दी से पहले स्वस्थ तो हो जाइए।’ मगर उन्हें तो जल्दी थी। जैसे वे भलीभांति यह जान गये हों कि अब बहुत ज्यादा जीवन नहीं बचा है। कम से कम बच गये इस समय का वे जैसे आदतन पूरा उपयोग कर लेने के लिए बेहद उतावले दिख रहे थे।

इधर फोन पर अक्सर उनका सवाल होता- ‘दिल्ली कब आ रहे हो? जल्दी से आ जाओ। तुमसे तमाम बातें करनी हैं।’ मेरा भी मन उनके बिना इलाहाबाद में कहां लग रहा था। अपने महाविद्यालय से छुट्टी ले कर मैं 09 फरवरी को दिल्ली पहुंचा। मुझे देखते ही दादा पहले की तरह ही जैसे उत्साह से भर गये हों। यद्यपि उनकी बीमारी की स्थिति को देखते हुए हम उनसे कम से कम बातचीत करना चाहते थे, लेकिन उन्हें अपनी बीमारी की परवाह कहां थी। उन्हें तो तमाम बातें करनी थीं। रोज-ब-रोज मन्द पड़ती हुई आवाज भी उनके हौसले को पस्त नहीं कर पायी थी। दस दिनों का दिल्ली का मेरा समय उनके साथ कब और कैसे कट गया, इसका बिल्कुल पता ही नहीं चला। बातचीत का विषय साहित्य से शुरू होता और फिर यह क्रम राजनीति, समसामयिक घटनाओं, खेलकूद, फिल्म, थियेटर आदि तक बिन रूके चलता चला जाता। उनके पास संस्मरणों का अथाह खजाना था। कमलेश्‍वर, दुष्यन्त कुमार से जुड़े हुए…। भैरव प्रसाद गुप्त, उपेन्द्र नाथ अश्‍क, श्रीकृष्ण दास से जुड़े हुए…। माया प्रेस से जुड़े हुए…। प्रतापगढ़ से जुड़े हुए…।

उनके हार्ट अटैक के इलाज के दौरान दिल्ली के साहित्यकारों जैसे मन्नू भंडारी, मैत्रेयी पुष्पा, कृष्णा सोबती, राजेन्द्र यादव, नामवर सिंह, अशोक बाजपेयी से जुड़े हुए…। उनके गांव बराई से जुड़े हुए…। प्रतापगढ़ से जुड़े हुए…। और इन सबसे स्वयमेव ही जुड़ जाता उनका अपना इलाहाबाद। जिसके बिना वह हमेशा बेचैन रहते। जहां रहने के वह तमाम बहाने ढूंढते। और जब कभी स्वस्ति दीदी उन्हें आजमगढ़ बुलाने के लिए फोर्स करतीं, तब इलाहाबाद न छोड़ने के हजार बहाने गढ़ते हुए।

अबकी बार दिल्ली में अपना इलाज कराते हुए दादा किसी को भी यह खबर देना नहीं चाहते थे। उनके रहने-सहने का जो अन्दाज रहा है, उसमें वे अपने को दीन हीन दिखने-दिखाने से बचना चाहते थे। दिल्ली पहुंच कर मैंने जब उनकी बीमारी की बात विश्‍वनाथ त्रिपाठी, ममता कालिया, रवीन्द्र कालिया, वीर भारत तलवार, आनन्द प्रकाश, उदभ्रान्‍त, कुमुद शर्मा, संजय जोशी आदि को बतायी तो वह पहले तो मुझे झिड़की पिलाते हुए बोले ‘इसकी क्या जरूरत थी। तुम नाहक ही सबको परेशान करते रहते हो।’ फिर इन लोगों से फोन पर प्रेमपूर्वक बातें करते हुए किसी भी समय मिलने आने की बात कहते। समय-समय पर जब ये लोग आते तब एक बार फिर शुरू हो जाता इनके साथ बातों का… यादों का एक अन्तहीन सिलसिला।

संजय जोशी के मि‍त्र अनुराग दादा का इन्टरव्यू लेना चाहते थे। दादा से जब मैंने इस बात की चर्चा की तो शुरुआती ना-नुकुर के पश्‍चात वह इन्टरव्यू देने के लिए राजी हो गये। अनुराग को 21 फरवरी, रविवार का दिन इसके लिए दिया गया। रेडियोथिरेपी से दादा की आवाज मन्द पड़ने लगी थी। इसके बारे में अनुराग से निवेदन किया गया कि यदि इन्टरव्यू छोटा हो तो दादा की सेहत के लिए बेहतर होगा। लेकिन जैसा कि स्वस्ति दीदी ने बताया इन्टरव्यू का सिलसिला जब शुरू हुआ तो वह लगभग एक घण्टे तक चला। दादा का यह अन्तिम इन्टरव्यू होगा, यह बात हम भला कहां जानते थे।

इन्स्टीट्यूट में इलाज कराते हुए भी दादा ने एक कहानी का सूत्र खोज लिया था। इन्स्टीट्यूट में काम करने वाली एक खूबसूरत नर्स का नाम उन्होंने ‘सुग्गी’ कर दिया था। सुग्गी को लेकर एक से जुड़ कर एक कथानक उनके मन मस्तिष्क में तैयार हो रहे थे। इसी प्रसंग में उनके खयालों में पता नहीं कहां से साइकिल चलाते दुष्यन्त कुमार आ खड़े होते जो घर लौटती सुग्गी के रिक्‍शे से टकरा कर गिर जाने का अभिनय करते। घायल दुष्यन्त कुमार को सुग्गी उठा कर इलाज कराने ले जातीं। और फिर अपनी राह चल पड़ती यह कहानी। इस कहानी में ईरान से इलाज कराने दिल्ली आया वह गोरा चिट्टा शेख भी शामिल हो जाता जो अपने बेटे-बेटी के साथ हमें राजीव गांधी कैन्सर इन्स्ट्टीट्यूट में प्रायः दिखायी पड़ता। मन मस्तिष्क में बुनी गयी उनकी वह कहानी कागज पर उतरने के पहले ही अनाथ हो गयी।

16 मार्च, 2010 की सुबह 8 बजे फुसफुसाती आवाज में दादा का फोन आया- ‘सन्तोष, मुझे बहुत तकलीफ हो रही है। अब जीने की इच्छा नहीं हो रही।’ बातचीत के दौरान ऐसा लगा जैसे बातों के इस जादूगर की आवाज के तार अब टूट रहे हैं। वह जादूगर जो हमेशा जीवन से भरा रहता। जो जब, जहां, जैसे, जिस तरह चाहता बातों को शुरू करता, नचाता। बातों को मनचाहे सूत्र से जोड़ देता और फिर एक विशि‍ष्ट अन्दाज में अंजाम तक पहुंचा देता। सुनने वाला मन्त्र मुग्ध हो उन्हें और उनकी बातों को एकटक निहारता और सुनता रहता।

मुझे याद नहीं किस सिलसिले में दूधनाथ सिंह ने यह बात कही, पर इस सन्दर्भ में मुझे हमेशा याद आती है कि अगर नामवर सिंह वाचिक परम्परा में आलोचना के शीर्ष पर हैं तो अपने गुरु मार्कण्डेय जी भी वाचिक परम्परा में कथक्कड़ी के शीर्ष पर हैं। इसमें वे बेजोड़ हैं। वाकई इस क्षेत्र में अप्रतिम प्रतिभा के धनी मार्कण्डेय जी की बातों, वृतान्तों, कथाओं, संस्मरणों को हमने बहुत करीब से देखा-सुना-जाना और महसूस किया है, यह बात तो हम फख्र के साथ कह ही सकते हैं।

दादा आज हमारे बीच नहीं हैं। हकीकत होते हुए भी इसे मानने का मन नहीं होता। और जब कभी इसे ले कर मन उदास होने को होता है तो हम इसे आश्‍वस्त करने में जुट जाते हैं कि दादा हमारे पास ही तो हैं। निराला जी की ये पंक्तियां कितनी सच हैं-

मरण को जिसने वरा है

उसी ने जीवन भरा है

दादा हमारे पास हैं- अपनी तमाम स्मृतियों, वृतान्तों, कहानियों और अपनी अन्य रचनाओं और अपने द्वारा सम्पादित कथा के तमाम अंकों में। हमारे स्मरण में है आज भी बिल्कुल जैसे का तैसा उनका जीवन। किसी ने कहा भी तो है – देखने के लिए देखने वाले नजर की जरूरत होती है। सच भी तो यही है। हम वह नजर विकसित कर उनकी बातों, विचारों और सिद्धान्तों को आगे ले जाकर उन्हें जीवित रख सकते हैं। उन्हें किसी संकीर्ण दायरे में तो बांधा ही नहीं जा सकता। उनके इस व्यापक फलक को हम और व्यापक करें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि प्रकट करने का, मेरी समझ से उपयुक्त तरीका हो सकता है।

एक आदमी जिया करता था लगातार

(मार्कण्डेय दादा के लिए)

उनके बारे में तमाम बातें

जानने का दावा कर सकता हूं

बावजूद इसके

एहतियातन यह भी कहा जा सकता है

कि बहुत कुछ नहीं भी जान पाया

उनके बारे में

उनके अन्दरूनी ज़ख्मों के बारे में तो कत्तई नहीं

जिनका टपकना

तमाम कोशिशों के बाद भी

नहीं उतर पाता था

उनके चेहरे पर

जानते हुए भी नहीं जान पाये

जैसे अपने को ही जीते हुए

नहीं जान समझ पाते हम

खुद अपने ही जीवन की पहेली

जीवन भर

जैसे आंखें खुली होने के बावजूद

टंग जाता है इन पर एक ऐसा पर्दा

जिससे हो कर देखते हुए भी

नजर नहीं आता हमें कुछ भी

फिर भी

एक आदमी के तौर पर मैं उनको

बखूबी जानता-पहचानता था

रिश्‍तों के तार को

अपनी  धुन के मुताबिक छेड़ते हुए

गढ लेते थे वे

बातों-बातों में ही

कोई न कोई बात

उनको फुहारों के रूप में

कई बार महसूस किया था मैंने

तपती हुई धूप में जब

धरती का कलेजा

जगह-जगह से फटने लगता था

और किसानों की आंख में

उग आती थी

दिन में ही जोन्ही

उमड़-घुमड़ कर घिर आते थे वे आदतन

आसमान में घटा बन कर

फिर बरसने लगते थे

धरती पर इस कदर

छहर-छहर

कि भीग जाती थी समूची मिट्टी

तब हरियाली झूलने लगती थी

धरती की डाल पर

डाल कर झूला

बेखौफ हो कर

वृक्ष रूप में पाया

जब-जब उनको देखा मैंने

जब कभी आते लोग थके-मांदे

अपनी छांव तले बैठा कर

हांकने लगते वे फौरन

अपनी पत्तियों का बेना

वे खिल उठते अपने फूलों में

किसी के दुख को कम करने खातिर तत्काल ही

और भूखों के आगे तो

अपनी ही पत्तियों के दोने में परोस देते

अपनी ही डाल के पके फल

बिना किसी हिचक के

उनसे बतियाना

हमेशा एक पेड़ से बतियाना था

उसकी हरियाली

और उसकी जड़ों से बतियाना था

दिल खोल कर पूरी-पूरी

देश दुनिया की

सच्ची-मुच्ची बातें

जिसे अक्सर दोहराता था मैं

उनसे बातें करते-करते

सूरज बन कर

दुनिया का अन्धेरा दूर करते

मैंने उन्हें अपनी आंखों देखा था

खुद में वे जलते रहते थे प्रतिपल

जैसे हजारों हाइडोजन बम

फूट पड़े हों एक साथ

और धधक उठा हो

उनका अपना धरातल

लेकिन दूर सुदूर कहीं

फैलने लगा हो उजास

और आसमान की लहरों पर

फिसलता हुआ चांद पड़ने लगा हो शीतल

अपनी करामाती किरनों से

वे जब चाहते रच देते इन्द्रधनुष

तमाम रंगों को समोते हुए

खुद उन तमाम रंगों से होते हुए

आसमान में बिखरे हुए बादल भी

तब उनके किरनों की उजास से

भर-भर आते

टहाटह लाल हो जाते

एक अनोखे अन्दाज में

कथा रूप में तो वाकई बेजोड़ थे वे

कई-कई प्रसंग एक साथ जुड़ते थे उनसे

कई-कई युगों

कई-कई धाराओं को

अपने साथ समाहित करते

कुछ-कुछ सच्चे

तो कुछ झूठे-मुट्ठे लगने वाले अन्दाज में

हकीकत को हू-ब-हू बयां करते

इस कथा में ही कहीं

अपनी चोट से व्यथित नजर आते

दिख जाते वे

और जब कभी कहीं हम

डूबते दिखायी पड़ते

निराशा के भंवर में

भांप जाते वे तुरन्त

आ जाते अपनी पतवार संभालते

हमको हमारी राह दिखलाते

तमाम-तमाम बातें बतलाते

इतना ही जाना मैंने उनको जितना देखा

लेकिन इतना भी नहीं जाना

कि ढाल दूं उन्हें ही

एक कहानी के दायरे में तुरत फुरत

हमारे लिए तो यह भी मुश्‍किल है कि

उन्हें कविता के बीच ला कर रख दूं

जैसे का तैसा

और रही जहां तक नाटक की बात

तो इतना समझ लीजिए

कि कई नाटकों में कई मौकों पर

उनकी आंखें कई-कई बार

नम होते पाया था मैंने

और इसे कहीं से भी

नाटक कहना मुनासिब नहीं

वे तो एक आदमी थे

आदमियत से पूरी तरह से भीगे हुए

जीवन की आपाधापी में

जीवन को बचाते बसाते हुए

आदमी की शक्ल में

एक ठेठ आदमी

अपने घर-बार में मशगूल रहते हुए भी

दूसरों की चिन्ता में

लगातार घुलता हुआ एक आदमी

वे तो एक कहानी थे

दूसरों के जीवन को

अपनी फिक्र में गढ़ते हुए

वे तो बस एक घबराहट थे

प्रतिरोध की आहट

लगातार कम होते जाने से

बेहिसाब घबराये हुए

वे तो एक नदी थे

लगातार…  लगातार…

बहते हुए

अपने पानी से

एक कविता रचते हुए

दोनों किनारों की दूरी को

हर पल पाटते हुए

सच-सच कहूं

तो बस इतना ही जानता हूं मैं उनको

इससे कम या इससे ज्यादा

कुछ भी नहीं

कि लगातार कठोर होते जा रहे समय में

बहुत नरम थे वे

कि लगातार ठण्डे पड़ते जा रहे जमाने में

आंच जैसे गरम थे वे

कि हताशाओं के दौर में

एक गहरी आस से थे वे

कि विश्‍वासघातों के दौर में

एक पक्के विश्‍वास थे वे

बार-बार महसूस किया मैंने

कि एक आदमी

जिया करता था उनके अन्दर

ठीक अपनी ही शर्तों पर

लेकिन अपनी लचक से भरा हुआ भरपूर

विद्रूपताओं और कट्टरताओं के इस दौर में भी

एक आदमी जिया करता था

उनके अन्दर

निरन्तर

अपने धर्म और अपनी जाति के अहम को

लगातार दरकिनार करते हुए

अपने साथ-साथ

हमें भी लगातार

कुछ और अधिक

आदमी बनाते हुए

08.08.2010

विधाओं की कोई एल.ओ.सी. नहीं होती : कान्तिकुमार जैन

कांतिकुमार जैन उन संस्‍मरणकारों में से जिन्‍होंने संस्‍मरण को साहि‍त्‍य की केंद्रीय वि‍धा के रुप में स्‍थापित किया। उनके संस्‍मरण खासे चर्चित और कुचर्चित भी हुए। उनसे प्रसिद्ध समीक्षक साधना अग्रवाल की बातचीत-

कान्ति जी, जहाँ तक मुझे मालूम है, छत्तीसगढ़ी बोली का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन आपने किया है- नई कविता और भारतेन्दु पूर्व हिन्दी गद्य पर भी आपका कार्य है। आलोचना की पुरानी फाइल पलटने से मुझे उसमें आपका एक लेख- ‘मुक्तिबोध मंडल के कवि’ देखने को मिला। मुक्तिबोध मंडल के कवियों ने ही आरंभ में ‘नर्मदा की सुबहकी योजना बनाई थी जिसे अज्ञेय ने न केवल झटक लिया बल्कि बहुत से पुराने कवियों को हटा दिया। ऐसा क्यों कर हुआ? कृपया इसे स्पष्ट करें।

1972 में जब मैं मप्र हिन्दी ग्रंथ अकादमी के लिए ‘नई कविता’ नामक पुस्तक लिख रहा था, तब मैंने देखा कि विवेचकों के आग्रहों, पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों के कारण नई कविता का सच्चा इतिहास नहीं लिखा जा सका है। हिन्दी में समीक्षा को ही इतिहास मान लिया जाता है। नई शोध के फलस्वरूप उपलब्ध नई जानकारी को इतिहास में समाहित करने की परंपरा हमारे विश्वविद्यालयों में नहीं है। मैंने उक्त पुस्तक में मुक्तिबोध के विवेचन के साथ जब ‘मुक्तिबोध मंडल के कवि’ का विचार सामने रखा तो डॉ. जगदीश गुप्त जैसे नई कविता के विचारकों ने प्रारंभ में अपनी असहमति प्रकट की, किन्तु बाद में वे भी मेरे तर्कों और तथ्यों से आश्‍वस्‍त हुए।

मुक्तिबोध ने ‘नर्मदा की सुबह’ की योजना बनाई थी। मुक्तिबोध के मित्र और शुजालपुर में उनके विद्यालय-सहयोगी रह चुके वीरेन्द्र कुमार जैन मानते हैं कि मालवा में ही हिन्दी की प्रयोगवादी और नई कविता का जन्म हुआ था। बाद में इस काव्यधारा में नेमिचंद जैन और भारतभूषण अग्रवाल जुड़े। वीरेन्द्र कुमार जैन ने मुक्तिबोध पर लिखे और 13 मई, 1973 के ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित अपने लंबे संस्मरण में स्पष्ट किया है कि कैसे अज्ञेय जी की संगठन क्षमता के कारण उन्हें ‘तारसप्तक’ के संपादन के लिए आमंत्रित किया गया। ठीक यही बात शमशेर जी ने भी कही है। अज्ञेय जी ने ‘तार सप्तक’ की मूल सूची से कुछ नाम निकाल दिए और कुछ नए जोड़ दिए। अज्ञेय तारसप्तक के झंडा बरदार नेता नहीं थे। मुक्तिबोध के ‘अनन्य मित्र और मुक्तिबोध मंडल के कवि’ प्रमोद वर्मा ने मुझे अपने पत्र में लिखा: ‘दूसरा तारसप्तक’ छप चुका था। मुक्तिबोध को यह देखकर हैरानी हुई कि नई कविता के नाम से प्रस्तुत छठे दशक की कविता ‘तारसप्तक’ के मूलतः वामपंथी रुझान को काट तराश कर कोरम कोर, सौंदर्यपरक कलावादी बना दी गई है। ऐसा तो छायावाद के जमाने में भी नहीं हुआ था। तो क्या यह सब उनके नव स्वाधीन देश को अंतरराष्ट्रीय पूँजीवाद की गिरफ्त में रहे चले आने के लिए ही किया जा रहा था?’

मैंने मुक्तिबोध मंडल की अपनी स्थापना का लंबा विवेचन किया जो डॉ. नामवर सिंह संपादित ‘आलोचना’ में छपा भी। इस विवेचन में जिन कवियों और विचारकों के नाम आए थे वे सब मेरे परिचित मित्र थे, श्रीकांत वर्मा, शिवकुमार श्रीवास्तव, रामकृष्ण श्रीवास्तव, जीवनलाल ‘विद्रोही’, प्रमोद वर्मा, अनिल कुमार, सतीश चौबे- सभी मुक्तिबोध के प्राचीन मित्र। परसाई और भाऊ समर्थ भी गो वे कवि नहीं थे। मुक्तिबोध ने बहुत सोच-विचार कर कवियों की सूची की अंतिम रूप दिया और उनकी कविताएँ भी एकत्र की थीं। यदि ‘नर्मदा की सुबह’ छप गई होती तो हिन्दी की स्वतंत्रता परवर्ती कविता का इतिहास कुछ दूसरा ही होता। अज्ञेय जी ने सप्तक श्रृंखला के माध्यम से मुक्तिबोध द्वारा प्रस्तावित ‘नर्मदा की सुबह’ वाली वामपंथी रुझान की कविता को हाईजैक कर लिया। सप्तकों की खानापूरी करने के लिए बाद में वे बहुत ही साधारण कवियों को ही हाईलाइट करते रहे। ‘आलोचना’ में प्रकाशित अपने लेख में मैंने विवेचित कवियों का समीक्षात्मक आकलन तो किया ही था, उनका संस्मरणात्मक आख्यान भी प्रस्तुत किया था, दोनों को ताने-बाने की तरह बुनते हुए। मेरे बाद के संस्मरणों में इसी शैली का उपयोग किया गया है। मुझे संतोष है कि यह शैली सामान्य पाठकों के साथ ही सुधी आलोचकों को भी पसंद आई। यह शैली विद्वत्ता का आतंक पैदा करने के स्थान पर हार्दिकता जगाती है।

कायदे से सागर विवि के हिन्दी विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष होने के नाते ही नहीं, बल्कि आप में जो आलोचनात्मक प्रतिभा है, उसे देखते हुए आपको आलोचक होना चाहिए था, क्योंकि आपके संस्मरणों में आपके आलोचक की चमक की चिंगारी जहाँ-तहाँ प्रचुरता से दिखती है, मेरे मन में जब-तब यह सवाल उठता है। कृपया अपनी स्थिति से हमें परिचित कराएँ।

एक समय था जब हिन्दी का विश्‍वविद्यालयीन अध्यापक कवि होता ही था। फिर कवि के रूप में प्रतिष्ठा न मिलने पर वह कविता का पाला छोड़कर आलोचना के क्षेत्र में सक्रिय होता था। आचार्य नगेन्द्र, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह जैसे अनेकानेक कवि-आलोचकों से हम परिचित हैं। हमारे यहाँ आलोचना के साथ विद्वता का फलतः गंभीरता का अनिवार्य रिश्ता माना जाता है। विद्वता आतंकित तो करती है, आकर्षित नहीं करती। हमारे विश्‍वविद्यालय विद्वत्ता का विकास तो करते हैं, संवेदना का नहीं। ज्यादा विद्वत्ता से मुझे भय लगता है। ऐसा नहीं है कि आलोचना के क्षेत्र में मैंने कुलांचे न भरी हों, पर वहाँ बहुत भीड़ थी। वहाँ कोई किसी को तब तक घास नहीं डालता जब तक उसके साथ अपना गुट या शिष्यमंडली न हो। आलोचना के क्षेत्र में मेरी स्थिति शरणार्थी की थी। हिन्दी समाज कुम्हार के उस चाक के समान है जो माँगे दिया न देय। ऐसे में मैंने संस्मरणों की राह पकड़ी, शरणार्थी से पुरुषार्थी बनने के लिए। वह भी लगभग दिवसावसान के समय। समीक्षा को मैंने संस्मरणों की मुस्कान से मिला दिया, 33, 67 के अनुपात में। यह मेरी अपनी ‘रेसेपी’ थी। मेरी यह ‘रेसेपी’ आलोचकों को पसंद आई। मेरे अच्छे संस्मरण वे माने गए, जिनमें मैंने रचनाकार या चिंतक या अध्यापक के छोटे-छोटे आत्मीय प्रसंगों के आधार पर उसके व्यापक एवं बृहत्तर रचना कर्म और जीवन मूल्यों का विश्‍लेषण किया। जैसे बच्चन के, डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी के, रजनीश के या ‘सुमन’ के। आप चाहें तो इन्हें संस्मरणात्मक समीक्षा कह लें या समीक्षात्मक संस्मरण। ‘तुम्हारा परसाई’ शीर्षक पुस्तक मैंने इसी शैली में लिखी है।

पाठकों को गंभीरता और आलोचना की यह फिजां पसंद आई। याद कीजिए, शायर का वह मंसूबा जिसमें वह कहता है:

क्यों न फिरदौस में दोजख को मिला दें या रब

सैर के वास्ते थोड़ी सी फिजां और सही।

मेरे संस्मरण साहित्य की सैर के शौकीनों को यही थोड़ी सी फिजां मुहैया करते हैं।

सागर विवि से अवकाश प्राप्त करने के बाद संस्मरण लिखने की बात सहसा आपके मन में कैसे उठी? यूँ जहाँ-तहाँ आपने इसका संकेत दिया है लेकिन मुझे लगता है आपके पाठक के नाते मेरे मन में इस प्रश्‍न को लेकर जो जिज्ञासा है, उसका निदान आप ही कर सकते हैं।

संस्मरण लिखने की न तो मेरी कोई तैयारी थी, न ही आकांक्षा, कोई योजना भी न थी। डॉ. कमला प्रसाद के कहने से मैं श्रीमती सुधा अमृतराय पर एक संस्मरण लिख चुका था। उसे मित्रों ने पसंद किया, भाषा विज्ञान जैसा नीरस विषय पढ़ाने वाले से ऐसी तरल भाषा और रोचक शैली की अपेक्षा किसी को नहीं थी। ऐसे में एक दिन स्थानीय महाविद्यालय के अध्यापक मित्र घर आए। वे लेखक भी हैं, समीक्षा जैसी गुरु गंभीर विधा में लिखते हैं। कमला से उन्हें एलर्जी है, पुराने सहयोगी रह चुकने कारण। उनके गुरुओं ने उन्हें बताया था कि संस्मरण हल्की-फुल्की विधा है। उनके गुरु के गुरु आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी प्रेमचंद द्वारा संपादित ‘हंस’ के आत्मकथांक/संस्मरणांक का काफी मखौल उड़ा चुके थे। उन्हें लगा कि भाषा विज्ञान और समीक्षा के पुण्य तीर्थ से संस्मरण के गटर में पतन मेरे सारे पुण्यों को नष्ट कर देगा। मेरे उद्धार की चिंता के कारण उन्होंने फरमाया-संस्मरण तो वो लिखता है जो चुक जाता है। संस्मरण तो मरे हुओं पर लिखे जाते हैं। कुछ भी लिख दो, मरा हुआ व्यक्ति न प्रतिवाद कर सकता है, न ही आपकी खबर ले सकता है। फिर संस्मरण तो आत्मश्‍लाघा की विधा है। जिसे कोई भाव नहीं देता, वह अपनी पीठ ठोकने लगता है। संस्मरण उनके लिए शेड्यूल्ड कास्ट विधा थी और संस्मरण लेखक को वे कुल की हीनी, जात कमीनी, ओछी जात बनाफर राय का सगोत्री मानते थे। उनकी चेतना पर संस्मरण का मरण काबिज था, संस्‍मृत के पक्ष में भी, मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिपरक सोनोग्राफी की। सुमन जी, त्रिलोचनजी या प्रेमशंकर जी ने तो कम आपत्ति की, उनके अनुगतों ने ज्यादा हो-हल्ला मचाया।

जो जितना पुराना और बड़ा कांवड़िया था, उसने उतना ही ज्यादा हल्ला मचाया। यह सब तो सच है पर लिखना नहीं चाहिए। कुछ ने मेरी औकात बताई। क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा। कुछ ने मुझ पर ‘क्रुयेलिटी’ का आरोप लगाया। मुझे संतोष है कि सुमन जी ने अपने होशो हवास में ‘हंस’ में प्रकाशित मेरा संस्मरण पढ़ लिया था, प्रेमशंकर जी ने भी। मैं संस्मरण श्रद्धालुओं के लिए नहीं लिखता। आस्था सुदृढ़ करने के लिए जो संस्मरण पढ़ते हैं, उन्हें मेरी सलाह है कि वे ‘कल्याण’ या ‘कल्पवृक्ष’ पढ़ें। इसी बीच दो दुर्घटनाएँ और हो गईं। मेरी कूल्हे की हड्डी टूट गई, काफी अर्से तक चलना-फिरना दूभर हो गया। न पुस्तकालय जा सकते, न ही अपने अध्ययन कक्ष की अलमारियों की ऊपरी शेल्फों से किताब निकाल सकते। ईश्‍वर प्रदत्त इस चुनौती का सामना मैंने संस्मरण लिखकर किया। ईश्‍वर से तो मैं निबट लिया पर कमलेश्वर का क्या करूँ? कमलेश्‍वर को अध्यापकों की सारी प्रजाति ‘पतित’ और ‘नालायक’ लगती है। उनके लेखे ‘रचनशीलता’ही सर्वोपरि है। सो भैये, लो ‘एक पतित और नालायक प्राध्यपक’ के संस्मरण पढ़ो। जान कर संतोष हुआ कि उनको मेरे संस्मरण पठनीय ओर प्रिज्म की तरह लगे। वाहे गुरु की फतह।

सवाल यह भी है कि पहला संस्मरण लिखने-छपने के बाद पत्रिका के संपादक और पाठकों की प्रतिक्रिया का आप पर कैसा असर हुआ?

पहला संस्मरण छपा अप्रैल-अक्टूबर ‘96 की ‘वसुधा’ में। वह किंचित् लंबा था, डॉ. कमला प्रसाद ने कहा कि आपके संस्मरण ‘वसुधा’ के बहुत पन्‍ने घेरते हैं पर रोचकता के कारण पाठक उन्हें पूरा पढ़ते हैं। मैं छोटे संस्मरण लिख ही नहीं पाता। छोटे संस्मरण मुझे या तो शोक प्रस्ताव जैसे लगते हैं या चरित्र प्रमाणपत्र जैसे। ‘हंस’ में मेरे लंबे-लंबे संस्मरण छपे और पाठकों को पसंद आए। भारत भारद्वाज ने लिखा कि संस्मरणों का जो दिग्विजयी अश्‍व काफी अर्से से प्रयाग और काशी के बीच घूम रहा था, वह अब सागर में स्थायी रूप से बाँध लिया गया है। मेरे संस्मरणों पर कमला प्रसाद को और राजेन्द्र यादव को बहुत सुनना पड़ा, अश्‍लीलता को लेकर। अश्‍लीलता मेरे संस्मरणों में मेरे कारण नहीं थी, संस्मृत के अपने व्यक्तित्व के कारण थी। पर कई सुधियों को दुःशासन द्वारा भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण में अश्‍लीलता या अनैतिकता नहीं दिखाई पड़ी, दिखाई पड़ी वेदव्यास द्वारा महाभारत में चीरहरण का उल्लेख किए जाने पर। इन दिनों एक विज्ञापन आ रहा है दूरदर्शन पर। लड़की पूछती है- क्या खा रहे हो? लड़का कहता है- लो तुम भी खाओ। लड़की फिर कहती है- पर यह तो तंबाखू है। लड़का कहता है- जीरो परसेंट टोबेको, हंड्रेड परसेंट टेस्ट। मेरे संस्मरणों में भी अश्‍लीलता जीरो प्रतिशत ही है, स्वाद कुछ लोगों को शत-प्रतिशत मिलता है। यह उनकी अपनी स्वादेन्द्रिय का कमाल है।

संस्मरण हिन्दी में एक अरसे से लिखे जाते रहे हैं बल्कि पिछले वर्षों में काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह एवं रवीन्द्र कालिया की संस्मरण पुस्तकें भी छपीं जो वस्तुतः उनके समकालीन रचनाकारों पर केन्द्रित हैं। आपने किस तरह संस्मरण की पूरी परंपरा से अलग हटकर कबीर के कपूत बनने का साहस संजोया?

अभी कुछ दिन हुए, संस्मरणों के एक प्रेमी पाठक मुझसे मिलने आए थे। उन्होंने बातचीत के दौरान बचपन में पूछी जाने वाली एक बुझौवल सुनाई:

तीतर के इक आगे तीतर

तीतर के इक पीछे तीतर

आगे तीतर पीछे तीतर

बताओ कुल कितने तीतर

फिर इस बुझौवल का संस्मरण-पाठ भी पेश किया:

का के है आगे इक का

का के पीछे है इक का

आगे इक का, पीछे इक का

बताओ कुल कितने हैं का

यहाँ एक का काशीनाथ का है, दूसरा कालिया का, तीसरा इस नाचीज कान्तिकुमार का है। यह सब कबीर के कपूत हैं, कपूतों की वह परंपरा ‘उग्र’ और ‘अश्क’ से होती हुई कृष्णा सोबती, हरिपाल त्यागी तक पहुँचती है। मैं भी इसी परंपरा का एक पड़ाव हूँ। मैं कुछ ज्यादा ही कपूत साबित हुआ।

कुछ विद्वानों का मत है कि आपने संस्मरण विधा को हाल के दिनों में प्रकाशित अपने संस्मरणों से केन्द्रीय विधा बना दिया है। इस बारे में आपको क्या कहना है?

इस संबंध में मैं क्या कहूँ? संस्मरण विधा आज समकालीन लेखन की केन्द्रीय विधा बन गई हैं, इसमें संदेह नहीं। पर इसका सारा श्रेय मेरा ही नहीं है। काशीनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथ सिंह के संस्मरणों से इस विधा में जो खुलापन आया था, उससे पाठकों की एक मानसिकता बन गई थी। मुझे उस मानसिकता का लाभ मिला। किसी भी संस्मरणीय के केवल कृष्णपक्ष का उद्घाटन करना लक्ष्‍य नहीं है, बल्कि उसके व्यक्तित्व की संरचना के तानों-बानों और उसके परिवेश की सन्निधि में उसकी रचनात्मकता के छोटे-बड़े प्रसंगों के माध्यम से ‘स्कैनिंग’ मेरा अभीप्सित है। अपने संस्मरणों को रोचक और पठनीय बनाने के लिए रचनात्मक कल्पना का उपयोग तो मैंने किया है पर ‘फेकता’(fake) का नहीं। मेरे संस्मरणों में अनेक प्रसंग सेंधे भरने के लिए गाल्पनिक तो हो सकते हैं पर वे पूरी तरह काल्पनिक नहीं हैं। अपने संस्मरणों में मैं स्वयं को बचाकर नहीं चलता।

मैंने कभी डायरी नहीं लिखी। स्मृति के और पुराने पत्रों के सहारे ही लिखता हूँ। एकाध संस्मरण में जहाँ भ्रमवश दूसरों से सुने तथ्यों के सहारे मुझसे घटनाओं की पूर्वापरता में गड़बड़ी हुई है, पाठकों ने मुझे पकड़ लिया है, इसका अर्थ मैंने यही लगाया कि हिन्दी में सुधी और सावधान पाठकों की कमी नहीं है। असावधानीवश हुई इन चूकों को स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं हुआ। जैसे ‘विद्रोही’ के संदर्भ में कमलेश्‍वर ने या मुक्तिबोध के संदर्भ में ललित सुरजन ने या ‘वसुधा’ के अंतिम अंक के संबंध में भारत भारद्वाज ने मेरी त्रुटि की ओर ध्यान आकर्षित किया। मैं इनका कृतज्ञ हूँ। ये त्रुटियाँ किसी बदनीयती के कारण नहीं हुईं। संस्मृतों के संपूर्ण व्यक्तित्व या रचनाशीलता के नियामक तत्त्वों के मेरे निष्कर्षों पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। पर भूल तो भूल है।

अपने संस्मरणों पर मेरे पास हजारेक पत्र तो आए ही होंगे। टेलीफोन भी कम नहीं आए। लोग पाठकों के न होने का रोना बेवजह ही रोते हैं। अकेले रजनीश वाले संस्मरण पर ही मुझे सैकड़ों पत्र मिले और अभी तक मिल रहे हैं। देश से भी, विदेशों से भी। इन पत्रों के आधार पर मैंने एक श्रृंखला लिखने का मन बनाया है- संस्मरणों के पीछे क्या है? रजनीश के संस्मरण पर प्राप्त प्रतिक्रियाओं वाला संस्मरण तो लिखा भी जा चुका है- ‘रजनीश का दर्शन: आध्यात्मिक दाद खुजाने का मजा।’असल में संस्मरणों को संस्मृत का ही आईना नहीं होना चाहिए, उसे उसके परिवेश का भी अता-पता देना चाहिए। उसे प्रचलित जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता की भी जाँच पड़ताल करनी चाहिए। मेरे लिए संस्मरण विशिष्ट कालखंड का सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास है।

पिछले दिनों हिन्दी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में रसाल जी, अंचल जी और सुमन जी पर जिस तरह आपके संस्मरण छपे उससे आपके दुश्मनों की संख्या में जरूर इजाफा हुआ, लेकिन सच बात यह भी है कि आज हिन्दी की कोई भी पत्रिका आपके संस्मरण के बिना अधूरी लगती है। क्या अब आप पूर्णतः संस्मरण समर्पित हैं या और भी आपकी कोई योजना है?

आपके इस प्रश्‍न के उत्तर में मैं नसीम रामपुरी का एक शेर उद्धृत करना चाहता हूँ:

हार फूलों का मेरी कब्र पर खुद टूट पड़ा

देखते रह गए मुँह फेर के जाने वाले

ऐसा तो नहीं है कि मैं अब संस्मरण छोड़कर कुछ और नहीं लिखता, पर अब जो कुछ लिखता हूँ, वह संस्मरणमय हो उठता है। ‘तुम्हारा परसाई’ मेरी नव्यतम पुस्तक है जिसे मैंने परसाई जी के जीवन, व्यक्तित्व, परिवेश और व्यंग्यशीलता का संस्मरणात्मक आख्यान कहा है। ‘तुम्हारा परसाई’ पढ़कर एक नामी-गिरामी प्रकाशक ने मुझे लिखा कि मुक्तिबोध पर भी ऐसी पुस्तक मैं क्यों नहीं लिखता? मेरा उत्तर था, ऐसी पुस्तक लिखने के जितने धैर्य और समय की आवश्यकता है, वह अब मेरे पास नहीं है। हाँ, मुक्तिबोध जी के नागपुर के दिनों पर लिखने का मन जरूर बना रहा हूँ, ‘महागुरु मुक्तिबोध: जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर’ नाम से। यह जीवनलाल वर्मा ‘विद्रोही’, रामकृष्ण श्रीवास्तव, श्रीकांत वर्मा, शिवकुमार श्रीवास्तव, प्रमोद वर्मा, अनिल कुमार, सतीश चौबे, भाऊ समर्थ, हरिशंकर परसाई जैसे रचनाकारों के साहित्य, संस्मरणों और पत्रों के माध्यम से नागपुर के दिनों के मुक्तिबोध के जीवन, मानसिकता और रचनाशीलता को ‘डिस्कवर’ करने की संस्मरणमय कोशिश होगी। इस कोशिश के कुछ अंश आपने ‘हंस’, ‘वसुधा’, ‘साक्षात्कार’, ‘आशय’, ‘अन्यथा’, ‘परस्पर’ जैसी पत्रिकाओं में देखे भी होंगे। मालगुड़ी डेज़ की तरह अपने बचपन के दिनों का वृत्तांत भी मैं लिख रहा हूँ ‘बैकुंठपुर में बचपन’ के नाम से। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल के अभावों, संघर्षों, शोषण, प्रकृति से तादात्म्य और लोक की अदम्य जिजीविषा का आख्यान। यह भी संस्मरणात्मक ही होगा। फिर संस्मरणों की मेरी नई पुस्तक भी है-‘जो कहूँगा, सच कहूँगा’ नाम से। एक तरह से ‘लौटकर आना नहीं होगा’ का दूसरा खंड। इन संस्मरणों में मेरी शिकायत मानवीय दुर्बलता से उतनी नहीं, जितनी टुच्चे स्वार्थों और संकीर्ण सोच के कारण किए जाने वाले छल, छद्म और फरेब से है। कथनी और करनी में जितनी दूरी आज दिखाई पड़ रही है, उतनी शायद कभी नहीं रही। मानवीय गरिमा का क्षरण करने वाली किसी भी चतुराई या संकीर्णता से मुझे एलर्जी है। इस एलर्जी को प्रकट करना दुश्मनों की संख्या में इजाफा करना है। मेरे दुश्मन बढ़ रहे हैं अर्थात् मेरे संस्मरण ठीक जगह पर चोट कर रहे हैं। ‘मे देअर ट्राइव इनक्रीज़’।

अभी शब्द शिखरपत्रिका में आपके नाम लिखे कुछ महत्वपूर्ण लेखकों के पत्र छपे हैं। राजेन्द्र यादव के लिखे पत्रों से ऐसा आभास होता है कि आप पर लगातार दबाव डालकर हंसके लिए उन्होंने आपसे संस्मरण लिखवाए ही नहीं बल्कि आपको जेल भिजवाने का भी पूरा प्रबंध कर दिया है। वस्तुस्थिति क्या है, यह आप ही बताएँगे।

नहीं, राजेन्द्र यादव का मुझ पर संस्मरण के लिए कोई दबाव नहीं था। संस्मरण के पात्र का चुनाव सदैव मेरा ही रहा है, उसका ढंग भी। अब 70 साल की उम्र में कोई मुझ पर दबाव डालकर कुछ लिखा लेगा, यह प्रतीति ही मुझे हास्यास्पद लगती है। राजेन्द्र यादव अच्छे संपादक हैं, वे रचनाकार की सीमाओं को और क्षमताओं को पहचानते हैं। वे साहसी भी हैं, मुझे लगता है वे जितने बद नहीं, बदनाम उससे बहुत ज्यादा हैं। शायद बदनामी मनोवैज्ञानिक रूप से उनके लिए क्षतिपूर्ति उपकरण है। बदनामी और विवाद उन्हें अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिए अनिवार्य लगते हैं। कुछ लोग होते हैं जिन्हें चर्चा में बने रहना अच्छा लगता है। चर्चा और बदनामी उनके लिए लगभग पर्याय होते हैं। मैं आपको बताऊँ, ‘अंचल’ वाला संस्मरण तो कोई छापने को तैयार ही नहीं था। अंचल प्रगतिशील रह चुके थे, ‘लाल चूनर’वाले। अतः प्रगतिशील खेमे की पत्रिकाएँ अपने नायक का सिंदूर खुरचित रूप दिखाने को तैयार नहीं थीं। अंचल जी हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रह चुके थे। अतः सम्मेलन से संबद्ध पत्रिकाओं के अपने संकोच थे। अक्षय कुमार जैन ने तो मुझे साफ लिखा कि हिन्दी के पाठक अभी ऐसी मानसिकता के नहीं हो पाए हैं कि वे आपके ऐसे संस्मरण पचा सकें। ‘वागर्थ’ (उस जमाने की), ‘वाणी’, ‘अक्षरा’ जैसी निरामिष पत्रिकाओं से मैं क्या उम्मीद करता? अन्ततः मैंने वह राजेन्द्र यादव को भेज दिया। राजेन्द्र यादव से मेरी कोई आत्मीयता नहीं थी। जीवाजी विश्‍वविद्यालय में मैंने उनका उपन्यास नहीं लगाया था। वे मुझसे रुष्ट थे। सोचा, उनको भी खंगाल लिया जाए। हफ्ते भर में उनका पत्र आया, शीघ्र छपेगा। ‘अंचल’ छपने पर बड़ा बावेला मचा। अश्‍लील, क्रुयेल, अनैतिक, चरित्रहनन, खुद बड़े पाक बने फिरते हैं टाइप। जेल पहुँचाने का इंतजाम राजेन्द्र यादव ने नहीं, मेरे मित्रों ने किया। भोपाल के मेरे एक बहुत पुराने मित्र ने जो स्वयं को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से बड़ा तो नहीं, पर उनके समकक्ष मानते हैं, अंचल जी की बेटी को कानूनी कार्यवाही के लिए उकसाया। वह स्वयं अनुभवी है, उसके पति न्यायाधीश हैं। वे कानून के जानकार हैं, समझदार। अतः उन मित्र महोदय के बहकावे में नहीं आए। हाँ, एक अखिल मुहल्ला कीर्ति के धनी कवि ने जरूर मुझ पर मानहानि जैसा कुछ करने की धमकी दी। पर वे भी टांय-टांय फिस्स से ज्यादा नहीं बढ़ पाए। सुधीर पचौरी और विष्णु खरे जैसी सुधी और नीरक्षीर विवेकी विचारकों ने अश्‍लीलता की चलनी में मेरी छानबीन की, यह भूलकर कि सूप कहे तो कहे, चलनी क्या कहे जिसमें बहत्तर छेद। हिन्दी समाज में अश्‍लीलता की कबड्डी खेलना समीक्षकों का सबसे पसंदीदा खेल है। यार लोग चाहते हैं कि मैं मित्रों के कांधे पर चढ़कर नहीं, भूतपूर्व मित्रों के कांधों पर चढ़कर अंतिम यात्रा पर निकलूँ। यहाँ हर पड़ोसी, दूसरे की खिड़की में ताक-झाँक की फिराक़ में रहता है, अपनी खिड़की में मोटे-मोटे ‘ब्लाइंड’ डालकर। अपने संस्मरणों के हर शब्द के लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। किसी राजेन्द्र यादव के पाले में गेंद फेंकना बेईमानी भी है, अनैतिकता भी। वह कायरता तो है ही।

कहने की जरूरत नहीं कि आज हिन्दी में आपने संस्मरण विधा में नई जान फूंकी है और हर नया लेखक कान्तिकुमार जैन बनने की कोशिश में लगा है। आप इस स्थिति को किस रूप में देखते हैं।

आपके इस तरह के प्रश्‍न के उत्तर में मैं आपको एक लतीफा सुनाना चाहता हूँ- स्कूल में पढ़ने वाले और नए-नए तरुण हुए एक छात्र को उसके एक सहपाठी ने एक प्रेम प्रसंग के निपटारे के लिए द्वंद युद्ध में ललकारा। यह युद्ध तलवारों से लड़ा जाना था। ललकारित छात्र ने अपने पिताजी से कहा कि पिताजी, आप मेरे लिए एक लंबी तलवार बनवा दें जो सहपाठी की तलवार से छह इंच लंबी हो। पिताजी समझ गए। बोले- बेटे! यदि तुम्हें सामनेवाले को परास्त करना है तो छह इंच आगे बढ़कर मारो। इस तरह के युद्ध तलवार की लंबाई से नहीं, भीतर के हाँसले से लड़े जाते हैं। यदि किसी का मेरुदंड कमजोर हो तो न तलवार की लंबाई काम आती है, न पिताजी का संरक्षण। ऐसे लोगों को संस्मरण नहीं लिखने चाहिए।

मुझे लगता है कि आपके संस्मरणों के पीछे परसाई खड़े हैं आशीर्वाद की मुद्रा में, क्योंकि यह बात तो बिल्कुल साफ है कि आपके भीतर के आलोचक और परसाई के व्यंग्य की धार से आपके संस्मरण परवान चढ़े हैं। वैसे तो अपनी नई पुस्तक तुम्हारा परसाईमें विनम्रतापूर्वक यह कहकर कि तुम्हारा परसाई में मेरा क्या है, आपने अपना संकोच स्पष्ट कर दिया है फिर भी कुछ बचा रहता है परसाई से उऋण होने के लिए। इस प्रसंग में आप कुछ और जोड़ना चाहेंगे।

परसाई जी मेरे मित्र थे- आत्मीय और अंतरंग। उनका और मेरा लगभग चालीस वर्षों का साथ था। उनसे प्रेरित और प्रभावित न होना कठिन था। वे मुझसे बड़े थे, प्रतिष्ठित। फिर विचारधारा के स्तर पर भी मैं उनके बहुत निकट रहा हूँ। मुझे उनकी जो बात सबसे पसंद थी वह यह कि अपनी विचारधारा की वे अपने व्यंग्यों में घोषणा नहीं करते थे, उसे संवेदित होने देते थे। जैसे बिजली इंसुलेटेड वायर के भीतर ही भीतर दौड़ती रहती है, यहाँ से वहाँ तक। पर अंत में वह तार झटका भी देता है और प्रकाश भी। इस अर्थ में वे हिन्दी के अनेक वामपंथी लेखकों से विशिष्ट हैं। दुर्भाग्य है कि हिन्दी में संघवाद, विचारधारा और उसके संगठनों का प्राधान्य है। हर संगठन अपने आदमी की तमाम-तमाम चूकों, खामियों, विचलनों को ढाँकने-मूँदने में लगा है। ठीक राजनीतिक दलों की तरह। संप्रदायवाद, भ्रष्टाचार, छल, घोटालों, बेईमानियों का हम गुट निरपेक्ष या संगठन तटस्थ होकर विरोध नहीं करते। परसाई ऐसा करते थे। इसीलिए परसाई की मार चतुर्मुखी होती थी ओर उनका प्रभाव भी इसीलिए सब तरह के पाठकों पर था। ऐसे समय परसाई जी जैसे लेखकों को होना चाहिए। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता है, जिसमें अपने अवसान के समय सूर्य पूछता है कि मेरे बाद पृथ्वी का अंधकार कौन दूर करेगा। मिट्टी का एक दिया सामने आया। बोला- अपनी शक्ति भर मैं करूँगा। मैं मिट्टी का वही दिया हूँ।

तुम्हारा परसाईएक विलक्षण पुस्तक है जो काशीनाथ सिंह जी की पुस्तक काशी का अस्सीकी तरह धमाके से विधाओं की वर्जनाओं को तोड़ती है। संस्मरणात्मक भी यह है लेकिन उससे ज्यादा परसाई के जीवन और लेखन का मोनोग्राफ। क्या आपको ऐसा नहीं लगता?

विधाओं का वर्गीकरण तो साहित्य शास्त्रियों ने सुविधा के लिए कर रखा है। विधाओं की चौहद्दी में बँधने से रचनाकारों की क्रियेटिविटी बाधित होती है। जैसे बहुत घिसने से बासन का मुलम्मा छूट जाता है, वैसे ही पीढ़ी दर पीढ़ी काम में आते रहने से विधाओं की दीप्ति भी फीकी पड़ जाती है। समर्थ रचनाकार प्रत्येक युग में साहित्य के परिधान में कुछ न कुछ परिवर्तन करता है। वास्तव में विधाओं की कोई एलओसी नहीं होती। विधाओं का अतिक्रमण करने से साहित्य की थकान मिटती है, साहित्यकार की भी। ‘तुम्हारा परसाई’ को मैंने जानबूझकर परसाई के जीवन, व्यक्तित्व, परिवेश और व्यंग्यशीलता का संस्मरणात्मक आख्यान कहा है। इससे परसाई जी के जीवन के और लेखन के तानों-बानों को समझने में सुविधा होती है। मुझे संतोष है कि इधर हिन्दी के बहुत से लेखक संस्मरण लिखने में रुचि ले रहे हैं। हर पत्रिका के लिए संस्मरण लगभग अनिवार्य हो गए हैं। इन संस्मरणों से हिन्दी साहित्य के वास्तविक इतिहास का कच्चा माल सामने आ रहा है। हिन्दी साहित्य के समकालीन इतिहास की दूसरी परंपरा का सामने आना कई दृष्टियों से वांछनीय है।

अंतिम सवाल, मुझे ठीक से नहीं मालूम लेकिन मैं यह जानना चाहती हूँ कि आपकी धर्मपत्नी साधना जैन का आपके लेखन में कितना सहयोग है- आपकी स्मृति को रिफ्रेश करने में या संदर्भों को दुरुस्त करने में?

साधना मेरी पत्नी हैं पढ़ी-लिखीं, साहित्यिक समझ से भरपूर। घटनाओं के पूर्वापर क्रम की और व्यक्ति द्वारा उच्चरित कथन को ज्यों का त्यों दुहरा सकने की उनमें विलक्षण प्रतिभा है। उर्दू के शेर तो उन्हें ढेरों याद हैं। अपने संस्मरण लेखन में जहाँ कहीं मैं अटकता हूँ, स्मृति का मैगनेट साफ करने में वे मेरी सहायता करती हैं। वे मेरी जीवन-संगिनी हैं फलतः संस्मरण-संगिनी भी। 1962 में मुझसे विवाह के उपरांत वे मेरे सारे मित्रों को जानती हैं और उन्हें समझती भी हैं। मैं डायरी नहीं लिखता पर यदि लिखता तो पत्नी से छिपाकर नहीं रखता। मैं हिन्दी के उन लेखकों में नहीं हूँ जो अपनी पत्नी को दर्जा तीन पर स्थान देते हैं- पहले मेरा लेखन, फिर मेरे दोस्त, फिर तू। मैं उन लेखकों में भी नहीं हूँ जो यह कहकर गौरवान्वित होते हैं, लेखन तो मेरा अपना है, मेरी पत्नी का इसमें कोई योग नहीं है। ऐसे लोग या तो मुझे सामंती पुरुषाना अहंकार से ग्रस्त लगते हैं या अपनी पत्नी को निर्बुद्धि समझते हैं। संयोग से न तो मुझमें वैसा अहंकार है, न ही साधना वैसी निर्बुद्धि हैं।

अपने संस्मरणों में अपनी पत्नी का उल्लेख करने का परिणाम यह हुआ है कि बहुत से संस्मरण लेखक अपनी पत्नी को भी क़ाबिले उल्लेख समझने लगे हैं। एक ने तो अपनी पत्नी को करवाचौथी परिधि से निकालकर साहित्य का कोई पुरस्कार भी दिलवा दिया है। गुजरात की एक धर्मपत्नी ने जिनके पति अच्छे खासे साहित्यकार हैं और जिन्होंने प्रेम विवाह किया था, बड़े दुःख से मुझे लिखा- काश! मेरे पति भी अपने संस्मरणों में उसी सम्मान और स्नेह से मेरा उल्लेख करते जैसे आप अपनी पत्नी का करते हैं। उस उमर में जब साहित्यकार पति और कुछ नहीं कर सकता, उसे इतना तो करना ही चाहिए।

(भारतीय लेखक, अक्टूबर-दिसंबर, 05  से साभार)

पायनियर का हिन्दी संस्करण शुरू

लखनऊ: देश के सबसे पुराने अंग्रेजी अखबारों में एक पायनियर ने लखनऊ से हिन्दी संस्करण शुरू कर दिया है। पायनियर के प्रधान संपादक तथा सांसद चंदन मित्रा ने शनिवार शाम इस राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक के पहले हिन्दी संस्करण का विमोचन किया। अखबार का दाम 2 रुपये रखा गया है। रविवार को यह तीन रुपये का होगा। 16 पेज के अखबार में सिर्फ फ्रंट व बैक कलर है।
मित्रा ने संवाददाताओं से कहा कि हिंदी पाठकों की बढ़ती संख्या और प्रभाव को देखते हुए लखनऊ से ‘पायनियर’ का हिंदी संस्करण शुरू करने का निर्णय लिया, क्योंकि यह इस समाचार पत्र का मूल स्थान भी है। उन्होंने कहा कि हमारी योजना उत्तर प्रदेश के अलावा हिंदी भाषी उन राज्यों से भी हिंदी संस्करण शुरू करने की है, जहां से हमारे अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं। उन्‍होंने स्पष्ट किया कि हिंदी संस्करण अंग्रेजी संस्करण का अनुवादित रूप नहीं होगा, बल्कि इसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व होगा, जिसमें सुरुचिपूर्ण सामग्री के अलावा स्थापित लेखकों के आलेख भी प्रकाशित होंगे।
अंग्रेजी दैनिक ‘पायनियर’ का 146 वर्ष पुराना इतिहास है। इसका प्रकाशन सबसे पहले 1864 में इलाहाबाद से शुरू हुआ था। इसके सात संस्करण हैं, जिनमें से पांच 1998 में मित्रा के दायित्व संभालने के बाद शुरू हुए।

एक विनम्र राजसी व्यक्‍त‍ित्‍व : शेखर जोशी

आज के राजनेताओं के जीने के शाही अंदाज और बड़बोलेपन को देखकर यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि कभी बेहद विन्रम और सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले राजनेता भी होते थे। ऐसे ही एक राजनेता थे, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सम्पूर्णानन्द। वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी का संस्मरण-

राजनीति के शीर्षस्थ महापुरुषों से आत्मीय परिचय कभी नहीं रहा था। पारिवारिक स्तर पर ‘प्रीमियर सैप- पं. गोविन्द वल्लभ पन्तजी का यदा-कदा जिक्र होता, लेकिन लखनऊ या नैनीताल जाकर उनके दर्शन का सौभाग्य कभी नहीं मिला। हमारे निकटस्थ समाजसेवी और प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी पंडित हरीकृष्ण पाण्डेजी थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब कुछ व्यवस्थित हो पाए तो उन्होंने अल्मोड़ा- कौसानी मोटरमार्ग पर रणमण (रनबन) में अपने औषधालय की स्थापना की। वन्देमातरम् का संक्षिप्त रूप ‘बंदे’उनका प्रिय अभिवादन शब्द था। श्‍वेत खादी परिधान में ऊनी पंखी लपेटे औषधालय में सुगन्धित औषधियों के बीच हमेशा चार-छह आदमियों से घिरे हुए उन्हें देखना बहुत प्रीतिकर लगता था। पिताजी का उनसे गहरा भाईचारा था। पिताजी से ही जाना था कि कुली बेगार आंदोलन से लेकर सन् 42 के आन्दोलन तक पाण्डेजी ने कुमाऊँ की जनता को जागृत करने के लिए कितना संघर्ष किया, कुर्बानी दी और उनके परिवारजनों ने कैसी यातनाएँ सही थीं। लेकिन पाण्डेजी के प्रफुल्लित चेहरे और सौम्य व्यवहार से उनके भूमिगत जीवन के कष्टों, कारावास की यातनाओं को कोई आभास नहीं मिलता था। वास्तविक सेनानी की तरह उन्होंने इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को सहज स्वीकार किया था। अल्मोड़ा और बरेली जेलों में रहते हुए पाण्डेजी न केवल प्रदेश के प्रायः सभी शीर्षस्थ नेताओं के सम्पर्क में आए वरन उनके प्रीतिभाजन भी बन गए थे।

संभवतः ऐसी ही आत्मियता के कारण उस बार बाबू सम्पूर्णानन्दजी ने अपनी कौसानी यात्रा से लौटते हुए रणमण के औषधालय में पाण्डेजी का आतिथ्य स्वीकार किया था।

यह सन् 1947 की गर्मियों की बात है। मेरा अनुमान है तब सम्पूर्णानन्दजी उत्तर प्रदेश सरकार ने शिक्षामंत्री थे। उस घटना के एक दिन पूर्व में पाण्डेजी के औषधालय में पहुँचा था। मेरा रणमण जाना अकारण नहीं था। यह प्रसंग मेरा अपनी प्रारंभिक पाठशाला के लगाव से जुड़ा हुआ है। शायद यह केवल मेरा ही अनुभव नहीं है कि हम ग्रामिण अंचल के लोग जीवनभर अपनी प्रारंभिक शाला से जितनी आत्मीयता से जुड़े रहते हैं उतना अन्य किसी संस्था से नहीं जुड़ पाते। हमारी स्मृतियों में कलम-दवात-पाटी का वह प्रथम साक्षात्कार अपने श्रद्धास्पद गुरु, प्रिय सहपाठियों और विद्यालय की सामान्य इमारत और पेड़-पौधों के साथ हमेशा-हमेशा के लिए सुरक्षित रह जाता है। मेरा सौभाग्य था कि मेरे गुरुजनों ने भी मुझे उस पाठशाला से और गहरे जुड़ने के अवसर दिए। संभवतः मेरी कलात्मक रुचि ने उन्हें प्रभावित किया था। इस कारण उनका आग्रह रहता कि मैं प्रतिवर्ष गर्मियों की छुट्टियों में अन्य प्रदेश से घर आने पर अपनी शाला के लिए कोई चित्र या अलंकरण बनाया करूँ। यह मेरे लिए विशेष गर्व का विषय हुआ करता और प्रतिवर्ष मेरा यह प्रयास रहता कि किसी नए विषय पर अपनी कलम कूँची आजमाऊँ और अपनी भेंट शाला में प्रस्तुत करूँ।

उस बार किसी पत्रिका में एक रोचक कैलेंडर देखकर मैंने उसकी रंगबिरंगी अनुकृति तैयार की थी। अपनी भेंट को अधिक प्रभावकारी और टिकाऊ बनाने की इच्छा से मैं अपनी उस कलाकृति को फ्रेम में मढ़वाना चाहता था। गाँव में यह सुविधा सहज संभव नहीं थी। पिताजी ने मेरा मंतव्य जानकर मुझे सुझाव दिया कि औषधालय के गोदाम से प्लाइवुड का टुकड़ा लेकर मैं वहीं बढ़ई से उसे फ्रेम करवा लूँ।

पाण्डेजी मेरी गतिविधियों को ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने जिज्ञासा की तो मैंने अपनी चपलता में फ्रेम लग चुकने पर उन्हें अपनी कलाकृति दिखाने का वचन दिया। बढ़र्इ ने उस कलाकृति को चौखटे में बाँधकर अपनी कारीगरी से निश्‍चय ही उसके सौन्दर्य में अभिवृद्धि कर दी थी। मैंने सगर्व पाण्डेजी के सम्मुख अपना कृतित्व प्रदर्शित किया और उन्हें उसकी बारीकियाँ समझायीं तो पाण्डेजी ने स्नेह से मुझे चपतियाते हुए साधुवाद दिया। फिर जैसे उन्हें कुछ याद आ गया हो, वह बोले, ‘कल मंत्रीजी आ रहे हैं। उनके जलपान की व्यवस्था करनी है। तुम लोग शहरी बालक ठहरे, सलीके से कर लोगे। बसन्त, तारी को लेकर सुबह आ जाना। इस तस्वीर को आज यहीं रहने दो कल ले जाना।

मैं पाण्डेजी का आशय नहीं समझ पाया था लेकिन तब भी अपनी कलाकृति को वहीं रखकर घर चला आया। दूसरे दिन हम लोग प्रातःकाल ही मंत्रीजी को देखने की उत्सुकता में औषधालय पहुँच गए। मंत्रीजी के स्वागत की सामान्य तैयारियाँ हो रहीं थीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रारंभिक वर्षों में मंत्रियों, सांसदों को लेकर आज की-सी आपाधापी, चापलूसी और मुंह दिखौवल नहीं होती थी। ग्रामांचल के थोड़े बहुत सामाजिक लोग ही वहाँ उपस्थित थे। सड़क के मोड़ के उस पार जब किसी मोटरगाड़ी का हार्न सुनाई देता तो सबकी उत्सुक निगाहें उस ओर उठ जातीं। सुबह के समय गरुड़-सोमेश्‍वर से अल्मोड़ा-रानीखेत-काठगोदाम को आने वाली गाड़ियों का क्रम चालू था और हरबार वह उत्सुकता जन्म लेती और फिर भीड़ में निराशा छा जाती।

किंचित् प्रतीक्षा के बाद अंततः मंत्रीजी की लम्बी कार आ पहुँची। पीछे-पीछे और भी दो-तीन छोटी गाड़ियों का काफिल था।

किसी राजसी व्यक्ति को देखने का यह मेरा पहला अवसर था। मैं स्वीकार करता हूँ कि मंत्रीजी की जैसी भव्य कल्पना मैंने मन ही मन कर रखी थी प्रत्यक्षतः उन्हें वैसा न पाकर मैं निराश ही हुआ था। श्यामवर्ण, दीर्घकेशी सम्पूर्णानन्दजी सहजभाव से कार से उतरकर पाण्डेजी से स्नेहपूर्ण मिले। उनके साथ पारिवारिक महिलाएँ भी थीं लेकिन राजसी आभा से प्रभावित करने योग्य कोई व्यक्तित्व मुझे दिखाई नहीं दिया।

हम लोग चाय-नाश्ते की व्यवस्था में व्यस्त हो गए। बैठक में क्या कुछ वार्तालाप होता रहा इससे हम अनभिज्ञ ही रहे। संभवतः बीते दिनों के संस्मरण दुहराये गए हों, पुराने साथियों को याद किया गया हो या स्थानीय समस्याओं पर चर्चा हुई हो।

जलपान समाप्त हो चुकने पर अचानक मेरी पुकार हुई। मैं चौंक पड़ा। लेकिन पाण्डेजी के आदेश की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती थी। ससंकोच मैं बैठक में उपस्थित हुआ तो पाण्डेजी को सम्पूर्णानन्दजी से मेरा परिचय कराते हुए सुना, ‘यह बालक हमारे मित्र जोशीजी के चिरंजीव हैं। बहुत मेधावी हैं। इसी वर्ष राजपूताना से मैट्रिक की परीक्षा दी है। अब आगे इन्जिनियरिंग में जाना चाहते हैं। इनके लिए किसी प्रकार की छात्रावृत्ति की व्यवस्था हो सकती तो इनकी इच्छा पूरी हो जाती।’

फिर जैसे पाण्डेजी को कुछ याद आया हो, उन्होंने मुझे आदेश दिया, ‘वह चित्र जो तुम कल दिखा रहे थे, उसे लेकर तो आओ।’

अपनी कलाकृति को दूसरे कमरे से ले आने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं था। मैं निरीह भाव से अपनी कृति को लेकर उपस्थित हो गया।

पाण्डेजी ने फिर अतिशयोक्ति की, ‘बहुत मेधावी बालक है, यह अद्भुत चीज बनाई है इन्होंने।’

फिर आदेश हुआ, ‘हाँ, हाँ भाई, बताओ। कल तुमने मुझे कुछ बताया था कि इस तालिका से गणना करके कैसे पिछले सौ वर्ष के दिन-वार निकाल लेते हो।’

वह कैलेंडर यदि मेरी मौलिक सूझबूझ का परिणाम होता तो शायद मुझे वैसी घबराहट नहीं हुई होती। उधार ली हुई प्रतिभा और ऊपर से पाण्डेजी द्वारा अपनी अयाचित प्रशंसा सुनकर मैं असहज हो गया था। लेकिन सम्पूर्णानन्दजी ने बालसुलभ उत्सुकता से गणना की विधि के बारे में अपनी ओर से जिज्ञासा कर मेरा उत्साह बढ़ा दिया, ‘अच्छा, यह बताइए 15 अगस्त, 1947 को क्या वार था।’

मैंने गणना कर वार बताया तो सम्पूर्णानन्दजी ने सहर्ष उसकी पुष्टि की। फिर ऐसी ही किसी महत्त्वपूर्ण तिथि के बारे में जिज्ञासा हुई और मैंने गणना कर सही उत्तर दे दिया।

सम्पूर्णानन्दजी ने अपने व्यवहार से ऐसा प्रदर्शित किया जैसे मैंने कोई अनोखी विधि का आविष्कार कर उन्हें आश्‍चर्य में डाल दिया हो।

मुझे प्रोत्साहित करने के लिए ही जैसे उन्होंने अपनी कन्याओं को संबोधित कर कहा, ‘आप लोग देख रही हैं, कैसा अद़्भुत कैलेंडर इन्होंने बनाया है।’

पाण्डेजी ने मुझे संकेत किया कि मैं वह कलाकृति मंत्रीजी को उपहार स्वरूप भेंट कर दूँ। आज सोचता हूँ वह कितनी साधारण-सी वस्तु थी जिसे पाण्डेजी के आदेश पर मैंने सम्पूर्णानन्दजी को भेंट किया था। लेकिन उसका बड़प्पन था कि उन्होंने उसे एक अमूल्य निधि की भाँति हार्दिक स्वीकार के साथ ग्रहण किया और अपने किसी सहयोगी को उसे कार में सहेज कर रखने का आदेश भी तत्काल दे दिया।

वर्षों बाद, ज्ञान होने पर, सम्पूर्णानन्दजी के कृतित्व और विराट व्यक्तित्व का परिचय मिला। और तब यह सोचकर मुझे आश्‍चर्य होता है कि इतिहास, दर्शन, ज्योतिष और खगोलशास्त्र के महान मनीषी ने उस दिन रणमण में सड़क किनारे पाण्डेजी के औषधालय के छोटे से कक्ष में अपनी विनम्रता का कैसा परिचय दिया था।