Archive for: September 2010

हिंदी रुकने वाली नहीं है : अरविंद कुमार

अरविंद कुमार

हिंदी की अपरिहार्य और अनवरोध्य प्रगति के प्रति माधुरी तथा सर्वोत्तम रीडर्स जाइजेस्ट जैसी पत्रिकाओं के पूर्व संपादक तथा हिंदी के पहले शब्‍दकोश समांतर कोश के रचियता और शब्देश्वरी तथा पेंगुइन हिंदी-इंग्लिश/इंग्लिश-हिंदी थिसारस द्वारा भारत में कोशकारिता को नई दिशा देने वाले अरविंद कुमार। वह हिंदी को आधुनिक तकनीक से लैस करने के हिमायती हैँ और आजकल इंटरनेट पर पहले सुविशाल हिंदी-इंग्लिश-हिदी ई-कोश को अंतिम रूप देने में लगे हैं-

हिंदी के उग्रवादी समर्थक बेचैन हैं कि आज भी इंग्लिश का प्रयोग सरकार में और व्यवसाय मेँ लगभग सर्वव्यापी है। वे चाहते हैं कि इंग्लिश का प्रयोग बंद कर के हिंदी को सरकारी कामकाज की एकमात्र भाषा तत्काल बना दिया जाए। उनकी उतावली समझ में आती है, लेकिन यहाँ यह याद दिलाने की ज़रूरत है कि एक समय ऐसा भी था जब दक्षिण भारत के कुछ राज्य, विशेषकर तमिलनाडु, हिंदी की ऐसी उग्र माँगोँ के जवाब में भारत से अलग होकर अपना स्वतंत्र देश बनाने को तैयार थे। तब ‘हिंदी वीरों’ का कहना था कि चाहे तो तमिलनाडु अलग हो जाए, हमें हिंदी चाहिए… हर हाल, अभी, तत्काल… उस समय शीघ्र होने वाले संसद के चुनावोँ में उन्होँने नारा लगाया कि वोट केवल उस प्रत्याशी को देँ जो हिंदी को तत्काल लागू करने के पक्ष मेँ हो। सौभाग्य है कि भारत के लोग इतने नासमझ न थे और न आज हैं कि एकता भंग होने की शर्त पर हिंदी को लागू करना चाहेँ।

मैँ समझता हूँ कि पूरी राजनीतिक और भाषाई तैयारी के बिना हिंदी को सरकारी कामकाज की प्रथम भाषा बनाना लाभप्रद नहीं होगा। हिंदी पूरी तरह आने मेँ देर लग सकती है, पर प्रजातंत्र और राष्ट्रीय एकता के लिए यह देरी बरदाश्त करने लायक़ है। तब तक हमें चाहिए कि सरकारी कामकाज में हिंदी प्रचलन बढ़ाते रहें और साथ-साथ अपने आप को और हिंदी को आधुनिक तकनीक से लैस करते रहेँ।

इंग्लिश के विरोध की नीति हमेँ अपने ही लोगोँ से भी दूर कर सकती है। आम आदमी इंग्लिश सीखने पर आमादा है तो एक कारण यह है कि आज आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए इंग्लिश का ज्ञान आवश्यक है। दूसरा यह कि संसार का सारा ज्ञान समेटने के लिए देश को इंग्लिश में समर्थ बने रहना होगा, वरना हम कूपमंडूक रह जाएँगे। यही कारण था कि 19वीं सदी मेँ जब मैकाले की नीति के आघार पर इंग्लिश शिक्षा का अभियान चला था, तब राजा राम मोहन राय जैसे देशभक्त और समाज सुधारक ने उस का डट कर समर्थन किया था। वह देश को दक़ियानूसी मानसिकता से उबारना चाहते थे। राममोहन राय ने कहा था, ‘एक दिन इंग्लिश पूरी तरह भारतीय बन जाएगी और हमारे बौद्धिक सामाजिक विकास का साधन।’ स्वामी विवेकानंद ने भी अमरीका में भारतीय संस्कृति का बिगुल इंग्लिश के माध्यम से ही फूँका था।

इसके माने यह नहीँ हैँ कि आज हम लोग हिंदी का महत्त्व नहीँ जानते या हिंदी की प्रगति और विकास रुक गया है या रुक जाएगा। मैं समझता हूँ कि हिंदी के विकास का राकेट नई तेज़ी से उठता रहेगा। हिंदी अब रुकने वाली नहीं है, हिंदी रुकेगी नहीं। कारण है हिंदी बोलने समझने वालोँ की भारी तादाद और उन के भीतर की उत्कट आग।

भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों का तथ्याधारित अनुमान हिंदी प्रेमियों के लिए उत्साहप्रद है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की जो चंद भाषाएँ होंगी उन में हिंदी अग्रणी होगी।

संसार में 60 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मारीशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की कुछ जनता हिंदी बोलती है। अमरीकी, यूरोपीय महाद्वीप और आस्ट्रेलिया आदि देशोँ में गए हमारे तथाकथित एनआरआई कमाएँ चाहे इंग्लिश के बल पर, लेकिन उनका भारतीय संस्कृति और हिंदी के प्रति प्रेम बढ़ा ही है। कई बार तो लगता है कि वे हिंदी के सब से कट्टर समर्थक हैँ।

अकेले भारत को ही लें तो हिंदी की हालत निराशाजनक नहीं, बल्कि अच्छी है। आम आदमी के समर्थन के बल पर ही पूरे भारत में 10 शीर्ष दैनिकों में हिंदी के पाँच हैँ (दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका),  तो इंग्लिश का कुल एक (टाइम्स आफ़ इंडिया) और मलयालम के दो (मलयालम मनोरमा और मातृभूमि), मराठी का एक (लोकमत), तमिल का एक (दैनिक थंती)। इसी प्रकार सब से ज़्यादा बिकने वाली पत्रिकाओँ में हिंदी की पाँच, तमिल की तीन, मलयालम की एक है, जबकि इंग्लिश की कुल एक पत्रिका है। हिंदी के टीवी मनोरंजन चैनल न केवल भारत मेँ बल्कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में भी लोकप्रिय हैं और हिंदी के साथ-साथ हमारे सामाजिक चिंतन का प्रसार कर रहे हैँ।

जहाँ तक हिंदी समाचार चैनलोँ का सवाल है इंग्लिश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित न्यूज़ वीकली इकोनमिस्ट ने 14 अगस्त 2010 अंक मेँ पृष्ठ 12 पर ­‘इंटरनेशल ब्राडकास्टिंग’ पर लिखते हुए कहा है कि अमरीका और ब्रिटेन के विदेशी भाषाओँ में समाचार प्रसारित करने वाले संस्थानोँ को अपना धन सोच’समझ कर बरबाद करना चाहिए। उदाहरण के लिए भारत की अपनी भाषाओँ के न्यूज़ चैनलोँ से प्रतियोगिता करना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है।

हमारी ताक़त है हमारी तादाद…

यह परिणाम है हमारी जनशक्ति का। यही हिंदी का बल है। बहुत साल नहीं हुए जब हम अपनी विशाल आबादी को अभिशाप मानते थे। आज यह हमारी कर्मशक्ति मानी जाती है। भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने सही कहा है: ‘अधिक आबादी अपने आप में कोई समस्या नहीं है, समस्या है उस की ज़रूरियात को पूरा न कर पाना। अधिक आबादी का मतलब है अधिक सामान की, उत्पाद की माँग। अगर लोगों के पास क्रय क्षमता है तो हर चीज़ की माँग बढ़ती है।’ आज हमारे समृद्ध मध्य वर्ग की संख्या अमरीका की कुल आबादी जितनी है। पिछले दिनोँ के विश्वव्यापी आर्थिक संकट को भारत हँसते खेलते झेल गया तो उस का एक से बड़ा कारण यही था कि हमारे उद्योगोँ के उत्पाद मात्र निर्यात पर आधारित नहीँ हैँ। हमारी अपनी खपत उन्हें ताक़त देती है और बढ़ाती है।

इसे हिंदी भाषियोँ की और विकसित देशोँ की जनसंख्या के अनुपातोँ के साथ साथ सामाजिक रुझानोँ को देखते हुए समझना होगा। दुनिया की कुल आबादी आज लगभग चार अरब है। इसमेँ से हिंदुस्तान और चीन के पास 60 प्रतिशत लोग हैँ। कुल यूरोप की आबादी है 73-74 करोड़, उत्तर अमरीका की आबादी है 50 करोड़ के आसपास। सन 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब से ऊपर हो जाने की संभावना है। इसमेँ से यूरोप और अमरीका जैसे विकसित देशों की आबादी बूढ़ी होती जा रही है। (आबादी बूढ़े होने का मतलब है किसी देश की कुल जनसंख्या मेँ बूढे लोगोँ का अनुपात अधिक हो जाना।) चुनावी नारे के तौर पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा कुछ भी कहें, बुढाती आबादी के कारण उन्हेँ अपने यहाँ या अपने लिए काम करने वालोँ को विवश हो कर, मजबूरन या तो बाहर वालोँ को आयात करना होगा या अपना काम विदेशों में करवाना होगा।

इस संदर्भ मेँ संसार की सब से बड़ी साफ़्टवेअर कंपनी इनफ़ोसिस के एक संस्थापक नीलकनी की राय विचारणीय है। तथ्यों के आधार पर उनका कहना है कि ‘किसी देश में युवाओँ की संख्या जितनी ज़्यादा होती है, उस देश में उतने ही अधिक काम करने वाले होते हैँ और उतने ही अधिक नए विचार पनपते हैं। तथ्य यह है कि किसी ज़माने का बूढ़ा भारत आज संसार में सबसे अधिक युवा जनसंख्या वाला देश बन गया है। इस का फ़ायदा हमें 2050 तक मिलता रहेगा। स्वयं भारत के भीतर जनसंख्या आकलन के आधार पर 2025 मेँ हिंदी पट्टी की उम्र औसतन 26 वर्ष होगी और दक्षिण की 34 साल।’

अब आप भाषा के संदर्भ में इस का मतलब लगाइए। इन जवानों में से अधिकांश हिंदी पट्टी के छोटे शहरोँ और गाँवोँ में होंगे। उन की मानसिकता मुंबई, दिल्ली, गुड़गाँव के लोगोँ से कुछ भिन्न होगी। उनके पास अपनी स्थानीय जीवन शैली और बोली होगी।

नई पहलों के चलते हमारे तीव्र विकास के जो रास्ते खुल रहे हैँ (जैसे सबके लिए शिक्षा का अभियान), उनका परिणाम होगा असली भारत को, हमारे गाँवोँ को, सशक्त कर के देश को आगे बढ़ाना। आगे बढ़ने के लिए हिंदी वालोँ के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत है अपने को नई तकनीकी दुनिया के साँचे मेँ ढालना, सूचना प्रौद्योगिकी में समर्थ बनना।

यही है हमारी नई दिशा। कंप्यूटर और इंटरनेट ने पिछ्ले वर्षों मेँ विश्व मेँ सूचना क्रांति ला दी है। आज कोई भी भाषा कंप्यूटर तथा अन्य इलैक्ट्रोनिक उपकरणों से दूर रह कर पनप नहीं सकती। नई तकनीक में महारत किसी भी काल में देशोँ को सर्वोच्च शक्ति प्रदान करती है। इसमेँ हम पीछे हैँ भी नहीँ… भारत और हिंदी वाले इस क्षेत्र मेँ अपना सिक्का जमा चुके हैँ।

इस समय हिंदी में वैबसाइटेँ, चिट्ठे, ईमेल, चैट, खोज, ऐसऐमऐस तथा अन्य हिंदी सामग्री उपलब्ध हैं। नित नए कम्प्यूटिंग उपकरण आते जा रहे हैं। इनके बारे में जानकारी दे कर लोगों मेँ  जागरूकता पैदा करने की ज़रूरत है ताकि अधिकाधिक लोग कंप्यूटर पर हिंदी का प्रयोग करते हुए अपना, देश का, हिंदी का और समाज का विकास करें।

हमेँ यह सोच कर नहीँ चलना चाहिए कि गाँव का आदमी नई तकनीक अपनाना नहीं चाहता। ताज़ा आँकड़ोँ से यह बात सिद्ध हो जाती है। गाँवोँ मेँ रोज़गार के नए से नए अवसर खुल रहे हैँ। शहर अपना माल गाँवोँ में बेचने को उतावला है। गाँव अब ई-विलेज हो चला है। तेरह प्रतिशत लोग इंटरनेट का उपयोग खेती की नई जानकारी जानने के लिए करते हैँ। यह तथ्य है कि ‘गाँवोँ में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालोँ का आंकड़ा 54 लाख पर पहुँच जाएगा।

इसी प्रकार मोबाइल फ़ोन दूरदराज़ इलाक़ोँ के लिए वरदान हो कर आया है। उस ने कामगारोँ कारीगरोँ को दलालोँ से मुक्त कर दिया है। यह उनका चलता फिरता दफ़्तर बन गया है और शिक्षा का माध्यम। अकेले जुलाई 2010 में 1 करोड़ सत्तर लाख नए मोबाइल ग्राहक बने और देश में मोबाइलोँ की कुल संख्या चौबीस करोड़ हो गई। अब ऐसे फ़ोनोँ का इस्तेमाल कृषि काल सैंटरों से नि:शुल्‍क  जानकारी पाने के लिए, उपज के नवीनतम भाव जानने के लिए किया जाता है। यह जानकारी पाने वाले लोगोँ में हिंदी भाषी प्रमुख हैँ। उनकी सहायता के लिए अब मोबाइलों पर इंग्लिश के कुंजी पटल की ही तरह हिंदी का कुंजी पटल भी उपलब्ध हो गया है।

हिंदी वालोँ और गाँवोँ की बढ़ती क्रय शक्ति का ही फल है जो टीवी संचालक कंपनियाँ इंग्लिश कार्यक्रमोँ पर अपनी नैया खेना चाहती थीँ, वे पूरी तरह भारतीय भाषाओँ को समर्पित हैँ। आप देखेंगे कि टीवी पर हिंदी के मनोरंजन कार्यक्रमोँ के पात्र अब ग्रामीण या क़स्बाती होते जा रहे हैँ।

सरकारी कामकाज की बात करेँ तो पुणेँ में प्रख्यात सरकारी संस्थान सी-डैक कंप्यूटर पर हिंदी के उपयोग के लिए तरह तरह के उपकरण और प्रोग्राम विकसित करने मेँ रत है। अनेक सरकारी विभागोँ की निजी तकनीकी शब्दावली को समो कर उन मंत्रालयोँ के अधिकारियोँ की सहायता के लिए मशीनी अनुवाद के उपकरण तैयार हो चुके हैँ। अभी हाल सी-डैक ने ‘श्रुतलेखन’ नाम की नई विधि विकसित की है जिस के सहारे बोली गई हिंदी को लिपि में परिवर्तित करना संभव हो गया है। जो सरकारी अधिकारी देवनागरी लिखने या टाइप करने में अक्षम हैं, अब वे इसकी सहायता से अपनी टिप्पणियाँ या आदेश हिंदी में लिख सकेंगे। यही नहीं इस की सहायता से हिंदी में लिखित कंप्यूटर सामग्री तथा ऐसऐमऐस आदि को सुना भी जा सकेगा।

निस्संदेह एक संपूर्ण क्रांति हो रही है।

चित्रा मुद़गल को का उदयराज सिंह स्मृति सम्‍मान

नई दिल्‍ली : पटना से पांच दशक से अधिक समय से प्रकाशित हो रही साहित्यिक पत्रिका नई धारा का वर्ष 2010 का उदयराज सिंह स्मृति सम्‍मान साहित्यकार चित्रा मुद्गल को प्रदान किया जाएगा। नई धारा रचना सम्‍मान तीन साहित्यकारों भगवतीशरण मिश्र,  गोपाल राय और जियालाल आर्य को प्रदान किया जाएगा। उदयराज सिंह स्मृति सम्‍मान के तहत एक लाख रुपय, सम्‍मान पत्र और स्मृति चिह्न प्रदान किया जाएगा। नई धारा रचना सम्‍मान के तहत 25 – 25 हजार रुपये प्रदान किए जाएंगे।

प्रख्‍यात साहित्यकार हिमांशु जोशी,  डा शेरजंग गर्ग और नवीन चंद्र लोहनी के निर्णायक मंडल ने पुरस्कारों के लिए साहित्यकारों का चयन किया।

भगत सिंह : सिनेमाई छवि से परे सच्‍चाई : मीरा विश्‍वनाथन

एक साजिश के तहत भगत सिंह की बॉलीवुड अभिनेता जैसी छवि बनाई जा रही है, जिसका मकसद केवल पिस्‍तौल लेकर अंग्रेजों को मार भगाना था। भगत सिंह की राजनीतिक सोच, जीवन संघर्ष और आज के समय में प्रासंगिकता को लेकर वरिष्‍ठ पत्रकार और लेखिका मीरा विश्‍वनाथन का आलेख-

भगत सिंह को फांसी देने वाले साम्राज्य का सूरज कब का डूब चुका है, लेकिन भगत सिंह की विरासत आज भी जिंदा है। हम आज जिस तरह की दुनिया में रह रहे हैं, जिस तरह के सवालों से जूझ रहे हैं, उसमें उनका काम और उनके विचार और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं।

पिछले कुछ सालों में आश्चर्यजनक रूप से भगतसिंह के प्रति लोगों का नए किस्‍म का रूझान देखने को मिल रहा है। संसद ने उन्हें एक मूर्ति के जरिए ‘अमर’ करने की कोशिश की है, जिसमें वे पगड़ी पहने हुए हैं। संघ परिवार उन्हें आक्रामक राष्ट्रवाद का प्रतिनिधि मानता है, ओपीनियन पोल वाले उन्हें गांधी से भी अधिक महान बता रहे हैं। और भला फिल्मों की भरमार को कैसे भूला जा सकता है- कुल पांच फिल्में बनीं। ये सभी फिल्‍में भगतसिंह के जीवन और उनकी शहादत के प्रति समर्पित थीं, जिनमें बॉबी देओल और सनी देओल जैसे अभिनेता व्यर्थ ही अपने शरीर का प्रदर्शन करते हुए देखे गए।

यह पूरा उद्योग भगतसिंह की छवि को भुनाने के लिए आगे आ गया है। कुछ वैसे ही जैसे कि चे ग्वेरा पैकेज करके बेचे जाने वाले उत्पाद में बदल दिए गए। एक तरह का राजनीतिक स्मृति-भ्रंश है जो इस तरह की पैकेजिंग का साथ देता है । भगत सिंह के विचारों को तिरोहित कर उनकी राजनीति को महज एक प्रतीक में बदला जा रहा है। यहां भगतसिंह की शहादत ‘सर्वोच्च बलिदान’ के मूर्त रूप के बतौर मानी जाती है, लेकिन उनके जीवन संघर्ष और उनकी राजनीति को महज एक टोकन के रूप में सीमित किया जा रहा है। इन फिल्‍मों से भगतसिंह की छवि एक ऐसे बॉलीवुड अभिनेता की बनती है जो सरसों के खेतों में ‘रंग दे बसंती’ गा रहा है, फिर पिस्तौल लेकर एक अंग्रेज को मार देता है और ‘भारत माता’ की सेवा में स्वयं फांसी पर लटक जाता है। एक क्रांतिकारी जीवन का महान संघर्ष,  उसका साहस और बलिदान, राजनीतिक शिक्षा की कष्ट-साध्य प्रक्रिया सब कुछ मीडिया द्वारा बनायी सिनेमाई छवि में धुल जाता है।

सिनेमा के जरिए भगत सिंह के जो पाठ प्रस्तुत किए गए उनमें सबसे ज्यादा अपढ़ (सबसे ज्यादा सफल होने के बावजूद) पाठ शायद राकेश ओम प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘रंग दे बसंती’ का था। संक्षेप में कहें तो फिल्म की कहानी इस तरह है- एक संघर्षशील ब्रिटिश फिल्म निर्माता को अपने दादा की डायरी मिलती है, जिसमें भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, अशपफाकउल्ला और रामप्रसाद बिस्मिल के जीवन, उनके साहसिक कारनामों और उनकी शहादतों का ब्यौरा है। वह इन क्रांतिकारियों पर फिल्म बनाने के निश्चय के साथ भारत आती है। यहां आकर वह पांच नौजवानों के एक ग्रुप से मिलती है, जो एकदम ही बेपरवाह किस्म के हैं। अपनी फिल्म में काम करने के लिए प्रोत्साहित करने के क्रम में वह डायरी में उल्‍लेखित क्रांतिकारियों के जीवन से उनका परिचय कराती है। इसी दौरान उनके एक दोस्त की मिग हादसे में मौत हो जाती है। इस प्रकिय्रा से गुजरते हुए नौजवान इस समझ पर पहुंचते हैं कि सरकार और भ्रष्‍ट नेता भारत की सभी समस्‍याओं की जड् हैं।

परिणामस्वरूप अपने दोस्त की मौत का बदला लेने के लिए वे रक्षा मंत्री की हत्या कर देते हैं। साथ ही एक रक्षा-उपकरणों के एक भ्रष्‍ट डीलर की भी हत्या कर देते हैं, जो इन पांचों में से ही एक का पिता है। इन हत्याओं का औचित्य बताने के लिए वे ऑल इण्डिया रेडियो के स्टेशन पर कब्जा कर लेते हैं, लेकिन कमांडो उन्हें मार गिराते हैं। वैसे इससे पहले वे सच से पर्दा उठा देते हैं। इन पांचों ‘शहीदों’ की मृत्यु को मीडिया मुद्दा बनाता है और आखिरी दृश्य में एक ‘युवा भारत’ दिखाया गया है, जो इन मौतों के चलते गुस्से में है और कुछ करना चाहता है।

रंग दे बसंती की तारीफ इसके ताजे लुक और ‘युवा अपील’ के चलते हुई। फिल्म के रिलीज होने के महीनों पहले इसका प्रचार हुआ और बहुत से ब्रांड इसके साथ जुड़े, साथ ही इसे गणतंत्र दिवस के दिन रिलीज किया गया था। फिल्म के रिलीज के बाद विभिन्न पुरस्कारों और उनके लिए नामित किए जाने का सिलसिला चला, जिसमें इस फिल्म को आधिकारिक रूप से भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए नामित किया जाना भी शामिल था। जिस चीज ने और भी ध्यान खींचा, वह थी मिडिया द्वारा पैदा की गई बहस कि इस फिल्म ने युवा सक्रियता के नए द्वार खोल दिए हैं। चाहे जेसिका लाल या प्रियदर्शिनी मट्टू के लिए न्याय की मांग करते हुए निकलने वाले मोमबत्ती जुलूस हों या फिर आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे मेडिकल कॉलेजों के छात्रा, इन सबको मीडिया ने ‘आर.डी.बी. इफेक्ट’ के रूप में दिखाने की कोशिश की। रंग दे बसंती को इस रूप में प्रस्तुत किया गया कि मानों इसने जनपहलकदमी का नया द्वारा खेला दिया हो।

लेकिन इस फिल्म या इस तरह की अन्य फिल्मों की समस्या यह है कि ये भगतसिंह और उनके साथियों के बारे में जितना बताती हैं, उससे अधिक छिपाती हैं। ये उनकी राजनीति के बारे में कुछ नहीं कहती, सिर्फ उन्हें राष्ट्रवादी के रूप में दिखाती है, जो ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने से अधिक कुछ नहीं चाहते थे। ये फिल्‍में मध्यवर्ग के भ्रष्टाचार के बारे में गुस्से को सामने लाते हुए यह सुझाती हैं कि यदि भ्रष्ट नेताओं को मार दिया जाए तो देश में सब कुछ दुरुस्त हो जाएगा। भूमण्डलीकृत दौर के लिए कॉरपोरेट द्वारा पैकेज किया हुआ ‘विरोध’ इस बात से पूरी तरह इनकार करता है कि किसी तरह के ढांचागत परिवर्तन की आवश्यकता है। भगतसिंह के साम्राज्यवाद या सांप्रदायिक एजेंडे के बारे में क्या विचार थे, जाति आधारित उत्‍पीड्न के बारे में वे क्या सोचते थे, देश के किसानों और मजदूरों को वे कितना महत्व देते थे, यह सब गायब है। उनकी राजनीति के मार्क्सवादी पहलू को सिरे से खामोश कर दिया गया है।

जिस तरह की सामान्य धरणा बनाई गई है, उसमें बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि भगतसिंह की राजनीति कितनी विस्तृत और मुखर थी। उनकी जेल नोटबुक में बहुत से लेखकों के पैराग्रापफ नोट किए गए हैं। इनमें मार्क्स-एंगेल्स से लेकर रूसो, देकार्त, स्पिनोजा, मार्क ट्वेन, रवीन्द्रनाथ, दोस्तोयेव्स्की और अरस्तू जैसे लेखकों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। यह लिस्ट काफी विस्तृत है। किताबों के लिए उनकी भूख तब और भी बढ़ गई, जब वे जेल में थे और अपनी तयशुदा मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। फांसी के लिए ले जाए जाने के कुछ मिनट पहले भी वे लेनिन की किताब पढ़ रहे थे। पंजाब के क्रांतिकारी कवि पाश ने ठीक ही लिखा है कि भगतसिंह ने लेनिन की किताब को जहां पढ़ना छोड़ा था, उसके आगे के पृष्ठों को पढ़ने की जिम्मेदारी आज के भारत के नौजवानों की है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भगत सिंह के राष्ट्रवाद में छात्रों और नौजवानों को केन्द्रीय भूमिका अदा करनी थी। लेकिन हिंसा की अराजक कार्रवाइयों में उतर पड़ने की जगह उन्होंने अपील की कि छात्रा-नौजवान जनता के बीच और गहरे पैठें, वे मजदूरों की कॉलोनियों और ग्रामीण गरीबों की झोपड़ियों में जाएं। यही वह परंपरा थी जिसने जे.एन.यू. छात्रासंघ के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर प्रसाद को क्रांतिकारी जीवन के लिए प्रेरित किया, जो भाकपा (माले) के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के बतौर अपने घर सिवान वापस लौटे, जहां माफिया डॉन और राजद के सांसद शहाबुद्दीन के लोगों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई। (कुछ समय से हम सुन रहे हैं कि महेश भट्ट चंद्रशेखर प्रसाद पर एक फिल्म बनाने वाले हैं। इसका तो सिर्फ कयास ही लगाया जा सकता है कि बॉलीवुड उनकी राजनीति में से किस चीज को दिखाना चाहेगा।)

भगतसिंह के शुरुआती लेखन में अराजकता और क्रांतिकारी आतंकवाद की तरफ थोड़ा झुकाव है, लेकिन उन्होंने बहुत जल्दी मार्क्सवाद के क्रांतिकारी सारतत्व को आत्मसात कर लिया। उन्होंने एक संगठित कम्युनिस्ट पार्टी की आवश्यकता पर जोर दिया और स्वतंत्रता व समाजवाद के लिए कम्युनिस्ट राजनीति की केन्द्रीयता पर बल दिया। संघर्ष के सभी रूपों के संयोजन की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसविदा दस्तावेज तैयार किया जिसमें चीजों के प्रति सारगर्भित और तर्कसंगत रुख लिया गया है। गांधीवादी संघर्ष के जरिए जनता की बड़े पैमाने पर गोलबंदी की प्रशंसा करते हुए भी उन्होंने कांग्रेस के वर्ग चरित्र का स्पष्ट किया और मजदूरों के राजनीतिकरण की कोशिश के गांधीवादी विरोध के प्रति आगाह किया था। उन्होंने ‘भूरे साहबों’ के राज्य की स्थापना के खतरे के प्रति सचेत करते हुए कहा कि यह केवल साम्राज्यवादी शासन की, एक चेहरे से दूसरे चेहरे की अदलाबदली होगी, जहां बहुसंख्यक भारतीयों, मजदूरों और किसानों का शोषण जारी रहेगा।

आज के दौर में भगतसिंह का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब हम देखते हैं कि हमारे भारत के शासकों ने खुद को साम्राज्यवादी और नव-उदारवादी राजनीति की सेवा में अर्पित कर दिया है। हमारी संप्रभुता विदेशी हितों के समक्ष गिरवी रख दी गई है, बड़े-बड़े भूखण्ड कर-मुक्त करके कारपोरेट लूट के लिए भेंट कर दिए गए हैं। जब लोग हक मांगते हैं राज्य अपनी आंखें मूंद लेता है, और जब विरोध करते हैं तो राज्‍य द्वारा लोगों पर कहर बरपाया जाता है। युद़ध की सी स्थिति घोषित कर दी गई है जो ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से जारी है, जिसके निशाने पर हमारे देश के सबसे गरीब लोग, दलित और आदिवासी हैं। आज भारतीय राज्य विरोध का झंडा उठाने वालों को उसी निर्ममता से गोलियों का निशाना बना रहा है, जैसे उनके उपनिवेशवादी पूर्वज करते थे। ऐसे में हमें भगतसिंह की बातें याद आती हैं। अपनी फांसी के तीन दिन पहले उन्होंने पंजाब के गवर्नर को पत्रा में लिखा था कि-

हम यह कहना चाहते हैं कि युद़ध छिडा हुआ है और यह लडाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शाक्तिशाली व्‍यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है- चाहे ऐसे अंग्रेज पूंजीपति हों… या शुद़ध भारतीय पूंजीपतियों द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो, तो भी इस स्थिति में कोई अंतर नहीं पडता।… परंतु युद़ध चलता रहेगा। हो सकता है कि यह लडाई भिन्‍न–भिन्‍न दशाओं में भिन्‍न–भिन्‍न स्‍वरूप ग्रहण करे। किसी समय यह लडाई प्रकट रूप ले ले, किसी समय गुप्‍त रूप से चलती रहे… । यह आपकी इच्‍छा है कि आप चाहे लडाई के जिस रूप को चुन लें, परंतु यह लडाई जारी रहेगी।… यह युद़ध तब तक समाप्‍त नहीं होगा, जब तक कि समाज का वर्तमान ढांचा समाप्‍त नहीं होता, समाजवादी गणराज्‍य स्‍थापित नहीं होता…। तभी शोषण के सभी रूपों का खात्‍मा होगा और वास्‍तविक और स्‍थाई शांति के युग में मानवता प्रवेश करेगी।

भगत सिंह और उनके साथियों के बारे में बात करना वस्‍तुत इतिहास पर पुनः दावेदारी और उसे अपना बनाने का मसला है। फिल्मों से परे, संसद में प्रतिमा से परे और भारत के शासक वर्ग द्वारा भगत सिंह की विरासत को हजम कर जाने की कोशिशों से भी परे, भगत सिंह की याद जिंदा है। यह कय़यूर और पुन्नप्रा वायलार में जिंदा है। तेभागा, तेलंगाना, नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम्, भोजपुर और नंदीग्राम में जिंदा है। भगत सिंह हमारे समय के संघर्षों में जिंदा हैं जहां ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ का नारा आज भी गूंजता है।

(जनमत, सितंबर, 2010 से साभार)

इधर हिंदी नई चाल में ढल रही है : कांति कुमार जैन

हर कोई हिंदी को लेकर चिंतित है। हिंदी क्षेत्र में कई विश्वविद्यालय और संस्‍थाएं हैं। इन सबके बाद भी हिंदी का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। इन कारणों और समाधान पर चर्चित संस्‍मरणकार कांतिकुमार जैन का आलेख-

जब मैं पिछले दिनों की प्रसिद्ध फिल्म लगे रहो मुन्ना भाई देखकर लौट रहा था तो मेरे 20 वर्ष नाती ने अचानक मुझसे पूछा- नाना जी, मैंने कक्षा में गांधीवाद के बारे में तो पढ़ा था, पर यह गांधीगिरी, लगता है, कोई नई बात है। मुझे कहना पड़ा कि गांधीगिरी बिल्कुल नई बात है और देश में बढ़ती हुई मर्यादाहीनता, धृष्टता, सैद्धांतिक घपलेबाजी और वास्तविक प्रतिरोध न कर प्रतिरोध का स्वांग करने वालों को संवेदित करने जैसी चीज है। जिन शब्दों में गिरी लग जाता है, वे कुछ हीनता व्यंजक अर्थ देने लगते हैं। जैसे- बाबूगिरी, चमचागिरी, गुंडागिरी। मुझे भारतेंदु हरिश्‍़चंद के उस कथन की भी याद आई, जिसमें आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व उन्होंने घोषित किया था कि हिन्दी नई चाल में ढली। अंग्रेज भारत में धर्म, ध्वजा और धुरी के साथ आये थे। इन तीनों का प्रभाव हिन्दी के स्वरूप पर भी पड़ा था। धर्म के प्रचार के लिए उन्होंने बाइबिल का अनुवाद किया और उसे मुद्रण यंत्रों से छपवाकर जनता के बीच वितरित किया, ध्वजा के लिए उन्होंने प्रशासन तंत्र तैयार किया और धुरी अर्थात् तराजू के लिए भारत में अंग्रेजी माल का नया बाजार विकसित किया। इन तीनों के साथ हिन्दी क्षेत्र में ढेरों अंग्रेजी शब्द आये जो आज तक प्रचलित हैं।

1947 में स्वतंत्रता के साथ ही हिन्दी पुन: नई चाल में ढली- लोकतंत्र, संविधान, विकास कार्य, शिक्षा का प्रचार-प्रसार, तकनीकी जैसे कारणों से हिन्दी व्यापक हुई, उसका शब्दकोश समृद्ध हुआ। नये-नये स्रोतों से आने वाले शब्द हिन्दी भाषी जनता की जुबान पर चढ़ गये। इन शब्दों में विदेशी शब्द थे, बोलियों के शब्द थे, गढ़े हुए शब्द थे। जनता अपनी बात कहने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग करती है, उनकी कुंडली नहीं पूछती। बस काम चलना चाहिए। वह तो भाषा के पंडित हैं, जो शब्दों का कुलगोत्र आदि जानना चाहते हैं। जनता भाषा की संप्रेषणीयता को महत्वपूर्ण मानती है, जबकि पंडित लोग भाषा की शुद्धता को महत्व देते हैं। हिन्दी के स्वाभिमान का हल्ला मचाने वालों को आड़े हाथों लेते हुए निराला जी ने एक बड़े पते की बात कही थी- हम हिन्दी के जितने दीवाने हैं, उतने जानकार नहीं। हिन्दी के शुद्धतावादी पंडितों ने कुकुरमुत्ता नामक कविता मे प्रयुक्त नवाब, गुलाब, हरामी, खानदानी जैसे शब्दों पर एतराज जताया था। कहा था, इन शब्दों से हमारी हिन्दी भ्रष्ट होती है। इन शुद्धतावादी विचारकों का कहना है कि हिन्दी के साहित्यकारों को विदेशी शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अब सामंत, पाटल, वर्गशंकर, कुलीन कहने से हिन्दी के स्वाभिमान की रक्षा भले ही हो जाये, किन्तु व्यंग्य की धार मौंथरी होती है और संप्रेषणीयता भी बाधित होती है। हिन्दी के ये शुद्धतावादी पोषक शहीद भगतसिंह को बलिदानी भगतसिंह कहना चाहते हैं। उनका बस चले तो वे भगतसिंह को भक्तसिंह बना दें। वे फीसदी को गलत मानते हैं, उन्हें प्रतिशत ही मान्य है। वे राशन कार्ड, कचहरी, कार, ड्राइवर, फिल्म, मेटिनी, कंप्यूटर, बैंक, टिकट जैसे शब्दों के भी विरोधी हैं। वही हिन्दी का सवाभिमान। यह झूठा स्वाभिमान हिन्दी के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। ऐसे लोग हिन्दी को आगे नहीं बढऩे देना चाहते। वे वस्तुत: जीवन की प्रगति के ही विरोधी हैं।

एक बार पंडित शान्तिप्रिय द्विवेदी जबलपुर आये थे। पंडित भवानी प्रसाद तिवारी उन दिनों वहां के मेयर थे, स्वयं कवि, ‘गीतांजलि के अनुगायक। उन्होंने शान्तिप्रिय जी के सम्मान में एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया। अपनी कविताएं भी सुनाईं। उनकी एक काव्य पंक्ति है- ”कैसी मुश्किल कर दी, तुमने कितनी रूप माधुरी प्राणों में भर दी।‘’ शान्तिप्रिय जी का हिन्दी प्रेम जागा, उन्होंने शिकायत की- बाकी सब तो ठीक है, यह मुश्किल शब्द विदेशी है। इसे यहां नहीं होना चाहिए। भवानी प्रसाद जी तो अतिथिवत्सल और शालीन थे, वे कुछ नहीं बोले, पर जीवन लाल वर्मा ‘विद्रोही’ जो स्वयं बहुत अच्छे कवि और व्यंग्यकार थे बिफर गये। बोले- ‘मुश्किल’ से आसान शब्द आप हिन्दी में बता दें तो मैं अपना नाम बदल दूं।‘ पंडित शान्तिप्रिय द्विवेदी जैसे विद्वान जीवन की प्रगति से ज्यादा भाषा की शुद्धता के हिमायती हैं।

जीवन जब आगे बढ़ता है तो वह अपनी आवश्यकता के अनुरूप  नये शब्द दूसरी भाषाओं से उधार लेता है,  नये शब्द गढ्ता है,  लोक की शब्द संपदा को खंगालता है और अपने को संप्रेषणीय बनाता है। मेरे एक मित्र हैं, मोबाइल रखते हैं पर मोबाइल शब्द का प्रयोग उन्हें पसंद नहीं है। मोबाइल को वे चलित वार्ता कहते हैं। जब वे आपसे आपकी चलित वार्ता का क्रमांक पूछते हैं तो आप भौंचक्के रह जाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते। ऐसे शुद्धतावादी हर युग में हुए हैं और हास्यास्पद माने जाते रहे हैं। मध्यकाल के उस फारसीदां का किस्सा आज भी लोगों द्वारा दुहराया जाता है, जब वे अपने नौकरों से आब-आब की मांग करते रहे थे। पानी उनके सिरहाने ही रखा था। सो जब कोई दीवाना मोबाइल को अछूत समझता है या पानी से परहेज करता है तो न वह भाषा की मित्र है,  न ही अपने जीवन का। ऐसे विद्वानों को मेरे मित्र अनिल वाजपेयी ‘अनसुधरे बल’ कहते हैं। हिन्दी तो बराबर स्वयं को सुधारती चलती है, पर ये विद्वान लकीर पीटने में ही मगन रहते हैं।

हिन्दी के एक विख्यात समीक्षक को दबिश जैसे शब्दों से परहेज है। वे समझते हैं कि दबिश अंग्रेजी के फुलिश या रबिश का कोई भाईबंद है। यदि उन्होंने हिन्दी के ही दबना,  दबाना,  दाब,  दबैल जैसे शब्दों को याद कर लिया होता तो वे दबिश के प्रयोग पर आपत्ति नहीं करते। कचहरी, पुलिस, कानून व्यवस्था, थाना आदि से संपर्क में आने वाले दबिश से अपरिचित नहीं है। वस्तुत: हिन्दी के दीवाने जीवन से अपने शब्दों का चयन नहीं करते, हिन्दी के शब्द कोशों से करते हैं। हिन्दी के शब्द कोशों के सहारे हम आज के लोकतांत्रिक भारत के जीवन-राजनीतिक कर्थताओं,  सामाजिक विसंगतियों, आर्थिक उलझनों और सांस्कृतिक प्रदूषण को पूरी तरह और सही-सही समझ ही नहीं सकते। हिन्दी के शब्दकोशों में न तो सुपारी जैसा शब्द है, न अगवा, हफ्ता, फिरौती, बिंदास, ढिसुंम, घोटाला, कालगर्ल, ब्रेक जैसे शब्द। आप हर दिन समाचार पत्रों, पुस्तकों, जन संप्रेषण माध्यमों, बोलचाल में ये शब्द सुनते हैं और समझते हैं, पर इन्हें अभी तक हमारे कोशकारों ने पांक्तेय मानकर शब्दकोशों में स्थान नहीं दिया। हमारे शब्दकोश जीवन से कम से कम पचास साल पीछे हैं।

हिन्दी में समस्या नये विदेशी शब्दों को स्वीकृत करने की तो है ही, उन शब्दों को भी अंगीकार करने की है जो हिन्दी की बोलियों में प्रचलित हैं। हिन्दी के साहित्यकार विभिन्न बोली क्षेत्रों से आते हैं। वे जब हिन्दी में अपने क्षेत्रों के अनुभवों और परिवेश की कथा लिखेंगे तो वहाँ के शब्दों के बिना उनका काम नहीं चलेगा। हिन्दी सदैव से एक उदार और ग्रहणशील भाषा रही है। जब रामचन्द्र शुक्ल ने कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी कहा तो वे हिन्दी की इसी व्यापक ग्रहणशीलता को रेखांकित कर रहे थे। साधु किसी एक स्थान पर जमकर नहीं रहता, घूमता-फिरना, नये-नये क्षेत्रों में जाना उसकी सहजवृत्ति है। इसी कारण हमारे मध्यकालीन संत कवियों में नाना बोली क्षेत्रों के शब्द मिल जाएंगे। हिन्दी कविता का अधिकांश तो हिन्दी की बोलियों में ही है। तुलसी, जायसी जैसे कवियों ने अपनी बोली के शब्दों से अपने काव्य को समृद्ध किया है। जायसी जब सैनिक के लिए पाजी, तुलसी जब सुपात्र के लिए लायक,  कबीर जब समीप के लिए नाल का प्रयोग करते हैं तो वे हिन्दी की विशाल रिक्थ सम्‍पदा का दोहन करते हैं। नये युग में भी गुलेरी ने उसने कहा था में ‘कुंड़माई’ जैसे शब्द का प्रयोग कर उसे हिन्दी पाठकों का परिचित बना दिया। कृष्ण सोबती डार से बिछुड़ी लिखकर पंजाबी ‘डार’ को जो समूह वाली है, हिन्दी का शब्द बनाने में संकोच नहीं करतीं। मैला आंचल, जिन्दगीनामा, कसप, डूब, चाक जैसे उपन्यासों की रोचकता केवल कथा को लेकर ही नहीं, उसकी भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता को लेकर भी है।

कुछ दिनों पहिले हिन्दी के एक समीक्षक ने मैला आंचल की हिन्दी को अपभ्रष्ट कहकर उसका परिनिष्ठित हिन्दी में अनुवाद करने का सुझाव दिया था। इधर हिन्दी की बोलियों को स्वतंत्र भाषा के रूप में स्वीकृत किये जाने की मांग बढ़ रही है। यदि अवधी को हिन्दी से पृथक भाषा मान लिया जायेगा, तब क्या रामचरित मानस का हिन्दी अनुवाद करना पड़ेगा, हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों को भोजपुरी में रूपान्तरित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी? नामवर सिंह तब हिन्दी के नहीं, भोजपुरी के साहित्यकार माने जाएंगे। इधर मेरे पास बुंदेली प्रेमियों के बहुत से पत्र आ रहे हैं जिनमें आग्रह किया जा रहा है कि मैं अपनी मातृभाषा के रूप में हिन्दी को नहीं,  बुंदेली को जनगणना पत्रक में दर्ज करवाऊँ। यह एक संकीर्ण विचार है। इससे हिन्दी बिखर जाएगी और हिन्दी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। एक ओर तो विभिन्न दूरदर्शन चैनलों में दिखाए जाने वाले धारावाहिकों में बींद और बींदड़ी जैसे ठेठ क्षेत्रीय शब्द लोकप्रिय हो रहे हैं,  दूसरी ओर हिन्दी की लो.ओ.सी. को और संकीर्ण बनाया जा रहा है।

राजनीति में छोटी-छोटी पार्टियां बनाकर सत्ता में भागीदारी के अवसर निकालना जबसे संभव हुआ है, तबसे हिन्दी की बोलियों के पृथक अस्तित्व की मांग करना भी लाभप्रद और सुविधाजनक हो गया है। छोटी राजनीतिक पाटियों ने हमारे लोकतंत्र को अस्थिर और सिद्धान्तविहीन बना दिया है, छोटी-छोटी बोलियों की पृथक पहिचान का आग्रह करने वाले हिन्दी के गढ़ में सेंध लगा रहे हैं। हमें उनका विरोध करना चाहिए, उनसे सावधान रहना चाहिए।

हमें हिन्दी को अद्यतन बनाने के लिए जिन बातों की ओर ध्यान देना चाहिए, उन बातों की ओर किसी का ध्यान नहीं है। हमारे विश्वविद्यालयों, हिन्दी सेवी संस्थाओं, हिन्दी के प्रतिष्ठानों के पास ऐसी कोई योजना नहीं है कि हिन्दी में आने वाले नये शब्दों का संरक्षण, अर्थ विवेचन और प्रयोग का नियमन किया जा सके। पिछड़ी का विरोधी शब्द अगड़ी हिन्दी में इन दिनों आम है, पर अगड़ी का शब्दकोशीय अर्थ अर्गला या अडंगा है। अंग्रेजी की एक अभिव्यक्ति है एफ.आर.आई. अर्थात् फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट। हिन्दी में इसे प्रथम दृष्टया प्रतिवेदन कहते हैं या प्राथमिकी। हिन्दी शब्दकोशों में ये दोनों नहीं हैं। यह शब्द विधि व्यवस्था का, अपराध जगत का, जनसंचार माध्यमों का बहुप्रयुक्त शब्द है। दादा, धौंस, घपला, घोटाला, कबूतरबाजी, हिट जैसे लोक प्रचलित शब्द भी हमारे शब्दकोशों में नहीं हैं। दूरदर्शन देखनेवालों को घंटे-आधघंटे में ब्रेक शब्द का सामना करना पड़ता है। पर ब्रेक को अभी शब्द कोशों में ब्रेक नहीं मिला है। और तो और बाहुबली का नया अर्थ भी हमारे शब्द कोशों में दर्ज नहीं है।

अंग्रेजी में हर दस साल बाद शब्द कोशों के नये संस्करण प्रकाशित करने की परंपरा है। वैयाकरणों, समाजशास्त्रियों, मीडिया विशेषज्ञों, पत्रकारों, मनोवैज्ञानिकों का एक दल निरंतर अंग्रेजी में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों की टोह लेता रहता है। यही कारण है कि पंडित, आत्मा, कच्चा, झुग्गी, समोसा, दोसा, योग जैसे शब्द अंग्रेजी के शब्द कोशों की शोभा बढ़ा रहे हैं। अंग्रेजी में कोई शुद्ध अंग्रेजी की बात नहीं करता। संप्रेषणीय अंग्रेजी की, अच्छी अंग्रेजी की बात करता है। अंग्रेजी भाषा की विश्व व्यापी ग्राह्यता का यही कारण है कि वह निरंतर नये शब्दों का स्वागत करने में संकोच नहीं करती। हाल ही में आक्सफोड एडवांस्ड लर्न्स डिक्शनरी का नया संस्करण जारी हुआ है। इसमें विश्व की विभिन्न भाषाओं के करीब तीन हजार शब्द शामिल किये गये हैं। बंदोबस्त, बनिया, जंगली, गोदाम जैसे ठेठ भारतीय भाषाओं के शब्द हैं, पर वे अंग्रेजी के शब्दकोश में हैं क्योंकि अंग्रेजी भाषी उनका प्रयोग करते हैं। इन नये शब्दों में एक बड़ा रोचक शब्द है चाऊ या चाव जिसका अर्थ दिया गया है- चोर, बदमाश, अविवाहित मां। इस चाव शब्द का एक रूप चाहें भी है। सूरदास ने चाव शब्द के चबाऊ रूपान्तर का प्रयोग अपनी कविता में किया है- सूरदास बलभद्र चबाऊ जनमत ही को धूत। हिन्दी का चाव या चाईं शब्द सात समंदर पार तो संग्रहणीय माना जाता है, पर अपने घर के शब्द कोशों में नहीं।

हिन्दी क्षेत्र में इतने विश्वविद्यालय हैं, हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने वाली इतनी संस्थाएँ हैं, क्या कोई ऐसी योजना नहीं बन सकती कि हिन्दी में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों को रिकार्ड किया जा सके। हम प्रत्येक दस वर्ष में जनगणना पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, क्या हिन्दी की शब्द गणना पर कुछ खर्च नहीं किया जा सकता? कोई हिन्दी समाचार पत्र अपने रविवासरीय संस्करण में पाठकों से आमंत्रित कर प्रत्येक सप्ताह उसके क्षेत्र में प्रचलित हिन्दी के सौ नये शब्द भी प्रकाशित करे तो वर्ष भर में 5000 से भी अधिक शब्द समेटे जा सकते हैं। वैश्विकीकरण के साथ, नई उपभोक्ता वस्तुओं के साथ, नये मनोरंजनों के साथ, लोकतंत्र की नई-नई व्यवस्थाओं के साथ जो सैकड़ों शब्द हिन्दी में आ रहे हैं, उन्हें काल की आंधी में उड़ जाने देना गैर जिम्मेदारी भी है और लापरवाही भी है। वह हिन्दी के प्रति हमारी संवेदनविहीनता का द्योतक तो है ही। हमें आज हिन्दी के शुद्धतावादी दीवाने नहीं, हिन्दी के संवेदनशील जानकार चाहिए।

वरिष्ठ साहित्यकार कन्हैयालाल नंदन का निधन

नई दिल्‍ली : हिंदी के जाने माने साहित्यकार और पत्रकार कन्हैयालाल नंदन का शनिवार सुबह निधन हो गया. वह 77 वर्ष के थे। उन्हें बुधवार शाम रक्तचाप कम होने और सांस लेने में तकलीफ होने के बाद रॉकलैंड अस्पताल, दिल्‍ली में भर्ती कराया गया था। उन्होंने शनिवार तड़के करीब तीन अंतिम सांस ली। वह पिछले काफी समय से डायलिसिस पर थे।

नंदन का जन्म उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में 1 जुलाई, 1933 को हुआ था। डीएवी कानपुर से स्नातक करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर किया और भावनगर विश्वविद्यालय से पीएचडी की। पत्रकारिता में आने से पहले नंदन ने कुछ समय तक मुम्बई के महाविद्यालयों ने अध्यापन कार्य किया।

वह वर्ष 1961 से 1972 तक धर्मयुग में सहायक संपादक रहे। इसके बाद उन्होंने टाइम्स ऑफ इडिया की पत्रिकाओं पराग,  सारिका और दिनमान में संपादक का कार्यभार संभाला। वह नवभारत टाइम्स में फीचर संपादक भी रहे। नंदन को पद्मश्री, भारतेंदु पुरस्कार, अज्ञेय पुरस्कार और नेहरू फेलोशिप सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्होंने विभिन्न विधाओं में तीन दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं। वह मंचीय कवि और गीतकार के रूप में मशहूर रहे।

कुरुप और शहरयार को ज्ञानपीठ पुररस्कार

नई दिल्‍ली : भारतीय ज्ञानपीठ ने 43वें और 44वें ज्ञानपीठ पुरस्कारों की घोषणा कर दी है। ये पुरस्‍कार मलयालम कवि नीलकानंदन वेलु कुरुप और उर्दू के जाने-माने शायर शहरयार को दिए जाएंगे। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता में चयन समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया। चयन समिति के अन्य सदस्य प्रोफेसर मैनेजर पाण्डेय,  डा के सच्चिदानंदन,  प्रो गोपीचंद नारंग,  गुरदयाल सिंह,  केशुभाई देसाई ,  दिनेश मिश्र और रवींद्र कालिया बैठक में मौजूद थे।

वर्ष 2007 के लिए 43वें ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले मलयालम कवि कुरुप का जन्म 1931 में कोल्‍लम, केरल में हुआ। उन्‍होंने प्रगतिशील कवि के तौर रचनात्‍मक सफर की शुरुआत की। अपनी कविताओं से उन्‍होंने समकालीन मलयालम साहित्‍य को समृद़ध किया। उनके 20 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उन्‍हें केरल साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार, साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार, पद़मश्री आदि पुरस्‍करों और सम्‍मानों से सम्‍मानित किया जा चुका है।

वर्ष 2008 के लिए 44वें ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले उर्दू के शायर शहरयार का जन्म 1936 में आंवला (बरेली), उत्‍तर प्रदेश में हुआ था। उनका पूरा नाम कुंवर अखलाक मुहम्‍मद खान है। फिल्म गमन, आहिस्ता-आहिस्ता और उमराव जान के गीतों ने उन्हें विशेष पहचान दिलाई।

असमिया कवि सनंत तांती के लिए सहयोग की अपील

नई दिल्ली: 4 नवंबर, 1952 को जन्में असमिया के सशक्त कवि सनंत तांती के ग्यारह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और बारहवां प्रेस में है। वह दो साल से बीमार हैं। करीब डेढ़ साल साल उनका एम्स में भी इलाज चला, लेकिन आराम नहीं हुआ।
उनकी पत्नी मिनौती तांती ने बताया कि डॉक्टरों ने शरीर व हड्डी में कैंसर बताया है। 6 अगस्त से उनका इलाज नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोला अस्पताल के कैंसर इंस्टीट्यूट में चल रहा है। उनका इलाज कर रहे डॉक्टर हर्ष दुवा ने बताया कि कैंसर पूरी तरह से ठीक तो नहीं होगा, लेकिन नियंत्रित हो जाएगा। उनका इलाज कम से कम छह महीने चलेगा और करीब ढाई-तीन लाख का खर्च आ जाएगा।
उनके इलाज पर काफी खर्च हो चुका है। इसलिए आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। आप सभी से अपील है कि यथासंभव आर्थिक सहयोग करें और अन्य लोगों से भी कहें ताकि उनके इलाज में कोई रुकावट न आए और सुचारू रूप से चलता रहे। इस संबंध में उनकी पत्नी मिनौती तांती से 8860415173 पर संपर्क कर सकते हैं।

जहाँ मौत भी एक गिनती है : संजय जोशी

इंसेफेलाईटिस यानी जापानी बुखार गोरखपुर के आसपास के इलाकों के हजारों बच्चों को लील चुका है। वर्षों से चल रही इस महामारी को रोक पाने में सरकार नाकाम है। सरकारी कार्यप्रणाली का वीभत्स नमूना यह है कि इस साल टीकाकरण इसलिए नहीं हो पाया क्‍यों‍क‍ि टीके रखे-रखे खराब हो गए। द ग्रुप, जन संस्कृति मंच और गोरखपुर फिल्म सोसायटी की टीम इस मुद्दे को बार-बार उठा रही है। हाल ही मैं टीम दोबारा प्रभावित क्षेत्र में गई। इस पर तैयार फिल्म को गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में दिखाया जाएगा। द ग्रुप के संयोजक संजय जोशी की रिपोर्ट-
2010 के मई महीने में हम कैमरा टीम के साथ गोरखपुर के आसपास के इलाकों में जापानी बुखार से हुई मौतों की कहानी दर्ज कर रहे थे। जून बीतते-बीतते बारिश का पानी फिर से गोरखपुर के आस-पड़ोस में जमने लगा। एक बार फिर से मस्तिष्क बुखार ने रंग दिखाना शुरू कर दिया। 1978 से चली आ रही इस बीमारी से यूपी के सरकारी अस्पतालों में अब तक 12 हजार से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। गैरसरकारी अस्पतालों का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन सरकारी अस्पतालों की सीमित पहुंच के आधार पर कहा जा सकता है कि दिमागी बुखार से मरने वाले बच्चों की संख्या सरकारी अस्पतालों में मौतों से कई गुना अधिक होगी। हजारों बच्चों की मौत के बावजूद सरकार कोई ठोस नीति नहीं बना पायी है। सरकारी उदासीनता और लापरवाही अपनी गुणात्मक मूर्खताओं के नित नए कीर्तिमान बनाए जा रही है। सरकार 27 वर्ष बाद इंसेफेलाईटिस के एक रूप जापानी इंसेफेलाईटिस के टीकाकरण का फैसला कर पाई, लेकिन चार वर्ष तक टीकाकरण करने के बाद इस वर्ष इसलिए टीकाकरण नहीं हो सका क्योंकि टीके रखे-रखे खराब हो गए।
जून में अखबारों से खबर मिली कि जापानी बुखार से बचाव के लिए जो टीके आये थे, वे प्रशीतन (ठण्ड) की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण खराब हो गए और इस कारण टीकों का पूरा बैच निरस्त कर दिया गया। मतलब यह कि जापानी बुखार के विषाणुओं से बचने का इस बरस कोई रास्ता न था। इसी दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य मंत्री  अनंत कुमार मिश्र ने भी बचकाना बयान दे डाला कि हमने ग्रामीण इलाकों और कस्बों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को सुविधा सम्पन्न बना दिया है इसलिए बेवजह जिला अस्पतालों में आने का कोई मतलब नहीं है। इसी आपाधापी में अगस्त का महीना  बीत गया और बुखार के विषाणुओं ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। सितम्बर से एक बार फिर मौत की खबरें आनी शुरू हो गयीं। ये अलग बात है कि बच्चों की मौतों की रोज-रोज आने वाली खबरें अभी न्यूज रूम की टीआरपी नीति की नजर में न चढ़ने के कारण अदृष्य पेजों पर हाशिये  पर पड़ी थीं। ऐसे समय में हम भी अपनी कहानी में मौतों को दर्ज करने 8 सितम्बर की सुबह गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कालेज पहुंचे। मेडिकल कालेज के एपिडेमिक वार्ड में जगह-जगह मरीजों के परिवार वाले व्यस्त रेल प्लेटफार्म की तरह यहां-वहां ठुंसे पड़े थे। कैमरामेन पंकज ने वार्ड का मुआयना किया और ट्राईपोड़ रख कर फ्रेम बनाने लगा। मई में इसी वार्ड में मस्तिष्क बुखार के इक्का-दुक्का मरीज थे। अब पंकज के हर फ्रेम में कई मासूम बच्चों के चेहरे कैद हो रहे थे। हर बेड पर कम से कम दो-तीन बच्चे और उनका पस्त पड़ा परिवार किसी तरह अटा पड़ा था। हर मां-बाप यही पूछ रहा था कि क्या हुआ उसके बच्चे को ? जूनियर डाक्टर जानता है कि इस बार तो टीका भी नहीं लगा है। इसलिए कमोबेश हर बच्चे को यहां से चुपचाप विदा लेनी है। वह भी बार-बार सिर्फ यही कह रहा था कि मस्तिष्क ज्वर है। इसका निदान कैसे होगा, यह किसी के मस्तिष्क में नहीं था। सारे मस्तिष्क जैसे एक क्रूर होनी को घटते हुए देखने के आदी हो चले थे। अस्पताल की दवाओं और गंदगी की बदबू की तरह बच्चों की मौतें साल दर साल घटने वाली एक रूढ़ि में तब्दील हो चुकी  थी। वार्ड में भीड़ न हो इस समझ से मैं गलियारे की बेंच पर बैठ गया। बगल में बैठी नौजवान मुस्लिम महिला ने सुबकते हुए मुझसे पेन और कागज मांगा। उस पर उसने किसी का मोबाइल नम्बर लिखा। उसका डेढ़ साल का बेटा भी मस्तिष्क बुखार से पीड़ित वार्ड में भरती था। उसके कई हफ्ते बीमारी को समझने में और अपने गाँव-कस्बे में ठोकर खाने में बीत गए।
काश ! मेरे पास कोई जादू होता और मैं माननीय स्वास्थ्य मंत्री अनंत मिश्र जी से पूछता यह बेचारी किस अस्पताल में जाए। अनंत मिश्र जैसों के बच्चे सरकारी अस्पतालों में  दाखिल नहीं होंगे और न ही उनके घर तक मच्छर पहुंच सकेंगे।
तभी एक महिला अपनी 12 साल की अचेत बिटिया मधुमिता को गोद में उठाये बदहवास गैलरी में आती दिखाई दी। कुशीनगर के बड़गाँव टोला की उर्मिला और शारदा प्रसाद की बेटी मधुमिता को 15 अगस्त से दौरे पड़ने शुरू हो गए थे। गाँव और कस्बे में इधर-उधर चक्कर काटने में ही इस परिवार के चार-पांच हजार रुपये खर्च हो गए। मधुमिता का मामा, जो पुलिस की वर्दी में था पहले उत्तेजना और हताशा में सरकार को कोसने लगा, फिर अचानक उसे अपनी वर्दी और नौकरी का खयाल आया तो लगभग बेचारगी में हमसे वीडियो रिकार्डिंग्स को डिलीट करने की मिन्नत करने लगा। मधुमिता को उसका भाई अंशु और पिता दोनों हाथों से उठाकर डाक्टर के केबिन में ले गए। बाहर रह गई उसकी माँ उर्मिला। रोते-रोते उर्मिला ने बताया कि कैसे इस बीमारी ने पूरे परिवार को सड़क पर खड़ा कर दिया है। रक्षाबंधन से शुरू हुए दौरे बंद होने का नाम नही ले रहे हैं। यह पूछने पर कि क्या उन्होंने अपनी बिटिया को टीके लगवाये थे- लाचारी से भरा न सुनने को मिला।
मै फिर उस मुस्लिम महिला के बगल में जा बैठा। अभी तक उसका फोन नहीं आया था, लेकिन वार्ड की भयावहता से वह अपने डेढ़ साल के बेटे के भविष्य का लेकर परेशान थी। इस वजह से वह रो-रोकर हलकान हुए जा रही थी। स्वास्थ्य मंत्री के दावे को चुनौती देने के लिए न्यूज एजेंसी एएनआई की टीम भी वार्ड के बीचों बीच मय ट्राईपौड और कैमरा माइकों में टीवी कंपनियों की नाम वाली तिकोननुमा लकड़ी के पट्टों के साथ तैयार थी। एजेंसी के रिपोर्टर कम कैमरामैन की दुविधा थी कि उन्हें कोई भी डाक्टर आधिकारिक वक्तव्य नहीं दे रहा था। इसके समाधान के लिए उन्होंने हमारे सहयोग के लिए आये गोरखपुर के पूर्व छात्र नेता एवं पत्रकार अशोक चौधरी को घेर लिया। अशोक चौधरी कुछ बोलते कि वार्ड के दूसरे कोने से गगन भेदती चीत्कारों ने हम सबको हिला दिया। यह वार्ड के एक कमरे के बाहर से उठी आवाजें थीं। उस समय ढाई साल के एक बच्चे की मौत की पुष्टि हुई थी। ये चीत्कारें उसी के परिवार की थीं।
बाबा राघव दास मेडिकल कालेज के एपिडेमिक वार्ड में 8 सितम्बर की दुपहर 12 बजे हर दूसरा बच्चा इसी बीमारी का शिकार था। उस वार्ड में हर परिवार अपने ऊपर मंडरा रही मौत से आशंकित था। हम वार्ड के बाहर खड़े थे। बीच बगल के गलियारे से उस नन्हे शिशु के माँ-बाप, दादी, मौसी, चाची का समवेत क्रंदन हमारे ऑडियो चैनलों में रिकॉर्ड हो रहा था। थोड़ी देर बाद उस परिवार का मुखिया, संभवत उस नन्हे शिशु का दादा घुंघराले बालों वाले प्यारे शिशु को तेजी से लेकर बाहर निकला। शिशु को देखने के बाद उस परिवार का क्रंदन वार्ड की छतों को भेदता हुआ सबके भीतर तक घुसकर बेचैन कर रहा था। जब दादा ने बच्चे को पिता को सौंपा तो तब मृत देह की झूली हुई गति से ही समझ में आया कि ये घुंघराले बाल और सलोनी सूरत जल्द ही स्मृति बन कर रह जाएंगे। बदहवास कदमों से उस परिवार ने अपने नन्हे की अंतिम यात्रा एपिडेमिक वार्ड से शुरू की। उस नन्हे शिशु का सलोना चेहरा पूरे वार्ड को गहरी खामोशी और अवसाद में डुबा चुका था। हमने भी अपना ट्राईपौड समेटा और इमरजेंसी वार्ड के पास आ गए; तभी उसी तीव्रता वाली चीखों का शोर हैडफोन के जरिये मेरे कानों तक पहुंचा। दाहिनी तरफ नजर घुमाई तो वही मुस्लिम महिला दहाड़ माकर छाती पीट रही थी, जिसने आधा घंटा पहले मुझे वार्ड के गलियार में किसी परिचित का नम्बर लिखने के लिए पेन और कागज मांगा था। हमारे फ्रेम के क्लोज अप में उसका आंसुओं से भरा चेहरा और हेडफोन पर- अरे कोई मोर बेटवा के जिया दे…का करुण आर्तनाद था।
राघव दास मेडिकल कालेज, गोरखपुर में अपनी फिल्म के लिए मौत की कहानी दर्ज करते हुए हमें सिर्फ 30 मिनट बीते थे और हम दो मौतों को देख चुके थे। अब उस आधी मौत के बारे में पता करने का हौसला मुझ में नहीं बचा था, जो कुशीनगर के बड़गाँव  से आयी उर्मिला अपनी 12 साल की लगभग विकलांग हो चुकी मधुमिता को बचाने में घरबार बेचकर कर्ज में डूबकर हासिल कर चुकी थी।
हम मेडिकल कालेज से लौट रहे हैं। गाड़ी गोरखपुर की भीड़ वाली सड़कों और बरसाती पानी के जमाव के बीच रास्ता बनाते हुए जा रही है। रेलवे स्टेषन पहुंचते एक पत्रकार दोस्त का मैसेज मिला- सिक्स डाइड टूडे इन बीआडी मेडिकल कालेज।
(जनसत्ता, 19 सितम्बर रविवारीय मैगजीन से साभार)

मुझमें नेहरू भी बोलता है, माओ भी : सुरजीत पातर

पंजाबी के वरिष्ठ कवि सुरजीत पातर को हाल ही में सरस्वती सम्मान प्रदान किया गया। साहित्य अकादेमी सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित पातर का जन्म 1944 में जालंधर, पंजाब के एक गांव में हुआ। उनका पहला कविता संग्रह 1978 में हवा विच लिखे हर्फ प्रकाशित हुआ। अपनी कविताओं में साफगोई और बेबाकी के लिए प्रसिद्ध पातर की रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनसे युवा पत्रकार संजीव माथुर की बातचीत के अंश-

क्या आप लफ्जों की सूफीयाना इबादत करते हैं?
मैं जिस माहौल में पला-बढ़ा हूं उसकी फिजा में ही गुरुबानी रची-बसी है। इसीलिए मेरी कविता में आपको लोकधारा, गुरुबानी और भक्ति या सूफी धारा का सहज प्रभाव मिलेगा। दरअसल मेरे चिंतन और कर्म दोनों में जो है वह प्रमुखत: मैंने पंजाब की फिजा से ही ग्रहण
किया।
एक बात और जुड़ी है। वह यह कि मैं जब भी दुखी होता हूं तो लफ्जों की दरगाह में चला जाता हूं। इनकी दरगाह में मेरा दुख शक्ति और ज्ञान में ट्रांसफॉर्म हो जाता है। यह ट्रांसफॉर्ममेंशन मुझे एक बेहतर इंसान बनाने में मददगार होता है। ध्यान रखें कि कविता मानवता में सबसे गहरी आवाज है।
पर आप को पढ़ते हुए कहीं-कहीं महसूस होता है कि अंधेरे दौरों से पैदा हुई उदासी की वजह भी दरगाह की तलाश को विवश कर रही है?
 नहीं ऐसा नहीं है। मैं अक्सर कहता हूं कि संताप या दुख को गीत बना ले, चूंकि मेरी मुक्ति की एक राह तो है। अगर और नहीं दर कोई ये लफ्जों की दरगाह तो है। इसलिए लफ्जों की दरगाह मेरे लिए एक ऐसा दर है जो मुझे इंसा की मुक्ति की राह दिखता है। और जो दर मुक्ति की राह दिखाए वह उदासी को भी ताकत में तब्दील करने कर देता है। जिंदगी आत्मसजगता में है। शब्दों की गहराई में समा जाओं तो दुख छोटे पड़ जाएंगे।
माना जाता है कि सातवें दशक में उभरी पंजाबी कविता ने साहित्य में दो ऐसे नाम दर्ज कराए जिनके बिना भारतीय कविता के आधुनिक परिदृश्य की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। ये नाम है पाश और पातर। पाश की कविता पर माक्र्सवाद का साफ प्रभाव है, आप किस विचार या लेखक से प्रभावित महसूस करते हैं?
मैं कविता का प्यासा था। मैंने विश्व काव्य से लेकर भारतीय साहित्य तक में सभी को पढ़ा। लोर्का हो या ब्रेख्त। शुरुआत में मुझ पर बाबा बलवंत का खासा प्रभाव पड़ा। इनकी दो किताबों ने खासा बांधा था- बंदरगाह व सुगंधसमीर। मेरी शुरुआती कविताओं पर इनका प्रभाव साफ देखा जा सकता है। पर मुझ पर हरभजन, सोहन सिंह मीशा, गालिब, इकबाल और धर्मवीर भारती का भी खासा प्रभाव रहा है। इसके अलावा शिव कुमार बटालवी और मोहन सिंह ने भी मुझे और मेरे लेखन को प्रेरित किया है। मैं राजनीति में कभी सीधे तौर पर सक्रिय नहीं रहा। जहां तक विचारधारा की बात है तो मैं साफ तौर पर मानता हूं कि लोकराज हो पर कल्याणकारी राज्य भी हो। इसीलिए मैंने लिखा है कि –
मुझमें से नेहरू भी बोलता है,  माओ भी
कृष्ण भी बोलता है,  कामू भी
वॉयस ऑफ अमेरिका भी, बीबीसी भी
मुझमें से बहुत कुछ बोलता है
नहीं बोलता तो सिर्फ मैं ही नहीं बोलता।
पर जो दौर आपकी काव्य रचना की शुरुआत का है, वही वक्त वामपंथ में उथल-पुथल का दौर था। पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला जहां आप छात्र थे वह नक्सलवादी गतिविधियों का केंद्र था। आपके के कई मित्र पंजाब स्टूडेंट्स यूनियन में सक्रिय थे। इस माहौल का आप पर क्या असर पड़ा?
जैसे मैंने पहले कहा कि मैं किसी राजनैतिक समूह का कार्यकर्ता तो नहीं था। इसीलिए नक्सलवाद के राजनीतिक पक्ष के बारे में तो आपको मेरी कविताओं में सीधे कोई नारा शायद न मिले, पर यह भी सच है कि इस विचार के मानवीय पक्ष- जैसे नवयुवकों की त्याग भावना, विचार के आधार पर मर-मिटने का जज्बा व गहरे और उष्म मानवीय संबंधों ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया है। इस प्रभाव को आप मेरे सौंदर्यबोध में पा सकते हैं। इस दौर में एक दोस्त था रुपोश, जिसने माक्र्सवाद से परिचय करने में अहम भूमिका निभायी। पर मेरी पीएसयू के साथियों से लगातार हिंसा व लेखकीय स्वतंत्रता को लेकर बहस चलती रहती थी। इसके बावजूद मेरी सहानुभूति
उनके साथ थी। चौक शहीदां में उसका आखिरी भाषण में मैंने साफ कहा है कि –
चलो यह चौक छोडें
किसी चौरस्ते पर पहुंचे
और वहां जाकर फिर दुविधा में पड़ें
यहां दुविधा में पड़ना फिर लौटकर कोख में पड़ना है
तुम्हें मैं क्या बताऊं कीमती दोस्तों
तुम तो जानते हो
कि जिस चौक में
अपने हंसमुख हमउम्रों का खून बह जाए
फिर वह चौक चौरास्ता नहीं रहता,
जिन चौकों में अभी हमउम्रों का खून बहाना है
वे आगे हैं।
वैसे मैं अपनी कविता और जीवन में कभी ऊंचे पैडिस्टियल से बात नहीं करता। मैं आम के बीच में ही खुद को सहज महसूस करता हूं। मैंने ये भी लिखा है कि – मेरा जी करता है कि जंगल में छिपे गोरिल्ले से कहूं, ये लो मेरी कविताएं जलाकर आग सेंक लो।
इमरजेंसी और पंजाब में आंतक का एक पूरा दौर आपने देखा है। कैसे देखते हैं इन दोनों अंधेरे दौरों को?
 इमरजेंसी पर मैंने कहा था कि कुछ कहा तो अंधेरा सहन कैसे करेगा, चुप रहा तो शमांदान क्या कहेंगे। जीत की मौत इस रात हो गई, तो मेरे यार मेरा इस तरह जीना सहन कैसे करेंगे। बुढ़ी जादूगरनी भी इमरजेंसी और सत्ता के दमनकारी पक्षों का सूक्ष्म व्यंग्य के साथ पर्दाफाश करती है। इमरजेंसी या आतंकवाद हमारे लोकतांत्रिक समाज पर धब्बा है। यह दौर कवि और कविता के लिए सर्वाधिक घातक थे।
आंतकवाद पर तो मैंने बिरख अर्ज करें में काफी कुछ कहा है। कुछ कविताओं जैसे कि
मातम,
हिंसा,
खौफ,
बेबसी
और अन्याय –
यें हैं आजकल नाम मेरे दरियाओं के।
या फिर एक लरजता नीर था को मैंने पाश को समर्पित किया है। एक दरिया को भी आप इसी संदर्भ में पढ़ सकते हैं। इसी संदर्भ में मैंने लिखा था – इस अदालत में बंदे वृक्ष हो गए, फैसले सुनते-सुनते सूख गए । इन्हें कहो कि ये अब अपने उजड़े घरों को लौट जाएं। ये कब तक यहां खड़े रहेंगे।
साहित्य का राजनीति से कैसा रिश्ता होना चाहिए?
बेशक प्रतिरोध की राजनीति साहित्य के फोकस में होनी चाहिए। व्यंग्य इसमें एक कारगर औजार हो सकता है। जैसे कि मैंने गहरे क्रंदनों को क्या मापना में कहा है कि जद तक उह लाशां गिणदें आपा वोटां गिणिए (जब तक वह लाशों को गिनते हैं आप वोटों को गिने)। सुलगता जंगल में भी आप इसकी झलक देख सकते हैं। साहित्य और लेखक की अपने वक्तों के प्रति एक जिम्मेदारी यह भी होती है कि वह इसको साफ साफ देखें और दिखाएं। ध्यान रखना चाहिए कि हम चाहे या न चाहें राजनीति या अपने माहौल से उदासीन होकर की गई साहित्य की रचना कमजोर होती है। उसमें मानवीय उष्मा की गरिमा नहीं होती है। साहित्य या रचना में हमारी मैं भी सिर्फ हमारी मैं नहीं होती है वह कवि खुद ही नहीं होता है।
क्या रचना की रचना एक निजी मामला नहीं है?
 देखिए, कवि या लेखक की मैं भी उसने खुद नहीं बनाई होती है। वह भी समाज से उसने पाई है। इसीलिए रचना एक हद ही निजी होती है, पर उसके बावजूद वह होती एक सामाजिक प्रक्रिया का हिस्सा ही है।
वैश्वीकरण का हमारे समाज पर क्या असर पड़ा है?
 वैश्वीकरण के प्रक्रिया ने सरकार की संकल्पना को कमजोर किया है। आज हमारी सरकारे बस लॉ एंड ऑर्डर का थाना भर बन कर रह गई हैं। शिक्षा और सेहत की जिम्मेदारी सरकार को उठानी चाहिए। पर कानूनों के बावजूद सरकारें इसे लागू करने से बच रही हैं। वह इसे किसी और के कंधे पर डालना चाह रही हैं। शिक्षा की तो एक लहर चलनी चाहिए। शिक्षा में असमानता खत्म होनी चाहिए। इसी असमानता के कारण गांवों के बच्चे अच्छे विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं ले पाते हैं। सेहत के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। शिक्षा और सेहत सबकी पहुंच में हो और यह करने की जिम्मेदारी सरकार की है, न की बाजार की। वैश्वीकरण ने सरकार को इस
जिम्मेदारी से आजाद करने में नकारात्मक भूमिका निर्वाह की है। इसके अलावा वैश्वीकरण की बयार ने हमारे मानवीय संबंधों को भी खासा प्रभावित किया है। माइग्रेट लेबर का सवाल एक बड़ा सवाल है। मेरी कविता आया नंदकिशोर में इस दर्द को
समझने की कोशिश आपको दिखाई देगी।
आपने शिरोमणि अवार्ड क्यों ठुकराया था?
मेरा मानना है कि पुरस्कारों में राजनीतिज्ञों का दखल नहीं होना चाहिए। इस पुरस्कार देने की प्रक्रिया में राजनीतिज्ञों का खासा दखल था। यह मुझे गवारा नहीं था सो मैंने यह पुरस्कार ठुकरा दिया।
कैसे रचते हैं अपनी कविताएं?
कविता को खोजते या रचते समय राजनीति, प्रकृति और आदम की बुनियादी इच्छाएं मेरी कविता में बुन जाती हैं। पर कविता में ये सचेतन नहीं आती है सहज-स्वाभविक हो तभी आती हैं। मैं खुद पर कोई विचारधारा लादता नहीं हूं। मैं कविता से विचारधारा नहीं करता हूं। मेरी प्रतिबद्धता इंसा और लोगों के साथ बनती है।
आजकल रचनात्मक व्यस्ताएं क्या हैं?
आजकल भाषा पर और उसके विज्ञान पर ध्यान दे रहा हूं। भाषावैज्ञानिकों ने यह काम छोड़ रखा है। मां बोली यानि मातृ-भाषा पंजाबी के विकास पर काम कर रहा हूं। यात्रा संस्मरण लिखने की भी योजना है। शीर्षक होगा सूरज मंदिर दां पौडियां।
अपने घर- परिवार के बारे में कुछ बताएं?
मेरा बचपन खुशहाल नहीं था। काम करने के लिए पिता हरभजन सिंह पूर्वी अफ्रीका चले गए । घर में चार बड़ी बहनें और मां हरभजन कौर के साथ खासे संघर्ष के दिन बिताए। पिता मां की मृत्यु पर नहीं आ सके। इसका दर्द जीवन भर रहेगा। कवि नहीं होता तो गायक होता। मेरी पत्नी भूपिंदर ने हमेशा साथ निबाहया है। दो बेटे हैं अंकुर और मनराज। बडे़ की शादी हो गई है।
नए लेखकों को कुछ राय?
देखों मैं अपनी कविता में भी उपदेश देने से बचता हूं। इसीलिए सिर्फ कुछ मशविरे हैं। जैसे फैशन की पीछे नहीं भागो। मन में गहरा झांक कर देखों। लेखन में एक कंटीनियूटी होनी चाहिए। परम्परा और वर्तमान का संजीदा भान व ज्ञान होना चाहिए। जैसे बे्रख्त के बारे तो आज बहुत सों को पता होता पर बुल्लेशाह या वारिस के बारे में भी मालूम होना चाहिए। स्टाइल पर जोर न हो। परिवेश से जुड़े। निरंतरता और बदलाव की समझ हो। सोचना चाहिए कि लोग हमसे दूर क्यों हो रहे हैं। मैं अक्सर युवा साथियों से कहता हूं- वो लोग जा रहे हैं आज की कविता से दूर, तो हजूर होगा इसमें भी आपका कुछ कसूर।

(कादम्बिनी से साभार)

प्रतिरोध का सिनेमा दूसरा नैनीताल फिल्म उत्सव स्थगित

नैनीताल : पिछले एक पखवाड़े से उत्तराखंड में भारी वर्षा के कारण हुए जान-माल के नुकसान के चलते नैनीताल में 24 सितंबर से होने वाले दूसरे नैनीताल फिल्म फेस्टिवल को अगली घोषणा तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। जहूर आलम, अध्यक्ष युगमंच और संजय जोशी, संयोजक, द ग्रुप, जन संस्कृति मंच ने बताया कि उत्तराखंड में भारी वर्षा के कारण जान-माल का काफी नुकसान हुआ है। इस कारण  24 से 26 सितम्बर तक होने  वाले दूसरे  नैनीताल फिल्म फेस्टिवल को अगली घोषणा तक के लिए स्थगित स्थगित कर दिया गया है।  अगली तारीख की घोषणा शीघ्र कर दी जाएगी .
युगमंच और द ग्रुप, जन संस्कृति मंच  इस त्रासदी में मारे गए लोगों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना प्रकट करता है.