Archive for: August 2010

हीरो : एक लव स्टोरी- रवि बुले

5 सितंबर, 1971 को जबलपुर, मध्यप्रदेश में जन्में चर्चित कथाकार रवि बुले का कहानी संग्रह आईने सपने और वसंतसेना प्रकाशित हो चुका है।
छोटे कस्बे का मध्यम वर्गीय युवा प्रेम को लेकर किस तरह के सपने देखता है, किस तरह का डर उसके मन में समाया रहता है और उसकी कैसी मानसिकता होती है। इसका सजीव चित्रण-

कहानी का हीरो बनने का सपना कौन नहीं देखता! हर आदमी को लगता है कि उसकी जिंदगी एक गजब की कहानी है। वह कहानी का हीरो है। यदि उसकी कहानी छप कर आ गई, तो तहलका मच जाएगा। दुनिया अपने दांतों से नाखून कुतरते-कुतरते उंगलियां तक चबा लेगी। वह किसी लेखक को ढूंढता है। कहानी के लेखक को। लेकिन सच तो लिखने वाले जानते हैं। कहानी लिखना इतना मुश्किल काम है कि दुनिया वाले इसे काम ही नहीं मानते! जबकि ज्यादातर जिंदगियों की कहानियां फ्लॉप होती हैं। कोई पूछता नहीं उन्हें। वही दुखड़े। वही रोना। वही घिसे-पिटे दृश्य। वही अंत। ऐसे में एक अच्छी कहानी लिखना! खुदा खैर करे। इन्हीं सारी बातों के बीच मेरे सबसे पक्के दोस्त सैफू के दिल में ‘कभी-कभी’ की तरह खयाल आया, मेरी कहानी में हीरो बनने का। इस बार वह गंभीर था। उसे जब से मैंने यह ‘स्टोरी’ बताई थी, वह इसमें हीरो बनने के लिए बावला था। चूंकि हमारी दोस्ती उतनी पुरानी है कि जब हम आपस में चड्डियां बदल लिया करते थे, इसीलिए उसकी इच्छा का मेरे लिए क्या महत्व होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है। पूरी गंभीरता के साथ जब सैफू का इस कहानी में हीरो बनना तय हो गया, तो मैंने उससे कहानी के  ‘मुहूर्त’ पर पहुंच जाने को कहा। ठीक समय पर। ताकि कहानी ‘हिट’ हो सके। कहानी के हीरो के तौर पर सैफू को ‘साइन’ करने का प्रश्र ही नहीं उठता था। कारण, हमारी दोस्ती और एक-दूसरे पर विश्वास।
आखिर वह समय आ ही गया, जब मुझे इस कहानी को शुरू करना था। लेकिन सैफू गायब! मुहूर्त सरपट घोड़े की तरह भागा जा रहा था। अपने पीछे गर्दो-गुबार छोड़ कर। मुहूर्त निकल गया, तो कहानी का सत्यानाश निश्चित है। कोई संपादक-प्रकाशक छुएगा भी नहीं इसे। बिना लिफाफा खोले और पढ़े ही लौटा देगा। यदि किसी गरीब-गुरबे संपादक ने कहानी छाप भी दी, तो पाठक रद्दी न्यूजप्रिंट और दो-चार सौ के सर्कुलेशन वाली पत्रिका में इसे भला पढेंग़े भी! इससे पहले कि मुहूर्त का सरपट घोड़ा अपने ही गर्दो-गुबार में गुम हो जाए, मैंने फैसला किया खुद ही हीरो बन जाने का। अपनी कहानी का खुद ही हीरो! किसी भी कहानीकार के लिए आग के दरिया में छलांग लगाने के समान है यह कहना कि वही अपनी कहानी का हीरो है। लेकिन मेरी मजबूरी है। सैफू  आया नहीं और मुहूर्त को मैं हाथ लगे बटेर की तरह निकल जाने देना नहीं चाहता। अत: प्रिय पाठक , आपसे निवेदन है कि कहानी का हीरो मुझे मान कर इसका रसास्वादन करें। भूल जाएं सैफू को। जो आदमी वक्त की कद्र नहीं करता, वक्त उसके साथ कभी वफा नहीं करता। सैफू के हाथ से हीरो बनने का सुनहरा मौका निकल चुका है और देखिएगा एक दिन उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। वह पछताएगा। खैर। उसके साथ हुई दुर्भाग्य से हुई इस तुच्छ दुर्घटना को भूल कर, आइए हम-आप कहानी की रोचक दुनिया में प्रवेश करें।
प्लीज, जस्ट अ मिनट।
कहानी चूंकि एक अकेले शख्स के बस की बात नहीं, इसीलिए मैं इसकी ‘स्टारकास्ट’ को स्पष्ट कर दूं। मुख्य  भूमिका में मैं हूं और है प्रीतो। जिस इमारत में रहता हूं, वहीं ऊपर रहने वाली। सहयोगी भूमिकाओं में हैं, मेरी मां और पिता। त्यागी जी यानि प्रीतो के पिता। गेस्ट एपीयरेंस है श्रीमती सहाय का, जिन्हें मैं कभी ‘आंटी’ नहीं कह पाता हूं।
चलें, सीढिय़ां शुरू हो चुकी हैं
नागिन-सी लहराती हुई जब प्रीतो चढ़ती, तो सीढिय़ां ऊपर को जातीं और गिलहरी-सी फुदकती हुई जब वह उतरती, तो सीढिय़ां नीचे को आतीं।
उसे सीढिय़ों पर ऐसे देखना मेरे मन को उतना ही रोमांचक और आकर्षक लगता, जितना अपने चेहरे पर उगती हुई नई-नई मूंछ और दाढ़ी को आईने में गौर से निहारना। जब कभी प्रीतो का स्कर्ट हवा मे थोड़ा लहरा जाता, तो उसकी गोरी टांगें घुटनों से ऊपर तक उघड़ जातीं। सपने और सच के दरमियान अंधकार का एक संक्षिप्त विस्तार आंखों के आगे फैल जाता। उसमें बिजली कौंधती, गुलाबी बिजली! वह बिजली मेरी आंखों में समा जाती। आंखें बंद किए मैं देर तक थरथराता रहता। कच्ची टहनी-सा! आंखें खोलने में मुझे डर लगता। मुझे लगता कि मैं पसीने-पसीने हो रहा हूं। लेकिन पसीना नहीं आता। फिर शर्म का हल्का-सा एहसास मन में सिर उठाता। चोर नजरों से मैं देखता कि घर में किसी ने मुझे पकड़ तो नहीं लिया। जब मैं खुद को अकेला पाता, तो आश्वस्त होता। दिल को एक ठंडी राहत मिलती। यद्यपि एक-दो बार प्रीतो मेरे ‘तीरे-नजर’ से आहत हो चुकी थी, लेकिन उसने जाहिर नहीं होने दिया। उसकी यह सहनशक्ति मेरे लिए ‘ग्रीन सिगनल’ थी।
घर भर की आंख बचा कर मैं उसे सीढिय़ों से उतरते और चढ़ते देख लेता। इसके अलावा वह कभी दिखाई नहीं पड़ती। ‘एजाज एसेट्स’ की पांचवी मंजिल पर रहने के बावजूद वह एक सांस में सीढिय़ों को नाप लेती। एक पल को भी उसके अभ्यस्त और सुडौल पैर नहीं डगमगाते। उसकी रफ्तार मुझे आकर्षित करती। जब वह सीढिय़ों पर दिखाई देती, तो सीढिय़ां भी जीवित लगतीं। धडक़ती! सांसें लेती हुई। बाकी सारे समय सीढिय़ां मुर्दे की तरह शांत पड़ी रहतीं और उस पर चढऩे-उतरने वाले कीड़ों-मकोड़ों की मानिंद लगते। इतने ढीले, सुस्त और रेंगते हुए कि कभी-कभी तो मुझे उनसे घिन होने लगती।
 

सीढिय़ों के पार स्वर्ग

एक शाम को मेरी आंखों के आगे फिर अंधकार का संक्षिप्त विस्तार फैला और पल भर को बिजली चमकी। गुलाबी बिजली! जब वह सीढिय़ां चढ़ रही थी, तभी स्कर्ट लहराया और उसकी पिंडलियों से भी ऊपर तक का गोरा चिकना अक्स अपनी जगह से आजाद होकर मेरी आंखों में जज्ब हो गया। उसे जैसे इसका पता लग गया। वह एक पल को ठहरी। मुझे देखा। …और रफ्तार से गुम हो गई। नर्म और थरथराता अक्स… मुझे देर तक कंपकंपाता रहा। किताब-कॉपी मेरे सामने खुले पड़े थे, पर मैं उन्हें देख तक नहीं पा रहा था। मेरी आंखों के सामने रेशमी-गुलाबी परदा नाचता रहा। इस परदे में वक्त के साथ मेरी लुका-छुपी देर तक चलती रही। उस पार क्या है? यह देखने की मैं कोशिश करता रहा। तभी डोरबेल वाली चिडिय़ा चहचहाई, तो मैंने उठ कर दरवाजा खोला। …सन्न रह गया। सामने प्रीतो खड़ी थी। फोक प्रिंट वाली कुरती और सलवार पहनी हुई। माथे पर बड़ी-सी गोल-लाल टीकी। बालों के बीच निकली मांग के दोनों तरफ उसकी चोटियां लटक रही थीं। दाईं चोटी से एक गुलाब झांक रहा था। सादे होंठों पर फीकी मुसकान। मेरा मुंह खुला का खुला रह गया।
इस बीच रसोई से मां निकल आई। झनझनाती हुई देह को लिए मैं अंदर चला आया। दिल की धडक़नें मुझे साफ सुनाई दे रही थीं। अब क्या होगा…! दिमाग से टूट कर शब्द दिल पर गिर रहे थे। पल भर में काली आशंका के बादल घुमड़ आए और बरसने भी लगे। शिकायत…! गए आज काम से! मारे के आगे भूत भी भागते हैं। फिर मेरी क्या औकात! मन ही मन शपथ ली कि आज बच जाऊं , तो स्कूल की प्रार्थना सभा में होने वाली ‘छात्र प्रतिज्ञा’ सही-सही बोलूंगा, ‘भारत हमारा देश है। हम सब भारतवासी आपस में भाई-बहन हैं…।’ इस बात पर पश्चाताप किया कि क्यों आज तक सिर्फ मां जायी बहनों के अलावा किसी और को बहन नहीं कहा… और अभी उम्र भी क्या है? पढ़-लिख कर ‘नवाब’ बन गए, तो फिर उम्र पड़ी है ऐश करने को!!
अभी से ऐसी ओछीं हरकतें! मैंने अपनी आत्मा को धिक्कारा। मां और पिता जी ने बचपन से सिखाया कि बड़ों का आदर करो। हमउम्र लडक़ों को भाई और लड़कियों को बहन मानो। उनकी सीख आज कलंकित हो गई! परिणाम के भय से मेरा रोम-रोम कांप उठा।
प्रीतो से बातें करके मां सीधे रसोई में चली गईं। अनिष्ट की आशंका से मेरी छठी इंद्री फडफ़ड़ाई। किताब मेरे हाथ में थी। मगर मैं अपने मन के पन्ने कभी पीछे, कभी आगे पलट रहा था। कई पुरानी सीखों को दोहराया और भविष्य के लिए नई चेतावनियां दर्ज की। जैसे ही पिता जी ने घर में कदम रखा, शरीर से मन गायब हो गया। अबाबीलों-सी बेचैन कल्पनाएं खोखले दिमाग की दीवारों से रह-रह कर टकरा रही थी। कहीं पढ़ी हुई पंक्ति याद आई, ‘यातना की कल्पना, कष्ट से ज्यादा यातनादायी होती।’ मैं इसी पंक्ति को जी रहा था। मन तो गया था, शरीर भी साथ छोडऩे लगा। …सुन्न पड़ रहा था।
थोड़ी देर बाद मां ने आ कर कहा कि तैयार हो जाओ। कपड़े बदल लो। प्रीतो ने अपने जन्मदिन पर बुलाया है। पिता जी ने इजाजत दे दी है।
पहले-पहल तो मेरे कुछ समझ नहीं पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे महसूस हुआ कि आकाश के घटाटोप अंधकार को परास्त करते हुए, मैं रश्मिरथि सूर्य की तरह जगत में पुन: प्रवेश कर रहा हूं। दिशाएं मेरी जय-जयकार कर रही हैं। कोर्स में पढ़ाई जा रही कविवर ह. रा. बच्चन की कविता ‘आ रही रवि की सवारी…’ मेरे कानों में गुंजने लगी। (इस कविता की गूंज के बीच मेरे साहित्य-अनुराग ने पहली किलकारी ली!) मुझे लगा जैसे यह मेरा पुनर्जन्म है।
‘कनफेशन’ के बाद मन बहुत निर्मल और पावन था। नवजाता शिशु-सा कोमल और निर्दोष! नरक की आग में मैंने खुद को जलाया, इसीलिए ईश्वर ने मेरे लिए स्वर्ग के द्वार खोले…!

नहीं, सपना नहीं

मेरी नजरें प्रीतो के चेहरे को छू रही थीं। उसके चेहरे का स्पर्श मखमली महसूस हो रहा था। वह मेरी आंखों में झांक कर दिल और जिगर का जायजा ले रही थी। मेरे घर के दरवाजे पर वह जितनी सादगीपूर्ण और घरेलू लग रही थी-सती सावित्री! अपने घर में ठीक उसके विपरीत थी। किसी विज्ञापन की हसीन मॉडल की तरह! उसके काले, घने, सुंदर और लहरदार बाल पीठ पर फैले हुए थे, जिन्हें कंडीशनिंग शैंपू ने दिलकश बना दिया था। होंठों को उसने बड़ी लगन से सजाया-संवारा था। कत्थई रंग की अल्ट्राक्रीम लिपस्टिक के चारों ओर लिपलाइनर से सुरेख खिंची थी। जिसे आसानी से पकड़ा नहीं जा सकता। कानों में पहने, गनमटल से बने सर्पाकार रिंग कंधों को लगभग छूते हुए झूल रहे थे। संपूर्ण देखभाल करने वाले रिवाइटलाजिंग फेस पैक के इस्तेमाल से उसके चेहरे की त्वचा साफ, निखरी और स्वस्थ लग रही थी। ‘ईगो फॉर वूमन’ बॉडी स्प्रे से उसकी देह में चुंबकीय शक्ति पैदा हो गई थी। उसकी आंखों में जैसे अनकही चुनौती थी। …और इन सबसे बढ़ कर वह स्कर्ट से ऊपर ऑफ शोल्डर Žलाउज पहने हुए थी। उसकी बांहें नंगी थीं और वक्ष रेखा के प्रथम बिंदु तक सीना खुला हुआ था। किसी भी लडक़ी को इस तरह अब तक मैंने सिर्फ सिनेमा और टीवी में देखा था।
वह विशाल कमरा मेरे सामने आश्चर्यलोक की तरह खुला-पसरा था। झिलमिल रेशमी-अंधेरे में चारों ओर मोमबत्तियां…। सेंटर टेबल पर एक बहुत बड़ा और सुंदर केक दिल की तरह धडक़ रहा था! उस केक पर क्रीम के इक्कीस गुलाब खिले थे! सुनहरी क्रीम से लिखा था- ‘लाइफ बिगेन्स एट ट्वेंटिवन’! एक मोमबत्ती केक के बीचों बीच रखी हुई, रौशन थी। रोशनी की स्वर्णिम आभा से दिपदिपा रहे कमरे में सिर्फ हम दोनों थे। वह और मैं। ‘मेड फॉर इच अदर!’ मुझे लगा कि किसी ख्वाब की ताबीर ऐसी ही होती है। रहस्यमयी और ऐंद्रजालिक! फिर भी सहज और स्वाभाविक! एक गीत की मद्धम धुन पृष्ठभूमि में बजने लगी, धीरे-धीरे स्पष्ट हुई…। ‘माइ हार्ट इज बीटिंग/कीप्स ऑन रिपीटिंग/आ’एम वेटिंग फॉर यू…’ शब्दों की स्पष्टता के साथ-साथ कमरे का एकांत पल-पल सघन होने लगा। हम करीब आ गए। फिर ठीक सामने! वैसे ही जैसे परस्पर आकर्षण में बंधे नायक-नायिका एक-दूसरे के सामने होते हैं! संगीत लहरियों ने सम्मोहन का अदृश्य जाल फैला दिया। अपने हाथों से मैंने गुलाब उसके बालों में लगाया। वह ‘कातिलाना अंदाज’ में मुसकराई। कहने-सुनने को कुछ बचा नहीं। ऐसा लगा, जैसे समय इसी एक पल में समा गया है। …और पल भी – थमा हुआ।
गीत के जाने किस शŽद ने दिल को छुआ। पैरों में अनायास हरकत हुई। हम नाचने लगे। बिल्कुल अभिजात-अंग्रेजी अंदाज में। नाचते हुए हम एक घेरे में घूम रहे थे। एक अनखिंची परिधि सहज ही तय हो गई। हम नाच रहे थे। कमरा भी हमारे नाच में शामिल हो गया।
वह मुझसे ज्यादा कुशल थी। उसका अभ्यास मुझसे अधिक था।
मेरी रफ्तार कुछ तेज थी। भावनाओं का ज्वार मेरे भीतर लहरा रहा था।
उसके खुले हुए गोरे कंधे बार-बार ध्यान आकर्षित कर रहे थे। वक्ष रेखा का प्रथम बिंदु अपना आकार विस्तृत कर चुका था। मेरी इच्छा हुई कि उसके चिकने-गोरे कंधों को चूम लूं। तभी मेरे ज्ञानकोष में सुरक्षित एक पुस्तक का पृष्ठ खुला। लाल स्याही से ‘मार्क ’ किया हुआ एक वाक्य सबसे अलग चमक रहा था; ‘किसेज व’र मेंट फॉर लिप्स, इट इज सिली टु वेस्ट दैम ऑन शोल्डर्स।’ मैंने नादानी छोड़ कर अपने चुंबनों का सही स्थल पर प्रयोग किया। पहले-पहल वह कुछ हिचकिचाई, फिर सहज हो गई। नाचते हुए हमने जाने कितनी बार एक-दूसरे के होंठों को चूमा। चुंबनों ने नाच में प्राण फूंक दिए। नाच की गति और एकाग्रता बढ़ गई। नाच से तेज मेरे दिल की धडक़नें थीं। एक दीर्घ चुंबन के दौरान मेरा दिल धमाके के साथ फट जाने के कगार पर पहुंच गया। पर ऐसा हुआ नहीं। हम नाचते रहे…। कमरा भी हमारे साथ-साथ नाचता रहा…। चुंबनों के बीच संगीत और नाच की गति पल-पल तेज होती चली गई। तेज… और तेज… इतनी तेज कि जैसे प्रकाश की गति…! चारों ओर फिर प्रकाश ही प्रकाश था…। संगीत… नाच… और प्रकाश…। सब अपने चरमोत्कर्ष पर…!
एकाएक सारी मोमबत्तियां थक कर पस्त हो गईं। जो जहां मुस्तैद थी, वहीं अपना आखिरी निशान छोड़ कर निढाल हो गई।
संगीत, दिल की धडक़नों-सा किसी चुंबकीय सन्नाटे में डूब गया।
नाचती हुई देह गुम हो गई।
कमरे में अंधेरा छा गया। उसके अलावा कुछ बाकी नहीं रहा।
सिर्फ कुछ झीने-झीने गुलाबी अक्स रह-रह कर तैर रहे थे। …अंधेरे में गुलाबी अक्स!
ये वक्त की हेरा-फेरी है
कैलेंडर की तारीखें समय से बदल रही थीं।
प्रीतो सीढिय़ों से उतरती, तो मुझे विश्वास होता कि सुबह हो गई। प्रीतो सीढिय़ों पर चढ़ती, तो मेरे यकीन की सांझ तसल्ली से ढलती। बिना अवकाश वह सीढिय़ों पर दिखाई पड़ती। कभी-कभार उसका स्कर्ट…
एक दिन वह नहीं दिखी!
न सीढिय़ों से उतरते हुए और न सीढिय़ों पर चढ़ते हुए। दिन भर मैं बेचैन रहा। रात भर मुझे नींद नहीं आई। मुझे लगा कि मेरे जीवन से कोई बहुत जरूरी चीज खो गई है। दिल में रक्त का संचार करने वाली कोई धमनी मुझे गुम मालूम पड़ी!
वह कई दिनों के लिए गायब हो गई।
सीढिय़ां अब मुर्दे की तरह शांत पड़ी रहतीं। उनमें कभी कोई हलचल नहीं होती। मेरा दिल भी अब स्पंदनहीन हो कर, देह में अपनी जगह पर लटका रहता। मुझे लगता कि सीढिय़ों की सांसें लौटेंगी, तो मेरा दिल धडक़ेगा। हालत दिन-ब-दिन विचित्र होती जा रही थी। विचारों में तार्किक संगति का अभाव बढ़ता जा रहा था। अब मेरी आंखें हमेशा खुली रहतीं, मुंदती नहीं। मैं खुली आंखों से जैसे सपने देखता। वह रफ्तार… वह स्कर्ट… सपने और सच के दरमियान अंधकार का संक्षिप्त विस्तार… उसमें कौंधती गुलाबी बिजली…! मैं कांप जाता।
जीवन जैसे किसी जकड़बंदी का शिकार हो गया। इसी अबूझ कैद में लगभग एक पखवाड़ा बीत गया।
वह नहीं दिखी। मैं सूनी सीढिय़ों को निहारता रहा।
एक रात को लघुशंका ने दबाव बनाया, तो मेरी नींद टूटी। पास के कमरे से मां-पिता जी के बातें करने की आवाजें आ रही थीं। मैंने ध्यान नहीं दिया।
टॉयलेट से लौट कर मैं बिस्तर पर लेट गया। मां की आवाज साफ सुनाई पड़ रही थी। मैं करवट बदल कर फिर सोने की कोशिश करने लगा। नींद आंखों में थी। तभी कुछ ऐसे शब्द कानों में पड़े कि नींद में झुरझुरी दौड़ गई। एक सौ तीन नंबर वाली श्रीमती सहाय ने दिन में जो बातें मां को बताई थीं, मां वो बातें पिता जी से कह रही थीं। मैं ध्यान से सुनने लगा-
त्यागी जी की लडक़ी आज लौट कर आई है। बंबई में मिली। जब घर से भागी थी, तब पेट से थी। उसके कॉलेज का कोई लडक़ा है, वही ले गया था। रोज कॉलेज जाने के बहाने उसके साथ इधर-उधर गुलछर्रे उड़ाती थी। त्यागी जी को एक तो अपनी बीवी की मौत का गम और उस पर लडक़ी की ये काली करतूत! कुलटा कहीं की…। बेचारे करते भी तो क्या? पानी जैसा पैसा बहाया और पुलिस की जेब गर्म की। तब जा कर मामला रफा-दफा हुआ।
प्रीतो के आने क ी बात सुनकर मुझे अपना दिल सीढिय़ों की तरह धडक़ता मालूम पड़ा। लगा कि हमेशा की तरह वह रफ्तार से उतर रही है…।
पूरी बिल्डिंग में श्रीमती सहाय की विश्वसनीयता संदिग्ध है। यह मैं जानता हूं। सर्वविदित है कि जब वह ‘पड़ोसी पुराण’ का वाचन करती हैं, तो उनकी जुबान पर त्रेतायुगीन धोबी आ कर विराजमान हो जाता है। वे अच्छे-अच्छों को डिगा देती हैं। मैंने प्रण किया कि मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करूंगा। निर्णय में जल्दबाजी मेरी आदत नहीं है। लड़कियों के मामले में तो सावधानी और भी जरूरी है क्योंकि मनीषियों ने उनकी लाज ‘टूट से फिर ना जुड़े’ की तर्ज पर मिट्टी के सकोरे से ले कर कांच के खिलौने तक, जाने कितने संकेतों द्वारा समझाई है।
मां की आवाज अब भी आ रही थी। सहाय जी की मिसेज बता रही थीं कि प्रीतो ने बंबई में अपना पेट साफ करा लिया। बच्चा पेट में ही मरकर ‘पायजन’ बन गया था। लडक़ी सूख कर बिल्कुल कांटा हो गई है। ढंग से चला भी नहीं जाता। मिसेज सहाय ने उसे खुद अपनी आंखों से देखा। भगवान का शुक्र है कि बच गई। नहीं तो त्यागी जी को उसकी लाश ही मिलती।
 यह कहते हुए मां का स्वर उदास हो गया। यह उदासी लडक़ी के भरी जवानी में मर जाने की आशंका से उपजी थी या उस कुलटा के बच जाने का दुख मां को था – समझ नहीं आया।
इसके बाद पिता जी का स्वर उभरा, ‘लडक़े का कुछ पता चला! कौन था?’
मां बोली, ‘हां कोई है। सैफू…’
सुनते ही मुझे लगा कि किसी पहाड़ी की चोटी से संतुलन खो कर गिर पड़ा हूं। लुढक़ रहा हूं तेजी से। एक भारी-भरकम चट्टïान मेरे पीछे चली आ रही है…। पूरी रफ्तार के साथ। उसकी गति मुझसे कहीं तेज है। वह किसी भी पल मुझे कुचल कर मिट्टी में मिला सकती है। लेकिन कृपा उस ईश्वर की, जिसकी आंखें सदा खुली रहती हैं। चट्टान के रास्ते में एक पत्थर आ गया, जिसने उसकी दिशा बदल दी और मुझे एक घनी-हरी मुलायम झाड़ी ने अपनी गोद में समो लिया। मैं उस चट्टïान को गिरते हुए देखता रहा। नीचे सिर्फ अंधेरा था। सघन अंधेरा।

क्या बोलूं, क्या बात करूं

प्रिय पाठक, आपने कभी अपने लंगोटिया यार से धोखा खाया हो, तो आप जरूर समझ सकेंगे मेरे दर्द को। कहानी में सैफू के इस तरह सेंध लगा लेने से मैं सदमें में हूं। ठगा हुआ महसूस कर रहा हूं। मैंने तो पहले ही सैफू से इस कहानी का हीरो बन जाने को कहा था। फिर उसने ऐसा क्यों किया? यह ठीक है कि उसका दिमाग तेज है, वह स्मार्ट है और मैं कक्षा में बारह तक आते-आते तीन बार फेल हो चुका हूं। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है! प्रीतो उसकी क्लास में पढ़ती जरूर है, लेकिन प्यार वह मुझसे करती है।
चौंकिए मत…!!
यह बात मैं इस तरह खुलेआम कहना नहीं चाहता था। मैं नहीं चाहता था कि प्रीतो मेरे प्यार में बदनाम हो। इसीलिए मैंने उसके जन्मदिन पर हुई बातों को छुपा लिया था। परंतु मेरे दिल में चोर नहीं था। आगे बताता ही। क्या कहानियां प्रेमी-प्रेमिका के मिलन के साथ समाप्त नहीं होती! विश्वास कीजिए, उस दिन तप्त-चुंबनों वाले नृत्य के बीच प्रीतो ने मेरे बाएं कान में फुसफुसा कर कहा था, ‘आइ लव यू चंदू…’
और एक बार नहीं, पूरे तीन बार, ‘लव यू… लव यू… लव यू… चंदू… चंदू… चंदू…’
मुझे मेरे प्यार की सौगंध। झूठ बोलूं, तो कौवा काट ले। मैं आपके हाथों में एक सुंदर प्रेम कहानी देना चाहता था। लेकिन बद-नीयत सैफू ने चोरी से घुसकर कहानी को खराब कर दिया है। इसके लिए मैं आपसे बेहद शर्मिंदा हूं। अब जबकि बात बिगड़ ही गई है, तो इसे अधूरी छोड़ कर आपका गुनहगार बनना नहीं चाहता। मां-पिताजी की उस रात वाली बातों के बाद में जो कुछ भी हुआ, वह आपके सामने ईमानदारी से रख रहा हूं। अब जो है, वह कहानी नहीं हकीकत है।

दुनिया एक कड़वी दवा है

श्रीमती सहाय सही थीं!
यह मेरे लिए जोर का झटका था। मैं प्रीतो के कमरे में बैठा था सुबह। मेरे कंधे पर उसका झुका हुआ सिर था। मेरी कमीज की बांहें उसके आंसुओं से तर थीं। पश्चाताप में डूबी प्रीतो मुझसे नजरें मिलाने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। लेकिन मैं भी अपने सपनों के टूट-बिखरने से स्तब्ध था। क्या कहूं प्रीतो से? अब कहने को बाकी भी क्या था? मेरे मन में भीषण द्वंद्व था। परंतु मन प्रीतो के आंसुओं में न पिघलता, यह कैसे संभव था? वह टूट चुकी थी। बुरी तरह। दुनिया की तमाम भाषाओं में ऐसा कोई शब्द नहीं था, जो उसके जख्म पर मरहम का काम करता। उसे ढाढस बंधाता। तसल्ली देता। जीवन सिर्फ एक दुर्घटना से खत्म नहीं हो जाता। वह भी ऐसी दुर्घटना से, जो सावधानी हटने से नहीं घटी। धोखे से जिसे अंजाम दिया गया। जी हां, धोखे से!
अपनी दरकती हुई आवाज में प्रीतो ने मुझे बताया कि सैफू  ने उसे धोखा दिया। जब प्रीतो के कॉलेज में पता चला कि उसने अपने जन्मदिन पर किसी को नहीं बुलाया। सिर्फ सैफू के दोस्त चंदू को छोड़ कर, तो क्लास के लडक़ों और लड़कियों ने सैफू का खूब मजाक बनाया। उसे ‘जोकर’ तक कहा! तब सैफू ने शर्त बदी कि महीने भर में वह कॉलेज की सबसे खूसूरत लडक़ी, प्रीतो को अपने जाल में फंसा कर दिखाएगा। शर्त भी ‘ट्रीट’ लेने-देने की। इसके बाद उसने कभी अपनी तेज रफ्तार बाइक पर बंदरों की तरह उछल-कूद कर के सांस रोक देने वाले करतब प्रीतो के सामने शुरू किए, तो कभी वह प्रीतो को दोस्ती की आड़ में छोटे-छोटे गिफ्ट देने लगा। जिससे उपहार देख कर प्रीतो को घर में भी उसकी याद आती रहे। पढ़ाई की टेबल पर रखने वाला फ्लावर पॉट। महंगी विदेशी कलम। शोकेस में रखने के लिए हमेशा सिर हिलाता छोटा-सा गुड्डा। इन सबसे बढ़ कर एक डियोडे्रंट, जिसकी सुगंध से अगले स्नान तक आजाद होना नामुमकिन था। ऐसा कोई हथकंडा नहीं था, जिसे सैफू ने नहीं आजमाया। लेकिन जब देखा कि प्रीतो दोस्ती की दहलीज से पैर बाहर नहीं निकाल रही और समय बीत रहा है। तो उसने आखिरी दांव चला। धमकी!
प्यार में जान देने की धमकी!
जहर की बोतल ले कर वह कॉलेज आया। उसने प्रीतो से कहा कि यदि उसे सच्चे प्यार में विश्वास नहीं है, तो वह सबके सामने जहर पी कर जान दे देगा। काफी हंगामे के बाद आखिर में जब सैफू ने बोतल मुंह से लगा ली, तो प्रीतो हार गई। सबके सामने उसने सैफू के प्यार को कुबूल कर लिया। सैफू ने प्रीतो को गले लगा कर सामने खड़े दोस्तों को आंख मारी और अंगूठा दिखाया-थम्स अप! वह शर्त जीत गया। उसने शानदार ट्रीट ली और सबके  सामने जहर वाली बोतल खोल कर गटक गया! उसके जहर पीने पर हैरान दोस्तों को उसने बताया कि कोल्ड ड्रिंक था! उसकी चालाकी पर सब और हैरान हुए। हो सकता था कि सैफू और उसके दोस्तों के इस जश्र में प्रीतो पीछे के दरवाजे से पहुंच जाती। उसे सच्चाई का पता लग जाता। लेकिन भाग्य सैफू के साथ था। प्रीतो के साथ नहीं। हा! प्रारब्ध…
प्रीतो प्रेम की कच्ची डोर से बंधी सैफू की ओर खिंचती चली गई। अंतत: सैफू ने अपने दिए सारे उपहारों के बदले प्रीतो से सबसे मूल्यवान ‘तोहफा’ हासिल कर लिया।
इस बारे में प्रीतो का कहना है कि सैफू  उससे सचमुच प्यार करने लगा था। तभी वह इतना आगे बढ़ी। सुनकर एक बार मेरा मन हुआ कि कहूं, ‘मूर्ख…’ लेकिन प्रीतो की मानसिक हालत को देखकर चुप रह गया। प्रीतो का कहना है कि जब सैफू को उसने ‘मम्मी-पापा बनने वाली बात’ बताई, तो वह मारे खुशी के उछल पड़ा। लेकिन वह अपने घर में यह खुशखबरी देने को राजी नहीं हुआ। उसने कहा कि यह सुन कर उसकी मां को हार्ट-अटैक आ जाएगा। एक बार पहले आ चुका है। फिर उसने योजना बनाई कि बंबई भाग चलें। वहां उसका दोस्त है। वहीं शादी करेंगे और कुछ महीनों बाद ‘बेबी’ को लेकर वापस लौट आएंगे। ‘बेबी’ को देख कर घर वाले नाराज नहीं होंगे। थोड़े-बहुत विरोध और आंसू बहाने के बाद प्रीतो तैयार हो गई। बकौल प्रीतो, ‘मरती क्या न करती…’
प्रीतो के ले कर सैफू बंबई भाग गया। दोनों उसके दोस्त के घर पहुंचे। कुछ घंटों बाद सैफू शादी का इंतजाम करने के लिए जाने की बात कह कर दोस्त के साथ निकला और फिर वे वापस नहीं लौटे। घबराई हुई प्रीतो ने तीन दिनों तक इंतजार करने के बाद फांसी लगा लेने का निश्चय कर लिया। तभी उसे ढूंढते हुए त्यागी जी पुलिस को ले कर वहां पहुंच गए। आगे क्या हुआ, श्रीमती सहाय से बेहतर कौन बयान कर सकता था!

जमाना खराब है

कैलेंडर की जाने कितनी तारीखें प्रीतो के आंसुओं से धुलती चली गईं। लेकिन आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। प्रीतो से पूरी सहानुभूति रखने पर भी मैं क्या कर सकता था! मैं जानता था कि वह यंत्रणा के कितने भयानक दौर से गुजर रही है। मैं पूरी तरह से उसके साथ था। यह कहने कि बात नहीं सच्चा प्यार किसी टुच्ची दुर्घटना से टूट नहीं सकता। जो टूट जाए वह प्यार ही क्या! सच्चा प्यार तो दो आत्माओं का मिलन होता है। देह का थोड़े! मेरे दिल में प्रीतो के लिए प्रीत बरकारर थी। प्यार, इश्क और मोहब्बत… चाहे जो कह लें। ऊपर वाला ऐसों-वैसों को यह नेमत नहीं बख्शता। किसी-किसी को देता है। लेकिन ऐसे कड़े वक्त में ये बातें प्रीतो से कहनी कैसे संभव होतीं? यह मुझसे छुपा नहीं था कि प्रीतो का मन उससे रह-रह कर एक ही सवाल कर रहा है – अब कौन अपनाएगा तुझे? यह सब जान कर। दुनिया ‘बदचलन’ कहेगी। थू-थू करेगी। सोचकर प्रीतो रो-रो पड़ रही थी। मैं उसे हर तरह से समझा-बुझाकर मायूस हो चुका था। मैं भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि प्रीतो एक बार मेरी आंखों में आंखें डाल कर देखे, उसे वही निश्छल प्यार दिखाई पड़ेगा। हीरे-सा चमकता हुआ। हीरा, जो सदा के लिए होता है।
… और दैवी प्रेरणा से प्रीतो ने मेरी आंखों में झांका। वही हुआ जो मैं सोच रहा था।
‘चंद…ऊ…’ कहते हुए प्रीतो जोरों से फूट-फूट कर रो पड़ी। मेरे सीने से लग कर। उसके दिल का गुबार आखिरी बार आंखों के रास्ते निकल रहा था। अंतत: हमने तय किया कि जो हुआ उसे भूल जाएंगे। जिंदगी में कभी याद नहीं करेंगे। सब कुछ नए सिरे से शुरू होगा। नया जीवन… नया प्रेम…। संयोग से यह पिछली सदी की आखिरी तारीख थी। अगला दिन नई सदी ला रहा था…।
सचमुच हम भूल गए जो कुछ भी हुआ था। जीवन नया आकार ले रहा था। मुझे अब सीढिय़ों पर उतरती-चढ़ती प्रीतो को देख कर दिल को तसल्ली नहीं देनी पड़ती थी। शहर के तमाम रेस्तरां और बाग-बगीचे हमारे प्रेम के गवाह बनते रहे। मैं स्कूल की क्लास ‘गोल’ करता और वह कॉलेज की। शाम को हम कॉलोनी की पहली सडक़ तक साथ आते और फिर वह आगे निकल जाती। मैं पीछे से घर पहुंचता।
एक दिन जब हम लौट रहे थे, तभी सैफू सामने से आता दिखा। प्रीतो ने मेरा हाथ पकड़ लिया। कसकर। सैफू हमारे पास आकर खड़ा हो गया। उसने प्रीतो से बात करने की इच्छा जाहिर की। लेकिन प्रीतो ने मुंह फेर लिया। उसने तरह-तरह से प्रीतो से निवेदन किए। साथ चलने के। प्रीतो टस से मस नहीं हुई। आखिर में उसने बताया कि वह अपने दोस्त के साथ ‘लोकल ट्रेन’ में धर लिया गया था। बिना टिकट। कोई जमानत लेने वाला नहीं था, इसीलिए दोनों को तीन महीने की जेल काटनी पड़ी। सैफू की बातें सुन कर मेरा दिल घबरा रहा था। कहीं प्रीतो…। लेकिन अपनी जलती हुई निगाहें सैफू पर डालते हुए प्रीतो ने उसके चेहरे पर थूक दिया! बोली ‘अब कोई चालाकी काम नहीं आएगी… तुम्हारा खेल मुझे पता लग चुका है सैफू… तुमने शर्त लगाई थी…’
प्रीतो की प्रतिक्रिया से मेरे दिल को बहुत राहत मिली। मैं आशंका से निवृत्त हो गया। सैफू का चेहरा देखने लायक था। बेहद लाचार, कमजोर और कुंठित चेहरा। लेकिन उसने एक कुटिल मुसकान मेरी तरफ फेंकी। उसके चेहरे पर अपने किए का पछतावा नहीं था। गले में पड़े मफलर से उसने चेहरे पर पड़े थूक को पोंछा और प्रीतो से ‘फिर मिलूंगा…’ कहकर बाइक पर फर्राटे से निकल गया। उसके आखिरी शŽदों से घबरा कर प्रीतो ने मेरा हाथ और कसकर जकड़ लिया। उसकी हथेली पर आए पसीने को मैंने महसूस किया। वह बोली, ‘सैफू कुछ भी कर सकता है चंदू…’
उसके डर को समझते हुए मैंने कहा, ‘मैं हूं ना…!’ लेकिन इस कहने का क्या मतलब था, मैं खुद भी नहीं समझ सका। उस दिन हम साथ-साथ लौटे। घर तक। किसी ने हमें देखा नहीं।
सैफू के डर से प्रीतो ने कॉलेज जाना, यहां तक कि घर से निकलना तक बंद कर दिया। हम मौका देख कर कभी-कभी छत पर मिल लिया करते।
लव मैरिज यानी प्यार आखिर प्यार होता है
अपनी जिंदगी के हालात को देखते हुए मैं शादी की कल्पना भी नहीं कर सकता था। तभी एक शाम प्रीतो ने मुझे चौंका दिया। यह कह कर कि क्या हम जल्दी शादी नहीं कर सकते! मुझे हंसी आ गई। वह गंभीर थी। जो कुछ भी हुआ, वह प्रीतो को घुन की तरह खाए जा रहा था। वह भुला नहीं पा रही थी। लेकि न उसकी बात ने मेरे भीतर रोमांच पैदा कर दिया। मैंने कोहनी से उसे टल्ला मारा और कहा, ‘हम दो, हमारे नौ दो ग्यारह…’ वह शर्माती हुई हंस पड़ी। अगले ही पल फिर गंभीर हो गई। मैंने उसे अपनी स्थिति समझाई। घर में। समाज में। मेरी हैसियत है कितनी! इस पर हमारे घर में प्यार की बात पर ही आग भडक़ जाएगी। …और लव मैरिज…!! लेकिन प्रीतो को इससे कम पर कुछ भी मंजूर नहीं था। जबकि घर में कुछ कहने का साहस मुझमें नहीं था। चोरी-छुपे जो चल रहा था, उसमें क्या कसर बाकी रह रही थी? प्रीतो नाराज हो गई। बड़ी मुश्किल से उसे मनाया। उसने एक और प्रस्ताव रखा। यदि वह अपने पिताजी से बात करे और फिर वे मेरे घर में, तो कैसा रहे!
मैंने ईश्वर को याद किया। सोचा, हो सकता है उसकी यही मर्जी हो। पर क्या यह सब इतना आसान है, जितना लग रहा है! जब प्रीतो साथ है, तो उतना कठिन भी नहीं होगा! बहुत विचार किया। प्रीतो ने कहा कि मूड देख कर वह अपने पिताजी से बात करेगी। जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी। लेकिन मैंने कहा कि अपने पिताजी से बात करने से पहले मुझसे कम-से-कम एक बार बात जरूर कर लेना।
दो ही दिन बीते। रविवार था। पिताजी घर में थे। प्रीतो अपने पिता के साथ हमारे दरवाजे पर खड़ी थी! मुझे इतना मौका भी नहीं मिला कि किसी बहाने बाहर निकल जाऊं। मैं अपने कमरे में बंद हो गया। स्टडी टेबल पर सिर पटक कर पत्थर बन गया।
इतनी जल्दी क्या पड़ी थी प्रीतो को! मैं भागा तो नहीं जा रहा था। कम-से-कम एक बार बात…। पर अब सब बेकार। घर से निकाला जाना निश्चित है। कहां ठौर मिलेगा…! दर-दर की ठोकरें खानी पड़ेंगी। प्यार में बर्बादी के सिवा और कुछ हासिल नहीं होने वाला। खत्म हो गई जिंदगी चंदू…। मैं लगभग सन्निपात की स्थिति में बड़बड़ा रहा था। जाने क्या-क्या…।
तभी मां की आवाज आई, ‘चंदू दरवाजा खोल…’
मेरे पैर इस तरह जड़ हो गए मानो अपना ही जनाजा उठाने के लिए बुलाया गया हूं। दरवाजा खोल कर निकला, तो देखा कि पिताजी त्यागी जी से हंस-हंस कर बातें कर रहे हैं। प्रीतो सिर झुकाए, लजाते हुए बैठी है। मां आर्शीवाद की मुद्रा में उसके सिर पर हाथ रखे हुए है। दोनों बहने मां के पास खड़ी हैं। टेबल पर रखा है मिठाई का डिब्बा!
हाथ पकड़ कर मुझे खींचते हुए मां बोली, ‘बधाई दो प्रीतो को… उसका ब्याह पक्का हो गया है…’
मेरे दिल में कटार भुंक गई…।खच्च…!
मां ने हाथ नहीं पकड़ा होता, तो अध-कटे पेड़ की तरह चरमरा कर वहीं गिर पड़ता।
‘बधाई… प्रीतो…’
अब क्या कहना
रात के सन्नाटे में मां-पिता जी के कमरे में जीरो वाट का बल्ब टिमटिमा रहा था। मां की आवाज आ रही थी, ‘बड़ा भला लडक़ा है… शरीफ खानदान से है… सहाय जी की मिसेज बता रही थीं कि कल ही अपनी मां के साथ आया था। जो हो गया, उस पर बहुत पछता रहा था। त्यागी जी के पैरों में गिर कर उसने माफी मांगी…। प्रीतो के भी पांव छूने को तैयार था! बेचारा… ! खाना-पीना सब छोड़ बैठा था, प्रीतो के प्यार में…। बाप है नहीं…। घर का इकलौता चिराग है। कैसे बुझने देगी मां…? थोड़ी नाराज थी। लेकिन प्रीतो को देख कर उसकी रही-सही शिकायतें दूर हो गईं। सोने के चार कंगन पहना कर गई है…!! बच्चों का भी मन रखना पड़ता है…। समय देखो, कैसा आ पड़ा है… और ये उमर भी तो निगोड़ी! कैसे, कब, कहां पांव फिसल जाएं नादानी में…? अब क्या कहना, उस लडक़े की जगह अपना चंदू ही होता तो…!!!’

सोमनाथ होड़ का कलाकर्म जनांदोलनों से जुड़ने के लिए प्रेरित करता है: अशोक भौमिक

 

नई दिल्ली: सोमनाथ होड़ का कलाकर्म कलाकार को जनांदोलनों से जु़ड़ने के लिए यह प्रेरित करता है। यह बात चर्चित चित्रकार व साहित्यकार अशोक भौमिक ने कौस्तुभ सभागार, ललित कला अकादमी, नई दिल्ली में जसम के फिल्म समूह द ग्रुप की ओर से ‘तेभागा आंदोलन और सोमनाथ होड़ का कलाकर्म’ विषय पर आयोजित व्याख्यान-प्रदर्शन में कही। यह आयोजन हिंदी के मशहूर कवि शमशेर बहादुर सिंह, जो कि एक चित्रकार भी थे, की याद को समर्पित था। यह वर्ष शमशेर का जन्मशताब्दी वर्ष भी है। अशोक भौमिक ने बताया कि 1946 में भारत की अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी ने 23 साल के युवा कला छात्र सोमनाथ होड़ को तेभागा आंदोलन को दर्ज करने का कार्य सौंपा था। सोमनाथ होड़ ने किसानों के उस जबर्दस्त राजनीतिक उभार और उनकी लड़ाकू चेतना को अपने चित्रों और रेखांकनों में तो अभिव्यक्ति दी ही, साथ-साथ अपने अनुभवों को डायरी में भी दर्ज किया। उनकी डायरी और रेखाचित्र एक जन प्रतिबद्ध कलाकार द्वारा दर्ज किया गया किसान आंदोलन का अद्भुत ऐतिहासिक दस्तावेज है।

उन्होंने सोमनाथ होड़ के रेखाचित्रों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। बीच-बीच में उनकी डायरी के अंशों का जिक्र करते हुए कहा कि 1942 से लेकर 1946 तक सोमनाथ होड़ की कला का सफर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा जनांदोलनों को संगठित करने के समानांतर विकसित होते दिखता है। यही वह दौर था जब सांप्रदायिक शक्तियां भी मजबूती से सर उठा रही थीं। तेभागा आंदोलन में किसानों ने भूस्वामियों की सांप्रदायिक रणनीति का भी जोरदार जवाब दिया। किसान परिवार की महिलाओं ने भी इस संघर्ष में शानदार भूमिका निभाई। इस आंदोलन के प्रत्यक्ष अनुभव सोमनाथ होड़ के लिए आजीवन प्रेरणा का स्रोत बने रहे। उनका उस आंदोलन के केंद्र रंगपुर में जाना, एक रचनाकार का राजनीतिक गतिविधियो और सक्रिय आंदोलनों के करीब जाने की जरूरत को आज भी रेखांकित करता है। सोमनाथ होड़ द्वारा डायरी में एक बेहद गरीब किसान द्वारा एक जोतदार के प्रलोभन को ठुकरा दिए जाने की घटना की तुलना नेहरू के कथनी और करनी के फर्क से जिस तरह की गई है, वह एक तीखा राजनैतिक व्यंग्य है। सोमनाथ होड़ को मूल्यों के मामले में किसान एक प्रधानमंत्री से बेहतर लगता है, क्योंकि उसे घूस लेना नहीं आता- वह अपना हक लड़ कर लेना चाहता है।

कार्यक्रम का संचालन युवा मार्क्सवादी विचारक पथिक घोष ने किया। अध्यक्षता कर रहे सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि इस व्याख्यान-प्रदर्शन के जरिए एक तरह से तेभागा के क्रांतिकारी किसान आंदोलन का इतिहास जीवंत हो उठा। प्रो. पांडेय ने तेभागा आंदोलन में संथाल आदिवासियों और महिलाओं की जबर्दस्त भूमिका की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि आज कला की दुनिया पर बाजार का जिस तरह कब्जा हो गया है उसने चित्रकारों की राजनीतिक भूमिका को कमजोर किया है। ऐसा नहीं है कि आज चित्रकला का राजनीतिक प्रभाव कम हो गया है, बल्कि हुआ यह है कि राजनीतिक चित्रकार कम हो गए हैं। प्रो. पांडेय ने कहा कि आज इस देश में जब सरकार की कारपोरेटपरस्त अर्थनीति के कारण लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं और जब जमीन और जंगल से किसानों और आदिवासियों को बेदखल करने के लिए सरकार जनसंहार कर रही है, तब कलाकारों का यह दायित्व है कि वे उसके प्रतिरोध में खड़े हों, उन सच्चाइयों को अपने कलाकर्म के जरिए दर्शाएं, जिनपर पर्दा डाला जा रहा है।

विचार-विमर्श के सत्र में वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि सोमनाथ होड़ ने आगे चलकर किस तरह का सृजन किया व्याख्यान में इसकी झलक भी होनी चाहिए थी। कवि रोहित प्रकाश ने तेभागा और आजादी के बाद के जनांदोलनों का जिक्र करते हुए उनके चित्रकला पर प्रभाव को लेकर सवाल किया। संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन ने उस दौर के साहित्यकारों और कलाकारों के सौंदर्यबोध को निर्मित करने में राजनीति और संस्कृति के गहन रिश्ते की जो भूमिका थी, उसे चिह्नित किया।

आयोजन के अंत में दो मिनट का मौन रखकर उत्तराखंड के आंदोलनकारी जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा के असामयिक निधन पर शोक प्रकट किया गया। मुरली मनोहर प्रसाद, अशोक वाजपेयी, प्रयाग शुक्ल, इब्बार रबी, रेखा अवस्थी, कांति मोहन, अनिल सिन्हा, नीलाभ, मदन कश्यप, प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, वैभव सिंह, स्वाति भौमिक, मधु अग्रवाल, राधिका, नंदिनी चंद्रा, भाषा सिंह, उमा, वंदना, प्रदीप दास, अनुपम राय, अजय भारद्वाज, मोहन जोशी, गौरीनाथ, कुमार मुकुल, पंकज श्रीवास्तव, रोहित कौशिक, अवधेश आदि कई जाने माने साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी और टेकानिया कला विद्यालय के छात्रा-छात्राएं मौजूद थे।

केदारनाथ और खुशवंत को साहित्य अकादेमी फेलोशिप

नई दिल्ली : हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार केदारनाथ सिंह, प्रख्यात स्तंभकार व लेखक खुशवंत सिंह और मैथिली के जाने-माने लेखक चंद्रनाथ मिश्र अमर को साहित्य अकादमी ने फेलो सम्मान से सम्मानित करने की घोषण की है। यह सम्मान नागार्जुन, अमृता प्रीतम, कृष्णा सोबती जैसे लेखकों को दिया जा चुका है।

साहित्य अकादमी ने भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य को बढ़ावा देने के लिए इस वर्ष से 20 लेखकों को बाल साहित्य पुरस्कार देने की भी घोषणा की है। अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं के दस लेखकों को वर्ष 2009 के भाषा सम्मान के लिए चुना गया है।
हिंदी साहित्य का बाल साहित्य पुरस्कार लेखक प्रकाश मनु को दिया जा रहा है। इसके अलावा गगन चंद्र अधिकारी (बाल साहित्य में पूर्ण योगदान के लिए-असमी भाषा), सरल डे (बाल साहित्य में पूर्ण योगदान के लिए-बंगाली), जसबीर भुल्लर(पंजाबी उपन्यास), दामयंती जडवाल चंचल(राजस्थानी छोटी कहानियां ), गुलाम हैदर (उर्दू छोटी कहानियां), कलुवकोलनू सरदनंदा (तेलुगु उपन्यास), मा कमलावेलन (तमिल उपन्यास), किमन यू मुलानी(सिंधी कविता), बोय्हा बिस्वंथ तुडु (संथाली), पुन्यप्रभा देवी (ओडिसा छोटी कहानियां), नैना सिंह योनजान (नेपाली बाल साहित्य में पूर्ण योगदान के लिए), अनिल अवचत (मराठी छोटी कहानियां), सिप्पी पल्लीपुरम (मलयालम छोटी कहानियां), तारा नंद वियोगी (मैथिली छोटी कहानियां), प्रकाश परिएक्कर (कोंकणी नाटक), बालुवारू मोहम्मद कुन्ही (कन्नड़), मिनी श्रीनिवासन (अंग्रेजी उपन्यास), ज्ञानेश्वर(डोगरी), नवीन मल्ला बारो (बोडो) शामिल हैं। गुजराती, कश्मीरी, मणिपुर तथा संस्कृत के लेखकों की घोषणा बाद में की जाएगी। इन्हें पुरस्कार स्वरूप 50 हजार रुपय, प्रशस्ति पत्र तथा प्रतीक चिह्नï प्रदान किए जाएंगे। सभी लेखकों को यह सम्मान नवंबर में एक कार्यक्रम के दौरान दिए जाने हैं।
भाषा सम्मान पाने वाले लेखकों में पंजाबी सूफी साहित्य विशेषज्ञ डॉ. गुरुदेव सिंह तथा दक्षिण भारत के क्लासिक एवं मध्यकालीन साहित्य के लिए प्रो. कोरलापति राममूर्ति को चुना गया है। पुरस्कृत होने वाले अन्य लेखकों में माधव जोशी अश्क तथा तेजपाल दर्शी तेज (काछी भाषा में अभूतपूर्व योगदान के लिए संयुक्त पुरस्कार), विश्वनाथ पाठक (अवधी भाषा तथा साहित्य), सुदामा प्रसाद प्रेमी तथा प्रेमलाल भट्ट (गढ़वाली भाषा तथा साहित्य), डॉ राम नारायण शर्मा तथा डॉ. कैलाश बेहारी द्विवेदी (बुंदेली भाषा तथा साहित्य), निरंजन चकमा (चकमा भाषा तथा साहित्य) हैं। इन सभी लेखकों को एक-एक लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र तथा प्रतीक चिह्न दिए जाएंगे।

जनकवि गिर्दा की कुछ कविताएं

उत्तराखंड के जनकवि गिरीश चंद्र तिबाडी गिर्दा का पिछले दिनों निधन हो गया। श्रद्धांजलि स्वरूप उनकी कुछ कविताएं दे रहे हैं। ये कविताएं उनकी प्रतिबद्धता और जन-समाज के प्रति उनकी चिंताओं को रेखांकित करती हैं-  

है किसका अधिकार नदी पर

चलो नदी तट वार चलो रे
चलो नदी तट पार चलो रे,करें यात्रा नदियों की
नदी वार तट पार चलो रे,करें यात्रा नदियों की
इन नदियों के अगल-बगल ही
जीवन का विस्तार,चलो रे करें यात्रा नदियों की
आज इन्हीं नदियों के ऊपर
पड़ी है मारामार, चलो रे करें यात्रा नदियों की
टुकड़ा-टुकड़ा नदी बिक रही
बूँद-बूँद जल भर, चलो रे करें यात्रा नदियों की
गाँव हमारे, नदी किनारे
सूखा कंठ हमारा, चलो रे करें यात्रा नदियों की
जल में बोतल,बोतल में जल
प्यासा पर संसार, चलो रे करें यात्रा नदियों की
सूखा गीला बादर-बिजुली
सबकी हम पर मार, चलो रे करें यात्रा नदियों की
प्रश्न यही कि नदी पर पहला
किसका है अधिकार, चलो रे करें यात्रा नदियों की
नहीं किसी की नदी मौरूसी
हम पहले हकदार, चलो रे करें यात्रा नदियों की
बहता पानी,चलता जीवन
थमा कि हाहाकार, चलो रे करें यात्रा नदियों की

मोरि कोसि हरै गे कोसि

जोड़ – आम-बुबु सुणूँ छी
गदगदानी ऊँ छी
रामनङर पुजूँ छी
कौशिकै की कूँ छी
पिनाथ बै ऊँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
कौशिकै की कूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

क्या रोपै लगूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
क्या स्यारा छजूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

घट-कुला रिङू छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
कास माछा खऊँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

जतकाला नऊँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
पितर तरूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

पिनाथ बै ऊँछी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
रामनङर पुजूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

जोड़ – रामनङर पुजूँ छी,
आँचुई भर्यूँ छी, – (ऐ छू बात समझ में ? जो चेली पहाड़ बै रामनगर बेवई भै, उ कूँणै यो बात) –
पिनाथ बै ऊँ छी,
रामनगङर पुजूँ छी,
आँचुई भर्यूँ छी,
मैं मुखड़ि देखूँ छी,
छैल छुटी ऊँ छी,
भै मुखड़ि देखूँ छी,
अब कुचैलि है गे मेरि कोसि हरै गे कोसि।
तिरङुली जै रै गे मेरि कोसि हरै गे कोसि।
हाई पाँणी-पाणि है गे मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

भावार्थ: दादा-दादी सुनाते थे कि किस तरह इठलाती हुई आती थी कोसी। रामनगर पहुँचाती थी, कौशिक ऋषि की कहलाती थी। अब जाने कहाँ खो गई मेरी वह कोसी ? क्या रोपाई लगाती थी, सेरे (खेत) सजाती थी, पनचक्की घुमाती थी। क्या मछली खिलाती थी वाह !….. आह ! वह कोसी कहाँ खो गई ? जतकालों को नहलाती थी (जच्चा प्रसूति की शुद्धि)। पितरों को तारती थी। पिनाथ से आती थी, रामनगर पहुँचाती थी। रामनगर ब्याही पहाड़ की बेटी कह रही है कि – कोसी का पानी अंचुरि में लेने के साथ ही छाया उतर आती थी अंचुरि में माँ-भाई के स्नेहिल चेहरे की। कहाँ खो गया कोसी का वह निर्मल स्वच्छ स्वरूप। अब तो मैली-कुचैली तिरङुगली (छोटी) अंगुली की तरह रह गई है एक रेखा मात्र। हाय, पानी पानी हो गई है। मेरी कोसी खो गई है।

 

क्या करें?

 
हालाते सरकार ऎसी हो पड़ी तो क्या करें?
हो गई लाजिम जलानी झोपड़ी तो क्या करें?
हादसा बस यों कि बच्चों में उछाली कंकरी,
वो पलट के गोलाबारी हो गई तो क्या करें?
गोलियां कोई निशाना बांध कर दागी थी क्या?
खुद निशाने पै पड़ी आ खोपड़ी तो क्या करें?
खाम-खां ही ताड़ तिल का कर दिया करते हैं लोग,
वो पुलिस है, उससे हत्या हो पड़ी तो क्या करें?
कांड पर संसद तलक ने शोक प्रकट कर दिया,
जनता अपनी लाश बाबत रो पड़ी तो क्या करें?
आप इतनी बात लेकर बेवजह नाशाद हैं,
रेजगारी जेब की थी, खो पड़ी तो क्या करें?
आप जैसी दूरदृष्टि, आप जैसे हौंसले,
देश की आत्मा गर सो पड़ी तो क्या करें?
यह कविता उत्तराखण्ड के जनकवि श्री गिरीश चन्द्र तिवारी “गिर्दा” ने दिनांक 8 अक्टूबर, 1983 को नैनीताल में हुई पुलिस फायरिंग के बाद लिखी थी।     
 
 

चुनावी रंग

 
यह रंग चुनावी रंग ठेरा, इस ओर चला, उस ओर चला,
तुम पर भी चढ़ा, हम पर भी चढ़ा, जिस पर भी चढ़ा, घनघोर चढ़ा,
गालों पर चढ़ा, बालों पर चढ़ा, मूछों में चढ़ा, दाढ़ी में चढ़ा,
आंखों में चढ़ा, सांसों में चढ़ा, धमनी में चढ़ा, नाड़ी में चढ़ा,
हाथों में चढ़ा, पांवों में चढ़ा, घुटनों में चढ़ा, जोड़ों में चढ़ा,
खुजली में चढ़ा, खांसी में चढ़ा, फुंसी में चढ़ा, फोड़ों में चढ़ा,
आसन में चढ़ा, शासन में चढ़ा, भाषण में उदघाटन में चढ़ा,
न्यासों में-शिलान्यासों में चढ़ा, यशगान-गीत-कीर्तन में चढ़ा,
उल्फत में चढ़ा, हुज्जत में चढ़ा, फोकट में चढ़ा, कीमत में चढ़ा,
मंदिर में चढ़ा, मस्जिद में चढ़ा, पूजा में चढ़ा, मन्नत में चढ़ा,
पुडि़या में चढ़ा, गुड़िया में चढा़, पव्वे में चढ़ा, बोतल में चढ़ा,
कुल्हड़ में चढ़ा, हुल्लड़ में चढ़ा, कुल देखो तो टोटल में चढ़ा,
चहुं ओर चढ़ा, घनघोर चढा, झकझोर चढ़ा, पुरजोर चढ़ा,
यह रंग चुनावी रंग ठैरा, इस ओर चढ़ा, उस ओर चढ़ा॥
 

सियासी उलट बाँसी

 
पानी बिच मीन पियासी
खेतो में भूख उदासी
यह उलट बाँसियाँ नहीं कबीरा, खालिस चाल सियासी
पानी बिच मीन पियासी
लोहे का सर पाँव काठ के
बीस बरस में हुए साठ के
मेरे ग्राम निवासी कबीरा, झोपड़पट्टी वासी
पानी बिच मीन पियासी
सोया बच्चा गाये लोरी
पहरेदार करे है चोरी
जुर्म करे है न्याय निवारण, नयाय चढ़े है फाँसी
पानी बिच मीन पियासी
बंगले में जंगला लग जाये
जंगल में बंगला लग जाय
वन बिल ऐसा लागू होगा, मरे भले वनवासी
पानी बिच मीन पियासी
जो कमाय सो रहे फकीरा
बैठे – ठाले भरें जखीरा
भेद यही गहरा है कबीरा, दीखे बात जरा सी
पानी बिच मीन पियासी

इस व्योपारी को प्यास बहुत है
 

एक तरफ बर्बाद बस्तियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ डूबती कश्तियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ हैं सूखी नदियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ है प्यासी दुनियाँ – एक तरफ हो तुम।

अजी वाह ! क्या बात तुम्हारी,
तुम तो पानी के व्योपारी,
खेल तुम्हारा, तुम्हीं खिलाड़ी,
बिछी हुई ये बिसात तुम्हारी,

सारा पानी चूस रहे हो,
नदी-समन्दर लूट रहे हो,
गंगा-यमुना की छाती पर
कंकड़-पत्थर कूट रहे हो,

उफ!! तुम्हारी ये खुदगर्जी,
चलेगी कब तक ये मनमर्जी,
जिस दिन डोलगी ये धरती,
सर से निकलेगी सब मस्ती,

महल-चौबारे बह जायेंगे
खाली रौखड़ रह जायेंगे
बूँद-बूँद को तरसोगे जब –
बोल व्योपारी – तब क्या होगा ?
नगद – उधारी – तब क्या होगा ??

आज भले ही मौज उड़ा लो,
नदियों को प्यासा तड़पा लो,
गंगा को कीचड़ कर डालो,

लेकिन डोलेगी जब धरती – बोल व्योपारी – तब क्या होगा ?
वर्ल्ड बैंक के टोकनधारी – तब क्या होगा ?
योजनकारी – तब क्या होगा ?
नगद-उधारी तब क्या होगा ?
एक तरफ हैं सूखी नदियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ है प्यासी दुनियाँ – एक तरफ हो तुम।

कुमानी कविता का हिंदी अनुवाद

जैंता एक दिन तो आयेगा
इतनी उदास मत हो
सर घुटने मे मत टेक जैंता
आयेगा, वो दिन अवश्य आयेगा एक दिन

जब यह काली रात ढलेगी
पो फटेगी, चिडिया चह्केगी
वो दिन आयेगा, जरूर आयेगा

जब चौर नही फलेंगे
नही चलेगा जबरन किसी का ज़ोर
वो दिन आयेगा, जरूर आयेगा

जब छोटा- बड़ा नही रहेगा
तेरा-मेरा नही रहेगा
वो दिन आयेगा

चाहे हम न ला सके
चाहे तुम न ला सको
मगर लायेगा, कोई न कोई तो लायेगा
वो दिन आयेगा

उस दिन हम होंगे तो नही
पर हम होंगे ही उसी दिन
जैंता ! वो जो दिन आयेगा एक दिन इस दुनिया मे ,
जरूर आयेगा,

(ये कविताएं नैनीताल समाचार, जसम लखनऊ, स्वप्नदर्शी, मेरा पहाड़ फोरम आदि से ली गईं। सभी का आभार)

संजय ग्रोवर की तीन गजलें

लेखन के साथ-साथ चित्रांकन में दखल रखने वाले संजय ग्रोवर की दो पुस्तकें गजल संग्रह ‘खुदाओं के शहर में आदमी’ तथा व्यंग्य संग्रह ‘मरा हुआ लेखक सवा लाख का’ प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी तीन गजलें-

1

पागलों की इस कदर कुछ बदगु़मानी बढ़ गयी
उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी
 
उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था
हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी
 
भीड़ का उनको नशा था, बोतलें करती भी क्या
तिसपे रसमों-रीतियों की सरगिरानी बढ़ गयी
 
छोटे शहरों, छोटे लोगों को मदद मिलनी तो थी
हाकिमों के रास्ते में राजधानी पड़ गयी
 
कुछ अलग लिक्खोगी तो तुम खुद अलग पड़ जाओगी
यूं ग़ज़ल को झांसा दे, आगे कहानी बढ़ गयी
 
‘वार्ड नं. छ’ को ‘टोबा टेक सिंह’ ने जब छुआ
किस कदर छोटी मिसाले-आसमानी पड़ गयी
 
दिल में फ़िर उट्ठे ख्याल ज़हन में ताज़ा सवाल
आए दिन कुछ इस तरह मुझपर जवानी चढ़ गयी
 

2

उसको मैं अच्छा लगता था
मैं इसमें क्या कर सकता था
 
एक ग़ज़ब की सिफ़त थी मुझमें
रोते-रोते हंस सकता था
 
नज़र थी उसपे जिसके लिए मैं
फ़कत गली का इक लड़का था
 
जाने क्यूं सब दाँव पे रक्खा
चाहता तो मैं बच सकता था
 
मेरा ख़ुदको सच्चा कहना
उसे बुरा भी लग सकता था
 
मेरा उसको अच्छा कहना
उसे बुरा भी लग सकता था
 
बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
किसी भी हद तक गिर सकता था
 
ख़ानदान और वंश के झगड़े !
मै तो केवल हंस सकता था
 

3

मोहरा, अफवाहें फैला कर            
बात करे क्या आँख मिला कर
 
औरत को माँ-बहिन कहेगा
लेकिन, थोड़ा आँख दबाकर
 
पर्वत को राई कर देगा
अपने तिल का ताड़ बना कर
 
वक़्त है उसका, यारी कर ले
यार मेरे कुछ तो समझा कर
 
ख़ुदको ही कुछ समझ न आया
जब बाहर निकला समझा कर

लोकगीतों के बीच जनकवि गिर्दा को अंतिम विदाई

नई दिल्ली : जनकवि गिरीश चंद्र तिवाडी ‘गिर्दा’ को जनवादी तरीके से अंतिम विदाई दी गई। गिर्दा का 22 अगस्त को सुशीला तिवारी चिकित्सालय, हल्द्वानी में देहांत हो गया था। कई दिनों से उनकी तबीयत खराब चल रही थी।
नैनीताल में निवास कर रहे गिर्दा का 23 अगस्त को अंतिम संस्कार पाईन्स श्मशानघाट पर किया गया। हजारों लोगों ने नम आंखों से अपने प्रिय कवि को अंतिम विदाई दी। गिर्दा की इच्छा के मुताबिक उनकी शवयात्रा उनके ही गीत से शुरू हुई। गिर्दा को उनके पुत्र तुहिनांश तिवाड़ी और दत्तक पुत्र प्रेम सिंह ‘पिरम’ ने मुखाग्नि दी।
सुबह करीब 10 बजे उनकी अंतिम यात्रा उनके गीत ‘ततुक नि लगा उदेख, घुनन मुनई न टेक, जैंता एक दिन त आलो…’ से शुरू हुई। शवयात्रा में ‘आज हिमाल तुमूकें धत्यूंछौ’, ‘हम लड़ते रयां भुला…’, ‘उत्तराखंड मेरी मातृभूमी, मातृभूमी मेरी पितृभूमी…’ और ‘हमारी ख्वाहिशों का नाम इंकलाब है…’ जैसे गीत गाए गए। यह सिलसिला श्मशानघाट तक चलता रहा। उनका दाह संस्कार भी उनके गीतों के बीच किया गया।
परम्परा  के विपरीत कई महिलाएं भी गिर्दा की अंतिम यात्रा में शामिल हुर्इं। उन्होंने अर्थी का कंधा भी दिया। अंतिम यात्रा में हर तबके और जाति-धर्म के लोग थे। लेखकों, पत्रकारों, रंगकमिर्यों, प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं अलावा मजूदर, नाविक, रिक्शाचालक आदि भी थे। गिर्दा को अंतिम विदाई देने के लिए अल्मोड़ा, देहरादून, लखनऊ आदि विभिन्न जगहों से लोग आए।
इस दौरान राजीव लोचन साह, डा. शेखर पाठक, रंगकर्मी जहूर आलम, वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी, राजेश जोशी, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी अध्यक्ष पीसी तिवारी, उलोवा के डा. शमशेर सिंह बिष्ट, बड़े भाई रजनी कुमार तिवारी, आशीष त्रिपाठी, जनकवि बल्ली सिंह चीमा, प्रभात ध्यानी, डा. गिरिजा पांडे, डा. भुवन शर्मा आदि शामिल थे।
सुप्रसिद्ध रंगकर्मी जहूर आलम ने बताया कि वैसे तो नैनीताल में रंगमंच की पुरानी परम्परा है। 1976 में कुमाऊं विश्वविद्यालय के बीडीएस कैंपस की सिल्वर जुबली थी। तब पहली बार किसी आधुनिक नाटक ‘अंधायुग’ का मंचन किया गया। इसके निर्देशन के लिए लेनिन पंत को दिल्ली से बुलवाया गया था। इस आयोजन में गिर्दा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने इस नाटक में लोक गीत-संगीत को जोड़ा। इसी वर्ष ‘युगमंच’ की स्थापना हुई। इसमें गिर्दा का अहम रोल रहा। कई नाटक किए। इमरजेंसी के दौरान गिर्दा के निर्देशन में घोर शासन विरोधी नाटक ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ हुआ।
‘पहाड़Ó के संपादक शेखर पाठक ने कहा कि सब गिर्दा को जनकवि के रूप में जानते हैं, लेकिन वह संस्कृतिकमी, संगीतकार, आंदोलनकारी भी थे। जन आंदोलनों में उन्होंने सक्रिय भाग लिया। ब्राह्मïण के रूप में जन्म लिया, लेकिन ब्राह्मïणवादी व्यवस्था और जाति व्यवस्था के विरोधी थे। सबसे बड़कर वह मानवतावादी थे। लोगों को जोडऩे वाले थे। संस्कृति के वाहक थे।

उत्तराखंड के जनकवि गिर्दा का निधन

नई दिल्ली: उत्तराखंड के जनकवि गिरीश चंद्र तिवाडी ‘गिर्दा’ का 22 अगस्त सुबह हल्द्वानी में देहांत हो गया। वह काफी समय से बीमार चल रहे थे। उनकी अंत्येष्टि 23 अगस्त सुबह पाईन्स, नैनीताल में होगी। 
उनका जन्म 9 सितंबर, 1945 को अल्मोड़ा के ज्योली हवालबाग गांव में हंसादत्त तिवाडी और जीवंती तिवाडी के घर हुआ था।
वह आजीवन जन संघर्षों से जुड़े रहे और अपनी कविताओं में जन पीड़ा को सशक्त अभिव्यक्ति दी।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान सरकारी उत्पीडऩ व दमन का परिहास करती गिर्दा की यह पंक्तियां उनके सरोकारों को दर्शाती हैं-
गोलियां कोई निशाना बांधकर दागी थी क्या?
खुद निशाने पर आ पङ़ी खोपड़ी तो क्या करें?
खामख्वां ही तिल का ताड़ बना देते हैं लोग,
वो पुलिस है, उससे हत्या हो पड़ी तो क्या करें?
काण्ड पर संसद तलक ने शोक प्रकट कर दिया,
जनता अपनी लाश बाबत, रो पड़े तो क्या करें?
आप जैसी दूरद्रष्टि, आप जैसे हौंसले,
देश की ही आत्मा गर सो गई तो क्या करें?

हुजूर! यह विकास का मतलब क्या होता है?

पिछले दिनों ब्लॉग हाशिया पर नृतत्वशास्त्री फेलिक्स पैडेल और समरेंद्र दास की शोधपरक रिपोर्ट पढऩे को मिली। यह रिपोर्ट तथाकथित विकास की अवधारण पर पुनर्विचार की मांग करती है। इस रिपोर्ट को ज्यों का त्यों हाशिया से साभार प्रस्तुत कर रहे हैं-

भारत समेत तीसरी दुनिया के अर्धउपनिवेशों के लिए विकास का क्या मतलब है? सिर्फ यह कि वे अपने संसाधनों और सस्ते श्रम को विकसित साम्राज्यवादी देशों के बहुराष्ट्रीय निगमों के मुनाफे और अपार लालच के लिए उन्हें सौंप दें? और इन कथित विकासशील देशों में लोकतंत्र का क्या मतलब है? यह कि अपने संसाधनों की लूट का विरोध कर रही अपनी जनता को संसद में बनाए कानूनों के जरिए बंदूक और सेना के बल पर चुप रखना या कुचल देना। पश्चिम बंगाल से लेकर उड़ीसा, झारखंड और बस्तर तक यही चल रहा है। पूरे भारत में और पूरी दुनिया में विकास और लोकतंत्र के नाम पर पर जो हो रहा है, उसके निहितार्थ क्या हैं? इससे किनको फायदा हो रहा है? जाने-माने नृतत्वशास्त्री फेलिक्स पैडेल और समरेंद्र दास की यह शोधपरक रिपोर्ट हमें इसका ब्योरा देती है। इसे हम पानोस दक्षिण एशिया की पुस्तक बुलडोजर और महुआ के फूल से साभार पेश कर रहे हैं। एक विनम्र सूचना यह भी कि पुस्तक में प्रकाशित मूल अनुवाद की कुछ गलतियों को हमने सुधारने की कोशिश की है।

फेलिक्स पैडेल और समरेंद्र दास  

 उड़ीसा में अल्युमिनियम की तलाश का नतीजा सांस्कृतिक जनसंहार के रूप में सामने आया है। विस्थापन ने जहां एक ओर आदिवासी समाज की संरचना की रीढ़ तोड़ दी है, वहीं कारखानों से फैलते प्रदूषण ने इलाके से खेती की संभावना समाप्त करके यहां के बाशिंदों से उनकी जीविका का सबसे अहम स्रोत छीन लिया है। चूंकि अल्युमिनियम उत्पादन को आगे बढ़ाने में हथियारों के उद्योग का वरदहस्त है, इसलिए स्थानीय लोगों की ओर कोई ध्यान भी नहीं देता और यह कहीं ज्यादा आपराधिक है।
औद्योगीकरण की एक नई आंधी, जिसे विकास, उन्नति और गरीबी निवारण की आड़ में थोपने की कोशिश हो रही है, से उड़ीसा और उसके पड़ोसी राज्यों के सैकड़ों गांवों के विस्थापन का खतरा पैदा हो गया है। खनन, धातु शोधन, बांध और ऊर्जा संयंत्र के लिए आदर्श जगहों के रूप में चिह्नित ये सारे इलाके आदिवासियों के रिहायशी स्थल हैं, जिनके नुकसान को विकास की अंधी दौड़ में एक ऐसी चीज के रूप में देखा जा रहा है जिससे बचा नहीं जा सकता।
पिछले 60 वर्षों में भारत में औद्योगीकरण की वजह से कोई छह करोड़ लोग पहले से ही विस्थापित हो चुके हैं। इनमें से कोई 20 लाख वंचित लोग उड़ीसा में रहते हैं और चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 75 प्रतिशत लोग आदिवासी या दलित हैं। इनमें से कुछ ही लोगों को समुचित मुआवजा मिला और अधिकांश लोगों के जीवन स्तर में किसी तरह का कोई सुधार नहीं हुआ, हालांकि बड़ी बेशर्मी से कहा यही जाता है कि विकास की शुरुआत विस्थापन से होती है। विस्थापितों के अनुसार सच यह है कि परियोजनाओं के उल्टे नतीजे निकले हैं। गरीबी की जिन हदों तक ये लोग पहुंच गए हैं, वे उतनी ही तकलीफदेह हैं जितनी उनकी सांस्कृतिक मान्यताओं और परम्पराओं के टूटने की कसक। यह कसक निश्चित रूप से उस जमीन के साथ रिश्ता बिगडऩे से पैदा होती है जिसे कभी उन्होंने खुद या उनके पुरखों ने जोता था।
इस प्रक्रिया को किस प्रकार समझा जा सकता है? हममें से हर किसी को एक न एक क्षेत्र में विशिष्टता हासिल है मगर जो कुछ घटित हो रहा है, उसे समझने के लिए हमें बहुआयामी माध्यम अपनाना पड़ेगा। मानव ज्ञान के अनुसार किसी भी चीज की समझदारी विकसित करने के लिए हमें सम्बद्ध व्यक्तियों के अभिमत को उन्हीं के शब्दों में सुन कर समझने का प्रयास करना होगा। मगर हममें से कम ही लोग ऐसे हैं जो यह सुनना चाहते हैं कि आदिवासी लोग कह क्या रहे हैं। हम लोग जानते हैं कि हजारों आदिवासियों को पूरे भारत में सभा-सम्मेलनों में ले जाने के लिए घुमाया जाता है, मगर रोड शो में उन्हें दर-किनार कर दिया जाता है। शायद ही उनसे कभी कहा जाता हो कि वे अपनी बात सबके सामने रखें, पूरी मीटिंग में वे अपने चेहरे पर एक गौरवशाली चुप्पी लेकर बैठे रहते हैं और फिर अपने गांव वापस चले जाते हैं। उन्हें उन लोगों की नासमझी सालती है जो यह दावा करते हैं कि वे उनकी मदद करेंगे।

सांस्कृतिक जनसंहार

भारत की मौजूदा औद्योगीकरण की प्रक्रिया उसकी विकास दर को तो बढ़ा सकती है, मगर इसका आदिवासियों पर प्रभाव किसी सांस्कृतिक जनसंहार से कम नहीं है। आदिवासी संस्कृति उनकी सामाजिक संस्थाओं द्वारा कायम संबंधों के आधार पर जीवंत बनी रहती है और विस्थापन इसी पारस्परिक बंधन के चिथड़े उड़ा देता है।
खेती की परम्परा और उसके साथ जुड़ी हुई आर्थिक व्यवस्था तब बिखर जाती है, जब लोग जमीन से कट जाते हैं और फिर कभी किसानों की तरह काम नहीं कर सकते। नाते-रिश्तों में दरार पड़ जाती है क्योंकि पारम्परिक रूप से सामाजिक रिश्ते गांवों की संरचना और दूसरे गांवों में रह रहे अपने आत्मीय स्वजनों से पारस्परिक दूरी पर निर्भर करते हैं। इलाके में किसी भी खनन कंपनी का प्रवेश निर्विवाद रूप से लोगों को उसके पक्ष या विपक्ष में बांट देता है। किसी भी इलाके में अगर किसी परियोजना की वजह से विस्थापन होता है तो वहां ऐसे लोगों के बीच जो मुआवजे की रकम स्वीकार कर लेते हैं और अपना घर-बार छोड़ कर ले जाते हैं और वे लोग जो इस योजना का विरोध करते हैं, हमेशा एक तनाव बना रहता है।
धार्मिक व्यवस्था दरक जाती है क्योंकि गांव के पवित्र पूजा स्थल हटा दिए जाते हैं और वे पहाड़ जिन्हें लोग सम्मान से देखते थे, उनकी खुदाई हो जाती है। लांजीगढ़ रिफाइनरी के निर्माण का रास्ता आसान करने के लिए किनारी गांव के बाशिंदों को वेदांतानगर ले जाया गया। उनमें से एक महिला ने गांव में बुलडोजर चलते देखा, जिसने गांव के सामूहिक पृथ्वी मंदिर को सपाट कर दिया। उसने इस जबरन विस्थापन की घटना के कुछ दिन बाद हम लोगों को बताया, ’हमारे देवता तक नष्ट हो गए।’ उसके लिए उसके पास जमीन न होने का मतलब था कि वह अब अपने लिए कभी भी अन्न का उत्पादन नहीं कर पाएंगी। पारम्परिक जीवन शैली की सारी मान्यताएं जिनसे लोग ऊर्जा पाते थे, वे सब ध्वस्त हो गईं।
स्थानीय तौर पर उपलब्ध सामग्रियों की संस्कृति, जिसके पास जो है उसका सबसे बेहतर इस्तेमाल कर लेना, वह भी उसी समय ध्वंस हो गई जब स्थानीय मिट्टी और लकड़ी के बने घरों को गिरा कर उनकी जगह कंक्रीट के घर बना दिए गए। लेकिन सबसे बड़ी बात हुई समाज व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन। कल तक जहां लोग अपने क्षेत्र और अपने संसाधनों के मालिक थे, वही आज अपने आप को शक्ति और क्षमता के एक जबरदस्त सीढ़ीनुमा प्रशासन तंत्र की सबसे निचली पायदान पर फेंका हुआ पाते हैं।
इस पूरे काले कारनामे में भ्रष्टाचार की अपनी भूमिका है जिसकी वजह से पूरा का पूरा गांव परियोजनाओं के हवाले हो जाता है और भले ही यह सब टेबुल के नीचे होता हो, मगर इसका समाज पर एक बहुत ही नकारात्मक प्रभाव जरूर पड़ता है। इससे लोगों का ध्रुवीकरण होता है, सम्पत्तिशाली वर्ग की सम्पत्ति उत्तरोत्तर बढ़ती है और उनके ‘भोग-विलास’ के क्रम में पहले से कहीं ज्यादा बदतरी और बेशर्मी देखने को मिलती है।
फरवरी 21, 2007 के उडिय़ा समाचार पत्र ‘सम्बाद’ के मुख पृष्ठ पर तालचर के निकट की एक कोयला खदान के एक नए स्कैंडल की खबर छपी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि टंगरापड़ा, नियमगिरी और खंडधरा खनन लीजों के मामले के न सुलझने के बावजूद एक अकेली खदान की लीज हासिल करने के लिए 200 करोड़ रुपयों (लगभग 45 मिलियन डॉलर) की घूस दी गई है। टंगरापड़ा खदान जाजपुर जिले में क्रोमाइट डिपॉजिट की खान है जिसकी लीज िजंदल स्ट्रिप्स को दी गई थी। लेकिन उड़ीसा उच्च न्यायालय ने इस अनुबंध की यह कर आलोचना की थी कि अगर योजना के अनुसार खदान का काम आगे बढ़ाया गया तो राज्य को 450 करोड़ डॉलर का नुकसान होगा। नियमगिरी उड़ीसा का सबसे अधिक विवादास्पद बॉक्साइट भंडार है जिसका विस्तार कालाहाण्डी और रायगड़ा जिलों तक फैला हुआ है, जबकि खंडधरा क्योंझर जिले का एक जंगल है जिसके पहाड़ों में प्रचुर मात्रा में लौह अयस्क उपलब्ध है।

यह सम्पत्ति किसकी है?

उड़ीसा के समृद्ध संसाधनों से बहुत से विवादों का जन्म होता है, इसमें ‘विकासÓ के हामी काफी बड़े हिस्से पर हाथ साफ कर देते हैं, जबकि इस इलाके में लंबे समय से रहने वाले आदिवासी वंचित रह जाते हैं। उदाहरण के लिए भारत की सबसे बड़ी बॉक्साइट खदान पंचपाट माली में है, जो नाल्को के अधीन है। यहां देश की सात चालू रिफाइनरियों में से दो मौजूद हैं, पहली नाल्को की दामनजुड़ी में और दूसरी हाल में पूरी की गई वेदांत की लांजीगढ़ में। इसके साथ देश के छह स्मेल्टरों में से दो स्मेल्टर, एक नाल्को का अनगुल में और दूसरा इडल का हीराकुंड में, यहीं चालू हैं। बहुत सी नई परियोजनाएं भी आने वाली हैं जैसे उत्कल की एक रिफाइनरी का काम काशीपुर में चल रहा है। कुछ दूसरे स्मेल्टर्स की भी योजना है जिसमें से वेदांत का एक कारखाना झारसुगुड़ा जिले में निर्माणाधीन है और दूसरा संबलपुर जिले में हिंडाल्को के अधीन योजना के अंतिम दौर में है।
यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि अंग्रेज भूगर्भ वैज्ञानिकों ने मूलत: इस पूरी योजना की रूपरेखा 1920 के दशक में तैयार की थी जिसमें फैक्ट्रियों की ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए बांधों का निर्माण, रेलों का नेटवर्क और बंदरगाहों की व्यवस्था थी। उनके अनुसार उड़ीसा के पहाड़ों में पाया जाने वाला बॉक्साइट ‘इतना अच्छा है कि अगर यह अधिक मात्रा में मौजूद हो तो यह इलाका (रायपुर-वैजाग) रेलवे लाइन के निर्माण के बाद बहुत महत्वपूर्ण हो जाएगा… इसकी महत्ता इसलिए और भी बढ़ जाती है क्योंकि यहीं दक्षिण-पश्चिम दिशा में मद्रास क्षेत्र (जयपुर रियासत) में जल-विद्युत पैदा करने की बहुत सी जगहें हैं और विशाखापत्तनम के पास में एक बंदरगाह का निर्माण किया जानेवाला है।’ इसके अलावा टीएल वाकर नाम का एक भूगर्भशास्त्री था जिसने उड़ीसा के बॉक्साइट से ढके पहाड़ों के इन खनिजों को यहां की कंध जनजाति के नाम के आधार पर खोंडालाइट नाम दिया था। यह आदिवासी इन पहाड़ों के चारों ओर निवास करते हैं और इन पहाड़ों को बहुत पवित्र स्थान मानते हैं।
उड़ीसा की बहुचर्चित खनिज सम्पदा को अर्थशास्त्री एक अनछुआ संसाधन मानते हैं लेकिन यहां के आदिवासी इन खनिज-समृद्ध पहाड़ों को अपनी जमीन की उर्वरता का स्रोत मानते हैं। अगर पेड़ काट दिए जाएं और पहाड़ों का खनन कर लिया जाए तो उड़ीसा का एक बहुत बड़ा क्षेत्र सूख जाएगा और तेजी से उसकी उर्वरता नष्ट हो जाएगी- यह चीज पंचपाट माली और दामनजुड़ी वाले इलाके में तो अभी से साफ दिखाई पड़ रही है।
काशीपुर आंदोलन के एक कंध नेता भगवान मांझी उत्कल अल्युमिना परियोजना के बारे में इसी तरह की बात बताते हैं। आंदोलन की वजह से बारह वर्षों तक परियोजना का काम रुका रहा, लेकिन उत्कल ने 2006 में फिर इस रिफाइनरी पर काम शुरू किया। भगवान मांझी के गांव कुचेईपदर के आसपास की कई वर्ग किलोमीटर जमीन अब नंगी हो गई है। पहाड़ों को नोच कर मशीनें उन्हें सपाट करने पर लगी हैं। रिफाइनरी साइट के पास के दो गांवों रामीबेड़ा और केंदूखुंटी का अब कोई वजूद नहीं बचा है। इन गांवों के बाशिंदों को कार्यस्थल के पास की एक कॉलोनी में रख दिया गया है और उनकी हैसियत बंधुआ मजदूरों के एक समूह से अधिक कुछ नहीं है।
रामीबेड़ा के सबसे मातबर नेता और सबसे बड़े भूमिधर मंगता मांझी की मौत 1998 में पुलिस उत्पीडऩ के कारण हो गई। बताते हैं कि पुलिस वाले उत्कल कंपनी की गाड़ी में रात में आए और अपनी मिर्च की फसल की रखवाली कर रहे मांझी को मचान से उतार कर बंदूक के कुंदों से मारा और केंदूखुंटी के दो अन्य दलितों के साथ बांध कर ले गए। उन्हें कई हफ्तों तक पुलिस हिरासत में रखा। जब उनको रिहा किया गया, तब पुलिस की मार-पीट से उनका चेहरा विकृत हो चुका था और कुछ दिनों बाद ही उनकी मृत्यु हो गई।
अभी उत्कल की योजना है कि स्थानीय पहाड़ बापला माली से 19.5 करोड़ टन बॉक्साइट का खनन किया जाए। इन पहाड़ों को आसपास के बड़े क्षेत्रों में फैली तीन जनजातियों के लोग बड़ा पवित्र मानते हैं। इस बीच उत्कल का मानना है कि आने वाले 30 वर्षों के भीतर यह स्रोत समाप्त हो जाएगा। इस तरह से उनके काम की वजह से यह गैर-नवीकरणीय संसाधन हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। सिर्फ इतना ही नहीं होगा, बल्कि बापला माली की बहुत सी सदानीरा जल-धाराओं पर भी उसका बुरा असर पड़ेगा।
पुलिस के लगातार हमलों के खिलाफ कुचेईपदर गांव के निवासियों ने कुछ वर्षों के लिए गांव में पुलिस के घुसने पर पाबंदी लगा दी थी। ऐसी ही झड़पों में एक बार भगवान मांझी ने एक वरिष्ठ अधिकारी से बात की। वह बताते थे, ‘मैंने एसपी से पूछा कि ”हुजूर! यह विकास का मतलब क्या होता है? क्या आप लोगों को उजाड़ देने को ही विकास मानते हैं? जिन लोगों के लिए विकास किया जाता है, उसका फायदा उन्हें मिलना चाहिए। इसके बाद यह फायदा आने वाली पीढिय़ों को मिलना चाहिए। इस तरह से विकास होना चाहिए। यह सिर्फ कुछ अधिकारियों के लोभ को शांत करने के लिए नहीं होना चाहिए। लाखों साल पुराने इन पहाड़ों को नष्ट करना विकास नहीं हो सकता। अगर सरकार ने यह फैसला कर लिया है कि उसे अल्युमिना चाहिए और इसके लिए उसे बॉक्साइट की जरूरत है तो फिर उसे हमें पुनस्र्थापना के लिए जमीन देनी चाहिए। आदिवासी होने के नाते हम लोग किसान हैं। हम जमीन के बिना नहीं रह सकते।’’
अब यह तो साफ है कि अल्युमिनियम हासिल करने की ललक में दो तरह से सांस्कृतिक जनसंहार की मार पड़ती है। एक तो विस्थापन आदिवासियों के सामाजिक ढांचे को सीधे तौर पर बर्बाद कर देता है और दूसरे कारखाने ख़ुद पर्यावरण को इस कदर तबाह करेंगे कि जल्दी ही पश्चिमी उड़ीसा का एक बड़ा क्षेत्र सूख कर खेती लायक नहीं बचेगा। बॉक्साइट के खनन से पहाड़ों की जल-धारण क्षमता समाप्त हो जाती है जिसके फलस्वरूप पानी के स्रोत सूख जाते हैं। वैसे भी कारखानों में पानी की बहुत ज्यादा खपत होती है और उनसे पर्यावरण का भी प्रदूषण फैलता है। जंगलों की सफाई और कारखानों से निकलने वाला धुआं दोनों मिल कर बारिश की मात्रा को बेतरह घटा देते हैं। इस बात को न केवल आदिवासी अच्छी तरह जानते हैं, बल्कि वैज्ञानिक भी मानते हैं।
अल्युमिनियम के अत्यधिक उत्पादन की वजह से अमूमन सांस्कृतिक जनसंहार का जन्म होता है। यह क्षेत्र ‘संसाधनों से अभिशप्त है’ और ऐसे क्षेत्र हर प्रकार की आर्थिक चालबाजी और हर संभव तरीके से शोषण के शिकार बनते हैं। अल्युमिनियम उद्योग ने शुरू से ही बहुत से देशों की आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता की जड़ें खोद डाली हैं। अब ‘संसाधन अभिशाप’ की परतें उड़ीसा में खुलने लगी हैं जहां मूल्यों का पतन हुआ है और रिश्वतखोरी जगजाहिर हो रही है। सांस्कृतिक जनसंहार का जन्म अल्युमिनियम और हथियारों के उद्योगों के आपसी रिश्तों से भी होता है। इसके युद्ध से संबंध की कोई सीधी जानकारी नहीं मिलती, मगर अल्युमिनियम की गिनती उन चार प्रमुख धातुओं में होती है जिन्हें ‘सामरिक महत्व’ का माना जाता है क्योंकि हथियारों के निर्माण में इनका महत्वपूर्ण उपयोग होता है। यही वजह है कि न्यूक्लियर वैज्ञानिक अब्दुल कलाम ने, जो इस लेख लिखे जाने के समय भारत के राष्ट्रपति थे, अपनी पुस्तक ‘इण्डिया 2020’ में अल्युमिनियम की महत्ता समझाने और भारत के 2020 तक विकसित देशों की कतार में खड़ा होने की अपनी कल्पना में इसकी भूमिका पर कई पन्ने लिखे हैं। इन दोनों ही बिंदुओं पर इस लेख में आगे विस्तार से चर्चा है।

प्रतिरोध और पुनर्वास

अब यह कहा जा सकता है कि 2 जनवरी, 2006 वह तारीख है जिस दिन विस्थापन के विरुद्ध आदिवासी प्रतिरोध मजबूत हुआ। यही वह दिन था जब कलिंगनगर हत्याकाण्ड में पुलिस के हाथों 12 आदिवासी मारे गए थे जब वे अपनी जमीन पर टाटा स्टील के कारखाने के निर्माण का विरोध कर रहे थे। विस्थापन विरोधी मंच ने तभी से कलिंगनगर में विशाल नाकेबंदी कर रखी है।
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में टाटा स्टील के एक दूसरे कारखाने के निर्माण को भी इसी तरह के आदिवासी प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि आदिवासियों का कहना है कि उनकी ‘रजामंदी’ पूर्णत: स्वेच्छा से नहीं दी गई थी। उनका प्रतिरोध एक प्रायोजित गृह-युद्ध की पृष्ठ-भूमि में शुरू हुआ, जब मध्य मार्च 2005 में सरकार समर्थित सलवा जुड़ुम (शांतिमार्च) कार्यक्रम हाथ में लिया गया। इस युद्ध का लक्ष्य केवल माओवादियों को ही समाप्त करना नहीं था, वरन औद्योगीकरण की उन योजनाओं को भी पूरा करना था जिनका आदिवासी समाज लंबे अरसे से विरोध कर रहा था। इसकी वजह से दंतेवाड़ा जिले में 80,000 आदिवासियों का विस्थापन हुआ जिसमें भय और आतंक का माहौल बना कर मानवीय अधिकारों का ऐसा जघन्य हनन हुआ जो किसी भी कल्पना से परे है। पश्चिम बंगाल में जहां भूमि अधिग्रहण के बाद भयंकर रक्तपात हुआ तब उच्च न्यायालय ने गैर-कानूनी ढंग से टाटा द्वारा सिंगूर में तथाकथित भूमि अधिग्रहण के खिलाफ बहुत कड़ा फैसला सुनाया था।
भारत में अब राष्ट्रीय स्तर पर एक उदार नई पुनर्वास और पुनस्र्थापन नीति की बात चल रही है, लेकिन इस उदार पुनर्वास और पुनस्र्थापन नीति में कहा क्या गया है? इस नीति का लब्बोलुआब यह है कि जिन थोड़े बहुत लोगों के पास जमीन का पट्टा है, उन्हें नगद पैसा दिया जाएगा, साथ में दिया जाएगा कारखाने के पास कॉलोनी में कंक्रीट का एक नया घर और रोजगार का वायदा जो पिछले समय में शायद ही कभी पूरा किया गया। इस तरह के पुनर्वास पैकेजों में शायद ही कभी विस्थापित लोगों को छीनी गई जमीन के बदले जमीन दी गई हो। यद्यपि अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ यह मानते हैं कि यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है। विश्व बांध आयोग ने इस तरह की व्यवस्था के प्रावधान की सिफारिश की थी, लेकिन इस प्रस्ताव को केंद्र और राज्य-सरकार दोनों ने ही खारिज कर दिया। इसी तरह से एक्स्ट्रैक्टिव इंडस्ट्री रिव्यू ने, जो विश्व बैंक द्वारा गठित एक स्वतंत्र पुनरीक्षण था, सिफारिश की थी कि विश्व बैंक विकासशील देशों में कोयला और खनन परियोजनाओं के लिए पैसा देना बंद कर दे और उसके स्थान पर ऊर्जा के पुनर्नवीनीकरण वाले संसाधनों पर अपना ध्यान केंद्रित करे। इस सलाह को भी दरकिनार कर दिया गया।
भगवान (मांझी) ने जमीन के मुद्दे के इर्द-गिर्द चल रहे बहुत से अनुत्तरित सवालों को सामने रखा। उनका कहना था, ”विकास के नाम पर जिन लोगों का विस्थापन हुआ है उनके बारे में हमने सरकार से सफाई मांगी है। कितने लोगों का आपने सही तरीके से पुनर्वास किया? आपने उनको रोजगार नहीं दिया, आपने पहले से विस्थापितों का तो पुनर्वास किया नहीं फिर आप और अधिक लोगों को कैसे विस्थापित कर सकते हैं? आप उनको लेकर कहां जाएंगे और उनको क्या काम देंगे? यह आप पहले हमें बताइये। सरकार हमारे सवालों का जवाब नहीं देती है। हमारा बुनियादी सवाल है कि अगर हमारी जमीन ले ली जाती है तो हम जिंदा कैसे रहेंगे? हम लोग आदिवासी किसान हैं। हम लोग मिट्टी के कीड़े हैं, उन्हीं मछलियों की तरह जिन्हें अगर पानी से निकाल दिया जाए तो वे मर जाएंगी। एक किसान से उसकी जमीन ले लीजिए, वह जिंदा नहीं बचेगा। इसलिए, हम अपनी जमीन छोड़ेंगे नहीं।’’
पुनर्वास और पुनस्र्थापन विशेषज्ञों तथा विश्व बैंक की पुनर्वास नीति की खास सिफारिश है कि विस्थापित लोगों की जीवन शैली में सुधार आना चाहिए। इसके बावजूद ऐसा कभी होता नहीं है। कंपनियां निगमों के सामाजिक उत्तरदायित्व जैसी बड़ी-बड़ी बातें करके इन सच्चाइयों पर परदा डाल देती हैं और दान-धर्म के मिशनरी मॉडल का विज्ञापन करती हैं, जबकि उनकी सारी कोशिश शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल-कूद और स्वयं सहायता समूहों तक केंद्रित रह जाती हैं। इन सारे कार्यक्रमों का मतलब है कि उन्हें आदिवासी संस्कृतियों की कोई समझ ही नहीं है।
अपनी वार्षिक आम रिपोर्ट (2006) में वेदांत रिसोर्सेज ने 60 पृष्ठ इस बात का बखान करने में लगाए हैं कि उसने अपने सामाजिक उत्तरदायित्व कार्यक्रम में कितने अच्छे-अच्छे काम किए हैं। इस (रिपोर्ट) में चमकीले कागज पर मुस्कुराते हुए उन आदिवासियों के रंगीन चित्र लगे हुए हैं जिनको इस कार्यक्रम के अधीन ‘सुसंस्कृत’ किया गया है। यह वास्तविक सच्चाई से एकदम परे है। वेदांत की लांजीगढ़ रिफाइनरी में काम के समय की दुर्घटनाओं में सैकड़ों लोग मारे गए हैं और इलाके में इस बात को सारे लोग जानते हैं कि अक्सर मजदूरों से काम करवा कर उन्हें पैसा नहीं दिया जाता और उन्हें काम पाने के लिए काफी लल्लो-चप्पो करनी पड़ती है।

उलटा असर

अल्युमिनियम उद्योग सबसे ज्यादा ऊर्जा की खपत वाले उद्योगों में से एक है। अल्युमिना की एक मीट्रिक टन मात्रा के शोधन में औसतन 250 किलोवाट पावर (केवीएच) बिजली की खपत होती है, जबकि अल्युमिनियम को गलाने में कम से कम 1300 केवीएच बिजली लग जाती है। जर्मनी के वप्परटल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि एक टन अल्युमिनियम के उत्पादन में 1,378 टन से कम पानी नहीं लगता है (इस्पात की इसी मात्रा के उत्पादन में 44 टन पानी लगता है जो तुलना में काफी कम होने के बावजूद ज्यादा ही है।) कुल मिला कर एक टन अल्युमिनियम बनाने में रिफाइनरियों में से 4 से 8 टन तक का जहरीला ठोस लाल कचरा निकलता है, मुख्यत: स्मेल्टर्स से लगभग 13.1 टन कार्बन-डाईऑक्साइड और 85 टन पर्यावरणीय कूड़ा-करकट और निर्जीव अपशिष्ट निकलता है। सीधे शब्दों में हम कह सकते हैं कि अल्युमिनियम उत्पादन का नकारात्मक प्रभाव उसके सकारात्मक प्रभाव से 85 गुना ज्यादा है। इंग्लैंड सरकार की हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले एक टन कार्बन उत्सर्जन से होने वाली क्षति की लागत 85 डॉलर प्रति टन बैठती है जिसका मतलब होता है अल्युमिनियम के एक टन के उत्पादन पर 1000 डॉलर का नुकसान।
बॉक्साइट से अल्युमिनियम के उत्पादन तक समाज और पर्यावरण चार स्तरों पर नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है। ये हैं बॉक्साइट का खनन, अल्युमिना का शोधन, अल्युमिनियम का गलाना और इन तीनों कथित कामों को करने के लिए बिजली का उत्पादन। जल-विद्युत के लिए बड़े बांधों का निर्माण या कोयले से ताप विद्युत पैदा करने के लिए ताप विद्युत घरों के निर्माण से यह जरूरतें पूरी की जाती हैं। इसी कड़ी में उड़ीसा में हजारों लोग जलाशयों के निर्माण और कोयला खदानों के कारण विस्थापित हुए हैं और यह दोनों संसाधन ऊर्जा के उत्पादन के लिए जरूरी हैं। इनकी कुर्बानी के पीछे भी अल्युमिनियम उद्योग का हाथ है।
बांधों, रिफाइनरियों और स्मेल्टरों की अनचाही कीमतों के बारे में अपेक्षाकृत बहुत कुछ लिखित सामग्री उपलब्ध है। इसके विपरीत पहाड़ों की चोटियों से बॉक्साइट के खनन से उड़ीसा की जमीन की उर्वरता को कितना नुकसान पहुंचा है, उसके बारे में खास जानकारी उपलब्ध नहीं है। बॉक्साइट की जल-संचय क्षमता बहुत ज्यादा होती है। यह रंध्र युक्त होता है और स्पंज की तरह काम करता है। बारिश के पानी को यह पूरे वर्ष तक पकड़ कर रखता है और धीरे-धीरे छोड़ता है। पहाड़ों के खनन से उनकी जल-संग्रह क्षमता बेतरह कम हो जाती है। इस समस्या का बहुत कम अध्ययन हुआ है और वह शायद इसलिए कि अल्युमिनियम कंपनिया बॉक्साइट पर तो बहुत शोध करती हैं, मगर उन शोधों से बचने की कोशिश करती हैं जिनसे उनके कारनामों का नकारात्मक पक्ष सामने आता है। मौसम परिवर्तन के क्षेत्र में वैज्ञानिक सबूतों के साथ जो चालबाजी खेली जा रही है, उसी की तर्ज पर ये विकृतियां भी खुल कर सामने आती हैं।
अल्युमिनियम उद्योग के इतिहास का सावधानीपूर्वक अध्ययन किए जाने पर यह जाहिर होता है कि वास्तव में अल्युमिनियम को इसकी उत्पादन लागत से कम कीमत पर बेचा जाता है। रिफाइनरी और स्मेल्टर्स तभी मुनाफा कमा सकते हैं जब उन्हें बिजली, पानी, परिवहन आदि पर भारी सब्सिडी के साथ-साथ टैक्सों में भी कटौती के लाभ मिलें। भारत में अल्युमिनियम उद्योग की ऊर्जा ऑडिट (1988) में यह बात साफ-साफ कही गई है। यह ऑडिट स्वतंत्र रूप से करवाया गया था। कंपनिया खुद भी बहुत से लागत खर्च को अपने हिसाब-किताब से दरकिनार कर देती हैं जिसमें समाज द्वारा चुकाये जानी वाली कीमतें और पर्यावरणीय लागत मुख्य है। ये कीमतें मेजबान सरकारों पर थोप दी जाती हैं और आखिरकार इनको वही भुगतता है जो पूरी आबादी में सबसे कमजोर होता है।
दूसरे देश खनन और धातु उत्पादन उद्योगों को भारत में लगाने में सबसे ज्यादा रुचि ले रहे हैं। यूरोप और अमेरिका में अल्युमिनियम बंदी के कगार पर पहुंच गया है क्योंकि वहां बिजली के दाम बढ़ रहे हैं और पर्यावरण संबंधी कानूनों में भी सख्ती आ रही है। अल्कैन ने जैसे ही काशीपुर में रिफाइनरी लगाने का फैसला किया, उसने 2003 में इंग्लैण्ड की अपनी आखिरी रिफाइनरी (बर्नटिसलैंड) बंद कर दी। ऐसा लगता है कि घरेलू उत्पादन प्रक्रिया को दूसरे देशों के हवाले करके यूरोप अपना कार्बन उत्सर्जन कुछ कम कर रहा है पर यह भी वहम के अलावा कुछ नहीं है। अल्युमिनियम का जितना उपयोग अभी यूरोप में हो रहा है उससे भी काफी कार्बन का उत्सर्जन होता है। यह बात अलग है कि वह अभी यूरोप को छोड़ कर भारत को प्रदूषित कर रहा है।

संसाधनों का अभिशाप

संसाधनों का अभिशाप दुनिया के बहुत से ऐसे क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा है जो प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न हैं। इन इलाकों में इस समृद्धि का दोहन करने के लिए बड़े-बड़े प्रकल्प यह कह कर लगाए जाते हैं कि इससे स्थानीय लोगों की सम्पत्ति बढ़ेगी मगर जो वास्तव में मिलता है वह है शोषण, गरीबी और हिंसा। नाइजीरिया का तेल समृद्ध डेल्टा, सिअरा लिओन, अंगोला और अफ्रीका के दूसरे अन्य देश, दक्षिण अमेरिका और भारत इस बानगी की पराकाष्ठा के कुछ उदाहरण हैं। नाइजीरिया में तेल कंपनिया जिस तरह का सलूक कर रही हैं, उदाहरण के लिए, वह उड़ीसा के लिए आने वाले दिनों में एक सबक हो सकता है। शेल और उसी तरह की दूसरी कंपनियां लोगों की जिंदगी और पर्यावरण की कीमत पर भारी मुनाफा कमा रही हैं। किसी भी तरह के विरोध का गला घोंटने के लिए विरोध करने वाले को सुरक्षा कर्मी मार डालते हैं। इस तरह की सबसे मशहूर घटना केन सारो वीवा की मौत थी जिन्हें कत्ल के झूठे आरोप में आठ दूसरे ओगोनी लोगों के साथ 1995 में शेल के षड्यंत्र और सारी दुनिया से भत्र्सना के बीच फांसी पर चढ़ा दिया गया।
अल्युमिनियम उद्योग ने व्यावहारिक तौर पर बहुत से देशों की अर्थ-व्यवस्था को तभी से नियंत्रित कर रखा है, जबसे उन्होंने आज़ादी हासिल की। गुयाना की आजादी 1957 से लेकर 1966 तक टलती रही जिस दरम्यान अंग्रेजों ने उन्हें देश में केवल सीमित तौर पर स्वशासन की मोहलत दी थी। इन वर्षों में छेदी जगन को तीन बार सत्ता इस शर्त पर मिली कि वे बॉक्साइट की रॉयल्टी एक समुचित स्तर तक बढ़ा देंगे और अल्कैन की सहायक कंपनी का राष्टरीयकरण कर देंगे। इसके बदले में एमआई-6 और सीआईए ने देश को अस्थिर करने की कोशिश की और जब अंतत: 1970 में उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया तब उस पर विश्व बैंक की तरफ से काफी दबाव डाला गया कि वह अल्कैन की क्षतिपूर्ति करे।
जमैका में 1972 में अमरीकी राजदूत ने माइकेल मैनली को ताकीद की थी कि अगर उन्होंने बॉक्साइट की रॉयल्टी बढ़ाने या उद्योगों के राष्ट्रीयकरण को चुनावी मुद्दा बनाया तो उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिए जाने का अंजाम भुगतना पड़ सकता है। यह केवल बंदर घुड़की नहीं थी क्योंकि अगले ही साल सीआईए ने चिली में पिनोशे द्वारा किए गए तख्तापटल का समर्थन किया और यह काम अनाकोण्डा और केन्निकॉट तांबे की खदानों और पेप्सीकोला की शह पर हुआ था। फिर भी मैनली ने अपनी योजना के अनुसार ही काम किया और 1974 में उन्होंने देश की बॉक्साइट खदानों में 51 साझेदारी का राष्ट्रीयकरण कर डाला। उसी साल उन्होंने बॉक्साइट पैदा करने वाले देशों का इंटरनेशनल बॉक्साइट एसोसिएशन (आईबीए) नाम का संगठन बनाया और कुछ समय के लिए अल्युमिनियम कंपनियों के साथ बॉक्साइट के बेहतर दामों के लिए करार किया। इस मामले में कच्चे माल का दाम तैयार माल का 7.5 प्रतिशत रखा गया। इसकी तुलना अगर लंदन मेटल एक्सचेंज की अल्युमिनियम कीमतों से करें तो वह इंगट का मात्र 0.4 प्रतिशत थी और भारत का रॉयल्टी रेट भी 2004 से इतना ही है।
कैजर अल्युमिनियम द्वारा संचालित एक सहायक कंपनी वाल्को (वोल्टा अल्युमिनियम कंपनी) के एक विशाल स्मेल्टर की ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए घाना में वोल्टा नदी पर दुनिया के सबसे बड़े बांधों में से एक, पर बहुत घटिया किस्म के बांध का निर्माण किया गया। इसकी वजह से कोई 80,000 लोग विस्थापित हुए, 740 गांवों को तबाह किया गया और अनुमानित तौर पर 70,000 लोग रिवर ब्लाइंडनेस और शिस्टोसोमियासिस नाम की बीमारियों के शिकार होकर हमेशा के लिए आंखों की रोशनी खो बैठे। कंपनी और घाना के पहले राष्ट्रपति एनक्रूमा के बीच हुए इकरारनामें को कपटपूर्वक कैजर के हक में कर दिया गया। इस पूरे उपक्रम में विश्व बैंक ने कंपनी के हिमायती की भूमिका अदा की थी। सीआइए ने 1957 से 1966 के बीच देश को अस्थिर करने का प्रयास किया और बांध और स्मेल्टर के चालू होने के एक महीने बाद एनक्रूमा को सत्ताच्युत कर दिया गया।
आजकल भारत में विषद चर्चा का विषय स्पेशल इकनॉमिक जोन (एसईजेड) भी कोई अजूबी चीज नहीं है। वह क्षेत्र जो संसाधन सम्पन्न हैं, उनकी औद्योगिक संस्थाओं का उपयोग बहुराष्टरीय कंपनियां अपने लाभ के लिए कर लेती हैं (इसका एक लंबा इतिहास है) जबकि इलाका गरीब बना रहता है। अल्युमिनियम उद्योग ने गुयाना, जमैका, घाना और गिनी जैसी कई जगहों में मुनाफा केवल इसलिए कमाया क्योंकि ये सब सब्सिडी वाले अंत:क्षेत्र थे। कंपनियों द्वारा इन देशों का शोषण इस बात की नजीर है कि उड़ीसा में बनने वाले अल्युमिनियम कारखानों से यहां का क्या हश्र होने वाला है। वेदांत और हिंडाल्को के प्रस्तावित स्मेल्टर्स उत्तर उड़ीसा में इन्हीं एसईजेड में स्थापित होने वाले हैं। घाना के वाल्को मास्टर करारनामे के मुकाबले 2005 के एसईजेड एक्ट में बिजली, पानी और जमीन के दामों में छप्पर फाड़ सब्सिडी देने का प्रावधान है और यह सभी प्रावधान भारत के उन कानूनों के खिलाफ हैं जिनमें श्रमिकों के अधिकार, भूमि के अधिकार और पर्यावरण की बात कही जाती है।
अल्युमिनियम उद्योग द्वारा पैदा किया हुआ ऐसा ही संसाधनों का अभिशाप आस्ट्रेलिया और ब्राजील के कुछ भागों में भी देखने को मिलता है। उत्तरी आस्ट्रेलिया में अल्कैन और अलकोआ परियोजनाओं में केप यॉर्क और अन्र्हेमलैंड में आदिम जाति के लोगों का विस्थापन हुआ, जबकि ब्राजील के टुकुरूई बांध की वजह से वहां से मूल वासियों का विस्थापन हुआ। मध्य भारत के खनन क्षेत्रों में भी यही कहानी दुहराई जाती है जिसके बारे में 25 जनवरी, 2001 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने गणतंत्रा दिवस के समय चिंता व्यक्त की थी। पांच सप्ताह पहले घटी मईकांच पुलिस हत्याकांड का हवाला देते हुए उन्होंने कहा था, ”जंगलों के बीच चल रही खनन प्रक्रिया से बहुत सी आदिवासी जन-जातियों के अस्तित्व और जीविका पर खतरा मंडरा रहा है… हमारी आने वाली पीढिय़ाँ ऐसा न कहें कि गणतंत्रीय भारत हरी-भरी पृथ्वी और निरीह आदिवासियों के मलबे पर खड़ा है जहाँ वे सदियों से रहते आए हैं।’’

युद्ध को हवा देते हुए

अल्युमिनियम उत्पादन को आगे बढ़ाने में हथियारों के उद्योग का मुख्य हाथ है यद्यपि यह बात खुल कर सामने नहीं आती है। भगवान मांझी इस सबंध का खुलासा तब करते हैं जब वह पूछते हैं कि बापला माली का बॉक्साइट कहां भेजा जायेगा, ”अगर उन्हें इसकी इतनी ज्यादा जरूरत है तो उन्हें यह हमें बताना चाहिए कि यह जरूरत क्यों है। हमारे बॉक्साइट का उपयोग कितनी मिसाइलों में किया जाएगा? आप कैसा बम बनाएंगे? कितने लड़ाकू हवाई जहाज बनेंगे? आपको हमें पूरा हिसाब देना होगा।’’
अल्युमिनियम का युद्ध से संबंध उसके पहले संरक्षकों-फ्रांस के नेपोलियन तृतीय और जर्मनी के कैसर विल्हेम तक जाता है। अल्युमिनियम के विस्फोटक गुण का आविष्कार 1901 में हुआ था, जब अमोनल और थर्माइट को खोज निकाला गया था। उसके बाद इस धातु ने दुनिया के इतिहास की धारा ही बदल दी।
अल्युमिनियम प्लांट में बिजली की भारी खपत क्यों होती है और इस धातु का अस्त्र-शस्त्रों के उपयोग में क्या रिश्ता है? अल्युमिनियम ऑक्साइड के अणुओं में अल्युमिनियम के ऑक्सीजन के साथ बॉण्ड को तोडऩे के लिए स्मेल्टरों में बिजली की जरूरत पड़ती है। थर्माइट इस प्रक्रिया को उलट देता है। बम में आइरन ऑक्साइड को अल्युमिनियम पाउडर के साथ भर दिया जाता है। जब फ्यूज में पलीता लगता है तब अल्युमिनियम का तापक्रम बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और यह आक्सीजन के साथ फिर बॉण्ड करने की कोशिश करता है जिससे बहुत ज्यादा धमाकेदार विस्फोट होता है। थर्माइट का इस्तेमाल सबसे पहले मिल्स बम हैंड ग्रेनेड में पहले विश्व युद्ध में हुआ था जब ब्रिटेन ने 70,000 ऐसे ‘बमÓ बनाए थे। इससे कम से कम 70,000 सिपाही मारे गए थे और इसके आविष्कारक सर विलियम मिल्स को इसके लिए नाइटहुड से नवाजा गया था। पहले विश्व युद्ध के दौरान ही अल्युमिनियम कंपनियों को यह आभास हो गया था कि उनका भविष्य हथियारों और विस्फोटकों के निर्माण के साथ जुड़ा हुआ है। अलकोआ के लगभग 90 प्रतिशत उत्पादन का इस्तेमाल हथियारों के निर्माण में लगा और अल्युमिनियम कार्पोरेशन ऑफ अमेरिका की मानक आत्मकथा में कहा गया है कि ‘अलकोआ के लिए युद्ध शुभ था।’
1930 के आस-पास हवाई जहाजों के डिजाइन में अल्युमिनियम का उपयोग होना शुरू हो गया और जैसे ही जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका ने हजारों लड़ाकू जहाजों का निर्माण करना शुरू किया, अल्युमिनियम कंपनियों ने बेतरह पैसा बनाया। अल्युमिनियम अब भी एक खाली जंबो जेट तथा दूसरे हवाई जहाजों के पूरे वजन का 80 प्रतिशत होता है जिसमें इसे प्लास्टिक के साथ भी यौगिक बना कर इस्तेमाल किया जाता है।
दूसरे विश्व युद्ध में अल्युमिनियम का उपयोग, मुख्य रूप से नापाम बम समेत, बमों में पलीता लगाने के लिए किया जाता था जिसकी वजह से हवाई हमलों में जर्मनी और जापान में हजारों नागरिकों को जान गंवानी पड़ी थी। वास्तव में युद्ध संबंधी धातुओं के निर्माण में जो भी खनिज लगते हैं, वे सब के सब उड़ीसा में पाए जाते हैं- लोहा, क्रोमाइट, मैंगनीज; इस्पात के लिए और बॉक्साइट तथा यूरेनियम, सब कुछ।
हिटलर को उड़ीसा के बॉक्साइट खनिज की जानकारी थी और यह एक वजह थी जो उड़ीसा के बंदरगाहों पर जापान ने बम गिराए थे। अमेरिका में विशालकाय बांधों के निर्माण के पीछे मुख्य कारण अल्युमिनियम स्मेल्टर्स के लिए बिजली की आपूर्ति करना था। ‘पश्चिमी बांधों से पैदा होने वाली बिजली के कारण दूसरा विश्व युद्ध जीतने में मदद मिली थी’ क्योंकि इससे अल्युमिनियम बनाने में मदद मिलती थी जिसका उपयोग हथियारों और हवाई जहाजों में होता था।
युद्ध के बाद अल्युमिनियम से होने वाली आमदनी धराशायी हो गई, लेकिन इसमें फिर उछाल आया जब कोरिया में युद्ध शुरू हुआ, उसके बाद वियतनाम और फिर कितने ही युद्ध अमेरिका के उकसाने पर हुए। कोरियाई युद्ध के समय अमेरिका के तात्कालिक राष्ट्रपति ड्वाइट डी आइजनहॉवर द्वारा स्थापित ‘सैन्य उद्योग कॉम्प्लेक्स की आधारशिलाÓ अल्युमिनियम ही थी। उनका कार्यकाल 1961 में इस चेतावनी के साथ समाप्त हुआ कि ‘हमें एक बहुत बड़े पैमाने पर स्थाई युद्ध उद्योग के निर्माण पर मजबूर कर दिया गया था।’
अमेरिका ने 1950 में इस धातु का संग्रह करना शुरू किया था। एक अमरीकी अल्युमिनियम विशेषज्ञ ने एक पैम्पफलेट में 1951 में लिखा था, ‘आधुनिक युद्ध कला में अल्युमिनियम अकेला सबसे महत्वपूर्ण पदार्थ है। भारी मात्रा में अल्युमिनियम के उपयोग और उसको नष्ट किए बिना आज न तो कोई युद्ध संभव है और न ही उसे सफलतापूर्वक उसके अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है… अल्युमिनियम युद्ध में सुरक्षा के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसकी मदद से लड़ाकू और परिवहन के लिए जहाजों का निर्माण होता है। आणविक हथियारों के निर्माण और उनके प्रयोग में अल्युमिनियम का उपयोग होता है। अल्युमिनियम और उसके महत्वपूर्ण गुणों की वजह से ही हार-जीत का अंतर पता लगता है।’
ईराक या अफगानिस्तान में दागी जाने वाली हर अमरीकी मिसाइल में विस्फुरण प्रक्रिया में शेल के खोखों और धमाकों में अल्युमिनियम का इस्तेमाल होता है। कार्पेट बॉम्बिंग में इस्तेमाल होने वाला डेजीकटर बम अल्युमिनियम की विस्फोटक क्षमता पर काम करता है। यही उपयोग आणविक मिसाइलों और अमेरिका के 30,000 आणविक विस्फोटक शीर्षों में होता है। दोनों विश्व युद्धों के बीच परदे के पीछे से युद्ध को उकसाने में हथियार बनाने वाली कंपनियों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। 1927 में लीग ऑफ नेशंस ने यह घोषणा की थी कि ‘निजी उद्योगों द्वारा हथियारों और युद्ध में प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं का निर्माण घोर आपत्तिजनक है।Ó लेकिन इससे जुड़े निहित स्वार्थ कहीं ज्यादा मजबूत थे। 1927 में ही जेनेवा में लीग के निरस्त्रीकरण अधिवेशन में एक अमरीकी पैरवीकार को 27,000 डॉलर इसलिए दिए गए थे कि वह छह सप्ताह तक हथियार बनाने वाली कंपनियों की तरफ से माहौल बनाने का काम करे ताकि ऐसा कोई समझौता होने ही न पाए। आज की ही तरह तब भी बहुत से शक्तिशाली देशों की अर्थव्यवस्था इसी शस्त्र उद्योग पर आधारित थी। इस सम्मेलन की असफलता के बाद एक ब्रितानी समीक्षाकार ने टिप्पणी की थी कि ‘युद्ध न केवल बहुत बुरी चीज है वरन यह बुरी तरह से फायदमेंद चीज भी है।Ó इन हथियार बनाने वाली कंपनियों के पीछे खनन कम्पनियां और धातुओं के विक्रेता समर्थन में खड़े रहते हैं। अमरीका द्वारा शुरू किए गए किसी भी युद्ध में दागे गए हर गोले की खाली जगह पर नया गोला लगता है और इसका निर्माण नए निकाले गए खनिजों से ही होता है।

रजामंदी का निर्माण

अगर कोई टिकाऊपन का सवाल उठाता है तो इसमें कोई शक नहीं है कि विस्थापित होने वाले आदिवासी समुदायों के पास अधिकांश प्रश्नों का उत्तर मिल जाएगा। वह प्रकृति से बहुत कम ग्रहण करते हैं और लगभग कुछ भी बरबाद नहीं करते। इसलिए अगर भगवान मांझी और उस तरह के कई लोग यह पूछते हैं कि स्थानीय आबादी और पर्यावरण की इतनी बड़ी कीमत पर खनन उद्यमों की कोई योजना बनती है तब क्या वह सचमुच विकास की योजना होती है? इस पर किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
ऐसे सम्मेलनों में जहां अल्युमिनियम के गुणों का बखान होता है, ये विचार प्रगट किए जाते हैं कि भारत एक पिछड़ा हुआ देश है क्योंकि यहां प्रति व्यक्ति अल्युमिनियम की सालाना खपत एक किलोग्राम से भी कम है जबकि ‘विकसित’ देशों में यह खपत 15.30 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष तक होती है। अल्युमिनियम उत्पादन की ऊंची लागत और उससे होने वाले मौसम परिवर्तन के दुष्प्रभावों को देखते हुए कहा यह जाना चाहिए था कि भारत में अल्युमिनियम की कम खपत बेहतर विकसित विकल्प का सूचक है। इसके अलावा चिकित्सा के क्षेत्र में होने वाले शोध बताते हैं कि भले ही थोड़ी मात्रा में हो मगर अल्युमिनियम की एक चिंताजनक मात्रा मानव शरीर में पैकेजिंग और जल-प्रदाय माध्यमों से लगातार प्रवेश कर रही है। इसका मानव शरीर से उत्सर्जन नहीं हो पाता और यह मस्तिष्क में जाकर इकट्ठा होने लगता है और कहा तो यहां तक जाता है कि इससे अल्जाइमर (भूलने) की बीमारी का खतरा रहता है।
मजे की बात यह है कि अल्युमिनियम दो कारणों से ‘पर्यावरण के लिए नुकसानदेह नहीं’ होने का दावा करता है। पहला यह कि इसका दुबारा-तिबारा उपयोग संभव है और दूसरा यह कि इसके उपयोग से मोटर गाडिय़ों का वजन अपेक्षाकृत कम होता है जिससे ईंधन की खपत कम होती है। लेकिन यह फायदे गुमराह करने वाले हैं और वास्तव में बेमानी हैं क्योंकि इसकी पर्यावरणीय लागत और ऐसे कारखानों में ईंधन की जिस मात्रा की जरूरत पड़ती है उसको अगर ध्यान में रखा जाए तो यह जाहिर होता है कि इस धातु के शोधन और खपत दोनों में कितना अधिक ईंधन लगता है। ध्यान देने लायक एक महत्वपूर्ण बात है कि आदिवासी लोग, जिन्हें टुकड़े-टुकड़ों में किसी चीज को देखने की आदत नहीं है, बापला माली के बॉक्साइट तथा बम और युद्ध जिनमें ‘भारी मात्रा में अल्युमिनियम की खपत होती है’, के बीच के संबंध को तुरंत भांप लेते हैं। जिस तरह के सवाल भगवान मांझी और उस तरह के लोग खड़ा करते हैं उनका उत्तर मिलना चाहिए और अल्युमिनियम परियोजनाओं के लाभ और लागत का विश्लेषण होना चाहिए। नाल्को की उड़ीसा की मौजूदा परियोजनाओं की सामाजिक और पर्यावरणीय लागत क्या है? अगर एक टन धातु का उत्पादन करने में 1,378 टन पानी की खपत होती है तब दामनजुड़ी के आस-पास की जमीन किस हद तक बंजर बनेगी? इन सवालों के जवाब कंपनियों द्वारा अल्युमिनियम के निर्यात से होने वाले मुनाफे के दूसरे पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यह हमें सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर ले जाता है- औद्योगीकरण की नीति का असली नियंत्रण किसके हाथ में है? राज्य में विभिन्न संरचनात्मक परियोजनाओं के लिए विश्व बैंक और दूसरी संस्थाओं ने जो पैसा दिया है, उसके फलस्वरूप उड़ीसा पूरे भारत में सबसे ज्यादा कर्ज में डूबा हुआ प्रांत है। इन कर्जों से सरकार पर बेवजह दबाव पड़ता है क्योंकि इनका भुगतान विदेशी मुद्रा में किया जाना है। इतना ही नहीं, कंपनियों की ताकत को कम करने वाले सारे नियम-कानूनों को ढीला करने की बात को भी मानना पड़ता है। परिणामस्वरूप एसईजेड तैयार किए जा रहे हैं ताकि ‘विदेशी निवेश के लिए माहौल बनाया जा सके’ और भारतीय कानून और संविधान में जमीन के अधिकार, श्रमिक अधिकार और पर्यावरण सुरक्षा के जो प्रावधान किए गए हैं उन्हें बिखेर देने की कोशिश हो रही है।
उड़ीसा की राजनीति और अर्थनीति के फैसले अब लंदन या वाशिंगटन में एक ऐसी व्यवस्था से किए जाते हैं जिनके बारे में परियोजनाओं से प्रभावित होने वाले लोगों को कोई जानकारी ही नहीं है। ब्रिटिश सरकार के डिपार्टमेंट फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (डीएफआइडी) के नीति निर्देशक अधिकारी द्वारा 2003 के एक्सट्रैक्टिव इंडस्ट्रीज रिव्यू का काम देखने वाले व्यक्ति को लिखे गए एक पत्र से इस बात का खुलासा होता है कि इन अधिकारों का किस तरह का उपयोग होता है। निर्देशक ने पत्र में इस बात की चेतावनी दी थी कि अगर रिपोर्ट में कुछ बुनियादी परिवर्तन नहीं किए गए तो रिपोर्ट को विश्व बैंक बोर्ड द्वारा खारिज कर दिए जाने का ‘सचमुच खतरा’ है (यह हुआ भी)। पत्र में लिखा है कि ‘पहले से पूरी सूचना के साथ रजामंदी (कृपया नोट करें कि इसमें रजामंदी के साथ किसी भी बंधन से मुक्त रजामंदी शब्दों का उपयोग नहीं किया गया है) पर कुछ सफाई जरूरी है। यह स्पष्ट नहीं होता है कि रजामंदी पूरी परियोजना के बारे में एकमुश्त आवश्यकता है… अगर कोई एक व्यक्ति राष्ट्रीय विकास पैकेज से सहमत नहीं होता है तो बैंक या सरकार किस हद तक इसे खारिज करने के लिए तैयार है?Ó अंतिम प्रश्न पूरी तरह से आदिवासी समुदायों के भूमि संबंधी अधिकार को व्यक्तिगत अधिकारों के साथ घालमेल कर के गलत तरीके से पेश करता है। यहां ब्रिटिश सरकार का एक अधिकारी इस बात पर आक्रोश जताता है कि भारत या किसी दूसरे देश के आदिवासी लोगों के हाथ में अभी जमीन पर कोई भी खनन परियोजना हाथ में लेने पर वीटो करने का अधिकार होगा। यह वही औपनिवेशिक मनोवृत्ति है जो भारत की आजादी के पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यवहार में झलकती थी।
जब ‘पूरी सूचना के साथ किसी भी बंधन से मुक्त सहमतिÓ को ही खारिज कर दिया जाता है तो उड़ीसा में जो कुछ भी हो रहा है, उस पर स्वीकृति की मुहर लग जाती है जहां जन-सुनवाई में ‘सहमति’ का निर्माण पुलिस की धमकी और मौजूदगी में छलपूर्वक किया जाता है। यह भी एक कारण है कि क्यों उड़ीसा और पड़ोसी राज्यों में सैकड़ों परियोजनाओं से प्रभावित होने वाले ग्रामीण ‘रजांमदी’ देने और अपनी जमीन छोडऩे के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं हालांकि उन्हें अपनी जमीन से विरत न कर पाने का अधिकार भारत के संविधान के पांचवीं अनुसूची में बुनियादी अधिकार के रूप में प्राप्त है।
परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन भी गंभीरता के साथ नहीं किया जाता, इसमें हमेशा देर की जाती है और इसके लिए जिस प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है उसी पर सवालिया निशान लगे हुए हैं। सामाजिक प्रभावों का मूल्यांकन तो होता ही नहीं है और कभी अगर यह काम हुआ भी तो यह उन अधिकारियों द्वारा किया जाता है जिनकी इस काम के लिए कोई ट्रेनिंग ही नहीं होती। इस बात को कोई मान्यता नहीं मिलती कि ये परियोजनाएं भारत की सांस्कृतिक धरोहर के लिए बहुत मंहगी साबित होती हैं। भारतीय संस्कृति क्या है और यह कहां रहती है? भारतीय संगीत, परम्परागत धर्म और शिल्प का इस तरह से बाजारीकरण और राजनीतिकरण हुआ है कि उनकी मूल आत्मा ही मर गई है और उनका नकली रूप ही सामने आता है जो ग्रामीण समाजों की शाश्वत परम्पराओं के बिलकुल उल्टा पड़ता है। भारतीय संस्कृति वह है जिसे महात्मा गांधी ने समझा था। खेती करना और जंगलों से पौधे इकट्ठा करना आदिवासी संस्कृति के मूल में है और जब उनका विस्थापन होता है तब उनकी यह परम्परा भी समाप्त हो जाती है। इसके बावजूद सांस्कृतिक जनसंहार को और मजबूत करने के लिए एक अनवरत प्रक्रिया के तहत उनकी बातों पर सेंसर बैठाना, उनकी अवहेलना करना तथा आदिवासियों के ज्ञान को नकारने का काम चलता रहता है, ऐसा भगवान मांझी तथा दूसरे लोग इशारा करते हैं। उनका कहना है, ‘हम स्थाई विकास चाहते हैं। हमारी जमीनों को सिंचाई उपलब्ध करवा दीजिए। हमारे लिए अस्पताल और दवाइयों की व्यवस्था कर दीजिए। हमारे स्कूल बनवा दीजिए और अध्यापकों की व्यवस्था कर दें। हमें जंगल और जमीन दे दें। हमें कंपनी नहीं चाहिए। कंपनी का खात्म कर दीजिए। यह बात हम पिछले 13 सालों से लगातार कह रहे हैं मगर सरकार है कि सुनती ही नहीं है।’
भारत पहले से ही एक अति-विकसित देश है और इन यूरोपीय कंपनियों के यहां आने के पहले भी था। जनता के बुनियादी अधिकारों और आने वाली पीढिय़ों के लिए पर्यावरण की सुरक्षा किसी भी विकसित समाज का प्रमाण है। लेकिन उन कानूनों की, जो इन अधिकारों की रक्षा करते थे और जिनका विकास आजादी के बाद के 60 वर्षों में एक लंबी और कष्टप्रद प्रक्रिया के तहत हुआ, अब विदेशों के दबाव की वजह से धज्जियां उड़ रही हैं। जो उद्योग स्थानीय लोगों पर थोपे जा रहे हैं वे टिकाऊ नहीं हैं और इन उद्योगों के क्रियाकलाप निश्चित रूप से किसी भी मायने में विकास को सुनिश्चित नहीं कर रहे हैं।

चित्रकार सोमनाथ होड़ के कलाकर्म पर व्याख्यान 28 को

नई दिल्ली : 28 अगस्त को शाम 5 बजे कौस्तुभ सभागार, ललित कला अकादेमी, रवींद्र भवन, मंडी हाउस, में मशहूर चित्रकार अशोक भौमिक तेभागा आंदोलन और सोमनाथ होड़ का कलाकर्म पर व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता मैनेजर पाण्डेय करेंगे।
इसका आयोजन जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह  ग्रुप की ओर से किया जा रहा है।

सोमनाथ होड़
बरोमा, चिटगांव में 1921 को जन्मे सोमनाथ होड़ ने इंडियन आर्ट कॉलेज, दिल्ली पौलीटेक्निक और कला भवन, शान्तिनिकेतन में अध्यापन किया। वे कुछ समय के लिए एमएस कॉलेज, बड़ोदा से भी जुड़े रहे। होड़ ने विभिन्न कला माध्यमों जैसे कि प्रिंट मेकिंग, रेखांकन और जल रंग में काम किया। आखिरी समय में वे पूरी तरह मूर्ति कला के लिए समर्पित हो गए। सोमनाथ होड़ ने तेभागा डायरी और आमार चित्रो भाबोना जैसी महत्त्वपूर्ण किताबें लिखीं। उन्हें ललित कला रत्न, मरणोपरांत पद्म भूषण और अनेक अलंकरणों  से सम्मानित किया गया। 2006 में मृत्यु से पहले तक वे शान्तिनिकेतन में रहते हुए कलाकर्म में सक्रिय रहे।    
तेभागा डायरी
1946 की सर्दियों में भारत की अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी ने सोमनाथ होड़ को उत्तर बंगाल में चल रहे तेभागा आन्दोलन को दर्ज करने का दायित्व सौंपा।  आर्ट स्कूल से गए युवा कला छात्र सोमनाथ गावों में चल रहे जबरदस्त राजनैतिक उभार के साक्षी बने।  उन्होंने अपने रेखांकनों और चित्रों में ग्रामीण जनमानस की लड़ाकू चेतना को शिद्दत से दर्ज किया। यह वही समय था जब राष्ट्रीय राजनीति में साम्प्रदायिक ताकतें मजबूती से जगह बना रही थीं। तेभागा आन्दोलन के दौरान लिखी सोमनाथ होड़ की निजी डायरी और उनके बनाए रेखाचित्र एक प्रतिबद्ध  कलाकार द्वारा दर्ज किया किसान आन्दोलन का अद्भुत सामाजिक दस्तावेज है। नजदीक से जुड़े रहने के कारण तेभागा अनुभव उनके लिए  जीवन पर्यंत प्रेरणा के स्त्रोत बने रहे।   
अशोक भौमिक
नागपुर में जन्मे अशोक भौमिक का उत्तर भारत की वामपंथी राजनीति और सांस्कृतिक आंदोलनों से गहरा जुड़ाव रहा है। उन्होंने  उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों के छात्रों को  कविता पोस्टरों से परिचित करवाया। भौमिक ने अपने चित्रों की एक ख़ास शैली अर्जित की है। हाल के दिनों में चित्रकला को जीवन और समाज से जोड़ने के लिए उन्होंने व्याख्यान- प्रदर्शनों के अभिनव प्रयोग किये हैं। इस सन्दर्भ में उन्होंने आरा, उज्जैन, अशोक नगर, बरेली, गोरखपुर, लखनऊ और जबलपुर में कला संबंधी व्याख्यान-प्रदर्शनों की महत्त्वपूर्ण प्रस्तुतियां दीं। इन शहरों के अलावा उन्होंने जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, भारतीय जन संचार संस्थान दिल्ली, भारतेंदु नाट्य अकादेमी लखनऊ और नेशनल कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स लाहौर के छात्रों को भी संबोधित किया है। अपने शोधपरक आलेखों और व्याख्यान- प्रदर्शनों  के जरिये उन्होंने उत्तर भारत के लोगों को चित्तप्रसाद, जैनुल आबेदीन और सोमनाथ होड़ जैसे महत्त्वपूर्ण भारतीय चित्रकारों से परिचित करवाया। जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्य अशोक भौमिक दिल्ली में रहते हुए चित्रकला को समर्पित हैं।    
कार्यक्रम के बारे में अधिक जानकारी के लिए संजय जोशी, संयोजक द ग्रुप से 9811577426 या thegroup.jsm@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।  

खेल में खेल : अनुराग

राष्ट्रमंडल खेलों में हो रहे भ्रष्टाचार को लेकर मैं हर भारतीय की तरह चिंतित था। मैं गुमसुम बैठा देश के कर्णधारों के गिरते स्तर के बारे में सोच रहा था। चौधरी साहब आ गए। मेरे कंधे को हिलाया तो भ्रष्टाचार की दुनिया से बाहर निकल आया।
वह मुस्काराए, ”बरखुद्दार क्या सोच रहे हो?”
मैं मुस्काराया, ”राजनेता असली खिलाड़ी हैं। वे खेलों में भी खेल कर रहे हैं। उन्हें न मैदान की जरूरत है और न ही प्रैक्टिस की। जन्मजात खिलाड़ी हैं।”
चौधरी साहब ने जोरदार ठहाका लगाया, ”तुम में यही कमी है कि अपने दिमाग से नहीं सोचते। जो पढ़-सुन लेते हो, उसी पर खून सुखाने लगते हो। राष्ट्रमंडल खेलों ने तो नेताओं-अफसरों की आत्मा को जगा दिया है। इसी का नतीजा है कि उनमें ईमानदारी बढ़ी है।”
मैंने रोष में कहा, ”बाजार में 20 से 40 हजार रुपये में मिलने वाली ट्रेडमिल को करीब 10 लाख रुपये के किराए पर लिया गया है, और वह भी मात्र 45 दिनों के लिए। 460 रुपये में मिलनेवाला साबुन का डिस्पेंसर 3397 रुपये में, 75 रुपये का प्लग प्वाइंट 1219 रुपये में, 111 रुपये का डस्टबिन 1167 रुपये में, 1800 रुपये का पेडेस्टल फैन 4412 रुपये में किराए पर लिया गया है। यह तो नमूने भर हैं। नियुक्तियों से लेकर हर किसी में घोटाला रहा है और आपको ईमानदारी दिखाई दे रही है?”
वह दृढ़ता से बोले, ”बिल्कुल। हमारे देश में सब काम कागजों में करने का रिवाज है। कागजों में तालाब बनते हैं, उनके लिए पैसा लिया जाता है। फिर उन्हें भरने के लिए पैसा लिया जाता है। हवा में फसलें उगाई जाती हैं और कट जाती है। पशुओं का चारा नेताओं-अफसरों के पेट में चला जाता है, वे कोलतार पी जाते हैं और डकार भी नहीं लेते। विकास की योजाएं कागजों में बनती हैं और खुशहाली आ जाती है। अब तुम ही बताओ, राष्ट्रमंडल खेलों में कहां भ्रष्टाचार हो रहा है। सामान खरीदा तो गया है, किराए पर भी लिया गया है। ऐसा तो नहीं हुआ कि लिया ही नहीं गया हो? नियुक्तियां भी वास्तव में हुई हैं। छोटी दुकान में जो चीज दो रुपये में मिलती है, वही बड़ी दुकान में चार की मिलती है। राष्टï्रमंडल खेल देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा सवाल है। और गिल साहब, सही कह रहे हैं कि बारात दरवाजे पर आ गई है। जिन लोगों ने बहन-बेटी की शादी की है, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि कितनी ही कांट-छांट करो, लेकिन बजट बढ़ ही जाता है। और जब बारात दरवाजे पर आ जाती है तो पैसे का मुंह नहीं देखा जाता, बल्कि इज्जत बचाई जाती है। इसलिए इन सबको को न देखो, न सुना और न कहो। नेताओं-अफसरों की नियत पर शक मत करो। बस खेलों की कामयाबी की सोचो।”
मेरा रोष कम नहीं हुआ, ”लेकिन यदि सारा काम समय पर पूरा हो जाता तो कम पैसे में ही सारा काम हो जाता।”
चौधरी साहब ने कहा, ”हम किसी को शाम छह बजे मिलने का समय देते हैं तो साढ़े छह बजे तक पहुंचते हैं कि वह टाइम से नहीं आएगा। दूसरा भी सोचता है कि वह टाइम से नहीं आएगा और साढ़े छह बजे तक पहुंचता है। समय की पाबंदी तो हमारे संस्कार में ही नहीं है। काम को लेट करना तो हमारी आदत है। पेपरों की तैयारी हम पूरे साल नहीं करते, बल्कि ऐन टाइम पर कुंजी और नोट्स से रट्टा लगाकर पास होते हैं। इसलिए खेलों की तैयारी की लेटलतीफी में किसी का कोई दोष नहीं है। देखते रहो खेल शुरू होने से पहले सब काम खत्म हो जाएगा।”
मैं तो चौधरी साहब से सहमत हो गया हूं। और आप…।