Archive for: July 2010

अलाव-चौपाल पर कथा सुनाते हुए : विश्वनाथ त्रिपाठी

प्रेमचंद को उनकी जयंती पर याद कर रहे हैं वरिष्ठ कवि और आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी-

जो साहित्य बड़ा होता है, वह निजी भी होता है। प्रेमचंद हर पाठक के आत्मीय हैं। जैसे- पिताजी या मां हैं। सबके लिए हैं, लेकिन तुम्हारे निजी हैं। बड़ा रचनाकार अपने प्रशंसक और पाठक का आत्मीय होता है। जैसे- तुलसी के राम हैं। उत्तरी भारत की सामान्य जनता के राम वैसे हैं, जैसे तुलसी ने प्रतिष्ठित कर दिया। मेरे लिए मेरा गांव है या गांव का किसान है या जो वहां की प्रकृति है या जो पशु-पक्षी हैं, वो वही हैं, जैसा प्रेमचंद ने अपने साहित्य में दिखाया है। जो हमारा ग्रामीण जगत है, उसकी प्रेमचंद ने अपने साहित्य में मानों पूर्ण रचना की है। मुझे प्रेमचंद के साहित्य का अनुभव एक स्वाद की तरह होता है। तो इसका परिणाम है कि प्रेमचंद एक लेखक के रूप में तो जाने जाते ही हैं, प्रेमचंद हमारी जातीय संस्कृति या जो हमारा परिवार है, सांस्कृतिक परिवार है, उसके जैसे बुजुर्ग सदस्य की तरह लगते हैं।
मैंने प्रेमचंद पर कविता लिखी थी। यह कविता मेरे एक आत्मीय लेखक शेखर जोशी को बहुत पसंद आई थी। इसकी पंक्तियां इस तरह थीं-
बात उन्नीस सौ चौंतीस-पैंतीस की होगी
मैं पांच-छह साल का रहा होऊंगा
तो प्रेमचंद मेरे गांव आए थे
उस समय मेरे पिताजी बैलों की सानी-पानी कर रहे थे
उन्होंने प्रेमचंद को रस-पानी पिलाया
और पता नहीं क्या-क्या बातें कीं
मेरे पिताजी ने उन दिनों मेरी बड़ी बहन की शादी के लिए
कुछ जमीन रहन रखी थी।
प्रेमचंद ने मुझे और मेरे छोटे भाई को
गुड़-पट्टी खाने को दी।
वो मुझे कंधे पर बिठाकर
पूरा गांव देख आए
प्रेमचंद ने होरी और धनिया को
मेरे गांव में ही देखा था
हलकू और जाबरा को भी।
दो-तीन दिन मेरे गांव में रहकर
फिर प्रेमचंद लमही गए
वो मुझे अब देखें तो भी पहचान लेंगे
बोलेंगे- ‘अरे तेजबहादुर तिवारी के पूत बिसनाथ, तुम इत्ते बड़े हो गए। बुढ़ाए गए।’
हमारे लिए और हमारे जैसे पाठकों के लिए, जिनकी अपार संख्या है, प्रेमचंद का रूप ऐसा है। हम उनके निष्पक्ष या तटस्थ पाठक या आलोचक नहीं हो सकते।
मेरे पिताजी दर्जा एक तक पढ़े थे। खेत में कुदाल चलाते थे। ब्राह्मणवादी थे। कर्मकांड पर विश्वास करते थे। जवाहर लाल नेहरू उनकी तुलना में बहुत बड़े आदमी थे। लेकिन मैं जवाहर लाल नेहरू को पिता नहीं कह सकता। ऐसा ही समझिए।
यह बात मैं पहले भी कई जगह कह चुका हूं कि प्रेमचंद का शायद ही कोई प्रसिद्ध पात्र हो जो कानपुर के पश्चिम और बनारस के पूर्व का हो। उनका रचना संसार ठेठ पूर्वी उत्तर प्रदेश का है। उनकी अधिकांश रचनाओं का काल 1910 के आसपास से 1936 तक है। ‘कर्बला’ जैसी कुछ रचनाएं ही ऐतिहासिक या पौराणिक हैं। यानी प्रेमचंद के रचना संसार का देशकाल बहुत सीमित है। लेकिन इसी सीमित देशकाल का चित्रण प्रेमचंद ने इस तरह किया है कि वे भारतीय साहित्य के या कम से कम हिंदी क्षेत्र के सर्वाधिक अंतरराष्टरीय ख्याति के कथाकार हैं। वस्तुत: यह देशीयता रचनाकार की अपनी आधारभूमि है, जिससे वो कालजयी होता है। यह वह इतिहास है, जिसके आधार पर वह साहित्य कालबिद्ध होकर कालजयी या कालातीत होता है। और यह बात स्वाधीनता आंदोलन के दौर में सिर्फ रचनाकार पर घटित नहीं होती। वह लेखकों और राजनीतिज्ञों दोनों पर लगभग समान रूप से लागू होती है। गांधी जी ठेठ गुजराती थे। ‘स’ को ‘श’ ही बोलते थे। हिंदी खड़ी बोली अपने ढंग से बोलते थे। गुजराती भाषा और साहित्य को उनका ऐतिहासिक योगदान है। और वे हमारे सबसे बड़े विश्व नागरिक हैं। जवाहर लाल नेहरू इतना-उतना नहीं, हमेशा इत्ता-उत्ता बोलते थे। ठेठ इलाहाबादी बोली है। लेकिन उनकी अंतरराष्टरीयता जगजाहिर है। यही बात आप रवींद्रनाथ ठाकुर, राजगोपालाचार्य, कम्युनिस्ट पार्टी के भूतपूर्व महामंत्री पी.सी. जोशी आदि के बारे में भी कह सकते हैं।
प्रेमचंद ने अपने समय का अंतरराष्टरीय कथा साहित्य पढ़ रखा था। वे मोपासा, ओ हेनरी, चेखव को आदर्श कहानीकार मानते थे। ताल्सताय, मैक्सिम गोर्की, नगुची उनके बहुत प्रिय थे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि इनमें से किसी का प्रभाव उनके लेखन पर नहीं पड़ा। यह बात हमारे समकालीन विशेषकर उदित और उदीयमान कथाकारों को विशेष रूप से नोट करनी चाहिए कि गहरे तौर पर और रचनात्मक तौर पर प्रभावित होने की उपलब्धि रचनात्मक तौर पर प्रभाव मुक्त और निजी होने में है। किसी के जैसा होने में नहीं। रचनात्मक दृष्टि से किसी के जैसा होने का मतलब व्यर्थ, अनावश्यक होना होता है।
कुछ लोगों ने जहां तक मुझे याद पड़ता है, निर्मल वर्मा ने कहा है कि भारतीय उपन्यास लिखे ही नहीं गए। नामवर जी ने इस कथन को समर्थित किया। निर्मल वर्मा और नामवर जी बड़े नाम हैं (नाम तो प्रेमचंद का भी बड़ा है)। प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों का शिल्प कैसा है? उन पर ‘चंद्रकांता संतति’, ‘तिलिस्म होशरूबा’, ‘पंचतंत्र’, ‘जातक’ अदि का प्रभाव है। कथा प्राय: ऐसे शुरू होती है, जैसे कोई जानकार बुजुर्ग गांव के चौपाल में या अलाव के आसपास हाथ तापते हुए लोगों को कहानियां सुना रहा हो। प्रेमचंद का कथा शिल्प ठेठ भारतीय है। और फिर उनकी कथावस्तु क्या अभारतीय है? इसलिए प्रेमचंद के रहते हुए भारतीय उपन्यास को नकारना समझ में न आने वाली बात है। प्रेमचंद की तो बात छोडि़ए, जिसे जादुई यथार्थवाद कहा जाता है, वह भी गैरभारतीय नहीं है। वस्तुत: जादुई यथार्थवाद यथार्थ को ही और अधिक प्रभावी बनाने के लिए होता है। मुझे मार्खेज पढ़ते समय कई स्थानों पर पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास ‘चारू चंद्रलेख’ के कई प्रसंग याद आते हैं। प्रेमचंद की कई कहानियों में यह जादुई यथार्थ मिलता है। जैसे- ‘आत्मराम’ में महादेव सुनार और उनके प्रिय तोते की आवाज के वर्तमान में भी आधी रात को सुनाई पड़ती है। जादुई यथार्थवाद कोई किताबी चीज नहीं है। यह निरक्षर और अशिक्षित जनता के सामान्य जीवन में व्यवहारित होता है। विधवा औरत अपने सुख-दुख में दिवंगत पति से ऐसे बात करती है, मानों वह जीवित हो और सामने बैठा हो, ‘देखा टहल के बप्पा, तुम्हारा लड़का हमसे क्या कह रहा है?’ बिल्कुल इसी तरह की स्थिति ‘वन हंडरेड इयर्स ऑफ साल्यूटेड’ में है। इसी उपन्यास का घनघोर वर्षा या दृश्य मुझे ‘कामायनी’ के ‘चिंता’ सर्ग की याद दिलाता है। इसलिए भारतीय और अभारतीय का निर्णय जरा देर से करना चाहिए।
प्रारंभिक दौर में हिंदी के अनेक वरिष्ठ आलोचकों ने  प्रेमचंद को द्वितीय श्रेणी का रचनाकार कहा। उनके अनुसार  प्रेमचंद उत्कृष्ट कथाकार नहीं, वह उपदेशक का सिद्धांत प्रचारक अधिक हैं। हिंदी पाठकों को बताने की जरूरत नहीं कि यह आरोप कबीर और तुलसी पर भी लगाया जाता है। वस्तुत: श्रेष्ठ रचना चमत्कृत नहीं करती, प्रभावित करती है। कलावादियों के पात्र सहज और सामान्य नहीं होते। वे प्रभावित कम करते हैं, चौंकाते ज्यादा हैं। जिस तरह अपेक्षाकृत अधिक संपन्न वर्ग अपने खान-पान और जीवन व्यवहार में विशिष्ट होता है, इसी तरह संपन्न वर्ग की मानसिकता या कुलीनतावादी लेखकों के पात्र और उनका शिल्प असामान्य और असहज होता है। शेखर एक पेड़ की डाल को काटकर उसे एस (स्) आकार देता है क्योंकि उसकी पे्रमिका का नाम शशि है। यानी उसके नाम की स्पेलिंग ‘एस’ से शुरू होती है। प्रेमचंद के पात्र ऐसा नहीं कर सकते। निर्मल वर्मा के साहित्य में शायद ही कभी कोई पात्र जोर से बोलता हो, हवा तेजी से चलती हो, दरवाजा जोर से खुलता हो। परसाई ने लिखा है कि मैं रिक्शे वालों पर भी लिखता हूं, मैं भिखमंगों पर भी लिखता हूं तो मैं सिर्फ चीड़ों की चांदनी पर कैसे लिख सकता हूं। मुझे लगता है, यदि मैं जोर से बोला तो निर्मल का रचना संसार फूं से उड़ जाएगा या बिखर जाएगा।
जीवन और संसार में ऐसा भी है, जहां अज्ञेय और निर्मल के पात्र यथार्थ हैं। लेकिन जो इनसे भिन्न हैं, वे कहीं बहुत ज्यादा और व्यापक हैं। और दुर्भाग्यवश भारत का यथार्थ बेरोजगारों, अशिक्षितों, दलितों, पराधीन नारियों, रोगियों, दहेज के लोभियों, शोषितों और शोषकों का यथार्थ है। इन पात्रों का शिल्प और उनकी भाषा चीख और चिल्लाहट की होगी, कानाफूसी या धीमी नहीं।
प्रेमचंद की रचनात्मक कला के एक उदाहरण पर गौर करें। उनके सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यास का नाम ‘गोदान’ है। उर्दू वाले उसे ‘गऊदान’ पढ़ते हैं। कमल किशोर गोयनका कह सकते हैं कि वह प्रेमचंद के हिंदुत्ववाद का प्रमाण है कि इस महाकाव्यात्मक उपन्यास के केंद्र में गो माता है। दूसरी तरफ अति वामपंथी (नाम लेना खतरनाक है) कमल किशोर गोयनका का विरोध करते हुए भी सारत: उनसे सहमत होंगे कि यह प्रेमचंद की प्रतिक्रियावादिता है। गो होरी का स्वप्न है। जैसा कि एक निम्न मध्यम वर्गीय किसान का स्वप्न होता है या था। होरी का यह स्वप्न पूरा नहीं होता। मृत्यु के समय यह गऊ होरी की अंतिम मूर्छा में फिर आती है-
‘फिर एक गाय का चित्र सामने आया, बिल्कुल कामधेनु-सी। उसने उसका दूध दुहा और मंगल को पिला रहा था कि गाय एक देवी बन गई और…।’
होरी की मृत्यु हो रही है।
हीरा ने रोते हुए कहा- ‘भाभी, दिल कड़ा करो, गो-दान करा दो, दादा चले।’
धनिया ने उसकी ओर तिरस्कार की आंखों से देखा। अब वह दिल को और कितना कठोर करे? अपने पति के प्रति उसका जो कर्म है, क्या वह उसको बताना पड़ेगा? जो जीवन का संगी था, उसके नाम को रोना ही क्या उसका धर्म है?
और कई आवाजें आयीं- ‘हां, गो-दान करा दो, अब यही समय है।’
धनिया यंत्र की भांति उठी, आज जो सुतली बेची थी, उसके बीस आने पैसे लायी और पति के ठंडे हाथ में रखकर सामने खड़े दातादीन से बोली, ‘महाराज, घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा। यही पैसे हैं, यही इनका गोदान है।’ और पछाड़ खाकर गिर गई।
यह कैसा गोदान है? और यह कैसी गऊ है? यहां कर्मकांड के प्रति चित्रित जीवन स्थितियों के कारण कितनी घृणा और विरक्ति है। ब्राह्मणवादी कर्मकांड के प्रति ऐसी घृणा, संवेदना आज भी किसी दलित लेखक ने नहीं पैदा की है। यहां प्रेमचंद सिद्धांतवादी नहीं, नारेबाज नहीं, आदर्शवादी नहीं, ऐतिहासिक नैतिकता को सौंदर्यबोध के आस्वाद में परिणित कर सकने वाले महान भारतीय रचनाकार के रूप में देखे जा सकते हैं।
प्रेमचंद को आदर्शोन्मुख यथार्थवादी रचनाकार कहा जाता है। इस विषय में पहली बात तो ध्यान में रखने की यह हैै कि यह आदर्शवादी वातावरण प्रेमचंद की सिर्फ रचनाओं में नहीं है, वह प्रेमचंद के राजनीतिक और सांस्कृतिक वातावरण में भी है। प्रेमचंद के अनेक पात्रों का हृदय परिवर्तन होता है, वे सरकारी नौकरी से इस्तीफा देते हैं, विदेशी वस्त्र पहनना छोड़ देते हैं, शराब पीना छोड़ देते हैं, जेल चले जाते हैं लेकिन यह सब प्रेमचंद के युग में सिर्फ काल्पनिक और किताबी बातें नहीं थी; उस समय जगह-जगह यह सब होता था। इसलिए यह केवल आदर्शवाद नहीं था बल्कि यथार्थ का चित्रण भी था। जिसे हम आज आदर्श समझते हैं, वह पे्रमचंद के युग में आंशिक तौर पर ही सही यथार्थ भी था। दूसरी बात यह कि प्रेमचंद यथार्थ और आदर्श को द्वंद्व का ताना-बाना अतीव विश्वसनीयता के साथ बुनते हैं। प्रेमचंद के पात्र सहसा कोई निर्णय शायद ही कभी लेते हों। वे गलत या सही निर्णय लेने के पूर्व काफी सोच-विचार करते हैं। ‘गबन’ उपन्यास में रमानाथ अपनी पत्नी के जेवर चुराने के पूर्व कितने विकल्पों पर विचार करता है, कितने पशोपेश में पड़ता है। प्रेमचंद की एक विख्यात किंतु अल्पचर्चित कहानी है ‘आत्माराम’। उसके नायक महादेव सुनार अपने तोते को बहुत प्यार करते हैं। वह तोता ही उनके जीने का सहारा है। एक बार वह उड़ जाता है तो पिंजरा लेकर महादेव सुनार रात भर उसकी तलाश करते हैं। उसी दौरान अशर्फियों से भरा घड़ा हाथ लग जाता है। अब महादेव सुनार की जो चेष्टाएं चित्रित की गई हैं, वे चाहे जितनी अजीब लगें, हैं परम स्वाभाविक। महादेव सुनार सोचते हैं कि अगर चोर लौटकर आ गए तो इस घड़े को कैसे बचाएंगे। वे कुछ अशर्फियां अपनी गांठ में बांधते हैं, जेब में भरते हैं। फिर उसे जमीन में गाडऩे का उद्यम करते हैं। एक बार उस घड़े को सिर पर रखकर तेजी से भागने का रिहर्सल करते हैं कि वे इतनी तेजी से भाग सकते हैं या नहीं कि चोर उन्हें पकड़ न पाएं। और इन्हीं सब विकल्पों में रात बीत जाती है और सवेरा हो जाता है। यानी चोरों के लौट आने का भय पूरी तरह समाप्त हो जाता है। प्रेमचंद ने एक स्थल पर लगभग तात्कालिक मुद्रा में दो पात्रों को एक ही निर्णय लेने का चित्रण किया है। वह है- ‘कफनÓ के घीसू-माधव का। कफन के लिए चंदा इकट्ठा करने के बाद पैसा मिला कि रास्ते में ताड़ीखाना दिखलाई पड़ा। दोनों थोड़ी देर तक चुप रहे फिर एकसाथ ताड़ीखाने में प्रवेश कर गए। वस्तुत: यह निर्णय भी इतना आकस्मिक नहीं है, यह आकस्मिकता तो लक्षण या अनुभाव है उनकी दीर्घकालीन और संस्कारी मदिरा पर आसक्ति का। और यह आसक्ति ऐसी तीव्र और असहाय कर देने वाली है कि यहां सोच-विचार और विकल्प के सभी रास्ते बंद हैं। ऐसी तात्कालिक विकल्पहीनता मामूली रचनाकार नहीं दिखा सकता। जो लोग प्रेमचंद के साहित्य में मनोवैज्ञानिक गहराई और मनोवैज्ञानिकता का अभाव पाते हैं उन्हें ऐसे स्थलों पर ध्यान देना चाहिए।
वस्तुत: प्रेमचंद यथार्थ से आदर्श का जो रास्ता अपने पात्रों के लिए तैयार करते हैं वह बहुत स्वाभाविक यानी टेढ़ा-मेढ़ा, ऊबड़-खाबड़, जटिल और विकल्पों से भरा हुआ है। यानी उतना विश्वसनीय है जितना कि जीवन। प्रेमचंद के यहां कथानक का विकास सिर्फ प्रलंब रैखिक या हॉरिजेन्टल ही नहीं होता, प्रलंबात्मक विकास आक्षांशिक जटिलता की पारस्परिक रगड़ का परिणाम होती है। पे्रमचंद की रचनाओं का कथानक सिर्फ अपने लक्ष्य का ही ध्यान नहीं रखता, उसमें पर्याप्त समवर्तिता होती है। पे्रमचंद की रचनाओं का उद्देश्य सामान्य विवरणों से निर्मित होता है। निर्मिति या कथानक का ताना-बाना प्रेमचंद के यहां केंद्रीय महत्व का है। पे्रमचंद छलांग मारने वाले या स्वाभाविकता को कूदकर लांघ जाने वाले या अपनी कला से चौंकाने वाले रचनाकार नहीं हैं। रचनात्मक आतुरता की बहुत बड़ी कमी होती है कि रचनाकार डिटेल्स का चित्रण या तो नहीं करते या उसे महत्वहीन समझते हैं। जबकि रचनाएं डिटेल्स में भरपूर होकर ही सिद्धि प्राप्त करती हैं। गोबर, झुनिया के पेट में बच्चा रोपकर लखनऊ गया था। वहां से लौटा तो झुनिया की गोद भरी थी। गोबर को इसकी खबर मिल गई थी। वह बच्चे के लिए गोटे की चमकदार टोपी लाया। जब गोबर और झुनिया की मुलाकात हुई तो झुनिया रूठी हुई थी। गोबर बच्चे को गोटे की टोपी पहनाता है। बच्चा वह टोपी उतारकर फेंक देता है। महान रचनाकार पे्रमचंद ने लिखा, बच्चा टोपी को पहनने की नहीं, खेलने की चीज समझता था। इसी तरह घर से लखनऊ जाते समय गोबर को एक युवा दंपती आपस में झगड़ा करते हुए मिलते हैं। उनका आपस में झगड़ा करना, गोबर का बीच में पडऩा, फिर पत्नी की डांट कि ये हमारा आपसी मामला है, तुम कौन होते हो बीच में पडऩे वाले आदि। ऐसे डिटेल्स हैं जो ‘गोदान’ के कथानक को विश्वसनीय भरपूर ओर समृद्ध बनाते हैं। कहते हैं कि गुलगुला गुड़ डालने से मीठा होता है। गोदान का पाठकीय आस्वाद ऐसे डिटेल्स से निर्मित होता है।
और प्रेमचंद की भाषा कैसी है? फिराक गोरखपुरी ने कहीं लिखा है कि उर्दू के महान आलोचक शिबली सर धुनते थे कि हाय! हिन्दुस्तान में एक भी मुसलमान नहीं जो प्रेमचंद जैसी उर्दू लिख सकता हो। यह उर्दू कैसी थी? यह सिर्फ उर्दू नहीं थी, सिर्फ हिंदी भी नहीं थी। प्रेमचंद की हिंदी और उर्दू में अवधी की तरावट थी जो उसे अद्वितीय ही नहीं, पाठक की आत्मीयता प्रदान करती थी और प्रेमचंद की कोई विशिष्ट भाषा-शैली नहीं थी। शेक्सपियर की भाषा-शैली के बारे में कहा जाता है कि अंगे्रजी बोलने वालों की सारी शैलियां शेक्सपियर की शैलियां हैं। इसी तरह हिंदी भाषा-भाषियों की सारी शैलियां प्रेमचंद की हैं।

तीन चिरकांक्षित इच्छाएं : तेम्बोत केराशेव

सोवियत संघ के अदीगेया प्रांत की प्रचलित दंतकथा पर आधारित चर्चित रुसी लेखक तेम्बोत केराशेव की खूबसूरत कहानी- 

यह एक सत्यकथा है या कल्पना- हम इस अटकलबाजी में नहीं पड़ेंगे। लोगों को यह विश्वास हो जाना हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण है कि ऐसा वास्तव में हो सकता था और यह भी कि ऐसी कहानियों में वे जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण तथा मनुष्य के गुण-दोषों के मूल्यांकन को अभिव्यक्त करते हैं।
एक बार मशूक नाम का एक युवक घोड़े पर यदा-कदा इस्तेमाल किए जाने वाली पगडंडी से अपने गांव की ओर जा रहा था। मशूक नाम किसानों में बहुत आम है, जिसका अर्थ होता बाजरे का बेटा। देखने में भी वह बिलकुल किसान का बेटा ही लगता था। मेमने की खाल की नीची पट्टीवाली टोपी;  हथकरघे के मोटे कपड़े का बना, पीला पड़ा चिरकेसी कोर्ट; काली हड्डी से बने कारतूस के खोल और खंजर की मूठ; नरी के मोजों के ऊपर पहने बिना एड़ी के जूते, जिनके कच्चे चमड़ें के तलों के मुड़े हुए किनारों पर से बैल के बाल अभी उड़े न थे। उसका घोड़ा भी बढिय़ा नसल का न था- भौंड़ा, हड्डियां निकली हुईं, मरियल। लेकिन युवक के मामूली कपड़े और घोड़े का साधारण साज बड़ी मेहनत से साफ किए हुए थे, उन पर पैबंद सलीके से लगे थे, हर चीज अपनी जगह पर दुरुस्त थी। मतलब यह है कि सब मामूली होते हुए भी, साफ-सुथरा और ढंग का था, जैसे कि इनसान को रहना चाहिए।
मशूक पच्चीस से ज्यादा का नहीं था, लेकिन छल्लेदार छोटी-छोटी मूंछों व दाढ़ी के कुंचित रोयों के कारण उसकी मुखाकृति आयु के अनुपात में अधिक गंभीर प्रतीत होती थी। और जिस मुस्तैदी से उस सुनसान रास्ते पर वह घोड़े पर बैठा जा रहा था, उससे लगता था कि युवक उनमें से है, जो इस नियम का कड़ाई से पालन करते हैं- ‘अगर मर्द बनकर पैदा हुए हो, तो मर्द की तरह ही रहो।’
पतझड़ का गरम दिन होने के बावजूद मशूक ने अपनी गरम टोपी न गुद्दी पर खिसकाई थी और न ही तिरछी की थी। वह घोड़े की चाल पर भी सख्ती से नजर रखे हुए था, उसे एक-सी, नपी-तुली कदमचाल से ले जा रहा था, जैसा कि अनुभवी घुड़सवार को करना ही चाहिए। नहीं तो क्या पता कब किसी हंसी उड़ानेवाले की नजर पड़ जाए ओर जीवनभर के लिए ‘खरहा-घुड़सवार’ नाम पड़ जाए।
कहने का तात्पर्य यह है कि मशमक ऐसों में से था, जिन्हें अदीग लोग ‘अच्छा लड़का’ कहते हैं।
अपने गांव का आधा रास्ता तय करने पर मशूक को एक पैदल जा रहा बूढ़ा मिला। युवक ने यहां भी यथा-विधि व्यवहार किया- वह बायीं ओर से बूढ़े के निकट आया (दायीं ओर का मार्ग सम्मानपूर्वक बुजुर्गों के लिए छोड़ दिया जाता है), और घोड़े से उतरकर वृद्ध को सलाम किया।
”तुम्हारी उम्र दराज हो और तुम सुखी रहो, मेरे बेटे!” बुजुर्ग ने कहा।
वह छोटे कद का और दुबला-पतला था, उसकी दाढ़ी कुकरौंधे के सूखे फूल-सी सफेद, फुलफुली और बढ़ी हुई थी। मशूक को सबसे अधिक आश्चर्य वृद्ध के चेहरे को देखकर हुआ, जो इतना गोरा था कि लगता था जैसे उसने कभी धूप नहीं देखी है। लेकिन मशूक ने अपने चेहरे पर आश्चर्य का भाव नाम मात्र को भी नहीं आने दिया। बुजुर्गों के चेहरे-मोहरे को अनावश्यक कुतूहल से देखना अशिष्टता समझी जाती है।
नौजवान ने बिना सोच-विचार में पड़े वृद्ध से तुरंत अपने घोड़े पर बैठ जाने का आग्रह किया।
”तुम्हारी किस्मत का सितारा हमेशा बुलंद रहे, मेरे बेटे!” वृद्ध ने कहा।  ”तुम आगे चलो, मैं तो अपनी आदत के मुताबिक धीरे-धीरे चलूंगा।”
”मुझे बिलकुल जल्दी नहीं है, आप घोड़े पर बैठ जाइए,” मशूक ने हठ किया। ”जब बुजुर्ग पैदल चल रहे हैं, तो मैं भला घोड़े पर कैसे सवार रह सकता हूं?”
”लेकिन मैं अगर घोडे पर बैठूंगा, तो तुम्हें पैदल चलना पड़ेगा,” वृद्ध मुस्कराया।
”बाबा, आप क्यों मुझे बुजुर्गों की बेइज्जती जैसा शर्मनाक काम करने को मजबूर करते हैं? आपके साथ-साथ पैदल चलने में मेरे पैर थोड़े ही टूट जाएंगे।”
”खैर, जैसी तुम्हारी मर्जी। तुम बहुत अच्छे लड़के हो”, वृद्ध मान गया और घोड़े पर सवार हो गया।
दोनों में बातें होने लगीं। मशूक छोटा होने के नाते सवाल नहीं पूछ रहा था, जबकि वृद्ध नि:संकोच सवाल पर सवाल पूछे जा रहा था। जब तक वे गांव के निकट पहुंचे, वृद्ध को मालूम हो चुका था कि मशूक अपनी बूढ़ी मां के साथ रहता है, उसके न कोई भाई है, न बहन। और यह भी कि इस साल उसने दो दिन की जुताई भर रई, एक दिन की जुताई भर बाजरा और एक की जुताई भर मक्का बोया था और फसल भी अच्छी हुई है। मशूक अपने जीवन से और अपनी साधरण सम्पन्नता से संतुष्ट है। खाने को रोटी का टुकड़ा है, तन ढकने को कपड़ा है, कोई बीमारी नहीं है, और मां भी हष्ट-पुष्ट है। फिर और क्या चाहिए अदीग नौजवान को? हां, अगर खान और उसके सरदार जीना हराम न करते, तो उसे जिंदगी से कोई शिकायत ही न होती।
गांव के निकट, जहां से रास्ता भिन्न-भिन्न दिशाओं में जाता था, वृद्ध ने घोड़ा रोक दिया।
”लो तुम्हारा गांव आ गया, मेरे बेटे। मुझे दूसरी तरफ जाना है। तुम्हें बहुत-बहुत शुक्रिया, मैं तुम्हारी घोड़े की काठी पर अच्छी तरह सुस्ता लिया। मैं आगे अपने रास्ते पैदल जाऊंगा…” उसने कहा।
मशूक ने वृद्ध को घर तक घोड़े पर छोड़ आने का आग्रह किया, लेकिन उसने साफ इनकार कर दिया।
”मेरा गांव इतना पास नहीं है। मैं तुम्हें और तकलीफ नहीं देना चाहता। मैं अरसे से पैदल चलने का आदी हूं। शुक्रिया, नौजवान।”
वृद्ध चल पड़ा, पर अचानक मुड़कर रहस्यमयी, सुखद मुस्कान के साथ बोला- ”बेटे, तुम मुझे बहुत पसंद आए। तुम्हारे अच्छे मिजाज, तुम्हारी ईमानदारी और मेहनतपसंदी के बदले में मैं तुम्हें कुछ देकर ही शुक्रिया अदा करना चाहता हूं। ऐसी किसी तीन चीजों के नाम बताओ, जिनकी तुम्हें सबसे ज्यादा जरूरत हो। वे तुम्हें मिल जाएंगी।”
मशूक को बहुत आश्चर्य हुआ। ‘बाबा कहीं सठिया तो नहीं गए हैं,’ उसने सोचा, ‘पता नहीं मुझे क्या मांगने की सूझ आए। मैं जो चाहूंगा, वह उसे कहां से लाएंगे? लेकिन संभ्रांत वृद्ध से यह कहना कि वह कहीं मजाक तो नहीं कर रहा है, अनुचित था। सन-से सफेद बालों वाले बुजुर्ग कभी किसी को धोखा नहीं दे सकते, खुद भले ही उनकी उम्मीदों का खून हो जाए,’ मशूक ने सोचा और जवाब दिया-
”बाबा, मैं शायद इतनी तारीफ के काबिल नहीं हूं, लेकिन आप अगर इतने नेक और दरियादिल हैं, तो मुझे थोड़ा सोचने और अपने बुजुर्गों से सलाह करने की मोहलत दीजिए। अदीग नौजवान के लिए बहुत जरूरी तीन चीजों के नाम इसी वक्त बताना मुझ जैसे नादान के बस की बात नहीं है।”
”यह भी बड़ी अक्लमंदी की बात है,” वृद्ध ने उसकी प्रशंसा की। ”तीन दिन बाद इसी जगह पर मिलना, मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा।”
घोड़े पर सवार होते समय मशूक एक क्षण के लिए मुड़ा, लेकिन जैसे ही उसने अगल-बगल नजर दौड़ाई तो पाया कि वृद्ध का वहां नाम-निशान भी नहीं है। चारों ओर खुला मैदान था- कोई छिप नहीं सकता था।
‘कहीं वह बूढ़ा शैतान या जिन तो नहीं था? वह आखिर कहां गायब हो गया?’… मशूक हैरत में पड़ गया।

मशूक को हालांकि पूरा विश्वास था कि उसे जिन ही मिला था, फिर भी वह यह आजमा लेना चाहता था कि वह अपना वचन निभाता है या नहीं।
अपने गांव में पहुंचकर मशूक ने अच्छा खाना तैयार करवाया और बुद्धिमान वृद्धों को अपने यहां न्योतकर उनसे पूछा कि अदीग नौजवान के लिए कौन-सी तीन वस्तुएं अत्यधिक आवश्यक हैं।
बुजुर्गों ने काफी देर सोचकर समवेत स्वर में कहा कि अदीग के लिए सबसे जरूरी है- अच्छा घोड़ा, अच्छा हथियार और अच्छी बीबी। अन्य सभी अतिथि भी वृद्धों से सहमत हो गए।
तीन दिन बाद मशूक पूर्वनिश्चित स्थान पर पहुंच गया। उसे वृद्ध के मिलने की आशा नहीं थी, लेकिन वह अपनी शंकाओं का निवारण करने पहुंच ही गया। वृद्ध को अपनी बाट जोहत देख वह आश्यर्चचकित रह गया।
”क्यों, नेक नौजवान, तुमने सोच लिया कि तुम्हें क्या चाहिए?” उसने मशूक से पूछा।
”जी, बाबा,” मशूक ने उत्तर दिया, ”बुजुर्गों ने कहा कि अदीग के लिए सबसे जरूरी हैं- अच्छा घोड़ा, अच्छा हथियार और अच्छी बीबी। मैं इन्हीं को लेना चाहूंगा।”
वृद्ध ने उत्तर तुरंत नहीं दिया। वह गहरे सोच में डूब गया और फिर बोला- ”तुम्हारे बुजुर्गों ने बहुत अक्लमंदी से काम लिया है। जो कुछ उन्होंने कहा, वह सचमुच आदमी के लिए जिंदगी में बहुत कीमती है। लेकिन मैं मुश्किल मे पड़ गया हूं,” उसने मन-ही-मन में कुछ सोचते हुए कहा। ”अच्छा हथियार और अच्छा घोड़ा हासिल करना इतना मुश्किल नहीं है। लेकिन जहां तक अच्छी बीबी का सवाल है… कुछ कह नहीं सकता… तीन ऐसी औरतें हैं, जो अच्छी बीवियों साबित हो सकती हैं। उनमें से दो घर-बारवाली हैं, उम्र में तुमसे बड़ी हैं। तीसरी औरत जबान तो हैं, पर दो साल हुए घर बसा चुकी है… लेकिन क्या किया जाए, जब वादा किया है, तो निभाना ही पड़ेगा। तुम नदी किनारे वाले गांव जाकर नौरोज नाम के आदमी का घर ढूंढ़ लो और उसकी बीवी को एक नजर देख लो। अगर वह तुम्हें पसंद आ गई, तो यही सही, मैं सारा गुनाह अपने सिर ले लूंगा और तुम्हारी शादी करवा दूंगा। जाकर देख आओ, फिर एक हफ्ते बाद इसी जगह पर आकर मुझे अपना फैसला बता देना।”
वृद्ध युवक से विदा लेकर अपने रास्ते चल दिया। मशूक अब उस पर बराबर नजर रखे रहा। वह यह देखना चाहता था कि वृद्ध गायब कैसे होता है। फिर भी एक क्षण के लिए उसकी नजर चूकी और जब उसने दोबारा बूढ़े की तरफ देखा, तो उसका वहां नाम-निशान भी न था, वह पहले की तरह गायब हो चुका था।
वृद्ध बहुत रहस्यमय था। मशूक को अब उसके वचन पर कभी विश्वास होने लगाता, तो कभी नहीं होता। इसके बावजूद अपनी पत्नी बनने योग्य एक मात्र स्त्री को जल्दी से जल्दी देखने का लोभ वह संवरण न कर सका और फौरन उस गांव के लिए रवाना हो गया।
वृद्ध को बताया हुआ गांव काफी दूर था। मशूक को दिनभर सफर करना पड़ा। अंत में वह एक बहुत ही मामूली-से अदीग गांव में पहुंच गया। एक संकरी-सी पहाड़ी नदी के किनारे मिट्टी के घर एक दूसरे से सटे, दलदली घास या सरकंडों से ढके खड़े थे। टेढ़ी-मेढ़ी गली में मशूक को नौरोज का घर मिल गया।
मशूक के आवाज देने पर एक सुडौल व छोटे कद की युवा स्त्री बाहर आई। उसकी गति में न तो चिंताग्रस्त गृहणियों की सी जल्दबाजी थी और न ही पुरुषों को आकृष्ट करने की अभ्यस्त, सर्वमान्य रूपसियों की सी सुस्ती। मशूक ने फौरन देख लिया कि उसकी चाल में उतावलापन नहीं है, उसके कदम हलके पड़ते हैं। उसे रूपवती नहीं कहा जा सकता था, पर वह सुदर्शना थी।
”आइए, तशरीफ लाइए!” स्त्री ने बिना कुछ पूछे कहा और बेंत से बना फाटक खोलने लगी।
”नौरोज साहब सही रहते हैं?”
”जी। आइए, हमारे मेहमान बनिए।”
”पर नौरोज साहब घर हैं?”
”आइए, वह आने ही वाले हैं,” स्त्री ने मशूक के लिए फाटक पूरा खोल दिया।
मशूक उस स्त्री की मृदु व मंद आवाज से अभिभूत हो गया। वह चरब-जबान नहीं थी, लेकिन बोलते समय आकरण संकोचवश शब्दों को लंबा भी नहीं खींचती थी। उसकी बातें सुनते समय उसकी सत्यता और निष्कपटता में संदेह उत्पन्न नहीं होता था। स्पष्ट था कि वह केवल शुद्ध हृदय से बात करने वाले लोगों में से है।
लेकिन उसका मुख्य आकर्षण शायद केवल इन्हीं गुणों तक सीमित नहीं था। मशूक यह नहीं समझ पर रहा था कि उसके अनिर्वचनीय सौंदर्य का रहस्य क्या है, पर वह तुरंत उसे पसंद आ गई।
स्त्री उसे एक साफ-सुथरे छोटे कमरे में ले गई।
”आप ऊबिएगा नहीं, आपको शायद ज्यादा देर उनका इंतजार नहीं करना पड़ेगा,”उसने कहा और मेहमान की ओर पीठ किए बिना बाहर चली गई।
उसके आदरपूर्वक उलटे कदम पीछे हटने की चेष्टा में भी, जो कि अन्य लोग अत्यंत आडंबरपूर्वक करते है, एक प्रकार का चित्ताकर्षक सम्मोहन था।
एकांत में एक प्रकार की अद्भुत व्याकुलता से ग्रस्त मशूक सोचन लगा कि उस स्त्री में ऐसा क्या है, जिसके कारण वह उसके वशीभूत हो गया है। क्या उसकी निष्कपटता के कारण? लेकिन कितने ऐसे निष्कपट लोग हैं, जिनमें इस प्रकार का आकर्षण नहीं होता है। क्या उसकी सौम्यता और शालीनता के कारण? लेकिन ये गुण तो लगभग सभी अदीग स्त्रियों में पाए जाते हैं।
मशूक अपनी पच्चीस वर्ष की आयु में अनेक स्त्रियों व युवतियों को देख चुका था, उनमें सुंदरियों की संख्या भी कम न थी, लेकिन अपने को किसी के द्वारा इस प्रकार वशीभूत किए जाने का अनुभव उसे कभी नहीं हुआ था।
उस स्त्री के शब्दों को मन-ही-मन बार-बार दोहराते और उसकी आदतों को स्मरण करते हुए मशूक की समझ में आने लगा कि वह अपने शब्दों की और अपने व्यवहार को भी कोई विशेष महत्व दिए बिना जीती है। उसे लगा कि वह अपने हृदय में कोई अत्यन्त कोमल निधि संजोय हुए है और अपना सारा ध्यान उसे सुरक्षित रखने में ही लगाती है। यही कारण है कि वह इतनी अकृत्रिम और स्वाभाविक प्रतीत होती है। उसे इस बात की बिलकुल चिंता नहीं कि वह कैसी लगती है, बल्कि किन्हीं उदास व अमूल्य विचारों में ही तल्लीन रहती है।
लेकिन वह आनंददायी व अमूल्य क्या है, जो वह अपने मन में संजोय हुए है? उसके चेहरे पर हर समय यह चमक कैसे बनी रहती है?
मशूक ने तिपाई खिड़की के पास खिसकाकर बाहर झांका। आंगन सलीके से झाड़ा-बुहारा हुआ था, मुर्गियों और टर्की बड़े आराम से उसमें घूम रहे थे, लेकिन बच्चे दिखाई नहीं दे रहे थे। जैसा कि लगता था, युवा दंपति अकेले रहते थे, उनके न बच्चे थे और न ही कोई संबंधी। गृहिणी आंगन में नजर आई, लेकिन न किसी प्रकार कर शोर हुआ और न ही हड़बड़ी देखने में आई, जैसा कि गृहिणियां प्रायं अतिथि के आने पर करती हैं। फिर ही मशूक की पूर्ण विश्वास था कि वह गृहस्थी के सारे काम-काज उतनी ही फुर्ती से करती है, जितनी कि ज्यादा शोर मचाने और हड़बड़ी दिखानेवाली गृहिणी।
उसका सोचना ठीक था। आधा घंटा भी न बीता होगा कि गृहिणी गोल चौकी उठाए आई, जिस पर गरम-गरम बाजरे का दलिया और मुर्गी का ताजा सालन रखे थे। वह चौकी रखकर गई, चिलमची व लोटा उठा लायी और मेहमान के हाथ-मुंह धो लेने पर बोली- ”वो आएं, तब तक आप खाना खा लीजिए। घर के मालिक के इंतजार में बैठा मेहमान बिना खाने के ऊबने लगता है।”
मशूक एक बार फिर उसकी स्वाभाविकता से चकित रह गया।
अपने विचारों व अनुमानों में खोया वह गृहिणी को एकटक ताके जा रहा था। यह अनुभव करके गृहिणी ने भी आश्चर्य से उसकी तरफ देखा। एक पल के लिए उनकी नजरें चार हो गईं। अतिथि की आंखों में स्पष्टï कुतूहल का भाव देखते ही स्त्री सकपता गई और जल्दी से बाहर निकल गई।
मशूक अपने अनचाहे अनुचित व्यवहार पर शर्म से लाल हो उठा, कसमसाया और भौंडे ढंग से खांसकर जल्दी-जल्दी खाना खाने में लग गया। लेकिन खाते समय भी वह याद करता रहा कि उसकी निर्लज्ज दृष्टि का अहसास होने पर भी वह कितनी शांति व शालीनता से वहां से गई थी।
उस अद्भुत नारी के बारे में चिंतन में लीन मशूक को मालूम भी नहीं पड़ा कि समय कितनी जल्दी बीत गया है, और नौराज भी घर लौट आया है। गृहिणी पति को लेने गयी। मशूक उसे देखकर फिर विस्मित रह गया- वह चल तेज कदमों से रही थी, फिर भी उसकी चाल पूर्ववत मन्द व सुन्दर प्रतीत ही रही थी।
गृहिणी ने फाटक समय पर खेल दिया, और सूखी घास से लदी बैलगाड़ी आहते में आ गयी। बैलगाड़ी से बड़ी-बड़ी, घुघराली मूंछोवाला, सुगठित, लम्बा-चौड़ा नौजवान कूदकर उतर आया। वह किसी बात से बहुत खीजा हुआ था।
”इन किम्मों की वजह से आज मुझे कितनी परेशानी उठानी पड़ी!” वह झुंझलाकर बोला। ”पागलों की तरह अचानक रास्ते में मुड़ गये, एक पहिया ढाल पर उतर गया और गाड़ी उलट गयी। उसे सीधा करके सारी घास दोबारा लादनी पड़ी। अगर ये आगे भी ऐसे ही मनमानी करते रहें, तो मैं नहीं जानता कि मैं क्या कर बैठूंगा,” उसने बैलों को जुए से निकलते हुए शिकायत की।
नौरोज की आवाज तो कड़कदार थी, लेकिन शिकायत वह बिलकुल बच्चों की तरह कर रहा था। मशूक सोचने लगा कि यह सीधा-साधा, अल्पबुद्धि तगड़ा नौजवान इस स्त्री के पति के रूप में बिलकुल नहीं फबता है।
यह स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि पत्नी पति की शिकायतों को गम्मीरता से नहीं ले रही है;  वह धीरे से ऐसे हंस पड़ी, जैसे लोग नासमझ बच्चों की प्यारी-प्यारी शरारतों पर हंसते हैं।
”मेरी आखों के नूर!” स्त्री ने कहा, ”हमारे बछड़ों पर कोई गुस्सा कर सकता है? ये तो अभी बहुत छोटे हैं। सधाये जाने पर अच्छे बैल साबित होंगे।”
स्त्री के हाथ बढ़ाकर उसे भूरे बछड़े के मुंह पर फेरा। बछड़े ने अपना मुंह स्नेहपूर्ण हाथ से सटा दिया।
”सचमुच! क्या जरूरत थी मुझे इतना गुस्सा करने की! कोई ऐसा खास नुकसान तो हुआ ही नहीं, गाड़ी भी नहीं टूटी। ऐसा तो होता ही रहता है…”
”सुनिए, हमारे यहां एक मेहमान आए है”, पत्नी न धीरे से कहा। ”आपका इंतजार करते-करते थक गए हैं।”
”कैसे मेहमान? कौन है वह?”
”मुझे मालूम नहीं, पर हमारी तरफ के नहीं हैं। लेकिन देखने में लायक नौजवान लगते हैं।”
”कौन हो सकता है?” नौरोज को आश्चर्य हुआ। ”खैर, कोई भी हो, बहुत अच्छा हुआ! मेहमान के आने से हमेशा घर में रौनक बढ़ जाती है!”
”आप बैलों को बांधकर मेहमान के पास जाइए। सूखी घास फिर उतार लेंगे,” पत्नी की सलाह दी।
”बेशक! ऐसा ही करेंगे,” नौरोज ने सहमति व्यक्त की और बेलों को पिछवाड़े के खुले बाड़े में ले जाने लगा। पत्नी अड़ रहे जानवरों को सूखी टहनी से हांकती हुई उसके पीछे-पीछे गई।
नांद में ताजा काटी धास तैयार जनर आते ही नौरोज ने तुरंत पत्नी की ओर पलटकर उसे वैसे ही प्रेम व ध्यानपूर्वक देखा, जैसे कि उसने फाटक पर देखा था। उसने बैलों को छोड़ दिया और पत्नी का हाथ पकड़ उसे अपनी ओर खींच लिया।
मशूक ने देख लिया कि उस अद्भुत नारी ने कितनी अकृत्रिम लज्जा के साथ, थोड़ा विरोध करते हुए नम्रता व विश्वासपूर्वक पति के शक्तिशाली हाथ पर झुककर एक गहरी सांस लेकर आंखें मूंद लीं। मशूक को लगा जैसे वह स्वयं उसका प्रगाढ़ चुंबन अनुभव कर रहा है, लेकिन अपने वर्जित कार्य कर लज्जित होकर वह खिड़की से दूर हट गया।

मेहमान और मेजबान काफी देर तक खाते-पीते रहे। उनके खाना खा चुकने के बाद गृहिणी ने आकर पूछा कि वे खाने के बाद तरबूज खाना पसंद करेंगे या दही पीना।
”बेशक, तरबूज!” नौरोज बुलंद आवाज में बोला।
”तरबूज दुछत्ती से उतारना पड़ेगा; चलिए, मेरी मदद कीजिए।”
मशूक को बावरचीखाने में से, जहां शायद दुछत्ती में चढऩे का रास्ता था, उन लोगों की आवाजें सुनाई देने लगी। गृहिणी काफी देर तक दुछत्ती में तरबूज लुढ़काती रही, फिर बोली- ”यह ठीक है?” पति ने उत्तर दिया- ”जरा अच्छा-सा चुनो!” ऐसा कई बार हुआ। अंत में गृहिणी कह उठी-
”मेरी समझ में नहीं आता कि आपको कैसे खुश करूं! यहां अंधेरा है, चुनना मुश्किल है कि इनमें से कौन-सा अच्छा है….”
”खैर, लो, लगता है यह ठीक रहेगा।” नौरोज ने अंत में कहा।
जब दोनों तरबूज खा चुके, तो गृहिणी चौकी उठा ले गई, और पुरुष एकांत में रह गए। नौरोज से न रहा जा सका और उसने अस्वाभाविक धीमी आवाज में मशूक से कहा- ”प्यारे मेहमान, यह राज मैं आपको बताए बिना नहीं रह सकता, दुनिया में मुझसे ज्यादा खुशनसीब अदीग कोई नहीं है। मेरी बीवी कैसा अनमोल हीरा है, यह आपको बताना मुश्किल है। आपने देर तक दुछत्ती में तरबूज लढ़काने और चुनने की आवाजें जरूरी सुनी होंगी। लेकिन मुझे तो अच्छी तरह मालूम था कि हमारे घर में सिर्फ एक तरबूज बचा था। इसके बावजूद इस फिक्रमंद औरत ने मुझे मायूस न करने और मेहमान के सामने हमारी गरीबी जाहिर न होने देने के इरादे से यही दिखाया कि हमारे यहां इस वक्त भी बहुत से तरबूज हैं और उनमें से सबसे अच्छा चुनना मुश्किल है। हमेशा ऐसा ही होता है। यह खुशहाली में भी और मुफलिसी में भी मेरे दिल को कभी ठेस नहीं लगने देती। आप एक समझदार और काबिल नौजवान लगते हैं, मेरी दिली ख्वाहिश है कि आपको भी ऐसी ही बीवी मिले। अच्छी बीवी जिंदगी में सब से बड़ी नियामत होती है।”
लेकिन मशूक तो बहुत पहले समझ चुका था कि उस स्त्री का मुख्य गुण केवल घर-गृहस्थी की मामूली बातों का ध्यान रखना ही नहीं है, जैसा कि उसका सीधा-सादा पति समझता था। उसका यह ध्यान तो मशूक को प्रथम दृष्टि से ही मुग्ध करने वाले उसके मुख्य गुण की अभिव्यक्ति का एक रूप मात्र ही था। लेकिन उसे क्या नाम दिया जाए? उस गृहिणी के आकर्षण का रहस्य क्या है, मशूक किसी तरह समझ नहीं पा रहा था।
नौरोज के यहां तीन दिन ठहरने के दौरान मशूक गृहिणी को बहुत ध्यान से देखता रहा और नित्य मन-ही-मन उसकी अधिक प्रशंसा करता रहा। तीन दिनों में उसे न कोई अनुचित आचरण दिखाई दिया और न ही कोई कटु शब्द सुनाई दिया। वह किसी अदृश्य व्यक्ति की तरह हर काम उपयुक्त समय पर समेट लेती, नि:शब्द और बिना किसी को परेशान किए घर में विद्यमान रहती। वह जो भी काम हाथों में लेती, उसे ढंग से करती, उसके घर में मेहमान के लिए हमेशा खाना तैयार रहता। घर के सारे काम-काज वह बिना बावेला मचाये चुपचाप कर लेती। थकान और चिंता उसके मुख पर व्याप्त प्रेम की दीप्ति को कभी बुझा नहीं पातीं।
जैसी कि अदीगों में परंपरा है, नौरोज के पड़ोसी उसके अतिथि का दिल बहलाने आने लगे। उन्हे मशूक का भला स्वभाव और विवेकशीलता बहुत पसंद आए और उन्होंने उसे नौरोज के साथ कई बार अपने यहां खाने पर बुलाया।
एक बार मशूक और नौरोज पड़ोसियों के यहां से काफी देर बाद आधी रात गए घर लौटे। लेकिन गृहिणी सोयी नहीं थी और उसने मुस्कारते हुए उनका स्वागत किया। जब नौरोज रसोई में गया, तो मशूक को पति व पत्नी में हो रही बातचीत सुनाई दी-
 ”खाना तैयार है, मेहमान को परोस दीजिए,” स्त्री ने कहा।
”कैसा खाना! हम सारी शाम खाना ही खाते रहे थे,” नौरोज आश्चर्य से बोला।
”आप दोनों ने औरों के यहां खाना खाया है, जबकि मेहमान ने शाम का खाना अभी अपने यहां चखा भी नहीं है,” पत्नी ने विरोध किया। ”खाने के बाद आप लोग जरूर देर तक गप-शप करते रहे होंगे, अब फिर भूख लग आई होगी।”
”बिलकुल भूख नहीं है। पेट इतना भरा है कि एक कौर भी मुंह में नहीं रख सकते!” नौरोज ने झल्लाकर कहा। ”मैंने कितनी बार तुमसे कहा कि जब मुझे कहीं देर हुआ करे, तो आधी रात तक मेरा इंतजार मत किया करो। इस बेतुके रिवाज की जरूरत किसको है?हमारे बारे में तुम्हें बुरा कहने वाला कौन है? हम बस दो लोग ही तो हैं? मै चाहता हूं कि तुम मेरे इंतजार में बेकार परेशान होने के बजाय आराम करो।”
मशूक को फिर गृहिणी की वही विशिष्टï मंद हंसी सुनाई दी। लगा जैसे वह किसी बच्चे पर स्नेहपूर्णक हंस रही हो।
”आप तो बस यह भूल जाते हैं कि आपको खुश करके मुझे भी खुशी ही हासिल होती है, तकलीफ नहीं।”
”तुम्हारा भी कोई जवाब नहीं?” नौरोज ने कहा और उसकी गरजदार आवाज अद्भुत प्रेमोद्रेक से मृदु हो उठी।
अचानक मशूक के मस्तिष्क में विचार कौंधा- ‘यह इसको मिले सुख की कीमत आंकना जानती है, खुद अपने और अपने पति के प्यार को संभालकर रखना, उसकी हिफाजत करना भी। इसे जिंदगी में अहम और मामूली बातों में फर्क करना भी आता है, और यही इसकी कशिश का राज है…’ मशूक ने मन ही मन फैसला किया।

मशूक उदास और चिंतामग्न-सा निश्चित समय पर पूर्वनिर्धारित स्थान पर पहुंच गया…
”क्यों, बेटा, वह औरत तुम्हें पसंद आई?” रहस्यमय वृद्ध ने उससे पूछा।
मशूक ने ठंडी सांस ली और सिर झुकाकर जवाब दिया-
”ऐसी बीवी का मिलना जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी होगा। लेकिन लगता है, वह मेरे नसीब में नहीं है। अगर मैं उस जोड़ी को तोड़ दूंगा, तो मेरा जमीर मुझे कचोटेगा और लोग भी मुझ पर लानत भेजेंगे। जो हो, सो हो, मैं अच्छा हथियार और अच्छा घोड़ा पाकर ही खुश रह लूंगा। अगर आप उन्हें मुझे दे सकते हैं, तो दे दीजिये। अच्छी बीवी मैं आपसे नहीं मांगूगा।”

शमशेर जन्मशताब्दी समारोह 25-26 सितंबर को

दिल्ली: जन संस्कृति मंच 25-26 सितंबर को कवि शमशेर बहादुर सिंह के जन्मशताब्दी के मौके पर दिल्ली में समारोह का आयोजन करेगा। पिछले दिनों साउथ एक्सटेंशन में आयोजित जसम, दिल्ली की बैठक में यह निर्णय लिया गया। जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय, राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामजी राय, जसम दिल्ली की सचिव भाषा, चित्राकार अशोक भौमिक, कवि मदन कश्यप और रंजीत वर्मा समेत जसम के कई सदस्य मौजूद थे। कवि व पत्रकार मंगलेश डबराल को शमशेर जन्मशताब्दी समारोह समिति का संयोजक बनाया गया।
समारोह में एक सत्र उन कवियों के वक्तव्य पर केंद्रित होगा जो अपने काव्य-कर्म पर शमशेर का प्रभाव मानते हैं। शमशेर की कविता, गद्य और चित्रकला पर केंद्रित सत्र भी होंगे। आखिरी सत्र उर्दू और हिंदी के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के बतौर उनकी भूमिका पर केंद्रित होगा। उनकी कविता पर केंद्रित पोस्टर प्रदर्शनी लगाई जाएगी तथा उनके जीवन और रचनाकर्म पर केंद्रित किताब का प्रकाशन भी किया जाएगा।
बैठक में सुप्रसिद्ध कवि मुक्तिबोध की जीवन संगिनी शांता मुक्तिबोध के निधन पर शोक प्रकट किया गया। राजनीतिक कार्यकर्ता और पत्रकार हेमचंद्र पांडेय की फर्जी मुठभेड़ में हुई हत्या की न्यायिक जांच किए जाने संबंधी क्रांतिकारी कवि वरवर राव की मांग के समर्थन में भी प्रस्ताव लिया गया।

साहित्य, कला और संस्कृति पर गहरे संकट का दौर : शिवकुमार मिश्र

कोलकाता : प्रख्यात आलोचक व जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार मिश्र ने कहा कि वर्तमान समय में साहित्य, कला व संस्कृति गहरे संकट के दौर से गुजर रहा हैं। इस दौर में आदमी की रचनाधर्मिता चुनौतियों के बीच खड़ी है। उन्होंने कहा कि ये निहायत ही रचना विरोधी समय है और साहित्य अभिव्यक्ति का इतना स्खलन पहले कभी नहीं हुआ था। यदि समय का चरित्र यही रहा तो फिर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आने वाले दिन में आदमी कितना आदमी रह जाएगा। देखा जाए तो आज आदमी का भी क्षरण हो रहा है और बाजारतंत्र हम पर हावी है। शिवकुमार मिश्र ने ये बातें भारतीय भाषा परिषद् सभागार में आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए कही। इस मौके पर मानिक दफ्तरी ज्ञानविभा ट्रस्ट कि ओर से हिंदी के प्रख्यात कथाकार शेखर जोशी को चंद्रयान पुरस्कार-2010 से नवाजा गया। संस्था के ट्रस्टी धनराज दफ्तरी ने पुरस्कार स्वरुप जोशी को 31 हजार रुपये की राशि, शॉल व श्रीफल प्रदान किए।
शिवकुमार मिश्र ने कहा कि शेखर जोशी ने औद्योगिक मजदूरों पर कहानियां लिखीं, जिनमें यथार्थ के सही संदर्भों को उभारा। यही नहीं जोशी ने नई  कहानी के तमाम दूसरे लोगों के साथ इसे व्यापक आयाम भी दिया था। उन्होंने कहा कि जोशी की कहानी यथार्थ की व्याख्या करते हुए जरूरी व गैर -जरूरी के बीच के फर्क को स्पष्ट करती है। उन्होंने शेखर जोशी की दाज्यू, कोसी का घटवार, नौरंगी बीमार है आदि कहानियों का जिक्र करते हुए कहा कि जोशी कि कहानियों में यथार्थ का चित्रण हमें मिलता हैं।
कथाकार शेखर जोशी ने कहा कि मैंने बहुत नहीं लिखा और यदि मैं सलीके से लिख पाया और आपकी नजर उस पर पड़ी है तो उसके प्रति आभार प्रकट करता हूं। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उनका नहीं, बल्कि उन पात्रों का है जो पाठकों के मन में रच-बस गए हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली प्रवास के दौरान वामपंथी राजनीति की तरफ उनका रुझान होने लगा। जोशी ने कहा कि जो थोडा बहुत मैं सलीके से लिख-पढ़ पाया उसका श्रेय इलाहाबाद के साहित्यिक माहौल को हैं। इस मौके पर नई पीढ़ी के लेखकों से निवेदन करते हुए जोशी ने कहा कि जो हम लिखें, उसमें कुछ प्रकाश हो, हताशा न हो। उनके मुताबिक साहित्य से हमें कुछ ऐसा भी मिलना चाहिए जिससे प्रेरणा मिले।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भारतीय भाषा परिषद् के निदेशक विजय बहादुर सिंह ने लेखक को साहित्य का डेंजर जोन करार देते हुए कहा कि वह (लेखक) हमें बताता है कि समाज कितने हद तक खतरे के निशान से ऊपर जा रहा है। उन्होंने कहा कि संकट के समय समाज में हमेशा आता रहता है। देखा जाए तो कभी-कभी वेदना भी समाज को जागृत करती है। सिंह ने कहा कि कवि व वेदना हमें बताते हैं कि समाज में अभी बहुत कुछ जीवित है। उनके मुताबिक बेचैनी व उकताहट से ही साहित्य बचा रहता है। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार प्रकाश चंडालिया ने किया। उन्होंने शेखर जोशी की कहानी दाज्यू का पाठ भी किया। समारोह में डा. कृष्ण बिहारी मिश्र, आलोचक व कथाकार विमल वर्मा, श्रीहर्ष, अरुण महेश्वरी, डा. अमरनाथ, आयोजक संस्था के ट्रस्ट अध्यक्ष प्रीतम दफ्तरी व दलाल टांटिया आदि भी मौजूद थे। धनराज दफ्तरी ने धन्यवाद दिया।

साहित्य-कला के साथ दिल्ली सरकार का खेल

कला और साहित्य के करोड़ों के बजट को राष्ट्रमंडल खेलों की भट्ठी में झोंक देने के निर्णय ने एक बार फिर दिल्ली सरकार की मनमानी और साहित्य व कला के प्रति उसके नजरिये की पोल खोल दी है। सरकार ने छह अकादमियों और कला परिषद के बजट में 15 करोड़ से ज्यादा की कटौती कर दी है।
दिल्ली सरकार को यहीं तसल्ली नहीं हुई। उसने हिंदी, पंजाबी, उर्दू, संस्कृत, सिंधी और मैथिली-भोजपुरी अकादमियों तथा कला परिषद को पत्र भेजकर तमाम कार्यक्रम स्थगित करने का निर्देश दिया है। अकादमियों को केवल 20-20 लाख दिए जाएंगे, वे भी इस शर्त के साथ कि इन्हें राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान आयोजित कार्यक्रमों में ही खर्च किया जाएगा। कार्यक्रम और आयोजन स्थल भी सरकार तय करेगी।
दिल्ली सरकार ऐसा कारनामा पहली बार नहीं कर रही है। वरिष्ठ लेखक कृष्ण बलदेव वैद को लेकर हुआ विवाद जगजाहिर है। एक कांग्रेसी नेता के कहने पर उन्हें शलाका सम्मान नहीं दिया गया। इसके विरोध में वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने भी शलाका सम्मान ठुकरा दिया। उनके अलावा छह और रचनाकारों ने हिंदी अकादमी पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया। लेखकों के विरोध के बावजूद पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया। इसका आयोजन किसी सभागार में न कर दिल्ली सरकार के सचिवालय में किया गया। हिटलरी रुख अपनाते हुए पत्रकारों तक को एंट्री नहीं दी गई। किसी सम्मानित लेखक को एक मिनट भी बोलने का भी मौका नहीं दिया गया। इस तरह का अभूतपूर्व साहित्यिक समारोह संभवत: पहली बार हुआ। यह भी शायद पहली बार हुआ कि किसी अकादमी के मुख्य पुरस्कार सहित कई और पुरस्कार ठुकरा दिए जाने के बाद भी समारोह आयोजित किया गया हो।
दिल्ली की मुख्यमंत्री छह अकादमियों की अध्यक्ष हैं। मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें राजनीतिक-प्रशासनिक कार्य करने पड़ते हैं। वे सभाओं, बैठकों, उद्घाटन आदि महत्वपूर्ण कार्यों में व्यस्त रहती हैं। साहित्य-कला जैसे तुच्छ विषयों के लिए उनके पास समय कहां! ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि उन्होंने साहित्य सृजन किया हो या वह भाषाविद् हों या कला-साहित्य के क्षेत्र में उनका किसी भी रूप में कोई योगदान रहा हो। ऐसे में वह अकादमियों में सक्रिय भूमिका कैसे निभा सकती हैं? क्या एक व्यक्ति का छह अकादमियों का अध्यक्ष बनना व्यवहारिक है? यह तो एक नजीर है। कमोवेश यह स्थिति सभी राज्यों की है। फिर क्यों न अकादमियां राज्य सरकार के शिकंजे से मुक्त की जाएं। उसमें पदाधिकारी रचनाकारों हों और उन्हीं के द्वारा चुने जाएं।
डॉक्टरों की संस्था डॉक्टर चलाते हैं, उद्योगपतियों की संस्था उद्योगपति चलाते हैं। यानी संस्था जिसकी होती है, उसी से जुड़े लोग उसे संचालित करते हैं। फिर रचनाकारों और कलाकारों की संस्थाएं राजनेता क्यों चलाएंगे?
असल में सरकारें साहित्य व कला अकादमियों को अपना भोंपू बनाकर रखना चाहती हैं। उनकी मंशा रहती है कि ऐसे लेखकों-कलाकारों को सम्मानित किया जाए, जो उनकी गलत-शलत नीतियों का समर्थन करें और विरोध में एक शब्द न बोलें? चुनाव में प्रचार भी करें तो सोने-पे-सुहागा। यह तभी संभव है जब अकादमियों पर उनकी पकड़ हो।
एक वजह यह भी है कि राजनेताओं की सोच सामंती है। वह कुर्सी मिलने पर खुद को जनसेवक नहीं, राजा समझते हैं। उसी की तर्ज पर पुरस्कार व सम्मान बांटने का अधिकार अपने हाथ में रखना चाहते हैं। इससे उनके दंभ की तुष्टि होती है।
आजकल की जोड़तोड़ की सिद्धांतहीन राजनीति की उपज अधिकतर नेता रीढ़विहीन हैं। ये अंदर से खोखले, वैचारिक रूप से दिवालिया और मूल्यहीन हैं। ये इतने कमजोर हैं कि वैचारिक आलोचना भी इन्हें भयभीत कर देती है। इन्हें स्तुति गान ही अच्छा लगता है। यह तभी संभव है, जब इनके हाथ में प्रलोभन देने की ताकत हो। इसलिए राज्य सरकारों से यह अपेक्षा करना बेकार है कि वे स्वेच्छा से अकादमियों को अपने चुंगल से मुक्त कर देंगी।
रचनाकार और कलाकार निजी स्वार्थों और प्रलोभनों से ऊपर उठकर उन अकादमियों और कला परिषदों में कोई पद ग्रहण नहीं करें, जो राज्य सरकारों के अधीन हैं। इनसे मिलने वाले पुरस्कारों और सम्मानों को भी ठुकरा दें। तभी राज्य सरकारों पर दबाव बनेगा और वे इस दिशा में कदम उठाएंगी।
संस्मरणकार कांतिकुमार जैन का कहना है कि सरकारों का साहित्य व कला का एजेंडा केवल मुखौटा है ताकि कोई यह न कह सके कि सरकार कला विरोधी है। इनके लिए कला-साहित्य का प्रोत्साहन केवल रस्म अदायगी है। सरकार का मकसद केवल राजनीति करना, वोट बैंक बढ़ाना ओर यह देखना है कि पैसा कहां से कमाया जा सकता है।
आज तक प्रेमचंद का स्मारक नहीं बनाया जा सका है। सरकारी पत्रिकाओं की हालत खराब है। वे स्तरहीन हैं और उनमें पठनीय सामग्री नहीं होती।
हमारी सरकारों की प्राथमिकता में कला, साहित्य, संस्कृति नहीं है। वे खुद को कला प्रेमी, साहित्य प्रेमी साबित करने के लए आयोजन करती हैं, लेकिन भयभीत भी रहती हैं कि कोई सरकार के खिलाफ न बोल दे। इसलिए सम्मानित साहित्यकारों को बोलने का मौका भी नहीं दिया जाता। उनका सम्मान केवल विज्ञापन के लिए करती हैं।
अकादमियों को सरकारों के चुगंल से मुक्ति मिलनी चाहिए।

विवेक भटनागर की दो गजलें

युवा लेखक और पत्रकार विवेक भटनागर की दो गजल-

गांव में कठपुतलियों के

क्यों भयानक हैं इरादे उंगलियों के
खलबली है गांव में कठपुतलियों के
 
और रंगों के लिए रंगींतबीयत
गिरगिटों ने पर तराशे तितलियों के
 
देखिये पक्षी तड़ित चालक हुए तो
हल नहीं होंगे मसाइल बिजलियों के
 
चांद की आंखों में डोरे सुर्ख तो थे
कम न थे तेवर सुहानी बदलियों के
 
आज गांवों ने किए सौदे शहर से
नथनियों के, पायलों के, हंसलियों के
 

बेहतर होगा जुबां फेंक दो

खिड़की-रोशनदान फेंक दो
ऐसा सब सामान फेंक दो
 
किसी बंद कमरे के अंदर
हवादार दालान फेंक दो
 
अच्छे से जीने की खातिर
बचा-खुचा सम्मान फेंक दो
 
बेहतर होगा जुबां फेंक दो
या फिर अपने कान फेंक दो
 
महरूम सभी चीजों से होकर
खालीपन का भान फेंक दो

केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती आयोजन 23-24 अक्टूबर को

नई दिल्ली : जन संस्कृति मंच, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष प्रो. राजेंद्र कुमार ने 23-24 अक्टूबर को महान प्रगतिवादी कवि केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशती इलाहाबाद और बांदा में मनाए जाने की घोषणा की है। राष्ट्रीय स्तर का यह कार्यक्रम जन संस्कृति मंच और केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती आयोजन समिति, बांदा
के संयुक्त तत्वावधान में मनाया जाएगा. प्रो. कुमार ने बताया कि इस कार्यक्रम में केदार जी की रचनाशीलता के विविध पक्षों पर अनेक सत्रों में देश के विद्वानों द्वारा विचार-विमर्श के अलावा कवि-गोष्ठी का भी दोनों स्थानों पर आयोजन किया जाएगा। सांस्कृतिक कार्यक्रम, केदार के गीतों का
गायन और उनकी कविताओं की पोस्टर प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी। केदार की स्मृति में 24 को इलाहाबाद से बांदा तक संस्कृतिकर्मियों की बस द्वारा यात्रा निकाली जाएगी।
जन संस्कृति मंच ने वर्ष 2010-11 में केदार, शमशेर, नागार्जुन, अज्ञेय और फैज़ की जन्मशती राष्ट्रीय स्तर पर मनाने का फैसला लिया है। इस सिलसिले का आरंभ 25-26 जून को समस्तीपुर, दरभंगा और नागार्जुन के गांव तरौनी में मंच द्वारा नागार्जुन जन्मशती के आयोजन की मार्फत हुआ और यह सिलसिला दिल्ली में शमशेर और फैज़, इलाहाबाद और बांदा में केदार तथा गोरखपुर-कुशीनगर में अज्ञेय के जन्मशती आयोजन के माध्यम से जारी रहेगा। इन सभी कवियों पर मंच की ओर से स्वतंत्र पुस्तकें भी निकाली जाएंगी।
प्रो. कुमार ने कवि मुक्तिबोध की पत्नी श्रीमती शांता मुक्तिबोध के रायपुर में 9 जुलाई को निधन पर जसम क ओर से शोक व्यक्त किया। वह 88 वर्ष की थीं। उन्होंने कहा कि शांता जी ने मुक्तिबोध के भीषण संघर्षमय जीवन में बेहद मुश्किलों, तनावों, तन्हाइयों, अभावों और कुर्बाानियों की राह चलते हुए उनका साथ निभाया। शांताबाई ने उनकी कठिन विरासत को खुद्दारी के साथ वहन करते हुए उनकी पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाया। उनकी जिजीविषा, अदम्य साहस और समर्पण के बगैर मुक्तिबोध के जीवन और कृतित्व का कोई भी जि़क्र अधूरा होगा।

कथाकार हृषीकेश सुलभ को इंदु शर्मा कथा सम्मान

हृषीकेश सुलभ

नई दिल्ली : जाने-माने कथाकार और रंगकर्मी हृषीकेश सुलभ को उनके कथा संग्रह वसंत के हत्यारे के लिए वर्ष 2010 के इंदु शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान लंदन के हाउस ऑफ कॉमंस में 08 जुलाई को आयोजित समारोह में दिया गया। उन्हें यह सम्मान ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त नलिन सूरी ने प्रदान किया।इस अवसर पर ब्रिटिश सांसद ने बैरी गार्डिन ने कहा कि लेखक हमारी इच्छाओं  और सपनों को शब्द देता है। जिन सवालों का जवाब राजनीति नहीं दे पाती, उनका जवाब साहित्य में खोजा जा सकता है।
15 फरवरी 1955 को बिहार के छपरा जिले में जन्मे कथाकार, नाटककार, रंग-समीक्षक हृषीकेश सुलभ की तीन दशकों से कथा-लेखन, नाट्य-लेखन, रंगकर्म के साथ-साथ सांस्कृतिक आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी रही है। आपके तीन कहानी संग्रह बंधा है काल, वधस्थल से छलांग और पत्थरकट– एक जिल्द में तूती की आवाज के नाम से प्रकाशित हो चुके हैं।
इंदु शर्मा कथा सम्मान कवयित्री और लघुकथा लेखिका इंदु शर्मा की स्मृति में दिया जाता है। उनका 1995 में अल्प आयु में कैंसर से निधन हो गया था। इसके पहले यह पुरस्कार चित्रा मुदगल, संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एसआर हरनोट, विभूति नारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, नासिरा शर्मा और भगवान दास मोरवाल को मिल चुका है।
वर्ष 2010 के लिए पद्मानन्द साहित्य सम्मान  संयुक्त रूप से महेन्द्र दवेसर दीपक को कहानी संग्रह अपनी अपनी आग के लिए और श्रीमती कादम्बरी मेहरा को कहानी संग्रह पथ के फूल के लिए दिया गया। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने सुलभ की कहानियों पर चर्चा की। बीबीसी हिंदी में सेवा की पूर्व प्रमुख अचला शर्मा ने महेंद्र दवेसर और कादंबरी मेहरा की कहानियों पर प्रकाश डाला।

अनभै सांचा का कवि : विश्वनाथ त्रिपाठी

विश्वनाथ त्रिपाठी

विगत 25 जून को नागार्जुन के जन्म स्थान तरौनी गांव में प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में उनके जन्मशताब्दी समारोह का शुभारंभ हुआ। मिथिलांचल बिहार प्रदेश के अंतर्गत है। इसमें बिहार के अनेक प्रगतिशील साहित्यकारों ने भाग लिया। बाहर से भी अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार पहुंचे। आयोजन बिहार प्रगतिशील लेखक संघ ने किया था। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी कार्यक्रम में भाग लिया। वहां से लौटकर बाबा को याद कर रहे हैं- 
समारोह में शामिल होने के लिए तरौनी की यह यात्रा वस्तुत: तीर्थयात्रा थी। नागार्जुन को बाबा के नाम से कहा और जाना जाता था। हिंदी में बाबा नाम से केवल एक और साहित्यकार को जाना जाता है। वे हैं बाबा तुलसीराम। तुलसीदास ने घर और परिवार छोड़ दिया था। बाबा ने घर-परिवार से संबंध तो नहीं तोड़ा, लेकिन वे अधिकांशत बाहर ही रहते थे।
गृहस्थ से ज्यादा यात्री थे। तुलसीदास की कविता के बारे में समालोचकों का विचार है कि उन्होंने अपने समय में प्रचलित सभी काव्य रूपों का उपयोग किया। नागार्जुन ने आधुनिक समय में प्रचलित शायद ही कोई ऐसा छंद हो जिसमें कविता न की हो- केवल शिष्ट साहित्यिक छंद ही नहीं, लोक गानों और लोक धुनों में भी। लेकिन तुलसीदास और नागार्जुन में केवल समानता ढूंढना गलत तो होगा ही अनर्थक भी। बाबा नागार्जुन सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के वर्णाश्रम व्यवस्थावादी रामभक्त नहीं, बीसवीं शताब्दी के समाजवादी विचारधारा से प्रतिबद्ध रचनाकार हैं। उन्होंने ‘हरिजन गाथा’ नामक महाकाव्यात्मक कविता लिखी, जिसमें नए युग के नायक का हरिजनावतार कराया। नागार्जुन ने इस हरिजन शिशु को वराह अवतार कहा है। वराह का अवतार अर्थात् वह धरती का उद्धार करने वाला होगा। नागार्जुन की कविता हिंदी साहित्य में एक नए बोध और शिल्प का आविष्कार करती है। दलितों और हरिजनों को सहानुभूति देने वाली कवितायें तो इसके पहले लिखी गई थीं, लेकिन हरिजन का यह सशक्त रूप हिंदी साहित्य में पहले नहीं दिखलायी पड़ा था। हरिजन शिशु की छोटी हथेलियों में- आड़ी तिरछी रेखाओं में हथियारों के ही निशान हैं खुखरी है, बम है, अस्ति भी है, गंड़ासा माला प्रधान है।
नागार्जुन के रचनाकार में कबीर और तुलसीदास का मणि कांचन योग है। नागार्जुन का व्यक्तित्व भी कालजयी लगता है। नागार्जुन दिल्ली प्राय: आते रहते थे। पूर्वी दिल्ली में सादतपुर में एक छोटा सा मकान था। उसमें अपने पुत्र श्रीकांत के साथ ठहरते थे। अगर आप यह पता लगाएं कि दिल्ली आकर वे किन लोगों से मिलते थे तो आप आश्चर्य चकित रह जाएंगे। मैंने उनकी कोई ऐसी फोटो नहीं देखी जिसमें वे किसी मंत्री, उद्योगपति, नेता या गुंडे के साथ दिखलाई पड़े। वे अज्ञात या अल्प-अज्ञात निम्न वर्गीय नवयुवक साहित्यकारों या उपेक्षित अधेड़ या वृद्ध मित्र साहित्यकारों के यहां बिन बुलाये पहुंच जाते थे। जिस घर पहुंचते थे कुछ दिनों के लिए उस घर के हो जाते थे। कभी-कभी तो अतीव मनोरंजक तनाव की स्थितियां पैदा हो जाती थीं। सो एक बार नागार्जुन ने मेरे घर पर भी आने की कृपा की।
मैं सादतपुर से उन्हें रिक्शे पर बिठाकर अपने घर लाया। रास्ते भर बाबा भुनभुनाते रहे ऑटो नहीं कर सकते थे। खैर किसी तरह घर पहुंचे। आते ही फरमाइश की दलिया खिलाओ। पत्नी ने दलिया बनाया। चखा, तो बोले, कैसी दलिया बनायी है? इसमें नमक ही नहीं है। पत्नी ने कहा कि इन्हें ब्लड प्रेशर है इसलिए हम नमक कम खाते हैं। अतिथि को इतना तेज गुस्सा आया कि दलिया का कटोरा लेकर चौके में जा पहुंचे। बोले- दलिया ऐसे बनाया जाता है? दलिया को पहले घी में भूना जाता है। फिर दूध या पानी से पकाया जाता है। तब दलिया खिलता है। पत्नी चुप रहीं। अकेले में मुझसे बोली, यह तुम मेरी सास को कहां से पकड़ लाए? लेकिन चार-पांच दिनों के बाद जब नागार्जुन जाने लगे तो पत्नी रोने लगी। मां-बाप की तरह ऐसे लोग बड़े भाग्य से घर आते हैं। इन्हीं दिनों मैंने नागार्जुन के रचना धर्मी रूप की एक झलक भी देखी। मेरी बड़ी नातिन चार-पांच साल की थी। उससे नागार्जुन की सबसे ज्यादा पटती। एक दिन तीसरे पहर भोजनोपरांत शयन के बाद उठा तो देखा नागार्जुन बहुत देर तक फर्श पर पड़ी किसी चीज को बड़ी गंभीरता से देखने में तन्मय हैं। समाधि लगी हो मानो। जब उन्हें मेरी आहट मिली तो बोले ‘देखो, कविता है यह। ‘नातिन की छोटी-छोटी चप्पलों को वह देख रहे थे। रचना-समाधि में लीन उनका चेहरा मैं कभी नहीं भूल सकता।
नागार्जुन बुजुर्गों के साथ बुजुर्ग-जवानों के साथ जवान और बच्चों के साथ हो जाते थे। जिन लोगों ने उन्हें महिलाओं के साथ घुल-मिलकर बातें करते देखा है वे लिस्ट को आगे बढ़ाएंगे। अपनी एक कविता में वह शिशु चिनार से बात करते हैं और कालिदास से जवाब-तलब करते हैं- ‘कालिदास सच-सच बतलाना।’ उनका जीवन अनुभव व्यापक था, कबीरदास की भांति वह अनेक परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों के समुच्चय थे। जीवन के प्रति गहरी आसक्ति थी। तीव्र सौंदर्यानुभूति के रचनाकार थे और इसलिए गहरी घृणा और तिलमिला देने वाले व्यंग्य के सहज कवि। यह सहजता जटिल अंतर्वस्तु का रूप है। जटिल अंतर्वस्तु के बगैर सहजता आ ही नहीं सकती। कविता की बात छोडि़ए, जीवन में भी वह जो इतने सहज थे, उसकी भी वजह व्यापक परस्पर-विरोधी जीवन स्थितियों को पचा सकने वाली क्षमता का ही प्रभाव है। बात सुनने में थोड़ा अजीब लगेगी, लेकिन है सच कि नागार्जुन कविता करते समय भी सिर्फ कवि नहीं, आदमी बने रहते हैं। मतलब यह कि वे रचना की प्रक्रिया में रचनात्मकता के व्याकरण का ही पालन नहीं करते। आम आदमी की तरह स्थितियों और घटनाओं का प्रभाव ग्रहण करने वाले नागार्जुन काव्य-रूढिय़ों का अतिक्रमण करते हैं। संवेदना और शिल्प का तालमेल करते हैं। ऐसा व्यक्ति साहित्य रचते समय भी न तो काव्य रूढिय़ों का ही अनुशासन पूरी तरह स्वीकार कर सकता है और न विचारधारा या पार्टी का ही। नागार्जुन की कवितायें पढ़ते ही पाठक कविता की दुनिया से निकलकर जीवन में आ जाता है। और उसके लिए जीवन-रस ही काव्य स्वाद बन जाता है। नागार्जुन की बहुत अच्छी कविता है- फूले कदंब। कंदब पुष्प की शोभा का बयान करके उसे साक्षात कर दिया। यह हो गया कवि का काम। अपने ही द्वारा रचित पुष्पित कंदब को छूने का मन कवि में छिपे आदमी का हो रहा है। सो आखिर में लिखा ‘मन कहता है छू ले कदंब’।
अनार के दानों का उपमान सुंदर दंत पंक्ति के लिए किया जाता है। प्राय: सुंदर नायिकाओं की सुंदर दंत पंक्ति के लिए। लेकिन उस आदमी के दांत जो अभी दिल्ली से टिकट मार कर लौटा है। पान चबा रहा है। इतना पुलकित-प्रसन्न है। कैसा लग रहा है। कुटिल आदमी की प्रसन्नता कितनी घृणास्पद होती है। दांत तो अनार ही जैसे हैं, लेकिन खिले हुए हैं। खिले क्रिया से दांतों का दूर-दूर होना, बीच की खाली जगह का दिखलाई पडऩा। जिसे ‘बीडर’ कहते हैं ‘खिले’ क्रिया से अनार के दानों का उपमान सौंदर्य नहीं, कुरुचि प्रदान करता है। और यह व्यंग्य का प्रहार निर्मम है-
आये दिन बहार के
खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के
दिल्ली से लौटे हैं अभी टिकट मारकर
नागार्जुन को आधुनिक कबीर यों ही नहीं कहा जाता है। कबीर ‘आंखिन देखी’ में विश्वास करते थे। ‘अनभै सांचाÓ की अभिव्यक्ति का साहस रखते थे। ‘अनभै सांचा’ अनुभव और निर्भीकता दोनों का अर्थ देने वाला संश्लिष्ट पद है। प्रगतिशील कवि कल्पना, स्मृति आदि की अपेक्षा देखने पर अर्थात् जो सामने दिख रहा है, उससे ज्यादा आकृष्ट होते हैं। ‘जो सामने हैÓ उसी में इतिहास, भविष्य सब कुछ समाया है। इसलिए देखने की कल्पना आदि से कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। वस्तुत: यह अंतर लोक और वेद का है। लोक और वेद के संतुलन की बात तुलसी करते थे। कबीर लोक और वेद के संतुलन पर नहीं, उसके अंतर पर बल देते थे- तू कहता है कागद लेखी, मैं कहता हूं आंखिन देखी।
इस देखी की रचनात्मकता में बड़ी महिमा है। नागार्जुन की एक कविता है- बादल को घिरते देखा है। ‘देखा है’ का अर्थ प्रत्यक्ष अनुभव किया है, अपनी आंखों देखकर जाना है। किताबों में पढ़कर, सुनी-सुनाई बात नहीं। मैं अपने अनुभव को अभिव्यक्त कर रहा हूं। आंख और कान में अंतर होता है। अनुभव का सर्वाधिक विश्वसनीय इंद्रिय माध्यम आंख है। आंख प्रतीक है प्रत्यक्ष अनुभव का, अनुमान इससे कमतर है। इसी कविता में नागार्जुन ने लिखा-
कहां गया धनपति कुबेर वह, कहां गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के, व्योम-प्रवाही गंगाजल का
ढूंढ़ा बहुत परंतु लगा क्या, मेघदूत का पता कहीं पर
जाने दो वह कवि-कल्पित था
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ चुंबी कैलाश-शीर्ष पर
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है।
कुबेर, अलका, व्योम-प्रवाही गंगाजल- सुनी-सुनाई बातें हैं, मेघदूत किताब है- मैंने जो बादल देखे, वे किताबी नहीं- आंखों से देखे, ये पंक्तियां उनको चित्रित करती हैं। लोग कालिदास के बादलों के बारे में लिखते होंगे।
‘मैंने तो में ‘तो’ के आग्रह पर विचार कीजिए। कालिदास की महानता से इंकार नहीं, लेकिन उनका अनुभव नागार्जुन का अनुभव हो- तो नागार्जुन की कविता की क्या जरूरत है। सच्चे अर्थ में यह कवि की स्वायत्तता और निजता है। ‘यह देखना’ कबीर का ‘आंखिन देखी’ ही है। कवि सरस्वती-पुत्र होता है। वह ‘अनभै साँचा’ की ही अभिव्यक्ति करता है। कबीर भक्त होते हुए भी राम के सामने भी तन कर खड़े होते थे। नागार्जुन सामाजिक विचारों के हैं, अपने को बार-बार प्रतिबद्ध घोषित करते हैं, लेकिन वामपंथी पार्टियों की खुलकर आलोचना करते हैं। बड़े कवि के पास विचारधारा का आग्रह तो होता है, लेकिन वह अपने अनुभव के आधार पर विचारधारा को तोड़ता भी है। नागार्जुन ने पारंपरिक काव्य-रूपों का हिंदी और उसकी बोलियों की क्षमता का अभूतपूर्व उपयोग किया है। नागार्जुन मैथिली और हिंदी दो भाषाओं के महाकवि हैं। जैसे तुलसीदास अवधी और ब्रजभाषा के। नागार्जुन ऐसे आधुनिक कवि हैं, जिनके पास विद्यापति, कबीर और तुलसी की परंपरा का उत्तराधिकार है। वे आधुनिक हिंदी और मैथिली के कालजयी कवि हैं।

प्रथम चंद्रयान पुरस्कार कथाकार शेखर जोशी को

कोलकाता: हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित कथाकार शेखर जोशी को मानिक दफ्तरी ज्ञानविभा  ट्रस्ट के प्रथम चंद्रयान पुरस्कार-2010  से नवाजा जायेगा। ट्रस्ट की और से जारी विज्ञप्ति में प्रबंध न्यासी धनराज दफ्तरी ने जानकारी दी कि नई कहानी में सामाजिक सरोकारों का प्रतिबद्ध स्वर जोड़ने वाले शेखर जोशी को पुरस्कार स्वरूप 31,000 रुपये की राशि भेंट की जाएगी।पुरस्कार समोराह कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद् में रविवार 18 जुलाई को आयोजित होगा। समारोह की अध्यक्षता भारतीय भाषा परिषद् के निदेशक डाक्टर विजय बहादुर सिंह करेंगे, जबकि प्रसिद्द विद्वान डाक्टर शिवकुमार मिश्र, अहमदाबाद मुख्य वक्ता होंगे। कार्यक्रम का संचालन पूर्व सांसद सरला महेश्वरी करेंगी।  इस अवसर पर शेखर जोशी की चचर्ति कहानी दाज्यू का पाठ पत्रकार प्रकाश चंडालिया करेंगे।