Archive for: June 2010

एक और विदा : भीमसेन त्यागी

 पिता-पुत्र संबंधों को लेकर कथाकार भीमसेन त्यागी की कहानी-

कमरे की पिछली दीवार की खिड़की तीसरे नेत्र की तरह खुली है। उसमें से आती रोशनी की बरछी बाबूजी के माथे को काटती, उनके और मेरे बीच फर्श पर आकर ठिठक गई है।
बाबूजी कसमसाकर करवट बदलते हैं और बिस्तर पर ऐसे हाथ फेरते हैं जैसे उसकी खाज मिटा रहे हों। शायद दरी में कोई सलवट उभर आई है। हाथ फेरने से सलवट निकल नहीं पाती। वे फिर उसी तरह लेट जाते हैं।
दूर से रेल के इंजन की धड़धड़ाहट सुनाई देती है। फिर एक लंबी सीटी-हू-हू-ऊ-ऊ-ऊ…
बाबूजी अक्सर चले जाने की बात कहते थे। मैं टाल जाता। लेकिन अब टालने की स्थिति टल चुकी थी। वे दिनभर अपने थोड़े से सामान को ट्रंक में लगाते रहे थे, टीन की जेब में खुंसे पुराने पोस्टकार्डों को निकालकर, फिर से पढ़-पढ़कर फाड़ते रहे थे। अब उनका जाना निश्चित था, ठीक वैसे ही जैसे एक दिन कांता का जाना निश्चित हो गया था…
सामने जिस चारपाई पर इस समय बाबूजी लेटे हैं, उस पर कांता की अम्मा बैठी थीं। उन्होंने साफ-साफ कहा था, ”बेटा अजीत, हमें तुमसे बड़ी-बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन तुमने सब पर पानी फेर दिया। अब हम किसी भी कीमत पर कांता को यहां नहीं छोड़ सकते!”
कांता के चले जाने- हमेशा-हमेशा के लिए चले जाने की सूचना मैंने बाबूजी को भेज दी थी और लिख दिया था,  ‘अब आप दिल्ली चले ही आइए। मुझे अच्छा नहीं लगता कि आप वहां अकेले रहें और इस उम्र में नौकरी करें।’

बाबूजी कस्बे के पुश्तैनी मकान में अकेले रहते थे। वह मकान बड़ी बहन की शादी में रहन रख दिया गया था। तब से लाख कोशिशों के बावजूद छुड़ाने का जुगाड़ नहीं भिड़ पाया था। लाख कोशिशों में सबसे बड़ी यह थी कि बाबूजी कचहरी की मुंशीगिरी से रिटायर होने के बाद, पैंसठ की उम्र में साठ रुपये महीना पर आटा पीसने की एक चक्की पर नौकरी करते थे। दिन-भर दस-दस, पंद्रह-पंद्रह किलो के हाड़े तोलना। बड़ा हाड़ा तोलते हुए एक बार पैर पर मना गिर गया था। पुरवा हवा चलती है तो अब भी उस पैर में दर्द होता है…
कई तरह के कई दर्द हैं, जो बाबूजी के तन-मन में रमे हैं। मां उस समय विदा हो गई थी, जब बाबूजी की मूंछ का एक बाल भी सफेद नहीं हुआ था। यह दर्द, उनका सबसे बड़ा दर्द है। दूसरा दर्द अंग्रेज के विदा हो जाने का है। वे बड़ी तड़प के साथ कहते हैं, ”अंग्रेज…अरे, जवाब नीं उसका! क्या आला हाक्कम होवैं थे! और ये हैं थारे गांधिये! क्या खा कै राज करेंगे ये!”
उनका इकलौता बेटा नालायक है, यह बाबूजी का एक और बड़ा दर्द है!

कांता के चले जाने के बाद बाबूजी जंग खाया पुराना ट्रंक और फटी दरी में लिपटा, गंदा बिस्तर कंधे पर रखे आए तो मिसेज खन्ना सदर दरवाजे पर खड़ी थीं। मैंने आगे बढ़कर बाबूजी के पैर छुए और बिस्तर कंधे से उतार लिया।
बाबूजी ने हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया तो कोट की दोनों बांहों में से कोहनियां निकली हुई दिखाई दीं। यह वही पुराना कोट है, जिसे वे पिछले दस साल से पहन रहे हैं।
चरण छूकर सीधा खड़ा हुआ तो देखा, मिसेज खन्ना के मोटे होंठों पर एक अजीब किस्म की मुसकान है। उन्होंने मुसकान को और फैलाव देते हुए पूछा, ”योर फादर?”
उत्तर में मैं केवल स्वीकारात्मक गर्दन हिला सका।
वह अंदर आकर बैठे तो मैंने पूछा, ”नए कोट का क्या हुआ बाबूजी?”
”टिरंक में है। हर बखत पहरने के लियो थोड़ा ई है वो।”
अब मैं क्या कहता!
कुछ देर बाद कमला चाय ले आई।
”यो कोण है!” बाबू जी ने मेरे कान से मुंह सटाकर रहस्यात्मक ढंग से पूछा।
”खाना बनाती है।” सवाल का पूरा जवाब देने के बाद मुझे यह जोडऩा भी जरूरी लगा, ”बेचारी गरीब औरत है। कई बच्चे हैं।”
”नईं! यो नीं चलैगा, ” बाबूजी ने शब्दों से कम और मुख-मुद्रा से ज्यादा नाराजगी प्रकट की, ”हम रहैंगे तो इसकी क्या जरूरत? कह दै, कल सै अपणा कोई होर इंतजाम कर लै।”
मैंने बाबूजी से या कमला से कुछ नहीं कहा, लेकिन कहने की जरूरत भी क्या थी?

शाम को खाने के बाद बाबूजी ने मेरी चारपाई के बराबर कांता की चारपाई पर अपना बिस्तर फैला दिया- फटी हुई सलवटी दरी, दुतई का आधा टुकड़ा, उड़े हुए लाल रंग का गद्दा, बिना कवर का चीकट लिहाफ। वे अपने साथ जो संक्षिप्त-सा सामान लाए थे, उसमें डेढ़ बालिश्त का नारियल का हुक्का भी था। बिस्तर में बैठकर नारियल गुडग़ुड़ाते हुए उन्होंने पूछा, ”क्यूं बई, तिनखा कित्ती है तेरी, चार सौ?”
”जी!”
”किराया कित्ता जावै?”
”अस्सी।”
”गेहूं क्या भाव मिलैं ह्यां?”
”मालूम नहीं!”
”इतना बी मलूम नहीं! नूं ई तो नास हुआ इस घर का!”
मैं चुप रहा।
”अच्छा, दूध कित्ता लेवे करै?”
”एक किलो।”
”जियादा है। आधा किलो बहोत। घी कित्ता लग जावै?”
”मालूम नहीं, कांता ही लाती थी।”
”अर चिन्नी?”
”यह भी मालूम नहीं।”
”तुजै कुछ मलूम बी है?” बाबूजी ने झल्लाकर कहा, ”ऐसे घर में कुक्कर बरकत दिखाई दै! इत्ती रकम कमारा है, अर सारी की सारी फूंक दै। सुण लै, डेढ़ सौ से पाई उप्पर नीं खरच होणे की, हां-आं-आं!”
मैं चुप रहा और बाबूजी देर तक बचत के महत्व पर भाषण देते रहे। नारियल समर्थन में हुंकारे भरता रहा।
अगले दिन सुबह पांच बजे सोया पड़ा था कि किसी ने खटाक्-से लिहाफ का कोना पकड़कर उसे ऐसे खींच लिया जैसे केले का छिलका उतार दिया हो। मैं आंखें मलता हुआ उठा और आदत के अनुसार बड़-बड़ाया, ”बई, ऐसी भी क्या जल्दी है!”
”जल्दी?” बाबूजी ने खंखार कर उत्तर दिया, ”नूं ई तो तंदरुस्ती खराब होवै है! पड़ा रह दिन चढ़े लो!”
अब मुझे पता चला कि चाय लिए जो व्यक्ति सामने खड़ा है, वह कांता नहीं, बाबूजी हैं। हड़बड़ाकर उठा और चाय का प्याला उनके हाथ से थाम लिया।
प्याले में से आत्मग्लानि की एक अजीब गंध उठ रही थी। मां की बात याद आई- ”बेट्टे, बड़ा हो कै अपणे बाबूजी की खूब सेवा करियो, कबी बी उनका जी ना दुखाइयो!”
मैं बड़ा हो गया हूं। बाबूजी की उम्र सेवा कराने योग्य हो गई है। और बजाय इसके की मैं उनकी सेवा करू, वे मेरी सेवा कर रहे हैं…
”पित्ता क्यूं नीं!” बाबूजी ने कड़क आवाज में हुक्म दिया।
एक शब्द भी मेरे मुंह से नहीं चू सका। कुल्ला करके चुपचाप चाय पीने लगा।
कुछ देर बाद बाबूजी खाना बनाने में जुट गए। मैं हाथ बंटाने रसोई में पहुंचा तो उन्होंने प्यार से डांट दिया, ”जा, तू शेफ कर लै। दफ्तर कू देर हो जागी।”
शेव का सामान वे पहले ही मेज पर रख गए थे। मैं ब्रश पर क्रीम लगाकर दाढ़ी पर मलने लगा।
थोड़ी देर बाद रसोई में से आवाज आई, ”पानी गरम है, बई, नाह लै!”
बाथरूम में पहुंचा तो देखा- वहां गरम पानी की बाल्टी के अलावा साबुन, तौलिया, अंडरवीयर, बनियान सब उसी तरह रखे हैं, जैसे कांता रखा करती थी।
नहाने के बाद आईने के सामने खड़ा कंघी कर रहा था कि रसोईघर से बाबूजी आए। दोनों हाथ आटे में सने थे। दाएं हाथ के अंगूठे से बाएं की हथेली मलते हुए उन्होंने कहा, ”खाना त्यार है, बई!”
”अच्छा।” मैं फिर कंघी करने लगा।
कुछ देर बाद वे खाने की टे्र लिए कमरे में खड़े थे।
”रसोई में ही…” मैंने कहना चाहा, लेकिन तब तक उन्होंने टे्र मेज पर रख दी और प्यार-पगे कड़े स्वर में बोले, ”बैठ, खा!”
खाना खाते समय भी मुझे मां की याद आई, लेकिन कह कुछ नहीं सका।
शाम को दफ्तर से लौटा तो देखा- तार पर कपड़े सूख रहे हैं। छोटे कपड़े ही नहीं, परदे, बिस्तरों की चादरें और दुतई तक उनमें हैं। बाबूजी सहन में मूढ़ा डाले बैठे हैं और मजे से नारियल गुडग़ुड़ा रहे हैं।
”देखिए, मिस्टर शर्मा, बाबूजी ने कितने कपड़े धो डाले हैं!” मिसेज खन्ना ने सीढिय़ां उतरते हुए कहा। आज फिर उनके मोटे होंठों पर वही मुसकान थी।
”इतने कपड़े धोने की क्या जरूरत थी?” अंदर आकर मैंने बाबूजी से कहा, ”बड़े कपड़े तो कांता भी धोबी से धुलवाती थी।”
”जभी तो नास हुआ इस घर का!” बाबूजी नारियल गुडग़ुड़ाते हुए रसोईघर में चले गए।
मैं कपड़े बदलने लगा। तहमद बांधकर पलंग पर बैठा ही था कि वे चाय की टे्र लेकर आ पहुंचे। केतली के सूंड में से भाप निकल रही थी।
चाय के बाद सुबह के अधपढ़े अखबार को लेकर पलंग पर लेट गया। सिगरेट का पैकेट तो हाथ आ गया मगर माचिस…आवाज दी, ”अरे बई, माचिस दियो!”
”ले, बेट्टे!” बाबूजी सिरहाने खड़े माचिस खडख़ड़ा रहे थे।
”अरे!” मैंने चौंककर अखबार नीचे रख दिया। याद आया, मैंने माचिस मंगाने के लिए ऐसे आवाज दी थी जैसे कांता को दिया करता था। फिर याद आया : बाबूजी के सामने तो मैं सिगरेट पीता ही नहीं!
मैंने उनके हाथ से माचिस ले ली और एक सींक निकालकर कान कुरेदने लगा।
बाबूजी चुपचाप रसोई में चले गए।
फिर अखबार उठा लिया, लेकिन मन उसमें रम न सका। अनायास खयाल आया : बाबूजी ने एक ही दिन में घर को ठीक वैसे संभाल लिया है, जैसे कांता ने संभाल रखा था। फर्क सिर्फ इतना है कि अब रसोई घर से चूडिय़ों के खनकने की आवाज नहीं आती…

आवाज आती है रेल के इंजन के घड़घड़ाने की…लंबी सीटी की आवाज…कांता के चले जाने की आवाज…बाबूजी के आने की आवाज…और अब फिर बाबूजी के लौट जाने की आवाज…
टं्रक में लगा सामान बाबूजी के सिरहाने रखा है। पुराने पोस्टकार्ड फाड़ डाले गए हैं। कमरे का तीसरा नेत्र खुला है। उसमें से आती रोशनी की बरछी बाबूजी के माथे को काटती, उनके और मेरे बीच फर्श पर आकर ठिठक गई है…
सामने की चारपाई पर सोए बाबूजी खर्राटे भर रहे हैं। मुंह आधा खुला है। छह दिन की बढ़ी सलेटी दाढ़ी रोशनी  की बरछी में चमक रही है। दाएं हाथ का खुश्क पंजा छाती पर फैला है। उंगलियों में नाखूनों के पास कच्चा आटा लगा है…
छुट्टी का दिन था। माधवन आया था। भाभी साथ थीं। मैं उलझन में पड़ गया। बाबूजी के रहते बाजार से चाय नहीं मंगाई जा सकती थी, न ही मैं बना सकता था। मेहमानों के सामने बाबूजी चाय बनाएं और मैं बैठा रहूं, यह भी बुरा लगता। तो फिर?
मैं सोच ही रहा था कि बाबूजी चुपचाप उठकर चले गए।
कुछ देर बाद वे चाय की ट्रे लिए कमरे में आए तो मुझे अपना ‘मैं’ चाय के प्याले में गिरी मक्खी सा लगने लगा।
”अरे! यह क्या तकल्लुफ किया आपने, बाबूजी!” माधवन बोला, ”चाय बनवानी ही होती तो गीता बना लेती। आपने क्यों तकलीफ की!”
”क्यूं? मैं रोज नीं बणात्ता!ÓÓ बाबूजी ने बेतकल्लुफी से जवाब दिया, ”जैसा यो अपणा बच्चा है, वैसे ई तम हो।”
खैर, वे बना ही लाए थे तो सबने एक-एक कप चाय ले ली।

बाबूजी के आने के बाद पहली तनख्वाह मिली तो मैंने लिफाफा ज्यों-का-त्यों उनके हाथ में थमा दिया। उन्होंने नोटों को चुचकारकर माथे से लगाया और मेरे सर पर हाथ फेरकर आशीर्वाद दिया।
उस रात देर तक वे घर के बजट के कोट को कतर-ब्योंतकर वास्केट बनाने की कोशिश करते रहे। बीच-बीच में मुझसे चीजों के भाव पूछते रहे। मैं संतोषजनक जवाब नहीं दे सका तो झल्लाते रहे।
”क्यूं बई, यो मकान बदल ना दैं?” बाबूजी ने चश्मा माथे पर चढ़ा कर मेरी तरफ घूरते हुए कहा, ”सव्हरा बोहत मंहगा है। कोई होर देख लै बीस-बाइस का।”
मैं कटकर रह गया। बड़ी मुश्किल से तो यह ढंग का मकान मिला है, इसे ही ये बदलवा रहे हैं!
अगले दिन दफ्तर जाने लगा तो जेब खाली थी। बाबूजी से कहा, ”कुछ पैसे दे दो।”
”कित्ते?”
”दे दो दस-पंद्रह।”
”क्या करैगा?”
”खर्च के लिए चाहिए न?”
”खर्च क्या, बस के लियो चहियें। बीड़ी-सिरकट तो तू पित्ता नीं!”
मन में आया कि कह दूं- पीता क्यों नहीं, लेकिन चुप खड़ा रहा।
बाबूजी ने अठन्नी निकालकर मेरी तरफ बढ़ाई। लगा, जैसे वे मुझे भीख दे रहे हों!
”इससे क्या होगा, कम से कम दस रुपए तो दो। पता नहीं कब पैसे की जरूरत पड़ जाए।”
”लै, चाहे सारे ले लै मेरी तरफ सै तो।” बाबूजी ने धोती की अंटी से निकालकर मुड़े हुए नोट मेरी तरफ बढ़ा दिए।
उन्हें रख लेना बाबूजी का अपमान होता। दस का एक नोट रखकर बाकी वापस लौटा दिए और ब्रीफ-केस उठाकर चुपचाप घर से बाहर हो गया।

शाम को देर से लौटा। बाबूजी बरामदे में चारपाई पर लेटे ऊंघ रहे थे। बूटों की आवाज सुनकर खड़े हो गए।
”टैम देखिए बई, क्या हो रा है?”
”साढ़े दस।”
”आणे की फुरसत मिल गी?”
मैं चुपचाप अंदर आकर कपड़े बदलने लगा।
”खाणा खावैगा?” बाबूजी ने पीछे-पीछे आकर पूछा।
सुबह के बाद खाना नहीं खाया था। आते समय बड़े जोर की भूख लग रही थी। लेकिन बाबूजी के प्रश्न ने पेट और मन पूरी तरह भर दिए। कपड़े बदलकर चुपचाप बिस्तर पर लेट गया।
”क्यूं बई, खाणे की बता?”
”भूख नहीं है।”
”भूख नीं है?” प्रश्न-चिह्न का तिलक उनके माथे चढ़ गया।
”हां, नहीं है!”
”तो फेर हम बी नीं खात्ते?”
”अभी तक आपने नहीं खाया?”
”खात्ता कैसो? तू तो आया ई नीं था।”
”कितनी बार कहा है, आप खा लिया करें। मेरा तो ऐसा ही रहता है शाम को।”
”खा कैसो लिया करैं! जब लो तू टैम सै आणा सुरू नीं करै, मैं खाणै का नीं!”
बाबूजी रसोई में चले गए। मुझे खयाल आया- कितनी तकलीफ देता हूं मैं इस आदमी को! कल से टाइम पर आया करूंगा।
खाने के बाद बाबूजी ने नारियल भर लिया और लिहाफ में दुबककर गुडग़ुड़ाने लगे।
”ढाई सौ तो नीं, पर दो सौ जमा करा दिये हैं डाकखान्ने में,” बाबूजी ने ऐसे स्वर में कहा जैसे दो सौ सड़क पर पड़े मिल गए हों।
”जमा तो करा दिए,” मुझे कहना पड़ा, ”लेकिन महीना कैसे निकलेगा?”
”सब लिकड़ जागा, तू देखता जा!”

अगले दिन सुबह बाबूजी चाय लेकर आए तो साथ में अखबार नहीं था।
”अखबार वाला नहीं आया?”
”नईं! मन्नै कल उसै मना कर दिया था। खन्ना साब कै तो आवै ई है इकबार, मैं मांग लाया करूंगा।”
अब मेरी समझ में आया कि दो सौ में घर का खर्च  कैसे पूरा हो जाएगा।
तीसरे दिन दस रुपए खत्म हो गए। दफ्तर जाते समय बाबूजी से कहा, ”कुछ पैसे दे दो।”
”क्यूं?”
”जरूरत है।”
”वे खतम हो गिये?”
”खत्म हो गए तभी तो मांग रहा हूं।”
”खतम कैसो हो गिये…बीड़ी तू नीं पित्ता, सिरकट तू नीं पित्ता!”
मुझे मालूम था कि सुनकर बाबूजी को तकलीफ होगी, लेकिन कहे बिना रहा नहीं गया, ”पीता क्यों नहीं! सिगरेट भी पीता हूं, और भी दस तरह के खर्च रहते हैं।”
”तू-ऊ-ऊ-ऊ!” बाबूजी का मुंह खुला रह गया, ”तू सिरकट पीवै है?”
”हां!”
”हमैं तो आज लो पता नीं चला?”
”आज तो चल गया!”
”चल गिया,” बाबूजी ने लंबी सांस लेकर कहा, ”नूं ई तो नास हुआ इस घर का! अरै! पीणी ई है तो बीड़ी पी लिया कर।”
”बीड़ी मैं नहीं पी सकता।”
”क्यूं? वो मिठ्ठी नी लगती?”
”खैर, मुझे पैसे दे दो। दफ्तर को देर हो रही है।”
”देख ले बेट्टे। जो बचैगा तेरे ई काम आवैगा।” बाबूजी ने अंटी खोलकर दस का मुड़ा हुआ नोट निकाला और मसलते हुए मेरे हाथ में ऐसे पकड़ा दिया जैसे महाजन को ब्याज का पैसा दे रहे हों।

अगले महीने तनख्वाह मिली तो रोज की तरह उस दिन भी देर से घर पहंचा। रास्ते-भर सोचता रहा, बाबूजी खाने का इंतजार देख रहे होंगे। घर पहुंचा तो देखा, वे बरामदे में मूढ़े पर बैठे-बैठे ही सो गए हैं। मुंह आधा खुला है। खर्राटों की आवाज खिरज पर चल रही है। नारियल बंदरिया के बच्चे की तरह गोद में टिका है।
मैं कुछ देर तक चुपचाप खड़ा उन्हें देखता रहा। सुख शायद इस आदमी के लिए है ही नहीं। या जो है, वही सुख है? जरूरत नहीं है, फिर भी तेली के बैल की तरह काम करता है। मेरी छोटी-से-छोटी सुविधा का खयाल रखता है- इतना खयाल कि वह स्वयं मुझे चुभने लगता है…
”कोण?” बाबूजी ने अचानक चौंककर कहा।
”मैं।”
”जीत! आ गया बेट्टे?” वे नारियल को संभालते हुए उठ खड़े हुए, ”तिनखा लाया?”
कच्चे दूध में फिटकरी गिर गई। सोचा था- इस बार तनख्वाह उन्हें नहीं दूंगा। लेकिन इस समय लगा- इनके और मेरे बीच कोई संबंध नहीं है। संबंध है इनके और तनख्वाह के बीच। मैंने आवेश में जेब से लिफाफा निकाला और बाबूजी की तरफ बढ़ा दिया।
उन्होंने करारे नोटों को चुचकारकर माथे से लगाया और आशीर्वाद का हाथ मेरी तरफ बढ़ा दिया। मन हुआ – पीछे हट जाऊं, लेकिन चुपचाप खड़ा रहा।
नोटों को अंटी में घुसेड़ते हुए वे बोले, ”चल, खाणा खा लै!”
”भूख नहीं है।”
”फेर कहीं खा आया क्या?”
खाना खाकर नहीं आया था, लेकिन प्रश्न का उत्तर देने को मन नहीं हुआ।
”क्यूं बई, बोलता क्यूं नीं?”
”बस, भूख नहीं है।” बात का सूत झटककर मैं अंदर आ गया आर कपड़े बदलकर बिस्तर की गुफा में घुस गया।
बाबूजी से बोलने को कतई मन नहीं हो रहा था, लेकिन रह-रहकर खयाल आता- खाना उन्होंने भी नहीं खाया होगा…नहीं खाया तो न खाएं। जिद पर अड़े हैं तो मरें भूखे…
जिद का तार कसता ही गया। मैं जान-बूझकर देर से घर आता। बाबूजी बरामदे में मूढ़े धंसे मिलते। बंदरिया का बच्चा छाती से सटा रहता। खर्राटों की आवाज पड़ोसियों तक पहुंचती।

एक दिन कुछ जल्दी दफ्तर से आ गया। मिसेज खन्ना सहन में बैठी दाल बीन रही थीं।
”हैलो, शर्मा जी!” उन्होंने इस ढंग से स्वागत किया, जैसे मैं उनका पड़ोसी नहीं, मेहमान हूं। बोलीं, ”आज तो बारिश होगी, आप टाइम से घर पहुंचे हैं।”
”फिर तो रोज ही बारिश होनी चाहिए…मिस्टर खन्ना तो ठीक साढ़े-पांच पर यहां होते हैं न!”
”उनकी बात और है।” मिसेज खन्ना जिस उत्साह से बात कर रही थीं, वह ढीला पड़ गया।
”बाबूजी नहीं हैं?”
”शायद दूध लेने गए हैं,”  मिसेज खन्ना ने उठकर गार्डन चेयर अपने नजदीक खींचते हुए कहा, ”आप बैठिए न!”
”और सुनाइए,”  मैंने कुर्सी में अपने को टिकाकर कहा, ”क्या ठाठ हैं?”
”ठाठ!” मिसेज खन्ना ने ऐसे मुंह बिचकाया, जैसे ठाठ कोई बहुत गंदी चीज हो। बात का रुख मोड़ते हुए बोलीं, ”बुरा न मानें तो एक बात कहूं, शर्माजी!”
”कभी बुरा माना है आपकी बात का?”
”सो तो ठीक है, मगर बात ही कुछ ऐसी है,” सही शब्दों की तलाश में भटकते हुए बोलीं, ”बाबूजी बेचारे बड़े परेशान से रहते हैं इन दिनों।”
”क्यों, कुछ कह रहे थे?”
”हां, कह रहे थे कि वे आपके जूठे बर्तन साफ करते हैं और आप इतना भी खयाल नहीं रखते कि उन्हें मेज से उठाकर…”
”आ गिया, बई!” पीछे से बाबूजी की आवाज आई। कोट की घिसी हुई बाहों में से कुहनियां झांक रही थीं और वे हाथ में दूध की बाल्टी लिए थे।
”चल, उठ!” एक अजीब अजनबी नजर से मुझे देखते हुए वे बोले। मैं चुपचाप उठा और उनके पीछे-पीछे  कमरे में आ गया।
”क्यूं बई,”  उन्होंने तल्ख लहजे में कहा, ”तू बहू कू क्यूं नीं बुला लेत्ता?”
”बुला तो लूं मगर…”
”मगर क्या? हमनै बी अपणी जवान्नी मैं बड़े-बड़े रंग देक्खे हैं।”
अविश्वास का एक ओर काला पर्दा उनके और मेरे बीच टंग गया।
मैंने कुछ कहना चाहा, लेकिन तभी लगा जैसे ढेर-सी रूई गले में फंस गई है। ब्रीफ-केस को मेज पर पटककर दरवाजे के बाहर हो गया।
”सुण, बई!”
वापस मुड़ा।
”हम चले जावैं ह्यां सै?”
”मैंने कब कहा आपसे?”
”कहा नीं तो म्हारे रहत्तो यो बदमास्सी नीं चलणे की!”
”क्या मतलब?”
”मतलब बी बताणा पड़ैगा?”
”नहीं, कोई जरूरत नहीं है।” मैं तेजी से दरवाजे के बाहर हो गया। पीछे बाबूजी क्या बड़बड़ाते रहे, मैंने नहीं सुनना चाहा।

रात को देर से लौटा। बाबूजी बरामदे में चारपाई पर लेटे ऊंघ रहे थे। दबे पांव बराबर से निकला। दरवाजा खोला।
दरवाजा खुलते ही बाबूजी की आंख भी खुल गई।
”कोण, जीत?”
मैं चुप रहा।
”खाणा खावैगा, बई?”
फिर चुप रहा।
”बोलता क्यूं नीं?”
इस बार भी मैं कुछ नहीं बोल सका और चुपचाप कपड़े बदलकर पलंग पर लेट गया।
बाबूजी माथा पकड़कर अपनी चारपाई की पाटी पर बैठ गए।
मैंने उनकी तरफ से करवट बदल ली।
”अच्छा बई, भुगतेंगे जो लिखा है!” बाबूजी ने पिघले स्वर में कहा। फिर सिसकियों और नाक सुड़कने की आवाज आई।
‘उठ जाऊं?’ मैंने स्वयं से पूछा, लेकिन अपमान की जो गांठ लगी थी, खुल न सकी।
मैं करवट लिए लेटा रहा। कुछ देर बाद बत्ती बंद हो गई।

उस रात के बाद आज फिर हम दोनों गुमसुम लेटे हैं। दो नहीं, तीन आदमियों का खाना रसोई में बना पड़ा है, लेकिन कोई भी मौन के कांच की दीवार को तोडऩा नहीं चाहता।
परसों इलाहाबाद से गंगाधर आया था। दो दिन की छुट्टी थी, मगर मंै एक दिन और रोककर इतवार में उसके साथ घूमना चाहता था।
आज सुबह गंगाधर ने फिर कहा, ”यार, तू मुझे चला ही जाने दे! बॉस बिला वजह नाराज होगा।”
”ऐसी की तैसी बॉस की! वही सब कुछ हो गया, हम कुछ भी न हुए!”
”नहीं, तू समझता नहीं, जीत! काम ही कुछ ऐसा है।”
”काम तो हमेशा से है और रहेगा। तू यहां कब-कब…”
”तो बई, तू इसै जाण क्यूं नीं देत्ता!” बाबूजी ने रसोईघर से आकर मेरी बात का तार काट दिया, ”काम का नुकसान होत्ता हो तो किसी कू रोकणा नीं चहिए।”
मुझे लगा जैसे किसी ने दिमाग के गुब्बारे में पिन चुभो दी है। गंगाधर के चेहरे पर सफेदी पुत गई। लेकिन वह बाबूजी की बात रखने के लिए बोला, ”देख लीजिए, बाबूजी, यह नाहक जिद कर रहा है।”
”दिमाग खराब है इसका तो,”  बाबूजी शह पाकर बोले, ”हम कहवैं हैं, तू चला जा, बेट्टे!”
मेरी बरदाश्त की हद टूट गई। तल्ख लहजे में बोला, ”आप होते कौन हैं हमारे बीच बोलने वाले!”
बाबूजी की त्यौरियां बदलीं, ”हम कोई होत्ते ई नीं, हरामखोर!”
”अच्छा, बकवास बंद कीजिए!”
”ब-क-वा-स! बकवास करैं हैं हम तो!”
”और क्या कर रहे हैं?”
”अरै, मैं इबी बता दूंगा तुजै, कुक्कर करा करैं हैं बकवास!”
”अच्छा, आप अपना काम देखिए!”
”क-I-I- म! काम देक्खूं जी इसका! नौक्कर हूं ना!”
”कौन कहता है…” मैं कुछ कहने ही वाला था कि गंगाधर ने मेरे मुंह पर हाथ रख दिया।
”चल, थोड़ा घूम आएं।”उसने मुझे हाथ पकड़कर खड़ाकर दिया और बाहर घसीट ले चला।
पार्क की बेंच पर बैठकर मैं देर तक पिछले चार महीने की घुटन वमन करता रहा।
अब गंगाधर रुक सकता था, लेकिन मैंने रोकना नहीं चाहा।
घर पहुंचे तो बाबूजी अपने टं्रक में सामान लगा रहे थे। टीन की जेब से पुराने पोस्टकार्ड निकालकर, फिर पढ़-पढ़कर फाड़ रहे थे।
चलते समय गंगाधर ने बाबूजी के चरण छुए। उन्होंने कुहनी निकले कोट की बांह उठाकर आशीर्वाद दिया।
गंगाधर की गाड़ी दोपहर डेढ़ बजे गई थी और मैं रात के साढ़े ग्यारह घर पहुंचा। बाबूजी आज बरामदे में नहीं हैं। चुपके से दरवाजा दबाया। खुल गया।
बाबूजी अपनी चारपाई पर लेटे हैं। नींद शायद नहीं आ रही। लिहाफ छाती तक खींच रखा है। सिर को और ऊंचा करने के लिए कुहनियां मोड़कर तकिए पर रख रखी है। चेहरे पर पीड़ा की विचित्र अपाठ्य लिपि लिखी है।
कपड़े बदलकर बाथरूम की तरफ गया तो देखा, रसोई में पूरा खाना बना पड़ा है।
लौटकर बत्ती ऑफ की और चुपचाप बिस्तर में घुस गया।
नींद नहीं आई और रात अंधेरे की पगडंडी पर भटकती रही।

बाबूजी को नींद आए काफी देर हो चुकी है। आधा मुंह खुला है और खर्राटे किसी डरावनी याद की तरह कमरे में तैर रहे हैं। सड़क की रोशनी की चमचमाती बरछी उनके माथे को काटती हुई मेरे और उनके बीच फर्श पर आकर ठिठक गई है। अभी-अभी उन्होंने फिर करवट बदली है और पुरानी दरी में पड़ी सलवट को निकालने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।
मुझे मां की याद आती है। मन होता है- उठकर दरी की सलवट निकाल दूं…लेकिन बीच में ठिठकी रोशनी उनके पास जाने से रोकती है।
रेल के घड़घड़ाने की आवाज आती है। शायद फ्रंटियर जा रही है। इंजन चीखता है…हू-हू-ऊ-ऊ-ऊ-हू! कैसी खराब जगह मकान ले लिया। रात भर नींद भी नहीं आती।
अलार्म टनटनाता है। बाबूजी आंख मलते हुए उठते हैं और स्टॉप-लीवर दबा देते हैं।
मैं करवट बदलकर लेट जाता हूं।
बाबूजी बाहर जाते हैं…बाथरूम में रोशनी होती है…नल से पानी गिरता है…फ्लश घरघराता है…बरामदे में लौटते कदमों की आहट होती है…वे फिर कमरे में आ जाते हैं…बिस्तर लपेटते हैं..बंदरिया के बच्चे के दो टुकड़े करते हैं…बिस्तर में घुसेड़ देते हैं…चारपाई के नीचे से जंग खाया ट्रंक खींचते हैं…घिसी हुई कुहनियों वाला कोट पहनते हैं…मेरे बिस्तर के पास आकर खड़े हो जाते हैं..
”अच्छा बेट्टे, मैं जा रहा हूं,” वे भर्राये स्वर में कहते हैं।
मन होता है, उठकर उन्हें रोक लूं! लेकिन मैं उठ नहीं पाता और लिहाफ को सिर तक खींच लेता हूं…टं्रक एक बार फिर खडख़ड़ाता है…बाहर जाते हुए कदमों की आहट आती है…दरवाजा खुलता है…बंद हो जाता है!
सड़क पर चलते कदमों की आहट देर तक कानों में बजती रहती है।

काशी का अस्सी पर केंद्रित बनास के विशेषांक का लोकार्पण

उदयपुर : साहित्य संस्कृति के संचयन बनास के विशेषांक गल्पेतर गल्प का ठाठ का लोकार्पण फतहसागर झील के किनारे स्थित बोगेनवेलिया आर्ट गेलेरी परिसर में 18 जून को किया गया।
काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी पर केंद्रित इस अंक का लोकार्पण सुविख्यात चित्रकार पीएन चोयल, चर्चित चित्रकार अब्बास बाटलीवाला, वरिष्ठ कवि नंद चतुर्वेदी और वरिष्ठ समालोचक नवल किशोर ने किया। पीएन चोयल ने कहा कि जब बाहर के दृश्य भीतर बदल जाते हों और सीधी भाषा हमारे अंदर हलचल पैदा करने में असफल हो रही हो तब व्यंग्य और प्रतीकों से बनी कोई कृति आवश्यक हो जाती है। बनास द्वारा पूरा अंक एक उपन्यास पर केंद्रित करना बताता है कि काशी का अस्सी हमारे समय और समाज को देखने वाली बड़ी कृति है।
नंद चतुर्वेदी ने हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता के समक्ष आ रही चुनौतियों की चर्चा करते हुए कहा की इसे साहित्य की भूमिका को पहचानने और ठीक से चिह्नित करना होगा। साहित्यिक पत्रकारिता को अब अंतरानुशासनिक भी होना पड़ेगा क्योंकि इसके बिना अपने समय और समाज को समझना मुश्किल है।
सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय के अध्यक्ष प्रो. शरद श्रीवास्तव ने काशी का अस्सी से एक महत्वपूर्ण अंश नरभक्षी राजा की कथा का पाठ किया। इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय,दिल्ली  के प्रो. आशुतोष मोहन ने कहा कि हमारे जीवन से हंसी के हिज्जे बदल दिए गए हैं ,काशी का अस्सी इसी हंसी के गायब होने की दास्तान की महागाथा है। सिरोही महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. माधव हाड़ा ने रेणु के बाद हिंदी में पहली बार बहुत निकट रहकर निस्संग भाव से भारतीय समाज को देखने के लिए काशी का अस्सी को असाधारण रचना बताया। वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवलकिशोर ने लघु पत्रिका की अवधारणा का उल्लेख कर लघु पत्रिकाओं के लिए नएपन की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मीडिया की नई तकनीकों के सामने लघु पत्रिकाओं को नया पाठक वर्ग बनाने की चुनौती है।
प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र नंदवाना, चित्रकार शैल चोयल, हेमंत द्विवेदी, शाहिद परवेज़, साहित्यकार मूलचंद्र पाठक, एस.एन. जोशी, लक्ष्मण व्यास, हिमांशु पंड्या, सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के अध्यक्ष डॉ. रईस अहमद, मीरा गल्र्स कालेज की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मंजू चतुर्वेदी, आकाशवाणी के सहायक केंद्र निदेशक डॉ. इंद्रप्रकाश श्रीमाली, महिला अध्ययन केंद्र की प्रभारी डॉ. प्रज्ञा जोशी, डॉ. चंद्रदेव ओला, डॉ. लालाराम जाट, डॉ. नीलेश भट्ट आदि उपस्थित थे। स्वागत कर रही बोगेनवेलिया आर्ट गेलेरी की निदेशक तनुजा कावडिय़ा ने कहा की सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए साझा काम करने होंगे। 
(प्रस्तुति : पल्लव)

जीवन की बेहतरी के लिए कविता जरूरी : मंडलोई

गुडग़ांव : सुरुचि साहित्य कला संस्थान की ओर से सीसीए स्कूल सभागार में 13 जून को आयोजित समारोह में दो कविता संग्रह और एक गजलों की सीडी का लोकार्पण किया गया। समारोह की अध्यक्षता चर्चित कवि लीलाधर मंडलोई ने की। उन्होंने जीवन को बेहतर बनाने के लिए कविता की जरूरत पर बल दिया।
इस अवसर पर जगदीश प्रसाद की कविताओं का संग्रह अतीत के प्रेत, मंजू भारती का बाल कविताओं का संग्रह इंद्रधनुष और राजगोपाल सिंह की गजलों की सीडी चंद पल तेरी बांहों में लोकार्पण किया गया। मदन कश्यप, लवलीन, डा. विवेक मिश्र आदि का काव्यपाठ भी हुआ।

संघर्ष और क्रांति का नहीं, समय हथियारों को ठीकठाक करने का : स्वयं प्रकाश

स्वयं प्रकाश

हिंदी के महत्वपूर्ण कथाकार स्वयं प्रकाश से उनके संघर्ष और साहित्य व राजनीति के जुड़े विभिन्न मुद्दों पर लक्ष्मण व्यास की बातचीत के अंश-

आपको लेखक बनाने में बचपन का क्या प्रभाव रहा?
बचपन ने अच्छे संस्कार दिए। पढऩे-लिखने को प्रोत्साहित किया। कुछ अच्छे साहित्यप्रेमी अध्यापक मिले। अच्छे पुस्तकालय-वाचनालय मिले। इससे अधिक शायद कुछ नहीं। लेखक बनना मेरी महत्वाकांक्षाओं में कहीं नहीं था।
मैंने अपने बचपन के बारे में कुछ नहीं लिखा। लिखूंगा-लिखूंगा करके टालता रहा और अब वैसा सब पढऩे में किसी की दिलचस्पी ही नहीं। 
आपकी आरंभिक रचनाएं, उन पर मिली प्रतिक्रियाएं, क्या लिखना है- किस तरीके से लिखना है, उन पर वैचारिक मंथन के बाद आपकी सर्जनात्मकता का एक ठोस और निश्चित रूप ग्रहण करना… इस रचनात्मक यात्रा के बारे में बताएं।  
1968 की बात है। मैं भारतीय नौसेना की नौकरी, गोदी की नौकरी, फिल्म इंडस्ट्री की दिहाड़ी और इधर-उधर का छुटपुट काम छोड़कर अपने गृहनगर अजमेर आ गया था। आया भी इसलिए था कि बंबई में झोंपड़पट्टी में रहने, आधा पेट खाने और लगातार नौटाक दारू पीने से भयंकर पीलिया हो गया था। बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। दोस्तों ने चंदा करके रेल का टिकट खरीदा था और टांगाटोली कर अजमेर जानेवाली रेल में बिठा दिया था। रेल चलते-चलते हाथ हिलाते हुए भी वे यही कह रहे थे- स्वयं प्रकाश। वापस मत आता! वे सब फिल्म इंडस्ट्री में कुछ बनने के लिए संघर्ष कर रहे थे। मदन सिन्हा, राजेश शर्मा, पाश, बाबूभाई! मैंने आज तक इनमें से किसी का नाम किसी बिलबोर्ड, पोस्टर या किसी फिल्म की क्रेडिट में नहीं देखा। शायद हम सब नष्ट हो जाने के लिए ही बने थे। उन्होंने मुझे वापस भेजकर बचा लिया। मेरी जिंदगी उन्हीं का कर्ज है।
इत्तेफाक से इसी समय रमेश उपाध्याय, जो व्यावसायिक पत्रिकाओं के स्थापित लेखक थे और बंबई में फ्रीलंसिंग कर रहे थे, लगातार पेट खराब रहने की वजह से बंबई छोड़कर अजमेर आ गए- इस भावना से कि हिंदी में एम.ए. करेंगे। अजमेर उनका जाना पहचाना शहर था। यहीं विभिन्न प्रेसों में कंपोजीटरी करते-करते वह लेखक बने थे।
अब अजमेर बोले तो कितना बड़ा शहर? साइकिल पर घंटे भर में सारे शहर की परिक्रमा हो जाए। तो हमारी मुलाकात तो होनी ही थी। एक जैसी रुचियां होने और मेरे परम फुर्सतिया होने के कारण नजदीकी भी हो गई। कुछ बंबई में रह लेने का सगापन भी था। मैं सोच रहा था कि देखें यह फ्रीलंासिंग क्या होती है, कैसे होती है कि लिखने मात्र से गुजारा चल जाता है। उन्हीं दिनों मैंने एक स्थानीय कंपोजीटर के उकसाने पर अपना कविता संग्रह खुद का पैसा खर्च करके छपवा लिया था। शीर्षक था ‘मेरी प्यास तुम्हारे बादलÓ। और कवि का नाम था, जी हां, स्वयं प्रकाश ‘उन्मुक्तÓ। छपवा इसलिए लिया कि कविताएं एक गहरी मोहब्बत की निशानी थीं। 
अब रमेश उपाध्याय ने देखा तो बोले कि आप कहानियां क्यों नहीं लिखते? पता नहीं क्यों ऐसा बोले। क्या देखकर बोले। लेकिन मैने सोचा, क्यों नहीं? क्या हर्ज? 
और लीजिए- मैं कहानीकार हो गया। रमेश उपाध्याय ने अंग्रेजी की एक किताब भी दी। यह थी नेपोलियन की प्रेमिका की डायरी। बोले, इसका हिंदी सार संक्षेप कर सको तो कादम्बिनी में छप जाएगा। मैंने कर दिया। जस का तस बगैर काटे-पीटे कादम्बिनी में छप भी गया। सौ रुपये पारिश्रमिक मिले, जो बहुत होते थे उन दिनों। पहली कहानी ‘टूटते हुएÓ समाज कल्याण नामक पत्रिका में छपी। उसके साठ रुपये मिले। फिर तो मैंने झड़ी लगा दी। पैसा जैसे बरसने लगा। हर महीने चार-पांच पत्रिकाओं में रचनाएं छपतीं।
इस समय तक माक्र्सवाद से न मेरा परिचय था और न रमेश का। वह कराया रमेश गौड़ और कांति मोहन ने। मगर यह बहुत बाद की बात है।  
1971 मैं भीनमाल नामक एक छोटे से कस्बे के टेलीफोन एक्सचेंज में नौकरी करता था और कुछ दोस्तों के साथ मुक्तवाणी नामक साप्ताहिक अखबार निकालता था। एक दिन कस्बे के इकलौते कॉलेज में नए-नए आये अंग्रेजी के प्रोफेसर मोहन श्रोत्रिय ने कहा, क्यों न हम एक साहित्यिक पत्रिका निकालें, जो कस्बे में ही नहीं, सारे देश में पढ़ी जाए। और हमने ‘क्यों’ निकाली।
यहां तक आते-आते शायद मैं वह बन गया था, जो हूं।  
इंदौर, अजमेर, मुंबई, जोधपुर, भीनमाल, जैसलमेर, सुमेरपुर, सुंदरगढ़, जावर, दरीबा, चित्तौडग़ढ़ और अब भोपाल! कैसी लगती है यह यात्रा?
बहुत रोचक, बहुत घटनापूर्ण, बहुत शुभाशीषमय।
इतनी लंबी रचना यात्रा में क्या कभी मन में संदेह हुआ, इसके प्रभाव को लेकरï? लोगों को प्रभावित कर बदलाव लाने की क्षमता पर?
अनेक बार। जब अखबार पर मुकदमा हुआ। जब पत्रिका बंद करना पड़ी। जब शिकायत पर तबादले हुए। जब दोस्त खोये। जब अपने ही संगठन मेंं पद के लिए कुत्ता-बिल्ली खींचतान देखी। जब सोवियत संघ ध्वस्त हुआ। लेनिन की प्रतिमाओं के सिर काटकर उन्हें धराशायी किया गया…
साठ के दशक से अब तक, साहित्य का मुख्यधारा से हाशिए पर चले जाना, इस प्रक्रिया को आप किस तरह देखते हैं? प्रेमचंद के शब्दों में, ‘समाज और राजनीति के आगे चलती मशाल’ अब पिछलग्गू बनकर रह गई है या आप मानते हैं कि यह स्थापना ही गलत है? 
तब जीवन अपेक्षाकृत सरल था। खाली समय में लोग पढ़ते थे या दोस्तियां करते थे। ‘प्रकृति के संपर्क में आते’ थे या रिश्तेदारियां निभाते थे। तब मनोरंजन करने के अलावा सूचना देना और शिक्षित करना भी साहित्य के प्रकार्य माने जाते थे। हर कविता-कहानी से कुछ न कुछ शिक्षा मिलती थी, जबकि उपन्यास (लोग सोचते थे कि) बिगाड़ते थे, जैसे कि फिल्म। और बिगडऩे की आरंभिक लेकिन पुष्ट और निर्विवाद निशानी होती थी- खड़े-खड़े पेशाब करने लगा या बाल जमाने लगा या सिगरेट पीने लगा। इसके बाद फिल्म, टेलीविजन, कंप्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल और खोजी पत्रकारिता तथा स्टिंग ऑपरेशन हो चुके हैं। साहित्य का स्वरूप और प्रकार्य पहले जैसा कैसे रह सकता था?
समाज और राजनीति के आगे चलने वाली मशाल का यह मतलब नहीं है कि मुंह में बेर की गुठलीवाली सीटी डाले, हाथ में मशाल पकड़े साहित्यकार आगे-आगे दौड़ रहा है और पीछे से उसका कुर्ता पकड़े राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसद, विधायक, प्रशासक, उद्योगपति सब दौड़ रहे हैं। 
किसी भी विषय का सर्वोच्च ज्ञान होता है उसका दर्शन। चाहे वह भौतिक शास्त्र ही क्यों न हो। डॉक्टर ऑफ फिलॉसॉफी का मतलब है इस विषय की फिलॉसॉफी में आपकी भी डॉक्ट्राइन है। उस दर्शन में अपका भी योगदान है तो आप विद्यावाचस्पति हैं। 
और दर्शन से भी ऊपर होता है साहित्य। यदि किसी विषय के साहित्य में आपके योगदान को स्वीकार कर लिया जाए, तब तो आप हो गए विद्यावारिधि।
प्रेमचंद के इस कथन की महत्ता न आज कम हुई है न कल कम होगी। हां, ऐसा साहित्य युगांतकारी परिस्थितियों में ही दिखाई देता है।
दुनिया में परिवर्तन इतनी तेजी से हो रहे हैं कि एक परिवर्तन को समझे तब तक नया परिदृश्या सामने आ जाता है। कथा प्रविधि इस पल-पल बदलते यथार्थ को पकड़ पाने में कितनी सक्षम है?  
हां, यह बात तो ठीक है। पहले सौ साल में जो परिवर्तन होते थे, अब दस साल में हो जाते हैं। एक टेक्नॉलोजी आती है और हम उसे सीखें कि वह ऑब्सलीट हो जाती है और यह रेपिड फास्ट ऑब्सलेंस टेक्नॉलोजी में ही नहीं, धारणाओं-मान्यताओं-मूल्यों और मनुष्यों में भी है। कोई नहीं जानता कि आज से पांच साल बाद दुनिया कैसी होगी!
एक तरफ इतनी अनिश्चितता और अनप्रिडिक्टिबिलिटी (अननुमानेयता) और दूसरी तरफ पारंपरिक यथार्थवाद की घोर प्रिडिक्टिबिलिटी! आप कहिए नर्स, और हम समझ गए कि वह कैसी है। आप कहिए पुलिसवाला और मजाल है हमारी आंखों के आगे शैलेंद्र सागर या विभूति नारायण राय का चित्र आ जाए! आप कहिए सेठ और पाठकों ने मानो उसे देख भी लिया। आगे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं। समूचे हिंदी साहित्य में न बिलगेट्स जैसा एक भी सेठ है न टीना मुनीम जैसी एक भी सेठानी (मुनीम नाम से क्या होता है, है तो सेठानी)। 
अब कथाकार को इस चुनौती का सामना करना है कि कैसे इनका चित्र उतारे! उसके पक्ष में यह बात है कि वह पत्रकार या संवाददाता या फोटोग्राफर नहीं है। दशक खंड का भी प्रतिनिधि-सा चित्र बना ले तो पाठक स्वीकार कर लेंगे।  
इस बीच एक नयी पीढ़ी का आगमन हुआ है जिसके संस्कार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने तय किए हैं। जिनके जीवन का मूलमंत्र है प्देजंदज ळतंजपपिबंजपवद (तुरंत तृप्ति) इस पीढ़ी के ध्यानाकर्षण हेतु साहित्यकार कथ्य व शैली के स्तर पर क्या परिवर्तन अपनाएं? 
मीडिया को गाली देना तो ठीक नहीं होगा। यहां भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय है, जिसमें युवक-युवतियों को मीडिया के बारे में गंभीर विचार-विमर्श और अध्ययन-मनन करते हुए देखता हूं। व्यवसाय का भी अपनी जगह महत्व है। मैं तो कहता हूं कि विज्ञापन का भी महत्व है। 
यह सही है कि आज के अनेक रचनाकार व्यावसायिकता के दबाव और प्रभाव में हैं और कई बार वे कहानी भी ऐसे लिखते हैं, जैसे छब्बीस एपीसोड का सीरियल लिख रहे हों, लेकिन हमें तो उनकी निष्ठा पर इसलिए भी शक नहीं करना चाहिए कि उन्होंने अपनी रचनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए हिंदी जैसी भाषा और लेखन जैसा नॉन ग्लैमरस व्यवसाय चुना।
बाकी यह भी तय है कि भविष्य में साहित्य का विकास एक व्यवसाय के रूप में ही होगा, मिशन के रूप में नहीं। शैली-शिल्प का निर्णय परिस्थिति के अनुसार हो जाएगा। बाजार इतनी बड़ी शक्ति है कि वह जनता के पाठ अभ्यास और पाठ संस्कार को भी बदल सकता है। मुझे तो शक है कि यह परिष्कृत-नागर और सवर्ण हिंदी-जिसमें हम बात कर रहे हैं, भविष्य में रहेगी या नहीं। विक्टोरियन अंग्रेजी का उदाहरण सामने है! क्या वाट लगाई है इसकी बदलते समय ने! 
साहित्य सृजन को ही जीविकोपार्जन का साधन बनाने की इच्छा हिंदी लेखकों के मन में रही है। विदेशी और भारत की कुछ अन्य भाषाओं में यह संभव भी हो पाया है, पर हिंदी समाज में एक-दो अपवाद ही हैं, जबकि हिंदी बोलने-पढऩे समझने वाले करोड़ों में हैं, क्या कारण हैं उसके? 
शायद हिंदी प्रदेश का भूगोल ही हो। हिंदी के हृदय प्रदेश बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश की पिछड़ी अर्थव्यवस्था। वर्षा आधारित कृषि। चारों तरफ से समुद्र से दूरी। व्यापक निरक्षरता। फिल्म और रंगमंच के केंद्रों से दूरी। व्यापार-वाणिज्य का पिछड़ापन! (देश के प्रमुख दस में से सात व्यापारिक घराने राजस्थान के, लेकिन उनका व्यापार वाणिज्य कहां? अहिंदीभाषी प्रदेश में)। मराठी, कन्नड़, मलयालम, तमिल, तेलुगु और बांग्ला के श्रेष्ठ साहित्यकार सहज ही व्यावसायिक रंगमंच और सिनेमा से जुड़ जाते हैं। हिंदीवालों के लिए यह दुष्कर हैं। और परदेसियों के संपर्क में आना भी समान रूप से दुष्कर। 
अब तो यह स्थिति है कि तीन सौ प्रतियों के प्रथम संस्करण होते हैं, और दूसरा संस्करण तो कभी-कभी ही सुनाई देता है। 
लेकिन साहित्य से जीविका चलाने वालों ने कालजयी साहित्य शायद ही कभी रचा हो। साहित्य पर बगैर स्वार्थ कोई पैसा नहीं लगाता। कहीं चर्च का पैसा है, कहीं दवा उद्योग का, कहीं सीआईए का। फोर्ड फाउंडेशन रॉकफेलर फाउंडेशन क्या है? एलेक्स हेली को ‘रूट्स’ लिखने के लिए रीडर्स डाइजेस्ट ने पैसा दिया। हमारे यहां व्यास सम्मान कैसे लोगों को मिलता है? राजा लोग पालते थे तो प्रशस्तियां और विरूदावलियां भी लिखवाते थे। सोवियत संघ में क्रांति के बाद लेखक आजीविका की चिंता से मुक्त हो गए, लेकिन क्या उनमें से कोई भी क्रांतिपूर्व के साहित्यकारों जैसा लिख पाया? तुलसीदास ने एकाध बार मांगकर खाया होगा या बचपन में कभी एकाध रोज खेलते-खेलते मस्जिद के अहाते में उनकी नींद लग गई होगी, लेकिन जो लिख गए उसका आशय यह लगता है कि लेखक लेन-देन के लफड़े से दूर रहता है। सच्चे लेखक के लिए साहित्य सृजन परमानंद प्राप्ति का माध्यम है, आजीविका-फाजीविका क्या होती है। पेट तो किसी तरह कुत्ता भी भर लेता है।
मुझे साहित्य को जीविका का साधन बनानेवाला आइडिया बहुत आकर्षक नहीं लगता। 
सोवियत संघ में साम्यवादी ढांचे का ढहना इन लेखकों के लिए बड़ा धक्का था, जो इसे माक्र्सवादी सोच की व्यावहारिक प्रयोगशाला के रूप में देखते थे, पूंजीवाद के विकल्प के रूप में देखते थे। इस घटना का पूर्वानुमान भी नहीं कर पाए। ऐसा क्यों हुआ? 
सोवियत सत्ता के पतन की आशंका या अनुमान तो उसके अस्तित्व में आने के भी पहले से आरंभ हो गए थे। अक्टूबर क्रांति के समय बोल्शेविक बहुमत में नहीं थे। बाद में चौदह साम्राज्यवादी देशों की सेना ने रूस पर आक्रमण कर दिया था। अपने देश की रक्षा में लगभग अस्सी प्रतिशत सबसे अच्छे बोल्शेविक मारे गए थे। गोर्की कई मामलों में लेनिन से सहमत नहीं थे। हिटलर को साम्राज्यवाद का पूरा समर्थन प्राप्त था। ऐसी परिस्थिति में समाजवाद की ठीक से नींव ही नहीं रखी जा सकी। मजदूरों की बजाय पार्टी नौकरशाही का नेतृत्व और विकेंद्रीकरण के स्थान पर केंद्रीकरण। छोटे-छोटे बच्चे पढऩे की बजाय कोम्सोमोल में भर्ती होकर बड़ों का काम कर रहे हैं। सैनिक आधार पर समाज का गठन करना पड़ा।
एक बात और ध्यान देने की है, पूंजीवाद एक वैश्विक व्यवस्था है। एक वैश्विक व्यवस्था का विकल्प दूसरी वैश्विक व्यवस्था ही हो सकती है। इसकी संभावना थी। परिस्थितियां थीं। लेकिन रूस और चीन आपस में ही लड़ लिए। और किस बात पर? चीन ने कहा, हमें एटम बम दो, रूस ने कहा नहीं दूंगा। फिर तो अतिक्रमण, सीमा विवाद, सैद्धांतिक मतभेद, संशोधनवाद और सोवियत साम्राज्यवाद सब हो गया।
आज पीछे मुुड़कर देखते हैं तो रूस और चीन का यह व्यवहार बहुत बचकाना और गैर जिम्मेदाराना लगता है, पर आज भी चीन जो कर रहा है- पाकिस्तान को पिट्ठू बनाकर अनाधिकृत तरीके से भारत की भूमि पर से होते हुए सीधे हिंद महासागर और पश्चिम एशिया के तेल क्षेत्र तक पहुंचने की कोशिश, वह क्या है? और यह किस बात का सूचक है? सिवाय दूरांध नौकरशाही कूटनीति के वर्चस्व और दूरंदेश राजनीतिक नेतृत्व के अभाव के? लेकिन इतिहास में प्जे और इनजे नहीं होते। 
मैं तो सोवियत प्रयोग को सत्तर साल की असफलता नहीं, सत्तर साल की सफलता ही मानता हूं। बात जरा व्यक्तिगत हो जाएगी। एक साल मुझे सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिलने वाला था। सोवियत संघ एक से अधिक बार हो आए एक मित्र ने कहा-मिल भी जाए तो जाना मत। वहां किसी भी दिन कुछ भी हो सकता है।
घटना के बाद वे किस विकल्प की खोज में है? इस विकल्प का कोई केंद्र भी है? विभिन्न बिखरे हुए जनसंघर्ष हैं, पर कोई केंद्रीकृत सगंठन-वाद-विचारधारा नहीं है। माक्र्सवाद सिद्धांत और विचारधारा के रूप में अभी भी प्रासंगिक है, पर व्यावहारिक रूप पहनाने की चुनौती विश्व स्तर पर अभी भी मौजूद है। किस तरह के विकल्प आप देख पा रहे हैं?
आप कह रहे हैं कि माक्र्सवाद सिद्धांत और विचारधारा के रूप में आज भी प्रासंगिक हैं, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता।
मुझे लगता है कि उत्पादन के साधनों और उत्पादन के संबंधों में काफी परिवर्तन हो चुका है। माक्र्सवाद को अपडेट करना जरूरी है। यह समय संघर्ष और क्रांति का नहीं, अपने हथियारों को ठीकठाक करने का है।  
महाश्वेता देवी, अरुंधती रॉय जैसा एक्टिविस्ट लेखन जिसमें जीवन और रचना के बीच भेद न हो, वही अभीष्ट हो नए लेखकों का या एक्टिविस्ट न होते हुए भी उन सरोकारों को अपने लेखन मेंं स्थान देना भी महत्वपूर्ण है? इस संगति के प्रश्न पर क्या सोचते हैं?
मुझे लगता है, हमारे अनेक युवा मित्र भयंकर रूप से दुविधाग्रस्त हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि समाजसेवा अधिक तसल्लीबख्श रहेगी या लेखन अधिक सार्थक? कुछ चतुराई भी चल रही है मन में कि जवानी के पांच साल तो चलो हम इसमें इंवेस्ट कर देंगे, लेकिन उसके बाद रिटर्न हेंडसम होना चाहिए। अब यह पता नहीं लेखन से होगा या समाजसेवा से। इस दुविधा के चलते वे कभी यह करते हैं कभी वह। और दुख इससे होता है कि दोनों में से एक भी काम ढंग से नहीं कर पाते। 
यह जो शब्द चला है-एक्टिविस्ट, जिसका कोई हिंदी पर्याय नहीं है और जो भयानक रूप से दिग्भ्रमित करनेवाला पद है। इसने अनेक युवाओं की जिंदगी को बरबाद कर रखा है। इनमें से अधिकांश आज से दस साल बाद पश्चिम से पैसे लेकर एड्स का प्रचार करते फर्जी एनजीओज में नजर आएंगे। 
किसी को लगता है कि प्रामाणिक और जीवंत लेखन के लिए जमीनी कार्यकर्ताओं से जुडऩा जरूरी है तो जरूर जुडऩा चाहिए, लेकिन इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि रचना का मूल्यांकन तो साहित्य के मापदंडों से ही होगा। उस वक्त कोई यह नहीं देखेगा कि आंदोलन में आप पीछे खड़े हुए थे या आगे। हमारे लिए तो आज भी अरुंधती रॉय सिर्फ एक पुस्तक की लेखिका हैं, केंद्रीय साहित्य अकादमी उन्हें चाहे जो समझे। और महाश्वेता देवी भी हमें एक अंचल के जीवन की खबर देने से ज्यादा क्या करती हैं? उनके समग्र लेखन से कौनसा राजनीतिक विचार उभरकर आता है? 
वर्तमान समय के उभरते बड़े मुद्दे जिनकी तरफ रचनाकारों को और ज्यादा तवज्जो देना चाहिए। 
पचास साल से यह देश तमाम निरक्षरता, गुरबत और राजनीतिक अनुभव हीनता के बावजूद सिर उठाकर खड़ा था तो सिर्फ इसलिए कि इसके पास एक मजबूत पारंपरिक कृषि आधार था। नव साम्राज्यवाद-जिसे लाड़ से भूमंडलीकरण कहा जाता है, समझ गया है कि भारत को गुलाम बनाना है तो उसका मजबूत कृषि आधार तोडऩा पड़ेगा। और यह काम उन्होंने शुरू कर दिया है। हजारों किसान एक दिन दाल में नमक कम होने या नाती द्वारा नमस्ते न करने के कारण आत्महत्या नहीं कर रहे हैं। इनकी आत्महत्याओं के कारण हैं- बैंक ऋण, डीजल के बढ़ते दाम और नकली बीढ़ी और जीई बीज। और अब आइटीसी, महेंद्रा और रिलायंस भारी पैमाने पर रिटेलिंग के क्षेत्र में आए हैं। वालमार्ट और टेस्को भी पीछे-पीछे आ रही हैं। आज से पांच साल बाद भारत में न कोई किसान बचेगा, न गांव, न वनोपज और न पशुधन, अगर इनकी चली। लेखकों को इस पर तुरंत ध्यान देना चाहिए।   
आपने गद्य की लगभग सभी विधाओं में लिखा है – कहानी, उपन्यास, नाटक, रेखाचित्र, निबंध आदि। आपका मन किस विधा में सबसे ज्यादा रमता है? विषयवस्तु विधा का निर्धारण करती है या विधा चुनने के उपरांत इसके अनुरूप कथ्य चुनते हैं? 
सच बात तो यह है कि सबसे ज्यादा मजा मुझे दोस्तों को लंबे-लंबे पत्र लिखने में आता है। अंतरंग मित्रों को पत्र लिखना गर्मियों की दोपहर में किसी झरने में नंगे नहाने जैसा है। कुछ दिखाना नहीं है, कुछ छिपाना भी नहीं है। भाषा-व्याकरण भी जाए भाड़ में। मूर्खता की बड़ी से बड़ी बात जहां निस्संकोच कही जा सकती है। और लिखते-लिखते क्या शानदार विचार, उपमाएं, कल्पना, बिंब, गुदगुदाते फिकरे, रसीली गालियां आती हैं अहा! मित्रों ने बड़ी संख्या में मेरे पत्र संभालकर रखे हैं। पता नहीं क्यों। पिछले दिनों इंदौर गया तो एमए में पढ़ रही मज्जू की बेटी ने मुझे कुछ पोस्टकार्ड दिखाए। वर्ष 1964-65-66 आदि के। मैंने नए साल की शुभकामनाएं भेजी थीं। हर पोस्टकार्ड में कुछ-कुछ करते हुए दो बड़े क्यूट से गधे बने हुए हैं।
विधा चुनकर उसमें कथ्य फिट करना तो कफन के नाप का मुर्दा ढूंढने जैसा है। 
आप मुंबई के जीवन पर उपन्यास लिखते हैं। महानगरीय जीवन आपको बहुत पसंद नहीं। ‘संधानÓ कहानी में आमने-सामने रखते हैं दोनों को। फिर भी भोपाल? क्यों चुना महानगर?
भोपाल महानगर नहीं है। सोलह लाख का मझोला-सा शहर है। इंदौर से भी छोटा। उम्र भी ज्यादा नहीं। यही कोई पचास-साठ साल। हां, राजधानी जरूर है। 
उड़ीसा भी रहे। वहां के जीवन प्रवास पर कुछ नहीं लिखा आपने? 
दो-तीन कहानियां तो लिखी थीं। मसलन बील, नेताजी का चश्मा, अफसर की मौत वगैरह। आजकल उड़ीसा के संस्मरण ही लिख रहा हूं।  
आपने पार्टी का अखबार बेचा, प्रलेस के सदस्य बने, कहानी लिखी और अब ‘वसुधाÓ का संपादन कर रहे हैं। कितनी प्रासंगिकता है इन चीजों की?  
अपने-अपने समय में, अपने-अपने स्थान पर हर चीज की प्रासंगिकता है। यही क्यों बच्चों को पढ़ाया भी, अपना अखबार भी निकाला, नाटकों का निर्देशन भी किया, यूनियन में भी काम किया। लेकिन लाठी नहीं खायी, सिर नहीं फुड़वाया, जेल नहीं गया, भूखा नहीं रहा। अंत में यही लगता है कि जितना कर सकते थे, उतना नहीं किया। आलस्य में बहुत समय गंवा दिया, लेकिन मजा बहुत आया।  
बच्चों की पत्रिका ‘चकमक’ का आपने संपादन किया। यह अनुभव कैसा रहा?
बहुत शिक्षाप्रद, लेकिन कुछ हताश भी करनेवाला। मैंने अपने बहुत सारे साहित्यकार मित्रों से बच्चों के लिए लिखने को कहा। कई ने मेरे कहने से लिखा भी, लेकिन इसे प्रकाशन योग्य नहीं पाया गया। बच्चों के लिए लिखना बहुत कठिन और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन जरूरी भी। 
‘वसुधा’ का संपादन कर रहे हैं। साहित्य की पत्रकारिता कैसी है? कैसी होनी चाहिए? क्या यह सच है कि संपादक भी एक शक्ति केंद्र बनता जा रहा है? 
मेरे पास दस साल की पहल, तद्भव, कथन, उद्भावना, आलोचना रखी हैं। कभी मन नहीं किया कि किसी को दे दें या रद्दी में बेच दें। यह किस बात का सूचक है? जिंदा साहित्य से जिसे परिचित होना है, उसका काम साहित्यिक पत्रिकाओं के बगैर चल ही नहीं सकता। जहां तक संपादक की भूमिका का सवाल है, मेरा खयाल तो यह है कि उन्हें जितनी सख्ती करना चाहिए उतनी वे नहीं करते। 
उम्र के इस पड़ाव पर पीछे मुड़कर आप देखते हैं तो अपनी लेखकीय यात्रा के कौन से मुकाम महत्वपूर्ण नजर आते हैं जिन्हें आप रेखांकित करना चाहेंगे? 
ज्यादा मुड़-मुड़कर देखेंगे तो आगे नहीं बढ़ पाएंगे। और पीछे देखते हुए आगे बढऩे की कोशिश की तो ठोकर खाएंगे। ‘उम्र के इस पड़ाव परÓ मध्यांतर हो गया है। इंटरवल के बाद अक्सर फिल्म सीरियस हो जाती है। इसलिए अब ऐसा लिखना है जो रोचक और सार्थक ही न हो, अंतत: मूल्यवान भी सिद्ध हो।

मेरा आत्मसंघर्ष : मणिकुंतला भट्टाचार्य

असमिया की चर्चित लेखिका के सृजनात्मक सफर की दास्तां…

कौन जानता है कि आनंद की तुलना में विषाद क्यों गहरा स्थायित्व प्राप्त करता है! खुद नहीं जानती, कब विषादग्रस्तता ने सीने में जगह बना ली थी। दोनों हाथों में शिशु बनकर लटकती फिरी थी शून्यता और निराशा। हजारों लोगों के बीच रहते हुए भी, साधारण जीवन गुजारती हुई भी, चुपके से समाती गई थी एकाकीपन के व्यूह में।
मेरे बंधु, पथ प्रदर्शक पिता ने मेरी हालत को शायद समझ लिया था। अनगिनत किताबें लाकर उन्होंने मेरे लिए ग्रंथशैया बना दी। वहीं सिर रखकर स्वप्न विभोर हुई थी, मेरे भीतर अंतहीन लहरें पैदा होने लगी थीं। आलोडि़त हृदय के साथ मैंने कलम थाम ली थी और 1981 से ही मैं एकाग्र होकर कविताएं लिखने लगी थी। जहां भी भेजती थी, प्रकाशित हो जाती थीं। दिनोंदिन पाठकों की तादाद बढऩे लगी और साथ ही लोग मेरी सराहना भी करने लगे। मगर आश्चर्य की बात थी कि तारीफों की तरफ मैं गौर नहीं कर पा रही थी। मैं ऐसी किसी खास भावना को उजागर करने की कोशिश कर रही थी, जो इस विशाल जगत और महाशून्य के बीच असंतुलन में एक अद़भुत स्थायित्व प्राप्त कर सके। मगर क्या थी वह भावना? गद्य-पद्य या दर्शन का विश्लेषण?
खुद ही रचे गए एकाकीपन के भीतर गुमसुम-सी रहने लगी। दिनोंदिन वह अव्यक्त यंत्रणा इस कदर बढ़ती गई कि कि उसका बोझ उठाते हुए मैं बार-बार कातर होने लगी। असहाय होने लगी। दिन के बाद दिन विषादग्रस्तता में डूबी रहने लगी।
1987 में पिताजी ने मुझे व्यक्तिगत संपत्ति की तरह किसी एक युवक के साथ ब्याह दिया। हां, कन्या संप्रदान के जरिए उन्होंने पिता के दायित्व का पालन किया और एक अचल संपत्ति की तरह, आर्य नारी की परंपरा के अनुसार पिता की छांव छोड़कर स्वामी के पास चली आई।… मानों जीवन ही बदल गया! पिता की बनाई ग्रंथशैया से उत्पन्न हुई भिन्न अनुभूतियों की जगह अब भौतिकवाद खड़ा हो गया था। पता ही नहीं चला कि कुछ भी किए बगैर किस तरह बारह साल गुजर गए। एक युग। आज के युग में किसी नारी की चाही गई हर चीज मुझे मिली, मगर सीने में कायम रही वही प्राचीन विषादग्रस्तता। मानों वह मेरी आजन्म सहचर हो। दोनों हाथों में शिशु बनकर लटक रही शून्यता और निराशा मानों अब मेरे कंधों पर सवार हो गईं! कुछ समझ नहीं पा रही थी। अद़भुत यंत्रणा!
मगर सारे दरवाजे बंद होने पर भी बाहर निकलने का कोई रास्ता निकल ही आता है। अनजाने में ही मैंने एक दिन कलम उठा ली और उस लंबी निस्तब्धता को तोड़ती हुई प्रवाहित हुई एक मायामय कविता। मनुष्य की कविता। यह 1991 के दिसंबर महीने के आखिरी हफ्ते की बात है। उस समय एक लोकप्रिय अखबार को कविता भेजी और वह प्रकाशित भी हो गई। उसके बाद फिर एक… उसके बाद फिर… और एक अन्य कविता। गुजरे हुए खामोश युग में कौन क्या रच रहा है, किधर जा रही है साहित्य की धारा, कुछ खबर नहीं थी मुझे। इस बार कुछ कविताएं पढ़कर ही एक-एक कर कई सराहना करने वाले लोग करीब आते गए। तीव्रता के साथ मैंने अध्ययन शुरू किया। कलम थामते ही स्वत: स्फूर्तता के साथ सिर्फ कविता ही नहीं रची जाती थीं, बल्कि गद्य भी निकलने लगा था।
धीरे-धीरे महसूस हुआ कि लिखते रहने से कई तरह से मेरे सीने का भार हल्का होता जाता है। हां, विषादग्रस्तता की भी जो भाषा होती है, जिसे अब तक बेवजह ढोते रहने के बारे में सोचती रही थी, वही अब विभिन्न रंग, सुर और भंगिमा के साथ मुझे सुख और आराम प्रदान करने में जुट गई थी।… आत्ममग्नता के साथ लिखने में मैं जुट गई। पूजा-अर्चना की तरह, ध्यान की तरह आश्चर्यजनक थी यह निमग्नता। अभिभूत हो उठी। भीतर से समझ गई कि जीवन के जिस महान और श्रेष्ठï चिंतन को व्यक्त करना चाहती हूं, उसके करीब जाने की यह महज सीढ़ी ही है, और कुछ नहीं। इसीलिए लोगों की प्रशंसा या अपने सुखानुभव को लेकर संतुष्ट या गौरवांवित होने की कोई जरूरत नहीं है। मैं कहानी भी लिखने लगी। हर रविवार दो-तीन अखबारों में लगातार कविताएं छप रही थीं, साथ ही कहानियां भी छपने लगीं। कोई भेद-भाव किए बिना या पत्र-पत्रिका के स्तर को अहमियत दिए बिना रचना मांगने आए किसी भी व्यक्ति को मैंने निराश नहीं किया। तेजी से मेरी रचनाएं प्रकाशित होने लगीं। इस तरह कलम रखने की फुरसत मेरे पास नहीं रह गई। याद है कि दो महीने के भीतर मैंने ग्यारह कहानियां लिखीं। इसके साथ ही समानांतर रूप से दो पत्रिकाओं और एक पत्र में स्तंभ लिखने की व्यस्तता भी बनी रही। जो भी लिखती, मन लगाकर लिखती। हृदय खोलकर, प्राण उड़ेलकर लिखती। मगर विषादग्रस्तता? वह मानों कभी साथ नहीं छोड़ेगी। मेरे बिलकुल अपने, सिर पर छतरी की तरह छांव देने वाले पिताजी का देहांत हो गया। मेरे हाथ की मुट़ठी में हाथ रखकर चले गए वे।… तड़पती रही मैं… और निरंतर कलम की व्यस्तता ने मुझे महान अनुभव से सराबोर कर दिया। इन रचनाओं के जरिए ही मानों मैं श्मशान के भस्म के बीच से ले आई हूं पिता को हाथ थामकर…। एक वास्तविक जीवन की समस्त प्राप्ति और समृद्धि के साथ इस अनुभव की कोई तुलना नहीं हो सकती। घटती गई सीने के भीतर जमी हुई यातना… कलम चलती रही।
मैंने जीवन का पहला उपन्यास ‘अरुंधती’ लिखा। क्या यह उपन्यास ही था? खुद ही जानती हूं कि किस तरह खुद को ‘अरुंधती’ के किरदार के साथ उजागर किया है मैंने। उसी समय, 2002 में मेरी पहली पुस्तक ‘प्रस्तर कन्या’ (कथा संकलन) प्रकाशित हुई। एक दैनिक पत्र के साप्ताहिक परिशिष्टï में ‘अरुंधतीÓ के प्रकाशन के साथ ही पाठक समाज में आलोडऩ आ गया। पत्र, फोन के अलावा उपन्यास की नायिका को देखने के लिए लोग मेरे घर आने लगे। नायिका को एक नया जीवन प्रदान करने का प्रस्ताव देने वालों में हाई स्कूल के छात्र भी शामिल थे। फिर वह उपन्यास दैनिक सेंटिनल में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ। असमिया पाठकों की तरह हिंदी पाठकों ने भी उपन्यास को अपनाया। फिलहाल इस उपन्यास का अंगे्रजी अनुवाद हो रहा है और इस पर फिल्म बनाने का भी विचार है।
‘अरुंधतीÓ की लोकप्रियता देखकर एक और पत्र के संपादक ने नया उपन्यास लिखने के लिए मुझ पर दबाव डाला। इस तरह एड्स की पृठभूमि में मैंने द्वितीय उपन्यास ‘स्वप्न संभव’ की रचना की। मगर दो अध्याय छापने के बाद प्रकाशन रोक दिया गया। आश्चर्यजनक रूप से इसके पीछे था संपादक की तरफ से मुझे दिया गया अशोभनीय प्रस्ताव। मनुष्य का ऐसा निर्लज्ज रूप देखकर मैं स्तब्ध रह गई। किंकत्र्तव्यविमूढ़ हो गई। क्रोधित होने की जगह उदास हो गई और एक दिन विनम्रता के साथ मैंने अप्रकाशित पांडुलिपि वापस मांग ली। उसी दौरान, 2004 में ‘प्रस्तर कन्या’ को असम का प्रसिद्ध साहित्यिक पुरस्कार ‘मुनीन बरकटकी पुरस्कार’ प्रदान किया गया। इसके साथ ही ‘स्वप्न संभव’ को भी छापने के लिए प्रकाशक तैयार हो गए और वह ‘संध्या’ के नाम से प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास को आकाशवाणी, गुवाहाटी ने भी धारावाहिक रूप से प्रसारित किया। इसके चार संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और इस पर फिल्म बन रही है।
इसके बाद ठहर जाने का कोई सवाल ही नहीं था। कलम चल रही है। धीरे-धीरे मैं महसूस करने लगी कि कुछ चित्रण करते समय मैं असाधारण रूप से निर्भीक हो उठती हूं, सहज-सरल अथावा सीधे-सीधे लिख देती हूं मानव जीवन की रहस्यमयता के बारे में। एक परिपूर्ण परिवार की एक साधारण गृहिणी होकर भी लिखते समय कैसे इस तरह निर्भीक हो जाती हूं? मेरे अपने लिए यह एक चमत्कारिक अनुभव है। कोई दुविधा-संकोच नहीं, लज्जाबोध नहीं। मातृभाषा के निर्वाचित-उपयुक्त-सौजन्यमूलक शब्दों से वे वर्णन इतने जीवंत हो उठते हैं कि पाठक उनमें अपनी गोपनीयता ढूंढऩे लगते हैं। मैं समझ गई कि कोई भी ऐसे वर्णन को ऊपर-ऊपर से पढ़ नहीं सकता या उसकी अनदेखी नहीं कर सकता। मुक्त रचना और पोर्नोग्राफी के बीच की सीमा रेखा को भी अच्छी तरह पहचानती हूं। इसमें कुछ पाठक नाराज भी हुए हैं। वे मुझे शालीनता का पाठ पढ़ाने लगे और विनम्रता के साथ सिर झुकाए मैं सब कुछ सुनती रही। बहस नहीं करती, असंतुष्ट भी नहीं होती, सिर्फ सुनती रहती हूं। रोकती भी नहीं। मगर उस पाठ को ग्रहण नहीं कर पाती। ग्रहण कर भी नहीं सकती। मैं मनुष्य के बारे में लिखती हूं। मनुष्य में ही प्रकृति, ईश्वर, धर्म और त्रिलोक को ढूंढती हूं। मूलरूप से मनुष्य दो प्रकार के होते हैं- प्रेममय और दुर्बल। मुझे लगता है कि मनुष्य हमेशा प्रेम का आधार रहा है। प्रेम ही सबकुछ नियंत्रित करता है। जिसे व्यभिचार कहते हैं, जिसे हिंसा-द्वेष कहते हैं, वह है दुर्बल को खुद ही दमित न की जाने वाली रिपुजात प्रक्रिया। वैसी दुर्बल श्रेणी को पहले दया और फिर क्षमा का पात्र ही मानती हूं मैं। शायद इसीलिए समालोचक मेरी कहानी में जब विलेन को ढूंढते हैं, वैसे पात्र की कमजोरियों को भी मैं तर्क के साथ प्रस्तुत करती हूं। मैं खुद ही अपने साथ बार-बार बहस करती हूं और सशक्त तर्क के पक्ष में कलम चलाती हूं। किसी का पाठदान नहीं मानती। मानव जीवन के रहस्यमय खंडचित्रों के अंकन की प्रक्रिया से जुड़ती चली गई। बिलकुल स्वत:स्फूर्त रूप से वे सब बातें कलम से प्रवाहित होती हैं। श्मशान से उठकर आए पिता आजकल एक रोशनी बन गए हैं। स्वामी के चेहरे की तरफ देखती हूं, उत्साह और साहस पाती हूं। शायद लोगों की शालीनता की सीख मेरे कान में समा नहीं पाती, उसका वह अहम कारण हो सकते हैं।
मगर दो तरीके से इसके नतीजे सामने आए। एक वर्ग ने मेरी भर्त्‍सना की कि बेबाक लेखन से मैं बाजार में छा जाना चाहती हूं। दूसरी तरफ कुछ अवसर की खोज करने वाले पुरुष सामने आए। जिन्हें मैं ‘दुर्बल मनुष्य’ मानती हूं। बेहिचक वे लोग अपनी इच्छा मेरे सामने व्यक्त करने लगे, मगर सामने तो है पिता की रोशनी और स्वामी की सबल उपस्थिति। इसीलिए उन पुरुषों के आचरण को मैंने लेखन के कच्चे माल के रूप में ग्रहण किया। मेज के करीब बैठकर ही देखती रही आदमी के भीतर के आदमी को। भौतिकवादी जीवन की प्राप्ति के एकाकीपन से टूटे हुए पुरुषों को।… कलम के साथ रिश्ता गहरा होता गया। नहीं लिखने से सीने में जमने लगती है विषादग्रस्तता। सबके साथ ऐसा ही होता है क्या? इसके साथ-साथ एक अदृश्य प्रतिबद्धता भी खींचती रही मुझे। प्रत्येक कहानी के जरिए कोई संदेश देने की कोशिश करती हूं। मेहनत करती हूं। जुटी रहती हूं लगातार… जुटी रहती हूं। 2004 में दूरदर्शन धारावाहिक ‘गेटवे’ की कहानी लिखने का काम मुझे सौंपा गया। तथ्य बटोरने के लिए घूमते समय मेेरे विचारों की चकरी भी घूमने लगी। अपनी प्रेममय पृथ्वी के नेपथ्य में बर्बर घटनाओं ने मुझे अवाक कर दिया। मेरे कोमल कवित्व को मानों इस्पाती पोशाक पहना दी गई। इस तरह लेखन में यथार्थ बढ़ता गया। 2005 में पुस्तकाकार रूप में ‘अरुंधती’ का प्रकाशन हुआ, उसी वर्ष कविता संकलन ‘मणिकुंतलार कविताÓ भी प्रकाशित हुआ। वर्ष 2006 में असम की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर ‘बरदोवानी’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुआ। वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव की जन्मभूमि बरदोवा से संबंधित पृष्ठभूमि पर इस उपन्यास को लिखना मेरे लिए एक चुनौती थी। पिता व स्वामी के कर्मजीवन में होते रहे तबादलों के चलते मेरा जीवन नगर केंद्रित रहा है। ग्रामीण परिवेश को महसूस करना आसान काम नहीं था। पाठकों की सराहना से लगता है कि मैं इस कोशिश में सफल हुई हूं। इसके बाद समकालिता विषय पर ‘मुक्ति’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुआ। डायन प्रथा को केंद्र में रखकर मैंने ‘शामियाना’ नामक उपन्यास लिखा। इसी दौरान एक बाल उपन्यास ‘शांत पापूहंतर कथारे’ प्रकाशित हुआ। इसके आधार पर दूरदर्शन धारावाहिक का निर्माण हो रहा है।
एक मासिक पत्रिका में धारावाहिक उपन्यास ‘दस्तखत’ लिख रही हूं। असम के मोबाइल थियेटर की पृष्ठïभूमि पर एक उपन्यास ‘मई डेस्डिमोना होषो खोजो’ लिख रही हूं। यह भी प्रकाशित  होनेवाला है। ‘मां, मेकले साहब आस बाढैशाकर पिता’, ‘गेटवे’ उपन्यास भी प्रकाशित होने वाले हैं। एक और उपन्यास तथा एक बाल उपन्यास पर काम भी चल रहा है। संभवत: इसी वर्ष ये भी प्रकाशित हो जाएंगे।… ठिठकी नहीं हूं मैं। अगर बेबाक लेखन से समाज का नुकसान ही कर रही हूं तो क्यों मेरी रचनाओं के आधार पर दूरदर्शन-आकाशवाणी के कार्यक्रम बनाए जाते हैं? क्यों लेखकों की अग्रज पीढ़ी उम्मीद भरी नजरों से मुझे देखती है, जागरूक वर्ग गौर करता है और नए लेखक सराहना करते हैं?
जरूर ये सब संकेत करते हैं पिता द्वारा रोशन की गई राह की तरफ। इसीलिए मैं आगे बढ़ती हूं सांप्रतिक समय से कुछ आगे अधिक परिश्रम के साथ। गहरी एकाग्रता के साथ लिखती हूं मैं, हृदय खोलकर लिखती हूं- ईश्वर के साथ एकाकार होने की प्रार्थना की तरह…। 
                                                                                (अनुवाद : दिनकर कुमार, वरिष्ठ पत्रकार)

लड़का लमबाटा का : एन.एस. थापा

एन.एस. थापा

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मोर्चे पर लड़ते हुए हिंदुस्तानी सिपाहिओं की बहादुरी को नारायण सिंह थापा ने खूबसूरती से कैमरे में कैद किया। आज़ादी के बाद वह नव निर्मित फिल्म डिवीजन में कैमरामैन हो गए। उन्होंने ऊर्जा से लबरेज़ संवेदनशील फिल्मकारों की एक नयी पीढी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। कई महत्वपूर्ण वृत्तचित्रों का निर्माण करते हुए थापा फिल्म डिवीजन के चीफ प्रोड्यूसर बनकर सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने अपनी जीवन यात्रा को एक बेहद पठनीय किताब ब्वॉय फ्रॉम लमबाटा में रूपांतरित किया। इसे नैनीताल की संस्था पहाड़ ने प्रकाशित किया है। अनुवाद और पुन: प्रस्तुत किया है वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष उपाध्याय ने-

लमबाटा हमारे उस घर का नाम है जिसे मेरे दादा उत्तम सिंह ने पिथौरागढ़(उत्तराखंड) जिला मुख्यालय के निकट मढ़-मानले गांव में पहाड़ी के एकांत छोर में बसाया था। लमबाटा यानी लंबा रास्ता। जैसा कि नाम से ही जाहिर है, अलग-थलग पड़ी इस जगह से हर मुकाम दूर है। मुख्य गांव करीब एक किमी दूर, पश्चिम की ओर बसा दूसरा गांव दो किमी, स्कूल सात किमी, पोस्ट आफिस 12 किमी, अस्पताल 22 किमी और निकटतम रेलवे स्टेशन 120 किमी दूर।
मेरे परदादा देब सिंह का मढ़-मानले में बड़ा  परिवार था। पांच बेटे और कई बेटियां। आनी लंबी-चौड़ी जमीन को जोतने के लिए उन्हें कई हाथों की दरकार थी। उनके बेटों ने और जमीनें जोड़ी, लेकिन रेतीली और सूखी धरती की कोख से अच्छी फसल नहीं उपज पाती थी। घर पर मंडराने वाली विपदाओं का मुकाबला खेती से कर पाना बहुत कठिन था।               
समय के साथ-साथ बेटियां पराए घरों में ब्याह दी गईं और बेटों ने पूरा गांव बसा लिया। देब सिंह के दूसरे बेटे उत्तम सिंह ने गांव से पूरब की ओर एक किमी दूर जंगल का एक टुकड़ा साफ किया और उस पर अपना घर बनाया। चूंकि गांव से नए घर का रास्ता कुछ लंबा था, इसलिए लोग इसे लमबाटा कहने लगे। उत्तम सिंह का परिवार भी बड़ा था- चार बेटे और पांच बेटियां। रीत के मुताबिक सभी बेटियों की शादी नौ से दस वर्ष के बीच कर दी गई और बेटों ने फौज  की राह पकड़ी। आस्था और परंपराओं पर चलते हुए सबसे बड़ा बेटा गजै सिंह पारिवारिक जायदाद की रखवाली के लिए घर पर बना रहा।
पहले विश्व युद्ध तक कुमाऊं रेजीमेंट खड़ी नहीं हुई थी। लेकिन अनपढ़ होने के बावजूद अच्छे सैनिक के रूप में कुमाऊंनियों की धाक जम चुकी थी। उस वक्त अल्मोड़ा में तैनात 2/10 गुरखा राइफल्स ने उत्तम सिंह के दूसरे बेटे तेज सिंह को धामी उपनाम बदलकर भर्ती होने की इजाजत दे दी। वह तेज सिंह थापा के नाम से गुरखा रेजीमेंट में भर्ती हुए। उनके बाद लछमन सिंह बर्मा में काचिन हिल्स बटालियन और सबसे छोटे कल्याण सिंह 19वीं हैदराबाद रेजीमेंट में भर्ती हुए। उस जमाने में सेना के जवानों की पगार मामूली थी, लेकिन इससे पहाड़ में रहने वाले उनके परिवार के लिए कपड़े, नमक, बीज और थोड़ी-बहुत जमीन का इंतजाम हो जाता था। 1918 में जब लड़ाई खत्म हुई, हमारे गांव का कोई भी सैनिक घर वापस नहीं भेजा गया।
उस जमाने में स्त्री-पुरुष जनसंख्या अनुपात लगभग बराबर होने के बावजूद गजै सिंह को अपनी जीवनसंगिनी की ढूंढ-खोज खासी मशक्कत करनी पड़ी। उनकी खोज अंतत: अनाथ जसुली देवी पर जाकर खत्म हुई, जिसे उसके चाचा ने पाला-पोसा था। गजै सिंह ने एक ब्राह्मण को चंद सिक्के थमाए और बिना किसी ताम-झाम के बेहद सादगी के साथ घर बसा लिया। जुसली बेहद खयाल रखने वाली संगिनी साबित हुई। उनकी पहली संतान बेटी हुई। उस जमाने में सारे बच्चे मुश्किल से ही किशोर वय तक पहुंच पाते थे। बेटी के बाद गजै सिंह की अगली दो संतानें अल्पायु में ही चल बसीं। पांच साल के बाद 1924 या 25 के जाड़े की किसी रात जसुली ने बेटे को जन्म दिया। गजै सिंह तत्काल खुशी से बाहर की ओर दौड़े और लमबाटा का उत्तराधिकारी पैदा होने की उद्घोषणा करते हुए अंधेरे में बंदूक से फायर किया।
नौजवान पिता अगली सुबह जाकर ही नवजात बेटे का मुंह देख पाए। जो कुछ नजर आया, उससे उन्हें निराशा हुई। बच्चा बेहद कमजोर था और किसी सूखे हुए झींगे जैसा दिखाई पड़ता था। उन्हें लगा कि बच्चा शायद ही अगला दिन देख पाए। लेकिन बच्चे ने न सिर्फ अगला दिन, बल्कि भरपूर जिंदगी देखी और इस तरह इस दुनिया में मेरा आगाज हुआ।
पांच वर्ष की उम्र तक मां गाहे-बगाहे छह महीने के भाई गोपाल के साथ मुझे भी अपनी छाती का दूध पिलाती थी। एक शाम पिता एक पाठी (बच्चों द्वारा स्कूल ले जाई जाने वाली काली तख्ती) लेकर घर पहुंचे और उन्होंने घोषणा की, ‘नारायण, अब मां का दूध पीना बंद कर। कल से तू स्कूल जाएगा।’ मेरे पिता अनपढ़ थे और अपने दस्तख्त भर कर पाते थे। जब कभी उनके भाइयों में एक की चिट्ठी आती तो वह डाकिये से उसे पढ़कर सुनाने के लिए कहते। मैं अपने घर का पहला सदस्य था, जो किसी किस्म की औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने वाला था।
मुझे नजदीक से मढ़-मानले में ताजा खुले स्कूल की नई इमारत में ले जाया गया। उस इलाके के 12 गांवों से पहली बार स्कूल में प्रवेश लेने वाले सात बच्चों में मैं भी शामिल था। स्कूल में ब्लैकबोर्ड के अलावा किसी किस्म का फर्नीचार या चटाई जैसी कोई चीज नहीं थी। बच्चे ठंडी जमीन पर पालथी मार के बैठ जाते। दुबले-पतले जमुनादत्त उपाध्याय नाम के अध्यापक हमें पढ़ाते थे। उपाध्याय जी ने वर्णमाला के स्वरों और व्यंजनों से परिचय कराया और गिनती सिखाई।
कक्षा दो तक गांव में पढ़ाई करने के बाद मुझे अपर प्राइमरी के लिए गढ़ीगांव के स्कूल में भेजा गया। नए स्कूल तक पहुंचने के लिए गहरी घाटी में उतरकर सात किमी लंबा रास्ता पार करना पड़ता था। अब मेरे लिए हर दिन की शुरुआत 2000 मीटर नीचे नदी तक उतरने के साथ होती थी। मैं चट्टानों को फांदते हुए नदी पार करता और फिर हल्की चढ़ाई वाले रास्ते पर चलकर स्कूल पहुंचता। इस स्कूल में मैंने पहली बार घड़ी की टिक-टिक सुनी। ठीक 10 बजे घंटी बजते ही कक्षाएं शुरू हो जाती थीं। चार कक्षाओं को पढ़ाने के लिए स्कूल में दो अध्यापक थे।
गढ़ीगांव के स्कूल में दो साल पढऩे के बाद अपर प्राइमरी की अंतिम परीक्षा की तारीख और केंद्र की घोषणा हुई। इम्तहान के सिर्फ दो दिन बाकी थे और मैं बुखार से तप रहा था। संभवत: यह किसी वाइरस का संक्रमण रहा हो या फिर इम्तहान का डर! मैं बिस्तर पर लगभग अचेत पड़ा था। अगर इम्तहान छूट जाता तो मेरा पूरा साल बरबाद हो जाता। ऐसे में मेरे चाचा लछमन सिंह मदद को आगे आए और मुझे अपनी पीठ पर बिठाकर परीक्षा के केंद्र तक ले गए और वापस लाए। मुझे याद नहीं किस तरह मैंने इम्तहान दिया, लेकिन मैं पास हो गया।
अब मेरे लिए आगे पढ़ाई के रास्ते बंद थे। पिताजी की हैसियत मिडिल स्कूल के लिए तहसील मुख्यालय पिथौरागढ़ भेज पाने की नहीं थी। फीस, किताबें और रहने-खाने का खर्च सब मिलाकर बीस रुपये महीने का इंतजाम असंभव था।
मेरे चाचा हवलदार मेजर तेज सिंह, जो परिवार के अकेले कमाऊ सदस्य थे, 2/10 गुरखा राइफल्स से रिटायरमेंट की तैयारी के साथ घर पहुंच गए थे। अब लगभग तय था कि खेत जोतना, बाड़ डालना, लकड़ी काटना, पशुओं को चुगाना ओर खेतों से बंदरों को भगाना ही मेरा भविष्य बनने वाला था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
एक दिन दोपहर को मां ने बताया कि भगवान डाकिए की शक्ल में हमारे कष्टों को दूर करने आए हैं। डाकिया चाचा तेज सिंह के नाम एक पत्र लेकर पहुंचा था। वह पत्र उनकी रेजीमेंट की ओर से था, जिसमें उनके रिटायरमेंट स्थगित किए जाने की सूचना देते हुए उन्हें शिलांग स्थित ट्रेनिंग सेंटर में ड्यूटी ज्वॉइन करने को कहा गया था। तेज सिंह अब नायब सुबेदार बना दिए गए थे।
पिताजी ने इस खुशखबरी के एवज में बकरी की बलि चढ़ाई और पूरे गांव को उसका गोश्त बांटा। चाचा तेज सिंह ने अपनी पुरानी वर्दी फिर से पहनी और शिलांग के लिए रवाना हो गए। अब वह न सिर्फ वायसराय के कमीशन, बल्कि पूरे परिवार के रहने को एक बंगले के भी हकदार हो गए।
नवंबर, 1935 में चाचा ने पिताजी को पत्र लिखा कि वह नारायण सिंह को आगे की पढ़ाई के लिए उनके पास भेज दें। आगे की पढ़ाई के दरवाजे खुलने और नई जगह देखने के मौके पर मैं बहुुत खुश था, लेकिन अनजान जगह व अजनबियों के बीच पहुंच जाने का डर भी कम नहीं सता रहा था। पिताजी ने हिदायत दी, ‘पहाड़ में जन्म लेने वाले आदमी और मैदान में जन्म लेने वाले बैल की एक जैसी किस्मत होती है। एक को जिंदगी भर तेल पेरना पड़ता है तो दूसरा मरने तक पथरीली अनुपजाऊ जमीन में खटने को अभिशप्त है।’ लेकिन मेरी किस्मत में तो कुछ और ही बदा था।
शिलांग के आर्य समाज स्कूल में मुझे एडमीशन मिल गया। स्कूल के गेट पर संदेश के रूप में लिखी प्रार्थना की पंक्तियां मुझे बेहद पसंद थीं- तमसो मा ज्योतिर्गमय, मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाओ। प्रत्येक रविवार ऐसे छात्र, जो जातिविहीन हिंदू समजा में विश्वास रखते थे और वैदिक दर्शन सीखना चाहते थे, स्कूल पहुंचते थे। उस दिन जीवनदायिनी वायु को पवित्र करने के लिए वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ हवन किया जाता था। आर्य समाज के दर्शन से प्रभावित होकर मैंने अतिरिक्त विषय के रूप में संस्कृत पढऩा शुरू किया।
शिलांग में दो वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के बाद नायब सूबेदार तेज सिंह का तबादला उनकी बटालियन 2/10 गुरखा राइफल्स में हो गया, जो उस वक्त तत्कालीन भारत के पश्चिम छोर क्वेटा में तैनात थी। अपनी बीवी, भतीजे, नवजात बेटी और कुत्ते ब्लू के साथ वह भारत के एक छोर से चलकर दूसरे छोर में पहुंचे। उत्तर भारत के सात प्रांतों को पार करने वाली यह उनकी अब तक की सबसे बड़ी यात्रा थी। असम की हरीभरी राजधानी को पीछे छोड़कर हम बलूचिस्तान की सूखी मरुभूमि में रहने क्वेटा पहुंचे। रेलवे प्लेटफार्म पर लंबे पठान सूखे मेवे बेचते हुए दिखाई दिए। कल्पना कीजिए, बादाम फकत दो रुपये किलो!
क्वेटा के सनातन धर्म हाईस्कूल मेरा पहला स्कूल था। कैंट से आठ किमी दूर। कुछ महीने स्कूल जाने के बाद मैंने इसे छोड़ दिया। भीषण गर्मी और ठंड में इतनी दूर पैदल आना-जाना मेरे लिए भारी पडऩे लगा। मैंने रेजीमेंटल स्कूल में एडमीशन ले लिया। यह सेना द्वारा सैनिकों के बच्चों के लिए चलाया जाता था। यहां बच्चे मैट्रिक की परीक्षा स्थानीय केंद्र से दे सकते थे। अध्यापक पढ़े-लिखे वर्दीधारी थे।
सोलह वर्ष की उम्र में मैट्रिक पास करने के बाद मैंने अपने चाचा के पदचिह्नों पर चलने का इरादा किया। मैंने अपना उपनाम धामी से बदलकर थापा किया और  2/10 गुरखा राइफल्स में रंगरूट की हैसियत से भर्ती हो गया। इसके पीछे किसी के लिए लडऩे की तमन्ना नहीं बल्कि, कुमाऊं की मनीआर्डर अर्थव्यवस्था को टिकाए रखने की मजबूरी ज्यादा थी। मुझे टे्रनिंग के लिए शिलांग के निकट हैप्पी वैली स्थित 2/10 गुरखा राइफल्स के ट्रेनिंग सेंटर में भेज दिया गया।
ट्रेनिंग के दौरान एक मजेदार वाकया हुआ। रात में फौजी बैरकों की बत्तियां बुझा दिए जाने के बाद कंबल के भीतर टार्च की रोशनी में किताबें पढ़ा करता था। एक बार ड्यूटी अफसर शेल्टन डगलस रात को बैरकों को औचक निरीक्षण करने पहुंच गए। मेरे बिस्तर पर रोशनी कर झलक पाकर उन्होंने मेरा कंबल खींचकर फेंक दिया। मैं चाल्र्स डिकेन्स की ‘अ टेल ऑफ टू सिटीज’ पढ़ते हुए पकड़ा गया। उस वक्त मैं बुरी तरह डर गया और सोचने लगा कि अब क्वार्टर गार्ड की सजा मिलनी तय है। लेकिन उसे बड़े दिल वाले आफिसर ने न मुझे माफ कर दिया, बल्कि दूसरे ही दिन अंग्रेजी कविता की एक पुस्तक भी भेंट की। 
टे्रनिंग पूरी करने के बाद हमारा बैच शपथ लेकर मध्य-पूर्व में चल रहे युद्ध में हिस्सा लेने के लिए तैयार था। शपथ के ऐन पहले 2/10 गुरखा राफल्स के कमांडेंट कर्नल कैरुथर्स परेड का निरीक्षण करने पहुंचे। मेरे पास पहुंचकर वह रुक गए और कंपनी कमांडर से पूछने लगे, ‘यह लड़का कौन है? यह दूसरे गुरखा सैनिकों जैसा नहीं दिखता।’ कंपनी कमांडर ने जवाब दिया, ‘यह अलग तरह का रंगरूट पूर्व नायब सूबेदार तेज सिंह थापा का भतीजा है।’
कर्नल कंपनी कमांडर के कान में कुछ बुदबुदाया और फिर चला गया। परेड के बाद कंपनी कमांडर ने मुझे अपने आफिस में बुलाकर चाचा का पता पूछा और उन्हें फिर ड्यूटी पर लौटने का संदेश भेजने को कहा। शाम को कंपनी कमांडर मेजर सी.डब्ल्यू. कजिन्स हमारे प्लाटून की रॉककॉल में पहुंचे। राइफल शूटिंग में दूसरा स्थान हासिल करने के लिए उन्होंने मुझे बतौर ईनाम एक टार्च दी। उन्होंने कहा, ‘इस चूहे जैसे छोटे सिपाही ने राइफल शूटिंग में 130 में से 120 अंक लाकर प्लाटून का नाम ऊंचा किया है।’
उसी हफ्ते मुझे सूचना दी गई, ‘आपको मध्य-पूर्व युद्ध में नहीं भेजा जाएगा। इसकी जगह आप यहीं रहकर नए रंगरूटों के बीच अशिक्षा के खिलाफ लड़ाई लडेंगे।Ó इराक पहुंचने के बजाए मैं टीचर्स टे्रनिंग के लिए ईस्टर्न कमांड एजुकेशनल सेंटर रानीखेत पहुंच गया। यहां मुझे नए रंगरूटों को सिखाने-पढ़ाने के गुर सिखाए गए। हालांकि कोर्स महज तीन महीने में खत्म हो गया, लेकिन इसने मुझे जिंदगी भर के लिए सबक सिखाया।
मेरी रिपोर्ट में दर्ज हुआ, ‘हालांकि जवान कमउम्र है, लेकिन वह बेहद जिज्ञासु व आत्मविश्वास से भरापूरा है। वह शानदार शिक्षण क्षमता रखता है।’ इस रिपोर्ट की बदौलत मुझे एकसाथ दोहरा प्रोमोशन हासिल हुआ और मैं नायक के पद के साथ नॉन कमिशंड आफिसर बना दिया गया।
फरवरी, 1943 में मुझे अंग्रेजी भाषा की ट्रेनिंग के लिए आर्मी एजुकेशन युनिवर्सिटी स्कूल, पचमढ़ी भेजा गया। शांतिकाल में एडिनबर्ग युनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफसर रह चुके कैप्टन मैककॉर्मिक मेरे प्रशिक्षक थे। मैककॉर्मिक ने अंग्रेजी साहित्य में मेरी रुचि जगाई। पचमढ़ी से मैं बतौर प्रशिक्षित अंग्रेजी अध्यापक वापस लौटा। इस दौरान दौड़ और फुटबाल में अच्छे प्रदर्शन के लिए कुछ ट्राफियां भी मुझे हासिल हुईं। 1943 के मध्यांश तक युद्ध भारत के पूर्वी सीमा तक पहुंच चुका था। जापान की 15वीं सेना किसी भी क्षण हमले के लिए तैयार थी। पिछले धक्कों और नुकसान के बावजूद 14वीं सेना को जंगल युद्ध में प्रशिक्षित कर जापान को बर्मा में घुसने से रोकने के लिए दोबारा जंग में भेजा जा रहा था। 43 वर्षीय एडमिरल लॉर्ड लुई माउंटबेटन के नेतृत्व में एक नई दक्षिण-पूर्व एशिया कमांड का गठन किया गया। ब्रिटिश और अमेरिकी सशस्त्र सेनाओं को जहां पश्चिम मोर्चा पर मिली कामयाबी के लिए प्रिंट और विजुअल मीडिया में अच्छा प्रचार मिल रहा था, वहीं वर्मा सीमा पर तैनात 14वीं सेना ‘भूली-बिसरी सेना’ कही जाने लगी थी।
अपने इंफाल दौरे पर लॉर्ड माउंटबेटन ने सैनिकों को संबोधित किया, ‘जवानो, आप सोचते होंगे कि बर्मा फ्रंट भुला दिया गया है। आप गलत हो, ऐसा किसी ने नहीं सुना।’ उनकी टिप्पणी पर हंसी का फव्वारा फूट पड़ा। उन्हें पता था कि यहां भी लड़ाई अंग्रेजों के पक्ष में झुक रही है, लेकिन जोंकों से भरे बर्मा के जंगलों में लड़ रहे सैनिकों के लिए इसके व्यापाक प्रचार की जरूरत थी।
हालांकि बर्मा के मोर्च पर लडऩे वाले सैनिकों में 70 फीसदी भारतीय थे, लेकिन ज्यादातर लोग उनके बारे में नहीं जानते थे। ब्रिटिश और अमेरिकी युद्ध संवाददाता सिर्फ अंग्रेज सैनिकों के बारे में लिखते थे और भारतीय सैनिकों की उपेक्षा करते थे। 1943-44 में भारतीय सेना नींद से जागी और भारतीय सैन्य कर्मियों को कॉम्बैट कैमरामैन के बतौर बर्मा और इतावली मोर्चों पर लड़ रही भारतीय सेना के साथ भेजने की जरूरत महसूस की जाने लगी।
सेना में एक सैनिक के पास आदेश मानने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता। हालांकि मुझे एक शिक्षक की ट्रेनिंग दी गई थी, लेकिन जरूरत पडऩे पर सेना मुझसे ट्रक ड्राइवर या रसोइये का भी काम ले सकती थी। मेरे भीतर के शिक्षक को कलकत्ता के पब्लिक रिलेशंस स्कूल ऑफ सिनेमेटोग्राफी में रिपोर्ट करने का आदेश मिला ताकि मैं जंगी कैमरामैन का प्रशिक्षण प्राप्त कर सकूं।
नौजवान से दिखाई पडऩे वाले ब्रिटिश अधिकारियों ने मेरा इंटरव्यू लिया। उनमें से एक ने पूछा, ‘आप एक शिक्षक हैं तो फिर कैमरामैन क्यों बनना चाहते हैं?’ बिना सोचे-समझे मैंने जवाब दिया, ‘मेरे पास दूसरा विकल्प नहीं था। रेजीमेंट ने मुझे जंगी कैमरामैन की ट्रेनिंग लेने का आदेश दिया और मैं यहां पहुंच गया। मुझे नहीं पता मेरा काम क्या होगा।’
दूसरे आफिसर ने पूछा, ‘अब तक आप कितनी फोटोग्राफी कर चुके हैं?’ मुझे स्वीकार करना पड़ा, ‘फोटोग्राफी का मेरा कुल अनुभव बॉक्स कैमरे से फोटो उतारने भर का है।’ तीनों हंस पड़े। फिल्म यूनिट में सिनेमेटोग्राफी के चीफ इंस्ट्रक्टर कैप्टन ब्रायन लैंगले बोले, ‘यह लड़का ईमानदार है। चलिए इसे रख लेते हैं। मैं इस टीचर को तराशकर कैमरामैन बनाने की कोशिश करूंगा।’
कैप्टन लैंगले पर सैन्यकर्मियों को मिलिट्री कैमरामैन के रूप में प्रशिक्षित करने का जिम्मा था। औपचारिक साहित्य का निर्देशपुस्तिकाओं के अभाव में उन्होंने इस ‘कैं्रक हैडल कॉलेज’ में अपना खुद का टे्रनिंग मॉड्यूल तैयार किया था। वह अपने स्कूल को इस नाम से पुकारते थे क्योंकि यहां कैमरामैन को स्प्रिंग नियंत्रित कैमरे चलाने होते थे, जिन्हें प्रत्येक 45 फीट रोल के बाद हाथ से घुमाना पड़ता था। ये कैमरे हल्के थे और मोर्चे पर फिल्म बनाने के लिहाज से सुविधाजनक थे।
मेरी ट्रेनिंग इंटरव्यू संपन्न होने के चंद मिनट बाद से ही शुरू हो गई। सिनेमा के नए क्षेत्र में मुझे नई शब्दावली से रू-ब-रू होना पड़ा। क्लोज अप, मिड एवं लांग शॉट्स, फिल्टर, चेंजिंग बैग, एक्सपोजर मीटर, फोकस, कंपोजीशन, फिल्म डेवलपिंग आदि। जब मुझे कलकत्ता भेजा गया तो मैं एक शिक्षक था और रोमन हिंदुस्तानी ग्रामर के अलावा राइफल या मशीनगन से शूट करना व मारना जानता था। लेकिन अब मुझे किसी बंदूक के बजाय घुप्प अंधेरे में कैमरा फिल्मों को लोड-अनलोड करना पड़ता था। किसी इंस्टीट्यूट में कैमरामैन की टे्रनिंग में दो या तीन साल लगते हैं, लेकिन कलकत्ता में मैंने तीन महीने में ही काफी तजुर्बा हासिल कर लिया। अपने सैनिकों को लड़ते हुए कैसे शूट करें या कैसे उसे एक स्टोरी में रूपांतरित करें। एक जमाने में मशहूर न्यू थिएटर स्टूडियो के मालिक बी.एन. सरकार ने एक बार सलाह दी, ‘लड़ाई खत्म हो जाए तो आप मेरे साथ आकर काम कर सकते हैं।’
मुझे एक व्यावसायिक परीक्षा से गुजरना पड़ा और मैं एक जंगी कैमरामैन के अलावा वायसराय के कमीशन का हकदार भी बन गया। मुझे एक प्रेस कार्ड दिया गया जिस पर दक्षिण-पूर्व एशिया के सुप्रीम कमांडर लॉर्ड लुई माउंटबेटन के हस्ताक्षर थे। इस कोर्ड से मुझे लड़ाई के अग्रिम मोर्चों तक जाने और सूचनाएं इकट्ठा करने के असीमित अधिकार मिल गए। मैं हैरान था कि एक आदमी जो बंदूक से शूट करने के लिए प्रशिक्षित था, अब एक गैर-योद्ध बन कर लड़ाई में कैमरे से शूट करने जा रहा है। 
                                                           (जन संस्कृति मंच और युगमंच की स्मारिका से साभार)

एकाकी देवदारु: शेखर जोशी

विकास के नाम पर पेड़ों को काटा जाना आम बात है। कभी हमने सोचा कि वह पेड़ किसी का संगी-साथी और आत्मीय भी हो सकता है। वर्षों बाद कथाकार शेखर जोशी अपने गांव गए तो बचपन के संगी देवदारु को न देखकर उनके मन में ऐसी टीस उठी, मानों कोई आत्मीय बिछड़ गया हो-

हिमालय के आंगन का वन-प्रांतर! और उस सघन हरियाली के बीच खड़ा वह अकेला देवदारु! खूब सुंदर, छरहरा और सुदीर्घ!  सहस्रों लंबी-लंबी बांहें पसारे हुए। तीखी अंगुलियां और कलाइयों में काठ के कत्थई फूल पहने हुए। ऐसा था हमारा दारुवृक्ष- एकाकी देवदारु! हमारी भाषा के आत्मीय संबोधन में ‘एकलु द्यार!’
वृक्ष और भी कई थे। कोई नाटे, झब्बरदार। कोई घने, सुगठित और विस्तृत। कोई दीन-हीन मरभुखे, सूखे-ठूंठ से। बांज, फयांट, चीड़, बुरांश और पांगर के असंख्य पेड़। समस्त वनप्रांतर इस वनस्पति परिवार से भरा-पुरा रहता था- वर्ष-वर्ष भर, बारहों मास, छहों ऋतुओं में।
देवदारु के वृक्ष भी कम नहीं थे। समीप ही पूरा अरण्य ‘दारु-वणि’ के नाम से प्रख्यात था। हजारों-हजार पेड़ पलटन के सिपाहियों की मुद्रा में खड़े हुए। कभी ‘सावधान’ की मुद्रा में देवमूर्ति से शांत और स्थिर तो कभी हवा-वातास चलने पर सूंसाट-भूंभाट करते साक्षात् शिव के रूप में तांडवरत। लेकिन हमारे ‘एकाकी देवदारु’ की बात ही और थी। वह हमारा साथी था, हमारा मार्गदर्शक था। ‘दारुवणि’ जहां समाप्त हो जाती, वहां से प्राय: फर्लांग भर दूर, सड़क के मोड़ पर झाड़ी-झुरमुटों के बीच वह अकेला अवधूत-सा खड़ा रहता था। जैसे, कोई साधु एक टांग पर तपस्या में मग्न हो।
सुबह-सुबह पूरब में सूर्य भटकोट की पहाड़ी के पार आकाश में एक-दो हाथ ऊपर पहुंचते तो उसका प्रकाश पर्वत शिखरों के ऊपर-ऊपर सब ओर पहुंच जाता था। एकाकी दारु के शीर्ष में प्रात: का घाम केसर के टीके से अभिषेक कर देता। रात से ही पाटी में कालिख लगा, उसे घोंट-घाट, कमेट की दावात, कलम और बस्ता तैयार कर हम लोग सुबह झटपट कलेवा कर अपने प्राइमरी स्कूल के पंडितजी के डर से निकलते। गांव भर के बच्चे जुटने में थोड़ा समय लग ही जाता था और कभी-कभार किसी अनखने-लाड़ले के रोने-धाने, मान-मनौवल में ही किंचित विलम्ब हो जाता तो मन में धुकुर-पुकुर लग जाती कि अब पंडितजी अपनी बेंत चमकाएंगे। आजकल की तरह तब घर-घर में न रेडियो था, न घड़ी। पहाड़ की चोटी के कोने-कोने में घाम उतर आया तो सुबह होने की प्रतीति हो जाती थी। ऐसे क्षणों में स्कूल के रास्ते में हमारी भेंट होती थी ‘एकाकी दारु’ से। वही हमको बता देता था कि अब ‘हे प्रभो आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए’ प्रार्थना शुरू हो गई होगी। कि अब गोपाल सिंह की दुकान से हुक्के का आखिरी कश खींचकर मास्टर साहब कक्षा में आ गए होंगे।
‘एकाकी दारु’ के माथे पर केसर का नन्हा टीका देखकर हम निश्चिंत हो जाते थे कि अब ठीक समय पर प्रार्थना में पहुंच जाएंगे। यदि बालिश्त भर घाम की पीली पगड़ी बंध गई तो मन में धुकुर-पुकुर होने लगती थी और हम पैथल की घाटी के उतार में बेतहाश दौड़ लगा देते थे और यदि किसी दिन दुर्भाग्य से सफेद धूप का हाथ भर चौड़ा दुशाला एकाकी दारु के कंधे में लिपट जाता था तो हमारे पांव न स्कूल की ओर बढ़ पाते थे, न घर की ओर लौट पाते थे। किसी कारण घर से स्कूल की और प्रस्थान करते हुए हम मन ही मन ‘एकाकी दारु’ से मनौतियां मनाते कि वह केसर का टीका लगाए हमें मिले।
सांझ को स्कूल से लौटते समय चीड़ के ठीठों को ठोर मारते, हिसालू और किलमौड़े के जंगली फलों को बीनते-चखते, पेड़ों के खोखल में चिडिय़ों के घोंसलों को तलाशते, थके-मांदे ‘दारुवणि’ की चढ़ाई पार कर जब हम ‘एकाकी दारु’ की छाया में पहुंचते तो एक पड़ाव अनिवार्य हो जाता था। कोई-कोई साथी उसकी नीचे तक झुकी हुई बांहों में लेट कर झूलने लगता। कोई उसकी पत्तियों के ढेर पर फिसलने का आनंद लेता। सुबह शाम का ऐसा संगी था हमारा ‘एकाकी दारु’।
वर्षा बाद मैं उसी मार्ग से गांव लौट रहा था। जंगलात की बटिया अब मोटर सड़क बन गई है। परंतु जिस समय उस मोड़ पर सड़क को चौड़ा करने के लिए निर्माण विभाग वाले एकाकी दारु को काट रहे होंगे, रस्सियां लगा कर उसकी जड़-मूल को निकालने का षडय़ंत्र रच रहे होंगे, उस समय शायद किसी ने उन्हें यह न बताया होगा कि यह स्कूली बच्चों का साथी ‘एकाकी दारुÓ है, इसे मत काटो, इसे मत उखाड़ों, अपनी सड़क को चार हाथ आगे सरका लो। शायद सड़क बनवाने वाले उस साहब ने कभी बचपन में पेड़-पौधों से समय नहीं पूछा होगा, उनकी बांहों पर बैठकर झूलने का सुख नहीं लिया होगा और सुबह की धूप के उस केसरिया टीके, पीली पगड़ी और सफेद दुशाले की कल्पना भी नहीं की होगी।
अब वहां सिर्फ एक सुनसान मोड़ है और कुछ भी नहीं।

कोविलन : नक्षत्र हुआ अस्त

कोविलन

मलायलम के वरिष्ठ लेखक कोविलन का 2 जून को निधन हो गया। वह प्रयोगधर्मी रचनाकार थे। साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार (दो बार) आदि कई पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित किया गया। उनके अभावग्रस्त बचपन, जीवन संघर्षों और लेखक के तौर पर उनके विकास पर अधारित आलेख-


कोविलन का जन्म अछूत समझी जाने वाली ईजवा जाति में 9 जुलाई, 1923 को तत्कालीन कोचीन राज्य (वर्तमान में केरल) में कंडानिसरी के एक किसान परिवार में हुआ।
उसके दादाजी का नाम शंकु था। वह बटाई पर नारियल, सुपारी, काजू आदि की खेती करते थे। परिवार का लालन-पोषण बहुत अच्छे ढंग से हो रहा था। चेचक की महामारी में उनकी मृत्यु हो गई। उस समय कोविलन के पिता वट्टमपराम्बिल वेलप्पन की उम्र आठ साल थी। परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया। खेत मालिक को केवल पैसे से काम था। खेत में काम हो या न हो इससे उसे कोई मतलब नहीं था। पैसे नहीं मिलने पर उसने खेत वापस ले लिए। दादी मजदूरी कर परिवार की देखभाल करने लगी।
इन विषम परिस्थितियों में भी वेलप्पन स्कूल जाते रहे। स्कूल में सभी बच्चे दोपहर को भोजन करने के लिए जाते थे। वेलप्पन स्कूल में ही बैठे रहते थे। एक दिन गुरुजी ने पूछा कि तुम खाना खाने क्यों नहीं जाते? वेलप्पन ने कोई जवाब नहीं दिया। गुरुजी ने दोबारा पूछा। वेलप्पन को सार्वजनिक रूप से, यहां तक गुरुजी के सामने यह कहने में शर्म आई कि घर में खाने के लिए नहीं है। इसलिए मैं घर नहीं जाता। अगले दिन से उन्होंने स्कूल जाना ही छोड़ दिया।
वेलप्पन तेरह-चौदह साल की उम्र से मजदूरी करने लगे। वह बड़े हो गए तो उन्होंने छह-सात एकड़ जमीन बटाई पर ले ली। यह पहाड़ वाला इलाका था इसलिए जमीन सस्ते में मिल गई। उन्होंने चार-पांच एकड़ पर काजू के पौधे लगाए। उन दिनों कोई काजू खाना पसंद नहीं करता था इसलिए बहुत सस्ता बिकता था। काजू का तेल नाव की लकड़ी पर लगाने के काम आता था। इससे लकड़ी की मजबूती बढ़ जाती है। इसके लिए बड़ा बिजनेसमैन ही काजू खरीदता था इसलिए काजू की खेती से कोई विशेष कमाई नहीं हो पाती थी। जैसे-तैसे परिवार का गुजारा हो रहा था।
वेलप्पन पढ़ नहीं पाए थे, लेकिन पढऩे के प्रति उनकी ललक कम नहीं हुई। बड़े होने पर वह पौराणिक और धार्मिक किताबें रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, कंब रामायण आदि खरीदकर पढ़ते थे। वह रामायण के चयनित भाग रोज पढ़ा करते थे। कोविलन को अपने पास बिठा लेते और अपने साथ रामायण के प्रसंगों का पाठ करने के लिए कहते। दु:ख भरे भाग का ही वह अधिक चयन करते थे। जटायु प्रसंग पढ़ते समय वह रोते थे। रावण का अत्याचार वह सह नहीं पाते। सीता और मंदोदरी विलाप जैसे प्रसंग पढ़ते हुए वे भाव-विभोर हो जाते थे। जब वे रोते तो कोविलन भी रोता। उसे रोता देख, वे नाराज हो जाते। अन्य धार्मिक व पौराणिक ग्रंथों का भी नियमित पाठ करते थे। इसका प्रभाव कोविलन के चरित्र पर पड़ा। धीरे-धीरे उसका रुझान साहित्य की ओर होने लगा।
वेलप्पन ने तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुए कोविलन को पढऩे के लिए भेजा। उसने चौथी पास की। बाद में आर्थिक समस्या बढ़ जाने पर उसे स्कूल जाने से रोक दिया। गुरुजी और कोविलन के साथ के लड़कों ने कहा कि इसे आगे पढ़ाओ। फीस के लिए पैसे नहीं थे। कोविलन ने मोंटसरी स्कूल में दाखिला ले लिया। वहां फीस नहीं ली जाती थी। स्कूल में एक गुरुजी थे। उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी। वह अंग्रेजी प्रेम से पढ़ाते थे। उन्होंने कोविलन को कक्षा छह, सात और आठ में अंग्रेजी पढ़ाई। इस वजह से उसकी अंग्रेजी में बहुत अच्छी पकड़ हो गई। वेलप्पन हाई स्कूल करवाना चाहते थे। लेकिन फीस के लिए पैसे की समस्या फिर खड़ी हो गई। कोविलन ने साहित्यदीपिका संस्कृत कॉलेज, पावरट्टी में एडमीशन ले लिया क्योंकि यहां फीस कम लगती थी। यहां लेखक के रूप में उसकी प्रतिभा उजागर हुई।
प्राइमरी में पढ़ते समय कुंजय्यप्पन गुरुजी ने उसे प्रोत्साहित किया था। उन्होंने कुमारनाशान की कविताएं पढऩे के लिए दीं। काव्य कृति ‘लीला’ पढऩे के लिए दी। इसकी बातें कोविलन की समझ में नहीं आईं। काव्य कृति ‘नलिनी’ पढऩे को दी। इसकी कुछ बातें कोविलन की समझ में आईं।
वलियाक्किल कुमारन गुरुजी ने भी कोविलन को प्रोत्साहित किया। वे मलयालम पढ़ाते थे। वे कुमारनाशान की काव्य कृति ‘नलिनी’ शुद्ध उच्चारण के साथ पढ़ाते थे। उसका भाव स्पष्ट करते थे।
कोविलन ने कुछ कविताएं लिखीं। उन्हें सुधारने के लिए अध्यापकों को दीं। कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि वे प्रभावशाली नहीं थीं। एम.पी. शंकुण्णि नायर गुरुजी ने कहा कि तुम्हारी कविताओं में 120 पंक्तियां हैं। कोविलन की समझ में आया कि इनमें काव्यात्मकता का अभाव है। उसने यह विधा छोड़ दी।
के.पी. नारायण पिषारड़ी गुरुजी ने उसकी रचनाएं पढ़ कर सुझाव दिया कि अगर तुम्हें उपन्यास में दिलचस्पी है तो पहले महाभारत पढ़ो। इसका मतलब कोविलन की समझ में नहीं आया। उसके मन में विचार उठता कि महाभारत उपन्यास का नमूना कैसे हो सकता है? बड़े होने पर कोविलन की समझ में यह बात आई कि जीवन के सारे प्रसंगों और आदर्शों का वर्णन महाभारत में मिलता है। पिषारड़ी गुरुजी का उपदेश उसके लिए बहुत प्रेरक था।
कोविलन ने कुछ विश्व प्रसिद्ध उपन्यासों के अनुवाद पढ़े। दास्तयेवस्की के उपन्यास ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ तथा विक्तर ह्यूगो के उपन्यास ‘लेस मिसरेबिल’ के अनुवाद भी पढ़े। इन उपन्यासों का उसके मन में गहरा असर पड़ा। मानवीयता का महत्व उसकी समझ में आने लगा।
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में गांधीजी को जेल हो गई। कोविलन ने सोचा कि जब अंग्रेजों ने गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया है तो मैं कॉलेज क्यों जाऊं? उसने कॉलेज में ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए। सभी विद्यार्थी कक्षाओं से बाहर आ गए। सबने मिलकर रैली निकाली। प्रधानाचार्य ने कोविलन को कॉलेज से निकाल दिया। उसने पिताजी को यह बात नहीं बताई। प्रधानाचार्य ने इस संबंध में घर पत्र भेजा तो उन्हें इस बात का पता चला। उन्होंने डंडी से कोविलन की खूब पिटाई कर दी। वह रोया नहीं। चुपचाप मार सहता रहा।
वह रोज खाना खाकर सुबह-सुबह घर से निकल जाता और सारा दिन घूमता रहता। इस दौरान उसका एक नई दुनिया से सामना हुआ। उसने समाज की विषमताओं और विद्रूपताओं को नजदीक से देखा। उसने देखा कि कितनी गरीबी है, भीषण तंगियों में लोग जी रहे हैं, सार्वजनिक रास्तों में अछूत नहीं जा सकते। ऐसे रास्तों से गुजरने पर एक-दो बार सवर्ण जाति के लोग उसे मारने के लिए आए। उसने भागकर अपनी जान बचाई। जीवन की इन विषम परिस्थितियों को लेकर उन्होंने उपन्यास लिखा- ‘ताकन्र्ना हृदयंगल’। इस समय उनकी आयु 19 वर्ष थी।
मां के देहांत के बाद छोटी बहन घर की देखभाल कर रही थी। एक दिन कोविलन रात को घर आए। काफी देर हो गई। उन्हें खाने के लिए नहीं बुलाया गया। उन्हें जोर की भूख लगी थी। उन्होंने बहन से पूछा कि खाने के लिए क्यों नहीं बुलाया जा रहा है? बहन ने बताया कि खाने के लिए कुछ नहीं है। बाजरे की कंजी बना रही हूं। कोविलन ने पूछा कि क्या पिताजी ने भी बाजरे की कंजी खाई है? बहन ने ‘हां’ में जवाब दिया।
कोविलन ने अगले दिन सुबह घर से सोने का एक आभूषण चुरा लिया। उन्होंने उसे बाजार में बेच दिया। वह फौज में भर्ती होने के लिए चल दिए। वह सोचने लगे कि पिताजी कड़ी मेहनत करते हैं। इसके बाद भी उन्हें बाजरे की कंजी खानी पड़ती है। मैं बीस साल का जवान हूं। मुझे कुछ करना चाहिए। वह 1943 में रॉयल इंडियन नेवी में भर्ती हो गए।
द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। उनकी ट्रेनिंग वरसोवा, मुंबई हुई। ट्रेनिंग के बाद उनकी नियुक्ति एंटी सबमेरीन डिटेक्टर ऑपरेटर के पद पर हो गई। जहाज के कैप्टन गुरचरण सिंह गिल थे। उन्होंने एंग्लो इंडियन लड़की से शादी की थी। उस समय इस तरह के विवाह को बुरा माना जाता था। सामाजिक बहिष्कार किया जाता था। वह शादी के बाद अपने गांव पंजाब नहीं गए। वह मुंबई में ही बस गए। कैप्टन गुरचरण सिंह गिल कोविलन को बहुत प्यार करते थे। वह उन्हें बेटा कहकर बुलाते थे।
द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हो गया। उन दिनों कोविलन छुट्टी पर थे। छुट्टी से वापस आए। उन्हें यात्री जहाज पर भेज दिया गया। जहाज सिंगापुर पहुंचा। उसने हार्बर से थोड़ा पहले लंगर डाल दिया। जहाज में कहा गया कि जो बाहर जाना चाहता है, जा सकता है। कोविलन के साथ जहाज में बहुत से यात्री और काम करने वाले थे। कई यात्री ऊपर डेक पर गए। कुछ देर बाद वह वापस आ गए। कोविलन ने उनसे पूछा कि क्यों वापस आ गए? उन्होंने बताया कि यात्री नहीं जा सकते। कोविलन चाय पीने के लिए डेक पर चले गए। वहां उन्हें साथ काम करने वाला ब्रिटिश आपरेटर मिला। उन्होंने उसका निशान देखकर पूछा, ”हेलो चार्ली, आप कहां जा रहे हैं?”
”मैं आजादी के लिए जा रहा हूं।” साथी आपरेटर ने जवाब दिया।
उन्होंने चाय नहीं पी। उन्होंने लिबर्टी वाले कपड़े पहने और एप्लीकेशन लिखी- रिक्वेस्टिड लिबर्टी। एप्लीकेशन अपने अधिकारी को दे दी। उन्हें तुरंत बुलाया गया। आदेश हुआ, ”तुम नहीं जा सकते।”
कोविलन ने पूछा, ”मैं क्यों नहीं जा सकता?”
अधिकारी ने गुस्से में कहा, ”हू यू टू टॉक अबाउट रॉयल सेलर्स?”
कोविलन ने जवाब दिया, ”आई एम एन इंडियन सेलर।”
उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। तुरंत कोर्ट बैठी। उनसे पूछा गया,”तुम कौन हो?” उन्होंने जवाब दिया, ”मैं भारतीय यात्री हूं। ब्रिटिश जहाज में यात्री की तरह आया हूं। मेरे चरित्र के बारे में मेरे कमांडिंग आफिसर और साथियों से पूछो।” तब अधिकारी थोड़ा नरम पड़े। कोविलन को चौदह दिन की सजा हुई। रोज एक घंटे राइफल हाथों पर ऊपर उठाकर दौड़ लगाना।
वह जहाज के डेक पर आगे-पीछे राइफल उठाकर दौड़ लगाने लगे। वह भागते-भागते थक गए। उन्होंने सोचा कि यह तो मुझे मार डालेंगे। वह नीचे आए। अपने साथी से ब्लेड मांगा। और बाएं हाथ के अंगूठे के नीचे से हथेली काट दी। तौलिया बांध लिया। पूरा तौलिया खून से लथपथ हो गया। थोड़ी देर बाद आवाज लगी, ”नंबर-11, पनिशमेंट वाला फॉलन।”
कोविलन डेक पर चले गए। उनके हाथ में बड़ा झाड़ू दे दिया कि सफाई करो। उन्होंने दाएं हाथ में झाड़ू ले लिया। बायां हाथ पीछे कर लिया। कमांडिंग आफिसर ने कहा कि दोनों हाथ से काम करो। कोविलन ने बायां हाथ दिखा दिया। आफिसर ने देखा कि इसने तो बहुत हाथ काट लिया है। आफिसर ने उन्हें सिक बेग में भेज दिया। कोविलन का एक पंजाबी दोस्त था। उसने यह बात पूरे जहाज में फैला दी। कोविलन ने कहा कि देखो भई, मैं किट बैग में कुछ ढूंढ़ रहा था। ब्लेड से हाथ कट गया। वह दोस्त शरारात से मुस्कुराया, ”अच्छा, ऐसा है।” उसने बताया कि यदि डाक्टर लिखकर दे दे तो उसे सजा से छुटकारा मिल सकता है। कोविलन ने डाक्टर से लिखवा लिया। उन्हें सजा से छुटकारा मिल गया।
इस घटना के छह-सात दिन बाद उनका जहाज इस यात्री जहाज के बराबर में आकर लगा। उसने लंगर डाल लिया। कोविलन को ऑर्डर हुआ। वह अपने जहाज में आ गए। जहाज में कैप्टन, एक्जीक्यूटिव आफिसर आदि सभी बदल गए थे। नया कैप्टन लैफ्टिनेंट चोपड़ा था। वह साढ़े छह फिट लंबा गंभीर जवान था। वह दूसरे जहाज में गेस्ट बनकर गया। उसे सारी बात बता दी गई। कैप्टन चोपड़ा ने कोविलन से कहा, ”तुम इतना बदमाश हो। मैं तुम्हें ठीक करूंगा।”
जहाज में सब लेफ्टिनेंट चेपरफीड थे। कोविलन ने उनसे कहा,  ”वल्र्ड वार खत्म हो गया है। अब मुझे छुटकारा मिलना चाहिए।”
चेपरफीड ने पूछा, ”क्यों?”
कोविलन ने कहा, ”मैं पढऩा चाहता हूं।”
चेपरफीड ने रिलीज करने के लिए उन्हें मुंबई भेज दिया। नौसैनिक विद्रोह हुआ। वह वारसोवा में थे। वह रोज वारसोवा से बॉम्बे फोर्ट जाकर सारी जानकारी यूनिट को दिया करते। उनका बस यही काम था। नौसैनिक विद्रोह समाप्त हो गया। उन्हें रिलीज कर दिया गया।
घर आते समय कोविलन के पास थोड़ा पैसा था। उन्होंने सारा पैसा पिताजी को दे दिया। उनसे कहा, ”मैं अपना उपन्यास प्रकाशित कराना चाहता हूं। मुझे 250 रुपये दे दीजिए।” उन्होंने 250 रुपये दे दिए।
कोविलन ने अपने पैसों से उपन्यास प्रकाशित कराया। उन्होंने 100 प्रतियां लीं और बेचने के लिए जिला मुख्यालय त्रिचूर चल दिए। बस में उन्हें प्रसिद्ध कवि पुन्नकुन्नम्म दामोदरन मिले। उनसे बातचीत हुई।
दामोदरन ने पूछा, ”क्या तुम जोसफ मुण्डश्शेरी को जानते हो?”
कोविलन ने कहा, ”मैं नहीं जानता। मैंने केवल उनका नाम सुना है।”
दामोदरन ने सलाह दी, ”आपको उनसे मिलना चाहिए।”
कोविलन ने दो प्रतियां, एक उन्हें तथा दूसरी जोसफ मुण्डश्शेरी के लिए दीं। उन्होंने कोविलन को मुण्डश्शेरी का पता बता दिया।
उसी शाम कोविलन मुण्डश्शेरी से मिलने गए। उन्होंने पूछा कि क्या-क्या पढ़ा है? कोविलन ने बता दिया। उन्होंने कहा कि तुम्हें अभी और पढऩा चाहिए।
जोसफ मुण्डश्शेरी खुद कुछ नहीं लिखते थे। वह बोलकर लिखवाते थे। कोविलन उनके कॉपी राइटर हो गए। मुण्डश्शेरी ‘मंगलोदयम्’ पत्रिका निकालते थे। अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित विशेष सामग्री का मलयालम में अनुवाद कर ‘मंगलोदयम्’ में नियमित प्रकाशन किया जाता था। इस कॉलम के लिए अनुवाद भी कोविलन करते थे। मुण्डश्शेरी अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित विशेष सामग्री पर निशान लगाकर कोविलन को दे देते थे।
कोविलन को पंद्रह रुपये महीने मिलते थे। इनसे गुजारा नहीं हो पाता था। कई दिन भूखा रहना पड़ता। इससे वह कमजोर हो गए।
मुण्डश्शेरी के पास काम करने से कोविलन को फायदा यह हुआ कि उनकी वायकोम मुहम्मद बशीर, सी.जे. थामस आदि महत्वपूर्ण रचनाकारों से मुलाकात हुई। उन्हें साहित्य क्या है? कहानी कैसे लिखी जाती है? आदि के बारे में मूलभूत जानकारी मिली। उनका आत्मविश्वास बढ़ा। ‘मंगलोदयम्’ में उनकी कहानियां प्रकाशित हुईं। इन कहानियों का शिल्प नए ढंग का था।
कोविलन ने प्राइवेट परीक्षा देकर सैकेंडरी स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट (एस.एस.एल.सी.) की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। उन्होंने सोचा कि आगे पढऩा चाहिए। वह जोसफ मुण्डश्शेरी से छुट्टी लेकर घर आ गए।
कोविलन ने टीचर ट्रेनिंग कोर्स करने का निश्चय किया। उन्होंने एप्लीकेशन दे दी। उनका सलेक्शन हो गया। यह जून-जुलाई 1948 की बात है। स्कूल त्रिचूर के पास था। कोविलन ने स्कूल जाकर देखा। नोटिस बोर्ड पर उनका भी नाम लिखा था। उन्होंने पिताजी को बताया। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। वेल्लपन ने कहा कि जो चाहे करो, मेरे पास पैसा नहीं है। कोविलन ने गांव के आयुर्वेदिक चिकित्सक से 75 रुपये उधार लिए और त्रिचूर चले गए। वहां जाकर रहने, खाने-पीने का इंतजाम किया। स्कूल गए तो हैरान रह गए। उनका नाम लाल स्याही से कटा हुआ था। उन्होंने आफिस में जाकर इसका कारण पूछा। उन्हें बताया गया कि शिक्षा मंत्री ने आदेश दिया है कि जिनको पढ़ाने का अनुभव नहीं है, वह कोर्स नहीं कर सकते। कोविलन ने सोचा कि शिक्षा मंत्री का कोई भाई-बंध ट्रेनिंग जाना चाहता है। उसे सीट दिलाने के लिए ही उसका नाम काटा गया है। इसके अलावा कोई और कारण नहीं हो सकता।
कोविलन ने 75 रुपये उधार लिए हुए थे। उनके सामने समस्या खड़ी हो गई कि अब क्या करूं? हालांकि आयुर्वेदिक चिकित्सक उन्हें बहुत प्यार करते थे। उन्होंने पैसों के लिए नहीं कहा। कोविलन ने बाद में दो किश्तों में उनके पैसे लौटाए।
वह घर आकर एक छोटा उपन्यास ‘तरवाड़’ लिखने लगे। वेलप्पन की उम्र 70 साल थी। उनके पेट में दर्द रहता था। चैन्ने में उनका ऑप्रेशन करवाया था, लेकिन दर्द ठीक नहीं हुआ। वे लेटे हुए थे। कोविलन उपन्यास की फाइनल कॉपी लिख रहे थे।
वेल्लपन ने पूछा, ”क्या कर रहे हो?”
कोविलन ने जवाब दिया, ”उपन्यास लिख रहा हूं।”
उन्होंने अगला सवाल किया, ”तुम कैसे जिओगे? मुझे बताओ, कैसे जिओगे?”
इस सवाल का जवाब कोविलन के पास नहीं था। वह चुप रहे। उन्होंने पूरा उपन्यास नीचे फेंक दिया। घर के सामने छोटा-सा पहाड़ था। वह उसके ऊपर चले गए। एक पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। उन्होंने तय किया कि पिताजी बूढ़े हो गए हैं। बीमार रहते हैं। एक मिनट भी गवाएं बिना, उनकी सहायता करनी चाहिए।
1948 में कबिलाइयों ने भारत पर आक्रमण किया था। सेना में बड़ी संख्या में जवान भर्ती किए जा रहे थे। कोविलन ऐरनाकुलम् (कोच्ची) जाकर सेना में भर्ती हो गए। वह सिग्नल कोर में गए। ट्रेड टेस्ट हुआ। उनका रेडियो मैकेनिक की ट्रेनिंग के लिए सलेक्शन हो गया। करीब एक साल ट्रेनिंग हुई। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्हें लखनऊ भेज दिया गया। वहां एक किलोवाट का ट्रांसमीटर था। एक साल बहुत मेहनत की। सारा काम सीख लिया। इस दौरान साहित्य में कुछ नहीं पढ़ा और न ही लिखा। जो पढ़ा, केवल ट्रांसमीटर के बारे में।
लखनऊ से उन्हें ट्रांसमीटर मैकेनिक बनाकर मेरठ भेज दिया। यहां रहते हुए उन्होंने बहुत-सी लघु कहानियां लिखीं। फौजी जीवन से संबंधित सबसे अच्छी कहानियां इसी दौर में लिखीं। जोसफ मुण्डश्शेरी और सी.जे. थामस से पत्र-व्यवहार चलता रहा। सी.जे. थामस कहानियां छपवाने के लिए कई पत्रिकाएं भेजते थे। कोविलन का मूल नाम वट्टमपराम्बिल वेलप्पन अय्यप्पन है। वह अभी तक इसी नाम से लिख रहे थे। सी.जे. थामस ने कहा कि तुम्हारा नाम वी.वी. अय्यप्पन पारंपरिक है। कोई उपनाम रखो। अपनी कहानियां ‘मातृभूमि” के लिए भेजो। कोविलन एक दिन तक इस बारे में सोचते रहे। उन्होंने अपना यह नाम तय किया। कोवलन मलयालम के एक श्रेष्ठ उपन्यास चीलापाडीकर्म* का पात्र है। उन्हें कोवलन बोलने और सुनने में अच्छा नहीं लगा। उन्होंने इसमें थोड़ा परिवर्तन कर कोविलन रख लिया।
वह अपना काम पूरे ध्यान से करते थे। उनके कार्यकाल में कभी ट्रांसमिशन फेल नहीं हुआ। एक ट्रांसमीटर के खराब होने पर दूसरे को चालू कर उसे रिपेयर कर लेते थे। कई लोग उनसे जलते थे। उनकी चुगली करते थे। इससे उन्हें दु:ख होता था। उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान किया जाता था। इसके चलते उन्हें हवलदार देवदानम् को मारना पड़ा। वह उन्हें बिना मतलब के तंग करता था।
वहां अमेरिकन ट्रांसमीटर लगा था। आजादी से पहले अंग्रेज इसे चलाते थे। एक-दो साल पहले ही भारतीयों को काम सिखाया गया था। वह हवलदार पहले बैच का था, लेकिन काम नहीं जानता था।
कोविलन ने दो-तीन बार हवलदार मेजर से उसकी शिकायत की, ”यदि यह मुझे तंग करेगा तो मैं इसे मारूंगा।”
हवलदार मेजर ने कहा, ”चाहे तुम कुछ भी करो। लेकिन ध्यान रखना कि कोई गवाह न हो। आगे मैं देख लूंगा।”
कोविलन ने हवलदार को ऐसी जगह और ऐसे समय मारा, जब वहां कोई नहीं था। उसने कोविलन की शिकायत कर दी।
हवलदार मेजर ने पूछा, ”मारते हुए किसी ने देखा? कोई गवाह है?”
हवलदार ने कहा, ”नहीं।”
हवलदार मेजर ने जवाब दिया, ”तब मैं कुछ नहीं कर सकता।”
एक दिन कोविलन कपड़े लेने धोबी घाट गए। हवलदार ने देख लिया। उसने कमांडिंग आफिसर से शिकायत कर दी। वह वहां नया-नया आया था और कोविलन के बारे में कुछ नहीं जानता था। असल में धोबी घाट में फौजियों को जाने की मनाही थी। लेकिन सभी फौजी कपड़े लेने के लिए अकसर जाते रहते थे। इसलिए कोविलन भी चले गए। हवलदार को बदला लेने का मौका मिल गया। कमांडिंग आफिसर ने कोविलन को चार्जशीट दे दी। उन्हें सजा मिली।
लखनऊ में कोविलन की कंपनी को पता चला कि उन्हें तंग किया जा रहा है तो उन्हें वापस बुला लिया। किसी ने कोई पूछताछ नहीं की। थोड़े दिन बाद उन्हें रांची भेज दिया गया। वहां वह क्लास-टू मैकेनिक बन गए। वहां ट्रेनिंग करने के बाद उन्हें हेड क्वार्टर आर्मड डिविजन सिग्नल रेजीमेंट में झांसी भेज दिया।
झांसी में मैंटिनेंस सेक्शन में उनकी पोस्टिंग हुई। वह बालीवाल खेलते थे। खेलते हुए उनके पैर में फै्रक्चर हो गया। प्लास्टर हुआ। उन्हें तीन सप्ताह के लिए बैरक में भेज दिया गया। वह हर समय चारपाई पर लेटे रहते। उन्होंने बैरक की लाइफ को अच्छी तरह से देखा। उन्होंने अनुभव किया कि कोई भी व्यक्ति संपूर्ण नहीं है। कुछ-न-कुछ माइनस यानी कोई-न-कोई कमी होती है। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने एक साल के अंदर ‘ए माइनस बी’ उपन्यास लिखा।
कोविलन को पैर ठीक होने पर सैकेंड फील्ड आर्टिलरी सिग्नल सेक्शन में भेज दिया गया। वहां रहते हुए उन्हें फौजी अधिकारियों के पारिवारिक जीवन को देखने-समझने का मौका मिला। बहुत-सी त्रासद घटनाएं देखीं। जैसे- उनके साथ बलभद्र प्रसाद काम करता था। वह ईमानदार था। गाड़ी में पेट्रोल भरते वक्त वह धांधली नहीं करता था। आर्टिलरी के लोग पेट्रोल देते समय धांधली करते थे। गलत वाउचर देने के लिए वे बलभद्र प्रसाद को मजबूर करते थे। जाली वाउचरों पर दस्तखत न करने के कारण उन्होंने उसको बहुत मारा-पीटा। बाद में बलभद्र प्रसाद पागल हो गया। आखिर मेडिकल तौर पर अनफिट कहकर उसको फौज से वापस भेज दिया। इन सबके आधार पर उन्होंने ‘एषमेडांगल’ (फौजी पत्नियां) उपन्यास लिखा।
कोविलन का अभी तक का अधिकांश लेखन फौजी जीवन के अनुभवों पर आधारित था। पत्रिकाओं के पत्र वाले स्तंभ में पाठक शिकायत करने लगे कि यह कौन है, जो फौजी-फौजी के बारे में लिखता है। कैसी भाषा लिखता है कि इसमें हिंदी, उर्दू, पंजाबी, अंग्रेजी आदि भाषाओं के शब्द भी इस्तेमाल करता है। कोविलन ने तय किया कि अब फौजी जीवन के बारे में कुछ नहीं लिखूंगा।
सन् 1962 में चीन का आक्रमण हुआ। उस समय कोविलन सेवनटिन माउंटेन डिवीजन की 64वीं ब्रिगेड में थे। उनको भूटान बॉर्डर पर भेजा गया। सिक्किम हिमालय में वह चार साल रहे। वहां कंचनजंगा को नजदीक से देखा। उन्होंने बचपन में पुराणों का अध्ययन किया था। महाभारत और रामायण के बाद कुमारसंभव को भी पढ़ा था। वहां हिमालय के महत्व का वर्णन मिलता है। उस समय उन्हें ये बातें काल्पनिक और बेबुनियाद लगती थीं। कंचनजंगा की पर्वत शृंखलाएं देखीं तो उनका दृष्टिïकोण बदल गया। पुराणों का मोहक प्रकृति वर्णन सही प्रतीत हुआ। कंचनजंगा के सौंदर्य को देखकर वह विस्मय से अभिभूत हो गए। स्नान के बाद आती पार्वती का रूप आंखों के सामने आया तो उन्हें अपनी बेटी की याद आई। बाद में उन्हें गंगटोक-नाथुला जाने का अवसर मिला। उधर के जो अनुभव हुए उन्हें लेकर उन्होंने बाद में दो उपन्यास ‘ताषवराकल’ (घाटियां) और ‘हिमालयम्’ लिखे और फौजी अनुभवों पर न लिखने की उनकी प्रतिज्ञा भंग हो गई।
कोविलन एक साल तक आई.आई.टी. कानपुर परिसर में एन.सी.सी. के इंस्ट्रक्टर रहे। वहां ‘ताषवराकल’ का पहला ड्राफ्ट लिखा। वहां से वह सेवानिवृत हुए। इसके लिए उन्हें सिग्नल ट्रेनिंग सेंटर भेजा गया। 1 जून, 1968 को वह घर आ गए। घर आकर ‘ताषवराकल’ की प्रेस कॉपी बनाई।
घर आने के बाद उन्होंने ग्रामीण जीवन पर आधारित उपन्यास ‘थोट्टंगल’ लिखा। इस उपन्यास के लिए उन्हें 1972 में केरल साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। बाद में ‘हिमालयम्’ उपन्यास लिखा।
देश में इमरजेंसी लगी। उन्हें एक बड़े कवि ने बताया कि बचकर रहना, हमारे और तुम्हारे पीछे भी पुलिस लगी है।
आई.आई.टी. कानपुर में एन.सी.सी. इंस्ट्रक्टर के रूप में काम करते हुए जो अनुभव हुए थे, उनके आधार पर ‘भरतन’ उपन्यास लिखा। इसका नायक भरतन एक ऐतिहासिक रूपक है, जो स्वातंत्र्योत्तर भारत के सामाजिक, राजनीतिक यथार्थ का चित्रण करता है। यह उपन्यास आपातकाल के दौरान 1976 में प्रकाशित हुआ।
कोविलन के पेट में दर्द हुआ। इसके लिए उन्हें आपे्रशन कराना पड़ा। इन अनुभवों को लेकर उन्होंने ‘जनमंथरंगल’ उपन्यास लिखा। इनके अलावा उन्होंने बहुत-सी कहानियां और उपन्यास लिखे। कोविलन प्रयोगधर्मी लेखक हैं। उन्होंने किसी मॉडल का अनुकरण नहीं किया। चाहे वह दूसरों द्वारा स्थापित हो या अपने द्वारा। इस रचनात्मक अनुशासन के कारण उनका लेखन अद्वितीय है।
उनकी 26 से अधिक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें दस कहानी संग्रह, बारह उपन्यास, एक नाटक और तीन विविध लेखन से संबंधित कृतियां शामिल हैं। उनके उपन्यास ‘तोट्टंगल’ पर आधारित धारावाहिक केरल दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया। कुछ कहानियां भी छोटे परदे के लिए रूपांतरित की गईं।
कोविलन का कहना था कि जीवन में जो कटु अनुभव हुए, उनसे मन थका नहीं। मुसीबतों का मुकाबला करना था। मेरे जीवन को उन कष्टदायक अनुभवों ने बर्बाद नहीं किया। बाद में मैंने उन पर बहुत सोच-विचार किया। वे मेरे लिए मार्गदर्शक बन गए। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढऩे के लिए इससे ही मुझे प्रेरणा मिली।

मलयालम के वरिष्ठ लेखक कोविलन का निधन

दिल्ली : मलयालम के वरिष्ठ लेखक कोविलन का बुधवार सुबह त्रिचुर के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 87 वर्ष के थे। वह सांस संबंधी बीमारी से पीडि़त थे। इलाज के लिए उन्हें एक सप्ताह पहले अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
9 जुलाई, 1923 को जन्में कोविलन का असली नाम वीवी अय्यप्पन है।  वह प्रयोगधर्मी रचनाकार माने जाते हैं। उनका मलायलम कथा साहित्य में विशिष्ठ स्थान हैं। साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें कई बार पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित किया गया। इनमें साहित्य अकादेमी पुरस्कार, केरल साहित्य अकादेमी पुरस्कार (दो बार), बशीर पुरस्कार, केरल साहित्य परिषद पुरस्कार आदि प्रमुख हैं। उन्हें केरल साहित्य फेलोशिप से भी सम्मानित किया गया था।