Archive for: May 2010

जोसेफ मेकवान को मत भूलिए

जोसेफ मेकवान

गुजराती के महत्वपूर्ण कथाकार जोसेफ मेकवान को उनके उपन्यास आंगलियात के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल चुका है। उनसे करीब तीन साल पहले परिचय हुआ था। अकसर फोन पर लंबी बातचीत होती, लेकिन मिलना नहीं हुआ। दो-तीन दिन पहले फोन किया तो दुखद समाचार मिला कि उनका 28 मार्च को देहांत हो गया है। इससे भी ज्यादा दुख इस बात का हुआ कि मीडिया में इस बारे में कोई खबर नहीं छपी। एक महत्वपूर्ण रचनाकार के संबंध में इस तरह की उपेक्षा अफसोसजनक है।
श्रद्धांजलि स्वरूप उनके बारे में आलेख-

जोसेफ मेकवान का जन्म 9 अक्तूबर, 1935 को खेड़ा जिले की आणंद तहसील के गांव त्रणोल में हुआ। उसके पिता डाहयाभाई रोमन कैथालिक चर्च के मिशनरी केटेकिस्ट (अध्यापक) एवं धर्म प्रचारक थे।
डाहयाभाई खाते-पीते, समृद्ध परिवार के वारिस थे। 26 बीघा जमीन थी। छह दुधारू भैंसें थीं। जोसेफ की दादी का नाम धन्नी मां (धनवाली) था। घर-खेत के पूरे कामकाज पर उनका अधिकार था। कहा जाता था कि धन्नी डोसी (बुढिय़ा) के टोकरी भर गहने हैं। वह छोटे बेटे से बार-बार बहियां लिखवातीं और लेनदारों से सूद वसूलने खुद दौड़-धूप करती थीं।
डाहयाभाई नौंवी तक पढ़े थे। उन्होंने बाइबिल की थीम पर ‘डेविड और गोलियाथ’, ‘सयाना राजा साऊल’, ‘महान मोजेज’, ‘जोसेफ एवं उसके भाई’ तथा ‘सच्चा दोस्त’, ‘धन्य वह जो मथ्था (सिर) दे दे’ और ‘अब जागो’ सामाजिक नाटक लिखे थे। वह निर्देशन और अभिनय भी करते थे। गुजराती के विख्यात रंगकर्मी एवं अभिनेता चीमन मारवाड़ी से उनकी दोस्ती थी।
डाहयाभाई पहनावे के शौकीन थे। रंगीन मिजाज और अय्याश किस्म के थे। शास्त्रीय संगीत के अनुरागी थे। खूब गाते थे। उनके छह विवाह हुए। बाल विवाह की स्त्री पसंद न आने पर उससे गौना ही नहीं किया। नाता तोड़ दिया। दूसरी शादी की। वह निपट गंवारू निकली। तीसरा विवाह गंगा से हुआ। सुहागरात को वह घुंघट तान कर उलटे मुंह बैठ गई। पूछने पर पता चला कि उनसे पहले उनके ममेरे भाई की मंगनी हुई थी। मायके वालों ने हामी कर दी थी। बाद में उनसे मंगनी हो गई। खाता-पीता घर देखकर मायके वालों ने पहली मंगनी नकार दी। दूसरी कबूल कर ली। गंगा के मन में यही मलाल था।
डाहयाभाई ने पूछा, ”क्या तुम्हें यह घर पसंद नहीं है?”
गंगा ने कहा, ”मैंने उनको बैन दिया था। चाहे वे गरीब रहे। मेरा मन नहीं मानता।”
यह सुनकर वह बाहर निकल गए। दूसरे दिन भाई के साथ गंगा को उसके मायके सादर पहुंचा दिया। समाज का दंड भुगत लिया। एक ही महीने में गंगा का पुनर्विवाह ममेरे भाई के साथ करा दिया।
चौथे विवाह में उनसे धोखा किया गया। तब तक वे बाइस साल के हो चुके थे। पांचवी शादी जोसेफ  की मां हीरी बहन से हुई। इन दोनों का गृहस्थ जीवन नौ साल चला।
1938 में हीरी बहन को टी.बी. हो गई। उस जमाने में यह असाध्य रोग था। इसलिए डाहयाभाई ने मान लिया कि अब यह बचने वाली नहीं है। उनका पत्नी की ओर से दिल-दिमाग उचट गया। हीरी बहन करीब सात माह तक अस्पताल में रहीं। डाहयाभाई उस दौरान गांव खंभोलज में मिशनरी महकमे में तैनात थे। उसी गांव की एक तलाकशुदा औरत दिवाली बहन से उनकी आंखें लड़ गईं। वह बहुत खूबसूरत थी। जब हीरी बहन वापस आईं, तब तक बात बहुत आगे बढ़ चुकी थी। वह सब जान चुकी थीं। एक दिन कुंए पर जाकर दिवाली बहन से मिलीं। उससे गुहार लगाई कि अब जीने का मन नहीं रहा है। मैं तो मर जाऊंगी। ये अवश्य तेरे साथ विवाह कर लेंगे। मेरे दो बेटे हैं। इन्हें प्यार से पालने-पोसने का वचन दे दो तो तुम्हारा सौभाग्य अमर रहे, ऐसा आशीष देती जाऊंगी। दिवाली बहन ने कोई जवाब नहीं दिया और मुंह चढ़ाकर चली गई।
चौथे दिन रविवार था। खंभोलज से ओड आठ मील की दूरी पर था। डाहयाभाई के छोटे भाई सोमभाई भाभी को लेने बैलगाड़ी लेकर आने वाले थे। लेकिन उन्होंने पति के साथ पैदल चलने का आग्रह किया। वह पति से सच्ची बात जानना चाहती थीं।
जोसेफ और उसका पांच साल बड़ा भाई मनु बाते करते, खेलते थोड़ा आगे चल रहे थे। हीरी का स्वर पति के साथ उलझ रहा था। मनु बार-बार पीछे मुड़कर देख लेता। वह कुछ-कुछ समझता था। इसलिए चिंता में था।
अचानक हीरी बहन के कंठ से करुण चीख निकली। मुड़कर देखते ही जोसेफ और मनु सहम गए। हीरी बहन नीचे पड़ी थी और डाहयाभाई उसे छाते से बेरहमी से पीट रहे थे। उन पर मानों शैतान सवार हो गया था। हीरी बहन के लिए यह अनेपक्षित था। वह बीच-बचाव का कोई प्रयास नहीं कर रही थीं। डर के मारे जोसेफ का पेशाब निकल गया। वह जोर-जोर से चीख-पुकार कर रोने लगा। मनु से नहीं रहा गया। वह झपटा और पिता की कोहनी पर दांत गड़ा दिए। उनके हाथ से छाता छूट गया। वे कोहनी छुड़ाने का प्रयास करने लगे। लेकिन छुड़वा नहीं पाए। उनका दूसरा हाथ मारने के लिए उठा भी, लेकिन शर्मिंदगी के कारण ठिठक गए। आखिर खून की उल्टी करती हीरी बहन ने लडख़ड़ाते स्वर में कहा, ”छोड़ दे बेटे! ये तो हमें मार डालने के लिए पैदा हुए हैं।”
मां के स्वर ने मनु को पिघला दिया। डाहयाभाई का झटका और मनु का जबड़ा खोलना एक साथ हुआ। इससे लगे धक्के से वह झड़बेरी की झाड़ी में जा फंसा। कांटों से उसकी छाती और पीठ छलनी हो गई। वह ज्यों-ज्यों कंटीली झाडिय़ों से अपने को छुड़ाने का प्रयास करता, त्यों-त्यों और अधिक फंसता जाता।
इस अशुभ घटना ने जोसेफ के बाल सुलभ मन को मार दिया- पिता मेरे लिए मर गया। गोदी में बिठाकर निवाले खिलाते, कंधे पर बिठाकर मौज कराते, बड़े चाव से नहलाते और कपड़े पहनाते, रात को कहानियां सुनाते, लोरियां गाकर सुलाते पिता की छवि धूमिल हो गई।
बैलगाड़ी लेकर आते सोमभाई ने जोसेफ की आवाज सुन ली। वह बैलगाड़ी को छोड़कर उस ओर दौड़ पड़े। करीब आकर उन्होंने यह दृश्य देखा तो मानों उन्हें काठ मार गया। वह बड़े भाई का बहुत आदर करते थे। भाभी को मां की तरह चाहते थे। वह कुछ नहीं बोले, तिरस्कृत नजरों से भाई को घूरते रहे। डाहयाभाई छोटे भाई की आंखों से आंखें नहीं मिला सके और मुंह मोड़कर वापस चले गए।
सोमभाई ने पहले मनु को कांटों से मुक्त कराया। फिर भाभी को उठाकर गाड़ी पर रखे गुदड़ पर लिटा दिया। जोसेफ को गोद में लिया और बैलगाड़ी चला दी।
उसी शाम धन्नी मां ने डाहयाभाई को बुलावा भेजा। शाम के धुंधलके में वे आए। धन्नी मां औसरे में बैठी थीं। डाहयाभाई देहरी पर पैर रख ही रहे थे कि वह चिल्लाईं, ”मेरे घर की देहरी पर पैर रखकर उसे छूत मत लगा। कान खोलकर सुन ले। आज से तू मेरे लिए मर गया। यदि मैं मर भी जाऊं तो मेरे मुर्दा शरीर पर मिट्टी डालने भी मत आना। मेरी अवगति होगी। मुझे मुंह मत दिखा। बस लौट जा।” वह अंदर चली गईं।
डाहयाभाई का चेहरा उतरा हुआ था। कोहनी पर पट्टी बंधी थी। पहनावा सादा था। पैर में जूते तक नहीं थे। दोपहर को उन्होंने शायद खाना नहीं खाया था। जब वह जाने लगे तो पास वाले दूसरे घर के किवाड़ की ओट में खड़ी जोसेफ की छोटी चाची जवेरबा मनौवल करने लगी, ”जेठजी, बिना खाये-पीये मत जाइए। मैंने खिचड़ी और गर्म दूध रखा है। थोड़ा खाते जाइए।”
एक पल के लिए वह ठिठके फिर चले गए। इस हादसे के बाद से हीरी बहन की जीने की इच्छा नहीं रही। लाख मनाने पर भी वह दूध-घी आदि पौष्टिक आहार नहीं लेतीं। वह बार-बार देवरानी जवेरबा से चिरौरी करतीं कि मनु को भी गोद ले ले। चाचा-चाची निसंतान थे। दोनों बच्चों को बहुत प्यार करते थे। दूध, दही, घी, मक्खन से बच्चे पुष्ट हों इसलिए ज्यादातर वे गांव में दादी के साथ ही रहते थे।
उस हादसे को दो महीने बीत गए थे। सितंबर का महीना था। हीरी बहन के चेहरे पर अजीब-सी दीप्ति थी। सास, देवरानी और ननद, सभी गहरी चिंता में पड़ गईं। देवर दु:खी थे। पर हीरी बहन खुश थीं। उन्होंने साग्रह देवरानी और ननद की सहायता से स्नान किया। नई साड़ी पहनी। लंबे बालों में वेणी गुंथवाई। देवरानी से हलवा बनवाया। अपने हाथों से दोनों बेटों को खिलाया, खुद भी खाया। फिर जोसेफ को आदेश दिया कि अब नाटक खेलो। दिसंबर में क्रिसमस-नाताल की रात को पिता द्वारा लिखे नाटक ‘विलहेम टेईल’ को बच्चे खेलते थे। विलहेम का बेटा वॉल्टेर जोसेफ बना था। उसे नाटक के कई संवाद याद थे। मां को खुश करने के लिए वह कई बार यह नाटक खेल चुका था। उस रात भी उसने यही किया। बूट, मौजे, कोट, पतलून, फैल्टकैप से मनु ने उसे सजाया। नाटक शुरू हुआ। गेस्लर नाम का अधिकारी विलहेम की तीरंदाजी को परखने के लिए उसके बेटे वॉल्टेर के सिर पर सफरजन (सेब) रखकर उसे बींधने का आदेश देता है। विलहेम पशोपेश में पड़ जाता है। वॉल्टेर कहता है, ”आप बिना किसी डर और चिंता के तीर चलाइये पिताजी। मैं तिलभर हिलूंगा नहीं। निशाना लगेगा ही। आपका लक्ष्य कभी निष्फल नहीं जाता।”
इस संवाद को सुनते ही हीरी बहन की ‘हायÓ निकल गई। सांसों की छूत के डर से वह कभी बच्चों को पास फटकने भी नहीं देती थीं, लेकिन जोसेफ को खींचकर छाती से लगा लिया और सुबक पड़ी, ”मुझे चारों और अंधेरा ही अंधेरा दिखता है, बेटे। मुझे पता नहीं, तुम कैसे जी पाओगे।” जवेरबा जोसेफ को पास वाले घर में ले गई। वह वहां सो गया। सुबह उठा तो सारा घर स्त्रियों से भरा था। चाची, बुआ, दादी सब रो रहे थे। सोमभाई की आंखें सुर्ख हो गई थीं। मनु पागल सा हो गया था। डाहयाभाई आ गए थे। वह सबसे दूर सिर झुकाए बैठे थे।
दोपहर को श्मशान यात्रा शुरू हुई। रिवाज के अनुसार पति अपनी पत्नी की अर्थी को दाहिनी ओर कंधा देता है। पति जिंदा न हो तो यह रस्म बड़ा बेटा निभाता है। अर्थी उठाते समय डाहयाभाई आगे बढ़े तो सोमभाई ने सिर हिलाकर मना कर दिया। वह स्वयं आगे बढ़े। ग्यारह साल के मनु को साथ रखा और अपने दाहिने कंधे पर अर्थी उठा ली। दफन क्रिया में मिट्टी की रस्म सोमभाई और दोनों बेटों ने निभायी। डाहयाभाई को पति का एक भी फर्ज अदा नहीं करने दिया। यह धन्नी मां का हुक्म था।
हीरी बहन की मृत्यु के बाद जवेरबा ने जोसेफ को मनु के साथ पाठशाला भेजा। मनु चौथी कक्षा में पढ़ता था। वह और उसके साथी कविताएं गाया करते थे। मास्टरजी हुक्का पिया करते थे। लड़कों की कविताओं की गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती थी। लोगों को लगता कि स्कूल अच्छा चल रहा है। मनु पढऩे में होनहार था। एक बार पढ़ लेने पर ही उसे कविता या पाठ याद हो जाता था। उसकी तथा साथियों को कविताएं सुन-सुनकर जोसेफ को भी तीसरी और चौथी कक्षा की सभी कविताएं याद हो गईं। सुर सुरीला था। एक दिन मास्टरनी ने उसे गाते सुन लिया। सबको शांत कर उसे अकेले गाने का आदेश दिया। उसे संकोच हुआ। मनु ने हिम्मत बंधाई। मास्टरनी मुंह न देखे इसलिए आगे किताब रख दी। कविता पूरी हुई तो कमरा तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज गया। तब भौंरे वाली कविता की फरमाइश हुई। पहली मुर्गे वाली थी। उसमें मुर्गे का चित्र था। इसलिए किताब सीधी पकड़ी थी। भौंरे वाली किताब पर चित्र नहीं था। उल्टी किताब पकड़े जोसेफ गा रहा था। सभी बच्चे मुंह दबाकर हंस रहे थे। जोसेफ को यह बात मालूम हुई तो वह वह रो पड़ा। इस फजीहत को खत्म करने के लिए मनु ने उसे अक्षरों की पहचान करवाई। हर एक शब्द पर अंगुली रखकर पढऩा सिखाया।
जोसेफ बिना मां का बच्चा था। मास्टरनी उसे बहुत चाहती थी। उनका प्यार करुणा से आद्र्र होता था। बिना एडमिशन लिए ही जोसेफ पढऩा सीख गया। वह पढऩे में होनहार था। सीधे दूसरी कक्षा में भर्ती करा दिया गया। सालाना इम्तहान में वह प्रथम आया।
पत्नी की मौत का कोई गम किए बिना डाहयाभाई ने चौथे ही महीने अपनी प्रेमिका से सगाई कर ली।
धन्नी मां ने जाना तो पुत्र को बुलाकर सुना दिया, ”देखो, बहुत मनमानी करते रहे हो। पर मेरे जीते जी उस औरत का पैर मैं अपने घर में नहीं पडऩे दूंगी।”
डाहयाभाई नहीं माने। शादी की तैयारी होने लगीं। उन्होंने सोमभाई को किसी तरह मना लिया। जिस रोज बारात जाने वाली थी, उसकी पहली रात को धन्नी मां ने बेटी से दूध गरम करवाया। उसमें ढाई-तीन तौला अफीम मिलाकर पी लिया। रोज दूध पीते समय घर की बिल्ली के लिए दो-तीन घूंट दूध रख छोड़ती थीं। बिल्ली ने खाली कटोरा चाटा और मुंह फेर लिया। छोटी बेटी ने यह भांप लिया।
कटोरे में स्याह परत देखकर उन्होंने पूछा, ”मां, अफीम तो नहीं घोला?”
”हां बेटी, वही किया। मैंने कहा था कि मेरे जीते जी उस औरत के पैर घर में नहीं पडऩे दूंगी, न उसका मुंह देखूंगी। यह कपूत मेरी एक नहीं सुनता। मैं भी अपने जबान पर अटल हूं। सोने जैसी मेरी बहू की मौत का लोकाचार भी पूरा नहीं हुआ है और यह फिर ब्याहने घोड़े चढ़ रहा है। मैं इस घर में अच्छा शगुन नहीं छोडूंग़ी।” धन्नी मां रो पड़ी।
उस रात ढाई बजे वह मर गईं। छोटी बेटी सारी रात अकेली मृत मां का हाथ पकड़े बैठी सुबकती रही। मरने से पहले धन्नी मां ने उससे कहा था, ”सुबह का मुर्गा न बोले, तब तक मेरी मौत पर रोना मत।”(गुजराती में इसे मरणपोक कहते हैं)
सुबह होते ही वह गला फाड़कर रो पड़ी। पास वाले घर से सोमभाई और जवेरबा दौड़ आये। मनु ने जोसेफ को झकझोरा, ”चल उठ, दादी मां भी मर गई।”
खबर मिलते ही डाहयाभाई भी दौड़कर आए। बड़ी बेटी के आने पर दोपहर डेढ़ बजे श्मशान यात्रा शुरू हुई। कब्र में अंतिम पानी डालने की रस्म जोसेफ ने निभायी। धन्नी मां को दाहिना कंधा सोमभाई ने दिया। ढाई बजे सब लौट गए। स्नानादि से निपटकर साढ़े तीन बजे डाहयाभाई की बारात सजी।
मान-मनौवल कर सोमभाई ने दोनों भतीजों को भी बाराती बनाया। दूसरे दिन चर्च में लग्न विधि हुई। दस बजे विदाई हुई। सभी पैदल चल रहे थे। किसी ने जोसेफ से कहा, ”तू पैदल क्यों चल रहा है? जा तेरी नई मां गोद में ले लेगी।” नई मां ने सुना और उसे गोद में ले लिया।
रास्ते में वह स्थान पड़ा, जहां मां के साथ वारदात हुई थी। मनु के मुंह से चीख निकल गई, ”जोशिया, देख अपनी मां वाली जगह। उतर जा। उसके पास हम नहीं जा सकते।” जोसेफ नई मां की गोद से जबरदस्ती छूट कर भाई के पास दौड़ गया। मनु और सोमभाई भीगी आंखों से उस जगह को निहार रहे थे। डाहयाभाई कुछ दूरी पर अपने दोस्त से बात कर रहे थे। वे वहीं खड़े रहे। नई मां कुछ समझी नहीं। पर उसी क्षण से जोसेफ उसकी नजरों से उतर गया।
अच्छा-खासा, भला-चंगा मनु नई मां के आते ही मुरझा गया। वह ठीक से खाता-पीता नहीं। सदैव झींकता रहता। दो महीने में वह सूखकर कांटा हो गया। तीन दिन बीमार रहा और एक दिन शाम को चल बसा। घर में सभी रो रहे थे। नई मां अप्रभावित थीं। न उनके आंसू थे, न चेहरे पर दर्द।
मनु की मौत के दूसरे महीने सोमभाई का दाहिना घुटना फूलने लगा। उसमें असह्य दर्द होने लगा। बहुत इलाज किया। यहां तक की लोहा गर्म करके पांच दाग भी दागे गए। लेकिन आराम नहीं हुआ। आखिरकार आणंद के साल्वेशन आर्मी अस्पताल में मेंडोकूक साहब ने जांघ से पैर काट दिया। दो महीने में ही वह बैशाखियों के सहारे चलने लगे।
जवेरबा भैंसों के चारे के लिए तड़के ही खेत में चली जाती थी। जिस रोज नई मां रोटियां सेंकती थीं, जोसेफ के लिए कम पड़ जाती थीं। वह चिल्लाने लगता और नई मां से जो मुंह में आए बोल देता।
उस रोज जवेरबा ननद की सुसराल गई थीं। दिवाली बहन और डाहयाभाई खेत में से जैसे ही आए भूख से परेशान जोसेफ बोल पड़ा, ”रोटी रखने के बक्से में ताला क्यों लगता है? मेरे लिए दही-रोटी क्यों नहीं रखी? जिस दिन तुम रोटी पकाती हो… मेरा पेट काटती हो…।”
डाहयाभाई आपे से बाहर हो गए। चारे की गठरी पटककर वह उसकी ओर लपके। एक भरपूर तमाचा कनपटी पर जड़ दिया। जोसेफ गिर पड़ा। वह बाल पकड़कर उसे पीटने लगे। झुंझलाहट के मारे उन्होंने उसे दीवार की ओर धक्का दे दिया। वह उखल पर जा गिरा। बाईं ओर सिर पर एक ईंच गहरा घाव हो गया। ज्वर के कारण सोमभाई पास वाले घर में सो रहे थे। जोसेफ की चीख-पुकार सुन वह दौड़कर आए। जीवन में उन्होंने पहली बार बड़े भाई को ललकारा, ”आप पड़साल (औसारा) से नीचे उतर जाइए। वर्ना मेरी बैशाखी आपकी सगी नहीं होगी। एक को तो मार डाला। अब दूसरे का भी खून कर रहे हो।”
डाहयाभाई मुंह लटकाये पड़साल से उतर गए। दिवाली बहन भी डरकर कोने में दुबक गई।
सोमभाई अपने आप पर काबू नहीं कर पा रहे थे। भयंकर क्रोध की कंपन और जोसेफ की चिंता में वह लडख़ड़ाकर गिर पड़े। पूरा बोझ कटी हुई टांग पर पड़ा। कठोर धरती ने रुझान भरे आवरण को कुचल डाला। सारा पड़साल खून से भर गया। खून रुक नहीं रहा था। धर्मादा दवाखाने के डॉक्टर ने दवा और पट्टी बांधकर बड़े अस्पताल ले जाने को कहा। बैलगाड़ी जोत कर उन्हें आणंद ले जाया गया। तब तक बहुत रक्त बह चुका था। वह बेहोश हो गए। डॉक्टर कूक के कारण वह बच तो गए, लेकिन फिर अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाए। डेढ़-दो महीने में साढ़े तीन मन की काया कंकाल सी हो गई। फिर एक उदास सांझ को उन्होंने अपनी पत्नी को पास बुलाया और सिरहाने खड़े रहने को कहा। वह आंखों में दृष्टि लगाए कुछ देर देखते रहे, फिर उनका सिर दाईं ओर लुढ़क गया, जहां जोसेफ बैठा था। पछाड़ खाकर जवेरबा गिर पड़ीं।
मातमपुर्सी और लोकाचार के साथ महीना बीत गया। अब साड़ी बदलवाने* की रस्म आई। छोटी ननद उन्हें नहला रही थी। तब उन्होंने कहा, ”ननदजी, तुम्हारे भाई का वंश मेरी कोख में पल रहा है। तीन महीनों से मेरे कपड़े नहीं आए। तुम्हारे भाई यदि यह जानते तो वे जी जाते। अब जेठजी से इतनी गुहार कीजिए कि पास वाला घर मुझे दे दें। जोशिया को लेकर मैं वहीं रहूंगी। खेत, घर और भैंसों का काम मैं कर लूंगी।”
भाई की मौत के बाद पहली बार छोटी बुआ के होंठो पर खुशी छा गई। भाभी को उसने बांहों में भर लिया। नई साड़ी पहनाकर केशों में बेणी सजाई। इसका मतलब था कि वैधव्य धर्म का पालन करते हुए वह अब आजीवन पति का घर नहीं छोड़ेगी। यह देख डाहयाभाई का माथा ठनका। उन्होंने छोटी बहन से पूछा। उसने सारी बात बता दी।
दिवाली बहन को यह कतई पसंद नहीं था कि जवेरबा का बेटा आधी मिल्कियत का भागीदार बने। अंतत: उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध मायके भेज दिया गया। घर छोड़ते समय वह इतनी बेजार थी कि जोसेफ को भी साथ ले चलीं। इतना भी ध्यान नहीं रहा कि इसे साथ नहीं ले जा सकती। जब वह जा रही थीं, खेत से लौटती लाडो मिल गई। वह उनके मातहत मणिभाई चमार की पत्नी थी। ये लोग घर और खेत में काम करते थे। इनसे रोटी, पानी का व्यवहार न था,  लेकिन लाडो इतना घुलमिल गई थी कि धन्नी मां से आंखें बचाकर रोटियों सेंक देती, विलौना चला दिया करती थी।
लाडो जोसेफ को अपने घर ले गई। जानती थी फिर भी खाना बनाकर खिलाया। वहीं सुला दिया। चार बजने को आए तब उसके हाथ-मुंह धुलाकर घर भेजने चल दी।
डाहयाभाई बाहर बैठे हुक्का पी रहे थे। वह घूंघट ताने, जरा तिरछी होकर बोली, ”बड़े ताऊजी, छोटी भौजी आज सुबह पीहर चली गईं। वह तो नहीं चाहतीं, पर पेट छुट्टा होने पर शायद इनका दूसरा विवाह हो जाएगा। आपने उसे सहारा दिया होता तो छोटे चाचा के बेटे को यहीं जन्म देतीं।”
डाहयाभाई मौन-मूक सुनते रहे।
”एक और अर्ज गुजारती हूं।” वह जोसेफ को आगे धकेल कर बोलीं, ”इस नन्हे की बद्दुआ न लीजिएगा।”
अंधेरा उतरा। दीया-बाती हो गई। पड़साल में बैठे जोसेफ की किसी को चिंता न थी। ऐसे की किवाड़ बंद हो जाएंगे, यह सोचकर उसकी रूलाई फूट गई। सामने वाले घर से जीवी काकी निकल आईं और कहने लगीं, ”अरे रोता क्यों हैं रे? तेरी चाची कहां गई?”
यह सुनकर दिवाली बहन बाहर निकली, ”यह मेरी आबरू किरकिरी करके ही रहेगा। नई मां जो हूं। कब की खाने को बुलाती हूं, पर सुनता ही नहीं।”
इतने में डाहयाभाई आ गए। पिता के डर से जोसेफ भीतर चला गया। दिवाली बहन ने एक प्लेट उसकी ओर ठेल दी। इसमें बची-खुची थोड़ी-सी खिचड़ी थी। घी नहीं था। ज्यादा घी नहीं लेने की रोज चाची से हठ करता था। पर आज उसकी समझ में आ गया कि लाड़-प्यार के दिन अब लद गए हैं। वक्तपर अच्छा-पेट भर कर खाना अब शायद ही मयस्सर हो।
उस रात जोसेफ को पड़साल में अकेला सोने के लिए छोड़ दिया गया। जाड़े का मौसम। खुली पड़साल में सनसनाती ठंडी हवा में छोटी-सी खटिया में पतली गुदड़ी ओढ़े, घुटने छाती से लगाए वह दुबका पड़ा था। बहुत डर लग रहा था। टावर में ग्यारह के टकोरे लगे और लाल कुतिया आ गई। उसने जोसेफ को सूंघा। जरा-सी कू-कू की और खाट के नीचे सो गई। उसकी उपस्थिति ने जोसेफ के डर को दूर कर दिया। उसे लगा जैसे- तारों में छिपी मां ने कुतिया को भेज उसे अकेला नहीं छोड़ा। निश्चिंत मन से वह सो गया। रात को ठंड का प्रकोप बढ़ा। कुतिया खाट पर चढ़ आई। इसका जोसेफ को पता नहीं चला। कुतिया की देह की गर्माहट से उसे ऊष्मा मिली। वह खूब सोया और सुबह तरोताजा जागा। बगैर भय-चित्कार के जोसेफ ने शांति से रैन बसर कर दी, इस बात का दिवाली बहन को अजीब आश्चर्य हुआ।
उसी साल दिवाली बहन ने बेटे को जन्म दिया। उनकी पहली शादी इसलिए टूटी थी कि तीन-चार साल बीतने पर भी मां नहीं बन पाईं। उन्हें बच्चे को जन्म देने के बड़े अरमान थे। बेटा होने पर वह आसमान में उडऩे लगीं। अब घर का सारा काम- झाडऩा, पौंछना, बुहारना, बर्तन मांजना, गोबर के टोकरे सिर पर लादकर खाद के लिए गड्ढे में डालना, भैंसों की नाद साफ करना सभी जोसेफ के सिर पर आ पड़ा। सुबह पांच बजे से लेकर रात ग्यारह बजे तक वह काम में लगा रहता। सब्जी बघारना और रोटी सेंकना भी सीखना पड़ा।
आठ साल के जोसेफ को वह कुंए पर ले जाती। कुंए बहुत गहरे थे। कहावत थी-
ओड-उमरेठ के गहरे कुंए
बेटी ब्याहे उसके मां-बाप मुए!
अर्थात् ओड और उमरेठ गांवों के कुंए इतने गहरे हैं कि कोई इन दो गांवों में अपनी दुलारी बेटी का ब्याह नहीं करेगा, करने वालों को बेटी की इतनी बद्दुआ पहुंचती है कि मानों वे बेमौत मर गए।
तीन साल इसी तरह गुजर गए। जोसेफ की पढ़ाई छूट गई। उस की किसी को चिंता नहीं थी। उस साल बारिश बहुत कम हुई। खेती बेकार हुई। बैल मर गया। दुर्भाग्य से दिवाली बहन के बेटे को कोई रोग लग गया। उसके पेट में कुछ टिकता नहीं था। छह महीने में वह सूखकर कांटा हो गया। उसके इलाज पर बेशुमार खर्च हुआ। गहने भी बिक गए। खाने के लाले पड़ गए। गांव में मिशन का मास्टर कहीं चला गया था। डाहयाभाई के घर की हालत बहुत खस्ता जानकर पादरी आए। उन्होंने डाहयाभाई को स्कूल चलाने का जिम्मा सौंप दिया। तनख्वाह 60 रुपये महीना निश्चित हुई। अब डाहयाभाई को जोसेफ को स्कूल में नए सिरे से दाखिल करना पड़ा। यहीं से जोसेफ के जीवन में नया मोड़ आया।
डाहयाभाई ने किसी तरह जोसेफ की चौथी कक्षा में भर्ती करा दिया था। घर के काम का बोझ जोसेफ के सिर से नहीं टला था। वह सप्ताह में दो-तीन घंटे जाकर स्कूल में बैठता और मिशनरी महकमे से आई चौथी कक्षा की किताबें पढ़ता।
कुंए में पानी भरते हुए जोसेफ की लड़कियों से अच्छी बनती थी। इनमें आणंद मिशनरी बोर्डिंग में सातवीं में पढऩे वाली सुमित्रा भी थी। वह बड़े प्यार से गणित और गुजराती सिखाती थी। पुस्तक पढऩे का चस्का भी उसने लगाया। कहानी-उपन्यास का भेद समझाया। इसी की वजह से मुख्यालय के हैडमास्टर वार्षिक परीक्षा लेने आए तो जोसेफ प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो गया। हैडमास्टर ने डाहयाभाई से कहा, ”लड़का बहुत होशियार है। इसका भविष्य बनाओ। मिशन स्कूल में मुश्किल पड़ता है तो गांव के लोकल बोर्ड स्कूल में भेजो। वर्नाक्यूलर फाइनल हो जाएगा तो प्राइमरी स्कूल का मास्टर तो बन ही जाएगा।”
उन्होंने जोसेफ के लिविंग सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर किए और उसे रजिस्टर में रखते हुए कहा, ”देखो, स्कूल खुलने पर अगर तुम्हारे पिताजी आनाकानी करें तो यह सर्टिफिकेट लेकर तुम खुद चले जाना। वहां के हैडमास्टर मेरे दोस्त हैं। मैं उन्हें चिट्ठी लिख दूंगा। वे तुझे दाखिला दे देंगे।”
डाहयाभाई टालमटोल करने लगे। जोसेफ एक दिन सर्टिफिकेट हथिया कर हैडमास्टर के पास चला गया। उसके पास शुल्क जमा करने को दस आने नहीं थे। उसने वादा किया, ”कल दे दूंगा।”
जून का महीना था। वह सुबह चार बजे उठा। आम पकने पर रात को टपक जाते हैं। उसने बाग में जाकर टोकरा भर आम बटोर लिए। करीब बीस किलो आम थे। वह टोकरा सिर पर रख दो-तीन मील दूर गांव चला गया। वहां रामजी मंदिर के चबूतरे पर बैठ गया। ग्राहक आने लगे। मोलभाव उसे आता नहीं था।
एक ने पूछा, ”पूरा टोकरा कितने में दोगे?”
जोसेफ ने कहा, ”आपको जो वाजिब लगे दे दो।”
”दो रुपये देता हूं। टोकरा मेरे घर पहुंचाना होगा।” ग्राहक बोला।
पास खड़ा दूसरे टोकरे वाला बोला, ”क्यों महाराज! बच्चा जानकर ठग लेना चाहते हो? क्यों रे, तू भाव बिगाड़ता है? मुफ्त में आते हैं आम? देखो साहजी, पूरे पांच लगेंगे। लेना है तो ले लो।”
ग्राहक ने पांच रुपये गिन दिए। जोसेफ टोकरा खाली करके लौटा तो उस आदमी के आम भी बिक चुके थे। वह बोला, ”तू नया लगता है। धंधा करना नहीं जानता। कल मेरे पास ही खड़े रहना।”
जोसेफ के मन में ऐसा कोई विचार नहीं था। फिर उसने सोचा कि उसके खाने-पीने, कपड़े और सुध लेने वाला कौन है? उसने आम मिलने तक यह धंधा करने का निश्चय कर लिया।
छह-सात दिन उसने यह कारोबार किया। उसने बयालीस रुपये कमाए। घर में किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई। ये पैसे उसने बचपन के दोस्त मगन के घर रख दिए क्योंकि घरवालों को पता चल जाता तो वह सारे रुपये ले लेते।
इन्हीं रुपयों से मगन के पिताजी जोसेफ के लिए दो जोड़ी कपड़े (कमीज, हॉफ पैंट और चड्ढी) और चप्पल ले आए। तेरह साल की उम्र में पहली बार उसने चप्पल पहनी।
नए कपड़े मिलने पर भी तत्काल पहन न सका। अब तक वह उपेक्षित जीवन जी रहा था। तन के कपड़े जब जीर्ण हो जाते तभी या तो बंबई बसे चचेरे भाइयों के उतरे हुए या फिर सिंधी व्यापारी के पास से तैयार हल्की किस्म के नसीब होते थे। वह नहाता रोज था, लेकिन सिर पर न तेल लगाता और न कंघा फिराता। ऐसी हालत में किसी शिक्षक का ध्यान उसकी ओर नहीं गया।
स्कूल खुले एकाध महीना हुआ था। क्लास टीचर ने युवा कवि कलापि (वह लाठी स्टेट के राजा थे) की कविता ‘एक घा’ पढ़ानी शुरू की। कविता का भावार्थ समझाने के बाद उन्होंने उसका मंदाक्रांता छंद सुनाया। विद्यार्थियों से पूछा, ”कौन यह कविता गाएगा?”
जोसेफ के पास मगन बैठा था। उसने कोहनी मारते हुए कहा, ”तू खड़ा हो जा और सुना दे। आज तेरा सिक्का जम जाएगा।” जोसेफ खड़ा नहीं हुआ तो वह बोला, ”मास्टरजी, जोसेफ गाएगा। इसका कंठ बहुत सुरीला है।”
जोसेफ को उठना पड़ा। शुद्ध रूप से मंदाक्रांता छंद का गान सुनकर मास्टरजी आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने पूछा, ”यह छंद तू पहले से जानता था?” जोसेफ ने इनकार कर दिया। उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि मैला-कुचैला गंवार लड़का एक बार सुनकर शास्त्रीय शुद्धता से गा पाये। उन्होंने परखना चाहा। पुस्तक के कुछ पन्ने पलट उन्होंने ‘शार्दुल विक्रिडित’ छंद का एक अष्टक निकाला। एक बार स्वयं सुनाया और जोसेफ से सुनाने के लिए कहा। बिना यतिभंग के उसने सुना दिया। वह अब भी संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने ‘काचला-काचबी’ का भजन अपनी तर्ज में गाया और फिर उसे गाने के लिए कहा। यह भजन उसने पहले कई बार सुना था। राग भी परिचित था। उसने इस ढंग से गाया कि सहपाठी तालियां बजा उठे। मास्टरजी ने उसे गले से लगा लिया। दूसरे दिन उन्होंने उसे प्रार्थना गवाने के लिए आगे भेजा। वहां भी वह खूब जमा। वह सबका चहेता बन गया।
मास्टरजी अत्यंत निष्ठावान, शील और संस्कार संपन्न थे। जाति के वाघरी थे। यह एक नीची जाति कहलाती है, जो घरफोड़ चोरी के लिए जानी जाती है। लेकिन वे सबसे अलग थे। अपने विषयों पर पूरा प्रभुत्व था। तन्मय होकर पढ़ाते थे। अपने बनाए टाइम टेबिल में एक पल भी व्यर्थ न करते थे। वे जोसेफ को हर विषयों में सर्वश्रेष्ठ रहने की प्रेरणा देते थे।
स्कूल गए जोसेफ को चार महीने हुए थे। मास्टरजी ने ब्लैक बोर्ड पर विषय लिखा- दारू निषेध अर्थात् शराबबंदी। यह 1948 की बात है। नई-नई आजादी आई थी। गुजरात मुंबई राज्य में सम्मिलित था। गांधीजी की नसीहत मानते हुए मुख्यमंत्री बाला साहब खैर ने पूरे राज्य में शराबबंदी कानून लागू कर दिया था।
ब्लैक बोर्ड पर विषय लिखकर मास्टरजी ने कहा, ”इस विषय पर निबंध लिखो।”
जोसेफ की समझ में बात नहीं आई। उसने पूछा, ”क्या लिखें मास्टरजी?”
वे बोले, ”निबंध।”
जोसेफ ने कहा, ”ठीक है। पर लिखें क्या?”
मास्टरजी को भी दिक्कत हो रही थी कि वह क्या व्याख्या समझाएं। वह बोले, ”निबंध… निबंध माने… देखो ‘निषेध’ का मतलब है- नहीं पीना। दारू पीने के फायदे नहीं होते, बहुत नुकसान होता है। पैसों की बर्बादी… आदमी, आदमी नहीं रहता, हैवान बन जाता है। बस! ऐसा ही तुम्हारे मन में जो आए, वही लिखो।”
फतेहसिंह दरबार नाम का एक मुंहफट लड़का बोला, ”कम पीयें तो हिचकोले आते हैं और ज्यादा पीयें तो चला नहीं जाता, धड़ाम से गिर पड़ते हैं। इसमें लिखने को क्या रखा है?”
मास्टरजी सहित सभी बच्चे हंस पड़े। पर क्या लिखना है यह बात जोसेफ के समझ में आ गई।
मगन के पिताजी गोरधन हफ्ते में एक बार शराब पीकर आते थे। वह तीन-चार घंटे बस्ती को सिर पर उठाकर रखते थे। वह गर्जना करते हुए बस्ती के नुक्कड़ पर आते तो स्त्रियां किवाड़ बंद कर घरों में घुस जातीं। वह बलिष्ठ थे। नशे में धुत्त होने पर भी अच्छे-खासे जवान भी उनसे डरते थे। उनके मन में जिनके दुर्गुण होते उनके नाम ले-लेकर जलील करते थे। वह थोड़ा-बहुत भवान भगत या डाहयाभाई से डरते थे।
एक बार उन्होंने डाहयाभाई का मुंह नोंच लिया, ”डाया काका, मैं आपका आदर करता हूं। आप मेरे आड़े मत आओ। अपना घर संभालो। नई बहू क्या लाए, खुद के बेटे और धरम-करम को ही बिसर गए। आपको देखता हूं तो मुझे लाज आती है।”
उसके बाद डाहयाभाई उसके सामने आने की हिम्मत न जुटा सके। वह दिवाली बहन को भी नहीं बख्शते थे। वह दूर के रिश्ते में उनकी बहन लगती थीं। वह मर्यादा रखकर गाना जोड़ते –
प्रभु मुझे ऐसी बहन ना दे
जिसका हिरदा पत्थर का हो
कलेजा कंटीला हो।
नशा उतरा पाते तो वह कमर में बंधी बोतल निकालकर मुंह में उड़ेल लेते। फिर घर की देहरी चढ़ते और निर्दोष पत्नी को पीट देते। चीख-पुकार का उनपर कोई असर न पड़ता। एक बार तो उसका हाथ टूट गया था। मगन कद-काठी में मासूम था। उस दिन मां की हालत उससे देखी नहीं गई। घर में बर्छा था। बर्छे की नोक बाप के गले पर लगाकर वह चीखा, ”छोड़ दे मेरी मां को, वर्ना घुसेड़ दूंगा तेरे गले के आरपार।” बेटे के तमतमाये चेहरे से गोरधन दहशत खा गए। शर्मिंदा होकर वह वहां से चले गए।
यह घटनाक्रम जोसेफ के मन में था। दूसरा- बंबई से उसके दो चाचा आते। शाम को घर में शराबखोरी का दौर चलता। शराब का ठेका एक किलोमीटर दूर था। एक रुपया लेकर वह जाता। बारह आने की देशी शराब की बोतल आती। बड़े चाचा उदारता से कहते, ”तू बहुत सयाना है, चवन्नी अपने पास रख ले।”
आधे घंटे बाद दूसरी, फिर तीसरी और रात के ग्यारह बजे चौथी का हुक्म होता। तब कहा जाता कि अपने पास जमा हुए बारह आने की बोतल ले आ। दूसरी सुबह रुपया देने के वचन से वह मुकर जाते।
इन अनुभवों के आधार पर जोसेफ ने ‘दारू-निषेध’ पर निबंध लिखा। मास्टरजी ने क्लास में पढ़वाया। ताली पिटी। मास्टरजी ने फुलस्केप कागज दिए और करीने से कागज के एक ओर पुनर्लेखन के लिए कहा। उसने लिखकर मास्टरजी को दे दिया।
दो महीने बीत गए। धर्मादा दवाखाने के पास प्रसूति ग्रह बन रहा था। इसकी ईंट भिगोने की मजदूरी जोसेफ के सिर पर लाद दी गई थी। दो दिन से वह स्कूल नहीं जा सका था। दोपहर को मगन दौड़ता हुआ आया और बोला, ”तेरा लिखा वह निबंध प्रतियोगिता में प्रथम आया। मास्टरजी तुझे बुला रहे हैं।”
जोसेफ ने कहा, ”कल शाम तक मैं नहीं आ पाऊंगा।”
दूसरे दिन शनिवार था। जोसेफ ने गहरे कुंए से पानी खींचकर दो बड़े कनस्तर भर दिए थे। बारह बजने वाले थे। वह ईंट भिगोकर बाहर रख रहा था। मास्टरजी वहां आ पहुंचे, ”भाई जोसेफ, पांचवीं से ग्यारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों की निबंध प्रतियोगिता में तुम्हारे निबंध को प्रथम पुरस्कार मिला है। मैं धन्य हो गया हूं तुम्हें पाकर।”
जोसेफ गद्गद् हो गया। वह कुछ बोल न पाया।
वह करुणाद्र्र आंखों से उसे निहारते हुए बोले, ”कल स्कूल के पास वाले खेत में पंडाल बंधेगा। मुंबई से राज्य के गृहमंत्री मोरारजी देसाई पधारेंगे। उनके हाथों तुझे इनाम मिलेगा। कल तो तुम आओगे न?”
”जी, कल छुट्टी है। अवश्य आऊंगा।” जोसेफ ने जवाब दिया।
वह उसे सिर से पैर तक निहार कर बोले, ”तुम्हारे पास दूसरे कपड़े हैं।”
उसके पास दो जोड़ी कपड़े थे। मगर उनको निकालने का साहस नहीं था। अधिक पूछताछ होती, इससे पहले ही वह बोल पड़ा, ”जो हैं, यही हैं मास्टरजी।”
”अच्छा। काम से निपटकर इन्हें धो डालना।” मास्टरजी कहकर चले गए।
ईंटों के गेरुए रंग से उसकी सफेद कमीज रंग गई थी। धोने के लिए साबुन नहीं था। कपड़े का रंग ही बदल गया। चड्ढी पर दो बड़े टांके लगे थे। वह इन्हीं कपड़ों को पहनकर दोस्तों के साथ पंडाल में गया।
पंडाल हजारों लोगों से भरा था। निबंध के विजेता की हकीकत पढ़कर मोरारजी देसाई ने आदेश दिया, ”वह निबंध लाओ और सबसे पहले इसे पढ़कर सुनाओ।”
शिक्षक रमणभाई गणपतभाई पाठक आगे बढ़े तो मोरारजी देसाई ने फरमाया, ”मास्टरजी, आप नहीं। उस लड़के से पढ़वाओ, जिसने इसे लिखा है।”
डर के मारे जोसेफ की टांगे थरथरा रही थीं। महिजीभाई मास्टरजी ने हौंसला बढ़ाया, ”घबरा मत। जैसा क्लास में पढ़ा था, वैसे ही पढ़ दे। मेरा नाम रख।”
निबंध के प्रारंभ में शराब न पीने की सीख देने वाली कुछ पंक्तियां थीं। जोसेफ ने सबसे पहले वह गाईं। पूरे पंडाल में निस्तब्धता छा गई। उसने दस-बारह मिनट में निबंध पूरा कर दिया। अंत में मास्टरजी द्वारा लिखाए दो नारे लगाए- जय मातृभूमि, जय हिंद।
पूरा पंडाल ताली की गडग़ड़ाहट से भर गया। इससे जोसेफ को एक अलग किस्म का रोमांच हुआ।
मोरारजी देसाई ने इनाम स्वरूप उसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ दी। उसके मन में आया कि इससे तो पांच रुपये मिल जाते तो ज्यादा अच्छा रहता। कम-से-कम अंग तो ढकता।
मास्टरजी बोल उठे, ”तू लेखक होगा बेटे। तू बहुत नाम कमाएगा।”
जोसेफ को घर में प्रोत्साहित करनेवाला कोई न था। वह अपना सुख-दु:ख भवान भगत से बांटता था। वह उसे बहुत चाहते थे। उस दिन अनेक बधाइयां पाता हुआ जोसेफ उनके पास गया। वह बहुत खुश हुए। एकाध पृष्ठ सुनने के बाद उन्होंने उसे रोक दिया। फिर गोरधन और डाहयाभाई को बुलाया। दोनों को अपने पास बिठाकर जोसेफ से शुरू से निबंध पढऩे को कहा। निबंध में दोनों के चरित्र उजागर हुए थे। उसे डर लगा।
भगतजी बोले, ”पढ़। मैं बैठा हूं। तुझे डर काहे का?”
जोसेफ पढ़ता गया। उसने कनखियों से देखा कि गोरधन काका मिट्टी कुरेद रहे हैं और पिताजी छत की ओर टकटकी लगाए कहीं खो गए हैं।
निबंध पूरा होने पर भगतजी बोले, ”सुन रे गोधा… इस बच्चे की नाल भी नहीं कटी, जिसने तेरे कुचरित्र का लेखा-जोखा लिया है। और मास्टरजी तुम्हारे लहू ने ही तुम्हारे अवगुण गाए हैं। अब तो मानुष की खाल अपनाओ।”
दोनों शर्मसार होकर चुपचाप चले गए।
तभी एक चमत्कार हुआ। गोरधन ने शराब छोड़ दी। वह जोसेफ के साथ आदर और स्नेह से पेश आने लगे। उन्होंने दो जोड़ी कपड़े लाकर डाहयाभाई को दिए, ”मैं जोसेफ के लिए यह इनाम लाया हूं।” उसी दिन से डाहयाभाई के घर में होने वाली महफिलें बंद हो गईं। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि वे जोसेफ के साथ बेरुखी बरत रहे हैं।
इन दो घटनाओं ने ‘शब्द’ में जोसेफ की असीम श्रद्धा जगा दी।
नई मां से दो टूक बातें हो जाने के बावजूद जोसेफ ने घर-खेती के कुछ काम नहीं छोड़े। उनमें एक था- कुंए से पानी भरना। यह काम उसे बहुत अच्छा लगता था। हमउम्र लड़कियों से मेल-मिलाप होता था। मोहल्ले की स्त्रियां अपना सुख-दु:ख सुनातीं थीं। जोसेफ बहुत छोटा था, लेकिन बहुत कुछ समझने लगा था। कुंआ उसके लिए जीवन की पाठशाला बन गया।
अगले साल लाडो की खूबसूरत जवान बेटी हेता तंबाकू मिल के नराधम मालिक की हवस का शिकार बन गई। उसे गर्भ ठहर गया। मां-बेटी दोनों ने आत्महत्या कर ली। उसी साल सुमित्रा की शादी हो गई। गहरा आघात देकर वह चली गई। इन दोनों घटनाओं ने जोसेफ को झकझोर दिया। उसे लगा जैसे उसके अंदर कुछ टूट गया।
पांचवीं क्लास में जोसेफ प्रथम श्रेणी से उत्र्तीण हुआ। छठी के क्लास टीचर रमणभाई पाठक थे। बड़े आलसी थे। पूरे साल उन्होंने कुछ नहीं पढ़ाया। जोसेफ पांचवीं क्लास में जाकर बैठ जाता था। महिजीभाई ने उसे छठी का गणित और विज्ञान सिखाया। बाकी उसने खुद पढ़ लिया। वह प्रथम श्रेणी से पास हो गया। महिजीभाई ने उसका लीविंग सर्टिफिकेट काट दिया और डाहयाभाई को थमाते हुए कहा, ”आणंद में मिशनरी बोर्डिंग स्कूल है। इसे वहां भर्ती करा दो। अच्छे प्रतिशत से फाइनल पास हो जाएगा तो प्राइमरी शिक्षक की नौकरी मिल जाएगी। इसका भविष्य बर्बाद न होने दो।”
डाहयाभाई के न चाहने पर भी मिशनरी पादरी ने जोसेफ को नडीआद भेज दिया। वहां 76 फीसदी अंक से वर्नाक्यूलर फाइनल किया। उसी पादरी ने सोलह साल की उम्र होते हुए जोसेफ को खंभोलज गांव की सात कक्षाओं के प्राइमरी स्कूल में पहली से तीसरी क्लास का शिक्षक नियुक्त कर दिया। दो वर्ष वह वहां रहा। धर्म के प्रति लापरवाही का कारण बताते हुए पादरी ने उसकी छुट्टी कर दी।
19 साल की उम्र न हो तब तक लोकल बोर्ड की नौकरी नहीं मिल सकती थी। उसने पुलिस में भर्ती होने का निश्चय किया। नडियाद, जहां वह सातवीं तक पढ़ा था, के पादरी ने फिर शिक्षक बना दिया। दो वर्ष के बाद उसे प्राइमरी टीचर्स ट्रेनिंग के लिए प्रतिनियुक्त किया गया। तब तक उसने एक्सटर्नल रूप से एस.एस.सी. मैट्रिक का प्राइवेट एग्जाम पास कर लिया।
आणंद के स्कूल में दो वर्ष टीचर ट्रेनिंग ली। यहां के आचार्य मगनभाई ओझा प्रखर गांधीवादी और शिक्षा शास्त्री थे। जोसेफ ने उनसे बहुत कुछ सीखा। इस दौरान जोसेफ ने राष्ट्रभाषा हिंदी की ‘साहित्य विशारद’, ‘राष्ट्रभाषा रत्न’ तथा ‘साहित्य अलंकार’ की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं। पी.टी.सी. होते ही उन्हें आणंद के प्रसिद्ध सेंट जेवियर्स में हिंदी शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिल गई। इसी दौरान डाहयाभाई का देहांत हो गया। वह अपने पीछे छोड़ गए पांच हजार का ऋण, सौतेली मां और उनके चार बच्चे। सारी जिम्मेदारी जोसेफ पर आ गई। आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि वह पिताजी का ठीक से उपचार भी न करा सके। उम्र इक्कीस साल हो गई थी। शादी हो चुकी थी।
पिताजी का ऋण अदा करने के लिए जोसेफ ट्यूशन, प्रूफरीडिंग और प्रतिष्ठित लेखक ईश्वर पेटलीकर के कार्यालय में पुनर्लेखन भी करने लगे। सुबह सात बजे से रात ग्यारह बजे तक यह सब चलता।
हिंदी की परीक्षाओं के दौरान जोसेफ मेकवान सूरदास, तुलसी, जायसी, कबीर, मीरा, केशवदास, बिहारी, रहीम, रसखान, निराला, महादेवी, पंत, प्रसाद से लेकर प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, अश्क, यशपाल, कृश्नचंदर, धर्मवीर भारती, दिनकर सहित मोहन राकेश, कमलेश्वर तक को भली-भांति पढ़ चुके थे। प्रेमचंद तो मानो उनके रूह में बस गए।
1954 में उनकी पहली कहानी ‘गेंगड़ी के फूल’ पत्रिका ‘सविता’ में छपी। 1956 से 64 तक उन्होंने 60 से अधिक कहानियां लिखीं।
जोसेफ के पैतृक नाते से तीसरी पीढ़ी के पूर्वज रामदास युवा आयु में चल बसे। उनकी पत्नी गर्भवती थी। पति की मौत के छह महीने बाद वह मां बनी। रिवाज के मुताबिक उन्होंने मायके जाकर पुनर्विवाह नहीं किया। बेटे के सहारे जिंदगी बिताना तय किया। बेटा जवान हुआ। उसका विवाह हुआ। पत्नी का नाम था आसीमां। तीन साल बाद पति दानजी की सांप के काटने से मौत हो गई। आसीमां को तीसरा महीना चल रहा था। उसने भी ससुराल में जीवन बिताने का निश्चय किया। उसका भी बेटा हुआ कानजी। भरी जवानी में दो पुरुषों की मौत हो गई थी। लोग कहने लगे कि यह घर अभिशप्त है। वह चाहे आजीवन कुंवारा रहे। उसका विवाह न किया जाए। कोई बच्चा गोद ले लेना। मां का मन नहीं माना। ब्राह्ïण को बुलाकर सभी व्रत-जप कर बेटे की शादी रचाई। बहू का नाम था पसी। ढाई साल बाद कानजी को टी.बी. हो गई। इलाज में सैकड़ों का ऋण हो गया। खेत गिरवी चला गया। कानजी नहीं बचे।
आसीमां और अन्य लोगों के कहने के बावजूद पसी ने घर नहीं त्यागा। उसके भी बेटा हुआ नाम रखा- देवा। पर टी.बी. वाले बाप का बेटा था। दूध-दवा से छह महीने में भला-चंगा हो गया।
पौष का महीना था। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। गिरवी रखे ख्त में तंबाकू के तीन फुट के पौधे के तने और पत्तों की जोड़ में जो फुनगी फूटती है, उसे गुजराती में ‘पीला’ कहते हैं। बच्चे की बीमारी के कारण ‘पीला’ तोडऩे-बीनने पसी नहीं जा सकी। ऋण देने वाला पटेल शाम को ज्यों-त्यों बोल गया था। दूसरी सुबह पसी बच्चे को गुदड़ी में लपेटकर खेत में गई। पेड़ पर पालना पड़ा था। बच्चे को सुलाया और ‘पीला’ निकालने में लग गई। एक दिन पहले बेमौसम बारिश हुई थी। इसलिए शीत लहर चल रही थी। सूरज कुछ चढ़ा। ग्यारह बजने को आए पर बच्चा रोया नहीं। जब पसी की छाती से दूध का उफान आया तो बावरी-सी दौड़ पड़ी। देवा ठिठुर कर ‘देव’ हो चुका था। मृत बच्चे को छोड़कर पसी ने दो बजे तक काम किया। फिर बच्चे को लेकर वह घर की ओर दौड़ी। वह खेत से बाहर निकल रही थी। प्रभुदास पटेल आ पहुंचा। उसने उस सद्य: मृत बच्चे को मां के मुंह की ओर नहीं देखा। ”कर दिया काम पूरा।” पूछते वह खेत की ओर देख रहा था। वह बोला, ”यह रुपया लेती जा। तय किया था। मजदूरी दो रुपये एक सूद में काट लिया जाएगा। दूसरा रोकड़ रूप में देना तय था।”
कुंए पर पसी को पागलों की तरह जोसेफ ने देखा। सामने मिलने वाली स्त्रियां भी उसके पीछे जाने लगीं। घर पहुंचकर पसी ने सास से कहा, ”लो मांजी, यह रुपया और यह आपके घर का दीया।” कहकर वह मूर्छित होकर गिर पड़ी।
जोसेफ मेकवान ने इस घटना को आधार बनाकर कहानी लिखी और सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘नवचेतन’ में भेज दी। तुरंत स्वीकृति का पत्र आ गया। अगस्त, 64 में वह छपने वाली थी। जुलाई के मध्य में कहानी वापस आ गई। संपादक ने लिखा था, ”माना कि कहानी का सघन करुणांत वास्तवदर्शी है, पर इससे सामाजिक अर्थ क्या संपन्न होगा? यही प्रश्नार्थ होते वापस कर रहा हूं। ‘नवचेतन’ के स्तर की दूसरी कहानी लिखो तो अवश्य भेजना।” उसी क्षण जोसेफ मेकवान ने हाथ में पकड़े फाउंटेन पैन की निब टूट जाए इस प्रकार फर्श पर प्रहार कर प्रण किया कि फिर कभी नहीं लिखूंगा। उन्होंने सोचा कि जिस वास्तव को, शोषण को, निर्मम अत्याचारों, बलात्कारों और क्रूर सामाजिक अन्याय की परंपराओं को देखा या अनुभूत किया, वही यथार्थ यदि गुजराती साहित्य को रास नहीं आ रहा है तो लिखना व्यर्थ है।
उन्होंने 1964 से 80 तक कुछ नहीं लिखा। गुजराती, बंग्ला, हिंदी, अंगे्रजी साहित्य पढ़ा खूब। मंथन चलता रहता।
उनके स्कूल में एक घटना घटी। नौंवी क्लास का एक होनहार विद्यार्थी फेल हो गया। सोलह साल का वैवाहिक जीवन व्यतीत करने के बाद उसके बाप ने अपनी पत्नी से संबंध तोड़ लिए। वह किशोर इस हादसे को सह न सका और आत्महत्या के लिए उतारू हो गया। जोसेफ मेकवान ने उस लड़के को आत्महत्या से रोक लिया, लेकिन उसके बाल मन पर जो कुठाराघात हुआ, उसका मरहम उनके पास भी नहीं था। इस घटना ने उन्हें फिर से कलम उठाने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने कहानी लिखी- ‘मेरा कौन’। दूसरे ही सप्ताह ‘जनसत्ता’ में छप गई। उनके पास पत्रों का तांता लग गया- लिखो, लिखो और लिखते ही रहो।
‘नया मार्ग’, ‘अखंड आनंद’, ‘जनकल्याण’ आदि कई पत्रिकाएं उनकी रचनाओं को छापने को तत्पर थीं। 1981 से 84 तक उन्होंने बीसियों रेखाचित्र और कई कहानियां लिखीं। 1985 में उनके पहले रेखाचित्र संग्रह ‘व्यथानां वीतक’ का प्रकाशन ‘खेतभवन’ से हुआ। इसे समालोचकों ने बहुत सराहा।
1986 में जोसेफ मेकवान का पहला उपन्यास ‘आंगलियात’ प्रकाशित हुआ। वह अत्यधिक प्रसिद्ध हुआ। गुजराती साहित्य में इसे चौथी लहर माना गया। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने उसे पुरस्कृत किया। गुजरात साहित्य अकादमी का प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। इनके अलावा कई अन्य पुरस्कार मिले। इसका हिंदी, राजस्थानी, अंगे्रजी आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ। गुजराती साहित्य के गद्य के डेढ़ सौ वर्ष के इतिहास में ऑक्सफॉर्ड से अनुदित होने वाला यह प्रथम उपन्यास है।
पढ़ाते समय ही जोसेफ मेकवान ने बी.ए., एम.ए., बी.एड., सब एक्सटर्नल किया। 36 साल तक हाईस्कूल में शिक्षक रहे। बीच में सात-आठ साल हिंदी के अध्यापक रहे। वहां के दंभी वातावरण में उन्हें घुटन महसूस होती। हिंदी के हैड ऑफ डिपार्टमेंट ने सेमीनार का विषय रखा- ‘क्या माक्र्स पे्ररित साहित्य शुद्ध साहित्य है! शुद्ध साहित्य में उसका क्या स्थान है।’ अपने व्याख्यान में उन्होंने साहित्य की शुद्धतिशुद्ध, कला के लिए जैसी अगड़म-बगड़म स्थापनाएं कर डालीं। जोसेफ मेकवान ने उन्हें आड़े हाथों लिया, ‘यदि इन महोदय की स्थापनाएं सही मानें तो पे्रमचंद के समूचे साहित्य सृजन से लेकर अमृतलाल नागर के ‘बूंद और समुंद्र’, रेणु के ‘मैला आंचल’, मंटो की कहानियां और यशपाल को साहित्य से निष्कासन देना पड़ेगा। 1936 में प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता क्यों की?’ और बहुत से संदर्भ दिए। किसी से जवाब देते नहीं बना।
दूसरे दिन हैड ने उन्हें बुलाया, ”देखिए, मैं आपका हैड हूं। आप मेरे मातहत हैं। हैड की स्थापना से विपरीत बोलना विवेक सम्मत नहीं है।”
जोसेफ मेकवान ने मुंहतोड़ जवाब दिया, ”तुम्हारे हैड पद की ऐसी की तैसी। तुमने समझ क्या रखा है? तुम्हारे हैड पर जूती मारता हूं। जाओ, जो बन पाए, कर दिखाओ।”
हैड सकपका गया। वह प्रिंसिपल से मिला, लेकिन  प्रिंसिपल ने जोसेफ मेकवान का पक्ष लिया। उसकी हेठी हो गई। वर्ष के अंत में जोसेफ ने इस्तीफा दे दिया।
36 साल की नौकरी के बाद 1993 में वह सेवानिवृत हुए। तब से लेखन में संलग्न रहे। उपन्यास, रेखाचित्र, कहानी, निबंध, आलोचना आदि विषयों पर उनकी करीब 50 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

राजनीति का प्रहसन : गौरव त्यागी

राजनीति में चल रही नाटकबाजी पर युवा पत्रकार का व्यंग्यात्मक आलेख-

यूपीए सरकार की दूसरी पारी का एक साल पूरा। सरकारी विज्ञापनों की बाढ़। मंत्रालयों की बड़ी-बड़ी उपलब्धियां। विपक्षी दल भी अपने में मस्त। लगता है देश में सुख और शांति है। कोई समस्या बची ही नहीं। सभी राजनेता अपने-अपने मिशन में लगे हंै। और वह है, कुर्सी कैसे हासिल की जाए। जमाने के साथ-साथ राजनेता भी हाईटैक हो गए हैं। अपने मंत्रालय या क्षेत्र में काम करने की बजाए ब्लाग और ट्वीटर पर जमे हैं। यहां भी गरीबी और आदमी की समस्या नहीं है। वे बेवकूफ हैं, जो रोटी-रोटी चिल्ला रहे हैं। उन्हें तो कंप्यूटर और इंटरनेट की मांग करनी चाहिए। घर-घर इंटरनेट होगा तो देश तरक्की करेगा। सरकार की उद्देश्य भी यही है कि देश हाईटैक हो, रोटी देना नहीं है।
रेल दुर्घटना होने पर लाल बहादुर शास्त्री ने इस्तीफा दे दिया, लेकिन  दिल्ली  रेलवे  स्टेशन पर  हुए हादसे के लिए दीदी ने लोगों को ही जिम्मेदार ठहराया। वह मौके पर भी नहीं पहुंची। उनके लिए बंगाल चुनावों में जीत ज्यादा जरूरी है।
स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद भी राजा शान से मंत्रालय में जमे हैं। अलागिरी संसद में कभी दिखाई नहीं देते, लेकिन कुर्सी कायम है। उनकी पार्टी ने केंद्र सरकार के सिंहासन में पाया लगाया है। मात्र दो घंटे में कांग्रेस ने करुणानिधि की विधानपरिषद की मांग मान ली। सरकार बचाने की मजबूरी थी। आदिवासी अपना हक सालों से मांंग रहे हैं, लेकिन किसी को सुनाई नहीं दे रहा है।
झारखंड़ में सत्ता की जंग चल रही है। इसके लिए कोई भी दल किसी भी स्तर तक गिर सकता है। देखना सिर्फ यह है कि वह स्तर क्या होगा। यही आज असली सियासत है। जनतंत्र की किसी को चिंता नहीं है। उसकी अहमीयत केवल इतनी है कि उसके ऊपर पैर रखकर कुर्सी तक पहुंचा जाता है। किसी भी  पार्टी के  पास जनता को लेकर कोई योजना नहीं है। गडकरी ने मुख्य विपक्षी दल की कमाल संभालते ही 2014 के चुनावों का खाका खींचा। गरीब के मुंह में निवाला कैसे जाएगा, यह किसी दल की योजना नहीं है। कांग्रेस के युवराज मिशन-ए-यूपी  पर हैं। वे रोड शो और दलितों के घर भोज कर रहे हैं और उन्हीं की पार्टी महंगाई बढ़ाने वाली नीतियों को परवान चढ़ा रही है। जनपक्षधरता का दावा करने वाले वामपंथी भी मौन हैं। वे अपने गढ़ बंगाल को बचाने में जुटे हैं।
देश महंगाई से त्रस्त है। मुख्य विपक्षी दल ने दिल्ली में रैली कर कर्तव्य को पूरा किया तो अन्य पार्टियां भी बयानबाजी करने तक ही सीमित हैं। जिस पर महंगाई पर अंकुश लगाने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी थी, वह शरद बाबू आईपीएल में चीयरलीडर्स के ठुमके देखने में मस्त रहे। उनके लिए क्रिकेट संघों पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना ज्यादा जरूरी है। महंगाई का समाधान निकालने के लिए कम खाने की हिदायत देते हैं। इससे लोगों को स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। अब तो मान लिया गया है कि महंगाई का मतलब है कि लोगों की तरक्की हो रही है और आमदनी बढ़ रही है। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सार्वजनिक रूप से इस ब्रह्म सत्य से अवगत करा चुकी हैं। करोड़पति सांसदोंं  की संख्या बढ़ गई है। ऐसे में जल, जंगल और जमीन की चिंता किसे होगी? 
लुटियंस जोन में बैठकर बस्तर की समस्याओंं का समाधान खोजा जा रहा है। एसी कमरों से खपरैलों के लिए राहत पैकेज की  घोषणा होती है। इसमे राहत कम, सियासत ज्यादा है। लेकिन वे कौन से हालात हैं कि नक्सलवाद पैदा हो रहा है और आमजन उसके साथ खड़ा है। उस क्षेत्र का समुचित विकास क्यों नहीं हो रहा है? पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने स्वीकार किया था कि विकास के लिए चला एक रुपया नीचे तक पहुंचते-पहुंचते दस पैसे रह जाता है। इस भ्रष्ट व्यवस्था पर क्यों अंकुश नहीं लग पाया?
जहां तक मीडिया की बात है तो उसे सनसनी और चटकारे चाहिए। सानिया के कपड़ों या वलीमा में क्या परोसा जा रहा है, इसकी चिंता है। क्रिकेट में हार-जीत बड़ी खबर है। फिल्म स्टारों के झूठे-सच्चे अफेयर के किस्से प्राथमिकता है। कौन ब्लाग या ट्वीटर लिखने लगा है और क्या लिख रहा है, यह सुर्खियां हैं। खबर में सनसनी और उत्तेजना होना जरूरी है। वह जमाना चला गया है, जब भूखे रहकर और चप्पल घिसकर पत्रकारिता की जाती थी। पत्रकार भी व्यावासायिक हो गया है। उसे भी गाड़ी, बंगाल और पेज थ्री की पार्टी चाहिए।

स्व. पंडित प्रताप नारायण मिश्र : बाबू गोपाल राम गहमरी

प्रताप नारायण मिश्र

भारतेन्दु मंडल के प्रमुख लेखक, कवि, पत्रकार प्रताप नारायण मिश्र (सितंबर, 1856-जुलाई, 1894) पर उनके सहयोगी रहे हिंदी के विद्वान गोपाल राम गहमरी का आत्मीय संस्मरण।

”वर्तमान समय हिंदी-लेखकों की तीसरी पीढ़ी का समय है। पहली पीढ़ी के जो इने-गिने लेखक रह गए हैं उनमें गोपाल राम गहमरी आज भी उसी लगन से साहित्य-सेवा में जुटे हैं। इस लेख में आपने पहली पीढ़ी के प्रमुख लेखक स्व. पं. प्रताप नारायण मिश्र का संस्मरण लिखा है। इससे पाठकों को यह भी मालूम होगा कि उस समय हिंदी लेखकों की क्या स्थिति थी।”
 सरस्वती, जून-1935, सं.-देवीदत्त शुक्ल, श्रीनाथ सिंह

स्व.  भारतेन्दु के समकक्ष कवि जिन पं. प्रताप नारायण मिश्र का संस्मरण लिख रहा हूं वे जब मुझे चिट्ठी भेजते थे तब मोटो की तरह ऊपर ”खुदादारमचेगमदारंभ” यह वाक्य लिखा करते थे। मिश्र जी उन्नाव जिले के बेल्थर गांव के रहने वाले थे। बाद को कानपुर में आए। उनके वहां कई मकान थे और वहीं ‘सतघरा’ महल्ले में रहते थे। उनका दर्शन मुझे कालाकांकर में हुआ था। जब मैं 1892 ई. में कालाकांकर नरेश तत्रभवान राजा रामपाल सिंह की आज्ञा से ‘हिंदोस्थान’ के संपादकीय विभाग में काम करने को पहुंचा, तब वहां साहित्यकारों की एक नवरत्न कमेटी-सी हो गई थी। उस समय वहां पं. प्रताप नारायण मिश्र, बाबू बालमुकुन्द गुप्त, पं. राधारमण चौबे, पं. गुलाबचन्द चौबे, पं. रामलाल मिश्र, बाबू शशिभूषण चटर्जी, पं. गुरुदत्त शुक्ल और स्वयं राजा साहब आदि लोग थे।
मुझसे मिश्र जी का पत्रालाप और पहले से था, लेकिन उनका दर्शन वहीं पहले-पहल हुआ। मैं रात को वहां पहुंचा और बाबू बालमुकुन्द गुप्त के यहां ठहरा था। मेरा उनका (गुप्तजी का) पत्र द्वारा परिचय उसी समय से था जब मैं बंबई में सेठ गंगाविष्णु खेमराज के यहां था और मेरा ‘श्री वेंकटेश्वर पे्रस’ में काम करते समय ‘हिन्दोस्थान’ में छपें त्रिपटी के महन्त के आचरण-संबंधी एक लेख पर गुप्त जी से विवाद हो उठा था। गुप्त जी में यह गुण था कि जो उनकी भूल दिखाता था उस पर वे अनखाते नहीं थे, प्रसन्न होते थे। उसी के फलस्वरूप मुझे राजा साहब के यहां जाना पड़ा था।
जब सवेरे मैं उठकर दातून कर रहा था तभी उनके चौतरे पर चढ़ते हुए खद्दर का बहुत लम्बा कुत्र्ता और धोती पहने, कंधों पर तेल चुचआते, लंबे बाल लहराते, झूमते हुए एक देवता ने कहा, ”तुम्हूं बालमुकुंदवा की तरह सवेरे-सवेरे लकड़ी चबात हो।”
मैं तो उनका रूप, उनकी चाल, उनकी लंबी-ऊंची नाक, उनका उज्ज्वल रूप देखकर धक् से रह गया। उनका रूप निहारने के सिवा मुझे उस समय और कुछ कहते नहीं बना। वे अपनी बात पूरी कर बैठक में चले गए। मैं जल्दी-जल्दी प्रात: क्रिया निपटाकर भीतर गया। जिस खाट पर वे देवता बैठे थे उसी पर मुझे बिठाकर नम्रता से बोले- ”आपने मुझे पहचाना न होगा। मेरा एक बौड़म कागज है, जो हर महीने आपके यहां भी जाया करता है। उसका नाम ‘ब्राह्मण’ है।”
इसके आगे उनको कुछ कहने की जरूरत ही नही रही। मैंने उठकर सादर प्रणाम किया, लेकिन उन्होंने फिर से उसी सम्मान से बिठाकर अपना स्नेह दिखाया और बाबू बालमुकुंद गुप्त भी, जो इतनी देर से मुस्कराते हुए ‘हिंदोस्थान’ का आलेख लिख रहे थे, समालाप में शामिल हुए। उसी दिन पंडित जी का मुझे पहले-पहल साक्षात् दर्शन हुआ था। तब से मेरे ऊपर मिश्र जी का स्नेह बहुत बढ़ा, वे मुझे अपने लड़के की तरह प्यार करने लगे। उनके साथ में कालाकांकर के जंगलों में बहुत घूमता था। वहां स्वास्थ्यकर वायु के सिवा मकोय खाने को खूब मिलता था। मैं घूमने का सदा से आदी हूं। अपराह्नï का समय हम लोगों का कालाकांकर के जंगलों में ही बीतता था। ‘हिंदोस्थान’ दैनिक ‘आज’ का आधा केवल चार पेज ही निकलता था। बाबू बालमुकुंद गुप्त अग्रलेख के सिवा टिप्पणियां भी लिखते थे। बाकी समाचार, कुछ साहित्य और स्वतंत्र स्तंभ के लिए मेरे ऊपर भार था। पं. प्रताप नारायण मिश्र ‘हिंदोस्थान’ पत्र के काव्य भाग के संपादक थे। वे फसली लेखक थे। जब कोई फसल जैसे जन्माष्टïमी, पित्रपक्ष, दशहरा, दीपावली, होली आते तब इन अवसरों पर हम लोग उनसे कविता लिया करते थे। पं. राधारमण चौबे और गुलाबचंद जी अंग्रेजी अखबारो का सार संकलन करते थे। इंग्लिशमैन, पायनियर, मार्निंगपोस्ट और सिविल मिलिटरी गजट उन दिनों एंग्लो इंडियन अखबारों में मुख्य थे। उनका मुंहतोड़ जवाब राजा रामपाल सिंह ‘हिंदोस्थान’ में दिया करते थे। आजकल हिंदी मे दैनिक पत्र बहुत निकलते हैं। काशी, कलकत्ता, दिल्ली, लाहौर, इलाहाबाद आदि से निकलने वाले विशाल हिंदी दैनिक पत्रों के दर्शन जैसे इन दिनों हिंदी पाठकों को हुआ करते हैं, उन दिनों वैसे नहीं थे। हिंदी के प्रेमी दैनिक पत्रों के लिए तरसते थे। मासिक और साप्ताहिक पत्रों के लिए तो हिंदी की दुनिया में कमी नहीं थी, लेकिन दैनिक पत्र तो हिंदी का एक ही ‘हिंदोस्थान’ ही था। उसमें एक बड़ी खूबी थी। यह कि वह दैनिक, राजनैतिक विषयों से जैसे भरा पूरा रहता था, वैसे ही साहित्य से ही संपन्न रहता था। आजकल हिंदी दैनिकों में राजनैतिक लेखों के आगे साहित्यिक विषय काव्य, नाटक आदि की चर्चा बहुत कम रहती है। किसी हफ्ते में एक-दो लेख निकल आते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि राजनीतिक लेख जिस अधिकता से आजकल दैनिकों में निकलते हैं, वैसे इनमें साहित्य के लेखों की अधिकता नहीं देखी जाती।
पं. प्रताप नारायण मिश्र में कई अनोखे गुण थे। कविता उनकी बहुत ऊंचे दर्जे की होती थी। भारतेन्दु ने भी उनके काव्य की बढ़ाई की थी। नाटक और रूपक भी बड़ी ओजस्विनी भाषा में लिखते थे। अपने लेख में जहां जिसका वर्णन करते थे, वहां उसको मानो मूर्तिमान वहां खड़ा कर देते थे। कलिकौतुक नाटक, जुआरी, खुआरी रूपक आदि उनकी लिखी पुस्तिकाओं के पढऩे वाले इसके साक्षी हैं। बंकिम बाबू के उपन्यासों के अनुवाद उन्होने हिंदी में किए थे। उनकी पुस्तक बांकीपुर के ‘खड्गविलास प्रेस’ में छपी है। उस प्रेस के स्वामी मिश्र जी की पुस्तकों को छापने पर भी उनके प्रचार में उदासीन ही रहे। भारतेन्दुजी की सब पुस्तकों को छापने का अधिभार भी ‘खड्गविलास प्रेस’ के स्वत्वाधिकारी को है, लेकिन उन पुस्तकों के प्रचार का उद्योग नहीं देखने में आया। भारतेन्दुजी के पुस्तकों का प्रचार तो काशी की नागरी प्रचारिणी ने भी प्रकाशन करके किया, भारत जीवन प्रेस से भी भारतेन्दुजी की पुस्तकें प्रकाशित हुईं, लेकिन मिश्र जी की पुस्तकों का प्रचार आज कहीं नहीं दीख पड़ता। स्कूल और विद्यालयों की कोर्स-बुकों में उनके लेख और कविताओं का प्रचार कुछ हद तक है, लेकिन साहित्य के क्षेत्र में उनकी कीर्ति लोप सी हो रही है।
पं. प्रताप नारायण मिश्र सत्य भाषी थे। उनके मुंह से भूलकर भी असत्य कभी सुनने को नहीं मिला। वे बड़े निर्भीक और बड़े हाजिर जवाब थे।
कालाकांकर में प्रवाास काल में पितृपक्ष में आग्रह करने पर उन्होंने ‘तृष्यन्ताम’ शीर्षक से लंबी कविता लिखी। उसमें उन्होंने समाज नीति, राजनीति और धर्म सब भर दिया। उन्होंने कचहरियों की देशा को देखकर उसमें लिखा है-
अब निज दुखहू रोय सकत नाहिं,
प्रजा खरीदे बिन इस्टाम।
पंडित जी अपने कान हिलाया करते थे। जब दो-चार मित्र इकट्ठे होते तब कहने पर पशुओं की तरह कान हिलने लगते थे। हंसी-दिल्लगी में भी कभी झूठ नहीं बोलते थे। एक बार भादों के महीने में वे अपने हाथों में मेंहदी रचाए हुए आए। मैंने पूछा, ”पंडित जी, तीज मे आप मेंहदी रचाते हैं?” उन्होंने छूटते ही कहा, ‘अरे भाई! मेंहदी न रचाऊं तो मेहरिया मारन लगे। यह उसी की आज्ञा से तीज की सौगात है।”
मिश्र जी बड़े हंसोड़ थे। कविता तो चलते-चलते करते थे। एक बार कानपुर के मित्र-मंडली के आयोजन से एक नाटक खेला गया। उसमे हिंदी के बड़े-बड़े उद्भट लेखकों ने भाग लिया। शब्दकोषों के रचयिता राधा बाबू भी उसमे थे। प्रसिद्ध कवि और सुलेखक राय देवी प्रसाद पूर्ण का भी उसमें सहयोग था।
मिश्र जी नास बहुत सूंघते थे। सुघनी भरा बेल सदा अपने अंदर खद्दर के कुर्तेवाले पाकेट में रखते थे और जब चाहा बेल निकालकर हथेली पर नास उड़लते और सीधे नाक में सुटक जाते थे। एक बार उसी नाटक मे राधा बाबू पियक्कड़ बनकर आये और झूम-झूम कर कहने लगे-
कहां गई मोरि नास की पुडिय़ा,
कहां गई मेरी बोतल।
जिसको पीके ऐसे चलिहौं,
जै लड्डू कोतल।
चलो दिल्ली चलें हरे-हरे खेतन की सैर करें।

इसे पंडित प्रताप नारायण मिश्र ने अपने ऊपर ताना समझा। उस समय वे नेपथ्य में मछली बेचने वाली मल्लाहिन का स्वांग भर चुके थे। झट स्टेज पर आकर बोले-
बाम्हन छत्री सभी पियत हैं,
बनिया आगरवाला।
हो मल्लाहिन पिउ लयी तो
क्या कोई हंसेगा साला।

चलो दिल्ली चले हरे-हरे खेतन की सैर करें।
मुंहतोड़ जवाब की कविता सुनकर सभी बड़े प्रसन्न हुए।
पंडित जी कविता में अपना उपनाम ‘बरहमन’ रखते थे, इसी से उन्होंने अपने मासिक पत्र का नाम ‘ब्राह्मण’ रखा था। उर्दू शायरी भी उनकी बड़ी चुटीली होती थी। उन्होंने नीचे लिखी पुस्तकें लिखी हैं-
शृंगार बिलास, मन की लहर, प्रेम प्रश्नावली, कलिकौतुक रूपक, कलिप्रभाव नाटक, हठी हमीर, गौ संकट, जुआरी-जुआरी, लोकोक्ति शतक, दंगल खंड, रसखान शतक, तृष्यन्ताम्, ब्राडला स्वागत, भारत दुर्दशा, शैव सर्वस्व, मानस विनोद, वर्णमाला, शिशु विज्ञान, स्वास्थ्य रक्षा, प्रताप संग्रह।
और नीचे लिखी पुस्तकों का अनुवाद किया-
राजसिंह, इंदिरा, युगलांगुलीय, सेनवंश व सूबे बंगाल का इतिहास, नीतिरत्नावली, शाकुन्तल, वर्ण परिचय, कथावल संगीत, चरिताष्टïक, पंचामृत।
कालाकांकर प्रवास में उन्होंने ब्राडला-स्वागत और तृष्यन्ताम् नाम से कविताएं लिखी थीं।
मिश्र जी हिंदी की दीन-दशा पर बड़ा दुख करते और साथ ही बंगला उन्नतावस्था पर बहुत प्रसन्न होते थे। वे कहा कहते थे कि देशी भाषाओं मे बंग भाषा का साहित्य पर खूब भूरा-पूरा है। इसका कारण यह है कि उसके लेखक धनी-मनी और समृद्धशाली तथा ऊंचे पदों पर पहुंचकर भी अपनी मातृभाषा के प्रचार का खूब उद्योग करते हैं। उसके लेखक अंग्रेजी आदि विदेशी भाषाओं में ऊंचा ज्ञान प्राप्त कर उन उन भाषाओं के सब उपयोगी विषय अपनी मातृभाषा में लाकर साहित्य भण्डार भरने में सदा सहायक होते हैं। उस भाषा के पाठक भी बहुत हैं। उन दिनों बंग भाषा में ‘दैनिक चन्द्रिका’ निकलती थी। उसमें समाचार और राजनैतिक लेखों के सिवा साहित्यिक लेख भी खूब होते थे। पंडित जी ने राजा रामपाल सिंह को वही दिखाकर ‘हिंदोस्थान’ में साहित्य स्तम्भ का कालम सन्निवेश कराया था।
पंडित जी कहा करते थे- भारतेन्दु के पास धन था। उनकी कीर्ति धन-बल से ही थोड़े ही दिनों में खूब फैली। मेरे पास भी रुपया होता तो मैं भी हिंदी मे बहुत कुछ काम करता। हिंदी में पाठकों की संख्या इतनी कम है कि उनके भरोसे कोई ग्रंथकार उत्साहित होकर आगे नहीं बढ़ सकता। वे दिन भी कभी आएंगे जब हिंदी के पाठक बंगला के पाठकों की तरह खूब बढ़ेंगे, जिनके भरोसे हिंदी के ग्रंथकार फलेंगे-फूलेंगे और उदर-भरण की चिंता से मुक्त होकर हिंदी में ग्रंथ-रत्न संग्रह करके गरीबिनी हिंदी को उन्नत करेंगे। शायद मेरे मरने के बाद वे दिन आयें।
कालाकांकर के जंगल में घूमते हुए एक बार मुझसे उन्होंने कहा था- ”बच्चा, मेरे पास एक अनमोल वस्तु है। जिसे मैंने बेदाम लिया है, लेकिन उसकी तुलना में संसार की दौलत भी पलड़े पर रखी जाए तो वह हल्की होगी। उसको हम भी बेदाम देने को तैयार हैं, लेकिन कोई लेने वाला नहीं मिलता।” मैं अचकचाकर उनका मुंह ताकने लगा और पूछा, ”वह कौन सी चीज है, पंडित जी? जरा मुझे भी बताइए।”
पंडित जी ने कहा, ”यों नाम जानकर क्या करोगे? तुम लेते हो तो अलबत्ते मैं देने को तैयार हूं।” मैंने कहा, ”इतना महान पदार्थ, जिसकी तुलना में दुनिया भर की संपत्ति हल्की है, मैं भला कहीं पा सकता हूं।”
पंडित जी बोले, ”नहीं, वह कोई ऐसी भारी या नायाब चीज नहीं है, जिसके बोझ से तुम पिस जाओगे। वह संसार में अतुलनीय है और अनमोल होने पर भी ऐसी है कि जो जब चाहे ले ले। उसमें कुछ दाम नहीं लगेगा, न कुछ बोझ ही उठाना पड़ेगा।”
मैं तो बिल्कुल न समझकर अचरज में आ गया। कहा, ”अगर मेरे साध्य का हो, मैं ग्रहण कर सकता हूं तो ऐसा अनमोल पदार्थ लेने को तैयार हूं।” उन्होंने भूत झाडऩे वाले ओझाओं की तरह अकड़कर कहा, ”ले बच्चा! ये सत्य भाषण है।”
मैं तो सकते में आ गया। और कुछ देर तक विस्मय में पड़े रहकर फिर बोला, ”पंडित जी, है तो जरूर यह अनमोल और जगत में इसकी तुलना में कुछ भी नहीं है, लेकिन बहुत ही कठिन ही नहीं, बल्कि असाध्य भी है।”
उन्होंने कहा, ”नहीं बच्चा! यह असाध्य नहीं और कष्टï साध्य भी नहीं। तुम चाहो तो बड़ी सुगमता से इसे सिद्ध कर लोगो।”
मैंने कहा, ”पंडित जी! रात-दिन मैं झूठ बोला करता हूं। यहां तक कि बेजरूरत झूठ बोलने की बान-सी पड़ गई है। जिसका झूठ तो ओडऩ-डासन और चबैना है वह कैसे सत्य भाषण कर सकता है?” उन्होंने उसी दम से कहा, ”इसका रास्ता मैं बताए देता हूं। तुम आज से ही मन में सत्य बोलने की ठान लो और जब मुंह से इच्छा या अनिच्छा से झूठ बोल जाओ तब याददाश्त लिख लिया करो और मुझे संध्या को बतला दिया करो कि आज इतना झूठ बोला। बस, इसके सिवा और कुछ भी उपाय दरकार नहीं है।”
मैं उस घटना के बाद वाले अपने अनुभव से कहता हूं, उनकी ये बात बिल्कुल सत्य है। उस दिन से मैं नम्बर लिखने लगा और महीने भर नहीं बीता कि अभ्यासवश अनजाने अर्थात इच्छा विरुद्ध जो झूठ निकल जाता था वही रह गया था। स्वयं अपने मन में रुकावट हो गई और मैं उनका इस विषय में चेला हो गया।
एक बार राजा रामपाल सिंह ‘हिंदोस्थान’ पत्र के लिए अग्रलेख लिखा रहे थे। जो कुछ वे बोले जाते थे उसको लिखने में जो उनसे दोबारा कुछ भी पूछता था उस पर बहुत बिगड़ उठते थे। मैं तेज लिखता था। इस काम के लिए वे सदा मुझे बुलाया करते थे। सफर में भी मुझे साथ रखते थे। एक बार वे अशुद्ध बोल गए, लेकिन मैने शुद्ध लिख लिया। जब समाप्त होने पर सुनने लगे तो जहां मैने सुधारकर लिखा था उसको सुनते ही अशुद्ध कहकर उसे सुधारने को कहा। पंडित जी वहीं बैठे थे। उन्होंने कहा कि लड़के ने शुद्ध लिखा है। इस पर राजा साहब बिगड़कर पंडित जी से बोले, ”आप बड़े गुस्ताख हैं।” पंडित जी ने छूटते ही कहा, ”अगर सच्ची बात कहना आपके दरबार में गुस्ताखी है तो मैं सदा गुस्ताख हूं।”
राजा साहब को और क्रोध आया और गर्म होकर बोले, ”निकल जाव यहां से।”
पंडित जी बोले, ”हम यहां से चले।” यह कहकर उसी दम बारादरी से उठे और चले गए। फिर कभी उनके यहां नहीं गए। और थोड़े दिन में अपना हिसाब चुकाकर कानपुर चले गए। बाबू बालमुकुंद गुप्त, पं. रामलाल मिश्र आदि किसी की भी बात उन्होंने नहीं सुनी।
पंडित जी कभी स्नान नहीं करते थे। मित्रों के आग्रह करने पर टाल जाते थे। जब कभी कोई त्योहार या बड़ा पर्व आता, बहुत उद्योग करने पर कभी-कभी स्नान कर लेते थे। कालाकांकर में उनके डेरे के सामने ही थोड़ी दूर पर गंगा जी बहती थी, लेकिन अपने मन में उन्होंने कभी स्नान नहीं किया। जब मित्र-मंडली उनको स्नान कराने पर तुल जाती थी तब भी बड़ा समर लेना पड़ता था।
एक बार उन्हें लोग टांगकर गंगा तट पर ले गए। किनारे जाकर भी भागने लगे। तब सबने उन्हें उठाकर गंगा में फेंकना चाहा। उन्होंने कहा, ”अच्छा गंगा में ऐसा डालना कि मेरा पांव पहले गंगा में न पड़कर मस्तक ही पड़े।” तब वैसा ही किया गया। कालाकांकर में मिश्र जी को तीस रुपये मासिक दिए जाते थे। उस समय वह तीस रुपया उनके निर्वाह के लिए काफी थे। कानपुर से मकानों का किराया आया करता था।
पंडित जी के कालाकांकर में रहते समय पंडित श्रीधर पाठक की पुस्तक ‘एकान्तवासी योगी’ का प्रकाशन हुआ और खड़ी बोली मे व्यवहृत हो इस पर बड़ा विवाद छिड़ा। ‘हिंदोस्थान’ में ‘स्वतंत्र स्तंभ’ नाम का एक अलग कालम था। उसमें खड़ी बोली की कविता के पक्ष और विपक्ष के लेख सालाना प्रकाशित किए जाते थे। पाठक जी के पक्ष में मुजफ्फरपुर की कलक्टरी के पेशकार बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री मुख्य थे। उन्होंने विलायत से सुंदरतापूर्वक खड़ी बोली काव्य छपवाकर यहां मंगाया और बिना मूल्य वितरित किया। खड़ी बोली की कविता का प्रचार ही उनका मुख्य उद्देश्य था। इसके सिवा गढ़वाल के पं. गोविंद प्रसाद मिश्र खड़ी बोली में कविता करके उत्साह बढ़ाते थे। लेकिन विपक्ष में बड़े-बड़े प्रभावशाली कवियों ने कलम उठाए थे।
पं. प्रताप नारायण मिश्र खड़ी बोली की कविता के विरोधियों में प्रधान थे। लखनऊ के ‘रतिक पंथ’ के संपादक से लेखक व सुकवि पं. शिवनाथ शर्मा भी खड़ी बोली की कविता के विरोधी थे। लेकिन राष्ट्रभाषा के प्रचार को और जिस भाषा का साधारण बोल-चाल में प्रचार है उसको कविता में भी अधिकार देना उसकी और राष्ट्रभाषा दोनों की उन्नति के लिए परमावश्यक है, इस विचार से प्रेरित होकर सबको खड़ी बोली की कविता के आगे अवनत होना पड़ा। इसके सिवा पं. श्रीधर पाठक ने भी यह सत्य प्रमाणित कर दिया कि उत्तम और रोचक लालित्य पूर्ण कविता करना कवि की शक्ति पर निर्भर है, भाषा पर नहीं।
तब पंडित जी ने राष्ट्रभाषा की उन्नति का ध्यान करके कह दिया, ”अच्छी बात है। आप कविता कर चलिए। मैं भी उस पर रोड़ा-कंकड़ फेंकता चलूंगा। लेकिन, याद रखिए, यह सड़क ऐसी सुंदर नहीं बनेगी कि कवि की निरंकुश शक्ति बेरोक-टोक दौड़ सके।”
पाठक जी ने कहा, ”हम इंजीनियरों को आप जैसे कंकड़ फेंकने वाले खचिवाहों की बहुत जरूरत है। आप उसे फेंकते चलिए। देखिएगा, यह सड़क ऐसी सुंदर और उत्तम बनेगी कि कवि लोग बे-रोक इस पर सरपट दौड़ेंगे।”
मिश्र जी की आत्मा स्वर्ग लोक से यह देखकर खूब प्रसन्न होती होगी कि खड़ी बोली काव्य किस उन्नत दिशा को प्राप्त है और कैसे-कैसे उद्भट कवि इन दिनों हुए हैं जिनकी मर्यादा और काव्य शक्ति के आगे अब बिरले ही किसी कवि की ब्रज-भाषा की कविता में रुचि देखी जाती है। पंडित जी का जन्म आश्विनी कृष्ण नौमी को संवत 1913 वि. में हुआ था। अड़तालीस वर्ष की उम्र में आप अषाढ़, शुक्ल चौथ को संवत 1951 वि. में परलोकवासी हो गए।

नीरज का काव्यपाठ 28 को

नई दिल्ली : पंडित गोपालप्रसाद व्यास की पांचवीं पुण्यतिथि के अवसर पर 28 मई को हिंदी भवन सभागार में काव्य-यात्रा : कवि के मुख से कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। इसमें लोकप्रिय कवि गोपालदास ‘नीरज’ का एकल काव्यपाठ होगा। मुख्य अतिथि पृथ्वीराज साहनी, मेयर दिल्ली होंगे।

चंद्रमुखी का दान : शरतचंद्र

शरतचंद्र के विरुद्ध एक पत्रिका में लेख छपा। उसी के संबंध में आलोचना हो रही थी। अपने मित्रों की बैठक में शरत बाबू ने कहा-
मेरे विरुद्ध सबसे बड़ा अभियोग यह है कि मैं पापियों का चित्रण इतने मनोहर ढंग से क्यों करता हूं। लोगों का विश्वास है कि मैं पतिताओं का समर्थन नहीं करता। हां, उनका अपमान करने का दिल नहीं चाहता। आखिर वे भी इंसान हैं, उन्हें भी फरियाद करने का हक है। एक दिन महाकाल के दरबार में सबका फैसला होगा। संस्कार की मूढ़ता के कारण लोग इसे स्वीकार करना नहीं चाहते। फिर परिपूर्ण मनुष्यत्व तो सतीत्व से बढ़कर है। मैंने अनेक सती नारियों को चोरी, दगा, फरेब, जालसाजी और झूठी गवाहियां देते देखा है। इसके विपरीत घटनाएं भी मैंने देखी हैं। आज तुम्हें एक ऐसी ही कहानी सुना रहा हूं। इस घटना को अपनी आंखों नहीं देखा है- फिर भी सत्य है। इस घटना से संबंधित दोनों ही व्यक्ति मेरे परिचित हैं, उनकी जबानी सुना है।
जिन लोगों की कहानी कह रहा हूं- वे दो मित्र हैं। दोनों में दांत-काटी रोटी थी। हर मौके पर वे दोनों साथ जाते थे। एक दिन दोनों एक वेश्या के यहां गए। मस्ती में आए बिना मौज का आनंद नहीं आएगा, यह सोचकर एक बोतल भी ले गए।
जहां वे लोग गए, वह लड़की नाचना-गाना भी जानती थी। नृत्य-गीत का कार्यक्रम जमकर हुआ। इधर पेग पर पेग चलते रहे। कुछ देर बाद दोनों नशे में धुत हो गए। फिर कौन किधर लुढ़का, पता नहीं। कहां कुर्ता, कहां धोती है, इसकी सुध नहीं रही। एक तरह से अचैतन्य हो गए।
दूसरे दिन नशा उतरने पर उनमें से एक जम्हाई लेता हुआ उठ बैठा। अचानक उसका हाथ कमर पर गया। और रो पड़ा, ”अरे बाप रे! मैं तो लुट गया। बरबाद हो गया।”
चीख-पुकार से दूसरे शराबी की आंखें खुल गईं। उसने आंखें मलते हुए पूछा, ”इतना चिल्ला क्यों रहे हो? क्या हुआ है?”
”पूछ रहे हो चिल्ला क्यों रहा है? मैं लुट गया। फेंटे में तीन हजार के नोट थे, नहीं हैं। तूने तो नहीं रखा है न?”
”मुझे क्या गरज पड़ी है, छिपाने की। कल रात से मैं बेखबर हूं। अभी-अभी तेरी चीख सुनकर उठा हूं।”
”तब तो हो चुका। मैं तो लुट गया दोस्त! मालिक का रुपया था। अब जाकर अगर सारा हिसाब समझाकर न दिया तो नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा और ऊपर से जेल भी जाना पड़ेगा। इस समय मेरे पास एक पैसा भी नहीं है कि देकर हिसाब समझा सकूं। फिर एक-दो रुपया नहीं, पूरे तीन हजार थे। इस समय इतना रुपया मुझे कौन देगा? हाय भगवान! अब मैं क्या करूं?” वह व्यक्ति बच्चों की तरह रोने लगा।
रोने से तो रुपया मिलता नहीं। मित्र की सलाह के अनुसार दोनों ने मिलकर सारे कमरे को अच्छी तरह देखा। लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला। इसके बाद उन्हें एक लड़की की याद आ गई। आखिर वह लड़की कहां चली गई? वह तो नहीं दिखाई दे रही है। कल रात जब हम लोग बेहोश हो गए, तब उस लड़की ने तो सारे रुपये गायब नहीं कर दिए? लगता है, उसी ने लिए हैं। वरना इस कमरे से रुपये उड़ थोड़ा ही जाते।
ठीक इसी समय जिसके बारे में चर्चा हो रही थी, वह लड़की कमरे में आई। जिसका रुपया गायब हो गया था, वह उसे देखते ही फुक्का फाड़कर रो पडा। इतनी बड़ी रकम, महाजन की नादिरशाही, नौकरी से हाथ धोना और लाल हवेली की संभावना वह एक सांस में कह गया।
सब कुछ सुन लेने के पश्चात उस लड़की ने कहा, ”नशे में धुत होकर आप दोनों लुढ़कते-लुढ़कते फर्श के उधर चले गए थे। वहां से उठाकर आप लोगों को मैंने यहां तकिया लगाकर सुला दिया। उस समय आप लोगों ने मुझे कितनी गालियां दीं- नहीं कहना चाहती। यह सब तो हमें नित्य सुनना ही पड़ता है। खैर, किसी सूरत में आप लोगों को लिटाकर जब मैं कमरे से बाहर जाने लगी तो देखा कि एक ओर रुपयों की थैली पड़ी है। उठाकर देखा-काफी नोट थे। उस थैली को लेकर सारी रात पहरा देती रह गई। यहां का पड़ोस कितना खराब है, आपसे छिपा नहीं है। तरह-तरह के लोग आते ही रहते हैं। गुंडे-बदमाश तो घात लगाए बैठे रहते हैं। मेरा विश्वास है कि कुछ गुंडों को यह बात मालूम हो गई थी कि आपके पास रुपये हैं। इसलिए कुछ गुंडे, जिन्हें मैं अच्छी तरह पहचानती हूं, इस कमरे के पास कई बार चक्कर काटते रहे। हिम्मत न होने के कारण वे भीतर नहीं आ सके। सोचा होगा कि आप लोगों के बाहर निकलने पर मार-पीटकर छीन लेंगे। कुछ ही रुपयों के लिए ये लोग खून तक कर सकते हैं। इधर मेरी क्या हालत थी- सोचिए। आप लोगों का रुपया मेरी मु_ïी में, बाहर गुंडों का चक्कर काटना, यह सब देखकर मैं बहुत डर गई। इसलिए बंद कमरे में बैठकर रात भर इन रुपयों की हिफाजत के लिए जागती रही। सुबह होने पर ही बाहर आई।”
इतना कहकर कमर में बंधी रुपयों की थैली देते हुए वह बोली, ”देख लीजिए, सब ठीक है न?”
कहानी समाप्त करते हुए शरत्चंद्र ने कहा, ”अब उस लड़की की महत्ता की कल्पना कीजिए। जो लड़की थोड़े-से रुपयों के लिए अपनी अस्मत भरे बाजार में बेच रही है, उसने तीन हजार जैसी मोटी रकम के लालच को कैसे ठुकरा दिया? यह कम महत्व की बात है? मान लो वह कह देती कि रुपये मैंने नहीं लिए हैं तो वे रुपये क्या वे लोग उससे वसूल कर पाते?”
इसीलिए मेरा यह कहना है कि उनका बाहरी रूप ही उनका असली परिचय नहीं है। ये भी इंसान हैं, इनके पास भी दिल है और इस दिल की सारी प्रवृत्तियां मर नहीं गई हैं। दूर क्यों जाते हैं। एक साधारण बात पर गौर फरमाइये कि ये लोग आज जिस राह को अपनाते हैं- क्या अपनी इच्छा से? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? वे नहीं- हमारा समाज। अगर इनके दिल की वकालत की जाए तो हमारे समाज की अनेक सती नारियों से वे कहीं अच्छी हैं।
इस कहानी को सुनने के बाद मेरी आंखें खुल गईं। इस लिए चंद्रमुखी (देवदास उपन्यास की एक पात्री) का इतना सुंदर चित्रण कर पाया। इसी लड़की ने चंद्रमुखी के सारे उपादानों को मुझे दान के रूप में दिया।

आसाराम बापू और कमला बुआ : कांतिकुमार जैन

पिछले दिनों किन्नरों को कोसते हुए आसाराम बापू ने बयान दिया था। उनका लक्ष्य सागर की मेयर कमला बुआ थीं। संतजी के बयान को लेकर असली और नकली किन्नरों की पहचान करता चर्चित संस्मरणकार का आलेख-

कुछ दिनों पहले उज्जैन में आसाराम बापू ने किन्नर विषयक बयान क्या दिया कि राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भूचाल आ गया, जिन लोगों ने संत श्रेष्ठ को टी.वी. पर किन्नरों की खास अदा में ताली बजा-बजाकर, अंगुलियां नचा-नचाकर, दीदे मटका-मटाकर किन्नरों को सराहते हुए देखा, उनके तो मानो जीते-जी ही स्वर्ग मिल गया। श्वेत, हिम धवल दाढ़ी, भौंहों तक के बाल सफेद, परदनिया और कुर्ता भी झकाझक सफेद। जब वे नाच-नाचकर, लहरिया लेते हुए किन्नरों को कोस रहे थे तो संयोग से टी.वी. पर यह नयन महोत्सव देखने का सौभाग्य मुझे भी मिला। टीवी पर संत आसाराम किसी भी किन्नर से ज्यादा किन्नर लग रह थे। किन्नरों के प्रति उनकी घृणा छिपाये नहीं छिप रही थी। लगता था कि इस धराधाम पर सबसे गर्हित प्राणी कोई है तो वह किन्नर ही है। इतनी घृणा संतों को शोभा नहीं देती, पर घृणा का मूल कारण मुझे दूसरे दिन समाचार पत्रों में पढऩे को मिला।
  अहमदाबाद हो या भोपाल, सागर हो या उज्जैन, सबने संतजी की किन्नर विरोधी टिप्पणी की शल्य चिकित्सा की। बापूजी का लक्ष्य सागर की कमला बुआ थी। सागर के बुआ समर्थकों ने कहा कि यह सारा मामला व्यापार का है। आसाराम बापू को लगा कि अभी तक उन्हें देखने और सुनने के लिए जो भीड़ उमड़ती थी, वह अब कमला बुआ को देखने और सुनने के लिए उमड़ेगी। कमला बुआ सागर की मेयर चुनी गई थीं। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों को गहरी शिकस्त दी थी।
भारतीय जनता मौका पडऩे पर असली और नकली का ऐसा भेद करती है कि बड़े-बड़े व्याख्याकार गच्चा खा जाएं। जनता मानती है कि जब हमें किन्नरों में से किसी एक का चुनाव करना है तो असली का ही चुनाव क्यों न किया जाए, सो उसने असली का चुनाव किया। बापू को लगा कि बुआ प्रतिष्ठा और लोकप्रियता में उनसे आगे निकल गईं। इसलिए बुआ को लंगड़ी मारना उन्हें जरूरी लगा। उन्होंने उज्जैन में अपने बयान द्वारा कमला बुआ को लंगड़ी मारी थी, पर यह दांव उल्टा पड़ा। अपनी लंगड़ी से वे स्वयं धराशाही हो गए।
मुझे उस नेता के इस विश्लेषण पर कि सारा मामला व्यापार का है, गंभीरता से विचार करने की जरूरत लगी। मैंने मंथन किया और मंथन का परिणाम निकला- ध्त। इस ध्त को प्राप्त करने में मेरे भाषा विज्ञानी मन ने बड़ा काम किया।
हमारे देश में पिता को बापू कहते हैं। पिता की बहन को बुआ या फुआ कहा जाता है। कई लोग बुआ को फूफी या फूफू भी कहते हैं। ये सारे शब्द संस्कृत के पितृ स्वषा के तद्भव रूप हैं। बुआ यानी बापू की बहन। बापू का बुआ की खिल्ली उड़ाना भारतीय पारिवारिक संबंधों में कोई नई बात नहीं है। अब सागर में बुआ सत्ता में आ गई, सागर की मेयर हो गईं तो बापू को अखरना ही था। सागर में बापू का बड़ा भारी आश्रम है। बात संबंधों की नहीं, सत्ता की है। सत्तासीन बुआ बापू को आंख की किरकिरी लगीं। उन्होंने किरकिरी दूर करने के लिए हथेली का सहारा लिया, अंगुलियों को मटकाया, आगे घूमे, पीछे मुड़े। बुआ जैसी करती थीं, वह सब किया।
ताली बजाना किन्नरों की खास अदा है। ताली बजाता किन्नर समाज में उपहास का पात्र माना जाता है। बापू को लगा कि सागर की जनता ने कमला बुआ को जिताकर यथास्थिति को बदलने की जुर्रत की है। बापू यथास्थितिवादी हंै। समाज बदल गया तो उन जैसे बापुओं को कोई नहीं पूछेगा, इसलिए कमला बुआ जैसे व्यक्तियों पर प्रहार करो।
ताली बजा-बजाकर किन्नर समाज संतति जन्म पर, विवाह के मौके पर, दस्टौन पर, मुंडन पर घर-घर जाकर अपनी जीविका वसूलता है। लोग खुशी-खुशी देते भी हैं। वे जानते हैं कि किन्नरों को यदि उन्होंने इनक नेग नहीं दिया तो ये किसी भी सीमा तक जा सकते हैं और गृहस्थ की थुड़ी-थुड़ी कर सकते हैं।
सागर में ही कोई चार-पांच साल पहले एक किन्नर ने विद्यापुरम के एक शुचितावादी प्रोफेसर की बड़ी थुड़ी-थुड़ीकर दी थी। प्रोफेसर साहब स्थानीय थे, किन्नरों को स्थानीय नामों से पुकारना उन्हें अच्छा लगता। किन्नरों को वे शापग्रस्त मानते थे और स्वयं को पुल्लिंग होने के कारण विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्राणी। वे किन्नरों को किन्नर नहीं कहते थे। ठेठ बुंदेली में कभी हीजड़ा कहते, कभी खसुआ। हीज़ फारसी शब्द है, इसी को और अवज्ञामूलक बनाना हो तो उसमें एड़ा प्रत्यय लगाकर हीजड़ा बनाया जाता है। दुखड़ा, मुखड़ा, टुकड़ा के वजन पर।
अकबर इलाहाबादी ने हीज़ शब्द का प्रयोग बड़े ही शायराना अंदाज में किया है। न हीयों में, न शीयों में। उनका संकेत अंग्रेजी के ‘हीÓ और ‘शीÓ से है। बोलचाल में ऐसे लोगों का परिचय देते हुए कहते हैं उठ बैठ, खड़ी हो जा। पशुओं को खस्सी बनाकर उन्हें अधिक कार्यक्षम बनया जाता है और वे प्रजनन के अयोग्य हो जाते हैं। प्रोफेसर साहब ने घर आए किन्नर को खस्सू कह दिया। कह ही नहीं दिया, उसे गाली भी दी और धक्का भी दिया।
आचार्यजी को पौत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। किन्नर टोली ने जनाना अस्पताल से यह सूचना प्राप्त की थी और अपने कुल की परंपरा के अनुसार अपना कर वसूलने विद्यापुरम आए थे। यहां कर तो मिला नहीं, मिला अपमान, मिले अपशब्द। किन्नर ने कहीं सुना था- सबसे कठिन जाति अपमान सो अपनी बिरादरी का ऐसा अपमान देखकर उसने गिरते-गिरते पुल्लिंग को अपनी जद में लिया और वे निरावृत्त हो धरणी पर धड़ाम से गिरे। यह लीला यहां संपन्न नहीं हुई। पंडितानी चिल्लाई- देखियो-देखियो, पंडितजी को का तो हो गऔ। पंडितजी को कुछ नहीं हुआ था। वे केवल बेपर्द हो गए थे। किन्नर राज ने इस दृश्य का व्यापारिक लाभ उठाने का विचार किया और उन्होंने भी अपनी धोती कमर से ऊपर कर ली। आंधी में उलटी हुई छतरी की तरह। पंंडितानी चिल्ला रही है, पुत्रजी किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हैं, पुत्रवधू सौरी से बाहर आ गई हैं और सोच रही हैं- हे धरती माता, तू फट जा, मैंन उसमें समा जाऊं। पंडितानी किन्नर बुआ से हाहा खा रही है। माई हूने अब सान्त, अपनी लीला समेटिये। यह गृहस्थों का घर है। समधियाने तक बात पहुंचेगी, हम तो कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे।
घर के सामने भीड़ लग गई थी। सब्जी वालों, कबड़ी वालों, ठेले वालों को इस बायस्कोप में बड़ा आनंद आ रहा था। ज्यों-ज्यों पंडितानी की हाहा बढ़ रही थी, न हीजी, न शीजी का रेट भी बढ़ रहा था। सौ रुपए से शुरू हुआ सेंसेक्स बढ़कर अब पांच सौ हो गया था। पंडितानी को अब न पंडितजी की सुध रह गई थी, न बेटे जी की। उन्हें कुल की कान बचाने भर की सुध थी। हम पेंशनदार लोग, बुआ तुम्हें पांच सौ रुपया दे हैं तो हमाओं को बजट बिगड़ जाते। बुआ गुस्सा थूकौ, धुतिया नीची करौ, ये लो सौ रुपैया और मौड़ा को आशीर्वाद दो। वे सौरी में गई। नवजात को उन्होंने बुआ की बढ़ी हुई हथेलियों में डाल दिया। बुआ ने बड़प्पन का परिचय दिया। जुग-जुग जिऔ राजा दशरथ के मौड़ा।
सारे मुहल्ले में यह खबर बिजली की तरह दौड़ गई। जब किन्नर टोली मेरे दरवाजे पर आई तो मैंने उन्हें दस का नोट दिया। कहा- बुआ हमरो रिटायरमेंट हो गयौ है, पंशेन अभी आई नहीं है, इतनेई में सात रखौ। सो हम लुटेरे थोड़ेई हैं। हम भी तुमाऔ दुख-सुख समझत हैं। भगवान ने तो हमारे साथ बड़ों अन्याय करौई है, अब हम अपनी रोजी रोटी कमा रयै, ऐसे में कोई हमें गाली दे हे तो हमें गुस्सा आहे कि नई। बुआ ठीक कह रही थीं। वह चलने को हुईं तो मैंने उन्हें रोका, बुआ हमारी एक बात सुने जाऔ। अगली बेर तुम चुनाव लड़ो, बीना से, कटनी से, शबनम मौसी और फलानी बुआ चुनाव जीत के भोपाल तक पहुंच गई हैं। तुमाऔ जीत बौ पक्को। हमाये वोट के लाने तुम निसाखातिर हो जाओ। बुआ के पैर थम गए। उन्होंने ताली बजाई, सपना मौसी, जूही बुआ और राधा रानी को बुलाया। कहा- देखियौ जे जैन साहब का कै रयै।
मैं नहीं कहता कि कमला बुआ के सागर के मेयर पद का चुनाव जीतने में मेरी उस दिन की प्रेरणा ही थी, पर वे चुनाव लड़ीं और जीतीं। जनता ने उन पर विश्वास प्रकट किया। सामान्य मतदाता नकली किन्नरों से इस प्रकार आजिज आ चुका है कि उसने सोचा चलो इस बार असली किन्नर को मौका देकर देखा जाए, जो सकता है असली किन्नर नकली मर्दों से बेहतर साबित हो।
ऐसे में संत आसाराम बापू का कमला बुआ का मजाक उड़ाना जनता का मजाक उड़ाना है, संविधान का अपमान करना है और लोकतंत्र की जड़ें कमजोर करना है। बापू अपना घर संभालें, दूसरों के फटे में टांग न डालें तो ही अच्छा। उज्जैन में संत आसाराम बापू ने कमला बुआ का मखौल उड़ाकर अच्छा नहीं किया। उनका यह आचरण संतों जैसा नहीं है। कमला बुआ हमारी प्रतिनिधि हैं, वे चुनाव लड़कर और जीतकर सागर की मेयर बनी हैं। उन्हें यह गौरव हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था ने दिया है। संत को जनता के विवेक का उपहास करना शत-प्रतिशत गलत है। हमारी परंपरा में किन्नर को अबध्य माना गया है। शिखंडी का उदाहरण हमारे सामने है। फिर संत प्रवर का कमला बुआ का माखौल उड़ाना किसी भी प्रकार से संतोचित नही है।
यहां भी कमला बुआ आसाराम बापू से बाजी मार ले गईं। संत शिरोमणी ने उज्जैन में अपने हाव-भाव से, बोली बानी से कमला बुआ की जिस भद्दे ढंग से हंसी उड़ाई, उसके उत्तर में कमला बुआ अपनी पर उतर आती तो बापू को भागते रास्ता नहीं मिलता, पर कमला बुआ ने बहुत शलीन ढंंग से, अत्यंत शिष्टतापूर्वक उत्तर में कहा कि मुझे उनका आशीर्वाद चाहिए। वे हमारे वंदनीय संत हंै। संतों के मार्गदर्शन के बिना मैं सफल हो ही नहीं सकती। कमला बुआ ने जिस गरिमा और मर्यादा का परिचय दिया है, उससे उनका कद सभी की दृष्टिï में बहुत ऊंचा हो गया है।
संत आसाराम बापू ताली बजाते हुए बहुत अच्छे लगते हैं, असली किन्नर मय अपनी मूछों और दाढ़ी के। वास्तव में दैहिक किन्नरत्व उतना मालौखस्पद नहीं है, जितना मानसिक किन्नरतत्व। कमला बुआ ने थोड़े ही समय में सागर में अपनी कार्य कुशलता और निर्णय क्षमता से जो छवि अर्जित की है, वह हमें बहुत आशान्वित करती है। वे आसाराम बापू से ज्यादा संत और उनकी तुलना में ज्यादा पुरुष लगती हैं। लोकतंत्र ने उन्हें जो अवसर दिया है, उसका वे भरपूर लाभ उठाएं, अपने कार्यों से जनता की कसौटी पर खरी उतरें। वे यशस्वी हों, सफल हों, जनता को उनसे बहुत उम्मीदें हैं, वे भारतीय लोकतंत्र में तीसरा विकल्प सिद्ध हो सकती हैं।
चलते-चलते एक प्रसंग याद आया। ईरान में किसी मुल्ला ने किसी किन्नर को धक्का दे दिया। किन्नर गिर पड़ा। पर वह करे तो क्या करे। उसने लपककर मुल्लाजी की दाढ़ी का एक बाल नोंच लिया। अरे, अर,े यह क्या करते हो। कुछ नहीं, मुझे मालूम है कि जिसके पास भी आपकी दाढ़ी का मुदद्दस बाल होगा, उसे सीधे जन्नत मिलेगी। यह सुनना था कि वह मौजूद भीड़ मुल्लाजी के बाल नोंचने लगी। मुल्लाजी सारी हेकड़ी भूल गए, पर तब तक काफी देर हो गई थी।
कमला बुआ चाहतीं तो अपने प्रशंसकों, अपने भक्तों, अपनी टोली के सदस्यों को कह देतीं कि संत आसाराम बाप की मूछों और दाढ़ी के बाल जन्नत का पासपोर्ट हैं तो संतजी अपना सारा संतत्व भूल जाते, पर कमला बुआ शरीफ हैं, बेहद शालीन हैं। उन्होंने बडप्पन का परिचय दिया और संत शिरोमणी की माफ कर दिया। बुआ बड़ी साबित हुईं, बापू बौने हो गए!

इस देश का यारो क्या कहना

यह देश है वीर जवानों का अलबेलों का, मस्तानों को… यह गाना चाय की दुकान पर गूंज रहा था। हम लोग बैठे चाय की चुस्की ले रहे थे।
वर्मा बोला, ”जितना बूढ़ा चाय वाला है, उतना ही घिसा-पिटा यह रिकार्ड बज रहा है। जमाना बदल गया है। यह देश तो प्रदर्शनकारियों और उपद्रवियों को हो गया है। इनके पास ऐसे-ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें लेकर इनका कार्यक्रम चलता रहता है। इसलिए देश में प्रत्येक दिन कहीं-न-कहीं धरना-प्रदर्शन और तोडफ़ोड़ हो रही है।” वर्मा ने अपनी बात तार्किक ढंग से पूरी की।
वर्मा के इस तर्क ने हमारे बीच में मौन रूप से स्पद्र्धा पैदा कर दी। हमारी आदत है कि हम दूसरे की सही बात को गलत और अपनी गलत बात को भी सही मानते हैं। इसलिए वर्मा के चुप होते ही कपूर बोल पड़ा, ”देखा जाए तो यह देश नेताओं का है। उन्हीं की तूती बज रही है। नेता ही देश के भाग्यविधाता बन गए हैं। इनकी इच्छा ही कानून है। अपने प्रिय नेता की मौत पर लोग आत्मदाह तक कर लेते हैं। ऐसी अंधभक्ति है, नेताओं के प्रति। जैसे गंगा में डुबकी लगाकर लोग पाप धो लेते हैं, वैसा ही नेता बनकर गुंडा, बदमाश, लंपट, मूर्ख आदि देश में सम्मानित और माननीय बन जाता है।”
”कपूर तू भी क्या बात कर रहा है?” झा ने बता आगे बढ़ाई, ”कहने को तो देश नेताओं द्वारा चलाया जा रहा है, लेकिन वास्तव में चलाने वाले तो नौकरशाह हैं। ये ही नेताओं के हाथ, पैर, आंख, कान हैं। नेता कानून बनाते हैं और आदेश देते हैं, लेकिन अमल करना और न करना तो नौकरशाहों के हाथों में है। ये अन्नदाता और मालिक हैं।  बुजुर्गों ने सही कहा है कि भगवान रूठ जाएं तो मनाना आसान है, लेकिन हाकिम रूठ जाए तो कोई कुछ नहीं कर सकता।”
”अरे भई, यह क्रिकेटरों का देश है।” बात की डोर खान ने पकड़ ली। ”मैच शुरू होते ही देश का माहौल बदल जाता है। लोग अपने कामधाम छोड़कर कमेंटरी सुनने या मैच देखने लग जाते हैं। जो यह नहीं कर पाते हैं, वे हर पल की स्थिति जानने के लिए बैचेन रहते हैं। जिसे खेलों में जरा भी रुचि नहीं होती, वह भी कम से कम स्कोर तो पूछ ही लेता है। मैच में जीत हो या हार, बड़ी खबर वह ही बनती है। क्रिकेटर मैच खेलकर, मॉडलिंग करके खूब पैसा कमाते हैं। इसके बावजूद मैच फिक्सिंग कर उल्लू-सीधा करते हैं, लेकिन देश में क्रिकेटरों के प्रति आकर्षण कम नहीं हुआ है।”
”यह देश उनका है, जिनकी एक झलक पाने के लिए लोग बेकरार रहते हैं। और वे हैं फिल्म स्टार। आज अधिकतर युवक-युवतियों का सपना फिल्मों में काम करना है। बड़ी-बड़ी राजनीतिक पार्टियां भी अपना चुनाव प्रचार अभिनेता और अभिनेत्रियों से करवाती हैं। फिल्म स्टारों ने चुनावों में दिग्गज राजनीतिज्ञों को मात दी है।ÓÓ बनर्जी ने हाथ नचा-नचाकर अपना मत प्रकट किया।
मैं ही भला कैसे चुप रहता? ”यह देश साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का है। ये लोग ही अपने विचारों और आदर्शों से समाज को दिशा दे रहे हैं। हर चीज नाशवान है, लेकिन विचार अमर हैं।” मैंने तर्क दिया।
”तुम सब गलत हो।” नेगी ने मेज ठोकी, ”तुम्हारी बातें एक हद तक सही हो सकती हैं, लेकिन कोई बात पूर्णत: सही नहीं है। हकीकत यह है कि देश भ्रष्टाचारियों का है। हर जगह भ्रष्टाचारियों का बोलबाला है। नेताओं और अफसरों के भ्रष्टाचार की कहानियों जग जाहिर हैं। क्रिकेटरों की पोल खुल चुकी है। फिल्म दुनिया से परदा उठ चुका है।” वह मेरी ओर देखकर बोला, ”क्या तुम्हारा साहित्य जगत भ्रष्टाचारियों से अछूता है? किस तरह साहित्य में गुटबाजी, खेमेबाजी होती है, पुरस्कारों के वितरण को लेकर धांधली होती है, विभिन्न साहित्यिक संगठनों के पदों और विदेशी दौरे पर जाने के लिए भाई-भतीजावाद होता है, यह तुम भी भलीभांति जानते हो। प्रकाशक पाठकों तक पहुंचाने की बजाए, कमीशन के बल पर लायब्रेरी में किताबें खपा रहे हैं।” वह धीरे से मुस्कराया, ”अब तुम ही बताओ कि यह देश किस का है?”
हम सभी को मानना पड़ा कि देश भ्रष्टाचारियों का ही है। नेगी का चेहरा जीत के दर्प से चमक उठा।

हिंदी अकादमी समारोह में 28 साहित्यकार सम्मानित

दिल्ली : साहित्यकारों के विरोध के बावजूद हिंदी अकादमी, दिल्ली ने समारोह आयोजित कर 28 साहित्यकारों एवं कार्टूनिस्ट का सम्मानित किया। पुरस्कार लेने से मना करने वाले लेखकों के नामों की घोषणा भी नहीं की गई। इस अवसर पर अकादमी की त्रैमासिकी इंद्रप्रस्थ भारती का लोकार्पण भी किया गया।
दिल्ली में मंगलवार को हिंदी अकादमी की अध्यक्ष और दिल्ली मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, उडिय़ा कवि डॉ. जगन्नाथ प्रसाद दास, अकादमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर और दिल्ली की संस्कृति मंत्री किरण वालिया ने पुरस्कृत लोगों को सम्मानित किया। अकादमी की अध्यक्ष शीला दीक्षित ने कहा कि बीते वर्षों के पुरस्कार अकादमी के कारण देर से दिए जा रहे हैं। उन्होंने घोषणा की कि पुराने पुरस्कृत लोगों को कम राशि देना उचित नहीं लगता इसलिए 2007-08 और 2008-09 के विभिन्न विधाओं में पुरस्कृत लोगों को भी सम्मान राशि 20 हजार रुपये के स्थान पर 50 हजार रुपये दी जाएगी।
सम्मान समारोह के दौरान कुल 28 साहित्यकारों को वर्ष 2007-08, 2008-09 और 2009-10 के लिए पुरस्कृत किया गया। पहले यह पुरस्कार 23 मार्च को दिए जाने थे, लेकिन विवादों के कारण तिथि बढ़ा दी गई थी। समारोह में 2009-10 के लिए कन्हैयालाल नंदन को काव्य सम्मान, असगर वजाहत को नाटक सम्मान, सुधीश पचौरी को गद्य विधा सम्मान, ज्ञान चतुर्वेदी को हास्य व्यंग्य सम्मान, बालेंदु दाधीच को ज्ञान प्रौद्योगिकी सम्मान, कार्टूनिस्ट इरफान को काका हाथरसी सम्मान और मुजीब रिज़वी को विशिष्ट सम्मान से सम्मानित किया गया। वर्ष 2008-09 के लिए द्रोणवीर कोहली, प्रो. इंद्रनाथ चौधरी, सुरेश सलिल, रामेश्वर प्रेम, बनवारी, अब्दुल बिस्मिल्लाह और गगन गिल को सम्मानित किया गया। प्रो. कृष्ण कुमार और लीलाधर मंडलोई के नाम की घोषणा की गई, लेकिन दोनों साहित्यकार किन्ही कारणवश कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए।
इसके साथ ही 14 साहित्यकारों को 2007-08 के कृति सम्मान से सम्मानित किया गया। हिंदी अकादमी की कार्यकारिणी द्वारा शलाका सम्मान के लिए वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद के चयन के बाद उनके साहित्य को कथित रूप से अश्लील बताए जाने पर उनको सम्मान नहीं देने के बाद पुरस्कार लेने से मना करने वाले केदारनाथ सिंह (शलाका सम्मान), प्रियदर्शन, विमल कुमार, रेखा जैन, अशोक गुप्ता, पंकज सिंह, पुरुषोत्तम अग्रवाल के नाम की घोषणा भी नहीं की गई।

अकादमी पुरस्कार समारोह में मीडिया को इजाजत नहीं

नई दिल्ली : ऐसा पहली बार हो रहा है कि हिंदी अकादमी के पुरस्कार समारोह में मीडिया को आने की इजाजत नहीं है। समारोह का आयोजन आज है। हिंदी अकादमी के सचिव प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव के अनुसार समारोह की कवरेज के लिए मीडिया आमंत्रित नहीं है। समारोह के अगले दिन प्रेस रिलीज जारी कर मीडिया को जानकारी दी जाएगी। उनका कहना है कि यह अकादमी का फैसला है।
वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण वलदेव वेद को शलाका सम्मान नहीं देने को लेकर विवाद चल रहा है। शलाका सम्मान के लिए चयनित केदारनाथ सिंह सहित सात वरिष्ठ साहित्यकारों ने पुरस्कार लेने से मना कर दिया। पुरस्कार समारोह में कोई बखेड़ा न खड़ा हो इसलिए इस बार आयोजन दिल्ली सचिवालय में हो रहा है और इससे मीडिया को दूर रखा गया है। समारोह में मुख्य अतिथि हिंदी अकादमी की अध्यक्ष मुख्यमंत्री शीला दीक्षित होंगी। सम्मान अर्पण उडिया के वरिष्ठ लेखक डॉ. जगन्नाथ प्रसाद दास करेंगे और अध्यक्षता प्रो.अशोक चक्रधर करेंगे।

कविगुरु की जयंती पर संस्कृति एक्सप्रेस रवाना

कोलकाता : कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयंती के अवसर पर 9 मई को देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। उनकी जन्मस्थली और रवीन्द्रभारती विवि के तौर पर परिवर्तित जोड़ासांकू ठाकुरबाड़ी में दिनभर लोगों का तांता लगा रहा। विशिष्ट लोगों ने गुरुदेव के कक्ष में जाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की व उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। कलाकारों ने शांति निकेतन में उनके कुछ गीतों पर नृत्य नाटिकाएं पेश कर श्रद्धांजलि दीं।
रेल मंत्री ममता बनर्जी ने हावड़ा स्टेशन से संस्कृति एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह गुरुदेव की कृतियों व उनसे जुड़े अनछुए पहलुओं से देशवासियों को परिचित कराएगी। एक साल की यात्रा के दौरान यह ट्रेन देश के पंद्रह-बीस पर्यटनस्थलों से गुजरने के बाद 9 मई, 2011 को वापस हावड़ा पहुंचेगी। रेल मंत्री ने कहा कि कविगुरु की 150वीं जयंती पर वर्ष भर विभिन्न कार्यक्रम होंगे। हावड़ा स्टेशन पर रवीन्द्र म्यूजियम व बोलपुर में गीतांजलि म्यूजियम निर्माण के लिए 25 करोड़ मंजूर किए गए हैं। रेलमंत्री ने कहा कि शांतिनिकेतन स्टेशन का आधुनिकीकरण किया जाएगा।
नई दिल्ली में प्रधानमंत्री ने संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में टैगोर के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और भाजपा संसदीय दल के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी सहित अनेक केंद्रीय मंत्री और सांसद उपस्थित थे। बाद में नेशनल गैलरी आफ माडर्न आर्ट में उनकी कला प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रधानमंत्री ने किया। उन्होंने कहा कि विश्व भारती, संस्कृति मंत्रालय और एनजीएमए मिलकर अगले साल पेरिस में टैगोर की कला प्रदर्शनी लगाने की योजना बना रहे हैं। पेरिस में इस प्रदर्शनी के जरिए उनका 150वां जन्म दिवस मनाया जाएगा, क्योंकि यही वह शहर है जहां 1930 में उन्होंने अपनी कला की पहली प्रदर्शनी लगाई थी। इसके लिए सरकार ने राष्ट्रीय समिति का गठन कर दिया है। इसमें अनेक वरिष्ठ मंत्री, मुख्यमंत्री और विख्यात विद्वान एवं विशेषज्ञ शामिल हैं। प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष हैं। उन्होंने बताया कि इसके साथ ही वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में एक अन्य समिति गठित की गई है जो इस भव्य समारोह के कामकाज को देखेगी।