Archive for: April 2010

रामलाल को मिले परमवीर चक्र

आप चौंकिए मत कि मैं रामलाल को परमवीर चक्र देने की सिफारिश क्यों कर रहा हूं? हां, यह सवाल सही है कि रामलाल है कौन? वह हमारा पड़ोसी है। दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत कर दो जून रोटी कमाने वाला। आप नाक-भौं मत सिकोडि़ए कि इसमें खास बात क्या है? वही खास बात मैं बता रहा हूं।
रामलाल दस सालों से एक नवनिर्मित कॉलोनी में रह रहा है। जहां दूषित पानी सप्लाई किया जा रहा है। कई बार तो सीवर का मिला हुआ पानी भी आ जाता है। टूटा पाइप कई दिनों में ठीक होता है। तब तक वह उसी पानी को पीता है। फिर भी जी रहा है।
भीषण गर्मी पड़ रही है। बिजली की बेवफाई चरम सीमा पर है। बिजली कई-कई घंटों में आती है और एक झलक दिखाकर गायब हो जाती है। रामलाल का बुरा हाल है। सरकार बयान जारी कर देती है कि फलां वर्ष तक बिजली संकट दूर हो जाएगा। फिर कटौती नहीं होगी। सब कुछ झेलकर भी वह प्रसन्न हो जाता है।
वह जो चीजें खा-पी रहा है, सब में मिलावट है। चर्बी से बना देसी घी और अरारोट से बना दूध पी रहा है। मिर्च-मसाले भी मिलावटी। वह गर्मी से राहत पाने के लिए जो आसक्रीम खाता है, वह मच्छर और चूहे मरे पानी से बनी है। फिर भी उसकी सांसें चल रही हैं।
पिछले दिनों वह बीमार पड़ गया था। एक सप्ताह दवाई खाकर ठीक हो गया। इसके तीन-चार दिन बाद मेडिकल स्टोर पर छापा पड़ गया। वहां नकली दवाएं बिक रही थीं। यह रामलाल का साहस ही है कि वह नकली दवा खाकर ठीक हो जाता है।
महंगाई पूनो के चांद की तरह बढ़ती जा रही है। पक्ष-विपक्ष में आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। समस्या का समाधान नहीं हो रहा है। सरकार बड़े गर्व से घोषणा कर रही है कि महंगाई रोकना हमारे हाथ में नहीं है। बहुत हायतौबा होने पर सरकार महंगाई रोकने के लिए समिति की घोषणा कर रही है। रामलाल तमाम मुश्किलें उठाकर भी इस घोषणा से परम संतुष्ट है।
आप इस बात पर आपत्ति उठा सकते हैं कि परमवीर चक्र तो केवल युद्ध के मैदान में वीरता दिखाने वालों को दिया जाता है। यह बताएं कि जिन हालत में रामलाल रह रहा है, क्या वह युद्ध के मैदान से कम भयावह हैं? सरकार चेतावनी दे रही है कि आतंकी हमला हो सकता है। वह खतरों से खेलते हुए दफ्तर जा रहा है। बाजार जा रहा है। दिनदहाड़े लूटपाट हो रही है। गोली मार दी जाती है। फिर भी उसने आना-जाना बंद नहीं किया है। बसों का सफर सुरक्षित नहीं रहा, लेकिन वह इन्हीं से यात्रा कर रहा है। क्या सैनिकों को इतने खतरों से जूझना पड़ता है? यदि आज तक किसी सिविलियन को परमवीर चक्र नहीं दिया गया तो अब दिया जाए। वीर पुरुष का सम्मान होगा और नई परंपरा भी शुरू होगी।
आप सहमत हैं तो अपना कमेंट्स जरूर दें। आपका कीमती कमेंट्स रामलाल को परमवीर चक्र दिला सकता है।

विष्णु जी एक : संस्मरण अनेक

नई दिल्ली: कालजयी जीवनी आवारा मसीहा के रचियता विष्णु प्रभाकर की पहली पुण्यतिथि पर 12 अप्रैल को हिंदी भवन और चित्र-कला-संगम के तत्वावधान में विष्णु जी एक : संस्मरण अनेक गोष्ठी का आयोजन किया गया। स्नेही साहित्यकारों ने श्रद्धापूर्वक उन्हें याद किया। गोष्ठी की शुरुआत मणिकुंतला के कबीर पद गायन से हुई।
वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि विष्णुजी का व्यक्तित्व अभिभूत करने वाला था। वह बड़े साहित्यकार थे और उनका युग भी बड़ा था। विष्णु जी सिद्धांतप्रिय मसिजीवी साहित्यकार थे। उन्होंने कभी अपनी संतानों तक के लिए सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया, लेकिन अफसोस है कि सात दशकों तक विष्णुजी कहानी लिखते रहे, लेकिन कहानी के इतिहास में उनका नामोल्लेख तक नहीं है।
उन्होंने कहा कि विष्णुजी के साहित्य के प्रकाशन व प्रचार तथा उनकी जन्मशती मनाने के लिए कुछ उपक्रम होना चाहिए। हिंदी भवन के मंत्री डॉ. गोविंद व्यास ने कहा कि हिंदी भवन जैनेंद्र कुमार, रामकुमार वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर तथा हरिवंश राय बच्चन की जन्मशती राष्ट्रीय स्तर पर मना चुका है। उन्होंने घोषणा की कि विष्णुजी की जन्मशती भी हिंदी भवन राष्ट्रीय स्तर पर धूमधाम से मनाएगा। विष्णुजी के ज्येष्ठ पुत्र अतुल प्रभाकर ने बताया कि विष्णु प्रभाकर की स्मृति-रक्षा के लिए एक न्यास का गठन किया जा चुका है।
कथाकार हिमांशु जोशी ने कहा कि विष्णुजी अपनी पीढ़ी के अंतिम साहित्यकार थे। उनमें जरा भी दिखावा नहीं था। वह अपने पर लगे आपेक्षों का कभी जवाब नहीं देते थे। सुपरिचित आलोचक राजकुमार सैनी ने कहा कि विष्णुजी ने काफी हाउस को एक विश्वविद्यालय बनाया, जिसमें हम जैसे उनके छात्र थे। विष्णु जी लोकतांत्रिक संस्कृति के संवाहक थे।
वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने कहा कि विष्णुजी से मेरी पहली मुलाकात कोलकाता में तब हुई, जब वह आवारा मसीहा के लिए शरच्चंद्र पर शोध-सामग्री के संकलन के सिलसिले में आए थे। जब विष्णुजी ने 75 वर्ष पूरे किए तो मैंने उनका साक्षात्कार सशर्त लिया था। मैंने शर्त रखी कि मैं साक्षात्कार दो हिस्सों में लूंगा। पहला साक्षात्कार आपके अजमेरी गेट स्थित कुण्डेवालान घर पर और दूसरा कनॉट प्लसे के कॉफी हाउस में। विष्णुजी ने मेरी शर्त को स्वीकार करते हुए लंबा साक्षात्कार दिया। विष्णुजी यथास्थितिवादी नहीं, मानवतावादी थे। उनके चरित्र में कहीं भी दोहरापन नहीं था।
संत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. बलदेव वंशी ने कहा कि विष्णुजी की वैष्णवता उनके साहित्य के माध्यम से हमारी विरासत बन चुकी है। विष्णुजी ने साहित्य कमाया, जीवन कमाया और मृत्यु भी कमाई। उन्होंने संतों का सा जीवन जिया। खुद ठगे गए, लेकिन कभी किसी को नहीं ठगा। युवा कथाकार-पत्रकार महेश दर्पण ने कहा कि विष्णुजी के पास कृत्रिमता का अहसास नहीं होता था। वह दिल्ली के होकर भी दिल्ली के नहीं लगते थे। वह स्वयं को पूर्णत: गांधीवादी नहीं मानते थे।
सुपरिचति व्यंग्यकार प्रदीप पंत ने कहा कि विष्णुजी विरोधाभासों के सामंजस्य थे। हंसराज रहबर, भीष्म साहनी से वैचारिक भिन्नता होते हुए भी विष्णुजी की उनसे खूब पटती थी। विष्णुजी ने गांधीवाद को अपने निजी जीवन में उतारा था।
विष्णुजी की पुत्री अनीता ने कहा कि सबसे बड़ी पुत्री होने के नाते मुझे पिताजी का सबसे अधिक स्नेह मिला। जब मैं कॉलेज जाती थी तो मुझे वह दस रुपये जबखर्ची दिया करते थे और खुद भी अपना जेबखर्च दस रुपये में चलाते थे। उनके साथ दक्षिण भारत की यात्रा अविस्मरणीय है। विष्णुजी अपने चार गुरु मानते थे- मां, मामा, बड़े भाई और पत्नी को।
ेगोष्ठी का संचालन डॉ. हरीश नवल ने किया। उन्होंने कहा कि अस्वस्थ्य होते हुए भी विष्णु जी मेरी बेटी की शादी में आए और बहुत देर तक रहे। जब तक वह रहे, तब तक स्नेहीजनों से घिरे रहे।
गोष्ठी में वीरेंद्र प्रभाकर, महेशचन्द्र शर्मा, हरिनारायण, रामकुमार कृषक, हरि बर्मन, संतोष माटा, सविता चड्ढा, रामकिशोर द्विवेदी, डॉ. धर्मवीर, डॉ. रवि शर्मा, भगवान सिंह, राजेंद्र नटखट आदि उपस्थित रहे।

महिलाओं को मान्यता खुद स्थापित करनी होंगी: मैत्रेयी

देहरादूनः महिला दिवस के सौ साल होने के उपलक्ष्य में प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा के जन्मदिन 26 मार्च को महिला समाख्या, उत्तराखंड ने दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया। इसे चार सत्रोंं, महिला आंदोलन के सौ वर्ष, महिला आंदोलन और मुस्लिम महिलाएं, महिला आंदोलन और दलित महिलाएं, महिला आंदोलन और गांधी में बांटकर महिला आंदोलन और उसकी स्थिति को समझने का प्रयास किया। कार्यक्रम का उद्घाटन उत्तराखंड की राज्यपाल माग्र्रेट आल्वा ने किया।
महिला समाख्या की निदेशिका गीता गैरोला ने अब तक की यात्रा का विवरण देते हुए इस दौर में सामने आई चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि चुनौतियों से निपटने मंे लगातार चली जद्दोजहद के बाद समाख्या की अवधारणा व कार्यक्रम को समझने में समाज के अंदर निरंतर चली बहस से काफी चीजें स्पष्ट हुईं। इस दौर के अनुभव इतने महत्वपूर्ण हैं कि स्त्री मुक्ति के आंदोलन को आगे ले जाने के लिए हिम्मत और वैचारिक धरातल प्रदान करते हैं।
महादेवी सृजन पीठ के अध्यक्ष डॉ लक्ष्मण सिंह बटरोही ने ‘महादेवी वर्मा के साहित्य में स्त्री विमर्श’ से महादेवी के स्त्री चेतना वाले साहित्य व सरोकार तथा आज के संदर्भ में उनके महत्व को सामने रखा। 20वीं शताब्दी के आखिरी दशक में महादेवी का उदय पुरुषवादी वर्चस्व के विरोध में उभर कर सामने आता है। एक बार महादेवी ने बौद्ध भिक्षुणी बनने की कोशिश की थी। दीक्षा के समय जब गुरु और उनके मध्य परदा रखा तो महादेवी यह कह कर चली आईं कि जो धर्म स्त्री से सीधा संवाद नहीं कर सकता, उसकी उन्हें जरूरत नहीं। डॉ बटरोही के अनुसार मीरा भारत की पहली विद्रोही कवि थीं, लेकिन महादेवी ने मीरा के आध्यात्मिक मिथक को तोड़ा और उसके संघर्ष को सामान्य स्त्री के संघर्ष के रूप में देखा। शिक्षा और पति में से शिक्षा को चुना। घर की देहली से बाहर निकली और कभी नहीं लौटी।
मुख्य अतिथि माग्र्रेट आल्वा में कहा कि कोई हमारी (स्त्रियों की) बात सुने या न सुने, हम तो अपने हक की बात करते रहेंगे। उन्होंने कहा कि हर महिला अपने जीवन में कुछ-न-कुछ मुश्किलें उठाती हैं। महिला होने के कारण जन्म के दिन से ही बहुत कुछ सहना पड़ता है। महिलाओं को पंचायतों से लेकर संसद तक में आरक्षण की बहस के दौरान बहुत से लोग इस परिवर्तन को पचा नहीं पाए। बहस के दौर में महिलाओं की क्षमताओं पर जो सवाल उठाए जाते थे, आज उन तमाम सवालों के जबाब महिलायें दे रही हैं। पंचायत से लेकर संसद तक में महिलायें इसलिए होनी चाहिए कि वे महिलाओं की मुश्किलें बेहतर जानती हैं।
100 साल की इस लंबी अवधि में कुछ महिलाओं ने अपने व्यक्तिगत संघर्ष को लिखकर सार्वजनिक करने की हिम्मत दिखाई। जिससे पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचे में घुट-घुट कर जीने वाली बाकी औरतों को जीने के रास्ते मिल सके और वे उन रास्तों पर चलने की हिम्मत कर सके। इन जीवंत उदाहरणो को ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं तक पहुंचाने और उन पर बहस कर उनके रास्तों को सहज बनाने की प्रक्रिया में महिला समाख्या द्वारा देश की कुछ चर्चित व संघर्शषील महिलाओं की कथा-आत्मकथाओं के अंशों की पुस्तक ‘ना मैं बिरवा, ना मैं चिरिया’ का विमोचन भी किया।
‘महिला आंदोलन के 100 वर्ष’ विषय का संचालन गीता गैरोला ने किया। मुख्य वक्ता प्रसिद्ध नारीवादी जया श्रीवास्तव ने कहा कि महिला के जीवन चक्र में हिंसा और अन्याय का चक्र बना है। इसलिए महिलाओं की लड़ाई इंसाफ के लिए है। पांच ‘इ’,  इंसाफ,  इंसान, इश्क,  इमान और इल्म पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि इन भावनाओं के बीच एक रिश्ता है जिसे महिला आंदोलन के संदर्भ में समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि स्त्री आंदोलन कभी भी पुरुष विरोधी नहीं, बल्कि दासता, अत्याचार व दमन विरोधी रहा है, यह समझने की जरूरत है।
स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी को सुधारवाद की बजाए हक आधारित दृष्टिकोण बताते हुए उन्होंने उदाहरण दिया कि ऐनी बेसेंट ने भी कहा था, ‘महिलाओं को हक नहीं दे सकते तो मानवाधिकार की बात भी मत कीजिए और मानवाधिकार की बात करनी है तो महिला अधिकारांे की बात भी करनी होगी।’
नारीवादी महिला संगठनों के इतिहास मे हैदराबाद के पुरोगामी महिला संगठन को भारत का पहला नारीवादी संगठन बताया। जेपी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी के साथ ही 1975-1990 के दौरान उभरे बहुत से महिला संगठनों व उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि इन सबसे महिला आंदोलन की समझ आगे बढ़ी है। रचनात्मक स्तर पर भी इस दौरान महिला जागरण के अनेक गीत व नाटक रचे गए। उत्तराखंड में जल, जंगल व जमीन के हक तथा चिपको व शराब बंदी आन्दोलन में महिलाओं की नेतृत्वकारी भूमिका को भी उन्होंने महिला आंदोलन का हिस्सा बताया और इन्हें समग्र रूप में देखे जाने की जरूरत बताई।
द्वितीय सत्र ‘महिला आंदोलन और मुस्लिम महिलायें’ की अध्यक्षता हम्माद फारूखी ने की। मुख्य वक्ता शीबा असलम थीं। संचालन सनत पत्रिका के संपादक फैजल मलिक ने किया।
सत्र की अध्यक्षता कर रहे हम्माद फारूखी ने कहा कि मुस्लिम समाज और इस समाज की महिलाओं की समस्याएं दूसरे समाज की मूल समस्याओं से भिन्न नहीं हैं। गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, बेरोजगारी यहां भी दूसरे समाजों की तरह है, लेकिन अलग-अलग क्षेत्र में निवास, स्थानीय संस्कृति, रीति-रिवाज आदि के कारण भिन्न पहचान बनती है। इसे एक जैसे परिभाष्ति करने की कोशिश होती है, जबकि पूरा समाज एक जैसा होता नहीं है।
संबोधन के दूसरे हिस्से में उन्होंने कहा कि चिंतन का परित्याग करने से इस्लाम में जड़ता आ गई है। चिंतन हो तो परिस्थिति अनुसार समाधान के विकल्प भी इस्लाम में मौजूद हैं और सहमति-असहमति के बीच संवाद रास्ता भी दिखाएगा।
मुख्य वक्ता शीबा असलम ने कहा कि जब सब तरह के समुदायों में मंथन व हलचल है, तब मुस्लिम महिलायें कैसे खामोश हैं, उनकी स्थिति कैसे भिन्न है। राजनीतिक क्षेत्र में संस्कृतिक विविधता को अल्पसंख्यकवाद के रूप में देखा जाने लगा है। मुस्लिम कट्ठरपंथियों ने भी अपनी आधी आबादी (औरत) को धर्म की आड़ में अलग-थलग रखा। इस्लाम को गलत रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश हुई, जबकि इस्लाम के सिद्धांतों में भेदभाव था ही नहीं।
उन्होंने कहा कि यह एक चुनौती है कि भारत जैसे देश में जहां व्यवस्था भ्रष्ट है, लोग मजहब को छोड़ व्यवस्था पर भरोसा कैसे करें ? सेकुलर होना तो सरकार का काम है, लोग मजहबी हों, इसमें कोई बुराई नहीं है, इसलिए परिवर्तन की बहस मजहब के भीतर से भी चलाई जा सकती है और रास्ता वहीं से भी निकलेगा। इसमें तर्कहीनता बड़ी बाधा है।
उन्होंने कहा कि इस्लाम में निश्चित है कि बालिग होने पर ही शादी हो और कुरान में किसी आपातकालीन स्थिति के अलावा किसी को भी एक से अधिक शादी की इजाजत नहीं है। एक से अधिक विवाह सामान्य मुस्लिम अधिकार नहीं है। तलाक, फतवा व काजी व्यवस्था पर उन्होंने कहा कि किस तरह इस्लाम की दुहाई देकर इन सब की आड़ में औरत का शोषण होता रहा है। फतवे की व्यवस्था को महज मशवरा बताते हुए उन्होंने कहा कि फतवा कोई कानून नहीं है, लेकिन औरत और पढ़े-लिखे व्यक्ति के खिलाफ फतवे को जबरन थोपा जाता है। शिया समुदाय में तलाक व्यवस्था में हुए कुछ सुधारों का उन्होंने स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि जेहाद को इस्लाम से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इससे पढ़े-लिखे और समझदार लोगों को दिक्कत होती है। प्रतिभागियों द्वारा सवाल उठाए जाने पर “ाीबा असलम ने बताया कि तीन बार तलाक का कुरान से कोई लेना-देना नहीं है। तलाक एक प्रक्रिया है, जिसमें पत्नी की सहमति आवश्यक होती है। इस्लाम में परिवार नियोजन की मनाही नहीं है।
फैजल मलिक ने कहा कि कुछ वर्षों से कुछ ऐसा माहौल बना है कि मुसलमान होने से डर लगता है। जैसे कोई सिराहने बैठा हो और कह रहा हो,‘उठ, तू मुसलमान है।’ इस स्थिति महिलाओं के लिए ज्यादा पीड़ादायक है। इस्लाम की ठीक से व्याख्या नहीं की गई है। धर्मगुरुओं ने धर्म से उतना ही लिया, जिससे उनको फायदा हो, समाज को नहीं।
हजरत मोहम्मद ने समझाया था कि सांप्रदायिकता घर उजाड़ती है और मजहब इन्सान बनाता है। उन्होंने स्वयं एक विधवा से शादी की और कन्या भू्रण हत्या का विरोध किया था।
मंजू मलिक ने कहा कि औरत की तकलीफें नस्ल-दर-नस्ल, पीढ़ी-दर-पीढ़ी खून में दौड़ती रही हैं। सदियोें तक औरत की जो भावनाएं दबाई गईं, वे सकारात्मक माहौल बनने से उभर रही है। विपरीत परिस्थितियों में समाज में अपना मुकाम बनाने वाली नाहिद ने ‘मेरे संघर्ष की कहानी-मेरी जुबानी’ सुना कर समाज के समक्ष कई प्रश्न खड़े किए।
सत्रों की समाप्ति के बाद ‘संभव’ नाट्य मंच, देहरादून ने कथाकार विद्यासागर नौटियाल की कहानी ‘फट जा पंचधार’ के नाट्य रूपांतरण का मंचन किया।
ओमप्रकाश बाल्मिकी की अध्यक्षता में ‘महिला आंदोलन एवं दलित महिलायें’ का विषय पर सत्र की शुरुआत डा. चंद्रा भण्डारी ने किया। उन्होंने कहा कि समाज की प्रारंभिक आत्मनिर्भर व्यवस्था टूटने से श्रम और सम्पत्ति के बंटवारे में पुरुष सम्पत्ति के मालिक के रूप में स्थापित हुए। इस जटिल सामाजिक श्रम विभाजन ने पुरुष के मुकाबले महिला की सामाजिक स्थिति कमजोर की और फिर इसने लिंगभेद को भी स्थापित कर दिया। महिलायें घर की सीमा तक सिमटने लगीं। भारतीय समाज में वर्णव्यवस्था के रूप में एक और तरह का विभाजन हुआ, जिसमें ऊंची-नीची श्रेणियों के कार्य के आधार पर जातियां थोप दी गईं। उत्पादन के कार्य करने वाले निम्न जातियों में वर्गीकृत हुए और उनके हिस्से शोषण और उपेक्षा आई। राज-काज के साथ सम्पत्ति और संसाधनों के मालिक ऊंची जातियां बन बैठीं। श्रम और सम्पत्ति के विभाजन ने भारतीय समाजों को दूसरी बार विभाजित कर दिया। पहले विभाजन से महिला और दूसरे विभाजन से दलित शोषण के शिकार हुए।
मुख्य वक्ता दलित आंदोलन की प्रसिद्ध नेता रजनी तिलक ने कहा कि समाज ने जिन जातियों को हाशिये पर रखा, उन्हें अछूत, अनुसूचित व दलित रूप में देखा। उनके श्रम का शोषण किया और सम्मान से भी वंचित किया गया। अंग्रेजी शासन काल में भी महिलाओं व दलितों को हाशिये पर रखने की कोशिश हुई। अंग्रेजी राज के कानूनों में भी यह दिखाई देता है।
भारत में कई बार महिला व दलित आंदोलन समानांतर भी चलते रहे। डॉ अंबेडकर के नेतृत्व में चले दलित आंदोलन इस समाज में जागरूकता के लिए महत्वपूर्ण रहे। स्त्री मुक्ति की भावना भी इन आंदोलनों में शमिल रही है।
सावित्री बाई फुले के जन्मदिन को महिला जाग्रति दिवस के रूप में मनाने की परंपरा दलित स्त्री की आवाज को सम्मान देने की कोशिश है। अलग-अलग राज्यों में महिला आंदोलन चल रहे हैं। इनके समंवय व मंथन की निरंतर जरूरत है। समय-समय पर मानवाधिकार आयोग व महिला आयोग को महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं, लेकिन अब भी समग्र रूप में आवाज उठाने की जरूरत है।
जातिगत शोषण को ऐतिहासिकता में देखने और आजादी को स्त्री मुक्ति के संदर्भ में परिभाषित करने की जरूरत बताते हुए उन्होनें कहा कि आगे का रास्ता भी इसी से निकलेगा। उन्होंने अन्याय झेलने वाले सभी समाजों से चुप्पी तोड़ने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था को पहली चुनौती महिला और दलित समाज ने ही दी है। मेहनतकश समाज के श्रम के शोषण पर अधिकार के लिए कुछ लोगों को दलित बना दिया गया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि महिला आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से ऊंची जाति की महिलाओं का है इसलिए निचले स्तर के असली मुद्दे अब भी चर्चा में नहीं आ पा रहे हैं। महिलाओं का सार्वजनिक मंचों पर आने को सकारात्मक बदलाव बताते हुए वह सार्वजनिक मंचों का उपयोग राजनीतिक बदलाव के लिए करने की जरूरत पर भी जोर देती हैं।
उत्तराखंड आंदोलन के दौरान महिलाओं के दमन का प्रसंग उठाते हुए उन्होंने अफसोस जताया कि राज्य आज तक एक दोषी को भी दंडित नहीं कर सका।
अध्यक्षीय भाषण में ओमप्रकाश बाल्मीकी ने सवाल उठाया कि क्या हम अब भी ऐसे समाज में रह रहे हैं, जहां हर स्तर पर महिलाओं को प्रताड़ित-उत्पीड़ित किया जा रहा है। समाज में दलितों से नफरत करना अब भी सिखाया जाता है। जो विचार समाज में घृणा पैदा करता है, उस पर चोट करना जरूरी है। ‘कन्यादान’ जैसी धारणा और प्रपंचों से, जो लड़की को वस्तु समझता है, उससे बाहर निकलना भी महिला आंदोलन का हिस्सा होना चाहिए। उत्तराखंड के सभी आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी अग्रिम मोर्चे पर रहने के बावजूद आंदोलन के बाद फायदा उठाने वालों में लड़ने वाली महिलायें कहीं नहीं दिखाई देतीं, इस स्थिति को उन्होंने सोचनीय बताया।
इस सत्र के दौरान नन्दी नैनवाल एवं विजय लक्ष्मी ने ‘मेरे संघर्ष की कहानी मेरी जुबानी’ सुनाई। चिपको आंदोलन की प्रसिद्ध नेत्री और कठिन परिस्थितियों में समाज में जगह बनाने वाली सुदेषा देवी को सम्मानित किया।
प्रसिद्ध लेखिका मैत्रेयी पुष्पा की अध्यक्षता में ‘महिला आंदोलन एवं गंाधी’ की मुख्य वक्ता डा. दिवा भट्ट तथा सत्र का संचालन डा. बसंती पाठक ने किया।
सत्र को आरंभ करते हुए हेमलता खण्डूड़ी ने कहा कि आजादी के आंदोलन के साथ गंाधी जी ने उपेक्षित समुदायों, दलितों व महिलाओं के प्रति संवेदनशील होकर सबकी भागीदारी के प्रयास किए। बाल विवाह, सती, पर्दा व विधवा उपेक्षा जैसी उत्पीड़नकारी परंपराओं का विरोध निरंतर करते रहे। महिलाओं की नेतृत्व क्षमता का मूल्यंाकन किया और नेतृत्व में आने को प्रेरित किया। स्त्री शिक्षा व स्वावलंबन की जरूरत भी गंाधी जी ने समझाई थी।
मुख्य वक्ता डॉ दिवा भट्ट ने कहा कि आजादी के आंदोलन में हर अवसर पर महिलाओं की भागीदारी में गंाधी जी की महत्वपूर्ण प्रेरणा रही है। गंाधी जी ने महिलाओं की “ाक्ति व सामथ्र्य को पहचाना और उन्हें सम्मान दिया। उनका मानना था कि स्त्री व पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं। आत्मबल में गंाधी जी महिला को पुरुष से आगे बताते थे। महिला के लिए अबला शब्द का वे विरोध करते व कहते कि यदि बल का अर्थ पशुबल है, तब जरूर महिला का बल पुरुष से कम है।
उन्होंने कहा कि गंाधी जी सार्वजनिक हित के आंदोलनों में महिलाओं के नेतृत्व पर जोर देते थे। उनकी मान्यता थी कि इससे सफलता मिलनी आसान होगी। मनुष्य समाज को आगे ले जाने में वे महिलाओं की बराबर भागीदारी पर जोर देेते रहे। उन्होंने कहा कि अब करीब 100 वष बाद गांधी जी के इन विचारों के आधार पर महिला स्वतंत्रता की स्थिति का आंकलन किया जाना चाहिए। यह भी स्मरण रहना चाहिए कि गांधी जी की अहिंसा आत्मसमर्पण नहीं था, क्योंकि स्त्री के खिलाफ शील भंग जैसे अत्याचार पर उन्होंने कहा था, ‘तुम्हारे हाथ हैं, नाखून हैं, उनका इस्तेमाल करो।’
आजादी के आंदोलन में महिलाओं को साथ ले जाने का प्रयोग सबसे पहले गांधी जी का था। गांधी जी के विचारों में विरोधाभास को भी रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं की भिन्न भूमिका की बात गांधी जी करते थे। क्या गंाधी जी महिलाओं को सीमित भूमिका में देखते थे ? यह जरूर बहस का विषय है।
डॉ0 सविता मोहन ने कहा कि गांधी जी ने जिन तीन अखबारों का प्रकाशन किया था, उनमें स्त्री शिक्षा पर सर्वाधिक जोर होता था।
डॉ0 शेखर पाठक ने कहा कि अंग्रेजी राज के दौरान उत्तराखंड का संदर्भ लें तो बहुत से लोगों को स्त्री संघर्ष नहीं दिखाई देता। वे सवाल खड़ा करते हैं, क्या इतिहास के पास ऐसा देखने की दृष्टि थी ? अब नए संदर्भ में महिला की भूमिका को देखा जा रहा है और इसकी जरूरत भी हैं। उन्होंने कहा कि शुरू में महिलायें इसलिए पृष्ठभूमि में रहीं कि कठिन परिस्थितियों में घर, परिवार व समाज को देखना चुनौतिपूर्ण था। जब वन आंदोलन शुरू हुआ तो महिलायें घर से बाहर निकलने लगीं। आजादी के आंदोलन में भी महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ती गई।
गांधी जी से प्रभावित सरला बहन व मीरा बहन का उत्तराखंड आगमन व गांधी के विचारों के साथ महिलाओं के बीच काम करना महत्वपूर्ण रहा। इसका प्रभाव उत्तराखण्ड में आज भी है।
डॉ0 पाठक के अनुसार आजादी के आंदोलन और उसके बाद भी काफी समय तक दलित स्त्री इसलिए नहीं दिखाई देती क्योंकि उनका योगदान व संघर्ष मौखिक परंपरा में आगे बढ़ा, लिखित में नहीं आ पाया। महिलाओं के बहुत से संघर्ष इतिहास व साहित्य में स्थान नही बना पाए। उत्तराखंड में यह लंबी श्रंृखला है। राज्य आंदोलन में वह प्रखर रूप से सामने आती है। इन सबको स्थान मिलने का समय भी आएगा। जल, जंगल और जमीन के आंदोलन आज फिर महत्वपूर्ण हो गए हैं और इनमें महिलाओं की भागीदारी फिर निर्णायक होगी।
अध्यक्षीय भाषण में कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि महिलाओं के आज के आंदोलन भी गंाधी के सत्याग्रह जैसे ही हैं। समय बदल गया है इसलिए गंाधी के विचारों में विसंगतियां दिखाई देती हैं। उन्होंने कहा कि महिला आंदोलन में पुरुष का विरोध भी क्यों न हो। जो उत्पीड़न करे, संघर्ष तो उससे होगा ही। संघर्ष के बिना सृजन संभव नहीं। उन्होंने कहा कि स्त्री की छटपटाहट किसी को दिखाई क्यों नहीं देती ? छटपटाहट से बाहर निकलने के लिए वह विरोध क्यों न करें ? नैतिकता का पाठ उसे ही क्यों पढ़ाया जाता है ? महिलाओं को धर्मग्रंथों की दुहाई दी जाती है, लेकिन इन ग्रंथों में तो चीर हरण, अग्नि परीक्षा है। चैराहे पर लुटती महिला का चीर बचाने अब कोई क्यों नहीं आता ?
उन्होंने कहा कि महिलाओं की स्थिति आज भी कैसी है, असलियत सब जानते हैं, इसलिये सच्चाई स्वीकार कर ही रास्ता निकलेगा। मान्यताएं बदलनी पड़ेंगी। महिलाओं से भी वह सवाल करती हैं कि महिला दिवस से ज्यादा आकर्षण जब करवाचैथ का हो गया है, तब परिवर्तन कैसे आएगा।
महिलाओं को अपनी मान्यता खुद स्थापित करनी होंगी। नए पर्व, त्योहार, उत्सव कायम करने होंगे। ऐसी मर्यादाएं, मान्यताएं बनानी होंगी, जिसमें महिलायें सम्मान के साथ शामिल हों। उन्होंने कहा कि हजारों साल की गुलामी महिलाओं की रही है, इसे कसटने में समय जरूर लगेगा।
‘आलो आंधारी’ की लेखिका बेबी हालदार ने अपने संघर्ष सुनाने के साथ अपनी सफलता को भी बांटा। गीता गैरोला ने कहा कि महिला आंदोलन के इतिहास में महिला समाख्या के प्रयास एक खामोश परिवर्तन साबित हो रहे हैं, इसे अनुभव किया जा सकता है।

पेशावर कांड का नायक वीर चंद्रसिंह गढ़वाली : पीतांबरदत्त डेवरानी

वीर चंद्रसिंह गढ़वाली

30 अप्रैल, 1930 को हुए ऐतिहासिक पेशावर कांड और उसके नायक वीर चंद्रसिंह गढ़वाली पर पीतांबरदत्त डेवरानी का विजारोत्तजेक आलेख

नगाधिराज हिमालय के नाभिकांड में स्थित गढ़वाल अपने पराक्रम, शौर्य और अप्रतिम देशभक्ति के लिए सुविख्यात है। 2/18 रायल गढ़वाल राइफल्स के गढ़वाली सैनिक ने वीर चंद्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में सन् 1930 में पेशावर में निहत्थे देशभक्त पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर साम्राज्यवादी अंग्रेजी शासन की चूलें हिला दी थीं और इस प्रकार देशभक्ति का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया था। दुर्भाग्य की बात है कि वीर चंद्रसिंह गढ़वाली और पेशावर कांड को आजादी के बाद जो स्थान और सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। जब भी सही ढंग से स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखा जाएगा, पेशावर कांड के वीर नायक चंद्रसिंह गढ़वाली और उनके साथियों को सम्मान स्मरण किया जाएगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह स्वतंत्रता संग्राम का सच्चा इतिहास नहीं हो सकता। चंद्रसिंह गढ़वाली के लिए गांधीजी ने कहा था कि, ‘मेरे पास बड़े चंद्रसिंह गढ़वाली जैसे चार आदमी होते तो देश कभी का आजाद हो गया होता।Ó मृत्युशय्या पर लेटे पंडित मोतीलाल नेहरू ने कहा था कि, ‘वीर चंद्रसिंह गढ़वाली को देश न भूले।Ó उसे ‘गढ़वालीÓ को हमारे नेता और इतिहासकार क्यों और कैसे भूल गए, यह हमारे सामने एक गंभीर विचारणीय प्रश्न है। जिस ‘गढ़वालीÓ ने पेशावर कांड द्वारा साम्राज्यवादी अंग्रजों को यह बताया था कि वह भारतीय सैनिकों की बंदूकों और संगीनों के बलबूते पर अब हिंदुस्तान पर शासन नहीं कर सकते, उसकी इतनी उपेक्षा क्यों हुई- इतिहासकारों को इसका जवाब देना होगा।
गढ़वाल के सुदूर उत्तरांचल में एक सामान्य कृषक श्री जाथलीसिंह भंडारी के परिवार में ग्राम रौणी सेरा मासौ पट्टी चौथान में चंद्रसिंह का जन्म हुआ था। उस समय गढ़वाल में शिक्षा-दीक्षा की कोई व्यवस्था न होने के कारण चंद्रसिंह सामान्य शिक्षा ही प्राप्त कर सके, परंतु वे जीवन भर लगनशील-स्वाध्यायी रहे और उन्होंने ऐसा कुछ पढ़ा-सीखा, जिसे दूसरे बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल कर भी नहीं सीख पाए। वे जन्मजात भड़ (वीर) थे। नेतृत्व करने का गुण उनमें बचपन से ही था। गांव के बालकों के वे सरदार थे। वीरों जैसा साहस था बालक चंद्रसिंह में। एक बार एक अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर की पत्नी गांव वालों से इसलिए नाराज हो गई थी कि वे ढंग के कपड़े नहीं पहने हुए थे। गांव के स्त्री-पुरुषों को पौड़ी तलब किया गया। एक तो पचासों मील की दूरी, दूसरी ओर अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर से कठोर सजा मिलने का भय। तब बड़ा दबदबा और आतंक था अंग्रेजों का । गांव के पुरोहित ने रास्ता सुझाया कि यदि कोई साहब के सिर पर उसके द्वारा मंत्रित भभूत डाल दे तो साहब का कोप शांत हो जाएगा। भला कौन कर पाता ऐसा दुस्साहस? लेकिन बालक चंद्रसिंह ने गांव वालों के साथ पौड़ी जाकर, चुपके से साहब की कुर्सी के पीछे जाकर साहब के सिर पर भभूत झाड़ दी। साहब ने सजा नहीं दी और गांव वाले, हंसी-खुशी चंद्रसिंह का गुणगान करते वापस गांव लौट आए। तब के भभूत झाडऩे वाले बालक ने आगे चलकर अंगेजी साम्राज्यवाद का भूत झाडऩे में भी कोई कसर नहीं रखी।
युवा चंद्रसिंह लैंसडौन पहुंच कर रायल गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हो गया। प्रथम विश्व युद्ध में मेसापोटामिया में अतुल पराक्रम दिखाने के बाद जब 1919 में सिपाही चंद्रसिंह लैंसडौन पहुंचे तो उन्हेंं हवलदार मेजर बना दिया गया। युद्ध समाप्त होते ही सैनिकों की छंटनी शुरू हो गई। हवलदार और जे.सी.ओ. सामान्य सिपाही बना दिए गए। हवलदार मेजर चंद्रसिंह को भी पदावनत कर सिपाही बना दिया गया और आश्वासन देकर एक महीने की छुट्टी पर घर भेज दिया गया। इस घटना ने चंद्रसिंह के मन में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश पैदा कर दिया।
उस समय देश में कई घटनाएं घटीं। जलियांवाला बाग में नृशंस डायर ने सैकड़ों लोगों को गोलियों से भून दिया था और सारे पंजाब में मार्शल ला लागू कर दिया था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू हो गया था। देश ने लंबी नींद के बाद अंगड़ाई ली थी। चंद्रसिंह पर इन घटनाओं का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहा। वे घर जाने के बजाय गांधीजी से मिलने चल पड़े। लेकिन वे गांधीजी के दर्शन नहीं कर पाए और एक माह बाद लैंसडौन लौट आए।

दिल्ली में चौपाल : भीमसेन त्यागी

भीमसेन त्यागी

एक समय था, जब दिल्ली के कॉफी हाउस में अलग-अलग भाषाओं के लेखक, पत्रकार, चित्रकार, संगीतकार, समाजशास्त्री, राजनीतिज्ञों आते थे। खूब बहसें हुआ करती थीं, लेकिन धीरे-धीरे सब खत्म हो गया। कॉफी हाउस को लेकर  कथाकार भीमसेन त्यागी  का जीवंत संस्मरण।

मैं1958 की गर्मियों में अपना कस्बा छोड़कर दिल्ली आया। कस्बा शहर और गांव के बीच की वर्णसंकर नस्ल की बस्ती होता है।  कस्बे में शहर की तमाम बुराइयां आ जाती हैं और गांव का कोई गुण नहीं रहता। ऐसी ही निर्गुण बस्ती में मेरा बचपन बीता। रस-रंग भरी यह बस्ती अपने में पूरी दुनिया थी। यहां मौलवी उस्मान का मकतब था, मुंशी रामसिंह का प्राइमरी मदरसा और फिर मास्टर टीकाराम का अंग्रेजी स्कूल। पंडित होशियार सिंह उर्फ हुसियारे पंडित का सांग था और प्रेमी भजनी की भजन मंडली। गुल्ली-डंडा खेलने के लिए पेंठ का मैदान था और तैरने के लिए हिंडन नदी- यानि हरनंद बाबा! दिन भर के लोगों के दुख-सुख बांटने, आल्हा, होली या किस्से-कहानी सुनने-सुनाने और मामले-मुकदमें निबटाने के लिए चौपाल थी। कस्बे की बहुत संपन्न लोक-संस्कृति थी और उस संस्कृति का केंद्र भी चौपाल ही थी। यह कस्बे का धड़कता हुआ दिल था। पूरे कस्बे की गलियां रक्तवाहिनी शिराओं की तरह चौपाल से जुड़ी थीं और यहीं से जीवनदायी रक्त ग्रहण करती थी।
दिल्ली आने के बाद कस्बे के तमाम धूलभरे चेहरे याद आते। दिल्ली बहुत बड़ी थी। यहां दफ्तर की मशीनी जिंदगी थी, बसों की गहमागहमी, घर-गिरस्ती के झमेले और चंद यार-दोस्त। लेकिन ये सब मिल कर भी उस शून्य को पूरा न कर पाते, जो चौपाल के न होने से बराबर सालता।
एक दिन सुदर्शन चोपड़ा आया और उसने कहा, ”आओ, टी-हाउस चलते हैं।”
”टी-हाउस? यह क्या बला है?”
”बहुत खूबसूरत बला है। वहां दिल्ली के तमाम लेखक और पत्रकार आते हैं और दुनिया-जहान के मसलों पर बहस करके अपनी सेहत खराब करते रहते हैं।”
कनाट प्लेस में रीगल बिल्डिंग के पार्लियामेंट स्ट्रीट वाले नुक्कड़ पर आबाद है- टी-हाउस। खासा बड़ा हाल है। दरवाजे में दाखिल होते ही दायें हाथ पत्र-पत्रिकाओं का मिनी स्टाल। थोड़ा आगे टी-हाउस का काउंटर। बाकी हाल में मेजें ही मेजें। हर मेज पर चार-छ: बुद्धिजीवी सिर जोड़े बैठे हैं और गरमा-गरम बहसों में उलझे हैं। तेजतर्रार आवाजें इधर से उधर लपक रही हैं, छतफाड़ ठहाके गूंज रहे हैं। मिली-जुली आवाजों का खुरदुरा संगीत पूरे हाल में भरा है। मैं क्षण भर ठिठक कर हाल पर नजर मारता हूं- अरे! अपनी चौपाल यहां कैसे आ गयी। दिल्ली बहुत बड़ी है, वैसे ही यह चौपाल! बड़ी कितनी ही हो, आखिर है तो चौपाल ही। वही किस्से-कहानी, वही संगीत, वही रसरंग, वही लतीफे, वही ठहाके और वही दुनिया-जहान की चिंताएं। चौपाल कस्बे की लोक-संस्कृति का केंद्र थी तो यह बड़ी महानगरीय संस्कृति का केंद्र है।
उस दिन के बाद से चौपाल आने का सिलसिला बढ़ता ही गया। कुछ दिन बाद तो वहां आना दिनचर्या का जरूरी हिस्सा बन गया। दफ्तर झंडेवालान में था। पांच बजते ही दोस्तों के साथ टी-हाउस का रुख करके और पूरी शाम रसरंग में डूबे रहते। कितनी नशीली थी वे शामें। धीरे-धीरे कस्बे की चौपाल की यादें धुंधली पड़ती गयीं और उसकी जगह दिल्ली की चौपाल लेती गयी।
इस चौपाल की पहली खबी यह कि नाम है टी हाउस लेकिन यहां टी कतई नहीं मिलती। आप चाय का आदेश देते हैं तो पेश की जाती है कॉफी। कस्बे में सुना था कि सतयुग में हमारे देश में घी-दूध की नदियां बहती थीं। कोई अतिथि बस्ती में आता और पानी की मांग करता तो उसे दूध दिया जाता। टी हाउस में अभी तक सतयुग ही चल रहा है। यहां भांति-भांति के देव पुरुष आते। इनमें आदि देव शंकर नहीं, विष्णु जी यानि श्री विष्णु प्रभाकर थे। वह जन्म से ही टी हाउस में बैठे दिखाई देते। जन्म टी हाउस का या फिर स्वयं विष्णु जी का, यह शोध का विषय है। शाम होते ही विष्णु जी अपने निवास अजमेरी गेट से टी हाउस का रुख करते और खरामा-खरामा मंजिल पर पहुंच जाते। आंधी हो या तूफान, वे विष्णु जी को रोक नहीं पाते। अगर किसी शाम विष्णु जी टी हाउस में दिखायी न दें तो मान लिया जाता कि वह गंगा-यमुना के नैहर में या फिर ‘आवारा मसीहाÓ की शोध के सिलसिले में बंगाल या बरमा की यात्रा पर हैं।
खादी के कुर्ते-पाजामे, बंडी और कलफ लगी नोकीली टोपी में, विष्णु जी अलग से पहचाने जाते। वह जिस मेज पर बैठे होते, उस पर उनके हमउम्र, छोटे और बहुत ही छोटे लल्लू ब्रांड लेखक भी होते। विष्णु जी किसी को भी यह अहसास न होने देते कि वह उनसे छोटा है। साथ ही यह अहसास भी न होने देते कि कोई उनसे बड़ा है। विष्णु जी गंभीर निरामिष किस्म के गंभीर लेखक हैं। वह टी-हाडसी लतीफों पर भी ठहाका न लगाते, सिर्फ धीरे से मुस्करा देते।
उन दिनों नयी कहानी आंदोलन उरूज पर था और उसके तीन तिलंगे कुचर्चा में थे। उनके विरोध में दर्जनभर नये पुराने और पुराने नये लेखक तलवारें भांजते रहते और रोज एक नया कहानी-आंदोलन अंकुरित होता। एक दिन टी हाउस में किसी ऐसे ही आंदोलन की चर्चा हो रही थी कि विष्णु जी ने भारी मन से कहा, ”भई, हम तो न तीन में हैं, न तेरह में!”
एक लेखक होली के अवसर पर प्रकाशित ‘दिनमान’ का नया अंक लेकर आया। उसमें लगभग पूरे हिंदी साहित्य की खबर ली गयी थी और जिस-जिस की खबर ली गई थी, उसके नाम बोल्ड अक्षरों में पाये गये थे। विष्णु जी ने उत्सुकता से अंक के पन्ने पलटने शुरू किये और जिसका नाम आता, उसी पर अपनी लघु टिप्पणी जड़ते जाते- जैनेंद्र जी का नाम है, अज्ञेय का भी। खैर, उनका तो होना ही था। सर्वेश्वर और श्रीकांत भी हैं। अच्छा, नगेंद्र जी का भी नाम है और सावित्री सिन्हा भी। हरिपाल तुम्हारा नाम भी… आखिरी पन्ना पलट कर विष्णु जी एक लंबी सांस लेते हैं और कहते हैं- लो, यह तो खत्म हो गया।
एक जोरदार ठहारा फूटता है और पूरा टी हाउस पर छा जाता है। विष्णु जी के भाई श्री ब्रह्मïानंद भी अक्सर टी हाउस में नजर आते। उनके प्रिय विषय थे मनोविज्ञान और सैक्स। उन्होंने फ्रायड, युग और हैवलाक एलिस को घोट-पीस कर पचा रखा था। वह टी हाउस में कोने की किसी मेज पर, नौजवान लेखकों के  बीच बैठे, उपरोक्त दार्शनिकों की केस हिस्ट्रीज सुना-सुना कर उनका और अपना मनोरंजन करते रहते। वह विष्णु जी के ही नहीं, पूरे टी हाउस के भाई साहब थे। बहुत कम लोग उनका असली नाम जानते थे। ज्यादातर के लिए तो उनका नाम ‘भाई साहब’ ही था।
चित्रकार जगदीश जोशी कमलेश्वर के साथ ही रहता। कमलेश्वर उसका स्थानीय अभिभावक था। जोशी की शादी हुई तो रिसेप्शन का आयोजन भी हुआ। निमंत्रण कार्ड छपे। उस समय निमंत्रण भेजने के लिए डाक विभाग को तकलीफ देने की जरूरत पेश न आती। कार्डों का बंडल लेकर टी हाउस आओ और तमाम मेजों पर कार्ड तकसीम कर दो।
रिसेप्शन वैंगर्स में था। निमंत्रित लोगों में भाई साहब भी थे। मेहमान मेजों पर विराजमान हो गये तो कमलेश्वर वर-वधू को साथ लेकर उनका परिचय कराने आया। वे तीनों भाई साहब वाली मेज पर पहुंचे तो कमलेश्वर ने एक-एक मेहमान का नाम लेकर परिचय कराना शुरू किया- आप फलां, आप फलां, आप फलां और आप… भाई साहब सामने पड़े तो कमलेश्वर गड़बड़ा गया। वह भी भाई साहब का नाम नहीं जानता था। कमलेश्वर ने तुरत बुद्धि से काम लिया और अपने एक्टराना अंदाज में कहा, ”और आप… आप भाई साहब!”
भाई साहब धीरे से मुस्कराये और उन्होंने हाथ जोड़ दिए।
टी हाउस में बेबाक साहित्यिक और राजनैतिक बहसें होतीं, आंदोलन जन्म लेते, उन्हें चलाने की रणनीति तय की जाती, विरोधियों की खाट खड़ी करने के सपने देखे जाते।  भरपूर निंदा रस लूटा जाता और लतीफेबाजी होती। लतीफेबाजी टी हाउस संस्कृति का जरूरी हिस्सा थी।
यह घोर आश्चर्य की बात मानी जाती कि मोहन राकेश के ठहाकों के बावजूद टी हाउस इतने बरस तक सलामत कैसे रहा। एक शाम राकेश चंद दोस्तों के साथ मेज पर बैठा किसी टी हाउसी लतीफे का रस ले रहा था कि सामने दरवाजे पर पंडित राजेंद्र यादव नमूदार हुए। राकेश ने दोस्तों से कहा, ”राजेंद्र आ रहा है। तुम कुछ देर हंसना मत। मैं खुद राजेंद्र के मुंह से उसे चूतियां कहलाऊंगा।”
दोस्तों ने दार्शनिकों के मुखौटे लगा लिये।
राजेंद्र अंदर दाखिल हुआ और पत्रिकाओं के मिनी स्टाल पर ठिठक कर नयी पत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगा- किस पत्रिका में अपनी कहानी और किस आलोचनात्मक लेख में अपना नाम छपा है। कहां कौन सा नया आंदोलन शुरू हुआ है? किसने किसकी टांग खींची है। राजेंद्र की चिंता यह भी थी कि कहीं कोई जम तो नहीं गया। पत्रिकाओं से निबटकर राजेंद्र ने एक नजर हाल पर मारी। अपनी जुमटो के लोग कहां विराजमान हैं। राकेश को देखकर वह उसकी मेज की तरफ बढ़ गया।
राकेश ने उसे दूर से ही लपक लिया, ”आओ राजेंद्र! सुनाओ क्या तीर मारे? आजकल तो धुंआधार लिख रहे हो।”
राजेंद्र ने बैठते हुए कहा, ”मैं क्या लिख रहा हूं, लिख तो तुम रहे हो।”
”क्यों, मैंने क्या लिखा?”
”राजपाल के लिए हेनरी जेम्स के इतने मोटे उपन्यास का अनुवाद कर मारा और कहते हो क्या लिखा?”
”यार, वह तो पुरानी बात हो गयी। इस एक महीने में तो कुछ भी नहीं लिखा।”
”तुम एक महीने की बात करते हो। मैंने तो पिछले तीन महीने से कुछ नहीं लिखा, सिवाय चिट्ठियों के!”
”तुमने चिट्ठियां तो लिख लीं। मैं तो वह भी नहीं कर सका। डाक का ढ़ेर ला है।” राकेश निराश प्रेमी की तरह एकदम उदास हो गया, ”कुछ नहीं, राजेंद्र! मेरी जिंदगी तो बेकार है। मैं तो चूतिया हूं।”
राजेंद्र ने तपाक से जवाब दिया, ”तू क्या चूतिया है, असली चूतिया तो मैं हूं।”
राकेश ने शरारत से मुस्करा कर कहा, ”साले, इस मामले में भी आगे मत जाने देना।”
मिले-जुले ठहाके का भीषण विस्फोट हुआ तो राजेंद्र हक्का-बक्का रह गया।
टी हाउस में राकेश के ठहाकों का कोई तोड़ था तो साहित्यकारों का डॉक्टिर और डॉक्टरों का साहित्यकार रामकिशोर द्विवेदी। रामकिशोर के ठहाकों के सामने राकेश के ठहाके फीके पड़ जाते। राकेश किसी बात पर ठहाके लगाता। लेकिन रामकिशोर को ठहाका लगाने के लिए किसी बात की दरकार न थी। वह सिर्फ ठहाका लगाने के लिए ही ठहाका लगा सकता था। ठहाका उसका तकियाकलाम था, ठीक वैसे ही, जैसे ‘माफ कीजिए!’ वह अक्सर बात की शुरुआत ही ‘माफ कीजिए’ से करता।
एक दिन डॉक्टर द्विवेदी ने शेरजंग गर्ग से कोई बात कहनी चाही, ”माफ  कीजिए…”
शेरजंग ने बात बीच में ही नोच ली। कहा, ”तुम्हें कतई माफ नहीं करूंगा। यह तो तुम्हारा तकिया कलाम है।”
टी हाउस में एक और अजीब शै थी- पंजाब से आया चित्रकार हमदम। उसके एक नहीं, दो तकियाकलाम थे- ‘हरामी’ और ‘बड़ी कुत्ती चीज है!’ चाहता तो कहता- ‘बहुत हरामी है!’ वह किसी से ज्यादा ही खुश होता और कुछ ज्यादा ही तारीफ चाहता तो कहा- ‘वह बड़ी कुत्ती चीज है!’ हमदम मुद्राराक्षस के लेखन पर फिदा था और अक्सर उसकी कुछ ज्यादा ही तारीफ करता रहता।
मुद्राराक्षस भी कम हमदम नहीं था। उन दिनों वह एक पत्रिका में स्तंभ लिख रहा था। एक बार उसने लिख मारा : राजेंद्र यादव के उपन्यास ‘उखड़े हुए लोग’ का नाम ही नहीं, अंदर का माल भी उड़ाया हुआ है। असल में राजेंद्र यादव मौलिक लेखक है ही नहीं, सिर्फ अनुवादक है।
एक दिन राजेंद्र ने मुद्रा को तपाक से पकड़ लिया, ”क्यों बई, तू ऐसा ही मानता है कि मैं मौलिक लेखक नहीं हूं। अनुवादक हूं।”
”नहीं, मैं तो नहीं मानता।”
”फिर फलां पत्रिका में ऐसा क्यों लिखा? जरूरी है कि मैं जो कुछ मानता हूं, वही लिखूं भी?”
उन दिनों सुदर्शन चोपड़ा घोर गृह-कलह से त्रस्त था। अपनी बंगाली पत्नी कृष्णा जी से डर कर, सिर्फ एक बैग लेकर घर से चला आया था और दोस्तों के यहां रह कर समय बिता रहा था। कृष्णा जी बराबर उसका पीछा कर रहीं थीं।
एक दिन सुदर्शन दोस्तों के साथ ही टी हाउस में बैठा था। दोस्तों में हरिपाल त्यागी भी था। अचानक सामने दरवाजे पर कृष्णा जी नजर आयीं। सुदर्शन घबरा गया कि अब भयानक कांड होगा। इस सार्वजनिक जगह पर फजीहत होगी।
कृष्णा जी उसी मेज पर आयीं। सुदर्शन को काटो तो खून नहीं। वह आने वाले किसी भी क्षण होने वाले भयानक विस्फोट का इंतजार करने लगा। लेकिन कृष्णा जी ने कुछ नहीं कहा। पर्स मेज पर रखा और चुपचाप टायलेट की तरफ चली गयीं। सुदर्शन ने राहत की सांस ली। ब्रीफकेस उठाया और फुर्ती से खिसक गया।
थोड़ी देर बाद कृष्णा जी आयीं तो सुदर्शन को न पाकर मायूस हुईं।
कुछ दिन बाद उन दोनों का समझौता हो गया। सुदर्शन घर चला गया। वे अच्छे पति-पत्नी की तरह रहने लगे। कृष्णा जी भी एक दफ्तर में काम करती थीं। एक शाम सुदर्शन ने उन्हें टी हाउस में मिलने का समय दे रखा था। वह मेज पर बैठा इंतजार कर रहा था। इत्तफाक से हरिपाल भी मौजूद था।
कृष्णा जी आईं और पर्स मेज पर रखकर टायलेट की तरफ चली गयीं। हरिपाल ने सुदर्शन को उंगली लगायी, ”सुदर्शन मौका है। भाग जा!”
टी हाउस में दिल्ली के कोने-कोने से, तरह-तरह के जीव आते। बहुत से नाम और उनसे ज्यादा बेनाम चेहरों का हुजूम लगा है। उन सबकी अपनी-अपनी विचार धाराएं, अपने-अपने सामाजिक सरोकार, अपने-अपने गम, अपनी-अपनी खुशियां, अपनी-अपनी कुंठाएं और अपने-अपने अहंकार थे। उन सबकी अलग-अलग दुनिया थी, फिर भी वे सब एक थे। उनमें इतना प्यार था कि एक दूसरे को नफरत करने के लिए मजबूर पाते और इतनी नफरत थी कि प्यार किये बिना रह न पाते। यह लव एंड हेट का अजीब फिनोमिना था। टी हाउस सिर्फ बौद्धिक अय्याशी का अड्डा न था। यह एक नशा था, जिसके बिना चैन न मिलता।
उस समय सिर्फ दिल्ली में नहीं, शायद पूरे भारत में बुद्धिजीवियो का सबसे बड़ा अड्डा टी हाउस ही था। अलग-अलग भाषाओं के लेखक, पत्रकार, चित्रकार, संगीतकार, समाजशास्त्री, राजनीतिज्ञ और दूसरे अनुशासनों के बुद्धिजीवी टी हाउस आते। इनके अलावा देश के दूसरे शहरों और धुर देहात तक के चेहरे वहां दिखाई देते। कभी-कभी हिंदी साहित्य पर शोध करने वाला कोई विदेशी शोधार्थी भी किसी मेज पर बैठा मिलता। आखिर क्या कशिश थी, जो इतने लोग दूर दराज से चल कर टी हाउस में खिंचे चले आते? टी हाउस की अपनी भरी-पूरी, बेहद नशीली संस्कृति थी, जो चुंबक की तरह लोगों को अपनी तरफ खींचती। पूरी दिल्ली में यह सबसे बड़ा अड्डा था, जहां तमाम लोगों से एक साथ मिलने, अपनी कहने, दूसरों की सुनने और एक खुशनुमा शाम बिताने का सुख मिलता।
दिल्ली और बाहर के तमाम लोग टी हाउस जरूर आते, लेकिन आभिजात्य के सताये कुछ ऐसे लेखक भी थे, जो टी हाउस को जनता ढाबा समझते और वहां आना अपनी शान के खिलाफ मानते। ऐसे महामहिम किसी पॉश रेस्तरां में बैठे, अपनी चार चावलों की खिचड़ी अलग पकाते।
टी हाउस कई बरस तक गुंजान रहा और दिल्ली की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बना रहा। लेकिन वक्त ने करवट बदली। बाजार की संस्कृति का दबाव बढऩा शुरू हुआ। टी हाउस के संचालकों को एक बेशकीमती जगह पर टी हाउस जैसा व्यवसाय चलाना, घाटे का सौदा लगने लगा। नतीजा यह कि टी हाउस बंद कर दिया गया और उसकी जगह एक भव्य टैक्सटाइल शोरूम और एक भव्य रेस्तरां खोल दिया गया।
टी हाउस उजड़ गया तो कुछ वर्कर्स ने सहकारिता के आधार पर जनता कॉफी हाउस खोला। कुछ बरस वह चला। लेकिन बाजार की संस्कृति पीछा करती हुई यहां भी आ पहुंची। थियेटर कम्युनिकेशन बिल्डिंग और काफी हाउस को गिरा कर तलघर में वातानुकूलित पालिका बाजार बना दिया गया।
काफी हाउस के कुछ शैदा मोहन सिंह प्लेस के काफी हाउस में जाते रहे। शायद इक्का-दुक्का अब भी जाते हैं। लेकिन पहले टी हाउस और फिर कॉफी हाउस के उजडऩे के साथ-साथ वह चौपाल संस्कृति भी बिखर गयी, जिसे  टी हाउस ने जन्म दिय था और बरसों पोसा ।
बाजार संस्कृति ने केवल उन जगहों पर ही हमला नहीं किया, जहां टी हाउस संस्कृति पनपी थी, उसने टी हाउस के शैदाओं के दिलो-दिमाग पर और भी तेज हमला किया। दिल्ली भयावह गति से फैलती जा रही थी। वह अपनी सीमाएं लांघ कर उत्तर प्रदेश और हरियाणा में अतिक्रमण कर रही थी। मध्य आय वर्ग के टी-हाउसिये छिटक कर शहर के हाशिये पर जा गिरे थे। लोगों के बीच भौगोलिक और उसके साथ-साथ भावनात्मक फासले बढ़ रहे थे। टी हाउस और दूसरे अड्डों पर होने वाले बेबाक बहस-मुबाहसों की जगह भव्य सभागारों में होने वाली औपचारिक और निर्जीव चर्चाओं ने ले ली। पुस्तकें महंगी से और महंगी होकर आम पाठक की पहुंच से बाहर हो गयीं। जीवंत पत्रिकाएं एक-एक कर बंद हो गयीं। लेखक और पाठक का आपसी रिश्ता कमजोर पड़ गया। दूरदर्शन के माध्यम से हासोन्मुख भूमंडलीय संस्कृति का दैत्य सीधे घरों में घुस आया और हमारी चेतना को चाट कर नंगई की अपसंस्कृति का भीषण प्रहार करने ल गा। हर कोई अकेला और बेगाना हो गया। सबने अपने भीतर एक-एक अंध-गुहा बना ली और उसमें खुद ही कैद हो गये।
महानगर दिल्ली के इस उत्तर प्रदेशीय हाशिये पर बैठा, सोच रहा हूं- टी हाउस की जवानी के वे दिन भी क्या थे! उनमें जीवन की कितनी उचास थी, कितनी मचंग, कितना नशा! व्यक्ति का समाज के साथ कितना गाढ़ा रिश्ता था। टी हाउस की चौपाल संस्कृति के बिखरने के साथ-साथ वह रिश्ता भी बिखरता गया। अब यह संस्कृतिविहीन दिल्ली एक विराट रेगिस्तान है, जिसमें दूर-दूर तक भी नखलिस्तान नजर नहीं आता

दस के दस

उस दिन बस में सुन रहा था, ‘भाई लोगों, आपके लेंगे सिर्फ दो मिनट, जरा ध्यान दीजिए। हमारे वैद्य जी की एक नई आयुर्वेदिक खोज। आपको हो जाया करती है भैया मसानी की गर्मी, यानी नहाते वक्त सिर पर पानी डालते ही आपको महसूस होने लगती लघु शंका। तो भाइयो, हमारे वैद्य जी की बनाई हुई यह गोली खाइए और एकदम चंगे हो जाइए। चालीस दिन का कोर्स है और पैकेट की कीमत है सिर्फ दस रुपए। और भैया, एक और बात सुन लीजिए। आपका बच्चा खाता बकरी की तरह है और सूखता लकड़ी की तरह है या फिर उसके पेट में पड़ जाया करते हैं पेटेरे यानी कि कीड़े। तो भाइयो, हमारे वैद्यराज की दूसरी खोज है यह गोली। अपने बच्चे को रात के वक्त दूध के साथ खिलाइए। आपका बच्चा सोएगा और मेरी गोली जागेगी। आपके बच्चे के पेट को रेशम-सा मुलायम बना कर सारी बीमारियों से निजात दिलाएगी।Ó
एक और बानगी देखिए, ‘हां तो भाइयो, गाड़ी चालने वाली है। आपके दो मिनट लूंगा। कंपनी ने नया पेन निकाला है। आप इसे बाजार से लेने जाएंगे तो पंद्रह या बीस रुपए से कम में नहीं मिलेगा। कंपनी का प्रचार है, आपका फायदा है इसलिए इसकी कीमत रखी है दस रुपए। दस रुपए! दस रुपए भी ऐसे नहीं लिए जाएंगे। इसके साथ लाल रंग का पेन बिल्कुल मुफ्त। आइटम हो गए दो और कीमत वही दस रुपए। ठहरिए, इसके साथ एक हरा और काला पेन भी मुफ्त। आइटम हो गए चार और कीमत दस रुपए। इनके साथ पॉकेट डायरी भी। तो भाइयो, अब आइटम हो गए पांच और कीमत दस रुपए। साहिबान, आपके घर में छोटे-छोटे बच्चे भी होंगे। उनके लिए दो पेंसिलें, एक कटर और साथ में एक रबर भी मुफ्त। आइटम हो गए नौ और कीमत वही दस रुपए। ठहरिये, साथ में एक स्केल भी। आइटम हो गए दस और कीमत वही दस रुपए। हां, उधर भी आ रहा हूं। जरा एक मिनट ठहरिए। आप भी देखिए। देखिए, सोचिए, समझिए पसंद आए तो खरीदिए। देखने की कोई कीमत नहीं।Ó
दिन भर बसों में इस तरह की लच्छेदार भाषा और आकर्षक तरीके से बोल कर पेन सेट, लाइट वाली अंगूठी, गले की चेन, चुंबक वाली चेन, लाइटर, शीशा, कंघा, दवाई आदि छोटा-मोटा सामान बेच कर लोग रोजी-रोटी कमा रहे हैं। इनका बोलने और एक-एक सामान थैले से निकाल कर दिखाने का अंदाज इतना आकर्षक होता है कि बरबस दो-चार लोग सामान खरीद ही लेते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आए इन लोगों में से अधिकतर को आर्थिक तंगी के चलते घर छोडऩा पड़ा। ये लोग दिल्ली के सदर बाजार से सामान खरीदते हैं। दस रुपए के सामान में तीन-चार रुपए तक बचा लेते हैं। इन्होंने क्षेत्र बांटे हुए हैं। सब अपने रूट में ही सामान बेचते हैं। प्रतिदिन ये सौ-डेढ़ सौ रुपए कमा लेते हैं।
आगरा के बबलू ने बताया कि वह तीन-चार साल से बसों में सामान बेचता है। घर में जमीन कम थी। बड़ा परिवार था। खर्चा चलता नहीं था। मजबूरन पढ़ाई बीच में छोड़ कर घर से रोजी-रोटी के लिए निकलना पड़ा। अलीगढ़ के जन्नो के अनुसार बेरोजगारी के कारण हर्र, बहेड़ा, आंवला और अन्य चीजें मिला कर वह खुद ही दवा बना कर बेचने लगा। उसने बताया कि वह किताबों से पढ़-पढ़ कर दवा तैयार करता है। दवा के फार्मूले के बारे में बात करने पर वह मुंह ताकता नजर आता है। उसे दवा की कोई जानकारी नहीं है।
ऐसा कौन होगा जो कम पैसे में अधिक से अधिक चीजें हीं चाहेगा। अगर दस रुपए में उसे दस चीजें मिल जाएं तो इससे अधिक फायदे की बात और क्या होगी। यही सोच कर पहले तो लोग थोड़ा सोचते हैं फिर उनके हाथ अपनी जेब में चले जाते हैं। और ये चीजें ले जाकर घर वालों को दिखाते हैं तो अपने आपको काफी सयाना महसूस करते हैं, भले ही वे चीजें दस दिन भी न चल पाएं। लेकिन कभी-कभी कोई यात्री ऐसा सवाल पूछ लेता है, जिसका जवाब ये फैरी वाले दे नहीं पाते। वह यात्री तो अपनी समझदारी पर खुश हो जाता है, लेकिन इनका धंधा मारा जाता है।
एक बार मैं नैनीताल जा रहा था। बस में एक लड़का अंग्रेजी सीखने की किताब बेच रहा था। वह कह रहा था, ‘इसमें शरीर के अंगों, फलों, सब्जियों, दिन, महीने, सभी रिश्तों आदि की अंग्रेजी है। इसे खरीद लीजिए। बच्चों को अंग्रेजी सीखने में मदद मिलेगी।Ó मेरे पास बैठे सज्जन ने मुस्कराने हुए कहा, ‘यार इसमें कैंजा की अंग्रेजी होगी तो मैं खरीद लूंगा।Ó अन्य यात्री भी मुस्कराने लगे। वह खिसिया कर नीचे उतर गया। पहाड़ में कैंजा का अर्थ मौसी है। इसी शीर्षक से शिवानी का एक उपन्यास भी है। दूसरी ओर इन चीजों को बेचने वालों को कम मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता। इनके पास इतना पैसा नहीं होता कि कहीं ठीया जमा सकें। इसलिए दिन भर एक से दूसरी बस में धक्के खाते रहते हैं। बिक्री का भी कोई ठिकाना नहीं। रोज कुआं खोदना और पानी भरने जैसी स्थिति रहती है। इसके अलावा बसों के कंडक्टरों से झिड़की खानी पड़ती है। कभी-कभी पुलिस वाले भी परेशान करते हैं। फिर भी इन्हें देख कर संतोष होता है कि तमाम कठिनाइयां सह कर भी ये लोग आम हिंदुस्तानी की तरह जीवन जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

विष्णु प्रभाकर के साथ फोटोग्राफी

विष्णु प्रभाकर

 यशस्वी साहित्यकार और आवारा मसीहा के रचियता विष्णु प्रभाकर की पहली पुण्यतिथि(11 अप्रैल) पर
उनके सहज और कर्मठ व्यक्तित्व को याद कर रहे हैं युवा निर्माता-निर्देशक

संजय जोशी

सितंबर, 2003 का कोई दिन। विष्णु प्रभाकर जी को फोन मिलाया। थोड़ी देर बाद धीमी आवाज आईं, कहिए, क्या काम है? कैसे याद किया? मैंने अपना मकसद बताया तो सहज ही तैयार हो गए। ज्यादा पूछताछ नहीं की कि कहां से पैसा मिला है, क्या प्रोजक्ट है, जैसा कि आमतौर पर दिल्ली वाले किसी काम के बारे में बात करते हुए पूछते हैं। इतना जरूर कहा कि मैं सुबह एक घंटा टहलने जाता हूं। इसलिए आप 7-7.15 बजे आएंगे तो घर पर मिलूंगा। दो-चार रोज बाद कैमरा बैग लादे में सुबह सात बजे उनके पीतमपुरा के मकान पर पहुंच गया।
विष्णुजी आंगन में आरामकुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। स्टूल पर चाय का गिलास, ट्रांजिस्टर और एक-दो जरूरी चीजें थीं। मेरी पहली मुलाकात थी। शुरू से ही वह अनौपचारिक हो गए। मैंने कैमरा निकाला और फ्रेम बनाकर क्लिक करने लगा। मेरे पास बहुत अच्छा टेलीफोटो लेंस नहीं था। क्लॉजअप के लिए नार्मल लेंस को ही ऑब्जेक्ट के पास ले जाना पड़ता। इसलिए मेरा नार्मल लेंस विष्णुजी के चेहरे के बहुत नजदीक रहने लगा। वे बिना किसी परेशानी या झुंझलाहट के प्रेम से तस्वीरें खिंचवाते रहे।
मुझे थोड़ा ताज्जुब भी हो रहा था कि आज पहली बार, फोटो खिंचवाने वाला व्यक्ति फोटो के खिंचने के उद्देश्य को लेकर एकदम निर्लिप्त दिख रहा है। मैं भी सहज हो चला था। विष्णुजी मेरे अनुरोध पर तरह-तरह से पोज दे रहे थे। कभी दरवाजे पर तिरछे बैठे हुए अपने नाम की पट्टिका के साथ, कभी आंगन में बनी छोटी क्यारी में पौधों की टहनी को पकड़े हुए, कभी पेड़ों को पानी डालते हुए तो आकाश को निहराते हुए कैमरामैन के लिए मुफीद लो एंगल फ्रेम करते हुए।
उन्होंने बताया कि यह मकान कैसे बनवाया। कैसे-कैसे पुरस्कार मिले और कैसे-कैसे उस राशि से मकान खड़ा होता गया। फिर मकान पर कब्जे और उसे छुड़ाने का किस्सा। उनकी बातचीत में कहीं भी मैं-मैं नहीं था और न ही बुढ़ापे की सनक का प्रभाव।
अब विष्णुजी स्टडी में बैठे थे। टेबिललैम्प और छोटी स्टूलनुमा मेज के साथ। मुझे लगातार अच्छे और सहज फ्रेम मिल रहे थे। मेरी सारी आशंका निर्मूल साबित हो रही थी। नौ बजते-बजते फोटोग्राफी का क्रम पूरा हो गया। थोड़ी देर बाद विष्णुजी को भी काम से जुटना था। दस बजे से उनके पास दो लोग आते थे। ये उनके टाइपिस्ट कम सहायक थे, जो उनकी चिट्ठियों से लेकर साहित्य लेखन तक में मदद करते थे।
मैंने विदा लेने से पहले मोहन सिंह प्लेस के कॉफी हाउस में एक फोटो सेशन करने की इच्छा जतायी। उन्होंने उसी सहज और निर्लिप्त भाव से जवाब दिया कि अगर कोई उन्हें यहां से ले जाए और छोड़ दे तो कोई आपत्ति नहीं है। जल्द ही दोबारा मुलाकात करने का बात कर में वापस लौट गया।
विष्णुजी के साथ शीघ्र ही कॉफी हाउस में फोटो सेशन करने का विचार उत्साहित करने लगा। सबसे बड़ी दिक्कत उनको ले आने और वापिस पहुंचाने के लिए टैक्सी का प्रबंध करने की थी। बेरोजगारी के समय बिना किसी आर्थिक मदद के फोटोग्राफी करना ही पहाड़ जैसा था, उस पर टैक्सी का भी प्रबंध करना। एक बंगाली मित्र प्रदीप दास, जो नाटक देखने और खेलने के दीवाने हैं, ने तुरंत समस्या का समाधान कर दिया। तय हुआ कि दशहरे के बाद किसी इतवार को वह अपनी मारुति से विष्णु जी को काफी हाउस ले जाएंगे। दूल्हा तैयार, घोड़ी भी तैयार, लेकिन बिन बाराती बारात कैसी? अब विष्णुजी की कॉफी हाउस मंडली को जुटाने का काम था। सभी बिना किसी नखरे के तैयार हो गए।

प्रदीप की कार एक-दो दिन से आवाज कर रही थी। इस कारण वह थोड़ा आशंकित थे। फिर भी हिम्मत करके अक्तूबर की एक सुबह हम लोग विष्णुजी के घर पर  ठीक 18 मिनट देरी से पहुंचे। यह इसलिए कि उन्होंने पहली बात यही कही कि 18 मिनट ज्यादा हो गए। कॉफी हाउस हमें 12 बजे पहुंचना था। वहां हम समय से पहुंच गए। विष्णुजी और मुझे छोड़कर प्रदीप गाड़ी पार्क करने चले गए। मेरे साथ दुविधा यह थी कि विष्णुजी को अकेले कैसे छोड़ दूं और अगर छोड़ता नहीं हूं तो उनका कॉफी हाउस की बिल्डिंग से प्रवेश करता हुआ  टॉप एंगिल शॉट कैसे खींच सकूंगा। इसी पेशोपेश में था कि उनकी कॉफी हाउस मंडली के एक सदस्य डॉ. राम किशोर द्विवेदी सड़क पर  मिल गए। दोनों बहुत दिनों बाद मिल रहे थे इसलिए बहुत खुश थे और मैं इसलिए क्योंकि टॉप एंगिल फ्रेम क्लिक कर सकूंगा। मैंने विष्णुजी को डॉ.  द्विवेदी के हवाले किया और तेजी से ऊपर पहुंच गया। कॉफी हाउस के आंगन में कांतिमोहन और पंकज बिष्ट पहले से ही बैठे थे। मैंने कॉफी हाउस की मुंडेर पर चढ़कर फ्रेम क्लिक किए। थोड़ी देर में हरिपाल त्यागी, भीमेसन त्यागी, केवल गोस्वामी, डॉ. आनंद प्रकाश, क्षितिज शर्मा भी आ गए। बहुत दिनों बाद कॉफी हाउस की मेज पर विष्णुजी की मंडली जुटी थी। न सिर्फ विष्णुजी और उनकी मित्र मंडली खुश दिख रही थी, बल्कि कॉफी हाउस के बैरे भी खुश थे कि इतने दिनों बाद उनके अपने विष्णुजी दिखाई दिए। दो-एक बैरे विष्णुजी से काफी देर तक कुशलक्षेम पूछते रहे। कॉफी की चुस्कियों के साथ ठहाकों को दौर भी चलता रहा। किसी ने विष्णुजी से पूछा कि इन दिनों क्या लिख रहे हैं। उन्होंने सहज भाव से कहा कि दो-चार बरस और जीवित रहा तो उपन्यास पूरा कर लूंगा। मित्र मंडली ने इस बात को आगे यह कहकर बढ़ाया कि अभी आप जापानी महिला की तरह कम से कम 105 बरस जिएंगे और तब तक एक और उपन्यास हम लोगों को पढऩे को मिलेगा। वाक्य पूरा होने से पहले ही उस सुंदर दोपहरी में कॉफी हाउस मंडली का ठहाका घुल गया। विष्णुजी बूढ़े बौद्ध भिक्षु की तरह मंद-मंद मुस्कराते रहे। कॉफी का एक दौर और चला। कॉफी के खत्म होने के बावजूद ठहाके लगाने का क्रम नहीं टूटा।
वापस चलने का वक्त आया। सब लोग विष्णुजी को छोडऩे नीचे सड़क तक आए। ऐसा लग रहा था, मानों विष्णुजी कॉफी हाउस के कर्मचारी हों और आज उनकी विदाई हो रही हो। एक ग्रुप फोटो के बाद सब लोग अपने-अपने घरों को निकल गए। हम लोग पीतमपुरा जाने के लिए कार में सवार थे।

कार स्टार्ट होते ही कॉफी हाउस के पुराने दिनों की चर्चा छिड़ गई। वह कॉफी हाउस की चर्चा छिडऩे मात्र से ही गजब उत्साह में आ गए। बताते रहे है कि आज का मोहन सिंह पैलेस का कॉफी हाउस कहां-कहां से घुमकर यहां आया। वह हाउस के दशकों पुरानी यादों में से एक से एक मजेदार किस्से सुनाने लगे। अपने जमाने को याद करते हुए संतोष के साथ कह रह थे कि पुराने लिखने वाले नए लोगों को बहुत हिम्मत बंधाते थे। रास्ता दिखाते थे। आजकल जैसी मारामारी  नहीं थी। कॉफी हाउस खाने-पीने की नहीं, बल्कि विचार-विमर्श की जीवंत जगह थी। बहस करते-करते कई बार हाथापाई की नौबत भी आ जाती, लेकिन जब घर जाते थे तो सारे शिकवे  खत्म। उर्दू के मशहूर शायर नरेश कुमार शाद को बहुत शिद्दत से याद करते रहे, भई, पीता खूब था, शायरी भी खूब करता था। एक बार इतना पी लिया कि बैरों ने कॉफी हाउस से बाहर कर दिया। फिर मैंने उनको समझाया, वह बहुत बड़ा शायर है। अंदर ले आओ। नहीं तो बहुत बदनामी होगी। वे मेरी बात मान गए और शाद को अंदर ले आए। विष्णुजी उदास हो गए कि हिंदी, उर्दू और पंजाबी तीनों भाषाओं के साहित्यकार आते थे। पहले पंजाबी वालों ने आना छोड़ा, फिर उर्दू वालों ने और अब हिंदी वाले भी कम हो गए हैं।
कॉफी हाउस का यह क्रम प्रीतमपुरा आने पर टूट गया। विष्णुजी कुछ थके हुए लग रहे थे। गाड़ी में देर तक बैठने के कारण साइटिका परेशान कर रहा था। मैंने और प्रदीप ने बारी-बारी से उनके साथ तस्वीरें खींचवाई। फिर इस वायदे के साथ कि जल्द ही इनको उनको दिखाने आएंगे, विदा ली।
प्रदीप की मारुति सारी आशंकाओं के बावजूद अभी भी ठीक चल रही थी। आज का दिन वाकई अच्छा बीता। प्रदीप को जरूर असंतोष था कि वह चाहकर भी विष्णु जी से आवारा मसीहा से जुड़े सवाल नहीं पूछ सके। इस उम्मीद के साथ कि अगली बार सिर्फ आवारा मसीहा के किस्सों पर ही बात करेंगे, हमारी गाड़ी भीड़ में रास्ता बनाती चली जा रही थी।

विष्णु प्रभाकर की प्रथम पुण्य तिथि पर कार्यक्रम

नई दिल्ली : हिंदी के यशस्वी साहित्यकार और गांधीवादी विचारक विष्णु प्रभाकर की प्रथम पुण्यतिथि पर 12 अप्रैल को विशेष कार्यक्रम विष्णु जी एक : संस्मरण अनेक का आयोजन हिंदी भवन में शाम पांच बजे किया जा रहा है। इसमें डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ. महीप सिंह, हिमांशु जोशी, डॉ. हरदयाल सिंह, डॉ. कमलकिशोर गोयनका, राजकुमार सैनी, पंकज बिष्ट और महेश दर्पण मुख्य वक्ता होंगे।

शेखर जोशी की कविताएं

कारखाना

अभी आठ की घंटी बजते
भूखा शिशु सा चीख उठा था
मिल का सायरन!
और सड़क पर उसे मनाने
नर्स सरीखी दौड़ पड़ी थी
श्रमिक जनों की पांत
यंत्रवत, यंत्रवेग से।

वहीं गेट पर बड़े रौब से
घूम रहा है फोरमैन भी
कल्लू की वह सूखी काया
शीश नवाती उसे यंत्रवत

आवश्यक है यह अभिवादन
सविनय हो या अभिनय केवल
क्योंकि यंत्रक्रम से चलता श्रम
गुरुयंत्रों की रगड़-ज्वाल से
तप जाएं न यंत्र लघुत्तम
है विनय-चाटुता तैल अत्युत्तम।
 

मुजफ्फरनगर 94*

जुलूस से लौटकर आई वह औरत
माचिस मांगने गई है पड़ौसन के पास।
दरवाजे पर खड़ी-खड़ी
बतिया रही हैं दोनों
नहीं सुनाई देती उनकी आवाज
नहीं स्पष्ट होता आशय
पर लगता है
चूल्हे-चौके से हटकर
कुछ और ही मुद्दा है बातों का।
फटी आंखों, रोम-रोम उद्वेलित है श्रोता
न जाने क्या-क्या कह रही हैं :
नाचती अंगुलियां
तनी हुई भंवें
जलती आंखें
और मटियाये कपड़ों की गंध
न जाने क्या कुछ कह रहे हैं
चेहरे के दाग
फड़कते नथुने
सूखे आंसुओं के निशान
आहत मर्म
और रौंदी हुई देह।

नहीं सुनाई देती उनकी आवाज
नहीं स्पष्ट होता आशय
दरवाजे पर खड़ी-खड़ी
बतियाती हैं दोनों।

माचिस लेने गई थी औरत
आग दे आई है।
(*सन्दर्भ : उत्तराखंड राज्य आंदोलन)

धानरोपाई

आज हमारे खेतों में रोपाई थी धानों की
घर में
बड़ी सुबह से हलचल मची रही काम-काज की।
खेतों में
हुड़के की थापों पर गीतों की वरषा बरसी।
मूंगे-मोती की मालाओं से सजी
कामदारिनों ने लहंगों में फेंटे मारे
आंचल से कमर कसी
नाकशीर्ष से लेकर माथे तक
रोली का टीका सजा लिया।

आषाढ़ी बादल से बैलों के जोड़े
उतरे खेतों पर
धरती की परतें खोलीं
भीगी पूंछों से हलवाहों का अभिषेक किया।
सिंचित खेतों में
विवरों से अन्नचोर चूहे निकले
मेढ़ों पर बैठे बच्चों ने किलकारी मारी
दौड़-भंूक कर झबरा पस्त हुआ।

बेहन की कालीनों से उठकर
शिशु पादप सीढ़ी-दर-सीढ़ी फैले।
विस्थापन की पीड़ा से किंचित पियराये
माटी का रस पीकर
कल ये फिर हरे-भरे झूमेंगे
मंजरित बालियां इठलाएंगी, नाचेंगी
सौंधी बयार मह-मह महकेगी।

जब घिरी सांझ
विदा की बेला आई
बचुवा की बेटी ने अंतिम जोड़ सुनाए :
धरती मां है
देगी, पालेगी, पोसेगी उनही को,
जो इसकी सेवा में जांगर धन्य करेंगे।
ऋतुएं पलटेंगी
घाम-ताप, वर्षा-बूंदी, हिम-तुषार
अपनी गति से आएंगे-जाएंगे
रहना सुख से, रहो जहां भी
होगी सबसे भेंट पुन:
जीवित यदि अगले वर्ष रही।

उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूं

डूबता रवि
घिर रही है सांझ
चित्रित गगन-आंगन!

किन अदीखी अंगुलियों ने वर्तुल सप्तरंगी अल्पना लिख दी?
कहां हैं वे हाथ
कितने सुघड़ होंगे?
(अल्पना के रंग साक्षी)
 
क्षणभर देख तो लूं
नयन-माथे से लगा लूं
उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूं।

मैं कि जिसका भाग्य अब तक
सूने चौक, देहरी, द्वार-आंगन से बंधा है।

शायद ये वही हों हाथ
जो धानों की हरी मखमल के किनारे
पीली गोट सरसों की बिछाते
जो धरा पर सप्तवर्णी बीज-रंगों अल्पना लिखते
जो धरा पर सप्तरंगी फूल-रंगों अल्पना लिखते
जो धरा पर सप्तगंधी अन्नरंगों अल्पना लिखते
आहï! कितने सुघड़ होंगे
पात-पल्लव-अन्न साक्षी

नयन माथे से लगा लूं
उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूं।

पहली वर्षा के बाद

भूरी मटमैली चादर ओढ़े
बूढ़े पुरखों से चार पहाड़
मिलजुल बैठे
ऊंघते-ऊंघते-ऊंघते।

घाटी के ओठों से कुहरा उठता
मन मारे, थके हारे बेचारे
दिन-दिन भर
चिलम फूंकते-फूंकते-फूंकते।

बर्फ

फ्रिज से निकालकर
गिलासों में ढाल लेते हैं जिसे
रंगीन पानी के साथ
चुभला भी लेते हैं कभी-कभी
खूब ठंडी-ठंडी होती है
यही शायद आप समझते हैं बर्फ है।

बर्फ जला भी देती है
गला देती है नाक, कान, अंगुलियां
पहाड़ों की बर्फ बहुत निर्मम होती है
बहुत सावधानी चाहिए बर्फ के साथ

अक्सर देखा है
बेपर्दा आंखों को अंधा कर देती है
पहाड़ों की चमकती बर्फ।

अंकित होने दो

मैं कभी कविताएं लिखता था शुभा!
और तुम अल्पना!
चांद तारे
फूल-पत्तियां
और शंखमुद्री लताएं चित्रित करते
न जाने कब
कविताओं की डायरी में
मैं हिसाब लिखने लगा।
कभी खत्म न होने वाला हिसाब
अल्ल-सुबह टूटी चप्पल से शुरू होकर
 देर रात में फटी मसहरी के सर्गों तक फैला
अबूझ अंकों का महाकाव्य

और तुम
अस्पताल, रोजगार-दफ्तर
और स्कूलों की सूनी देहरी पर
मांडती रही वर्तुल अल्पना

साल दर साल!
साल दर साल!!

शुभा!
अभिशप्त हैं पीढिय़ां
लिखने को कविताएं
बुनने को सपने
और अंकित करने को सतरंगी दुनिया।

न रोको उन्हें
लिखने दो शुभा
दीवारों पर नारे ही सही
अंकित होने दो उनके सपनों का इतिहास।

द्विज

यज्ञवेदी
गीत सुस्वर
गृहजाग, समिधा-धूम
ऋचाओं की अनवरत अनुगूंज
रह-रह शंख का उद्घोष!

आज मुनुवां द्विज हो गया है।

अभी कुछ देर पहले
पिता का आदेश पाकर
‘माम भिक्षाम देहिÓ कहता
वह शिखाधारी
दण्डधारी
मृगछाला लपेटे
राह गुरुकुल की चला था
लौट आया बाल-बटु फिर
कर न पाया अनसुनी मनुहार मां की!

गिन रहा अब नोट,
परखता
सूट के कपड़े, घडिय़ां
और भी कितनी अनोखी वस्तुएं
झोली में पड़ीं जो।

मुनुवां मगन है अब
आज मुनुवां द्विज हो गया है।

पर, साथ छूटा हमजोलियों का
अब बीती बात होगी:
वे ताल-पोखर
वे अमराइयां
जूठी-कच्ची कैरियां।
अब सीधे संवाद होगा
अग्नि, सविता औ वरुण से

छह पीली डोरियों से मुनुवां अब बंध गया है
आज मुनुवां द्विज हो गया है।

निराला के प्रति

शेष हुआ वह शंखनाद अब
पूजा बीती!
इन्दीवर की कथा रही
तुम तो अर्पित हुए स्वयं ही।

ओ महाप्राण!
इस कालरात्रि की गहन तमिस्रा
किन्तु न रीती!
किन्तु न रीती!!

तेलुगु और हिंदी : मेरे लेखन के दो नयन : बालशौरि रेड्डी

बालशौरि रेड्डी

यह धारण बनी हुई है कि दक्षिण भारतीय हिंदी के कट्टर विरोधी हैं। वह कभी हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन तेलुगु के चर्चित लेखक बालशौरि रेड्डी से बातचीत कुछ और ही सच्चाई बयां करती है। लेखन और भाषा के मुद्दे पर उनसे बातचीत के अंश-

आपके लेखन की शुरुआत कब और कैसे हुई?
मैं काशी मैं विद्यार्थी था। उन दिनों मैं तुकबंदी किया करता था। वहां एक तेलुगु एसोसिएशन थी। मैं उसका सहायक सचिव था। आंध्र का प्रमुख पर्व ‘उगादी’ है। हमने सोचा कि इस अवसर पर किसी पत्रकार या संपादक को अध्यक्षता के लिए बुलाया जाए ताकि हमारी गतिविधियों का सभी को पता लग सके। इसलिए हमने कमलापति त्रिपाठी जी को आमंत्रित किया। समारोह में मैंने आंध्र के बारे में बताया। इस पर त्रिपाठी जी ने कहा, ”रेड्डी साहब, आपका वक्तव्य तो बहुत अ’छा था। हम चाहते हैं कि पर्व-त्योहार की अपेक्षा वहां के रीति-रिवाज या सामाजिक परिस्थितियों पर लिखकर दीजिए।”
मैंने कहा, ”पंडित जी, उत्साह में आकर मैंने कुछ कह दिया, लेकिन लिखने की क्षमता मेरे में नहीं है।”
”नहीं, नहीं, मुझे लगता है कि आप लिख सकते हैं।” त्रिपाठी जी ने कहा।
इसके पश्चात मैं उनसे नहीं मिला। उन्हीं दिनों उत्तर प्रदेश की राज्यपाल सरोजिनी नायडू का निधन हो गया। उन्हें श्रद्धांजालि अर्पित करने के लिए कवि सम्मेलन हुआ। मैं वहां आमंत्रित था। मैंने अपनी कविता सुनाई। इस समय अध्यक्षता कमलापति त्रिपाठी जी कर रहे थे। उन्होंने मुझे पकड़ा, ”मैंने कहा था कि कोई रचना दो। तुम लिखते क्यों नहीं।”
मैंने सोचा कि जो व्यक्ति सचमुच मुझसे लिखवाना चाहते हैं, मुझे प्रेरित कर रहे हैं, मेरा उत्साहवर्धन कर रहे हैं तो मुझे लिखना चाहिए।
एक रचना लिखकर मैं उनके पास गया। उन्होंने उसे संपादित करके छापा। काशीनाथ उपाध्याय ‘भ्रम्रर’ उन दिनों ‘ग्राम संसार’ देखते थे। उनसे भी मेरा परिचय हुआ। ‘ग्राम संसार’ में भी छपने लगा। काशी से निकलने वाले अन्य पत्रों के संपादकों ने भी मेरा पता लगाया और मुझसे लिखवाना शुरू किया। इस तरह से मैं हिंदी में लिखने लगा।
उन्ही दिनों आंध्र से एक तीर्थयात्री काशी आए हुए थे। उनसे मेरी भेंट एक होटल में हुई। उन्होंने मुझे त्रिलिंग नामक एक तेलुगु पाक्षिक पत्र दिया। उसे पढऩे के बाद मुझे लगा कि इससे अ’छा तो मैं भी लिख सकता हूं। मैंने ‘ललित कललु’ नाम से तेलुगु में लेख लिखा। वह छप गया। आंध्र के दो-तीन चर्चित लेखकों ने मेरे लेख की प्रशंसा में पत्र लिखे। इस तरह हिंदी और तेलुगु में लिखने लगा। तेलुगु और हिंदी मेरे लेखन के दो नयन हैं। इन नयनों से मैं सारस्वत लोक को देखता हूं। इस तरह मेरे लेखन की शुरुआत 1949 में हुई।
आपकी पहली रचना कब प्रकाशित हुआ?
‘ग्राम संसार’ में पहली रचना भ्रमर जी ने प्रकाशित की।  उसके पश्चात ‘आज’ में तो निरंतर प्रकाशित होती रहीं। दक्षिण जाने के पश्चात तेरह वर्षों तक ‘आज’ का दक्षिण का विशेष संवाददाता रहा।
आपका पहला उपन्यास कब प्रकाशित हुआ?
पहला उपन्यास 1954 में प्रकाशित हुआ। राजपाल एंड संज के संस्थापक विश्वनाथ मल्होत्रा का पत्र एक दिन मुझे मिला। उन्होंने उपन्यास की मांग की थी। उस समय तक मैं कहानियां, कविताएं व निबंध लिख चुका था। मुझे लगा कि मैं उपन्यास नहीं लिख सकता हूं। मेरे एक मित्र थे डा. पी.आर. रेड्डी। वह मेरे घर आए। पूछा, ”भई, आप तो हमेशा प्रसन्न दिखाई देते हो। क्या बात है? आज बड़े चिंतित मालूम हो रहे हो।”
मैंने कहा, ”राजपाल एंड संज ने मुझसे एक उपन्यास देने के लिए कहा है। लेकिन मुझे अपनी कमजोरी पर ग्लानि हो रही है। मैं लिख नहीं पाता।”
उन्होंने कहा, ”पब्लिशर्स हैज गोट कान्फैंड आन यू, हाव कैन यू से दैट यू कांट राइट, गो हैड।” यह मेरे लिए मूलमंत्र बन गया।
उन दिनों मेरे कजिन ‘शबरी’ पर फिल्म बना रहे थे। उसकी पटकथा मैं लिख रहा था। इसके लिए मैं मध्य प्रदेश के दक्षिणांचल जगदलपुर, बस्तर तथा कुछ अन्य क्षेत्रों मे गया, जहां ‘शबर’ लोग रहे हैं। मैंने सोचा कि शबरों के बारे में लिखने से पहले उनकी जीवन-पद्घति, आचार-विचार के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। आंध्र के श्री गिडअ राममूर्ति पतलु ने ‘शबर भाषा’ के लिए एक लिपि तेलुगु में बनाई थी। मैंने देखा कि शबर आखेट करके जीवनयापन करते हैं। हम लोग अपने को सभ्य समाज का व्यक्ति समझते हैं, शिक्षित मानते हैं, सुसंस्कृत मानते हैं, लेकिन इसके बावजूद हम लोगों मे जो कमजोरियां हैं, उनकी अपेक्षा ये लोग विचार दृष्टि से ही नहीं व्यवहार की दृष्टि से भी हमसे भले हैं। इन सबके आधार पर मैंने एक उपन्यास लिखा। वह राजपाल एंड संज से प्रकाशित हुआ।
आप तेलुगु भाषी हैं। अपने हिंदी में भी बहुत लिख है। क्या कभी हिंदी में लिखने में दिक्कत भी आई?
कोई मुश्किल नहीं आई क्योंकि जब में हिंदी में लिखता हूं तो तेलुगु को भूल जाता हूं। हिंदी की शब्दावली या हिंदी की शैली अपने आप आ जाती है। जैसे रेल की दो पटरियां समांतर चलती हैं, कभी दोनों में टकराहट नहीं होती। वैसे ही जब मैं हिंदी में लिखता हूं तो यह बिल्कुल भूल जाता हूं कि मैं तेलुगु भाषी हूं। मैं उस समय सोचता हूं कि मैं हिंदी का लेखक हूं।
आपकी इतनी अच्छी हिंदी है। इसका क्या कारण है?
तेलुगु भाषा को लेकर थोड़ा मतभेद है। लेकिन अधिकतर लोग तेलुगु को ‘आर्य भाषा’ परिवार की भाषा मानते हैं। हालांकि डाक्टर गियर्सन आदि ने तेलुगु को द्रविड़ परिवार की भाषा घोषित किया है। यह विवादस्पद है। लेकिन तेलुगु में 65 से 70 प्रतिशत तत्सम शब्द संस्कृत के हैं। तेलुगु का पहला व्याकरण ‘आंध्र शब्द चिंतामणि’ सन् 1020 में लिख गया था। वह संस्कृत में था। इस तरह वर्णमाला से लेकर साहित्य तक में संस्कृत का प्रभाव है। तेलुगु का पहला महाकाव्य महाभारत है। तीन महाकवियों ने उसका तीन शताब्दियों में प्रणयन किया, वह व्यास कृत महाभारत की अपेक्षा काया की दृष्टि से बड़ा है। इसलिए हमारे यहां कहावत है- ‘अगर खाना हो तो बड़े खाना चाहिए और सुनना हो तो महाभारत सुनना चाहिए।’ हिंदी प्रदेशों में तुलसीदास कृत रामचरित मानस जितनी लोकप्रिय है, उतनी लोकप्रिय आंध्र में व्यास कृत महाभारत है।
कवित्रय नामक तीन कवियों ने तीन शताब्दियों में इनका प्रणयन किया। इसके बाद भागवत का स्थान है। हालांकि इन महाकवियों ने संस्कृत के काव्यों का तेलुगु में रूपांतरण किया। लेकिन आवश्यकतानुसार उन्होंने मौलिक उद्भावनाएं की हैं। काव्य को अधिक सरस, सरल ओर गतिशील बनाने के लिए अपनी कल्पना से सुंदर बनाया। तेलुगु में तेरह-चौदह रामायण हैं। उनमें ऐसी उपकथाएं हैं जो वाल्मीकि रामायण, तुलसी रामायण, कंब रामायण, पंप रामायण, वल्लतोल रामायण और बंगाला कृत्तिवास रामायण में उपलब्ध नहीं है।
आपने बाल पत्रिका चंदामामा का करीब 23 वर्षों तक सफल संपादन किया। इसकी सफलता का क्या राज है?
सबसे पहले जिनके लिए हम रचना लिखते हैं, उनकी मानसिकता को, उनकी रुचि को हमें समझना चाहिए। उसके अनुरूप सामग्री देनी चाहिए, जिससे वे समझ सकें। उस समय मैं कभी-कभी कहानियां लिखा करता था। कहानी लिखकर बच्चों को सुनाया करता था। बच्चे कहते थे कि यह कहानी अच्छी नहीं हैं तो मैं उसे फेंक देता था। उसके बाद फिर कहानी लिखता था। जिस कहानी को अधिकांश बच्चे कहते थे कि यह अच्छी है, तब हम देते थे। हम पांच-छह सामाजिक कहानियां देते थे। लेकिन हम पर ठप्पा लगाया गया कि हम पौराणिक कथाएं देते हैं और बच्चों को दसवी शताब्दी की ओर ले जा रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं था। उदाहरण के लिए बेताल कथाओं को लें। बेताल प’चीसी; के नाम से संस्कृत में पच्चीस कथाएं हैं। पच्चीस कथाएं समाप्त हो गईं। बाल पाठकों ने कहा, ”अंकल हमें और कहानियां चाहिए।” हम कहां से देते?
चंदामामा दस-बारह भाषाओं में प्रकाशित होती थी। सभी भाषाओं के संपादकों की बैठक हुई। संचालक ने कहा, ”पुरानी बोतल में नई शराब।” हमने पूछा कि क्या मतलब? उन्होंने कहा कि चौखट-फ्रेम बेताल कथा का रहेगा, लेकिन नई कहानी बनाकर घुसेड़ देंगे। इस तरह से हमने ‘क्लू’ वाली कहानियां का चयन किया। परिणास्वरूप बेताल कथा आज तक चल रही है।
 हमने सोचा कि बच्चों के लिए देश का इतिहास दिया जाना चाहिए तो पूरा इतिहास दिया। महाभारत, रामायण, भागवत और जो भी पौराणिक कथाएं हैं, हमने सरल, सरस भाषा में बच्चों के स्तर की बनाकर दीं। इस तरह से बच्चों के लिए आवश्यक सामग्री दी।
मैं साहित्य के दो प्रयोजन मानता हूं। एक तो मनोरंजन होता है। बच्चों के लिए मनोरंजन होना ही चाहिए। उसके साथ ज्ञानवर्धन भी। लेकिन ज्ञान बच्चों के दिमाग में ठूस कर भरना नहीं चाहिए। वह हंसते-बोलते हुए मनोरंजन के साथ सहज ढंग से ज्ञान अर्जित करें।
समाज के प्रति साहित्यकार का क्या दायित्व है?
इस विषय पर भारतीय ज्ञानपीठ ने बहुत पहले दिल्ली में ‘सामाजिक परिवर्तन में लेखन का दायित्व’  नाम से बहुत बड़ी गोष्ठी की थी। इसमें देश के लगभग 65 साहित्यकारों को आमंत्रित किया गया था। उनमें मैं भी था। कुछ लोगों ने कहा कि लेखक कोई समाज सुधारक नहीं होता। मैंने कहा कि साहित्य का समाज पर बहुत प्रभाव पड़ता है। रस्किन ने अन टू द लास्ट लिखी, उसको पढऩे के बाद गांधी जी उसके कथ्य से बहुत प्रभावित हुए। टॉलस्टॉय की रचनाओं को प्रभाव गांधी जी पर स्पष्ट परिलक्षित होता है।
 कोई धर्म, साहित्य, संप्रदाय या ज्ञान-विज्ञान हो, पहले विचार आते हैं। विचार आने के बाद उसके सिद्धांत बनते हैं। फिर उन पर अमल होता है। धर्मों के भी कुछ सिद्धांत हैं। इसके लिए साहित्य बनता है। उन सिद्धांतों को आचरण में लाया जाता है। साहित्य के भी कुछ सिद्धांत होते हैं। हमारे मनीषियों ने चिंतन, मन करके अमृत सम जो सारतत्व प्राप्त किया ,उसे सूक्त रूप में परोसा। उदाहरण के लिए ‘सत्यमेव जयते’, ‘वसुधैव कुटुम्बकम’, ‘अहिंसा परमोधर्म:’। इस तरह उन्होंने सूत्र वाक्य बताए। इन पर साहित्य रचा गया।
कार्ल माक्र्स ने कैपिटल लिखा। उसका प्रभाव विश्व की एक तिहाई जनता पर पड़ा। हमारे साहित्यकार भी इस विचार से प्रभावित हुए। तो माक्र्स ने विचार दिया। इसके बाद कैपिटल के आधार सिद्धांत बने। फिर साम्यवादियों ने उस पर अमल किया। उसके आधार पर साहित्य का निर्माण हुआ।
लेखक की कलम में वह ताकत है कि विश्व में क्रांति पैदा कर सकती है। फिर वह कार्ल माक्र्स हो या गांधीजी। चीन के एक दर्शनिक ने कहा कि भारत ने बिना अस्त्र-शस्त्र उठाए विश्व के एक तिहाई भाग को अपना उपनिवेश बनाया। बौद्ध धर्म के आधार पर यह कैसे हुआ? पुस्तकों के माध्यम से, विचारों के माध्यम से।
विनोबा जी ने कहा कि विचार एक प्रकाश है। अज्ञान में पले हुए लोगों के दिमाग में जो अंधकार है, उसे दूर करने के लिए ज्ञान रूपी प्रकाश जो है, वह विचार है। गांधी जी ने उसे सत्य कहा, आचरण कहा।
 मैं हिंदी का श्रेष्ठ माहकाव्य कामायनी को मानता हूं। प्रसाद ने कामायनी में एक जगह कहा, ‘ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की। एक-दूसरे से मिल न सके, यह विडंबना है जीवन की।’ हम जो कुछ ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसे आचरण में नहीं लाते। जो हम जानते हैं, सोचते हैं, उसके अनुरूप हमारी क्रिया नहीं होती। यह विडंबना आज के जीवन की है। गांधी जी ने कहा है कि कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए। हम जो कहते हैं, वही हमें करना चाहिए।
मैं मानता हूं कि साहित्यकार संवेदनशील होता है। संवेदनशीलता जब जागृत होती है तो रचनाकार अपनी अभिव्यक्ति को साहित्य की किसी विधा के माध्यम से अभिव्यक्ति करता है। उसका प्रभाव पाठक पर पड़ता है। उसे सोचने के लिए साहित्य बाध्य करता है। उसके मस्तिष्क पर कथ्य का गहरा प्रभाव पड़ता है। उसे आचरण में लाया जाता है। उससे परिवर्तन भी होते हैं। इसलिए मैं समझता हूं कि साहित्य समाज में सुधार या परिवर्तन लाने में सक्षम है। बशर्ते हमारे लेखन में, चिंतन में, अनुभूतियों में वो ताकत हो कि वह दिल को स्पंदित कर सके।
राष्ट्रभाषा का मसला हल नहीं हो सका है? इसका हल क्या है?
 मैंने गांधी से हस्ताक्षर लेकर हिंदी सीखी। गांधी जी ने 21 जनवरी, 1946 को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की रजत जयंती समारोह का उद्घाटन किया था। उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि बहुत जल्दी ही देश आजाद होने जा रहा है। आजाद हिंदुस्तान की राष्ट्र भाषा हिंदी होगी। अत: मैं महिलाओं तथा युवाओं से अपील करता हूं कि आप लोग अभी से हिंदी सीखना आरंभ करें ताकि हिंदुस्तान के आजाद होते ही जनता की भाषा में शासन का कार्य संपन्न हो सके। गांधी जी का यह सपना था, परंतु आज तक हम लोग उनके सपने को साकार नहीं कर पाए।
 किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के लिए चार उपकरणों की आवश्यकता होती है। उसका अपना एक संविधान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रभाषा होती है। किसी भी देश के लिए विदेशी भाषा कभी भी राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती। इसलिए गांधी जी ने सोचा कि स्वतंत्र होने के बाद भारत के लिए भी एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। 1918 में इंदौर में साहित्य सम्मेलन के दसवें अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा था कि हिंदी का प्रचार होना चाहिए। अपने पुत्र देवदास गांधी, जो उस समय 18 वर्ष के थे, को मद्रास भेजा। वहां दक्षिण में हिंदी प्रचार का बीजारोपण हुआ। आज दक्षिण में हर साल दस लाख बच्चे हिंदी सीख रहे हैं। आंध्र, कर्नाटक और केरल में दसवीं तक अनिवार्य रूप से हिंदी पढ़ाई जाती है।
स्वाधीनता के आंदोलन के दौरान हिंदी को राष्ट्रयता की संवाहिका के रूप में स्वीकार किया गया। जेलों में हमारे नेताओं ने हिंदी सीखी। गांधी जी ने कहा कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। उन्होंने सोचा कि हम अभी से हिंदी का प्रचार करें तो स्वतंत्र होते ही तुरंत हिंदी में काम कर सकते हैं और अंगे्रजी को हटा सकते हैं। यही कारण है कि 1936 में राजा जी मद्रास के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने हिंदी को स्कूल में अनिवार्य बनाया और तत्कालीन जामिया मिल्लिया के अध्यक्ष को लिखा कि हम अपने बच्चों को सही हिंदी सिखाना चहते हैं। अच्छी पाठ्य पुस्तकें तैयार कर भिजवा दो। हिंदी का विरोध करने वाले रामास्वामी नायकर जो डी.के. के प्रवक्ता थे, उनके घर पर 1922 में मोतीलाल नेहरू ने हिंदी प्रचारक विद्यालय का उद्घाटन किया था। कहने का मतलब है कि उस काल खंड में हिंदी के लिए दक्षिण के सभी नेता और जनता प्रतिबद्ध थी।
1950 में संविधान में हिंदी को स्वीकृति मिली। यह बताया गया कि 15 वर्ष के पश्चात हिंदी अंग्रेजी का स्थान ग्रहण करेगी और हिंदी हमारी प्रशासनिक भाषा होगी। 1963 में इसमें संशोधन हुआ कि जब तक हिंदीत्तर भाषा के तीन चौथाई सांसद स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक ऐसा नहीं होगा। अब तो यह विवाद का विषय बन गया है।
1965 में जब लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने,  उन्होंने सोचा कि हम देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजना क्रियांवित करते हैं, लेकिन भाषा के लिए अब तक जो भी प्रयास हुआ नगण्य है। इसके लिए उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को दिल्ली में आमंत्रित किया। तीन दिन तक गहन चर्चा हुई। इसके बाद सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ कि सभी राज्यों में त्रि-भाषा सूत्र पर अमल किया जाएगा। इसके अनुसार प्रथम भाषा के रूप में मातृïभाषा, द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी तथा तृतीय भाषा के रूप में अंग्रेजी पढ़ाई जानी थी। आंध्र, केरल और कर्नाटक में इसका अनुपालन हुआ। हरियाणा में थोड़े प्रयास हुए। उत्तर प्रदेश में तेलुगु को कुछ जगह पढ़ाया गया। लेकिन इस सूत्र पर गंभीरता से काम नहीं हुआ।
 कोई भी गणतंत्र राष्ट्र विदेशी भाषा को अपनी राजभाषा के रूप मं स्वीकार नहीं करता। जब टर्की आजाद हुआ तो कमलपाशा ने देश के सभी अधिकारियां को बुलाकर कहा, ”देखो भई, हमारा देश स्वतंत्र हो गया है। हम तरक्की करना चाहते हैं। बताओ।” लोगों ने अपने-अपने विचार दिए। अंत में उन्होंने कहा, ”आप लोग अपनी घड़ी देखो। इसी मिनट और इसी सैकिंड से टर्की की राजभाषा तुर्की है। जाओ काम करो।” ऐसे काम होता है।
देश में रेल विभाग, वित्त विभाग, सेना विभाग आदि कई विभाग एक हैं। लेकिन शिक्षा नीति प्रांतीय सरकारों के हाथ में है। वहां के शिक्षा मंत्री पाठ्यक्रम तैयार करते हैं। संपूर्ण राष्ट्र के लिए अगर एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनती तो सारे बच्चों को एक प्रकार की शिक्षा मिलती। अब क्या होता है? हर प्रांत में वहां के नेताओं के बारे में पढ़ाया जाता है। बच्चे सोचते हैं कि यही हमारी दुनिया है। हमारे बीच एकात्मता नहीं है। विघटन की प्रवृत्ति है। एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति तुरंत बनाई जानी चाहिए। भले ही इसके लिए संविधान में संशोधन करना पड़े।
 हिंदी राष्ट्र की अस्मिता की भाषा है। मैं पहले भारतीय हूं। उसके बाद आंध्रवासी हूं। मेरी मातृभाषा तेलुगु मुझे तो बहुत प्यारी है क्योंकि जन्मघूटी से सीखी हुई भाषा है वह। हिंदी से कम नहीं मानता और हिंदी के लिए मैं अपनी मातृभाषा की बलि देना भी नहीं चाहूंगा। लेकिन एक भारतीय के नाते संपूर्ण राष्ट्र के लिए हिंदी को प्रशासनिक एवं भारत-भारती के रूप में अवश्य देखना चाहता हूं।
समय-समय पर कई राज्यों में हिंदी के विरोध में आंदोलन हुए है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था मैं विदेश में तो हिंदी बोल सकता हूं, वहां कोई खतरा नहीं है लेकिन भारत में बोलूंगा तो जान को खतरा हो जाएगा। इस बारे में क्या कहना है?
मुझे यह वक्तव्य पढ़कर बहुत दुख हुआ। मैंने इसका विरोध करते हुए एक लेख भी लिखा था। दरअसल 1922 में आंध्र के नगर काकिनाडा में अखिल भारतीय कांग्रेस महासभा का अधिवेशन हुआ था। स्वागताध्यक्ष श्री कोंडावेंकटपय्या पंतुलु ने हिंदी में स्वागत भाषण दिया था। उनके लिए कोई खतरा नहीं था तो अस्सी साल बाद इन लोगों को क्या खतरा होता है? मेरी समझ में नहीं आता।
समय-समय पर आंदोलन तो हुए?
ये तो स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री संवैधानिक मान्यताओं को अमल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्हे ऐसा वक्तव्य नहीं देना चाहिए था। अगर वह दृढ़ता से हिंदी पर अमल करते और इसके विरोध में आंदोलन होता तो हम लोग भी उसके विरोध में खड़े हो जाते।
लेकिन जो आंदोलन हुए उनके क्या कारण है?
यह तो राजनीति प्रेरित है। नेता कोई-न-कोई आंदोलन खड़ा कर जनता को अपने पक्ष में करना चाहते हैं। जनता में जो कमजोरियां हैं, उन प्रवृत्तियों को उभार कर लाभ उठाने का प्रयास होता है। हम सब भारतीय पहले हैं, उसके बाद कुछ और हैं। आम आदमी को हिंदी से कुछ लेना-देना नहीं है। मान लीजिए अगर मैं मजदूर हूं। मैं कहीं भी जाकर काम करता हूं। मुझे हिंदी से क्या लेना-देना। लेकिन प्रशासनिक कार्य के लिए हिंदी आवश्यक है। हिंदी विभिन्न राज्यों को एकसूत्र में जोडऩे के लिए एक माध्यम है। जब विदेशियों ने अंग्रेजी का थोपा तो अपने सहर्ष स्वीकार किया। आप गर्व करते हैं, जबकि आपको अंग्रेजी बोलना भी नहीं आता। हिंदी का विरोध करने वाले कितने प्रतिशत अंग्रेजी जानते हैं आपको मालूम है? यदि कोई दक्षिण से दिल्ली आए तो रास्ते में जितने भी राज्यों को पार करना पड़ता है, वहां हिंदी के बिना काम चलेगा ही नहीं।
 दक्षिण में चार राज्य हैं। इस राज्यों के वासी जब दूसरे राज्य में जाते हैं तो ऐसे अनुभव करते हैं, जैसे हॉलैंड का व्यक्ति पौलैंड में गया हो। फ्रांस आंध्र के बराबर भी नहीं है। इंग्लैंड तो आंध्र से भी छोटा है। उन्होंने डंडे के बल पर राज्यों को जीतकर अपना उपनिवेश बनाया। जबरदस्ती अंग्रेजी को थोपा। अंग्रेजी प्रशासन की भाषा बना। इससे रोजी-रोटी मिलती थी इसलिए सबने उसको अपनाया। लेकिन अंग्रेजी के आने से पहले भारत ने विश्व में अपना वर्चस्व किसी भाषा और किसी संस्कृति के बल पर ऊंचा किया? वेद जैसे ज्ञान के ग्रंथ विश्व में कहीं भी नहीं हैं। संस्कृत में क्या नहीं है। वो तो कठिन है, मृतभाषा है। शंकरचार्य जी ने आठवीं शताब्दी में सारे भारत में जाकर शास्त्रार्थ किया। ग्रंथ लिखे। वाल्मीकि ने रामायण संस्कृत में लिखी जो कि शिक्षित नहीं थे। उनके लिए कठिन नहीं थी तो हमारे लिए कैसे है?
आपने कई ऐतिहासिक उपन्यास लिखे। क्या कारण है कि आप बार-बार इतिहास की ओर मुड़ते हैं?
 देश को समग्र इतिहास नहीं मिल रहा है। जो कुछ खंडित रूप में लिखा गया है, वह भारत को एक साथ जोडऩे में सक्षम नहीं है। उदाहरण के लिए, कहा जाता है कि ईसा पूर्व आर्यों का आगमन हुआ। इसके बाद शक आए, हूण आए, मुगल आए, अंग्रेज आए। उस समय दक्षिण में कौन शासन करता था? अशोक व हर्ष के काल तक सारा इतिहास मिलता है। उसके बाद सब छोटी-छोटी रियासतें थीं। अत: भारत का समग्र इतिहास नहीं बना। इसलिए आंध्र के स्वर्णिम इतिहास को उपन्यास के माध्यम से प्रस्तुत करने का मैंने फैसला किया। उस कालखंड में साहित्य, कलाओं का अद्भुत विकास हुआ। मुगलों का आक्रमण हुआ, पुर्तगाली आए थे। चारों तरफ से उनका दबाव था। ऐसी हालत में आंध्र में कृष्णदेव राय या जो भी थे, उन्होंने अपनी अस्मिता के लिए युद्ध किए। अपनी कलाओं का विकास किया व आक्रमणकारियों को प्रदेश में घुसने नहीं दिया। आंध्र के इतिहास का देश के इतिहास में उल्लेख नहीं है। पल्लव, हूण, चालुक्य, चोल, पांड्य आदि दो-चार वंशों का थोड़ा बहुत उल्लेख है, लेकिन यह संपूर्ण इतिहास नहीं है। मैंने आंध्र के तीन-चार कालखंडों को लेकर औपन्यासिक रूप दिया। इनमें उस समय आंध्र के लोग क्या सोचते थे, वहां कलाओं का विकास कैसे हुआ? यह सब समग्र रूप से मैंने दिया।
लेखन के अलावा आपकी रुचि के अन्य विषय क्या हैं?
लेखन के अलावा सबसे पहले मैं अच्छा नागरिक बनना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि सभी प्रदेशों में भाईचारे की भावना बढ़े। विभिन्न भाषाएं अगल-अलग प्रदेशों में जरूर हैं, लेकिन सबका चिंतन एक है। राधाकृष्ण ने एक बार कहा था कि ‘इंडियन लिटरेचर इज वन, दैट इज रिर्टन डिफरेंट लैंग्विजेज’। मैं इसे स्पष्ट करता हूं। वेद, पुराण, रामायण, महाभरत, अभिज्ञान शाकुंतलम सभी पूरे देश के लिए एक हैं। अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ इन्हीं को आधार बनाकर लिखे गए। मैं चाहता हूं कि समस्त भारतीय भाषाओं में जो अच्छा साहित्य है, हिंदी में आए। भारतीय वांग्मय का प्रतिनिधि हिंदी बने। इसी प्रकार वांग्मय इतर भाषा में अनुदित हो। नोबल पुरस्तकार विजेता अमत्र्य सेन का कहना है कि अगर भारतीय भाषाओं में हम पुन: अपने बच्चों को शिक्षा दें तो वह दिन आएगा, जब यहां पर कई नालंदा विश्वविद्यालय खुल जाएंगे। विदेशी लोग यहां आकर अध्ययन करेंगे।
 
 
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