Archive for: March 2010

अपरोध बोध

सर्दियों के दिन थे। सुबह आठ बजे का समय। कर्मचारियों को फैक्टरी व दफ्तर और छात्र-छात्राओं को स्कूल-कॉलेज जाने की जल्दी। बस ने आज फिर देर कर दी। सवारियां मधुमक्खियों की तरह भिनभिना रही हैं।
बस रुकी। मैं तेजी से लपका। एक आदमी उठा। मैंने तुरंत सीट पर कब्जा कर लिया। पहले से खडे़ लोगों की ओर दयनीयता से देखते हुए मन ही मन विजयी भाव से मुस्कारा दिया।
अगला स्टाप आया। सैलाब फिर उमड़ा। जोर-जबरदस्ती करके कुछ लोग और चढ़ गए। उनमें एक महिला अपने दो बच्चों के साथ जैसे-तैसे चढ़ गई। एक बच्चा गोद में बिलखता हुआ और दूसरा पैरों के बीच भिंचा हुआ।
सबकी नजरें उसे घूरने लगीं। उसने याचना की दृष्टि से देखा, परंतु सभी ने मेरी तरह सभी न नजरें ऐसे घुमा लीं जैसे कुछ देखा समझा ही न हो।
मेरा पास बैठा व्यक्ति खिड़की से लगी अपनी बैसाखियां को खट-खट करता हुआ खड़ा हो गया और उसने महिला से कहा, ”आइए, बैठिए।”
मुझे लगा, जैसे में संवेदनाविहीन मांस का लोथड़ा मात्र हूं।

लेट-लतीफ

मुझे आज फिर देर हो गई। मैंने हड़-बड़ाकर घर से निकलते हुए घड़ी पर नजर डाल तो पांच मिनट लेट था। मैं तेजी से बस स्टाप की ओर बढ़ते हुए सोचने लगा- आज तो देर हो गई। बस तो निकल गई होगी। काश, आज बस लेट हो।
मोड़ पर मुड़ते ही बस दिखाई दी। मैंने दौड़ते हुए हाथ हिला दिया। बस रुक गई। मैं लपक कर चढ़ गया। मैंने घड़ी पर पुनः नजर डाली। दो-तीन मिनट और बीत गए थे।
भाई, ”बस जरा जल्दी चलवा।” पायदान पर पैर रखते ही मैं बोला।
”वे दो लोग भाग कर आ रहे हैं। अभी चलते हैं”, कंडेक्टर ने सपाट सा जवाब दिया।
”ऐसे तो कोई-न-कोई आता रहेगा। दफ्तर के लिए पहले ही बहुत देर हो गई। जल्दी-जल्दी बस चलवा”, मैं झुंझलाकर बोला।
कंडेक्टर ने ऐसे घूर कर देखा, मानो कह रहा हो कि यदि मैं भागकर आती हुई सवारियांे का ध्यान न रखता और बस को चलवा देता तो तुम तो रह ही जाते।
मैं चुपचाप आगे खिसक लिया।

संघर्ष और सृजन का आयोजन 26-27 को देहरादून में

देहरादूनः अंतरराष्ट्ीय महिला दिवस के सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में महिला समाख्या, उत्तराखंड की ओर से दो दिवसीय कार्यक्रम संघर्ष और सृजन का आयोजन 26 और 27 मार्च को साईं पीजी होम, इंदिरानगर, देहरादून में किया जा रहा है। इसका उद्घाटन उत्तराखंड की राज्यपाल मार्गेट अल्वा करेंगी। संचालन कमला पंत करेंगी। महादेवी वर्मा के साहित्य में स्त्री विमर्श पर निदेशक, महादेवी वर्मा सृजन पीठ का व्याख्यान होगा। पुस्तिका ‘ना मैं विरवा ना मैं चिरिया’ का विमोचन किया जाएगा। इसमें महिलाओं की आत्मकथा ओर जीवतिनयों के अंश संकलित किए गए हैंं।
पहले सत्र का संचालन महिला समाख्या, उत्तराखंड की निदेशक गीता गैरोला करेंगी। इस अवसर पर जिला इकाई, टिहरी द्वारा गीत ‘तीन गज की ओढ़नी’, प्रस्तुत किया जाएगा। महिला आंदोलन के सौ वर्ष विषय पर परिचर्चा होगी। अध्यक्षता गौरी चैधरी करेंगी। मुख्य वक्ता जया श्रीवास्तव होंगी। पैनलिस्ट होंगी सरोजनी कैन्तुरा, सविता मोहन, अनिता दिघे, कुसुम नौटियाल और बेबी हालदार।
दूसरे सत्र में जिला इकाई, उत्तरकाशी द्वारा ‘वो हमारे गीत को रोकना चाहते हैं’ गीत प्रस्तुत किया जाएगा। महिला आंदोलन एवं मुस्लिम महिलाएं विषय पर परिचर्चा होगी। इसका संचालन जान्हवी तिवारी करेंगी और अध्यक्षता कथाकार पंकज बिष्ट करेंगे। मुख्य वक्ता शीबा असलम होंगी। पैनलिस्ट हम्माद फारूखी, डॉ0 जैनब रहमान, रजिया बेग, अंजुम मलिक होंगे। जिला इकाई, उधम सिंह नगर द्वारा गीत ‘चार दिवारी में घुट कर अब नहीं जीना है’ प्रस्तुत किया जाएगा। संघर्ष कर मुकाम हासिल करने वाली पांच महिलाओं को सम्मानित किया जाएगा। सत्र का समापन कथाकार विद्यासागर नौटियाल की चर्चित कहानी “फट जा पंचधार“ के नाट्य रूपांतरण के मंचन से होगा। इसका मंचन संभव नाट्य मंच द्वारा किया जाएगा।
दूसरे दिन का पहला सत्र जिला इकाई, पौड़ी द्वारा प्रस्तुत गीत ‘इरादे कर बुलंद’ से आरंभ होगा। महिला आंदोलन एवं दलित महिलाएं विषय पर परिचर्चा होगी। संचालन शशि मौर्या करेंगी। अध्यक्षता कथाकार ओमप्रकाश वाल्मिकी करेंगे। मुख्य वक्ता होंगी रजनी तिलक। पैनलिस्ट होंगे वीएन राय, जितेंद्र भारती, इंद्रा पंचोली, लक्ष्मण सिंह बटरोही, सुचित्रा वैद्यनाथ। संघर्षशील महिलाओं नंदी नैनवाल, विजयलक्ष्मी और बेबी हालदार के संघर्ष पर प्रकाश डाला जाएगा।
दूसरे सत्र में महिला आंदोलन और गांधी विषय पर परिचर्चा होगी। इसका संचालन बसंती पाठक करेंगी। अध्यक्षता करेंगी चर्चित लेखिक मैत्रेयी पुष्पा। मुख्य वक्ता होंगी दिवा भट्ट। पैनलिस्ट डॉ शेखर पाठक, डॉ0 विद्या सिंह, डॉ0 मधुबाला नयाल होंगी। मुख्य अतिथि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक होंगे।
सत्र का समापन युगमंच, नैनीताल द्वारा प्रस्तुत नाटक “जिन लाहौर नई वेख्या से होगा।

साहित्य पर अश्लील तोहमत

पिछले कुछ समय से हिंदी साहित्य में कोई वैचारिक और रचनात्मक हलचल तो नहीं हो रही है, लेकिन विवाद नए-नए उठ रहे हैं। हिंदी अकादमी, दिल्ली में उपाध्यक्ष पद पर अशोक चक्रधर की नियुक्ति, सैमसंग पुरस्कार, उपन्यास द्रोपदी को लेकर हंगामा और अब केदारनाथ सिंह द्वारा शलाका सम्मान ठुकराना। उनके अलावा पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रियदर्शन, रेखा जैन, पंकज सिंह, गगन गिल और विमल कुमार ने भी पुरस्कार नहीं लेने की घोषणा की है। इसके पीछे वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान नहीं दिया जाना है। दरअसल, हिंदी अकादमी की पिछली कार्यकारिणी ने वैद को वर्ष 2008-2009 के शलाका सम्मान के लिए नामित किया था। बाद में इसे रोक दिया गया। असल में साहित्य से कुछ लोगों ने वैद पर अश्लील साहित्य लिखने का आरोप लगाया था। वैसे तौर से उनके उपन्यास नासरीन और बिमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां को लेकर आपत्ति जताई थी। हालांकि हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने यह कहा कि अकादमी ने कभी आधिकारिक तौर पर कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान देने या नहीं देने की बात नहीं कही।
वैद का लेकर हो रहे विवाद ने एक बार फिर साहित्य में अश्लीलता के सवाल को जीवित कर दिया है। यह सवाल सदियों पुराना है। साहित्य के जन्म के साथ ही इस तरह के विवाद उठने लगे। समय-समय पर इसे लेकर खूब हो-हल्ला मचा। प्रसिद्ध कथाकार पांडेय बेचन शर्मा उग्र के साहित्य को पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी घासलेटी साहित्य मानते थे। उन्होंने इसके विरोध में व्यापक अभियान भी चलाया था और गांधीजी से भी इसकी शिकायत की थी। हालांकि गांधीजी को उग्र की रचनाएं अश्लील नहीं लगीं और उन्होंने क्लीन चिट दे दी। अश्लीलता का संबंध हमारी मानसिकता और परिवेश से है। हम जिस समाज में रह रहे हैं, जो इसके लिए अश्लील है, वह दूसरे समाज के लिए सहज हो सकता है। स्थिति इसकी उल्टी भी संभव है।
अगर लेखक की मानसिकता स्वस्थ और समाजपरक है तो उसमें अश्लीलता आ ही नहीं सकती है। ऐसा वर्णन पढ़कर पाठक उत्तेजित और यौनकांक्षी नहीं होगा, बल्कि उसके मन में घृणा और आक्त्रोश ही उत्पन्न होगा। अस्वस्थ मानसिकता का रचनाकार सेक्स और नग्न चित्रण केवल क्षणिक उत्तेजना के लिए करेगा। दूसरी ओर कुछ रचनाकार सस्ती लोकप्रियता और सनसनी फैलाने के लिए भी इस तरह का चित्रण करते हैं, लेकिन उनके लेखन को कोई स्थाई महत्व नहीं मिलता। इसके अलावा अश्लीलता समय सापेक्ष है। समय के अनुसार इसकी परिभाषा भी बदलती रही है। आज से चालीस-पचास पहले फिल्मों में जिन दृश्यों को अश्लील माना जाता है, आज उन्हें सहज मान लिया गया है।
चर्चित कथाकार भीमसेन त्यागी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि अश्लीलता का प्रश्न उतना ही पुराना है, जितना साहित्य। वास्तव में अश्लीलता साहित्य में नहीं, बल्कि साहित्यकार की मानसिकता में होती है। अगर रचनाकार की मानसिकता स्वस्थ व समाजपरक है तो नग्न चित्रण भी अश्लील न होकर सार्थक और सही मायनों में साहित्य का उद्देश्य पूरा करने वाला हो जाता है। एलेक्जेंडर कुप्रिन का यामा-द-पिट इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। स्त्री-पुरुष का जैसा नग्न चित्रण इस उपन्यास में हुआ है, वैसा साहित्य में बहुत कम हुआ है। लेकिन इस नग्न चित्रण के बावजूद जो मानवीय संवदेना यामा-द-पिट में है, वह उसे विश्व की श्रेष्ठतम उपन्यासों की कतार में ला खड़ा करती है।
गोर्की की कहानी एक इंसान का जन्म में नग्न चित्रण है, लेकिन पाठक क्षणभर के लिए कहीं अश्लीलता अनुभव नहीं करता।
जगदम्बा प्रसाद दीक्षित की कहानी जिदंगी और गंदगी में भरपूर नग्नता होने के बाद भी लेशमात्र अश्लीलता नहीं है। निर्णायक बिंदू नग्नता नहीं, लेखक की मानसिकता है।

लेखक बडे़ मूल्यों के लामबंद हों : सेरा यात्री

स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में हर कोई जानता है। अब तो बच्चे भी इस बारे में जानने लगे हैं। यदि लेखक सेक्स का वर्णन रसलोलुप होकर करता है तो वह अश्लील है। यदि मर्यादा में रहकर वर्णन किया जाता है तो वह अश्लील नहीं है।
अश्लीलता का सबसे अधिक आरोप मंटो पर लगा है। वेश्याओं का वर्णन उनकी रचनाओं में बहुत हुआ है। लेकिन उन्होंने ऐसा वर्णन नहीं किया कि जो पाठक के मन में यौन इच्छा या यौन उन्मुक्तता पैदा करता है।
अश्लीलता अगर लेखक का उद्देश्य ही बन जाए तो गलत है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण तस्लीमा नसरीन है। उन्होंने कैसे विभिन्न पुरुषों के साथ संभोग किया, कैसे इंज्वाय किया, इसका उल्लेख उनकी रचनाओं में है। इसे वह मुक्त सेक्स कहती हैं। उन्होंने लेखन से धर्म, भ्रष्टाचार, कुपोषण आदि के विरुद्ध जो संघर्ष किया है, वह इसके नीचे दब जाता है।
लेखक जब बडे़ मूल्यों से हटकर शरीर पर अटक जाता है तो उसकी रचना में अश्लीलता आ जाती है।
मान लिया कि कृष्ण बलदेव वैद की रचनाओं में अश्लीलता है। जब उनका नाम घोषित कर दिया और उनसे स्वीकृति ले ली तो हिंदी अकादमी का नैतिक दायित्व है कि उन्हें पुरस्कार दे। हाल ही में तेलुगु के लेखक के उपन्यास द्रोपदी को लेकर साहित्य अकादमी पुरस्कार समारोह में हंगामा हुआ। उनका नाम घोषित कर किया जा चुका था इसलिए विवाद के बाद भी उन्हें पुरस्कार दिया गया।
आज समाज में बडे़ मूल्यों के लिए संघर्ष खत्म हो गया है। लेखकों को इसके लिए लिए लामबंद होना चाहिए। जन साधारण की समस्याओं के लिए लेखक एकजूट हों। किसे पुरस्कार दिया गया, किसे नहीं, ये बहुत छोटी चीजें हैं। बड़ी बात समाज में हो रहे अनाचार के विरुद्ध एकजूट होकर संघर्ष करना है।

अश्लीलता का संबंध सोच से : कांतिकुमार जैन

अश्लीलता का संबंध हमारी मानसिकता, हमारे संस्कारों से है। हम सब अभी भी विक्टोरिया युगनी प्रूडरी से बाहर नहीं निकाल पाए हैं। कहते हैं कि विक्टोरिया के समकालीन कुलीन लोग अपने ड्ाइंग रूम की मेजों को मेजपोश से ढककर रखते थे ताकि तेज की नंगी टांगें आगंतुकों की आंखों से ओझल रही जाएं। हम अभी तक इसी मानसिकता से ग्रस्त हैं। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने निराला के प्रसिद्ध गीत दूर देश की वामा, आए मंद चरण अभिरामा, उतरे जल में अवसन श्यामा, अंकित उरछवि सुंदरतर हो की प्रशंसा करते हुए लिखा कि निरालाजी इस गीत में अवसन के स्थान पर नंगी कर देते तो न छंदोभंग होता, न यति टूटती पर गीत अश्लील हो जाता। अर्थात् अश्लील अवसन शब्द नहीं है। अश्लील नंगा शब्द है। अभिजनोचित, सुरुचिपूर्ण सभ्य होने का दर्प। हमें देखो, हम कितने संस्कृत हैं, तुम कितने असंस्कृत। तुम्हारें पांव पांव, हमारे पांव चरण वाली मानसिकता।
कालिदास ने मेघदूत में तन्वीश्यामा शिखरिदशना वाले प्रसिद्ध छंद में स्तन भर शब्द का इस्तेमाल किया है। इसका छत्तीसगढ़ अनुवार क्या हो? छत्तीसगढ़ में स्त्री के बडे़-बडे़ स्तनों को थन कहना आम है। दाई रे, ओकर कतेक बडे़-बडे़ थन हवै। छायावाद के वरिष्ठ कवि मुकुटधर पांडेय ने मेघदूत के अपने छत्तीसगढ़ अनुवाद में लिखा-
झुके थोरकुन थनभारा ले, कूला हर गरुवावै
तेकर कारन आलस मा वे जल्दी चले न पावै
कालिदास के स्तन भार को किसी ने अश्लील नहीं कहा था, किंतु छत्तीसगढ़ में इस अनुवाद के कारण मुकुटधर जी पर भारी आरोप लगे। देववाणी में जो अश्लील नहीं है, हिंदी में या उसकी बोलियों में अनुदित होते ही वह अपनी श्लीलता खो देता है। पाण्डेय जीने इस आरोप पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बडे़ दुख से मुझे लिखा था, मेघदूत के छत्तीसगढ़ अनुवाद को लेकर मुझ पर छींटाकशी शुरू हो गई है। निस्संदेह मेघदूत में एकाध स्थान पर नग्नताई पाई जाती है, अभी हम नेकेड और न्यूड का अंतर नहीं समझ पाएं हैं। खैर, आलोचना महाकवि की समझी जाएगी, मैं तो मात्र आलोचक हूं।
लेखक के चर्चित लेख- अश्लीलता का हिंदी चेहरा का अंश

हम इच्छाधारी

हम सब इच्छाधारी हैं। इस धरती में कदम रखते ही हमारी इच्छाएं भी जन्म ले लेती हैं। और फिर जिदंगीभर हम उन्हें पूरा करने में ही लगे रहते हैं। एक पूरी होती है तो रक्तबीज की तरह कई जन्म ले लेती हैं। इच्छाएं ब्रह्म हैं। इनका न आदि है और न अंत।
राजनीति के अखाडे़ को ही ले लें। कार्यकर्ता की इच्छा रहती है कि वह स्थानीय स्तर का पदाधिकारी बन जाए। बन जाता है तो प्रदेश या देश स्तर की इच्छा जन्म ले लेती है। यह भी पूरा हो जाती है तो जन प्रतिनिधि बनने की इच्छा पनपने लगती है। फिर केंद्र में मंत्री पद दिखाई देने लगता है। इसमें कामयाबी मिल जाती है तो बड़ा बंगला, फार्म हाउस, बड़ी गाड़ियां, स्विस बैंक में खाता, बच्चों की विदेश में पढ़ाई जैसी नाना प्रकार की इच्छाएं जन्म ले लेती हैं। इनके लिए वह घोटाले करता है। विकास कार्यों के लिए जो निधि मिलती है, उसमें कमीशन खाता है। इसमें उसका कोई कसूर नहीं है। सब इच्छाएं करवाती हैं। इसके बावजूद इच्छाएं पूरी नहीं होतीं। वह अगली बार, उससे अगली बार यानी अंतत काल तक मंत्री बने रहना चाहता है। प्रधानमंत्री बनने के कोई चांस न हों तो भी कब्र में पैर में लटकाए भी इसकी इच्छा रखता है।
पूंजीपति की इच्छाएं भी कम नहीं होतीं। वह जितना ज्यादा मुनाफा कमाता है, उतनी ही उसकी इच्छाएं बढ़ती जाती हैं। दुनिया भर की सुख-सुविधाएं जुटाकर भी उसकी इच्छाएं कम नहीं होतीं। इसलिए वह कर्मचारियों का शोषण करता है। कम से कम वेतन पर अधिक से अधिक काम करना चाहता है। भ्रष्ट नेताओं को और भ्रष्ट करता है। मैंने आज तक किसी पूंजीपति को यह कहते नहीं सुना कि मैंने बहुत कमा लिया। अब मेरी इच्छाएं पूरी हो गई हैं, भले ही दुनिया का नंबरवन पूंजीपति ही क्यों न हो।
साधु-संत जिन्हें इच्छा विजयी माना जाता था, आज वह सबसे आगे हैं। आश्रमों और मठों को लेकर तो विवाद होते ही रहते थे, अब लड़की भगाने और हत्या करने में भी पीछे नहीं हैं। धन और नारी की इच्छा में वह दलाली करने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। एक बाबा की इच्छा तो इतनी बढ़ गई है कि उसने राजनीतिक पार्टी बनाने की ही घोषणा कर दी है।
क्रिकेटर खेल के ही इतना कमाता हैं, फिर भी क्या उनकी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। फैशन शो में कैटवॉक करने से लेकर रियल्टी शो में डांस तक कर रहे हैं। विज्ञापनों से अनाप-शनाप कमा रहे हैं। आईपीएल के लिए भेड़-बकरियों की तरह उनकी बोली लगाई जा रही है। वे लाखों-करोड़ों में बिक रहे हैं। इसे देखकर आदिम युग का दृश्य साकार हो जाता है, जब गुलामों की खरीद-फरोख्त की जाती थी।
पौराणिक कथाओं के इच्छाधारी नाग के बारे में पढ़ा था। वह कोई भी रूप रख सकाता था। पहले मुझे इससे पर यकीन नहीं होता था, लेकिन अब विश्वास करने लगा हूं। नेता, क्रिकेटर, पूंजीपति, अफसर, मंत्री, बाबा आदि के रूप में इच्छाधारी है। उसने लोगों को धोखा देने के लिए केवल रूप बदला हुआ है।
शिवमूरत द्विवेदी उर्फ स्वामी भीमानंद उर्फ इच्छाधारी बाबा ने भी जो कुछ किया अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किया। इसमें उसका क्या दोष है? एक मामूली से इनसान की इच्छाएं बढ़ती गईं और वह हर तरीके से पैसा कमाने लगा। क्या एक सिक्युरिटी गार्ड के यहां तक पहुंचने में इच्छाधारी अधिकारियों और पुलिसकर्मियों का हाथ नहीं है?
मैं भी इच्छाधारी हूं। मेरी भी इच्छाएं अंतत हैं। एक पूरी करता हूं, तुरंत उससे बड़ी इच्छा जन्म ले लेती है। इसलिए मैं तो इच्छाधारी बाबा की शरण में जा रहा हूं।

वयोवृद्ध कथाकार मार्कण्डेय का निधन

नई दिल्ली। हिंदी के वयोवृद्ध कथाकार मार्कण्डेय का निधन हो गया है। वह गले के कैंसर से पीडि़त थे। उनका इलाज राजीव गांधी कैंसर अस्पताल, रोहिणी में चल रहा था। उनका अंतिम संस्कार शुक्रवार को इलाहाबाद में किया जाएगा।
प्रेमचंद के बाद हिंदी कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन को पुनस्र्थापित करने वालों में मार्कण्डेय महत्वपूर्ण कथाकार थे। उन्होंने आम आदमी के जीवन में साहित्य में जगह दी। वह जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में से थे।
1965 में उन्होंने माया के साहित्य महाविशेषांक का संपादन किया था। कई महत्वपूर्ण कहानीकार इसके बाद सामने आए। 1969 में उन्होंने साहित्यिक पत्रिका कथा का संपादन शुरू किया। इसके अभी तक 14 अंक ही निकल पाए हैं। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में पत्रिका को मील का पत्थर माना जाता है।
उन्होंने जीवनभर कोई नौकरी नहीं की। अग्निबीज, सेमल के फूल(उपन्यास), पान फूल, महुवे का पेड़, हंसा जाए अकेला, सहज और शुभ, भूदान, माही, बीच के लोग (कहानी संग्रह), सपने तुम्हारे थे (कविता संग्रह), कहानी की बात (आलोचनात्मक कृति), पत्थर और परछाइयां (एकांकी संग्रह) आदि उनकी महत्वपूर्ण कृतियां हैं। हलयोग (कहानी संग्रह) प्रकाशनाधीन है। उनकी कहानियों का अंग्रेजी, रुसी, चीनी, जापानी, जर्मनी आदि में अनुवाद हो चुका है। उनकी रचनाओं पर 20 से अधिक शोध हुए हैं।
80 वर्षीय मार्कण्डेय को दो साल पहले गले का कैंसर हो गया था। इलाज से वह ठीक हो गए थे। अब आहार नली के पिछले हिस्से में कैंसर हो गया था। वह 1 फरवरी को इलाज के लिए दिल्ली आ गए थे। राजीव गांधी कैंसर अस्पताल, रोहिणी में उनका इलाज चल रहा था।

अमरकांत को व्यास सम्मान

नई दिल्ली । सुप्रसद्धि लेखक अमरकांत को उनके उपन्यास इन्हीं हथियारों से के लिए वर्ष 2009 का व्यास सम्मान दिया जाएगा। यह उपन्यास 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बलिया की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। इस उपन्यास के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है।
अमरकांत का जन्म 1 जुलाई, 1925 को भगमलपुर, बलिया में हुआ। सूखा पत्ता, काले-उजले दिन, कंटीली राह के फूल, ग्राम सेविका, सुन्नर पांडे की पतोह, आकाश पक्षी आदि उनके उपन्यास हैं। जिदंगी और जोंक, देश के लोग, मौत का नगर,  मित्र-मिलन तथा अन्य कहानियां, कुहासा, तूफान, कलाप्रेमी, प्रतिनिधि कहानियां, एक धनी व्यक्ति का बयान, सुख और दुख का साथ आदि उनके कहानी संग्रह हैं। इनके अलावा उन्होंने बाल साहित्य भी काफी मात्रा में लिखा।
केके बिरला फाउंडेशन द्वारा दिए जाने वाले इस सम्मान में ढाई लाख राशि प्रदान की जाती है।

हिंदी अकादेमी ने पुरस्कारों का दायरा बढ़ाया

नई दिल्लीः हिंदी अकादेमी ने शलाका साहित आठ पुरस्कारों का दायरा बढ़ा दिया हैं। अब इन पुरस्कारों के लिए चयन में पुरस्कार पाने वाले का दिल्ली का होना जरूरी नहीं रह गया है। अकादमी के इस निर्णय से पुरस्कारों के लिए नाम का चयन राष्टीय स्तर पर किया जा सकेगा।
इसके अलावा सम्मान राशि भी बढ़ी दी गई है। शलाका सम्मान में एक लाख ग्यारह हजार की जगह राशि दो लाख कर दी गई है। विशिष्ट सम्मान के लिए इक्कीस हजार की जगह पचास हजार रुपए सम्मान राशि दी जाएगी। विशिष्ट पुरस्कारों में हिंदी अकादमी विशेष योगदान सम्मान, हिंदी अकादमी काव्य सम्मान, हिंदी अकादमी गद्य विधा सम्मान, हिंदी नाटक सम्मान, हिंदी हास्य व्यंग्य सम्मान, हिंदी बाल साहित्य सम्मान और ज्ञान- प्रोद्योगिकी सम्मान शामिल हैं।

केदरानाथ सिंह ने शलाका ठुकराया, कार्यक्रम स्थगित

नई दिल्ली : वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने शलाका पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया है। उनके अलावा छह अन्य साहित्यकारों ने भी अकादमी पुरस्कार नहीं लेने की घोषणा की है।
इसके पीछे चर्चित साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान से वंचित रखने का मामला है। अकादमी की पिछली कार्यकारिणी ने वैद को वर्ष 2008-2009 के शलाका सम्मान के लिए नामित किया गया था। कुछ लोगों ने वैद के साहित्य पर अश्लीलता का आरोप लगाया था। इसके चलते उनका नाम काट दिया गया और किसी को भी यह सम्मान नहीं दिया।
केदारनाथ सिंह के सम्मान ठुकराना के बाद कई अन्य साहित्यकार भी विरोध में आ गए है। प्रसिद्ध लेखक प्रियदर्शन ने साहित्य कृति पुरस्कार नहीं लेने की घोषणा कर दी। इनके अलावा पुरस्कार ठुकराने वालों में पुरुषोत्तम अग्रवाल, रेखा जैन, गगन गिल और विमल कुमार भी हैं।
अकादमी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, जब सात साहित्यकारों ने पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया है।
सूत्रों के अनुसार पुरस्कार को लेकर हुए विवाद के बाद 23 मार्च को होने वाला पुरस्कार समारोह स्थगित कर दिया गया हैं। जो नाम बचे हैं, उनके अलावा अकादमी फिर से पुरस्कारों के लिए नाम का चयन करेगी। उसके बाद समारोह की तिथि घोषित की जाएगी।

और कलियुग शुरू हो गया

शताब्दियों पहले की बात है। एक ब्राह्मण किसी साहूकार के यहां काम करता था। एक दिन ब्राह्मण साहूकार के पास आया और बोला, ”मैंने आपके यहां वर्षों काम किया है। मैं अपने घर जाना चाहता हूं। मेरा हिसाब-किताब कर दीजिए।”
साहूकार को भला क्या आपत्ति हो सकती थी? उसने हिसाब-किताब करके 1000 स्वर्ण मुद्राएं ब्राह्मण को देकर खुशी-खुशी विदा किया। ब्राह्मण ने स्वर्ण मुद्राएं लीं और अपने दस वर्षीय बेटे के साथ घर की ओर चल दिया।
दोनों चलते-चलते एक नगर में पहुंच गए। शाम घिर आई थी। ब्राह्मण ने इसी नगर में रात बिताने का निश्चय किया। उसे स्वर्ण मुद्राओं की चिंता सताने लगी। उसे एक तरकीब सूझी। वह नगर सेठ के पास गया, ”सेठ जी, मेरे पास 1000 स्वर्ण मुद्राएं हैं। मुझे डर है कि यदि मेरे पास रहेंगी तो चोर-डाकू लूट लेंगे। इन्हें अपने पास रख लीजिए। मैं सुबह ले लूंगा।”
नगर सेठ मुस्कराते हुए बोला, ”लाओ, इन्हें मैं अपनी तिजोरी में रख लेता हूं।” यह कहकर उसने स्वर्ण मुद्राएं तिजोरी में रख लीं।
सुबह होते ही ब्राह्मण व उसका पुत्र नित्यकर्म से निपटकर नगर सेठ के पास गए। ब्राह्मण ने अपनी स्वर्ण मुद्राएं मांगी। सेठ ने इनकार कर दिया। दोनों के बीच विवाद बढ़ने लगे। इसके साथ भीड़ भी बढ़ने लगी। लोगों ने पूछने पर ब्राह्मण ने बताया कि कल रात रखने के लिए सेठ जी को 1000 स्वर्ण मुद्राएं थीं। अब वापस मांग रहा हूं तो मना कर रहे हैं।
सभी की निगाहें नगर सेठ की ओर घूम गईं। नगर सेठ ने सफाई दी कि यह ब्राह्मण झूठ बोल रहा है। उसने कल रात एक भी स्वर्ण मुद्रा नहीं दी थी। यदि यह सच बोल रहा है तो अपने बेटे की कसम खा ले।
ब्राह्मण ने चुनौती स्वीकार कर ली। उसने बेटे के सिर पर हाथ रख दिया, ”मैं अपने बेटे की कसम खाकर कहता हूं कि मैने कल रात रखने के लिए सेठजी को 1000 स्वर्ण मुद्राएं दी थीं।”
इतना कहना था कि उसका बेटा गिर गया। ब्राह्मण सबके सामने झूठा साबित हुआ और उसे बेटे से हाथ धोना पड़ा।
ब्राह्मण को बहुत दुख हुआ। उसे इस बात का अत्यधिक दुख था कि सच बोलने के बावजूद उसका बेटा मरा क्यों? वह बेटे के शव को चैराहे पर ले आया और विलाप करने लगा।
अभी कुछ समय बीता था कि एक व्यक्ति घोडे़ पर सवार होकर आया। वह देखने में बूढ़ा और थका हुआ लग रहा था। वह ब्राह्मण के पास आकर ठिठक गया, ”हे ब्राह्मण, तू इस तरह विलाप क्यों कर रहा है?”
ब्राह्मण ने सारी दास्तान सुनाई और सहायता की गुहार लगाई। घुड़सवार का सिर शर्मिंदगी और हताशा से झुक गया। वह बोला, ”मैं सतयुग हूं। अब मेरी कोई नहीं मानता है। मैं कुछ नहीं कर सकता हूं।” कहकर उसने अपना घोड़ा बढ़ा दिया।
इसी तरह त्रेता और द्वापर भी आए। उन्होंने भी ब्राह्मण की व्यथा सुनी और असमर्थता का रोने रोते हुए आगे बढ़ गए।
कुछ देर बाद एक और घुड़सवार आया। उसके चेहरे से अभिमान का तेज फूट रहा था। आंखों में झूठ व मक्कारी की चमक थी। उसने भी ब्राह्मण के पास आकर विलाप का कारण पूछा। ब्राह्मण दुखी मन से बोला, ”आपसे पहले भी तीन घुड़सवार आ चुके हैं। कोई कुछ नहीं कर सका। चलिए, आप भी अपना रास्ता देखिए।”
घुड़सवार मुस्कराया, ”मैं कलियुग हूं। घबराओ मत। बोला, क्या बात है?”
ब्राह्मण ने पलभर उसे घूरा और फिर सारी विपदा सुना दी।
ब्राह्मण की बात सुनकर कलियुग ने जोरदार ठहाका लगाया, ”बस इतनी सी बात। इधर आओ और सुनो। जैसा मैं कहता हूं, वैसा ही करना।” कलियुग ने सारी बता समझा दी। ब्राह्मण ने स्वीकृति में सिर हिला दिया। उसने बेटे के शव को उठाया और जल्दी-जल्दी नगर सेठ के घर की ओर चल दिया।
ब्राह्मण नगर सेठ के घर के समाने विलाप करने लगा। धीरे-धीरे भीड़ इकट्ठी होने गली। नगर सेठ गुस्से से चीखा, ” क्या बात है? अब क्यों आया है?”
ब्राह्मण विनीत स्वर में बोला, ”सेठ जी, मुझसे भूल हो गई थी। मैं रखने के लिए एक हजार नहीं, बल्कि दो हजार स्वर्ण मुद्राएं दी थीं।”
नगर सेठ का गुस्सा और बढ़ गया, झूठ मत बोल। यहां से भाग जा।
ब्राह्मण ने बेटे के सिर पर हाथ रख दिया, ”मैं अपने मरे बेटे की कसम खाकर कहता हूं कि मैंने दो हजार स्वर्ण मुद्राएं दी थीं।”
उसका इतना कहना था कि लड़का उठ खड़ा हुआ। भीड़ की निगाहें सेठ को घूरने लगीं। नगर सेठ लोगों की निगाह की भाषा समझ गया। उसने दो हजार स्वर्ण मुद्राएं लाकर ब्राह्मण को दे दीं। ब्राह्मण स्वर्ण मुद्राएं लेकर बेटे के साथ घर की ओर चल दिया।
कलयुग शुरू होने के बाद यह पहली घटना थी, जब सच झूठ और झूठ सच साबित हुआ। इसके बाद की दास्तान हम सबके सामने है।

सुधीर शर्मा : अपराधी के साहित्‍यकार बनने की गाथा

अपनी घुटन व अंधेरे से मुक्ति मुझे साहित्यिक रचनाओं से मिली हे। रचनाओं ने ही मुझे नई प्राणवायु और उजाला दिया है। मैंने इस बात को आत्मसात कर लिया है कि रचना जीवन के अंधकार से जूझने वाली मनुष्यता की आत्मिक शक्ति है…
यह किसी बुद्धिजीवी का वक्तव्य या किसी कहानी-उपन्यास का संवाद नहीं, बल्कि एक कैदी की कठोर जिंदगी की हकीकत है। दस साल की सजा काट चुके सुधीर शर्मा को साहित्य ने नई रोशनी दिखायी, जिसके प्रकाश में उसने अपराध की दुनिया  को छोडऩे का निश्चय कर लिया।
सुधीर शर्मा कौन है? वह कैसे अपराधी बना, उसका साहित्य से कैसे संपर्क हुआ और इस अपराध के दलदल से वह कैसे निकला, इसकी बड़ी रोमांचक, दास्तान है।
सुधीर शर्मा का जन्म 9 सितंबर, 1962 को दिल्ली में एक गरीब घर में हुआ। उसके पिता पूर्णचंद्र शर्मा एक फैक्टी में क्लर्क थे । वह ईमानदार और मेहनती इंसान थे लेकिन सख्त रवैये के कारण घर में हिटलरी कानून चलाते थे। जैसे- सुधीर गली के बच्चों के साथ नहीं खेलेगा। वह डंडे के बल पर पढ़ाने के हामी थे। मां कमला देवी चार जमात पास सीधी-सादी धार्मिक गृहिणी। इन कानूनों का पालन उन्हें भी करना पड़ता था। वह अपनी ममता का गला घोंटकर इनका पालन करतीं। कभी-कभी न करने पर उन्हें भी प्रताडि़त होना पड़ता। सुधीर को बाहरी बच्चों के साथ न खेलने देने से वह शायद उसे बुराइयों से बचाना चाहते हों, लेकिन उनकी इस सख्ती ने सुधीर के बलमन पर उल्टा प्रभाव डाला। समय के साथ-साथ वह कक्षाओं में आगे बढ़ता गया। उसकी छोटी बहन का जन्म हुआ। उस समय सुधीर की उम्र दस वर्ष थी। बहन के आने के बाद भी उसके हम उम्र दोस्तों की कमी पूरी नहीं हुई। पिताजी के हिटलरी कानून ज्यों के त्यों थे।
नौंवी में विषय चुनने की बात आई। सुधीर की ड्राइंग बहुत अच्छी थी। वह ड्राइंग लेना चाहता था। उसने पिताजी को बताया। उन्होंने एक झापड़ के साथ निर्देश दिया कि कॉमर्स लो। ड्राइंग लेकर क्या पेंटर बनना है? सुधीर पढ़ाई में अच्छा था। उसने मन मारकर कॉमर्स ली। वह किसी तरह बस पास होने का ध्यान रखता। अब पिताजी की तानाशाही के प्रति उसके मन में विद्रोह कुलबुलाने लगा। लेकिन वह खामोशी ही रहता।
हायर सैकेंडरी पास कर उसने एक सांध्य कॉलेज में दाखिला ले लिया। उसे पार्ट टाइम में कनाट प्लेस की मशहूर न्यूज एजेंसी मेें काम मिल गया। कॉलेज की आजादी और कनाट प्लेस की दुनिया ने उसे एक नई दुनिया से परिचित कराया। घर के रूढि़वादी-घुटन भरे माहौल से यह दुनिया अलग थी। कॉलेज में वह यह देखकर दंग रह गया कि लड़कों के माता-पिता उनके साथ दोस्त की तरह बात करते हैं। कनाट प्लेस की दुनिया उसे दूसरी ही लगी, जिसे वह फिल्मों में देखा करता था। वह जिस न्यूज एजेंसी में काम करता था, उसके अखबार व पत्रिकाएं सभी दूतावासों, मंत्रालयों और पंच सितारा होटलों में जाती थीं। काम करने से उसे आत्मविश्वास मिला। वह अपनी तनख्वाह घर में देता और अपना जेब खर्च एक-दो रुपये निकाल लेता।