Archive for: February 2010

जनकवि नजीर अकबराबादी की होली पर कविताएं

होली

हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।
एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।
जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।
जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब।
मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।
तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ।
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।
और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां।
तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।
नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम नजीर।
फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।

होली पिचकारी

हां इधर को भी ऐ गुंचादहन पिचकारी।
देखें कैसी है तेरी रंगविरंग पिचकारी।।

तेरी पिचकारी की तकदीद में ऐ गुल हर सुबह।
साथ ले निकले हैं सूरज की किरन पिचकारी।।

जिस पे हो रंग फिशां उसको बना देती है।
सर से ले पांव तलक रश्के चमन पिचकारी।।

बात कुछ बस की नहीं वर्ना तेरे हाथों में।
अभी आ बैठें यहीं बनकर  हमतंग पिचकारी।।

हो न हो दिल ही किसी आशिके शैदा का नजीर।
पहुंचा है हाथ में उसके बनकर पिचकारी।।

valenltine-day1

प्रेमिका की तलाश

जनहित में खोदें सड़कें

अभी कुछ दिन पहले ही सड़क बनी थी। इतनी जल्दी टूट गई। सड़क पर जगह-जगह गड्ढे हो गए हैं। हे भगवान! इस देश का क्या होगा? इस तरह की बातें कर कुछ लोग डवलपमैंट आथोरिटी को कोसते रहते हैं। वे नासमझ हैं। उन्हें नहीं पता कि टूटी और गड्ढेयुक्त सड़क के कितने लाभ हैं। यदि उन्हें पता चल जाए तो वह अपना राग बंद कर दें।

टूटी और गड्ढेयुक्त सड़क के बहुत से लाभ हैं। जांच होती है। फाइल बनती है। टेंडर निकलता है। ठेका दिया जाता है। साइट पर जाकर निरीक्षण किया जाता है। इससे आथोरिटी के कर्मचारी और अधिकारी व्यस्त रहते हैं। काम नहीं होगा तो बैठे-बैठे आलसी हो जाएंगे। मोटी-मोटी तनख्वाह मिलती है। कुछ काम तो उन्हें करना ही चाहिए। ठेका-वेका देने में कुछ ऊपरी कमाई हो जाती है सो अलग। इसी से वे और उनके परिवारवाले ठाठ की जिंदगी जीते हैं।

गाडिय़ों के टायर घिसते हैं। बिक्री अधिक होती है। टायर कंपनियों के कर्मचारियों को काम मिलता रहता है। अगर टायर की बिक्री कम हो जाएगी तो कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ेगी। हो सकता है कि कुछ कंपनियां ही बंद हो जाएं। ऐसे में हजारों लोग सड़क पर आ जाएंगे।

गाड़ी के शॉकर खराब हो जाते हैं। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की दाल-रोटी चलती रहती है। आखिर उन्हें भी अपने बच्चों का पेट पालना है। सड़क खराब होती है तो ट्यूब पंक्चर अधिक होती है। आसपास पंक्चर लगाने वाले भी होते हैं। इससे हजारों लोगों को रोजगार मिला हुआ है। मोटर मैकेनिकों को भी काम मिलता रहता है।

बार-बार और जल्दी-जल्दी सड़क खराब होने से उसकी मरम्मत में मजदूर लगे रहते हैं। उनकी रोजी-रोटी चलती रहती और और हजारों परिवार का भरण-पोषण होता है। इनके अलावा सड़क निर्माण में बजरी, रोड़ी,  तारकोल आदि का इस्तेमाल होता है। बार-बार सड़क की मरम्मत करने से इनकी खपत अधिक होती है। इससे भी कई लोगों का पेट भर रहा है।

सड़क सही होगी तो वाहन सरपट दौड़ेंगे। भारत में लोगों के ट्रैफिक सेंस को देखते हुए विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि इससे दुर्घटनाएं अधिक होंगी। सड़क खराब होने से वाहन धीमी गति से चलते हैं। दुर्घटना नहीं होती। लोगों का जीवन सुरक्षित रहता है। और सबसे बढिय़ा बात। शादी के बाद नई-नवेली दुल्हन के साथ घर आ रहे हैं। सड़क सही होगी तो गाड़ी दौड़ती चली जाएगी। लेकिन यदि सड़क टूटी-फूटी और गड्ढे युक्त होगी तो गाड़ी हिचकौले खाती चलेगी। ऐसे में दुल्हन से बार-बार टकराने का जो सुख मिलेगा,  वह क्या कम बड़ा लाभ है?

अब कल्पना करो कि सड़क बनने के आठ-दस साल के बाद तक कोई टूट-फूट नहीं होती। कहीं गड्ढे नहीं पड़ते। तब देखो कितने लोगों का नुकसान होगा! करोड़ का धंधा चौपट हो जाएगा। देश की आर्थिक व्यवस्था पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। कितने ही लोगों की रोजी-रोटी छिन जाएगी। अराजकता फैलेगी। इस देश की सबसे बड़ी समस्या गरीबी और बेरोजगारी है। दोनों का समाधान काफी हद तक खराब सड़कों से हो रहा है। लाखों लोगों को काम मिल रहा है। टिकाऊ-पक्की सड़क बना लाखों लोगों को बेरोजगार कर भूखों मारना क्या उचित होगा?

मेरा सुझाव है कि जिनके घरों के आगे की सड़क सही है, वह उसे खोद दें। जगह-जगह एक-डेढ़ फीट गहरे गड्ढे कर दें। यही जनहित में है।

markandaya

मार्केण्डेय

मेरी पाठशाला

मैंने रैक में किताब के ऊपर किताब रख दी।
”अनुराग, यह क्या कर रहा है? ऐसे किताब के ऊपर किताब या कोई चीज नहीं रखते। कवर खराब हो जाता है।”
मैंने चौंककर देखा, कोई नहीं था।
मैं लेख लिख रहा था। शब्द गलत लिखा गया। मैंने उस पर चार-पांच बार पेन फेर दिया।
”यह क्या किया? एक बार पेन फेरने से नहीं पता चल रहा था कि शब्द काट दिया? गंदा करने की क्या जरूरत थी?”
मैंने सिर उठाकर देखा, कोई नहीं था।
अगस्त, 1993 का पहला सप्ताह। दिनभर जोरदार बारिश हुई थी। शाम को बारिश बंद हुई। मैं कंप्यूटर पर टाइप कराए गए अपने उपन्यास का प्रिंटआउट लेकर भीमसेन त्यागी से मिलने चल दिया।
उन दिनों मैं एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा था। मेरा रूम-पार्टनर त्यागीजी के प्रिंटिंग पे्रस में काम करता था। उसने त्यागीजी से मिलवाने की बात कही थी।त्यागीजी घर में अकेले थे। लुंगी और बनियान में। परिचय के बाद उन्होंने पूछा, ”किन-किन लेखकों की कौन-कौन-सी किताबें पढ़ी हैं?” 
मैंने बताया तो बोले, ”अभी तुम्हें बहुत पढऩे की जरूरत है। पहले खूब पढ़ो। फिर लिखने की सोचो।” 
मैंने उपन्यास का प्रिंटआउट दिखाया। उन्होंने दो-तीन पेज पढ़े। गलतियों पर निशान लगा दिए। मैं उपन्यास के नेगेटिव बनवा चुका था। केवल छपाई शेष थी। इसमें तीन-चार हजार रुपए खर्च हो गए थे। मैंने त्यागीजी को यह बात बताई।
उन्होंने सलाह दी कि यह उपन्यास मत छपवाओ। इसमें बहुत-सी कमियां हैं। इससे तुम्हें फायदा होने के बजाए नुकसान ही होगा। इसमें जो पैसा लग गया है, उसे भूल जाओ।
न जाने क्यों मेरे मन में यह बात बैठी हुई थी कि बड़े लेखक नए लेखकों को आगे नहीं आने देना चाहते। मैंने दहेज की समस्या पर उपन्यास लिखा था। मेरा खयाल था कि यह उपन्यास समाज को नई दिशा देगा और दहेज समस्या के समाधान में सहायक होगा। मुझे लगा कि त्यागीजी ने इसे जान-बूझकर खारिज कर दिया है। इसलिए मुझे उनकी सलाह अच्छी नहीं लगी। मैं मायूस होकर लौटा, लेकिन उपन्यास छपवाया नहीं।
त्यागीजी के बहनोई वेदप्रकाश त्यागी बिजली विभाग (अब पावर कारपोरेशन) में कार्यरत हैं। मेरे पापा बिजली विभाग से रिटायर हुए हैं। वेदप्रकाशजी से करीब 27-28 साल पुराने संबंध हैं। 1992 में मैंने पालीटैक्निक की। मैं नौकरी के लिए उनके पास नोएडा आ गया। उन्होंने एक फैक्ट्री में नौकरी लगवा दी।
उन दिनों पापा मवाना, मेरठ में कार्यरत थे। मवाना के नजदीक पेपर मिल खुली। मैं वापस चला गया। वहां आठ-नौ महीने काम किया। एक तो वेतन बहुत कम मिल रहा था, दूसरे पापा रिटायर होनेवाले थे। छोटा भाई आईटीआई कर रहा था। उसके सामने नौकरी की समस्या आनेवाली थी इसलिए वहां नौकरी छोड़ मैं दोबारा नोएडा आ गया। मैं वेदप्रकाशजी के साथ रहकर नौकरी ढूंढऩे लगा। तीन-चार महीने उनके साथ रहा। त्यागीजी उनके यहां आते-जाते रहते थे। वेदप्रकाशजी के बच्चे उन्हें मामाजी कहते, तो मैं भी मामाजी कहने लगा।
एक दिन मामाजी वेदप्रकाशजी के यहां आए थे। उन्होंने मुझे पेन-कागज लेकर बुलाया। मैंने सोचा कि वह कुछ लिखवाना चाहते हैं। उन्होंने तीन-चार लाइनें बोलीं और कागज ले लिया। वह मेरी हैंडराइटिंग देखना चाहते थे। इससे संतुष्टï हुए। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि जब तक नौकरी नहीं लग जाती, हमारे यहां काम कर लिया कर। कुछ पेमेंट कर दूंगा। इससे आने-जाने का और जेब-खर्च निकल जाएगा। वह साप्ताहिक पत्र ‘जनचेतना’ और साक्षरता अभियान के लिए ‘नवसाक्षर चेतना’ प्रकाशित कर रहे थे। प्रिंटिंग पे्रस चल रहा था। मुझे इनके लिए काम करना था।
मैं प्राय: रोज सुबह उनके यहां चला जाता। ग्राउंड फ्लोर पर पे्रस थी। फस्र्ट फ्लोर पर वे रह रहे थे। छत पर एक छोटा कमरा बना हुआ था। असल में वह रसोई थी। लेकिन ऊपर-नीचे बार-बार आने-जाने में ज्योति भाभी (उनकी पुत्रवधू) को दिक्कत होने के कारण रसोई नीचे ही बना ली। ऊपरवाली रसोई को मामाजी पढऩे-लिखने के कमरे के रूप में इस्तेमाल करने लगे। इसी में किताबों की रैक लगा दी गईं।
यह वह दौर था, जब परिवार पर लगातार आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा था। पे्रस बंद होने के कगार पर पहुंच गया था। ऐसा भी होता कि दो-ढाई सौ रुपए के चलते प्रिंटिंग का आर्डर पूरा न हो पाता और घाटा उठाना पड़ता। पे्रस को जिंदा रखने के लिए हर संभव प्रयास किया गया। जरूरत पडऩे पर मित्रों और रिश्तेदारों से कर्ज लिया गया। मगर तमाम प्रयासों के बावजूद पे्रस अंतत: बंद हो गया और पीछे छोड़ गया मोटा कर्ज। 
मामाजी 1984 के अंत में नोएडा आ गए थे। किराए पर रहे। 1987 में डी-180, सेक्टर-10 की बिल्डिंग खरीदी। 1988 में बेटे विवेक त्यागी ने एम।ए. कर ली। उत्तरप्रदेश फाइनेंस कारपोरेशन से लोन लेकर पे्रस लगाया- चेतना पे्रस। इसके पीछे मकसद था कि बेटा पे्रस संभाल लेगा। आय का साधन हो जाएगा और वे अपना समय लिखने-पढऩे में लगाएंगे। मामाजी का यह सपना फलीभूत नहीं हो सका। अव्यवस्था के कारण पे्रस घाटे में जाने लगा। तमाम तरह की दिक्कतें आने लगीं और मानसिक शांति छिन्न-भिन्न हो गई।
यूपीएफसी की किश्तें समय पर नहीं जा पा रही थीं। पेनल्टी लग गई। नौबत आ गई कि यदि आज पैसा जमा नहीं हुआ तो नोएडा प्राधिकरण फैक्ट्री सील कर देगा।
सुबह ड्यूटी पर जाने से पहले मैं वहां गया। घर पर केवल मामीजी थीं। घर के बाकी सदस्य पैसे की व्यवस्था करने के लिए गए थे। मामीजी की आंखें भरी थीं। कागजात और आवश्यक सामान एक जगह रख लिया गया था कि दुर्भाग्यवश अगर फैक्ट्री सील हो जाती है तो कम-से-कम जरूरी सामान बाहर निकाला जा सके। हर किसी के जहन में एक ही सवाल था- अब क्या होगा! मैं चुपचाप मामीजी की बातें सुनता रहा। सांत्वना देने की स्थिति में भी नहीं था क्योंकि पैसे की समस्या तो पैसे से ही हल हो सकती थी। मैं काम पर चला गया। सारे दिन मन बेचैन रहा। रह-रहकर खयाल आता कि आज क्या होगा! शाम को वापस आया। जानकारी मिली कि आवश्यक पैसों का इंतजाम हो गया और यूपीएफसी में जमा करा दिया है। फैक्ट्री सील होने से बच गई है। राहत की सांस ली। दिन था 19 सितंबर, 1994। मामाजी का जन्मदिन। परिस्थितियां ऐसी थीं कि सुबह शुभकामना नहीं दे पा रहा था। शाम को बधाई दी।
तत्कालीन संकट तो टल गया, लेकिन उधार की राशि में मोटा इजाफा हो गया। 1995 में प्रिंटिंग पे्रस बेचनी पड़ी। उससे जो पैसा मिला, वह कर्ज के सामने ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुआ। परिवार पर आर्थिक और उससे भी ज्यादा मानसिक दबाव बढ़ गया।
ऐसी विषम परिस्थितियों में किसी का भी धैर्य चुक सकता था लेकिन मामाजी ने साहस से मुकाबला किया। उन्हें इस मुद्दे को लेकर हमने न कभी झींकते देखा और न घबराते। बाहर का आदमी तो जान भी नहीं सकता था कि यह परिवार इस समय किन कांटों-भरी राह से गुजर रहा है।
कुछ दिनों बाद मैं उन्हीं के साथ रहने लगा। मामाजी ने ऊपरवाला कमरा मुझे दे दिया। खुद नीचे ही सोने और पढऩे-लिखने लगे। परिवार के सभी सदस्य बहुत अच्छे हैं, इसलिए जल्द ही आत्मीय संबंध हो गए।
मामाजी के साथ रहते हुए सही मायनों में ‘लेखन की पाठशाला’ में भर्ती हुआ। मेरी भाषा में अशुद्धियां थीं। कभी-कभी शब्दों के चयन में गलती कर देता। उन्होंने मेरी शिक्षा के बारे में पूछा। कहने लगे कि तुझे किसी ने भाषा का ज्ञान नहीं दिया और न ही ऐसा माहौल मिला, इसलिए गलती करता है। लेकिन इसमें घबराने की कोई बात नहीं।
मामाजी ने भाषा सुधारने पर बहुत जोर दिया। उनका कहना था कि जिसकी भाषा ही भ्र्रष्टï है, वह कैसा लेखक? लेखक का भाषा पर पूरा अधिकार होना चाहिए। कुछ बड़े लेखकों की भाषा में बाद तक भी अशुद्धियां रह जाती हैं, लेकिन इसे आदर्श स्थिति नहीं कहा जा सकता। रचना में भाषागत अशुद्धियां होंगी तो संपादक तुझे लेखक मानने से इनकार कर देगा और रचना पर विचार भी नहीं करेगा, इसलिए सबसे पहले भाषा पर ध्यान दे। मैं तेरी रचनाएं देखकर गलतियों पर निशान लगा दिया करूंगा। एक कॉपी पर इन्हें नोट करते रहना। सही शब्द को कम-से-कम पांच बार लिखना। धीरे-धीरे यह कमी दूर हो जाएगी। किसी शब्द को लेकर कनफ्यूजन हो सकता है। वह गलती क्षम्य है, लेकिन सामान्य शब्दों में गलती नहीं होनी चाहिए। 
परिवार पर आर्थिक दबाव बेहद बढ़ गया था। सवाल उठा कि इससे कैसे छुटकारा पाया जाए। परिवार के सभी सदस्य इस पर चर्चा करते। योजना बनती, बिगड़ती। लेकिन कोई उचित समाधान नहीं मिल रहा था। कर्जा लाखों में था। उसमें पांच-दस हजार रुपए महीने की आमदनी से कुछ होनेवाला नहीं था। काफी सोच-विचार कर मामाजी ने फैसला किया कि वह मुंबई जाकर फिल्मी लेखन करेंगे।
मामाजी फिल्मी लेखन को अच्छा नहीं मानते थे। लेकिन समस्या का समाधान तो करना ही था। उन्होंने तय किया कि मुंबई केवल तब तक रहेंगे, जब तक कर्जे का एक बड़ा भाग चुकता न हो जाए।
वह सितंबर, 1995 में मुंबई चले गए। बीच-बीच में नोएडा आते। पत्रों के माध्यम से संपर्क बना रहा। 13 अपै्रल, 1997 को मेरी शादी हुई। उनके आने का कार्यक्रम था, नहीं आ पाए। 9 अपै्रल का लिखा उनका पत्र मिला। शादी में परिजनों, मित्रों ने अपने-अपने तरीके से शुभकामनाएं दीं, बधाइयां दीं और उपहार दिए। लेकिन मामाजी ने जो शुभकामनाएं दीं, वे मेरे लिए अद्भुत हैं। उन्होंने लिखा, ”विवाह का निमंत्रण मिल गया है। मेरा आने का पक्का इरादा था। 5 तारीख का रिजर्वेशन भी करा लिया था। लेकिन यहां कुछ अर्जेंट काम ऐसा आ गया कि रिजर्वेशन कैंसिल कराना पड़ा।
”मैं शरीर से नहीं आ सकूंगा, लेकिन मन से उत्सव में ही रहूंगा। कामना करता हूं- तुम्हारा वैवाहिक जीवन सुखी, समृद्ध तथा यशस्वी हो।
”आशीर्वाद की औपचारिकता मुझे नहीं आती, लेकिन मेरा आशीर्वाद तो साक्षात तुम हो!”शादी के बाद बहू के साथ मुंबई घूमने आओ।
”अमित स्नेह- तुम दोनों को!” 
डी-180 कोने की बिल्डिंग है। आर्थिक दबाव से छुटकारा पाने के लिए सड़क की ओर दुकानें निकाल दी गई थीं। फैक्ट्री के पीछे एक लंबी दुकान निकली। उसमें शर्मा नाम के एक व्यक्ति ने फोटोस्टेट की मशीन लगाई हुई थी। उसने प्रस्ताव रखा कि सभी दुकानदार मिलकर पांच-छह लाख रुपए दे देंगे। आप लिखकर दे दो कि यह जगह तुम्हें दी जा रही है। मालिकाना हक आपका ही रहेगा। परिवार के कुछ सदस्यों को यह प्रस्ताव अच्छा लगा। इसमें उन्हें कुछ बुराई नहीं दिखाई दी, तत्कालीन संकट में थोड़ी राहत मिल रही थी। लेकिन मामाजी की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने विवेकजी से कहा, ”बेटे, शर्मा की नीयत ठीक नहीं है। यह फैक्ट्री कब्जाना चाहता है। सबसे पहले इसे नोटिस देकर यहां से निकालो। यह यहां रहेगा तो और दुकानदारों को भी उल्टी-सीधी पट्टïी पढ़ाता रहेगा।” दुकानदारों से सिक्योरिटी और किराया एडवांस लिया हुआ था। उसको निकालने के लिए करीब पच्चीस हजार रुपए की जरूरत थी। इस बात से मामाजी घबराए नहीं। उन्होंने जैसे-तैसे पैसे का इंतजाम किया और शर्मा को अलविदा कह दिया।
विवेकजी एक दैनिक समाचारपत्र में नौकरी कर रहे थे। भाभी किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही थीं। दोनों की सीमित आय से लाखों का कर्जा उतारना असंभव था। दूसरी ओर बच्चे बड़े हो रहे थे। खर्चा भी बढ़ रहा था। इसका एक ही उपाय था कि अपना कोई काम किया जाए और इस तरह अक्तूबर, 1999 को शुरू हुआ ‘ज्योति ग्राफिक्स’। एक छोटी फोटोकॉपी की मशीन लगाई गई। शुरू-शुरू में समस्याएं अधिक आईं। एक तो अनुभवहीनता, दूसरे कभी मशीन खराब तो कभी कोई और तकनीकी समस्या। मशीन एक ही थी। कोई खराबी आ जाती तो काम ठप्प हो जाता।
जुलाई, 2000 को मामाजी मुंबई से आए हुए थे। मैं मिलने गया।
”यहां कुछ काम नहीं हो पा रहा है। इससे मुंबई ही अच्छे थे। वहां से तो यह सोचकर आया था कि यहां अनुराग जैसे बच्चों से मुलाकात होती रहेगी, लेकिन वह तो दुर्लभ हो गया है।” मामाजी ‘वर्जित फल’ के पन्नों को देखते हुए बोले।
मैंने बताया कि इंटरव्यू के चक्कर में लगा था। इस वजह से नहीं आ पाया।
उनकी नजर पांडुलिपि के पेज नंबर 196 पर पड़ी। वह उलटा लगा था। ”यह कैसे हो गया? वैसे तो कंपोजिंग करते समय ऑपरेटर भी इसे ठीक कर लेता। लेकिन ऐसी गलती हो कैसे गई?” वह टैग से पेज निकालने लगे।
ज्योति भाभी आ गईं। बोलीं, ”आज पापा का उपन्यास पूरा हो गया है। मैं कितनी देर से कह रही हूं कि ऊपर जाकर आराम से बैठकर काम कर लो, लेकिन जा नहीं रहे। पसीने से कैसे भीगे हुए हैं।”
मामाजी ने पेज सीधा किया और टैग लगाते हुए बोले, ”इस बात का भी बहुत असर पड़ता है कि पांडुलिपि नीट और क्लीन हो। खासकर शुरुआती दौर में।” वह आगे बोले, ”यह उपन्यास पूरा हो गया है। अब मैं अपना बड़ा उपन्यास शुरू करूंगा। उसे शुरू करने का उत्साह जरूर है। यदि बड़ा उपन्यास शुरू कर देता तो यह अधूरा रह जाता। मैंने निश्चय कर लिया है कि साल में कम-से-कम छह किताबें पूरी करूंगा। भले ही छपें नहीं, लेकिन प्रकाशक के पास तो चली जाएं। किताबें तैयार हैं। थोड़ा-बहुत काम करना है। कुछ मैटर कट जाएगा तो कुछ बढ़ जाएगा।”
 फोटोस्टेट मशीन खराब थी। मामीजी गुस्से में बोलीं, ”यह मशीन राक्षस हो गई है। जितना कमाती है, उतना खा जाती है।”
मामाजी मुस्कुराए, ”अनुराग, तुझे एक किस्सा सुनाता हूं। हमारे एक परिचित ने गाड़ी ली। उसका रजिस्ट्रेशन देहरादून कराया। इसका नियम है, जहां का रजिस्ट्रेशन होगा, वहीं से रिन्यू कराना होता है। वह रिन्यू कराने देहरादून जा रहे थे। जो भी मिलता, उसी से कहते, ‘चल तुझे देहरादून घुमा लाऊं।’ लोगों ने सोचा- आना-जाना फ्री है और जो ले जाएगा खाना उसके जिम्मे रहेगा ही। कई लोग तैयार हो गए।”
देहरादून में बड़ी-बड़ी कोठियां हैं। एक कोठी में आरटीओ का दफ्तर था। वहां आम के कई पेड़ थे। एक पेड़ के नीचे सभी बैठ गए। आम पके हुए थे। एक कौवा पेड़ पर बैठा था। वह जैसे ही डाल हिलाता, आम टप से नीचे। एक आदमी बड़ा खुश होता हुआ आम सबकी ओर बढ़ा देता, ‘लो जी, आप भी खाओ। आप भी लो।” वह ऊपर की ओर देखते हुए बोला, ‘वाह! काकभुशंडीजी वाह! वाह! काक ऋषिजी, वाह!’ थोड़ी देर में आम गिरने बंद हो गए। उसने ऊपर देखा। कौआ उड़कर दूसरे पेड़ पर चला गया था। वह गुस्से में चिल्लाया, ‘कौआ ढेढ़ उड़ गया।’ ”
कहकर वे जोर से हंसे, ”यही तेरी मामी का हाल है। कल कह रही थी कि यदि ऐसे ही मशीन चलती रही तो एक-डेढ़ साल में कर्जा चुकता हो जाएगा। आज मशीन खराब हो गई तो उसे राक्षसी बना दिया।” 
मैं प्रकाशित रचनाओं की कटिंग मुंबई भेजता रहता था। मैंने पत्र में वहां आने की इच्छा जाहिर की और कहानी ‘भूख’ भेजी।
मामाजी ने 12 जून, 1997 को भेजे पत्र में लिखा, ”तुम्हारे पत्र और कहानी सब मिले। कटिंग्स भी समय-समय पर मिलती रहीं। तुम्हारी लिखने की प्रगति देखकर संतोष होता है। लेकिन अभी तुम्हें बहुत गहरे अध्ययन और मनन की आवश्यकता है।
”कहानी ‘भूख’ मैंने आते ही उत्सुकतापूर्वक पढ़ी थी। आज फिर पढ़ी। यह दैहिक स्तर पर ही अटक गई है। मानव-मन की किसी सूक्ष्म अनुभूति का स्पर्श नहीं करा पाती। दिक्कत यह है कि इसमें समस्या का गांभीर्य स्थापित नहीं होता। और, समस्या ही स्थापित नहीं होगी तो कहानी का आधार क्या होगा? सवाल समस्या के छोटी या बड़ी होने का नहीं। महत्वपूर्ण सवाल उसे गंभीरता से फील करने और कलात्मक ढंग से अभिव्यक्त करने का है। राष्टï्रीय तथा अंतरराष्टï्रीय महत्व के मुद्दों पर बहुत निकृष्टï कहानियां लिखी गई हैं और एक साधारण-सी घटना पर मास्टरपीस।
”मेरी राय है कि तुम लिखने में जल्दबाजी न करो। जो भी थीम आए, उसे धीरे-धीरे अनुभूति की आंच पर पकने दो। बहुत लगन से अच्छा साहित्य पढ़ो, तभी महत्वपूर्ण रचनाएं आएंगी।
”तुम्हारे यहां आने का प्रस्ताव मेरे लिए खुशी का बायस है। लेकिन यह बहुत महंगा और बेमुरव्वत शहर है। यहां भयानक संघर्ष है और संघर्ष का समापन किसी सार्थक उपलब्धि में नहीं, फ्रस्ट्रेशन में होता है। यह सब मैंने यहां आकर नहीं जाना, पहले से ही जानता था। इसीलिए बहुत थोड़े समय के लिए आर्थिक दबाव के कारण आया। अब ज्यादा समय यहां नहीं रहूंगा। ऐसे में तुम्हें आने की सलाह नहीं दे सकता। बेहतर है, वहीं किसी फैक्ट्री में सर्विस देख लो। साहित्य को आजीविका का साधन मत बनाओ। यह बहुत कठिन है। मैं इतना काम करके भी आज तक नहीं बना सका।”अपनी किताबों के प्रकाशन की चिंता मुझे भी है। लेकिन डेढ़ साल में एक बार भी दिल्ली नहीं आ सका। जब भी आऊंगा, तभी यह काम हो सकेगा! इनके अलावा जो किताबें फाइलों में हैं, उनकीभी व्यवस्था करनी है।”
वह दुर्भाग्यवश ये दोनों काम नहीं कर पाए। 
जैसा कि मामाजी ने लिखा था वह ज्यादा दिन मुंबई नहीं रुके और जनवरी या फरवरी, 2001 को मुंबई को अलविदा कहकर वापस आ गए।
 
मामाजी छठे दशक के अंत में इलाहाबाद गए थे। वहां उनकी भेंट श्री भारतीय से हुई थी। श्री भारतीय ने 1935 में लेखन कला की मासिक पत्रिका ‘लेखक’ का प्रकाशन किया था। उन्होंने ‘लेखक’ के चार अंक भी दिखाए। मामाजी ने इस तरह की पत्रिका के प्रकाशन पर जोर दिया तो श्री भारतीय ने चारों अंक उन्हें दे दिए और कहा कि आप इसका पुनप्र्रकाशन कर सकें तो अवश्य कीजिए। मामाजी ने वादा कर लिया। उनके मन में रह-रहकर बात उठती कि ऐसी पत्रिका जरूर निकलनी चाहिए।
एक दिन उन्होंने ‘लेखक’ के अंक दिखाए और ये सब बातें बताईं। मैंने अंक देखे। अपने तरीके की विशिष्ट पत्रिका लगी। बिल्कुल नया कलेवर। उसमें सभी महत्वपूर्ण लेखकों ने लिखा था। पे्रमचंद ने भी लिखा था।
मामाजी बोले, ”मैं नए लेखकों के लिए इस तरह की पत्रिका निकालना चाहता हूं। इसमें तुझे मदद करनी होगी। लघु पत्रिका निकालना घरफूंक तमाशा देखना है। कोई आर्थिक लाभ इससे नहीं हो सकेगा। सोच-समझ ले।”
मैंने हर संभव सहयोग देने का वादा किया।
उन्होंने पत्रिका की रूपरेखा बनाई। प्रपत्र तैयार किया। लेखक-मित्रों को भेजा। कुछ के घर गए। उनसे रचनाएं लीं। इस तरह ‘भारतीय लेखक” की शुरुआत हुई। जनवरी, 2003 में पहला अंक निकला और इस तरह करीब पांच दशक बाद उन्होंने अपना वादा पूरा किया।
‘भारतीय लेखक’ निकालने का मकसद केवल एक वादा पूरा करना नहीं था। वह गोर्की और अन्य देशी-विदेशी लेखकों का उदाहरण देकर कहते थे कि हर रचनाकार को सृजनात्मक लेखन के साथ-साथ नए लेखकों को भी आगे बढ़ाना चाहिए, उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए और उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए। वे नए लेखकों के प्रति अपने दायित्व को लेकर सजग थे। ‘भारतीय लेखक’ में एक खंड ‘नए लेखकों के लिए’ रखा। इसमें लेखन संबंधी रचनाएं प्रकाशित करते।
‘भारतीय लेखक’ के प्रवेशांक के संपादकीय में उन्होंने पत्रिका निकालने के औचित्य पर लिखा था, ”पत्रिकाओं की इस भीड़ में एक और पत्रिका की क्या सार्थकता है? यह सवाल बार-बार प्रायोजकों के सामने आया और हर बार एक ही उत्तर मिला- रचना की आंतरिक प्रक्रिया तथा लेखकीय संघर्ष से संबद्ध कुछ ऐसे अहम सवाल हैं, जिनका हर सृजनशील लेखक को सामना करना पड़ता है। उन सवालों के उत्तर न इन पत्रिकाओं के पास हैं, न अकादमियों के पास और न इन लेखक-संघों के पास। उन सवालों के सार्थक उत्तरों की खोज में अंतत: लेखकों को जूझना पड़ता है। इस खोज का ही विनम्र किंतु सजग प्रयास है ‘भारतीय लेखक’।”
इसके अलावा ‘भारतीय लेखक’ के माध्यम से वह हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं को एक मंच प्रदान करना चाहते थे। वह कहते थे कि यह केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि सचमुच में ‘भारतीय लेखक’ हो। इसके लिए उन्होंने गैर-हिंदीभाषी लेखकों से सहयोग लिया और अन्य लेखकों से संपर्क कर रहे थे।
‘भारतीय लेखक’ का एक महत्वपूर्ण और चर्चित स्तंभ ‘विशिष्ट लेखक’ है। इसमें लेखक का आत्मकथ्य, उसकी एक रचना, रचना-प्रक्रिया, रचनाओं पर मूल्यांकनपरक लेख, संस्मरण, साक्षात्कार आदि प्रकाशित किए जाते हैं। इसका मकसद एक ओर किसी लेखक को फोकस करना, दूसरी ओर लेखक की रचना-प्रक्रिया और आत्मकथ्य के माध्यम से नए लेखक के लिए उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराना है।
मामाजी का कहना था कि ‘विशिष्ट लेखक’ में जेनुइन राइटरों को लिया जाए, दंदफंद से महापुरुष बन बैठे लेखकों को नहीं। यही कारण है कि उन्होंने शेखर जोशी जैसे सहज, सरल और कलम के धनी लेखक को प्रवेशांक में लिया। ‘महापुरुषोंÓ को तो उन्होंने विशिष्टï लेखक की सूची में भी शामिल नहीं किया।
‘भारतीय लेखक’ की सामग्री ही नहीं, ले-आउट का भी साहित्य जगत में जोरदार स्वागत हुआ। साहित्य-पे्रमियों ने इसे हाथों-हाथ लिया। मामाजी के देहांत तक ‘भार

कथाकार मार्कण्डेय को दोबारा कैंसर हुआ

नई दिल्ली: वरिष्ठ साहित्यकार और कथा के संपादक मार्कण्डेय दोबारा कैंसर की चपेट में आ गए हैं। उनका इलाज राजीव गांधी कैंसर अस्पताल में इलाज चल रहा है।
प्रेमचंद के बाद हिंदी कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन को पुनस्र्थापित करने वालों में मार्कण्डेय महत्वपूर्ण कथाकार हैं। उन्होंने आम आदमी के जीवन में साहित्य में जगह दी। वह जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में हैं।
1965 में उन्होंने माया के साहित्य महाविशेषांक का संपादन किया। कई महत्वपूर्ण कहानीकार इसके बाद सामने आए। 1969 में उन्होंने साहित्यिक पत्रिका कथा का संपादन शुरू किया। इसके अभी तक 14 अंक ही निकल पाए हैं। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में पत्रिका को मील का पत्थर माना जाता है।
उन्होंने जीवनभर कोई नौकरी नहीं की। अग्निबीज, सेमल के फूल(उपन्यास), पान फूल, महुवे का पेड़, हंसा जाए अकेला, सहज और शुभ, भूदान, माही, बीच के लोग (कहानी संग्रह), सपने तुम्हारे थे (कविता संग्रह), कहानी की बात  (आलोचनात्मक कृति), पत्थर और परछाइयां (एकांकी संग्रह) आदि उनकी महत्वपूर्ण कृतियां हैं। हलयोग (कहानी संग्रह) प्रकाशनाधीन है। उनकी कहानियों का अंग्रेजी, रुसी, चीनी, जापानी, जर्मनी आदि में अनुवाद हो चुका है। उनकी रचनाओं पर 20 से अधिक शोध हुए हैं।
80 वर्षीय मार्कण्डेय को दो साल पहले गले का कैंसर हो गया था। इलाज से वह ठीक हो गए थे। अब आहार नली के पिछले हिस्से में कैंसर हो गया है। वह 1 फरवरी को इलाज के लिए दिल्ली आ गए हैं। राजीव गांधी कैंसर अस्पताल, रोहिणी में उनका इलाज चल रहा है। सप्ताह में पांच दिन रेडियोथैरेपी की जा रही है। उनका करीब डेढ़ माह इजाल चलेगा।

'द्रोपदी' को लेकर साहित्य अकादेमी समारोह में हंगामा

नई दिल्ली : द्रोपदी पर विवादित किताब लिखने वाले तेलुगु लेखक वाईएल प्रसाद को साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित किए जाने को लेकर हंगामा हुआ। साहित्य अकादमी का साहित्योत्सव कार्यक्रम 15 फरवरी से शुरू हो गया है। यह 20 फरवरी तक चलेगा। कमानी सभागार में आयोजित समारोह में कार्यक्रम के दूसरे दिन देश की 25 भाषाओं के लेखकों को सम्मानित किए जाने के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार-2009 रखा गया था। समारोह में कुछ भाषाओं के लेखकों को सम्मानित किया जा चुका था। विवादित पुस्तक ‘द्रोपदी’ के लेखक वाईएल प्रसाद को सम्मानित करने के लिए बुलाया गया तो दर्शक दीर्घा में बैठे कई लोग भड़क उठे और नारेबाजी करते हुए मंच पर चढ़ गए। आक्रोशित लोगों ने धक्का-मुक्की की तो कुछ ने लेखक पर पत्रिका व कागज आदि फेंके। उन्होंने अकादेमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय को भी निशाना बनाया।  पुलिस ने हंगामा करे लोगों को सभागार से बाहर निकाला। इसके बाद कार्यक्रम आगे बढ़ाया जा सका।
आक्रोशित लोगों का आरोप है कि लेखक ने द्रोपदी का अपमान किया है। उन्होंने लेखक की तुरंत गिरफ्तारी की मांग की। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय मंत्री प्रवीण आय ने साहित्य अकादमी को भंग करने की मांग की। उन्होंने कहा कि यह सांकेतिक विरोध भारतीयता के विरुद्ध लेखन करने वालों के खिलाफ है। जो अकादमी हमारी संस्कृति पर आपत्तिजनक साहित्य लिखने वाले लेखक को सम्मानित करती है, उसके चेयरमैन जनता से माफी मांगें। उन्होंने माफी नहीं मांगने पर अकादमी के बाहर धरना-प्रदर्शन करने की चेतावनी दी।

valenltine day

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प्रेमिका की तलाश

प्रेम, यानी इश्क का भूत कब और किस पर सवार हो जाए, कहना मुश्किल है। यह भूत वक्त, हालात या उम्र, किसी का भी खयाल नहीं रखता। कोई भी इससे बच नहीं सकता। हम सभी कभी-न-कभी इसकी चपेट में आ ही जाते हैं। असल में यह भूत हमेशा हमारे इर्दगिर्द मौजूद रहता है। इसे जरा सा मौका मिला और हो गया सवार। फिर इसका कोई इलाज नहीं, सब झाडफ़ूंक बेकार।
अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा था कि मुझे भी इस ने धर दबोचा। मैंने पीछा  छुड़ाने की बहुत कोशिश की, परंतु वह नहीं माना। मैं ही कमजोर साबित हुआ। मजबूरन झुकना पड़ा, परंतु एक गहरा संकट उठ खड़ा हुआ। प्रेम करना है तो एक अद्द प्रेमिका भी होनी चाहिए। प्रेमिका भी ऐसी कि… पूछो नहीं। आज तक न तो ऐसी हुई हो और न आगे कभी हो। वर्तमान में एक हो और वह केवल मेरे लिए। सो सारा बचपन एक अद्द प्रेमिका की तलाश में गुजर गया, लेकिन खोज पूरी न हुई।
जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका था, हालांकि अभी अभी थोड़ी-बहुत लड़खड़ाहट थी। मेरे मन से आवाज उठी, ‘अरे मूर्ख, तू क्यों पागल बनता है? एक प्रेमिका ढूंढकर उसके पीछे सारी जिंदगी पागल बन, लोगों के ताने सुनने और पत्थर खाने में कोई अक्लमंदी नहीं।Ó इसलिए प्रेमिका तलाश मुहिम बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई।
हमने पौराणिक और ऐतिहासिक ग्रंथों को पढ़कर और कुछ तो सीखा नहीं, परंतु इतना जरूर जान लिया कि राजा, महाराजाओं और सामंतों के प्रेम का श्रीगणेश नदी के किनारे जलक्रीड़ा करती या पानी के लिए जाती सुंदरियों की छेड़छाड़ से होता था। नदी, पोखर का जमाना तो रहा नहीं, सुंदरियां बाथरूम में बंद हो कर जलक्रीड़ा करने लगी हैं। इसलिए मैंने बड़े अरमानों से मोहल्ले के नल की ओर पग बढ़ा दिए।
पानी का संकट चल रहा था, सो लंबी लाइन लगी थी। इसे मैंने अपना सौभाग्य समझा। मैंने लाइन के चारों ओर चक्कर लगाया तो परेशान हो गया कि प्रेम किस से शुरू करूं? सभी एक से बढ़कर एक थीं। मैंने अक्ल से काम लिया और सोचा, एकसाथ तीन-चार निशानें लगाता हूं, जो भी सही बैठ गया, उसी से काम चला लूंगा।
अपनी ओर से कोशिश शुरू कर दी। खूब फब्तियां कसीं, खूब ऊटपटांग गाने गाए, बेहूदा शेरों के तीर चलाए, लेकिन किसी के दिल में प्रेम के बीज फूटना तो दूर, कान में जूं तक नहीं रेंगी। न तो किसी ने झूठा गुस्सा दर्शाया और न ही कोई हंसी। न जाने जल संकट के कारण उन्होंने ध्यान नहीं दिया या पहले ही मेरे जैसे झूठे-सच्चे प्रेमी बना चुकी थीं। मेरी पहली कोशिश बेकार गई।

कालेज की सबसे खूबसूरत लड़की मेरी क्लास में पढ़ती थी। एक दिन चार-पांच लड़कों ने घेर लिया और छेड़खानी करने लगे।
मैं उधर से निकला तो उन्हें ललकारा, ”अकेली लड़की को छेड़ते हो।”
”अकेली को छेड़ें या सहेलियों के साथ, तुझे क्या?” एक लड़का मुसकराया।
मैं गुस्से में चिल्लाया, ”चुपचाप यहां से दफा हो जाओ। नहीं तो एकएक की हड्डी-पसली तोड़ दूंगा।”
”अरे, जा-जा…तेरे जैसे सुकडे पहलवानों से डरने लगे तो लूट लिया हमने छेड़छाड़ का मजा।” दूसरा गुस्से से बोला।
अपने दुबले-पतले बदन को देखकर एक बार तो मैं डर ही गया। मैं वहां से भागने ही वाला था कि ऐन वक्त पर याद आ गया। मैंने ढिशुमढिशुम शुरू कर दी। चंद घूंसे खाकर चारों रफूचक्कर हो गए।
लड़की कांपती हुई मेरे पास आई और बोली, ”मैं आपका एहसान जिंदगी भर नहीं भूलंगी।”
”एहसान कैसा, यह तो मेरा फर्ज था। तुम अकेली क्या आती हो? अगर बुरा न मानो तो मेरे साथ आया-जाया करो। मेरा घर भी इधर ही है।”मैंने बिना किसी फीस के नेक सलाह दे दी।
वह फूटफूट कर रोने लगी तो मेरी आंखें चमक उठीं। मन ही मन खुश हुआ कि काम बन गया।
”तुम घबराओ नहीं। मैं हूं न।” मैं स्टाइल में बोला।
उसके होंठ फडफ़ड़ाए,   ”भैया…”
मैं धड़ाम से आसमान से सीधा धरती पर आ गया।
उसने सुबकी ली, ”मेरा कोई भाई नहीं है। मुझे इसका बहुत दुख था, रक्षाबंधन पर मेरी सभी सहेलियां अपने भाइयों को राखी बांधती हैं, अपनी रक्षा के लिए मैं किसे राखी बांधूं?
”परसों रक्षाबंधन है। तुम हमारे घर जरूर आना। मैं अभी बाजार से राखी खरीद लाती हूं।” उसने आंसूं पोंछ लिए। उसकी आंखों में खुशी की चमक उभर आई।
मेरी बोलती बंद हो गई। सिर हिलाने के अलावा कोई चारा नहीं था। वह बाजार की ओर बढ़ गई। मेरी क्या हालात हुई, इसका आप अंदाज लगा सकते हैं। अपने दोस्तों को नाटक करने व मार खाने के लिए जो रुपए दिए, वे अलग डूब गए।

मैं जिस भी समारोह में जाता हूं, चाहे वह दोस्त का हो या दुश्मन का, उत्सव हो या मातम, मेरी निगाहें रूपसियों को तलाश करती रहती हैं। ताकझांक करने में कभी-कभी तो मैं रिश्तों को भी ताक पर रख देता हूं।

जवानी की दहलीज पर मजबूती से कदम जम चुके थे। कालेज के मौजमस्ती के माहौल को छोड़कर आफिस के बोर माहौल में आ गया था। इत्तिफाकन आफिस से में बहुत सी लड़कियां काम करती थीं। मैंने सोचा, ‘चलो, मन लगाने का कुछ तो साधन है।Ó
मेरा मन कामधाम में नहीं लगता था, बस दिनभर लड़कियों को ताकता रहता और कल्पना करता था कि सभी लड़कियां मुझे घेरे हुए प्रेमभरी बातें कर रही हैं।
मेरे एक साथी को मेरे इश्की भूत को पता चला तो उसने नेक सलाह दी, ”यार, साइकिल से काम नहीं चलेगा। तू कम से कम स्कूटर तो खरीद ले, फिर आती-जाती लड़कियों को लिफ्ट दे।”
सलाह मुझे पसंद आ गई। इधर-उधर से रुपया उधार लेकर नया तो नहीं परंतु पुराना स्कूटर खरीद लिया। वह दो-चार महीने तो सही चला, फिर खड़पड़ करने लगा।
मैंने बहुत कोशिश की कि कोई लड़की लिफ्ट मांगे। मैं स्कूटर की रफ्तार धीमी कर लेता, परंतु मेरे स्कूटर का आलाप सुनकर लड़कियां पहले ही मुंह फेर लेतीं।
एक दिन मैंने बस स्टाप पर आफिस की एक लड़की को देखा। मेरी बांछें खिल गईं, फौरन स्कूटर रोक लिया, ”मैडम, पहले ही देर हो गई है, मेरे साथ स्कूटर पर चलो।”
उसने जबरदस्ती धन्यवाद कहा और मुंह मोड़ लिया। वहां खड़े सभी लोग मुझे घूरने लगे तो आगे बढऩा पड़ा।
मैडम आफिस 15 मिनट देर से पहुंची और मैं पूरे तीन घंटे देरी से पहुंचा। मैं हांफता हुआ मैडम की सीट तक पहुंचा और बोला, ”अच्छा हुआ, जो आप मेरे साथ नहीं आईं। रास्ते में स्कूटर खराब हो गया था। कोई मैकेनिक की दुकान भी नहीं मिली… स्कूटर खींच कर लाना पड़ा।”
”यह तो मुझे पहले ही पता था,” मैडम गंभीरता से बोली।
”कैसे? क्या आप ज्योतिष भी जानती हैं?”
”तुम्हारे खचड़ा स्कूल से और क्या उम्मीद की जा सकती है,” मैडम मुंह बनाती हुई बोलीं।
सभी के चेहरों पर मुस्करान खिल उठी। मैं अपना सा मुंह लेकर चुपचाप अपनी सीट पर जाकर बैठ गया।
उसी दौरान मेरी जबरदस्ती शादी कर दी गई। बच्चे हो गए, लेकिन इश्क का भूत न उतरा।

एक दिन मैंने आफिस की लड़कियों के घरों के बारे पता लगाया। केवल एक लड़की का घर मेरे घर के पास था, जो खूबसूरत तो नहीं, पर ठीकठाक थी। मैंने शान से उससे कहा, ”मैडम, मेरा घर आपके घर के पास ही है। आप बस में आने के बजाय मेरे साथ आया-जाया कीजिए।”
उसने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरा और चीखी, ”बकवास बंद करो।”
अगले दिन मेरी पेशी हो गई। मैनेजर ने खूब डांटा और मेरी तरक्की भी रोक दी।
मैं सोचने लगा कि ऐसी क्या गलती हो गई? बाद में पता चला कि उस लड़की ने मेरी शिकायत कर दी थी। मैनेजर की निगाहें पहले ही उस पर लगीं थीं।

हमारे आफिस में नया क्लर्क आया। वह मजनंू बना घूमता। अपनी प्रेमिकाओं के नाम गिनवाता। उनके बारे में चटखारे ले लेकर चटपटे किस्से सुनाता।
मुझे लगा, अब जाकर कोई सही आदमी मिला।
”गुरु, मैं बहुत परेशान हूं। आज तक कोई प्रेमिका नहीं मिलीं। हमें भी कोई गुरुमंत्र दो,” मैं गिड़गिड़ाया।
वह मुसकराया, ”तुम आफिस कैसे आते हो?”
”स्कूटर से।”
”तुम यहीं मार खा गए।”
”वह कैसे?”मेरा मुंह खुला का खुला रह गया।
”प्रेम का श्रीगणेश बसों में होता है… भीड़भाड़, घिचपिच रहती है, बस सुनहरा मौका देखा और हो जाओ शुरू।”
मेरे स्कूटर आफिस न ले जाने के फैसले पर घर के सभी लोग हैरान हो गए।
पत्नी ने कहा, ”तुम से कितनी बार कहा कि इस खचड़ा को मत ले जाओ, परंतु तुम ने कभी नहीं सुनी। लगता है, आज तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है… तुम दफ्तर नहीं जाओगे।”
”परंतु मैं ठीक हूं,” मैं खीज उठा।
मेरा बेटा किसी डाक्टर की तरह बोला, ”अच्छा यह बताइए, आपका क्या नाम है?”
”अनुराग।”
”आपका आफिस कहां है?”
”सेक्टर-10 नोएडा में।”
”अच्छा, यह बताओ, आज तारीख क्या है?”
”15 अक्टूबर।”
”आप ठीक हैं। आफिस जा सकते हैं।” वह सिर हिलाते हुए इतमीनान से बोला।
मुझे बहुत झुंझलाहट हुई। आफिस के लिए देर हो रही थी, इसलिए चुपचाप खिसक लिया।
मैं बस में चढ़ा तो देखा कि एक हसीन लड़की सामने ही खड़ी है। मैं मन ही मन खुश हुआ। वह जैसे ही भीड़ में आगे बढ़ी, मैंने वैसे ही उसे छेड़ा तो हंगामा खड़ा हो गया।
”लुच्चे-लफंगे, लड़की को छेड़ते शरम नहीं आती,” वह चिल्लाई।
उस लड़की से दो-चार कदम आगे खड़े लड़के ने मेरा कालर पकड़ कर एक घूसा जड़ दिया और चीखा, ”मारो साले को…”
एक अधेड़ बोल उठा, ”क्या जमाना आ गया है… इन लौफरों ने बहू-बेटियों का घर से निकलना मुश्किल कर दिया है। ऐसी धुनाई करना कि छठी का दूध याद आ जाए।”
सबको बहती गंगा में हाथ धोने का मौका मिल गया। सबके सब शरीफ बन गए। तड़तड़ातड़। मुझे वह मार पड़ी कि अस्पताल में भर्ती होने के चार घंटे बाद होश आया और डेढ़ महीने तक वहां आराम करना पड़ा।
तकरीबन दो महीने बाद दफ्तर जाना शुरू किया तो देखा कि वही लड़का और लड़की बस में छेड़छाड़ कर रहे हैं और एक-दूसरे को देखकर मुसकरा रहे हैं। वह अधेड़ मंदमंद मुसकराते हुए बड़े मोहक अंदाज से लड़की को घूर रहा है। मेरा दिल जल उठा।
मेरे मजूनं गुरु ने समझाया, ”यह भी प्रेम करने का फार्मूला है, जो पंसद न आए, उसकी शिकायत कर दो, हंगामा खड़ा कर दो, उसे बदनाम कर दो। जो पसंद आ जाए, नैन लड़ाते रहेा और बगुलाभगत बनकर प्रेम करते रहो।”

सारी उम्र बीत गई। दो-चार साल और जी गया तो बहुत है। कब्र मैं पैर लटके हुए हैं, लेकिन इश्क का भूत नहीं उतरा है। प्रेमिका की चाह अभी भी बाकी है।