Archive for: January 2010

साहित्य अकादेमी का कारपोरेटाइजेशन

केंद्रीय साहित्य अकादेमी और कोरिया की मल्टीनेशनल कंपनी सैंमसंग इंडिया के बीच हुई जुगलबंदी से लेखकों में आक्रोश है। अकादेमी साहित्य का गठन 12 मार्च, 1954 को भारत सरकार द्वारा किया गया था। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं और भारत में होनेवाली साहित्यिक गतिविधियों का पोषण और समन्वय करना है। अकादेमी के इतिहास में पहली बार कोई मल्टीनेशनल कंपनी पुरस्कार प्रायोजित कर रही है। सैंमसंग इंडिया ने आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं को पुरस्कार देने की घोषणा की है। प्रत्येक वर्ष आठ भारतीय भाषाओं को चुना जाएगा। इस तरह से प्रत्येक भाषा का तीन साल बाद नंबर आएगा। इस वर्ष बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, पंजाबी, तेलुगु और बोडो भाषाओं के लेखकों को सम्मानित किया जा रहा है। पुरस्कार कोरियाकी प्रथम महिला द्वारा पंच सितारा होटल ओबेराय में 25 जनवरी को दिया जाएगा। यह पुरस्कार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की स्मृति में दिया जा रहा है। आयोजन साहित्य अकादेमी के बैनर के नीचे हो रहा है, यही विवाद की जड़ है। कई लेखकों ने समारोह के बहिष्कार का मन बना लिया है। उन्होंने इसकी घोषणा भी कर दी है। इनमें साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त लेखक भी हैं। सुप्रसद्धि साहित्यकार नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, मैनेजर पांडेय, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी आदि इस पुरस्कार का विरोध कर चुके हैं। Read more

ज्ञान प्राप्त करने की कुंजी है कोश : अरविंद कुमार

 
 
 

कोशकार अरविंद कुमार और उनकी पत्नी कुसुम कुमार

आधुनिक युग में हिंदी कोशकारिता के जनक अरविंद कुमार पिछले तीन दशक से शब्द संकलन कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ी और महर्षि जैसे जीवन चुना। बीस साल की अटूट मेहनत के बाद उन्होंने हिंदी को अनमोल खजाना दिया- समांतर कोश। इसका प्रकाशन 1996 में नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया। पेंगुइन से प्रकाशित द्विभाषी समांतर कोश से हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाएं समृद्ध हुई हैं। शब्द, शब्द की महत्ता, कोशकारिता के जन्म और उसके विकास पर उनसे बातचीत :

हमारे जीवन में शब्द का क्या महत्व है?
शब्द भाषा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कड़ी है। हमारे संदर्भ में शब्द का केवल एक अर्थ है- एकल, स्वतंत्र, सार्थक ध्वनि। वह ध्वनि जो एक से दूसरे तक मनोभाव पहुंचाती है। संसार की सभी संस्कृतियों में इस सार्थक ध्वनि को बड़ा महत्व दिया गया है। संस्कृत ने शब्द को ब्रह्म का दर्जा दिया है। शब्द जो ईश्वर के बराबर है, जो फैलता है, विश्व को व्याप लेता है। ग्रीक और लैटिन सभ्यताओं में शब्द की, लोगोस की, महिमा का गुणगान विस्तार से है। ईसाइयत में शब्द या लोगोस को कारयित्री प्रतिभा(क्रीएटिव जीनियस) माना गया है। कहा गया है कि यह ईसा मसीह में परिलक्षित ईश्वर की रचनात्मकता ही है। Read more

अरविंद कुमार: लगन से किए सपने सच

लेकिन सपने साकार करना बहुत मुश्किल। सपनों को साकार करने के लिए किस तरह की दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत होती है, कैसे सुख-आराम भूल जाना पड़ता है और किस तरह लगन से काम किया जाता है, इसकी मिसाल हैं- समांतर कोश के कोशकार अरविंद कुमार। Read more

कई संगठन फिर भी लेखकों का शोषण

पिछले दिनों सुप्रसिद्ध लेखक ज्ञानरंजन प्रगतिशील लेखक संगठन से अलग हो गए। उन्होंने जो आरोप लगाए हैं, वे बेहद गंभीर हैं। ज्ञानरंजन वर्षों से प्रगति लेखक संघ के सदस्य रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि संगठन का सांस्कृतिक पतन हो चुका है। वह यह भी कहते हैं कि जिस प्रगतिशील लेखक संघ की नींव मुंशी प्रेमचंद ने रखी, वह राजनीतिक गुटबंदी में शामिल हो गया है। उसे संपत्ति का रोग लग गया है। जब संगठन में पहले-सी विचारधारा और अनुशासन ही नहीं रहा तो यहां बने रहने का कोई मतलब नहीं है।
इसी के साथ लेखक संगठनों की प्रासंगिकता को लेकर फिर से सवाल उठने लगे हैं। इनकी नींव कब रखी गई? इन्हें बनाने का उद्देश्य क्या है? अधिकांश लेखक संगठन किसी-न-किसी राजनीतिक पार्टी से संबद्ध हैं। उन पार्टियोंं की नीतियां इन्हें किस तरह प्रभावित करती हैं? क्या किसी रचनाकर को लेखक संगठन से जुडऩा चाहिए? उसकी रचनात्मकता को संगठन किस तरह प्रभावित करते हैं? संगठन लेखकों के हितों की रक्षा करने में कितने सक्षम हैं? संगठनों की क्या भूमिका होनी चाहिए आदि मुद्दे भी अहम हैं। Read more

आओ हमें ठगो

ठगो खूब ठगो। हमारी तो नियति ही ठगे जाना है। जन्म से लेकर मरने तक कदम-कदम पर ठगे ही तो जा रहे हैं। इस नेक काम में तुम ही पीछे क्या रहते हो।जो ज्योतिष अपने भविष्य के बारे में नहीं जानते, वे हमारे भविष्य को उज्जवल करने के नाम पर ठग रहे हैं। कोई हाथ की लकीरें देख रहा है तो कोई ताश के पत्तों से भविष्य बांच रहा है। हम खुश हैं। उनके पास बार-बार जा रहे हैं। Read more

क्रिकेट दस सुख

क्रिकेट खेलिए। खूब खेलिए। बल्ला उठाइए। न उठाइए। सब चलेगा। निंदा रस बेकार। सब सुख सागर।
पहला सुख : दूसरे टेंशन में, आप फ्री। कई रिकॉर्ड बना तो चुके हैं। विश्व के महान खिलाडिय़ों में शुमार हैं। फिर किस बात की चिंता? बाहर का रास्ता दिखाने की किसकी हिम्मत? लोग करें चिंता, सचिन कितना स्कोर खड़ा करेगा? हरभजन कितने विकेट चटगाएगा? नहीं किया स्कोर खड़ा। दूसरे को नहीं भेजा पैवेलियन। आप चले आए। तो क्या हुआ? दुनिया आनी-जानी। यह कोई कुंभ का मेला है, जो बारह साल बाद आएगा। जल्द होगा दूसरा टूर्नामेंट। फिर देखा जाएगा।

बड़े काम की चाय की प्याली

मैं सोया हुआ था। श्रीमतीजी ने हिलाया, ”आफिस नहीं जाना क्या? लिहाफ तान कर सोए हुए हो।ÓÓ
मैंने अंगड़ाई ली, ”आज चाय नहीं मिलेगी?ÓÓ
”लाई हूं, तुम्हारी चाय की प्याली। उठो तो सही।ÓÓ श्रीमतीजी ने कहा।
मैंने लिफाह से मुंह बाहर निकाला, ”मेज पर रख दो।ÓÓ
वह चाय की कप मेज पर रख कर चली गई।
मुझे झपकी लग गई। पांच-सात मिनट बाद आंख खुली। मैंने आवाज दी, ”सुनो जी, चाय तो कोल्ड डिं्रक हो गई है। इस गरम तो कर दो।ÓÓ
वह चाय गरम करके ले आई। मैं चाय पीकर बाथरूम में घुस गया।

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मैकाले महाराज की जय

अब कहने वाले चाहे कुछ भी कहें, लेकिन मैं तो मैकाले महाराज की जय-जयकार करूंगा। मैकाले महाराज ने अंग्रेजी शिक्षा नीति लागू कर जो राह दिखाई, उसके लिए हम सदा उनके ऋणी रहेंगे। यह अभागा देश अंधकार में डूबा हुआ था। ज्ञान-विज्ञान का तो हमें पता ही नहीं था। ऐसे में मैकाले महाराज ने अंग्रेजी रूप ज्ञान की ज्योति से हमारा अंधकार दूर कर दिया। वास्तव में हम कूप मंडूक थे।

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