साहित्य नहीं सच : फ़ज़ल इमाम मल्लिक

संस्‍था ‘महि‍ला सामख्‍या’ ने अन्‍तर्राष्‍ट्रीय महि‍ला दि‍वस के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर आठ संघर्षशील महि‍लाओं के जीवन पर आधारि‍त कहानि‍यों की पुस्‍तक ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे…’ का प्रकाशन कि‍या है। इस पर लेखक-पत्रकार फ़ज़ल इमाम मल्लिक की समीक्षा-

उत्तराखण्‍ड में महिलाओं के बीच काम कर रही संस्था ‘महिला सामख्या’ सामाजिक और जन सरोकारों को लेकर न सिर्फ सचेत है, बल्कि दूरदराज और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में उन महिलाओं की ताक़त भी है जो समय और समाज की बंदिशों मे बंधी अभिशप्त ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के लिए कई बार जीवन उतना आसान नहीं होता, जितना हम और आप सोचते-समझते हैं। उत्तराखण्‍ड  के दूरदराज़ के इलाकों में रहने वाली अपढ़ महिलाओं की स्थिति भी कुछ ज्यादा अच्छी नहीं है। इलाक़ा चाहे मैदानी हो या पहाड़ी, महिलायें लगभग हर जगह एक तरह की स्थितियों से जूझती हैं। हालांकि यह भी सही है कि शोषण, अत्याचार और ज़ुल्म का शिकार सिर्फ़ अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी महिलायें ही नहीं होतीं, शिक्षित महिलायें भी कई स्तर पर इस शोषण का शिकार होती रहती हैं। इसकी वजहें ढेरों हैं। समाज और परिवार तो इसके लिए ज़िम्मेदार है ही, कई बार ख़ुद महिलायें भी इसका कारण बन जाती हैं। ‘महिला सामख्या’ ऐसी ही महिलाओं के बीच लम्‍बे समय से काम कर ही रही, उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी तो दे ही रही है, साथ ही शिक्षित कर अपने पैरों पर खड़े करने की कोशिश में भी जुटी हुई है। बड़ी बात यह है कि उन महिलाओं को एक लम्‍बी-चौड़ी धरती और खुला-खुला आकाश देने के लिए संस्था की महिलायें न सिर्फ उनके बीच जाकर जनगीतों के ज़रिये सरोकार बनाती हैं बल्कि उन्हें गीत लिखने के लिए प्रेरित भी करती हैं। लघुनाटकों का लेखन और मंचन भी संस्था की महिलाएं करती हैं और जीवन के बेहतर तरीक़े से जीने के लिए उन्हें प्रेरित करती हैं जो घर और समाज के बीच कहीं पिस कर रह गई हैं।

संस्था की निदेशक गीता गैरोला का सरोकार साहित्य से भी है इसलिए इन महिलाओं को साहित्य से जोड़ने की कोशिश भी संस्था की होती है। लेकिन सिर्फ गीता गैरोला ही नहीं संस्था की दूसरी सदस्यों का अनुराग भी किताबों से है इसलिए संस्था ने उन महिलाओं के संघर्ष और जीवन को बड़े समाज से जोड़ने के लिए ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे…’ का प्रकाशन किया है। इस पुस्तक में आठ महिलाओं की जिंदगी को हमारे सामने रखा गया है। इन कहानियों में फ़िक्शन कहीं नहीं है, सिर्फ़ यथार्थ है। जो जीवन उन महिलाओं ने जिया है उसे जस का तस सामने रख दिया गया है। न कोई अलंकरण, न कोई विशेषण, न किसी तरह का प्रयोग। आख़िर यह सब संभव भी तो नहीं है, जब जीवन को जस का तस देखते हैं तो फिर सारे संज्ञा-विशेषण गौण हो जाते हैं। रह जाती है जीवन की कड़वी और तल्ख़ हक़ीक़त। इसमें आप या हम कमला, अनामिका, मधुली, सितारा, मोहिनी, सुनीता, नंदी और मंगला जैसी महिलाओं के जीवन को जलते और गलते देखने के लिए अभिशप्त होते हैं। इन महिलाओं के जीवन को कृष्णा खुराना, डा गिरिबाला जुयाल, डा अतुल शर्मा, गीता गैरोला और कमल जोशी ने क़लमबद्ध किया है, लेकिन सच यह भी है कि जीवन की सच्चाई को कौन भला शब्दों में ढाल सका है। ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे…’ की कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा लगता भी है कि हम अपने बनाए हुए जहन्नुमों से गुज़र रहे हैं जहाँ ज़िंदगी कई-कई रंग में जलती है। इन कथाओं में काली और स्याह रात है तो सुबह का उजाला भी। संघर्ष और जीवन में कुछ करने की ललक के बीच ही उन महिलाओं ने काली और स्याह रात को पीछे छोड़ कर उजली और निखरी सुबह की तरफ़ क़दम बढ़ाए। यह भी सही है कि इन महिलाओं की राह में पग-पग पर परेशानियां खड़ी की गईं लेकिन उन्होंने ‘महिला सामख्या’ की साथियों की मदद से इन परेशानियों को दूर करने में कामयाबी पाई। हो सकता है कि साहित्यकारों और आलोचकों के लिए यह पुस्तक बहुत महत्त्व की न हो लेकिन इसमें भी दो राय नहीं कि इस पुस्तक का साहित्यिक महत्त्व भले नहीं हो लेकिन इसका सामाजिक महत्त्व है और यह महत्त्व उन साहित्यिक कृतियों से कहीं ज्यादा है जो सिर्फ पुस्तकालयों की ख़रीद के लिए लिखी और छापी जाती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि महिला सामख्या इस तरह के पुस्तकों के प्रकाशन का सिलसिला जारी रखेगी, ताकि हम सच्ची और अच्छी कहानियां भी पढ़ सकें।

पुस्‍तक परि‍चय-
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे (आत्मकथा), संपादन: गीता गैरोला, कमल जोशी, संपादन सहयोग: डा. चंद्रकला भंडारी, हेमलता खंडूड़ी,
प्रकाशक: महिला सामख्या, 10, इंदिरा नगर, फेज-1, देहरादून (उत्तराखंड)।

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सितारा : कमल जोशी

 

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