
लेखन के साथ-साथ चित्रांकन में दखल रखने वाले संजय ग्रोवर की दो पुस्तकें गजल संग्रह ‘खुदाओं के शहर में आदमी’ तथा व्यंग्य संग्रह ‘मरा हुआ लेखक सवा लाख का’ प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी तीन गजलें-
1
पागलों की इस कदर कुछ बदगु़मानी बढ़ गयी
उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी
उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था
हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी
भीड़ का उनको नशा था, बोतलें करती भी क्या
तिसपे रसमों-रीतियों की सरगिरानी बढ़ गयी
छोटे शहरों, छोटे लोगों को मदद मिलनी तो थी
हाकिमों के रास्ते में राजधानी पड़ गयी
कुछ अलग लिक्खोगी तो तुम खुद अलग पड़ जाओगी
यूं ग़ज़ल को झांसा दे, आगे कहानी बढ़ गयी
‘वार्ड नं. छ’ को ‘टोबा टेक सिंह’ ने जब छुआ
किस कदर छोटी मिसाले-आसमानी पड़ गयी
दिल में फ़िर उट्ठे ख्याल ज़हन में ताज़ा सवाल
आए दिन कुछ इस तरह मुझपर जवानी चढ़ गयी
2
उसको मैं अच्छा लगता था
मैं इसमें क्या कर सकता था
एक ग़ज़ब की सिफ़त थी मुझमें
रोते-रोते हंस सकता था
नज़र थी उसपे जिसके लिए मैं
फ़कत गली का इक लड़का था
जाने क्यूं सब दाँव पे रक्खा
चाहता तो मैं बच सकता था
मेरा ख़ुदको सच्चा कहना
उसे बुरा भी लग सकता था
मेरा उसको अच्छा कहना
उसे बुरा भी लग सकता था
बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
किसी भी हद तक गिर सकता था
ख़ानदान और वंश के झगड़े !
मै तो केवल हंस सकता था
3
मोहरा, अफवाहें फैला कर
बात करे क्या आँख मिला कर
औरत को माँ-बहिन कहेगा
लेकिन, थोड़ा आँख दबाकर
पर्वत को राई कर देगा
अपने तिल का ताड़ बना कर
वक़्त है उसका, यारी कर ले
यार मेरे कुछ तो समझा कर
ख़ुदको ही कुछ समझ न आया
जब बाहर निकला समझा कर


आप को राखी की बधाई और शुभ कामनाएं.
रक्षाबंधन पर हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
बहुत बढ़िया और शानदार लगा ! सारे ग़ज़ल एक से बढ़कर एक हैं! उम्दा पोस्ट!
बहुत बढ़िया प्रस्तुति। तीनो गजले बहुत बढ़िया हैं…
Nice Keep On.
Shivesh
पागलों की इस कदर कुछ बदगु़मानी बढ़ गयी
उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी
एक से एक खूबसूरत गज़ल बहुत-बहुत बधाई …
उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था
हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी
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‘वार्ड नं. छ’ को ‘टोबा टेक सिंह’ ने जब छुआ
किस कदर छोटी मिसाले-आसमानी पड़ गयी
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जाने क्यूं सब दाँव पे रक्खा
चाहता तो मैं बच सकता था
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बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
किसी भी हद तक गिर सकता था
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तीनो गजले शानदार हैं
बहुत-बहुत बधाई
कुछ अलग लिक्खोगी तो तुम खुद अलग पड़ जाओगी
यूं ग़ज़ल को झांसा दे, आगे कहानी बढ़ गयी……….क्य कह क्या ना कहू…..
सिर्फ इतना कहता हूं बेहतरीन, सिर्फ बेहतरीन…
बहुत सुन्दर !
१-
कुछ अलग लिक्खोगी तो तुम खुद अलग पड़ जाओगी
यूं ग़ज़ल को झांसा दे, आगे कहानी बढ़ गयी
२-
बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूं कि
किसी भी हद तक गिर सकता था
३-
वक़्त है उसका, यारी कर ले
यार मेरे कुछ तो समझा कर
तीनों ग़ज़ल बहुत अच्छी हैं…
हर ग़ज़ल से एक एक बेशक़ीमती शेर चुन लिया-
संजय ग्रोवर जी को बधाई.
पुस्तकों के प्रकाशन के लिए बधाई ….तीनों गज़लें लाजवाब
तीनो गजले शानदार…जबरदस्त!
संजय जी,
तीनो रचना बहुत अच्छी लगी, शुभकामनाएं!
जनाब खूबसूरत ग़ज़लें फरमाई हैं .दिलके अंदर उतरे हैं जो शेर कॉपी कर रहा हूँ
पागलों की इस कदर कुछ बदगु़मानी बढ़ गयी
उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी
वार्ड नं. छ’ को ‘टोबा टेक सिंह’ ने जब छुआ
किस कदर छोटी मिसाले-आसमानी पड़ गयी
जाने क्यूं सब दाँव पे रक्खा
चाहता तो मैं बच सकता था …….कभी लिखा था मैंने….. हाथ बडा सकता तो उसे छु सकता था/हाथ बढ़ाने में ही तो सारा फासला था.
फिर लोटू आपके पास ….
बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
किसी भी हद तक गिर सकता था
औरत को माँ-बहिन कहेगा
लेकिन, थोड़ा आँख दबाकर
शफ्फ्कत
तीनो की तीनो गज़लें शानदार हैं…
इनमे से एक भी शेर ऐसा नहीं जिसे अलग से चुन कर बेहतरीन कहा जाय…कोई शेर किसी से कमतर नहीं…
बहुत आनंद आया पढ़कर…बहुत बहुत आभार आपका इन सुन्दर ग़ज़लों को पढवाने के लिए…
तीनों गजल लाजबाब!!!
उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था
हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी
बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
किसी भी हद तक गिर सकता था
वाह भाई ग्रोवर साहब, लाजवाब…। छोटी बहर में इतना खूबसूरत शेर…। मजा आ गया…
लाजवाब, बेमिसाल,बेहतरिन ग़ज़ल फ़र्माई है .
साहिल हाथरसि
तीनो गजले शानदार…जबरदस्त!
तीनो गजले शानदार…
बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
किसी भी हद तक गिर सकता था
तीनो गजले बहुत बढ़िया हैं…
उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था
हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी
भीड़ का उनको नशा था, बोतलें करती भी क्या
तिसपे रसमों-रीतियों की सरगिरानी बढ़ गयी…….yeh linein me dimag aur mastak par badi asar kar gai ….apne jo apne shabdon me jo bhavnao aur sachchai ko ukera hai bah vastav me sarahneey hai…..apka bahoot bahoot dhanyabad
भीड़ का उनको नशा था, बोतलें करती भी क्या
तिसपे रसमों-रीतियों की सरगिरानी बढ़ गयी
bahut sundar gazal
एक ग़ज़ब की सिफ़त थी मुझमें
रोते-रोते हंस सकता था
parbhavit karti rachna