शौचालय का अर्थशास्त्र : दिनेश चन्द्र भट्ट ‘गिरीश’

मोंटेक सिंह आहलूवालि‍या के 35 लाख रुपये खर्च करके दो शौचालय बनाने के कारणों, इसकी आवश्‍यकता और इसके दूरगामी लाभ बता रहे हैं शि‍क्षक और लेखक दिनेश चन्द्र भट्ट ‘गिरीश’-

‘शौचालय’ दो शब्दों के योग से बना है- ‘शौच’ और ‘आलय’। शौच शब्द ‘शुचि’ से बना है जिसका अर्थ है- पवित्र। ऐसा ‘आलय‘ (भवन) जहाँ से व्यक्ति पवित्र होकर निकलता है। जिसका शौचालय जितना बडा़ वह उतना ही अधिक पवित्र- वर्तमान परिपेक्ष्य में यही अभिप्राय ज्यादा समीचीन है। ऐसे शौचालय का प्रयोग न कर पाने वालों को क्या कहा जाय- म्लेच्छ यही न।

शुचिता या पवित्रता के पायदान पर हमारे देश में आज अगर कोई विराजमान हैं तो वे हैं- योजना आयोग के उपाध्यक्ष माननीय मोंटेक सिंह आहलूवालिया । 35 लाख रुपये खर्च करके दो भव्य शौचालय निर्मित करवाने वाले की शुचिता पर कैसे सन्देह किया जा सकता है। समग्र राष्ट्र के हितार्थ आर्थिक नियोजन करने का कार्य कितना मष्तिष्क को थकाने वाला होगा, जिस कारण उन्हें कब्ज की शिकायत रहती होगी। उनके शुभचिन्तकों ने उन्हें भव्य शौचालय निर्मित कराने की सलाह दी होगी। यह ऐसा शौचालय होगा जो संगमरमर से निर्मित, उसकी दीवारें स्वर्णरचित और उसकी सामग्री रत्‍नखचित ही होगी। ऐसा अनुमान मैं लगा रहा हूँ। शुचिता हेतु जब वह बैठते होंगे, मंद-मंद संगीत की सुरलहरियाँ बज उठती होंगी। वहाँ त्रिविध बयारि (शीतल, मंद, सुगन्धि से परिपूर्ण वायु) बहती होगी ताकि वह शुचिता परिपूर्ण होकर उस आलय से बाहर आयें।

मल-मूत्र विसर्जन के लिये एक और शब्द प्रयुक्त होता है- लघुशंका और दीर्घशंका। जब कोई व्यक्ति फ्रेश होने के लिये जाता है तो वह कहता है- दीर्घशंका हेतु जा रहा हूँ। निश्‍चय ही वह निम्नमध्य या मध्यम आर्थिक स्थिति वाला ही व्यक्ति है जिसे शंका है (लघु या दीर्घ) कि शारीरिक श्रम न करने, अव्यवस्थित दिनचर्या, तनावग्रस्तता के कारण उसकी आँतो में पल रहे या सड़ रहे मलमूत्र का परित्याग वह यथोचित ढंग से कर पाता है या नही! उसकी शंका समाधान को प्राप्त ही होगी, निश्‍चयपूर्वक कहा नहीं जा सकता। अपच, अम्लीयता, गैस, बवासीर जैसी बीमारियाँ इसीलिये अस्तित्वमान हैं।

निम्न आर्थिक स्थिति वर्ग का तो कहना ही क्या ‘मलत्याग‘ शब्द की अश्‍लील मानते हुए वह कहता है- दिशा मैदान जाना। आज के सन्दर्भ में उसमें ऐसा करने के लिये न तो कोई दिशा बची है और न मैदान ही। हाँ रेल लाइन या सड़क के किनारे समूह बनाकर मजबूरी में शर्म का परित्याग किये हुए बैठने को मजबूर हैं। रेल के ए.सी. क्लास में सफर करने वाले भद्रपुरुष के लिये ऐसे दृश्य कितनी जुगुप्सा पैदा करते होंगे। देश की अधिसंख्य आबादी ऐसा करती है। इसे सहन भी तो करना ही पड़ता है कि एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक वोट बैंक के रूप में इनका जीवित रहना कितना जरूरी है। अन्यथा अभावग्रस्तता में ये जियें या मरें किसे परवाह है।

शौचालय के लिए यदाकदा ‘बाथरूम’ का प्रयोग किया जाता है। कहीं-कहीं विद्यालयों में बच्चे मलमूत्र त्याग के लिये ‘बाथरूम’ शब्द का प्रयोग करते हैं। जरूरतमंद व्यक्ति अगर किसी मंत्री या बड़े नेता के यहाँ पहुँच जाय तो वह नेताजी को घण्टों बाथरूम के आश्रय में पाता है। आज समझ में आ रहा है कि आलीशान शौचालय का उपयोग करने वाला बाथरूम की भव्यता से मोहित होकर ही घण्टों सुखभोग करता हुआ परितृप्त होकर वहाँ से निकलता होगा।

तो बात निकली थी मोंटेक सिंह का शौचालय भव्य और आकर्षक है। आर.टी.आई. के तहत हमारे देश की सभी उच्च-आर्थिक स्थिति वालों के शौचालयों की स्थिति का ब्यौरा मंगाया जाना चाहिए। साथ ही विदेशों की ऊँची हस्तियों के शौचालयों से सम्बन्धित अभिलेख माँगे जाने चाहिए। सबसे महंगे शौचालय वाले का नाम ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड’ में दर्ज होना चाहिए। हो सकता है मोंटेक सिंह का नाम इस रिकार्ड में दर्ज हो जाय। अमेरिका के राष्ट्रपति इस हेतु उन्हें गले लगा लें जैसा कि पिछले माह एक अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को गले लगा लिया था। इससे बड़ा सम्मान हमारे देश के लिये और क्या हो सकता है।

शौचालय दीर्घशंका और दिशा मैदान का सम्बन्ध जीवन स्तर से ही है। जो व्यक्ति 35 लाख रुपये के शौचालयों का इस्तेमाल कर रहा है वह निश्‍चय ही छप्पन भोग का आनन्द तो लेता ही होगा। वह करोड़ालय (करुणालय नहीं) में तो अवश्य निवास करता होगा। उसके मातहत पलने वाले लोगों का जीवन स्तर भी उन्नत होता होगा। पत्रकारों को चाहिए कि वे उन सभी का साक्षात्कार लें (मोंटेक सिंह और उनके मातहतों से) और पूछें आपको कैसा लगता है इतने भव्य शौचालयों का उपयोग करते हुए? क्या-क्या विशिष्टताएँ हैं इन शौचालयों में? कितना आनन्द आता है शुचिता की प्रक्रिया में? आदि-आदि। हमारी नई पीढ़ी को यह जानकारी अवश्य ही होनी चाहिए ताकि उनका लक्ष्य बने- मोंटेक सिंह जैसा बनना और भव्य शौचालयों का सदुपयोग कर एक काबिल भारतवासी बनना। माता-पिता अपने बच्चों को एक सीख दें कि बनो तो मोंटेक सिंह जैसा अन्यथा मानुष देह धारण करने का क्या औचित्य? ‘बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर नर मुनि सदग्रंथन गावा‘, हमारा बचपन क्यों ऐसा आदर्श ग्रहण कर पा रहा है बड़ा चिन्तनीय विषय है।

बच्चे का महंगा स्कूल, हमारा आवास, हमारी कार, गहने आदि स्टेटस सिम्बल हुआ करते हैं। स्टेटस मेन्‍टेन करने के लिए आज व्यक्ति क्या नहीं करता! गुणवत्ता से अधिक प्रचलन का ध्यान रखा जाता है। हमारे  लिये सौभाग्य का विषय है कि आज शौचालय स्टेटस सिम्बल बनने जा रहा है। सम्पन्नता की अभिव्यक्ति या व्यक्ति की पहचान इसलिये नही होगी कि वह किस कार में सवारी करता है। या उसके बच्चे कितने महंगे स्कूल में पढ़ते है। या वह कितना महंगा भोजन करता है। बस महत्वपूर्ण यह होगा कि उसका शौचालय कितना महंगा है। और उसके भीतर किन-किन सुख सुविधाओं की ध्यान में रखा जाता है। अब शौचालय से सम्बन्धित टायलेट सीट, उसमें लगने वाले मार्बल आादि का विज्ञापन अधिकाधिक देखने को मिलेगा। अगर कोई फिल्मी हस्ती तत्सम्बन्धी आइटम का विज्ञापन करे तो कहना ही क्या! क्रिकेट स्टार घड़ी बेच रहा है। फिल्म अभिनेत्री कुरकरे खाकर और खिलाकर अपने परिवार को सम्पन्न और खुशहाल बता रही है। इसी प्रकार का बहुत कुछ। लेकिन अब फिल्मतारिका और फिल्म स्टार टायलेट में बैठा यह बताने का प्रयास कर रहा होगा कि फलाँ कम्पनी की टायलेट सीट या शौचालय में प्रयुक्त होने वाला मार्बल या इसी तरह के अन्य आयटम आपको कैसे सुख प्रदान करते हैं। अगर आप बताए गए आयटम का प्रयोग करते हैं तो आपका जीवन धन्य हो जायेगा और यह भी कि आपका शौचालय आपके लिए गर्व और पड़ोसी की ईर्ष्या का कारण भी होगा। उस विज्ञापन का मूलमंत्र होगा- उसका शौचालय आपके शौचालय से आकर्षक कैसे! उपभोक्ता के लिये अंग्रेजी का शब्द है-कष्टमर। अगर उपभोक्ता को आर्थिक तंगी से जीवन यापन करते हुए विज्ञापित वस्तुओं का प्रयोग स्टेटस के दबाब में करना पड़े तो वह कष्टमर ही है यानी आर्थिक तंगी के कारण कष्ट से मरने वाला। शौचालय आज बाजार के मायावी संसार का प्रिय विषय बनने जा रहा है। यही प्रेरणा काम करने वाली है कि आप अपने जीवन में भवन बनाएँ या न बनाएँ एक अदद आलीशान शौचालय अवश्य बनवा लें। ‘एक बंगला बने  न्यारा’  नहीं, ‘एक शौचालय बने उजियारा’।

मुझे लगता है कि मोंटेक सिंह का सम्बन्ध मण्टो की एक कहानी के एक चरित्र टोबाटेक सिंह से है। कहें तो मोंटेक सिंह और टोबाटेक सिंह भाई-भाई। टोबाटेक सिंह ने अपनी आखिरी श्‍वास तक भारत विभाजन को स्वीकार नहीं किया। भारत और पाकिस्तान के पूरे क्षेत्र को वह हिन्दुस्तान ही मानता आया। दुर्भाग्य से पाकिस्तान में रहना पड़ा। हर समस्या की शिकायत वह पण्डित नेहरू से करने की बात कहा करता था। इसी प्रकार मोंटेक सिंह आर्थिक विभाजन को स्वीकार नही करना चाहते। सभी भारतवासियों को वह खाते-पीते और उभरती आर्थिक महाशक्ति वाले देश का नागरिक समझते हैं। अगर किसी व्यक्ति को भुखमरी, किसानों की आत्महत्या, भ्रष्टाचार, संशाधनों का असमान वितरण आदि समस्याएँ या विसंगतिया दिखाई देती है तो उसकी दृष्टि का दोष है। उसकी भावना का दोष है- ‘जाकी रही भावना जैसी’। हमें बलिहारी होना चाहिये उस शौचालय का जिसके उपयोग के उपरान्त ऐसी कोई भी अनुभूति नहीं होती जो देश के लिये चिन्तनीय हो। वहाँ ऐसा अनुभव अवश्य होता होगा कि भारत 2020 तक विश्‍व की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरने वाला है। ऐसा अनुभव प्रदान कराने वाला शौचालय अगर महिमामण्डित करने के योग्य नहीं तो और क्या है?

काले धन पर इस वर्ष और विगत वर्ष अत्यधिक चर्चाएं हुईं कि कालाधन विदेशों मे जमा है। कई लोगों ने बि‍स्तर के अंदर, दीवार की चिनाई में, छत के भीतर आदि कई जगहों पर धन संचित किया हुआ था। हमारे देश के मनीषी इसे कालाधन बता रहे थे। अगर मेरे पास इतना धन होता तो मैं इसे काला नहीं रहने देता, पीला बना लेता। शौचालय की दीवारों को स्वर्णनिर्मित बनाकर भव्य शौचालय की निर्मिति के बाद भी अगर देश की तीन चौथाई आबादी बेधडक यत्र-तत्र दिशा मैदान वाला कार्य भी करती या 28 रुपये रोजाना कमाकर अमीर भी बन जाती तो मुझ पर क्या असर होता। शायद कुछ भी नहीं क्योंकि मैं तो उस भव्य शौचालय का उपभोग करने वाला होता जहां से गरीबी, बेकारी, भुखमरी, कुपोषणा, बदहाल व्यवस्थाऐं आदि तो कुछ भी महसूस नही होता। बचपन मे याद की हुई एक कविता का स्मरण मुझे इस सन्‍दर्भ में हो रहा है-

यदि होता किन्नर नरेश मैं, राजमहल में रहता।
सोने का सिंहासन होता, सिर पर मुकुट चमकता।।
-आमीन

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