शरद तिवारी की कविताएं

युवा कवि शरद तिवारी की कविताएं

क्या होगा

एक पेड़ था
जिसकी डालियों पर
चिडियाएँ घोसले बनाती थीं
वहीं पर उनका बसेरा था
वहीं चहचहाती थीं
एक पेड की जटाएँ
धरा में धँसी थीं
उसके तले
कहते हैं किसी योगी ने
परमत्व पाया था
एक पेड़ था विशाल
जाने कहाँ से आया था
उसके तने को चीर
कभी किसी ने
एक सुन्‍दर घर बनाया था
उपलब्धि को सबने सराहा था
एक पेड़ था वह
जो आँधियों में टूटकर
किसी राहगीर के सिर पर गिरा था
वह भी पेड़ ही था
जिसकी शीतल छाया ने
पथिक का श्रम हरा था
सहारा बना था
पेड़ थे बहुत से और भी
जो अब भी हैं
नही भी हैं
जो सामानों में बदल गए हैं
जिनके फल हमने तोडे़ थे
बच्चे, बन्‍दर जिन पर चढे़ थे
जो कुल्हाडी़ की चोटें खा
धरा पर पडे़ थे
पतझड़ में जिनके पत्ते झडे़ थे
और फिर बहार आई थी
कथाएँ लिखी गईं
कवियों ने पोथियाँ सजाई थीं
यह सब हुआ था
और भी न जाने क्या-क्या हुआ था
और क्या-क्या होगा
रह गया था
यह सब कुछ सोचता-सा मैं
उस नन्हे बीज को
हथेली पर रखकर
उलटता-पुलटता
देखता हुआ।

योग

इस दृश्य से
अलग रहने की कोशिश में
रहता हूँ हरदम
सोचता हूँ विचरूँ
‘दृष्टा’ बनकर सतत्
बस
असंपृक्‍त
अपनी मौत को भी देखूँ
तमाशे की तरह
अलग खड़ा रहकर
शरीर क्या हैं ?
सिर्फ हाड़-माँस
भौतिक राशियों का पुंज
आँखें हैं
बस किसी लैंस की तरह
गले से निकली आ़वाज
मह़ज वोकल कॉर्ड की कम्‍पन ही तो है
ऐसी ही व्याख्या करता हूँ अक्सर
ताकि बना रहूँ
एक अंसग दृष्टा
पर जब भी कभी
कोई सुगठित सुसज्जित
हा़ड़ माँस का पिंड
जिसमें जडे़ हों
दो सुन्‍दर लैंस
सामने आ जाता है
और
वोकल कॉर्ड करती है
सुरीली कम्‍पन
यह दृष्टा
दृश्य में विलीन हो जाता है
ऐसे में फिर
योग कहाँ रह पाता है।

भेडि़या धसान

चलते चलते
देखा किसी ने पीछे मुड़कर
ज़रा गौर से
और चल दिया
देखा देखी देखा
कुछ इसी तरह
दूसरे ने भी
और चल पड़ा
तीसरा भी देखकर चलता हुआ
चलते हुए और भी कुछ लोगों ने
देखा जिस ओर
मैंने भी देखा
चलते-चलते
उसी ओर
कुछ भी न था जहाँ पर
गर था तो बस वही
भेडिया धसान
जो चल रहा है
ज़माने में
ज़ोरों पर
जिसके चलते
चलते हैं लोग
एक दूसरे को देखकर
बिना किसी तर्क के।

छुई मुई

छुई मुई
छूते ही मुई
सिमटी
मुरझा-सी गई
नाज़ुकी
ऩाज होता है जिसपे
तमाशा बन गई
उँगलियाँ उठीं सबकी
उसकी ही ओर
न चाहते हुए भी।

गरमी आ रही है

ट्यूब लाइट की फट्टी के पीछे से
बड़े दिनों बाद आज अचानक
हँसता-सा मुँह लिए
ख़ामोशी से गरदन लटकाए
लगातार झाँकती छिपकली
इशारा करती है
कि गरमी आ पहुँची है
ठसाठस भरी नगर बस के
सहयात्रियों के चढ़ते-उतरते
रगड़ खाकर गुज़रते समय
झटके से झोंके के साथ आने वाली
बदन की मंद-मंद बदबू भी
यही बतलाती है
कि गरमी आ पहुँची है
कुछ देर तेज रौ चलने पर
कहीं टुक बैठकर आराम करने पर
गालों पर चोरी से ढुलक आने वाली
नन्हीं-सी पसीने की एक-दो बूँदें भी
मानो कह जाती हैं
कि गरमी आ पहुँची है
रसोई की नाली के इर्दगिर्द
एक अरसे बाद
अजनबी से चहल क़दमी करते
कुछेक चींटे और कॉकरोच
आगाह कर जाते हैं कि कि गरमी आ पहुँची है
कैलेंडर की तेजी से बीत गई ठण्डी तारीखों के अलावा
वसंत की उन्मादी पवन के उन्हीं बासी इशारों के सिवा भी
और भी कई बातें बतलाती हैं
कि गरमी आ पहुँची है
ज़रा ग़ौर तो कीजिए।

आत्मश्‍लाघा

गम्‍भीरता
गहराई तक जाने वाली नज़र
वह विचारों की प्रौढ़ता
बुद्धि का वह पैनापन
हर एक बात की बुनियादी समझ
दक्षता, दृढ़ निश्‍चय और दबंगपन
अलावा इसके
और भी बहुत कुछ हैं मुझमें…
- जब-जब उस ऊँची आकांक्षा को
न पा सकने की कसक
मन में उपजती है
तब-तब
देने लगती है संबल
वहीं आत्‍मश्‍लाघा

वह मरेगी नहीं

कितना छिपाने
दबाने और मारने की
कोशिश करोगे उसको
फिर भी
वह तुम्‍हारी देह के
हर सँकरे मोड़ पर
तुम्‍हारे भीतर
बसी ही रहेगी कमोबेश
चली जाएगी भले
थोड़ी देर के लिए
तुम्‍हारी खीझ मिटाने
तुम्‍हें खुश करने के लिए
पर भागेगी नहीं सदा के लिए
बद है वह, यानी बुरी है
तुम्‍हें नापसंद है
क्‍योंकि वह दिखावा नहीं
आडम्‍बर नहीं
इसलिए मारना चाहते हो उसे हर बार
हटाना चाहते हो अपने पास से
किसी खुशफहमी में रहने के लिए
पर सोच लो
वह मरेगी नहीं कभी भी
क्‍योंकि वह सच्‍चाई है
तुम्‍हारे तन की
जो मरेगी नहीं
तुम्‍हारे मरने के बाद भी
बल्कि प्रकट होगी
और भीषण रूप में
इसलिए खत्‍म करेंगे
लोग एक बार फिर तुम्‍हें
मरने के बाद भी
शायद उसके ही डर से
पर फिर भी तो रहेगी वह
उनके साथ
जो तुम्‍हें खत्‍म करके चले थे।

12 comments on “शरद तिवारी की कविताएं

  1. dinesh kumar shukla says:

    sharmaji namaskar
    sharadji ko aur apko badhai ki itni achchhi kavitayen padhne ko mili.dhanyavad.

  2. Santha Sundari says:

    बहुत ही सुन्दर कवितायें हैं,और पुरानी बातों को नए अंदाज़ में कहने की शरद जी की अभिव्यक्ति निराली है.धन्यवाद शर्मा जी.

  3. अच्छी कवितायेँ ……………….

  4. sushil raghav says:

    bahtreen kavitayen…….

  5. PRAN SHARMA says:

    SEEDHEE – SAADEE BHASHA AUR SEEDHE – SAADE BHAAV , KAVITAYEN PADH KAR
    AANANDIT HO GAYAA HUN .

  6. Sanjay Joshi says:

    sundar kavitaain. mubarak sharad aur lekhak manch.

  7. Vijay Singh says:

    आज के हमारे दौर की कथा कहती हुई इन कविताओं में मैं खुद को आसानी से ढूंढ पाया हूँ. लिखते रहिए शरद जी. आपकी और कविताएँ भी पढ़ना चाहूँगा.

  8. Irfan says:

    Achhi kavitayein. Ek bar punah padhne kii zaroorat rahegi. Badhai

  9. naeem says:

    wah sharad ji! bahut badhiya.

  10. शरद तिवारी says:

    आप सभी का बहुत-बहुत आभार.

  11. Nagendra Mishra says:

    Kuchh nai tarah ki sundar kavitayen padhne ko mili.Dhanyavad.

  12. Mahesh Ramjeeawon says:

    Meri kouch kavitaon ki samanta hai sharad ji ki rachnaon mein.Vishesh kar-Kya Hoga

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