वीरेंद्र नारायण झा की लघुकथाएं

 

गांव समया, महिनाथपुर(बिहार) में 08 अप्रैल, 1954 को जन्में चर्चित कथाकार-पत्रकार वीरेंद्र नारायण के लेख, कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएं और कविताएं हिंदी तथा मैथिली की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके पहले मैथिली कहानी संग्रह जीबाक बाट का प्रकाशन 2004 में हुआ।
समाजिक जीवन की विद्रुपताओं, राजनीतिक पतन और तेजी से फैल रही अपसंस्कृति के दुष्प्रभावों को चित्रित करती उनकी लघुकथाएं झकझोर देती हैं -
  

बच्चे की खुशी

शहर के सबसे बड़े सेठ के एक वर्षीय पुत्र का जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था। शानदार पार्टी रखी गई थी। शहर के तमाम बड़े लोगों को पार्टी में शिरकत करने के लिए निमंत्रण भेजा गया। आखिर वह शाम भी आई, जब सेठ के बच्चे का हाथ पकड़कर केट कटवाया गया तथा मोमबत्तियां बुझाने की रस्म अदा की गई। प्राय: सारे मेहमान पहुंच चुके थे।
ऐन वक्त पर बच्चा रोने लगा। सारे नौकर-चाकर दौड़े, आया दौड़ी। सभी बच्चे को चुप कराने का प्रयास करने लगे। जब उसने रोना बंद नहीं किया तो सेठ तथा सेठानी मेहमानों से क्षमायाचना करते हुए लाडले को चुप कराने में जुट गए। बच्चा था कि चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था। सेठ के डॉक्टर मित्र जो वहां मौजूद था, उसने बच्चे का डॉक्टरी जांच की, लेकिन सब कुछ ठीक-ठाक था। फिर भी बच्चे रोये जा रहा था।
अब मेहमान भी परेशान हो उठे। सभी बारी-बारी से बच्चे को चुप करने का उपाय करने लगे। एक महिला मेहमान ने सोने की साड़ी-पिन(ब्रोच) खोलकर बच्चे की हथेली पर रख दी। नेता-मंत्री मित्रों ने अपनी-अपनी टोपी उसके हवाले कर दी, अमीर मित्रों ने सोने की अंगूठी तथा सोने का फाउंटेन पेन दिखाई। कई घोड़े बने और बच्चे को अपनी पीठ पर लादकर घुमाया। छोटे-छोटे बच्चों ने भालू-बंदर की आवाज निकाली लेकिन सब व्यर्थ। जिद्दी बच्चे ने किसी भी चीज में अपनी रुचि नहीं दिखाई। रोता ही रहा।
अंत में पुलिस के एक बहुत बड़े अफसर तथा सेठ के जिगरी दोस्त ने अपनी जेब से पिस्तौल निकालकर बच्चे के हाथ में पकड़ा दी। बच्चा पिस्तौल थामते ही न केवल चुप हुआ, बल्कि खुशी के मारे उछलने भी लगा। सभी खुश थे कि बच्चे ने रोना बंद किया। पार्टी में जैसे जान आ गई।

संदेश

एक नोबेल पुरस्कार विजेता बाढ़ पीडि़तों की व्यथा-कथा जानने हेतु मिथिलांचल पहुंचा। व्यथा सुनने के बाद उसने सबसे एक ही प्रश्न पूछा, ”फिलवक्त आप लोग अपने भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं?” सबने एक ही उत्तर दिया, ”हमने सपने देखने छोड़ दिए।” पहले तो वह चकित हुआ, लेकिन जब अपने प्रश्न को उसने अन्य लोगों के समाने रखा तो तब भी उनके उत्तर एक-से थे।
पीडि़तों का साहस, धैर्य तथा सुख-दुख के प्रति उनका समत्व भाव देखकर वह दंग रह गया।
राजधानी वापस आने पर पत्रकारों ने उनसे पूछा, ”मिथिलावासियों के नाम कोई संदेश?”
उसने बड़े ही सहज भाव से उत्तर दिया, ”संदेश में क्या दूं? संदेश लेकर तो मैं वापस जा रहा हूं।”
”वह क्या?” पत्रकारों ने एक साथ प्रश्न किया।
”यही कि कम सपने देखने वाले अधिक सुखी रहते हैं।”

शुक्रगुजारी

 पति और पत्नी दोनों कोख में पल रहे बच्चे के लिंग को लेकर काफी चिंतित थे। इस बार वे किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। डॉक्टरी जांच के बाद पाया गया कि कोख में दो जुड़वा बच्चे हैं। एक लड़का और दूसरी लड़की। उन्होंने भगवान को याद किया और आभार प्रकट किया।
उधर, लड़की अपने भाई का तहे दिल से शुक्रिया अदा कर रही थी जिसकी वजह से उसकी जान बच गई।

फिर हम क्या करेंगे

”बापू कल क्या है?” रसिया ने अपने बापू से पूछा।
बापू ने जवाब दिया, ”बेटी, कल नया साल आनेवाला है।”
”नया साल आने से क्या होता है, बापू?”
रामसरूप जो ग्रेजुएट था, रिक्शा चलाकर आपने परिवार का निर्वाह करता था। परिवार में पत्नी तथा सात साल की बेटी रसिया थी। पत्नी भी सरकारी फ्लैटों में कामकाज कर थोड़ा-बहुत उपार्जन कर लिया करती थी।
रामसरूप ने बिटिया को समझाते हुए कहा, ”बेटी, बारह महीने का एक साल होता है और आज रात खत्म हो जाएगा। कल आनेवाले साल का पहला दिन होगा। लोग खुशियां मनाएंगे, मिठाई खाएंगे, नाचेंगे-गाएंगे…।”
”फिर हम क्या करेंगे, बापू?” रसिया की आंखों में चमक थी।
”तुम भी इस्त्री किया हुआ कपड़ा पहनकर अम्मा के साथ मेमसाहब के यहां चली जाना। वहीं नया साल मना लेना। ढेर सारी मिठाई खाना, खेलना-कूदना…।”
”लेकिन बापू, मैं उनके यहां कैसे जाऊंगी! अम्मा बता रही थी कि साहब और बच्चों के साथ मेमसाहब मोटरगाड़ी में कही घूमने जाएंगी। रात को देर से घर वापस आएंगी। फिर हम नया साल कैसे मनाएंगे?”
रसिया के चेहरे पर उदासी छायी हुई थी। रामसरूप ने ढाढ़स देते हुए कहा, ”कल ने सही, एक दिन बाद तो मिठाई मिलेगी। मेमसाहब के यहां तो रोज नया-नया पकवान बनता है…। अब खुश?”
रसिया चहक उठी, उल्लास से बोली, ”क्या मेमसाहब के यहां रोज नया साल आता है बापू।”

सेज

एक किसान ने सपने में देखा कि उसके खेत में धान, गेहूं, मक्का, बाजरा वगैरहा की जगह छोटी-छोटी मोटरों के पौधे उग आएं हैं। पहले तो चकित हुआ, लेकिन चारों ओर रंग-बिरंगी चमचमाती मोटर कार की फसलें देखकर खुशी से खिल उठा। उसने अपने पड़ोसी के खेतों पर नजर दौड़ाई तो सब ओर मोटर की ही फसलें लहलहा रही थीं। फिर सबने एक-दूसरे को यह खुशखबरी सुनाई और समय से मोटरें काटरक घर लाने लगे। घर के बच्चे-बढ़े-औरतें सभी खुश थे कि उनका खेत अब अन्न के बदले मोटरें उगलने लगा है।
मोटरें बेचकर वे आराम से गुजर-बसर करने लगे। खाने के लिए घर में अन्न-पानी था ही, कमी होने पर दूर के हाट-बाजार से मोटरों में भरकर ले आते।
कुछ महीने बड़े ही आराम से कटे। धीरे-धीरे सब तरफ आनाज की कमी होती गई, क्योंकि किसानों ने अब मोटरों की खेती शुरू कर दी थी। हालात कुछ ऐसे बदले कि अन्न के लाले पडऩे लगे किसानों के घर। फिर उन्होंने खेती में आग लगा दी ताकि मोटरों की फसल नष्टï हो जाए और वे फिर से खेतीबारी शुरू कर सकें। लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका। मोटरें जल तो गईं, लेकिन जमीन खेती के लायक नहीं रह पाई। लाख कोशिशों के बावजूद वे खेतों में अन्न नहीं उगा सके।
अब वे अपने खेतों की मिट्टी के भाव बेचकर कहीं और पलायान करने की सोच रहे थे।
अचानक किसान की नींद खुली और वह सीधा खेत की ओर दौड़ा, यह देखने केे लिए नहीं कि वहां अन्न की फसल लहलहा रही है या मोटरों की, बल्कि यह देखने के लिए कि कहीं उसकी जमीन मिट्टी के भाव तो नहीं बिक गई?

(लघुकथा संग्रह भगवान भरोसे से साभार)

One comment on “वीरेंद्र नारायण झा की लघुकथाएं

  1. arun sharma says:

    वाह साहब, दिल खुश हो गया है। चार लाइन की शुक्रगुजारी ने आसानी से वो बात कह दी जो घंटों के उपदेश के बाद भी नहीं समझाई जा सकती। सेज भी बहुत बढिया लगी।

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