
नई दिल्ली : पंजाबी के सुप्रसद्धि कवि सुरजीत पातर को सरस्वती सम्मान से नवाजा गया। यह सम्मान उन्हें उनके काव्य संग्रह लफ्जा दी दरगाह के लिए दिया गया है। इस पंजाबी कविता संग्रह का प्रकाशन वर्ष 2003 में हुआ था। 1945 में जन्मे कवि का पहला कविता संग्रह 1978 में हवा विच लिखे हर्फ प्रकाशित हुआ था। पातर पंजाबी के तीसरे लेखक और दूसरे कवि हैं, जिन्हें सरस्वती सम्मान से नवाजा गया। इससे पहले डा. दलीप कौर टिवाणा (उपन्यास) और डा. हरिभजन सिंह (कविता) को यह सम्मान मिल चुका है।
कवि सुरजीत पातर ने कहा कि यह वक्त भाषाओं और साहित्य के लिए खुशगवार समय नहीं है, क्योंकि यूनेस्को के सर्वेक्षणों के मुताबिक कितनी भाषाएं हर साल मर जाती हैं और उनके साथ मर जाते हैं उनके गीत, कहानियां, पहेलियां और लोकोक्तियां। सम्मान को अपनी मातृभाषा पंजाबी को समर्पित करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य व्यक्ति को उस ऊंचाई से देखना सीखाता है, जहां से हम हर एक के दुख को महसूस कर सकें। साहित्य पढऩे वाला एक जन्म में कई जन्म जी लेता है। उन्होंने कहा कि लिखना दुनिया से, समय से, कुदरत से और अपने आप से एक गहरी गुफ्तगू है।
पातर ने कहा कि कवियों की गुफ्तगू परमात्मा से भी होती है। गुरु नानक की वाणी में यह सतरें है, प्रभु मजलूमों गरीबों को इतनी यातनाएं सहनी पड़ती हैं। जालिम इतने जुल्म कर रहे हैं, क्या तुम्हें दर्द नहीं आता?
उन्होंने बताया कि मेरे एक विद्यार्थी ने मुझसे पूछा कि क्या परमात्मा ने गुरु नानक के सवाल का कोई जवाब दिया था कि वह सवाल आज भी क्षितिज के सीने में तीर की तरह चुभा है? मेरी अंतरआत्मा से आवाज आती है कि परमात्मा ने कहा होगा कि नानक तुम्हीं तो मेरे दर्द और दया की मूर्ति हो।
पातर ने कहा कि कभी साहित्य के हलकों में बात चलती है कि लोग कविता से दूर जा रहे हैं। लोग कविता से दूर जा रहे हैं या कविता लोगों से दूर जा रही है? मुझे लगता है यदि कविता लोगों को अपने दिल में जगह देगी तो लोग भी जरूर कविता को अपने दिल में जगह देंगे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि यदि भाषाएं लोगों के बीच रुकावटें पैदा करती हैं तो कविता व्यक्तियों को जोडऩे का कार्य करती है। कवि व्यक्ति को हर दिन की जिंदगी का सम्मान करना सिखाता है। उन्होंने कहा कि मेरा गहरा विश्वास है कि लेखक, कवि और कलाकार आम लोगों से अलग होता है और कविता साहित्य की सबसे अलग विधा है, क्योंकि अनुभूति पर आधारित होती है। अभिव्यक्ति का यह माध्यम आहिस्ता-आहिस्ता खात्मे की ओर बढ़ रहा है।
केके बिरला फाउंडेशन के 19वें सरस्वती सम्मान-2009 के रूप में सुरजीत पातर को साढ़े सात लाख रुपए नकद और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। पिछले साल तक पुरस्कार की राशि पांच लाख रूपए थी।
पातर ने कहा कि कवियों की गुफ्तगू परमात्मा से भी होती है। गुरु नानक की वाणी में यह सतरें है, प्रभु मजलूमों गरीबों को इतनी यातनाएं सहनी पड़ती हैं। जालिम इतने जुल्म कर रहे हैं, क्या तुम्हें दर्द नहीं आता?
उन्होंने बताया कि मेरे एक विद्यार्थी ने मुझसे पूछा कि क्या परमात्मा ने गुरु नानक के सवाल का कोई जवाब दिया था कि वह सवाल आज भी क्षितिज के सीने में तीर की तरह चुभा है? मेरी अंतरआत्मा से आवाज आती है कि परमात्मा ने कहा होगा कि नानक तुम्हीं तो मेरे दर्द और दया की मूर्ति हो।
पातर ने कहा कि कभी साहित्य के हलकों में बात चलती है कि लोग कविता से दूर जा रहे हैं। लोग कविता से दूर जा रहे हैं या कविता लोगों से दूर जा रही है? मुझे लगता है यदि कविता लोगों को अपने दिल में जगह देगी तो लोग भी जरूर कविता को अपने दिल में जगह देंगे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि यदि भाषाएं लोगों के बीच रुकावटें पैदा करती हैं तो कविता व्यक्तियों को जोडऩे का कार्य करती है। कवि व्यक्ति को हर दिन की जिंदगी का सम्मान करना सिखाता है। उन्होंने कहा कि मेरा गहरा विश्वास है कि लेखक, कवि और कलाकार आम लोगों से अलग होता है और कविता साहित्य की सबसे अलग विधा है, क्योंकि अनुभूति पर आधारित होती है। अभिव्यक्ति का यह माध्यम आहिस्ता-आहिस्ता खात्मे की ओर बढ़ रहा है।
केके बिरला फाउंडेशन के 19वें सरस्वती सम्मान-2009 के रूप में सुरजीत पातर को साढ़े सात लाख रुपए नकद और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। पिछले साल तक पुरस्कार की राशि पांच लाख रूपए थी।


लिखना दुनिया से, समय से, कुदरत से और अपने आप से एक गहरी गुफ्तगू है।…..सच कहा