4 फरवरी, 1964 को जन्में कॉकबोरोक (त्रिपुरी) के लेखक नरेन्द्र देवबर्मा के कई कविता संग्रह, कहानी संग्रह और बच्चों के नाटकों की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी इस कहानी का भाषांतरण स्मिता देवबर्मा ने किया है-
बचपन से ही मुझे दूसरों की शादी-ब्याह में जाने की आदत तो है नहीं। फिर भी समतिया भैया का अनुरोध टाल नहीं सका और मुझे उनकी बेटी के ब्याह मे जाना पडा़। इस ब्याह में जाकर जो मैंने देखा, उसे अभी तक भूल न सका। शादी-ब्याह का अनुष्ठान रीति-रिवाज के साथ बहुत धूमधाम और खुशी-खुशी सम्पन्न हुआ। भैया समतिया ने गरीब होने के बावजूद अनुष्ठान में किसी भी चीज की कमी नहीं छोडी़। खान-पान की व्यवस्था में देखभाल करने का दायित्व मुझे सौंपा। मैंने ठीक तरह से इस दायित्व को निभाया। भैया समतिया शादी-ब्याह के बीच-बीच में खाने-पीने की भी खोज खबर लेते रहते और मुझसे कहते है, ‘‘तुम्ही मेरे हाथ-पाँव और आँख-कान हो। जितना है तुम्हीं को सम्भालना है और देखना है कि किसी चीज की कमी न रहे।
उन की बातों को सुनकर मुझे और भी होशियारी से इस दायित्व को देखना पडा़।
उधर शीतकाल का सूर्य अपने घर जाने की तैयारियाँ कर रहा था। मैं भी अपनी थकावट को दूर करने के उद्देश्य से उस जगह को छोड़कर घर के सामने वाले बडे़ आँगन की ओर आया तो देखा आँगन के चारों ओर घेरा डाल कर लोग न जाने क्या देख रहे थे। तभी देखा एक औरत बच्चा गोद मे लिये भीड़ चीरती हुई बाहर निकल आई और बड़बडा़ई, ‘‘न कभी देखी, न सुनी ऐसी अनहोनी करतूतें (करामत)।’’ मैंने उससे पूछा, ‘‘क्या हुआ बहन? वहाँ क्या हो रहा है?’’ मेरी बातों का कोई उत्तर न देकर वह औरत अपने आपसे कहती है, ‘‘ये भी कोई बात हुई, शादी की अपनी मर्जी से और अब ससुराल जाना नहीं चाहती। फिर शादी की ही क्यों?’’
‘‘हुआ क्या?’’ ऐसा कह मैं भीड़ को चीर के आगे बढ़ गया। जाने पर देखा, नई दुल्हन रूडमारी सभी के बीचों-बीच खडी़ बातों का जवाब दे रही थी। वहाँ गाँव के मुखिया अंजूराय कोई सवाल (दुल्हन से) कर रहे थे, ‘‘बेटी, सचमुच तुम ससुराल नही जाओगी?’’
‘‘कहा ना ताऊ जी मैं न जाऊँगी।’’ रूडमारी ने जवाब दिया। ‘‘क्यों जाना नहीं चाहती?’’ अंजूराय ने सवाल किया।
‘‘मैं ऐसे ही नहीं जाऊँगी। जाने की इच्छा नहीं है। इसलिये नहीं जाऊँगी।’’ रूडमारी फटाफट जवाब देती है।
‘‘फिर तुमने शादी क्यों की?’’ दादा अंजूराय ने पूछा।
‘‘मैंने अपनी मर्जी से ही शादी की है।’’ रूडमारी ने उत्तर दिया। ‘‘अपनी मर्जी से ही शादी की है तो अब ससुराल क्यों जाना नहीं चाहती?’’
‘‘मेरा मन नहीं चाहता इसलिये नहीं जाऊँगी। यही मेरा आखिरी फैसला है। इससे ज्यादा मैं कुछ कहना नहीं चाहती।’’ रूडमारी ने कठोर जवाब दिया। रूडमारी के इस जवाब को सुनकर अंजूराय के पास उसे कहने के लिये कुछ बात न रही।
मैंने कुछ कहना चाहा तो रूडमारी ने रोकते हुये कहा, ‘‘काका, आप बीच में न कहें तो ज्यादा अच्छा होगा।’’ उसके बाद मैंने भी कुछ कहने की जरूरत नहीं समझी। चुपचाप खडा़ रहा। रूडमारी की माँ इस तमाशे को देखकर जोर-जोर से रोने लगी और कहने लगी, ‘‘मेरी बेटी को किसकी बुरी नजर लग गई जो अनाप-सनाप बकती जा रही है।’’
रूडमारी के पिता समतिया कहने लगे, ‘‘कहाँ की बुरी नजर पड़ गयी। एक-दो डंडे पडे़ंगे तो अपने आप ठीक हो जायेगी।’’ तभी वहाँ उपस्थित सभी लोग कहने लगे, ‘‘ऐसे नहीं चलेगा। दूल्हे को बुलाओ। वो आकर जो कुछ करे करने दो। तब कई लोगों ने दूल्हे को बुलाया।
जल्दी जाकर नहीं बैठने से सीट न मिलेगी, ऐसा सोच कर दूसरी तरफ कुछ बाराती जीप गाडी़ में पहले से ही बैठे हुये थे। पहले से ही जीप के दोनों टेलर में दहेज में दी गई सभी वस्तुएं जैसे- पंलग, अलमारी, टीवी, फ्रिज, सोफा आदि बाँध कर रख दिया गया। गाडी़ में बैठे लोग इन्तजार करते-करते थककर गुस्सा जाहिर करने लगे। दूल्हे का नाम रमेन। वह पढा-लिखा है और सरकारी नौकरी करता है। सुनते ही फटाफट आया और साफ शब्दों में पूछने लगा, ‘‘रूडमारी, क्या तुम सचमुच ससुराल जाना नहीं चाहती।’’
‘‘सच नही तो क्या मैं मजाक कर रही हूँ।’’
रूडमारी का यह खुले विचार का जवाब सिर्फ रमेन को ही नहीं, वहाँ उपस्थित सभी लोगों को आश्चर्यचकित कर देता है।
‘‘क्यों नहीं जाओगी तुम।’’ रमेन ऊँची आवाज में फिर पूछता है।
‘‘मेरा दिल नहीं चाहता।’’ रूडमारी ने जवाब दिया।
‘‘ये भी कोई बात हुई। तो फिर शादी क्यों की?’’
‘‘मेरे दिल ने चाहा इसलिये की।’’
‘‘ऐसी बात बनाने से नहीं चलेगा। तुमको कहना ही पडे़गा, क्यों जाना नहीं चाहती।’’
‘‘तुम मुझमे प्यार नहीं करते।’’ रूडमारी के इस जवाब से सभी को आश्चर्य हुआ। किसी के मुँह से आवाज नहीं निकली। केवल एक-दूसरे की ओर देखते रहे।
‘‘मैं तुमसे प्यार नहीं करता।’’ रमेन के मुँह से आवाज निकलती है, ‘‘मै तुमसे प्यार नहीं करता तो फिर आकर शादी ही क्यों करता।’’
‘‘मैं जानती हूँ, तुम मुझसे प्यार नहीं करते।’’ रूडमारी बोलती है।
‘‘तुम्हें कैसे पता? तुम्हें बताना पडे़गा।’’ रमेन ने ठोस शब्दों में कहा।
‘‘तो सुनो।’’ रूडमारी ने कहना आरम्भ किया, ‘‘पिछले वर्ष तुम्हारे साथ मेरा ब्याह करने की तारीख तय हो चुकी थी। क्या ये सच नहीं है?’’ रमेन ने सर हिलाकर ‘हाँ’ किया। ‘‘तब तुमने शादी नहीं की क्योंकि दहेज में जो कुछ तुमने माँगा वो सब मेरे पिता जी पूरा नहीं कर पाये। इस साल मेरे पिता जी ने अपनी दो बीघा जमीन बेचकर तुम्हारी माँगें पूरी कीं। आज इस वजह से तुमने मुझसे शादी की। तुमने तो मुझसे प्यार ही नहीं किया। प्यार है तो सिर्फ दहेज से। अगर मुझसे प्यार होता तो पिछले साल ही बिना दहेज के मुझसे शादी करते।’’
रूडमारी के इस कथन से सभी प्रभावित होकर एक-दूसरे के कान में फुसफुसाने लगे।
तब मैं भी चुप न रह सका। बीच में खडा़ होकर कहना पडा़, ‘‘सुनो रमेन, सुनो भाइयो और बहनों, दूसरों को देखकर दहेज लेने और देने की जो प्रथा हमने शुरू की है हमारे समाज में वह ठीक नहीं। घर में अगर एक बेटी हो तो भी माता-पिता की चिन्ता की सीमायें खत्म नहीं होती। घर, जमीन-जायदाद बेचकर दहेज देने का नियम शुरू किया। हमारे समाज में जो नियम चालू हुआ है वह एक बीमारी की तरह फैला हुआ है। इस बीमारी को हमें ही रोकना पडे़गा। नहीं तो हमारे समाज में अंधेरा फैल जायेगा।’’
मेरी इस बात पर सहमति देते हुए सभी ने समर्थन दिया। तब रमेन ने रूडमारी के करीब जाकर उसके दोनों हाथ पकड़ के अपने सीने पर रख कर कहा, ‘‘रूडमारी, तुम सच में रूडमारी हो। रूडमारी का अर्थ है ज्ञानी। आज तुमने मुझे सचमुच बहुत अच्छी शिक्षा दी। मुझे भी दहेज प्रथा पसन्द नहीं है। समाज मुझे नीचा दिखायेगा, ऐसा सोचकर मैंने भी दहेज मांगा था। आज मैं तुम्हारा हाथ पकड़कर कसम खाता हूँ जितना भी दहेज में खर्च हुआ है, उसे में वापस कर दूँगा। साथ ही साथ मैं आशा करता हूँ कि तुम जैसी लडकियाँ हमारे समाज मैं पेदा हों तो दहेज प्रथा हमारे समाज में और ज्यादा दिन रह नही पायेगी।’’



लेखक को शुभकामनाएं…
दहेज का श्राप अन्ततः सबको लगता है, अच्छा यही होगा कि इसे समाज से शीघ्र विदा किया जाये।
लेखक को शुभकामनाएं…