मेरी जिंदगी में बच्चे : सुधीर सुमन

छुटकू बच्चे की शक्ल से मिलती तस्वीर।

लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन को हाल ही में दो बच्चे मि‍ले। ये बच्‍चे जिस तरह से मिले, उसे याद करते हुए लिखा गया लेख-

बच्चे मेरी जिंदगी की ऊर्जा रहे हैं। हमेशा बच्चों के बीच घिरा रहा हूँ। कुछ पढ़ाकू छवि होने के कारण और ज्यादा बच्चों से लगाव होने के कारण अक्सर माता-पिता मुझसे ही उनका नाम रखने की गुजारिश करते थे। करीब 20-25 बच्चों का नामकरण मैंने किया ही होगा। आज भी कोई न कोई ऐसा आग्रह कर ही देता है। कितने शिशु मेरी बाहों में झुलते हुए, मेरे कंधे पर सैर करते हुए बड़े हुए। हमारे यहाँ एक गीत जो बच्चों को झुलाते हुए अक्सर गाया जाता था- तोरा मइया न डोलावे, तोरा बप्पा न डोलावे तोरा हमहीं डोलाईं, वह तो जैसे पूरी तरह से हकीकत रहा है।

किशोर उम्र में मैंने ‘बच्चों के बारह उपन्यास’ नामक एक किताब पढ़ा था, जिसमें एक उपन्यास की कथा पराग नाम के एक बच्चे के बारे में थी। कहानी तो काल्पनिक थी, पर कल्पना ऐसी थी, जिसने मुझ पर गहरा असर छोड़ा था। पराग की उम्र बढ़ती नहीं, वह अमर है। और यह अमरता ही उसके लिये गहरे दुख और अवसाद की वजह बन जाती है। उसके साथी बच्चे बड़े होते हैं, बूढे़ होते हैं, फिर मर जाते हैं। जो नये बच्चे आते हैं, वे उसके दोस्त बनते हैं। लेकिन एक वक्त ऐसा आता है, जब वह अपनी अमरता को अभिशाप समझने लगता है और जिस लड़की से वह गहरा स्नेह करता है, उसके मरने के बाद वह भीषण पीड़ा से भर उठता है और अमरता से मुक्ति चाहता है। शायद हू ब हू कथा इसी रूप में न हो, पर इसी रूप में मेरी स्मृति में बची हुई है। कभी-कभी लगता है कि वह पराग मेरे भीतर बैठा हुआ है। फिर भी मैं उसकी तरह मुक्ति नहीं चाहता। मैं बच्चों की आँखों से इस दुनिया को लाखों बार देखना चाहता हूँ। उनके साथ उनकी भाषा में बात करना चाहता हूँ।

मैं शुक्रगुजार हूँ उन मां-बापों का जिन्होंने मेरे वात्सल्य पर यकीन किया और उन बच्चों का जिन्होंने मुझे बेहद प्यार किया। आज तो बच्चे बड़ों की महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिये ऐसे रेस में झोंक दिये जा रहे हैं, कि उनका बचपन समय से पहले ही खत्म हो जाता है। ऐसे माहौल में हाल में दो बच्चे मुझे कुछ इस तरह मिले कि मैं भूल नहीं पाया। एक तो बिल्कुल नन्हा-सा शायद साल-डेढ़ साल का होगा, गोरा-चिट्टा, मुस्कुराता हुआ, आँखों में अजीब सी शरारत भरी थी जिसकी। मेट्रो की लाइन में खड़ा था तो पीछे से किसी ने मेरी शर्ट खींची। मैंने पीछे मुड़के देखा  तो पाया महाशय मेरी शर्ट पर अपनी उंगलियों की जबर्दस्त पकड़ बनाये हुए हैं। मैंने पकड़ बनाये रहने दी। मेट्रो के अंदर घुसने तक उन्होंने शर्ट नहीं छोड़ा। लेकिन उनकी माता जी को सीट मिल गई  तो उन्हें मेरी शर्ट छोड़नी पड़ी। फिर भी उनकी आँखें मेरा पीछा करती रहीं। जब मैं अपने स्टेशन पर उतरा तो देखा महाशय शीशे से मुझे देख रहे हैं। मैंने गर्मजोशी से बाय किया, मेट्रो चली गई, पर उन्होंने हमेशा के लिये स्मृति में जगह बना ली। ठीक वैसे ही बच्चे की शक्ल मेरी एक फेसबुक फ्रेंड के वॉल पर जाने पर दिखती है।

मनमोहक मुस्कान के साथ जाह्नवी।

दूसरी दिलचस्प मुलाकात सात साल की एक बच्ची से लखनऊ जाते वक्त गोमती एक्सप्रेस में हुई। मैं अपनी सीट पर बैठ चुका था। ट्रेन खुलने से पहले मेरी सीट की बगल में एक दंपत्ति अपनी दो बच्चियों के साथ आये। मेरी सीट खिड़की के पास थी। मेरे ठीक विपरीत साइड की खिड़की पर वे दोनों बच्चियां बैठ गईं। अचानक मेरे आगे की सीट पर एक और बच्ची का सिर उभरा, उसने मुझे देखा, मैंने उसे देखा। मैं मुस्कुराया, वह भी मुस्कुराई। मगर कहीं थोड़ी सी हिचक थी। पहले तो उसने मेरे बगल वाले दंपत्ति को दूसरे साइड की सीट पर भेजा, वहाँ से उनकी बच्चियों को अधिकारपूर्वक बुलाया और फिर लगे खेलने। एक खेल था- पिकाचू, जिसमें हारने वाले का गाल पकड़कर खींचा जाता है। हमारी चंचल, चपल सहयात्री ने अपना नाम जाह्नवी बताया, उसके साथ यह सूचना जोड़ते हुए कि यह नाम उनकी दादी माँ ने रखा था। मेरे पूछने पर उन्होंने जाह्नवी का अर्थ भी बताया, फिर से इस सूचना के साथ कि उनकी दादी माँ ने बताया है कि जाह्नवी का अर्थ गंगा होता है। खैर, जाह्नवी अद्भुत ऊर्जा से भरी थीं। थकान का नामोनिशान उनके चेहरे पर नहीं आ रहा था। उन्होंने जो नये दोस्त बनाए थे, वे थोड़ी देर रुकना चाहते थे, पर उनका खेल- पिकाचू थम ही नहीं रहा था। तेज गति से हथेलियों का टकराना, फिर कैंची और पत्थर की शक्ल में मुद्राएं और हारने वाले के गालों को खींचना। और साथ ही यह भी बताना कि अंकल गाल खींचने में कितना मजा आता है न! खेल से थोड़ा डायवर्ट हुईं तो अंत्याक्षरी शुरू कर दी और साबित कर दिया कि उनका अंग्रेजी के शब्दों का ज्ञान सबसे अधिक है, अपने बड़े गोल मटोल भाई से कहीं अधिक, जो खेल में उनका साथ देने को मजबूर थे। उनके पिता बस एकाध बार उन पर निगाह डाल ले रहे थे। उनकी माँ दूसरी साइड की चेयर पर अपने ही ख्यालों में खोई हुई थीं। बाकी गोमती के चेयर कार डिब्बे का मेरे ठीक सामने का चेयर तो मानो जाह्नवी का घोड़ा था, जिसकी लगाम हाथ में लिये वह उसे दौड़ाए लिये जा रही थीं।

गोमती एक्सप्रेस अपने नियत समय से देर होती जा रही थीं, लेकिन हमारी जाह्नवी तो समय को अपने हिसाब से नचा रही थीं। हमारी बातचीत शुरू हो चुकी थी। अचानक उन्होंने मेरी ओर पाँच-छह पॉपकार्न बढ़ाए, मैंने कहा- तुम खाओ। वह कहाँ मानने वाली थीं। उन्होंने मेरे हाथों में मौजूद किताब को बंद किया और उस पर पॉपकार्न रख दिये। अब मैं क्या करता, मैंने तो खा लिये। फिर कुछ देर बाद मैंने आलू भुजिया देना चाहा, पर उन्होंने मना कर दिया। लेकिन कुछ देर बाद ही उनकी बंधी हुई मुट्ठी हल्की सी ढीली हुई, गोकि उनका चेहरा कोई देखता तो उसे लगता कि उनका ध्यान कहीं और हैं, पर मैंने संकेत समझ लिया। मैंने सबकी आँख बचाकर आलू भूजिया उनकी नन्हीं हथेलियों में रख दी। उन्होंने कनखियों से अपने पिता की ओर देखा, उनका ध्यान कहीं और था। और वह इस तरह अपनी हथेलियों को अपने मुँह तक ले गईं, मानो बस यूँ ही हथेलियाँ उधर चली गई हों। और किसी को पता नहीं चल पाया। बल्कि भाई ने ताड़ने की कोशिश की, पर उन्होंने उसे डॉज दे दिया। कमाल यह था कि यह मुद्रा उन्होंने चार-पाँच बार दुहराई और किसी को पता नहीं चला कि हम दोनों अपने खाने की वस्तुएं शेयर कर रहे हैं।

मुझे अगले दिन साथी मदन मोहन के उपन्यास पर कार्यक्रम का संचालन करना था। मैं दुबारा उनके उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ को पढ़ लेना चाहता था। लेकिन जाह्नवी के थपेड़े न केवल कभी-कभी मेरे माथे पर लग रहे थे, बल्कि वे किताब के पन्नों को भी गड्डमड्ड कर दे रहे थे। अचानक किताब ही उनके कब्जे में चली गईं और उन्होंने उसके अंदर के आखिरी कवर पर अपने मां-पिता का मोबाइल नम्‍बर लिखा। यह भी लिखा कि माई नेम इज जाह्नवी। मुझे लगा कि यह नटखट कहीं अपने माँ-बाप के लिये मुश्किल न पैदा कर दे। मैंने तुरत उन्हें अपना परिचय दिया और बताया कि जब मैं लखनऊ फिल्म फेस्टिवल में आऊँगा तो आपको फोन करूँगा। बच्चों के लिये जब फिल्में दिखाई जायेंगी तो आपलोग जाह्नवी को लेकर आइयेगा। फिल्मों का नाम सुनते ही जाह्नवी अपने सवालों के साथ तैयार हो गईं। लेकिन ट्रेन लखनऊ में दाखिल हो चुकी थी। मुझे लग रहा था कि मेरी अगली ट्रेन छूट न जाये। मैं अपना सामान व्यवस्थित करने लगा। जाह्नवी इसे लेकर परेशान थीं कि अंकल कहाँ ठहरेंगे। मैंने चुटकी ली- आपके यहाँ ठहर जाऊँगा। वे बोलीं- नहींऽऽ। स्टेशन पर ट्रेन के लगते ही मुझे तेजी से भागना पड़ा। एक हड़बड़ी की विदाई ली, इस उम्मीद के साथ कि हम फिर मिलेंगे।

One comment on “मेरी जिंदगी में बच्चे : सुधीर सुमन

  1. ऐसे प्रसंग जीवन को उत्‍साह और उमंग से सराबोर कर जाते हैं।

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