सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक बबन पाण्डेय की पहली कविता ‘मन का दर्द’ 1980 में पटना से प्रकाशित पत्रिका ‘पहुँच’ में प्रकाशित हुई। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कई कवितायें प्रकाशित हो चुकी हैं। बिहार सरकार के जल-संसाधन विभाग में सहायक अभियंता बबन पाण्डेय की तीन कवितायें-
ओ मेघ ! तू बरस
ओ मेघ ! तू बरस
घनघोर बरस
तू उनके लिये बरस
जिनके कुएँ
सरकारी पन्नों पर बने हैं।
ओ मेघ ! तू बरस
घनघोर बरस
फाड़ दे
जनता के कान पर जमे
भाषणों और आश्वाूसनों की काई को।
ओ मेघ ! तू बरस
घनघोर बरस
इतना बरस
टूट जाये तटबंध नदियों के
खोल दे पोल
इंजीनियरों और ठेकेदारों की मिलीभगत की।
विटामिन की गोलियाँ
आज नहीं रुक रही थी
फाइल पर उनकी कलम
नहीं खोज रही थी
उनकी आँखें
सेल्फ पर रखे
सरकारी नियमों की किताब
पैर में मानों
लग गये हों पहिये।
मैंने भी खाई है
विटामिन की गोलियाँ
मगर उसमे नहीं होती
नोटों की गड्डियों जैसी ऊर्जा।
हँसने के पीछे का राज
हँसी नहीं आ रही है
कई सालों से मुझे
भूल गया हूँ
कब हँसा था खिलखिलाकर पिछली बार।
हास्य-क्लब ज्वाइन किया
वहाँ तो लोग
हँसते कम हैं
दाँत निपोरते ज्यादा हैं।
सम्बन्धियों के यहाँ गया
सोचा हँस लेंगे सब मिलकर
मगर
हँसी नाम की चिड़ियाँ उड़ चुकी थी।
हँस कर स्वागत करते हैं
दुकानदार, जब सामान खरीदता हूँ
एजेंट, जब पालिसी लेता हूँ
गर्ल फ्रेंड, जब पार्टी लेती है
पत्नी, जब गहने खरीदना हो
मित्र, जब उधार लेना हो।
क्या हँसी
अब व्यवसाय बन चुकी है।



वैसे तो बबन जी प्रेम कवितायेँ अधिक लिखते हैं , पर ये कवितायेँ कुछ अलग ही है सशक्त और दमदार रचनाओं के लिए बधाई .
तीनों कवितायें बड़े गहरे उतरती हैं..मन में..
ACHCHHEE KAVITAAYON KE LIYE BABAN JI KO BADHAAEE AUR SHUBH KAMNAAYEN .
मैं नित्यानंद जी का आभारी हूँ , जिन्होंने
मुझे इस ब्लॉग के बारे में बताया … मैं लेखक मंच ब्लॉग के administtrator को भी बधाई दे रहा हूँ