ग़ज़लकार, कहानीकार और समीक्षक प्राण शर्मा का जन्म वजीराबाद (पाकिस्तान) में 13 जून 1937 को हुआ। प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में हुई और पंजाब विश्वविद्यालय से एम. ए., बी.एड. किया। वह 1965 से यू.के. में प्रवास कर रहे हैं। उनकी दो पुस्तकें ‘ग़ज़ल कहता हूँ’ व ‘सुराही’ (मुक्तक-संग्रह) प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अलावा ‘अभिव्यक्ति’ में प्रकाशित ‘उर्दू ग़ज़ल बनाम हिन्दी ग़ज़ल’ और ‘साहित्य शिल्पी’ पर ‘ग़ज़ल: शिल्प और संरचना’ के 10 महत्वपूर्ण लेख हैं। उनकी तीन गज़लें-
1.
कुछ नया करके दिखाने को मचलता रहता है
मेरा ऐसा दोस्त है जो घर बदलता रहता है
धुन का पक्का कुछ न कुछ तो होता है वो साहिबो
मीठे फल के जैसा जिसका भाग्य फलता रहता है
पहले जैसा तो कभी रहता नहीं वो दोस्तो
धीरे-धीरे आदमी का मन बदलता रहता है
किसलिए ए दोस्त अपने दिल को हम छोटा करें
ज़िन्दगी में घाटे का व्यापार चलता रहता है
ये ज़रूरी तो नहीं औरों की खुशियाँ देख कर
हर बशर ही द्वेष की ज्वाला में जलता रहता है
ज़लज़ले या आधियाँ, तूफ़ान या बरबादियाँ
कुछ न कुछ संसार में ए दोस्त चलता रहता है
`प्राण`कोई क्या करेगा उसकी नीयत पर यक़ीन
रंग गिरगिट की तरह वो तो बदलता रहता है
2.
उड़ते हैं हज़ारों आकाश में पंछी
ऊँची नहीं होती परवाज़ हरिक की
होना था असर कुछ इस शहर भी उसका
माना कि अँधेरी उस शहर चली थी
इक डूबता बच्चा कैसे वो बचाता
इन्सान था लेकिन हिम्मत की कमी थी
इक शोर सुना तो डर कर सभी भागे
कुछ मेघ थे गरजे बस बात थी इतनी
सूखी सी जो होती जल जाती वो पल में
कैसे भला जलती गीली कोई लकड़ी
दुनिया को समझना अपने नहीं बस में
दुनिया तो है प्यारे अनबूझ पहेली
पुरज़ोर हवा में गिरना ही था उसको
ए ‘प्राण’ घरों की दीवारें थी कच्ची
3.
चेहरों पर हों कुछ उजाले सोचता हूँ
लोग हों खुशियों के पाले सोचता हूँ
तन के काले हों भले ही दुःख नहीं है
लोग मत हों मन के काले सोचता हूँ
हो भले ही धर्म और मजहब की बातें
पर बहें मत खूं के नाले सोचता हूँ
वक़्त था जब दर खुले रहते थे सबके
अब तो हैं तालों पे ताले सोचता हूँ
ढूँढ लेता मैं कहीं उसका ठिकाना
पाँव में पड़ते न छाले सोचता हूँ
सावनी ऋतु है, चपल पुरवाइयाँ हैं
क्यों न छायें मेघ काले सोचता हूँ
‘प्राण’ दुःख आये भले ही ज़िन्दगी में
उम्र भर डेरा न डाले सोचता हूँ



तीनो ही गज़लें बेशकीमती…………हर शेर ज़िन्दगी की तल्खियों से मिलवा जाता है और हकीकत का आभास करा जाता है…………सादगी से गहरी बात कह देना ही आदरणीय प्राण शर्मा जी की कलम का कमाल है…………मुझमे कहाँ इतनी शक्ति जो कुछ कह सकूँ सिवाय इसके कि हम उन्हे पढकर अनुग्रहित होते हैं।
पहले जैसा तो कभी रहता नहीं वो दोस्तो
धीरे-धीरे आदमी का मन बदलता रहता है
किसलिए ए दोस्त अपने दिल को हम छोटा करें
ज़िन्दगी में घाटे का व्यापार चलता रहता है…
वाह क्या बात है. तीनों गज़लें हमेशा की तरह दिल को छूने वाली हैं, मगर पहली गज़ल के हर शेर….भुलाये नहीं भूलेंगे. शुभकामनायें..
प्राण शर्मा जी को समय-समय पर पढ़ता रहा हूँ। जितने अच्छे इंसान, उतने ही अच्छे कवि भी। उनकी ग़ज़लों में कोई-न-कोई चिंतन अवश्य होता है। आज भी निराश होकर नहीं जाना पड़ रहा है…उन्हें बधाई!
`प्राण`कोई क्या करेगा उसकी नीयत पर यक़ीन
रंग गिरगिट की तरह वो तो बदलता रहता है…waah…
Teeno bemisaal gazlen … Pran Sahab ki khoobi hai sheron mein gahri baat karna …
प्राण साहिब की ये ग़ज़लें पढ़कर अच्छा लगा। यह शे’र तो बहुत भाया-
तन के काले हों भले ही दुःख नहीं है
लोग मत हों मन के काले सोचता हूँ
इस शेर को पढ़कर वाह न निकले, ऐसा हो ही नहीं सकता।
एक से बढ़ कर एक गज़लें…आनन्द आ गया…
सावनी ऋतु है, चपल पुरवाइयाँ हैं
क्यों न छायें मेघ काले सोचता हूँ
क्या बात है!!!
आ. प्राण शर्मा जी की तीनों ग़ज़लें सुंदर हैं
पहले जैसा तो कभी रहता नहीं वो दोस्तो
धीरे-धीरे आदमी का मन बदलता रहता है
***
होना था असर कुछ इस शहर भी उसका
माना कि अँधेरी उस शहर चली थी
***
तन के काले हों भले ही दुःख नहीं है
लोग मत हों मन के काले सोचता हूँ
जिन ग़ज़लों में ऐसे खूबसूरत अशआर पिरोये गए हों उनके बारे में क्या कहा जाए? किन लफ़्ज़ों में तारीफ़ की जाय…प्राण साहब की ग़ज़लें सीधी सरल ज़बान में इंसान को सोचने को मजबूर करती हैं उसे और अच्छा बनने का आग्रह करती हैं…उनकी ग़ज़लों में समाज के बदलते हालात से होने वाली परेशानियाँ दुःख तकलीफें झलकती हैं…वो इस बदलाव के खिलाफ नहीं हैं बल्कि सकारात्मक बदलाव के हिमायती हैं. उन्हें पढना हमेशा अच्छा लगता है. इश्वर उन्हें सदा स्वस्थ रखे.
नीरज
प्राण जी !
निसंदेह आप एक उच्चकोटि के गज़लकार हैं ! आपकी किस गज़ल को अधिक और किसको कम अच्छा कहें ! सभी अशआर एक से बढ़ कर एक हैं !
सूखी सी जो होती जल जाती वो पल में
कैसे भला जलती गीली कोई लकड़ी…………. बहुत सारगर्भित बात कही है आपने !
पुरज़ोर हवा में गिरना ही था उसको
ए ‘प्राण’ घरों की दीवारें थी कच्ची………अतिसुन्दर सच !
अशेष सरहना के साथ
दीप्ति
तीनो ही गजले बहुत अच्छी लगीं | एक- एक शेर उम्दा है | किसे सराहें , किसे छोड़े ….
इला
प्राण जी की तीनों ही गज़ले अद्भुत हैं–मन को छू लेने में सक्षम.
रूपसिंह चन्देल
प्राण जी, बधाई ! तीनों ग़ज़लों में ज़िन्दगी लिख दी!
महेंद्र
Sorry, no moderation! This is my heartfelt response!!
Mahendra.
aapne jo apni gajalon ke madhyam se jo jivan ki sachchai ka sach ukera hai vo vastav me sarahneey hai…mai isse jyada kya kahu..mere liye to yah chhote muh badi bat wali kahabat sidah ho jayegi….atah mai age kya kahu…mai asha karta hu ki aap yun hi gajlo ke madhyam se samaj ko apni lekhni ki tankar se sadaiv madhur pan karte rahenge …apka subhechhu……..
teeno gazalen sundar hain . dil se utthee aavaaz sada nishane par padtee hai . bahut badhaaee . bane rahiye .
bahan kadambari