जैनेन्द्र और अज्ञेय पर फ्रायड का प्रक्षेप: संजीव कुमार

 

युवा आलोचक संजीव कुमार को इस वर्ष का देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार उनकी आलोचना-पुस्तक ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ के लिए 5 अप्रैल को प्रदान किया जाएगा। प्रेमंचदोत्तर मनोवैज्ञानिक उपन्यास के अकादमिक पठनों की पड़ताल करता यह आलेख उनकी पुरस्कृत पुस्तक के पहले अध्याय का संशोधित-परिवर्धित रूप है, जिसे कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के अज्ञेय जन्मशती संगोष्ठी में प्रस्तुत किया गया था-

यह अध्ययन हिंदी की मनोवैज्ञानिक उपन्यास धारा के दो प्रमुख स्तम्भों- जैनेन्द्र और अज्ञेय-पर मनोविश्लेषण के प्रभाव से संबंधित स्थापनाओं के परीक्षण की एक कोशिश है। जैनेन्द्र और अज्ञेय प्रेमचंदोत्तर दौर के सबसे प्रमुख उपन्यासकारों में गिने जाते हैं। इनके महत्व का एक बड़ा आधार ये है कि इन्होंने प्रेमचंद से बिल्कुल अलग तरह की उपन्यास-कला को हिंदी में संभव किया और ऐसा करते हुए हिंदी में मनोवैज्ञानिक उपन्यास धारा के प्रवर्तक बने।
हिंदी की अकादमिक आलोचना में प्रेमचंदोत्तर मनोवैज्ञानिक उपन्यास धारा की मुख्य प्रेरणा फ्रायडीय मनोविश्लेषण को माना गया है। हिंदी साहित्य के इतिहासों और हिंदी उपन्यास के विकास के आख्यानों में लगभग निरपवाद रूप से यह बात दोहरायी गयी है कि प्रेमचंदोत्तर युग के शुरुआती सालों मोटे तौर पर (1936 से 1950-52 तक) में हिंदी उपन्यास में दो बिल्कुल अलहदा दिखने वाली प्रवृत्तियां उभरती हैं, जिनमें से एक के प्रेरणास्रोत मार्क्स हैं तो दूसरी के फ्रायड। इस दूसरी प्रवृत्ति के साथ जैनेन्द्र, अज्ञेय, इलाचंद्र जोशी और देवराज के नाम जुड़े हुए हैं।
यह बात ग़ौर करने की है कि मनोवैज्ञानिक उपन्यास के साथ जुड़े हुए चार नामों में से जैनेन्द्र और अज्ञेय ही ऐसे रचनाकार हैं जिन पर इस उपन्यास धारा की प्रतिष्ठा टिकी हुई है और इनके उपन्यास किसी महत्वपूर्ण अर्थ में फ्रायडीय प्रभाव की ताईद नहीं करते। इन्हें फ्रायड से प्रेरित-प्रभावित धारा में नामज़द करने के लिए हिंदी की अकादमिक आलोचना को या तो आरोपण/प्रक्षेपण का तरीका इस्तेमाल करना पड़ा, जिसमें रचना और सिद्धांत दोनों में अपने तरीके से काट-छांट या जोड़-तोड़ करनी पड़ती है, या फिर सिद्धांत के साथ रचना का तालमेल बिठाने की चुनौती को अनदेखा करते हुए यह मान लेना पड़ा कि मानव-मन की गतिकी में विशेष रुचि अपने-आप में फ्रायडीय प्रभाव का सबूत है। बाद वाले तरीके के मुरीदों ने मनोवैज्ञानिक उपन्यास-धारा का निर्धारण करते हुए उसके प्रेरक के रूप में फ्रायड, साथ में युंग और ऐडलर की चर्चा तो की, लेकिन उपन्यासों के विवेचन के मौके पर उनसे किनारा कर लेने का सुरक्षित रास्ता चुना। यहां हम आरोपण की कोशिशों के कुछ नमूने देखेंगे, मुख्यतः ‘सुनीता’ (जैनेन्द्र,  1935) और ‘शेखर: एक जीवनी’ (अज्ञेय,  1941, 1943) के संदर्भ में। यह दिलचस्प है कि जैनेन्द्र और अज्ञेय के उपन्यासों में से ये ही दो ऐसे हैं, जिनमें सचमुच फ्रायड का प्रभाव कुछ हद तक देखने-दिखाने की संभावना है और इस संभावना के बावजूद, या शायद इसी वजह से, यहाँ सिद्धांत के साथ रचना का तालमेल बिठाने के लिए मनमानी व्याख्याओं का सहारा लेना पड़ा/लिया गया।
पहले चर्चा ‘शेखर: एक जीवनी’ की। इसलिए कि स्वघोषित गांधीवादी जैनेन्द्र की ‘सुनीता’ के मुकाबले, पश्चिमी लेखकों को धड़ल्ले से उद्धृत करने वाले अंग्रेज़ीदां अज्ञेय के उपन्यास पर इस तरह के आरोपण के उदाहरण अधिक मिलते हैं। आलोचकों ने इस उपन्यास पर मनोविश्लेषणशास्त्र का गहरा असर पाया है। ‘शेखर: एक जीवनी’ को ही ध्यान में रख कर 1953 के अपने एक लेख ‘फ्रायड और हिंदी साहित्य’ में डा. नगेन्द्र ने लिखा था, ‘अज्ञेय जैसे एकाध कलाकार द्वारा ही फ्रायड व्यवस्थित ढंग से हिंदी में आए और धीरे-धीरे उनकी ओर आकर्षण बढ़ा।’  रामदरश मिश्र लिखते हैं, ‘ ‘शेखरः एक जीवनी’ का मनोविश्लेषण पक्ष बड़ा ही समृद्ध है।’  और डा. देवराज उपाध्याय को ‘मालूम तो ऐसा ही होता है कि  (…) चित्त-विश्लेषणवादी बाल-मनोविज्ञान को कथात्मक और सृजनात्मक रूप देने के प्रयत्न में ही शेखर का निर्माण हुआ है।’
यहां बताना उपयोगी होगा कि हिंदी के मनोवैज्ञानिक उपन्यास के लक्षण-निर्धारण में डा. देवराज उपाध्याय की बड़ी भूमिका रही है। 1956 में प्रकाशित उनका ग्रंथ ‘आधुनिक हिंदी कथा साहित्य और मनोविज्ञान’ उनके पीएच.डी. के शोधप्रबंध का पुस्तकाकार रूप है और इसने मनोवैज्ञानिक उपन्यास के आगामी अध्ययन को ख़ासा प्रभावित किया है। पीछे उद्धृत बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने जो लिखा है, वह ज़्यादा ग़ौरतलब है, क्योंकि वहां ‘शेखर: एक जीवनी’ को एक रूपक के माध्यम से पूरी तरह फ्रायडीय ढांचे में अंटा देने की तत्परता दिखती है-
फाँसी ही मानो चित्त-विश्लेषण करनेवाला डाक्टर है, कोठरी ही क्लिनिक है, जहाँ फाँसी ने शेखर के साथ ऐसी आत्मीयता का वातावरण स्थापित किया है कि उसके चित्त पर पड़े सारे प्रतिरोध की पर्तें झड़ गई हैं और वह अपने ऊपर पड़े सारे आवरणों को चीर कर अपने बाल-जीवन-उद्यान में प्रवेश कर वहाँ के दृश्यों को सा़फ-सा़फ देखने लग गया है।
शेखर फाँसी का सजायाफ्ता कैदी है। वह आसन्न मृत्यु का साक्षात्कार करता हुआ अपने अतीत जीवन में अपनी इस नियति के सूत्रों की खोज कर रहा है और इस क्रम में लगभग विस्मृत हो चुके बाल्यकाल से लेकर निकट अतीत तक के अपने जीवन की वह पुनर्रचना करता है। उपन्यास की भूमिका की शुरुआत में कहा गया है, ‘वेदना में एक शक्ति होती है। जो यातना में है, वह द्रष्टा हो सकता है।’ इस संदर्भ को ध्यान में रखें तो देवराज उपाध्याय के सांगरूपक के सभी अंगों के मायने समझ में आते हैं।
आइए, देखें कि क्या यह सांगरूपक इसी तरह पूरे उपन्यास पर घटित हो सकता है ?
फ्रायडीय सिद्धांतों में प्रतिरोध (Resistence) दमन (Repression) का प्रमाण है और दमन का अर्थ है, किसी प्रेरणा या आवेग को अचेतन में धकेल देना और उसे वहीं बनाए रखना। जिस प्रबल प्रयास से किसी मानसिक प्रक्रम को अचेतन बनाया गया था, वही प्रबल प्रयास उस इलाज के समय दोबारा सक्रिय हो जाता है जिसके द्वारा अचेतन को चेतना में लाने की कोशिश की जा रही है। इसे ही फ्रायड ने प्रतिरोध कहा है। यह प्रतिरोध अतीत में किये गये दमन को ही पुष्ट करता है।
इस संदर्भ में शेखर को देखें तो बाहरी ढांचे के स्तर पर उसकी औपन्यासिक योजना (जीवन के एक निश्चित बिंदु पर ठहर कर सुदीर्घ अतीत की स्मृतियों का पुनस्संकलन और उसके आलोक में अपनी गतिविधियों की व्याख्या) की मनोविश्लेषण-विधि के साथ थोड़ी बहुत समानता भले ही दिखती हो, कहीं भी इस बात के संकेत नहीं मिलते कि शेखर अपने जिन विगत अनुभवों और भाव-स्थितियों के आधर पर अपने जीवन की पुनर्रचना कर रहा है और अपनी नियति के सूत्रों को खोज रहा है, वे अब तक अचेतन की परतों में दबी रहती आई हैं। जिन घटनाओं और उनसे उपजी अनुभूतियों का शेखर हवाला देता है, उनके बारे में वह कभी यह दावा नहीं करता कि वे दरअसल अचेतन के अँधेरे में छुप कर उसकी नियति का सूत्र-संचालन कर रही थीं और वेदना-प्रदत्त अंतर्दृष्टि ने उन्हें चेतना के प्रकाश में ला दिया है। स्मृतियों के पुनस्संकलन के संदर्भ में उपन्यास से मात्र यही आशय व्यंजित होता है कि वेदना द्वारा प्राप्त अंतर्दृष्टि उन बिखरे-बिखरे अनुभवों को अर्थ के एक सूत्र में पिरो रही है। अर्थात्, अतीत के इस उत्खनन की विशिष्टता इसमें नहीं है कि उसके द्वारा दमन-प्रक्रिया का शिकार हुए अनुभवों की मुक्ति हुई है, बल्कि मात्र इसमें निहित है कि उसने पिछले तमाम अनुभवों को, जो अलग-अलग होने पर बेमानी लग सकते हैं, एक शृंखला में गूँथ कर मानीख़ेज बना दिया है। वाचक बहुध किसी घटना से निष्पन्न मानसिक विकार के चेतन स्वरूप को निरंतरता को चिह्नित भी करता है। मिसाल के लिए, वह बताता है मां के जिस अविश्वास का उसके व्यक्तित्व पर दूरगामी असर है, उस अविश्वास को उसने अपने जीवन में कभी भुलाया नहीं।
उस दिन के बाद सोते-जागते, चैतन्य में और सुषुप्ति में, संग्राम में और पलायन में, जितनी अधिक बार अविश्वास के उस भयंकर आकस्मिक ज्ञान का चित्र मेरे सामने आया है, उतनी बार कोई चित्र नहीं आया। मुझे याद है, मेरी गिरफ्तारी के बाद पहले-पहल मुझे घर का विचार आया, तब यही था कि जब माँ सुनेंगी, तब इस समाचार के प्रति पहला भाव तो विजय का ही होगा, जैसे ‘मैं तो जानती ही थी, मैंने कभी उसका विश्वास नहीं किया!’ फिर वह दुखी होगी, रोएगी भी, जलेगी भी, पर उसका पहला विचार, चाहे वह कितना ही क्षणिक क्यों न हो और तत्काल ही कितनी भी ग्लानि क्यों न उत्पन्न करे. पहला विचार तो यही होगा कि उससे यही आशा होनी चाहिए थी… और न जाने क्यों, इस विचार ने मुझे बड़ी सांत्वना दी थी, एकदम शांत कर दिया था और पुलिस के अत्याचारों के प्रति सर्वथा निरपेक्ष बना दिया था।
जाहिर है, अविश्वास का भयंकर आकस्मिक ज्ञान किसी अचेतन ग्रंथि का रूप लेकर शेखर की क्रियाशीलता को निर्देशित नहीं कर रहा है। शेखर इस ज्ञान के उपघातज अनुभव को सचेत रूप से जीता आया है। इस तरह कहना चहिए कि जीवनीकार बन कर वह किसी दमित भाव के अनुसंधाता के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञात भावस्थिति और उसके दूरगामी प्रभाव के वर्णनकर्ता के रूप में हमारे सामने आता है। उपन्यास में वर्णित दूसरे स्मृति-खंडों के बारे में यही बात निश्चयपूर्वक कही जा सकती है।
चूंकि शेखर में वर्णित अधिकांश भाव-स्थितियों का स्वरूप निरंतर चेतन रहा है, इसलिए ‘दमन’ के रोगजनक प्रक्रम के संकेत वहाँ नहीं खोजे जा सकते और बिना दमन के कैसा प्रतिरोध! अगर शेखर प्रतिरोध-मुक्त हुआ है, तो उसे दमन की पहचान होनी चाहिए और दमन की पहचान का अर्थ है, अचेतन मानसिक प्रक्रमों की पहचान। इन बातों का कोई संकेत न तो शेखर की अतीत-यात्रा में मिलता है, न ही रचनाकार द्वारा लिखी गई भूमिका में। जाहिर है, इन दोनों से बाहर किसी चीज को प्रमाण मान कर निर्णय नहीं दिया जा सकता। इस तरह मनोविश्लेषण की विधि को जिस सांगरूपक के माध्यम से डाॅ. उपाध्याय ने शेखर पर लादना चाहा है, उसकी बुनियाद में ही खोट है।
डा. देवराज उपाध्याय यह भी मानते हैं कि शेखर में ‘कहीं-कहीं तो स्पष्ट रूप से चित्त-विश्लेषण के सिद्धांतों की चर्चा है।’  और ‘ऐसे अनेक स्थल हैं जहाँ पर पुत्र पर माता के या पुत्री पर पिता के प्रभावों की व्याख्या की गई है।’  पूरे उपन्यास को बहुत ठहर-ठहर कर ग़ौर से पढ़ें, तब भी इस बात की तथ्यता प्रमाणित करना मुश्किल है। मनोविश्लेषण के सिद्धांतों की ‘स्पष्ट चर्चा’ उपन्यास में शायद ही कहीं मिल पाए। थोड़ा प्रयास करके एकाध हिस्से को ऐसी चर्चा की कोटि में डाला जा सकता है, पर उसे भी ‘स्पष्ट चर्चा’ कह पाना संभव नहीं।’  जहाँ तक ‘अनेक स्थलों पर पुत्र पर माता के और पुत्री पर पिता के प्रभावों की व्याख्या’ का सवाल है, वह कहीं-कहीं मिलती ज़रूर है, पर उसे पूरी तरह फ्रायडीय व्याख्या कहना या फ्रायडीय सिद्धांतों से उसे पुष्ट कर पाना मुश्किल है।  वस्तुतः ईडिपस, इलेक्ट्रा और बधियाकरण-जैसी ग्रंथियों का कोई स्पष्ट या अस्पष्ट हवाला शेखर में नहीं मिलता। पुत्र-पुत्री पर माता-पिता के प्रभाव की फ्रायडीय विधि से चर्चा इन ग्रंथियों को संदर्भ बना कर ही की जा सकती है। मानना पड़ता है कि फ्रायडीय मनोविश्लेषण का प्रभाव दिखलाने के उत्साह में डाॅ. देवराज उपाध्याय का विवेचन बहुत संयत नहीं रह गया है।
इस असंयत और असंगत विवेचन की मार शेखर को ही नहीं, फ्रायड को भी सहनी पड़ी है। फ्रायड के ‘फैमिली रोमांस’ की धरणा को शेखर पर घटित करने के लिए देवराज उपाध्याय इस धरणा की अपने तरीके से व्याख्या प्रस्तुत करते हैं-
फ्रायड ने पारिवारिक रोमांस ;थ्ंउपसल त्वउंदबमद्ध का जो चित्र उपस्थित किया है, पिता के पुत्री के प्रति, भाई का बहिन के प्रति, माता का पुत्र के प्रति यौन भाव का आकर्षण होना, माता-पिता के यौन प्रणय-व्यापार को देख लेने की बालक में उत्सुकता होना और उसे देख लेने में सफल होना- इनकी मानसिक प्रतिक्रिया इत्यादि का सुंदर और कलात्मक वर्णन शेखर से बढ़ कर और कहाँ पाया जा सकता है। (ज़ोर हमारा)
सारी गड़बड़ ‘रोमांस’ शब्द ने की है। ‘द ़फैमिली रोमांस’ शीर्षक से ़फ्रायड ने एक छोटा निबंध 1908 में लिखा था, जिसमें वह बताता है कि हर बच्चे के मन में एक सचेत फैंटेसी होती है जिसमें वह यह कल्पना करता है कि उसके माता-पिता असली माता-पिता नहीं हैं और वह असल में एक अधिक संपन्न और कुलीन माता-पिता की संतान है। यह फैंटेसी, जो कि अपने वाल्दैन से स्वतंत्र होने के संघर्ष का हिस्सा है, बाद में दमित हो जाती है।
यानी फ्रायड ने ‘रोमांस’ शब्द का इस्तेमाल एक कथात्मक विधा के अर्थ में किया था, देवराज उपाध्याय ने इसे प्रेम-व्यापार समझ लिया और फ्रायड को जितना वे जानते थे, उसके हिसाब से इसके ब्यौरों की भी कल्पना कर ली।
डा. देवराज उपाध्याय के विवेचन ने आगे के अध्ययनों को ख़ासा प्रभावित किया है, जिसका एक दिलचस्प प्रमाण डा. भारतभूषण अग्रवाल का बहुप्रतिष्ठित और मानक शोधग्रंथ ‘हिंदी उपन्यास पर पाश्चात्य प्रभाव’ है। इसमें शेखर पर मनोविश्लेषण के प्रभाव की बात करते हुए उन्होंने बार-बार देवराज उपाध्याय का हवाला दिया है और इस सिलसिले में देवराज उपाध्याय को वही ‘इज्जत’ बख़्शी है, जो उपाध्याय जी ने अज्ञेय और फ्रायड को बख़्शी थी यानी कई ऐसी बातें देवराज उपाध्याय की ज़बान से कहलवा दी हैं जो उन्होंने कही ही नहीं। जैसे-‘उन्होंने बताया है कि शेखर की कामेच्छा का दमन किस प्रकार उसकी जिज्ञासावृत्ति को उकसाता है’ या ‘शेखर का माता के प्रति व्यवहार उसी दमन से व्याख्यायित हो सकता है’।  ये बातें एक तरह की तुक्केबाज़ी हैं (भारत भूषण अग्रवाल को ‘बताया है’ से पहले ‘शायद’ लगा देना चाहिए था), तुक्केबाज़ी इस रूप में कि देवराज उपाध्याय ने अगर शेखर को पूरी तरह से फ्रायड के ढांचे में देखा-समझा है तो ज़रूर कामेच्छा के दमन को ही केंद्र में रखा होगा ! सच्चाई यह है कि देवराज उपाध्याय ने मनोविश्लेषण के प्रभाव को आवश्यकता से अधिक ज़रूर आंका है, लेकिन कहीं भी यह दावा नहीं किया कि कामेच्छा के दमन के संदर्भ में ही माता के प्रति शेखर के व्यवहार और शेखर की जिज्ञासावृत्ति की व्याख्या हो सकती है।
ठीक इसी तरह, देवराज उपाध्याय के हवाले से ही डा. अग्रवाल ने यह भी कहा है कि ‘शेखरः एक जीवनी में’ ‘पुत्री का पिता के प्रति, बहन-भाई का एक-दूसरे के प्रति, पुत्र का माता के प्रति यौनाकर्षण, बालक में माता-पिता के यौन-व्यापार को देखने की उत्सुकता आदि सभी यथास्थान अंकित किए गए’  हैं। ज़ाहिर है, पीछे पारिवारिक रोमांस वाला जो अंश उध्दृत किया गया है, वही इसका आधर है। उस अंश को ग़ौर से पढ़ें तो उसके अंतिम वाक्यांश को छोड़ कर शेष अंश दरअसल फ्रायड का हवाला देते हैं, न कि ‘शेखरः एक जीवनी’ का। इस वाक्य से यह स्पष्ट नहीं है कि शेखर में तथाकथित ‘फैमिली रोमांस’ का यह चित्र पूरा-का-पूरा आया है अथवा उसका कोई अंश-विशेष ही आ पाया है। आगे डाॅ. उपाध्याय ने जो विवेचन किया है, उससे यह साफ होता है कि वे उन सारे ब्यौरों के मात्र एक अंश-भाई का बहन के प्रति आकर्षण-की उपस्थिति शेखर में देख पाए हैं। अगर आप निरावलंब प्रत्यक्ष की व्याधि के शिकार न हों, तो इससे ज़्यादा देखा भी नहीं जा सकता। पुत्री का पिता के प्रति और पुत्र का माता के प्रति यौनाकर्षण तो शेखर में नाम मात्रा को नहीं मिलता। जहाँ तक यौन-क्रिया को देखने की उत्सुकता का सवाल है, शेखर एक बार ग़लती से माता-पिता के समागम (वह भी संदिग्ध) का दृश्य अवश्य देख लेता है, लेकिन यह दर्शन न तो सायास-सुनियोजित है और न ही सुदीर्घ। इसलिए यह मानना युक्तिसंगत न होगा कि शेखर के अंदर माता-पिता के यौन-व्यापार को देखने की ‘उत्सुकता’ है। अलबत्ता यौन-जीवन को लेकर दूसरी तरह की उत्सुकताएँ उसके अंदर अवश्य हैं, जिनके चलते वह माता की आलमारी में छिपा कर रखी गई गंदी पुस्तकों को पढ़ डालता है, ‘गीत गोविन्द’ के पद गाने से मना किए जाने पर उस काव्य को छिप कर गंभीरतापूर्वक पढ़ जाता है। दरअसल, इस तरह की उत्सुकताएँ भी अपने-आप में यौनविषयक नहीं हैं, बल्कि ये गोपनीयता की चुनौती का जवाब देनेवाले विद्रोही तेवर का सबूत हैं।
इस तरह भारत भूषण अग्रवाल ने देवराज उपाध्याय के हवाले से जो कुछ कहा है, वह वैसे ही है जैसे पुराने ज़माने में मूल प्रति से की गयी प्रतिलिपि और फिर उसकी प्रतिलिपि की परंपरा में मूल प्रति की एक छोटी-सी ग़लती या अस्पष्टता धीरे-धीरे एक बड़े बदलाव का रूप ले लेती होगी।
कामेच्छा के दमन से संबंधित बलाघात ने अकादमिक आलोचना में आगे और गहरा रंग पकड़ा। वहां तक जाने से पहले एक बार यह देख लेना ज़रूरी है कि पाठ के आधार पर सचमुच कामेच्छा के बारे में जीवनीकार का क्या नजरिया रेखांकित किया जा सकता है। यह सही है कि जीवनीकार ने काम को उन तीन महती प्रेरणाओं में से एक माना है जिन्हें ‘मानव अपनी मानवता के साथ ही पाता है, बाद की परिस्थिति या व्यवहार से नहीं’ और इसके लिए अंशतः उसे फ्रायड का आभारी होना चाहिए, जिसकी मान्यता है कि ‘यह कतई सही नहीं है कि काम-आवेग कैशोर्य में बच्चों के अंदर प्रवेश करते हैं, जैसे ईसाई ध्र्म-सिद्धांत में सूअर में शैतान प्रवेश कर जाते हैं।’  पर फ्रायड का यह दाय ग्रहण करते हुए भी जीवनीकार शेखर ने कहीं यह संकेत नहीं दिया है कि कामेच्छा का दमन ही उसके अंदर की जिज्ञासावृत्ति को उकसाता रहा है। अगर जीवनीकार की यही मान्यता होती कि कामेच्छा का दमन ही उसके व्यक्तित्व के कई पहलुओं का निर्णायक-नियामक रहा है, तो जाहिर है, इस ज्ञान के बाद जीवनी लिखते हुए उसके मन में काम के शारीरिक या यौन-पक्ष के प्रति वर्जना का भाव नहीं रहना चाहिए था। बालक/किशोर शेखर के मन में इस शारीरिक पक्ष के प्रति जो वर्जना का भाव है, उसके लिए तो यह कहा जा सकता है कि वह माता-पिता और समाज के प्रभाव से निर्मित पराहं (सुपर ईगो) की देन है, लेकिन दृष्टा शेखर, जो अपनी जीवनी लिख रहा है, उसे तो प्रतिरोधमुक्त होकर इस वर्जना के भाव को झटक देना चाहिए था ! मगर ऐसा नहीं होता। यह ‘दृष्टा’ शेखर भी सेक्स-संबंधी अपनी स्मृति को लिपिबद्ध करते समय उस समय की घृणा, जुगुप्सा आदि को इंगित करता हुआ लिखता है-
वह अवण्र्य है। उसे वे ही समझ सकते हैं, जो कभी वासना से उत्पन्न हुए पापकर्म के किनारे तक पहुँच कर लौट आए हैं- किसी बाह्य रुकावट या नियम या असामथ्र्य या डर से नहीं, एक आंतरिक, स्वतः उत्पन्न ग्लानि के कारण…।
इस अंश से स्पष्ट है कि वर्जना का भाव स्वयं जीवनीकार शेखर के मन में भी है। ऐसे में वह कामेच्छा के दमन की ‘थीसिस’ का यथेष्ट उपयोग अपने आत्मविश्लेषण में नहीं कर सकता, यह बात बहुत साफ है। इसीलिए फ्रायडीय पद्धति पर पाशवी काम-प्रवृत्ति के दमन से उत्पन्न विकारों की सुस्पष्ट चर्चा शेखर में नहीं मिलती। यदि कोई आलोचक शेखर के आरंभिक जीवन-वृत्त की इस दमन के संदर्भ में व्याख्या करता है, तो बजाय यह कहने के, कि शेखर के रचनाकार ने मनोविश्लेषणशास्त्र का उपयोग किया है, यह कहना अधिक संगत होगा कि आलोचक उस शास्त्र से प्रभावित है और स्वयं विश्लेषक बन कर शेखर को अपने ‘काउच’ पर बैठे, निस्संकोच अपनी स्मृतियों का बयान करते एक मरीज के रूप में देख रहा है, एक ऐसा मरीज, जो अपनी स्मृतियों के गूढ़ार्थ को खुद नहीं समझता, लेकिन इस विश्वास के साथ सब कुछ बयान कर रहा है कि मनोविश्लेषक ;यानी आलोचकद्ध उसके ‘केस’ की हैतुकी को समझ लेगा।
शेखर को पढ़ते हुए कई आलोचक ऐसे मनोविश्लेषक अवतार में देखे गये हैं, लेकिन दिक़्क़त ये है कि वे स्वयं इस अवतारवाद में विश्वास नहीं करते और अपने मौलिक निदान ;कपंहदवेपेद्ध को रचनाकार का अभिप्रेत बताने लगते हैं। एक दिलचस्प उदाहरण रणवीर रांग्रा की पुस्तक ‘हिंदी उपन्यास में चरित्र चित्रण का विकास’ में देखा जा सकता है। डाॅ. रांग्रा ने शेखर का एक प्रसंग उध्दृत किया है जिसमें मां के हाथों सज़ा पाने के बाद शेखर अपनी बहन सरस्वती की गोद में रोता हुआ लेट जाता है और उसे नींद आ जाती है। नींद में वह सपना देखता है कि दोपहर की कड़कड़ाती हुई धूप में वह एक ऊंट पर सवार होकर मरुस्थल को चीरता हुआ भागा जा रहा है, बहुत लंबे समय से, और कोई उसके पीछे आ रहा है। उसे मालूम नहीं कि कौन ? लेकिन वह जानता है कि कोई उसका पीछा कर रहा है, और कभी वह मुड़ कर देखता है तो पीछे सि़र्फ ऊंट के पैरों से उठता धूल का गुबार दिखाई पड़ता है। वह बहुत प्यासा है, पर पानी कहीं नहीं दीखता। अचानक एक जगह सा़फ निर्मल जल का झरना दिख जाता है। वह अपनी प्यास बुझाने उतर पड़ता है। घुटनों के बल झुकता है, लेकिन पानी बहुत नीचे है। कहीं से उसकी बहन सरस्वती भी आ जाती है। दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़े प्यासी निगाहों से पानी को देखते रहते हैं।
रणवीर रांग्रा ने इस स्वप्न का जो विश्लेषण किया है, उसे देखें-
इस स्वप्न में शेखर के गत जीवन के अनेक भाव, विचार और अनुभूतियां तथा कई दृश्य एकाकार हो गये हैं। इसमें शेखर के जीवन का कटु यथार्थ मरुस्थल के रूप में प्रकट हुआ है और उसकी अहंता (ईगो) ऊंट के रूप में है जिस पर चढ़ कर वह मरुस्थल को चीर कर भागा जा रहा है। उसका पीछा करने वाला ‘कुछ’ उसके मां-बाप और अन्य लोगों की अहंताएं हैं, जो उसे घेर कर उसका समाजीकरण करना चाहती हैं। इस मरुस्थल में उसे केवल एक शाद्वल (ओएसिसद) दिखाई देता है और वह है सरस्वती। शेखर प्यासा ही भागता चला जा रहा है। उसकी प्यास सेक्स की प्यास है, जिसे वह बुझाना चाहता है, पर झरने के पास पहुंच कर वह अपनी प्यास नहीं बुझा सका है। उसके हाथ पर सरस्वती का हाथ है और वे दोनों प्यासी आंखों से पानी को देख रहे हैं। एक-दूसरे के निकटतम होने पर भी दोनों प्यासे रह जाते हैं। जलरूपी सेक्स-तृप्ति (ग्रैटिफिकेशन) को वे पा नहीं सकते, क्योंकि वे सगे भाई-बहन हैं, शायद इसलिए।
रणवीर रांग्रा ऐसा स्वप्न-विश्लेषण करें, किसी को क्या आपत्ति हो सकती है! और अगर होगी भी तो वह किसी और मौके पर व्यक्त की जानी चाहिए। (मसलन, यह आपत्ति हो सकती है कि साहब, आपने स्वप्न के आखि़री हिस्से को क्यों छोड़ दिया जहां शेखर पानी के बीच एक बड़ा-सा फूल देखता है ‘जिसके बीचोंबीच एक तपे सोने-से वर्ण की डंडी (pistil) है।’ आपको कहना चाहिए कि डंडी लिंग का प्रतीक है और उसे देख कर शेखर को जिस शांति का अनुभव होता है, वह दरअसल बधियाकरण ग्रंथि से पीडि़त शेखर के लिए लिंग के सुरक्षित होने की आश्वस्ति है।) फिलहाल तो आपत्ति इस बात पर है कि श्री रांग्रा के हिसाब से यही विश्लेषण रचनाकार को अभिप्रेत है। अगर यही अज्ञेय को भी अभिप्रेत है तो इसका मतलब यह कि खुद उनकी निगाह में शेखर का पूरा व्यक्तित्व, स्वतंत्रता और सौंदर्य की उसकी खोज, उसकी प्रश्नाकुलता कामकुंठा से ही निकली है। तो फिर Will to revolution की, और ‘विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं’ की सारी बातें उपन्यास में क्या खानापूरी करने या सिर्फ शब्द भरने के लिए आयी हैं? आप यह निष्कर्ष भी निकालना चाहें तो बेशक निकाल लें, लेकिन मैं फिर कहूंगा कि इसे आप अपने निष्कर्ष के रूप में ही पेश करें, अपनी जीवनी का बयान करते नैरेटर शेखर के बारे में उसके लेखक अज्ञेय का निष्कर्ष तो न बताएं!
इंडियन ऐडवांस स्टडीज़ इंस्टीट्यूट, शिमला की एक शोध-परियोजना से सन् 2000 में निकली डा. प्रेम सिंह की किताब ‘क्रांति का विचार और हिंदी उपन्यास’ में भी ‘शेखरः एक जीवनी’ पर विचार करते हुए फ्रायड का ऐसा ही आरोपण देखने को मिलता है। प्रेम सिंह मानते हैं कि जीवनीकार प्रकट रूप से तो फ्रायड का विरोध करता है जब वह कहता है कि माता के प्रति आकर्षित पुत्र और पिता के प्रति आकर्षित कन्या साधरणता की ओर जाते हैं, लेकिन ‘फ्रायड के इस प्रकट विरोध के बावजूद शेखर पर उसका प्रभाव आन पड़ा है।’ वह ऐसे कि ‘मां के अविश्वास से लगे झटके के फलस्वरूप उसके चरित्र में काम-संबंधों की सहज योग्यता विकसित नहीं हो पाती। कैशोर्य काल के जैविक मनोविज्ञान से निकल कर वह एक ‘संपूर्ण’, ‘मुक्त’ पुरुष तो बनता है, लेकिन काम-संबंधों को ‘जघन्य, घृणित, अचिंतनीय, भ्रष्टाचार’ मानते हुए। लिहाज़ा शरीर का दमन करके उसकी मांगों को वह मानसिक क्षेत्र में ले जाता है।’  स्त्रियों को वह ‘देवियों के रूप में स्वीकार करता है। वे उसे तभी तक भाती हैं जब तक उन्होंने शारीरिक संबंध न बनाए हों, यानी उनके मां बनने का ख़तरा न हो।… शशि को रामेश्वर के साथ बने शारीरिक संबंध की जकड़ से लाना ज़रूरी है ताकि वह उसे मानसिक प्यार कर सके-मां बनने से बचा सके।’ ‘शारीरिक संबंध बनाने की अपनी असमर्थता को अपनी प्रणय-गाथाओं की परेड कराकर ढंकना उसके लिए ज़रूरी हो जाता है।’
इन बातों की रोशनी में विचार करें कि प्रेम सिंह जब कहते हैं कि ‘शेखर पर फ्रायड का प्रभाव आन पड़ा है’, तो उनका मतलब क्या होता है। अगर वे यह कहना चाहते हैं कि शेखर के सर्जक अज्ञेय पर फ्रायड का प्रभाव है, तो ज़ाहिर है, पीछे जो कुछ कहा गया है, उसे वे स्वयं अज्ञेय का अभिप्रेत बताना चाहते हैं। यह बात बिल्कुल साफ है कि ये बातें शेखर के सर्जक को अभीष्ट नहीं हैं। काश कि होतीं! तब प्रेम सिंह को अज्ञेय से ‘बोदे और भावुक शेखरवाद’ की शिकायत न रहती, क्योंकि तब शेखर अज्ञेय के लिए क्रांति-शक्ति का प्रतिनिधि न होकर एक नकारात्मक उदाहरण होता। अगर प्रेम सिंह यह कहना चाहते हैं कि स्वयं शेखर नामक पात्र पर फ्रायड का प्रभाव है तो इसका मतलब ये कि फ्रायड कुंठाओं का विश्लेषण करने वाला नहीं, उन्हें पैदा करने वाला विचारक है। उसका प्रभाव आया तो ये सारी कुंठाएं पनप गयीं। यह भी बेबुनियाद है। यानी अंततः हाथ यही लगता है कि फ्रायड का प्रभाव खुद आलोचक पर ‘आन पड़ा है’ जो उपन्यास के चरित्र को एक ‘केस’ के रूप में देख रहा है और फ्रायडीय पद्धति पर उसका अपनी ओर से विश्लेषण कर रहा है। ऐसा विश्लेषण तो आप प्रेमचंद के होरी का, रेणु के कालीचरण का या नागार्जुन के बलचनमा का भी कर लें, किसने रोका है!
यहां एक वाजिब सवाल उठाया जा सकता है कि क्या प्रभाव का ग्रहण सचेत स्तर पर ही हो, यह ज़रूरी है? यानी क्या यह संभव नहीं कि रचनाकार की मंशा किसी सिद्धांत का रचनात्मक उपयोग करने की न हो, इसके बावजूद उसका पाठ अपने अंतर्निहित तर्क से हमें उस दिशा में सोचने के लिए बाध्य करे जो सिद्धांत विशेष ने निर्दिष्ट की है ? बेशक, ऐसी स्थितियों में भी प्रभाव की बात करना जायज़ है, क्योंकि कई बार सिद्धांत का इस्तेमाल किया नहीं जाता, हो जाता है। लेकिन इसकी जांच के लिए पाठ का अंतर्निहित तर्क न्यूनतम शर्त है। बाहर से आरोपित तर्क प्रभाव की दावेदारी को जायज़ नहीं ठहरा सकते, क्योंकि आख्यान स्वयं में एक कारण-कार्य-शृंखला है। आप जब उपन्यास में बयान की गयी कारण-कार्य-शृंखला को एक भिन्न कारण-कार्य-शृंखला से अपदस्थ करते हैं, तो दरअसल आप एक अलग आख्यान रच रहे होते हैं। इस अलग आख्यान के आधार पर प्रभाव की बात भला कैसे की जा सकती है ?
यह सवाल भी उठाया जा सकता है कि आखि़र कोई तो कारण होगा कि होरी, कालीचरण या बलचनमा के मुकाबले शेखर अपने फ्रायडीय विश्लेषण के लिए आलोचकों को अधिक आमंत्रित करता या उकसाता है? निस्संदेह इसका कारण यह है कि (1) ‘शेखर: एक जीवनी’ अंततः एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है और इस मायने में ‘गोदान’, ‘मैला आंचल’ या ‘बलचनमा’ से बिल्कुल अलग है कि यहां व्यक्ति का मनस्लोक आख्यान की अग्रभूमि में है, जबकि सामाजिक जीवन पृष्ठभूमि में। ऐसे उपन्यास में, ज़ाहिर है, फ्रायडीय विश्लेषण के लिए उकसाने की अधिक संभावना निहित है, (2) एक पात्र के मनोवैज्ञानिक विकास को चिह्नित करने वाली बचपन से युवता तक की कहानी फ्रायड के मनोयौनिक विकास की अवधरणा के आरोपण के लिए बहुत मूफीद आधार मुहैया कराती है। आलोचकों के पास जो फ्रायड-काट के कपड़े थे, उनके लिए एक सही नाप/कद-काठी वाला शरीर मिल गया और जब यह मिला तो उन्होंने कपड़े पहना डालने की आतुरता में, देख कर भी इस बात की अनदेखी की कि यह शरीर नंगा नहीं है, इस पर पहले से कपड़े हैं (शेखर की कहानी कच्चे आंकड़े/ Raw data की तरह नहीं है, उसका वाचक और लेखक खुद बहुत विचारशील है)। इसलिए अगर शेखर ने हिंदी साहित्य के दूसरे चरित्रों के मुक़ाबले फ्रायडीय विश्लेषण के लिए आलोचकों को ज़्यादा उकसाया है, तो यह अपने-आप में इस चरित्र की निर्मिति पर फ्रायड की छाप होने का सबूत नहीं है।
हरिप्रसन्न और सुनीता, जो जैनेन्द्र के उपन्यास ‘सुनीता’ के मुख्य चरित्र हैं, आलोचकों को उकसावा देने के मामले में शेखर के आजू-बाजू ही रहे हैं। वैसे ये भी सही है कि ‘सुनीता’ में फ्रायड की कई अंतर्दृष्टियों की छाप मिलती है और शायद जैनेन्द्र के किसी भी और उपन्यास तथा किसी भी और औपन्यासिक चरित्र की बनिस्पत यहां मनोविश्लेषण के सूत्रों को ढूंढ़ना आसान है, भले ही हम उन सूत्रों के ढूंढ़ने के बाद इस दुविधा के शिकार हो जाएं कि इन्हें प्रभाव (Influence) की श्रेणी में रखा जाए या समभाव (confluence) की।
उपन्यास की केंद्रीय पात्र सुनीता की चरित्र-निर्मिति में दमन, विस्थापन, उदात्तीकरण आदि बचाव-तंत्रों के बहुत स्पष्ट संकेत मिलते हैं। निश्चित रूप से इन बचाव-तंत्रों की ओर संकेत करने में जैनेन्द्र ने फ्रायड से आंशिक प्रेरणा ही ली है, क्योंकि कहीं भी यह नहीं दिखलाई पड़ता कि सुनीता यौन मनोभावों को चेतना से परे रखने और उनकी क्रियात्मक ऊर्जा का अन्य रूपों में उपयोग करने के लिए बचाव-तंत्रों का सहारा ले रही है। फिर भी इतना स्पष्ट है कि सुनीता घर की चारदीवारी तक सिमटी एक अधूरी जिंदगी जी रही है और इस अधूरेपन की कसक को दबाने के लिए, उसे अपनी सचेत पीड़ा का हिस्सा बनने से बचाने के लिए वह बचाव-तंत्रों की योजना करती है।
इसी तरह हरिप्रसन्न के भटकाव को जैनेन्द्र ने राष्ट्रीय मुक्ति के संकल्प और क्रांतिधर्मिता के साथ नहीं, बल्कि अचेतन मन में गहरे बैठी हुई काम-कुंठा के साथ जोड़ कर देखा है। काम की इस ग्रंथि का संकेत कथाकार काफी बाद में करता है, किंतु यह बात बहुत आरंभ से ही स्पष्ट होती चलती है कि अव्यवस्थित और भटकावग्रस्त जीवन-शैली राष्ट्रीय मुक्ति की आकांक्षा और क्रांतिकारी संलग्नता के चलते नहीं, किसी मनोवैज्ञानिक गाँठ के चलते है।
लेकिन ‘सुनीता’ को आद्यंत एक फ्रायडीय समग्रता में देख पाना संभव नहीं है और ऐसी कोशिश करने वाले को रचना और सिद्धांत, दोनों के साथ कुछ-न-कुछ ज्यादती करनी पड़ेगी। ऐसी ज्यादतियाँ डा. देवराज उपाध्याय की पुस्तक में देखी जा सकती हैं, हालाँकि सामान्यीकरण के स्तर पर उनका मानना है कि ‘जैनेन्द्र के उपन्यासों को फ्रायडीयन नहीं कह सकते हैं।’
देवराज उपाध्याय ने ‘सुनीता’ के आखि़री प्रसंग यानी ‘क्लाइमेक्स’ को जिस तरह से पढ़ा है, वह स्वयं आलोचक के मनोविश्लेषण के लिए किसी को प्रेरित कर सकता है। हिंदी साहित्य का यह ख्यात किंवा कुख्यात प्रसंग निश्चित रूप से उपन्यास को समझने के लिए अत्यंत निर्णायक है। यहाँ रात के समय जंगल के एकांत में प्रणय/काम-पिपासु हरिप्रसन्न के सामने सुनीता निर्वस्त्र हो जाती है और आमंत्रित करती है कि वह जो चाहता है, करे। हरिप्रसन्न शर्मिन्दा होकर दूर चला जाता है और बहुत देर तक ठगा-सा एक जगह बैठा रहता है। देवराज उपाध्याय इस प्रसंग का हवाला देते हुए लिखते हैं-
हरिप्रसन्न जब सुनीता के पूर्ण शरीर का दर्शन कर लेता है तो उसे एक अपार और गंभीर तृप्ति की पुलकानुभूति होती है…। … इस वर्णन को पढ़ कर रतिश्रान्त और आनंदतृप्त व्यक्ति का तन्द्रालस चित्र उपस्थित हो जाता है। फ्रायड ने बालक की कामभावना के विकास की प्रथमावस्था को ओरल स्टेज कहा है। जिस समय वह माँ का स्तनपान करता है, सेक्स की आनंदानुभूति प्राप्त करता है। फ्रायड का कथन है कि दुग्धपान से तृप्त बालक जब माँ की गोद में विश्राम करता है तो उसकी मुद्रा में उसकी गंभीर संतोष की झलक पाई जाती है जिसका दर्शन वयःप्राप्त मानव की कामतृप्ति की अलसाई मुद्रा में पाया जाता है। हरिप्रसन्न की जिस मुद्रा का यहाँ चित्रण किया गया है उसमें और एक रति-तृप्त कामतृप्त व्यक्ति की मुद्रा में कितना साम्य है।
देवराज उपाध्याय जिस वर्णन के आधर पर इस निष्कर्ष तक पहुँचे हैं (उन्होंने उद्धृत किया है), उसे भी देखें-
वह बैठा था। वह परास्त था, पुचकारा-सा शांत था। ठोड़ी उसकी हथेली पर टिकी थी और कोहिनी जंघा पर। वह मानो इस अनबूझ विश्व-ग्रंथ में उलट गए एक अद्र्धविराम के चिन्ह की भाँति वहाँ बैठा था- मानो निखिल प्रवाह के बीच क्षण की एक चुप को चिन्हित करने के लिए ही यह है, अन्यथा वह कुछ नहीं है- मात्र एक बूँद है।
इस वर्णन को देखते हुए और थोड़ा पहले तथा बाद के प्रसंगों को पढ़ते हुए पता चलता है कि आलोचक ने यहाँ कितनी दूर की कौड़ी लाई है। यहाँ हमारा साक्षात्कार हरिप्रसन्न की संतुष्ट और तृप्त मुद्रा से नहीं, परास्त और पश्चातापयुक्त मुद्रा से होता है। वह अपने अंदर दबी पड़ी काले फन-जैसी इच्छाओं के बाहर निकल पड़ने से लज्जित और क्षुब्ध है, यह बात पूरे आखि़री प्रसंग से बहुत अच्छी तरह व्यक्त होती है। ऊपर उध्दृत अंश में जिस परास्त हरिप्रसन्न की चर्चा मिलती है, उसी की वह स्थिति भी देखें जब सुनीता अपने अंतिम अंगवस्त्रा भी उतार चुकी है-
हरिप्रसन्न ने दोनों हाथों से अपनी आँखें ढँक लीं। उसके मुँह से एक शब्द न फूट सका। सर्वथा पराभूत वह अपने पराजय में गड़ जाने लगा। लज्जा ने उसे जमा दिया। मानो काटो तो खून नहीं। धरती फट क्यों नहीं गई कि वह गड़ जाता।
ऐसे हरिप्रसन्न के बारे में यह कहना कि उसे ‘सुनीता के पूर्ण शरीर का दर्शन कर एक अपार और गंभीर तृप्ति की पुलकानुभूति होती है’, और उसके साथ फ्रायड के रतिश्रान्त व्यक्ति के वर्णन को नत्थी कर देना, पाठ के साथ कैसी जोर-जबर्दस्ती है, कहने की जरूरत नहीं। दरअसल, देवराज उपाध्याय ने पूरे उपन्यास का अपने तरीके से पाठ तैयार कर लिया है। हरिप्रसन्न को वे काम-लक्ष्य की विकृति का शिकार मानते हैं, जो सुनीता को नग्न देखने की अचेतन इच्छा से परेशान है। वह अचेतन रूप से ही ऐसी स्थितियाँ तैयार करता है कि सुनीता उसे अकेले में मिल सके। फिर वह सुनीता को नग्नावस्था में देखता है और उसके मन की गाँठ दूर हो जाती है। वह स्वस्थ हो उठता है। वास्तविकता यह है कि जैनेन्द्र ने उपन्यास के अंत को बिल्कुल खुला छोड़ा है। श्रीकांत और सुनीता हरिप्रसन्न के मन की गाँठ को दूर करना चाहते तो हैं, लेकिन उनकी कोशिशों से ऐसा हो पाता है या नहीं, उसके बाद हरिप्रसन्न की जीवन-शैली में कोई बदलाव आता है या नहीं, यह बात कथाकार ने किसी संकेत से हमारे सामने नहीं रखी है। श्रीकांत, जिसे सचमुच की घटना का पता भी नहीं, भले ही यह समझता हो कि हरि के मन की गाँठ निकल गई , सुनीता और कथाकार इस मामले में बिल्कुल चुप हैं और उनकी चुप्पी बेमानी नहीं है। अस्तु! डाॅ. देवराज उपाध्याय यदि अंत के प्रसंग में हरिप्रसन्न की परास्त-लज्जित मुद्रा को संतुष्ट-तृप्त मुद्रा के रूप में देखते हैं और उसी के आधार पर अपने निष्कर्षों तक पहुंचते हैं, तो इसका कारण यह है कि निष्कर्ष उनके मन में पहले से विद्यमान है और वे कथा को उन निष्कर्षों के अनुरूप ढालना चाहते हैं। हैरत तब और बढ़ जाती है, जब आप यह पाते हैं कि भारतभूषण अग्रवाल जैसे गंभीर शोधार्थी जैनेन्द्र पर मनोविश्लेषण का प्रभाव आँकने के लिए देवराज उपाध्याय की व्याख्या को इस टिप्पणी के साथ उध्दृत करते हैं कि उन्होंने ‘‘हरिप्रसन्न की इस समय की स्थिति पर अच्छा प्रकाश डाला है!’
‘सुनीता’ के प्रसंगों की व्याख्या में ऐसे मनमानेपन के उदाहरण एकाधिक हैं। सुनीता को क्रांतिकारी दल की नेत्री बनाने के संकल्प के साथ हरिप्रसन्न जब उसे रात के समय जंगल के बीचों-बीच ले जा रहा है, तब दूर एक लाल रोशनी चमकती है, जो इस बात का संकेत है कि अभी इस तरफ पकड़े जाने का ख़तरा है। हरिप्रसन्न घबरा कर रुक जाता है और सुनीता को बाँहों में समेट लेता है।
उसने सुनीता को बाहुओं में और कसके कहा, ‘वह उधर देखो। कुछ दीखा? ठहरो, फिर दीखेगा।’
कुछ सेकिण्ड बाद एक लाल रोशनी चमकी और क्षण होते-होते वह लुप्त भी हो गई।
भय से चकित सुनीता ने कहा, ‘वह क्या है?’
हरिप्रसन्न ने उत्तर दिया, ‘ख़तरा है। वह लाल रोशनी है। अब वहाँ नहीं जाना होगा।
लाल रोशनी का प्रसंग उपन्यास में इतना ही है। यहाँ वाचक की ओर से दी गई जानकारी को ध्यान में रखें और तब देवराज उपाध्याय की इस टिप्पणी को पढ़ें-
हरिप्रसन्न के मनोविज्ञान को देखने पर मालूम पड़ेगा कि वहाँ लाल रोशनी वगैरह कुछ नहीं थी। हरिप्रसन्न के अचैतन्यावस्थ ने रोशनी देख ली थी, रोशनी का निर्माण उसके अंतर्मन की एक क्रिया थी, कारण कि यह उसकी अभीष्ट-सिद्धि में सहायक होती थी। जिस तरह हिस्टीरियाग्रस्त या सम्मोहित व्यक्ति अनेक कार्य करते हैं या दृश्य देखते हैं जिनका उन्हें स्वयं ज्ञान नहीं होता, उसी तरह हरिप्रसन्न का अंतर्मन ऐसे वातावरण की सृष्टि कर रहा है जिसमें सम्पूर्ण नारी शरीर पर एकाधिकार करने की वासना की तृप्ति हो सके।
पता नहीं चलता कि देवराज उपाध्याय ये बातें जैनेन्द्र के मंतव्य को समझाने के लिए लिख रहे हैं या कि यह ‘यदि-मैं-सुनीता-लिखता’-नुमा कोई उद्गार है। इतना तो तय है कि कथाकार की दृष्टि में यह लाल रोशनी मनोरोगी का ‘हैल्यूसिनेशन’ नहीं है, और न ही इच्छित वस्तु को देख लेने वाले रोजमर्रा के मनोविकार ;साइकोपैथाॅलजी इन एवरीडे लाइफद्ध की उपज। वह रोशनी सुनीता को भी दिखती है। ऐसे में या तो हम यह मानें कि दोनों का अंतर्मन ऐसे वातावरण की सृष्टि कर रहा है, जिसमें अपनी-अपनी वासना की तृप्ति हो सके, या फिर यह मानें कि वाचक की यह बात, कि ‘एक लाल रोशनी चमकी और लुप्त हो गई’, एक वस्तुनिष्ठ सूचना है, किसी के अंतर्मन की गढंत नहीं।
लेखक से आगे बढ़ कर उसके पात्रों और परिस्थितियों पर अपना भाष्य थोपने का ऐसा दुस्साहस डा. उपाध्याय ने कई जगह दिखलाया है। वैसे इसकी कोई मनाही भी नहीं होनी चाहिए, लेकिन दिक्कत वहां आती है, जहां हम उसी भाष्य को लेखक की मंशा मान कर उसके ऊपर अलाँ या फलाँ का प्रभाव साबित करने लगते हैं। मिसाल के लिए, अगर आलोचक यह कहता है कि ‘परख’ में ‘बिहारी और कट्टो की दमित कामवासना के उदात्तीकृत रूप (सब्लिमेशन) की बात कही गई है’ , तो यह सिर्फ अपने तरीके से किया गया भाष्य नहीं है, बल्कि उसे ही लेखक का कथ्य बताने की जिद भी है (ग़ौर फरमाएँ, ‘बात कही गई है’)।
जैसा कि पीछे बताया जा चुका है, रचना और सिद्धांत के बीच तालमेल बिठाने के लिए रचना का ही नहीं, सिद्धांत विशेष का भी अपने तरीके से पाठ तैयार करना पड़ता है। देवराज उपाध्याय ने फ्रायड के ‘आहत तृतीय पक्ष की जरूरत’ (नीड फार इंजर्ड थर्ड पार्टी) वाले सूत्र को ख़ासा तोड़-मरोड़ कर ‘सुनीता’ पर घटित किया है। यहाँ श्रीकांत एक ‘असाधरण’ (डा. उपाध्याय ‘असामान्य’ कहना चाहते हैं) पात्र ठहरता है, जो पति-पत्नी संबंधों में आए ठहराव और ठंडेपन को दूर करने के लिए बीच में एक तीसरे को ले आता है और उसे आहत कर अपने रिश्तों को दुबारा गरमाहट देता है। अव्वल तो यह समझ में नहीं आता कि देवराज उपाध्याय एक ही समय में हरिप्रसन्न को एक ओर तृप्त-संतुष्ट, तो दूसरी ओर आहत कैसे कह जाते हैं। ये शायद उनके लिए विपरीतार्थक शब्द नहीं हैं। खैर, इस बात को अनदेखा भी कर दें, तो नीड फार इंजर्ड थर्ड पार्टी के फ्रायडीय सूत्रीकरण को डा. उपाध्याय ने एकदम गलत तरीके से पेश किया है। 1910 में लिखे गए ‘ए स्पेशल टाइप आफ चाइस आफ आब्जेक्ट मेड बाई मेन’ में फ्रायड ने मनोरोगी आशिक की कुछ ख़ास तरह की पसंदों का जिक्र किया। उसमें पहली ही किस्म वह है, जहाँ एक आहत तृतीय पक्ष की जरूरत होती है। व्यक्ति ऐसी ही स्त्री को चुनता है, जो विवाह, प्रेम या किसी भी और संबंध से किसी अन्य पुरुष के अधिकार में है। ऐसी स्त्री जो ज्ञात रूप से किसी और की पत्नी या प्रेमपात्र नहीं है, इस तरह के आशिक की पसंद नहीं बन पाती। मौजूदा दावेदार को मायूस और आहत करके अपनी प्रेमिका को हासिल करने की चुनौती ही इस प्रेम का सार है। फ्रायड ने इसे ईडिपस ग्रंथि से जोड़ कर देखा है और मातासंबंधी बद्धता (फिक्सेशन) तथा पिता के प्रति प्रतिद्वंद्वी भाव का नतीजा माना है। इस आलोक में ‘सुनीता’ को देखें तो कुछ हद तक हरिप्रसन्न में ऐसा प्रेमी होने की संभावना नजर आती है। लेकिन डा. उपाध्याय अपने तरीके से इस आहत तृतीय पक्ष की जरूरत की व्याख्या करते हुए श्रीकांत को ऐसा आशिक ठहराते हैं और इसके आधर पर उपन्यास का एक पूरा अलग पाठ निर्मित कर लेते हैं, जहाँ श्रीकांत सुनीता को हरिप्रसन्न की ओर धकेलता ही इसलिए है कि अपनी सर्वानुगता पत्नी के प्रति उसके अंदर आकर्षण जग सके और इस तरह अपने वैवाहिक संबंध को पुनर्नवा करना संभव हो। यहाँ बहस इस पाठ से नहीं है। बहस इस बात से है कि उक्त पाठ को फ्रायडीय सूत्र के साथ नत्थी किया गया है। इसके लिए उस सूत्र के मायने को थोड़ा बदलते हुए यह मान लिया गया कि अगर अपनी पत्नी को किसी और के प्रेमसंबंध में धकेलने और दुबारा पाने में किसी को सुख मिले, तो वह भी प्रेमास्पद के चयन की उसी कोटि में आता है, जिसे फ्रायड ने ‘ए स्पेशल टाइप आफ चाइस आफ आब्जेक्ट मेड बाई मेन’ में व्याख्यायित किया है। कोई दूसरे के कब्जे में है, इसलिए उसे प्रेमपात्र के रूप में चुनना एक बात है और जो अपनी है, उसे जैसे-तैसे दूसरे के अंक से छुला कर अपने लिए दुबारा आकर्षक बना लेना दूसरी बात। इन दोनों में देवराज उपाध्याय कोई र्फक क्यों नहीं देखते, यह समझना कठिन है। ख़ासतौर से तब जबकि आहत तृतीय पक्ष संबंधी सूत्र को ईडिपस ग्रंथि, बद्धता (फिक्सेशन), पिता के प्रति ईष्र्या और प्रतिशोध की भावना-जैसे तमाम संदर्भों के साथ जोड़ कर देखने में उन्होंने कोई गड़बड़ी नहीं की है।
एक बार फिर यह याद दिलाना जरूरी होगा कि ये ज्यादतियाँ भी उस उपन्यास के साथ करनी पड़ीं, जिस पर फ्रायड का अधिकतम प्रभाव दिखलाई पड़ता है। वह जैनेन्द्र के उपन्यासों के बीच अपवाद सरीखा है। प्रेमचंदोत्तर युग के आरंभिक डेढ़ दशकों में छपे उनके दूसरे उपन्यासों को देखें, तो वहाँ मनोविश्लेषण के सिद्धांतों का कोई साक्ष्य ढूँढ़ पाना मुश्किल है।
‘सुनीता’ और ‘शेखर: एक जीवनी’ के अध्ययन से संबंधित ये उदाहरण क्या बताते हैं?
एक बात तो इनसे ये पता चलती है कि हिंदी आलोचना और साहित्येतिहास में बेहद कच्चे तरीके से गढ़े गए सामान्यीकरण एक बार गढ़े जाने के बाद किस तरह अमर हो जाते हैं। मूल में जाने की बजाय अगर आलोचना से ही आलोचना निकलेगी और साहित्येतिहास ग्रंथों को आधार बना कर ही साहित्येतिहास लिखा जाएगा, तो ये होना लाजिामी है।
दूसरी बात ये पता चलती है कि प्रेमचंदोत्तर दौर के आरंभिक डेढ़ दशक में माक्र्स और फ्रायड से प्रेरित-प्रभावित समानांतर धाराओं का वजूद, दरअसल, हिंदी के अकादमिक हल्के में प्रचलित एक किंवदंती है। इसमें कोई शक नहीं कि जैनेन्द्र और अज्ञेय मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार हैं। फ्रायड का कोई हवाला दिए बग़ैर भी उन्हें मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार कहने के पर्याप्त कारण हैं। इसलिए इसमें कोई समस्या न थी कि प्रेमचंदोत्तर उपन्यास-विकास का आख्यान लिखते हुए मनोविश्लेषणवाद को बहुत ज्याादा तूल न देकर मनोवैज्ञानिक उपन्यास के कुछ सामान्य अभिलक्षणों का ख़ाका तैयार किया जाता और जैनेन्द्र, अज्ञेय, इलाचंद्र जोशी तथा देवराज को उसमें स्थान दिया जाता। लेकिन दूसरे वाले पक्ष में माक्र्सीय प्रेरणा की प्रबल उपस्थिति हिंदी आलोचना को इस बात के लिए उकसा रही थी कि एक ऐसी ही वैश्विक प्रेरणा मनोवैज्ञानिक धारा में भी ढूँढ़ ली जाए। इससे प्रेमचंदोत्तर उपन्यास-विकास के आख्यान में एक संतुलन, ‘स्मार्टनेस’ और चुस्ती आ जाती। यह बुनियादी तौर ‘कथानक-रूढि़’ के प्रति लोभ का मामला था। स्वाभाविक रूप से विद्वानों को माक्र्स के रू-ब-रू इस भूमिका के साथ न्याय करने की संभावना फ्रायड में दिखी, क्योंकि अपनी बौद्धिक कद-काठी में वह ख़ासा कद्दावर था, बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में ही मनोविज्ञान का लगभग पर्याय बन चुका था और अतिसरलीकरण के लिए आतुर लेखक उसे अर्थ की केंद्रीयता बतानेवाले माक्र्स के सामने यौन-भाव की केंद्रीयता बतानेवाला उसका समर्थ प्रतिद्वंद्वी स्वीकार करने लगे थे। वह इसलिए भी एक अच्छा चुनाव था कि उसने, जे.ए.सी. ब्राउन के शब्दों में कहें तो, ‘कोपरनिकस और डारविन की तरह ही अपने-आपको देखने की हमारी पूरी पद्धति कर क्रांतिकरण कर दिया’  था और चालीस के दशक तक आते-आते साहित्यिक-बौद्धिक जगत में ऐसे लोग अल्पसंख्यक रह गए थे, जिन्होंने फ्रायड से जाने-अनजाने कुछ-न-कुछ ग्रहण न किया हो। ऐसे में मन की कथा कहनेवाले सभी उपन्यासकारों पर उसका कुछ असर दिखना स्वाभाविक था। लिहाजा माक्र्स वाली धारा के बरक्स फ्रायड वाली धारा का आविष्कार हुआ। अब इसमें दिक्कत ये थी कि इलाचंद्र जोशी को छोड़ दें तो कोई और मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार फ्रायडीय सिद्धांतों का ‘उपयोग’ करता दिखलाई नहीं पड़ता, भले ही फ्रायडीय समग्रता से कट कर अज्ञात-अचेतन प्रेरणाओं और यौन-कुठाओं की बात कहीं-कहीं मिल जाए। यशपाल, राहुल साँकृत्यायन, नागार्जुन, भैरव प्रसाद गुप्त, राँगेय राघव, अमृत राय इत्यादि अपने उपन्यासों में माक्र्सवाद से जिस तरह की प्रेरणा ग्रहण करते हैं, उस तरह की प्रेरणा जैनेन्द्र और अज्ञेय फ्रायड से ग्रहण नहीं करते। फ्रायड ही क्यों, मनोविश्लेषण संप्रदाय में आनेवाले दूसरे धड़ों को भी गिनती में शामिल कर लिया जाए, तो वे ऐसी प्रेरणा ग्रहण करते नहीं दीखते। ऐसे में फ्रायड को, या मनोविश्लेषण के नाम से प्रचलित ‘फैमिली आफ स्कूल्स आफ साइकालजी’  को मनोवैज्ञानिक कथा-धारा का मूल प्ररेणा-स्रोत बताना बड़ा कठिन था। यानी मूल संकट यह था कि फकत चार उपन्यासकारों में से दो दिग्गजों को निकाल कर अलग श्रेणी बना दें, तो फ्रायड की गंगोत्री से निकलती धारा लुप्तप्राय हो जाएगी और अगर चारों को एक साथ रखें, तो फ्रायड को उसकी गंगोत्री बताना मुश्किल होगा। जैसा कि पीछे कहा जा चुका है, इसका एक उपाय आलोचकों ने ये निकाला कि ‘एक ओर माक्र्स तो दूसरी ओर फ्रायड’ वाले सूत्र का उल्लेख प्रेमचंदोत्तर उपन्यास के आरंभिक परिचय में तो कर दिया, पर उसके बाद रचनाओं में सिद्धांत के उपयोग के नमूने तलाशने का जोखि़म नहीं उठाया। यानी वे सामान्यीकरण की प्रक्रिया में निहित चुनौती को ही अनदेखा कर आगे बढ़ गए। कुछ और लोगों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और तब उन्हें जो कुछ करना पड़ा, उसके नमूने हम पीछे देख चुके हैं।
कहने का मतलब ये कि रचना और सिद्धांत के साथ बरती गई ज्यादतियों के उपर्युक्त उदाहरण किन्हीं दो या तीन आलोचकों/शोधर्थियों की सीमाओं का निदर्शन भर नहीं हैं। ये हमें ठोस कारण देते हैं कि हम क्यों साहित्येतिहास के एक महत्वपूर्ण सूत्रीकरण पर पुनर्विचार करें, उसे ख़ारिज करने या बदलने की बात करें, और साथ-ही-साथ यह देखें कि प्रेमचंदोत्तर उपन्यास के प्रसंग में अकादमिक आलोचना का फ्रायड-मोह क्या सचमुच चुस्त-दुरुस्त किस्सा गढ़ने में मददगार ‘कथानक-रूढि़यों’ का ही मोह है ?

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