जाने-माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा (11 जनवरी, 1942 – 25 फरवरी, 2011) की कहानी-
पाटानाला से कोई सौ गज आगे जाने पर दाहिने हाथ जो गली है उसमें बीसेक मकान होंगे, सभी एक-दूसरे से चिपके-चिपके कुछ ऐसे कि गली के मुहाने से सब एक ही मकान का आभास देते हैं। उनके रूप-रंग भी मिलते-जुलते। लगता लकड़ी के पुराने नक़्काशीदार, कोलतार-पुते खम्भों पर टिकी उनकी छतें जैसे नाले के ऊपर तक पहुँच रही हैं और हैरत से आगे फैले संसार को देख रही हैं। छतें ऐसी कि नजरें टपककर उनके नीचे के बरामदों में गिर जाएँ और जरा-सा उठकर दीवानखाने से होते हुए अन्दर आँगन तक चली जाएँ और चारों ओर के बरामदों में सिलसिलेवार बने कमरों को देखकर औचक हो जाएँ—अंदर क्या होगा मालूम नहीं; यहाँ से नजरें वहीं तक जा पाती हैं और पुराने अँधेरे में गुम हो जाती हैं।
सभी मकान खस्ताहाल! गोया सौ-डेढ़ सौ साल की उमर तो पार ही कर चुके हैं और उम्रदराजी की झुर्रियाँ लटकाये अपने झाँर्इंपन में पुराना उजास देखने की कोशिश कर रहे हों। पाँच-सात मकानों को छोड़ सबके रंग-रोगन उड़ चुके हैं। जिन पर रंग चढ़े हैं उन मकानों के बच्चे शायद बाहर कहीं ऐसा काम कर रहे हों कि रंगाई-पुताई, घर-खर्च के लिए कुछ पैसे यहाँ भी भेज रहे हों पर उनके पपड़ाये रंगों के पीछे से पुरानापन झाँक रहा है। इस पीढ़ी के दादा-परदादाओं ने कभी यहाँ जिन्दादिली और अपने तरीके के शान-ओ-शौकत के दिन गुज़ारे होंगे। अब तो यह पीढ़ी अपनी दाल-रोटी और आबरू बचा ले जाए यही बहुत है। उन्होंने अपने तरीक़े से ऐश किया, बच्चों के लिए कुछ खास नहीं छोड़ सिवा इन मकान के और कुछ सामानों व घर की व्यवस्था के! उन्हें अन्दाज भी न होगा कि ज़माना कुछ ऐसा आएगा कि बच्चों की हालत हमसे बेहतर न होगी और मकानों पर रंग चढ़ाना भी मुश्किल हो जाएगा- पीपल के पत्ते-सा कल को उन्होंने नहीं देखा, देखा अपने आज को!
जो भी हो अब इन घरों के लोगों के पास छोटी नौकरियाँ, दुकानें, रोजगार के कुछ अन्य छोटे-मोटे धंधे हैं जिनसे इनके दिन कटते हैं। शहर के नये मुहल्लों व नयी कॉलोनियों की तुलना में यहाँ पड़ोसन, जिन्दादिली और भाईचारा ज़्यादा है। जितना वक्त इन्हें मिलता है उसमें हँसी-मजाक, सुख-दु:ख, राय-मशवरा सब कुछ चलता। कुल मिलाकर गली एक बड़ा-सा परिवार लगती जिसमें अलग-अलग कौम के लोग थे पर सबके बीच हँसी-ठट्ठा, दु:ख-दर्द का बँटवारा, उधार-पैंचा भी चलता औऱ सब एक-दूसरे के भाई-बहन, चाचा-भतीजा, अम्मा-दादी, फूफी-मौसी, देवर-भाभी, बाबा-दादा का रिश्ता और छोटे-बड़े का लिहाज भी बरकरार था। इस गली की पहचान ही थी इसका सदाबहारपन, गो कि इसमें कमी आनी शुरू हो गयी थी। जिन्दगी के कठिन मरहले थे जिनके हल पैसों से ताल्लुक रखते थे पर अभी वे गली के नये-पुराने लोगों पर हावी नहीं हुए थे। असर बहुत धीरे हो रहा था और ऐसे असर को कम-से-कम इस गली में रोकने की कोशिश भी चलती रहती थी। आज के समय में भी गली खुशहाल थी, रौशन थी और जिन्दादिली के झोंके आया करते थे।
ऊपरी तौर पर यह अकेली गली खुश थी पर थी तो वह बदलते हुए एक बड़े शहर के बीच में ही जहाँ ज़िन्दगी और व्यवहार के तमाम तौर-तरीके बदल रहे थे। पहले जहाँ कोई पाटावाली गली पूछकर इन घरों में ठीक-ठाक से पहुँच जाता था अब उसे कई गलियों में भटकते और काफी पूछताछ के बाद पहुँचना सम्भव हो पाता था। जब से आबादी औऱ व्यवसाय के रूपों में बढ़ोत्तरी व बदलाव आया है, कई तरह की दुकानें, धन्धे, छोटी-छोटी कम्पनियाँ के छोटे-छोटे दफ्तर खुल गए हैं। अब कई घरों में ही फैक्ट्रियाँ जैसी चीजें लग गयी हैं। पुरानी पीढ़ियाँ लगभग निकल चुकी हैं और नयी पीढ़ियाँ आ चुकी हैं जो इस गली में भले ही न दिखाई देती हों पर गली से बाहर होते ही दिखाई देने लगती हैं। यहाँ तक कि अब इस गली की डाक भी गड़बड़ाने लगी है। पहले ‘नाम, पाटावाली गली’ के पते पर ही डाक आ जाती थी। यहाँ के लोगों को गुमान भी नहीं था कि इस पते पर अब डाक गड़बड़ाएगी। हो भी क्यों न! नयी पीढ़ी के नये धन्धे। लोग-ही-लोग, सवारियों की भरमार, खरीददारों की रेलम-पेल। पहले की तुलना में हज़ारों तरह के सामान और जरूरते जैसे सबके जीने का नक्शा ही बदल गया हो। तीन चौथाई लोग घर से जल्दी निकलते, शाम-रात के बीच घर लौटते। कुछ लोगों की तो देखा-देखी कई दिनों बाद होती, दुआ-सलाम कम होते पर जब होते तो बड़ी गर्मजोशी और हमदर्दी से। गनीमत थी गली अभी जीवित बची थी पर लोगों को परेशानी तब हुई ज्यादा जब मकान नम्बर- पाँच, ग्यारह और पन्द्रह के नाम आए मनीआर्डर वापस लौट गए, डाकिया इनमें दिये पते पर पहुँच नहीं पाया। इन घरों के बच्चे बाहर रहते थे और अपने परिवार के खर्चे के लिए पैसे भेजते थे। महीने का पैसा जब नहीं आया, बुजुर्ग परेशान हुए, डाकघर में दौड़-धूप की तो पता चला इन नामों के मनीआर्डर वापस कर दिए गए हैं क्योंकि डाकिए को पते मिले नहीं। अब आप लोग पता ठीक कराएँ तब डाक मँगाएँ। इस गली वालों के लिए यह एक नई आफत थी, कोफ्त अलग, पैसों के लाले अलग। पोस्टमास्टर ने सुझाव दिया, ‘गली का कोई नाम रखिए। नाम महापालिका में रजिस्टर कराइए। पाटानाला के पास अब कई गलियाँ हैं इसलिए नाम जरूरी है।महापालिका नाम हमारे पास भेजेगी फिर आपको डाक मिलने लगेगी। महापालिका का काम देर-सबेर होता रहेगा, यहाँ इस पोस्ट ऑफिस में गली के नाम की इत्तिला देकर जाइए अपने बाल-बच्चों को नया पता नोट कराइए। कोई दिक्कत नहीं होगी।’
इस गली में रहने वालों के सामने एक नया झमेला खड़ा हुआ- ‘इस तरह तो हम सबसे कट कर रह जाएँगे। कोई हल तो ढूँढ़ना ही होगा।’
इस मसले को लेकर यहाँ के बुजुर्गों ने जल्दी-जल्दी कई बैठकें कीं पर गली का कोई माकूल नाम सूझा नहीं। कुछ नौजवान भी थे गली में, लेकिन वे अपने कामधन्धे में इतना फँसे रहते कि ऐसी बैठकों में आने का उनके पास वक़्त ही नहीं। बुजुर्गों को सूझ नहीं रहा था कि इसका क्या नाम रखा जाय ताकि पता सटीक हो क्योंकि अब तो आसपास भी कई गलियाँ बस गई हैं। पहले उनमें इक्का-दुक्का लोग थे अब वहाँ नये व्यवसायी व कुछ किराएदार आ गए हैं। व्यवसायियों ने वहाँ बड़े-बड़े मकान बनवा लिए हैं, कुछ किराए पर उठाये है, कुछ खुद उनकी रिहाइश हैं; कुछ में घरेलू फैक्ट्रियाँ। अतंत: बुजुर्गों ने तय किया कि गली के नौजवानों को शामिल किए बिना गली का नाम तय नहीं हो सकता। बाजार की साप्ताहिक बन्दी का दिन तय हुआ और यह कि सबको बताया जाय और इस दिन की बैठक की अहमियत बतायी जाय।
नाम छोड़कर गली का हाल पुराना ही था-गुलज़ार- गुलज़ार-सा। गली के करीब आधा रिहाइशों की महिलायें अपने घर का सारा काम खुद करती थीं। झाडू, पोंछा, बर्तन, कपड़ा-सफाई, सब्जी, सौदा-सुलुफ। इनके साथ घर के मर्दों की ताबेदारी जो इनके स्वभाव का हिस्सा बन चुकी थी- दादी, अम्मा, बुआ,चाची, दीदी ने यही सिखाया था। शुरू में यह सिखाना-सीखना बड़ा नागवार गुज़रा होगा पर घुट्टी पीते- पीते आदत हो गई, अब रूटीन!
गली के मर्द भी हिंसक नहीं थे, शायद हिंसक होने की उनकी उम्र बीत चुकी थी। वे भी जानते थे प्यार-मुहब्बत की बातें और अपनत्व दिखा कर महिलाओं से जो चाहो करा लो। पुराने बाप-दादाओं ने सामंती संस्कार का यह छोटा-सा टुकड़ा अपने बच्चों में डाल दिया था यह सोचकर कि बाकी तो वे सँभाल ही लेंगे। इसका असर भी गली में दिखाई देता। वहाँ सबमें एक शांति और समझदारी दिखाई देती- अक्सर हँसी-ठट्ठा मजाक यानी गली में एक गुलजार बना रहता। दूसरी गलियों वाले इससे रश्क करते, उनके यहाँ तो आए दिन झांऊ-झांऊ मची रहती। वहाँ की महिलाएँ इस गली का हवाला देकर मर्दोंका गुस्सा और बढ़ा देतीं। इस गली के गुलज़ार रहने का एक बड़ा कारण और भी था। यहाँ के बाकी रिहाइशों में महरी काम करती। महरी क्या, वह तो घरों के सदस्य की तरह थी। जहाँ काम करती वहाँ की तो वह थी ही बाकी घरों की भी वह अपनी ही थी। इस गली में बस एक ही महरी का प्रवेश था। वह सबका हाल लेती। दादी, अम्मा, चाची, भाभी, दीदी का रिश्ता जोड़कर कभी हँसी-मज़ाक भी कर लेती, सबसे मीठे बोल, कभी सौदा-सुलुफ भी कर देती। इस तरह वह पूरी गली की एक ऐसी सदस्य थी जिसमें ऊर्जा और उत्साह भरा हुआ था। लोग उसे देखकर अपना आलस्य तोड़ देते। नाम उसका रामकली- कली की तरह खिली औऱ तनी हुई- सुगन्ध फेंकती, गली में घुसती तो गली हरसिंगार की तरह महक उठती।
दूसरी गलियों वाली सब जली रहतीं इस गली के गुलजारपन से। कहतीं रमकलिया का मन तो उसी गली में रमता है। हमारी तो वह सुनती तक नहीं। आवाज दो तो ऐंठ कर चली जाती है। वहीं कमाएगी, वहीं खाएगी, हँसी-ठट्ठा करेगी जैसे वह उसकी कामवाली गली न होकर नैहर-ससुराल हो। रमकलिया को कहीं खोजने जाने की जरूरत नहीं। जिसे खोजना हो पाटानाला की सबसे पुरानी गली में चला जाय कहीं-न-कहीं मिल ही जाएगी बतक्कड़ करते जवानी की ऐंठ दिखाती हुई। बेशरम को लाज-हया तो है नहीं। छोकड़ों के सामने तो छोड़ दो, बुजुर्गों के सामने भी दाँत दिखाती रहती है। चाचा-बाबा कहकर मटकती रहती है। उनके बीड़ी-तम्बाकू ला देती है, नसीहत भी देती है पर उनका कहा टालती भी नहीं। सबके दिल में घुसी हुई है…
पाटानाला की इस गली के आजू-बाजू की गलियों के, गली के मुहाने के लगभग सभी लोग रमकलिया को जानते हैं- उसकी चाल-ढाल को लेकर, बेबाकी को लेकर, सीन को लेकर, ‘नयनों से चलते बाण’ को लेकर और उसके उद्धत स्वभाव को लेकर- ‘कहीं कुछ कहा और वह चढ़ न बैठे।’ ललचाई व चोर नजरों से लोग उसे देखते, शायद मन-ही-मन आहें भी भरते हों पर सामने से कुछ नहीं। कभी चिढ़ में, कभी हँसी में कहते- ‘‘रमकलिया की तो एक ही गली है, उसी के लिए बनी है वह गली। वहाँ रहने वाले भी कैसे लोग हैं चमारिन को रखे हुए हैं। कोई भेदभाव नहीं, जैसे घर की लड़की हो, धरम का नाश कर रखा है। क्या हिन्दू, क्या मुसलमान। सभी घरों में वैसे ही जाती है। क्या कर रखा है इसने सब पर!’
कलाली, चिक्किन, टोला पार करते हुए बेधड़क चलीआती है अपनी गली में। भला कोई डर-भय है उसे, उतान हुई चलती रहती है हिरणी जैसी। एक पल में यहाँ, दूसरे पल वहाँ।
अरे! उसे क्या डर-भय। वह तो खुद ही धड़काए रहती है सबको। पिछले साल का वह किस्सा याद नहीं जब भवानी क्लॉथ स्टोर के मालिक के बेटे ने रास्ते में उसका हाथ पकड़ा था तो उसे वहीं पटककर मारा था रमकलिया ने- ‘छैलागिरी दिखाता है? बहू-बेटियों की इज्जत पर हाथ डालना चाहता है? हाथ तोड़ बाप के पास भेज दूँगी।’ सड़क, गलियारा सब सन्न! लोग ठिठके दखते रहे। दो-चार लात उसने उसके कूल्हे पर लगाई और सीधे अपनी गली में चली गयी थी।
पहले लोग छूत-अछूत के डर से रामकली से नहीं लगते थे, इस घटना के बाद उसके साहस से, अब उसके टपर-टपर बेबाक बोलने से जैसे दुनिया भर की जानकारी उसी के पास, सवर्ण और दलित का मसला वह जानती है, दलित भी आदमी हैं यह वह जानती है, अपने पर आक्रमण करने वालों को सबक सिखाना वह जानती है- गली के बुजुर्गों ने उसे क्या-क्या नहीं बता दिया है आज के समय और समाज के बारे में जैसे वह उस गली की बेटी हो, कोई कुछ कहकर तो देखे। भवानी के बेटे वाली घटना के बाद गली के सब लोगों ने भवानी से शिकायत की, आगे कोर्ट जाने की बात कही तब वह गिड़गिड़ाया- ‘कोर्ट-कचहरी में हम फँसे दादा तो रोटी-दाल कैसे चलेगी। माफ करना….’ लोग भड़ास निकालते- ‘उसका क्या ठिकाना, जरा-सी टोक-टाक पर वह किसे क्या कह दे, गाली-गुफता, मार-पीट पर उतारू हो जाए।’
अब तो जमाना ही बदल गया न! मुसहर, चमार तो घर में घुसे रहते हैं औऱ ये शरीफ़ लोग, बुजुर्ग लोग उसे बेटी बनाए हुए हैं। आदमी, जाति-धरम का फ़र्क ही मिटा दिया है। अपना ही धरम बिगाड़ रहे हैं। वह तो अपने को दलित मानती ही नहीं उसकी चाल, बातचीत देखो तब समझोगे- जमाना बदल रहा है तेज़ी से। रामकली जब अपनी गली आती-जाती है तो नुक्कड़ पर खड़े लड़कों के दिल जलते हैं। कहते हैं ‘हमारी गली में तो आओ रामकली। हम बताएँगे कि गली क्या होती है’। जिन लोगों ने भवानी और उसके बेटे का हाल देखा है वे समझाते हैं छोकरों को- ‘रमकलिया से न लगना, लोक-परलोक बिगाड़ देगी। उसके बहुत सारे बाप-भाई हैं यहाँ…’
रामकली, जैसे सूरज के साथ झम्म-से गिरती है गली में और बहार आ जाती है। बूढ़े-बुजुर्ग सभी उठकर अपना हुक्का-पानी सँभालते हैं। सबका हाल लेती है रामकली। यह उसका रोज का काम है।
गली के ही बुजुर्ग बताते हैं- ‘बहुत पहले नक्खास से आगे ‘चमरटोली’ में रहते थे रामकली के घर वाले। समय के साथ इधर-उधर बिखर गए, कोई जूता-चप्पल का काम करता, कोई म्युनिस्पैलिटी में लग गया, कोई बिखरते हुए नवाबों के पड़पोतों के यहाँ सफाई के लिए चला गया। यह लड़की हमारे सामने बड़ी हुई। घर वाले इधर-उधर हुए। माँ ने मिट्टी, अद्धा, फूस, टाट, सेवार वग़ैरह से लीप-लापकर नाले के किनारे एक कोठरी-सी बनाई। हमारे पास आई, हमने काम कराया अब वह बूढ़ी लाचार-सी है। रामकली ही उसकी बेटा-बेटी है। हमारे यहाँ की घरवालियों ने उसे बेटी-सा माना अब वह हमारी गली की शोभा है- निडर, दिलेर और समाज को समझने वाली। आज भी रोज कुछ-न-कुछ पूछती-जानती रहती है…’
ऐसी रामकली के बुजुर्ग परेशान हैं कि उनकी गली का नाम क्या रखा जाय। जब तक गली का नाम दर्ज नहीं होगा उनका नाता-रिश्ता दुनिया से टूट जाएगा। उनके बाल-बच्चों का हाल उन्हें नहीं मिलेगा। शहर के ही नये लोग भटक जाएँगे। बुजुर्गों और गली के सभी लोगों में इस बात से परेशानी है। सब प्रतीक्षा में हैं कि कितनी जल्दी बाजार की साप्ताहिक बन्दी हो और पूरी गली के लोगों की मीटिंग हो। कोई नाम उभर कर आ जाए। ऐसा नाम जिससे सभी गली को पहचान लें। गली की एक छवि बने औऱ इसके नाम में अपनापा हो। बुजुर्गों की अपनी बातचीत में, रोज के मिलने-जुलने में भी गली के नामकरण का ज़िक्र निकल आता। लोगों का सोचना था किसी मजहब, सम्प्रदाय, देवी-देवता, अल्लाह-पैगम्बर, नेता आदि के नाम पर गली का नामकरण हो। लेकिन मुश्किल थी कि गली में कोई ऐसा बड़ा आदमी भी नहीं हुआ था जिसके नाम पर सबकी सहमति हो।
असमंजस की स्थिति में साप्ताहिक बन्दी का दिन आया। ग्यारह बजे दिन में बैठक-बैठी- बुजुर्ग, युवा, अधेड़ सब थे, कुछ महिलाएँ भी। रामकली समझ नहीं पा रही थी सब लोग इकट्ठे क्यों हुए हैं उसकी उत्सुकता बढ़ी हुई थी। बैठक में बुजुर्गों ने असली बात साफ की कि गली का नाम अब क्यों जरूरी हो गया है। देश-दुनिया से जुड़े रहने के साथ अपनी पहचान का भी सवाल था और गली को एक नया नाम देने का भी जिसमें आत्मीयता हो, अपनापन हो, एका हो और तुरंत लोगों की जबान पर नाम चढ़ जाए। उससे लगाव भी हो। सबने अपने-अपने सुझाव रखे पर बात बन नहीं रही थी। युवाओं की समझ में कुछ आ नहीं रहा था। अधेड़ भी अब चाह रहे थे किसी नेता के नाम पर सहमति हो और छुट्टी हो। काफ़ी समय बीत गया था सभी उठना चाहते थे, सबकी घर-गृहस्थी थी, आराम का दिन था, कई काम निपटाने थे, लोगों में निराशा भर रही थी इतनी कोशिशों के बावजूद असफलता! अन्त में पाँच नम्बर मकान वाले बुजुर्ग उठे- ‘भई! मैं थक गया, अब बैठ नहीं सकता। नाम नहीं सूझ रहा तो मेरी मानो। नाम रखो ‘गली रामकली’।’ सबने एक दूसरे को देखा और मुस्कुराए चेहरे पर था गहरा संतोष!



बेहतरीन…
दीप हम ऐसे जलायें
दिल में हम एक अलख जगायें..
आतंकवाद जड़ से मिटायें
भ्रष्टाचार को दूर भगायें
जन जन की खुशियाँ लौटायें
हम एक नव हिन्दुस्तान बनायें
आओ, अब की ऐसी दीवाली मनायें
पर्व पर यही हैं मेरी मंगलकामनायें….
-समीर लाल ‘समीर’
http://udantashtari.blogspot.com
बहुत बढ़िया कहानी, बहुत रोचक चित्रण है….
- आनंद